Saturday, January 7, 2023

RIG VED (सूक्त 4.1-58) ऋग्वेद

 RIGVED (4) ऋग्वेद
CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM
By :: Pt. Santosh Bhardwaj
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ॐ गं गणपतये नम:।
अक्षरं परमं ब्रह्म ज्योतीरूपं सनातनम्।
गुणातीतं निराकारं स्वेच्छामयमनन्तजम्॥
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि।
[श्रीमद्भगवद्गीता 2.47]
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (1) ::
 ऋषि :- वामदेव, गौतम, देवता :- अग्नि, वरुण, छन्द :- त्रिष्टुप्पादि।
त्वां ह्यग्ने सदमित्समन्यवो देवासो देवमरतिं न्येरिर इति क्रत्वा न्येरिरे। अमर्त्य यजत मर्त्येष्वा देवमादेवं जनत प्रचेतसं विश्वमादेवं जनत प्रचेतसम्॥
हे अग्नि देव! आप द्योतमान और शीघ्र गामी हैं। स्पर्द्धा वान देवगण आपको सर्वदा ही युद्ध के लिए प्रेरित करते हैं; इसलिए याजक गण लोग आपको स्तुति द्वारा प्रेरित करें। हे यजनीय अग्नि देव! आप अमर, द्युतिमान् और उत्कृष्ट ज्ञान विशिष्ट हैं। यज्ञ करने वाले मनुष्यों के बीच में आने के लिए देवों ने आपको उत्पन्न किया है। आप कर्माभिज्ञ हैं। समस्त यज्ञों में उपस्थित रहने के लिए देवों ने आपको उत्पन्न किया।[ऋग्वेद 4.1.1]
स्पर्द्धा :: होड़, प्रतियोगिता, अभिलाषा, तीव्र इच्छा, प्रतिद्वंद्विता, ईर्ष्या न करते हुए भी किसी के समान होने की इच्छा, किसी लक्ष्य को पूरा करने की चुनौती, किसी से बराबरी करने की अभिलाषा अथवा तीव्र इच्छा; competition, emulous-motivated by a spirit of rivalry.
EMULOUS :: motivated by a spirit of rivalry.
हे अग्नि देव! तुम ज्योर्तिवान हो। गति से चलते हो। शत्रु पर विजय प्राप्त करने की कामना स्पर्द्धा से परिपूर्ण देव तुम्हें युद्ध के लिए ग्रहण करते हैं। यजमान तुम्हारी वंदना करते हुए आकृष्ट करते हैं। तुम अविनाशी ज्योर्तिवान अत्यन्त ज्ञानी हो, मनुष्यों को यज्ञ कार्य के लिए प्राप्त करने के लिए देवों ने तुमको प्रकट किया है। तुम कार्यों के ज्ञाता हो, समस्त अनुष्ठानों में प्रत्यक्ष रहने के लिए देवों ने तुम्हारी रचना की है।
Hey adorable Agni Dev! The emulous demigods-deities excite you, being swift to move-act. Therefore, the worshippers urge you by their devotions to bring the deities to their sacrifices-Yagy. You are immortal, divine, all wise, as the present divinity among men.
Hey Agni Dev! You are radiant-aurous and dynamic-fast moving. Demigods-deities seek your help-cooperation against the competitors. The Ritviz worship-pray to you. You are enlightened, immortal and evolved by the demigods-deities for the accomplishment of the Yagy by the humans. You are aware of the endeavours, goal, targets of the humans. 
स भ्रातरं वरुणमग्न आ ववृत्स्व देवाँ अच्छा सुमती यज्ञवनसं ज्येष्ठं यज्ञवनसम्। ऋतावानमादित्यं चर्षणीधृतं राजानं चर्षणीधृतम्
हे अग्नि देव! आपके भ्राता वरुण देव हैं। वे हव्य भाजन, यज्ञ भोक्ता, अतिशय प्रशंसनीय, उदकवान, अदिति-पुत्र, जलदान द्वारा मनुष्यों के धारक, सुबुद्धि युक्त और राजमान हैं। आप ऐसे वरुण देव को स्तोताओं के अभिमुख करें।[ऋग्वेद 4.1.2]
राजमान :: चमकता हुआ; radiant, aurous, shinning.  
हे अग्ने! वरुण तुम्हारे भ्राता हैं। वे हवियों के पात्र, यज्ञ का उपभोग करने वाले, जल वाले, प्रशंसित, अदिति के पुत्र हैं। वे जल वृद्धि द्वारा प्राणी को धारण करने वाले हैं। वे सुन्दर प्रज्ञा वाले एवं शोभनीय हैं। इन वरुण की प्रार्थना करने वालों के तुल्य लाओ।
Hey Agni Dev! Involve Varun Dev with the worshippers in the Yagy, as a willing participant. He the ruler of the water, the son of Aditi, the supporter of men the sovereign venerated by mankind.
Hey Agni Dev! Varun dev is your brother. He deserve offerings, participant of Yagy, appreciable, son of Dev Mata Aditi, supporter of humans by granting-providing water, pious, righteous, virtuous, truthful, aurous. Let the worshipers-Ritviz come to him.
सखे सखायमभ्या ववृत्स्वाशुं न चक्रं रथ्येव रंह्यास्मभ्यं दस्म रंह्या।
अग्ने मृळीकं वरुणे सचा विदो मरुत्सु विश्वभानुषु। तोकाय तुजे शुशुचान शं कृध्यस्मभ्यं दस्म शं कृधि
हे सखिभूत दर्शनीय अग्नि देव! आप अपने मित्र वरुण देव को हमारे अभिमुख करें, जिस प्रकार से गमन कुशल और रथ में युक्त अश्व द्वय शीघ्रगामी चक्र को लक्ष्य देश के अभिमुख ले जाते हैं। हे अग्नि देव! आपकी सहायता से वरुण देव ने सुखकर हव्य लाभ किया है। हे दीप्तिमान अग्नि देव! हम लोगों का कल्याण करें।[ऋग्वेद 4.1.3] 
हे अग्नि देव! तुम सखाभाव से परिपूर्ण हो। जैसे गमन युक्त रथ में जुड़े दो अश्व शीघ्र चलने वाले पहियों को लक्ष्य पर पहुँचाते हैं, वैसे ही तुम अपने वरुण को हमारे लाओ। हे अग्नि देव! तुम्हारे सहयोग से वरुण ने सुखमय हवियाँ ग्रहण की हैं तथा अत्यन्त तेजस्वी मरुतों के लिए भी सुखकारक हव्य अर्जन किया है।
Hey Agni Dev! You possess the feelings of brotherhood-companionship. Bring Varun Dev to us, the way an expert-skilled charioteer negotiate the two horses deployed in the charoite towards the destination. Hey Agni Dev! Varun Dev attained-obtained the comfortable offerings, gratifying oblation along with the aurous Marud Gan. Hey Agni Dev! Resort to our welfare bringing happiness to our sons & grand sons.
त्वं नो अग्रे वरुणस्य विद्वान्देवस्य हेळोऽवयासिसीष्ठाः।
यजिष्ठो वह्नितमः शोशुचानो विश्वा द्वेषांसि प्र मुमुग्ध्यस्मत्
हे अग्नि देव! आप समस्त पुरुषार्थ के साधना के उपायों को जानते हैं। हम लोगों के प्रति द्योतमान वरुण देव के क्रोध का अपनोदन करें। आप सबकी अपेक्षा अधिक याज्ञिक, हविर्वाही और अतिशय दीप्तिमान् हैं। आप हम लोगों को सब प्रकार के पापों से विशेष रूप से दूर अर्थात् विमुक्त करें।[ऋग्वेद 4.1.4]
हे अग्नि देव! तुम हमारी संतान को सुख प्रदान करो और हमको कल्याण प्रदान करो। हे अग्नि देव! तुम सभी कर्मों के स्वामी हो। प्रकाशवान वरुण को हमारे प्रति क्रोधित न होने दो। तुम यज्ञ करने वालों में उत्तम हवियों को वहन करने वाले अत्यन्त प्रकाशवान हो। तुम प्रत्येक प्रकार के पापों से हमारी सुरक्षा करो।
Hey wise Agni Dev! Avert from us the wrath of Varun Dev. You are the most frequent sacrificer, the most diligent bearer of oblations, the most resplendent liberate us from all animosities.
Hey Agni Dev! You are aware all means of achieving ambitions. Ensure that Varun Dev do not become angry with us. You are radiant, carrier of offerings of the Yagy. Remove our all sorts of sins.
स त्वं नो अग्रेऽवमो भवोती नेदिष्ठो अस्या उषसो व्युष्टौ।
अव यक्ष्व नो वरुणं रराणो वीहि मृळीकं सुहवो न एधि
हे अग्नि देव! रक्षा दान द्वारा आप हम लोगों के होवें। उषा के विनष्ट होने पर प्रातः काल में अग्नि होत्रादि कार्य की सिद्धि के लिए हम लोगों के अत्यन्त पास होवें। हम लोगों के लिए जो वरुण कृत जलोदरादि रोग और पाप हैं, उनका विनाश करे। आप लिए अत्यन्त फल प्रद हैं। आप इस सुखकर हवि का भक्षण करें। हम आपके उत्तम रूप का आह्वान करते हैं; हमारे निकट आगमन करें।[ऋग्वेद 4.1.5]
हे अग्नि देव! रक्षण कार्यों द्वारा हमारे अत्यन्त निकट आओ। उषा की समाप्ति पर प्रातः की बेला में यज्ञादि कार्यों की सिद्धि के लिए हमारे अत्यन्त पास पधारो। हमारे लिए जल से उत्पन्न व्याधियों को पहले ही समाप्त कर दो। तुम यजमानों को अभीष्ट फल प्रदान करते हो। तुम तुष्टिप्रद हवि का सेवन करो। हम तुम्हें भली-भाँति आहूत करते हैं। तुम हमारे निकट पधारो।
Hey Agni Dev! Come near to protect us, in the morning for carrying out Yagy and accomplishment of our endeavours. Vanish our ailments-diseases developed through water. You grant desired rewards to the Ritviz. Accept the nourishing offerings. We should honour, worship, pray you.
अस्य श्रेष्ठा सुभगस्य संदृग्देवस्य चित्रतमा मर्त्येषु।
शुचि घृतं न तप्तमघ्न्यायाः स्पार्हा देवस्य महनेव धेनोः
उत्तम रूप से भजनीय अग्नि देव का प्रशंसनीय अनुग्रह मनुष्यों के लिए अत्यन्त भजनीय तथा स्पृहणीय होता है। जिस प्रकार से क्षीराभिलाषी देवों के लिए गौओं का तेजोयुक्त, क्षरणशील और उष्ण दुग्ध स्पृहणीय होता है तथा जैसे मनुष्यों के लिए दूध देने वाली गाय भजनीय होती है।[ऋग्वेद 4.1.6]
स्पृहणीय :: प्राप्त करने योग्य, वांछनीय; coveted, enviable, preferable, admirable.
उत्तम ऐश्वर्यवान अग्नि देव की प्राणियों के बीच अत्यन्त महान तथा अद्भुत दृष्टि हो। जैसे दूध की कामना वाले प्राणियों को गाय का पवित्र दूध थन से निकलकर उष्ण को प्राप्त होता है, जैसे गौदान की कामना वाले को दान स्पृहणीय होता है, जैसे अग्नि का तेज भी गौ के समान पोषण योग्य एवं स्पृहणीय होता है।
Your favours to the humans deserve appreciation. The way warm coveted cow milk, full of energy-nourishment is desired by the demigods-deities, cow is worship able for the humans.
त्रिरस्य ता परमा सन्ति सत्या स्पार्हा देवस्य जनिमान्यग्नेः।
अनन्ते अन्तः परिवीत आगाच्छुचिः शुक्रो अर्यो रोरुचानः
अग्नि देव का प्रसिद्ध उत्तम और यथार्थ भूत अग्नि, वायु तथा सूर्यात्मक तीन जन्म सभी के द्वारा स्पृहणीय हैं। अनन्त आकाश में अपने तेज द्वारा परिवेष्टित, सभी के शोधक, दीप्ति युक्त और अत्यन्त दीप्यमान स्वामी अग्नि देव हमारे यज्ञ स्थल पर पधारें।[ऋग्वेद 4.1.7]
अग्नि के तीन रूप अग्नि, पवन और सूर्य विख्यात एवं महान हैं। अनन्त अम्बर में अपने तेज से व्याप्त सभी को पवित्र करने वाले, ज्योति से परिपूर्ण और अत्यन्त तेजस्वी अग्निदेव हमारे अनुष्ठान को ग्रहण हों।
Three form of Agni viz. fire, air and the Sun are admirable for all. Let extremely radiant Agni Dev present in the infinite sky with his aura-energy, purifier of all, obelize us by visiting-participating in our Yagy.
सदूतो विश्वेदभि वष्टि सद्मा होता हिरण्यरथो रंसुजिह्वः।
रोहिदश्वो वपुष्यो विभावा सदा रण्वः पितुमतीव संसत्
हे दूत! देवों के आह्वानकारी, सुवर्णमय रथोपेत एवं रमणीय ज्वाला विशिष्ट अग्नि देव! समस्त यज्ञ की कामना करते हैं। रोहिताश्व, रूपवान और सदा कान्ति युक्त अग्नि देव धन-धान्य से सम्पन्न घर की तरह सुखकारी हैं।[ऋग्वेद 4.1.8]
वे अग्नि देवगणों को आमंत्रित करने वाले दूत, स्वर्ण रथ वाले, अभिलाषित ज्वालाओं वाले, यज्ञों के प्राप्त होने की अभिलाषा करते हैं। सुसज्जित अश्व वाले, प्रदीप्त अग्नि अन्न से सम्पन्न गृह के समान सुखदायक हैं।
Agni Dev present in the golden charoite, with his beautiful flames, is the messenger-ambassador inviting-invoking demigods-deities, desires-wish to attend the Yagy. Agni Dev possessing decorated horse, accompanied with brilliant flames is comfortable like a house possessing food grains.
स चेतयन्मनुषो यज्ञबन्धुः प्र तं मह्या रशनयां नयन्ति।
स क्षेत्यस्य दुर्यासु साधन्देवो मर्तस्य सधनित्वमाप
अग्नि देव यज्ञ में विनियुक्त होते हैं। वे यज्ञ में प्रवृत्त मनुष्यों को जानते हैं। अध्वर्यु गण महती रशना द्वारा उत्तर वेदि में उनका प्रणयन करते हैं। याजक गण के गृहों में अभीष्ट साधन करते हुए वे निवास करते हैं। वे द्योतमान अग्नि देव धनियों के साथ एकत्र वास करते हैं।[ऋग्वेद 4.1.9]
अनुष्ठान :: संस्कार, समारोह, विधि, रस्म, धार्मिक प्रक्रिया (संस्कार, उत्सव, पद्धति), शास्र विधि, आचार, आतिथ्य सत्कार; rituals, rites, ceremonies.
अग्नि देव अनुष्ठान में व्याप्त होते हैं। वे यज्ञ कर्मों की कामना वाले प्राणियों को जानते हैं। अध्वर्युगण उन्हें उत्तर वेदी में नियम पूर्वक स्थापित करते हैं। यजमानों का अभिष्ट सिद्धि करते हुए उनके भवनों में रहते हैं। वे प्रकाशवान अग्नि देव धन सम्पन्नों सहित वास करते हैं।
Agni Dev is engaged-busy with religious ceremonies. He is aware of the humans who are engaged in the Yagy. The Ritviz establish him over the North end of the Vedi. He resides in the homes of the devotees to fulfil-accomplish their desires-motives. Radiant-aurous Agni Dev resides with the rich collectively.
स तू नो अग्निर्नयतु प्रजानन्नच्छा रत्नं देवभक्तं यदस्य।
धिया यद्विश्वे अमृता अकृण्वन्द्यौष्पिता जनिता सत्यमुक्षन्
स्तोताओं द्वारा भजनीय जो उत्कृष्ट रत्न अग्नि का है, उस रत्न को सर्वज्ञ अग्नि देव हमारे सम्मुख प्रेरित करें। मरण धर्म रहित समस्त देवों ने यज्ञ के लिए अग्नि का उत्पादन किया। द्युलोक उनके पालक और पिता हैं। अध्वर्यु गण घृतादि आहुतियों द्वारा यथार्थ भूत अग्नि को सिञ्चित करते हैं।[ऋग्वेद 4.1.10]
जिन रमणीय समृद्धि को प्रार्थना करने वाले भजते हैं, अग्नि देव की वह उत्तम समृद्धि और हमारे सम्मुख उपस्थित हो। अविनाशी देवों ने अग्नि देव को अनुष्ठान करने के लिए रचित किया है। अम्बर उनके पोषक पितृ रूप हैं। अध्वर्यु मनुष्य घृत आदि की से उस सत्य को सींचते हैं।
Let wise Agni Dev conduct us to that wealth which is desired by the devout-devotees. The fire has been produced by the immortals for the performance of sacred oblations, the most resplendent, liberate us from all animosities.
None is immortal. Even Maha Dev, Bhagwan Shri Hari Vishnu and brahma Ji have a fixed life span of 8 Prardh, 4 Parardh and 2 Parardh respectively.
ANIMOSITY :: शत्रुता, वैरभाव; द्वेष; a strong feeling of anger and dislike.
Let the excellent-marvellous prayers recited by the devotees in the honour of Agni Dev, be available to us. Immortal demigods-deities have ignited fire for the Yagy. The heavens are their nurturers and patrons-father. The Ritviz makes offerings of Ghee in fire.
स जायत प्रथमः पस्त्यासु महो बुध्ने रजसो अस्य योनौ।
अपादशीर्षा गुहमानो अन्तायोयुवानो वृषभस्य नीळे
अग्नि ही श्रेष्ठ हैं। वे याजक गणों के गृहों में और महान् अन्तरिक्ष के मूल स्थान में उत्पन्न हुए हैं। अग्नि पाद रहित और शिरोवर्जित हैं। वे शरीर के अन्तर्भाग का गोपन करके जलवर्षी मेघ-बादलों के निलय में अपने को घूमाकार बनाते हैं।[ऋग्वेद 4.1.11]
अग्नि देव सब में सर्वोत्तम हैं। वे गृहों निवास करने वाले प्राणियों के मध्य ग्रहों के मुखिया पुरुष के समान वास करते हैं। हे श्रेष्ठ जन समूह के आश्रय स्थान रूप एवं बिना पाँव वाले हैं। वे सभी के शीर्ष होते हुए भी शिरों से परे हैं। वे सभी के अन्दर रमे रहते हैं।
He is first engendered in the habitation-houses of the sacrificers, then upon his station-the altar, the base of the vast firmament-sky, space; without feet, without head, concealing his extremities, combining with smoke in the nest of the rain-cloud.
Agni Dev is best-excellent. He has evolved in the homes of the performers of Yagy and the centre of the space, configuring himself round, combining with the rain clouds. He has no legs-feet and head (specific shape & size). Though the head of all, he himself is without head. He is embedded in all.
प्र शर्ध आर्त प्रथमं विपन्याँ ऋतस्य योना वृषभस्य नीळे।
स्पार्हो युवा वपुष्यो विभावा सप्त प्रियासोऽजनयन्त वृष्णे
हे अग्नि देव! आप स्तुति युक्त उदक के उत्पत्ति स्थान में मेघ के कुलाय भूत अन्तरिक्ष में वर्तमान हैं। तेज आपके निकट सर्वप्रथम उपस्थित होता है। जो अग्नि स्पृहणीय, नित्य तरुण, कमनीय और दीप्तिमान् हैं, उन्हीं अग्नि देव के उद्देश्य से सप्त होता प्रार्थना करते हैं।[ऋग्वेद 4.1.12]
हे अग्नि देव! तुम जलों के रचित स्थान में बादल के नीड़ रूप अंतरिक्ष में प्रार्थनाओं से परिपूर्ण हुए व्याप्त रहते हो। सर्व महान तेज तुम्हारे पास उपस्थित होता है। जो अग्निदेव सभी के चाहने योग्य, सततयुवा कमनीय एवं ज्योति से परिपूर्ण हैं, सप्त होता इन्हीं के लिए वंदनाएँ उच्चारित करते हैं।
Hey Agni Dev! You are present in the clouds being worshipped-prayed. The Tej, aura-energy is present-associated with him. The Strotr-reciters of hymns, pray always young, beautiful, glittering, coveted, enviable, preferable, admirable Agni Dev.
अस्माकमत्र पितरो मनुष्या अभि प्र सेदुर्ऋतमाशुषाणाः।
अश्मव्रजाः सुदुघा वव्रे अन्तरुदुस्रा आजन्नुषसो हुवानाः
इस लोक में हमारे पितृ पुरुषों ने यज्ञ करने के लिए अग्नि के अभिमुख गमन किया। प्रकाश के लिए उषा देवी का आह्वान करते हुए उन लोगों ने अग्नि देव की परिचर्या के बल से पर्वत विलान्तर्वर्ती अन्धकार के बीच से दुधारु धेनुओं को मुक्त किया।[ऋग्वेद 4.1.13] 
इस संसार में हमारे पूर्वज यज्ञ साधन के लिए अग्नि के सामने उपस्थित हुए, उन्होंने उषा का आह्वान किया और अग्नि की पूजा से प्राप्त हुए बल के माध्यम से शैल की गुफाओं में छाए हुए अंधेरे में से दुहने योग्य पयस्विनी गौओं को बाहर किया।
Our ancestors-Manes presented themselves before Agni Dev in this universe. They invoked Usha Devi, worshiped Agni Dev and released the milch cows from the caves under darkness in the mountains.
ते मर्मृजत ददृवांसो अद्रिं तदेषामन्ये अभितो वि वोचन्।
पश्वयन्त्रासो अभि कारमर्चन्विदन्त ज्योतिश्चकृपन्त धीभिः
उन लोगों ने पर्वत को विदीर्ण करते समय अग्नि की परिचर्या की। अन्य ऋषियों ने उनके कर्म का कीर्तन सर्वत्र किया। उन्हें पशुओं को बचाने के उपाय मालूम थे। अभिमत फलप्रद अग्नि की प्रार्थना करते हुए उन्होंने ज्योति लाभ किया और अपने विवेक द्वारा यज्ञ किया।[ऋग्वेद 4.1.14] 
उन्होंने पर्वत को ध्वंस करते समय अग्नि की अर्चना की। अन्य ऋषियों ने भी उनके कार्यों का सब जगह बखान किया। उन्हें पशु सुरक्षा करके उपायों को पूर्ण ज्ञान था। उन्होंने अभीष्ट फल प्रदान करने वाली अग्निदेव की प्रार्थना दोबारा देखने वाली इंद्रिय को लाभ ग्रहण किया तथा अपनी उत्तम मति द्वारा यज्ञ कार्य का साधन किया।
They destroyed the mountains and circumambulated Agni Dev. Other Rishi Gan sung their endeavours every where. They were aware of the means to liberate the cattle. Having achieved their target they prayed-worshiped Agni Dev performing Yagy prudently and gained vision.
ते गव्यता मनसा दृधमुब्धं गा येमानं परि षन्तमद्रिम्।
दृळ्हं नरो वचसा दैव्येन व्रजं गोमन्तमुशिजो वि वव्रुः
अङ्गिरा आदि कर्मों के नेता और अग्नि की कामना वाले थे। उन्होंने मन से गौ लाभ की इच्छा करके द्वार निरोधक, दृढ़ बद्ध, सुदृढ़, गौओं के अवरोधक एवं सर्वतः व्याप्त गोपूर्ण गोष्ठ रूप पर्वत का अग्नि विषयक स्तुति द्वारा उद्घाटन किया।[ऋग्वेद 4.1.15]
पूर्व जन्म के कर्मों के करने में वे अग्रगण्य थे। वे अग्नि की हमेशा इच्छा करते थे। उन्होंने गौ के प्राप्त करने की कामना से अत्यन्त अटल गौओं से भरे हुए गौशाला के समान शैल की अग्नि की प्रार्थनाओं से प्राप्त बल द्वारा खोला।
Angira and other Rishi were expert in the procedures-methodology of performing Yagy & Agni worship. They desired to have-release the cows, destroyed the gates in the yard-cowshed possessing cows in captivity, reciting prayers devoted-addressed to Agni Dev.
ते मन्वत प्रथमं नाम धेनोस्त्रिः सप्त मातुः परमाणि विन्दन्।
तज्जानतीरभ्यनूषत व्रा आविर्भुवदरुणीर्यशसा गोः
हे अग्नि देव! स्तोत्र करने वाले अङ्गिरा आदि ने ही पहले-पहल जननी वाक के सम्बन्धी शब्दों को जाना, पश्चात् वचन सम्बन्धी सत्ताईस छन्दों को प्राप्त किया। अनन्तर इन्हें जानने वाली उषा की प्रार्थना की एवं सूर्य के तेज के साथ अरुण वर्णा उषा प्रादुर्भत हुई।[ऋग्वेद 4.1.16]
छन्द ::  मंत्र को सर्वतोभावेन आच्छादित करने की विधि को छन्द कहते हैं। यह अक्षरों अथवा पदों से बनता है। मंत्र का उच्चारण चूँकि मुख से होता है, अतः छन्द का मुख से न्यास किया जाता है।
वर्ण तथा यति (विराम) के नियमों के अनुरूप वाक्य या पद्यात्मक रचना, छंदशास्त्र में वर्ण या मात्राओं का वह निश्चित मान जिसके आधार पर पद्य लिखा जाता है, इच्छा, अभिलाषा, नियंत्रण, रुचि, अभिप्राय, तरकीब; उपाय; युक्ति, बंधन-गाँठ, स्वेच्छाचार, मन, वर्ण, मात्रा आदि की गिनती से होने वाली पद्यों की वाक्य रचना यथा दोहा, सोरठा, चौपाई; metre.
हे अग्ने! वंदना करने वाले अंगिरा आदि ऋषियों ने ही वाणी रूपिणी जननी से रचित वंदनाओं के साधन का शब्दों में पहली बार ज्ञान प्राप्त किया फिर सत्ताइस छन्दों को जाना। इसके बाद जानने वाली उषा की प्रार्थना की और तभी आदित्य के तेज से परिपूर्ण अरुण रंग वाली उषा का आविर्भाव हुआ।
Hey Agni Dev! rishi Angira at first learned the Strotr pertaining to the voice-speech and there after learned 27 Chhand-metre. Then he prayed to Devi Usha and the Sun-Adity, leading to the arrival of Arun with his aura.
नेशत्तमो दुधितं रोचत द्यौरुद्देव्या उषसो भानुरर्त।
आ सूर्यो बृहतस्तिष्ठदज्राँ ऋजु मर्तेषु वृजिना च पश्यन्
रात्रि कृत अन्धकार उषा द्वारा प्रेरित होने पर विनष्ट हुआ। अन्तरिक्ष दीप्त हुआ। उषा देवी की प्रभा उद्गत हुई। मनुष्यों के सत् और असत् कर्मों का अवलोकन करते हुए सूर्य देव महान् अजर पर्वत के ऊपर आरूढ़ हुए।[ऋग्वेद 4.1.17]
रात्रि के द्वारा उत्पन्न तम उषा की प्रेरणा से अटल हुआ, फिर अंतरिक्ष प्रकाशमय हुआ। उषा की आभा प्रकट हुई फिर प्राणियों के सत्य कर्मों को देखने में सक्षम अटल शैल पर चढ़ गये।
The darkness due to the night vanished as soon Devi Usha appeared,  leading the the aura spread by her. The space-sky lightened. Sury Dev-Sun rose to the immortal mountain to see virtuous-wicked, pious-vices the deeds-endeavours of the humans. 
आदित्पश्चा बुबुधाना व्यख्यन्नादिद्रलं धारयन्त द्युभक्तम्।
विश्वे विश्वासु दुर्यासु देवा मित्र धिये वरुण सत्यमस्तु
सूर्योदय के अनन्तर अङ्गिरा आदि ने पणियों द्वारा अपहृत गौओं को जानकर पीछे की ओर से उन गौओं को अच्छी तरह से देखा एवं दीप्ति युक्त धन धारित किया। इनके समस्त घरों में यजनीय देवगण आवें। वरुण जनित उपद्रवों का निवारण करने वाले हे मित्रभूत अग्निदेव! जो आपकी उपासना करता है, उसकी समस्त कामनाएँ पूर्ण हों।[ऋग्वेद 4.1.18]
सूर्य के उदित होने पर अंगिरा आदि ऋषियों ने पणियों के द्वारा चुराई गई धेनुओं को जाना तथा पीछे से उन्हें भली-भाँति देखा। इसके समस्त साधनों को अनुष्ठान कार्य में हिस्सा ग्रहण करने के पात्र देवता ग्रहण हुए। हे सखा की भावना से ओत-प्रोत अग्निदेव! तुम वरुण के क्रोध को शांत करने वाले हो। तुम्हारी उपासना करने वालों को फल ग्रहण हो।
After the Sun rise Angira and the other Rishis carefully examined the released cows from behind and accepted the glittering wealth (gems & jewels). Let revered-honoured demigods-deities visit their houses. Hey Agni Dev! Any one wo worship-pray you is released from the troubles generated-created by Varun Dev, leading to accomplishment of all of his desires.
अच्छा वोचेय शुशुचानमग्निं होतारं विश्वभरसं यजिष्ठम्।
शुच्यूधो अत्रंण गवामन्धो न पूतं परिषिक्तमंशोः
हे अग्नि देव! आप अत्यन्त दीप्तिमान्, देवों के आह्वाता, विश्व पोषक और सर्वापेक्षा यागशील है। आपके उद्देश्य से हम प्रार्थना करते हैं। याजक गण लोग आपको आहुति देने के लिए गौओं के ऊधः प्रदेश से शुद्ध पवित्र दुग्ध नहीं दुहा तथा सोम को अभिषुत (भी) नहीं किया, वे लोग केवल आपकी प्रार्थना करते हैं।[ऋग्वेद 4.1.19]
हे अग्ने! तुम देवगणों का आह्वान करने वाले, अत्यन्त प्रदीप्त वाले, संसार के पालनकर्त्ता, सबकी उपेक्षा अत्यधिक यज्ञ-कर्म करने वाले हो। हम तुम्हारी वन्दना करते हैं। तुम्हारे लिए आहुति देने के लिए तुम्हारी अर्चना करते हैं।
Hey radiant-aurous Agni Dev! You invoke the demigods-deities, nourish-nurture the whole world and is comparatively worshiped more. We worship-pray you and make offerings for you with cow's Ghee. 
विश्वेषामदितिर्यज्ञियानां विश्वेषामतिथिर्मानुषाणाम्।
अग्निर्देवानामव आवृणानः सुमृळीको भवतु जातवेदाः
अग्नि देव समस्त यज्ञीय देवताओं को पैदा (उत्पन्न) करने वाले हैं तथा अग्नि देव सम्पूर्ण मनुष्यों के लिए अतिथिवत् पूज्य हैं। स्तोताओं के अन्न भोजी अग्नि देव स्तोताओं के लिए सुखकर हों [ऋग्वेद 4.1.20] 
अग्नि देव यज्ञ के लिए अतिथि के समान पूजने योग्य हैं। स्तोताओं का हृव्य भक्षण करने वाले अग्नि देव वंदना करने वाले को सुखी करें।
Agni Dev invoke all demigods-deities for the Yagy and is respectable like a guest. Let Agni Dev accepting the offerings of the Ritviz-Strota be blissful to them.(13.1.2023)
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (2) :: ऋषि :- वामदेव गौतम, देवता :- अग्नि,  छन्द :- त्रिष्टुप
यो मर्त्येष्वमृत ऋतावा देवो देवेष्वरतिर्निधायि।
होता यजिष्ठो मह्ना शुचध्यै हव्यैरग्निर्मनुष ईरयध्यै
जो मरण धर्म-रहित अग्नि देव मनुष्यों के बीच में सत्यवान होकर निहित है, जो दीप्तिमान अग्नि देव इन्द्रादि देवताओं के बीच में शत्रुओं के पराभव कर्ता है, वे ही अग्नि देव देवों के आह्वाता और सबकी अपेक्षा अधिक यज्ञ करने वाले हैं। वे अपनी महिमा से प्रदीप्त होने के लिए उत्तर वेदि पर स्थापित हुए हैं एवं हवि द्वारा याजक गणों को स्वर्ग लोक भेजने के लिए स्थापित हुए हैं।[ऋग्वेद 4.2.1]
अविनाशी अग्नि के साथ स्वरूप से मनुष्य के मध्य रहते हैं। जो ज्योर्तिवान अग्नि देव इन्द्रादि देवों के संग मिलकर शत्रुओं को पराजित करने वाले हैं। वे अग्नि देवों को पुकारने में समर्थ हैं तथा सबसे अधिक यज्ञानुष्ठान करते हैं। वे उत्तर वेदी पर अपनी महिमा द्वारा ही प्रदीप्त होने के लिए पधारते हैं तथा हवि वहन करते हुए यजमानों को मोक्ष प्राप्त कराने के लिए प्रकट हुए हैं।
Immortal, truthful Agni Dev is present amongest the humans. Radiant Agni Dev present amongest the demigods-deities defeats the enemies with them. He has been established in the North of the Vedi to help the Ritviz attain heavens. 
इह त्वं सूनो सहसो नो अद्य जातो जाताँ उभयाँ अन्तरग्ने।
दूत ईयसे युयुजान ऋष्व ऋजुमुष्कान्वृषणः शुक्रांश्च
हे बल पुत्र अग्नि देव! आप आज हमारे इस कार्य में प्रकट हुए हैं। हे दर्शनीय अग्निदेव! आप ऋजु, मांसल, दीप्तिमान् और बलवान् अश्वों को रथ में युक्त करके जन्म विशिष्ट देव और मनुष्यों के बीच में हव्य पहुँचाने के लिए दूत बनकर पहुँचते हैं।[ऋग्वेद 4.2.2]
ऋजु :: सीधा, ईमानदार और सच्चा; unbent, straight, honest & truthful.
हे बलोत्पन्न अग्नि देव! तुम आज हमारे कार्य में सिद्ध हुए हो, तुम दर्शनीय हो अपने पुष्ट तेजस्वी, शक्तिशाली अश्वों को रथ में जोतकर देवताओं और प्राणियों के मध्य हवि वाहक दूत रूप से प्राप्त हो।
Hey Agni Dev born out of might! You have invoked in our endeavour. Hey beautiful Agni Dev! You are honest & truthful radiant, muscular; deploy the horses in the charoite and become the messenger-ambassador between the demigods-deities and the living beings.  
अत्या वृधस्नू रोहिता घृतस्नू ऋतस्य मन्ये मनसा जविष्ठा। 
अन्तरीयसे अरुषा युजानो युष्मांश्च देवान्विश आ च मर्तान्
हे अग्नि देव! आप सत्य भूत हैं। मैं आपके रोहित वर्ण वाले अश्वद्वय की प्रार्थना करता हूँ। वे अश्व मन की अपेक्षा भी अधिक वेगवान हैं, वे अन्न और जल का क्षरण करते हैं। आप दीप्तिमान अश्वद्वय को रथ में नियोजित करके देवों और मनुष्यों के बीच में प्रवेश करें।[ऋग्वेद 4.2.3]
रोहित :: लाल रंग का, रक्त वर्ण, लोहित, रोहु मछली, एक प्रकार का मृग, रोहितक नाम का पेड़, इंद्रधनुष, कुसुम का फूल, बरे का फूल, केसर, रक्त, लहु, खून, वाल्मीकि रामायण के अनुसार गंधर्बों की एक जाति, लोमड़ी, लाल रंग का घोड़ा, राजा हरिश्चंद्र के पुत्र का नाम, अयोध्या के राजा।
हे अग्नि देव! तुम सत्य के रूप हो। मैं तुम्हारे दोनों लाल रंग वाले अश्वों की प्रार्थना करता हूँ। तुम्हारे अश्व हृदय से भी अधिक गति वाले हैं। वे अन्न और जल की वृष्टि करते हैं। तुम उन तेजस्वी अश्वों को अर्पण रथ में जोड़कर देवों और मनुष्यों के मध्य में पधारो।
Hey truthful Agni Dev! I pray-worship your red coloured two horses. They are faster than the speed of mind. They grant food grains and rains. Join the humans & the demigods-deities riding your charoite deploying the red horses.
अर्यमणं वरुणं मित्रमेषामिन्द्राविष्णू मरुतो अश्विनोत।
स्वश्वो अग्ने सुरथः सुराधा एदु वह सुहविषे जनाय
हे अग्नि देव! आपका अश्व उत्तम है, रथ उत्तम है और धन भी उत्तम है। इन मनुष्यों के बीच में शोभन हवि वाले याजक गण के लिए अर्यमा, वरुण, मित्र, इन्द्र, विष्णु, मरुद्गण और अश्विनी कुमारों को इस यज्ञ स्थल पर ले आयें।[ऋग्वेद 4.2.4]
हे अग्ने! तुम्हारे अश्व, रथ एवं कीर्ति सभी में उत्तम हैं। अर्यमा, वरुण, मित्र, इन्द्र, विष्णु, मरुद्गण तथा दोनों अश्विनी कुमारों को हवि से युक्त यजमानों के लिए इन प्राणियों के बीच बुलाओ।
Hey Agni Dev! Your horses, charoite & the wealth are excellent-superb. Accompany-bring Aryma, Varun, Mitr, Indr, Vishnu, Marud Gan and Ashwani Kumars to the Yagy site for the sake of the humans, using-making best offerings.
गोमाँ अग्नेऽविमाँ अश्वी यज्ञो नृवत्सखा सदमिदप्रमृष्यः।
इळावाँ एषो असुर प्रजावान्दीर्घो रयिः पृथुबुध्नः सभावान्
हे बलवान् अग्नि देव! हमारा यह यज्ञ गौ विशिष्ट, मेष-भेड़ विशिष्ट और अश्व विशिष्ट है। जो यज्ञ अध्वर्यु और याजक गण विशिष्ट है, वह यज्ञ सर्वदा अप्रधृष्य, हविरन्न से युक्त तथा पुत्र-पौत्रवान हो एवं अविच्छिन्न अनुष्ठान से संयुक्त, धन सम्पन्न, बहुत धनों का हेतुभूत और उपदेष्टाओं से युक्त हो।[ऋग्वेद 4.2.5]
अप्रधृष्य :: अजेय, जिसे दबाया या हटाय़ा न जा सके; unassailable, unconquerable, invincible.
उपदेष्टा :: उपदेशक, preceptorial.
हे शक्ति शाली अग्नि देव! हमारा अनुष्ठान ऋषभ, धेनु और घोड़े लाभ करने वाले हों। जो अध्वर्युओं और यजमानों द्वारा किया जाता है। वह अनुष्ठान हव्य से सम्पन्न तथा संतानों से परिपूर्ण हो और अनुष्ठान धन तथा समृद्धियों का कारण भूत और उपदेश से पूर्ण हो।
Hey mighty Agni Dev! Let our Yagy performed-conducted by the Ritviz and the priests help us in securing cows, sheep and the horses. It should be invincible, include offerings of food grains, various kinds of wealth, associated by the sons & grand sons and  preceptorial.
यस्त इध्मं जभरत्सिष्विदानो मूर्धानं वा ततपते त्वाया।
भुवस्तस्य स्वतवाँ: पायुरग्ने विश्वस्मात्सीमघायत उरुष्य
हे अग्नि देव! जो मनुष्य आपके लिए स्वेद (पसीने से) युक्त होकर लकड़ियों को ढोता है, जो आपको प्राप्त करने की कामना से अपने मस्तक को लकड़ी के भार से उत्तप्त करता है, उसे आप धनवान बनाते हुए उसका पालन करते हैं। जो कोई उनके अनिष्ट-कामना करता है, उससे आप उनकी रक्षा करें।[ऋग्वेद 4.2.6]
हे अग्नि देव! तुम्हारे लिए लकड़ियों को ढोने वाला जो प्राणी पसीने से युक्त होता है, जो तुम्हारी अभिलाषा से अपने माथे को काष्ठ के बोझ से भारी करता है तुम उसका पालन करते हुए उसे धन से युक्त करते हो। तुम उसके अहित-चिंतकों से भी उसके रक्षक हों।
Hey Agni Dev! A person who carry a load of wood over his head, sweating, desirous of invoking you is enriched, nourished-nurtured & protected by you from those who wish to harm him.
यस्ते भरादन्नियते चिदन्नं निशिषन्मन्द्रमतिथिमुदीरत्।
आ देवयुरिनधते दुरोणे तस्मिन्रयिध्रुवो अस्तु दास्वान्
हे अग्नि देव! अन्न की इच्छा करने पर जो कोई आपको देने के लिए हविष्यान्न धारित करता है, जो आपको हर्ष कर सोमरस प्रदान करते हैं, जो अतिथि रूप से आपका उत्तर वेदि पर प्रणयन करता है और जो व्यक्ति देवत्व की इच्छा करके आपको घर में प्रदीप्त करता है, उसका पुत्र धर्म पथ में निश्चल और औदार्य विशिष्ट हो।[ऋग्वेद 4.2.7]
औदार्य :: उदारता; frankness, liberalism.
हे अग्ने! अन्न की इच्छा से जो तुम्हें उत्तर वेदी पर अतिथि रूप से विद्यमान करता है तथा जो मनुष्य देवत्व की इच्छा से अपने गृह में तुम्हें विद्यमान करता है, उसका पुत्र धर्ममार्गी, स्थिर और उदार हो।
Hey Agni Dev! A devotee desirous of food grains, who establish you over the east of the Uttar Vedi (Yagy site) like-as a guest, provides you Somras for your pleasure-happiness, lit you inside his house for the grant of demigodhood-deity hood, his son always abide by the Dharm-perform his duties religiously firmly, accompanied by frankness, liberalism.
यस्त्वा दोषा य उषसि प्रशंसात्प्रियं वा त्वा कृणवते हविष्मान्।
अश्वो न स्वे दम आ हेम्यावान्तमंहसः पीपरो दाश्वांसम्॥
हे अग्नि देव! जो मनुष्य रात्रि काल में और जो व्यक्ति उषा काल में आपकी प्रार्थना करता है एवं जो याजक गण प्रिय हव्य से युक्त होकर आपको प्रसन्न करता है, आप अपने घर में सुवर्ण निर्मित सज्जा (काठी) विशिष्ट अश्व के तुल्य विचरण करते हुए उस याजक गण की दरिद्रता से रक्षा करें।[ऋग्वेद 4.2.8]
हे अग्ने! जो प्राणी रात्रि के समय या उषा बेला में तुम्हारी वंदना करता है, तुम उस यजमान की, सुवर्ण से बनी झूल वाले अश्व के समान चलते हुए आकर रक्षक हो।
Hey Agni Dev! A devotee who pray to you both in the morning & evening making offerings, pleases you is granted a horse having golden rug over its body & is protected by you. 
यस्तुभ्यमग्ने अमृताय दाशद्दुवस्त्वे कृणवते यतस्रुक्।
न स राया शशमानो वि योषन्नैनमंहः परि वरदघायोः॥
हे अग्नि देव! आप अमर हैं। जो याजक गण आपके लिए हव्य प्रदान करता है, जो आपके लिए स्रुक को संयत करता है, जो आपकी परिचर्या करता है, वह प्रार्थना करने वाला याजक गण धन शून्य न हो तथा हिंसक प्राणी उन्हें कष्ट न दे सकें।[ऋग्वेद 4.2.9]
हे अग्ने! तुम्हारा कभी पतन नहीं होता। जो यजमान तुमको हवि प्रदान करता है, जो यजमान तुम्हारे लिए स्नुक को सही करता है तथा जो यजमान तुम्हारी अर्चना सेवा करता है, वह प्रार्थना करने वाला यजमान कभी भी निर्धन न हो।हिंसकों की हिंसा उसे कभी भी स्पर्श न करे।
Hey immortal Agni Dev! A devotee who make offerings to you holding the Struck firmly, pray-worship you should not become poor and the beasts should never trouble-harm him.
यस्य त्वमग्ने अध्वरं जुजोषो देवो मर्तस्य सुधितं रराणः।
प्रीतेदसद्धोत्रा सा यविष्ठासाम यस्य विधतो वृधासः
हे अग्नि देव! आप आनन्द युक्त दीप्तिमान हैं। आप जिस मनुष्य का सुसम्पादित और हिंसा रहित अन्न भक्षण करते हैं, हे युवतम! वह होता निश्चय ही हर्षित होता है। अग्नि देव के परिचर्याकारी जो याजक गण यज्ञ के वर्द्धयिता हैं, हम उन्हीं के होंगे।[ऋग्वेद 4.2.10]
हे सद्य युवा अग्ने! तुम प्रसन्न रहते हो तथा प्रकाशवान हो। जिस यजमान का भली प्रकार संपादित तथा हिंसा शून्य भावना से दिया हुआ अन्न सेवन करते हो, यह होता निश्चय ही प्यार करने वाला है। अग्नि की सेवा करने वाले जो यजमान यज्ञ को बढ़ाते हैं हम उन्हीं का अनुसरण करेंगे।
सद्य :: आज ही, इसी समय, अभी, तुरंत, शीघ्र, झट, तत्काल, कुछ ही समय पूर्व, भगवान् शिव का एक नाम, सद्योजात; current.
Hey Agni Dev! You are happy and radiant. The Ritviz-devotee who's food grains-offerings are accepted by you, become happy-blissful. Hey youthful! We will accompany-associate ourselves with those Ritviz who prolong-continue with the Yagy-rituals.
चित्तिमचित्तिं चिनवद्वि विद्वान्पृष्ठेव वीता वृजिना च मर्तान्।
राये च नः स्वपत्याय देव दितिं च रास्वादितिमुरुष्य
अश्व पालक जिस प्रकार से अश्वों के कान्त एवं दुर्वह पृष्ठों को पृथक कर सकते हैं, उसी प्रकार विद्वान अग्नि देव पाप और पुण्य को पृथक करें। हे अग्नि देव! हम लोगों को सुन्दर पुत्र से युक्त धन दें। आप दाता को धन दें और अदाता के समीप से उसकी रक्षा करें।[ऋग्वेद 4.2.11]
जैसे घोड़े की पोषण करने वाला उसकी पीठ के कसे हुए साज को पृथक कर देता है, वैसे ही अग्नि देव पाप-पुण्य को पृथक करें। हे अग्ने ! हमको पुत्र से परिपूर्ण धन प्रदान करो। तुम दान देने वाले को धन प्रदान करो और उसका नजदीक से पोषण करो। 
The way the caretaker of the horse removes the rug from its back, let enlightened Agni Dev separate his sins and virtues. Hey Agni Dev! Bless us with obedient-virtuous sons and wealth. Grant wealth-riches to the donor and protect him.
कविं शशासुः कवयोऽदब्धा निधारयन्तो दुर्यास्वायोः।
अतस्त्वं दृश्याँ अग्न एतान्पड्भिः पश्येरद्भुताँ अर्य एवैः
हे अग्नि देव! मनुष्यों के घरों में निवास करने वाले अतिरस्कृत देवों ने आपको मेधावी होता होने के लिए कहा है। हे अग्नि देव! आप मेधावी हैं, यज्ञ स्वामी हैं; इसलिए आप अपने चञ्चल तेज से दर्शनीय और अद्भुत देवों को देखें।[ऋग्वेद 4.2.12]
चंचल :: जो बराबर गतिशील हो, हिलने-डुलनेवाला, अस्थिर; playful, fickle.
हे अग्ने! प्राणियों के गृहों में वास करने वाले तथा कभी भी निरादृत न होने वाले देवगणों से तुमने अत्यधिक ज्ञानी को होता नियुक्त किया है। हे अग्निदेव! तुम यज्ञ के पालनकर्त्ता हो तथा मेधावी हो। तुम अपने चंचल तेज के माध्यम से देवगणों को दर्शनीय बनाओ।
Hey Agni Dev! The revered-honoured demigods-deities have requested you to accept the priesthood of the humans being enlightened in who's house you are present-worshiped. Hey Agni Dev! You are the master-deity of the Yagy. Perceive the amazing demigods-deities with your aurous-radiant playful eyes.
त्वमग्ने वाघते सुप्रणीतिः सुतसोमाय विधते यविष्ठ।
रत्नं भर शशमानाय घृष्वे पृथु श्चन्द्रमवसे चर्षणिप्राः
हे दीप्तिमान युवतम अग्नि देव! आप मनुष्यों की अभिलाषा के पूरक एवं उत्तर वेदि पर प्रणयन के योग्य हैं। जो याजक गण आपके लिए सोमाभिषव करता है, आपकी परिचर्या करता है और आपकी प्रार्थना करता है, उसकी रक्षा के लिए आप उसे प्रभूत, आह्लादकर तथा उत्तम धन प्रदान करें।[ऋग्वेद 4.2.13]
हे सद्ययुवा अग्नि देव! तुम अत्यन्त तेजस्वी हो। तुम मनुष्यों की कामनाओं को पूर्ण करते हो। तुम उत्तर वेदी पर विद्यमान किये जाने के पात्र हो। जो यजमान तुम्हारे लिए सोम का अभिषव करता है, तुम्हारी सेवा करता हुआ श्लोक उच्चारण करता है, उसी की सुरक्षा के लिए उसे हर्षिता, महान, धन प्रदान करो।
Hey young radiant Agni Dev! You fulfil-accomplish the desires of devotees-worshipers and deserve to be present over the Uttar Vedi of Yagy site. The devotee who recite prayers in your honour, while extracting Somras for you, is granted best comforts, wealth  and protection.
अधा ह यद्वयमग्ने त्वाया पड्भिर्हस्तेभिश्चकृमा तनूभिः।
रथं न क्रन्तो अपसा भुरिजोर्ऋतं येमुः सुध्य आशुषाणाः
हे अग्नि देव! जिस लिए हम लोग आपकी कामना से हाथ, पैर और शरीर द्वारा कार्य करते हैं, जिस प्रकार से शिल्पिकार रथ निर्माण करते हैं। उसी प्रकार यज्ञरत और शोभनकर्मा अङ्गिरा आदि ने बाहु द्वारा काष्ठ मन्थन करके आप सत्यभूत को उत्पन्न अर्थात् पैदा किया।[ऋग्वेद 4.2.14]
हे अग्नि देव! जिस कारण से हम तुम्हारी कामना करते हुए हाथ-पाँव तथा शरीर को कार्यरत करते हैं, उसी कारण उसमें कर्म वाले, यज्ञ कार्य में लगे हुए अंगिरा आदि ऋषियों ने अपने हस्त से अरणी मंथन के माध्यम से शिल्पों को पथ निर्माण करने के समान तुमने सत्य के कारण रूप प्रकट किया।
Hey Agni Dev! We wish to have-acquire you by using our hands, legs and the body, just like the artisan-wood smith, carpenter construct the charoite. Similarly, Angira and other Rishis-sages rub the wood with their hands and evolve truthful fire-Agni.
अधा मातुरुषसः सप्त विप्रा जायेमहि प्रथमा वेधसो नॄन्।
दिवस्पुत्रा अङ्गिरसो भवेमाद्रिं रुजेम धनिनं शुचन्तः
हम सात व्यक्ति (वामदेव और छः अङ्गिरा) प्रथम मेधावी हैं। हम लोगों ने माता उषा के समीप से अग्नि के परिचालकों या रश्मियों को पैदा किया। हम द्योतमान आदित्य के पुत्र अङ्गिरा हैं। हम दीप्तिमान सूर्य होकर उदक विशिष्ट पर्वत या बादलों का भेदन करेंगे।[ऋग्वेद 4.2.15]
हम सात विप्र आरिम्भक मेधावी हैं। हमको माता रूप उषा के आरम्भिक समय में अग्नि ने रचित किया है। हम ज्योर्तिवान आदित्य के पुत्र अंगिरा हैं। हम तेजस्वी होकर जल से पूर्ण बादल को विदीर्ण करेंगे।
We 7 people, Vamdev and 6 Angira are the first intelligent people. We generated the rays-flames in fire with the day break-Usha. We are the sons of radiant-aurous Angira. We will become radiant Sun-Adity & shine tearing off rains from the clouds.
अधा यथा नः पितरः परासः प्रत्नासो अग्न ऋतमाशुषाणाः।
शुचीदयन्दीधितु मुक्थशासः क्षामा भिन्दन्तो अरुणीरप व्रन्
हे अग्नि देव! हम लोगों के श्रेष्ठ, पुरातन और सत्य भूत यज्ञ में रत पितृ पुरुषों ने दीप्त स्थान तथा तेज प्राप्त किया। उन्होंने स्तोत्रों का उच्चारण करके अन्धकार का नाश किया तथा पणियों द्वारा अपहृत अरुण वर्णा गौओं को या उषा को प्रकाशित किया।[ऋग्वेद 4.2.16]
हे अग्नि देव! हमारे पूर्वजों ने उत्तम, परम्परागत और सत्य के कारण यज्ञ-कर्मों को करके श्रेष्ठ पद और तेज को प्राप्त किया। उन्होंने उक्थों के माध्यम से अंधेरे का विनाश किया और पणियों द्वारा अपहृत गायों को ढूँढा।
Hey Agni Dev! Our great, ancient and truthful ancestors attained the brilliant positions. They recited the Strotr, removed darkness & released the cows abducted by the Pani-demons.
सुकर्माणः सुरुचो देवयन्तोऽयो न देवा जनिमा धमन्तः।
शुचन्तो अग्निं ववृधन्त इन्द्रमूर्वं गव्यं परिषदन्तो अग्मन्
सुन्दर यज्ञादि कार्य में रत दीप्ति युक्त तथा देवाभिलाषी स्तोता धौंकनी द्वारा निर्मल लोहे के मनुष्य जन्म को यागादि कार्य द्वारा निर्मल करते हैं। वे अग्नि देव को दीप्त तथा इन्द्र देव को प्रवृद्ध करते हैं। चारों ओर उपवेशन करके उन्होंने महान गौ समूह को प्राप्त किया।[ऋग्वेद 4.2.17]
धोंकनी के द्वारा पवित्र हुए लोहे के तुल्य, अनुष्ठान आदि महान कर्मों में लगे, देवों के द्वारा पवित्र करते हैं। वे अग्नि को ज्योर्तिवान करते हुए इन्द्र देव की वृद्धि करते हैं। उन्होंने चारों तरफ आराधना करते हुए वृहद गौ संगठन को पराजित किया था।
The aurous recitators busy with the rituals and the Yagy, purify-cleanse their actions-acts just like the red hot iron is purified by the blower. They ignite the fire and worship-pray to strengthen Indr Dev. They prayed all around and attained a large cattle herd.
आ यूथेव क्षुमति पश्वो अख्यद्देवानां यज्जनिमान्त्युग्र।
मर्तानां चिदुर्वशीरकृप्रन्वृधे चिदर्य उपरस्यायोः
हे अग्नि देव! अन्न विशिष्ट घर में पशु समूह रहता है, उसी प्रकार अङ्गिरा आदि देवों के गौ समूह के निकट हैं। उनके द्वारा लाई गई गौओं से प्रजा सामर्थवान हुई। आर्य अपत्य वर्द्धन समर्थवान और मनुष्य पोषण समर्थ हुए।[ऋग्वेद 4.2.18]
हे अग्नि देव! तुम तेजवान हो। अन्न से युक्त गृह में पशुओं के निवास करने के समान देवगणों की गायों का सामीप्य अंगिरादि को प्राप्त है। उनके द्वारा लाई गई गायों ने प्रजाओं को पुष्ट किया। वर्द्धन सामर्थ्य से युक्त प्राणी संतानवान एवं पोषण सामर्थ्य से युक्त हो।
Hey brilliant Agni Dev! The way food grains are available in the house having cattle, Angira and demigods-deities are near the cow herd. The populace gained strength by virtue of the cows brought by them. The Ary had progeny turned strong and duly nourished-nurtured.
अकर्म ते स्वपसो अभूम ऋतमवस्त्रन्नुषसो विभातीः।
अनूनमग्निं पुरुधा सुश्चन्द्रं देवस्य मर्मृजतश्चारु चक्षुः
हे अग्नि देव! हम आपकी उपासना करते हैं, जिससे हम शोभन कर्म वाले होते हैं। तम निवारिका उषा सकल तेज धारित करती है। वह पूर्ण रूप से आह्लादकर अग्नि देव को बहुधा धारित करती है। आप द्योतमान है। हम आपके मनोहर तेज की परिचर्या करते हैं।[ऋग्वेद 4.2.19]
हे अग्नि देव! हम तुम्हारी अर्चना करते हैं, उसी से हम महान कर्म वाले बनते हैं। अंधकार का पतन करने वाली उषा समस्त तेजों से परिपूर्ण हुई प्रदान करने वाली अग्नि को धारण करने वाली है। तुम ज्योति से परिपूर्ण हो। हम तुम्हारे रमणीय तेज की आराधना करते हैं।
Hey Agni Dev! We worship you and perform virtuous, righteous, auspicious deeds. You support bright Usha-day break. Usha generally-normally possess pleasant Agni Dev.  You are radiant and we appreciate your delightful energy. 
एता ते अग्न उचथानि वेधोऽवोचाम कवये ता जुषस्व।
उच्छोचस्व कृणुहि वस्यसो नो महो रायः पुरुवार प्र यन्धि
हे विधाता अग्नि देव! आप मेधावी हैं। हम आपके उद्देश्य से इस सम्पूर्ण स्तोत्रों का उच्चारण करते हैं, आप इसका सेवन करें। आप उद्दीप्त होकर हमें विशेष रूप से धनवान् करें। आप बहुतों द्वारा वरणीय हैं। आप हम लोगों को महान् धन प्रदान करें।[ऋग्वेद 4.2.20]
हे अग्नि देव! तुम मेधावी हो। हम तुम्हारे लिए श्लोकों का उच्चारण करते हैं, तुम इनको स्वीकार करो। तुम प्रदीप्त होकर वृद्धि करो। तुम अनेक द्वारा प्रदान करो।
Hey Agni Dev! You are brilliant-intelligent. Accept the prayers-Strotr we recite in your honour. You glow and make us rich. Grant us lots of wealth. You are revered-honoured by many.
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (3) :: ऋषि :- वामदेव गौतम, देवता :- अग्नि,  रुद्र, छन्द :- त्रिष्टुप
आ वो राजानमध्वरस्य रुद्रं होतारं सत्ययजं रोदस्योः।
अग्निं पुरा तनयित्नोरचित्ताद्धिरण्यरूपमवसे कृणुध्वम्
हे याजक गणों! चंचल विद्युत की तरह आने वाली मृत्यु के पहले ही अपनी रक्षा के लिए यज्ञ के स्वामी, देवों के आवाहक, रुद्र रूप, द्यावा-पृथ्वी के बीच वास्तविक यजन प्रक्रिया चलाने वाले, स्वर्णिम आभा युक्त अग्नि देव का पूजन करें।[ऋग्वेद 4.3.1]
हे मनुष्यों! देवों के आह्वान करने वाले, अनुष्ठान के स्वामी अम्बर धरा को अन्न से पूर्ण करने वाले, स्वर्ण के समान शोभा वाले तथा शत्रुओं को रुलाने में समर्थ क्रोधित रूप वाले अग्नि देव की, मृत्यु के पहले ही सुरक्षा ग्रहण करने के लिए उपासना करो। 
Hey humans-worshipers! Let us pray-worship Agni Dev-the deity of Yagy, possessing golden hue, a form of Rudr, present between the heaven & earth, who invite the demigods-deities in the Yagy, prior to the arrival of death as quickly as lightening, 
अयं योनिश्चकृमा यं वयं ते जायेव पत्य उशती सुवासाः।
अर्वाचीनः परिवीतो नि षीदेमा उ ते स्वपाक प्रतीचीः
हे अग्नि देव! पति कामिनी एवं सुवस्त्राच्छादिता स्त्री जिस प्रकार पति के लिए स्थान प्रस्तुत करती है, उसी प्रकार हम लोग भी उत्तर वेदि रूप प्रदेश प्रदान करते हैं, यही आपका स्थान है। हे सुकर्मा अग्नि देव! आप तेज द्वारा परिवृत होकर हम लोगों के अभिमुख उपवेशन करें। यह सकल प्रार्थना आपके अभिमुख उपवेशन करे।[ऋग्वेद 4.3.2]
हे अग्ने! पति की अभिलाषा वाली एवं सुन्दर कपड़ों से सुसज्जित नारी जिस प्रकार पति के लिए स्थान देती है, वैसी ही हम उत्तर वेदी रूप स्थान तुम्हारे लिए प्रदान करते हैं। तुम्हारा यही स्थान है। हे अग्निदेव! तुम उत्तम कर्मों को करने वाले हो, तुम अपने तेज से सुसज्जित हुए हमारे सम्मुख पधारो। यह वंदना तुम्हारी पूजा में पहुंचे। 
Hey Agni Dev! Let us provide the place over the Uttar Vedi, the way a woman desirous of husband decorate herself in beautiful cloths. Please stay with us possessing radiance. We are reciting this prayer for you. 
आशृण्वते अदृपिताय मन्म नृचक्षसे सुमृळीकाय वेधः।
देवाय शस्तिममृताय शंस ग्रावेव सोता मधुषुद्यमीळे
हे स्तोता! स्तोत्र श्रवण परायण, अप्रमत्त, मनुष्यों के द्रष्टा, सुखकर और अमर अग्नि देव के उद्देश्य से स्तोत्र और शस्त्र का पाठ करें। प्रस्तर के तुल्य सोमाभिषवकारी याजक गण अग्नि की प्रार्थना करते हैं।[ऋग्वेद 4.3.3]
हे वंदनाकारी! तुम श्लोकों को सुनने वाले, निरालस्य, द्रष्टा एवं अविनाशी की इच्छा से वंदनाओं को उच्चारण करो। पाषाण, जैसे सोम का अभिषव करने में समर्थवान हैं, उसी प्रकार यजमान अग्निदेव के लिए प्रार्थना करने में तल्लीन रहते हैं।
Hey Stota-devotee! Recite Strotr for immortal, blissful Agni Dev, without laziness. The way stone is capable of extracting Somras, the devotees-Ritviz keep performing his prayers.
त्वं चिन्नः शम्या अग्ने अस्या ऋतस्य बोध्यृतचित्स्वाधीः।
कदा त उक्था सधमाद्यानि कदा भवन्ति सख्या गृहे ते
हे अग्नि देव! हम लोगों के इस कर्म के आप देवता होवें। हे सत्यज्ञ अग्नि देव! आप सुकर्मा हैं। आपको हमारी प्रार्थना ज्ञात है। उन्मादकारक आपके स्तोत्र कब उच्चारित होंगे? हमारे घर में आपके साथ कब मित्र भाव होगा?[ऋग्वेद 4.3.4]
हे अग्नि देव! हमारे इस यज्ञ अनुष्ठान में तुम देवता बनो। तुम सत्य को जानने वाले तथा महान कर्मों को करते हो। तुम हमारे श्लोकों को जानों। तुम आह्लाद उत्पन्न करने वाले हो। तुम हमारे स्तोत्र को समझो। आह्लाद उत्पन्न करने वाले तुम्हारे स्तोत्र कब कहे जायेंगे? तुम हमारे घर में कब मैत्री भाव से व्याप्त होगे?
Hey Agni Dev! You should be deity-patron in our Yagy. Hey truthful Agni Dev! You perform-conduct virtuous, righteous, pious deeds. You are aware of our request. When will our pleasant-pleasure generating Strotr be recited-responded?! When will you be present in our homes as a friend?!
