Monday, January 12, 2015

REBIRTH पुनर्जन्म :: HINDU PHILOSOPHY (5.4) हिंदु दर्शन

REBIRTH पुनर्जन्म
 HINDU PHILOSOPHY (5.4) हिंदु दर्शन
CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM
By :: Pt. Santosh Bhardwaj
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ॐ गं गणपतये नम:।
अक्षरं परमं ब्रह्म ज्योतीरूपं सनातनम्।
निराकारं स्वेच्छामयमनन्तजम्॥
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि
[श्रीमद्भगवद्गीता 2.47]
प्राणी को मोक्ष की प्राप्ति तक 84,00,000 योनियों से गुजरना पड़ता है, जिनमें वह पाप-पुण्य के परिणाम स्वरूप सुख-दुःख भोगता है। यह साँप और सीढ़ी के खेल की तरह है। उसे जघन्य अपराधों की वजह से नरक, यज्ञादि के फलस्वरूप स्वर्ग और पुण्यों और ईश्वराधना, जप-तप के फल स्वरूप मोक्ष की प्राप्ति होती है। नरक और स्वर्ग से वह पुनः पृथ्वी पर अन्यानेक योनियों में जन्म लेता है।
 अगर कोई किसी को दु:ख पहुँचाता है और उसके प्राण लेता है, तो पाप से उसका जन्म-मरण नहीं छूटता। वह बार-बार जन्म लेता और मरता है। इससे मनुष्य का जन्म पाकर धर्म बढ़ाना चाहिए। आदमी को हाथी से लेकर चींटी तक सबकी रक्षा करनी चाहिए। जो लोग दूसरों के दु:ख को नहीं समझते और उन्हें सताते हैं, उनकी इस पृथ्वी पर उम्र घटती जाती है और वे लूले-लँगड़े, काने, बौने होकर जन्म लेते हैं और सभी तरह के कष्ट भोगते हैं।[बैताल पचीसी]
इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत।
सर्वभूतानि संमोहं सर्गे यान्ति परन्तप॥
हे भरतवंश में उत्पन्न शत्रुतापन अर्जुन! इच्छा-राग और द्वेष से उत्पन्न होने वाले द्वन्द-मोह से मोहित सम्पूर्ण प्राणी संसार में अनादिकाल से मूढ़ता को, जन्म-मरण को प्राप्त हो रहे हैं।[श्रीमद्भगवद्गीता 7.27]
Hey Arjun! The tormentor-harasser of the foes born in Bharat dynasty! Desires, attachments, allurements aided by enmity generate-create, never ending chain of struggle (problems, tensions, troubles, tortures), affections & illusions in the creatures, which pushes them to imprudence, ignorance, congenital idiocy creating  a web of repeated birth & deaths ever since the universe came into existence.
इच्छाएँ और द्वेष मनुष्य के मस्तिष्क में ख़लल (खराबी, द्वंद-मोह) उत्पन्न करते हैं। कामनाओं की ये ऐसी दलदल हैं, जिसमें मनुष्य एक बार फँसा तो बाहर निकलना बड़ा मुश्किल है। पुनर्जन्म का मूलभूत कारण कभी खत्म न होने वाली इच्छाएँ हैं, जो खत्म होने का नाम ही नहीं लेती। इस दलदल से वही निकल पाता है, जिसने स्वयं को परमात्मा के आगे समर्पित कर दिया हो। डूबते को तिनके का सहारा बन जाता है, हरी स्मरण! प्रभु की शरण में जाते ही, मोह के बंधन कटने लगते हैं और मुक्ति-मोक्ष का मार्ग प्रशस्त हो जाता है।
Never ending desires create obstacles-disturbance in the thinking process of the humans. Prudence is lost and the individual starts sinking in the swamp of lust, sensuality, sexuality, possessions, wealth, comforts and distances himself from the God. This leads him to unending process of births & deaths, like the spider's web. There is no end to desires, which can be reined through the worship, asylum under the God. One, who is drowning seeks protection from the smallest possible source like a straw, then why not the Almighty HIMSELF! The moment one goes to HIM, his problems starts reducing slowly and gradually, bit by bit. Never expect miracles. Sins of billions of births can not be cut over night. Have faith in HIM and the bonds of sins will be cut leading to Liberation-Salvation, slowly, gradually but certainly.
यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्। 
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः॥
हे कौन्तेय अर्जुन! मनुष्य अन्तकाल में जिस-जिस भी भाव-योनि का स्मरण करते हुए शरीर छोड़ता है, उसी भाव में तन्मय चित्त होने के कारण वह, अंतकाल के उस भाव से भावित होकर उस-उस योनि को ही प्राप्त करता है।[श्रीमद्भगवद्गीता 8.6] 
One moves to that species (takes birth, reincarnation) which he was thinking of, at the time of his death.
वर्तमान जीवन में मनुष्य का जिन-जिन लोगों लगाव, द्रोह, शत्रुता आदि थी, अगर वह मृत्यु के समय उन्हें याद करता है, उनका चिंतन करता है तो, वो उन्हीं के बीच फिर से जन्म लेगा। अगर वह किसी पशु-पक्षी से लगाव के कारण उसे स्मरण कर रहा होगा तो, उस योनि में चला जायेगा। 
One developed relations with innumerable people throughout his life. He could not detach himself from these bonds, enmity, affections etc. and kept remembering them at the last moment. His memory-remembrance of such events, people, sensuality, passions will direct him to these people, families, country after the death for rebirth. If he had developed love and affection for his pets, birds, animals, reptiles he will certainly go to these species in new incarnation. It shows the importance of the last moments in the life of a person. Relinquished King Bharat, an incarnation of the Almighty; too got birth as a deer due to his attachment for the deer nursed by him.
आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन। 
मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते॥
हे अर्जुन! ब्रह्मलोक तक सभी लोक पुनरावर्ती वाले हैं अर्थात वहाँ जाकर पुनः वापस लौटकर संसार में आना पड़ता है; परन्तु हे कौन्तेय! मुझे प्राप्त होने पर पुनर्जन्म नहीं होता।[श्रीमद्भगवद्गीता 8.16] 
The Almighty Bhagwan Shri Krashn told Arjun that all abodes till Brahm Lok attained by the Yogi, ascetic, devotee are subject to return to the earth after enjoying the fruits of their effort-endeavour. The organism does not obtain Salvation. But, if he achieves the Ultimate Gau Lok or Vaekunth Lok, he does not return to earth i.e., he is freed from the vicious cycles of birth and death.
नर्कों से लेकर ब्रह्म लोक पर्यन्त समस्त लोक मनुष्य को कर्म फल भोगों के उपरान्त पुनः पृथ्वी लोक पर भेज देते हैं। समस्त भोग स्थलों में ब्रह्म लोक सर्वोच्च है। मृत्युलोक में राजा होना, स्त्री-पुरुष, परिवार आदि सभी उसके अनुकूल हों, युवावस्था हो शरीर निरोग हो, यह यहाँ का सुख है। इससे अधिक सुख मर्त्य देवताओं को मिलता है जो मृत्यु के बाद पुण्य कर्मों के आधार पर देव लोक प्राप्त करते हैं। इनसे अधिक सुख आजान देवता पाते हैं जो कल्प के अंत तक देवता बने रहते हैं। इनसे अधिक सुख इन्द्र के लोक स्वर्ग में है और सबसे अधिक सुख ब्रह्म लोक में है। परन्तु अनन्त सुख तो केवल भगवत्प्राप्ति में ही मिलता है। देव-ब्रह्मा जी के दर्शन मात्र से मुक्ति नहीं मिलती; यह परम पिता परमेश्वर में लीन और एकाकार होने पर मोक्ष से ही प्राप्त होती है। अनन्त  ब्रह्मांडों का सुख भी मनुष्य को पूर्ण रूपेण सुखी नहीं कर सकता। 
The organism-humans are sent back to earth after experiencing the impact of their Karm-deeds from the hells and the heavens, including the highest the Brahm Lok. Brahm Lok provides the best possible comforts, one can think of. Still one can not stay there forever. The human as a king with family, relatives, wife, children, good health and youth is most comfortable. Next stage is that of the Marty demigods-deities. Higher than them are the Azan demigods, deities, who retain this form till one day-Kalp of Brahma Ji is there. The heaven of the Indr provides more pleasure, sensuality, sexuality, comforts, luxuries, passions to the devotee, ascetic-Yogi. Above them all these, is the Brahm Lok. Since, the Brahm Lok too is perishable, its residents too are sure to be eliminated-expelled after the designated period. If one thinks that he will continue to have comforts-pleasure just by seeing the deities, demigods or the God, he is mistaken, since its not the gesture-meeting with the God, but the faith-feelings which relieves one from the unending cycles of birth and death.  One who achieve the Gau Lok or Vaekunth Lok is sure to stay there, since they are out of reach for the time.
अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे। 
रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके॥
ब्रह्मा जी के दिन के आरम्भ में अव्यक्त (ब्रह्मा जी के सूक्ष्म शरीर) से सम्पूर्ण शरीर पैदा होते हैं और ब्रह्मा जी की रात के आरम्भ काल में उस अव्यक्त नाम वाले  (ब्रह्मा जी के सूक्ष्म शरीर) में ही सम्पूर्ण शरीर लीन हो जाते हैं।[श्रीमद्भगवद्गीता 8.18]
All manifestations-organism, weather material or divine, evolve from the creator-Brahma Ji during the creative cycle-beginning of his day (evolution, Kalp, Sarg) and then they merge-assimilate back into him during night (annihilation, Praly, devastation)  of Brahma Ji during the destructive cycle. 
व्यक्त-मूर्त शब्दों का प्रयोग भौतिक और दैवीय सृष्टि के लिए किया गया है। ब्रह्मा जी के सूक्ष्म शरीर से दिन (कल्प, सर्ग, सृष्टि रचना) की शुरुआत में समस्त प्राणियों का उद्भव-विकास होता है और रात्रि-प्रलय में समस्त जीवधारी उन्हीं में लीन हो जाते हैं। महाप्रलय उस वक्त होता है, जब ब्रह्मा जी अपनी आयु पूरी कर लेते हैं और महासर्ग तब होता है, जब ब्रह्मा जी परमात्मा से पुनः प्रकट होते हैं। ब्रह्मा जी पर्यन्त सभी प्राणी-लोक काल के अंतर्गत हैं। परमात्मा कालातीत हैं। ब्रह्मा जी के दिन और रात की गड़ना सूर्य से नहीं अपितु प्रकृति से होती है। ब्रह्मा जी में लय होते वक्त प्राणी के गुण-दोष आत्मा में बने रहते हैं और नये सर्ग में उत्पत्ति होने पर पुनः प्रकट हो जाते हैं। 
The physical-material & divine manifestations are used to illustrate the defined body form-shape & size. All organism take birth from the micro-minute body form of Brahma Ji to convert into visible (macro, vast forms), species of the universal creations. This process begins at the dawn of Brahma Ji's day. As soon as one day of Brahma Ji is over, the night falls and devastation takes place concluding the entire living world-abodes. They all assimilate in him. All abodes till Brahm Lok are perishable in due course of time except the Gau Lok and Vaikunth Lok. Only the Almighty is free from the clutches of time-death. Longevity of the Brahma Ji's day & night is not measured by the solar scale. Its measured through nature's other parameters. The traits, virtues, defects, qualities, characterises remain in the soul and reveal as soon the next phase begins and the soul acquires new body, according to remaining deeds.
भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते। 
रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे॥
हे पार्थ! उन्हीं प्राणियों का यह समुदाय उत्पन्न हो-हो कर प्रकृति के परवश हुआ ब्रह्मा जी के दिन के समय उत्पन्न पुनः होता है और ब्रह्मा जी की रात्रि में लीन हो जाता है।[श्रीमद्भगवद्गीता 8.19]  
The same multitude-quantum of beings comes into existence again and again at the beginning of evolution-creative cycle and is annihilated, inevitably, at the time of devastation (doom's day, the destructive cycle).  
प्राणियों का यह समुदाय वही है, जो परमात्मा का स्वरूप है और आदि काल से जन्म-मृत्यु के बंधनों में जकड़ा हुआ है। पदार्थ-शरीर तो बदलता रहता है, क्योंकि वो निर्जीव सम्बन्ध नहीं रखता, मगर प्राणी संबंधों से स्वयं को मुक्त नहीं कर पाता। प्राणी का जन्म-जन्म का बंधन उसका स्वयं संचित किया हुआ है, क्योंकि वो उसे अपना मानता है। जब वह इसको अपना मानता है तो इसके-प्रकृति के, परवश-परतंत्र हो जाता है। सुख की इच्छा उसे मुक्त-स्वतंत्र नहीं होने देती। यही इच्छा उसे अवश (बेबस-लाचार) बना देती है। इस प्रकार वह जन्म-मृत्यु का ग्रास बनकर ब्रह्मा जी के दिन में बार-बार जन्म लेता हुआ, अन्ततोगत्वा पुनः ब्रह्मा जी की रात्रि में-प्रकृति में लीन हो जाता है। 
Entire group of creatures-organism is the same which is a replica of the Almighty, but remains away from-aloof from HIM due to his desire for comforts. It passes through numerous species-incarnation due to the feeling of oneness with the physical-material body. He considers this body to be his own. He performs to seek success-pleasure and makes him rigidly tied to the body. The body falls after death but the relations persists, even after the death. The chain continues for 4.32 billion solar years during Brahma's day (Kalp, Sarg) and assimilation in nature remains thereafter for the next evolution and then he again roam in various species till he understand-realise the gravity, magnitude-importance of Salvation-devotion to the Almighty-God and start makes endeavours to achieve it. Its a game of snake and ladder.
पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्‌क्ते प्रकृतिजान्गुणान्। 
कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु॥
प्रकृति में स्थित पुरुष (जीव) ही प्रकृति जन्य गुणों का भोक्ता बनता है और गुणों का संग ही इसके ऊँच-नीच योनियों में जन्म लेने का कारण बनता है।[श्रीमद् भगवद्गीता 13.21]
The Purush-organism present in the nature-world, becomes the consumer of the qualities-traits associated with it and its association with them leads to birth-reincarnation in higher or lower species.
प्रकृति के तादात्म्य स्थापित होने पर प्राणी-मनुष्य में, मैं-मेरा, सुख-दुःख की भावना बनती है और उसे प्रकृति जन्य गुणों का भोक्ता बनाती है। जिन योनियों में सुख की बहुलता होती है, उनको सत्-योनि कहते हैं। जिन योनियों में दुःख की बहुलता होती है, उन्हें असत्-योनि कहते हैं। सत्-असत् योनियों में जन्म लेने का कारण गुणों का संग ही है। सत्त्व, रज और तम, ये तीनों गुण प्रकृति से उत्पन्न होते हैं। इन तीनों गुणों से ही सम्पूर्ण पदार्थों और क्रियाओं की उत्पत्ति होती है। प्रकृतिस्थ पुरुष जब इन गुणों के साथ अपना सम्बन्ध मान लेता है, तब ये ऊँच-नीच योनियों में जन्म लेने का कारण बन जाते हैं। यदि वह अपने स्वरूप में स्थित रहे, अहंता-ममता न रखे, तो वह सम हो जाता है। प्रकृति से सम्बन्ध से वह परतंत्र हो जाता है। प्रकृति के साथ सम्बन्ध अज्ञान है। 
Rapport of the organism with the nature is responsible for ego. It creates the sense of ownership resulting in pain or pleasure. The species in which the soul experience majority of pleasure is virtuous-Sat one and in which it experiences majority of pain is wicked-foul (Asat), full of vices. The birth in Sat or Asat species is the association of the soul with good or bad, virtuous or wicked deeds. Satv, Raj or Tam; the 3 attributes of deeds, are born out of nature. Interaction with these three results in the acquisition of all material objects and performances-deeds. When the organism considers himself to be related to nature i.e., a fraction of it, these attributes overpower him, resulting in his rebirth in good or bad, superior or inferior species. 
If he maintains his status of equanimity with the three attributes and perform his deeds without attachment, affection or desires, he will be free from the impact of nature & ultimately attain emancipation, salvation-freedom from reincarnations. Influence of nature makes him bonded-a slave. His association with the nature is ignorance.
यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत्। 
तदोत्तमविदां लोकानमलान्प्रतिपद्यते॥
जिस समय सत्त्व गुण बढ़ा हो, उस समय यदि देहधारी मनुष्य मर जाता है, तो वह उत्तम वेत्ताओं के निर्मल लोकों में जाता है।[श्रीमद्भगवद्गीता 14.14]  
One who dies during the dominance of Satv Gun, goes to the pure abodes of the enlightened-those who acquired virtues, righteousness, piousity in their life time.
निर्मल प्रवृत्ति के व्यक्तियों में सत्त्व गुण लगातार बढ़ता रहता है। सत्कार्य, सदाचार, पुण्यकार्य, समाजसेवा, दीन-दुःखी की मदद्, परमात्मा की भक्ति, वर्णाश्रम धर्म का पालन, तीर्थ यात्रा इत्यादि ऐसे कार्य हैं, जिनसे मनुष्य की निवृत्ति होती है। ऐसे वक़्त यदि देहान्त होता है, तो मनुष्य को उत्तम-निर्मल लोकों की प्राप्ति होती और वहाँ से लौटने पर पुण्यात्माओं के घर जन्म मिलता है। विवेकवान पुरुष उत्तमवेत्ता है। सत्त्वगुण को अपना मानकर उसमें रमण न करे और भगवान् की सम्मुखता रहे, तो सात्विक गुण से भी असंग-गुणातीत होकर भगवान् के परमधाम को चला जायेगा, अन्यथा सत्त्वगुण का सम्बन्ध रहने पर वह ब्रह्मलोक तक के ऊँचे लोकों को चला जायेगा। ब्रह्मलोक तक के लोकों में तो सापेक्ष निर्मलता है, परन्तु भगवान् के परमधाम में निरपेक्ष निर्मलता है। 
The Satv Gun keep on increasing in those people who perform pious, righteous, virtuous jobs. They keep on doing their Varnashram Dharm-duties assigned by the Shastr-scriptures. He helps the needy, poor, down trodden, visits pious-religious places, undertake pilgrimages, perform charity, attains equanimity-treats all organism at par. These activities enhances the Satv Gun in him and at this stage if one dies, he attains the highest abodes inhabited by the enlightened. But, one has to return from the highest abode and take birth in pious families on earth. If one do not involve himself in the Satv Gun as well and keep himself devoted to the Almighty, he is sure to attain the Ultimate. The Ultimate abode of the Almighty is absolute-beyond compare and no one returns from there. All abodes till Brahm Lok are meant for enjoying the output of the pious deeds, performed with motive, just like the heaven.
सूर्यग्रहण या चन्द्रग्रहण के समय भोजन करने वाला मनुष्य जितने अन्न के दाने खाता है, उतने वर्षों तक अरुतुन्द नामक नरक में वास करता है। फिर वह उदर रोग से पीड़ित मनुष्य होता है फिर गुल्मरोगी, काना और दंतहीन होता है। [देवी भागवत पुराण]
ग्रहण के समय सोने से रोगी, लघु शंका करने से दरिद्र, मल त्यागने से कीड़ा, स्त्री प्रसंग करने से सूअर और उबटन लगाने से व्यक्ति कोढ़ी होता है।
रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते। 
तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते॥
रजोगुण के बढ़ने पर मरने वाला मनुष्य कर्म संगी मनुष्य योनि में जन्म लेता है तथा तमोगुण के बढ़ने पर मरने वाला मूढ़ योनियों में जन्म लेता है।[श्रीमद्भागवत गीता 14.15]  
When one dies during the dominance of Rajo Gun, he is bound to take birth as a human being in association with performances, deeds, actions etc. One who depart with the enhanced Tamo Gun gets birth in inferior species as lower creatures.
मरते समय मनुष्य में यदि रजो गुण यथा :- लोभ, स्पृहा, अशान्ति, प्रवृत्ति आदि बढ़े हुए हैं, तो उसे कर्मों में आसक्ति रखने वाली मनुष्य योनि में ही जन्म मिलेगा। शुभ कर्म करने वाला, अच्छे संसार वाला व्यक्ति फिर से उन्हीं संस्कारों के साथ जन्म लेगा। इस स्थिति में उसे विवेक की प्राप्ति भी होती है, जिससे वह सत्संग, स्वाध्याय कर सकता है। यदि मनुष्य में मरते वक्त तमो गुण की प्रधानता यथा :- प्रमाद, अप्रकाश, मोह है तो वह कीट-पतंग, पशु-पक्षी, वृक्ष-लता, आदि हीन योनियों में पहुँचेगा। इसीलिये मनुष्य को अपने जीवन का अन्तिम समय भगवत भक्ति, भजन-कीर्तन, प्रभु का चिन्तन-मनन, ध्यान-समर्पण में लगाना चाहिये। 
One who dies with enhanced Rajo Gun like greed, disturbances, displeasure etc. is sure to get rebirth as a human being associated with numerous deeds. One who had been performing virtuous deeds is sure to get rebirth in virtuous families. His virtues in the previous birth will accompany him in this birth as well. In addition to that the God will grant him prudence as well. He would be able to perform prayers, rituals, self study etc. However, a wicked person will have the imprints of his misdeeds carried forward in this birth as well. Therefore, one should adopt auspicious company and avoid the company of notorious people (criminals, outlaws, sinners). Those who dies in a state of intoxication, ignorance, laziness etc. are sure to get rebirth as insects, animals, birds, trees etc. If someone is thinking of an animal at the time of (deserting earth) death, he is sure to move to that species, though temporarily. Therefore, it is advised that one should think, meditate, concentrate in the God only, at the time of his death. He should discard the attachments, allurements, anonymity, rivalry etc. One who thinks of revenge is sure to move to the species of venomous snakes. One should pardon-forgive every one for his own betterment. He should stop thinking of recovery of debts, loans etc. He should surrender to the Almighty, think of HIM, recite HIS names, perform-recite prayers.
कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम्।
रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमसः फलम्॥
विवेकी पुरुषों ने शुभ कर्म का फल सात्विक निर्मल, राजस कर्म का फल दुःख और तामस कर्म का फल अज्ञान-मूढ़ता बताया है।[श्रीमद्भागवत गीता 14.16]  
The outcome of pious Karm-deeds is Satvik, virtuous (joy, happiness, pleasure), result of Rajas Karm is pain toil & sorrow and the impact of Tamas Karm is ignorance, idiocy, foolishness (rebirth in lower species & hell).
कर्म जिस भावना से किया गया है, वो वही रुप ले लेगा। स्वच्छ, निर्मल परोपकार की भावना से किया गया कार्य जिसके पीछे स्वार्थ और फलेच्छा नहीं है, सात्विक फल प्रदान करता है। रागात्मकता से ग्रस्त कार्य, भोग-विलास, संचय आदि की प्रवृत्ति से ग्रस्त होते हैं। इनमें से कुछ कर्म स्वर्ग की लालसा से किये जाते हैं। अन्ततोगत्वा इनका परिणाम सिवाय दुःख के कुछ नहीं होता। तमोगुण मोह से लिप्त है, जिसकी परिणति हिंसा, हानि, पाप, हीन योनियों में जन्म लेना है। सात्विक कर्म से कभी दुःख पैदा नहीं होता, राजसिक कर्म से सुख पैदा नहीं होता और तामसिक मनोवृति कभी विवेक जाग्रत नहीं होने देती। जिसकी मनोवृत्ति और भावना जैसी होगी मनुष्य जीवन के अवसान काल में उसके अनुरुप ही चिंतन करेगा और उसके अनुसार ही जन्म अथवा मुक्ति प्राप्त करेगा।
Its the mentality, thinking which matters while performing a job, work, deed. The tendency will give it the shape of Satvik, Rajsik or Tamsik deeds. Any deed performed with pure heart, honestly for the welfare of others, society, without any selfishness-motive, expectation of output, reward, benefit will lead to virtuousness, righteousness, piousness. One is sure to get the love and affection of the Almighty. The tendency of performing with the desire of gains, accumulation, satisfaction of passions, comforts is binding and is sure to make the doer suffer. Some pious deeds performed for seeking higher abodes will certainly materialise and elevate the devotee to higher abodes but one who rises, falls as well. It may lead to pain, sorrow, displeasure. One is happy when he gain and weep when he is a looser. Ignorance, imprudence, stupidity, idiocy is sure to indulge one in anti social, criminal, offences, terrorism which is sure to make one move to inferior species. Depending upon the sins earned; one is sure to wander (भटकना) in 84,00,000 species. Still one is sure to get the abode-birth according to his remembrances at his last moment. Satvik Karm never generate pain-sorrow. Rajsik Karm never lead to bliss. Tamsik Karm never let the prudence rise.
ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः। 
जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः॥
सत्त्व गुण में स्थित मनुष्य ऊर्ध्व लोकों जाते हैं, रजोगुण में स्थित मनुष्य मृत्यु लोक में जन्म लेते हैं और निंदनीय तमोगुण की वृत्ति में स्थित तामस मनुष्य अधोगति में जाते हैं।[श्रीमद्भागवत गीता 14.18]  
Those who are established in Satv Gun move to higher abodes-heavens; those who are involved in Rajo Gun reborn in the mortal world and those who had been practicing Tamo Gun move to insipid (फीका, बेस्वाद, रसहीन, मंद, नीरस, स्‍वादहीन), torturous, painful hells & lower species. 
जीवन यापन, रहन-सहन में सत्त्वगुण की प्रधानता होने से प्राणी स्वर्ग, ब्रह्मलोक जैसे उच्च लोकों में जाता है। धर्म का पालन, तीर्थ, जप-तप, दान-पुण्य, लोगों की निस्वार्थ सहायता, कर्म में फलेच्छा न रखना आदि सत्त्व गुण के अन्तर्गत आते हैं। संग्रह, भोग, ऐशो-आराम, स्वार्थ, ममता-कामना, फलेच्छा मनुष्य को पृथ्वी लोक में पुनर्जन्म प्रदायक हैं। अशुद्ध आचरण, निंदनीय कर्म, आराम तल्वी, जरूरत से ज्यादा सोना, दूसरों को दुःख देना, चोरी, डकैती, हत्या, कपट, धोकाधड़ी, झूँठ, आतंक पैदा करना आदि प्राणी को स्वतः नर्क और अधोगति देते हैं। मनुष्य मरकर भी मुक्त न होकर भूत-प्रेत, पिशाच, नर्क, हीन-निंदनीय योनियों में, इसी कारण पहुँचता है और अत्यधिक कष्ट पाता है। उसकी मुक्ति में अनेकों वर्ष और युग तक व्यतीत हो जाते हैं। फिर भी यदि मृत्यु के वक्त यदि वह मनुष्य योनि का चिन्तन कर रहा होगा तो उसे मनुष्य योनि में जन्म लेकर भयंकर, दुःख-दर्द, पीड़ा, हारी-बीमारी का सामना करना पड़ेगा। अतः मनुष्य को सात्विक भोजन, सात्विक आचार-विचार-मंत्रोपचार, शुद्ध स्थान-संगति का पालन करना चाहिये। 
Purity in life style, mode of living, truth, virtuous behaviour, uplift the man to higher abodes-heavens. One should resort to pilgrimage and perform pious acts there. He should do charity, donations and help the needy-poor. He may feed the beggars, cows, dogs, birds etc. He should perform his duties like helping others, social service, community welfare without the desire for reward, name, fame-honour. One who is busy in accumulation of wealth, selfishness, allurements, desires, comforts is supposed to come back to earth. Those who are busy in nefarious acts, thefts, looting, terrorism, cheating, murders are sure to reach hells and lower species. Still, if they are busy thinking of human life at the time of their death, they will get rebirth on the earth as human being, but would be subjected to pain, torture, sorrow, diseases-illness etc. One may become a ghost as well and lead a painful life. Those who are sent to hells, inferior species, ghosts life are supposed to reside there for thousands of years and some times various Yugs (cosmic era) and Kalps.

गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान्। 
जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते॥
देहधारी-विवेकी मनुष्य, देह को उत्पन्न करने वाले इन तीनों गुणों का अतिक्रमण करके जन्म, मृत्यु और वृद्धावस्था रुप दुःखों से रहित हुआ, अमरता का अनुभव करता है।[श्रीमद्भगवद्गीता 14.20]  
The enlightened-prudent rises above the three characterises of nature, which produce the body and experiences immortality having freed from the pains of birth, old age and death. 
देह-शरीर की उत्पत्ति प्रकृति के त्रिगुण से ही होती है। विचार शील मनुष्य इन गुणों का अतिक्रमण करके देह से अपना सम्बन्ध नहीं मानता। शरीर धारी होने से ही उसे देही कहा गया है। जन्म, मृत्यु और वृद्धावस्था शरीर के गुण हैं। जब विचारशील व्यक्ति शरीर से ही सम्बन्ध नहीं मानता, तो दुःख कैसा? जो गुणों से निर्लिप्तता का अनुभव कर लेता है, उसे अमरता का अहसास हो जाता है। देही-आत्मा अमर है, देह-शरीर नहीं। 
The body is composed of the three characterises of nature. The enlightened, learned, scholar, philosopher, visionary crosses this hurdle and disown the body. Birth, old age and death are the features of the body. The soul is for ever, since ever. One who has discarded the body feels free and experiences immortality, the characterises of soul-spirit, which is a component of the Almighty.
***
तानहं द्विषतः क्रुरान्संसारेषु नराधमान्। 
क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु॥
उन द्वेष करने वाले, क्रूर स्वभाव वाले और संसार में अत्यधिक नीच, अपवित्र मनुष्यों को मैं बार-बार आसुरी योनियों में ही गिराता रहता हूँ।[श्रीमद्भागवत गीता 16.19]  
The Almighty resolved that HE send the mean, wretched, impure people with demonic traits who possess rivalry-hatred, cruelty, sinfulness for others, to Demonic species again and again.
परमात्मा द्वेष करने वाले, क्रूर स्वभाव वाले, अत्यधिक नीच-अधम, अपवित्र मनुष्यों को बार-बार आसुरी योनियों (साँप, मगरमच्छ, कुत्ता, शेर, भेड़िया आदि) में ही भेजते रहते हैं। नर्क में वास से तो पाप नष्ट होते हैं, परन्तु नीच प्रवृति के मनुष्यों के संग-साथ से पाप बढ़ते हैं। अतः मनुष्य को अपने बच्चों के लालन-पालन में इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिये। नौकरों के सहारे पलने वाले बच्चों में अच्छे संस्कारों का अभाव स्वाभाविक है। नौकरों के संसार अच्छे हैं, इस बात का प्रमाण मिलना मुश्किल है। आजकल ऐसा रिवाज़ हो गया है कि माँ-बाप बच्चे को सुधारने वाले शिक्षक को प्रताड़ित करने से बाज़ नहीं आते और परिणाम भी सामने आ जाता है। 
The Almighty never delays in sending the cruel, notorious, dreaded criminals, murderers to hells & demonic species. Hell is certainly better than the company of the wretched, smeared since hells cut off the sins, but company of the villains is sure to lead one to wrong direction. It has become a fashion to rush to school and hit the teacher, who ask the child to improve. The TV channels, news papers and the media make a lot of hue and cry and tarnish the image of the sincere teachers who try to improve the child. The child commit numerous mistakes which needs to be eliminated but the parents prevent this. The teacher in his zeal to improve the child, too cross the boundary-limit! The unworthy parents have to repent later throughout their life. As is the trend, the servants look after the child and invariably bad habits are passed on to the child. As one finds out; most of the criminals, terrorists, anti nationals, spoilt people were not reared properly, in their childhood. They are low on education, culture, virtues and morals. A certain segment of society following other religious practices, is taught demonic tendencies, traits, sinful acts from the very early childhood. A new trend has emerged. Innocent children are made to become human bombs, terrorists, out laws. They are trained to commit murders, rapes, loot, dacoity, invasion, burglary etc. etc. In Jhar Khand, India, there are schools which train the youngsters to commit cyber crimes. Thousands of Nigerians over stays & commit cyber crimes, frauds, narcotics trade in India, almost everyday. However, it is certain & is a prophecy that this segment of society will vanish sooner or later, automatically.
Young couples who are employed rarely feel the need to pay enough attention to their progeny. There creche to look after them. The values, culture, society of creche owners, servants are copied by the infants and remain as such throughout their life.