कथा ह तद्वरुणाय त्वमग्ने कथा दिवे गर्हसे कन्नः आगः।
कथा मित्राय मीळ्हुषे पृथिव्यै ब्रवः कदर्यम्णे कद्भगाय
हे अग्नि देव! वरुण के निकट आप हम लोगों की पापजन्य निन्दा क्यों करते हैं? अथवा सूर्य के निकट क्यों निन्दा करते हैं? हम लोगों का क्या अपराध है? अभिमत फलदाता मित्र और पृथ्वी को आपने क्यों कहा? अथवा अर्यमा और भग नामक देवों से ही आपने क्यों कहा?[ऋग्वेद 4.3.5]
हे अग्नि देव! हमारे पापों की बात वरुण देव के सामने क्यों करते हो? हमारी निन्दा सूर्य से क्यों करते हो? हमसे तुम्हारे प्रति कौन सा अपराध हुआ है? अभीष्ट फल प्रदान करने वाले सखा, धरा, अर्यमा और भग से तुमने क्या बात कही है?
Hey Agni Dev! Why did you reproach us for our sins to Varun Dev, the Sun? What is our offence? Why repeat it to the bountiful Mitr, to earth, to Aryaman or to Bhag?
Hey Agni Dev! Why do you describe our sins to Varun Dev, Sury Bhagwan, Mitr, Prathvi, Aryma, Bhag!?  What's our fault? 
कद्धिष्ण्यासु वृधसानो अग्ने कद्वाताय प्रतवसे शुभंये।
परिज्मने नासत्याय क्षे ब्रवः कदग्ने रुद्राय नृघ्ने
हे अग्नि देव! जब आप यज्ञ में वर्द्धमान होते हैं, तब उस कथा को क्यों कहते हैं? प्रकृष्ट बल युक्त, शुभ प्रद, सर्वत्र गामी, सत्य के नेता वायु से आप वह कथा क्यों कहते हैं? पृथ्वी से क्यों कहते हैं? हे अग्नि देव! पापी मनुष्यों को मारने वाले रुद्र देव से वह कथा क्यों कहते हैं?[ऋग्वेद 4.3.6]
हे अग्नि देव! तुम जब यज्ञ में वृद्धि करते हो तब उस बात को क्यों करते हो? श्रेष्ठ बलवान लाभकारी सर्वत्र वेगवान, सत्य में अग्रणी आयु से भी यह बात क्यों करते उसी प्रकार यजमान अग्निदेव के लिए प्रार्थना करने में तल्लीन रहते हैं।
Hey Agni Dev! Why do you describe-discuss the story-tale of our sins while you are busy with the Yagy? Hey mighty, auspicious, dynamic, truthful! Why do you narrate our sins to Prathvi, Rudr?
कथा महे पुष्टिंभराय पूष्णे कद्रुद्राय सुमखाय हविर्दे।
कद्विष्णव उरुगायाय रेतो ब्रवः कदग्ने शरवे बृहत्यै
हे अग्नि देव! महान् एवं पुष्टि प्रद पूषा से आप वह पाप कथा क्यों कहते हैं? यज्ञ भाजन, हवि प्रद रुद्र से वह क्यों कहते हैं? बहुस्तुति भाजन श्री विष्णु से पाप की कथा क्यों कहते हैं? बृहत् संवत्सर अथवा निर्ऋति से वह कथा क्यों कहते हैं?[ऋग्वेद 4.3.7]
उन महान एवं पालक पूषा यज्ञ के पात्र एवं हवि युक्त रुद्र से अनेक प्रार्थनाओं के पात्र विष्णु से श्रेष्ठ संवत्सर के समक्ष यह बात क्यों कहते हो? 
Hey Agni Dev! Do not spell the tale of our sins to great and nourishing Pusha, the acceptor and offerings of Yagy Rudr, multiple Strotr-prayers deserving Bhagwan Shri Hari Vishnu, either the solar year-Samvatsar or Nirshrati?
कथा शर्धाय मरुतामृताय कथा सूरे बृहते पृच्छ्यमानः।
प्रति ब्रवोऽदितये तुराय साधा दिवो जातवेदश्चिकित्वान्
हे अग्नि देव! सत्य भूत मरुद्गण से आप वह कथा क्यों कहते हैं? पूछे जाने पर महान सूर्य से वह कथा क्यों कहते हैं? देवी अदिति से और त्वरितगमन वायु से क्यों कहते हैं? हे सर्वज्ञ जात वेदा (अग्निः, वह्निः, हुतासनः, अनलः, वैश्वानरः, पुरोहितः, अंगिरा)! आप द्युलोक के कार्य का साधन करें।[ऋग्वेद 4.3.8]
जातवेदा :: अग्निः, वह्निः, हुतासनः, अनलः, वैश्वानरः, पुरोहितः, अंगिरा, अग्नि, चित्रक वृक्ष, चीते का पेड़, अंतर्यामी, परमेश्वर, सूर्य; fire, Chitrak tree, God, omniscient.
हे अग्नि देव! सत्य के कारण रूप मरुद्गण से ये बात क्यों बताते हो? पूछे जाने पर भी सूर्य से, अदिति से तथा द्रुतगामी पवन से क्यों कहते हो? हे सभी को जानने वाले मेधावी अग्नि देव! तुम श्रेष्ठ कार्यों को सिद्ध करो।
Hey truthful Agni Dev! Why you discuss  our sins with Marud Gan, the great Sun, Devi Aditi, dynamic Vayu-Pawan Dev. Hey all knowing Agni! Perform the duties of the heavens-space, sky.
ऋतेन ऋतं नियतमीळ आ गोरामा सचा मधुमत्पकमग्ने।
कृष्णा सती रुशता धासिनैषा जामर्येण पयसा पीपाय
हे अग्नि देव ! हम सत्य भूत यज्ञ के संग नित्य सम्बद्ध दुग्ध की याचना गौओं के निकट करते हैं। अपक्व होकर भी वह गौ मधुर और पक्व दुग्ध धारित करती है। वह कृष्ण वर्णा होकर भी शुभ्र, पुष्टि कारक और प्राण धारक दुग्ध द्वारा मनुष्यों का पालन करती है।[ऋग्वेद 4.3.9]
हे अग्नि देव! हम सत्य के कारण भूत यज्ञ से संबंधित दूध को गायों को धारण करती हैं। उनमें काली गाय भी पुष्टिदायक, प्राण दाता, सफेद दूध देकर, प्राणियों को पुष्ट करती है।
Hey Agni Dev! We request the cows to yield milk for the truthful Yagy. Though immature, yet she grant sweet, nourishing milk. Though black in colour she is nourishing, Pran-life supporting-sustaining for the humans.
ऋतेन हि ष्मा वृषभश्चिदक्तः पुमाँ अग्निः पयसा पृष्ठ्येन।
अस्पन्दमानो अचरद्वयोधा वृषा शुक्रं दुदुहे पृश्निरूधः
अभिमत फलवर्षक और श्रेष्ठ अग्नि देव सत्य भूत और पुष्टिकर दुग्ध द्वारा सिक्त होते हैं। अन्नद अग्नि देव एकत्र अवस्थिति करके सभी जगह तेज द्वारा विचरण करते हैं। जल वर्षक सूर्य अन्तरिक्ष या मेघ से जल का दोहन करते हैं।[ऋग्वेद 4.3.10]
इच्छित फल की वर्षा करने वाले महान अग्नि देव पोषक दूध द्वारा सींचे जाते हैं। अन्न दाता अग्निदेव अपने समस्त तेज को संगठित करके विचरण करते हैं। जल की वर्षा करने वाले आदित्य अंतरिक्ष का दोहन करते हैं।
Desires accomplishing excellent, truthful Agni Dev is nourished by the milk. Food grains granting radiant Agni Dev roam-every where. Sun-Adity leads to rains by condensing water in the space-sky.
ऋतेनाद्रिं व्यसन्भिदन्तः समङ्गिरसो नवन्त गोभिः।
शुनं नरः परि षदन्नुषासमाविः स्वरभवज्जाते अग्नौ
मेधातिथि आदि ने यज्ञ द्वारा गौ निरोधक पर्वत को विदीर्ण करके फेंक दिया और गौओं के साथ मिले। कर्मों के नेता उन अङ्गिरोगण ने सुख पूर्वक उषा को प्राप्त किया। तदनन्तर सूर्य देव मन्थन द्वारा अग्नि के उत्पन्न होने पर उदित हुए।[ऋग्वेद 4.3.11]
गायों को रोकने वाले पर्वत को मेधातिथि आदि ने फाड़ डाला तथा गायों को पाया। कर्मों में अग्रसर अंगिराओं ने उषा को सुख से प्राप्त किया। फिर अरणि मंथन से अग्नि के प्रकट होने पर सूर्य उदय हुआ।
मेधातिथि :: काण्ववंश में उत्पन्न एक ऋषि जो ऋग्वेद के प्रथम मंडल के 12-23 सूक्तों के द्रष्टा थे, शाकद्वीप के अधिपति जो प्रियव्रत के पुत्र कहे गये हैं, कर्दम प्रजापति के एक पुत्र।अरुन्धती मेधातिथि की पुत्री थी जो उन्हें यज्ञ से प्राप्त हुई थीं।
Medhatithi Rishi Gan etc. destroyed-powered the mountain which was blocking the cows, with the Yagy and joined the cows. Endeavours inspiring Angira Gan attained Usha-day break. Thereafter, wood was rubbed to ignite fire and then the Sun arose.
ऋतेन देवीरमृता अमृक्ता अर्णोभिरापो मधुमद्भिरग्ने।
वाजी न सर्गेषु प्रस्तुभानः प्र सदमित्स्रवितवे दधन्युः
हे अग्नि देव! मरण रहिता, विघ्न शून्या और मधुर जल युक्ता देवी नदियाँ यज्ञ द्वारा प्रेरित होकर जाने के लिए प्रोत्साहित अश्व के तुल्य सर्वदा प्रवाहित होती हैं।[ऋग्वेद 4.3.12]
हे अग्ने! अविनाशी, मधुर जल वाली नदियाँ यज्ञ द्वारा प्रेरणा प्राप्त कर चलने के लिए उगमिव अश्व के समस्त निर्विघ्न रूप से हमेशा बहती हैं।
Hey Agni Dev! The immortal, free from obstacles, possessing sweet water, inspires by the Yagy maintain their flow, like the encouraged horse.
मा कस्य यक्षं सदमिद्धुरो गा मा वेशस्य प्रमिनतो मापेः।
मा भ्रातुरग्ने अनृजोर्ऋणं वेर्मा सख्युर्दक्षं रिपोर्भुजेम
हे अग्नि देव! जो कोई हमारी हिंसा करता है, उसके यज्ञ में आप कभी न जाना। किसी दुष्ट बुद्धि वाले प्रतिवासी (पड़ोसी) के यज्ञ में न जाना। हमें छोड़कर दूसरे बन्धु के यज्ञ में न जाना। आप कुटिल चित्त भ्राता के ऋण (हवि) की कामना न करना। हम लोग भी मित्र या शत्रु द्वारा प्रदत्त धन का भोग नहीं करेंगे। केवल आपके ही द्वारा प्रदत्त धन का भोग करेंगे।[ऋग्वेद 4.3.13]
दुष्ट बुद्धि :: कुटिल मति; crooked, knavish, impious, cruel.
हे अग्नि देव! जो कोई भी हमारी हिंसा करे, उसे यज्ञ में तुम कभी नहीं पहुँचना, किसी क्रूर पड़ौसी के यज्ञ में तुम कभी मत पधारना। हमारे अतिरिक्त किसी अन्य को सखा न बनाना। तुम कुटिल मति वाले बन्धु की हवियों की अभिलाषा मत करना। हम भी शत्रु के दिये अन्न का सेवन नहीं करते। केवल तुम्हारे दिये धन को ही भोगें।
Hey Agni Dev! Do not lit in the Yagy of those who tease-trouble, torture, harm us physically. Never join the Yagy of our neighbour who is crooked, knavish, impious, cruel. Do not accept the offerings of the brothers who are crooked. We do not consume the food grains of the crooked. Let us consume-use the food grains-stuff granted by you.
रक्षा णो अग्ने तव रक्षणेभी रारक्षाणः सुमख प्रीणानः।
प्रति ष्फुर वि रुज वीड्वहो जहि रक्षो महि चिद्वावृधानम्
हे सुयज्ञ अग्नि देव! आप ही हम लोगों के रक्षक हैं। आप हव्य द्वारा प्रीत होकर आश्रय दान द्वारा हमारी रक्षा करें। आप हम लोगों को प्रदीप्त करें। हम लोगों के दृढ़ पाप का आप विध्वंस कर भयंकर राक्षसों का विनाश करें।[ऋग्वेद 4.3.14]
सुयज्ञ :: सुयज्ञ विष्णु के प्रसिद्ध चौबीस अवतारों में से एक अवतार का नाम है; an incarnation of Bhagwan Shri Hari Vishnu.
भयंकर :: उग्र, क्रूर, प्रखर, क्रुद्ध, चंड; terrifying, fierce, awful.
भयंकर, घोर, महिमामयहे अग्ने! तुम महान यज्ञ वाले हो तुम हमारे रक्षक हो। तुम हवि द्वारा हर्षोल्लासित होकर अपना आश्रय देते हुए हमारे रक्षक बनो। हमारे घोर पाप का नाश करते हुए इस बढ़े हुए अज्ञान को समाप्त कर डालो।
Hey Suyagy Agni Dev! You are the protector of the public-populace. Become our protector pleased by our offerings. Destroy our sin-felony and destroy the furious-terrifying demons.
एभिर्भव सुमना अग्ने अर्कैरिमान्त्स्पृश मन्मभिः शूर वाजान्।
उत ब्रह्माण्यङ्गिरो जुषस्व सं ते शस्तिर्देववाता जरेत
हे अग्नि देव! आप हमारे अर्चन योग्य स्तोत्रों द्वारा हर्षित मन वाले हों। हे शूर! हमारे इस स्तोत्र सहित अन्न को ग्रहण करें। हे हविरन्न के गृहीता अग्निदेव! मन्त्रों का सेवन करें। देवों के उद्देश्य से प्रयुक्त प्रार्थना आपको करे।[ऋग्वेद 4.3.15]
हे अग्नि देव! हमारी आराधना योग्य श्लोकों द्वारा तुम हम पर स्नेह बनाये रखो। हमारी प्रार्थनाओं से परिपूर्ण हवियों को स्वीकृत करो। तुम हवि रूप अन्न को प्राप्त करने वाले हो, हमारे श्लोकों को प्राप्त करो। देवों के लिए की जाने वाली वंदनाएँ तुम्हारी वृद्धि करें। 
Hey Agni Dev! You should be pleased, have pleasure by this Strotr of ours, recited by us. Hey brave! Accept this Strotr of ours, along with food grains. Hey granter of food grains for offerings Agni Dev! Accept our offerings for the sake of demigods-deities.
एता विश्वा विदुषे तुभ्यं वेधो नीथान्यग्ने निण्या वचांसि।
निवचना कवये काव्यान्यशंसिषं मतिभिर्विप्र उक्थैः
हे विधाता अग्नि देव! आप कर्म विषय को जानने वाले और उत्कृष्ट द्रष्टा हैं। हम विप्रगण आपके उद्देश्य से फल प्रापक, गूढ़, अतिशय वक्तव्य और हम कवियों द्वारा ग्रथित इस समस्त वाक्य का स्तोत्रों के साथ उच्चारण करते हैं।[ऋग्वेद 4.3.16]
हे अग्नि देव! तुम विधायक हो, तुम कार्यों के ज्ञाता एवं प्राणियों के स्रष्टा हो। हम मेधावी प्राणी तुम्हारी इच्छा से फलदायी, अत्यन्त गूढ़ उच्चारण के योग्य हमारे द्वारा रचित इस पूरे श्लोक का भली-भाँति उच्चारण करते हैं।
Hey destinate-the deity of fate Agni Dev! You know the intricate deeds and is an excellent visionary. We prudent-intelligent Brahmans recite the Strotr with the complete stanza, which has deep meaning with the desire of rewards.
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (4) :: ऋषि :- वामदेव गौतम, देवता :- रक्षोहाऽग्नि छन्द :- त्रिष्टुप
कृणुष्व पाजः प्रसितिं न पृथ्वीं याहि राजेवामवाँ इभेन।
तृष्वीमनु प्रसितिं द्रूणानोऽस्तासि विध्य रक्षसस्तपिष्ठैः
हे अग्नि देव! आप अपने तेज पुञ्ज को बढ़ावें, जिस प्रकार से व्याघ्र अपने जाल को विस्तारित करता है। जिस प्रकार अमात्य के साथ राजा हाथी के ऊपर बैठकर जाता है, उसी प्रकार आप भय शून्य तेज समूह के साथ गमन करें। आप शीघ्रगामिनी सेना का अनुगमन करके शत्रु सैन्य को हिंसित करें और शत्रुओं को नष्ट करें। अत्यन्त तीक्ष्ण तेज द्वारा आप राक्षसों का भेदन करें।[ऋग्वेद 4.4.1]
हे अग्नि देव! तुम अपनी तेज राशि को व्याघ्र द्वारा अपने जल को वृद्धि करने के तुल्य विशाल करो। मंत्री को साथ लेकर राजा के विचरण करने के समान तुम अपने भय विमुख तेज के साथ विचरण करो। तुम अपनी द्रुत गति वाली सेना के साथ शत्रु की सेना का पतन करो। शत्रुओं को समाप्त कर दो। तुमने अपने तेज से असुरों को विदीर्ण कर डाला।
Hey Agni Dev! Boost-enhance your radiance-aura, like the hunter who increase the width of his net. The manner in which the king rides the elephant with his minister without fear, you should also move with your brilliance-brightness uninteruptly-disturbance. Destroy-vanish the army of the enemy and the demons by your fast moving army. 
तव भ्रमास आशुया पतन्त्यनु स्पृश धृषता शोशुचानः।
तपूंष्यग्ने जुह्वा पतङ्गानसंदितो वि सृज विष्वगुल्काः
हे अग्नि देव! आपकी भ्रमण कारिणी और शीघ्र गामिनी रश्मियाँ सभी जगह प्रसृत होती हैं। आप अत्यन्त दीप्तिमान हैं। अभिभव समर्थ तेजोराशि द्वारा आप शत्रुओं को दग्ध करें। शत्रु आपको निरुद्ध नहीं कर सकते। इस हेतु टूटकर गिरने वाले तारे की गति से अपने तेज को प्रेरित करें।[ऋग्वेद 4.4.2]
हे अग्नि देव! तुम्हारी गतिमती, तीव्र गामिनी रश्मियाँ सभी जगह पहुँचती हैं। तुम अत्यन्त तेजस्वी हो। शत्रुओं को हराने में सक्षम तेज द्वारा शत्रुओं को नष्ट कर डालो। शत्रु तुमको बाधित नहीं कर सकते। तुम नभ से गिरने वाले तारों के समान गति से जीने वाले अपने तेज को प्रेरित करें।
Hey Agni Dev! Your fast moving rays reach every where. You are radiant. Burn the enemy with your fierce flames. The enemy can not block you. Spread your heat like the shooting-falling stars.
प्रति स्पशो वि सृज तूर्णितमो भवा पायुर्विशो अस्या अदब्धः।
यो नो दूरे अघशंसो यो अन्त्यग्ने माकिष्टे व्यथिरा दधर्षीत्
हे अग्नि देव! आप अतिशय वेगवान हैं। शत्रुओं को बाधा देने वाली रश्मियों को आप शत्रुओं के प्रति प्रेरित करें। कोई भी आपकी हिंसा नहीं कर सकता। जो कोई दूर से हम लोगों की अनिष्ट कामना करता है अथवा जो निकट से अनिष्ट करने की इच्छा करता है, आप उसके निकट से इस समस्त प्रजा की रक्षा करें। हम लोग आपके हैं। जिससे कोई शत्रु हम लोगों को पराजित न कर सके।[ऋग्वेद 4.4.3]
हे अग्नि देव तुम अत्यन्त तेज चाल वाले हो । शत्रुओं को रोकने वाले अपने बल को शत्रुओं के प्रति चलाओ। तुम्हें कोई हिंसित नहीं कर सकता। पास या दूर से हमारा अनिष्ट करने वालों से हमारी संतानों की सुरक्षा करो। हमें कोई भी शत्रु अपने वश में न कर सकें। हम तुम्हारे ही साधक होने से इस बात का ध्यान रखो।
Hey Agni Dev! Your speed is too fast. Spread your flames to block-stop the enemy. None can harm you. Protect the entire populace from the person who wish to harm us, from far or near, considering us your own. Do not let the enemy defeat-over power, control us. 
उदग्ने तिष्ठ प्रत्या तनुष्व न्य १ मित्राँ ओषतात्तिग्महेते।
यो नो अरातिं समिधान चक्रे नीचा तं धक्ष्यतसं न शुष्कम्
हे तीक्ष्ण ज्वाला विशिष्ट अग्नि देव! उठो, राक्षसों को मारने के लिए उद्यत हों। शत्रुओं के ऊपर ज्वालाजाल का विस्तार करें। तेजोराशि द्वारा शत्रुओं को भली-भाँति दग्ध करें। हे समिद्ध अग्नि देव! जो व्यक्ति हमारे साथ शत्रुता करता है, उस व्यक्ति को सूखी लकड़ी के तुल्य आप जला दें।[ऋग्वेद 4.4.4]
हे तीक्ष्ण ज्वाला वाले अग्नि देव! दुष्टों का सर्वविनाश करने हेतु तत्पर हो जाओ। शत्रुओं पर तुम अपनी ज्वालाओं का आवरण डालकर उन्हें नष्ट कर डालो। हे अग्नि देव! हमारे साथ शत्रुता का व्यवहार करने वाले दुष्ट को सूखे काष्ठ के समान भस्म कर डालो।
Hey Agni Dev with fierce flames! Rise-get up and be ready to kill the demons. Hey Samiddh Agni Dev! Spell your cast over the enemies & burn-roast them like dry wood.
ऊर्ध्वो भव प्रति विध्याध्यस्मदाविष्कृणुष्व दैव्यान्यग्ने।
अव स्थिरा तनुहि यातुजूनां जामिमजामिं प्र मृणीहि शत्रून्
हे अग्नि देव! आप राक्षसों को मारने के लिए उद्यत होवें। हमसे जितने अधिक बलवान हैं, उन सबको एक-एक करके मारें। अपने देव सम्बन्धी तेज को आविष्कृत करें। प्राणियों को क्लेश देने वालों के दृढ़ धनुष को ज्या शून्य करें और पूर्व में पराजित अथवा अपराजित शत्रुओं को विनष्ट करें।[ऋग्वेद 4.4.5]
हे अग्नि देव! तुम राक्षसों का पतन करने को तैयार हो जाओ। हमसे अधिक ताकतवर शत्रुओं को एक-एक करके समाप्त कर डालो। अपने अद्भुत तेज को प्रत्यक्ष करो। जीवों को संतापित करने वाले दुष्टों को मारकर हमसे अलग करो। पूर्व पराजित हुए या अपराजित शत्रुओं का पतन कर डालो।
Hey Agni Dev! You should be inclined to kill the demons. Kill those who are stronger than us, one by one. Invoke your divine radiance. Kill enemies who teased-troubled the living beings whether defeated or undefeated in the past with your bow.
स ते जानाति सुमतिं यविष्ठ य ईवते ब्रह्मणे गातुमैरत्।
विश्वान्यस्मै सुदिनानि रायो द्युम्नान्यर्यो वि दुरो अभि द्यौत्
हे युवतम अग्नि देव! आप गमनशील और मुख्य हैं। जो कोई आपके लिए प्रार्थना करता है, वह पुरुष आपके अनुग्रह को प्राप्त करता है। आप यज्ञ के स्वामी हैं। आप उसके लिए समस्त शोभन दिनों को, धनों को और रत्नों को ग्रहण करें। आप उसके घर के समक्ष प्रकाशित हों।[ऋग्वेद 4.4.6]
हे अत्यन्त युवा अग्निदेव! तुम वेगवान एवं प्रमुख हो। तुम्हारे प्रति वंदना करने वाला प्राणी तुम्हारी कृपा चाहता है। हे यज्ञ स्वामिन! तुम उसके लिए सभी सौभाग्यशाली दिवसों की, अन्न एवं रत्न आदि धनों को स्वीकार करें। तुम उसके सम्मुख प्रकाशवान हो जाओ।
Hey too youthful Agni Dev! You are dynamic and significant. One who pray-worship you is granted your favours-grace. You are the deity of Yagy. Accept the jewels, riches-offerings on auspicious days-the days of Yagy, by the Ritviz and lit in front of his house.
सेदग्ने अस्तु सुभगः सुदानुर्यस्त्वा नित्येन हविषा य उक्थैः।
पिप्रीषति स्व आयुषि दुरोणे विश्वेदस्मै सुदिना सासदिष्टिः
हे अग्नि देव! जो व्यक्ति नित्य सङ्कल्पित हव्य द्वारा अथवा उक्त मन्त्र द्वारा आपको प्रसन्न करने की इच्छा करता है, वह पुरुष सौभाग्यवान् और सुदाता है। वह कठिनता से लाभ करने के योग्य अपनी सौ वर्षों की आयु को प्राप्त करता है। उस याजकगण के लिए सब दिन शोभन हो। वह यज्ञ फल साधन समर्थ हों।[ऋग्वेद 4.4.7]
हे अग्नि देव! जो मनुष्य प्रतिदिन हवि दान एवं मंत्र रूप वंदनायें प्रेरित करने के उद्देश्य से तुम्हारे स्नेह की अभिलाषा करता है, वह व्यक्ति और सौभाग्यशाली एवं दानशील हो। वह कठिनाई से प्राप्त होने वाली और अपनी सौ वर्ष की आयु को भोगे, उस यजमान के लिए समस्त दिन सौभाग्य की वर्षा करने वाला हो। वह यज्ञ का पोषण करने के साधनों से सम्पन्न हों।
Hey Agni Dev! A person who pleases you with offerings and Mantr-hymns, should become a lucky donor. He should enjoy longevity for 100 years. Each and every day should be auspicious for him. He should be capable of performing Yagy.
अर्चामि ते सुमतिं घोष्यर्वाक्सं ते वावाता जरतामियं गीः।
स्वश्वास्त्वा सुरथा मर्जयेमास्मे क्षत्राणि धारयेरनु द्यून्
हे अग्नि देव! हम आपकी अनुग्रह बुद्धि की पूजा करते हैं। आपके उद्देश्य से उच्चारित वाक्य प्रतिध्वनित होकर, आपकी प्रार्थना करें। हम लोग पुत्र-पौत्रादि के साथ उत्तम रथ और उत्तम अश्वों से युक्त होकर आपकी याचना करेंगे। आप हम लोगों के लिए प्रतिदिन धन धारित करें।[ऋग्वेद 4.4.8]
हे अग्नि देव! हम आपकी कृपा पूर्ण बुद्धि की वंदना करते हैं। तुम्हारे लिए उचारण किये हुए वाक्य प्रति ध्वनित होते हुए तुम्हारी वंदना करें, हम अपने पुत्र-पौत्र आदि एवं उत्तम रथ और अश्वों से युक्त तुम्हारी सेवा करने वाले हों। तुम हमारे लिए प्रतिदिन शोभन अन्न धारण करो।
Hey Agni Dev! We worship you to have your favours-grace. Our prayers dedicated to you, should echo-reverberate. We will worship-pray you, being blessed with sons & grandsons, possessing excellent horses and charoite. Keep-provide, grant wealth and food grains to us, every day.
इह त्वा भूर्या चरेदुप त्मन्दोषावस्तर्दीदिवांसमनु द्यून्।
क्रीळन्तस्त्वा सुमनसः सपेमाभि द्युम्ना तस्थिवांसो जनानाम्
हे अग्नि देव! आप सदैव प्रज्वलित रहते हैं। इस लोक में पुरुष आपके समीप आपकी सेवा प्रतिदिन करते हैं। हम भी शत्रुओं के धन को आत्मसात करके अपने घर में पुत्र-पौत्रों के साथ विहार करते हुए प्रसन्नतापूर्वक आपकी परिचर्या करते हैं।[ऋग्वेद 4.4.9]
हे अग्नि देव! तुम दिन रात प्रदीप्त होते हो। इस संसार के पुरुष तुम्हारी निकटता ग्रहण कर नित्य-प्रति तुम्हारी सेवा करते हैं। शत्रुओं के धन को अपनाते हुए हम भी अपने घरों में संतानों से युक्त मोद करते हुए हर्षित मन से तुम्हारी विविध रूप से सेवा करते हैं।
Hey Agni Dev! You should be lit continuously for ever. The humans pray-worship you in this world. We enjoy with our sons & grandsons utilising the wealth-riches obtained from the enemy.
यस्त्वा स्वश्वः सुहिरण्यो अग्न उपयाति वसुमता रथेन।
तस्य त्राता भवसि तस्य सखा यस्त आतिथ्यमानुषग्जुजोषत्
हे अग्नि देव! जो पुरुष सुन्दर अश्व युक्त होकर याग-योग्य धन विशिष्ट होकर और व्रीहि आदि धन से संयुक्त रथ के साथ आपके निकट पहुँचते हैं, उस पुरुष के आप रक्षक बनें। जो पुरुष अनुक्रम से अतिथि योग्य पूजा आपको प्रदान करता है, उसके आप मित्र होवें।[ऋग्वेद 4.4.10]
व्रीहि :: धान, चावल, अन्न, धान का खेत, चावल का बीज या दाना; rice.
हे अग्नि देव! जो व्यक्ति यश के योग्य सुंदर अश्वों से युक्त धन से सम्पन्न रथ के साथ तुम्हारे पास जाता है, तुम उस प्राणी के रक्षक बन जाते हो। जो व्यक्ति तुम्हें अतिथि मानकर तुम्हारी वंदना करता है, तुम उसके साथ मित्रता का भाव रखते हो
Hey Agni Dev! The person who comes to you with food grains-offerings over his charoite deploying strong & beautiful horses, should be protected-sheltered by you. You should be friendly with that person, who worship-pray you like a guest.
महो रुजामि बन्धुता वचोभिस्तन्मा पितुर्गोतमादन्वियाय।
त्वं नो अस्य वचसश्चिकिद्धि होतर्यविष्ठ सुक्रतो दमूनाः
हे होता, युवतम और प्रज्ञावान अग्नि देव! स्तुति द्वारा जो मित्रता उत्पन्न हुई हैं, उसके द्वारा हम महान राक्षस रूप शत्रुओं को भग्न करें। यह स्तोत्रात्मक वचन पिता गौतम के निकट से हमारे पास आया है। आप शत्रुओं के विनाशक हैं। आप हमारी प्रार्थना श्रवण करें।[ऋग्वेद 4.4.11]
हे अग्नि देव! तुम अत्यन्त युवा, बुद्धिमान एवं होता रूप हो। श्लोक द्वारा तुम से जो हमारा भ्रातृ भाव रचित हुआ है उसके द्वारा हम आसुरी वृत्ति वाले शत्रुओं को विदीर्ण करें। यह वंदना रूपी वाणी गौतमों द्वारा हमको ग्रहण हुई है। तुम शत्रुओं का विनाश करने वाले हो। हमारी वंदना रूपी संकल्पों पर पूरी तरह ध्यान देने की कृपा दृष्टि करो।
Hey patron of the Yagy, youngest, intelligent Agni Dev! The friendship, which has evolved by virtue of prayers should destroy the demons-giants. These prayers-hymns have evolved from our father Gautom. Being the destroyer of the demons-enemies, respond to our prayers.
अस्वप्नजस्तरणयः सुशेवा अतन्द्रासोऽवृका अश्रमिष्ठाः।
ते पायवः सध्रय्ञ्चौ निषद्याग्ने तव नः पान्त्वमूर
हे सर्वज्ञ अग्नि देव! आपकी रश्मियाँ सतत जागरूक, सर्वदा गमनशील सुखान्वित, आलस्य रहित, अहिंसित, अश्रान्त, परस्पर सङ्गत और रक्षा करने में समर्थ हैं। वे इस स्थान पर उपवेशन करके हमारी रक्षा करें।[ऋग्वेद 4.4.12]
अश्रान्ति :: अथक; un weary, un tired. 
संगत :: अनुकूल, मुताबिक़, अविस्र्द्ध, तर्कयुक्त, सिलसिलेवार, अविरोधी, प्रासंगिक, संगत, उचित, अनुरूप, योग्य, प्रस्तुत; consistent, compatible, relevant.
हे अग्नि देव! तुम सर्वोपरि हो। तुम्हारी किरणें सदा ही चैतन्य रहती हैं। वे हमेशा गमनशील, प्रमाद रहित, अहिंसित, अश्रान्त एवं सुसंगति हुई हमारी रक्षा कर्म में समर्थ हैं। वे रश्मियाँ इस यज्ञ में रमण करती हुई हमारी रक्षा करें।
Hey enlightened-all knowing Agni Dev! Your rays are awake-alert, movable-dynamic, free from laziness, non violent, un weary, un tired, mutually consistent, compatible, relevant and capable of protection-shelter to us, spreaded all over in the Yagy.
ये पायवो मामतेयं ते अग्ने पश्यन्तो अन्धं दुरितादरक्षन्।
ररक्ष तान्त्सुकृतो विश्ववेदा दिप्सन्त इद्रिपवो नाह देभुः
हे अग्नि देव! रक्षा करने वाली आपकी इन रश्मियों ने कृपा करके ममता के पुत्र चक्षुहीन दीर्घतमा की शाप से रक्षा की। आप सर्व प्रज्ञावान हैं। आप आदरपूर्वक उन रश्मियों का पालन करते हैं। आपके शत्रु आपको विनष्ट करने की इच्छा करके भी आपका विनाश नहीं कर सकते।[ऋग्वेद 4.4.13]
हे अग्निदेव! तुम्हारी इन रक्षणप्रद किरणों ने ममता के नेत्र हीन पुत्र दीर्घमान पर कृपा दृष्टि कर उसकी श्राप से सुरक्षा की है। हे अग्नि देव! तुम अत्यन्त मेधावी हो। अपनी उन किरणों का प्रेम पूर्वक पोषण करते हो। तुम्हारे शत्रु तुम्हारा पतन करने की कामना करते हुए भी अपने प्रयास में असफल रहते हैं।
Hey Agni Dev! Your protective rays blessed the son of Mamta Dirghtama from the curse. You are enlightened-intelligent. You nurse the rays with love & affection. Your enemy desirous harming you can not harm you.
त्वया वयं सधन्य १ स्त्वोतास्तव प्रणीत्यश्याम वाजान्।
उभा शंसा सूदय सत्यतातेऽनुष्ठुया कृणुह्यह्रयाण
हे अग्नि देव! आपका गमन लज्जा शून्य है। हम स्तोता आपके अनुग्रह से समान धन वाले होकर आपके द्वारा रक्षित हों। आपकी प्रेरणा से अन्न लाभ करें। हे सत्य विस्तारक और पाप नाशक अग्नि देव! आप हमारे निकटस्थ या दूरस्थ शत्रुओं को विनष्ट करें तथा क्रम से समस्त कार्य करें।[ऋग्वेद 4.4.14]
हे अग्नि देव! तुम निःसंकोच गमन करते हो। हम वंदना करने वाले तुम्हारी कृपा से धनवान बनकर तुम्हारी शरण प्राप्त करें। तुम्हारी प्रेरणा से हमको अन्नलाभ हो । हे अग्निदेव! तुम सत्य का विस्तार करने वाले हो। तुम पाप का पतन करने में समर्थवान हो। पास या दूर शत्रुओं का आप पतन करो और सभी कर्मों का साधन करो।
Hey Agni Dev! Your movements are free from hesitation. We the Stota, be protected by you, having attained wealth, due to your blessings-grace. We should be inspired to have-gain food grains. Hey the nurturer of truth and destroyer of sins, Agni Dev! Destroy our enemies near or far-distant enemies, sequentially. Let all our endeavours be accomplished.
अया ते अग्ने समिधा विधेम प्रति स्तोमं शस्यमानं गृभाय।
दहाशसो रक्षसः पाह्य१स्मान्द्रुहो निदो मित्रमहो अवद्यात्
हे अग्नि देव! इस प्रदीप्त स्तुति द्वारा हम आपकी सेवा करें। हमारे इस स्तोत्र को ग्रहण करें। स्तुति विहीन राक्षसों को भस्म सात करें। हे मित्रों के पूजनीय अग्नि देव! शत्रु और निन्दकों के परिवाद से हमारी रक्षा करें।[ऋग्वेद 4.4.15]
परिवाद :: निन्दा, तिरस्कार, परिवाद, धिक्कार, भला-बुरा, निंद लेख, अभियोग पत्र, reproach, complaint, libel. 
हे अग्नि देव! प्रस्तुत प्रार्थना द्वारा हम तुम्हारी सेवा करते रहें। हमारे स्तोत्र को स्वीकार करो। जो दुष्ट प्रकृति वाले वंदना नहीं करते उन्हें समाप्त कर डालो। हे अग्नि देव! आप मित्रों द्वारा पूजनीय हो। हमको शत्रुओं और निन्दकों की निंदा पूर्ण बातों से हमारी रक्षा करें।
Hey Agni Dev! We should continue serving you with this prayer-hymn. Accept our prayer. Burn the demons who do not pray-worship you. Hey Agni Dev, worshiped by the friends! Protect us from the enemies and those who reproach, libel, disgrace us. (26.01.2023)
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (5) :: ऋषि :- वामदेव गौतम, देवता :- वैश्वानर छन्द :- त्रिष्टुप
वैश्वानराय मीळ्हुषे सजोषाः कथा दाशेमाग्नये बृहद्धाः।
अनूनेन बृहता वक्षथेनोप स्तभायदुपमिन्न रोधः
समान रूप से प्रीति युक्त होकर हम याजक गण वैश्वानर नामक अभीष्टवर्षी, एवम् महान, दीप्तियुक्त अग्नि देव को किस प्रकार से हव्य प्रदान करें? स्तम्भ जिस प्रकार से छप्पर को धारित करता है, उसी प्रकार से वे सम्पूर्ण इसलिए बृहत् शरीर द्वारा द्युलोक को धारित करते हैं।[ऋग्वेद 4.5.1]
हम सभी समान स्नेह वाले तपस्वी यजमान उस अनिष्ट की वर्षा करने वाले ज्योर्तिमान वैश्वानर अग्नि को हर्षित करते के लिए किस प्रकार हवि प्रदान करें? जैसे छप्पर को स्तम्भ धारण करता है, उसी प्रकार अग्नि देव अपने समस्त रूपों द्वारा क्षितिज को धारण करते हैं।
What is the method, procedure of making offerings to Vaeshwanar Agni Dev by us-the worshipers, who is radiant-aurous, great, accomplish desires. The way-manner in which a pole supports the thatched hut roof, Agni Dev supports the entire universe in his vast-gigantic form till the horizon.
मा निन्दत य इमां मह्यं रातिं देवो ददौ मर्त्याय स्वधावान्।
पाकाय गृत्सो अमृतो विचेता वैश्वानरो नृतमो यह्वो अग्निः
हे होताओ! जो अग्नि देव हव्य युक्त होकर मरणशील और परिपक्व बुद्धि विशिष्ट हम याजक गणों को धन प्रदान करते हैं, उनकी आलोचना न करें। वे मेधावी, अमर और प्रज्ञावान् हैं। वे वैश्वानर, नेतृश्रेष्ठ एवं महान् हैं।[ऋग्वेद 4.5.2]
हे होताओ! हवि युक्त होकर तुम मरणधर्म परिपक्व बुद्धि वाले यजमानों को अग्निदेव धन प्रदान करते हैं, उनका आदर करो।
Hey Hotas! Do not criticise Agni Dev who grants wealth-riches to mortals, matured, intelligent worshipers on making offerings-prayers. He is intelligent, immortal and prudent. He is Vaeshwanar, excellent leader and great.
साम द्विबर्हा महि तिग्मभृष्टिः सहस्ररेता वृषभस्तुविष्मान्।
पदं न गोरपगूळ्हं विविद्वानग्निर्मह्यं प्रेदु वोचन्मनीषाम्
मध्यम और उत्तम रूप स्थान द्वय को परिव्याप्त करने वाले, तीक्ष्ण तेजो विशिष्ट, प्रभूत सारवान अभीष्ट वर्षी और धनवान अग्नि देव अत्यन्त गुप्त गोपद के सदृश रहस्यमय हैं। वे ज्ञातव्य हैं। विद्वानों के सहयोग से हम उनका ज्ञान प्राप्त करें।[ऋग्वेद 4.5.3]
ज्ञातव्य :: जानने योग्य, जो जाना जा सके, बोधगम्य, जिसे जानता हो अथवा जिसे जानना उचित हो, ज्ञेय, वेद्य, बोधगम्य, श्रुति उपनिषद आदि में आत्मा को ही एक मात्र ज्ञातव्य माना है उसे जान लेने पर फिर कुछ जानना बाकी नहीं रह जाता; cognoscible.
वे अविनाशी अग्नि देव अत्यन्त मध्यम एवं उत्तम दोनों स्थानों में व्याप्त अपने तीव्र तेज से युक्त हों। वे अभीष्टों की वृष्टि करने वाले, सार परिपूर्ण एवं धन सम्पन्न होते हुए भी पर्वत में छिपे गृह के तुल्य रहस्यपूर्ण हैं। उनका ज्ञान ग्रहण करना उचित है। विद्वानजन श्रेष्ठ श्लोकों के अध्ययन द्वारा हमकों उनका स्वरूप ज्ञात करवायें।
Immortal, rich, desires fulfilling, Agni Dev is like the secret cave in the mountain, pervade both the mediocre and best places possessing high level of radiance-brightness, aura. Let us be enlightened about him with the help of scholars. He deserve to be known.
प्र ताँ अग्निर्बभसत्तिग्मजम्भस्तपिष्ठेन शोचिषा यः सुराधाः।
प्र ये मिनन्ति वरुणस्य धाम प्रिया मित्रस्य चेततो ध्रुवाणि
विद्वान मित्र देव और वरुण के प्रिय एवं स्थित तेज को जो द्वेषी हिंसित करता है, उसे सुन्दर धन विशिष्ट और तीक्ष्ण दन्त अग्नि देव अत्यन्त सन्तापकर तेज-द्वारा भष्मसात करें।[ऋग्वेद 4.5.4]
जो प्राणी मेधावी मित्र और वरुण के प्रिय की हिंसा करता है, उसे तीव्र दाँत वाले, सुन्दर धनयुक्त अग्निदेव अपने अत्यन्त क्लेशदायी तेज के द्वारा नष्ट कर दें।
Let Agni Dev burn-roast, one who tease-torture the affectionate-dear of Mitr & Varun Dev with his sharp, torturous teeth and heat. 
अभ्रातरो न योषणो व्यन्तः पतिरिपो न जनयो दुरेवाः।
पापासः सन्तो अनृता असत्या इदं पदमजनता गभीरम्
भ्रातृ रहिता, विपथ गामिनी योषित (स्त्री, नारी) के तुल्य तथा पति विद्वेषिणी दुष्टाचारिणी स्त्री के तुल्य यज्ञ विहीन, अग्नि विद्वेषी, सत्य रहित और सत्य वचन शून्य पापी नरक स्थान को उत्पन्न करते हैं।[ऋग्वेद 4.5.5]
जैसे पोषण करने वाले भ्राता से द्वेष करने वाली नारी तथा पति से द्वेष करने वाली झूठी नारी कष्ट देने वाली गंभीर दशा को ग्रहण हो जाती है, वैसे ही कीर्ति विमुख एवं अग्नि से द्वेष करने वाले सत्य पृथक तथा सत्य वाणी से शून्य पापाचारी का अध: पतन होवे।
अध:पतन ::  अधोगमन-नर्क में जाना, पतन, गिरावट, नीचे गिरना, अवनति, दुर्दशा, दुर्गति, विनाश, क्षय; down fall, degrade to hell, degeneration, degression.
द्वेष :: राग का विरोधी भाव, वैमनस्यता, विरोध, शत्रुता, वैर; malice, hatred, enmity.
The way-manner in which a corrupt woman envy her brother supporting-nourishing her, those who hate Agni Dev, speak untruth sinners too degrade to hell.
इदं मे अग्ने कियते पावकामिनते गुरुं भारं न मन्म।
बृहद्दधाथ धृषता गभीरं यह्वं पृष्ठं प्रयसा सप्तधातु
हे शोधक अग्नि देव! हम आपके कर्म का परित्याग नहीं करते। क्षुद्र व्यक्ति को जिस प्रकार से गुरु भार दिया जाता है, उसी प्रकार आप हमें प्रभूत धन प्रदान करें। वह धन शत्रु घर्षक, अन्न युक्त, दूसरों के द्वारा अनवगाहनीय महान स्पर्शन योग्य एवं सात प्रकार (सात ग्राम्य पशु और सात वन्य पशु) का है।[ऋग्वेद 4.5.6]
हे पावक! हम तुम्हारे द्वारा प्राप्त किये जाने वाले व्रत को नहीं छोड़ते, जैसे कमजोर प्राणी को कोई भारी बोझ से लाद दे उसी प्रकार तुम हमको सुंदर धन दो। वह धन शत्रु का संहार करने वाला, अन्न से युक्त पोषण करने में समर्थ, ज्ञानवर्धक एवं श्रेष्ठ सप्त धातुओं से युक्त हो।
Hey pious-pure Agni Dev! We do not reject our endeavours, goals, targets. Over load us with riches just like an inferior-weak person is given some tough job-task. That wealth associated with food grains capable of nourishing-nurturing, 7 metals, 7 cattle, scholarly, should be destructible-destroyer for the enemy.
तमिन्न्वे ३ व समना समानमभि क्रत्वा पुनती धीतिरश्याः।
ससस्य चर्मन्नधि चारु पृश्नेरग्रे रुप आरुपितं जबारु
यह सुयोग्य एवं सभी के प्रति समान शोधयित्री स्तुति उपयुक्त पूजा विधि के साथ वैश्वानर के निकट शीघ्र गमन करे। वह वैश्वानर के आरोहणकारी दीप्त मण्डल पृथ्वी के निकट से अचल द्युलोक के ऊपर विचरण करने के लिए पूर्व दिशा में आरोपित हुई है।[ऋग्वेद 4.5.7]
वह समस्त प्रकार से उपयुक्त, समान शोधन करने वाली वंदना पूजन विधि के द्वारा वैश्वानर अग्नि को ग्रहण हो। वंदना वैश्वानर अग्नि की वृद्धि करने वाली उज्जवल पृथ्वी के पास से अचल अम्बर पर भ्रमण करने के लिए पूर्व दिशा में प्रकट हुई है।
The hymns-Strotr followed by proper-methodical prayers, suitable by all means, should be accepted by Vaeshwanar Agni. The prayers should enhance-boost fire-Agni, appear in the east over the earth, travelling in the stationary sky-space.
प्रवाच्यं वचसः किं मे अस्य गुहा हितमुप निणिग्वदन्ति।
यदुस्त्रियाणामप वारिव व्रन्पाति प्रियं रुपो अग्रं पदं वेः
विद्वान् कहते हैं कि दोग्धागण जल के तुल्य जिस दुग्ध का दोहन करते हैं, उस दुग्ध को वैश्वानर गुफा में छिपाकर रखते हैं। वे विस्तीर्ण पृथ्वी के प्रिय एवं श्रेष्ठ स्थान की रक्षा करते हैं। मेरे इस वाक्य के अतिरिक्त और क्या वक्तव्य हो सकता है?[ऋग्वेद 4.5.8]
महापुरुषों का कहना है कि दूध निकालने वाले जिस दूध को जल के समान दुहते हैं, उस दूध को वैश्वानर अग्नि गुफाओं में रहस्यमय रखते हैं। वे विशाल भूमण्डल के प्यारे स्थान की रक्षा करते हैं, यह वचन कितना अद्भुत तथा अधिक बल वाला कहा जाने में समर्थ है।
The scholars-philosophers state milk drawn-extracted like water by the milkman, is kept by Vaeshwanar in the secret cave. He protects that excellent vast place over the earth. What else can I say better than this!? 
इदमु त्यन्महि महामनीकं यदुस्त्रिया सचत पूर्व्यं गौः।
ऋतस्य पदे अधि दीद्यानं गुहा रघुष्यद्रघुयद्विवेद
क्षीर प्रसविणी गौ अग्नि होत्रादि कर्म में जिनकी सेवा करती है, जो अन्तरिक्ष में अत्यन्त दीप्तिमान् हैं, जो गुफा में निहित हैं, जो शीघ्र स्पन्दमान हैं और जो शीघ्र गमनकारी हैं, वे महान और पूज्य हैं। सूर्य मण्डलात्मक वैश्वानर को हम जानते हैं।[ऋग्वेद 4.5.9]
जिन अग्नि देव की दुग्ध देने वाली गायें अनुष्ठान आदि शुभ कार्य में सेवा करती हैं, जो अग्नि स्वयं ज्योर्तिवान है, जो गुफा में वासित है, जो शीघ्र गतिमान एवं वेगवान हैं। वे महान पूजनीय हैं। सूर्य मण्डल में विद्यमान उन वैश्वानर अग्नि को हम भली-भाँति जानते हैं।
Extremely bright Agni Dev placed in the space inside a cave, is served by the  milch cows, quickly moves fast, is revered-honoured. We thoroughly know-identify Vaeshwanar Agni present in the solar elliptical path.
अध द्युतानः पित्रोः सचासामनुत गुह्यं चारु पृश्नेः।
मातुष्पदे परमे अन्ति षद्गोर्वृष्णः शोचिषः प्रयतस्य जिह्वा
पिता-माता स्वरूप द्यावा-पृथ्वी के बीच में व्याप्त होकर दीप्तिमान् वैश्वानर गौ के ऊधः प्रदेश में निगूढ़ रमणीय दुग्ध को मुख द्वारा पान करने के लिए प्रबोधित हों। बलशाली, तेजोयुक्त और प्रयत्नशील वैश्वानर की जिह्वा, माता गौ के उत्कृष्ट स्थान में स्थित दुग्ध को पीने की इच्छा करती है।[ऋग्वेद 4.5.10]
माता-पिता के समान नभ-धरती के मध्य में व्याप्त हुए प्रकाशवान वैश्वानर गौ के भाग में उत्तम तथा स्वादिष्ट दूध को पीने के लिए चैतन्य हो। उन अभिष्टों की वर्षा करने वाले, प्रकाशवान वैश्वानर, अग्नि की जिह्वा मातृरुपिणी गौ उर्ध्व स्थान में पेय-पान करने की इच्छा करती हैं।
Then, radiant in association with the parents, heaven and earth, he is awakened to drink the milk of the cow with the tongue of the assiduous (performer of holy rites), the resplendent showerer of benefits, approaching the excellent station of the maternal cow, seeks to drink the milk.
Vaeshwanar Agni! Establish yourself between the sky & earth who are like father & mother. Mighty radiant Vaeshwanar wish to drink milk with his tongue from the udder of the cow.
ऋतं वोचे नमसा पृच्छ्यमानस्तवाशसा जातवेदो यदीदम्।
त्वमस्य क्षयसि यद्ध विश्वं दिवि यदु द्रविणं यत्पृथिव्याम्
किसी के द्वारा पूछे जाने पर नमस्कार पूर्वक सत्य बोलते हैं। हे जात वेदा! आपकी प्रार्थना द्वारा यदि हम इस धन को प्राप्त करें, तो आप ही इस धन के स्वामी होवें। आप सम्पूर्ण धन के स्वामी होवें। पृथ्वी में जितने धन हैं और द्युलोक में जितने धन हैं, उन सब ऐश्वर्यों के भी आप स्वामी हैं।[ऋग्वेद 4.5.11]
मुझ से कोई अत्यन्त सम्मान पूर्वक पूछे तो हे अग्नि देव! मैं अवश्य ही सत्य बात कहूँ। हे अग्ने! तुम्हारी वंदना करते हुए हम इस सुन्दर धन को ग्रहण करें तुम धन के अधिपति बनो। क्योंकि तुम समस्त धनों के स्वामी हो। पृथ्वी और अम्बर में जितने भी धन हैं, उन सभी के तुम अधीश्वर हो।
If someone question me with due respect, I will speak the truth. Hey Agni Dev! We should get wealth-riches due to your favours & if we get it, you should be its master-owner. You are the master-owner of the wealth & grandeur in the heavens & the earth.
किं नो अस्य द्रविणं कद्ध रत्नं वि नो वोचो जातवेदश्चिकित्वान्।
गुहाध्वनः परमं यन्नो अस्य रेकु पदं न निदाना अगन्म
हे जात वेदा! इस धन का साधन भूत धन क्या है? इसका हितकर धन क्या है? आप जानते हो, हमें बतावें! इस धन की प्राप्ति के लिए जो मार्ग है, उसका गूढ़ और उत्कृष्ट उपाय हमसे कहो? लक्ष्य पूर्ति के अभाव में निन्दित होकर अपने घर न लौटें।[ऋग्वेद 4.5.12]
इस धन की साधन भूत शक्ति क्या है? इसका हितकारी धन कौन-सा है? हे अग्नि देव! तुम जो जानते हो वह हमें बतलाओ, इस धन को ग्रहण करने को जो आसान रास्ता है, उसका महान तरीका बताओ। जिससे हम अपने ध्येय को प्राप्त करने में सफल हो सकें।
Hey Agni Dev! Tell us the  source of this useful wealth!? Explain the intricate secrets of attaining this wealth. We should not be insulted on being unsuccessful, on returning home.
का मर्यादा वयुना कद्ध वाममच्छा गमेम रघवो न वाजम्।
कदा नो देवीरमृतस्य पत्नीः सूरो वर्णेन ततनन्नुषासः
पूर्व आदि सीमा क्या है? पदार्थ ज्ञान क्या है? रमणीय पदार्थ समूह क्या है? शीघ्र गामी अश्व जिस प्रकार से संग्राम के अभिमुख गमन करता है, उसी प्रकार हम इन्हें अधिगत करेंगे। द्युतिमती, मरण रहिता और आदित्य की पत्नी प्रसवित्री उषा किस समय हम लोगों के लिए प्रकाशित होकर व्याप्त होंगी?[ऋग्वेद 4.5.13]
मर्यादा क्या है? करने योग्य दायित्व कौन से है? जानने योग्य ज्ञान कौन से हैं? गतिमान घोड़ा जैसे संग्राम को जाता है एवं शीघ्र कार्य-क्षय निरालस्य हुआ ज्ञान विद्वानों को ग्रहण करता है, वैसे ही हम भी कब गतिमान होंगे और ज्ञानैश्वर्य को ग्रहण करेंगे? उज्जवल ज्योति वाली अविनाशी उषा सूर्य की रोशनी से परिपूर्ण हुई कब हमारे लिए प्रकाशमान होगी?
What is our limit, responsibility, material, enlightenment? We should adopt-obtain, acquire them just like the fast moving horses. When will dynamic, immortal, Usha appear with the rays-light of Sun?
अनिरेण वचसा फल्ग्वेन प्रतीत्येन कृधुनातृपासः।
अधा ते अग्ने किमिहा वदन्त्यनायुधास आसता सचन्ताम्
हे अग्नि देव! अन्न रहित, उक्थ मन्त्र और आरोपणीय अल्पाक्षर वाणी द्वारा अतृप्त मनुष्य अभी इस लोक में आपकी क्या प्रार्थना करेंगे। हविर्विहीन वाक्य द्वारा कुछ लाभ नहीं सकता। हविरादि साधन से हीन जन दुःख प्राप्त करते हैं।[ऋग्वेद 4.5.14]
अन्न वंचित, विरुद्ध ज्ञान वाला अतृप्त मनुष्य इस संसार में स्वल्प प्रण से तुम्हारे प्रति क्या कहता है? वह हथियारों से दूर निहत्थे प्राणी की भाँति असत ज्ञान से युक्त हुए क्लेश पाता है।
Hey Agni Dev! Tell us the prayers, powerful Mantr, which should be adopted-recited by a unsatisfied person, facing troubles-pain, sorrow, who has no food grains, for making offerings.
अस्य श्रिये समिधानस्य वृष्णो वसोरनीकं दम आ रुरोच।
रुशद्वसानः सुदृशीकरूपः क्षितिर्न राया पुरुवारो अद्यौत्
समिद्ध, अभीष्टवर्षी और निवासप्रद अग्नि का तेजः समूह यज्ञ घर में दीप्त होता है। याजकगण के मङ्गल के लिए वे दीप्त तेज का परिधान करते हैं; इसलिए उनका रूप रमणीय है। वे अनेक यजमानों द्वारा प्रार्थित होकर द्योतित होते हैं, जिस प्रकार से अश्व आदि धन से राजा द्योतित होता है।[ऋग्वेद 4.5.15]
हम सुखपूर्वक दैदीप्यमान अग्नि की तेज राशि यज्ञ स्थान में प्रदीप्त होते हैं। यजमान को सुख प्रदान करने के लिए वे उज्जवल तेज को धारण करते हैं। अतः उनका स्वरूप अत्यन्त सुन्दर है। जैसे अश्वादि धनों से परिपूर्ण हुआ राजा चमकता है, वैसे ही अग्नि देव अनुष्ठान की वंदनाओं द्वारा पूजनीय होकर चमकते हैं।
The Yagy-site, house is lit by the radiance of fire-Agni. He adopts the specific high intensity aura for the benefit of the Ritviz, devotee, with his beautiful-attractive postures. He shines on being revered-worshiped by the hosts, just like the king who glitters-shines, riding a horse wearing ornaments-jewels.(30.01.2023)
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (6) :: ऋषि :- वामदेव गौतम, देवता :-अग्नि छन्द :- त्रिष्टुप
ऊर्ध्व ऊ षु णो अध्वरस्य होतरग्ने तिष्ठ देवताता यजीयान्।
त्वं हि विश्वमभ्यसि मन्म प्र वेधसश्चित्तिरसि मनीषाम्
हे यज्ञ होता अग्नि देव! आप सर्वश्रेष्ठ याज्ञिक हैं। आप हम लोगों से ऊर्ध्व स्थान में अवस्थिति करें। आप सम्पूर्ण शत्रुओं के धन को जीतें। आप स्तोताओं की प्रार्थना को प्रवर्द्धित करें।[ऋग्वेद 4.6.1]
हे होता अग्नि देव! तुम याज्ञिकों में महान हो। तुम हमसे सर्वोच्च पद पर अवस्थित होओ। तुम समस्त शत्रुओं को जीतने वाले हो। वंदना करने वालों की वंदनाओं को प्रशस्त करो।
Hey Hota Agni Dev! You are the best-superb Ritviz. Establish yourself at the highest level from us. Win the wealth of the enemy. Accomplish the desires-requests of the worshipers.
अमूरो होता न्यसादि विश्व१ग्निर्मन्द्रो विदथेषु प्रचेताः।
ऊर्ध्वं भानुं सवितेवान्तेव धूमं स्तभायदुप द्याम्
प्रगल्भ, होमनिष्पादक, हर्षयिता और प्रकृष्ट ज्ञान विशिष्ट अग्नि देव यज्ञ में प्रजाओं के बीच में स्थापित होते हैं। वे उदित सूर्य के तुल्य ऊद्धर्व मुख होते हैं और स्तम्भ के तुल्य द्युलोक के ऊपर धूम को धारित करते हैं।[ऋग्वेद 4.6.2]
प्रगल्भ :: वाक्चातुर्य, प्रतिभा, मुखरता, प्रौढ़ता, निःशंकता, प्रसिद्धि; intelligent, maturity, prudent.
अग्नि देव अनुष्ठान का सम्पादन करने वाले, प्रसन्नता को रचित करने वाले, अत्यन्त ज्ञान और मेधावी हैं। वे अनुष्ठान मंडप में यजमानों के मध्य विराजमान होते हैं। वे उदित होते ही सूर्य के समान ऊँचे उठे रहते हैं और स्तम्भ के तुल्य धूप को धारण करते हैं।
Intelligent, enlightened Agni Dev is the organiser of the Yagy who has established himself amongest the populace. He is elevated like the Sun and support the Sun light like a pole-pillar.
यता सुजूर्णी रातिनी घृताची प्रदक्षिणिद्देवतातिमुराणः।
उदु स्वरुर्नवजा नाक्रः पश्वी अनक्ति सुधितः सुमेकः
संयत और पुरातन जुहू घृत पूर्ण हुआ है। यज्ञ को दीर्घ करनेवाले अध्वर्युगण प्रदक्षिण करते हैं। नवजात यूप उन्नत होता है। आक्रमणकारी और सुदीप्त कुठार पशुओं के निकट गमन करता है।[ऋग्वेद 4.6.3]
पुरातन एवं संयत जुहू घृत से पूरा हुआ है। यज्ञ की वृद्धि करने वाले अध्वर्यु प्रदक्षिणा करते हुए अपनी अभिलाषा को प्राप्त करते हैं। नव उत्पन्न यूप ऊपर उठता हुआ मंगलकारी होता है। हित करने वाला यजमान गाय आदि पशुओं को प्राप्त करता है।
Ancient & balanced pot made of Butea wood is full of Ghee. The Ritviz who prolong the Yagy circumambulate the Yagy site. Newly fixed pole-pillar rise up. The performers of Yagy get cows as Dakshina-gifts, fee.
स्तीर्णे बर्हिषि समिधाने अग्ना ऊर्ध्वो अध्वर्युर्जुजुषाणो अस्थात्।
पर्यग्निः पशुपा न होता त्रिविष्ट्येति प्रदिव उराणः
कुश के विस्तृत होने पर और अग्नि समिद्ध होने पर अध्वर्यु, दोनों को प्रीत करने के लिए उत्थित होते है। होम निष्पादक और पुरातन अग्नि देव अल्प हव्य को भी बहुत कर देते हैं तथा पशु पालकों के तुल्य पशुओं के चारों ओर तीन बार गमन करते हैं।[ऋग्वेद 4.6.4]
कुश के बिछ जाने पर तथा अग्नि के समृद्ध होने पर अध्वर्युगण दोनों का आदर करने के लिए प्रस्तुत होते हैं। यज्ञ का सम्पादन करने वाले पुरातन अग्नि देव अश्व से हव्य को भी प्रचुर करते हैं। वे पालकों के समान यश में वृद्धि करते हुए श्रेष्ठ, मध्यम, अधम तीनों श्रेणी के जीवों पर अनुग्रह करते हैं।
When the sacred grass-Kush is strewn and the fire is kindled, the Adhvaryu-hosts, priests, Ritviz rises, propitiating the demigods-deities and Agni, the offeror of the oblation, ancient and multiplying the offering, thrice circumambulates the cattle like a keeper of cattle.
The priests become ready to honour both :- demigods-deities and Agni Dev. A little quantity of offerings too yield a lot for the Hawan performers. They circumambulate thrice around the cattle.
परि त्मना मितगुरेति होताग्निर्मन्द्रो मधुवचा ऋतावा।
द्रवन्त्यस्य वाजिनो न शोका भयन्ते विश्वा भुवना यदभ्राट्
होता, हर्षदाता, मिष्टभाषी और यज्ञवान अग्नि देव परिमित गति होकर पशुओं के चारों ओर गमन करते हैं। अग्नि का दीप्ति समूह अश्व के तुल्य चारों ओर धावित होता है। अग्नि देव जब प्रदीप्त होते हैं, तब समस्त लोक भयभीत हो जाते हैं।[ऋग्वेद 4.6.5]
हर्षिता प्रदान करने वाले, होता रूप मृदुभाषी यज्ञ से परिपूर्ण अग्नि देव परिमित चाल वाले होकर सब जगह विचरण करते हैं। उनकी ज्योतिपुंज अश्व के समान सब तरफ दौड़ता है। वे जब दीप्तीमान होते हैं, तब अखिल विश्व के प्राणधारी डर जाते हैं ।
Sweet spoken and dedicated to the Yagy, Agni Dev circumambulate the cattle, as a host with restricted-controlled speed. The shinning groups of fire run like a horse. When Agni Dev shines-glitters, all abodes are filled with fear.
भद्रा ते अग्ने स्वनीक संदृग्घोरस्य सतो विषुणस्य चारुः।
न यत्ते शोचिस्तमसा वरन्त न ध्वस्मानस्तन्वी ३ रेप आ धुः
हे सुन्दर ज्वाला विशिष्ट अग्नि देव! आप भीति जनक हो और सभी जगह व्याप्त हो। आपकी मनोहर और कल्याणकारी मूर्ति अच्छी तरह से दिखाई देती है। रात्रि अन्धकार द्वारा आपकी दीप्ति को ढक नहीं सकती। राक्षस आदि आपके शरीर में पाप को नहीं रख सकते हैं।[ऋग्वेद 4.6.6]
हे अग्नि देव! तुम्हारी ज्वालाएँ सुन्दर हैं, तुम दुष्टों को डराने वाले एवं सर्व व्यापक हो, तुम्हारा मनोहर और मंगलकारी स्वरूप भली प्रकार दर्शनीय है। रात्रि का अंधेरा भी तुम्हारे प्रकाश को रोकने में सक्षम नहीं हैं। असुर आदि दुष्ट तुम्हारे शरीर पर पापमय प्रयोग करने में सफल नहीं हो सकते।
Hey beautiful Agni Dev, with a special flame! You create fear for the enemy and pervade the whole world. Your attractive and beneficial figure is seen all around. Night can not cover your radiance by darkness. The wicked & the demons can not perform sins by using you-your body.
न यस्य सातुर्जनितोरवारि न मातरापितरा नू चिदिष्टौ।
अधा मित्रो न सुधितः पावको ३ ग्निर्दीदाय मानुषीषु विक्षु॥
हे वृष्टि को उत्पन्न करने वाले वैश्वानर! आपका दान किसी के द्वारा निवारित नहीं हो सकता। पिता-माता स्वरूप द्यावा-पृथ्वी जिसे प्रेषित करने में शीघ्र समर्थ नहीं होते हैं, वे तृप्त और शोधक अग्नि देव मनुष्यों के बीच में मित्र की तरह दीप्तिमान होते हैं।[ऋग्वेद 4.6.7]
हे वैश्वानर अग्नि देव! तुम वर्षा के कारण भूत हो। तुम्हारा दान किसी के द्वारा रोका नहीं जा सकता। जिस अग्नि को प्रेरित करने में माता-पिता रूपी आकाश-पृथ्वी शीघ्र ही समर्थवान नहीं होते हैं, वे अग्नि संतृप्त होकर शुद्ध करने वाली हैं और पुरुषों के मध्य सखा के समान विद्यमान हुए ज्योर्तिवान होते हैं।
Hey rain creating Vaeshwanar Agni Dev! Your donations can not be blocked by any one. Heavens & the earth, like father & mother, are unable to move-inspire quickly that saturated-satisfied and purifying Agni Dev who shines-glitter amongest the humans like friend.
द्विर्यं पञ्च जीजनन्त्संवसानाः स्वसारो अग्निं मानुषीषु विक्षु।
उषर्बुधमथर्यो ३ न दन्तं शुक्रं स्वासं परशुं न तिग्मम्
मनुष्यों की दसों अँगुलियाँ, स्त्री के तुल्य जिन अग्नि को उत्पन्न करती हैं, वे अग्नि उषाकाल में बुध्यमान, हव्यभाजी, दीप्तिमान, सुन्दर वदन और तीक्ष्ण फरसे के तुल्य शत्रु रूपी राक्षसों के हन्ता है।[ऋग्वेद 4.6.8]
पुरुषों की दसों उंगलियाँ, स्त्री के समान जिस अग्नि को प्रदीप्त करती हैं, वे अग्नि देव उषा काल में जागने वाले, हव्य स्वीकार करने वाले, श्रेष्ठ प्रकाश में चमकने वाले एवं सुन्दर स्वरूप वाले हैं। वे तीखे मुखवाले फरसे के समान शत्रुओं का विनाश करते हैं।
The beautiful Agni which is ignited-evolved by the ten fingers of the humans, like a woman, is shinning-radiant, accepts the offerings  and acts like the sharp edged Farsa-sword, a killer of demons.
तव त्ये अग्ने हरितो घृतस्ना रोहितास ऋज्वञ्चः स्वञ्चः।
अरुषासो वृषण ऋजुमुष्का आ देवतातिमह्वन्त दस्माः॥
हे अग्नि देव! आपके वे अश्व हमारे यज्ञ के अभिमुख आहूत होते हैं। उनकी नासिका से फेन निलकता है। वे लोहित वर्ण, अकुटिल, सुन्दरगामी, दीप्तिमान, युवा, सुगठित और दर्शनीय हैं।[ऋग्वेद 4.6.9]
हे अग्नि देव! तुम्हारे उन अश्वों को हम अपने सम्मुख पुकारते हैं। उनके मुख से फेन निकलता है । वे लाल रंग वाले, सीधे मार्ग पर चलने वाले हैं। उनकी चाल सुन्दर है और वे चमकती हुई देह वाले, युवावस्था से परिपूर्ण, शक्तिशाली तथा देखने योग्य हैं।
Hey Agni Dev! Your red coloured horses join-come to our Yagy. Foam evolve-come out of their nostrils. They are fast moving, young, strong-able bodied and beautiful.
ये ह त्ये ते सहमाना अयासस्त्वेषासो अग्ने अर्चयश्चरन्ति।
श्येनासो न दुवसनासो अर्थं तुविष्वणसो मारुतं न शर्धः
हे अग्नि देव! आपके वे शत्रुओं को अभिभूत करने वाली, गमनशील, दीप्ति और पूजनीय रश्मियाँ, मरुतों के तुल्य अत्यन्त ध्वनि करती हैं, जब वे अश्व की तरह निर्धारित स्थान में जाती है।[ऋग्वेद 4.6.10]
हे अग्नि देव! तुम्हारी किरणें शत्रुओं को वश में करने में सक्षम हैं। वे गमनशील दमकती हुई और अर्चना के लायक रश्मियाँ मरुतों के समान विविध नाद करने वाली है तथा वे अश्वों के समान गंतव्य तुम्हारे लिए ही हमने किया है।
Hey Agni Dev! Your rays are capable of enchanting the enemy, fast moving, revered, sounds like the Marud Gan & move to their destination like the horses.
अकारि ब्रह्म समिधान तुभ्यं शंसात्युक्थं यजते व्यू धाः।
होतारमग्निं मनुषो नि षेदुर्नमस्यन्त उशिजः शंसमायोः
हे समिद्ध अग्नि देव! आपके लिए हम लोगों ने स्तोत्र रचित किए हैं। होता उक्थ (शस्त्र रूप स्तोत्र) का उच्चारण करते हैं। यजमान आपका यजन करते हैं। इसलिए आप हम लोगों को धन प्रदान करें। मनुष्यों के प्रशंसनीय होता अग्नि देव की पूजा करने के लिए ऋत्विक आदि पशु आदि व धन की कामना से उपविष्ट हुए हैं।[ऋग्वेद 4.6.11]
वे देदीप्यमान अग्नि देव! यह श्रेष्ठ श्लोक तुम्हारे लिए ही हमने किया है। तुम्हारे लिए ही विद्वान मनुष्य महान वचनों का उच्चारण करते हैं। यजमान द्वारा तुम्हारा अनुष्ठान करते हैं। इसलिए तुम हमकों धन ऐश्वर्य प्रदान करो। पुरुषों के होता अग्नि देव की उपासना करने के लिए तथा पशु आदि धनों की इच्छा के संग ऋत्विक आदि विद्वान यहाँ विराजे हैं।
Hey radiant Agni Dev! We have composed this hymn-Strotr in your honour. The Ritviz-host worship-pray you, for wealth and comforts. The Ritviz have gathered here with the desire to have cattle and riches.(01.02.2023)
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (7) :: ऋषि :- वामदेव गौतम, देवता :-अग्नि छन्द :- त्रिष्टुप,जगती, अनुष्टुप्
अयमिह प्रथमो धायि धातृभिर्होता यजिष्ठो अध्वरेष्वीड्यः।
यमन्पवानो भृगवो विरुरुचुर्वनेषु चित्रं विभ्वं विशेविशे
न्पवान् आदि भृगुवंशीयों ने वन के बीच में दावाग्नि रूप से दर्शनीय एवम् समस्त लोक के ईश्वर अग्नि देव को प्रदीप्त किया। वे होता, याज्ञिक श्रेष्ठ, स्तुति भाजन और देव श्रेष्ठ अग्नि यज्ञकारियों द्वारा संस्थापित हुए।[ऋग्वेद 4.7.1]
दावाग्नि :: वन या जंगल में स्वतः लगने वाली आग, दावानल; forest fire which evolve by itself.
यह अग्नि देव सभी में महान, सभी के आदि में वर्तमान, सर्व सुखों के दाता पूजनीय तथा समस्त यज्ञों में वंदना करने के समान हैं। इन्हें आदि काल में भृगुओं ने ज्योर्तिमान किया था। अग्नि याज्ञिकों में महान, तेजस्वी एवं पाप नाशक हैं। इन परमेश्वर अग्नि को हवन करने वाले विद्वान विद्यमान करते हैं।
The Bhragus Anpvan, etc. visualised-saw Dawagni in the forest and evolved-ignited Agni as the God of all abodes. Agni Dev, best amongest the demigods-deities was established by the Yagy doers-performers being the host-Hota, best as a Yagyik (performer of Yagy) and worship-prayers deserving.
अग्ने कदा त आनुषग्भुवद्देवस्य चेतनम्।
अधा हि त्वा जगृभिरे मर्तासो विक्ष्वीड्यम्
हे अग्नि देव! आप दीप्तिमान् और मनुष्यों द्वारा स्तुति योग्य है। आपकी दीप्ति कब प्रसृत होगी? मर्त्य लोग आपको ग्रहण करते हैं।[ऋग्वेद 4.7.2]
हे अग्ने! तुम प्राणियों के द्वारा पूजने योग्य हो, तुम अत्यन्त दीप्तिवान हो। तुम्हारा प्रकाश कब अनुकूल होगा?
Hey Agni Dev! You are radiant and deserve worship by the humans. The immortals avail you.
ऋतावानं विचेतसं पश्यन्तो द्यामिव स्तृभिः। 
विश्वेषामध्वराणां हस्कर्तारं दमेदमे
माया रहित, विज्ञ, नक्षत्र परिवृत स्वर्ग की तरह और समस्त यज्ञ के वृद्धि कारक अग्नि देव के दर्शन करके ऋत्विक् आदि प्रत्येक यज्ञ गृह में उनको ग्रहण करते हैं।[ऋग्वेद 4.7.3]
वे अग्नि देव अनेक ज्ञानों से युक्त, माया से परे, नक्षत्रों से युक्त आकाश के समान सभी यज्ञों को सम्पन्न करने वाले हैं। दर्शनीय अग्नि को ऋत्विक आदि मेधावी जन प्रत्येक अनुष्ठान स्थान में विद्यमान करते हैं।
The Ritviz accept Agni Dev, contemplating him in every dwelling, truthful intelligent, brilliant with sparks like the sky with stars, the perfecter of all sacrifices.
The Ritviz establish Agni Dev, the promoter of the Yagy, free from cast-spell, enlightened, pervading the constellations like the heavens, in the Yagy house.
शुं दूतं विवस्वतो विश्वा यश्चर्षणीरभि।
आ जभ्रुः केतुमायवो भृगवाणं विशेविशे
जो अग्नि देव प्रजाओं को अभिभूत करते हैं, उन्हीं शीघ्रगामी याजकगण के दूत, केतु स्वरूप और दीप्तिमान् अग्नि देव का आनयन समस्त प्रजाओं के लिए मनुष्य गण करते हैं।[ऋग्वेद 4.7.4]
अभिभूत :: पराजित किया हुआ, पीड़ित; overwhelmed, surrendered, overcome.
जो अग्नि देव प्रजाओं के सुख के लिए अपना तेजोप्रद ज्योति प्रदान करते हैं, वे शीघ्रतम विचरण शील, यजमान के दूत-सन्देश वाहक स्वरूप एवं ज्ञान की रोशनी से परिपूर्ण हैं। अग्नि देव का प्रकट होना प्रत्येक प्रजाजन के लिए मंगलकारी होगा।
Agni Dev who cast a spell over the populace, grant radiance-light, possessor enlightenment, is fast moving, is the ambassador of the hosts & is like Ketu-dragon tail. Evolution of Agni Dev is favourable- beneficial to the populace.
तमीं होतारमानुषक्चिकित्वांसं नि षेदिरे।
रण्वं पावकशोचिषं यजिष्ठं सप्त धामभिः
उन होता और विद्वानों ने अग्नि देव को अध्वर्यु आदि मनुष्यों ने यथा स्थान पर उपविष्ट कराया है। वे रमणीय, पवित्र दीप्ति विशिष्ट, याज्ञिक श्रेष्ठ और सप्त-तेजो युक्त हैं।[ऋग्वेद 4.7.5]
उन होता रूप अग्नि को अध्वर्यु आदि ने उचित स्थान पर प्रतिष्ठित किया है। वे तेजस्वी तथा शुद्ध करने वाली प्रदीप्ति से युक्त हैं। वे अत्यन्त दानशील तथा सभी के मित्र रूप हैं। वे सात तेजों से युक्त अनुकूल होकर यज्ञ स्थान में निर्वाह करें।
The Hota & the learned-scholars, priests evolved Agni Dev, established him at his proper place. He is aurous, attractive, pious, excellent-best amongest the Yagyik and the possessor of 7 types of energy (rays).
तं शश्वतीषु मातृषु वन आ वीतमश्रितम्।
चित्रं सन्तं गुहा हितं सुवेदं कूचिदर्थिनम्
मातृ स्वरूप जल समूह में और वृक्ष समूह में विद्यमान, कमनीय, दाह भय से प्राणियों द्वारा असेवित, विचित्र गुफा में निहित, सुविज्ञ और सभी जगह हव्य ग्राही उन अग्नि देव को अध्वर्यु आदि मनुष्यों ने उपविष्ट कराया है।[ऋग्वेद 4.7.6]
उपविष्ट ::  जमकर बैठा हुआ; contained.
विचित्र :: अजीब, अनोखा, चितला, बहुरंगा, रंग-बिरंगा, विलक्षण; weird, bizarre, quaint, pied.
मातृभूत जलों में तथा वृक्षों में युक्त जलने के भय से अनेकों प्राणधारियों द्वारा असेवित गुहा में अवस्थित, दिव्य मेधावी और सब जगह हव्य सामग्री को प्राप्त करने वाले अग्नि देव की पुरुषों ने आराधना की है।
Humans-priests worshiped-prayed attractive Agni Dev, who is present in water, wood, feared by the humans due to its burning nature, present is weird-bizarre, caves, is well informed-enlightened & accepts offerings every where.
ससस्य यद्वियुता सस्मिन्नूधव्रतस्य धामन्रणयन्त देवाः।
महाँ अग्निर्नमसा रातहव्यो वेरध्वराय सदमिदृतावा
देवगण निद्रा से विमुक्त होकर अर्थात् उषाकाल में जल के स्थान स्वरूप सम्पूर्ण यज्ञ में जिन अग्नि देव को प्रार्थना आदि के द्वारा प्रसन्न करते हैं, वे महान एवं सत्यवान अग्नि देव नमस्वरपूर्वक दत्त हव्य को ग्रहण करके सदैव याजक गण कृत यज्ञ को अवगत करें, जानें।[ऋग्वेद 4.7.7]
देव निद्रा को छोड़कर उषा काल में जिस अग्नि को यज्ञ स्थल में वंदनाओं द्वारा हर्षित करते हैं। सत्य से युक्त श्रेष्ठ अग्नि देव प्रणामपूर्वक दिए हव्य को ग्रहण करते हुए यजमान द्वारा किये गये यज्ञ को जानते रहें।
The demigods-deities free from sleep, pleased through worship-prayers notice the Yagy site, at dawn-morning Usha Kal, meets-accepts Agni Dev, who is great & truthful by saluting him accepts & offerings.
वेरध्वरस्य दूत्यानि विद्वानुभे अन्ता रोदसी संचिकित्वान्।
दूत ईयसे प्रदिव उराणो विदुष्टरो दिव आरोधनानि
हे अग्नि देव! आप विद्वान् है। आप यज्ञ के दूत कार्य को जानते है। इन दोनों द्यावा-पृथ्वी के मध्य में अवस्थित अन्तरिक्ष को आप भली-भाँति जानते है। आप पुरातन है। आप अल्प व्य को बहुत कर देते है। आप विद्वान्, श्रेष्ठ और देवों के दूत है। आप देवताओं को हवि देने के लिए स्वर्ग के आरोहण योग्य स्थान में जाते हैं।[ऋग्वेद 4.7.8]
हे अग्नि देव! तुम ज्ञानवान हो यज्ञों में, दौत्य कर्म करते हो। तुम इन जनों और धरती गगन के मध्य अवस्थित हुए अंतरिक्ष को सही ढंग से जानते हो। हे अग्नि देव! तुम प्राचीन हो। अतः अनुष्ठान को भी बढ़कर अत्यधिक कर देते हो। तुम अत्यन्त मेधावी हो। महान एवं देवों के सन्देशवाहक हो। तुम देवों के लिए हवि पहुँचाने के लिए स्वर्ग के उच्चतम स्थान को भी ग्रहण होओ।
अनुष्ठान :: संस्कार, धार्मिक क्रिया (उत्सव, संस्कार), पद्धति, शास्रविधि, आचार, आतिथ्य सत्कार, समारोह, विधि, रसम; ritual, rite, ceremony.
Hey enlightened Agni Dev! You function as an ambassador in the Yagy. You are aware of the space-sky between the heavens & the earth. You are immortal-ancient, for ever. You enhance-boosts the scope of the rituals. You are excellent conveyor, learned, intelligent-prudent, carries the offerings to the demigods-deities, attaining highest place-position in the heavens.
कृष्णं त एम रुशतः पुरो भाश्चरिष्णव १ र्चिर्वपुषामिदेकम्।
यदप्रवीता दधते ह गर्भं सद्यश्चिज्जातो भवसीदु दूतः
हे अग्नि देव! आप दीप्तिमान् है। आपका गमन मार्ग कृष्ण वर्ण है। आपकी दीप्ति पुरोवर्तिनी है। आपका सञ्चरणशील तेज सम्पूर्ण तैजस पदार्थों के बीच में श्रेष्ठ है। आपको न पाकर याजकगण लोग आपकी उत्पत्ति के कारण स्वरूप काष्ठ को धारित करते हैं। आप उत्पन्न होकर तत्काल ही याजकगण के दूत होते है।[ऋग्वेद 4.7.9]
पुरोवर्तिनी :: पहले रहने वाला, पहले होने वाला; predecessor, preceding, antecedents.
हे अग्निदेव! तुम प्रकाश से युक्त हो। तुम्हारा चलने का रास्ता काले रंग का है। तुम्हारी कांति आगे से दिखाई देती है। तुम्हारा तेज सभी तेजोमय पदार्थों में उत्तम है। तुम्हारी प्राप्ति के लिए तुम्हारे उत्पत्ति कारण लकड़ी को स्वीकार किया जाता है और तुम उत्पन्न होते ही यजमान के दूत बन जाते हो। 
Hey Agni Dev! You are radiant-aurous. Your path is dark-black. Your brilliance is ever since. You are best amongest the dynamic-movable. In your absence the worshiper ignite woods. You immediately evolve and act as their ambassador.
सद्यो जातस्य ददृशानमोजो यदस्य वातो अनुवाति शोचिः।
वृणक्ति तिग्मामतसेषु जिह्वां स्थिरा चिदन्ना दयते वि जम्भैः
तृषु यदन्ना तृषुणा ववक्ष तृषु दूतं कृणुते यह्वो अग्निः।
वातस्य मेळिं सचते निजूर्वन्नाशुं न वाजयते हिन्वे अर्वा
अग्नि देव क्षिप्रगामी रश्मि समूह द्वारा अन्न रूप काष्ठ आदि को शीघ्र दग्ध करते हैं। वे काष्ठ समूह को विशेष रूप से दग्ध करके वायु के बल के साथ सङ्गत होते हैं। घुड़सवार जिस प्रकार से अश्व को बलवान् करता है, उसी प्रकार गमन शील अग्नि देव अपनी रश्मि को बलवान करते हुए प्रेरित करते हैं।[ऋग्वेद 4.7.10-11]
अग्निदेव क्षिप्रगामी रश्मिसमूह द्वारा अन्नरूप काष्ठ आदि को शीघ्र दग्ध करते हैं। महान् अग्निदेव अपने को क्षिप्रगामी दूत बनाते हैं। अरणियों को मथने के पश्चात रचित होने वाले अग्नि के तेज को ऋत्विज आदि ही देखते हैं। जब अग्नि की शाखा रूपी लपटों के लक्ष्य पर पवन प्रवाहमान होती है तब अग्नि देव अपनी तीव्र लपटों से वृक्षों के संगठन में विद्यमान कर देते हैं तथा अन्न रूपी काष्ठ आदि को अपने तेज से भक्षण कर जाते हैं। 
अग्नि देव शीघ्रगामी रश्मियों के माध्यम से अन्न आदि काष्ठ को शीघ्र ही जला देते है। अग्नि देव सबमें श्रेष्ठ हैं। वे शीघ्र गमन करने वाले दूत बन जाते हैं। वे लकड़ियों को जलाकर पवन के सहित मिल जाते हैं जैसे अश्वारोही अपने अश्व को पुष्ट करते हैं और प्रेरणा प्रदान करते हैं।
Agni Dev burn the wood with his destructive rays. He acts as a fast moving ambassador. The Ritviz watch the glow after rubbing wood. When the flames of fire accompany air, Agni Dev assimilate his flames in the trees and eat-consume the food grains.(02.02.2023)
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (8) :: ऋषि :- वामदेव गौतम, देवता :-अग्नि छन्द :- गायत्री
दूतं वो विश्ववेदसं हव्यवाहममर्त्यम्। यजिष्ठमृञ्जसे गिरा
हे अग्नि देव! आप सम्पूर्ण धन के स्वामी, देवताओं को हव्य पहुँचाने वाले, मरण धर्म रहित, अतिशय यजनशील और देवदूत हैं। हम स्तुति द्वारा आपको वर्द्धित करते हैं।[ऋग्वेद 4.8.1]
हे अग्नि देव! तुम सभी धनों के स्वामी, देवता को हवि पहुँचाने वाले, अविनाशी, अत्यन्त अनुष्ठान करने वाले एवं देवों के लिए दौत्यकर्म करने वाले हो। तुम अग्नि देव को हम साधारण वंदनाओं द्वारा वृद्धि करते हैं।
Hey Agni Dev! You are the master of entire wealth, carrier of offerings to demigods-deities & their messenger, immortal, best performer of  Yagy. We make prayers for your well being-promotion.
स हि वेदा वसुधितिं महाँ आरोधनं दिवः। स देवाँ एह वक्षति
अग्नि देव याजक गणों के अभीष्ट फल साधक धन के दान को जानते हैं। वे महान् हैं। वे दिव्य लोक के आरोहण स्थान को जानते हैं। वे इन्द्रादि देवताओं का हमारे इस यज्ञ में आवाहन करें।[ऋग्वेद 4.8.2]
आरोहण :: चढ़ना, सवार होना, नृत्य, अभिनय आदि के लिए बना हुआ मंच, अँखुआ फूटना; climb, ascent, ascension, embarkation, mounting.
अग्निदेव श्रेष्ठ हैं। वे यजमानों की मनोकामना सिद्ध करने वाली अग्नि ज्योर्तिवान हैं। वे इन्द्रादि देवों को नमस्कार करने के कर्मों के भी ज्ञाता हैं। वे अग्नि देवों को हमारे अनुष्ठान में पुकारें।
Agni Dev is great, accomplishes the desire for wealth of the devotees, to help them make donations. He is aware of the ascent of the heavens. Let him invite Indr Dev along with the demigods-deities in out Yagy.
स वेद देव आनमं देवाँ ऋतायते दमे। दाति प्रियाणि चिद्वसु
वे द्युतिमान् हैं। इन्द्रादि देवताओं को याजक गणों द्वारा क्रम पूर्वक नमस्कार करना जानते हैं। वे यज्ञ गृह में यज्ञाभिलाषी याजक गण को अभीष्ट ऐश्वर्य प्रदान करते हैं।[ऋग्वेद 4.8.3]
वे अग्नि प्रकाशवान हैं। वे इन्द्रादि देवताओं को नमस्कार करने के क्रम के ज्ञाता हैं। वे यज्ञ की कामना करने वाले यजमान को यज्ञ स्थान में अभीष्ट धन प्रदान करते हैं।
He is radiant. He is aware of the sequence of praying-saluting the demigods-deities. He grant desired grandeur-wealth to those who wish to conduct Yagy.
स होता सेदु दूत्यं चिकित्वाँ अन्तरीयते। विद्वाँ आरोधनं दिवः
अग्नि देव होता हैं। वे दूत कर्म को जान करके और स्वर्ग के आरोहण योग्य स्थान को जान करके द्यावा-पृथ्वी के बीच में गमन करते हैं।[ऋग्वेद 4.8.4]
दौत्य कर्म के ज्ञाता अग्निदेव होता रूप हैं। स्वर्गारोहण योग्य स्थल को जानने वाले हैं एवं अम्बर और धराके मध्य विचरण करते हैं।
Agni Dev is the Hota-initiator, organiser of the Yagy. He stations-establishes himself between the heavens & the earth, identifying the place for ascent, having understood the procedures-methodology of rituals, Hawan, Agni Hotr &  the Yagy.
ते स्याम ये अग्नये ददाशुर्हव्यदातिभिः। य ईं पुष्यन्त इन्धते
जो हव्य दान देकर अग्नि देव को प्रसन्न करता है, जो उन्हें वर्द्धित करता है और जो याजक गण उन्हें काष्ठ द्वारा प्रदीप्त करता है, उसी यजमान के सदृश हम भी आचरण करें।[ऋग्वेद 4.8.5]
जो यजमान, उन्हें काष्ठ के द्वारा प्रज्वलित करता है, उन्हें हव्य द्वारा वृद्धि करता हुआ हर्षित करता है, हम भी उस यजमान के समान कार्य करते हुए अग्नि को हर्षित करें। यजमान अग्नि की पूजन आदि परिचर्या करते हैं।
We should also behave-act like one, who provide offerings, Samidha-wood, to enhance-promote him. 
ते राया ते सुवीर्यैः ससवांसो वि शृण्विरे। ये अग्ना दधिरे दुवः
जो याजक गण अग्नि देव की परिचर्या करते हैं, वे अग्नि देव का सम्भजन करके धन द्वारा विख्यात होते हैं और पुत्र-पौत्र आदि के द्वारा भी विख्यात होते हैं।[ऋग्वेद 4.8.6]
धन से परिपूर्ण होते हुए अनेक ऐश्वर्य को भोगते हुए, अन्न आदि सुख से पूर्ण होते हैं।
Those hosts, Ritviz, priests who pray, worship, serve Agni Dev acquire grandeur-wealth, enjoy it and have sons & grandsons.
अस्मे रायो दिवेदिवे सं चरन्तु पुरुस्पृहः। अस्मे वाजास ईरताम्
ऋत्विक आदि के द्वारा अभिलषित धन हम यजमानों के पास प्रतिदिन आगमन करें। अन्न हम लोगों को यज्ञ कार्य में प्रेरित करें।[ऋग्वेद 4.8.7]
ऋत्विक आदि द्वारा अभिलाषित किया धन प्रतिदिन हमारे समीप आएँ और उसके द्वारा हमको अनेक ज्ञान विज्ञान तथा बल आदि प्राप्त हों।
Let the riches pour to us-the Ritviz, everyday. Let the money inspire us to attain enlightenment, knowledge and strength.
स विप्रश्चर्षणीनां शवसा मानुषाणाम्। अति क्षिप्रेव विध्यति 
हे अग्नि देव! आप मेधावी हैं। बल द्वारा मनुष्यों के विनाश योग्य पाप को विशेष रूप से विनष्ट करें।[ऋग्वेद 4.8.8]
वे अग्नि देव महान विद्वान हैं। वे मनुष्यों के कष्ठों को गति से चलने वाले बाणों के तुल्य अपनी शक्ति से प्रहार करके समाप्त कर डालें।
Hey enlightened Agni Dev! Remove-destroy the sins of the humans-devotees with your intelligence.(03.02.2023)
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (9) :: ऋषि :- वामदेव गौतम, देवता :-अग्नि छन्द :- गायत्री
अग्ने मृळ महाँ असि य ईमा देवयुं जनम्। इयेथ बर्हिरासदम्
हे अग्निदेव! आप हम लोगों को सुखी बनावें। आप महान् है। आप देवों की कामना करने वाले हैं। आप याजकगण के निकट कुश पर बैठने के लिए आगमन करते हैं।[ऋग्वेद 4.9.1]
हे अग्नि देव! हमको सुख प्रदान करो। तुम देवताओं की कामना करने वाले एवं श्रेष्ठ हो। तुम यजमान के निकट कुश पर विराजमान होने की कामना से आते हो।
Hey Agni Dev! Make us blissful-happy. You are great. You come to acquire the Kush Mat by the side of the devotee.
समानुषीषु दूळभो विक्षु प्रावीरमर्त्यः। दूतो विश्वेषां भुवत्
राक्षसों आदि द्वारा अहिंसनीय अग्नि देव मनुष्य लोक में प्रकर्ष रूप से गमन करते हैं। वे मृत्यु विवर्जित हैं। वे समस्त देवों के दूत हैं।[ऋग्वेद 4.9.2]
राक्षस आदि दुष्टों द्वारा भी जिनकी हिंसा नहीं हो सकती, जो मृत्यु जगत में स्वच्छन्द भ्रमण करने में समर्थवान हैं, वे अग्नि देव अविनाशी हैं। वे समस्त देवों के सन्देश वाहक हैं।
Immortal Agni Dev can not be killed by the demons. He is capable of moving over the earth freely. He is the messenger of the demigods-deities.
स सद्म परि णीयते होता मन्द्रो दिविष्टिषु। उत पोता नि षीदति
यज्ञ घर में ऋत्विक आदि के द्वारा नीयमान होकर अग्नि देव यज्ञों में स्तुति योग्य होते हैं। अथवा होता होकर यज्ञ गृह में प्रवेश करते हैं।[ऋग्वेद 4.9.3]
ऋत्विक गण आदि के यज्ञ भवन में लाए जाकर अग्नि देव वंदना के पात्र होते हैं या वे स्तुति द्वारा यज्ञ स्थान में आते हैं।
Established in the house of the Ritviz, Agni Dev is honoured-prayed, worshiped, on being requested.
उत ग्ना अग्निरध्वर उतो गृहपतिर्दमे। उत ब्रह्मा नि षीदति
यज्ञ में अग्नि देव देव पत्नी या अध्वर्यु होते हैं। अथवा यज्ञगृह में वे गृहपति होते हैं। ब्रह्मा नामक ऋत्विक होकर उपवेशन करते हैं।[ऋग्वेद 4.9.4]
वे अग्नि देव अध्वर्यु तथा देव पत्नी रूप होते हैं अथवा यज्ञ भवन में बृहस्पति रूप से प्रतिष्ठित होते हैं। अथवा यज्ञ में ब्रह्मा रूप से विराजमान होते हैं।
Agni Dev may be the officiating priest at the sacrifice or the master of the house in the sacrificial chamber or he sits down as the Brahman.
Agni Dev is either Goddess or priest in the Yagy. He is like Dev Guru Brahaspati or Brahma  Ji in the Yagy house. 
वेषि ह्यध्वरीयतामुपवक्ता जनानाम्। हव्या च मानुषाणाम्
हे अग्नि देव! आप यज्ञाभिलाषी मनुष्यों के लिए हव्य की कामना करते हैं। आप अध्वर्यु आदि के सम्पूर्ण कर्मों को जानने वाले ब्रह्मा हैं। आप यज्ञ कर्मों के अविकल उपद्रष्टा या सदस्य हैं।[ऋग्वेद 4.9.5]
हे अग्नि देव! तुम अनुष्ठान की इच्छा करने वाले मनुष्यों की हवियों की इच्छा करते हो। तुम अध्वर्यु आदि के कार्यों के ज्ञाता ब्रह्मा रूप हो। तुम अनुष्ठान कार्यों के उपदेष्टा स्वरूप हो।
Hey Agni Dev! You are desirous of offerings from those who wish to perform Yagy. You are like Brahma Ji aware of the duties of the priests. You are like the preceptor of the rituals, Yagy.
वेषीद्वस्य १ दूत्यं यस्य जुजोषो अध्वरम्। हव्यं मर्तस्य वोळ्हवे
हे अग्नि देव! आप हव्य वहन करने के लिए जिस याजक गण के यज्ञ की सेवा करते हैं, उसके दूत कार्य की भी आप कामना करते हैं।[ऋग्वेद 4.9.6]
हे अग्ने! तुम हवियों को वहन करने के लिए जिस यजमान के अनुष्ठान को सेवन करते हो उस यजमान के अनुष्ठान में दौत्य कर्म करने के लिए भी तुम अभिलाषा करते हो।
Hey Agni Dev! You serve as a messenger and acceptor of the offerings of the Ritviz.
अस्माकं जोष्यध्वरमस्माकं यज्ञमङ्गिरः। अस्माकं शृणुधी हवम्
हे अग्नि देव! आप हमारे यज्ञ की सेवा करें, हमारे हव्य का सेवन करें और हमारे आह्वान कारक स्तोत्र को भी श्रवण करें।[ऋग्वेद 4.9.7]
हे तेजस्वी! तुम हमारे यज्ञ का सेवन करो। हमारे हव्य को स्वीकार करो और आह्वान करने वाले हमारे श्लोक को श्रवण करने का अनुग्रह करो।
Hey Agni Dev! Take care of our Yagy, accept our offerings and the Strotr inviting you.
परि ते दूळभो रथोऽस्माँ अश्नोतु विश्वतः। येन रक्षसि दाशुषः
हे अग्नि देव! आप जिस रथ द्वारा समस्त दिशाओं में गमन करके हवि देने वाले याजक गणों की रक्षा करते हैं, आपका वही अहिंसनीय रथ हम याजकगणों के चारों ओर व्याप्त हो।[ऋग्वेद 4.9.8]
हे अग्नि देव! तुम अपने जिस रथ पर चढ़कर सभी दिशाओं में गमन करते हुए हव्यदाता यजमान के रक्षक हो, तुम्हारा वह रथ हमारी हिंसा से रक्षा करे। 
Hey Agni Dev! Your charoite in which you move all around, accepting offerings & protecting the hosts-Ritviz should shield-pervade around the hosts-Ritviz.(04.02.2023)
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (10) :: ऋषि :- वामदेव गौतम, देवता :-अग्नि छन्द :- पदपंक्ति, महापदपंक्ति, उष्णिक्। 
अग्ने तमद्याश्वं न स्तोमैः क्रतुं न भद्रं हृदिस्पृशम्। ऋध्यामा त ओहैः
हे अग्नि देव! आज हम ऋत्विक गण, इन्द्रादि प्रापक स्तुति द्वारा आपको वर्द्धित करते हैं। अश्व जिस प्रकार से सवार का वहन करता है, उसी प्रकार आप हव्य वाहक है। आप यज्ञकर्ता के सदृश उपकारक है। आप भजनीय हैं और अतिशय प्रिय हैं।[ऋग्वेद 4.10.1]
हे अग्नि देव! हम ऋत्विग्गण वंदना द्वारा तुमको बढ़ाते हैं। जैसे अश्व सवार को चढ़ाता है, वैसे ही तुम हवियों को वहन करते हो। तुम यज्ञ करने वाले उपकार करते हो, तुम यजन करने योग्य तथा अत्यन्त प्रिय एवं सुखकारी हो।
Hey Agni Dev! We the Ritviz-hosts, priest worship you. The way the horse carries a man over his back, you carry the offerings to demigods-deities. You are as good-beneficial as the Yagy. You deserve worship.
अधा ह्यग्ने क्रतोर्भद्रस्य दक्षस्य साधोः। रथीर्ऋतस्य बृहतो बभूथ 
हे अग्नि देव! आप इसी समय हमारे भजनीय, प्रवृद्ध, अभीष्ट फल साधक, सत्य भूत और महान यज्ञ के नेता है।[ऋग्वेद 4.10.2]
प्रवृद्ध :: अतिशय वृद्धि को प्राप्त, प्रौढ़, तलवार के 32 हाथों में से एक जिसे प्रसृत भी कहते हैं, इनमें तलवार की नोक से शत्रु का शरीर छू भर जाता है, अयोध्या के राजा रघु का एक पुत्र जो गुरु के शाप से 12 वर्ष के लिये राक्षस हो गया था, वृद्धि युक्त, खूब बढ़ा हुआ, खूब पक्का, विस्तृत, खूब फैला हुआ, विशाल, उग्र, घमंडी, गर्विष्ठ (को कहते हैं); grown up, mature, grown tremendously, aged.
हे अग्नि देव! तुम हमारे यजन के योग्य हो। तुम बढ़ोत्तरी हुए अभीष्ट फल को सिद्ध करने वाले, सत्य के आधारभूत एवं श्रेष्ठ हो तथा रथी के तुल्य नेतृत्व करने वाले हो।
Hey Agni Dev! You deserve worship-prayers, grants-accomplish desires.  You are truthful, vast, grown up & mature leader.  
एभिर्नो अर्कैर्भवा नो अर्वाङ् १ स्वर्ण ज्योतिः।
अग्ने विश्वेभिः सुमना अनीकैः
हे अग्नि देव! आप ज्योतिर्मान सूर्य के तुल्य समस्त तेज से युक्त और शोभन अन्त:करण वाले हैं। आप हम लोगों के अर्चनीय स्तोत्र द्वारा नीत होवें और हम लोगों के अभिमुख आगमन करें।[ऋग्वेद 4.10.3]
हे अग्नि देव! तुम प्रकाश से परिपूर्ण, सूर्य के समान तेज से परिपूर्ण एवं उत्तम अंतःकरण करने वाले हो। तुम हमारे द्वारा उत्तम चित्त होकर हमारे सम्मुख आ जाओ।
Hey Agni Dev! You possess brightness-radiance, aura like the Sun possessing pure, virtuous heart, innerself (mind, heart & soul). Come to us and be worshiped-honoured with appreciable-best Strotr.
आभिष्टे अद्य गीर्भिर्गृणन्तोऽग्ने दाशेम। प्र ते दिवो न स्तनयन्ति शुष्माः
हे अग्नि देव! आज हम ऋत्विक वचनों द्वारा प्रार्थना करके आपको हव्य प्रदान करेंगे। सूर्य की रश्मि के तुल्य आपकी शोधक ज्वाला शब्द करती है अथवा मेघ के तुल्य आपकी ज्वाला शब्द करती है।[ऋग्वेद 4.10.4]
हे अग्नि देव! हम आज वाणी द्वारा स्तुति करके तुम्हारे लिए हव्य प्रदान करेंगे। सूर्य रश्मि के समान तुम्हारी शुद्ध करने वाली ज्वाला है। तथा मेघ के समान गर्जनशील है।
Hey Agni Dev! We the Ritviz-hosts make offerings to you associated with prayers. What is the nature of your flames generating purifying sound like the rays of Sun or they-flames sound like the clouds?
तव स्वादिष्ठाग्ने संदृष्टिरिदा चिदह्न इदा चिदक्तोः।
श्रिये रुक्मो न रोचत उपाके
हे अग्नि देव! आपकी प्रियतम दीप्ति अहर्निश अलङ्कार के तुल्य पदार्थों को आश्रयित करने के लिए उनके समीप शोभा पाती है।[ऋग्वेद 4.10.5]
अहर्निश :: निरन्तर, दिन-रात; photeolic, round the clock.
हे अग्नि देव! तुम्हारी परम प्रिय ज्योति अलंकार के समान पदार्थों को भूषित करने के लिए उनके निकट दिन-रात सुशोभित होती है।
Hey Agni Dev! Your round the clock glare is present with the matter-material like an ornament.
घृतं न पूतं तनूररेपाः शुचि हिरण्यम्। तत्ते रुक्मो न रोचत स्वधावः
हे अन्न वान अग्नि देव! आपकी मूर्ति शोधित घृत के तुल्य पाप रहित है। आपका पवित्र एवं रमणीय तेज अलङ्कार के तुल्य दीप्त होता है।[ऋग्वेद 4.10.6]
हे अग्नि देव! तुम अन्न से परिपूर्ण हो। तुम्हारा स्वरूप पवित्र घृत के समान पाप से शून्य है। तुम्हारा शुद्ध एवं पवित्र तेज आभूषण के समान ज्योर्तिवान हैं।
Hey Agni Dev! You possess food grains. Your figure is like the purified butter-Ghee. You are pious, attractive, beautiful & your aura is comparable to ornaments-jewels.
कृतं चिद्धि ष्मा सनेमि द्वेषोऽग्न इनोषि मर्तात्। इत्था याजकगणादृतावः
हे सत्यवान अग्नि देव! आप याजकगणों द्वारा निर्मित हैं; तथापि चिरन्तन हैं। आप याजक गणों के पाप को निश्चय ही दूर कर देते हैं।[ऋग्वेद 4.10.7]
हे सत्य से परिपूर्ण अग्ने! तुम लगातार होते हुए भी यजमानों द्वारा उत्पन्न होते हो। तुम यजमानों के पाप को दूर करने में अवश्य ही सक्षम हो।
Hey truthful Agni Dev! You are evolved by the desirous, worshipers. You certainly remove-destroy the sins of he devotees.
शिवा नः सख्या सन्तु भ्रात्राग्ने देवेषु युष्मे।
सा नो नाभिः सदने सस्मिन्नूधन्
हे अग्नि देव! आप द्युतिमान् है। आपके प्रति जो हम लोगों का मित्र और भ्रातृभाव है, वह मङ्गल जनक है। वह मित्र भाव और भ्रातृ कार्य देवों के स्थान में और सम्पूर्ण यज्ञ में हम लोगों का नाभिबन्धन हो।[ऋग्वेद 4.10.8]
हे अग्नि देव! तुम प्रकाशवान हो। तुम्हारे प्रति हमारा जो बंधु और मैत्री भाव है, वह मंगलकारी हो। यह मैत्रीभाव एवं भ्रातृत्व संपूर्ण यज्ञ में हमारे कल्याण स्वरूप हो।
Hey Agni Dev! You are radiant. Your feeling-affection for us is like a friend ship & brotherhood. This friendly & brotherly relation should become bonding-tying for our welfare.(06.02.2023)
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (11) :: ऋषि :- वामदेव गौतम, देवता :- अग्नि छन्द :- त्रिष्टुप्।
भद्रं ते अग्ने सहसिन्ननीकमुपाक आ रोचते सूर्यस्य।
रुशदृशे ददृशे नक्तया चिदरूक्षितं दृश आ रूपे अन्नम्
हे बलवान अग्नि देव! आपका भजनीय तेज सूर्य के समीपभूत दिवस में चारों ओर दीप्तिमान् होता है। आपका सुन्दर और दर्शनीय तेज रात्रि में भी दिखाई देता है। आप रूपवान् हैं। आपके उद्देश्य से स्निग्ध और दर्शनीय अन्न बहुत होता है।[ऋग्वेद 4.11.1]
हे अग्नि देव! तुम अपने पराक्रम से युक्त हो। तुम्हारा पूजन योग्य तेज सूर्य के दैदीप्यमान तेज के समान है। तुम्हारा तेज सुंदर एवं दर्शनीय है, वह रात में छिपता नहीं है। तुम अत्यन्त रूप वाले हो। तुम्हारी प्रेरणा से घृत आदि से युक्त अन्न उत्पन्न होता है।
Hey mighty Agni Dev! Your worship serving radiance-aura is like that of the Sun spread all around. Your beautiful-attractive radiance is visible during the night as well. You are beautiful-handsome. The food grains grow by the inspiration from you, soaked with Ghee-possessing oil-fat.
वि षाह्यग्ने गृणते मनीषां खं वेपसा तुविजात स्तवानः।
विश्वेभिर्यद्वावनः शुक्र देवैस्तन्नो रास्व सुमहो भूरि मन्म
हे बहु जन्मा अग्नि देव! आप यज्ञकारियों द्वारा प्रार्थित होकर स्तुतिकारी याजकगण के लिए पुण्य लोक के द्वार को खोल दें। हे सुन्दर तेजोविशिष्ट अग्नि देव! देवों के साथ याजकगण को आप जो धन देते हैं, हमें भी वही प्रभूत और अभिलषित धन प्रदान करें।[ऋग्वेद 4.11.2]
हे अनेक जन्म वाले अग्नि देव! तुम अनुष्ठान करने वालों के द्वारा पूजित हुए वंदनाकारी यजमान के लिए पुण्यलोक का दरवाजा खोलो, तुम सुन्दर तेज से परिपूर्ण हो। देवों के संग तुम यजमान को जो धन प्रदान करते हो, हमको भी इच्छित धन को प्रदान करो।
Hey Agni Dev, reborn several times! On being worshiped-prayed you open the doors of the abodes meant for the virtuous, righteous, pious. Hey Agni Dev, possessing brilliance-aura! Grant us the riches you grant to the Ritviz, in association with the demigods-deities.
त्वदग्ने काव्या त्वन्मनीषास्त्वदुक्था जायन्ते राध्यानि।
त्वदेति द्रविणं वीरपेशा इत्थाधिये दाशुषे मर्त्याय
हे अग्नि देव! हविर्वहन और देवतानयन आदि अग्नि सम्बन्धी कार्य आपसे ही उत्पन्न हुए हैं, स्तुति रूप वचन आपसे ही उत्पन्न हुए हैं और आराधनयोग्य स्तोत्र आपसे ही उत्पन्न हुए हैं। सत्य कर्म और हव्यदाता याजकगण के लिए वीर्य युक्त रूप और धन भी आपसे ही उत्पन्न हुए हैं।[ऋग्वेद 4.11.3]
हे अग्नि देव! हवियों का वहन करना तथा देवताओं के आगमन संबंधी कार्य तुम्हारे द्वारा ही प्रकट हुए हैं। वंदना रूपिणी वाणी तुम्हारे द्वारा ही उत्पन्न हुई है।
Hey Agni Dev! The endeavours like carrying of offerings and invoking demigods-deities have evolved from you. Hymns pertaining to worship-prayers evolved from you. Truthful endeavours, wealth for the Ritviz making offerings, evolved from you, granting valour-might. 
त्वद्वाजी वाजंभरो विहाया अभिष्टिकृज्जायते सत्यशुष्मः।
त्वद्रयिर्देवजूतो मयोभुस्त्वदाश्रुर्जूजुवाँ अग्ने अर्वा
हे अग्नि देव! बलवान्, हव्य वाहक, महान् यज्ञकारी और सत्य बल विशिष्ट पुत्र आपसे ही उत्पन्न हुए हैं। देवों द्वारा प्रेरित सुखप्रद धन आपसे ही उत्पन्न होता है और शीघ्रगामी, गतिविशिष्ट और वेगवान् अश्व आपसे ही उत्पन्न हुए हैं।[ऋग्वेद 4.11.4]
हे अग्नि देव! बलशाली, हव्य वहन करने वाले, यज्ञ कार्यों के तपस्वी, महान और सत्य शक्ति से परिपूर्ण पुत्र तुम्हारे द्वारा ही प्रकट हुए हैं। देवताओं के द्वारा प्रेरित, कल्याणकारी, समृद्धि तुम्हारे द्वारा प्रकट होता है, विशेष चाल वाला, गतिवान, शीघ्रगामी छोड़ा भी तुम्हारे द्वारा ही रचित हुआ है।
Hey Agni Dev! Mighty, carriers of offerings, performers of Yagy and truthful sons have evolved from you. Inspired by the demigods-deities; the comforts, pleasures, bliss evolved from you. Fast running horses having specific speeds modes of running evolved from you.
त्वामग्ने प्रथमं देवयन्तो देवं मर्ता अमृत मन्द्रजिह्वम्।
द्वेषोयुतमा विवासन्ति धीभिर्दमूनसं गृहपतिममूरम्
हे अमर अग्नि देव! देवाभिलाषी मनुष्य स्तुति द्वारा आपकी परिचर्या करते हैं। आप देवों में आदि देव है। आप प्रकाशवान है। आपकी जिह्वा देवों को हर्षित करने वाली है। आप पापों को दूर करने वाले हैं और राक्षसों का संहार करने की इच्छा वाले हैं। आप गृहपति और प्रगल्भ हैं।[ऋग्वेद 4.11.5]
प्रगल्भ :: वाक्चातुर्य, प्रतिभा, मुखरता, प्रौढ़ता, निःशंकता, चतुर, होशियार, प्रतिभाशाली, संपन्न बुद्धिवाला, उत्साही, हिम्मती, साहसी, प्रायः बढ़-चढ़कर बोलने वाला, अधिक बोलने वाला, वाचाल, निडर, निर्भय, पुष्ट, प्रौढ़, उद्धत, जिसमें नम्रता न हो, हाज़िरजवाब, समय पर ठीक उत्तर देने वाला, प्रसिद्धि; intelligent, maturity, prudent, forward, magniloquent 
हे अग्नि देव! तुम अविनाशी हो। देवताओं की अभिलाषा करने वाले प्राणी स्तुतियों द्वारा तुम्हारी सेवा करते हैं। तुम देवताओं में आदि देवता हो। तुम दीप्तिमान हो। तुम्हारी जिह्वा देवगणों को शक्तिशाली करने वाली है। तुम पापों को दूर करते हो तथा असुरों का संहार करने की अभिलाषा करते हो।
Hey immortal Agni Dev! Living beings desirous of invoking demigods-deities worship-pray you. You are radiant. You words please the demigods-deities. You remove the sins and destroy the demons. You are intelligent-prudent household.
आरे अस्मदमतिमारे अंह आर विश्वां दुर्मतिं यन्निपासि।
दोषा शिवः सहसः सूनो अग्ने यं देव आ चित्सचसे स्वस्ति
हे बलपुत्र अग्नि देव! आप रात्रि काल में मङ्गलजनक और द्युतिमान होकर हमारे कल्याण के लिए सेवा करते हैं। जिस कारण आप याजकगणों का विशेष रूप से पालन करते हैं, आप हम लोगों के निकट से अमंगल को दूर करें। हम लोगों के निकट से पाप को दूर करें और हमारे निकट से समस्त दुर्मति को दूर करें।[ऋग्वेद 4.11.6]
कुबुद्धि :: दुर्मति, दुष्ट, बद, द्रोही, बदख़्वाह; bad sense, malevolent.
हे शक्ति रचित अग्नि देव! तुम रात्रि के समय मंगलकारी एवं ज्योर्तिवान होकर हमारे कल्याण के लिए जागरुक रहते हो। जिस कारणवश तुम यजमानों को पुष्ट करते हो, उसी से हमारे निकट रचित हुई बुद्धि हीनता को हटाओ। हमारे निकट से पाप को हटा दो। हमारे पास से कुबुद्धि को दूर करो।
Hey Agni Dev born out of might-power! You become beneficial and radiant for our welfare. Remove our idiocy by the same reason for which you nurture-nourish the Ritviz, hosts. Remove the sinners and malevolent-wicked away from us.(06.02.2023)
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (12) :: ऋषि :- वामदेव गौतम, देवता :- अग्नि छन्द :- त्रिष्टुप्।
यस्त्वामग्न इनधते यतस्रुक्त्रिस्ते अन्नं कृणवत्सस्मिन्नहन्।
स सु द्युम्नैरभ्यस्तु प्रसक्षत्तव क्रत्वा जातवेदश्चिकित्वान्
हे अग्नि देव! जो याजकगण स्रुक को संयत करके आपको प्रदीप्त करता है, जो व्यक्ति आपको प्रतिदिन तीनों सघनों में हविरूप अन्न देता है, हे जातवेदा! वह व्यक्ति आपके तृप्तिकर कार्य द्वारा आपके प्रसहमान (त्वदीय तेज अर्थात्‌ जीतने वाला) तेज को जानकर धन द्वारा शत्रुओं को पराभूत करता है।[ऋग्वेद 4.12.1]
हे अग्नि देव! स्त्रुक को दृढ़ कर जो यजमन तुमको दीप्तिमान करता है एवं जो तुम्हें नित्यप्रति तीनों सवनों में हविरूपी अन्न दान करता है वह तुम्हें संतुष्टि प्रदान करने वाले कार्य द्वारा तुम्हारे तेज का ज्ञान ग्रहण करके अपने शत्रुओं को विजय करता है।
One who who ignite you, balancing the Struk, offer you food grains, satisfies you, understand-acquires your knowledge; wins-over powers the enemies.
इध्मं यस्ते जभरच्छश्रमाणो महो अग्ने अनीकमा सपर्यन्।
स इधानः प्रति दोषामुषासं पुष्यन्रयिं सचते घ्नन्नमित्रान्
हे अग्नि देव! जो आपके लिए होम साधन समिधाएँ लाते हैं, हे महान अग्नि देव! जो व्यक्ति काष्ठ के अन्वेषण में श्रान्त होकर आपके तेज की परिचर्या करते हैं और रात्रि काल तथा दिवाकाल में जो आपको प्रदीप्त करते हैं, वह याजक गण प्रजा और पशुओं द्वारा पुष्ट होकर शत्रुओं को विनष्ट करते हुए धन प्राप्त करते हैं।[ऋग्वेद 4.12.2]
हे अग्नि देव! जो व्यक्ति तुम्हारे लिए यज्ञ साधक लकड़ी लाता है तथा जो व्यक्ति की तलाश थककर तुम्हारी अर्चना करता है एवं रात्रि और दिन में तुम्हें प्रज्वलित करता है, वह यजमान संतान और पशुओं से सम्पन्न होकर शत्रुओं का विनाश करता है और धन को प्राप्त करता है।
Hey Agni Dev! One-The Ritviz, who brings Samidha-wood for Yagy-for you, takes rest after being tired and ignite you in the morning is strengthened with progeny & cattle, destroys the enemy and gets riches-wealth.
अग्निरीशे बृहतः क्षत्रियस्याग्निर्वाजस्य परमस्य रायः।
दधाति रत्नं विधते यविष्ठो व्यानुषङ्मर्त्याय स्वधावान्
हे अग्नि देव! आप महान बल के ईश्वर तथा उत्कृष्ट अन्न और पशु स्वरूप धन के स्वामी हैं। युक्तम और अन्नवान् अग्निदेव परिचर्या करने वाले याजकगण को रमणीय धन से संयुक्त करें।[ऋग्वेद 4.12.3]
वे अग्नि देव श्रेष्ठतम शक्ति के स्वामी तथा महन अन्न और पशु रूपी धन के अधिपति हैं। अत्यन्त युवा एवं अन्नवान अग्नि देव सेवा करने वाले यजमान को सुन्दर धन से सम्पन्न करें।
Agni Dev is possess ultimate strength, excellent food grains & cattle as wealth-riches, is young, has food grains and grants wealth to the Ritviz-host.
यचिद्धि त पुरुषत्रा यविष्ठाचित्तिभिश्चकृमा कच्चिदागः।
कृधी ष्व १ स्माँ अदितेरनागान्व्येनांसि शिश्रथो विष्वगग्ने
हे युवतम अग्नि देव! यद्यपि आपके परिचारकों के बीच में हम अज्ञानवश कुछ पाप करते हैं, तथापि आप पृथ्वी के निकट हमें सम्पूर्ण रूप से निष्पाप कर दें। हे अग्नि देव! सभी जगह विद्यमान हमारे पापों को आप शिथिल करें।[ऋग्वेद 4.12.4]
हे सद्य युवा अग्नि देव! तुम्हारे सेवकों के मध्य हम अज्ञान के वशीभूत हुए तुम्हारा अपराध करते हैं, तुम धरा के पास हमको उन अपराधों और पापों से बचा दो। हे अग्नि देव! तुम सर्वत्र ग्रहण हो। हमारे द्वारा हुए पापों को नष्ट कर दो।
Hey youthful Agni Dev! We commit sins due to ignorance amongest your devotees over the earth, still you pardon us & make us sinless. Hey Agni Dev! Protect us from sins at all places-locations.
 महश्चिदग्न एनसो अभीक ऊवद्दिवानामुत मर्त्यानाम्।
मा ते सखायः सदमिद्रिषाम यच्छा तोकाय तनयाय शं योः
हे अग्नि देव! हम आपके मित्र हैं। हमने इन्द्रादि देवों के निकट अथवा मनुष्यों के निकट जो पाप किये हैं, उस महान और विस्तृत पाप से हम कभी भी कष्ट न पावें। आप हमारे पुत्र और पौत्र को उपद्रवों से शान्ति और सुकृत जनित सुख प्रदान करें।[ऋग्वेद 4.12.5]
उपद्रव :: दुक्की, विकार, अव्यवस्था, अशांति, विशृंखलता, शैतान, दो, पिशाच, ताश की दुक्की, अशांति, बाधा; nuisance, deuce, disturbance, disorder.
हे अग्नि देव! तुम हमारे मित्र हो। हमने इन्द्र आदि देवताओं तथा सभी प्राणियों का जो अपराध या पाप किया है, उस घोर अपराध से हम कभी भी बाधाओं को न पाएं। तुम हमारी संतानों को भी पाप रूप से बचाते हुए सुख दो।
Hey Agni Dev! Being our friend, protect-shield us from the sins committed by us, pertaining to the demigods-deities & Indr Dev. We should never be punished for them. Grant comforts, peace, tranquillity, solace, pleasure to our sons & grand sons calming down the troubles-disturbances. 
यथा ह त्यद्वसवो गौर्यं चित्पदि षिताममुञ्चता यजत्राः।
एवो ष्व१स्मन्मुञ्चता व्यंहः प्र तार्यग्ने प्रतरं न आयुः
हे पूजनीय और निवासयिता अग्नि देव! आपने जिस प्रकार आपने पैर बँधी गौ को छुड़ाया, उसी प्रकार हम लोगों को पाप से विमुक्त करें। हे अग्नि देव! हमारी आयु आपके द्वारा प्रवृद्ध है, आप इसे और बढ़ावें।[ऋग्वेद 4.12.6]
हे अग्नि देव! तुम पूजनीय एवं निवास से परिपूर्ण हो। तुमने जिस प्रकार पांवों से बंधी हुई धेनु को बचाया था, उसी प्रकार हमको पाप से बचाओ। हे अग्नि देव! हमारी आयु तुम्हारे द्वारा बढ़ायी गई है। तुम इसमें और भी वृद्धि करो।
Hey honourable-revered Agni Dev! The way-manner in which you released the cows who's legs were tied, us as well from the sins. Hey Agni Dev! Enhance our life span-longevity.(08.02.2023)
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (13) :: ऋषि :- वामदेव गौतम, देवता :- अग्नि छन्द :- त्रिष्टुप्।
प्रत्यग्निरुषसामग्रमख्यद्विभातीनां सुमना रत्नधेयम्।
यातमश्विना सुकृतो दुरोणमुत्सूर्यो ज्योतिषा देव एति
शोभन मन वाले अग्नि देव तमोनिवारिणी उषा के धन प्रकाशकाल के पूर्व ही प्रवृद्ध होते हैं। हे अश्विनी कुमारों! आप याजकगण के गृह में गमन करें। ऋत्विक् आदि के प्रेरक सूर्य देव अपने तेज के साथ उषाकाल में प्रकट होते हैं।[ऋग्वेद 4.13.1]
हे महान हृदय वाले अग्नि देव! तम का पतन करने वाली उषा की ज्योति से पहले तुम प्रबुद्ध होते हो। हे अश्विनी कुमारों! तुम यजमान के ग्रह में विचरण करो। ऋत्विक आदि को शिक्षा देने वाले सूर्य अपने तेज से परिपूर्ण उषा समय में उदित हो होते हो।
Hey Agni Dev, possessing great innerself (mind, heart & soul)! Agni Dev become active prior to dawn-day break. Usha bring light prior to Sun rise. Hey Ashwani Kumars! Move to the houses of the Ritviz-devotees. Inspiring the Ritviz, Sury Bhagwan-Sun, appear with his aura-radiance with Usha in the morning.
ऊर्ध्वं भानुं सविता देवो अश्रेद्द्रप्सं दविध्वद्गविषो न सत्वा।
अनु व्रतं वरुणो यन्ति मित्रो यत्सूर्यं दिव्यारोहयन्ति
सविता देव उन्मुख किरण को विकासित करते हैं। रश्मियाँ जब सूर्य को द्युलोक में आरूढ़ कराती हैं, तब वरुण, मित्र और अन्यान्य देवगण अपने-अपने कर्मों का अनुगमन करते हैं, जिस प्रकार से बलवान वृषभ गौओं की कामना करके धूलि विकीर्ण करता हुआ गौओं का अनुगमन करता है।[ऋग्वेद 4.13.2]
सूर्य देव किरणों को विकसित करते हैं। जब किरणें सूर्य को आकाश में चढ़ाती हैं, तब वरुण, मित्र और अग्नि सभी देवता अपने कर्मों के पीछे चलते हैं, उसी तरह जिस तरह बलिष्ठ बैल गायों की कामना कर धूल उड़ाता हुआ गायों के पीछे चलता है।
Savita Dev-Sun, boosts his rays establishing himself in the heavens. Varun Dev, Mitr and other demigods-deities begin with their work-routine just like the bull who chase the cows raising dust.
यं सीमकृण्वन्तमसे विपृचे ध्रुवक्षेमा अनवस्यन्तो अर्थम्।
तं सूर्यं हरितः सप्त यह्वीः स्पशं विश्वस्य जगतो वहन्ति
सृष्टि करने वाले देवों ने संसार के कार्य का परित्याग न करके सर्वतोभाव से अन्धकार को दूर करने के लिए जिस सूर्य को सृष्ट किया, उस समस्त प्राणि समूह के विज्ञाता सूर्य को धारित महान हरिनामक सप्ताश्व करते हैं।[ऋग्वेद 4.13.3]
सृष्टि के रचनाकार देवताओं ने संसार के कर्म को न छोड़कर तम को समाप्त करने के लिए जिस सूर्य की उत्पत्ति की, वह सूर्य सभी प्राणधारियों को जानने वाले हैं। हें प्रकाशवान सूर्य देव! तुम संसार का पालन करने वाले अन्न के लिए रश्मियों की वृद्धि करते हो। तुम ही उस काले रंग की रात्रि को भगाते हो और अत्यधिक बोझ को भी ढो लेने वाले अश्वों द्वारा गमन करते हो।
Seven great courses convey that Sun, whom the deities, occupants of enduring mansions and not heedless of their offices, have formed for the driving away of darkness and who is the animator of the whole world.
The demigods-deities continued with their endeavours and created-evolved the Sun-Sury Dev, to eliminate the darkness, who ride the charoite pulled by seven horses called Hari.