The teachers too are rarely good enough to educate children. Reservation has totally spoiled education and values. There is no place for values, morals, scriptures in the curriculum. The teachers, principals lack morality. The principal lack administrative, managerial, supervisory skills. The education is westernised. The syllabus was heavily in favour of the Mughal emperors (brutal killers-murderers), Muslims.
आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि। 
मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम्॥
हे कुन्ती  नन्दन! वे मूढ़ मनुष्य मुझे प्राप्त न करके जन्म-जन्मान्तर में आसुरी योनि को प्राप्त होते हैं, फिर उससे भी अधिक अधम गति में अर्थात भयंकर नरकों में चले जाते हैं।[श्रीमद्भागवत गीता 16.20] 
The Almighty addressed Arjun as Kunti Nandan and elaborated further. The ignorant-deluded with demonic traits do not desire of assimilation in the God and continue taking birth in demonic species, ultimately leading to fearsome hells.
आसुरी प्रवृति के मनुष्य परमात्मा को प्राप्त करने के सुअवसर, मानव योनि में जन्म को व्यर्थ कर देते हैं और  पुनः-पुनः हीन आसुरी योनियों में जन्म लेते हैं। आसुरी योनि (भूत, प्रेत, पिशाच, ब्रह्म राक्षस, कबन्ध-सिर कट जाने पर बचा हुआ धड़ जो चलने, फिरने में समर्थ होता है, चुड़ैलआदि) में जन्म, उनके पापों के भोग के लिए अपर्याप्त होता है और फिर उन्हें भयङ्कर नरकों से गुजरना पड़ता है। मानव शरीर प्राप्ति का उद्देश्य-अवसर केवल मात्र भगवत प्राप्ति हेतु है। यही वो दुर्लभ अवसर है जब मनुष्य अपने स्वभाव में परिवर्तन कर सकता है, क्योंकि स्वभाव देव योनियों में प्रवेश करके भी नहीं बदलता। इसीलिये मानव योनि को देव योनियों से भी श्रेष्ठ और दुर्लभ माना गया है। 
One, who still possess demonic traits even after taking birth as a human being, wastes this opportunity-chance; is sure to fall in lower demonic species. Such people repeatedly take birth as low species carnivores-cannines. There are others who move to species like ghosts, Dracula and experience pain, torture and sorrow while teasing others. These species too find inability to punish-modify them and they are further subjected to hells full of pains, turmoil, rigorous torture. The God is very kind, since he has awarded an opportunity to humans to mend their ways and assimilate in HIM. The basic traits of one remain unchanged even after a stay-stint in heaven. Its only the earth and birth as a human being which comes as God gift to refine, improve him self. This is why the birth as a human being becomes superior to angles, demigods, deities, demigods of lower hue. One has to analysis-meditate and find faults with him to correct them and decide not to commit the earlier mistakes. If he finds himself incapable of doing that, he should seek asylum, shelter, protection & help from the God.
कृतघ्नानां गतिस्तात नरके शाश्वती: समाज:।
मातापितृगुरुणां च ये नतिष्ठन्ति शासने 
कृमि कीटपिपीलेषु जायन्ते स्थावरेषु च।
दुर्लभो हि पुनस्तेषां मानुष्ये पुनरुद्भव:
कृतघ्नों (Ungrateful person) की एक ही गति है, सदा के लिए नरक-दुःख विशेष में पड़े रहना। जो माता-पिता और गुरु जनों के आधीन नहीं रहते, वे कृमि, कीट, चींटी और वक्षादि की योनियों में जन्म लेते हैं। उनके लिए मनुष्य योनि में जन्म लेना दुर्लभ हो जाता है।[महा.अनुशासन पर्व 6.2-3]
Permanent abode for the ungrateful is either hell of rebirth as low species-insects, worms, trees-shrubs etc. Those who discard the parents, elders, Guru find it extremely difficult to get rebirth as humans.
परिवादात्खरो भवति श्र्वा वै भवति निन्दक:। 
परिभोक्ता कृमिर्भवति कीटो भवति मत्सरी॥
गुरु का उपहास करने वाला मरने पर गधा, निन्दा करने से कुत्ता, उसकी सम्पति का भोग करने से कृमि और ईर्ष्या करने से कीड़ा होता है।[मनु स्मृति 2.201] 
One who makes fun of his teacher becomes an ass, on censuring-defaming he becomes a dog, on using his property a worm and on envying becomes an insect in next incarnation.
ब्राह्मण का हत्यारा ब्रह्म राक्षस बनता है। मन्दिर में पूजा-पाठ सवेतन करने वाला, मन्दिर के दान-धर्म में घपला करने वाला कुत्ता बनता है। 
Neglecting parents is a great sin. Those who neglect, tease, torture their parents eventually go the hells. Those who murder their parents too get worst possible hells and on their release from the hells; they have to spend millions of years in the form of various worms, insects and ultimately they become trees, shrubs etc.
परिवादात्खरो भवति श्र्वा वै भवति निन्दक:। 
परिभोक्ता कृमिर्भवति कीटो भवति मत्सरी॥
गुरु का उपहास करने वाला मरने पर गधा, निन्दा करने से कुत्ता, उसकी सम्पति का भोग करने से कृमि और ईर्ष्या करने से कीड़ा होता है।[मनु स्मृति 2.201] 
One who makes fun of his teacher becomes an ass, on censuring-defaming he becomes a dog, on using his property a worm and on envying becomes an insect in next incarnation.
उपासने ये गृहस्था: परपाकमबुद्धय:। 
तेन ते प्रेत्य पशुतां व्रजन्त्यन्नादिदायिनाम्॥
जो गृहस्थ अज्ञान वश दूसरे का अन्न खाते फिरते हैं, वे दोष से जन्मान्तर में अन्नदाताओं के पशु होते हैं।[मनु स्मृति 3.104] 
The ignorant house hold who venture eating food of others, get rebirth as animals of those who fed them.
केतितस्यु यथान्यायं हव्यकव्ये द्विजोत्तमः। 
कथञ्चिदप्यतिक्रामन् पापः सूकरतां व्रजेत्॥
देवकर्म या पितृकर्म में निमन्त्रित ब्राह्मण निमन्त्रण स्वीकार करके किसी कारण से यदि भोजन न करे तो उस पाप के कारण वह जन्मान्तर में सूअर होता है।[मनु स्मृति 3.190] 
If the Brahmn fails to turn up for accepting the sacred food for the purpose of offerings to the Manes, deities or the demigods due to one or the other reason he will be subjected to became a pig-hog in next birth by virtue of this sin.
देवत्वं सात्त्विका यान्ति मनुष्यत्वं च राजसाः।
तिर्यक्त्वं तामसा नित्यमित्येषा त्रिविधा गतिः
सात्विक मनुष्य देवत्व को, राजसिक मनुष्यत्व को और तामसिक वृत्ति वाला व्यक्ति तिर्यक (कीट-पतंग) योनि को प्राप्त होता है। नित्य इन तीनों प्रकृतियों की यही तीन गति होती हैं।[मनु स्मृति 12.40] 
SATVIK :- virtuous (righteous, pious, honest, truthful) gets Devatv-incarnations demigods-deities.
RAJSIK :- money minded (attached, bonded, egoistic, ambitious) gets birth as a human being and the Tamsik goes to the species of insects, worms. This is the threefold course of transmigration after death.
दशसूनासमं चक्रं दशचक्रसमो ध्वजः। 
दशध्वजसमो वेशो दशवेशसमो नृपः॥
दस वधिकों के समान एक तेली होता है, दस तेलियों के बराबर एक कलाल होता है, दस कलालों के बराबर एक वेशोपजीवी होता है हुए दस वेशोपजीवियों के समान एक राजा होता है।[मनु स्मृति 4.85] 
One Teli-oil extractor is as sinful-bad as ten butchers, one Kalal, liquor, wine maker is as vicious as 10 Teli, one Veshopjeevi is as much degraded as ten wine makers and one king other than the Kshtriy Vansh-caste is as wicked as ten Veshopjeevi.
दश सूनासहस्राणि यो वाहयति सौनिकः। 
तेन तुल्यः स्मृतो राजा घोरस्तस्य प्रतिग्रहः॥
जो वधिक दस हजार प्राणियों की हिंसा करता है, उसके तुल्य राजा होता है। इसलिए उसका दान भयानक होता है।[मनु स्मृति 4.86]  
The king is as sinful as the butcher who kills ten thousand animals. Therefore, one must not accept offerings from such kings.
All kings are not sinners. There had been kings who are still remembered for their virtues, righteousness, piousness. But knowingly or unknowingly the kings commit crimes against humanity and suffer in the hells thereafter. The present day kings, Neta-ministers are no exception. Their offerings bring misery to the priests who accept the money from them. For the time being life become easy for them but bring misery in next several births.
Like wise the priests, temple heads-Mahants, office bearers of the trusts who run the trusts of the temple and make use of the money for their person purposes, find suitable birth in hells, since the money poured into the coffers of the temple is generally in lieu of removal of tortures from pains, sorrow, diseases.
यो राज्ञः प्रतिगृह्णाति लुब्धस्योच्छास्त्रवर्तिनः। 
स पर्यायेण यातीमान्नरकानैकविंशतिम्॥
जो कृपण और शास्त्र की आज्ञा न मानने वाले राजा से दान लेता है, वह क्रम से 21 नरकों में गिरता है।[मनु स्मृति 4.87] 
One who accepts donations, offerings from the king who does not spend money for the welfare of the citizens and discards the scriptures goes to 21 sets of dreaded hells, in succession.
अलिङ्गो लिङ्गिवेषेण यो वृत्तिमुपजीवति। 
स लिङ्गिनां हरत्येनस्तिर्यग्योनौ च जायते॥
जो ब्रह्मचारी न होकर भी ब्रह्मचारी के चिन्ह धारण करके, उनकी वृत्ति से जीवन-निर्वाह करता है, वह ब्रह्मचारियों के पापों को अपने लिये बटोरता है और मरने के बाद वह कुत्ते आदि तिर्यग योनियों में जन्म लेता है।[मनु स्मृति 4.200] 
One who is not a celibate but earns his livelihood by pretending to be a celibate by wearing the marks-signs meant for the celibate, collects the sins of the celibate and as a result of it get birth in inferior species like dogs.
धर्मप्रधानं पुरुषं तपसा हतकिल्बिषम्। 
परलोकं नयत्याशु भास्वन्तं खशरीरिणम्॥
तपस्या से जिसका पाप नष्ट हो चुका है, ऐसे धर्म प्रधान ब्रह्म स्वरूप पुरुष को धर्म, ब्रह्म लोक की प्राप्ति करता है।[मनु स्मृति 4.243] 
One who has burnt all his sins by virtue of asceticism, austerities, Yog, meditation, helping the deserving needy, is sure to reach the abode of the creator Brahma Ji, from where he will reach the Ultimate abode when Brahma Ji will merge-assimilate with the Almighty, if he continues his endeavours of devotion to the Almighty there as well. Otherwise, on completion of the pious deeds there he will return to earth to get birth in learned, enlightened, pious families.