वहिष्ठेभिर्विहरन्यासि तन्तुमवव्ययन्नसितं देव वस्म।
दविध्वतो रश्मयः सूर्यस्य चर्मेवाधुस्तमो अप्स्व १ न्तः
हे द्युतिमान सूर्य! आप जगन्निर्वाहक रस को ग्रहण करने के लिए तन्तु स्वरूप रश्मि समूह को विस्तारित करते हैं, कृष्ण वर्णा रात्रि को तिरोहित करते हैं और अत्यन्त वहन समर्थ अश्वों द्वारा गमन करते हैं। कम्पन युक्त सूर्य की रश्मियाँ अन्तरिक्ष के बीच में स्थित चर्म सदृश अन्धकार को दूर करती हैं।[ऋग्वेद 4.13.4]
हे प्रकाशवान सूर्य देव! तुम संसार का पालन करने वाले अन्न के लिए रश्मियों की वृद्धि करते हो। तुम ही उस काले रंग की रात्रि को भगाते हो और अत्यधिक बोझ को भी ढो लेने वाले अश्वों द्वारा गमन करते हो। सूर्य की गतिमान रश्मियाँ अंतरिक्ष में स्थित तम को भगाती हैं।
Hey Illuminated Sury Dev-Sun! You sip-absorb the juices for the welfare of the world, by spreading your rays, like a web, removing the darkness of the night, being carried by the mighty horses. Sun associated with vibrations-waves removes the darkness spreaded like the skin.
अनायतो अनिबद्धः कथायं न्यङ्ङुत्तानोऽव पद्यते न।
कया याति स्वधया को ददर्श दिवः स्कम्भः समृतः पाति नाकम्
अदूरवर्ती अर्थात् प्रत्यक्ष उपलभ्यमान सूर्य का कोई भी बन्धन नहीं कर सकता। अधोमुख सूर्य किसी प्रकार भी हिंसित नहीं होते। ये किस बल से ऊद्धर्वमुख भ्रमण करते हैं? द्युलोक (स्वर्गलोक) में समवेत स्तम्भ स्वरूप सूर्य स्वर्ग का पालन करते हैं। इसे किसने देखा है? अर्थात् इस तत्त्व को कोई भी नहीं जानता।
प्रत्यक्ष प्राप्त सूर्य को कोई बाँध नहीं सकता। नीचे रहने वाले सूर्य की कोई हिंसा नहीं कर सकता। वे किस शक्ति से ऊँचे उठते हुए चलते हैं? क्षितिज में स्तम्भ के समान उठे हुए सूर्य अपने आप को शरण प्रदान करते हैं। इसे कौन देखता है? सूर्य की कोई हिंसा नहीं कर सकता। वे किस शक्ति से ऊँचे उठते हुए चलते हैं?
Neither, none can tie the Sun, nor can he be harmed-attacked by any one. What is the strength-force behind him, which moves him around. Sury Dev support-nurture the heavens like pole. Who has seen this!? None is aware of he source-secret of his strength.(09.02.2023)
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (14) :: ऋषि :- वामदेव गौतम, देवता :- अग्नि छन्द :- त्रिष्टुप्।
प्रत्यग्निरुषसो जातवेदा अख्यद्देवो रोचमाना महोभिः।
आ नासत्योरुगाया रथेनेमं यज्ञमुप नो यातमच्छ
जातवेदा अग्नि देव के तेज से दीप्यमाना उषा प्रवृद्ध हुई है। हे प्रभूत गमनशाली अश्विनी कुमारों! आप दोनों रथ द्वारा हमारे यज्ञ में पधारें।[ऋग्वेद 4.14.1]
हे महान हृदय वाले अग्नि देव! तम का पतन करने वाली उषा की ज्योति से पहले तुम प्रबुद्ध होते हो। हे अश्विद्वय! तुम भ्रमणशील हो। रथ पर सवार होकर तुम दोनों इस यज्ञ को प्राप्त हो जाओ। 
Hey Agni Dev! Shinning Usha has appeared by virtue of your energy-aura. Hey dynamic Ashwani Kumars! Join our Yagy by coming here by your charoite.  
ऊर्ध्वं केतुं सविता देवो अश्रेज्ज्योतिर्विश्वस्मै भुवनाय कृण्वन्।
आप्रा द्यावा-पृथिवी अन्तरिक्षं वि सूर्यो रश्मिभिश्चेकितानः
सविता देवता समस्त भुवन को आलोक युक्त करके उन्मुख किरण का आश्रय लेते हैं। सबको विशेष रूप से देखने वाले सूर्य ने अपनी किरणों से द्यावा-पृथ्वी और अन्तरिक्ष को परिपूर्ण किया है।[ऋग्वेद 4.14.2]
प्रकाशवान सूर्य सभी संसार को प्रकाशित करके किरणों के आश्रय पर चलते हैं। सबके दृष्टा सर्य ने अपनी किरणों के माध्यम से गगन, धरती और अंतरिक्ष को पूर्ण किया है।
Savita Dev-Sun illuminate the universe with his rays. He has completed-supplemented the earth, heaven and the space through his rays.
आवहन्त्यरुणीर्ज्योतिषागान्मही चित्रा रश्मिभिश्चेकिताना।
प्रबोधयन्ती सुविताय देव्यु १ षा ईयते सुयुजा रथेन
धन को धारण करने वाली, रक्त वर्णा, ज्योति: शालिनी महती, रश्मि विचित्रिता और विदुषी उषा आई हैं। प्राणियों को जगाकर करके उषा देवी सुयोजित रथ द्वारा सुख प्राप्ति के लिए गमन करती हैं।[ऋग्वेद 4.14.3]
धनों को धारण करने वाली, महती दीप्तिमय, अरुण रंगवाली उषा रश्मियों के द्वारा तेजवाली बनकर प्रकट होती है। वह उषा जीव मात्र को चैतन्य करती हुई अपने सुशोभित रथ द्वारा कल्याण के लिए विचरणशील होती है।
Possessor of all riches-wealth, radiant, lighted, great, enlightened, with amazing rays Usha Devi, has appeared-arrived. She awake the organism-living beings and keep on moving further.
आ वां वहिष्ठा इह ते वहन्तु रथा अश्वास उषसो व्युष्टौ।
इमे हि वां मधुपेयाय सोमा अस्मिन्यज्ञे वृषणा मादयेथाम्
हे अश्विनी कुमारों! उषा के प्रकाशित होने पर अत्यन्त वहन क्षम और गमनशील अश्व आपको इस यज्ञ में ले आवें। हे अभीष्ट वर्षिद्वय! यह सोमरस आपके लिए हैं। इस यज्ञ में सोमपान करके आनन्दित होवें।[ऋग्वेद 4.14.4]
हे अश्विनी कुमारों! उषा के उदय होने पर वहन करने की अत्यन्त क्षमता वाले गमनशील अश्व तुमको उस यज्ञ में ले जाएँ। तुम दोनों अभिलाषाओं की वर्षा करने वाले हो। यह सोम तुम्हारे लिए है। अतः इस अनुष्ठान में सोमपान करके संतुष्टि को प्राप्त होओ।
Hey Ashwani Kumars! Let your mighty, capable horses bring you here, on the arrival of Usha Devi. Hey desires-accomplishment granting duo! This Somras is for you. Seek pleasure by drinking Somras in this Yagy.
अनायतो अनिबद्धः कथायं न्यङ्ङुत्तानोऽव पद्यते न।
कया याति स्वधया को ददर्श दिवः स्कम्भः समृतः पाति नाकम्
अदूरवर्ती अर्थात् प्रत्यक्ष उपलभ्यमान सूर्य का कोई भी बन्धन नहीं कर सकता है। अधोमुख सूर्य किसी प्रकार हिंसित नहीं होते हैं। ये किस बल से ऊद्धर्व मुख भ्रमण करते हैं? द्युलोक में समवेत स्तम्भ स्वरूप सूर्य स्वर्ग का पालन करते हैं। इसे किसने देखा है? अर्थात् इस तत्त्व को कोई भी नहीं जान सकता।[ऋग्वेद 4.14.5] 
प्रत्यक्ष उपलब्ध सविता देव को बाँधने में कोई भी समर्थवान नहीं है। यह नीचे रहे तब भी उनकी हिंसा किया जाना सम्भव नहीं है। वे किस पराक्रम से ऊँचे उठते हुए चलते हैं? वे अम्बर स्तम्भ के तुल्य स्वर्ग के शरण भूत हैं। इसे कौन जानता है? अर्थात इस तत्व का ज्ञाता कोई नहीं है।
None is capable of binding-harming visible Sun. What is source-reason, power behind his motion!? He supports the heaven like a pole. None is aware of this secret-intricate fact.(10.02.2023)
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (15) :: ऋषि :- वामदेव गौतम, देवता :- अग्निदेव, अश्विनी कुमार,  छन्द :- गायत्री 
अग्निर्होता नो अध्वरे वाजी सन्परि णीयते। देवो देवेषु यज्ञियः
होम निष्पादक देवों के बीच में दीप्त और यज्ञार्ह अग्नि देव हमारे यज्ञ में द्रुतगामी अश्व के तुल्य लाए जाते हैं।[ऋग्वेद 4.15.1]
अनुष्ठान का संपादन करते वाले देवों के हवन योग्य एवं दीप्तिवान अग्निदेव को हमारे यज्ञ में लाने वाले तीव्र गति से चलने वाले घोड़ों से आयें।
Let radiant Agni Dev, desirous of Yagy, join in between the demigods by fast moving horses.
परि त्रिविष्ट्यध्वरं यात्यग्नी रथीरिव। आ देवेषु प्रयो दधत्
अग्नि देव देवों के लिए अन्न धारित करके प्रति दिन रथी के तुल्य यज्ञ स्थल में तीन बार चक्कर लगाते है।[ऋग्वेद 4.15.2]
अग्नि देव देवों के लिए अन्न धारित करके, नित्य प्रति तीन बार विचरणशील रथ के समान चलते हैं।
Agni Dev offerings-carry food grains and come thrice to the Yagy, like a charoite driver.
परि वाजपतिः कविरग्निर्हव्यान्यक्रमीत्। दधद्रत्नानि दाशुषे
अन्न के पालक मेधावी अग्निदेव हवि देने वाले याजकगण को रमणीय धन देकर हवि को चारों ओर से व्याप्त करते हैं।[ऋग्वेद 4.15.3]
अन्नों की सुरक्षा करने वाले मेधावी अग्निदेव! हविदाता यजमान को सुन्दर धन को प्रदान करते हुए हवि रत्न को समस्त ओर से विद्यमान करते हैं।
Intelligent Agni Dev protects the food grains-offerings, from all sides  & grants valuables to the Ritviz-desirous.
अयं यः सृञ्जये पुरो दैववाते समिध्यते। द्युमाँ अमित्रदम्भनः
जो अग्नि देवता के पुत्र सृञ्जय के लिए पूर्व दिशा में स्थित होते हैं और उत्तर वेदी पर समिद्ध होते हैं, वे शत्रु नाशकारी अग्नि दीप्ति युक्त हों।[ऋग्वेद 4.15.4]
जो अग्नि देव पवन के सम्पर्क से अधिक प्रकाशित होते हुए शत्रुओं को भस्म करते हैं वह तेजस्वी अग्नि महान पुरुषों द्वारा प्राप्त होने योग्य हैं, वह शत्रु विजय के कार्य में सबसे आगे प्रदीप्ति युक्त होते हैं।
Radiant as Agni, the subduer of foes, who is kindled on the altar of the cast as he was kindled for Sranjay the son of Demigod.
Destroyer of the enemies, Sranjay, son of demigod, who is established in the east and present over the North Vedi, should be associated with Agni Dev.
अस्य घा वीर ईवतोऽग्नेरीशीत मर्त्यः। तिग्मजम्भस्य मीळ्हुषः
प्रार्थना करने वाले वीर मनुष्य तीक्ष्ण तेज वाले, अभीष्ट वर्षी और गमन शील अग्नि देव के ऊपर आधिपत्य का विस्तार करें।[ऋग्वेद 4.15.5]
वीर स्तोता, तेज वाले, शत्रुओं पर अस्त्र आदि की वर्षा करने वाले एवं गमनशील अग्नि पर अपना अधिकार करने वाले हो।
Let the worshiping brave humans extend their sphere-influence over dynamic Agni Dev.
तमर्वन्तं न सानसिमरुषं न दिवः शिशुम्। मर्मृज्यन्ते दिवेदिवे
याजकगण लोग अश्व के तुल्य हव्यवाही, द्युलोक के पुत्रभूत सूर्य के तुल्य दीप्तिमान और सम्भजनीय अग्नि देव की नित्य बारम्बार परिचर्या करते हैं।[ऋग्वेद 4.15.6]
यह हवन घोड़े के समान हवि वाहक, अम्बर के पुत्र के समान सूर्य की तरह दीप्ति वाले तथा समान यजनीय अग्नि देव की यजमान गण बार-बार सेवा को करो।
The worshipers pray Agni Dev, every day, several times like the horse of the Hawan & the Sun-the son of the sky.
बोधद्युन्मा हरिभ्यां कुमारः साहदेव्यः। अच्छा न हूत उदरम्
सहदेव के पुत्र सोमक राजा ने जब हमें इन दोनों अश्वों को देने की बात कही, तब हम भली प्रकार उनके पास पहुँचे और वहाँ से सन्तुष्ट होकर लौटे।[ऋग्वेद 4.15.7]
सहदेव के पुत्र सम्राट सोमक ने इन दोनों अश्वों को हवि को प्रदान करने का विचार प्रकट किया, तब हम उनके निकट जाकर इन दोनों को संग लेकर चले आये।
When Emperor Somak, son of Sahdev granted us the horse duo, we went to them and brought them with us, satisfied.
उत त्या यजता हरी कुमारात्साहदेव्यात्। प्रयता सद्य आ ददे
सहदेव के पुत्र सोमक राजा के निकट से उसी दिन उन पूजनीय और प्रयत अश्वों को हमने ग्रहण किया।[ऋग्वेद 4.15.8]
सहदेव पुत्र राजा सोमक के निकट से उन परिचय योग्य सुन्दर अश्वों को हमने उसी दिन ले लिया।
We took the revered horses from king Somak, son of Sahdev, same day.
एष वां देवावश्विना कुमारः साहदेव्यः। दीर्घायुरस्तु सोमकः
हे कान्तिमान अश्विनी कुमारों! आप दोनों के तृप्ति कारक सहदेव के पुत्र सोमक राजा सौ वर्ष की आयु वाले हों।[ऋग्वेद 4.15.9]
हे अश्विनी कुमारों! तुम दोनों उज्ज्वल तेज वाले हो। सहदेव पुत्र सम्राट सोमक ने तुम दोनों को संतुष्ट किया है। सोमक सौ वर्ष की आयु को प्राप्त करे।
Hey radiant Ashwani Kumars! Let king Somak, son of Sahdev, who satisfied you, live for 100 years.
तं युवं देवावश्विना कुमारं साहदेव्यम्। दीर्घायुषं कृणोतन
हे अश्विनी कुमारों! आप दोनों सहदेव के पुत्र सोमक राजा को दीर्घायु प्रदान करें।[ऋग्वेद 4.15.10]
हे अश्विनी कुमारों! तुम दोनों उज्जवल कान्ति वाले हो सहदेव के पुत्र राजा सोमक को तुम दीर्घ आयु प्रदान करो।
Hey Ashwani Kumars! Grant long age to king Somak, son of Sahdev.
(10.02.2023)
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (16) :: ऋषि :- वामदेव गौतम, देवता :- इन्द्र,   छन्द :- त्रिष्टुप्।
आ सत्यो यातु मघवाँ ऋजीषी द्रवन्त्वस्य हरय उप नः।
तस्मा इदन्धः सुषुमा सुदक्षमिहाभिपित्वं करते गृणानः
सोमवान और सत्यवान इन्द्र देव हमारे निकट पधारें। इनके अश्व हमारे निकट आगमन करें। हम याजक गण इनके उद्देश्य से सार विशिष्ट अन्न रूप सोमरस का अभिषव करेंगे। वे तृप्त होकर हम लोगों के अभीष्ट को पूर्ण करें।[ऋग्वेद 4.16.1]
सोम के स्वामी सत्य से परिपूर्ण इन्द्र देव हमारे निकट पधारें, इनके अश्व हमारे यहाँ आयें। हम यजमान इन्द्र देव के लिए ही अन्न के सार रूप सोम को सिद्ध करेंगे। वे हमारे द्वारा पूजनीय होकर हमारी इच्छा को पूरी करें।
Let truthful, possessor of Som, Indr dev come close-near us. His horses should come close to us. We Ritviz-desirous, will extract Somras from the specific food grains. He should accomplish our desires on being satisfied.
अव स्य शूराध्वनो नान्तेऽस्मिन्नो अद्य सबने मन्दध्यै।
शंसात्युक्थमुशनेव वेद्याश्चिकितुषे असूर्याय मन्म
हे शत्रुओं को अभिमत करने वाले इन्द्र देव! इस माध्यन्दिन के सवन में आप हम लोगों को विमुक्त करें, जिस प्रकार से गन्तव्य मार्ग के अन्त में मनुष्य घोड़ों को छोड़ देता है। जिससे इस सवन में हम आपको हर्षित करें। हे इन्द्र देव! आप सर्वविद हो और असुरों के हिंसक हैं। यजमान लोग उशना के तुल्य हम आपके लिए मनोहर स्तोत्र का उच्चारण करते हैं।[ऋग्वेद 4.16.2]
हे इन्द्र देव! तुम शत्रुओं को भयभीत करने वाले हो। दिवस के इस बीच सवन में जैसे अपने निर्दिष्ट जगह पर जाकर अश्वों को विमुक्त किया जाता है, वैसे ही तुम हमें विमुक्त करो, जिससे सवन में हम तुम्हें पुष्ट करें। हे इन्द्र देव! तुम शत्रुओं का विनाश करने वाले एवं सभी के स्वामी हो। उशना के समान यजमान जन तुम्हारे लिए सुन्दर स्तोत को कहते हैं।
Hey Indr Dev! You create fear-terror in the enemies. Release us in the middle segment of the day, just like the person who releases the horses at the end of his journey, so that we may be able to please & nourish you. You are aware of all that happens and slay the demons-giants. The hosts-Ritviz sing beautiful hymns-Strotr in your praise-honour.
कविर्न निण्यं विदथानि साधन्वृषा यत्सेकं विपिपानो अर्थात्।
दिव इत्था जीजनत्सप्त कारूनह्ना चिच्चक्रुर्वयुना गृणन्तः
विद्वान जिस प्रकार से गूढ़ अर्थ का सम्पादन करते हैं, उसी प्रकार अभीष्ट वर्षी इन्द्र देव कार्यों को सम्पादित करते हैं। जब सेचन योग्य सोमरस का अधिक परिमाण में पान करके ये हर्षित होते हैं, तब द्युलोक सप्त संख्यक रश्मियों को वास्तव में उत्पन्न कर देते हैं। स्तूयमान (worth praising) रश्मियाँ दिन में भी मनुष्यों के ज्ञान का सम्पादन करती हैं।[ऋग्वेद 4.16.3]
विद्वान जिस प्रकार से गूढ़ विषयों का सम्पादन करते हैं, उसी प्रकार अभीष्ट वर्षी इन्द्र देव कार्यों को सम्पादित करते हैं। जब सेवन के योग्य सोम को अधिक परिमाण में पान करके पुष्टि को ग्रहण करते हैं, तब अम्बर से सप्त रश्मियाँ मनुष्य के लिए ज्ञानमयी होती हैं।
Indr Dev materialise the tasks in the same manner, in which the scholars decipher the intricate words-text. He become happy after drinking Somras in large doses-quantity. The heaven generate the praise worthy rays which enlighten the humans.
DECIPHER :: कूट (गूढ़) लेखन को पढ़ लेना या समझ लेना; कूटवाचन करना; learn to pronounce, to succeed in reading or understanding, something that is not clear.
स्व१र्यद्वेदि सुदृशीकमर्कैर्महि ज्योती रुरुचुर्यद्ध वस्तोः।
अन्धा तमांसि दुधिता विचक्षे नृभ्यश्चकार नृतमो अभिष्टौ
जब प्रभूत एवं ज्योति स्वरूप द्युलोक रश्मियों द्वारा अच्छी तरह से दर्शनीय होता है, तब देवगण उस स्वर्ग में निवास करने के लिए दीप्ति युक्त होते हैं। नेतृ श्रेष्ठ सूर्य ने आगमन करके मनुष्यों को अच्छी तरह से देखने के लिए घनी भूत अन्धकार को नष्ट कर दिया।[ऋग्वेद 4.16.4]
जब दीप्ति स्वरूप अम्बर किरणों के द्वारा उक्त तरह से दर्शनीय होता है, तब देवता गण तेज से चमकते हुए, उस स्वर्ग में निवास करते हैं। सभी का नेतृत्व करने वाले सविता देव ने प्रकट होकर मनुष्यों को देखने के लिए गंभीर अंधेरे का पतन कर डाला।
The demigods become aurous-radiant, when the heaven is lit with the rays of light. The Sun-Sury Dev appeared and vanished the dense darkness.
ववक्ष इन्द्रो अमितमृजीष्यु १ भे आ पप्रौ रोदसी महित्वा।
अतश्चिदस्य महिमा विरेच्यभि यो विश्वा भुवना बभूव
सोम विशिष्ट इन्द्र देव अमित महिमा धारित करते हैं। वे अपनी महिमा के बल से द्यावा और पृथ्वी दोनों को परिपूर्ण करते हैं। इन्द्र देव ने समस्त भुवनों को अभिभूत किया है। इनकी महिमा समस्त भुवनों से अधिक है।[ऋग्वेद 4.16.5]
सोमवान इन्द्र देव अत्यधिक महिमावान हो जाते हैं। वे अपनी महिमा से नभ और धरती दोनों को सम्पन्न करते हैं। इन्द्र देव ने सभी लोकों को व्याप्त किया है, क्योंकि वे सभी लोकों से श्रेष्ठ हैं।
Possessor of Somras, Indr Dev has immense glory. He compensate the earth & sky by virtue of his glory-might. Indr Dev has enchanted all abodes, since he is the beast amongest all abodes.
विश्वानि शक्रो नर्याणि विद्वानपो रिरेच सखिभिर्निकामैः।
अश्मानं चिद्ये बिभिदुर्वचोभिर्व्रजं गोमन्तमुशिजो वि वव्रुः
इन्द्र देव सम्पूर्ण मनुष्यों के हितकर वृष्टि आदि कार्य को जानते हैं। उन्होंने अभिलाषकारी और मित्र भूत मरुतों के लिए जल वर्षण किया। जिन मरुतों ने वचन रूप ध्वनि से पर्वतों को विदीर्ण किया, उन मरुतों ने इन्द्र देव की अभिलाषा करके गोपूर्ण गोशाला के भण्डार खोल दिये।[ऋग्वेद 4.16.6]
वे इन्द्र देव मनुष्यों के लिए हितकारक सभी कार्यों को जानते हुए जल-वृष्टि आदि करते हैं। उन्होंने अभिलाषा पूर्ण मित्र भाग वाले मरुद्गण के लिए जल-वृष्टि की थी। जिन मरुद्गण ने वाणी की ध्वनि से ही पर्वतों को चीर डाला, उन्होंने इन्द्रदेव की इच्छा करते हुए धेनुओं से पूर्ण गोष्ठ खोल दिया।
Indr Dev is aware of all that which is beneficial-essential for the humans. He showered rains for the desirous friendly Marud Gan. Marud Gan teared-destroyed the mountains just by their loud voice. They opened the gates of cow shed remembering Indr Dev.
अपो वृत्रं वद्रिवांसं पराहन्प्रावत्ते वज्रं पृथिवी सचेताः।
प्रार्णांसि समुद्रियाण्यैनोः पतिर्भवञ्छवसा शूर धृष्णो॥
हे इन्द्र देव! आपके लोक पालक वज्र ने जलावरक मेघ को प्रेरित किया। चेतनावती भूमि आपसे संगत हुई। हे शूर और वर्षणशील इन्द्र देव! आप अपने बल से लोकपालक होकर समुद्र सम्बन्धी और आकाश स्थित जल को प्रेरित किया।[ऋग्वेद 4.16.7]
हे इन्द्र देव! आपका वज्र लोकों का रक्षक है। उसने जलों के आवरण रूपी बादल को गतिमान किया। वह चैतन्य पृथ्वी तुमसे पूर्ण हुई। तुम अत्यन्त शक्तिशाली एवं घर्षणशील हो । हे इन्द्र देव! तुम अपनी ही शक्ति से संसार के तीनों लोकों का पालन करते हुए समुद्र की ओर आकाश में स्थित जल को प्रेरित करो।
Hey Indr Dev! Your Vajr is the protector & nurturer of the universe. It inspires-motivate the water possessing clouds. The earth is conscious due to you. Hey brave, mighty, powerful and rain showering Indr Dev! You became the supporter of the universe and manages-inspires the water in the ocean and the sky.
अपो यदद्रिं पुरुहूत दर्दराविर्भुवत्सरमा पूर्व्यं ते।
स नो नेता वाजमा दर्षि भूरिं गोत्रा रुजन्नङ्गिरोभिर्गृणानः
हे बहुजनाहूत इन्द्र देव! जब आपने वृष्टि जल को लक्ष्य करके बादलों को विदीर्ण किया तब आपके लिए पहले ही सरमा ने पणियों द्वारा अपहृत गौओं को प्रकट किया। अङ्गिराओं द्वारा स्तूयमान होकर आप हमें प्रचुर अन्न प्रदान करें।[ऋग्वेद 4.16.8]
हे इन्द्र देव! तुम अनेकों द्वारा पुकारे गये हो। जब तुमने वृष्टि वाले जल को देखकर बादल को चीर डाला था, तब तुम्हारे लिए सरमा ने पणियों द्वारा चुरायी गयी धेनुओं का भेद खेल दिया था। तुम अंगिराओं द्वारा पूजनीय होकर जन्म देते और हमारा कल्याण करते हो।
Hey Indr Dev! Worshiped-prayed by many people-humans you shattered-teared the clouds and made them rain. Sarma disclosed the secret that the Pani-demons had stolen the cows. Having prayed praised by Angira you grant us sufficient food grains and look after us & our welfare.
अच्छा कविं नृमणो गा अभिष्टौ स्वर्षाता मघवन्नाधमानम्। ऊतिभिस्तमिषणो द्युम्नहूतौ नि मायावानब्रह्मा दस्युरर्त
हे धनवान इन्द्र देव! मानव आपको सम्मानित करते हैं। आपने धन प्रदान करने के लिए कुत्स के अभिमुख गमन किया। याचना करने पर शत्रुओं के उपद्रवों से आश्रयदान द्वारा आपने उनकी रक्षा की। कपटी ऋत्विकों के कार्यों को अपनी अनुज्ञा से जानकर आपने कुत्स के धन लोभी शत्रुओं को युद्ध में विनष्ट कर दिया।[ऋग्वेद 4.16.9]
कपटी :: छली, मिथ्याभिमानी, अभिमानी, मिथ्या दावेदार, धूर्त, असत, कृत्रिम, साधन-संपन्न; cheat, insidious, pretentious, disingenuous, deceptor.
हे धनेश्वर इन्द्र! प्राणी जगत तुम्हारा सम्मान करते हैं। धन देने के लिए कुत्स के सम्मुख गए थे। बुलाने पर तुमने शत्रुओं के उपद्रवों से उनको बचाकर शरण दी थी। अपनी सुमति से कपटी ऋत्विकों के कार्यों को तुमने जान लिया तथा कुत्स के धन की कामना करने वाले शत्रु को मार दिया।
Hey wealthy Indr Dev! The humans pray-respect you. You requested Kuts to grant wealth-riches. You protected him on being requested and sheltered him. You realised the designs of the deceptor Ritviz and destroyed the greedy enemies of Kuts in the war-battle.
आ दस्युध्ना मनसा याह्यस्तं भुवत्ते कुत्सः सख्ये निकामः।
स्वे योनौ नि षदतं सरूपा वि वां चिकित्सदृतचिद्ध नारी
हे इन्द्र देव! आपने मन में शत्रुओं को मारने का संकल्प करके कुत्स के घर में आपने आगमन किया। कुत्स भी आपके साथ मैत्री करने के लिए लालायित हुए थे, तब आप दोनों अपने स्थान में उपविष्ट हुए। आपकी सत्य दर्शिनी पत्नी शची आप दोनों का समान रूप देखकर द्विविधा में पड़ गई।[ऋग्वेद 4.16.10]
उपविष्ट ::  आसीन, विराजमान, अध्यासीन, अभिनिविष्ट, बैठा हुआ, जमकर बैठा हुआ; seated, contained.
अवस्थित :: अवस्थान, टिकाव, विद्यमानता, स्थिति, मौक़ा, मुहल्ला; location, locality, locale.
हे इन्द्र देव! तुमने शत्रुओं को समाप्त करने का निश्चय कर लिया और कुत्स के घर जा पहुँचे। कुत्स भी तुम्हारी मित्रता के लिए लालायित था। तब तुम दोनों अपने स्थल पर अवस्थित हुए। सत्य को देखने वाले तुम्हारी भार्या तुम दोनों का एक जैसा रूप देखकर अत्यन्त धर्म संकट में पड़ गई।
Hey Indr Dev! You decided to eliminate the enemy and reached the house of Kuts. Kuts too was eager to have friendship with you. Thereafter, you both seated together. Devi Shachi, your wife became confused, when she found both of  you having the same-alike figure. 
यासि कुत्सेन सरथमवस्युस्तोदो वातस्य हर्योरीशानः।
ऋज्रा वाजं न गध्यं युयूषन्कविर्यदहन्यार्याय भूषात्
शत्रुओं का वध करने वाले, वायु के तुल्य गति वाले अश्वों के स्वामी, हे इन्द्र देव! जिस दिन दूरदर्शी कुत्स ग्रहणीय अन्न के तुल्य ऋजुगामी (straight moving) अश्व द्वय को अपने रथ युक्त करके आपत्ति से निस्तीर्ण होने में समर्थ हुए, उस दिन हे इन्द्र देव! आपने कुत्स की रक्षा करने की इच्छा से उसके साथ एक रथ पर गमन किया। आप शत्रु नाशक और वायु के सदृश घोड़ों के अधिपति हैं।[ऋग्वेद 4.16.11]
जब रानी कुत्स स्वीकार करने योग्य अन्न के समान तीव्रगामी दोनों अश्वों को अपने रथ में जोड़कर संकट से छुटकारा पाने में सफल हुई, तब हे इन्द्रदेव! तुमने उसके मार्ग पर उसकी रक्षा करने के लिए एक साथ गमन किया। तुम शत्रुओं का विनाश करने वाले पवन के समान गति वाले अश्वों के दाता हो।
Slayer of enemies, possessor of fast moving horses like Pawan-air, Hey Indr Dev! The day when you deployed your horses in the charoite which are like the acceptable food grains, free from troubles-tensions, you rode the charoite to protect Kuts.
 कुत्साय शुष्णमशुषं नि बर्हीः प्रपित्वे अह्नः कुयवं सहस्रा।
सद्यो दस्यून्प्र मृण कुत्स्येन प्र सूरश्चक्रं वृहतादभीके
हे इन्द्र देव! आपने कुत्स के लिए सुख रहित शुष्ण का वध किया। दिवस के पूर्व भाव में आपने कुयव नाम वाले असुर को मारा। बहुत परिजनों से आवृत होकर आपने उसी समय वज्र द्वारा शत्रुओं को भी विनष्ट किया। आपने संग्राम में सूर्य के चक्र को छिन्न कर दिया।[ऋग्वेद 4.16.12]
हे इन्द्र देव! तुमने कुत्स के कारण शुष्ण को समाप्त कर डाला। दिन के प्रारम्भ में तुमने कुयव नामक दैत्य का वध किया, उसी समय तुमने सूर्य के चक्र को भी तोड़ दिया।
For Kuts, you slained the unhappy Shushn and in the forepart of the day, you slained Kuyav surrounded by thousands of his relatives with the thunderbolt; you have swiftly destroyed the Demons and you have cut them to pieces in the battle, with the wheel of the chariot of the Sun.
Hey Indr Dev! You killed Shushn-demon for the sake of Kuts. Earlier in the morning you killed Kuyav, another demon & enemies surrounded by many of their relatives with your Vajr & the wheel of the charoite of Sun-Sury Narayan in the war.
त्वं पितुं मृगयं शूशुवांसमृजिश्वने वैदथिनाय रन्धीः।
पञ्चाशत्कृष्णा नि वपः सहस्रात्कं न पुरो जरिमा वि दर्दः
हे इन्द्र देव! आपने पिप्रु नामक असुर को तथा प्रवृद्ध मृगय-प्रवृक नामक असुर का वध किया। आपने विदीथ के पुत्र ऋजिश्वा को बन्दी बनाया। आपने पचास हजार कृष्ण वर्ण राक्षसों का वध किया। वृद्धावस्था जिस प्रकार से रूप को विनष्ट करती है, उसी प्रकार से आपने शम्बर के नगरों को विनष्ट कर दिया।[ऋग्वेद 4.16.13]
हे इन्द्र देव! तुमने पिप्रू और प्रवृक नामक दैत्य को मार दिया। तुमने वैदधि के पुत्र ऋजिश्वा को बनाया और पचास सहस्र काले वर्ण वाले असुरों का वध किया। जैसे बुढ़ापा रूप का नाश करता है वैसे ही तुमने शत्रु के नगरों का नाश कर दिया।
Hey Indr Dev! You killed Pipru & Mragay, the demons. You imprisoned Rijshva, son of Vithith. You killed 50,000 black skinned-coloured demons. The way old age takes over living being you destroyed the cities of Shambar demon.
सूर उपाके तन्वं १ दधानो वि यत्ते चेत्यमृतस्य वर्पः।
मृगो न हस्ती तविषीमुषाणः सिंहो न भीम आयुधानि बिभ्रत्
हे इन्द्र देव! आप मरण रहित है। जब आप सूर्य के निकट अपना शरीर धारित करते हैं, तब आपका रूप प्रकाशित होता है। सूर्य के समीप सबका रूप मलिन हो जाता है, किन्तु इन्द्र देव का रूप और भासमान होता है। हे इन्द्र देव! आप मृग विशेष के तुल्य शत्रुओं को दग्ध करके आयुध धारित करते हैं और सिंह के तुल्य भयंकर विकराल हो जाते हैं।[ऋग्वेद 4.16.14]
हे इन्द्र देव! तुम अविनाशी हो। तुम जब सूर्य के निकट प्रकट होते हो तब तुम्हारा रूप अत्यन्त ज्योतिवान होता है। सूर्य के सामने सभी फीके पड़ जाते हैं, परन्तु इन्द्र देव का रूप अधिक तेजोमय होता जाता है। हे इन्द्र देव! तुम मृगया के समान शत्रुओं को जलाते और अस्त्र धारण करते हो तथा उस समय शेर के समान विकराल हो जाते हो।
Hey Indr Dev! You are immortal. When you are close to the Sun, you become shinning. Anyone else looses his aura while in the proximity of Sun. You kill the enemy like hunting the deer and possess the weapons to destroy the enemy like furious lion.  
इन्द्रं कामा वसूयन्तो अग्मन्त्स्वर्मीळ्हे न सवने चकानाः।
श्रवस्यवः शशमानास उक्थैरोको न रण्वा सुदृशीव पुष्टिः
राक्षस जनित भय को निवारित करने के लिए इन्द्र देव की कामना करने वाले और धन की इच्छा करने वाले स्तोता लोग युद्ध सदृश यज्ञ में इन्द्र से अन्न की याचना करते हैं, स्तोत्रों द्वारा उनकी प्रार्थना करते हैं और उनके निकट गमन करते हैं। इन्द्र देव उस समय स्तोताओं के लिए आवास स्थान के तुल्य होते हैं और रमणीय तथा दर्शनीय लक्ष्मी के तुल्य होते हैं।[ऋग्वेद 4.16.15]
असुरों द्वारा उत्पन्न भय को दूर करने के लिए इन्द्र का आश्रय अभिलाषा वाले एवं धन की कामना करने युद्ध के समान यज्ञ में इन्द्र से अन्न चाहते हैं। वे स्तोत्रों द्वारा अन्न की स्तति करते हुए उनके नजदीक जाते हैं। उस समय वे इन्द्र उनके लिए आश्रय स्थान के समान रक्षा करते हैं और रमणीय एवं दर्शनीय धन के समान ऐश्वर्य सम्पन्न होते हैं।
The Ritviz request-pray to Indr Dev to relieve them from the fear of the demons and desire wealth & food grains in the Yagy which is like a war. They recite hymns and move closer to Indr Dev. At this moment Indr Dev is like shelter-home for them-worshipers. He become beautiful-attractive, possessing wealth and grandeur.
तमिद्व इन्द्रं सुहवं हुवेम यस्ता चकार नर्या पुरूणि।
यो मावते जरित्रे गध्यं चिन्मक्षू वाजं भरति स्पार्हराधाः
जिन इन्द्र देव ने मनुष्यों के कल्याण के लिए प्रसिद्ध कार्य किये, जो स्पृहणीय धन विशिष्ट हैं, जो हमारे सदृश स्तोता के लिए ग्रहणीय अन्न को शीघ्र लाते हैं, हे याजक गणों! हम स्तोता लोग उन इन्द्र देव का शोभन आवाहन आपके लिए करते हैं।[ऋग्वेद 4.16.16]
इन्द्र देव ने मनुष्यों के कल्याण के लिए असंख्यक विख्यात कर्म किये हैं। वे इन्द्र देव धन-ऐश्वर्य से परिपूर्ण एवं इच्छा के योग्य हैं। वे हमारे तपस्वी को प्राप्त करने योग्य अन्न को शीघ्र ले आते हैं। हे मनुष्यों! तुम्हारे लिए हम तपस्वीगण उन इन्द्र देव का सुन्दर आह्वान करते हैं।
Indr Dev performed numerous deeds for the welfare of the humans. He possess wealth and grandeur. He gives food grains to the hosts-devotees quickly. Hey Ritviz-devotees! We ascetics invoke Indr Dev.
तिग्मा यदन्तरशनिः पताति कस्मिञ्चिच्छूर मुहुके जनानाम्।
घोरा यदर्य समृतिर्भवात्यध स्मा नस्तन्वो बोधि गोपाः
हे शूर इन्द्र देव! मनुष्यों के किसी भी युद्ध में अगर हम लोगों के बीच में तीक्ष्ण अशनिपात हो अथवा शत्रुओं के साथ अगर हम लोगों का घोरतर युद्ध हो, तब हे स्वामिन्! आप हम लोगों के शरीर की रक्षा करें।[ऋग्वेद 4.16.17]
हे इन्द्रदेव! तुम पराक्रमी हो। मनुष्यों द्वारा होने वाले संग्राम में हमारे मध्य तीक्ष्ण वज्रपात हो या शत्रुओं से हमारा अत्यन्त घोर युद्ध हो, तब तुम हमारी देह को अपने निमंत्रण में रखते हुए प्रत्येक प्रकार से हमारी सुरक्षा करना।
Hey brave Indr Dev! Protect us-our bodies if we entangle in a war with the humans, involve in furious war with the enemy or lightening strike us. 
भुवोऽविता वामदेवस्य धीनां भुवः सखावृको वाजसातौ।
त्वामनु प्रमतिमा जगन्मोरुशंसो जरित्रे विश्वध स्याः
हे इन्द्र देव! आप वामदेव के यज्ञ कार्य के रक्षक होवें। आप हिंसा रहित हैं। आप युद्ध में हम लोगों के सुहृद होवें। आप मतिमान हैं। हम लोग आपके निकट गमन करें। आप सर्वदा हम के प्रशंसक हों।[ऋग्वेद 4.16.18]
सुहृद :: मित्र, सखा; cordial, crony, affectionate, soft-kind hearted.
हे इन्द्र देव! तुम वामदेव द्वारा किये जाने वाले यज्ञ कार्य के रक्षक हो। तुम किसी के द्वारा हिंसित नहीं किये जाते। तुम युद्ध में हमारे प्रति सहृदयता का बर्ताव करो। तुम अत्यन्त सुन्दर मति वाले हो। तुम हमारे नजदीक आओ। हे इन्द्र! तुम हमेशा स्तोताओं की प्रशंसा करने वाले बनो।
Hey Indr Dev! You should protect the Yagy of Vam Dev. You are be non violent. You should favour us in the war. You are intelligent-prudent. We should be close to you. Appreciate-like our hymns praising you.
एभिर्नृभिरिन्द्र त्वायुभिष्टा मघवद्भिर्मघवन्विश्व आजौ।
द्यावो न घुम्नैरभि सन्तो अर्यः क्षपो मदेम शरदश्च पूर्वीः
हे धनवान इन्द्र देव! हम शत्रुओं को जीतने के लिए समस्त युद्ध में आपकी अभिलाषा करते हैं। धनी जिस प्रकार धन द्वारा दीप्त होता है, हम भी उसी प्रकार हव्य युक्त होकर पुत्र-पौत्रादि परिजनों के साथ दीप्त हों और शत्रुओं को पराजित करके रात्रि एवं सम्पूर्ण संवत्सरों में आपकी प्रार्थना करें।[ऋग्वेद 4.16.19]
हे इन्द्र देव! तुम समृद्धिवान हो। हम युद्धों में तुम्हारी इच्छा करते हैं। जैसे धनवान अपने धन से चमकता है, वैसे ही हम भी धन तथा पुत्र-पौत्रादि परिवार वालों के संग ज्योति से परिपूर्ण हों। हम अपने शत्रुओं को पराजित कर रात दिन और वर्षों में प्रसन्नता से तुम्हारा पूजन करते रहें।
Hey wealthy Indr Dev! We expect you to favours us in the war to win the enemy. The way a rich become glorious we too should be glorious with sons & grandsons. Win the enemy and worship-pray you in all segments of the day & night.
एवेदिन्द्राय वृषभाय वृष्णे ब्रह्माकर्म भृगवो न रथम्।
नू चिद्यथा नः सख्या वियोषदसन्न उग्रोऽविता तनूपाः
इन्द्र देव के साथ हम लोगों की मैत्री जिस कार्य से वियुक्त न हो, तेजस्वी और शरीर पालक इन्द्र देव जिससे हम लोगों के रक्षक हों, हम लोग उसी प्रकार का आचरण करेंगे। दीप्त रथ निर्माता जिस प्रकार रथ बनाते हैं, उसी प्रकार हम लोग भी अभीष्ट वर्षी तथा नित्य तरुण इन्द्र देव के लिए स्तोत्र की रचना करते हैं।[ऋग्वेद 4.16.20]
हम वही कार्य करेंगे, जिससे इन्द्र सहित हमारी मैत्री का विच्छेदन न हो और शरीर के रक्षक तेजस्वी इन्द्र हमारे पालन कर्ता बनें। कुशल रथ निर्माता जैसे रथ बनाता है, वैसे ही हम भी कामनाओं की वर्षा करने वाले प्रतिदिन इन्द्र के लिए सुन्दर स्तोत्रों को रचते हैं।
We should act-behave with aurous & our protector Indr Dev in such a manner that our friend ship with him continues. The way a builder of charoite builds it, we should compose attractive Strotr-hymns to worship youthful Indr Dev who accomplish our desires. 
नू ष्टुत इन्द्र नू गृणान इषं जरित्रे नद्यो ३ न पीपेः।
अकारि ते हरिवो ब्रह्म नव्यं धिया स्याम रथ्यः सदासाः
हे इन्द्र देव! आप पूर्व वर्ती ऋषियों द्वारा प्रशंसित होकर तथा हम लोगों द्वारा स्तूयमान होकर जिस प्रकार से जल नदी को पूर्ण करता है, उसी प्रकार आप स्तोताओं के अन्न को प्रवृद्ध करते हैं। हे हरि विशिष्ट इन्द्र देव! हम आपके उद्देश्य से अभिनव स्तोत्र को रचते हैं। जिससे हम लोग रथवान होकर स्तुति द्वारा सदा आपकी सेवा करते रहें।[ऋग्वेद 4.16.21] 
हे इन्द्र देव! तुम प्राचीन काल में ऋषियों द्वारा अर्चित होकर और हमारे द्वारा नमस्कृत होकर जल द्वारा नदी पूर्ण करने के तुल्य समान प्रार्थना करने वालों के लिए अन्न धन की वृद्धि करते हो। हम तुम्हारे लिए नवीन श्लोकों की रचना करते हैं जिससे रथ आदि से परिपूर्ण हुए वंदना के संकल्पों द्वारा तुम्हें हमेशा हर्षित करते रहें।
Hey Indr Dev! On being praised by the ancient rishis and us, you increase the food grains of the Hosts-devotees the way water completes the rivers. Hey Indr Dev! We always compose fresh hymns-Strotr in your honour so that we have charoites and worship-pray, serve you.(13.02.2023)
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (17) :: ऋषि :- वामदेव गौतम, देवता :- इन्द्र,  छन्द :- त्रिष्टुप्, एकपदा विराट।
त्वं महाँ इन्द्र तुभ्यं ह क्षा अनु क्षत्रं मंहना मन्यत द्यौः।
त्वं वृत्रं शवसा जघन्वान्त्सृजः सिन्धूँरहिना जग्रसानान् 
हे इन्द्र देव! आप महान् है। महत्त्व से युक्त होकर पृथ्वी ने आपके बल का अनुमोदन किया एवं द्युलोक ने भी आपके बल का अनुमोदन किया। लोकों को आवृत करने वाले वृत्र नामक असुर को आपने बल द्वारा मारा। वृत्रासुर ने जिन नदियों को अवरुद्ध किया, आपने उन नदियों को विमुक्त कर दिया।[ऋग्वेद 4.17.1]
हे इन्द्र देव! तुम श्रेष्ठ हो। महती पृथ्वी ने तुम्हारी शक्ति का समर्थन किया आकाश ने तुम्हारी शक्ति का अनुमोदन किया। तुमने अपनी शक्ति से लोकों को ढक देने वाले वृत्रासुर को समाप्त किया। वृत्र ने नदियों को वशीभूत किया, तुमने उनको स्वतंत्र कर दिया।
Hey Indr Dev! You are the best-great. Earth & the heaven too supported your might. Vratr was killed by your power. You released the river blocked by Vrata Sur.
तव त्विषो जनिमब्रेजत द्यौ रेजद्भूमिर्भियसा स्वस्य मन्योः।
ऋघायन्त सुभ्व: १ पर्वतास आर्दन्धन्वानि सरयन्त आपः
हे इन्द्र देव! आप दीप्तिमान है। आपके जन्म होने पर द्युलोक आपके कोपभय से कम्पित हुआ, पृथ्वी कम्पित हुई और वृद्धि प्रदान के लिए बृहत मेघ समूह आपके द्वारा आबद्ध हुआ। इन मेघों ने प्राणियों की पिपासा को विनष्ट करके मरुभूमि में जल प्रेरण किया।[ऋग्वेद 4.17.2]
हे इन्द्र देव! तुम अत्यन्त तेजस्वी हो। तुम्हारे प्रकट होने पर नभ तुम्हारे क्रोध के डर से काँप गया। उस समय पृथ्वी भी काँप गई और बादलों के दल को तुमने बाँध लिया। तुम्हारी प्रेरणा से प्राणियों की प्यास मिटाने के लिए उन मेघों ने मरुभूमि में जल की वर्षा की।
Hey Indr Dev! You are energetic. Your appearance led to trembling of heavens, earth and the clouds prepared to rain. The clouds quenched the thirst of the living beings and the deserts too got water-rain showers.
भिद्गिगिरिं शवसा वज्रमिष्णन्नाविष्कृण्वानः सहसान ओजः।
वधीद्वृत्रं वज्रेण मन्दसानः सरन्नापो जवसा हतवृष्णीः
शत्रुओं के अभिभवकर्ता इन्द्र देव ने तेज प्रकाशित करके और बल पूर्वक वज्र का प्रेरण करके पर्वतों को विदीर्ण किया। सोमपान से हर्षित होकर इन्होंने वज्र द्वारा वृत्रासुर को विनष्ट किया। वृत्रासुर के विनष्ट होने पर जल आवरण रहित होकर वेग से आने लगा।[ऋग्वेद 4.17.3]
शत्रुओं को पराजित करने वाले इन्द्र देव ने अपने तेज की ज्योति और शक्ति द्वारा वज्र को चलाकर पर्वतों को चीर डाला। सोमपान करके पुष्ट होने के बाद इन्द्रदेव ने अपने वज्र से वृत्र को समाप्त कर डाला। उस वृत्र के समाप्त होने पर जल की वर्षा होने लगी।
Defeater of the enemies Indr Dev lit by his aura, projected Vajr with force to smash the mountains. Pleased by drinking Somras, he killed Vrata Sur with Vajr. With the killing of Vratr, rain waters showered.
सुवीरस्ते जनिता मन्यत द्यौरिन्द्रस्य कर्ता स्वपस्तमो भूत्।
य ईं जजान स्वर्यं सुवज्रमनपच्युतं सदसो न भूम
हे इन्द्र देव! आप अतिशय स्तुत्य, उत्तम वज्र विशिष्ट, स्वर्ग स्थान से अच्युत अर्थात् विनाश रहित और महिमावान हैं। आपको जिन द्युतिमान प्रजापति ने उत्पन्न किया, वे अपने को सुन्दर पुत्रवान मानते थे। आपको जन्म देने वाले प्रजापति उत्तम कर्म करने वाले थे।[ऋग्वेद 4.17.4]
तुम अत्यन्त पूजनीय वज्र से युक्त, अलौकिक स्थान के अधिपति और अविनाशी हो। तुम अत्यन्त महिमा वाले हो, जिन तेजस्वी प्रजापति ने तुम्हें प्रकट किया था, वे अपने को सुन्दर पुत्र वाला मानते थे।
Hey Indr Dev! You are honoured-revered, possess excellent Vajr, immortal. Radiant-energetic Prajapati who produced you, considered himself to have a beautiful-handsome son, performer of auspicious, righteous, virtuous deeds.
य एक इच्च्यावयति प्र भूमा राजा कृष्टीनां पुरुहूत इन्द्रः।
सत्यमेनमनु विश्वे मदन्ति रातिं देवस्य गृणतो मघोनः
सम्पूर्ण प्रजाओं के राजा, बहुजनाहूत और देवों के बीच में एकमात्र प्रधान इन्द्र देव शत्रु जनित राय को विनष्ट करते हैं। द्युतिमान और धनवान बन्धु इन्द्र देव के उद्देश्य से वास्तव में समस्त याजकरण प्रार्थना करते हैं।[ऋग्वेद 4.17.5]
इन्द्र के जन प्रजापति का कर्म अत्यन्त उत्तम और शंसा के योग्य था। मनुष्य मात्र के स्वामी, अनेकों द्वारा पुकारे गये, देवताओं के सुख इन्द्रदेव शत्रु द्वारा रचित किये गये भय को मिटाते हैं। वे समृद्धि और ज्योर्तिवान। उन मित्र रूप इन्द्रदेव के लिए यजमान श्लोकों द्वारा नमस्कार करते हैं।
Emperor of all living beings, worshiped by many and the only leader amongest the demigods-deities, destroy the enemies. Radiant and wealthy-rich, brotherly Indr Dev is worshiped-prayed by the Ritviz-hosts.
सत्रा सोमा अभवन्नस्य विश्वे सत्रा मदासो बृहतो मदिष्ठाः।
सत्राभवो वसुपतिर्वसूनां दत्रे विश्वा अधिथा इन्द्र कृष्टीः
सम्पूर्ण सोमरस वास्तव में इन्द्र देव के निमित्त हैं। ये मद कारक सोम महान इन्द्र देव लिए सचमुच हर्ष कारक हैं। हे इन्द्र देव! आप धनपति हैं, केवल धनपति ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण पशुओं के भी पति हैं। हे इन्द्र देव! धन के लिए आप वास्तव में समस्त प्रजाओं को धारित करते है।[ऋग्वेद 4.17.6]
सभी सोम इन्द्रदेव के लिए उत्पन्न होते हैं। यह सोम बल उत्पन्न करने वाला है तथा उन पर श्रेष्ठ इन्द्र को प्रसन्नता प्रदान करते हैं। हे इन्द्र देव! तुम ऐश्वर्यवान् सभी प्रजाओं का पालन-पोषण करने वाले हो।
Entire Somras is meant for Indr Dev. Intoxicating Somras produces great pleasure-happiness in Indr Dev. Hey Indr Dev! You are not only the owner of wealth but also all the leader of living beings, animals-cattle. Hey Indr Dev! You protect-shelter the living beings with wealth.
त्वमद्य प्रथमं जायमानोऽमे विश्वा अधिथा इन्द्र कृष्टीः।
त्वं प्रति प्रवत आशयानमहिं वज्रेण मघवन्वि वृश्चः
हे धनवान इन्द्र देव! पूर्व में ही उत्पन्न होकर आपने वृत्रभीत होकर सम्पूर्ण प्रजाओं को धारित किया। आपने उदकवान देश के उद्देश्य से जल निरोधक वृत्रासुर को छिन्न-भिन्न किया।[ऋग्वेद 4.17.7]
हे धन ऐश्वर्य सम्पन्न इंद्र देव! तुमने उत्पन्न होते ही वृत्र के भय से बचाने के लिए प्रजाओं की रक्षा की। तुमने सभी प्रदेशों को जल युक्त कर देने के उद्देश्य से जल को रोकने वाले शत्रु को नष्ट कर दिया।
Hey grandeur possessing Indr Dev! You appeared in the past and supported the populace. You eliminated Vrata Sur to maintain water supply in all regions, throughout the world.
सत्राहणं दाधृषिं तुम्रमिन्द्रं महामपारं वृषभं सुवज्रम्।
हन्ता यो वृत्रं सनितोत वाजं दाता मघानि मघवा सुराधाः
अनेक शत्रुओं के हन्ता, अत्यन्त दुर्द्धर्ष शत्रुओं के प्रेरक, महान, विनाश रहित, अभीष्टवर्षी और शोभन वज्र विशिष्ट इन्द्र देव की प्रार्थना हम लोग करते हैं। जिन इन्द्र देव ने वृत्रासुर असुर ने को मारा, जो अन्नदाता और शोभन धन से युक्त हैं तथा जो धन दान करते हैं, हम उनकी प्रार्थना करते हैं।[ऋग्वेद 4.17.8]
अनेक शत्रुओं को समाप्त करने वाले, विकराल शत्रुओं को शिक्षा प्रदान करने वाले, महान एवं अविनाशी इन्द्र देव का पूजन करते हैं। वे इन्द्र देव अभिष्टों की वृष्टि करने वाले और सुन्दर वज्र वाले हैं। उन्होंने वृत्र का पतन किया था। वे अन्न प्रदान करने वाले उज्ज्वल वनों के अधिपति हैं। सदैव धन प्रदान करते रहते हैं, उन इन्द्र का हम पूजन करते हैं।
We worship immortal, great, desire accomplishing, Vajr possessing Indr Dev, who eliminated several enemies. We pray Indr Dev, who killed Vrata Sur, grants food grains, has grandeur and donate money.
अयं वृतश्चातयते समीचीर्य आजिषु मघवा शृण्व एकः।
अयं वाजं भरति यं सनोत्यस्य प्रियासः सख्ये स्याम
जो धनवान इन्द्र देव संग्राम में अद्वितीय सुने जाते हैं, वे मिलित और विस्तृत शत्रु सेना को विनष्ट करते हैं। वे जो अन्न याजक गणों को देते हैं, उसी अन्न को वे धारित भी करते हैं। इन्द्र देव के साथ हम लोगों की मित्रता प्रीति युक्त हो।[ऋग्वेद 4.17.9]
जो इन्द्र अत्यन्त धनवान एवं युद्ध में अद्वितीय वीर माने गये हैं, वे सुसंगत और विशाल शत्रु सेना को समाप्त करने में सक्षम हैं। वे जिस अन्न और धन को धारण करते हैं, वही यजमान को देते हैं। इन इन्द्र सहित हमारा मित्र भाव अटूट रहे।
Highly rich and exceptional brave warrior Indr Dev, destroys the well arranged-managed enemy army in the war. He distribute food grain possessed by him to those requesting for it. Let our association with him be friendly-affectionate.
अयं शृण्वे अध जयन्नुत घ्नन्नयमुत प्र कृणुते युधा गाः।
यदा सत्यं कृणुते मन्युमिन्द्रो विश्वं दृळ्हं भयत एजदस्मात्
शत्रु विजयी और शत्रु हिंसक होकर इन्द्र देव सभी जगह प्रख्यात हैं। ये शत्रुओं के पास से पशुओं को छीन लाते हैं। इन्द्र देव जब वास्तव में कोप करते हैं, तब स्थावर और जंगमरूप समस्त जगत इनसे डरने लगता है।[ऋग्वेद 4.17.10]
वे इन्द्र शत्रुओं से पशुओं को छीन लेते हैं। जब ये आक्रोशित होते हैं, तब यह स्थावर जंगम रूप का अखिल संसार इन्द्रदेव के भय से नितान्त भयग्रस्त हो जाता है।
Winner & destroyer of the enemy Indr Dev, is famous every where. He snatches the cattle from the enemy. When Indr Dev grow angry fixed and movable living beings become afraid of him.
समिन्द्रो गा अजयत्सं हिरण्या समश्विया मघवा यो ह पूर्वीः।
एभिर्नृभिर्नृतमो अस्य शाकै रायो विभक्ता संभरश्च वस्वः
जिन धनवान इन्द्र देव ने असुरों को जीता, शत्रुओं के रमणीय धन को जीता, अश्व समूह को जीता तथा अनेक शत्रु सेनाओं को जीता, वे सामर्थ्यवान नेतृ श्रेष्ठ स्तोताओं द्वारा प्रार्थित होकर पशुओं के विभाजक तथा धन के धारक हों।[ऋग्वेद 4.17.11]
जिन समृद्धिशाली इन्द्रदेव ने दैत्यों पर विजय ग्रहण की थी तथा शत्रुओं के महान धन पर अधिकार प्राप्त किया था। जिन इन्द्र देव ने शत्रुओं को जीतकर उनके अश्वों को अपने अधिकार में कर लिया था, वे सर्व समर्थ इन्द्र, सभी में अग्रणी एवं वन्दना करने वालों से पूजनीय होकर पशुओं को बाँटने और धनादि के रक्षक हैं।
Let Indr Dev winner of the demons, collector-possessor of their wealth & horses, mighty-powerful leader should distribute the cattle and protect wealth, on being prayed-worshiped.
कियत्स्विदिन्द्रो अध्येति मातुः कियत्पितुर्जनितुर्यो जजान।
यो अस्य शुष्यं मुहुकैरियर्ति वातो न जूतः स्तनयद्भिर भैः
हे इन्द्र देव! आप अपनी जननी के समीप कितना बल प्राप्त करते हैं और पिता के समीप कितना बल प्राप्त करते हैं। जिन इन्द्र देव ने अपने पिता प्रजापति के समीप से इस दृश्यमान जगत को उत्पन्न किया तथा उन्हीं प्रजापति के समीप से जगत को मुहुर्मुहः बल प्रदान किया, वे इन्द्र देव गर्जनशील मेघ द्वारा प्रेरित वायु के तुल्य आहूत होते हैं।[ऋग्वेद 4.17.12]
इन्द्र देव ने अपने माता-पिता से कितनी शक्ति को प्राप्त किया था? जिन इन्द्र देव ने अपने पिता प्रजापति के निकट से इस संसार को रचित करके संसार को बल प्रदान किया है, उन इन्द्र देव की गर्जना करने वाले बादल से प्रेरित पवन के समान आह्वान किया जाता है।
Some portion of his strength; Indr derives from his mother, some portion from his father; he who, though his progenitor, has begotten the world and animates its vigour repeatedly, as the wind is driven by thundering clouds.
Hey Indr Dev! You get power-mighty, strength in the company of your parents. Indr Dev produced the world and granted strength to it. He is worshiped like the roar of clouds who pray to Pawan Dev.
क्षियन्तं त्वमक्षियन्तं कृणोतीयर्ति रेणुं मघवा समोहम्।
विभञ्जनुरशनिमाँइव द्यौरुत स्तोतारं मघवा वसौ धात्
हे धनवान इन्द्र देव! आप निराश्रितों को आश्रय प्रदत्त करते हैं और किए गए पापों को विनष्ट करते हैं। आप द्युलोक के सदृश सुदृढ़ वज्र धारण करने वाले हैं, क्योंकि आप शत्रुओं का संहार करने वाले हैं। आप धनवान हैं, इसलिए प्रार्थना करने वालों को धन प्रदान करते हैं।[ऋग्वेद 4.17.13]
इन्द्र देव धनवान हैं, वे धन हीन प्राणियों को धन से पूर्ण करते हैं। अंतरिक्ष के समान अटल वज्र युक्त शत्रु को मारने-वाले इन्द्र देव भी पापों को नष्ट करते हैं और वंदना करने वालों को धन प्रदान करते हैं।
Hey rich-wealthy Indr Dev! You grant shelter-protection to homeless and eliminates the sins. You possess the strong Vajr like the heaven and the slayer of the enemies. You grant money-riches on being prayer-worshiped. 
अयं चक्रमिषणत्सूर्यस्य न्येतशं रीरभत्ससृमाणम्।
आ कृष्ण ईं जुहुराणो जिघर्ति त्वचो बुध्ने रजसो अस्य योनौ॥
इन्द्र देव ने सूर्य के आयुध को प्रेरित किया और युद्ध के लिए जाने वाले एतश-प्रकाश युक्त को निवारित किया। कुटिल गति और कृष्ण वर्ण मेघ ने तेज के मूलभूत और जल के स्थान स्वरूप अन्तरिक्ष में स्थित इन्द्र देव को अभिषिक्त किया।[ऋग्वेद 4.17.14]
अभिषेक :: प्रतिष्ठापन, समझाना, बतलाना, स्नान; coronation, consecration, ablution, anointment.
इन्द्र देव ने सूर्य के अस्त्र को शिक्षा प्रदान की तथा संग्रामोद्यत एतश का निवारण किया। तिरछी गति और काले रंग वाले बादल ने तेज आश्रय रूप और जल से पूर्ण अंतरिक्ष में निवास करने वाले इन्द्रदेव का अभिषेक किया था। 
Indr Dev inspired the weapons of aurous-radiant Sury Bhagwan-Sun. Dark clouds coronated Indr dev in the space with water.
असिक्न्यां याजकगणो न होता॥
जिस प्रकार से रात्रि काल में याजक गण सोमरस द्वारा इन्द्र देव को अभिषिक्त करते हैं। वे भी रात्रि में ही सभी मनुष्यों को परम ऐश्वर्य प्रदत्त करते हैं।[ऋग्वेद 4.17.15]
जैसे यजमान अंधेरी रात में भी इन्द्र का आह्वान करता है, वैसे ही इन्द्र देव प्रजाओं को रात में भी ऐश्वर्य आदि प्रदान करते हैं।
As the sacrificer-hosts, Ritviz pours the oblation at night upon the fire, Indr Dev grant their wishes at night too.
The way the Ritviz coronate Indr Dev at night, he too grants grandeur to them during the night as well.
गव्यन्त इन्द्रं सख्याय विप्रा अश्वायन्तो वृषणं वाजयन्तः।
जनीयन्तो जनिदामक्षितोतिमा च्यावयामोऽवते न कोशम्
हम मेधावी स्तोता गौओं की अभिलाषा करते हैं, अश्वों की अभिलाषा करते हैं, अन्न की अभिलाषा करते हैं और स्त्री की अभिलाषा करते हैं। हम मित्रता के लिए कामना पूरक, भार्याप्रद और सर्वदा रक्षक इन्द्र देव को, लोग जिस प्रकार से प्यासे लोग कुओं में जल पात्र को भरकर निकालते हैं, उसी प्रकार अवनमित करेंगे।[ऋग्वेद 4.17.16]
हम मेधावी स्तोता गाय, अन्न और सुन्दर संतान उत्पन्न करने वाली नारी की कामना करते हैं। हम अभीष्ट पूर्ण करने वाले, संतानदात्री पत्नी को देने वाले तथा सदैव अक्षय सुरक्षा प्रदान करने वाले इन्द्रदेव के सखा भाव को उसी तरह चाहते हैं, जिस प्रकार कुएँ से जल निकालने की अभिलाषा करने वाले मनुष्य जल पात्र को ग्रहण करना चाहते हैं।
We the intelligent worshipers-devotees are desirous of cows, horses, & wife. We desirous humbled, love friendly Indr Dev sheltering us, like the thirsty person who wish to draw water from the well, to seek wife to produce sons. 
त्राता नो बोधि ददृशान आपिरभिख्याता मर्डिता सोम्यानाम्।
सखा पिता पितृतमः पितॄणां कर्तेमु लोकमुशते वयोधाः
हे इन्द्र देव! आप आप्त है। रक्षक रूप से सभी को देखते हुए आप हमारे रक्षक होवें। आप सोम योग्य याजक गणों के अभिद्रष्टा और सुखयिता है। प्रजापति के समान आपकी ख्याति है। आप पालकों के बीच श्रेष्ठ हैं। आप इस संसार के स्रष्टा हैं और याजकों के अन्न प्रदाता हैं।[ऋग्वेद 4.17.17]
आप्त :: मिला हुआ, कुशल, संबंधी, मित्र, विश्वस्त व्यक्ति, शब्द प्रमाण, अर्हत लब्धि, प्राप्त, प्रामाणिक, कुशल, दक्ष, विश्वास करने योग्य, विश्वसनीय तत्वज्ञ व्यक्ति; concerned, reliable expert person.
हे इन्द्र देव! तुम हमारी रक्षा करने वाले, देखने वाले, सखा उपदेशकर्त्ता शोभित गुणों से युक्त हों। तुम हमारे पूर्व पुरुषों के भी पिता तुल्य, संतानों को सुख देने वाले सखा, ज्ञान और पराक्रम प्रदान करने वाले हो। तुम महान लोकों की कामना करने वाले को उत्तम पद प्रदान करते हो।
Hey Indr Dev! You are reliable concerned & expert. Protect us. You are comforter & well wisher of the Somras deserving Ritviz. You are famous as Prajapati & best amongest the nurturers. You are the creator of the universe and grant food grains to the worshipers.
Here Dev raj Indr is symbolic of Bhagwan Brahma & Bhagwan Shri Hari Vishnu.
सखीयतामविता बोधि सखा गृणान इन्द्र स्तुवते वयो धाः।
चक्रमा सबाध आभिः शमीभिर्महयन्त इन्द्र
हे इन्द्र देव! हम आपसे मित्रता की अभिलाषा करते हैं। आप हमारे रक्षक होवें। आप प्रार्थित होते हैं, आप हमारे मित्र होवें। आप स्तोताओं को अन्न प्रदान करें। हे इन्द्र देव! हम बाधा युक्त होकर भी स्तुति रूप कर्म द्वारा पूजा करके आपका आह्वान करते हैं।[ऋग्वेद 4.17.18]
हे इन्द्र देव! हम तुम्हारा सखा भाव चाहते हैं। तुम हमारे पोषक बनो। तुम्हारी अर्चना की जाती है, तुम हमारे सखा बनो। वदंना करने वाले यजमानों को अन्न प्रदान करो। हे इन्द्रदेव! हमारे महान कर्मों में बाधा उपस्थित होने पर तुम्हें स्मरण करते हैं। तुम हमारे आह्वान पर ध्यान आकृष्ट करते हुए हमें धन प्रदान करो।
Hey Indr Dev! We desire your friendship. Become our protector. You are worshiped-prayed. Grant food grains to the worshipers. Hey Indr Dev! We remember-call, invoke you as and when face problems. 
स्तुत इन्द्रो मघवा यद्ध वृत्रा भूरीण्येको अप्रतीनि हन्ति।
अस्य प्रियो जरिता यस्य शर्मन्नकिर्देवा वारयन्ते न मर्ताः
जब इन्द्र देव हम लोगों के द्वारा प्रार्थित होते हैं, तब वे अकेले ही अनेक अभिगन्ता शत्रुओं का वध कर डालते हैं। जिस इन्द्र देव की शरण में वर्तमान स्तोता का निवारण न देवगण करते हैं और न मनुष्य गण करते हैं, उन इन्द्र देव को स्तोता प्रिय होता है।[ऋग्वेद 4.17.19]
जब हम उन इन्द्रदेव की वंदना करते हैं तब वे अकेले ही बहुत से असुरों को समाप्त कर देते हैं। उनको विद्वान स्तोता बहुत ही प्रिय हैं। उनके आश्रय में रहने वाले को दवेता या मनुष्य कोई नहीं रोक सकता है।
One being invoked-worshiped, Indr Dev alone eliminate the demons-enemies. He likes the enlightened worshipers-devotees. Those under his asylum-protection can not be restrained by any one.
एवा न इन्द्रो मघवा विरप्शी करत्सत्या चर्षणीधृदनर्वा।
त्वं राजा जनुषां धेह्यस्मे अधि श्रवो माहिनं यज्जरित्रे
विविध शब्दवान, समस्त प्रजाओं के धारक, शत्रु रहित और धनवान इन्द्र देव इस प्रकार प्रार्थित होकर हम लोगों के सत्य रूप अभिलषित को सम्पादित करें। हे इन्द्र देव! आप समस्त जन्म धारियों के राजा हैं। स्तोता जिस महिमा युक्त यश को प्राप्त करता है, वह यश आप अधिक मात्रा में हम लोगों को प्रदान करें।[ऋग्वेद 4.17.20]
हे इन्द्र देव ! तुम अत्यन्त धनवान, विविध ध्वनि वाले, समस्त प्रजाओं के रक्षक तथा शत्रुओं से शून्य हो। वे हमारी इस प्रकार की प्रार्थना को सुनकर हमारी सर्वश्रेष्ठ मनोकामनाओं को पूर्ण करें। हे इन्द्र देव! तुम समस्त रचित प्राण धारियों के स्वामी हो। जिस महिमा वाले सुन्दर कीर्ति की प्रार्थना करने वाला ग्रहण करता है, वह अत्यन्त कीर्ति हमको प्रदान करो।
Addressed as knowledgeable of various languages-dialects, nurturer of various living beings, without any enemy, let wealthy Indr Dev, accomplish our desires. Hey Indr Dev! You are the emperor-leader of all living beings. Grant us the fame which an honourable-revered worshiper gains by virtue of composing-singing beautiful hymns.
नू ष्टुत इन्द्र नू गृणान इषं जरित्रे नद्यो ३ न पीपेः।
अकारि ते हरिवो ब्रह्म नव्यं धिया स्याम रथ्यः सदासाः
हे इन्द्र देव! आप पूर्ववर्ती ऋषियों द्वारा प्रशंसित होकर तथा हम लोगों के द्वारा स्तूत होकर जिस प्रकार से जल नदी को पूर्ण करता है, उसी प्रकार स्तोताओं के अन्न को आप प्रवृद्ध करते हैं। हे हरि विशिष्ट इन्द्र देव! हम आपके उद्देश्य से अभिनव स्तोत्र करते हैं, जिससे हम लोग रथवान होकर स्तुति द्वारा सदा आपकी सेवा करते रहें।[ऋग्वेद 4.17.21]
हे इन्द्र देव! तुम पुरातन काल में हुए ऋषियों के द्वारा पूजनीय हुए हमारे द्वारा भी स्तुत्य होकर जल द्वारा नदी को पूर्ण करने के समान, अन्न की वृद्धि करते हो। हम तुम्हारे लिए नए श्लोक रचते हैं। जिससे हम रथ युक्त हुए सदैव तुम्हारी अर्चना करते रहें।
Hey Indr Dev! Praised by the ancient-earlier sages, Rishi Gan, worshiped by us; grant us food grains like the water which fills the rivers. We compose beautiful Strotr in your honour, for you so that we possess charoite and pray you, sing hymns in your honour.(18.02.2023)
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (18) :: ऋषि :- वामदेव गौतम, देवता :- इन्द्र,  अदिति, छन्द :- त्रिष्टुप्।
अयं पन्था अनुवित्तः पुराणो यतो देवा उदजायन्त विश्वे।
अतश्चिदा जनिषीष्ट प्रवृद्धो मा मातरममुया पत्तवे कः
इन्द्र देव कहते हैं, "यह योनि निर्गमण रूप मार्ग अनादि और पूर्वापर लब्ध है। इसी योनि मार्ग से सम्पूर्ण देव और मनुष्य उत्पन्न हुए हैं; इसलिए आप गर्भ में प्रवृद्ध होकर इसी मार्ग द्वारा उत्पन्न होवें। माता की मृत्यु के लिए कार्य मत करो"। 
यह रास्ता अनादि समय से चलता आ रहा है, जिसके द्वारा विभिन्न भोगों और एक दूसरे को चाहने वाले नर-नारी ज्ञानीजन आदि रचित होते हुए प्रवृद्ध होते हैं। उच्चस्थ पदवी वाले समर्थवान व्यक्ति भी इस परम्परागत रास्ते से ही रचित होते हैं। हे मनुष्य! अपनी जननी माता को अनादर करने का प्रयास न करें।[ऋग्वेद 4.18.1]
Indr Dev said that the sequence of birth through the womb-vagina has been prevalent ever since. All demigods-deities appeared through this route. Establish yourself in the womb and prevent mother's death. 
नाहमतो निरया दुर्गर्तैत्तिरश्चता पार्श्वान्निर्गमाणि।
बहूनि मे अकृता कर्त्वानि युध्यै त्वेन सं त्वेन पृच्छै
वामदेव कहते हैं, "हम इस योनि मार्ग द्वारा नहीं निर्गत होंगे। यह मार्ग अत्यन्त दुर्गम है। हम पार्श्व भेद करके निर्गत होंगे। दूसरों के द्वारा अकरणीय बहुत से कार्य हमें करने हैं। हमें एक के साथ युद्ध करना है। हमें एक के साथ वाद-विवाद करना है"।[ऋग्वेद 4.18.2]
निर्गत :: बाहर आया हुआ, निःसृत; issued, come forth, gone forth.
निर्गतहम पूर्वोक्त योनि मार्ग से नहीं बच सकते। टेढ़े रास्ते से पशु-पक्षी के रूप में जन्म लेकर भी जीवन बड़े दुख से व्यतीत होता है। मैं चाहता हूँ कि इस फंदे से निकल जाऊँ। मुझे अनेक कष्ट न उठाने पड़ें। बार-बार का झगड़ा सब झमेला मात्र है। हमको संसार पथ के किनारे लगने का प्रयास करना चाहिये।
Vamdev said that he would not like to follow that route of birth, since it was very tough, intricate, difficult. We would prefer lateral route. We have to conduct several tasks deferred by others, undertake wars & have debate.
परायतीं मातरमन्वचष्ट न नानु गान्यनु नू गमानि।
त्वष्टुगृहे अपिबत्सोममिन्द्रः शतधन्यं चम्वोः सुतस्य
इन्द्र देव कहते हैं, "हमारी माता मर जायगी, तथापि हम पुरातन मार्ग का अनुधावन नहीं करेंगे, शीघ्र बहिर्गत होंगे"। (इन्द्र ने जो यथेच्छा चरण किए, उसी को वामदेव कहते हैं) इन्द्र देव अभिषवकारी त्वष्टा के घर में सोमाभिषव फलक द्वारा अभिषुत सोमरस का पान बलपूर्वक किया, वह सोमरस बहुत धन द्वारा क्रीत था।[ऋग्वेद 4.18.3]
जैसे अपनी जननी की मृत्यु पर कोई व्यक्ति कहता है कि मैं भी इसके पीछे ही चला जाऊँ या न जाऊँ। कालोपरांत वह ज्ञान-धैर्य आदि से शांत होकर पिता के घर में पुत्र बनकर रहता हुआ जीवन का उपयोग करता है। उसी प्रकार विवेकी होकर त्वष्टा के गृह में सोमपान करता है। अदिति ने उस शक्तिशाली इन्द्र को महीनों वर्षों तक धारण किया था। उस श्रेष्ठ इन्द्रदेव ने अनेक विशिष्ट कार्य किए। उनकी समानता उत्पन्न हुए अथवा आगे उत्पन्न होने वालों में से कोई नहीं कर सकता।
Indr Dev said that he would not discard that route which may kill his mother-Aditi. Indr Dev consumed the Somras at Twasta's house which was bought with a lot of money.
किं स ऋधक्कृणवद्यं सहस्रं मासो जभार शरदश्च पूर्वीः।
नही न्वस्य प्रतिमानमस्त्यन्तर्जातेषूत ये जनित्वाः
"अदिति ने इन्द्र देव को अनेक मासों और अनेक संवत्सरों तक गर्भ में धारित किया। इन्द्र देव ने यह विरुद्ध कार्य क्यों किया अर्थात गर्भ में बहुत दिनों तक रहकर इन्द्र देव ने माता अदिति को कष्ट दिया"। इन्द्र देव के ऊपर किये गये आक्षेप को सुनकर अदिति कहती हैं, "हे वामदेव! जो उत्पन्न हुए हैं और जो देवादि उत्पन्न होंगे, उनके साथ इन्द्र की तुलना कदापि नहीं हो सकती"।[ऋग्वेद 4.18.4]
अदिति ने उस शक्तिशाली इन्द्र को महीनों वर्षों तक धारण किया था। उस श्रेष्ठ इन्द्रदेव ने अनेक विशिष्ट कार्य किए। उनकी समानता उत्पन्न हुए अथवा आगे उत्पन्न होने वालों में से कोई नहीं कर सकता।
Vamdev accused Indr Dev of staying in the womb of his mother for many months and years, torturing her. Aditi, his mother replied that those who were born and those were going to take birth could not be compared with Indr Dev.
अवद्यमिव मन्यमाना गुहाकरिन्द्रं माता वीर्येणा न्यृष्टम्।
अथोदस्थात्स्वयमत्कं वसान आ रोदसी अपृणाज्जायमानः
गह्वर रूप सूतिका गृह में उत्पन्न इन्द्र देव को निन्दनीय मानकर माता ने उन्हें अतिशय सामर्थ्यवान किया। अनन्तर, उत्पन्न होते ही इन्द्र देव ने अपने ओज को धारित करके खड़े हुए और द्यावा-पृथ्वी को अपने तेज से परिपूर्ण कर दिया।[ऋग्वेद 4.18.5]
गह्वर :: गड्ढा, बिल, विवर, गुफा, अँधेरा एवं गहरा स्थान, देवालय, मंदिर, गहरा, घना, दुर्गम; deep, precipice, chasm.
अदिति ने उस इन्द्र को गति देने में समर्थ मानते हुए अदृश्य रूप से धारण किया और फिर इन्द्र देव ने अपनी ही सामर्थ्य से रचित तेज को धारण करते हुए सर्वोच्च वर्ग और आकाश-पृथ्वी दोनों को युक्त किया।
Deeming it disreputable that he should be brought forth in secret, his mother Aditi endowed Indr Dev with extraordinary vigour; therefore, as soon as born he sprung up of his own accord, invested with splendour and filled both heaven and earth.
Mother Aditi nourished Indr Dev secretly, considering him to be capable, keeping him invisible and granted him extraordinary vigour. Thereafter, Indr Dev lit the earth and sky-heaven with his aura-radiance as soon he took birth.
एता अर्षन्त्यललाभवन्तीर्ऋतावरीरिव संक्रोशमानाः।
एता वि पृच्छ किमिदं भनन्ति कमापो अद्रिं परिधिं रुजन्ति
"अ-ल-ला शब्द करती हुई अथवा हर्ष ध्वनी करती हुई ये जलवती नदियाँ इन्द्र देव के महत्त्व को प्रकट करने के लिए हर्ष पूर्वक बहुविध शब्द करती हुई बहती है। हे ऋषि! आप इन नदियों से पूछो कि ये क्या बोलती है? यह शब्द इन्द्र देव के माहात्म्य का सूचक है। मेरे पुत्र इन्द्र देव ने ही उदक के आदरक मेघ को विदीर्ण करके जल को प्रवर्तित किया।[ऋग्वेद 4.18.6]
अत्यन्त ध्वनि करती जल से पूर्ण सरिताएँ इन्द्र के महत्त्व को प्रकट करती हुई कहती है कि हे विद्वान! यह सरिताएँ क्या कहती हैं, यह इनसे पूछो। क्या यह इन्द्र देव का यशोगान करती हैं। इन्द्र का यशोगान रोकने वाले मेघ को फाड़कर जल की वर्षा की थी।
The river show their pleasure, generating several thrilling sounds depicting the significance of Indr Dev. Hey Rishi! ask these river what they speak? This statement signify the greatness-importance of Indr Dev. Her son-Indr Dev teared into the clouds and produced rains.
किमु ष्विदस्मै निविदो भनन्तेन्द्रस्यावद्यं दिधिषन्त आपः।
ममैतान्पुत्रो महता वधेन वृत्रं जघन्वाँ असृजद्वि सिन्धून्
वृत्र वध से ब्रह्म हत्या रूप पाप को प्राप्त करने वाले इन्द्र देव को वेद वाणी क्या कहती है? जल फेन रूप से इन्द्र देव के पाप को धारित करता है। मेरे पुत्र इन्द्र देव ने महान् वज्र से वृत्रासुर का वध किया और इन नदियों को प्रवाहित किया।[ऋग्वेद 4.18.7]
वृत्र की हत्या करने पर इन्द्र देव को ब्रह्म हत्या का जो पाप लगा, उस सम्बन्ध में वेद वाणी क्या कहती है? इन्द्र देव के उस पाप को जल ने फेन के रूप में धारण किया। इन्द्र देव ने अपने श्रेष्ठ वज्र द्वारा वृत्र को विदीर्ण कर सरिताओं को प्रवाहमान किया।
What is the opinion of Ved regarding the slaying of Vratr leading to the sin of Brahm Hatya-murder of a Brahman? The water bears the foam over it, as the sin of Indr Dev. Aditi's son Indr dev killed Vrata Sur and let the rivers flow.
ममचन त्वा युवतिः परास ममचन त्वा कुषवा जगार।
ममचिदापः शिशवे ममृड्युर्ममच्चिदिन्द्रः सहसोदतिष्ठत्
वामदेव कहते हैं, “आपकी युवती माता अदिति ने हर्षित होकर आपको उत्पन्न किया। कुषवा नाम की राक्षसी ने प्रमत्त होकर आपको ग्रास बनाया। हे इन्द्र देव! उत्पन्न होने पर आपको जल समूह ने प्रमत्त होकर सुखी किया"। इन्द्र देव ने हर्षित होकर अपने वीर्य के प्रभाव से सूतिका गृह में राक्षसी को निगलने का प्रयास किया था।[ऋग्वेद 4.18.8]
हे इन्द्र देव! अत्यन्त प्रसन्नता वाली नारी अदिति ने ममतामय होकर तुम्हें जन्म दिया। कुषवा नाम की राक्षसी से तुम्हें अपना ग्रास बनाने का प्रयत्न किया। तुम्हारे उत्पन्न होते ही सुख प्रदान किया। तुम अपनी क्षमता से सूतिका गृह से उस राक्षसी को मार देने को तैयार हुए।
Vam Dev addressed Indr Dev and said that his young mother gave him birth. The intoxicated demoness Kushva engulfed him. Hey Indr Dev! Water bodies made you happy as soon as you were born. Indr Dev became happy and tried to swallow the demoness.
ममच्चन ते मघवन्व्यंसो निविविध्वाँ अप हनू जघान।
अधा निविद्ध उत्तरो बभूवाञ्छिरो दासस्य सं पिणग्वधेन
हे धनवान इन्द्र देव! व्यंस नामक राक्षस ने प्रमत्त होकर आपके हनुद्वय (चिबुक के अधोभाग) को विद्ध करके अपहृत किया। हे इन्द्र देव! इसके अनन्तर अधिक बलवान होकर आपने व्यंस राक्षस के सिर को वज्र द्वारा पीस डाला।[ऋग्वेद 4.18.9]
हे समद्धि के स्वामी इन्द्र देव! मद से परिपूर्ण होकर व्यंस नामक दैत्य ने तुम्हारी ठोढ़ी के आधे हिस्से में आघात पहुँचाया, जब तुमने शक्ति से व्यंस के सिर को वज्र से अच्छी तरह से कुचल डाला।
Hey wealthy-rich Indr Dev! The demon called Vyans struck your chin, under intoxication and abducted you. Thereafter, you became mighty and powdered his head with Vajr.
गृष्टिः ससूव स्थविरं तवागामनाधृष्यं वृषभं तुम्रमिन्द्रम्।
अरीळ्हं वत्सं चरथाय माता स्वयं गातुं तन्व इच्छमानम्
सकृत्प्रसूता (एक बार ब्यायी हुई) गौ जिस प्रकार से बछड़े का प्रसव करती है, उसी प्रकार इन्द्र की माता अदिति ने अपनी इच्छा से सञ्चरण करने के लिए इन्द्र देव को प्रसव है। इन्द्र देव अवस्था में वृद्ध, प्रभूत बलशाली, अनभिभवनीय, अभीष्टवर्षी, प्रेरक, अनभि स्वयं गमनक्षम और शरीराभिलाषी हैं।[ऋग्वेद 4.18.10]
जैसे गाय शक्तिशाली बछड़े को उत्पन्न करती है, वैसे ही इन्द्र की जननी अदिति अपनी इच्छा पर चलने वाले, सभी शक्तियों से सम्पन्न, सर्व विजेता इन्द्र को जन्म देती है। वह इन्द्र सभी के प्रेरक, अविनाशी, सर्वव्याप्त, अभीष्टों की वर्षा करने वाले एवं कर्मों का फल देने में सक्षम हैं।
The way a cow give birth to the calf, Mata Aditi channelized-centralised her powers and gave birth to Indr Dev. Indr Dev is possessor of might, power, desires granting, inspiring, all pervading-dynamic and capable of awarding the rewards of endeavours-Karm.
उत माता महिषमन्ववेनदमी त्वा जहति पुत्र देवाः।
अथाब्रवीद् वृत्रमिन्द्रो हनिष्यन्त्सखे विष्णो वितरं विक्रमस्व
इन्द्र की माता अदिति ने महिमावान इन्द्र देव से पूछा, "हे मेरे पुत्र इन्द्र देव, अग्नि देव आपको त्याग रहे हैं"। इन्द्र देव ने श्री हरी विष्णु से कहा, "हे मित्र श्री विष्णु! आप यदि वृत्रासुर को मारने की इच्छा करते हैं, तो अत्यन्त पराक्रमशाली होवें"।[ऋग्वेद 4.18.11]
माता अदिति श्रेष्ठ समृद्धि वाले तुम इन्द्र देव की अभिलाषा करती हुई कहती हैं कि हे पुत्र इन्द्र देव! यह सभी विजयाभिलाषी पराक्रमी तुम्हें ग्रहण होते हैं। तब इन्द्रदेव ने कहा, हे विष्णो! तुम वृत्र को वध करने की कामना करते हुए अत्यन्त पराक्रमी बनो।
Indr Dev's mother Mata Aditi,  inquired of the mighty Indr Dev, whether the deities, Agni Dev etc. had deserted him? Indr Dev asked Shri Hari Vishnu if he purposed to slay Vrata Sur and become mighty possessing great valour.
कस्ते मातरं विधवामचक्रच्छयुं कस्त्वामजिघांसच्चरन्तम्।
कस्ते देवो अधि मार्डीक आसीद्यत्प्राक्षिणाः पितरं पादगृह्य
हे इन्द्र देव! आपके अतिरिक्त किस देव ने माता को विधवा किया! आप जिस समय शयन कर रहे थे अथवा जाग रहे थे; उस समय किसने आपको मारना चाहा? कौन देवता देने में आपकी अपेक्षा अधिक हैं? किस कारण वश आपने पिता के दोनों चरणों को पकड़कर उनका वध किया?[ऋग्वेद 4.18.12]
हे इन्द्र देव! तुम्हारा कौन सा शत्रु पैरों को पकड़ सकता कर तुम्हारे पिता को
मारकर माता की विधवा बना सकता है? तुमको सोते समय या चलते समय कौन मार सकता है? तुम्हारे अतिरिक्त ऐसा कौन सा देवता है, जो ऊँची पदवी पा सकता है।
Who has made your mother a widow!? Who has sought to slay you while the sleeping or walking!? Which deity has been more gracious than you since you slained the father, having seized him by the foot?
Hey Indr Dev! Who can kill your father holding his legs making your mother a widow!? Who can kill while moving or sleeping?! Which deity other than you can attain a high post, designation?!
अवर्त्या श्रुन आन्त्राणि पेचे न देवेषु विविदे मर्डितारम्।
अपश्यं जायाममहीयमानामधा मै श्येनो मध्वा जभार
हमने भूख से पीड़ित होकर कुत्ते की अँतड़ी को पकाकर खाया। हमने देवों के बीच में इन्द्र देव के अतिरिक्त अन्य देव को सुख दायक नहीं पाया। हमने अपनी पत्नी को असम्मानित होते देखा। इसके अनन्तर इन्द्र देव हमारे लिए मधुर जल लावें।[ऋग्वेद 4.18.13]
हमने निर्धनता वश कुत्ते की आँतों को भी पकाया, तब तुम्हारे लिए देवों में इन्द्रदेव के अतिरिक्त कोई भी सुख प्रदान करने वाला नहीं हुआ। जब हमने अपनी पत्नी को अपमानित होते देखा, तब इन्द्र देव ने ही हमारी सुरक्षा की और मधुर रस प्रदान किया।
We cooked & ate the intestine of the dog due to intolerable hunger. We did not find any other demigod-deity who could grant us comfort. We saw our wife being insulted. Indr Dev granted us solace and offered us water-sweep sap.(21.02.2023)
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (19) :: ऋषि :- वामदेव गौतम, देवता :- इन्द्र,   छन्द :- त्रिष्टुप्।
एवा त्वामिन्द्र वज्रिन्नत्र विश्वे देवासः सुहवास ऊमाः।
महामुभे रोदसी वृद्धमृष्वं निरेकमिवृणते वृत्रहन्ये
हे वज्रवान इन्द्र देव! इस यज्ञ में शोभन आह्वान से युक्त तथा रक्षक निखिल देवगण और दोनों द्यावा-पृथ्वी वृत्र वध के लिए एक मात्र आपका ही आवाहन करती हैं। आप स्तूयमान, महान गुणोत्कर्ष से प्रवृद्ध और दर्शनीय हैं।[ऋग्वेद 4.19.1]
हे वज्रिन! इस अनुष्ठान में सुन्दर आह्वान वाले तथा सुरक्षा सामर्थ्य वाले समस्त देवता और अम्बर धरा, वृत्र पतन के लिए केवल तुमको ही भजते हैं। तुम वंदना योग्य एवं गुणों के उत्कर्ष से वृद्धि करते हुए तथा दर्शनीय हो।
Hey Vajr possessing Indr Dev! The earth and sky-heavens invoke you to kill Vratr-demon, in the Yagy. You are praise worthy, possessing great characters-qualities, worship able, worth seen.
अवासृजन्त जिव्रयो न देवा भुवः सम्राळिन्द्र सत्ययोनिः।
अहन्नहिं परिशयानमर्णः प्र वर्तनीररदो विश्वधेनाः
हे इन्द्र देव! वृद्ध पिता जिस प्रकार से युवा पुत्र को प्रेरित करते हैं, उसी प्रकार देवगण आपको असुर वध के लिए प्रेरित करते हैं। हे इन्द्र देव! आप सत्य विकास स्वरूप है। तब से आप समस्त लोकों के अधीश्वर हुए है। जल को लक्ष्य करके परिशयन करने वाले वृत्रासुर का आपने वध किया। सबको प्रसन्न करने वाली नदियों का आपने ही खनन किया।[ऋग्वेद 4.19.2]
हे इन्द्र देव! जैसे वृद्ध पिता अपने पुत्र को शिक्षा प्रदान करता है, वैसे ही देवतागण तुमको राक्षसों के संहार की शिक्षा देते हैं। तुम सत्य के विकसित रूप हो। तुम सभी भुवनों के दाता हो। जल को लक्ष्य कर सोते हुए वृत्र को तुमने मार दिया। सबको सन्तुष्ट करने वाली सरिताओं को तुमने प्रवाहित किया।
Hey Indr Dev! The demigods-deities inspired-encouraged you to kill Vrata Sur. You are embodiment of truth. Since then, you are the leader of all abodes. You killed Vrata Sur resting-sleeping the waters. You desilted-excavated the rivers.
अतृप्णुवन्तं वियतमबुध्यमबुध्यमानं सुषुपाणामिन्द्र।
सप्त प्रति प्रवत आशयानमहिं वज्रेण रिणा अपर्वन्
हे इन्द्र देव! आपने भोग में अतृप्त, शिथिलाङ्ग, दुर्विज्ञान, अज्ञान भावापन, सुप्त और सपणशील जल को आच्छादित करके सोने वाले वृत्रासुर को पौर्णमासी में वज्र द्वारा मारा।[ऋग्वेद 4.19.3]
हे इन्द्र देव! तुमने अपृप्त इच्छा वाले अज्ञानी, कमजोर, बुरे विचार वाले, लुप्त एवं शांत जल ढक लेने वाले, विश्राम करते वृत्र की वज्र द्वारा हत्या की।
Hey Indr Dev! You killed Vrata Sur who was not content-dissatisfied, had weak limbs, possessed bad ideas vices-wickedness, ignorant-idiot, lazy, shadowing the waters, sleeping on full moon day. 
अक्षोदयच्छवसा क्षाम बुध्नं वार्ण वातस्तविषीभिरिन्द्रः।
दृळ्हान्यौभ्नादुशमान ओजोऽवाभिनत्ककुभः पर्वतानाम्
वायु जैसे बल द्वारा जल को हिलाती है, उसी प्रकार परमैश्वर्यवान इन्द्र देव बल द्वारा अन्तरिक्ष को क्षीण जल करके पीस डालते हैं। बलाभिलाषी इन्द्र देव दृढ़ मेघ को भग्न करते हैं और पर्वतों के पक्षों को छिन्न-भिन्न करते हैं।[ऋग्वेद 4.19.4]
पवन अपनी शक्ति से जल को क्षुब्ध करते हैं, वैसे ही परम समृद्धि से परिपूर्ण इन्द्र देव अपनी शक्ति से अम्बर को सूक्ष्म तेज से युक्त कर जल को छिन्न-भिन्न करते हैं। वे जल की अभिलाषा करने वाले इन्द्रदेव बादलों और शैलों को तोड़ डालते हैं।
Indr Dev, by his strength, agitated the exhausted firmament, as wind, by its violent gusts, agitates the water, exulting in his strength, he divided the large clouds and shattered the peaks of the mountains.
The way air shake the water with its power, Indr Dev associate the sky with his energy and tear the clouds into pieces and shatter the peaks of the mountains.
अभि प्र दगुर्जनयो न गर्भं रथाइव प्र ययुः साकमद्रयः।
अतर्पयो विसृत उब्ज ऊर्मीन्त्वं वृताँ अरिणा इन्द्र सिन्धून्
हे इन्द्र देव! माताएँ जिस प्रकार पुत्र के निकट गमन करती हैं, उसी प्रकार मरुतों ने आपके निकट गमन किया, जिस प्रकार से वृत्रासुर को मारने के लिए आपके साथ वेगवान रथ गया। आपने विसरणशील नदियों को जल से पूर्ण किया, मेघ को भग्न किया और वृत्रासुर द्वारा आवृत जल को प्रवाहित किया।[ऋग्वेद 4.19.5]
हे इन्द्र देव! जैसे जननी पुत्र की ओर जाती है, वैसे ही मरुत तुम्हारे समीप गए थे। वैसे ही वृत्र वध के लिए तुम्हारे समीप रथ पहुँचा था। तुमने सरिताओं को जल से परिपूर्ण कर दिया। मेघ को विदीर्ण कर वृत्र द्वारा रोके हुए जल को गिरा दिया।
विदीर्ण :: चीयर-फाड़ करना, तोड़ देना; teared-torn, cloven, cleft, laciniate, rimose.
Hey Indr Dev! Marud Gan approached you like the mother who become close to her son and similarly your charoite reached you. You filled the dried rivers with water. You laciniate-teared the clouds and released the water blocked by Vrata Sur.
त्वं महीमवनिं विश्वधेनां तुर्वीतये वय्याय क्षरन्तीम्।
अरमयो नमसैजदर्णः सुतरणाँ अकृणोरिन्द्र सिन्धून्
हे इन्द्र देव! आपने महती तथा सबको प्रीति देने वाली और तुर्वीति तथा वय्य राजा के लिए अभीष्ट फल देने वाली भूमि को अन्न-जल से अचल किया तथा हे इन्द्र देव! आपने नदियों को (सुगमता से तैरने के योग्य) बना दिया।[ऋग्वेद 4.19.6]
हे इन्द्र देव! तुम सभी को प्रेम करने वाली तुर्वीति से और सम्राट वय्य के लिए इच्छित फलदायिनी धरा को अन्न से परिपूर्ण कर दिया और जल से युक्त किया था। हे इन्द्र देव तुमने जल को सुविधा पूर्वक तैरने के योग्यतम कर दिया।
You have made the vast, all cherishing and exuberant earth, delighted with abundant food and tremulous water, for the sake of Turviti and Vayy, you have made the rivers easy to be crossed, swimmed.
Hey Indr Dev! You filled the earth with food grains  for he sake king Vayy of the Turvas-Turviti, made the river comfortable for swimming.
प्राग्रुवो नभन्वो ३ न वक्वा ध्वस्त्रा अपिन्वद्युवतीर्ऋतज्ञाः।
धन्वान्यज्राँ अपृणक्तृषाणाँ अधोगिन्द्रः स्तर्यो ३ दंसुपत्नीः
इन्द्र देव ने शत्रु हिंसक सेना के तुल्य तटध्वंसिनी, जल युक्ता तथा अन्न जनयित्री नदियों को भली-भाँति पूर्ण किया। इन्होंने दस्युओं द्वारा नियन्त्रित गौओं को दुहा।[ऋग्वेद 4.19.7]
शत्रु का विनाश करने वाली सेना के सम्मुख इन्द्र ने किनारों को तोड़ने वाली जल से पूर्ण अन्नोत्पादिनी नदियों को परिपूर्ण किया, उन्होंने जल विहीन शुष्क प्रदेशों को वर्षा द्वारा पूर्ण किया और प्यासे यात्रियों को शांति प्रदान की। जिन गायों पर राक्षसों ने अधिकार कर लिया था, उस प्रसव से निवृत्र हुई गायों को इन्द्र ने दुहा था।
Dev Raj Indr filled food grain producing rivers with water, which were like the enemy army breaking the embarkment. He milked the cows abducted by the demons.
पूर्वीरुषसः शरदश्च गूर्ता वृत्रं जघन्वाँ असृजद्वि सिन्धून्।
परिष्ठिता अतृणद्बद्बधानाः सीरा इन्द्रः स्त्रवितवे पृथिव्या
वृत्रासुर को मारकर इन्द्र ने तमिस्रा द्वारा आच्छादित अनेक उषाओं को तथा संवत्सरों को विमुक्त किया एवं वृत्र द्वारा निरुद्ध जल को भी विमुक्त किया। इन्द्र देव ने मेघ के चारों ओर वर्तमान तथा वृत्र द्वारा अवरुद्ध नदियों को प्रवाहित कर पृथ्वी को तृप्त किया।[ऋग्वेद 4.19.8]
तमिस्रा से ढकी हुई असंख्य उषाओं और वृष्टि को इन्द्र देव ने वृत्र को समाप्त करके विमुक्त किया और वृत्र द्वारा रोकी गई नदियों को धरा पर प्रवाहमान होने के लिए छोड़ा।
Indr Dev killed Vrata Sur and released many Usha & days from darkness releasing waters blocked by Vrata Sur. Dev Raj made the cloud rain and maintained the flow of rivers.
वमृीभिः पुत्रमग्रुवो अदानं निवेशनाद्धरिव आ जभर्थ।
व्य १ न्धो अख्यदहिमाददानो निर्भूदुखच्छित्समरन्त पर्व
हे हरि नामक घोड़े वाले इन्द्र देव! आपने उपजिह्विका द्वारा भक्ष्यमान अग्रू पुत्र को दीमक के स्थान से बाहर किया। बाहर किये जाते समय वह अग्रू पुत्र यद्यापि नेत्रहीन था, फिर भी उसने सर्प को अच्छी तरह से देखा। उसके बाद चीटियों के द्वारा काटे गये अङ्गों को आपने जोड़ा।[ऋग्वेद 4.19.9]
हे महान अश्वों के स्वामी इन्द्र देव! उपजिह्वाका द्वारा प्रथक किये अग्रु पुत्र को तुमने दीमक के बिल से निकाला। निकलते समय वह अग्रु पुत्र नेत्र हीन था। तब भी उसने साँप को भली प्रकार देखा। उपजिह्विका द्वारा भक्षण किये अंगों को इन्द्र देव ने जोड़ दिया था।
Hey Indr Dev, master of horses named Hari! You released the son of Agru with your minor-sub tongue from the termite mould. Tough Agru's son was blind yet he saw the snake clearly. Thereafter, you joined his organs-limbs cut by the ants.
प्र ते पूर्वाणि करणानि विप्राविद्वाँ आह विदुषे करांसि।
यथायथा वृष्ण्यानि स्वगूर्तापांसि राजन्नर्याविवेषीः
हे राजमान प्राज्ञ इन्द्र देव! आप सर्व वेता है। वर्षण योग्य और स्वयं सम्पन्न मनुष्यों के वृष्टि सम्बन्धी कर्मों को आपने जिस प्रकार से किया, वाम देव उन सकल पुरातन कर्मों का उल्लेख करते है।[ऋग्वेद 4.19.10]
हे बुद्धि मान इन्द्रदेव! तुम सभी कुछ जानते हो। वर्षा के योग्य और प्राणियों को सम्पन्न करने वाली वर्षा सम्बन्धी धर्मों का किस प्रकार तुमने किया था, उन सभी कर्मों का वामदेव ने उल्लेख किया है।
Hey intelligent-prudent Indr Dev! You are enlightened-all knowing. Vam Dev described your ancient deeds-endeavours pertaining to rain, leading to human welfare.
नू ष्टुत इन्द्र नू गृणान इषं जरित्रे नद्यो न पीपेः।
अकारि ते हरिवो ब्रह्म नव्यं धिया स्याम रथ्यः सदासाः
हे इन्द्र देव! आप पूर्ववर्ती ऋषियों द्वारा प्रशंसित होकर तथा हम लोगों के द्वारा प्रशंसित होकर जिस प्रकार से जल नदी को पूर्ण करता है, उसी प्रकार स्तोताओं के अन्न को आप प्रवृद्ध करते है। हे हरि विशिष्ट इन्द्र देव! हम आपके उद्देश्य से अभिनव स्तोत्रों रचते हैं, जिससे हम लोग रथवान होकर स्तुति द्वारा सदा आपकी सेवा करते रहें।[ऋग्वेद 4.19.11]
हे इन्द्र देव! तुम प्राचीन मुनियों द्वारा पूजित बने और हमारे द्वारा भी वंदित किये गये हो। तुम जल के द्वारा नदी को पूर्ण करने के तुल्य प्रार्थना करने वालों के अन्न की वृद्धि करते हो। हे इन्द्र देव ! हम तुम्हारे लिए नवीन श्लोकों को कहते हैं, जिसके द्वारा हम रथीवान बने तुम्हारी वंदना और परिचर्या करते रहे।
Hey Indr Dev! You were praised by the ancient sages and us filling the rivers with water and granting food grins to the devotees-worshipers. We compose new Strotr-hymns in your honour on becoming the owners of charoite and worship-pray, serve you.(22.02.2023)
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (20) :: ऋषि :- वामदेव गौतम, देवता :- इन्द्र,   छन्द :- त्रिष्टुप्।
आ न इन्द्रो दूरादा न आसादभिष्टिकृदवसे यासदुग्रः।
ओजिष्ठेभिर्नृपतिर्वज्रबाहुः संगे समत्सु तुर्वणिः पृतन्यून्
अभीष्टप्रद और तेजस्वी इन्द्र देव! हम लोगों को आश्रय प्रदान करने के लिए दूर से पधारें; हम लोगों को आश्रय प्रदान करने के लिए पास से आगमन करें। वे संग्राम में संगत होने पर शत्रुओं का वध करते हैं। वे वज्रबाहु मनुष्यों के पालक और तेजस्वी मरुतों से युक्त हैं।[ऋग्वेद 4.20.1]
हे इन्द्र देव! तुम अभिलाषाओं के प्रदान करने वाले और तेज से परिपूर्ण हो। तुम हमको आश्रय देने के लिए दूर हो, तो भी आओ, निकट हो तो भी पधारकर हमारी सुरक्षा करो। तुम संग्राम स्थान में शत्रुओं का नाश करते हो। तुम वज्र धारण करने वाले हो। तुम प्राणियों के पालनकर्त्ता एवं तेजस्वी मरुद्गण से युक्त हो।
Hey Indr Dev! You accomplish our desires & possess radiance-aura. Whether far or near come and grant asylum-shelter, protection to us. You kill  the enemy in the war, possessing Vajr. You are the nurturer of the living beings and associated with the Marud Gan.
आ न इन्द्रो हरिभिर्यात्वच्छार्वाचीनोऽवसे राधसे च।
तिष्ठाति वज्री मघवा विरप्शीमं यज्ञमनु नो वाजसातौ
हम लोगों के अभिमुख वर्ती इन्द्र देव आश्रय और धन प्रदान करने के लिए हम लोगों के पास अश्वों के साथ पधारें। वज्रवान, धनशाली और महान इन्द्र देव युद्ध में उपस्थित होने पर हमारे इस यज्ञ में उपस्थित होवें।[ऋग्वेद 4.20.2]
हमारे सामने आने वाले इन्द्र आश्रय देने और धन प्रदान करने के लिए अपने अश्वों के साथ हमारे समीप आएँ। वे इन्द्र वज्रधारी, धनैश्वर्य से युक्त एवं श्रेष्ठ हैं, युद्ध का अवसर होने पर वे हमारे कार्यों में सहयोगी बनें।
Let Indr Dev granting us asylum, come to us with his horses. Vajr wielding-possessing, rich-wealthy and great Indr Dev join us in the Yagy after the war.
Wield :: रखना, चलाना, बरतना, हिलाना, सँभालना, फिराना, प्रबंध करना, काम में लगाना, हाथ लगाना, शक्ति, अधिकार आदि रखना और उनका प्रयोग-उपयोग करना, हथियार पास रखना और उसे इस्‍तेमाल करने के लिए तैयार रहना; to have and use power, authority, to hold and be ready to use a weapon.
इमं यज्ञं त्वमस्माकमिन्द्र पुरो दधत्सनिष्यसि क्रतुं नः।
श्वघ्नीव वज्रिन्त्सनये धनानां त्वया वयमर्य आजियेम
हे इन्द्र देव! आप हम लोगों को पुरःसर करके हमारे द्वारा किये जाने वाले यज्ञों को ग्रहण करें। हे वज्र धर! हम आपके स्तोता हैं। जिस तरह से व्याध हिरणों का शिकार करता है, उसी प्रकार से हम आपके द्वारा धन लाभ के लिए युद्ध में विजय प्राप्त करें।[ऋग्वेद 4.20.3]
हे इन्द्र देव! हमारे साथ सखाभाव रखते हुए हमारे द्वारा किये जाते हुए इस अनुष्ठान को हविपूर्ण करो। हे वज्रिन! हम आपकी प्रार्थना करते हैं। जैसे शिकारी हिरणों का शिकार करता है वैसे हम तुम्हारी शक्ति से धन ग्रहण करने हेतु युद्ध में विजेता हों।
Hey Indr Dev! Accept our offerings in the Yagy as a friend. Hey Vajr possessing Indr Dev! You are our deity. The way a tiger hunt the deer, in the same way you should benefited us with wealth, winning war.
उशन्नु षु णः सुमना उपाके सोमस्य नु सुषुतस्य स्वधावः।
पा इन्द्र प्रतिभृतस्य मध्वः समन्यसा ममदः पृष्ठ्येन
हे अन्नवान इन्द्र देव! आप प्रसन्न मन से हम लोगों के समीप आगमन कर हमारी कामना करके उत्तम रूप से अभिषुत, सम्भूत और मादक सोमरस का पान करें एवं माध्यन्दिन सवन में उदीयमान स्तोत्र के साथ सोमपान करके हर्षित होवें।[ऋग्वेद 4.20.4]
उदीयमान :: उगता हुआ, उदित होता हुआ, उठता या उभरता हुआ, होनहार, विकासशील, प्रगतिशील, उन्नतिशील; budding, assurgent, ascendant, nascent.
हे इन्द्र देव! तुम अन्नों के दाता हो, तुम प्रसन्न युक्त मन से हमारे नजदीक आओ तथा हमको चाहते हुए उत्तम प्रकार से सिद्ध किये गये सोमरस को पियो। दिन के मध्य वंदना सवन में उज्जवल स्तोत्र सहित हर्ष प्रदायक सोम को ग्रहण करो।
Hey Indr Dev! You are the provider of food grains. Come to us happily, drink the intoxicating Somras extracted by us, during the mid day and enjoy along with the recitation of ascendant, nascent hymns.
वि यो ररप्श ऋषिभिर्नवोभिर्वृक्षो न पक्वः सृण्यो न जेता।
मर्यो न योषामाभिमन्यमानोऽच्छा विवक्मि पुरुहूतमिन्द्रम्
जो पके फल वाले वृक्ष के तुल्य एवं आयुध कुशल विजयी व्यक्ति के तुल्य हैं और जो नूतन ऋषियों द्वारा विविध प्रकार से स्तूयमान होते हैं, उन पुरुहूत इन्द्र देव के उद्देश्य से हम प्रार्थना करते हैं। जिस प्रकार से मनुष्य अपनी स्त्री की प्रशंसा करता है।[ऋग्वेद 4.20.5]
पुरुहूत :: जिसका आह्वान बहुतों ने किया हो, जिसकी बहुत से लोगों ने स्तुति की हो; invoked by many.
जो इन्द्र देव पके फल वाले वृक्ष के समान और अस्त्र कुशल विजेता के समान पराक्रमी हैं, जो नये ऋषियों के द्वारा असंख्य तरह से पूजनीय होते हैं, उन इन्द्रदेव के लिए हम प्रशंसा से परिपूर्ण श्लोक उच्चारित करते हैं।
We worship Indr Dev, like a man who praise his wife, who is like the tree granting ripe fruits, expert-skilled in using weapons, winner, praised & invoked by the sages-Rishis. We praise-honour him with hymns.
गिरिर्न यः स्वतवाँ ऋष्व इन्द्रः सनादेव सहसे जात उग्रः।
आदर्ता वज्रं स्थविरं न भीम उनेव कोशं वसुना न्यृष्टम्
जो पर्वत के तुल्य प्रवृद्ध और महान हैं, जो तेजस्वी हैं और जो शत्रुओं को अभिभूत करने के लिए सनातन काल में पैदा हुए हैं, वे इन्द्र देव जल द्वारा पूर्ण जलपात्र के तुल्य तेज पूर्ण बृहत वज्र का आदर करते हैं।[ऋग्वेद 4.20.6]
जो शैल के समान विस्तृत हैं, जो तेज से तेजस्वी हैं, जो शत्रुओं को वश में करने के लिए प्राचीन समय में उत्पन्न हुए, वे इन्द्र जल से भरे हुए पात्र के समान अत्यन्त तेजस्वी एवं श्रेष्ठ वज्र के धारण करने वाले हैं।
Indr Dev, who is vast-broad like the mountain, radiant born in ancient-times, eternal, enchant the enemy, respect-honour Vajr like the pot full of water.
न यस्य वर्ता जनुषा न्वस्ति न राधस आमरीता मघस्य।
उद्वावृषाणस्तविषीव उग्रास्मभ्यं दद्धि पुरुहूत संयः
हे इन्द्र देव! आपके जन्म से ही कोई निवारक नहीं रहा। यज्ञादि कर्म के लिए आपके द्वारा प्रदत्व धन का नाशक कोई नहीं रहा। हे बलशाली, तेजस्वी, पुरुहूत! आप अभीष्टवर्षी हैं। आप हम लोगों को धन प्रदान करें।[ऋग्वेद 4.20.7]
हे इन्द्र देव! तुम्हारे प्राकट्य समय से ही तुम्हें कोई रोकने वाला नहीं हुआ। यज्ञादि शुभ कार्यों के लिए तुम्हारे द्वारा किये गये धन का पत्तन करने वाला भी कोई नहीं हुआ। वे बलशाली! तुम बहुत ही तेजस्वी और अभिलाषाओं की वृष्टि करने वाले हो। हमारे लिए धन प्रदान करो।
Hey Indr Dev! There is none to obstruct-restrain you since your birth. There is no one to destroy the grants made by you. Hey mighty-powerful, radiant, invoked by many, you are desires accomplishing. Give us money.
ईक्षे रायः क्षयस्य चर्षेणीनामुत व्रजमपवर्तासि गोनाम्।
शिक्षानरः समिथेषु प्रहावान्वस्वो राशिमभिनेतासि भूरिम्
हे इन्द्र देव! आप प्रजाओं को धन और घर का पर्यवेक्षण करते हैं और विरोधक असुरों गौओं के समूह को उन्मुक्त करते हैं। हे इन्द्र देव! आप शिक्षा के विषय में प्रजाओं के नेता या शासक हैं और युद्ध में प्रहार करने वाले हैं। आप प्रभूत धनराशि के पार हैं।[ऋग्वेद 4.20.8]
पर्यवेक्षक :: काम की देखभाल करनेवाला अधिकारी; supervisor.
हे इन्द्र देव! तुम प्राणियों के धन एवं ग्रहों के पर्यवेक्षक हो। तुम विघ्न प्रदान करने वाले असुरों से गौओं के दल को युक्त करते हो। तुम शैक्षणिक कार्यों में अग्रणी और युद्ध काल में नेतृत्व कर शत्रुओं पर वार करते हो। तुम उत्पन्न सम्पन्नकर्त्ता हो।
Hey Indr Dev! You supervise the wealth-money and houses of he populace, release the cows from the demons captivity. Hey Indr dev! You are the leader of the populace in educational matters and strike the enemy in the war. You possess grandeur-wealth.
कया तच्छृण्वे शच्या शचिष्ठो यया कृणोति मुहु का चिदृष्वः।
पुरु दानुषे विचयिष्ठो अंहोऽथा दधाति द्रविणं जरित्रे॥
अतिशय प्राज्ञ इन्द्रदेव किस प्रज्ञाबल से विश्रुत होते हैं? महान् इन्द्र देव जिस प्रज्ञाबल से मुहुर्मुह कर्म समूह का सम्पादन करते हैं (उसी के द्वारा विश्रुत हैं)। वे याजक गणों के बहुत से पापों को विनष्ट करते हैं और याजकों को धन प्रदान करते हैं।[ऋग्वेद 4.20.9]
तुम शैक्षणिक कार्यों में अग्रणी और युद्ध काल में नेतृत्व कर शत्रुओं पर वार करते हो। तुम उत्पन्न सम्पन्नकर्त्ता हो। वह सबसे अधिक बुद्धि वाले इन्द्रदेव किस वाणी, बल और बुद्धि से परिपूर्ण हैं। किन कार्यों के द्वारा वह श्रेष्ठ इन्द्रदेव बार-बार असंख्य कर्मों को करते हैं। वे मनुष्यों को पापों को समाप्त करते हुए वंदना करने वालों को धन ऐश्वर्य प्रदान करते हैं।
मा नो मर्धीरा भरा दद्धि तन्नः प्र दाशुषे दातवे भूरि यत्ते। 
नव्ये देष्णे शस्ते अस्मिन्त उक्थे प्र ब्रवाम वयमिन्द्र स्तुवन्तः॥
हे इन्द्र देव! आप हम लोगों की हिंसा न करें; बल्कि हम लोगों के पोषक बनें। हे इन्द्र देव! आपका जो प्रभूत धन हव्य दाता को दान देने के लिए आपका है, वह धन लाकर हमें दें। हम आपका भजन करते हैं। इस नूतन दान योग्य और प्रशस्त उक्थ में हम आपका विशेष रूप से भजन करते हैं।[ऋग्वेद 4.20.10]
हे इन्द्र देव! हमारा नाश न हो। तुम्हारे लिए जो प्राणी अपने को अर्पित करते हैं उनको अपना लेने योग्य ऐश्वर्य दो। हमारी अर्चना स्वीकार हो।
Hey Indr Dev! Do not vanish us; nurture us. Grant us the money meant for charity-donation for those who make offerings to you. We worship-pray you. Accept our requests.
नू ष्टुत इन्द्र नू गृणान इषं जरित्रे नद्यो ३ न पीपेः।
अकारि ते हरिवो ब्रह्म नव्यं धिया स्याम रथ्यः सदासाः
हे इन्द्र देव! आप पूर्व वर्ती ऋषियों द्वारा प्रशंसित होकर तथा हम लोगों के द्वारा स्तुत होकर जिस प्रकार से जल नदी को पूर्ण करता है, उसी प्रकार आप स्तोताओं के अन्न को प्रवृद्ध करते है। हे हरि विशिष्ट इन्द्र देव! हम आपके उद्देश्य से अभिनव स्तोत्रों की रचना करते हैं, जिससे हम लोग रथवान होकर स्तुति द्वारा सदा आपकी सेवा करते रहें।[ऋग्वेद 4.20.11]
हे इन्द्र देव! तुम प्राचीन काल में ऋषियों एवं अब हमारे द्वारा भी पूज्य हुए हो। तुम नदी के पूर्ण करने वाले जलों के समान हम वंदनाकारियों के अन्न की वृद्धि करते हो। तुम अश्ववान हो, हम तुम्हारे लिए नवीन श्लोक की उत्पत्ति करते हैं, जिसके द्वारा हम पथ संयुक्त बन तुम्हारी प्रार्थना और परिचर्या करते हैं।
Hey Indr Dev! You were worshiped-prayed by the ancient Rishis-sages. Having been worshiped by us you increase our stock of food grains just like the waters which fill the rivers, on being requested-prayed. We have compose new hymns in your honour so that we possess charoites and become rich.
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (21) :: ऋषि :- वामदेव गौतम, देवता :- इन्द्र,   छन्द :- पंक्ति, त्रिष्टुप्।
आ यात्विन्द्रोऽवस उप न इह स्तुतः सधमादस्तु शूरः।
वावृधानस्तविषीर्यस्य पूर्वीर्द्यौर्न क्षत्रमभिभूति पुष्यात्
जिनका बल प्रभूत है। जो सूर्य के तुल्य अभिभव समर्थ बल का पोषण करते हैं, वे हम लोगों के समीप रक्षा के लिए आवें। पराक्रमवान और प्रवृद्ध इन्द्र देव हमारे साथ प्रसन्न हों।[ऋग्वेद 4.21.1]
प्रभूत :: उत्पन्न, जो हुआ हो, निकला हुआ, उद्गत, बहुत अधिक, प्रचुर, पूर्ण, पूरा, पक्व, पका हुआ, उन्नत, उद्‌गम, भूत, उद्‌गम; excellent, outstanding, regeneratory, sufficient, ample, abundant.
वीरेश्वर इन्द्र वंदनाओं द्वारा हमारी सुरक्षा हेतु पधारें। वह वृद्धि को ग्रहण हुए हमारी प्रसन्नता से ही प्रसन्नता को मानें। जो शक्ति, कौशल से सम्पन्न और सूर्य के समान तेजस्वी हैं, वे इन्द्र देव हमको पराजित करने वाले होकर पोषण करें।
May Indr Dev possessing aura-radiance like the Sun, come to us for protection and being praised by us, being the mighty hero, be exhilarated along with us. He possess employ his own over powering vigour.
Let mighty Indr Dev possessing radiance like the Sun, come to protect us. Let him enjoy with us. He possess valour and ample, abundant power, might.
तस्येदिह स्तवथ वृष्ण्यानि तुविद्युम्नस्य तुविराधसो नॄन्।
यस्य क्रतुर्विदथ्यो ३ न सम्राट् साह्वान्तरुत्रो अभ्यस्ति कृष्टीः
हे स्तोताओ! यज्ञार्ह सम्राट के तुल्य जिनका अभिभव कारक तथा त्राण कारक कर्म शत्रु सम्बन्धिनी प्रजाओं को अभिभूत करता है, उन प्रभूत यशा तथा अतिशय धन शाली इन्द्र देव के बलभूत नेता मरुतों की आप लोग इस यज्ञ में प्रार्थना करें।[ऋग्वेद 4.21.2]
हे मनुष्यों! यज्ञ आदि शुभ कर्म करने वाला राजा के समान जिनका सबको करने वाला कर्म शत्रुओं की सेना को पराजित करने में सक्षम हैं तथा हमारे रक्षक हैं, उस यशस्वी एवं ऐश्वर्यशाली इन्द्र के पराक्रम के कारण रूप मरुद्गण का इस यज्ञ स्थान में वंदना करो।
Hey humans! Pray-worship Marud Gan for the success of the Yagy, who are the reason behind the valour of revered Indr Dev possessing wealth-riches, grandeur and might, who is capable of crushing the enemy and our protector. 
आ यात्विन्द्रो दिव आ पृथिव्या मक्षू समुद्रादुत वा पुरीषात्।
स्वर्णरादवसे नो मरुत्वान्परावतो वा सदनादृतस्य
हे इन्द्र देव! हम लोगों को आश्रय देने के लिए मरुतों के साथ स्वर्ग लोक से, भूलोक से, अन्तरिक्ष लोक से, जल से, आदित्य लोक से, दूर देश से और जल के स्थान भूत मेघ लोक से यहाँ पधारें।[ऋग्वेद 4.21.3]
हे इन्द्र देव! हमको शरण देने के लिए स्वर्ग, धरा, अंतरिक्ष, सूर्य-मंडल में या जिस दूर स्थल में भी हो, वही से मरुद्गण के साथ पधारो।
Hey Indr Dev! Come to protect us along with the Marud Gan from heavens, space, earth, water, Adity Lok, distant places and the abode of clouds or where ever you are.
स्थूरस्य रायो बृहतो य ईशे तमु ष्टवाम विदथेष्विन्द्रम्।
यो वायुना जयति गोमतीषु प्र धृष्णुया नयति वस्यो अच्छ
जो स्थूल एवं महान् धन के अधिपति हैं, जो प्राण रूप बल द्वारा शत्रु सेना को जीतते हैं, जो प्रगल्भ हैं और जो स्तोताओं को श्रेष्ठ धन प्रदान करते हैं, यज्ञ स्थल में हम उन इन्द्र देव के उद्देश्य से प्रार्थना करते हैं।[ऋग्वेद 4.21.4]
प्रगल्भ :: चतुर, होशियार, प्रतिभाशाली, संपन्न बुद्धि वाला, उत्साही, हिम्मती, साहसी, प्रायः बढ़-चढ़कर बोलने वाला, अधिक बोलने वाला, वाचाल, निडर, निर्भय, पुष्ट, प्रौढ़, उद्धत, जिसमें नम्रता न हो, हाज़िर जवाब, समय पर ठीक उत्तर देने वाला; profound, forward, magniloquent.
जो स्थिर और सर्वश्रेष्ठ समृद्धियों के स्वामी हैं, जो प्राण रूप शक्ति से शत्रु की सेनाओं को हराते हैं, जो अत्यन्त कुशल हैं और प्रार्थनाओं को करने वालों को उत्तम धन प्रदान करते हैं, उन शत्रुहन्ता इन्द्रदेव के लिए हम इस यज्ञ स्थान में प्रार्थना करते हैं।
We request-solicit the presence of Indr Dev in our Yagy, who is the owner of great wealth, winner of the enemy, forward, grants money to the devotees.
उप यो नमो नमसि स्तभायन्नियर्ति वाचं जनयन्यजध्यै।
ऋञ्जसानः पुरुवार उक्थैरेन्द्रं कृण्वीत सदनेषु होता
जो निखिल लोकों का स्तम्भन करके यज्ञार्थ गर्जनशील वचन को उत्पन्न करते हैं और हव्य प्राप्त करके वृष्टि द्वारा अन्न प्रदान करते हैं, जो प्रसाधन योग्य तथा उक्थ (स्तोत्र, hymns) द्वारा स्तुति योग्य हैं, यज्ञ गृह में होता उन इन्द्र देव का आह्वान करते हैं।[ऋग्वेद 4.21.5]
स्तम्भन :: निश्चल, निस्तब्ध, सुन्न; repressed, appalled, paralyzed, stunted, transfixed, slaphappy, paralysed, flabbergasted, restrained, benumbed, spaced out.
उक्थ  :: श्लोक, स्तोत्र; hymns.
जो सभी संसार को स्तंभित करते हुए गर्जन शब्द कों उत्पन्न करते हैं और हवियाँ स्वीकार कर वर्षा द्वारा अन्न प्रदान करते हैं, जो उत्तम स्तोत्र द्वारा श्लोक के पात्र हैं, उन इन्द्र को यज्ञ-स्थान में हम आमंत्रित करते हैं।
We invoke Indr Dev, who stun all abodes, create roaring-thundering  sound for the Yagy, accept offerings and grant food grains, deserve worship-prayers with excellent Strotr, at our Yagy site. 
धिषा यदि धिषण्यन्तः सरण्यान्त्सदन्तो अद्रिमौशिजस्य गोहे।
आ दुरोषाः पास्त्यस्य होता यो नो महान्त्संवरणेषु वह्निः
जब इन्द्र देव की प्रार्थना के अभिलाषी याजक गण के गृह में निवासकारी स्तोता युद्ध प्रार्थना सहित उनके निकट उपगत होते हैं, तब वे इन्द्र देव आवें। वे करें। वे याजक गणों के होता है। उनका क्रोध अत्यन्त भयंकर है।[ऋग्वेद 4.21.6]
जब इन्द्र देव की प्रार्थना की इच्छा करने वाले के गृह में निवास करते हुए प्रार्थना करने वाले इन्द्र देव के सामने श्लोक उपस्थित हों, तब वे इन्द्र देव प्रस्थान करें। वे युद्ध भूमि में हमारे सहायक हों।
When the repeaters of his commendations, abiding in the dwelling of the worshipper, approach Indr Dev with praise, may he who is our great sustainer in conflicts, whose wrath is difficult to be appeased, becomes the ministering priest of the master of the house.
When the hosts-priests staying in the house of the Ritviz, make prayers devoted to war, let Indr Dev come at that occasion. His wrath-anger is tremendous.
सत्रा यदींभार्वरस्य वृष्णः सिषक्ति शुष्मः स्तुवते भराय।
गुहा यदीमौशिजस्थ गोहे प्र यद्धिये प्रायसे मदाय
जगद्भर्ता अर्थात् जगत का पालन-पोषण करने वाले प्रजापति के पुत्र एवं अभीष्टवर्षी इन्द्र देव का बल स्तोत्र कारी यजमानों की सेवा करता है। वह बल वास्तव में याजक गणों के भरण के लिए गुहारूप हृदय उत्पन्न होता है, यजमानों के गृह और कर्म में वास्तव में अवस्थान करता है तथा यजमानों की अभीष्ट प्राप्ति और हर्ष के लिए निःसंदेह वह बल उत्पन्न होता है। इन्द्र देव का बल यजमानों का सदैव पालन करता है।[ऋग्वेद 4.21.7]
वे इन्द्र देव अत्यन्त तेज वाले यजमानों के होता रूप हैं। प्रजापति के पुत्र, संसार का पालन-पोषण करने वाले, इच्छाओं की वर्षा करने वाले, इन्द्र का बल स्तोता यजमान का रक्षक है। वह शक्ति यजमानों का पालन करने के लिए शरीर के गुफा रूपी मन में प्रकट होती है। वह शक्ति यजमानों के घरों और कर्मों में व्याप्त होती हुई हर्ष और अभीष्ट प्राप्ति के लिए उत्पन्न होती हुई सदैव पोषण करती है।
Desires fulfilling-accomplishing, nurtures the universe & the hosts, son of Prajapati,  Indr Dev is like the host of the Ritviz. His might, valour takes care of the Ritviz & protects them. His power appear in the innerself of the Ritviz, generating happiness, pervade their homes & endeavours.