दृढकारी मृदुर्दान्तः क्रूराचारैरसंवसन्। 
अहिंस्रोदमदानाभ्यां जयेत्स्वर्गं तथाव्रतः॥
दृढ संकल्प, कोमल, दान्त, क्रूरकर्म करने वालों के संसर्ग से दूर रहने वाला, किसी को न सताने वाला, ऐसा व्रती पुरुष अपने इन्द्रिय निग्रह और दान से स्वर्ग को जीत लेता है।[मनु स्मृति 4.246]
One who is firm-determined, gentle (soft, polite) and patient, shuns the company of the cruel, does no injury to organism-creature, leads to heavens after death, through self control-restraint and charity-donations.
यावन्ति पशुरोमाणि तावत्कृत्वो हि मारणम्। 
वृथापशुघ्नः प्राप्नोति प्रेत्य जन्मनि जन्मनि॥
देवतादि के उद्देश्य के बिना वृथा पशुओं को मारने वाला मनुष्य मरने पर उन पशुओं की रोम सँख्या के बराबर जन्म-जन्म में मारा जाता है।[मनु स्मृति 5.38] 
One who kills animals without justification gets rebirth as animal to be slaughtered as many times as there are hair on the body of the animal killed by him.
Normally, the animals killed by the beasts, carnivorous are those organism who killed the innocent animals, when they themselves were humans.
व्यभिचारात्तु भर्तुः स्त्री लोकेप्राप्नोति निन्द्यताम्। 
शृगालयोनिं प्राप्नोति पापरोगैश्च पीड्यते॥
पर पुरुष के साथ व्यभिचार करने से स्त्री संसार में निन्दित समझी जाती है और मरने के बाद शृगाल (गीदड़ी) होती है तथा कुष्ठादि रोगों से पीड़ित होती है।[मनु स्मृति 5.164] 
The who is involved in sex with the other man is disgraced in the world and become a jackal in next birth and suffers from diseases like leprosy in the current birth. 
She may have venereal-sexually transmitted diseases, AIDS, HIV etc. There is no one to look after her in old age and she gets a painful death.
अनधीत्य द्विजो वेदाननुत्पाद्य तथा सुतान्।
अनिष्ट्वा चैव यज्ञैश्च मोक्षमिच्छन्व्रजत्यधः॥
जो द्विज वेदों को पढ़कर तथा पुत्रों की उत्पत्ति और यज्ञों का अनुष्ठान न कर (अकृत ऋषि ऋण, पितृ ऋण और देव ऋण से उऋण हुए बिना) सन्यास धारण करता है वह नीच गति को प्राप्त होता है।[मनु स्मृति 6.37] 
The Brahmn who adopts sage-hood without clearing off the three debts i.e., study of Veds, having a son and performing sacrifices in holY fire moves downwards into low species in next incarnations. 
Please refer to :: SANYAS YOG संन्यास योग :: YOG (10) योगsantoshkipathshala.blogspot.com
The Brahmn has to study first by joining celibacy-chastity till the age of 25 years as a Brahmchari in the Ashram of the Guru. Thereafter, he has to get married and become a household and produce sons, discharging all responsibilities towards parents, elders, Guru, society, nation and only then he can retire from active life. Having discharged all his duties, responsibilities, he is free to move to Vanprasth-retired life i.e., life in the forests.
Kapil Muni, an incarnation of Bhagwan Shri Hari Vishnu had to return to family way to clear the 3 debts. Please refer to :: KAPIL MUNI कपिल मुनि :: THE NARRATOR OF SANKHY YOG साँख्य शास्त्र-ज्ञान योग के प्रतिपादक
santoshkathasagar.blogspot.com 
देहादुत्क्रमणं चास्मात्पुनर्गर्भे च सम्भवम्। 
योनि कोटिसहस्रेषु सृतीश्चास्यान्तरात्मनः॥
शरीर को त्याग कर से फिर गर्भ में प्रवेश, प्राणों का वियोग और अनन्त कोटि योनियों में भ्रमण, यह सब अपने ही कर्म दोष का फल है।[मनु स्मृति 6.63] 
After the death and release from the hells, the soul has to enter the womb again, leading to infinite rebirths, incarnations as a result of the deeds.
Except some people; all others, forget their previous lives. After rebirth they have to again pass through the cycle of learning, performing and experiencing the result of their previous deeds as destiny. Those who prepare themselves for Salvation and work in that direction are exempted from hells, rebirths, painful experiences, torments.
सूक्ष्मतां चान्ववेक्षेत योगेन परमात्मनः। 
देहेषु च समुत्पत्तिमुत्तमेष्वधमेषु च॥
योग द्वारा परमात्मा की सूक्ष्मता का विचार करे और कर्म दोष से उत्तम-अधम देहों में जन्म होने की बात सोचे।[मनु स्मृति 6.65] 
One should analyse the penetration, presence of the Almighty in each and every living being by making use of Yog, connecting himself to the God and try to find out the reason of his birth in lowest to highest species.
The Almighty is present in each and every organism in the form of soul-the living force, consciousness.
उच्चावचेषु भूतेषु दुर्ज्ञेयामकृतात्मभिः। 
ध्यानयोगेन सम्पश्येद् गतिमस्यान्तरात्मनः॥
प्राणियों का उच्च-नीच योनियों में जाने का कारण जो अज्ञानियों के लिये बहुत ही कठिन है, उसे ध्यान योग से देखे अर्थात ब्रह्मनिष्ठ होकर देखे।[मनु स्मृति 6.73] 
Its very difficult to understand the cause-reason of moving to inferior-low species by the ignorant (idiots, morons, those who lack intelligence, prudence, understanding, reason, cause or those belonging to other faith-religion & do not wish to know it.). One can perceive it by concentrating-meditating in the God.
सम्यग्दर्शनसम्पन्नः कर्मभिर्न निबद्ध्यते।  
दर्शनेन विहीनस्तु संसारं प्रतिपद्यते॥
ब्रह्म का सम्यक् दर्शन करने वाला कर्मों से बद्ध नहीं होता, किन्तु ब्रह्म दर्शन से विहीन पुरुष संसारी होकर जन्म-मरण के फेर में पड़ता है।[मनु स्मृति 6.74]
One who has understood the gist of the Almighty is not tied by the deeds or their impact, but one who is ignorant keep moving cyclically from one incarnation to another. 
सम्यक् :: पूरा, सब, समस्त, उचित, उपयुक्त, ठीक, सही,मनोनुकूल, पूरी तरह से, ब प्रकार से,अच्छी तरह, भली-भाँति; complete.
अस्थिस्थूणं स्नायुयुतं मांसशोणितलेपनम्। 
चर्मावनद्धं दुर्गन्धिपूर्णं मूत्रपुरीषयोः॥
जराशोकसमाविष्टं रोगायतनमातुरम्। 
रजस्वलमनित्यं च भूतावासमिमं त्यजेत्॥
हड्डी खंबे वाली, शिशुओं से युत, माँस और रुधिर से लेप की हुई, चमड़े से ढकी हुई, मल-मूत्र, जरा और शोक से आक्रांत रोगी का घर भूख-प्यास से व्याकुल भोगाभिलाषी और क्षण भंगुर रूपी शरीर को, ऐसे प्राणियों के घर को त्याग देना ही चाहिये अर्थात ऐसा प्रयत्न करना चाहिये जिससे पुनर्जन्म ने हो।[मनु स्मृति 6.76-77] 
One should endeavour not to have reincarnation, so that he is saved from housing the body-bony cage supported by spine, made of skin, flash, smeared with blood, covered with urine and excreta, fragility-old age, illness-ailments and sorrow-grief, requiring food all the time, perishable in a fraction of second.
व्यभिचारात्तु भर्तुःस्त्री लोके प्राप्नोति निन्द्यताम्।
शृगालयोनिं चाप्नोति पापरोगैश्च पीड्यते
स्वामी के विरुद्ध आचरण करने वाली स्त्री (व्याभिचारिणी) इस लोक में निदित होती है और मरने के बाद श्रृगाल  (गीदड़, सियार) योनि में उत्पन्न होकर अनेक प्रकार के रोगों को भोगती है।[मनु स्मृति 9.30]  
The woman who acts against her husband and enters into sexual relation with some one else not only invite slur bad name (taint) but also suffer from various diseases like AIDS, chlamydia gonorrhoea and syphilis rebirth as a jackal in next birth.
She virtually spoil her life for momentary enjoyment and suffer throughout the life being inflicted by serious incurable diseases, slur-taint, isolation and dishonour till death finally comes to her. After death she is moved to hell and gets birth as a lower species.
भोजनाभ्यञ्जनाद्दानाद्यदन्यत्कुरुते तिलैः।
कृमिभूतः श्वविष्ठायां पितृभिः सह मज्जति
जो भोजन, उबटनऔर दान के अलावा अन्य कार्य तिल से करता है; वह कीड़ा होकर पितरों के साथ कुत्ते की विष्ठा में गिरता है।[मनु स्मृति 10.91]  
One who utilise sesame for any purpose other than food, anointing (oiling-messaging) the body & donations, plunged into the ordure-falls along with his Manes in the faecal matter of dogs after becoming an insect-worm, in next births.
न यज्ञार्थं धनं शूद्राद्विप्रो भिक्षेत कर्हिचित्।
यजमानो हि भिक्षित्वा चण्डालः प्रेत्य जायते
यज्ञ करने के लिये ब्राह्मण कभी शूद्र से भिक्षा न माँगे, क्योंकि शूद्र से भिक्षा माँगने वाला ब्राह्मण यज्ञ कर्ता मरने पर चाण्डाल होता है।[मनु स्मृति 11.24] 
The Brahman should never seek contribution, donations, alms for performing a Yagy from a Shudr. The Brahmn who gets alms-Dakshina from a Shudr becomes a Chandal in his next birth.
The Brahmns, Pandits, Pujaris, Purohits, Acharys accept Dan-Dakshina, alms from any one indiscriminately without distinction or knowledge of their caste-creed or Varn. To be sure they will have to pass through low castes, inferior species in next births. To protect themselves from this penalty, they should put excess fund with them for further charity-helping destitute, poor, needy, distressed.
यज्ञार्थमर्थं भिक्षित्वा यो न सर्वं प्रयच्छति।
स याति भासतां विप्रः काकतां वा शतं समाः
यज्ञ के लिए दान प्राप्त कर जो ब्राह्मण पूरा धन यज्ञ में उपयोग नहीं करता, वह सौ वर्ष तक के लिये भासपक्षी-कौआ बनता है।[मनु स्मृति 11.25] 
The Brahman who do not utilise the full money collected for performing the Yagy is subjected to the species of crow for 100 in next birth.
The Brahmans, Purohit, Achary should never use the money paid to them for performing a Yagy, to their family's person use. Instead they should use the surplus money obtained in this account for charity.