वि यद्वरांसि पर्वतस्य वृण्वे पयोभिर्जिन्वे अपां जवांसि।
विदगौरस्य गवयस्य गोहे यदी वाजाय सुध्यो ३ वहन्ति
इन्द्र देव ने मेघ के द्वार को अपावृत किया और जल के वेग को जल समूह द्वारा परिपूर्ण किया; इसलिए जब सुकर्मा याजक गण इन्द्र देव को अन्न प्रदान करते हैं, तब वे याचकों को गौर मृग और गवय मृग प्रदान करते हैं।[ऋग्वेद 4.21.8]
इन्द्र देव ने बादल के द्वार को खोल डाला। जल की चाल को युक्त किया। जब श्रेष्ठ कार्य वाले यजमान इन्द्रदेव को हवियाँ प्रदान करते हैं। तब वे गौ आदि धन की प्राप्ति करते हैं।
Indr Dev opened the source of clouds and accelerated the flow of waters. The Ritviz made offerings of food grains for Indr Dev and in return they got cows & wealth.
भद्रा ते हस्ता सुकृतोत पाणी प्रयन्तारा स्तुवते राध इन्द्र।
का ते निषत्तिः किमु नो ममत्सि किं नोदुदु हर्षसे दातवा उ
हे इन्द्र देव! आपका कल्याण कारक हस्त द्वय (दोनों हाथ) सत्कर्म का अनुष्ठान करता है। एवं आपका हस्त द्वय याजक गण को धन प्रदान करता है। हे इन्द्र देव! आपकी स्थिति क्या है? क्यों आप हम लोगों को हर्षित नहीं करते? क्यों आप हम लोगों को धन देने के लिए प्रसन्न नहीं होते?[ऋग्वेद 4.21.9]
हे इन्द्र देव! तुम्हारे दोनों हाथ कल्याणकारी हैं। हे इन्द्र देव! तुम्हारे उच्च पद की क्या स्थिति है? तुम हमको धन प्रदान करने हेतु हर्षित क्यों नहीं होते?
Hey Indr Dev! Both of your hands are busy in welfare, virtuous deeds granting money to the Ritviz. What's your position!? Don't you become happy having provided us riches?!
एवा वस्व इन्द्रः सत्यः सम्राड्ढन्ता वृत्रं वरिवः पूरवे कः।
पुरुष्टुत क्रत्वा नः शग्धि रायो भक्षीय तेऽवसो दैव्यस्य
इस प्रकार प्रार्थित होकर सत्यवान, धनेश्वर और वृत्र हन्ता इन्द्र देव याजक गणों को धन देते हैं। हे बहु स्तुत! हम लोगों की प्रार्थना के लिए आप हमें धन-धान्य प्रदान करें। जिससे हम दिव्य ऐश्वर्य का सेवन कर सकें।[ऋग्वेद 4.21.10]
सत्य से परिपूर्ण, धनों के दाता वृत्र को मारने वाले इन्द्र की यह स्तुति किये जाने पर वे यजमानों को प्रदान करते हैं। हे इन्द्रदेव! तुम अनेकों द्वारा पूजनीय हो। हमारी वंदना श्रवण कर हमें धन प्रदान करो जिससे हम दिव्य ऐश्वर्य का उपयोग कर सकें।
On being worshiped-prayed truthful, donator of riches, killer of Vratr Indr Dev grants wealth to the Ritviz. Hey Indr Dev! Worshiped by several people, grant us wealth & food grains so that we can enjoy divine grandeur.
नू ष्टुत इन्द्र नू गृणान इषं जरित्रे नद्यो ३ न पीपेः।
अकारि ते हरिवो ब्रह्म नव्यं धिया स्याम रथ्यः सदासाः 
हे इन्द्र देव! आप पूर्ववर्ती ऋषियों द्वारा प्रार्थित होकर तथा हम लोगों के द्वारा स्तूयमान होकर जिस प्रकार से जल नदी को पूर्ण करता है, उसी प्रकार स्तोताओं के अन्न को आप प्रवृद्ध करते हैं। हे हरि विशिष्ट इन्द्र देव! हम आपके उद्देश्य से अभिनव स्तोत्रों का गायन करते हैं, जिससे हम लोग रथवान होकर स्तुति द्वारा सदा आपकी सेवा करते रहें।[ऋग्वेद 4.21.11] 
हे इन्द्र देव! तुम पूर्व कालीन ऋषियों द्वारा वंदित हुए हो। अब हमारे द्वारा वंदनीय होकर जल द्वारा नदी को पूर्ण करने वाले के तुल्य वंदना करने वालों के अन्न की वृद्धि करो। हे अश्ववान इन्द्र देव! हम तुम्हारे लिए नवीन श्लोक रचते हैं। जिसके द्वारा हम श्रेष्ठ रथ से परिपूर्ण हुए तुम्हारा पूजन और परिचर्या करते रहें।
Hey Indr Dev! Prayed-worshiped by ancient sages-Rishis, praised by us, you fill our godown-stores with food grains, just as the water fills the river. Hey the master of horses named Hari we compose new hymns in your honour-praise, so that we posses chariots and continue serving you.(01.03.2023)
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (22) :: ऋषि :- वामदेव गौतम, देवता :- इन्द्र,   छन्द :- त्रिष्टुप्।
यन्न इन्द्रो जुजुषे यच्च यष्टि तन्नो महान्करति शुष्या चित्।
ब्रह्म स्तोमं मघवा सोममुक्था यो अश्मानं शवसा बिभ्रदेति
महान बलवान इन्द्र देव हम लोगों के हविष्यान्न का सेवन करते हैं। वे धनवान हैं। वे वज्र धारित करके बल से युक्त होकर आगमन करते हैं। इन्द्र देव हव्य, स्तोम, सोमरस और प्रार्थना को स्वीकार करते हैं।[ऋग्वेद 4.22.1] 
हे महा बलिष्ठ इन्द्र देव! हमारा हव्य रूप अन्न भक्षण करते हैं। वे समृद्धिवान वज्र धारण कर, बलशाली बनकर आते हैं। हविरन्न, प्रार्थना, सोम तथा श्लोकों को प्राप्त करते हैं।
Mighty, great Indr Dev accept our offerings of food grains. he is rich. He arrives wielding Vajr becoming powerful. He accept our prayers, offerings, Somras, Strotr-hymns.
वृषा वृषन्धिं चतुरश्रिमस्यनुग्रो बाहुभ्यां नृतमः शचीवान्। 
श्रिये परुष्णीमुषमाण ऊर्णां यस्या पर्वाणि सख्याय विव्ये
अभीष्टवर्षी इन्द्र देव दोनों बाहुओं से वृष्टि कारी चतुर्धारा विशिष्ट वज्र को शत्रुओं के ऊपर फेंकते हैं। वे उग्र, नेतृ श्रेष्ठ और कर्मवान होकर आच्छादन कारिणी परुष्णी नदी की आश्रय के लिए सेवा करते हैं। इन्होंने परुष्णी के भिन्न-भिन्न प्रदेश को मित्रता के लिए आवृत्त किया।[ऋग्वेद 4.22.2]
वे इन्द्रदेव इच्छाओं की वृष्टि करने वाले हैं। वे विकाराल कार्य वाले, अग्रणी करने वाले बनकर परुष्णी नदी को आश्रय देने के लिए पूर्ण करते हैं। उन इन्द्र ने परुष्णी नदी को मंत्रों के कर्म के लिए सम्पन्न किया।
Desires-accomplishments fulfilling, rain producing Indr Dev, launch four edged Vajr with both hands over the enemies. The great leader turn furious, duty bound & serve Parushni river granting protection to her. He pervaded various regions of Parushni river friendly.
यो देवो देवतमो जायमानो महो वाजेभिर्महद्भिश्च शुष्मैः।
दधानो वज्रं बाह्वोरुशन्तं द्याममेन रेजयत्प्र भूम
जो दीप्तिमान, जो दातृ श्रेष्ठ और जो उत्पन्न होते ही प्रभूत अन्न  तथा महाबल से युक्त हुए, वे दोनों बाहुओं में कामयमान वज्र धारित करके बल द्वारा द्युलोक और भूलोक को प्रकम्पित करते हैं।[ऋग्वेद 4.22.3]
जो अत्यन्त प्रकाशवान, उत्तम दानी, उत्पन्न होते ही अन्न और अत्यन्त शक्तिशाली हो गए। वे इन्द्र दोनों भुजाओं में वज्र उठाकर अपनी शक्ति से नभ और पृथ्वी को कंपा देते थे।
Excellent donor, radiant turn mighty-powerful as soon as he took birth and possessed a lot of food grains. He wield Vajr in both hands and shake the heaven and earth.
विश्वा रोधांसि प्रवतश्च पूर्वीर्द्यौर्ऋष्वाज्जनिमन्नेजत क्षाः।
आ मातरा भरति शुष्म्या गोर्नृवत्परिज्मन्नोनुवन्त वाताः
महान इन्द्र देव के जन्म होने पर समस्त पर्वत, अनेक समुद्र, द्युलोक और पृथ्वी उनके भय से कम्पित हुई। बलवान इन्द्र देव गतिशील सूर्य के माता-पिता द्यावा-पृथ्वी को धारित करते हैं। उनके द्वारा प्रेरित होकर वायु मनुष्य के तुल्य शब्द करती है।[ऋग्वेद 4.22.4]
उन श्रेष्ठ इन्द्र के प्राकट्य पर सभी शैल, सभी समुद्र, नभ और धरती उनके डर से कंपित हो गए। वे बलशाली, इन्द्रदेव गतिमान आदित्य, माता-पिता, अम्बर, धरा को धारण करते हैं। इन्द्र देव द्वारा प्रेरणा प्राप्त पवन मनुष्य के तुल्य ध्वनिकारी होता है।
The moment Indr Dev, evolved, the mountains, ocean, heavens and the earth trembled due to his fear. Mighty Indr Dev support the father of Sun, the earth and sky. Air inspired by him sound like the humans.
ता तू त इन्द्र महतो महानि विश्वेष्वित्सवनेषु प्रवाच्या।
यच्छूर धृष्णो धृषता दधृष्वानहिं वज्रेण शवसाविवेषीः
हे इन्द्र देव! आप महान हैं, आपका कर्म महान है और आप समस्त सवन में स्तुति योग्य हैं। हे प्रगल्भ, शूर, इन्द्र देव! आपने सम्पूर्ण लोक को धारित करके धर्षणशील वज्र द्वारा बल पूर्वक अहि को विनष्ट कर दिया।[ऋग्वेद 4.22.5]
हे इन्द्र देव! तुम सर्वश्रेष्ठ हो, तुम्हारा कार्य महत्त्वशील है और तुम समस्त सवनों में वंदनाओं के पात्र हो। तुम अत्यन्त मेधावी एवं पराक्रमी हो। तुमने शक्ति पूर्वक अपने वज्र से अहि का पतन किया था और समस्त लोकों को धारण किया था।
Hey Indr Dev! You are great. Your endeavours-efforts are great. You deserve worship-prayers during the three segments of the day. Hey intelligent-prudent, brave Indr Dev! You support the entire universe and killed Ahi-demon with you Vajr forcibly.
ता तू ते सत्या तुविनृम्ण विश्वा प्र धेनवः सिस्रते वृष्ण ऊध्नः।
अधा ह त्वद्वृषमणो भियानाः प्र सिन्धवो जवसा चक्रमन्त
हे अधिक बलशाली इन्द्र देव! आपके वे सकल कर्म निश्चय ही सत्य हैं। हे इन्द्र देव! आप अभीष्टवर्षी है। आपके भय से गौएँ अपने ऊधः प्रदेशों में दूध टपकाती हैं। हे हर्षण शील! नदियाँ आपके भय से वेग पूर्वक प्रवाहित होती हैं।[ऋग्वेद 4.22.6]
हे इन्द्र देव! तुम अत्यन्त शक्तिशाली हो। तुम्हारे सभी कर्म भय से ओत-प्रोत हैं। तुम अभीष्टों की वर्षा करने वाले हो। तुम्हारे डर से गौएँ दूध की रक्षक हैं। नदियाँ तुम्हारे डर से प्रवाहित होती हैं। 
Hey mighty-powerful Indr Dev! Your endeavours are truthful. You grant-accomplish desires. Cows yield milk due to your fear. The river maintain their flow at high speed due to your fear.
अत्राह ते हरिवस्ता उ देवीरवोभिरिन्द्र स्तवन्त स्वसारः।
यत्सीमनु प्र मुचो बद्बधाना दीर्घामनु प्रसितिं स्यन्दयध्यै
हे हरि वान इन्द्र देव! जब आपने वृत्र द्वारा बद्ध इन नदियों को दीर्घ कालिक बन्धन के अनन्तर प्रवाहित होने के लिए मुक्त किया, तब उसी समय वे प्रसिद्ध द्युतिमती नदियाँ आपके द्वारा रक्षित होने के लिए आपका प्रार्थना करती थीं।[ऋग्वेद 4.22.7]
हे अश्व वान इन्द्र देव! जब तुमने वृत्र द्वारा रोकी गयी इन नदियों को बहुत कालो परान्त प्रवाहमान के लिए छोड़ा, तभी उसी समय वे सुन्दर नदियाँ तुम्हारी शरण के लिए प्रार्थना करती थीं।
Hey the master of horses named Hari, Indr Dev! The beautiful rivers blocked by Vratr used to worship-pray you, when you released them.
पिपीळे अंशुर्मद्यो न सिन्धुरा त्वा शमी शशमानस्य शक्तिः। अस्मद्र्यक्शुशुचानस्य यम्या आशुर्न रश्मि तुव्योजसं गोः
हर्ष जनक सोम निष्पीड़ित हुआ है, स्पन्दमान होकर यह आपके निकट आगमन करे। शीघ्र गामी आरोही गमनशील अश्व की दृढ़बल्गा धारण करके जिस प्रकार से अश्व को प्रेरित करता है, उसी प्रकार आप दीप्तिमान स्तोता की प्रार्थना को हमारे निकट प्रेरित करें।[ऋग्वेद 4.22.8]
हर्षोत्पादक सोम सिद्धस्थ हुआ। वह गतिमान होकर तुम्हारे समीप आए। तीव्रगामी सवार चलने वाले अश्व की लगाम पकड़कर जैसे उसे प्रेरणा देता है, उसी प्रकार तुम पवित्र कर्म वाले स्तोता की वंदना को प्रेरणा प्रदान करो।
Pleasure generating Somras has been extracted for you, move quickly to drink it. The manner in which a fast moving rider holds the reins of the horse and inspire-kick him, like wise direct-inspire the prayers of the virtuous hosts to us.
अस्मे वर्षिष्ठा कृणुहि ज्येष्ठा नृम्णानि सत्रा सहुरे सहांसि।
अस्मभ्यं वृत्रा सुहनानि रन्धि जहि वधर्वनुषो मर्त्यस्य
हे सहन शील इन्द्र देव! आप सर्वदा शत्रुओं का नाश करने करने वाला, प्रवृद्ध और प्रशस्त बल हम लोगों को प्रदान करें। वध योग्य शत्रुओं को हमारे वशी भूत करें। हिंसक मनुष्यों के अस्त्रों को नष्ट करें।[ऋग्वेद 4.22.9]
हे इन्द्र देव! तुम शत्रुओं को हमेशा हराने वाला श्रेष्ठ बल हमें दो। मृत करने योग्य शत्रुओं को हमारे अधिकार में करो और हिंसा करेन वाले विरोधियों के हथियारों का पतन करो।
Hey tolerant Indr Dev! Grant us the strength, power, might to us to kill-eliminate the enemy. Let the enemy fit for slaying, come under under our control. Destroy the weapons-Astr of the enemy.
TOLERANT ::  सहनशील, सहने योग्य, सहिष्णु; large heartedpatient, passive, staying, bearable, endurable.
अस्माकमित्सु शृणुहि त्वमिन्द्रास्मभ्यं चित्राँ उप माहि वाजान्।
अस्मभ्यं विश्वा इषणः पुरंधीरस्माकं सु मघवन्बोधि गोदाः
हे इन्द्र देव! आप हम लोगों की प्रार्थना श्रवण करें। हम लोगों को विविध प्रकार का अन्न प्रदान करें। हमारे लिए समस्त बुद्धि प्रेरित करें। हमारे लिए आप गौ प्रदान करें।[ऋग्वेद 4.22.10]
हे इन्द्र देव! हमारी प्रार्थना को सुनो। हमको विविध भाँति का अध्ययन आदि प्रदान करो। हमारे लिए मतियों की शिक्षा प्रदान करो और हमको धेनुएँ प्रदान करो।
Hey Indr Dev! Listen-respond to our prayers. Give us various kinds of food grains. Inspire-motivate our intelligence. Grant us cows. 
नू ष्टुत इन्द्र नू गृणान इषं जरित्रे नद्यो ३ न पीपेः।
अकारि ते हरिवो ब्रह्म नव्यं धिया स्याम रथ्यः सदासाः
हे इन्द्र देव! आप पूर्ववर्ती ऋषियों द्वारा प्रार्थित होकर तथा हम लोगों के द्वारा प्रशंसित होकर जिस प्रकार से जल नदी को पूर्ण करता है, उसी प्रकार स्तोताओं के अन्न को प्रवृद्ध करते हैं। हे हरि विशिष्ट इन्द्र देव! हम आपके उद्देश्य से अभिनव स्तोत्रों का गान करते हैं, जिससे हम लोग रथवान होकर स्तुति द्वारा सदा आपकी सेवा करते रहें।[ऋग्वेद 4.22.11]
हे इन्द्र देव! तुम प्राचीन ऋषियों द्वारा पूजनीय, हम भी अब तुम्हारी वंदना करते हैं। तुम जल द्वारा नदी को पूर्ण करने के समान वदंना करने वालों के लिए अन्न की वृद्धि करते हो। हे इन्द्र! तुम अश्वों के दाता हो। हम तुम्हारे लिए नए श्लोक की रचना करते हैं। जिससे हम रथ वाले बनकर तुम्हारी वंदना और परिचर्या करते रहें।
Hey Indr Dev! The manner in which you fill the rivers with water on being requested by the ancient sages-Rishis, in the same manner grant food grains to the hosts-devotees. Hey Indr Dev! We pray you with the beautiful Strotr, so that we possess charoite and keep on serving you.(03.03.2023)
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (23) :: ऋषि :- वामदेव गौतम, देवता :- इन्द्र,   छन्द :- त्रिष्टुप्।
कथा महामवृधत्कस्य होतुर्यज्ञं जुषाणो अभि सोममूधः।
पिबन्नुशानो जुषमाणो अन्धो ववक्ष ऋष्वः शुचते धनाय
हम लोगों की प्रार्थना महान इन्द्र देव को किस प्रकार से वर्द्धित करेगी? वे किस होता के यज्ञ में प्रसन्न होकर आगमन करते हैं? महान इन्द्र देव सोम रस का आस्वादन करते हुए तथा अन्न की कामना और सेवा करते हुए किस याजकगण को देने के लिए प्रदीप्त धन को धारित करते हैं।[ऋग्वेद 4.23.1]
हमारी वन्दना इन्द्र देव को किस प्रकार वृद्धि करेंगी? वे किस होता के अनुष्ठान में प्रेम भाव से पधारते हैं। इन्द्र देव श्रेष्ठ हैं। वे सोमरस का स्वाद लेते हुए तथा हवि की अभिलाषा करते हुए उज्जवल धन को किस यजमान के लिए धारण करते हैं?
How can our prayers-worship promote-boost Indr Dev?! In whose-the host's Yagy, he join-participate?! Great Indr Dev sips-drink Somras & grants riches to the host who wish to have food grains and serve him.
को अस्य वीरः सधमादमाप समानंश सुमतिभिः को अस्य।
कदस्य चित्रं चिकिते कदूती वृधे भुवच्छशमानस्य यज्योः
कौन वीर इन्द्रदेव के साथ सोमपान करता है? कौन व्यक्ति इनके अनुग्रह को प्राप्त करता है? कब इनके विचित्र धन वितरित होंगे? कब ये स्तोता याजकगण को वर्द्धित करने के लिए रक्षा युक्त होंगे?[ऋग्वेद 4.23.2]
इन्द्र सहित कौन सोम रस पियेगा? कौन उनकी दया प्राप्त करेगा? उनका अलौकिक धन कब बाँटा जायेगा? अपने श्लोक को बढ़ाने के लिए किसकी रक्षा करेंगे? हे इन्द्र! तुम श्रेष्ठ यश से युक्त होकर होता की बात कैसे श्रवण करते हो? 
Who is the brave person who will enjoy Somras with Devraj Indr?! Who pleases him and gets his favours?! When will his amazing riches be distributed?! When will these Stota-Ritviz be protected to flourish-accomplish their desirous?!
कथा शृणोति हूयमानमिन्द्रः कथा शृण्वन्नवसामस्य वेद।
का अस्य पूर्वीरुपमातयो ह कथैनमाहुः पपुरिं जरित्रे
हे इन्द्र देव! परमैश्वर्य से युक्त होकर आप होता की कथा को क्योंकर श्रवण करते हैं? स्तोत्रों को सुनकर प्रार्थना करने वाले होता की रक्षण कथा को क्योंकर जानते हैं? इन्द्र देव के पुरातन दान कौन हैं? वे दान इन्द्र देव को स्तोताओं की अभिलाषा के पूरक क्यों कहते हैं? [ऋग्वेद 4.23.3]
तुम श्लोकों को सुनकर ही वंदनाकर्त्ता की सुरक्षा को कैसे जानते हो? तुम्हारे प्राचीन दान कौन से हैं? तुम्हारे वे दान वंदनाकारी की कामना को पूर्ण करने वाले क्यों कहे जाते हैं?
How is that Indr Dev hears (the worshipper) who invokes him and hearing, how does he know his necessities? What are his gifts of old; why have they termed him the fulfiller (of the desires) of him who offers praise?
Hey Indr Dev! Blessed with Ultimate grandeur, how do you respond to the prayers of the devotees?! How do you manage to protect the devotee?! What are the tales of charity of Indr Dev? Why these donations are related to accomplishments of the desires of the devotees? 
कथा सबाधः शशमानो अस्य नशदभि द्रविणं दीध्यानः।
देवो भुवन्नवेदा म ऋतानां नमो जगृभ्वाँ अभियज्जुजोषत्
जो याजक गण पीड़ा युक्त होकर इन्द्र देव की प्रार्थना करते हैं और यज्ञ द्वारा दीप्ति युक्त होते हैं, वे किस प्रकार से इन्द्र सम्बन्धी धन प्राप्त करते हैं? जब द्युतिमान इन्द्र देव हव्य ग्रहण करके हमारे ऊपर प्रसन्न होते हैं, तब वे हमारी प्रार्थना को विशेष रूप से जानते हैं।[ऋग्वेद 4.23.4]
जो यजमान दुख में पड़कर इन्द्र देव की प्रार्थना करते और अनुष्ठान के द्वारा ज्योति पाते हैं, वे इन्द्र देव के धन को कैसे ग्रहण करते हैं। जब ज्योतिवान इन्द्र देव सेवन करके हम पर प्रसन्न होते हैं, तब वे हमारे श्लोकों को ठीक तरह से समझते हैं। 
How do the Ritviz get money-wealth from Indr Dev, when they worship-pray to him under distress-pain, conducting the Yagy? Radiant Indr Dev answer our prayers when he accept our offerings and become happy with us.
कथा कदस्या उषसो व्युष्टौ देवो मर्तस्य सख्यं जुजोष।
कथा कदस्य सख्यं सखिभ्यो ये अस्मिन्कामं सुयुजं ततस्त्रे
द्योतमान इन्द्र देव उषा के प्रारम्भ में (प्रभात में) किस प्रकार और कब मनुष्यों के बन्धुत्व की सेवा करते हैं? जो होता इनके उद्देश्य से सुयोग तथा कमनीय हव्य को विस्तारित करते हैं, उन बन्धुओं के प्रति कब और किस प्रकार से अपनी मित्रता को इन्द्र देव प्रकाशित करते हैं?[ऋग्वेद 4.23.5] 
प्रकाशवान इन्द्र उषा बेला में कब और किस प्रकार प्राणियों में सखा भाव बनाते हैं? इन्द्र देव के लिए जो होता सुन्दर हव्य को बढ़ाते हैं। तब उनके प्रति इन्द्र कब और कैसे अपना सखा भाव प्रदर्शित करते हैं?
How & when does Indr Dev generate brotherhood with the humans in the morning-dawn, Usha? How & when does Indr Dev extend  friendship with the hosts-Ritviz accepting the beautiful offerings by them? 
किमादमत्रं सख्यं सखिभ्यः कदा नु ते भ्रात्रं प्र ब्रवाम।
श्रिये सुदृशो वपुरस्य सर्गाः स्व १ र्ण चित्रतममिष आ गोः
हे इन्द्र देव! हम याजक आपके शत्रु पराभवकारी मित्र को स्तोताओं के निकट किस प्रकार से भली-भाँति कहेंगे? कब हम आपके भ्रातृत्व का प्रचार करेंगे? सुदर्शन इन्द्र देव का उद्योग स्तोताओं के कल्याण लिए होता है। सूर्य के तुल्य गतिशील इन्द्र देव का अतिशय दर्शनीय शरीर सभी के द्वारा अभिलषित है।[ऋग्वेद 4.23.6]
हे इन्द्र देव! यजमान शत्रु को पराजित करने वाले तुम्हारे सखा भाव को किस प्रकार वंदना करने वालों से कहेगी? कब हम तुम्हारे बन्धु भाव को प्रचारित करेंगे? श्रेष्ठ दर्शन करने वाले इन्द्र देव के समस्त कर्म वंदना करने वालों के लिए सुख कारक होते हैं। सूर्य के समान अत्यन्त दर्शनीय इन्द्र देव के शरीर की सभी अभिलाषा करते हैं। 
Hey Indr Dev! How can we recite the Strotr-hymns meant for the destruction of the enemy? when will we extend our brotherhood? Endeavors of Indr Dev are aimed at the benefit of the Ritviz. Invocation of dynamic Indr Dev like the Sun, is pleasant for the devotees-Ritviz.
द्रुहं जिघांसन्ध्वरसमनिन्द्रां तेतिक्ते तिग्मा तुजसे अनीका।
ऋणा चिद्यत्र ऋणया न उग्रो दूरे अज्ञाता उषसो बबाधे
द्रोह करने वाली, हिंसा करने वाली तथा इन्द्र देव को न जानने वाली राक्षसी को मारने के लिए पूर्व से ही तीक्ष्ण आयुधों को अत्यन्त तीक्ष्ण करते हैं। ऋण भी हम लोगों को उषा काल में बाधित करता है, ऋण विनाशक बलवान इन्द्र देव उन उषाओं को दूर से ही अज्ञात भाव से पीड़ित करते हैं।[ऋग्वेद 4.23.7]
द्रोह :: नमकहरामी, बेवफ़ाई, राज-द्रोहिता, दुष्टता, हानिकरता, नुक़सानदेहता, कपट, द्वेष, डाह, दुष्ट भाव, बदख़्वाहता; malignancy, disloyalty, malevolence.
द्रोह और हिंसा करने वाली, इन्द्र की शक्ति को न जानने वाली असुरों को मारने के लिए वे पहले से ही शस्त्रों को तेज रखते हैं। जैसे ऋणि व्यक्ति सभी धन को समाप्त करता है, वैसे ही इन्द्र देव उन उषाओं को पीड़ित करते हैं।
The weapons are sharpened prior-before killing the demoness possessing envy, malevolence and violence. Indr Dev discharge loans that trouble a person in the morning-dawn calming Usha.
Loans haunt every one. Payment of loans start troubling right with the beginning of the day.
ऋतस्य हि शुरुधः सन्ति पूर्वीर्ऋतस्य धीतिर्वृजिनानि हन्ति।
ऋतस्य श्लोको बधिरा ततर्द कर्णा बुधानः शुचमान आयोः
ऋत (सत्य, आदित्य अथवा यज्ञ) देव के पास बहुत जल है। ऋतदेव की प्रार्थना पाप को नष्ट करती है। ऋतदेव का बोध योग्य तथा दीप्तिमान् स्तुति वाक्य मनुष्यों के बधिर कर्ण (जिन्हें सुनाई नहीं देता) में भी प्रवेश पाता है।[ऋग्वेद 4.23.8]
ऋतु देव अनेक जल से परिपूर्ण हैं। उनकी प्रार्थना पापों को दूरस्थ करती है। उनको ज्ञान प्रदान करने वाली प्रार्थना बहरे व्यक्ति के भी कानों में पहुँच जाती है।
Rit Dev (Truth, Adity-Sun, Yagy) possess plenty of water. His prayer-worship destroys sin. Acknowledgement-awareness of Rit Dev leads to hearing by the deaf, who are devoted to prayers-worship.
ऋतस्य दृळ्हा धरुणानि सन्ति पुरूणि चद्रा वपुषे वपूंषि।
ऋतेन दीर्घमिषणन्त पृक्ष ऋतेन गाव ऋतमा विवेशुः
वयुष्मान् ऋतदेव के दृढ़, धारक, आह्लादक आदि अनेक रूप हैं। लोग ऋतदेव के निकट प्रभूत अन्न की इच्छा करते हैं। ऋतदेव द्वारा गौएँ दक्षिणा रूप से यज्ञ में प्रवेश करती हैं।[ऋग्वेद 4.23.9]
ऋतु देव के असंख्य रूप हैं। तपस्वीगण उनसे अन्न की विनती करते हैं। इनके द्वारा धेनु दक्षिणा के रूप में अनुष्ठान में पधारती हैं।
Rit Dev has several forms like determined, bearer and blissful. People-Humans request him for granting food grains. Cows come to the Yagy for Dakshina-donating (to Brahmans).
ऋतं येमान ऋतमिद्वनोत्यृतस्य शुष्मस्तुरया उ गव्युः।
ऋताय पृथ्वी बहुले गभीरे ऋताय धेनू परमे दुहाते
स्तोता लोग ऋतदेव को वशीभूत करने के लिए उनकी भक्ति करते हैं। ऋतदेव का बल शीघ्र ही जल कामना करता है। विस्तीर्णा तथा दुरवगाहा द्यावा-पृथ्वी ऋतदेव की है। प्रीति वायिका तथा उत्कृष्टा द्यावा-पृथ्वी ऋतदेव के लिए दुग्ध दोहन करती है।[ऋग्वेद 4.23.10]
स्तुति करने वाले ऋतुदेव को वश में करने के लिए उनका पूजन करते हैं। उनका पराक्रम जल की कामना करता है। पृथ्वी ऋतृदेव के लिए दूध दुहती है।
Those who wish to be blessed by Rit Dev, worship-pray him. His might desire rains, he produces rains. Both the heavens & the earth belong to Rit Dev. The earth draw milk-milch for Rit Dev.
नू ष्टुत इन्द्र नू गृणान इषं जरित्रे नद्यो ३ न पीपेः।
अकारि ते हरिवो ब्रह्म नव्यं धिया स्याम रथ्यः सदासाः
हे इन्द्र देव! आप पूर्ववर्ती ऋषियों द्वारा प्रार्थित होकर तथा हम लोगों के द्वारा प्रशंसित होकर जिस प्रकार से जल नदी को पूर्ण करता है, उसी प्रकार स्तोताओं के अन्न को आप प्रवृद्ध करते है। हे हरि विशिष्ट इन्द्र देव! हम आपके उद्देश्य से अभिनव स्तोत्र का उच्चारण करते हैं, जिससे हम लोग रथवान होकर स्तुति द्वारा सदा आपकी सेवा करते रहें।[ऋग्वेद 4.23.11] 
हे इन्द्र देव! तुम पूर्वज जल द्वारा नदी को पूर्ण करने के समान स्तोताओं के अन्नों को बढ़ाते हो। मुनियों द्वारा पूज्यनीय हुए हो अब हम भी तुम्हारा पूजन करते हैं। हे इन्द्र देव! तुम अश्ववान हो। हम तुम्हारे लिए नवीन श्लोक की उत्पत्ति करते हैं जिससे हम रथ वाले होकर तुम्हारी प्रार्थना और परिचर्या करते हैं।
Hey Indr Dev! Having been worshiped by us and ancient sages, you maintain water in the rivers and grant food grains to the Stota (devotees seeking food stuff). Indr Dev possess the horses named Hari. We recite newly composed excellent hymns in your honour, to seek charoite.(08.03.2023)
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (24) :: ऋषि :- वामदेव गौतम, देवता :- इन्द्र,   छन्द :- त्रिष्टुप्, अनुष्टुप्।
का सुष्टुतिः शवसः सूनुमिन्द्रमर्वाचीनं राधस आ ववर्तत्।
ददिर्हि वीरो गृणते स गोपतिर्निष्षिधां नो जनासः
हम लोगों को धन देने के लिए तथा हम लोगों के अभिमुख किस प्रकार से सुन्दर प्रार्थना बल के पुत्र इन्द्र देव को आवर्तित करे। हे याजकों! वीर तथा पशु पालक इन्द्र देव हम लोगों को शत्रुओं का धन दें। हम लोग उनकी प्रार्थना करते हैं।[ऋग्वेद 4.24.1]
शक्ति के पुत्र इन्द्र देव को सुन्दर प्रार्थना द्वारा धन प्रदान करने के लिए हम किस तरह से पुकारें? हे मनुष्य! पशुओं का पोषण करने वाले पराक्रमी इन्द्रदेव हमको शत्रुओं का धन प्रदान करें। हम उनका पूजन करते हैं।
Let us pray to Indr Dev, son of Shakti for granting us wealth-riches. Hey Ritviz! Let brave and protector of cattle give us money of the enemy. We worship Indr Dev.
स वृत्रहत्ये हव्यः स ईड्यः स सष्टुत इन्द्रः सत्यराधाः।
स यामन्ना मघवा मर्त्याय ब्रह्मण्यते सुष्वये वरिवो धात्
वृत्रासुर को मारने के लिए इन्द्र देव संग्राम में आहूत होते हैं। वे स्तुति योग्य हैं। वे सुन्दर रूप से प्रार्थित होने पर याजक गणों को धन देने के लिए सत्य धन होते हैं। धनवान इन्द्र देव स्तोत्राभिलाषी तथा सोमाभिलाषी याजकगण को धन प्रदान करते हैं।[ऋग्वेद 4.24.2]
वृत्र के लिए इन्द्र देव संग्राम में पुकारे जाते हैं। वे वंदना के पात्र हैं। उत्तम ढंग से स्तुति किये जाने पर वे यजमानों को धन प्रदान करने के लिए सत्य स्वरूप बनते हैं। वे ऐश्वर्यवान इंद्र देव के श्लोक की ओर सोम की अभिलाषा वाले, यजमान को धन प्रदान करते हैं।
Worship able Indr Dev is invoked in the war to kill Vrata Sur. On being prayed beautifully, he ensure granting of wealth to the Ritviz-devotees. Wealthy Indr Dev grant desires recitation of Strotr and Somras from the Ritviz to give them money.
तमिन्नरो वि ह्वयन्ते समीके रिरिक्वांसस्तन्वः कृण्वत त्राम्।
मिथो यत्त्यागमुभयासो अग्मन्नरस्तोकस्य तनयस्य सातौ
मनुष्यगण युद्ध में इन्द्र देव का ही आह्वान करते हैं। याजकगण शरीर को तपस्या द्वारा क्षीण करके उन्हीं को त्राणकर्ता करते हैं। याजकगण तथा स्तोता दोनों ही परस्पर संगत होकर पुत्र-पौत्र लाभ के लिए इन्हीं के समीप जाते हैं।[ऋग्वेद 4.24.3]
युद्ध में प्राणी इन्द्र देव को आहूत करते हैं। यजमान और प्रार्थनाकारी दोनों मिलकर संतति लाभ के लिए इन्द्र देव के निकट जाते हैं।
Humans invoke Indr Dev in the war. The Ritviz reduce their body through ascetics and consider him as the protector. The Ritviz and the Stota, both go to him for having sons & grandsons.
क्रतूयन्ति क्षितयो योग उग्राशुषाणासो मिथो अर्णसातौ।
सं यद्विशोऽववृत्रन्त युध्मा आदिन्नेम इन्द्रयन्ते अभीके
हे बलवान इन्द्र देव! चतुर्दिक में व्याप्त मनुष्य जल लाभ के लिए एकत्र होकर यज्ञ करते हैं। जब युद्धकारी लोग युद्ध में एकत्रित होते हैं, तब कौन इन्द्र देव की अभिलाषा करता है।[ऋग्वेद 4.24.4]
हे इन्द्र देव! तुम शक्तिशाली हो। चारों दिशाओं में रहने वाले व्यक्ति जल के लिए संगठित होकर अनुष्ठान करते हैं। जब संग्राम करने वाले युद्ध भूमि में एकत्र होते हैं, तब इनमें से कौन इन्द्र देव की इच्छा करते हैं?
Hey Indr Dev, you are mighty! The humans gather together and conduct Yagy for the sake of Yagy. Who invoke Indr Dev, when the warriors gather for the war?
आदिद्ध नेम इन्द्रियं यजन्त आदित्यक्तिः पुरोळाशं रिरिच्यात्।
आदित्सोमो वि पपृच्याद सुष्वीनादिज्जुजोष वृषभं यजध्यै
उस समय युद्ध में कोई योद्धा बलवान इन्द्र देव की पूजा करते हैं। अनन्तर कोई पुरोडाश पकाकर करके इन्द्र देव को देते हैं। उस समय सोमाभिषव करने वाले याजकगण अनभिषुत सोम वाले याजकगण को धन से पृथक कर देते हैं। उस समय कोई अभीष्टवर्षी इन्द्र देव के उद्देश्य से यज्ञ करने की अभिलाषा करते हैं।[ऋग्वेद 4.24.5]
उस समय कोई वीर सशक्त इन्द्र का पूजन करते और कोई पुरोडाश लाकर इन्द्र को देते हैं। उस समय सोम सिद्ध करने वाले यजमान, सोम सिद्ध न करने वाले यजमान को धनविहीन कर देते हैं। उस समय अभिलाषाओं की बरसात करने वाले इन्द्र के लिए सभी यज्ञ करने की कामना करते हैं।
At that moment some warrior pray to Indr Dev and bring baked Purodas to him. The Ritviz who extract Somras isolate that Ritviz who do not involve himself in the extraction of Somras from receiving money.  Every one wish to conduct Yagy for the sake of Indr Dev, who accomplish desires.
कृणोत्यस्मै वरिवो य इत्थेन्द्राय सोममुशते सुनोति।
सध्रीचीनेन मनसाविवेनन्तमित्सखायं कृणुते समत्सु
जो सोमाभिलाषी स्वर्ग लोक स्थित इन्द्र देव के उद्देश्य से अभिषव करते हैं, उन्हें इन्द्र देव धन प्रदान करते हैं। एकान्त चित्त से इन्द्र देव की अभिलाषा करने वाले तथा सोमाभिषव करने वाले याजक गण के साथ संग्राम में इन्द्र देव मित्रता करते हैं।[ऋग्वेद 4.24.6]
अद्भुत संसार में वास करने वाले इन्द्र देव के लिए जो सोम की इच्छा करने वाले उसे सिद्धस्थ करते हैं। इन्द्र देव उनको धन-प्रदान करते हैं। एकाग्रचित भाव से इन्द्र देव की इच्छा करने वाले तथा सोम सिद्धस्थ करने वाले यजमान से वे इन्द्र देव संग्राम क्षेत्र में सखा भाव दृढ़ करते हैं।
Indr Dev grants money to those who  extract Somras for him. Indr Dev become friendly in the war with those devotees-Ritviz who extract Somras for him & concentrate-meditate him.
य इन्द्राय सुनवत्सोममद्य पचात्पक्तीरुत भृज्जाति धानाः।
प्रति मनायोरुचथानि हर्यन्तस्मिन्दधद्वृषणं शुष्ममिन्द्रः
जो आज इन्द्र देव के लिए सोमाभिषव करते हैं, जो पुरोडाश पकाते हैं और जो भूजने योग्य जौ को भूँजते हैं, उसी स्तोत्रकारी के स्तोत्र को स्वीकार करके इन्द्र देव याजक गण की अभिलाषा के पूरक बल को धारित करते हैं।[ऋग्वेद 4.24.7]
आज जो इन्द्र देव के लिए सोमरस निकालते हैं, जो पुरोडाश लाते और भूनने योग्य जौं को भूनते हैं, उस श्लोक को स्वीकार करने वाले इन्द्र यजमान की इच्छा पूर्ण करने वाले पराक्रम को धारण करते हैं।
One who extract Somras for Indr Dev today, bake Purodas and roast barley, he accept his prayers and acquire the strength to accomplish his desires.
यदा समर्यं व्यचेदृघावा दीर्घं यदाजिमभ्यख्यदर्यः।
अचिक्रदद् वृषणं पत्न्यच्छा दुरोण आ निशितं सोमसुद्भिः
जब शत्रुओं के हिंसक स्वामी इन्द्र देव शत्रुओं को जानते हैं, जब वे दीर्घ संग्राम में व्याप्त रहते हैं, तब उनकी पत्नी सोमाभिषवकारी ऋत्विक कारक द्वारा तीक्ष्णीकृत अर्थात सोमपान करने से उत्साहवान तथा अभीष्टवर्षी इन्द्र देव का यज्ञगृह में आह्वान करती है।[ऋग्वेद 4.24.8]
जब वे शत्रु संहारक ईश्वर इन शत्रुओं को जान लेते हैं और जब वे भीषण युद्ध में संलग्न होते हैं तब उनकी पत्नी सोम सिद्धस्थ करने वाले ऋत्विक द्वारा सोमपान में दुष्ट और इच्छाओं की वृष्टि करने वाले इन्द्र देव का आह्वान करती हैं।
Wife of energetic Indr Dev, who is busy in the war destroying the enemy having identified them; who accomplish desires, invoke him at the Yagy site, when the Ritviz extract Somras.
भूयसा वस्नमचरत्कनीयोऽविक्रीतो अकानिषं पुनर्यन्।
स भूयसा कनीयो नारिरेचीद्दीना दक्षा वि दुहन्ति प्र वाणम्
कोई बहुत पुण्य द्वारा अल्प धन प्राप्त करता है, फिर क्रेता के निकट गमन करके 'हमने विक्रय नहीं किया है' कहकर अवशिष्ट मूल्य की प्रार्थना करता है। विक्रेता 'बहुत दिया है' कहकर अल्प मूल्य का अतिक्रम नहीं करता है। चाहे 'समर्थ होओ या असमर्थ, विक्रय काल में जो वचन हुआ है, अब वही रहेगा।[ऋग्वेद 4.24.9]
कोई पुण्य करके कम धन पाता है, फिर क्रय करने वाले के समीप जाकर हमने बेचा नहीं, ऐसा कहकर शेष धन माँगता है। खरीदने वाला उससे अधिक धन नहीं देता।
A man has realized a small price for an article of great value and again comes back to the buyer & says, "this has not been sold; I require the full price"; but he does not recover a small price by a large equivalent; whether helpless or clever they adhere to their bargain.
One gains little money even after earning a lot of virtues (paying a lot for it). He demands his money back from the seller but the seller refuse to refund.
क इमं दशभिर्ममेन्द्रं क्रीणाति धेनुभिः।
यदा वृत्राणि जङ्घनदथैनं मे पुनर्ददत्
कौन हमारे इन्द्र देव को दस गायों द्वारा खरीदेगा? जब ये शत्रुओं का वध करेंगे, तब इनको फिर मुझे देना।[ऋग्वेद 4.24.10]
इन्द्र को कौन दस गायों के समान धन से खरीद सकता है? वह जब वृद्धि करते हुए शत्रुओं की हत्या कर डालते हैं तब वह उसके गवादि धन को मुझे ही सौंप देते हैं।
Who can buy our Indr Dev for ten cows?! Give him to me when he kill the enemies. 
नू ष्टुत इन्द्र नू गृणान इषं जरित्रे नद्यो ३ न पीपेः।
अकारि ते हरिवो ब्रह्म नव्यं धिया स्याम रथ्यः सदासाः
हे इन्द्र देव! आप पूर्ववर्ती ऋषियों द्वारा प्रार्थित होकर तथा हम लोगों के द्वारा प्रशंसित होकर, जिस प्रकार से जल नदियों को पूर्ण करता है, उसी प्रकार आप स्तोताओं के अन्न को प्रवृद्ध करते हैं। हे हरि विशिष्ट इंद्र देव! हम आपके उद्देश्य से अभिनव स्त्रोत्रों का गान करते हैं। जिससे हम लोग रथवान होकर सदा आपकी सेवा करते रहें।
[ऋग्वेद 4.24.11]
हे इन्द्र देव! तुम पूर्वज मुनियों के द्वारा अर्चित हो । अब तुम्हारी प्रार्थना करते हैं। तुम जल से परिपूर्ण नदी के समान स्तुति करने वालों के अन्न की वृद्धि करते हो। हे इन्द्र देव! तुम अश्ववान हो । हम तुम्हारे लिए नये श्लोक रचते हैं जिससे हम रथवाले होकर तुम्हारी वंदना करते हैं।
Hey Indr Dev you enrich the Stota with food grains, the way the river is filled with water on being worshiped by ancient sages-Rishis and praised by us. Hey Indr Dev you possess the horses named Hari. We sing newly composes hymns, Strotr-prayers for you so that we have charoite and keep serving you.(09.03.2023)
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (25) :: ऋषि :- वामदेव गौतम, देवता :- इन्द्र,   छन्द :- त्रिष्टुप्।
को अद्य नर्यो देवकाम उशन्निन्द्रस्य सख्यं जुजोष।
को वा महेऽवसे पार्याय समिद्धे अग्नौ सुतसोम ईट्टे
आज कौन मनुष्य हितकर, देवताभिलाषी, कामयमान मनुष्य इन्द्र देव के साथ मैत्री चाहता है? सोमाभिषवकारी कौन व्यक्ति अग्नि देव के प्रज्वलित होने पर महान तथा पारगामी आश्रय लाभ के लिए इन्द्र देव की स्तुति करता है?[ऋग्वेद 4.25.1]
हितकारक, देवों की इच्छा करने वाला कौन-सा व्यक्ति आज इन्द्र देव से मित्रता स्थापित करने की इच्छा रखता है? सोम का अभिषण करने वाला ऐसा कौन-सा मनुष्य है जो अग्नि प्रदीप्त होने पर इन्द्र देव की सुरक्षा करने वाली शरण की 'इच्छा' से उनका पूजन करता है।
What friend of man or worshipper of the demigods, deserving the friendship of Indr Dev, has today enjoyed it or what offeror of the libation on the kindled fire praises him sufficiently for his great and unbounded protection?
Which human who is desirous, helping, beneficial, wish to invoke demigods & wish to be friendly with Indr Dev? Which human being who extract Somras, worship Indr Dev & seek asylum under him after the ignition of fire-Agni, desirous of great & Ultimate gains?
Ultimate gain is Moksh, emancipation, Salvation.
को नानाम वचसा सोम्याय मनायुर्वा भवति वस्त उस्राः।
क इन्द्रस्य युज्यं कः सखित्वं को भ्रात्रं वष्टि कवये क ऊती
कौन याजकगण स्तुति वाक्य द्वारा सोमार्ह इन्द्र देव के निकट झुकता है? कौन इन्द्र देव की स्तुति की कामना करता है? कौन इन्द्र देव द्वारा प्रदत्त गौओं को धारित करता है? कौन इन्द्र देव की सहायता करने की इच्छा करता है? कौन इन्द्र देव के साथ मित्रता की इच्छा करता है? कौन इन्द्र देव के भ्रातृत्व की इच्छा करता है? कौन क्रान्तदर्शी इन्द्र देव से आश्रय प्रार्थना करता है?[ऋग्वेद 4.25.2]
कौन सा यजमान इन्द्र देव के सम्मुख वंदना करता हुआ नमन करता है? कौन इन्द्र की वंदना का रक्षक है? इन्द्र को प्रदान की हुई गौओं को कौन लेता है? इन्द्र की सहायता कौन चाहता है? कौन उनमें सखा भाव का अभिलाषी है? कौन उनसे बंधुत्व भाव रखना चाहता है? कौन उस तेजस्वी इन्द्रदेव के शरण की विनती करता है।
Who prostrate before Indr Dev, who is desirous of Somras?  Who wish to pray-worship Indr Dev? Who support-nurture cows for the sake of Indr Dev? Who wish to help-support Indr Dev? Who wish to be friendly with Indr Dev? Who wish to be brotherly with Indr Dev? Who seek asylum under radiant Indr Dev?
को देवानामवो अद्या वृणीते क आदित्याँ अदितिं ज्योतिरीट्टे। 
कस्याश्विनाविन्द्रो अग्निः सुतस्यांशोः पिबन्ति मनसाविवेनम्
आज कौन याजक गण इन्द्र देव आदि देवताओं से रक्षा के लिए प्रार्थना करता है? कौन आदित्य, अदिति तथा उदक की प्रार्थना करता है? अश्विनी कुमार, इन्द्र और अग्नि देव किस याजकगण की प्रार्थना से प्रसन्न होकर अभिषुत सोम का यथेच्छ रूप से पान करते हैं?[ऋग्वेद 4.25.3]
उदक :: उत्तर दिशा, जल-पानी, east direction, water.
कौन यजमान इन्द्रदेव आदि देवों की सुरक्षा करने के लिए विनती करता है? आदित्य, अदिति और उदक की प्रार्थना कौन करता है? अश्विनी कुमार, इन्द्रदेव और अग्नि किस यजमान के स्तोत्र से हर्ष पाकर छने हुए सोम रस को अपनी इच्छा के अनुसार पीते हैं?
Which devotee request Indr Dev & demigods-deities for protection? Who worship Adity, Aditi & Udak? Ashwani Kumars, Indr and Agni Dev drink Somras pleased with who's request-prayer?
तस्मा अग्निर्भारतः शर्म यंसज्ज्योक्पश्यात्सूर्यमुच्चरन्तम्।
य इन्द्राय सुनवामेत्याह नरे नर्याय नृतमाय नृणाम्
जो याजक गण कहते हैं कि नेता मनुष्यों के बन्धु एवम् नेताओं के बीच में श्रेष्ठ नेता इन्द्र देव के लिए सोमाभिषव करेंगे, उन याजक गणों को हविर्भर्ता अग्नि देव सुख प्रदान करें तथा चिर काल से उदित सूर्य देव को देखें।[ऋग्वेद 4.25.4]
चिरकाल :: बहुत समय, दीर्घकाल; long period of time, forever.
जो यजमान प्राणियों के सखा उत्तम नेतृत्व वाले इन्द्र के लिए सोम सिद्ध करने का निश्चय करते हैं। ऐसे यजमानों की हवियों के स्वामी अग्नि देव सुख प्रदान करें और हमेशा होने वाले सूर्य देव के दर्शन करने वाला बनायें।
Let Agni Dev grant comforts-pleasure to the Ritviz who under take to extract Somras for the best leader of humans Indr Dev and let they see rising Sun for a long period of time.
न तं जिनन्ति बहवो न दभ्रा उर्वस्मा अदितिः शर्म यंसत्।
प्रियः सुकृत्प्रिय इन्द्रे मनायुः प्रियः सुप्रावीः प्रियो अस्य सोमी
अल्प अथवा अधिक शत्रु उन याजक गणों को हिंसित न करें, जो याजक गण इन्द्र देव के लिए सोमाभिषव करते हैं। इन्द्र देव की माता अदिति उन याजक गणों को अधिक सुख प्रदान करें। शोभन यज्ञ करने वाले याजक गण इन्द्र देव के प्रिय हों। जो इन्द्र देव की स्तुति की कामना करता है, वे इन्द्र देव के प्रिय होवें। जो इन्द्र देव के निकट साधुभाव से गमन करते हैं, वे इन्द्र देव के प्रिय होवें। सोमवान याजक गण इन्द्र देव के प्रिय होवें।[ऋग्वेद 4.25.5]
अदिति इनको बनावें, सुन्दर यज्ञ आदि शुभ कर्म करने वाले यजमानों को इन्द्र देव प्रेम करें। इन्द्र देव की प्रार्थना करने के अभिलाषी उनके प्रेम भाजन बनें। जो शील स्वभाव वाले एवं प्रिय सोम की सिद्धि करते हैं, वे इन्द्र देव के प्रेम पात्र बनें।
The enemy should not harm small or large numbers-groups of Ritviz who extract Somras for Indr Dev. Let Aditi, mother of Indr Dev grant comforts to the Ritviz. Those Ritviz who perform Yagy should be dear to Indr Dev. Those who wish to worship Indr Dev should be dear to him. Those who visit Indr Dev saintly, should be dear to him. Ritviz possessing Somras should be dear to Indr Dev.
सुप्राव्यः प्राशुषाळेष वीरः सुष्वेः पक्तिं कृणुते केवलेन्द्रः।
नासुष्वेरापिर्न सखा न जामिर्दुप्राव्योऽवहन्तेदवाचः
जो व्यक्ति इन्द्र देव के निकट गमन करता है और सोमाभिषव करता है उसके पवित्र कार्य को शीघ्र अभिनवकारी तथा विक्रान्त इन्द्र देव स्वीकार करते हैं। जो याजकगण सोमाभिषव नहीं करता, उसके लिए इन्द्र देव व्याप्त नहीं होते हैं, मित्र नहीं होते हैं और बन्धु भी नहीं होते हैं। जो व्यक्ति इनके निकट गमन नहीं करता और उनकी प्रार्थना नहीं करता, इन्द्र देव उसकी हिंसा करते हैं।[ऋग्वेद 4.25.6]
विक्रांत :: प्रतापी, तेजस्वी, वीर, बहादुर, साहसी, हिम्मत वाला; valiant.
इन्द्र के समीप जाने वाले और सोम सिद्ध करने वाले यजमान के पाप-कर्म को पराक्रमी इन्द्र स्वीकार नहीं करते हैं। सोम का अभिषेक न करने वाले यजमान के लिए इन्द्र व्याप्त नहीं होते। वे उसमें सख्य और बंधु भाव को नहीं रखते। इन्द्र देव के निकट न जाने वाला उसकी प्रार्थना न करने वाला उनके द्वारा हिंसित किया जाता है।
Indr Dev accepts-recognise the virtuous-pious deeds of one who become close to him and extract Somras for him. One who is adverse, is not recognised as a friend or relative, brother and is vanished.
न रेवता पणिना सख्यमिन्द्रोऽसुन्वता सुतपाः सं गृणीते।
आस्य वेदः खिदति हन्ति नग्नं वि सुष्वये पक्तये केवहो भूत्
अभिषुत सोमपायी इन्द्र देव सोमाभिषव कर्म रहित, धनवान और लोभी बणिकों (बनियों) के साथ मैत्री संस्थापित नहीं करते। वे उनके निरर्थक धन को उद्धरित कर और नष्ट करते हैं। वे सोमाभिषवकारी तथा हव्य पाककारी याजकगण के असाधारित मित्र होते हैं।[ऋग्वेद 4.25.7]
सिद्ध सोम पान करने वाले इन्द्रदेव सोम सिद्ध करने वाले काम से विमुख धनिक एवं लोलुप के साथ मित्रता का भाव नहीं बनाते। वे उनके किसी काम न आने वाले धन का पतन कर देते हैं। वे सोमाभिषवकर्त्ता तथा हविरत्न के पाक-कर्त्ता यजमान से अत्यन्त बंधु भाव स्थापित करते हैं।
Indr Dev do not establish friendly relations with those rich, greedy-Vaeshy, who not extract Somras for him. He destroys their useless wealth. Those Ritviz who extract Somras & make offerings of cooked food stuff to him is his great-close friend. 
इन्द्रं परेऽवरे मध्यमास इन्द्रं यान्तोऽवसितास इन्द्रम्।
इन्द्रं क्षियन्त उत युध्यमाना इन्द्रं नरो वाजयन्तो हवन्ते
उत्कृष्ट तथा निकृष्ट व्यक्ति इन्द्र देव का आह्वान करते हैं एवम् मध्यम व्यक्ति भी इनका ही आह्वान करते हैं। चलने वाले लोग इनका आह्वान करते हैं तथा उपविष्ट लोग भी इनका ही आह्वान गृह में रहने वाले लोग इनका आह्वान करते हैं तथा युद्ध करने वाले भी इनका ही आह्वान करते हैं। अन्न की इच्छा करने वाले लोग भी इन्हीं इन्द्र देव का आह्वान करते हैं।[ऋग्वेद 4.25.8] 
ऊँचे, नीचे, मध्यम सभी तरह के प्राणी इन्द्र को आहुत करते हैं। गमनशील, उपविष्ट, ग्रहों में वास करने वाले, समर भूमि में जाने वाले तथा अन्न की अभिलाषा वाले सभी जीव इन्द्र का आह्वान करते हैं।
Excellent, depraved (upper & lower class) and the middle class gentry invoke Indr Dev. Dynamic as well as those who stay in homes too invoke him. Those who wish to have war invoke him. Desirous of food grains invoke him.(11.03.2023)
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (26) :: ऋषि :- वामदेव गौतम, देवता :- इन्द्र, छन्द :- त्रिष्टुप्।
अहं मनुरभवं सूर्यश्चाहं कक्षीवाँ ऋषिरस्मि विप्रः।
अहं कुत्समार्जुनेयं न्यृञ्जेऽहं कविरुशना पश्यता मा
हम प्रजापति हैं, हम सबके प्रेरक सविता हैं, हम ही दीर्घतमा के पुत्र मेधावी कक्षीवान ऋषि हैं, हमने ही अर्जुनी पुत्र कुत्स को भली-भाँति अलंकृत किया, हम ही उशना नामक कवि हैं। हे मनुष्यों! हमें अच्छी तरह से देखो।[ऋग्वेद 4.26.1]
हम प्रजापति, सबको प्रेरणा प्रदान करने वाले एवं हम ही दीर्घतमा के विद्वान पुत्र कक्षीवान ऋषि हैं हम कवि उशना हैं। हमने ही अर्जुन के पुत्र कुत्स को भली-भांति प्रशंसित किया था। हे मनुष्यों! हम ही क्रांतदर्शी और सर्वप्रिय हैं।
We are Praja Pati, Savita-who inspire all, Medhavi Kakshivan Rishi-son of Dirghtama and poet Ushna. We decorated Kuts the son of Arjuni.  Hey humans! Look at us carefully.
अहं भूमिमददामार्यायाहं वृष्टिं दाशुषे मर्त्याय।
अहमपो अनयं वावशाना मम देवासो अनु केतमायन्
हमने आर्य को पृथ्वी प्रदान किया। हमने हव्यदाता मनुष्य को सस्य की अभिवृद्धि के लिए वृष्टि प्रदान किया। हमने शब्दायमान जल या आनयन किया। देवगण हमारे सङ्कल्प का अनुगमन करते हैं।[ऋग्वेद 4.26.2]
मैंने ही ध्वनि करते हुए जल को अभिप्रेरित किया। मेरी इच्छा पर समस्त देवता चलते हैं।
We granted earth to the Ary. We provided rains to the humans to boost vegetation. I inspired rains making sound. Demigods-deities fulfil our objective.
अहं पुरो मन्दसानो व्यैरं नव साकं नवतीः शम्बरस्य।
शततमं वेश्यं सर्वताता दिवोदासमतिथिग्वं यदावम्
हमने सोमपान से मत्त होकर शम्बर के निन्यानबे नगरों को एक काल में ही ध्वस्त किया। जिस समय हम यज्ञ में अतिथियों के अभिगन्ता राजर्षि दिवोदास का पालन कर रहे थे, उस समय हमने दिवोदास को सौ नगर निवास करने के लिए दिए।[ऋग्वेद 4.26.3]
सोमपान करके मैंने शम्बर के निन्यानवें शहरों को एक ही समय में नष्ट कर डाला। जब मैं अनुष्ठान में सुरक्षा कर रहा था तब मैंने उनके निवास के लिए सौ पुरी प्रदान की थी।
Having drunk, we destroyed 99 habitats-cities of Shambar-a demon. When Rajrishi Divodas was looking after the guests, we granted him 100 cities to him.
प्र सु ष विभ्यो मरुतो विरस्तु प्र श्वेनः श्येनेभ्य आशुपत्वा।
अचक्रया यत्स्वधया सुपर्णो हव्यं भरन्मनवे देवजुष्टम्
हे मरुद्गण! श्येन पक्षी पक्षियों के बीच में प्रधान है। अन्य श्येनों की अपेक्षा शीघ्रगामी श्येन प्रधान है। क्योंकि देवों द्वारा सेवित सोमरूप हव्य को मनुष्यों के लिए स्वर्गलोक से चक्र रहित रथ द्वारा सुपर्ण लाया था।[ऋग्वेद 4.26.4]
श्येन पक्षी FALCON 
हे मरुतों ! तुम बाज पक्षियों में प्रधान तत्व हो। दूसरे की उपेक्षा तुम शीघ्रगामी हो। देवताओं द्वारा सेवन किये जाने वाले सोमरूपी हव्यों को स्वर्ग के बिना पहिये के रथ द्वारा अद्भुत संसार से लाकर मनुष्यों को प्रदान किया था।
Hey Marud Gan! Falcon is supreme amongest the birds. Amongest the falcons, fast moving Shyen is best. Suparn brought Somras from the heaven for the humans in the charoite which had no wheels.
भरद्यदि विरतो वेविजानः पथोरुणा मनोजवा असर्जि।
तूयं ययौ मधुना सोम्येनोत श्रवो विविदे श्येनो अत्र
जब भयभीत होकर श्येन पक्षी द्युलोक से सोमरस लाया, तब वह विस्तीर्ण अन्तरिक्ष मार्ग में मन के तुल्य वेग युक्त होकर उड़ा एवं सोममय मधुर अन्न के साथ वह शीघ्र गया और सोमरस लाने के कारण सुपर्ण ने इस लोक में यश प्राप्त किया।[ऋग्वेद 4.26.5]
जब श्येन पक्षी डरकर आकाश से सोम को लाया तब वह विशाल अंतरिक्ष के रास्ते के हृदय के तुल्य गतिवाला होकर उड़ा। सम रूप मधु के साथ वह शीघ्र गया और सोम लाने से उसका ऐश्वर्य फैल गया।
When the Falcon, intimidating (its guardians), carried off from hence the Somras it was at large; flying swift as thought along the vast path of the firmament-space, it went rapidly with the sweet Somras and the hawks thence acquired the celebrity in this world.
When fearful-afraid, Shyen-Falcon brought Somras from the heaven, it flew at high speed through the vast space-sky with the speed of the innerself-brain and Suparn-Falcon earned honour over the earth due to this act.
ऋजीपी श्येनो ददमानो अंशुं परावतः शकुनो मन्द्रं मदम्।
सोमं भरद्दादृहाणो देवावान्दिवो अमुष्मादुत्तरादादाय
देवों के साथ होकर ऋजुगामी और प्रशंसित गमन श्येन पक्षी ने दूर से सोम को धारित करके एवं स्तुति योग्य तथा मदकर सोम को उन्नत द्युलोक से ग्रहण करके दृढभाव से उसको ले आए।[ऋग्वेद 4.26.6]
द्रुतगामी और यशस्वी श्येन पक्षी देवगणों सहित दूर से सोम को उठाकर स्तुत एवं प्रसन्नता पूर्वक सोम को उच्च नभ से लेकर दृढ़ता पूर्वक धरती पर चला आया।
Fast flying Falcon on being praised picked up toxicating Somras & brought it up to the earth from the heavens.
आदाय श्येनो अभरत्सोमं सहस्रं सवाँ अयुतं च साकम्।
अत्रा पुरंधिरजहादरातीर्मदे सोमस्य मूरा अमूरः
श्येन पक्षी ने सहस्र और अयुत संख्यक यज्ञ के साथ सोमरस को ग्रहण करके उस अन्न का आनयन किया। उस सोमरस के लाये जाने पर बहुकर्म विशिष्ट प्राज्ञ इन्द्र देव ने सोम सम्बन्धी हर्ष के उत्पन्न होने पर मूर्ख शत्रुओं का वध किया।[ऋग्वेद 4.26.7]
श्येन ने हजारों लाखों अनुष्ठान कार्यों द्वारा सोम को प्राप्त किया और वह उसको ले आया। सोम के लाने पर बहुकर्मा एवं मेधावी इन्द्र देव ने सोम से रचित शक्ति से अज्ञानी शत्रुओं का पतन किया।
Falcon accepted Somras after thousands-millions, uncounted prayers and brought it. It amused Indr Dev and he killed the imprudent-brainless, duffer enemies.(13.03.2023)
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (27) :: ऋषि :- वामदेव गौतम, देवता :- इन्द्र,   छन्द :- त्रिष्टुप्, शक्वरी।
गर्भे नु सन्नन्वेषामवेदमहं देवानां जनिमानि विश्वा।
शतं मा पुर आयसीररक्षन्नध श्येनो जवसा निरदीयम्
गर्भ में विद्यमान होकर ही हम (वामदेव) ने इन्द्र देव आदि समस्त देवों के जन्म को यथाक्रम से जाना। अर्थात् परमात्मा के समीप से सब देव उत्पन्न हुए हैं। सैकड़ों लौहमय शरीरों ने हमारा पालन किया। अभी हम श्येन के तुल्य स्थित होकर आवरण रहित आत्मा को जानते हुए शरीर से निर्गत होते हैं।[ऋग्वेद 4.27.1]
गर्भ में वास करते हमने इन्द्रादि समस्त देवताओं के प्राकट्य को उत्तमता से जान लिया था। लौह से निर्मित स्थित नगरियों में हमारा पोषण हुआ था। हम ज्ञान से परिपूर्ण हो बाज के तुल्य विशालगति से उड़ जाने वाली आत्मा को जानते हुए देह बंधन से छूट जाते हैं।
We understand the significance of Indr Dev and all the demigods-deities, while staying in the womb. We were nurtured-grown by hundred of bodies like the iron. At present we become like the Falcon & free from the body. The soul leaves the body recognising it.
न घा स मामप जोषं जभाराभीभास त्वक्षसा वीर्येण।
ईर्मा पुरंधिरजहादरातीरुत वाताँ अतरच्छूशुवानः
उस गर्भ ने हमारा पर्याप्त रूप से अपहरण नहीं किया अर्थात् गर्भ में निवास करते समय हमें मोह नहीं हुआ। हमने गर्भस्थ दुःख को तीक्ष्ण वीर्य द्वारा अर्थात् ज्ञान सामर्थ्य से पराभूत किया। सभी के प्रेरक परमात्मा ने गर्भ स्थित शत्रुओं का वध किया और वर्द्धमान होकर गर्भ में क्लेशकारक वायु को अतिक्रान्त किया।[ऋग्वेद 4.27.2] 
उस गर्भ में रहते हुए भी हम मोह में नहीं फँसे। हमने गर्भ के दुःखों को ज्ञान के पराक्रम से प्राप्त किया। सबको प्रेरणा देने वाले परमात्मा ने गर्भ में स्थित शत्रु रूपी कीटाणुओं का नाश किया और वृद्धि को प्राप्त होकर कष्ट पहुँचाने वाली वायु का शमन किया।
We remained free from worldly allurements during our stay in the womb. We overcome the pain, sorrow, worries with the help of enlightenment. The Almighty who inspire all, killed our enemies-microorganism (germs, virus, bacteria, fungus etc.) and we overcome the air-gas which troubled us.
अव यच्छ्येनो अस्वनीदध द्योर्वि यद्यदि वात ऊहुः पुरंधिम्।
सृजद्यदस्मा अव ह क्षिपज्ज्यां कृशानुरस्ता मनसा भुरण्यन्
सोमाहरण काल में जब श्येन ने द्युलोक से अधोमुख होकर शब्द किया, जब सोमपालों ने श्येन के निकट से सोमरस छीन लिया, जब शरप्रक्षेपक सोमपाल कृशानु ने मनोवेग से जाने की इच्छा करके धनुष की केटि पर प्रत्यञ्चा चढ़ाई और श्येन के प्रति शरक्षेपण किया तब श्येन ने सोमरस का आनयन किया।[ऋग्वेद 4.27.3]
सोम लाते समय जब बाज ने क्षितिज के नीचे की ओर मुख करके ध्वनि की, तब सोम के रक्षकों ने श्येन से सोम को छीन लिया, जब सोम रक्षक शुशुवान ने हृदय की गति से जाने वाले के लिए धनुष पर डोरी और श्येन की तरफ बाण को चलाया, तब श्येन सोम को लेकर आया।
The Falcon-Shyen faced the horizon making sound leading to snatching of Somras by its protectors. At this moment Krashanu loaded his bow & arrow, allowing Falcon-Shyen to fly with the speed of mind, allowing Shyen to bring Somras.
ऋजिप्य ईमिन्द्रावतो न भुज्यं श्येनो जभार बृहतो अधि ष्णोः।
अन्तः पतत्पतत्र्यस्य पर्णमद्य यामनि प्रसितस्य तद्वेः
अश्विनी कुमारों ने जिस प्रकार सामर्थ्यवान् इन्द्र विशिष्ट देश से भुज्यु नामक राजा का अपहरण किया, उसी प्रकार ऋजुगामी श्येन ने इन्द्र रक्षित महान द्युलोक से सोमरस का आहरण किया। उस समय युद्ध में कृशानु के आयुधों से विद्ध होने पर उस गमनशील पक्षी का एक पतनशील पंख गिर पड़ा।[ऋग्वेद 4.27.4]
जैसे अश्विनी कुमारों ने इन्द्र के स्वामित्व वाले देश से राजा भृज्यु का अपहरण किया था, उसी प्रकार इन्द्र से रक्षित श्रेष्ठ आकश से ऋजुगामी सोम को लेकर आया। उस समय कृशनु से लड़ने के कारण उस श्येन का एक पंख बाण से बिंध जाने के कारण गिर गया।
The manner in which Ashwani Kumars abducted king Bhujyu from the domain of Indr Dev,  in the same way fast moving falcon abducted Somras. At that moment one of his feathers was cut by the arrow of Krashanu.
अध श्वेतं कलशं गोभिरक्तमापिण्यानं मघवा शुक्रमन्यः। अध्वर्युभिः प्रयतं मध्वो अग्रमिन्द्रो मदाय प्रति धत्पिबध्यै शूरो मदाय प्रति धत्पिबध्यै
इस समय विक्रमवान इन्द्र देव शुभ पात्र स्थित, गव्य मिश्रित, तृप्तिकर, सारसमन्वित एवं अध्वर्युओं द्वारा प्रदत्त सोम लक्षण अन्न का और मधुर सोमरस का हर्ष के लिए पहले ही पान करें।[ऋग्वेद 4.27.5] 
महापराक्रमी इन्द्रदेव शुद्ध सुरभित, भव्य-मिश्रित, संतुष्टि दायक, सात रूप सोम के अध्वर्युओं द्वारा दिये जाने पर उसके हर्ष दायक इसको इस समय पियें।
Let mighty Indr Dev drink Somras granting pleasure, kept in the pious pot, mixed with cow milk, satisfying with seven flavours, provided by the worshipers-devotees.(14.03.2023)
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (28) :: ऋषि :- वामदेव गौतम, देवता :- इन्द्र,   छन्द :- त्रिष्टुप्।
त्वा युजा तव तत्सोम सख्य इन्द्रो अपो मनवे सस्रुतस्कः।
अहन्नहिमरिणात्सप्त सिन्धूनपावृणोदपिहितेव खानि
हे सोम! इन्द्र देव के साथ आपकी मैत्री होने पर इन्द्र देव ने आपकी सहायता से मनुष्यों के लिए सरणशील जल को प्रवाहित किया, वृत्रासुर का वध किया, सर्पणशील जल को प्रेरित किया और वृत्रा सुर द्वारा तिरोहित जल द्वारों को खोल दिया।[ऋग्वेद 4.28.1]
हे सोम! जब इन्द्र देव तुम्हारे सखा बने हुए तब तुम्हारी सहायता से उन्होंने पुरुषों के लिए जल को प्रवाहमान किया और वृत्र का पतन किया। वृत्र द्वारा रोके हुए द्वार को खोलकर तुमने जल को शिक्षित किया।
Hey Som! When you became a friend of Indr Dev, he made the water flow and killed Vrata Sur & opened the blockade of water created by Vrata Sur. 
त्वा युजा नि खिदत्सूर्यस्येन्द्रश्चक्रं सहसा सद्य इन्दो।
अधि ष्णुना बृहता वर्तमानं महो द्रुहो अप विश्वायु धायि
हे सोम! इन्द्र देव ने आपकी सहायता से क्षण भर में प्रेरक सूर्य के रथ के ऊपर स्थित बृहत अन्तरिक्ष में वर्तमान द्विचक्र रथ के एक चक्र को बलपूर्वक तोड़ डाला। प्रभूत द्रोहकारी सूर्य के सर्वतोगामी चक्र को इन्द्र देव ने अपहृत कर लिया।[ऋग्वेद 4.28.2]
चक्र :: आवर्तन, वृत्त, मंडली, घेरा, चक्कर, क्षेत्र, पहिया, चक्र, चाक, चक्का; cycle, circle, wheel.
हे सोम! तुम्हारी सहायता से ही इन्द्र ने सूर्य के रथ के ऊपर स्थित दो चक्रों वाले रथ के एक चक्र को पल भर में अलग कर दिया। सूर्य के सर्वत्र गतिमान चक्रों को स्पर्धा के कारण इन्द्र देव ने ले लिया।
Hey Som! Indr Dev destroyed one of the two disc-cycles over the charoite of Sun in the sky with might. He took away, snatched the competitive disc moving in all directions.
अहन्निन्द्रो अदहदग्निरिन्दो पुरा दस्यून्मध्यन्दिनादभीके।
दुर्गे दुरोणे क्रत्वा न यातां पुरू सहस्त्रा शर्वा नि बर्हीत्
हे सोम! आपके पान से बलवान इन्द्र देव ने मध्याह्नकाल के पहले ही संग्राम में शत्रुओं को मार डाला और अग्नि देव ने भी कितने शत्रुओं को जला डाला। किसी कार्य से रक्षा शून्य दुर्गम स्थान से जाने वाले व्यक्ति को जिस प्रकार से चोर मार डालते हैं, उसी प्रकार इन्द्र देव ने सहस्र शत्रु सेनाओं का वध किया।[ऋग्वेद 4.28.3]
हे सोम! तुमको पान कर वीर इन्द्र देव ने मध्याह्न समय से पूर्व ही शत्रुओं को युद्ध में समाप्त कर दिया और अग्नि ने भी असंख्य शत्रुओं को समाप्त कर दिया। जैसे अरक्षित मार्ग से जाने वाले धनिक को चोर मार देता है वैसे असंख्य शत्रु सेनाओं को इन्द्रदेव ने समाप्त कर डाला।
Hey Som! After drinking you, mighty Indr Dev killed the enemies in the mid day and Agni Dev burnt several enemies. Indr Dev killed the thousands of enemies like the rich being killed while moving through an unsafe route.
विश्वस्मात्सीमधमाँ इन्द्र दस्यून्विशो दासीरकृणोरप्रशस्ताः।
अबाधेथाममृणतं नि शत्रूनविन्देथामपचितिं वधत्रैः
हे इन्द्र देव! आप इन दस्युओं को सभी सदगुणों से रहित करते हैं। आप कर्महीन मनुष्यों (दासों) को गर्हित (निन्दित) बनाते हैं। हे इन्द्र देव और सोम! आप दोनों शत्रुओं को बाधा दो और उनका वध करें। उन्हें मारने के लिए लोगों से सम्मान ग्रहण करें।[ऋग्वेद 4.28.4]
हे इन्द्र देव! तुम समस्त दुष्टों को सद्गुणों से विहीन करते हो। तुम उन वस्तुओं को निंदा के योग्य करते हो। हे इन्द्र देव और सोम! तुम दोनों ही शत्रुओं के आक्रमण-कार्य में विघ्न डालते हुए उनका विनाश करो, उनका वध करने हेतु की जाने वाली प्रार्थनाओं को स्वीकार करो।
Hey Indr Dev! You devoid the dacoits of virtues and make the humans vulnerable, who avoid work-efforts, endeavours. Hey Indr Dev & Som! You apply breaks to both the enemies and kill them. Accept the prayers felicitations by the humans, pertaining to the slaying of the enemies.
एवा सत्यं मघवाना युवं तदिन्द्रश्च सोमोर्वमश्व्यं गोः।
आदर्दृतमपिहितान्यशृना रिरिचथुः क्षाश्चित्ततृदाना
हे सोम! आप और इन्द्र देव ने महान अश्व समूह और गो समूह को दान किया एवं पणियों द्वारा आच्छादित गोवृन्द और भूमि को बल द्वारा विमुक्त किया। हे धन युक्त इन्द्र देव और सोम! आप दोनों शत्रुओं के हिंसक है। आप दोनों ने इस प्रकार से जो कुछ किया है, वह सत्य है।[ऋग्वेद 4.28.5]
हे सोम! तुम और इन्द्र देव ने विशाल अश्वों और गौओं के संगठन को दान किया था। हे इन्द्र देव और सोम! तुम दोनों ही अत्यन्त समृद्धिशाली हो। तुम दोनों शत्रुओं का नाश करने में समर्थ हों। तुम दोनों जो भी कार्य करते हो, वह सभी सच है।
Hey Som! You and Indr Dev donated a large group of horses and the cows, released the land under the control of Ahi-demons with force-might having cows herds. Hey wealthy Indr Dev & Som! You are the destroyer of the enemy. What ever you did in this manner is true.(15.03.2023)
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (29) :: ऋषि :- वामदेव गौतम, देवता :- इन्द्र,   छन्द :- त्रिष्टुप्।
आ नः प्रार्थित उप वाजेभिरूती इन्द्र याहि हरिभिर्मन्दसानः।
तिरश्चिदर्यः सवना पुरूण्याङ्गुषेभिर्गृणानः सत्यराधाः
हे इन्द्र देव! आप प्रशंसित होकर हम लोगों को रक्षित करने के लिए हम लोगों के अन्न युक्त अनेक यज्ञों में अश्वों के साथ पधारें। आप आनन्दमय, स्वामी, स्तोत्रों द्वारा प्रशंसित और सत्यधन हैं।[ऋग्वेद 4.29.1]
हे इन्द्र देव! हमारे द्वारा पूजनीय होने पर हमारी सुरक्षा के लिए हविरत्न से परिपूर्ण हमारे यज्ञों में अश्वों से युक्त पधारो। तुम हर्षित हृदय वाले, श्लोकों द्वारा पूजनीय, सत्यस्वरूप एवं स्वर्ग के स्वामी हो। 
Hey Indr Dev! On being worshiped, join our Yagy having food grains for offerings, with your horses, to protect us. You are blissful, lord truthful and revered-honoured with hymns.
आ हि ष्मा याति नर्यश्चिकित्वान्हूयमानः सोतृभिरुप यज्ञम्।
स्वश्वो यो अभीरुर्मन्यमानः सुष्वाणेभिर्मदति सं ह वीरैः
मनुष्यों के हितकारी तथा सर्ववेत्ता इन्द्र देव सोमाभिषवकारियों द्वारा आहूत होकर यज्ञ के उद्देश्य से आगमन करें। वे सुन्दर अश्वों से युक्त हैं, वे निर्भय हैं, वे सोमाभिषवकारियों द्वारा स्तुत होते हैं एवं वीर मरुतों के साथ आनन्दित होते हैं।[ऋग्वेद 4.29.2]
प्राणियों को कल्याण करने वाले, सभी ज्ञानों को जानने वाले, इन्द्र सोम सिद्ध करने वालों द्वारा आमंत्रित किये जाने पर यज्ञ के लिए आएँ। वे इन्द्र सुशोभित घोड़ों वाले, निडर, पूज्य तथा वीर मरुद्गण सहित पुष्टि को प्राप्त होते हैं।
Let all knowing Indr Dev, helping humans, join the Yagy on being worshiped by those who extract Somras. He is fearless, possess beautiful horses, prayed by the extractors of Somras and enjoy with Marud Gan.
श्रावयेदस्य कर्णा वाजयध्यै जुष्टामनु प्र दिशं मन्दयध्यै।
उद्वावृषाणो राधसे तुविष्मान्करन्न इन्द्रः सुतीर्थाभयं च
हे स्तोता! आप इन्द्र देव के कर्णद्वय में इन्द्र देव का शुभ करने के लिए और सब दिशाओं में अतिशय हर्षित करने के लिए स्तोत्रों को श्रवण करावें। सोमरस से सिक्त बलवान इन्द्र देव हम लोगों के धन के लिए शोभन तीर्थों को भय रहित करें।[ऋग्वेद 4.29.3]
हे मनुष्यों! इन्द्र देव की शक्ति की वृद्धि के लिए तथा उन्हें प्रत्येक प्रकार से सन्तुष्ट करने के लिए उनके दोनों कानों में श्लोक को श्रवण कराओ। सोम रस से सींचे गये पराक्रमी इन्द्रदेव हमारे धन के लिए उत्तम स्थानों को भय से मुक्त करें।
Hey Stota-worshipers! Let Indr Dev listen-hear the hymns through both ears, make all direction happy and auspiciousness. Satisfied by drinking Somras let mighty Indr Dev make the pilgrimage fearless for our wealth.
अच्छा यो गन्ता नाधमानमूती इत्था विप्रं हवमानं गृणन्तम्।
उप त्मनि दधानो धुर्या ३ शून्त्सहस्त्राणि शतानि वज्रबाहुः
वज्रबाहु इन्द्र देव अपने वशीभूत सहस्र संख्यक तथा शत संख्यक शीघ्रगामी अश्वों को रथ वहन प्रदेश में संस्थापित करते हैं एवं रक्षा करने के लिए याचक, मेधावी आह्लादकारी और प्रार्थनाकारी याजकगण के समीप जाते हैं।[ऋग्वेद 4.29.4]
भुजाओं में वज्र धारण करने वाले इन्द्र देव अपने बहुसंख्यक अश्वों को रथ में चलने के लिए जोड़ते हैं और रक्षा करने के लिए मेधावी हर्ष प्रदान करने वाले, वंदना करते हुए याचक यजमान के समीप जाते हैं।
Bearing Vajr in his arms, Indr Dev deploy his hundreds and thousands of fast moving horses in the charoite and move to the intelligent Ritviz-hosts who make pleasant prayers.
त्वोतासो मघवन्निन्द्र विप्रा वयं ते स्याम सूरयो गृणन्तः।
भेजानासो बृहदिवस्य राय आकाय्यस्य दावने पुरुक्षोः
हे धनवान इन्द्र देव! हम लोग आपके स्तोता हैं। हम लोग आपके द्वारा रक्षित हैं, मेधावी और स्तुतिकारी है। आप दीप्ति विशिष्ट, स्तुति योग्य और अन्न विशिष्ट है। ऐश्वर्य प्रदान करने के समय हम मनुष्य आपकी प्रार्थना करते हैं।[ऋग्वेद 4.29.5]
हम वंदनाकारी विद्वान तुम्हारे निकट रक्षित हैं। तुम ज्योतिवान अन्नवान और वन्दनाओं के पात्र हों। धन प्रदान करने वाले समय में हम तुम्हारा यजन करें।
Hey rich Indr Dev! We are your worshipers. We are protected by you,  and worship you. You are radiant, deserve prayers and grant food grains. We are intelligent, pray you when you grant us grandeur.(16.03.2023)
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (30) :: ऋषि :- वामदेव गौतम, देवता :- इन्द्र,   छन्द :- गायत्री, अनुष्टुप।
नकिरिन्द्र त्वदुत्तरो न ज्यायाँ अस्ति वृत्रहन्। नकिरेवा यथा त्वम्
हे शत्रु संहारक इन्द्र देव! इस लोक में आपकी अपेक्षा कोई भी श्रेष्ठ नहीं है, आपकी अपेक्षा कोई भी प्रशस्यतर नहीं है। हे इन्द्र देव! आप जिस प्रकार लोक में प्रसिद्ध हैं, उस तरह कोई भी प्रसिद्ध नहीं है।[ऋग्वेद 4.30.1]
हे इन्द्र देव! तुम वृत्र का संहार करने वाले हो। इस संसार में तुमसे बढ़कर कोई श्रेष्ठ नहीं है। तुमसे बढ़कर इस संसार में कोई दूसरा महान नहीं है। तुमसे बढ़कर कोई विशाल भी नहीं है। तुम संसार में जितने प्रसिद्ध हो, उतना विख्यात भी कोई नहीं है।
Hey slayer of the enemy Indr Dev! No other person in this world is as famous-popular as you are.
सत्रा ते अनु कृष्टयो विश्वा चक्रेव वावृतुः। सत्रा महाँ असि श्रुतः 
सभी जगह व्याप्त चक्र जिस प्रकार शकट अर्थात गाड़ी का अनुवर्तन करता है, उसी प्रकार प्रजागण आपका अनुवर्तन करते हैं। हे इन्द्र देव! आप सचमुच महान और गुणों द्वारा विख्यात हैं।[ऋग्वेद 4.30.2]
हे इन्द्र देव! सर्वव्यापी पहिया जैसा गाड़ी के पीछे चलता है, वैसे ही प्रजाजन भी तुम्हारे पीछे चलते हैं। तुम मेधावी हो। तुम अपने गुणों द्वारा देवताओं में प्रसद्धि हो।
Verily men are attached to you as are all the wheels to the body of the wagon-cart; in truth you are great and renowned.
The humans are attached with you like the wheels are attached to the cart. You are intelligent and known for your qualities-virtues amongest the demigods-deities.
विश्वे चनेदना त्वा देवास इन्द्र युयुधुः। यदहा नक्तमातिरः
विजय की अभिलाषा से सब देवों ने बलरूप से आपकी सहायता प्राप्त करके असुरों के साथ युद्ध किया। उस समय आपने अहर्निश शत्रुओं का वध किया।[ऋग्वेद 4.30.3]
अहर्निश :: दिन-रात लगातार; round the clock, photeolic.
हे इन्द्र देव! विजय की अभिलाषा वाले जब देवों ने शक्ति के रूप में तुम्हारी सहायता ग्रहण करके असुरों से युद्ध किया था।
The demigods-deities fought with the demons with your help-support. At that time you continuously killed the demons, day & night.
यत्रोत बाधितेभ्यश्चक्रंकुत्साय युध्यते। मुषाय इन्द्र सूर्यम्
हे इन्द्र देव! जिस युद्ध में आपने युद्धकारी कुत्स एवं उसके सहायकों के लिए सूर्य के रथ चक्र का भी अपहरण कर लिया।[ऋग्वेद 4.30.4]
तब तुमने युद्धरत कुत्स और उसके सहायकों के लिए सूर्य पर चक्र को घुमाया और अपने व्यक्तियों की सुरक्षा की थी।
Hey Indr Dev! You controlled the cycle of the Sun, while fighting with Kuts-demon & his warriors. 
यत्र देवाँ ऋघायतो विश्वाँ अयुध्य एक इत्। त्वमिन्द्र वनूँरहन्
हे इन्द्र देव! जिस युद्ध में आपने एकाकी होकर देवों के बाधक सकल राक्षसों के साथ युद्ध किया तथा उन हिंसकों का वध कर दिया।[ऋग्वेद 4.30.5]
हे इन्द्र देव! युद्ध में तुमने अकेले ही हिंसा करने वाले तथा सभी देवताओं को विघ्न देने वाले असुरों से युद्ध किया था, उसमें उन सभी को तुमने मार दिया था।
Hey Indr Dev! You killed all the violent demons single handily in the war.
यत्रोत मर्त्याय कमरिणा इन्द्र सूर्यम्। प्रावः शचीभिरेतशम्
हे इन्द्र देव! जिस संग्राम में आपने एतश ऋषि के लिए सूर्य की भी हिंसा की, उस समय युद्ध कर्म द्वारा आपने एतश की रक्षा की।[ऋग्वेद 4.30.6]
हे इन्द्र देव! तुम जिस संग्राम में एतश के लिए सूर्य पर भी आक्रमण किया था, उस घोर संग्राम द्वारा तुमने एतश मुनि की भली-भांति रूप से रक्षा की थी।
Hey Indr Dev you discomfited Sun, for protecting Etash by your exploits.
DISCOMFIT :: परेशान, अशांत; make (someone) feel uneasy or embarrassed.
Hey Indr Dev! You protected Etash Muni in that furious war with your fighting skills and disturbed the Sun.
किमादुतासि वृत्रहन्मघवन्मन्युमत्तमः। अत्राह दानुमातिरः
हे आवरक अन्धकार के हननकर्ता धनवान इन्द्र देव! उसके बाद क्या आप अत्यन्त क्रोधवान हुए? इस अन्तरिक्ष में और दिवस में आपने दानु पुत्र वृत्रासुर का वध कर दिया।[ऋग्वेद 4.30.7]
हे वृत्र रूप आवरणकारी अंधकार को दूर करने वाले इन्द्र और दुष्टों पर अत्यधिक क्रोध करने वाले हो। तुम प्रजाओं को छिन्न-भिन्न करने वाले असुरों का वध करो।
Hey remover of darkness, wealthy Indr Dev! Thereafter, your became angry and killed Vrata Sur the son of Danu in the space, during the day.
एतद्धेदुत वीर्य १ मिन्द्र चकर्थ पौंस्यम्।
स्त्रियं यद्दुर्हणायुवं वधीर्दुहितरं दिवः
हे इन्द्र देव! आपने बल को इस प्रकार से सामर्थ्य युक्त किया। आपने सूर्य देव तथा द्युलोक की दुहिता पुत्री उषा का भी वध किया।[ऋग्वेद 4.30.8]
हे इन्द्र देव! तुम पुरुषोचित्त वीर कर्मों को करने वाले हो। जैसे सूर्य अपने उजाले से उषा को नष्ट कर देता है, वैसे ही तुम एकत्र हुई शत्रु सेना को समाप्त कर दो।
Hey Indr Dev! You performed like a great warrior. The way Sun shines and replace Usha-day break, you destroyed the enemy armies.
दिवश्चिद्धा दुरितं महन्मदीययानाम्। उषासमिन्द्र स पिणक्
हे महान इन्द्र देव! आपने द्युलोक की दुहिता तथा पूजनीया उषा को सम्पिष्ट किया।[ऋग्वेद 4.30.9]
संपुष्टि :: पुष्टिकरण; पक्का करना; nourish. 
Hey mighty Indr Dev! You have enriched revered, glorious dawn Usha-the daughter of heaven-Sun.
Hey great Indr Dev! You nourished Usha, the honoured daughter of heaven.
अपोषा अनसः सरत्संपिष्टादह बिभ्युषी। नि यत्सीं शिश्नथद्वृषा
अभीष्टवर्षी इन्द्रदेव ने जब उषा के शकट को भग्न किया, तब उषा भयभीत होकर इन्द्र देव द्वारा भग्न शकट के ऊपर से अवतीर्ण हुई।[ऋग्वेद 4.30.10]
अभिलाषाओं के वर्षक इन्द्र देव जब तुमने उषा के रथ को छिन्न-भिन्न कर डाला था, तब उषा भयभीत होकर इन्द्र द्वारा तोड़े हुए रथ के ऊपर से प्रकट हुई थी।
Hey great, desires accomplishing Indr Dev! When you destroyed the charoite of Usha, she appeared over the broken charoite. 
एतदस्या अनः शये सुसंपिष्टं विपाश्या। ससार सीं परावतः॥
इन्द्र देव द्वारा विचूर्णित उषा देवी का शकट विपाशा नदी के किनारे पर गिर पड़ा। शकट के टूट जाने पर उषा देवी दूर देश में चली गई।[ऋग्वेद 4.30.11]
इन्द्र द्वारा तोड़ा गया वह उषा का रथ विपाशा नदी के किनारे जा पड़ा। रथ के भस्म होने पर उषा दूर देश में अचेत अवस्था में जाकर गिरी।
Powdered-broken cart of Usha fell over the bank of river Vipasha. Usha shifted else where-other region, due to the breaking of her cart.
उत सिन्धुं विबाल्यं वितस्थानामधि क्षमि। परि ष्ठा इन्द्र मायया
हे इन्द्र देव! आपने सम्पूर्ण जलों तथा तिष्ठमाना नदी को पृथ्वी के ऊपर बुद्धि बल से सभी जगह संस्थापित किया।[ऋग्वेद 4.30.12]
हे इन्द्र देव! तुमने सभी जलों को तथा तिष्ठमाना नदी को इस भूमण्डल पर अपनी बुद्धि के पराक्रम से प्रकट किया था।
Hey Indr Dev! You established water & Tishthmana river over the earth by virtue of your intelligence.
उत शुष्णस्य धृष्णुया प्र मृक्षो अभि वेदनम्। पुरो यदस्य संपिणक्
हे इन्द्र देव! आप वर्षणकारी है। जिस समय आपने शुष्ण नामक असुर के नगरों को नष्ट किया, उस समय आपने उसके धनों को लूट लिया।[ऋग्वेद 4.30.13]
हे इन्द्रदेव तुम वृष्टि करने वाले हो। अब तुमने शुष्ण के नगरों का विनाश किया था तब तुमने उसके धन को भी लूटा था।
Hey Indr Dev! You cause rains. You destroyed & plundered the cities of demon Shushn.
PLUNDERED :: लूटा, डाका डालना, चुराना; rob, flay, ransack, loot, despoil,  pillage, depredate, reave, reive, steal, thieve, pilfer, filch, purloin, lift.
उत दासं कौलितरं बृहतः पर्वतादधि। अवाहन्निन्द्र शम्बरम् 
हे इन्द्र देव! आपने कुलितर के पुत्र दास शम्बर को बृहत पर्वत के ऊपर से नीचे की ओर गिरा कर मार डाला।[ऋग्वेद 4.30.14] 
हे इन्द्र देव! तुमने कौलितर के पुत्र शम्बर नामक राक्षस को शैल से नीचे गिराकर मार दिया।
Hey Indr Dev! You threw the son of Kulitar, Shambar from the high mountain and killed him.
उत दासस्य वर्चिनः सहस्राणि शतावधीः। अधि पञ्च प्रधींरिव
हे इन्द्र देव! चक्र के चतुर्दिक स्थित शंकु (हिंसक) के तुल्य वर्चि नामक दास के चतुर्दिक स्थित पञ्चशत संख्यक और सहस्र संख्यक अनुचरों को आपने विशेष रूप से मार डाला।[ऋग्वेद 4.30.15]
हे इन्द्र देव! चक्र के चारों ओर स्थित शंकु के समान वर्चि नामक दस्यु के चारों ओर स्थित पाँच सौ सहस्त्र संख्यक के दासों को तुमने मार दिया था।
Hey Indr Dev! You killed the five hundred thousand followers-servants, soldiers surrounding the disc in all directions like Shanku-violent; of the slave called Varchi. 
उत त्यं पुत्रमग्रुवः परावृक्तं शतक्रतुः। उक्थेष्विन्द्र आभजत् 
शतकर्मा इन्द्र देव ने अग्रु के पुत्र परावृत्त को स्तोत्रों का पाठ करने योग्य बनाया।[ऋग्वेद 4.30.16]
हे इन्द्रदेव! तुमने प्रशंसा के योग्य कार्यों में भी उन अग्रु पुत्रों को दुखों से बचाकर यज्ञ का भागी बनाया।
Thousand Yagy performing Indr Dev enabled Paravratt the son of Agru, recite the sacred hymns-Strotr.
उत त्या तुर्वशायदु अस्नातारा शचीपतिः। इन्द्रो विद्वाँ अपारयत्
ययाति के शाप से अनभिषिक्त प्रसिद्ध राजा यदु और तुर्वश को शची के पति विद्वान इन्द्र देव ने अभिषेक योग्य बनाया।[ऋग्वेद 4.30.17]
अभिषेक :: प्रतिष्ठापन, समझाना, बतलाना, स्नान; coronation, consecration, ablution, anointment.
शचि पति इन्द्र ने ययापि के शाप से च्युत यदु और तुर्वश को संकट से दूर किया।
Indr Dev, the husband of Shachi, enabled king Yadu & Turvash for re-coronation, who were to be cursed by Yayati.
उत त्या सद्य आर्या सरयोरिन्द्र पारतः। अर्णाचित्ररथावधीः
हे इन्द्र देव! आपने तत्क्षण सरयू नदी के पार में रहने वाले आर्यत्वाभिमानी अर्ण और चित्ररथ नामक राजा का वध किया।[ऋग्वेद 4.30.18]
हे इन्द्र! तुमने तत्क्षण सरयू के पार रहने वाले अर्ण तथा चित्र रथ राजा को मार दिया था।
Hey Indr Dev! You killed immediately king Arn & Chitr Rath who lived across the river Saryu. 
अनु द्वा जहिता नयोन्यं श्रोणं च वृत्रहन्। न तत्ते सुम्नमष्टवे
हे वृत्र हन्ता इन्द्र देव! आपने बन्धुओं द्वारा त्यागे गये अन्ध और पंगु को अनुनीत किया अर्थात उनके अन्धत्व और पंगुत्व को विनष्ट किया। आपके द्वारा प्रदत्त सुख का अतिक्रमण करने में कोई भी समर्थ नहीं हो सकता।[ऋग्वेद 4.30.19]
पंगु :: लँगड़ा, गतिहीन, वात रोग से ग्रस्त व्यक्ति; लुंज-पुंज, लंगड़ा-लूला, असन्तोषजनक, कच्चा, अपूर्ण; crippled,  lame,  lacerated.
हे वृत्र नाशक इन्द्रदेव! तुमने बंधुओं द्वारा त्यागे गये नेत्रहीन एवं अपंग पर भी दया की थी। तुम्हारे द्वारा दिए सुख को नष्ट करने में कोई भी सक्षम नहीं हैं।
Hey slayer of Vratr Indr Dev! You cured the blind and crippled, discarded by the brothers. No one can vanish the comforts granted by you. 
शतमश्मन्मयीनां पुरामिन्द्रो व्यास्यत्। दिवोदासाय दाशुषे
इन्द्र देव ने प्रदाता याजकगण दिवोदास को शम्बर के पाषाण निर्मित शत संख्यक नगर प्रदान किया।[ऋग्वेद 4.30.20]
इन्द्र देव ने हविदान करने वाले यजमान दिवोदास को शम्बर के पत्थर से बने सौ नगर दिये।
Indr Dev granted the hundred cities of Shambar built with stone, to Divodas who made offering for him.
 अस्वापयद्दभीतये सहस्रा त्रिंशतं हथैः। दासानामिन्द्रो मायया
इन्द्र देव ने दभीति के लिए अपनी शक्ति से तीस हजार राक्षसों को हनन-साधन आयुधों के द्वारा पृथ्वी पर सुला दिया।[ऋग्वेद 4.30.21]
इन्द्र ने अपनी माया से दस्युओं की तीन सौ सहस्त्र सेना का नाश करने के लिए यज्ञ करने वाले अस्त्रों से धरती पर सुला दिया।
Indr Dev slayed (laid them over the earth),  thirty thousand demons for Dabhiti with his might & power.
स घेदुतासि वृत्रहन्त्समान इन्द्र गोपतिः। यस्ता विश्वानि चिच्युषे
हे इन्द्र देव! आपने इन समस्त शत्रुओं को प्रच्युत किया। हे शत्रुओं के हिंसक इन्द्र देव! आप गौओं के पालक है। आप सम्पूर्ण याजकगणों के लिए समान रूप से प्रख्यात है।[ऋग्वेद 4.30.22]
हे इन्द्र! तुम वृत्र का संहार करने वाले हो। तुमने समस्त शत्रु सेनाओं को युद्ध क्षेत्र में विचलित कर दिया। तुम धेनुओं के पोषणकर्त्ता हो।
Hey Indr Dev! You destroyed all the enemies. You serve-nurture the cows. You are honoured by the Ritviz.
उत नूनं यदिन्द्रियं करिष्या इन्द्र पौंस्यम्। अद्या नकिष्टदा मिनत्॥
हे इन्द्र देव! जिस लिए आपने अपने बल को सामर्थ्यवान किया, इसीलिए आज भी कोई व्यक्ति उसको हिंसा नहीं कर सकता।[ऋग्वेद 4.30.23]
तुम जिस शक्ति और समृद्धि को धारण करते हो, उसकी हिंसा आज भी कोई मनुष्य करने में समर्थ नहीं है।
Hey Indr Dev! None can destroy your power, might & strength.
वामवास त आदुरे देवो ददात्वर्यमा।
वामं पूषा वामं भगो वामं देवः करूळती
हे शत्रु विनाशक इन्द्रदेव! अर्यमा देवता आपको वह मनोहर धन प्रदान करें, दन्त हीन पूषा वह मनोहर धन प्रदान करें और भग वह मनोहर धन प्रदान करें।[ऋग्वेद 4.30.24]
हे इन्द्र देव! तुम शत्रुओं का पतन करने वाले हो, अर्यमा सुन्दर धन को प्रदान करें। दन्त विहीन पूषा और भग भी रमणीय धन को प्रदान करें।
Hey destroyer of the enemy Indr Dev! Let Aryma, Pusha-who has no teeth & Bhag grant you lovely riches, gifts.(20.03.2023)
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (31) :: ऋषि :- वामदेव गौतम, देवता :- इन्द्र,   छन्द :- गायत्री।
कया नश्चित्र आ भुवदूती सदावृधः सखा। कया शचिष्ठया वृता
सर्वदा वर्द्धमान, पूजनीय और मित्र भूत इन्द्र देव किस तर्पण द्वारा हमारे अभिमुख आगमन करेंगे? किस प्रज्ञा युक्त श्रेष्ठ कर्म द्वारा हम लोगों के अभिमुख आगमन करेंगे।[ऋग्वेद 4.31.1]
वे हमेशा वृद्धि करने वाले, पूषा के पात्र सखा रूपी इन्द्र देव किस पुष्प द्वारा हमारे सामने पधारेंगे। किस गतिवान के महान कार्य से प्रभावित हुए वे हमारे सम्मुख पधारेंगे।
By what means will Indr Dev, who is ever augmenting, wonderful, our friend, be present with us, by what most effective rite?
By which means, always advancing-progressing, revered Indr Dev will invoke in front of us? Which intelligent & excellent endeavour will bring him to us? 
कस्त्वा सत्यो मदानां मंहिष्ठो मत्सदन्धसः। दृळ्हा चिदारुजे वसु
हे इन्द्र देव! पूजनीय, सत्य भूत और हर्षकर सोमरसों के बीच में कौन सोमरस शत्रुओं के धन को विनष्ट करने के लिए आपको हर्षित करेगा?[ऋग्वेद 4.31.2]
हे इन्द्र देव! सत्य रूपी और हर्षित करने वाले सोम रसों के मध्य, शत्रुओं के धन का पतन करते हुए तुम्हें कौन सा सोमरस संतुष्ट करेगा?
Hey Indr Dev! Which Somras amongest the honoured-respected, blissful, truthful Somras will please-motivate you to destroy the wealth of the enemy?
अभी षु णः सखीनामविता जरितॄणाम्। शतं भवास्यूतिभिः
हे इन्द्र देव! आप मित्र स्वरूप स्तोताओं के रक्षक है। आप बहुत प्रकार की रक्षा के साथ हमारे अभिमुख आगमन करें।[ऋग्वेद 4.31.3]
हे इन्द्र देव! तुम सखा रूप वंदना करने वालों के रक्षक हो, अपने अनेक रक्षा साधनों के साथ हमारे सम्मुख पधारो।
Hey Indr Dev! you are the protector of the friendly Stota-household. Invoke here with various means of safety, in front of us.
अभी न आ ववृत्स्व चक्रं न वृत्तमर्वतः। नियुद्भिश्चर्षणीनाम्
हे इन्द्र देव! हम लोग आपके उपगन्ता हैं। आप हम मनुष्यों की प्रार्थना से प्रसन्न होकर हमारे निकट वृत्ताकार चक्र के तुल्य पधारें।[ऋग्वेद 4.31.4]
हे इन्द्र देव! हम तुम्हारे मार्ग पर चलने वाले हैं। हम प्राणियों की प्रार्थनाओं से प्रसन्न होते हुए तुम हमारे सम्मुख वृत्ताकार चक्र के सम्मुख आओ।
Hey Indr Dev! We are your followers. Be happy with our prayers and obelize us by coming to us like a rotating wheel (while pool).
प्रवता हि क्रतूनामा हा पदेव गच्छसि। अभक्षि सूर्वे सचा
हे इन्द्र देव! आप यज्ञ के प्रवण प्रदेश में अपने स्थान को जानकर आगमन करते हैं। हम सूर्य के साथ आपकी उपासना करते हैं।[ऋग्वेद 4.31.5]
हे इन्द्र देव! तुम यज्ञ में अपने स्थान को समझते हुए यहाँ पधारो। सूर्य के साथ हम तुम्हारा पूजन करते हैं।
Hey Indr Dev! Maintaining your dignity in the Yagy, you arrive here. WE worship you along with the Sun.
सं यत्त इन्द्र मन्यवः सं चक्राणि दधन्विरे। अध त्वे अध सूर्ये
हे इन्द्र देव! आपके लिए सम्पादित प्रार्थना और कर्म जब हम लोगों के द्वारा अनुमन्यमान होते हैं, तब वे पहले आपके होते हैं और उसके पश्चात सूर्य देव के होते हैं।[ऋग्वेद 4.31.6]
हे इन्द्र देव! तुम्हारे लिए सम्पादन की गई वंदना तथा कार्य जब एक साथ ऊपर उठते हैं तब वे पहले तुम्हारे और फिर सूर्य के होते हैं।
Hey Indr Dev! When we perform prayers and make offerings we worship you first, followed by the Sun.
उत स्मा हि त्वामाहुरिन्मघवानं शचीपते। दातारमविदीधयुम्
हे कर्म पालक इन्द्र देव! आपको लोग धनवान, स्तोताओं के अभीष्टप्रद और दीप्तिमान कहते है।[ऋग्वेद 4.31.7]
हे इन्द्र देव! तुम कार्यों के रक्षक हो। तुमको धनशाली और वंदनाकारी की कामना पूर्ण करने वाला तथा तपस्वी कहा जाता है।
Hey Indr Dev! You protect our efforts-endeavours. Public calls you rich-wealthy, worship deserving, glorious-radiant.
उत स्मा सद्य इत्परि शशमानाय सुन्वते। पुरू चिन्मंहसे वसु
हे इन्द्र देव! आप क्षण भर में ही स्तुति कारी तथा सोमाभिषवकारी याजक गण को बहुत धन प्रदत करते हैं।[ऋग्वेद 4.31.8]
हे इन्द्र देव! सोम सिद्ध करने वाले तथा प्रार्थना करने वाले यजमान को तुम तुरन्त ही अनेक सा धन प्रदान करते हो।
Hey Indr Dev! You grant  a lot of riches-wealth to the worshipers, those who extract Somras for you. 
नहि ष्मा ते शतं चन राधो वरन्त आमुरः। न च्यौत्नानि करिष्यतः
हे इन्द्र देव! बाधक राक्षस आदि आपके शत परिमित धन का निवारण नहीं कर सकते। शत्रुओं की हिंसा करने वाले आपके बल का निवारण नहीं कर सकते।[ऋग्वेद 4.31.9]
हे इन्द्र! विघ्न देने वाले राक्षस भी तुम्हारे सैंकड़ों ऐश्वर्य को रोक नहीं पाते। विभिन्न बल वाले वीर कर्मा भी तुम्हारी शक्ति को नहीं रोक पाते।
Hey Indr Dev! The demons creating obstacles, can not check-prohibit your grandeur. The violent who kill the opponents, can not prohibit your might, power, strength.
अस्माँ अवन्तु ते शतमस्मान्त्सहस्रमूतयः। अस्मान्विश्वा अभिष्टयः
हे इन्द्र देव! आपकी शत संख्यक रक्षा हम लोगों की रक्षा करे। आपकी सहस्र संख्यक रक्षा हम लोगों की रक्षा करे। आपका समस्त अभिगमन हम लोगों की सुरक्षा करें।[ऋग्वेद 4.31.10]
हे इन्द्र देव! तुम्हारे हजारों रक्षा साधन हमारे रक्षक हों। तुम्हारे हजारों रक्षा साधन हमारी रक्षा करें। तुम्हारी सभी प्रेरणाएँ रक्षा में सहायक हों।
 Hey Indr Dev! Let your multiple-thousands means protect us.
अस्माँ इहा वृणीष्व सख्याय स्वस्तये। महो राये दिवित्मते
हे इन्द्र देव! इस यज्ञ में आप हम याजक गणों के मित्र, अविनाशी तथा दीप्ति युक्त धन का भागी बनावें।[ऋग्वेद 4.31.11]
हे इन्द्र देव! हम यजमानों को इस यज्ञ में सखा रूप, कभी नष्ट न होने वाला तथा प्रकाश से युक्त धन का अधिकारी बनाओ।
Hey Indr Dev! You should share-enjoy the imperishable, glorious wealth in this Yagy, being our friend-the Ritviz. 
अस्माँ अविड्ढि विश्वहेन्द्र राया परीणसा। अस्मान्विश्वाभिरूतिभिः॥
हे इन्द्र देव! आप प्रतिदिन हम लोगों की अपने महान धनों द्वारा रक्षा करें और समस्त रक्षा कर्मों द्वारा हमारी रक्षा करें।[ऋग्वेद 4.31.12]
हे इन्द्र देव! प्रतिदिन अपने श्रेष्ठ धन द्वारा हमारे रक्षक बनो।
Hey Indr Dev! Protect us and our wealth eceryday.
अस्मभ्यं ताँ अपा वृधि व्रजाँ अस्तेव गोमतः। नवाभिरिन्द्रोतिभिः
हे इन्द्र देव! आप शूर के तुल्य नूतन रक्षा द्वारा हम लोगों के लिए गो विशिष्ट गोव्रज (गौओं के निवास स्थान) का उद्धार करें।[ऋग्वेद 4.31.13]
हे इन्द्र! वीर के समान अपने नए रक्षा साधन द्वारा हमारे लिए गौओं के वास को पुष्ट करो।
Hey Indr Dev! Like a brave person you should protect & support the cows sheds with new means-weapons.
अस्माकं धृष्णुया रथो द्युमाँ इन्द्रानपच्युतः। गव्युरश्वयुरीयते॥
हे इन्द्र देव! हम लोगों का शत्रु धर्षक, दीप्तिमान, विनाश रहित, गोयुक्त और अश्व युक्त रथ सभी जगह गमन करे। आप उस रथ के साथ हम याजकों की रक्षा करें।[ऋग्वेद 4.31.14]
हे इन्द्र देव! तुम हमारे शत्रुओं को मारने वाले अत्यन्त तेजस्वी, अविनाशी गायों से युक्त अश्वों वाले रथ में सभी ओर जाने वाले हो। तुम उस रथ के साथ हमारे रक्षक बन जाओ।
Hey Indr Dev! Let our radiant, imperishable chariots having cows & horse roam every where. Protect us along with that charoite.
अस्माकमुत्तमं कृषि श्रवो देवेषु सूर्य। वर्षिष्ठं द्यामिवोपरि
हे सभी के प्रेरक सूर्य देव! आपने जिस प्रकार से सेचन समर्थ द्युलोक को ऊपर में स्थापित कर दिया, उसी प्रकार से देवों के बीच में हम लोगों के यश को उत्कृष्ट करें।[ऋग्वेद 4.31.15]
हे सूर्य! तुम सबको प्रेरणा प्रदान करते हो। तुमने बरसात में समर्थ नभ को जैसे उच्च स्थापित किया है, वैसे ही देवताओं के बीच हमारे यज्ञ को बढ़ाओ।
Hey Sury Dev-Sun, inspiring all! The way-manner in which you have established the heavens at a high altitude in the sky, enhance-boost the glory of our Yagy, amongest the demigods-deities.(23.03.2023)
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (32) :: ऋषि :- वामदेव गौतम, देवता :- इन्द्र,  अश्व, छन्द :- गायत्री।
आ तू न इन्द्र वृत्रहन्नस्माकमर्धमा गहि। महान्महीभिरूतिभिः
हे शत्रु हिंसक इन्द्र देव! आप शीघ्र ही हम लोगों के निकट आगमन करें। आप महान है। महान रक्षा के साथ आप हमारे निकट आगमन करें।[ऋग्वेद 4.32.1]
हे इन्द्र देव! तुम शत्रुओं के शोषणकर्त्ता हो। तुम हमारे सामने शीघ्रतम पधारो। तुम सर्वश्रेष्ठ हो। अपनी सर्वश्रेष्ठ रक्षाओं से युक्त हमारे सम्मुख आओ।
Hey slayer-destroyer of the enemy, great Indr Dev! Come to us quickly and grant asylum-protection.
भृमिश्चिद्धासि तूतुजिरा चित्र चित्रिणीष्वा। चित्रं कृणोष्यूतये
हे पूजनीय इन्द्र देव! आप भ्रमणशील और हम लोगों के अभीष्टदाता है। चित्र कर्म युक्त प्रजा को आप रक्षा के लिए धन प्रदान करते हैं।[ऋग्वेद 4.32.2]
हे इन्द्र देव! तुम पूजा के योग्य हो। तुम विचरणशील हो। तुम हमको इच्छित फल प्रदान करते हो। तुम प्रजा को पोषण के लिए धन देते हो।
Hey Indr Dev! You deserve worship. You are dynamic and accomplish our desires. You nourish, support and nurture the humans-populace.
दभ्रेभिश्चिच्छशीयांसं हंसि व्राधन्तमोजसा। सखिभिर्ये त्वे सचा 
हे इन्द्र देव! जो याजकगण आपके साथ संगत होते हैं, उन थोड़े से भी याजकगणों के साथ आप उत्प्लवमान तथा वर्द्धमान शत्रुओं को अपने बल से विनष्ट करते है।[ऋग्वेद 4.32.3]
हे इन्द्र देव! जो यजमान तुम्हारे अनुकूल होते हैं, उन थोड़े यजमानों सहित तुम उच्छृंखल, बड़े हुए शत्रुओं को अपने उत्तम बल से नष्ट करते हो।
Hey Indr Dev! You kill-destroy the enemy with the small numbers of the Ritviz who are associated with you, with your might-power.
वयमिन्द्र त्वे सचा वयं त्वाभि नोनुमः। अस्माँ अस्माँ इदुदव 
हे इन्द्र देव! हम याजकगण आपसे संगत हुए हैं। हम अधिक परिमाण में आपकी प्रार्थना करते हैं। आप हम सबकी विशेष रूप से रक्षा करें।[ऋग्वेद 4.32.4]
सुसंगत :: सिलसिलेवार, क्रमबद्ध, तर्कयुक्त, तर्कसंगत, परंपरा-संबंधी, संसक्त, स्पष्ट, संगत, बद्ध; compatible, coherent, sequential, sequent, virtuous-auspicious-pious company.
हे इन्द्र देव! हम यजमान तुम्हारे द्वारा सुसंगत हुए हैं। हम तुम्हारी अत्यन्त प्रार्थना करते हैं। तुम्हारा विशेष रूप से पोषण करते हैं।
Hey Indr Dev! We hosts-Ritviz attained your virtuous company. We have increased the quantum of your worship-prayer. Take care of us, specially.
स नश्चित्राभिरद्रिवोऽनवद्याभिरूतिभिः। अनाधृष्टाभिरा गहि
हे वज्र धर! आप मनोहर, अनिन्दित और शत्रुओं के द्वारा अग्रहर्षित अर्थात अनाक्रमणीय रक्षाओं के साथ हमारे निकट आगमन करें।[ऋग्वेद 4.32.5]
वे वज्रिन! आनन्दमयी! दिव्य शत्रुओं के द्वारा पराजित न होने वाले, तुम अपनी समृद्ध सुरक्षाओं से युक्त हमारे निकट पधारो।
Wielder of the thunderbolt-Vajr, come to us with wondrous, irreproachable, irresistible protections.
Hey Vajr wielding! Hey attractive, blissful, undefeated by the enemy, come to us with the means of protection for us.
भूयामो षु त्वावतः सखाय इन्द्र गोमतः। युजो वाजाय घृष्वये 
हे इन्द्र देव! हम आपके सदृश गोयुक्त देवता के मित्र है। प्रभूत अन्न के लिए आपके साथ संयुक्त होते हैं।[ऋग्वेद 4.32.6]
हे इन्द्र देव! हम तुम्हारे तुल्य धेनु सहित पुरुष के उपयोगी हैं। हम महान धन के लिए तुम्हारी सहायता को चाहते हैं।
Hey Indr Dev! We are friendly with the demigods-deities possessing cows. We associate-coordinate our self with you for plenty of food grains & money.
त्वं ह्येक ईशिष इन्द्र वाजस्य गोमतः। स नो यन्धि महीमिषम् 
हे इन्द्र देव! जिस कारण आप ही एक गोयुक्त अन्न के स्वामी हैं; इसलिए आप हमें प्रभूत अन्न प्रदान करें।[ऋग्वेद 4.32.7]
हे इन्द्र देव! तुम अकेले हो गाय, घोड़े आदि के दाता हो। हमको बहुत सा अन्नादि धन प्रदान करो।
Hey Indr Dev! You are the owner of food grains & cows. Grant us sufficient food grains.
न त्वा वरन्ते अन्यथा यद्दित्ससि स्तुतो मघम्। स्तोतृभ्य इन्द्र गिर्वणः
हे स्तुति योग्य इन्द्र देव! जब आप प्रार्थित होकर स्तोताओं को धन प्रदान करने की इच्छा करते हैं, तब कोई भी उसे रोक नहीं सकता।[ऋग्वेद 4.32.8]
हे इन्द्र देव! तुम स्तुति के पात्र हो स्तुति करने वालों को धन देने की कामना करते हो। तुम्हारे उस दान को तब रोकने की शक्ति किसी में नहीं है।
Hey Indr Dev! When you decide to grant riches to the Stota, none is capable of obstructing you.
अभित्वा गौतमा गिरानूषत प्रदानवे। इन्द्र बाजाय घृषवये
हे इन्द्र देव! आपको लक्ष्य करके गौतम नाम वाले ऋषि धन और प्रभूत अन्न के लिए प्रार्थना वाक्य द्वारा आपकी प्रार्थना करते हैं।[ऋग्वेद 4.32.9]
हे इन्द्र देव! तुम्हारे उद्देश्य से गौतम वंशज मुनि अन्न के लिए श्लोक द्वारा पूजन करते हैं।
Hey Indr Dev! Rishis with the title Gautom request-pray you for food grains and money by using sacred Strotr-hymns.
प्र ते वोचाम वीर्या३या मन्दसान आरुजः। पुरो दासीरभीत्य
हे इन्द्र देव! सोमपान से हर्षित होकर के आप क्षेपक असुरों के सम्पूर्ण नगरों में अभिगमन करके उन्हें विदीर्ण कर देते हैं। हे इन्द्र देव! हम स्तोता आपके उसी वीरता का कीर्तन करते हैं।[ऋग्वेद 4.32.10]
हे इन्द्र देव! तुम सोमपान करके पराक्रमी बने क्षेपक राक्षसों के समस्त पुरों में जाकर तोड़ते हो।
Hay Indr Dev! You become happy after drinking Somras and destroy the habitats-cities of the demons. We the Stota, sing the glory of your valour, bravery.
ता ते गृणन्ति वेधसो यानि चकर्थ पौंस्या। सुतेष्विन्द्र गिर्वणः
हे इन्द्र देव! आप स्तुति योग्य है। आपने जिन बलों को प्रदर्शित किया। हे इन्द्र देव! प्राज्ञगण सोमाभिषव होने पर आपके उसी बल का संकीर्तन करते हैं।[ऋग्वेद 4.32.11]
हे इन्द्र देव! तुम वंदना के पात्र हो। तुम जिन बलों को प्रकट करते हो, तुम्हारे उन्हीं बलों को मेधावी लोग सोम के सिद्ध होने पर उच्चारण करते हैं।
Hey Indr Dev! You deserve worship. You demonstrate-exhibit your might, power & valour. The intelligent-prudent sing the glory of your strength after extracting Somras.
अवीवृधन्त गोतमा इन्द्र त्वे स्तोमवाहसः। ऐषु धा वीरवद्यशः
हे इन्द्र देव! स्तोत्र वाहक गौतम ऋषि आपको स्तोत्र द्वारा वर्द्धित करते हैं। आप उन्हें पुत्र-पौत्र युक्त कर अन्न प्रदान करें।[ऋग्वेद 4.32.12]
हे इन्द्र! स्तोत्रों को वहन करने वाले गौतम वंशज स्तोत्र से तुम्हें बढ़ाते हैं। तुम उन्हें पुत्रादि से परिपूर्ण अन्न प्रदान करो।
Hey Indr Dev! Gautom Rishi who possess (has the Strotr in his memory) the Strotr, enhance-boost you, through the Strotr. Bless him with sons & grandsons.
यच्चिद्धि शश्वतामसीन्द्र साधारितस्त्वम्। तं त्वा वयं हवामहे
हे इन्द्र देव! यद्यपि आप सभी यजमानों के साधारण देवता हैं, तथापि हम स्तोता आपका आह्वान करते हैं।[ऋग्वेद 4.32.13]
हे इन्द्र देव! तुम सात यजमानों के विख्यात देवता हो। हम प्रार्थना करने वाले तुम्हें पुकारते हैं।
Hey Indr Dev! Even though you are our demigod-deity, yet we invoke you. 
अर्वाचीनो वसो भवास्मे सु मत्स्वान्धसः। सोमानामिन्द्र सोमपाः
हे निवासप्रद इन्द्र देव! आप हम यजमानों के समक्ष पधारें। आप सोमपान करने वाले हैं, आप सोमरूप अन्न द्वारा प्रसन्न होवें।[ऋग्वेद 4.32.14]
हे इन्द्र देव! तुम महान निवास प्रदान करते हो। तुम यजमानों के सम्मुख पधारो। हे सोमपान करने वाले इन्द्रदेव! तुम सोम रूप अन्न से पुष्टि को प्राप्त होओ।
Hey Indr Dev! You are the provider of best residence-habitat to us. We invoke you. You enjoy Somras. Be happy with the grains like the Som.
अस्माकं त्वा मतीनामा स्तोम इन्द्र यच्छतु। अर्वागा वर्तया हरी
हे इन्द्र देव! हम आपके स्तोता हैं। हमारा स्तोत्र आपको हमारे निकट ले आए। आप अश्वद्वय को हमारे अभिमुख प्रेरित करें।[ऋग्वेद 4.32.15]
हे इन्द्र देव! हम तुम्हारी स्तुति करने वाले हैं, हमारा स्तोत्र तुम्हें हमारे निकट लाए। तुम दोनों अश्वों को हमारे सम्मुख मोड़ों।
Hey Indr Dev! We are your worshipers. Let our Strotr bring you close to us i.e., in our proximity. Direct your horses towards us.
पुरोळाशं च नो घसो जोषयासे गिरश्च नः। वधूयुरिव योषणाम्
हे इन्द्र देव! आप हमारे पुरोडाश रूप अन्न का भक्षण करें। स्त्री कामी पुरुष जिस प्रकार से स्त्रियों के वचन की सेवा करता है, उसी प्रकार आप हमारे स्तुति वाक्य का सेवन करें।[ऋग्वेद 4.32.16]
हे इन्द्र देव! तुम हमारे पुरोडाश का भक्षण करो जैसे पुरुष स्त्रियों के संकल्पों को सुनता है उसी तरह तुम हमारे संकल्पों को ध्यान पूर्वक सुनो।
Hey Indr Dev! Please eat-accept the offerings of backed barley lobs made by us. Listen to our words the way a lascivious hear-respond to the women.
सहस्त्रं व्यतीनां युक्तानामिन्द्रमीमहे। शतं सोमस्य खार्यः
हम स्तोता इन्द्र देव के निकट शिक्षित, शीघ्र गामी तथा सहस्र संख्यक अश्वों की याचना करते हैं एवं शत संख्यक सोम-कलश की याचना करते हैं अर्थात् अपरिमित कलश वाले यज्ञ की याचना करते हैं।[ऋग्वेद 4.32.17]
हम वंदना करने वाले इन्द्र के पास सीखे हुए शीघ्र चलने वाले सहस्त्रों अश्वों को माँगते हैं और सैकड़ों सोम कलशों की याचना करते हैं।
The Ritviz, devotee, hosts pray-request Indr Dev to grant them trained-skilled fast moving thousand horses, hundred pots-vessels full of Somras for the Yagy.
सहस्रा ते शता वयं गवामा च्यावयामसि। अस्मत्रा राध एतु ते
हे इन्द्र देव ! हम आपकी सैकड़ों और हजारों गौओं को आपसे प्राप्त करते हैं। हम लोगों का धन आपके निकट से आवें।[ऋग्वेद 4.32.18]
हे इन्द्र! हम तुम्हारी सैकड़ों तथा हजारों गायों को अपने सम्मुख प्राप्त करें। हमारा धन तुम्हारे पास से यहाँ आए।
Hey Indr Dev! We receive hundreds & thousands of cows from you. Please bring our riches-wealth to us.
दश ते कलशानां हिरण्यानामधीमहि। भूरिदा असि वृत्रहन्
हे इन्द्र देव! हम आपके समीप से दश कुम्भ परिमित सुवर्ण प्राप्त करते हैं। हे शत्रु हिंसक इन्द्र देव! आप सहस्र प्रद होते हैं।[ऋग्वेद 4.32.19]
हे इन्द्र! हम तुम्हारे दस कलशों में स्वर्ण धारण करें। हे वृत्र के हननकर्त्ता इन्द्र देव! तुम अपरिचित दान करने वाले हो।
Hey Indr dev! let us receive gold in 10 vessels. Hey slayer of Vratr Indr Dev! You conceal your identity while making donations.
भूरिदा भूरि देहि नो मा दभ्रं भूर्या भर। भूरि घेदिन्द्र दित्ससि
हे इन्द्र देव! आप बहुप्रद है। आप हम लोगों को बहुत धन प्रदान करें। अल्प धन न दे। आप बहुत धन हम लोगों के लिए लावें, क्योंकि आप हम लोगों को प्रभूत धन देने की इच्छा करते हैं।[ऋग्वेद 4.32.20]
बहुप्रद :: व्ययशील, उडाऊ, फजूल खर्च, बहुत, अतिव्ययी; extravagant, lavish.