देवस्वं ब्राह्मणस्वं वा लोभेनोपहिनस्ति यः।
स पापात्मा परे लोके गृध्रौच्छिष्टेन जीवति
जो लोभ से देवता के निमित्त अर्पण किये हुए धन को या ब्राह्मण के धन का अपहरण करता है, वह पापात्मा मरने के बाद परलोक में गिद्ध की जूठन से जीता है अर्थात कट्टा, सियार, लोमड़ी, कीड़ा, मकोड़ा, कृमि बनता है।[मनु स्मृति 11.26] 
A person who by virtue of greed or otherwise steals-snatches, sizes the offering to demigods or belongings of a Brahman, depends-survives over the left over food-meat of dead animals, by the vultures, i.e., becomes a dog, jackal, fox, insect, bird, worm in his next birth. 
This is applicable to all those Brahmans, trustees, care takers of temples who even by mistake use the offerings of a temple to their use. Even those Brahmans who perform worship on salary basis are not spared. The Muslim invaders, the British who took away money from the temples are sure to have faced the fury of the Almighty. At present the governments are using the offerings of temples to promote Islam and Christianity in states like Karnatak & Keral. The government official who extort money from the temples in Andhr Pradesh and waste it over non deserving, too are sure to be subjected to this treatment in this and next births. The ministers who are behind this should be prepared to face the punishment in present & current birth.
शरीरजैः कर्मदोषैर्याति स्थावरतां नरः।
वाचिकैः पक्षिमृगतां मानसैरन्त्यजातिताम्
शरीर से उत्पन्न कर्मदोषों के फलों से मनुष्य स्थावरता, वाचिक दोषों से पक्षी और मृगत्व को और मानस दोषों से चाण्डालादि जाति को प्राप्त होता है।[मनु स्मृति 12.9] 
One moves to fixed species (trees, plants, shrubs etc.) due to the wrong deeds performed bodily, to birds or deer like species due to the evil deeds done verbally-speech and to the birth as a Chandal for the ill deeds performed mentally.
पञ्चभ्य एव मात्राभ्यः प्रेत्य दुष्कृतिनां नृणाम्।
शरीरं यातनार्थोयमन्यदुत्पद्यते ध्रुवम्
पापात्मा मनुष्यों के पञ्चभौतिक शरीर से ही एक सूक्ष्म शरीर निश्चय करके परलोक में दुःख भोगने के लिये उत्पन्न होता है।[मनु स्मृति 12.16]  
A minute body of the sinner-wicked emanate-emerges from his dead remains and is destined to suffer in next birth-incarnation, hells.
यद्याचरति धर्मं स प्रायशोऽधर्ममल्पशः।
तैरेव चावृतो भूतैः स्वर्गे सुखमुपाश्नुते
वह जीव यदि अधिक धर्म और थोड़ा पाप करता है तो उन भूतों (पंचभूतों) के रूप में जन्म लेकर स्वर्ग में सुख भोगता है।[मनु स्मृति 12.20]  
The creature is entitled to heaven if he commit more virtuous deeds as compared to sins.
देवत्वं सात्त्विका यान्ति मनुष्यत्वं च राजसाः।
तिर्यक्त्वं तामसा नित्यमित्येषा त्रिविधा गतिः
सात्विक मनुष्य देवत्व को, राजसिक मनुष्यत्व को और तामसिक वृत्ति वाला व्यक्ति तिर्यक (कीट-पतंग) योनि को प्राप्त होता है। नित्य इन तीनों प्रकृतियों की यही तीन गति होती हैं।[मनु स्मृति 12.40]  
The Satvik :- virtuous (righteous, pious, honest, truthful) gets Devatv-incarnations demigods-deities, the Rajsik :- money minded (attached, bonded, egoistic, ambitious) gets birth as a human being and the Tamsik goes to the species of insects, worms. This is the threefold course of transmigration after death.
स्थावराः कृमिकीटाश्च मत्स्याः सर्पाः सकच्छपाः।
पशवश्च मृगाश्चैव जघन्या तामसी गतिः
स्थावर (वृक्षादि), कृमि, कीट, मछली, सर्प, कछुआ, पशु और मृग ये सब तमोगुण की गति हैं।[मनु स्मृति 12.42]  
Trees-plants, insects, worms, fishes, snakes, tortoises, cattle and deer, are the movements of a deceased depending upon his Tamsik :- viceful, wretched, criminal, viceful deeds.
हस्तिनश्च तुरङ्गाश्च शूद्रा म्लेच्छाश्च गर्हिताः।
सिंहा व्याघ्रा वराहाश्च मध्यमा तामसी गतिः
हाथी, घोड़े, शूद्र, निन्दित म्लेच्छ जाति, सिंह, व्याघ्र और सूअर; ये तामस वृत्ति की गतियाँ हैं।[मनु स्मृति 12.43]  
Rebirth as elephant, horse, Shudr and Mallechchh-despicable barbarians (Christian & Muslim), lion, tiger and boar-pig is resulted by Tamas Gun.
चारणाश्च सुपर्णाश्च पुरुषाश्चैव दाम्भिकाः।
रक्षांसि च पिशाचाश्च तामसीषूत्तमा गतिः
चारण, गरुड़, दाम्भिक पुरुष, राक्षस और पिशाच; ये तामसी गुण की उत्तम गतियाँ हैं।[मनु स्मृति 12.44]  
Rebirth as Charan (servants), Garud-a bird, one full of proud-egoistic, Rakshas-demons & Giants and Pishach occurs as  a result of a bit superior impact of Tamsik Gun.
झल्ला मल्ला नटाश्चैव पुरुषाः शस्त्रवृत्तयः।
द्यूतपानप्रसक्ताश्च जघन्या राजसी गतिः
झल्ला (लाठी चलाने वाला), मल्ल (पहलवान), नट, शस्त्र जीवी, जुआ और मदिरा पीने वाला; ये रजोगुण की अधम गति है।[मनु स्मृति 12.45]  
Rebirth as one who use wield stick-baton, wrestler, juggler-Nat, warrior, gambler, drunkard is the outcome a the worst of Rajo Gun.
राजानः क्षत्रियाश्चैव राज्ञां चैव पुरोहिताः।
वादयुद्धप्रधानाश्च मध्यमा राजसी गतिः
राजा, क्षत्रिय, राजाओं के पुरोहित और विवाद करने में प्रधान; ये राजसिक  गुण  की मध्यम गति है।[मनु स्मृति 12.46]  
One may get birth as a king, Kshtriy, priests of the king or as a debater for possessing Rajsik Gun as a middle level-average movement.
गन्धर्वा गुह्यका यक्षा विबुधानुचराश्च ये।
तथैवाप्सरसः सर्वा राजसीषूत्तमा गतिः॥
गन्दर्भ, गुह्यक, यक्ष, देवताओं के अनुचर (विद्याधर) और अप्सरा; ये रजोगुण की उत्तम गति हैं।[मनु स्मृति 12.47] 
Rebirth as a Gandarbh, Guhyak, servants of demigods-Vidyadhar & Nymphs are the superior forms of Rajogun.
तापसा यतयो विप्रा ये च वैमानिका गणाः।
नक्षत्राणि च दैत्याश्च प्रथमा सात्त्विकी गतिः॥
तापस (वानप्रस्थ), सन्यासी, ब्राह्मण, वैज्ञानिक, नक्षत्र और दैत्य; ये सत्वगुण की अधम गति हैं।[मनु स्मृति 12.48]  
Rebirth as an ascetic, hermit-wanderer, Recluse, Brahmn, scientist, Nakshtr & giants are the lowermost movements of soul for possessing Satvik Gun.
यज्वान ऋषयो देवा वेदा ज्योतींषि वत्सराः।
पितरश्चैव साध्याश्च द्वितीया सात्त्विकी गतिः॥
यज्ञकर्त्ता, ऋषि, देवता, वेदाभिमानी, ज्योति (ध्रुवादी), वत्सर (वर्ष), पितृगण, साध्यगण; ये सत्व गुण की मध्यम गति हैं।[मनु स्मृति 12.49]  
Performers of Yagy-sacrificers, sages, demigods, learners of Veds, heavenly lights (Dhruv etc.), years, the Manes-Pitr and the Sadhygan constitute the middle level of rebirth as an outcome of Satvgun possessed by the doers.
ब्रह्मा विश्वसृजो धर्मो महानव्यक्तमेव च।
उत्तमां सात्त्विकीमेतां गतिमाहुर्मनीषिणः॥
ब्रह्मा, विश्वसृज (मरिचि आदि), धर्म महान और अव्यक्त; इनको महर्षियों ने सत्वगुण की उत्तम गति कहा है।[मनुस्मृति 12.50] 
Brahma Ji-the creators of the universe (Marichi etc.), Dharm & the greatest beings, and the nondescript (indiscernible) have been  categorised as the excellent movement of a person as a result of performance-possession of Satvgun by the Mahrishis-sages.
श्वसूकरखरोष्ट्राणां गोजाविमृगपक्षिणाम्।
चण्डालपुक्कसानां च ब्रह्महा योनिमृच्छति
ब्रह्महत्या करने वाला क्रम से कुत्ता, सूअर, गधा, ऊँट, गौ, बकरा, भेड़, मृग, पक्षी, चाण्डाल और पुक्कस (एक प्राचीन अन्त्यज, नीच और बर्बर जाति) योनि को प्राप्त करता है।[मनुस्मृति 12.55] 
The slayer of a Brahman gets rebirth as a dog, pig, ass-donkey, camel, cow, goat, sheep, deer, bird, Chandal  and a Pukkas (an ancient barbarian & cruel caste), respectively..
कृमिकीटपतङ्गानां विड्भुजां चैव पक्षिणाम्।
हिंस्राणां चैव सत्त्वानां सुरापो ब्राह्मणो व्रजेत्[मनुस्मृति 12.56]
मदिरा पीने वाला ब्राह्मण, कृमि, कीट, पतङ्ग, विष्टा भोजी (गुबरीला) और हिंसा करने वाले जन्तु की योनि में उत्पन्न होती है।[मनुस्मृति 12.56] 
The Brahman who consumes wine-liqueur gets rebirth as insects, worms, insects & birds which eats shit-ordure and the wild animals-beasts; respectively. 
लूताहिसरटानां च तिरश्चां चाम्बुचारिणाम्।
हिंस्राणां च पिशाचानां स्तेनो विप्रः सहस्रशः
सोना चुराने वाला ब्राह्मण मच्छर, साँप, गिरगिट, पक्षी, जल में रहने वाले (ग्राह आदि) और हिंसा करने वाले पिशाचों की योनि में उत्पन्न होता है।[मनुस्मृति 12.57] 
The Brahmn who steals gold gets rebirth as  mosquitoes & spiders, snakes and lizards-chameleon, of aquatic animals (like crocodile) and Pishachs who eat flesh and involve in violence.
तृणगुल्मलतानां च क्रव्यादां दंष्ट्रिणामपि।
क्रूरकर्मकृतां चैव शतशो गुरुतल्पगः
गुरु पत्नी गमन करने वाले तृण, गुल्म, लता, कच्चा माँस खाने वाले पक्षी (गिद्ध आदि) और दाँत  वाले (हिंसक आदि) तथा क्रूर कर्म करने वाले बधिक आदि दुष्ट योनियों में सैंकड़ों बार जन्म लेते हैं।[मनुस्मृति 12.58] 
Those who enters into sexual relations with the wife of the Guru-teacher (elder brothers, honourable people etc.) gets rebirth hundreds of times as straw-grass, creeper-climbers, eaters of red-raw meat like vultures-kites, carnivores-beasts, butchers performing cruel acts.  
हिंस्रा भवन्ति क्रव्यादाः कृमयोऽभक्ष्यभक्षिणः।
परस्परादिनः स्तेनाः प्रेत्यान्त्यस्त्रीनिषेविणः
हिंसा करने वाले और कच्चे माँस को खाने वाले (गृद्ध आदि) बनते हैं। अभक्ष्य खाने वाले कृमि होते हैं। सुवर्ण की चोरी करने वाले परस्पर माँस खाने वाले कुत्ते आदि होते हैं और चाण्डाल की स्त्री के साथ गमन करने वाले प्रेत होते हैं।[मनुस्मृति 12.59] 
Those who resort to violence and eaters of red-raw meat become vultures. Those who eat prohibited food (meat, fish, egg) become worms. One who steal gold become animal who eat one another like dogs. One who intercourse with a Chandal woman become Pret (phantom, sprite, apparition, ghost, waff, phantasm, evil spirit).
संयोगं पतितैर्गत्वा परस्यैव च योषितम्।
अपहृत्य च विप्रस्वं भवति ब्रह्मराक्षसः
पतित के संग संसर्ग रखने वाला, दूसरे की स्त्री के साथ सम्बन्ध रखने वाला और ब्राह्मण का धन हरण करने वाला ब्रह्म राक्षस होता है।[मनुस्मृति 12.60] 
One who enters into sexual relations with a depraved-wretched (characterless) woman (prostitute, society girl, call girls, concubine, actresses), sexual relations with a married woman and snatch the wealth of a Brahmn become a Brahm Rakshas-fierce demon spirits (they eat flesh & meat of animals & humans).
मणिमुक्ताप्रवालानि हृत्वा लोभेन मानवः।
विविधानि च रत्नानि जायते हेमकर्तृषु
जो मनुष्य लोभवश मणि, काँसा, मोती, मूँगा और अनेक प्रकार के रत्नों का अपहरण करता है वह सुनार बनता है।[मनुस्मृति 12.61]  
One who steals precious stones-jewels, Bronze, pearls or coral or any of the ornaments-jewellery, gets rebirth as a goldsmith.
धान्यं हृत्वा भवत्याखुः कांस्यं हंसो जलं प्लवः।
मधु दंशः पयः काको रसं श्वा नकुलो घृतम्
धान चुराने वाला मूसा, काँसा चुराने वाला हँस, जल चुराने वाला प्लव पक्षी, मधु चुराने वाला दंस, दूध चुराने वाला कौआ, रस चुराने वाला कुत्ता और घी चुराने वाला नेवला बनकर पैदा होता है।[मनुस्मृति 12.62]  
One who steal paddy become a rat, on stealing Bronze he become a Hans (cob, swan), water thief become a bird called Palav, thief of honey is reborn as Dans, thief of milk turn into crow, thief of extracts become a dog and the thief of Ghee become an ichneumon in next birth.
मांसं गृध्रो वपां मद्गुस्तैलं तैलपकः खगः।
चीरीवाकस्तु लवणं बलाका शकुनिर्दधि
माँस चुराने वाला गृद्ध, चर्बी चराने वाला मदगुप पक्षी, तेल चुराने वाला तैलपक पक्षी, नमक चुराने वाला झिल्ली पक्षी और दही चुराने वाला बलाका पक्षी बनता है।[मनुस्मृति 12.63]  
One who steal meat become a vulture, thief of fat of dead animals (grease, adeps, axungia), become a bird called Madgup, thief of oil turn into a bird called Taelpak, thief of salt become a bird called Jhilli and the thief of curd become a bird called Balaka.
कौशेयं तित्तिरिर्हृत्वा क्षौमं हृत्वा तु दर्दुरः।
कार्पासतान्तवं क्रौञ्चो गोधा गां वाग्गुदो गुडम्
कौशेय (रेशमी वस्त्र) चुराने वाला तीतर पक्षी, और वस्त्र चुराने वाला मेंढ़क, ऊनी वस्त्र चुराने वाला कौआ पक्षी, गाय चुराने वाला गौ और गुड़ चुराने वाला वाग्गुद पक्षी होता है।[मनुस्मृति 12.64]  
One who steal silk cloths become partridge, for stealing linen a frog, for stealing woollen cloth a crow, for stealing a cow a cow, for stealing jaggery Vaggud a bird (flying fox) in next birth.
छुच्छुन्दरिः शुभान्गन्धान्पत्रशाकं तु बर्हिणः।
श्वावित्कृतान्नं विविधमकृतान्नं तु शल्यकः
अच्छे गन्ध वाले (केसर, कस्तूरी आदि) चुराने वाला छुछुन्दर, पत्ता और शाक चुराने वाला मोर, पकाया हुआ अन्न चुराने वाला श्रावित और अपक्क अन्न चुराने वाला शल्यक होता है।[मनुस्मृति 12.65]  
For stealing fine perfumes one become a musk-rat, for stealing leaves-vegetables one becomes peacock, for stealing cooked food of various kinds a Shravit-porcupine, for stealing uncooked food a Shalyak-hedgehog, in next birth.
बको भवति हृत्वाऽग्निं गृहकारी ह्युपस्करम्।
रक्तानि हृत्वा वासांसि जायते जीवजीवकः
अग्नि चुराने वाला बगुला, उपस्कर (छलनी, सूप-छाज आदि) चुराने वाला दीमक और रंगे हुए वस्त्रों को चुराने वाला चकोर बनता है।[मनु स्मृति 12.66]  
One who steals fire become a heron, for stealing household utensils like sieve one becomes termite, for stealing dyed clothes a partridge, ptarmigan in next birth.
वृको मृगैभं व्याघ्रोऽश्वं फलमूलं तु मर्कटः।
स्त्रीमृक्षः स्तोकको वारि यानान्युष्ट्रः पशूनजः
मृग और हाथी चुराने वाला भेड़िया, घोड़ा चुराने वाला बाघ, फल-मूल चुराने वाला वानर, स्त्री चुराने वाला भालू, पीने का पानी चुराने वाला पपीहा, यान (गाड़ी, रथ, रब्बा, कार, दुपहिया वाहन आदि) चुराने वाला ऊँट और साधारण पशुओं को चुराने वाला बकरा होता है।[मनु स्मृति 12.67]  
One who steals deer and elephant becomes wolf, for stealing horse one becomes tiger, thief of fruits & roots becomes Vanar-monkey, for stealing woman one becomes bear, for stealing water one becomes a black-white cuckoo, for stealing vehicles a camel, for stealing cattle a he-goat in following birth.
यद्वा तद्वा परद्रव्यमपहृत्य बलान्नरः।
अवश्यं याति तिर्यक्त्वं जग्ध्वा चैवाहुतं हविः
जिस किसी प्रकार से बलात् दूसरे का द्रव्य हरण कर और हवन के लिये रखी हुई हवि (घी आदि) को खाकर मनुष्य निश्चय ही तिर्यक् योनि में जाता है।[मनु स्मृति 12.68]  
One who forcibly grab (snatch, loot) other's wealth (property, money, belongings) or eats the holy goods meant for prayers, Pooja inevitably- definitely goes to the species of insects in coming births.
स्त्रियोऽप्येतेन कल्पेन हृत्वा दोषमवाप्नुयुः।
एतेषामेव जन्तूनां भार्यात्वमुपयान्ति ताः
स्त्रियाँ भी इस प्रकार चोरी करने पर पाप की भगिनी होती हैं और अन्त में पूर्वोक्त पाप के कारण उपरोक्त जंतुओं की स्त्रियाँ होती हैं।[मनु स्मृति 12.69]  
The women folk who commit such thefts too acquire sins and become the females of the animals who had committed such sins, in their next births. 
स्वेभ्यः स्वेभ्यस्तु कर्मभ्यश्च्युता वर्णा ह्यनापदि।
पापान्संसृत्य संसारान्प्रेष्यतां यान्ति शत्रुषु
निरापद अवस्था में चारों वर्ण यदि अपने-अपने कर्मों से च्युत हो जायें, तो संसार में पाप योनि को प्राप्त होकर शत्रु के दास होते हैं।[मनु स्मृति 12.70]  
If the humans belonging to the four Varns discard their Varnashram Dharm in spite of being safe (period of peace & harmony under a pious king), they get rebirth as slaves of the enemy.
वान्ताश्युल्कामुखः प्रेतो विप्रो धर्मात्स्वकाच्च्युतः।
अमेध्यकुणपाशी च क्षत्रियः कटपूतनः
यदि ब्राह्मण अपने कर्म से भ्रष्ट हो जाये तो वमन खाने वाला उल्का मुख नाम का प्रेत होता है। क्षत्रिय अपने कर्म से भ्रष्ट हो जाये तो वह विष्टा और मुर्दा खाने वाला कटपूतन नाम का प्रेत होता है।[मनु स्मृति 12.71]   
The Brahmn who do not abide by his duties-Dharm, become a Pret (wretched spirit)  called Ulka Mukh who eats the vomited food. A Kshatriy becomes a Pret-phantom who eats shit and dead humans-corpses & is called Katputan Pret, if he fails to discharge his duties prescribed by the scriptures.
मैत्राक्षज्योतिकः प्रेतो वैश्यो भवति पूयभुक्।
चैलाशकश्च भवति शूद्रो धर्मात्स्वकाच्च्युतः
यदि वैश्य अपने कर्म से रहित हो तो पीव खाने वाला मैत्राक्ष ज्योतिक नामक प्रेत होता है और शूद्र अपने कर्म से च्युत हो तो चैलाशक नाम का प्रेत होता है।[मनु स्मृति 12.72]
A Vaeshy is reborn as a Pret named Jyotik who eats pus, in case he fails to discharge his duties as a businessman-tradesman. A Shudr get rebirth as  a Pret called Chaelashak if he fails to discharge-honour his duties.
यथा यथा निषेवन्ते विषयान् विषयात्मकाः।
तथा तथा कुशलता तेषां तेषूपजायते
विषयों को चाहने वाले जैसे-जैसे विषयों का सेवन करते जाते हैं, वैसे-वैसे उनकी उन विषयों में रूचि बढ़ती जाती है।[मनु स्मृति 12.73]   
The interest in sensualities-passions keep on increasing with the indulgence of one, in them.
The ever growing interest in passions spoil one's present and the next birth, simultaneously.
तेऽभ्यासात्कर्मणां तेषां पापानामल्पबुद्धयः।
सम्प्राप्नुवन्ति दुःखानि तासु तास्विह योनिषु
अल्प बुद्धि वाले उन पापकर्मो के अभ्यास से जन्म दर जन्म उन-उन योनियों में उत्पन्न होकर दुखों को झेलते हैं।[मनु स्मृति 12.74]   
Imprudent people with low intelligence keep on getting birth in inferior species repeatedly, due to their deep involvement in passions, sensuality, sexuality, passions, lasciviousness and suffer for their sinfulness.
तामिस्रादिषु चाग्रेषु नरकेषु विवर्तनम्।
असिपत्रवनादीनि बन्धनछेदनानि च
पापात्मा तामिस्त्र आदि उग्र नरकों में वास करते हैं। असिपत्र आदि और बन्धनच्छेदन आदि नरकों को भोगते हैं।[मनु स्मृति 12.75]   
The sinner are moved to Tamistr, Asi Patr and Bandhanchchhedan hells to suffer and undergo extreme pain, tortures.
संभवांश्च वियोनीषु दुःखप्रायासु नित्यशः।
शीतातपाभिघातांश्च विविधानि भयानि च
अल्प बुद्धि वाले दुःख प्राय वियोनियों की योनि में जन्म लेकर जाड़ा-गरमी के कष्ट और अनेक प्रकार  के भय से ग्रस्त रहते हैं।[मनु स्मृति 12.77]   
They get rebirth in the species meant for tortures of natures like extreme heat & cold & have to face constant fears.
असकृद् गर्भवासेषु वासं जन्म च दारुणम्।
बन्धनानि च काष्ठानि परप्रेष्यत्वमेव च
अल्प बुद्धि वाले बारम्बार गर्भ में वास करते हैं, दुःखद जन्म लेते हैं। अनेक प्रकार के बन्धनों को भोगते हैं और दूसरों के दास होते हैं।[मनु स्मृति 12.78]  
They repeatedly enter the womb and get painful & agonising birth. They suffer from numerous ties-bonds, fetters & imprisonment and become slaves of others.
योनिमन्ये प्रपद्यन्ते शरीरत्वाय देहिनः। 
स्थाणुमन्येSनुसंयन्ति यथाकर्म यथाश्रुतम्॥
नचिकेता यमराज संवाद :: अपने अपने शुभ कर्मों के अनुसार और शास्त्र, गुरु, सङ्ग, शिक्षा, व्यवसाय, आदि के द्वारा देखे-सुने हुए भावों से निर्मित, अन्त:कालीन  वासना के अनुसार, मरने के पश्चात, कितने ही जीवात्मा तो दूसरा शरीर धारण करने के लिये शुक्र के साथ माता की योनि में प्रवेश कर जाते हैं। जिनके पुण्य-पाप समान होते हैं, वे मनुष्य का और जिनके पुण्य कम तथा पाप अधिक होते हैं, वे पशु-पक्षी का शरीर धारण करके उत्पन्न होते हैं और कितने ही, जिनके पाप अत्यधिक होते हैं, वे स्थावर भाव को प्राप्त होते हैं अर्थात वृक्ष, लता, तृण, पर्वत आदि जड़ शरीरों में उत्पन्न होते हैं।[कठोपनिषद 2.2.7] 
शरीरजैः कर्मदोषैर्याति स्थावरतां नरः। 
वाचिकैः पक्षिमृगतां मानसैरन्त्यजातिताम्॥
जो मनुष्य शरीर से चोरी, पर स्त्री गमन, श्रेष्ठों को मारने आदि दुष्ट कर्म करता है, उसको वृक्ष आदि स्थावर योनियों में मिलता है। वाणी से किये गये पाप कर्मों के फलस्वरूप पक्षी और मृग आदि तथा मन से किये दुष्ट कर्मों के कारण उसे चाण्डाल आदि का शरीर प्राप्त होता है।
हर गुर निंदक दादुर होई; जन्म सहस्र पाव तन सोई। 
द्विज निंदक बहु नरक भोग करि; जग जनमइ बायस सरीर धरि॥
भगवान् शंकर और गुरु की निंदा करने वाला मनुष्य अगले जन्म में मेंढक होता है और वह हजार जन्म तक वही मेंढक का शरीर पाता है। ब्राह्मणों की निंदा करने वाला व्यक्ति बहुत से नरक भोगकर फिर जगत्‌ में कौए का शरीर धारण करके जन्म लेता है।[रामचरित मानस] 
सुर श्रुति निंदक जे अभिमानी; रौरव नरक परहिं ते प्रानी। 
होहिं उलूक संत निंदा रत, मोह निसा प्रिय ग्यान भानु गत॥
जो अभिमानी जीव देवताओं और वेदों की निंदा करते हैं, वे रौरव नरक में पड़ते हैं। संतों की निंदा में लगे हुए लोग उल्लू होते हैं, जिन्हें मोह रूपी रात्रि प्रिय होती है और ज्ञान रूपी सूर्य जिनके लिए बीत गया (अस्त हो गया) रहता है। [रामचरित मानस]
सब कै निंदा जे जड़ करहीं; ते चमगादुर होइ अवतरहीं। 
सुनहु तात अब मानस रोगा; जिन्ह ते दुख पावहिं सब लोगा॥
जो मूर्ख मनुष्य सब की निंदा करते हैं, वे चमगादड़ होकर जन्म लेते हैं। हे तात! अब मानस रोग सुनिए, जिनसे सब लोग दुःख पाया करते हैं। [रामचरित मानस]
NEXT INCARNATION-BIRTH OF THE SINNER पाप का फल :: असत्य बोलने वाला मनुष्य मृग तथा पक्षी की योनि में जन्म लेता है। 
ब्रह्म हत्यारा पुरुष-व्यक्ति मृग, कुत्ते, सूअर और ऊँटो की योनि में जाता है। इनसे मुक्ति के बाद राजयक्ष्मा का रोगी बनता है। 
मदिरा पान करने वाला गधे, चाण्डाल तथा मल्लेछ (मुसलमान, अंग्रेज) बनता है और उसके दाँत काले पड़ जाते हैं। 
सोना चुराने वाला कीड़े-मकोड़े और पतिंगे की योनि पाता है। उसका नाख़ून खराब होता है। 
गुरु (कोई भी पूज्य व्यक्ति) पत्नी  से गमन करने वाला तृण अथवा लता बनता है और इससे मुक्ति के बाद मनुष्य योनि में कोढ़ी होता है।
अन्न चुराने वाला मायावी-राक्षस होता है। 
वाणी-कविता आदि की चोरी करने वाला गूँगा होता है। 
धान्य का अपहरण करने वाला अतिरिक्त अंग के साथ जन्म लेता है।
चुगलखोर की नाक और मुँह से बदबू आती है। 
तेल चुराने वाला तेल पीने वाला कीड़ा बनता है।
दूसेरों की स्त्री और ब्राह्मण का धन चुराने वाला निर्जन वन में ब्राह्मण राक्षस होता है। 
रत्न चोर नीच जाति में जन्म लेता है।
उत्तम गंध का चोर छछूंदर होता है। 
शाक पात चुराने वाला मुर्गा बनता है। 
अनाज की चोरी करने वाला चूहा बनता है। 
पशु चोर-बकरा, दूध चराने वाला-कौवा, सवारी की चोरी करने वाला-ऊँट, फल चुराकर खाने वाला-बन्दर या गृद्ध बनता है। 
शहद चोर-डाँस, घर का सामान चुराने वाला-गृह काक होता है। 
वस्त्र हड़पने वाला-कोढ़ी, चोरी-चोरी रस का स्वाद लेने वाला-कुत्ता और नमक चोर-झींगुर बनता है।
जीव, भोग देह का परित्याग करके पुनः गर्भ में आता है।जीव वायु रूप होकर गर्भ में प्रवेश करता है। केवल मनुष्योँ को मृत्यु के उपरांत एक आतिवाहिक संज्ञक शरीर प्राप्त होता है। अन्य किसी भी प्राणी को वह नहीं मिलता और न ही वे यमलोक को ले जाये जाते हैं।
यह लोक कर्म भूमि है और परलोक फल भूमि। यम दूत जब किसी पुण्य वान को धर्मराज के पास लेकर जाते हैं, तो वे उसका पूजन करते हैं और यदि कोई पापी ले जाया जाता है तो उसे दण्ड मिलता है। भोग देह दो प्रकार की हैं :- शुभ और अशुभ।  भोग देह के द्वारा कर्मफल भोग लेने के बाद जीव पुनः मर्त्य लोक में गिरा दिया जाता है। उसके त्यागे हुए शरीर को निशाचर खा जाते हैं। 
यदि जीव भोगदेह के माध्यम से पहले स्वर्ग का सुख पाता है तो उसे पुनः पापियों के योग्य भोग शरीर धारण कर नरक की यातना सहनी पड़ती है और तदुपरान्त जीव को पशु पक्षी या तियर्ग योनि-कीड़े मकोड़े के रूप में जन्म लेना पड़ता है। 
यदि पहले पाप का फल भोग कर प्राणी स्वर्ग जाता है तो उसे देवोचित शरीर मिलता है। स्वर्ग जाने वाले प्राणी को भोग काल समाप्त होने पर पवित्र आचार विचार वाले धनवानों के घर जन्म प्राप्त होता है। 
जो जिस पाप से सम्बन्ध रखता है, उसका कोई न कोई चिन्ह लेकर पुनर्जन्म लेता है।[अग्नि पुराण ] 
One who kills a Brahman becomes deer, dog, camel and there after suffers from tuberculosis as a human being in still next birth.
One who consumes wine becomes ass, Chandal, untouchable, Mallechchh, Muslim, European & his teeth becomes black due to decay.
One who steals gold becomes insect and on liberation from the species of insects, he will become human again but his teeth becomes black due to decaying.
One who indulge into intercourse with the wife of his teacher or any respected person's wife, becomes tree-shrub-straw and suffers from leprosy in next birth as a human being.
One who steal food grain, will become a demon.
One who steals the scripts of the other's writings become dumb in next birth. 
One who indulge in the theft of grains-food-cereals is born with an extra limb.
Backbiters are born with foul smelling mouth and nose.
Oil thief becomes the insect, which drinks oil.
One who steal the wife of other person or Brahmn's money-wealth, becomes demon in an inhabited jungle. 
Jewel thief gets birth in a low caste family.
Scents thief becomes foul smelling rat. One who steal food grain becomes mouse.
One who steal vegetables-leafy vegetables becomes cock.
Animal thief becomes male goat, domestic goods thief becomes camel, fruit thief becomes monkey or vulture.
Honey thief becomes mosquito and thief of domestic goods becomes a crow.
Cloth stealer will become leprosy patient, one who enjoys juices without offering it to others, will become a dog like the priest, who depends upon the salary from the temple or misuse temples funds, Salt thief will become cricket-an insect.
One is born with the sign of the sin he committed in his previous incarnation.
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संतोष महादेव-धर्म विद्या सिद्ध व्यास पीठ 
(बी ब्लाक, सैक्टर 19, नौयडा)

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