हे इन्द्र देव! तुम हमें अपरिमित धन प्रदान करने की इच्छा करते हो। तुम बहुत साधन दाता लेकर हमको अत्यन्त धन प्रदान करो। स्वल्प धन न दो। अनेक असंख्य समृद्धि प्रदान करो।
Hey Indr Dev! You are extravagant, lavish. Give us a lot of money since you you wish to give us more. 
भूरिदा ह्यसि श्रुतः पुरुत्रा शूर वृत्रहन्। आ नो भजस्व राधसि
हे वृत्र हिंसक विभ्रान्त इन्द्र देव! आप बहुप्रद रूप से अनेकों यजमानों के निकट विख्यात है। आप हम लोगों को धन का भागी बनावें।[ऋग्वेद 4.32.21]
विभ्रांत :: घूमता हुआ, चक्कर खाता हुआ, भ्रम में पड़ा हुआ, विभ्रमयुक्त,  विक्षुब्ध-व्याकुल, चारों ओर फैला हुआ; dynamic.
हे वृत्र के शोषण करने वाले पराक्रमी इन्द्रदेव! तुम अनेक धन देने वाले के रूप में यजमानों में विख्यात हो। तुम हमको धन का अधिकारी बनाओ।
Hey slayer of Vratr dynamic Indr Dev! You are known for your habit of donating lavishly. Share money with us.
प्र ते बभ्रु विचक्षण शंसामि गोषणो नपात्। माभ्यां गा अनु शिश्रथः
हे प्राज्ञ इन्द्र देव! हम आपके पिङ्गलवर्ण अश्व द्वय की प्रशंसा करते हैं। हे गोप्रद! आप स्तोताओं का विनाश नहीं करते। आप इस अश्व द्वय द्वारा हमारी गौओं को नष्ट न करें।[ऋग्वेद 4.32.22]
हे मेधावी इन्द्र देव ! हम तुम्हारे लाल रंग वाले दोनों अश्वों की प्रार्थना करते हैं। तुम धेनुओं का दान प्रदान करने वाले हो। तुम वंदना करने वालों को नष्ट नहीं करते। तुम अपने दोनों अश्वों द्वारा हमारी गायों को कष्ट न देना।
Hey intelligent Indr Dev! We appreciate you red coloured horses. Hey donor of cows, you never destroy your worshipers. Use these horses to protect our cows.
कनीनकेव विद्रधे नवे द्रुपदे अर्भके। बभ्रु यामेषु शोभेते
हे इन्द्र देव! दृढ़, नव और क्षद्र द्रुमाख्य स्थान में स्थित कमनीय शाल भञ्जिका द्वय (पुतलिका) के तुल्य आपके पिङ्गल वर्ण दोनों घोड़े यज्ञ में शोभा पाते हैं।[ऋग्वेद 4.32.23]
हे इन्द्र देव! जाने योग्य मार्ग में जैसे लाल वर्ण के दो अश्व शोभा पाते हैं, उसी प्रकार स्थिरता नवीन खूंटे के समान कार्यों में दृढ़ स्त्री-पुरुष रूप यजमान सुशोभित होते हैं।
Hey Indr Dev! The way your red coloured horses are gracious over the movable road, the men & women too are gracious in the Yagy.  
अरं म उस्त्रयाम्णेऽरमनुस्त्रयाम्णे। बभ्रु यामेष्वस्त्रिधा
हे इन्द्र देव! हम जब बैलों से युक्त रथ द्वारा गमन करें अथवा जब पैरों द्वारा गमन करें, तब आपके अहिंसक तथा पिङ्गल वर्ण अश्व द्वय हमारे लिए मंगलकारी हों।[ऋग्वेद 4.32.24]
हे इन्द्र देव! जब हम बैलों से जुते रथ में बैठकर चलें या पैदल यात्रा करें तब तुम्हारे हिंसा रहित लाल रंग वाले दोनों घोड़े हमारे लिए सुखकारी हों।
Hey Indr Dev! Let your red coloured horses be helpful to us when we walk on foot or travel in the charoite deploying oxen.(26.03.2023)
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (33) :: ऋषि :- वामदेव गौतम, देवता :- ऋभुगण,  छन्द :- त्रिष्टुप्।
प्र ऋभुभ्यो दूतनिव वाचमिष्य उपस्तिरे श्वैतरीं धेनुमीळे।
ये वातजूतास्तरणिभिरेवैः परि द्यां सद्यो अपसो बभूवुः
हम याजक गण ऋभुओं के निकट दूत के तुल्य स्तुति वाक्य प्रेरित करते हैं। हम उनके निकट सोम उपस्तरण के लिए पयोयुक्त गौ की याचना करते हैं। ऋभुगण वायु के समान गमन करने वाले है। वे जगत् के उपकार जनक कर्म को करने वाले हैं। वे वेग से जाने वाले घोड़ों द्वारा अन्तरिक्ष को क्षण मात्र में परिव्याप्त करते हैं।[ऋग्वेद 4.33.1]
हम यजमान ऋभुगण के लिए दूत के समान वंदना वाणी को प्रेरित करते हैं। हम उनके समीप सोम उपस्थित करने हेतु दुग्ध वाली गौओं की विनती करते हैं। ऋभुगण पवन के समान चलने वाले तथा संसार का हित करने वाले कार्यों को करते हैं। वे अपने वेगवान घोड़ों से पल भर में अंतरिक्ष को विद्यमान करते हैं।
We, the hosts, Ritviz express ourselves as a messenger, to the Ribhu Gan, reciting prayers. We request them to grant us cows yielding milk. Ribhu Gan moves as fast as air. They preform deeds pertaining to the welfare-benefit of the universe-world. Their horses pervade the space with the blink of eye.
यदारमक्रन्नृभवः पितृभ्यां परिविष्टी वेषणा दंसनाभिः।
आदिद्देवानामुप सख्यमायन्धीरासः पुष्टिमवहन्मनायै
जब ऋभुओं ने माता-पिता को परिचर्या द्वारा युवा किया एवं चमस निर्माणादि अन्य कार्य करके वे अलंकृत हुए, तब इन्द्रादि देवों के साथ उन्होंने उसी समय मित्र-लाभ किया। वीर ऋभुगण प्रकृष्ट मनस्वी हैं। वे यजमानों के लिए पुष्टि धारित करते हैं।[ऋग्वेद 4.33.2]
जब ऋभुगण ने अपनी माता को युवावस्था दी और चमस बनाने आदि कार्यों को करते हुए यशवान हुए तब उसी समय उनकी मित्रता इंद्रादि देवताओं के साथ हो गई। वे मनस्वी एवं धैर्यवान हैं तथा यजमान के लिए पराक्रम धारण करते हैं।
मनस्वी :: चिन्तन शील, विचार शील; intelligent person, thoughtful person, contemplative person.
Ribhu Gan granted youth to their parents, developed Chamas and gained fame & honours. They gained -enjoyed the friendship of the demigods-deities. They are thoughtful and have patience. The rise-possess valour to protect the devotees, Ritviz.
पुनर्ये चक्रुः पितरा युवाना सना यूपेव जरणा शयाना।
ते वाजो विभ्वाँ ऋभुरिन्द्रवन्तो मधुप्सरसो नोऽवन्तु यज्ञम्
ऋभुओं ने यूप काष्ठ के तुल्य जीर्ण और लेटे हुए अपने माता-पिता को नित्य युवा किया। बाज विभु और ऋभु इन्द्र देव के साथ सोम पान करके हम लोगों के यज्ञ की रक्षा करें।[ऋग्वेद 4.33.3]
ऋभुगणों ने ही यूप के समान जीर्ण और लुढ़के पड़े हुए माता-पिता को तरुणाई प्रदान की। वे शक्तिशाली और ऋभु इन्द्रदेव के साथ सोमपान करते हुए हमारे अनुष्ठान के रक्षक हों।
They made their parents younger day by day, who were lying like the dead log. Let Vibhu & Ribhu Gan drink Somras along with Indr Dev and protect-shield our Yagy.
यत्संवत्समृभवो गामरक्षन्यत्संवत्समृभवो मा अपिंशन्।
यत्संवत्समभरन्भासो अस्यास्ताभिः शमीभिरमृतत्वमाशुः
ऋभुओं ने संवत्सर पर्यन्त मृतक गौ का पालन किया। ऋभुओं ने उस गौ के माँस-शरीर को संवत्सर पर्यन्त अवयव युक्त किया एवं संवत्सर पर्यन्त उसके शरीर के सौन्दर्य की रक्षा की। इन सकल कार्यों द्वारा उन्होंने देवत्व को प्राप्त किया।[ऋग्वेद 4.33.4]
ऋभुगण ने एक वर्ष तक मृत धेनु की सेवा की। उन्होंने उस धेनु के शरीर को अवयवों से सम्पन्न किया और वर्ष भर उनकी सुरक्षा की। अपने इन कर्मों से वे देवत्व को ग्रहण कर सके।
For a year the Ribhus preserved the dead cow & invested it with flesh & other organs, continued its beauty they obtained by their acts of immortality.
The Ribhu Gan nursed-preserved the dead cow for a year and produced flesh and other organs in her. They attained divinity by virtue of this act.
ज्येष्ठ आह चमसा द्वा करेति कनीयान्त्रीन्कृणवामेत्याह।
कनिष्ठ आह चतुरस्करेति त्वष्ट ऋभवस्तत्पनयद्वचो वः
ज्येष्ठ ऋभु ने कहा, “एक चमस को दो करेंगे।" उसके अवरज विभु ने कहा, "तीन करेंगे।" उसके कनिष्ठ वाज ने कहा, “चार प्रकार से करेंगे"। हे ऋभुओं! आपके गुरु त्वष्टा ने इस चतुष्करण रूप आपके वचन को अङ्गीकार किया।[ऋग्वेद 4.33.5]
बड़े ऋभु ने एक चमस को दो करने की कामना प्रकट की। बीच के ऋभुगण ने तीन करने की और छोटे ऋभु ने चार करने को कहाँ। हे ऋभुगण ! तुम्हारे मरु त्वष्टा ने इस तुम्हारी "चार करने" वाली बात को स्वीकार कर लिया।
The eldest Ribhu said that they would convert one Chamas to two. The second-middle one said that they world make three Chamas out of one. The youngest said that they would convert it into four. Twasta as Guru accepted their plea.
सत्यमूचुर्नर एवा हि चक्रुरनु स्वधामृभवो जग्मुरेताम्।
विभ्राजमानांश्चमसाँ अहेवावेनत्त्वष्टा चतुरो ददृश्वान्
मनुष्य रूप ऋभुओं ने सत्य कहा; क्योंकि उन्होंने जैसा कहा, वैसा किया। इसके अनन्तर ऋभु गण तृतीय सवन गत स्वधा के भागी हुए। दिवस के तुल्य दीप्तिमान चार चमसों को देखकर त्वष्टा ने उसकी कामना की और उसे अङ्गीकार किया।[ऋग्वेद 4.33.6]
उस पुरुष रूपी वाले ऋभुओं ने जो कहा, वही किया। उनका कथन सत्य को प्राप्त हुआ। फिर वे ऋभुगण तीसरे सवन में स्वधा अधिकारी बने। दिन के समान ज्योतिवान चार चमसों को देखकर त्वष्टा ने कामना करते हुए प्राप्त किया।
Ribhu Gan in the form of humans, did what they said. Thereafter, they became entitled-eligible for the third  session-evening Swadha. Twasta accepted the four shinning Chamas.
द्वादश द्यून्यदगोह्यस्यातिथ्ये रणन्नृभवः ससन्तः।
सुक्षेत्राकृण्वन्ननयन्त सिन्धू न्ध न्वातिष्ठन्नोषधीर्निम्नमापः
अगोपनीय सूर्य के घर में जब ऋभु गण आर्द्रा से लेकर वृष्टि कारक बारह नक्षत्रों तक अतिथि रूप से सुख पूर्वक निवास करते हैं, तब वे वृष्टि द्वारा खेतों को शस्य सम्पन्न करते और नदियों को प्रेरित करते हैं। जल विहीन स्थान में औषधियाँ उत्पन्न होती हैं और नीचे की ओर जल जमा होता है।[ऋग्वेद 4.33.7]
प्रत्यक्ष प्रकाशवान सूर्य लोक में जब वे ऋभुगण आर्द्रा से वर्षा कारक बारह नक्षत्रों तक अतिथि रूप में रहते हैं। तब वे वर्ष द्वारा कृषि को धान्यपूर्ण करते और नदियों को बहने वाला बनाते हैं। जल रहित स्थान में दवाइयाँ पैदा होती और निचले स्थानों में जल भरा रहता है।
When Ribhu Gan reside in the house of Sun, starting from Adra- constellation & the rain causing 12 constellations comfortably, they make the earth green with vegetation and inspire the rivers. Medicines grow over those places where there in no water (stagnations) and water is stored in low lying regions.
रथं ये चक्रुः सुवृतं नरेष्ठां ये धेनुं विश्वजुवं विश्वरूपाम्।
त आ तक्षत्वृभवो रयिं नः स्ववसः स्वपसः सुहस्ताः
ऋभु गण, जिन्होंने सुचक्र और चक्र विशिष्ट रथ का निर्माण किया, जिन्होंने विश्व की प्रेरयित्री और बहुरूपा गायों को उत्पन्न किया, वे सुकर्मा, अन्न युक्त और सुहस्त ऋभु हम लोगों को धन प्रदान करें।[ऋग्वेद 4.33.8]
जिन्होंने सुन्दर पहियों वाले रथ का निर्माण किया था, जिन्होंने संसार को शिक्षित करने वाले तथा अनेक रूपिणी धेनु को प्रकट किया था, वे श्रेष्ठतम कर्म वाले सुन्दर अन्नवास और सिद्ध ऋभुगण हमारे धन का सम्पादन करें।
Let Ribhu Gan engaged in virtuous, pious endeavours, who created the charoite with beautiful wheels and cows, grant us wealth along with food grains.
अपो ह्येषामजुषन्त देवा अभि क्रत्वा मनसा दीध्यानाः।
वाजो देवानामभवत्सु कर्मेन्द्रस्य ऋभुक्षा वरुणस्य विभ्वा
इन्द्र देव आदि देवों ने वर प्रदान रूप कर्म द्वारा एवं प्रसन्न हृदय से देदीप्यमान होकर इन ऋभुओं के अश्व, रथ आदि निर्माण रूप कर्म को स्वीकार किया। शोभन कर्म करने वाले कनिष्ठ वाज सभी देवों के सम्बन्धी हुए, ज्येष्ठ ऋभु इन्द्र देव के सम्बन्धी हुए और मध्यम विभु वरुण देव के सम्बन्धी हुए।[ऋग्वेद 4.33.9]
इन्द्रादि देवगणों ने वर देने जैसे कर्म द्वारा तथा प्रसन्न चित्त हृदय से तेजस्वी होकर ऋभु गण के अश्व, रथ आदि के निर्माण कार्य को स्वीकार किया । श्रेष्ठ कर्म वाले छोटे-बड़े ऋभु इन्द्र से सम्बन्धित हुए।
Demigods-deities including Indr Dev, accomplishing desires, accepted the endeavours of Ribhu Gan like creation of charoite, horses etc. and became relatives. Young Vaj and other demigods-deities became relatives, the middle-second Vibhu became relative of Varun Dev.
ये हरी मेधयोक्था मदन्त इन्द्राय चक्रुः सुयुजा ये अश्वा।
ते रायस्पोषं द्रविणान्यस्मे धत्त ऋभवः क्षेमयन्तो न मित्रम्
हे ऋभुओं! जिन्होंने अश्व द्वय को प्रज्ञा तथा स्तुति द्वारा बलिष्ठ किया, जिन्होंने उस अश्व द्वय को इन्द्र के लिए सुयोजमान किया, वही ऋभुगण हम लोगों को मंगलकांक्षी मित्र के तुल्य धन, पुष्टि गौ आदि धन तथा सुख प्रदान करें।[ऋग्वेद 4.33.10]
जिन ऋभुओं ने दो अश्वों को वृद्धि और प्रशंसा के माध्यम से पुष्ट किया, वह ऋभु हमारे लिए मंगलकारी सखा के समान धन, गौ, जल इत्यादि और सभी सुख प्रदान करें।
The Ribhus who who created and grew the twin horses and made them strong for Indr Dev, should become our friend, grant us wealth, nourished cows and comforts-luxuries.
इदाह्नः पीतिमुत वो मदं धुर्न ऋते श्रान्तस्य सख्याय देवाः।
ते नूनमस्मे ऋभवो वसूनि तृतीये अस्मिन्त्सवने दधात
चमस आदि निर्माण के अनन्तर तृतीय सवन में देवों ने आप लोगों को सोमपान तथा तदुत्पन्न हर्ष प्रदान किया। तपो युक्त व्यक्ति को छोड़कर दूसरे के मित्र देव गण नहीं होते। हे ऋभुओं! इस तृतीय सवन में आप निश्चय ही हम लोगों को ऐश्वर्य प्रदान करें।[ऋग्वेद 4.33.10]
चमस आदि के बनने के बाद देवताओं ने तीसरे सवन में तुम्हारे लिए सोमपान से रचित हर्ष प्रदान किया था। देव गण तपस्वी के अतिरिक्त किसी अन्य के सखा नहीं बनते हैं। हे ऋभुओं! इस तीसरे सवन में तुम हमारे लिए अवश्य ही फल प्रदान करो।
The demigods-deities granted pleasure-enjoyment to Ribhu Gan, when they created Chamas in the third segment of the day-evening and offered them Somras. Hey Ribhu Gan! During this third segment of the day, you will definitely grant us grandeur.(29.03.2023)
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (34) :: ऋषि :- वामदेव गौतम, देवता :- ऋभुगण,  छन्द :- त्रिष्टुप्।
ऋभुर्विभ्वा वाज इन्द्रो नो अच्छेमं यज्ञं रत्नधेयोप यात।
इदा हि वो धिषणा देव्यह्नामधात्पीतिं सं मदा अग्मता वः
हे ऋभु! विभु, वाज और इन्द्र देव, रत्न प्रदान करने के लिए आप लोग हमारे इस यज्ञ में पधारें, क्योंकि अभी दिन में वाक्देवी आप लोगों को सोमाभिषव सम्बन्धी प्रीति प्रदान करती हैं। इसलिए सोम जनित हर्ष आप लोगों के साथ संगत हों।[ऋग्वेद 4.34.1]
संगत :: अनुकूल, मुताबिक़, अविस्र्द्ध, तर्कयुक्त, सिलसिलेवार, अविरोधी, प्रासंगिक, उचित, अनुरूप, योग्य, प्रस्तुत; accompaniment, compatible, consistent, relevant.
हे ऋभु, विभु, बाज और इन्द्र देव! धन-धौलत के लिए हमारे इस अनुष्ठान में विराजो। अभी दिन में वाणी रूप वंदना तुम्हारे लिए सोम सिद्ध करने सम्बन्धी स्नेह प्रदान करती हैं। सोम से रचित हुई तुम्हारे साथ सुसंगत हो।
Hey Ribhu, Vibhu, Vaj & Indr Dev! Join our Yagy to grant jewels, gems. Vak Devi is affectionate with you during the day & help you extract Somras. Let the pleasure-happiness, enjoyment by virtue of Somras be compatible with you.
विदानासो जन्मनो वाजरत्ना उत ऋतुभिर्ऋभवो मादयध्वम्।
सं वो मदा अग्मत सं पुरंधिः सुवीरामस्मे रयिमेरयध्वम्
हे अन्न द्वारा शोभमान ऋभु गण! पहले आप लोगों का जन्म मनुष्यों में हुआ, अब देवत्व प्राप्ति को जान करके आप लोग देवों के साथ हर्षित होवें। हर्ष कर सोम और प्रार्थना आप लोगों के लिए एकत्र हुए हैं। आप लोग हमारे लिए पुत्र-पौत्र के लिए विशिष्ट धन प्रेरित करें।[ऋग्वेद 4.34.2]
हे ऋभुओं। तुम अन्न के द्वारा सुशोभित हो। पूर्व में तुम पुरुष थे अब देवता बने हो। इस बात का ध्यान करते हुए देवताओं को समीप पुष्टि को पाओ। हर्षकारी सोम और स्तोत्र तुम्हारे लिए सुसंगत हुए हैं। तुम हमारे लिए पुत्र-पौत्रादि से युक्त धन प्रदान करो।
सुशोभित :: सजा हुआ, संवारा हुआ, अलंकृत, विभूषित, मंडित, सुंदर, सुखद, शोभायमान, सुश्री, रमणीय; graceful, adorned, inwrought. 
Hey Ribhu Gan! You should be adorned with food grains. Initially you got birth as humans and now you have attained divinity granting you pleasure. You have gathered for Somras and prayers. Grant riches for us & our sons, grandsons.
अयं वो यज्ञ ऋभवोऽकारि यमा मनुष्वत्प्रदिवो दधिध्वे।
प्र वोऽच्छा जुजुषाणासो अस्थुरभूत विश्वे अग्रियोत वाजाः
हे ऋभुओं! आप लोगों के लिए यह यज्ञ किया गया है। मनुष्य के तुल्य दीप्तिशाली होकर आप लोग इसे धारित करें। सेवमान सोम आप लोगों के निकट रहता है। हे वाजगण! आप लोग ही प्रथम उपास्य है।[ऋग्वेद 4.34.3]
हे ऋभुगण ! यह हवन तुम्हारे लिए किया गया है तुम इसे प्राणी के समान दीप्तिवान होकर करो। सेवा कारक सोम तुम्हारे निकट उपस्थित हैं। तुम हमारे मुख्य साध्य हो।
Hey Ribhu Gan! This Yagy has been organised for you. Become radiant-aurous and support it. Somras for drinking is available with you. Hey Vaj Gan! You deserve first worship.
अभूदु वो विद्यते रत्नधेयमिदा नरो दाशुषे मर्त्याय।
पिबत वाजा ऋभवो ददे वो महि तृतीयं सवनं मदाय
हे नेतृगण! आपके अनुग्रह से अभी इस तृतीय सवन में दान योग्य रत्न परिचर्याकारी, हव्य दाता याजक गण के लिए है। हे वाजगण! हे ऋभुगण! आप लोग पान करें। तृतीय सवन में हर्ष के लिए प्रभूत सोमरस हम आप लोगों के लिए प्रदत्त करते हैं।[ऋग्वेद 4.34.4]
हे अग्रगण्य ऋभुओं! हविदाता यजमान के लिए इस तीसरे सवन में तुम्हारे कृपा दृष्टि से दान योग्य रत्न ग्रहण हो। हम तुम्हारे लिए पुष्टिदायक सोम प्रदान करते हैं। तुम उसको ग्रहण करो।
Hey senior Ribhu Gan! During this third segment of the day-evening, jewels-gems are meant for the Ritviz to donate-charity. Hey Ribhu Gan! Hey Vaj Gan! Drink Somras offered by us for your pleasure-happiness.
आ वाजा यातोप न ऋभुक्षा महो नरो द्रविणसो गृणानाः।
आ वः पीतयोऽभिपित्वे अह्नामिमा अस्तं नवस्व इव ग्मन्
हे वाजो, हे ऋभुक्षाओ! आप लोग नेता है। महान धन की प्रार्थना करते हुए आप लोग हमारे निकट आगमन करें। दिवस की समाप्ति में अर्थात तृतीय सवन में जिस प्रकार से नव प्रसवा गौएँ घर की ओर जाती हैं, उसी प्रकार यह सोमरस का पान आप लोगों के निकट आगमन करता है।[ऋग्वेद 4.34.5]
ऋभुगण, श्रेष्ठ ऐश्वर्य की प्रशंसा करते हुए तुम हमारे समीप आओ। दिन की समाप्ति पर जैसे नवप्रसूता गायें अपने स्थान को वापस लौटती हैं, उसी प्रकार यह सोम रस तुम्हारे पीने के लिए तुम्हारी ओर आता है।
Hey Vaj! Hey Ribhu Gan! You are great. Come to us appreciating great wealth & grandeur. Come to the hosts-household like the cows laying the calf & who return home in the evening; for drinking Somras.
आ नपातः शवसो यातनोपेमं यज्ञं नमसा हूयमानाः।
सजोषसः सूरयो यस्य च स्थ मध्वः पात रत्नधा इन्द्रवन्तः
हे बलवानों! स्तोत्र द्वारा आहूत होकर आप लोग इस यज्ञ में आगमन करें। आप लोग इन्द्र देव के साथ प्रीत होते हैं और मेधावी हैं; क्योंकि आप लोग इन्द्र देव के सम्बन्धी हैं। आप लोग इन्द्र देव के साथ रत्न प्रदान करते हुए मधुर सोमरस का पान करें।[ऋग्वेद 4.34.6]
हे शक्ति से परिपूर्ण ऋभुओ। श्लोक द्वारा पुकारे जाने पर तुम इस अनुष्ठान पधारो। तुम इन्द्र देव के मित्र रूपी और मतिवान हो क्योंकि तुम इन्द्र देव के सम्बन्धी तुम मधुर सोमपान को इन्द्र देव के संग पान करते हुए रत्नादि धन प्रदान करो।
Hey mighty Ribhu Gan! On being invoked by the recitation of Strotr, join this Yagy. You are Indr Dev's affectionate, relatives & intelligent. Provide us jewels-gems & enjoy Somras.
सजोषा इन्द्र वरुणेन सोमं सजोषाः पाहि गिर्वणो मरुद्भिः।
अग्रेपाभिर्ऋतुपाभिः सजोषा ग्नास्पत्नीभी रत्नधाभिः सजोषाः
हे इन्द्र देव! आप रात्रयभिमानी वरुण देव के साथ समान प्रीति युक्त होकर सोमरस का पान करें। हे स्तुति योग्य इन्द्र देव! आप मरुतों के साथ संगत होकर सोमपान करें। प्रथम पानकारी ऋतुओं के साथ देव-पत्नियों के साथ और रत्न देने वाले ऋभुओं के साथ सोम रस का पान करें।[ऋग्वेद 4.34.7]
हे इन्द्र देव! वरुण सहित सम्यक दीप्तिवान होकर सोम पियो। पहले पीने वाले ऋभुओं, देवांगनाओं तथा रत्नादात्री सामर्थ्यो सहित सोमपान करो।
Hey worship deserving Indr Dev! Enjoy Somras with Varun Dev, Marud Gan, goddesses, wives of the demigods-deities & Ribhu Gan who provide us jewels-gems.
सजोषस आदित्यैर्मादयध्वं सजोषस ऋभवः पर्वतेभिः।
सजोषसो दैव्येना सवित्रा सजोषसः सिन्धुभी रत्नधेभिः
हे ऋभुओं! आदित्यों के साथ संगत होकर आप हर्षित होवें, पर्व में अर्चमान देव विशेष के साथ संगत होकर आप हर्षित होवें, देवों के हितकर सविता देव के साथ संगत होकर हर्षित होवें और रत्नदाता नद्यभिमानी देवों के साथ संगत होकर हर्षित होवें।[ऋग्वेद 4.34.8]
हे ऋभुओं! आदित्यों सहित मिलकर आनन्द को प्राप्त हो जाओ। उपासनीय देवताओं को ग्रहण करो। पर्वत के तुल्य अचल एवं रत्नदाता देवों के संग मिलकर हृष्ट-पुष्ट हो जाओ।
Hey Ribhu Gan! You should be happy in the company of Adity Gan, specific demigods-deities of the festivals, Savita Dev & the deities as great as the mountains who grant gems-jewels.
ये अश्विना ये पितरा य ऊती धेनुं ततक्षुर्ऋभवो ये अश्वा।
ये अंसत्रा य ऋधग्रोदसी ये विभ्वो नरः स्वपतानि चक्रुः
जिन ऋभुओं ने अपने रक्षण साधनों से अश्विनी कुमारों को सक्षम बनाया, जिन्होंने जीर्ण माता-पिता को युवा किया, जिन्होंने धेनु और अश्व का निर्माण किया, जिन्होंने देवों के लिए अंसत्रा कवच निर्माण किया, जिन्होंने द्यावा-पृथ्वी को पृथक किया, जो व्याप्त एवं नेता हैं और जिन्होंने सुन्दर अपत्य प्राप्ति साधन कार्य रूप किया, वे सर्व प्रथम सोमपान करने वाले हैं।[ऋग्वेद 4.34.9]
जिन्होंने अश्विनी कुमारों को बनाने आदि कर्मों से अपने प्रति स्नेहवान बनाया, जिन्होंने जीर्ण माता-पिता को तारुण्य किया, जिन्होंने गौ और घोड़े को निर्मित किया, जिन्होंने देवों के लिए उसका कवच बनाया। जिन्होंने आकाश और धरती को अलग किया, जिन्होंने सुन्दर से तान उत्पन्न करने वाला कार्य किया और जो सबके नेता रूप हैं, वे ऋभु मध्यम पान करने वाले हैं।
The Ribhu Gan, who made Ashwani Kumars capable, made their parents young, created cows & horses, produced shields for the demigods-deities, separated the sky & earth, who pervades each & every place & works as means for the off springs; are going to drink Somras first of all. 
ये गोमन्तं वाजवन्तं सुवीरं रयिं धत्थ वसुमन्तं पुरुक्षुम्।
ते अग्रेपा ऋभवो मन्दसाना अस्मे धत्त ये च रातिं गृणन्ति
हे ऋभुओं! जो गोविशिष्ट, अन्नविशिष्ट, पुत्र-पौत्रादि विशिष्ट, निवास योग्य घर आदि धनों से युक्त तथा बहुत अन्न वाले धन को धारित करते हैं एवं जो धन की प्रशंसा करते हैं, वे प्रथम सोमपानकारी ऋभुगण हर्षित होकर हम लोगों को धन प्रदान करें।[ऋग्वेद 4.34.10]
गौ, अन्न, संतान तथा निवास योग्य ही वह व्यक्ति है जो अनेक अन्न वाले, धनों के पालक हैं, जो धनों की प्रशंसा करने वाले हैं। वे ऋभुगण प्रथम सोमपान के द्वारा हृष्ट-पुष्ट होकर हमें धन ऐश्वर्य प्रदान करें।
Let Ribhu Gan drink Somras first of all, become healthy, happy with us and provide us riches. They possess cows, food grains, sons-grandsons, residence, various kinds of riches.
नापाभूत न वोऽतीतृषामानिःशस्ता ऋभवो यज्ञे अस्मिन्।
समिन्द्रेण मदथ सं मरुद्भिः सं राजभी रत्नधेयाय देवाः
हे ऋभुओं! आप लोग चले न जाना। हम आप लोगों को अत्यन्त तृषित नहीं करेंगे। हे देवो! आप लोग अनिन्दित होकर रमणीय धन प्रदान करने के लिए इस यज्ञ में इन्द्र देव के साथ हर्षित हों, मरुतों के साथ हर्षित होवें और अन्यान्य दीप्तिमान देवों के साथ हर्षित हों।[ऋग्वेद 4.34.11]
हे ऋभु गण! हमसे दूरस्थ मत जाना। तुम हमें अधिक समय वृषित न रहने देना। तुम सुन्दर धन देने के लिए इन्द्रदेव के साथ इस अनुष्ठान में हर्ष को ग्रहण होओ। मरुद्गण तथा अन्य तेजस्वी देवों के साथ पुष्टतम हो जाओ।
Hey Ribhu Gan! Do not desert us. We will not trouble-bother you. Hey demigods! You should be happy-pleased with us along with Indr Dev, several demigods-deities and grant riches-wealth for the Yagy.(31.03.2023)
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (35) :: ऋषि :- वामदेव गौतम, देवता :- ऋभुगण,  छन्द :- त्रिष्टुप्।
इहोप यात शवसो नपातः सौधन्वना ऋभवो माप भूत।
अस्मिन्हि वः सवने रत्नधेयं गमन्त्विन्द्रमनु वो मदासः
हे बल के पुत्र, सुधन्वा के पुत्र ऋभुओं! आप सब इस तृतीय सवन में पधारें, अपगत न होवें। इस सवन में मदकर सोम रत्नदाता इन्द्र देव के अनन्तर आप लोगों के निकट गमन करें।[ऋग्वेद 4.35.1]
हे सुधन्वा के बलशाली पुत्रों! इस तृतीय सवन में यहाँ पधारो, कहीं अन्य विचरण मत करो। दृष्टि कारक सोम इस सवन में, रत्न दान करने वाले इन्द्र देव के पश्चात तुम्हारे सम्मुख आयें।
Hey Ribhu Gan, son of Sudhanva & grand son of Bal! Come here in the third segment of the day-evening. Do not move else where. Let Som come to you after the donor of jewels-gems Indr Dev.
आगन्नृभूणामिह रत्नधेयमभूत्सोमस्य सुषुतस्य पीतिः।
सुकृत्यया यत्स्वपस्यया चँ एकं विचक्र चमसं चतुर्धा
ऋभुओं का रत्न दान इस तृतीय सवन में मेरे निकट आवें; क्योंकि आप लोगों ने शोभन हस्त व्यापार द्वारा और कर्म की इच्छा द्वारा एक चमस को चार प्रकार से विनिर्मित किया है एवं अभिषुत सोमरस का पान किया।[ऋग्वेद 4.35.2]
ऋभुओं के द्वारा दिये जाने वाले रत्नों का दान इन तीसरे सवन में मेरे नजदीक पधारें। हे ऋभुगण! तुमने अपने हाथ की कला के माध्यम से एक चमस के चार बना दिये थे और सुसिद्ध सोम को पिया था।
Let the impact of donation of jewels-gems by Ribhu Gan, show its impact in the evening, since they created 4 Chamas out of one by virtue of your skills and drank Somras.
व्यकृणोत चमसं चतुर्धा सखे वि शिक्षेत्यब्रवीत।
अथैत वाजा अमृतस्य पन्थां गणं देवानामृभवः सुहस्ताः
हे ऋभुओं! आप लोगों ने चमस को चार प्रकार का बनाया एवं कहा कि, "हे मित्र अग्नि देव! अनुग्रह करें"। अग्नि देव ने आप लोगों से कहा, "हे वाजगण! हे ऋभुगण! आप लोग कुशल हस्त है। आप लोग अमरत्व पथ में अर्थात स्वर्ग मार्ग में गमन करें।”[ऋग्वेद 4.35.3]
हे ऋभुगण! तुमने एक चमस के चार करते हुए कहा था, हे मित्र रूप अग्ने! दया करो। तब अग्नि ने उत्तर दिया था, हे ऋभुओं! तुम हस्त कारोबार में मेधावी हो। तुम अमरत्व प्राप्ति के मार्ग पर जाओ।
Hey Ribhu Gan! You created 4 Chamas out of one and requested friendly Agni Dev to oblige you. Agni Dev told you, "Hey Vaj Gan! Hey Ribhu Gan"! You are skilled. You should attain immortality.
किंमयः स्विच्चमस एष आस यं काव्येन चतुरो विचक्र।
अथा सुनुध्वं सवनं मदाय पात ऋभवो मधुनः सोम्यस्य
जिस चमस को कौशलपूर्वक चार प्रकार का बनाया, वह चमस किस प्रकार का था? हे ऋत्विकों! आप लोग हर्ष के लिए सोमाभिषव करें। हे ऋभुओं! आप लोग मधुर सोमरस का पान करें।[ऋग्वेद 4.35.4]
जिस चमस की चालाकी पूर्वक चार बनाये गये थे, वह चमस कैसा था? हे ऋत्विजों! आनन्द के लिए सोम को सिद्ध करो! हे ऋभुओं! तुम मधुर सोम का पान करो।
What was the shape, size of the Chamas that was converted by you into four, skilfully?! Hey Ritviz! Drink Somras happily. Hey Ribhu Gan! Drink the sweet-tasty Somras.
शच्याकर्त पितरा युवाना शच्याकर्त चमसं देवपानम्।
शच्या हरी धनुतरावतष्टेन्द्रवाहावृभवो वाजरत्नाः
हे रमणीय सोम वाले ऋभुओं! आप लोगों ने कर्म द्वारा माता-पिता को युवा बनाया, कर्म द्वारा चमस को देवपान के योग्य चतुर्था किया और कर्म द्वारा शीघ्र गामी इन्द्र देव को वहन करने वाले अश्व द्वय को सम्पादित किया।[ऋग्वेद 4.35.5]
हे उत्तम सोम युक्त ऋभुगण! तुमने कला द्वारा अपने माता पिता को तारुण्य दिया। एक चमस के चार बनाये और इन्द्र के शीघ्र चलने वाले दोनों अश्वों को प्रकट किया।
Hey possessor of descent Somras Ribhu Gan! You made your parents young by using your skills, expertise & knowledge. You converted one Chamas into four by virtue of expertise. You evolved the fast moving horse duo for Indr Dev. 
यो वः सुनोत्यभिपित्वे अह्नां तीव्रं वाजासः सवनं मदाय।
तस्मै रयिमृभवः सर्ववीरमा तक्षत वृषणो मन्दसानाः
हे ऋभुओं! आप लोग अन्नवान है। जो याजक गण आप लोगों के उद्देश्य से हर्ष के लिए दिवावसान में तीव्र सोमरस का अभिषव करता है, हे फलवर्षी ऋभुओं! आप लोग हर्षित होकर उन याजकों को हर प्रकार से पराक्रमी, उत्तम संतानों से युक्त ऐश्वर्य प्रदान करते हैं।[ऋग्वेद 4.35.6]
ऋभुगण! तुम अन्न के स्वामी हो। जो यजमान तुम्हारे आनन्द के लिए दिवस के अन्तिम दिन के अंतिम पहर को छानता है, उस यजमान के लिए तुम उत्तम अभीष्ट वर्षी होते हुए अनेक संतान परिपूर्ण धन के देने वाले बनों।
Hey Ribhu Gan! You possess food grains. You extract Somras for the public at the end of the day. Hey accomplishments granting-fulfilling Ribhu Gan! Become happy-pleased and grant versatile progeny & grandeur to the Ritviz.
प्रातः सुतमपिबो हर्यश्व माध्यंदिनं सवनं केवलं ते।
समृभुभिः पिबस्व रत्नधेभिः सखीयों इन्द्र चकृषे सुकृत्या
हे हरि विशिष्ट इन्द्र देव! आप प्रातः सवन में अभिषुत सोमरस का पान करें। माध्यन्दिन सवन केवल आपका ही है। हे इन्द्र देव! आपने शोभन कर्म द्वारा जिसके साथ मित्रता की है, उस रत्नदाता ऋभुओं के साथ आप तृतीय सवन में उनके साथ पान करें।[ऋग्वेद 4.35.7]
हे अश्ववान इंद्र! तुम सुसिद्ध सोम को प्राप्त सवन में पान करो। दिन के मध्यकाल वाला सवन केवल तुम्हारे लिए ही है। हे इन्द्र! अपने श्रेष्ठ कार्य द्वारा तुमने जिनके साथ मित्रता स्थापित की, उन रत्न दान करने वाले ऋभुगण के साथ तीसरे सवन में सोम पान करो।
Hey master of the horses named Hari, Indr Dev! Drink Somras during the first, second & third segment of the day. Drink Somras in the third segment of the day with Ribhu Gan, with whom you became friendly by virtue of your virtuous deeds; who grant jewels-gems. 
ये देवासो अभवता सुकृत्या श्येना इवेदधि दिवि निषेद।
ते रत्नं धात शवसो नपातः सौधन्वना अभवतामृतासः
हे ऋभुओं! आप लोग सुकर्म द्वारा देवता बने। हे बल के पुत्रो! आप लोग श्येन (गृद्ध-विशेष) के तुल्य द्युलोक में प्रतिष्ठित होवें, आप लोग धनदान प्रदान करें। हे सुधन्वा के पुत्रो! आप लोग अमर हुए।[ऋग्वेद 4.35.8]
हे ऋभु गण! तुमने अपने उत्तम कार्यों से देवत्व प्राप्त किया। तुम श्येन के समान क्षितिज में ग्रहण होओ। हे सुधन्वा पुत्रों! तुम अमरत्व ग्रहण कर चुके हो, हमकों धन प्रदान करो।
Hey son of Sudhanva, Ribhu Gan! You have attained divinity by virtue of your auspicious-virtuous deeds. You should be honoured in the heavens like the Shyen-bird & grant us riches. You have attained immortality.
यत्तृतीयं सवनं रत्नधेयमकृणुध्वं स्वपस्या सुहस्ताः।
तदुद्भवः परिषिक्तं व एतत्सं मदेभिरिन्द्रियेभिः पिबध्वम्
हे सुहस्त ऋभुओं! आप लोग रमणीय सोमदान युक्त तृतीय सवन को शोभन कर्म की इच्छा से प्रयुक्त और प्रसाधित करते हैं, इसलिए आप लोग हर्षित इन्द्रियों के साथ अभिषुत सोमरस का पान करो।[ऋग्वेद 4.35.9]
हे ऋभुओं! तुम महान हस्त कला से सम्पूर्ण हो। तुम सुन्दर सोम से सम्पूर्ण तीसरे सवन को महान कार्यों की कामना से सुसिद्ध करते हो। अतः तुम हर्षित हृदय से सोम का पान करो।
Hey great experts in handicrafts, Ribhu Gan! Enjoy Somras in the third segment of the day with pleasure.(04.04.2023)
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (36) :: ऋषि :- वामदेव गौतम, देवता :- ऋभुगण,  छन्द :- त्रिष्टुप् ,जगती।
अनश्वो जातो अनभीशुरुक्थ्यो 3 रथस्त्रिचक्रः परि वर्तते रजः।
महत्तद्वो देव्यस्य प्रवाचनं द्यामृभवः पृथिवीं यच पुष्यथ
हे ऋभुओं! आप लोगों का कर्म स्तुति योग्य है। आप लोगों द्वारा प्रदत्त अश्विनी कुमार का त्रिचक्र रथ अश्व के बिना और प्रग्रह के बिना अन्तरिक्ष में परिभ्रमण करता है। जिसके द्वारा आप लोग द्यावा-पृथ्वी का पोषण करते हैं, वह रथ निर्माण रूप महान् कर्म आप लोगों के देवत्व को प्रख्यात करता है।[ऋग्वेद 4.36.1]
हे ऋभुओं! तुम्हारे द्वारा किये जाने वाले कर्म प्रशंसा के योग्य हैं। तुम्हारे द्वारा दिया अश्विनीकुमारों का तीन पहिये वाला रथ अश्व के बिना ही अंतरिक्ष में भ्रमण करता है। जिसके द्वारा तुम आकाश और पृथ्वी का पोषण करते हो। रथ बनाने वाला श्रेष्ठ कार्य तुम्हारे देवत्व का साक्ष्य रूप है।
Hey Ribhu Gan! Your endeavours deserve appreciation. The three wheeled charoite created by you for Ashwani Kumars, roams-travels in the space-heavens, has no horses; with the help which you nourish the earth & heavens. Your great endeavour is a proof of divinity-divine hood.
रथं ये चक्रुः सुवृतं सुचेतसोऽविह्वरन्तं मनसस्परि ध्यया।
ताँ ऊ न्व 1 स्य सवनस्य पीतय आ वो वाजा ऋभवो वेदयामसि
हे सुन्दरान्तःकरण ऋभुओं! आप लोगों ने मानसिक ध्यान द्वारा सुवर्तन चक्र वाला अकुटिल रथ बनाया। हे वाजगण और हे ऋभुगण! हम सोमपान के लिए आप लोगों को आमंत्रित करते हैं।[ऋग्वेद 4.36.2]
हे उत्तम हृदय वाले ऋभुगण! तुमने अपने आंतरिक ध्यान से सुन्दर चाल वाला पहिये से युक्त रथ बनाया था। हम तपस्वीगण तुम्हें सोमपान हेतु बुलाते हैं।
Hey Ribhu Gan with excellent innerself! You created the charoite with excellent navigation system, through your mental power. Hey Vaj & Ribhu Gan! We invite for drinking Somras.
तद्वो वाजा ऋभवः सुप्रवाचनं देवेषु विभ्वो अभवन्महित्वनम्।
जिव्री यत्सन्ता पितरा सनाजुरा पुनर्युवाना चरथाय तक्षथ
हे वाजगण, हे ऋभुगण और हे विभुगण! आप लोगों ने अपने जो वृद्ध और जीर्ण माता-पिता को नित्य तरुण और सर्वदा चलने फिरने योग्य बना दिया, आप लोगों का वही माहात्म्य देवों के बीच में प्रख्यात है।[ऋग्वेद 4.36.3]
हे ऋभुओं! तुम तीनों ने अपने वृद्ध माता-पिता को तरुण अवस्था देकर चलने के योग्य बनाया था। तुम्हारा वह महान कार्य देवताओं में विख्यात है।
Hey Vaj, Ribhu & Vibhu Gan! Your great endeavour by virtue of which you granted youth to your parents is famous between the demigods-deities.
एकं वि चक्र चमसं चतुर्वयं निश्चर्मणो गामरिणीत धीतिभिः।
अथा देवेष्वमृतत्वमानश श्रुष्टी वाजा ऋभवस्तद्व उक्थ्यम्
हे ऋभुओं! आप लोगों ने एक चमस को चार भागों में विभाजित किया, कर्म द्वारा गौ को चर्म से परिवृत किया; इसलिए आप लोगों ने देवों के मध्य अमरत्व पाया। हे वाजगण, ऋभुगण! आप लोगों का यह कर्म प्रशंसा के योग्य है।[ऋग्वेद 4.36.4]
हे ऋभुओं! तुमने एक चमस के चार भाग किये। अपने उत्तम कार्य से धेनु को चमड़े से ढका। इसलिए तुमने देवों का अविनाशी पद ग्रहण किया। तुम्हारे सभी कर्म वंदना के योग्य हैं।
Hey Ribhu Gan! You made four Chamas out of one and covered the body of cow with leather leading to attainment of divinity. Hey Vaj Gan, Hey Ribhu Gan! This practice-endeavour of yours deserve appreciation.
ऋभुतो रयिः प्रथमश्रवस्तमो वाजश्रुतासो यमजीजनन्नरः।
विभ्वतष्टो विदथेषु प्रवाच्यो यं देवासोऽवथा स विचर्षणिः
वाजों के साथ विख्यात नेता ऋभुओं ने जिस धन को उत्पन्न किया, प्रधान और प्रभूत वह अन्न विशिष्ट धन ऋभुओं के निकट से हमारे निकट आवे। यज्ञ में ऋभुओं द्वारा सम्पन्न रथ विशेष रूप से प्रशंसा के योग्य है। हे दीप्ति विशिष्ट ऋभुओं! आप लोग जिसकी रक्षा करते हैं, वह दर्शन योग्य होता है।[ऋग्वेद 4.36.5]
ऋभुगण ने जिस धन को प्रकट किया था, वह अन्न युक्त मुख्य धन ऋभुओं के निकट आएँ। यज्ञ स्थान के ऋभुगण द्वारा निर्मित रथ प्रशंसनीय है। हे दीप्तिमान ऋभुओं! तुम जिसकी रक्षा करते हो। वह साधक देखने योग्य होता है।
Let the wealth & food grains created by the Ribhu Gan-leader of the Vaj Gan, be available to us. The charoite generated by the Ribhu Gan in the Yagy deserve special mention-appreciation. Hey radiant Ribhu Gan! A person protected by you is worth invoking-seeing.
स वाज्यर्वा स ऋषिर्वचस्यया स शूरो अस्ता पृतनासु दुष्टरः।
स रायस्पोषं स सुवीर्यं दधे वाजो विभ्वाँ ऋभवो यमाविषुः
वाजि, विभु और ऋभु जिस पुरुष की रक्षा करते हैं, वह बलवान् होकर रण कुशल होता है, वह ऋषि होकर प्रशंसनीय होता है, वह शूर होकर शत्रुओं का विनाशक होता है, वह युद्ध में उद्धर्ष होता है और वह मनुष्य धन, पुष्टि तथा पराक्रम को धारित करता है।[ऋग्वेद 4.36.6]
जिस व्यक्ति की ऋभुगण सुरक्षा करते हैं, वह मनुष्य पराक्रमी एवं संग्राम कौशल में चालाक होता है। वह मुनि बनकर वंदनाओं से सम्पन्न होता है। वह पराक्रमी शत्रुओं को पराजित करके युद्ध में उच्च स्थान प्राप्त करता है तथा धनवान संतान से परिपूर्ण और शक्तिशाली होता है।
The person protected by Vaj, Vibhu & Ribhu Gan become mighty, an expert warrior, appreciated as a sage and possess valour to destroy the enemy. He attains a high rank-position in the war and get riches-wealth, nourishment, galore, might & power.
श्रेष्ठं वः पेशो अधि धायि दर्शतं स्तोमो वाजा ऋभवस्तं जुजुष्टन।
धीरासो हि ष्ठा कवयो विपश्चितस्तान्व एना ब्रह्मणा वेदयामसि
हे वाजगण, हे ऋभुगण! आप लोग अत्युत्कृष्ट और दर्शनीय रूप धारित करते हैं। हम लोगों ने आपके लिए यह उचित स्तोत्र रचा है। आप लोग इसका सेवन करें। आप लोग धैर्यवान्, कवि और ज्ञानवान हैं। स्तोत्र द्वारा हम आप लोगों को आहूत करते हैं।[ऋग्वेद 4.36.7]
हे ऋभुओं! तुम अत्यन्त उत्कृष्ट और दर्शन के योग्य स्वरूप वाले हो। हमने यह सुन्दर स्तोत्र तुम्हारे लिए ही बनाया है। तुम इसे सुनो। तुम मेधावी, ज्ञानी और कवि हो । श्लोकों द्वारा हम तुम्हारी वंदना करते हैं।
Hey Vaj, Ribhu Gan! You are excellent and possess beautiful looks. We have composed this Strotr in your honour. Please listen-hear it. You are poetic, have patience and are learned-enlightened. We worship-pray you with the help of these Strotr-hymns.
यूयमस्मभ्यं धिषणाभ्यस्परि विद्वांसो विश्वा नर्याणि भोजना।
द्युमन्तं वाजं वृषशुष्ममुत्तममा नो रयिमृभवस्तक्षता वयः
हे ऋभुओं! हमारी प्रार्थना के लिए मनुष्यों की हितकारिणी समस्त भोग्य वस्तुओं को जानकर आप उनकी प्राप्ति करें एवं हमारे लिए दीप्तिमान, बल कारक और बलवान शत्रुओं के शोषक धन और अन्न का सम्पादन करें।[ऋग्वेद 4.36.8]
हे ऋभुओं! हमारी वंदना के लिए व्यक्तियों का हित करने वाली समस्त भक्षण योग्य सामग्री को तुम प्राप्त करो और हमारे लिए अत्यन्त तेजस्वी तथा शक्ति रचित करने वाला, शत्रुओं का पोषण करने वाला अन्न धन ग्रहण कराओ।
Hey Ribhu Gan! Avail the useful commodities for our consumption and grant us nourishing food grains of the powerful enemy.
इह प्रजामिह रयिं रराणा इह श्रवो वीरवत्तक्षता नः।
येन वयं चितयेमात्यन्यान्तं वाजं चित्रमृभवो ददा नः
हे ऋभुओं! आप लोग हमारे इस यज्ञ में हर्षित होकर पुत्र-पौत्रादि का सम्पादन करें, इस यज्ञ में धन-सम्पादन करें और इस यज्ञ में भृत्यादि युक्त यश सम्पादन करें। हम लोग जिस अन्न के द्वारा दूसरों का अतिक्रमण कर सकें, उस तरह का रमणीय श्रेष्ठ अन्न हम लोगों को प्रदान करें।[ऋग्वेद 4.36.9]
हे ऋभुगण! तुम हमारे ऐश्वर्य में प्रीतिमान होकर पुत्र-पौत्रादि तथा धन, भृत्यादि से युक्त यश प्राप्त कराओ। हम जिस धन से दूसरों पर जीत हासिल कर सकें वह सुंदर धन हमको दो।
Hey Ribhu Gan! Be pleased with us and award us sons & grandsons. Give us money and servants for the Yagy. Give us the food grains and riches with which we can over power others (enemies).(07.04.2023)
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (37) :: ऋषि :- वामदेव गौतम, देवता :- ऋभुगण,  छन्द :- त्रिष्टुप्, अनुष्टुप्।
उप नो वाजा अध्वरमृभुक्षा देवा यात पथिभिर्देवयानैः।
यथा यज्ञं मनुषो विश्वा ३ सुदधिध्वे रण्वाः सुदिनेष्वह्नाम्
हे रमणीय ऋभुओं! आप लोग जिस प्रकार से दिवसों को सुदिन करने के लिए मनुष्यों के यज्ञ को धारित करते हैं, हे वाजगण, हे ऋभुगण! उसी प्रकार से आप लोग देवमार्ग द्वारा हमारे यज्ञ में पधारें।[ऋग्वेद 4.37.1]
रमणीय :: मनोरम, सुहावना, ललित, आनंदकर, आनंदमय, हर्षजनक, आनंदपूर्ण, आनंदित, आनंद देनेवाला; delightful, delectable.
हे ऋभु गण! तुम जैसे दिनों को उत्तम दिन बनाने के लिए मनुष्यों के अनुष्ठान का पोषण करते हो, वैसे ही तुम देवों के श्रेष्ठतम मार्ग हमारे अनुष्ठान में पधारो।
Hey delightful Vaj Gan, Ribhu Gan! The manner in which you support the Yagy of the humans for their welfare-benefits, come to our Yagy through the divine path.
ते वो हृदे मनसे सन्तु यज्ञा जुष्टासो अद्य घृतनिर्णिजो गुः।
प्र वः सुतासो हरयन्त पूर्णाः क्रत्वे दक्षाय हर्षयन्त पीताः
आज यह समस्त यज्ञ आपके हृदय और मन में प्रीति दायक हो, घृत मिश्रित पर्याप्त सोमरस आपके हृदय में गमन करे। चमस पूर्ण अभिषुत सोमरस आपकी कामना करता है। वह प्रीत होकर आपको सुकर्म के लिए स्फूर्ति प्रदान करे।[ऋग्वेद 4.37.2]
आज समस्त अनुष्ठान तुम्हारे अन्तःकरण को स्नेह प्रदान करो। घृत मिश्रित सोमरस पर्याप्त मात्रा में तुम्हारे हृदय में प्रविष्ट करे। चमस में रखा हुआ सोम तुम्हारी कामना करता है।
Let this Yagy grant solace, delight to your innerself. Enjoy Somras mixed with Ghee. Chamas full of Somras awaits you. Let it grant energy-pleasure.
त्र्युदायं देवहितं यथा वः स्तोमो वाजा ऋभुक्षणो ददे वः।
जुह्वे मनुष्वदुपरासु विक्षु युष्मे सचा बृहद्दिवेषु सोमम्
हे वाजिगण, हे ऋभुगण! जो लोग सवन त्रयोपेत देवों के हितकर सोमरस को आप लोगों के उद्देश्य से धारित करते हैं, उन समवेत प्रजाओं के बीच में हम मनु के तुल्य प्रभूत दीप्ति युक्त होकर आपके उद्देश्य से सोमरस प्रदान करते हैं।[ऋग्वेद 4.37.3]
वह स्नेहमय होकर तुम्हें श्रेष्ठ कर्मों की प्रेरणा प्रदान करें। हे ऋभुओं! जो व्यक्ति तीनों सयनों में तुम्हारे लिए देवताओं का हित करने वाले सोम को धारण करते हैं, उनमें हम अत्यन्त मनस्वी होकर तुम्हारे लिए सोमरस प्रदान करते हैं।
Hey Vaj Gan, Ribhu Gan! The affectionate who serve you Somras, during the three segments of the day for the welfare-benefit of the demigods, should become aurous-radiant like Manu. 
पीवोअश्वाः शुचद्रथा हि भूताय: शिप्रा वाजिनः सुनिष्काः।
इन्द्रस्य सूनो शवसो नपातोऽनु वश्चेत्यग्रियं मदाय
हे ऋभुओं! आपके अश्व मोटे हैं, आपके रथ दीप्तिशाली हैं, आपका हनुद्वय लोहे के सदृश सारवान है। आप अन्नवान और शोभन निष्क (दान) वाले है। हे इन्द्र के पुत्रों और बल के पुत्रों! आप लोगों के हर्ष के लिए यह प्रथम सवन अनुष्ठित हुआ है।[ऋग्वेद 4.37.4]
हृष्ट पुष्ट :: दृढ़, हट्टा-कट्टा, बलवान; robust, athletic, hefty.
हे ऋभुओं! तुम्हारे अश्व हृष्ट-पुष्ट हैं, तुम्हारा रथ देदीप्यमान है। तुम्हारी चिन लोहे के समान दृढ़ हैं। तुम अन्नों के स्वामी तथा श्रेष्ठ दान करने वाले हो। हे शक्तिवानों! तुम्हारी पुष्टि के लिए हम इस पहले सवन में यज्ञ करते हैं।
Hey Vajin, you are borne by stout horses mounted on a brilliant car, have jaws of metal and are possessed of treasures; sons of Indr Dev, grandsons of strength, this last sacrifice is for your exhilaration.
Hey Ribhu Gan! Your horses are healthy-robust, hefty and the charoite is shinning. Your jaws are strong like iron. You possess food grains and donate it. You are the sons & grandsons of Indr Dev and Bal. First segment of the day has been met-accomplished with worship-pryers for your pleasure.
ऋभुमृभुक्षणो रयिं वाजे वाजिन्तमं युजम्।
इन्द्रस्वन्तं हवामहे सदासात ममश्विनम्
हे ऋभुओं! हम अत्यन्त वृद्धिशील धन का आह्वान करते हैं, संग्राम में अत्यन्त बलवान रक्षक का आह्वान करते हैं और सर्वदा दानशील, अश्ववान तथा इन्द्रवान या इन्द्रियवान आपके गण का आह्वान करते हैं।[ऋग्वेद 4.37.5]
हे ऋभुओं! हम श्रेष्ठ बढ़े हुए धन की विनती करते हैं। युद्ध काल उपस्थित होने पर अत्यन्त बलशाली रक्षक को आमंत्रित करते हैं तथा सदैव दानशील अश्वों के दाता तुम्हारे गणों को हम आमंत्रित करते हैं।
Hey Ribhu Gan! We pray-request you the growing wealth. We request for the highly potential protectors in the war. We invite your mighty warriors, who grant us horses and donate money.
सेदृभवो यमवथ यूयमिन्द्रश्च मर्त्यम्।
स धीभिरस्तु सनिता मेधसाता सो अर्वता
हे ऋभुओं! आप और इन्द्र जिस मनुष्य की रक्षा करते हैं, वह श्रेष्ठ होता है। वह मनुष्य अपने कर्मों द्वारा धन का भागीदार और यज्ञों में अश्वों से युक्त होता है।[ऋग्वेद 4.37.6]
हे ऋभुओं! तुम और इन्द्र जिसकी रक्षा करते हो, वह प्राणी सबमें उत्तम होता है। वह अपने कार्य द्वारा धन भाग प्राप्त करें तथा यज्ञ में अश्वों से युक्त हो।
Hey Ribhu Gan! One protected by you and Indr Dev is excellent. He enjoy wealth by virtue of his endeavours and possess horses in the Yagy.
वि नो वाजा ऋभुक्षणः पथश्चितन यष्टवे।
अस्मभ्यं सूरयः स्तुता विश्वा आशास्तरीषणि
हे वाजिगण, हे ऋभुगण! हम लोगों को यज्ञ मार्ग प्रज्ञापित करें। हे ज्ञानियों! आप लोग प्रशंसित होकर समस्त दिशाओं में सफलतापूर्वक आगे बढ़ने के लिए हमें रास्ता दिखावें।[ऋग्वेद 4.37.7]
हे ऋभुओं! हमको अनुष्ठान में मार्ग गामी बनाओ। तुम कुशल हो। तुम हमारे लिए समस्त दिशाओं में सफल होने की शक्ति बाँटने वाले बनो।
Hey Vaji Gan & Ribhu Gan! Guide us in our Yagy. Hey enlightened! Show-guide us in achieving success in all direction (all round success)
तं नो वाजा ऋभुक्षण इन्द्र नासत्या रयिम्।
समश्वं चर्षणिभ्य आ पुरु शस्त मघत्तये
हे वाजगण, हे ऋभुगण, हे इन्द्रदेव, हे अश्विनीकुमारों! आप सब हम प्रार्थना करने वालों को प्रचुर ऐश्वर्य और शक्ति प्राप्ति के लिए आशीर्वाद प्रदत्त करें।[ऋग्वेद 4.37.8]
हे ऋभुओं! हे इन्द्र देव! हे अश्विनी कुमारों ! हम प्रार्थना करने वालों को तुम दान के लिए महान धन और अश्वों के दान की शिक्षा प्रदान करो।
Hey Vaj Gan, Hey Ribhu Gan, Hey Indr Dev and Hey Ashwani Kumars! Grant us sufficient wealth-riches, grandeur responding to our prayers, blessing us.(10.04.2023)
 ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (38) :: ऋषि :- वामदेव गौतम, देवता :- आकाश, पृथ्वी, दधिक्रा,  छन्द :- त्रिष्टुप्।
उतो हि वां दात्रा सन्ति पूर्वा या पूरुभ्यस्त्रसदस्युर्नितोशे।
क्षेत्रासां ददथुरुर्वरासां घनं दस्युभ्यो अभिभूतिमुग्रम्
हे द्यावा-पृथ्वी! दाता त्रसदस्तु राजा ने आपके समीप से बहुत धन प्राप्त करके याचक मनुष्यों को दिया, आपने उन्हें अश्व और पुत्र दिये एवं दस्युओं को मारने के लिए अभिभव समर्थ तीक्ष्ण अस्त्र प्रदान किया।[ऋग्वेद 4.38.1]
हे आकाश-पृथ्वी! त्रसदस्यु नामक दानी राजा ने तुमसे अनेक धन प्राप्त करके माँगने वालों को दिया। तुमने उसको अश्व और पुत्र प्रदान किया था तथा राक्षसों का पतन करने के लिए विरोधियों को पराजित करने वाला तीक्ष्ण शस्त्र दिया था।
Hey Heaven-sky & Earth! Donor king Trasdastu got lots of money-riches from you and gave to the needy. You gave them horses, sons and sharp weapons to kill the demons-dacoits.
उत वाजिनं पुरुनिष्षिध्वानं दधिक्रामु ददथुर्विश्वकृष्टिम्।
ऋजिप्यं श्येनं प्रुषितप्सुमाशुं चर्कृत्यमर्यो नृपतिं न शूरम्
गमनशील, अनेक शत्रुओं के निषेधक, समस्त मनुष्यों के रक्षक, सुन्दरगामी, दीप्ति विशिष्ट, शीघ्र गामी एवं बलवान राजा के तुल्य शत्रु विनाशक दधिक्रा (अश्व रूपी अग्नि) देव को आप दोनों (द्यावा-पृथ्वी) को धारित करते है।[ऋग्वेद 4.38.2]
दधिक्रा :: एक देवता जो घोड़े के आकार के माने जाते हैं, घोड़ा, अश्व; a demigod with the shape-figure of horses, horse.
अनेक शत्रुओं को रोकने वाले सभी प्राणियों के रक्षक विशेष प्रकाश वाले, द्रुतगामी, शक्तिशाली, भूमिपति के समान शत्रुओं को नष्ट करने वाले दधिक्रा को तुम दोनों ग्रहण करने वाली हो।
Both of you, the heaven & earth support the horse (fire in the form of horse) capable of vanishing-killing the enemies, fast moving, possessing beautiful movements, radiant, equivalent to a mighty king, protector of all humans.
यं सीमनु प्रवतेव द्रवन्तं विश्वः पूरुर्मदति हर्षमाणः।
 िड्भर्गृध्यन्तं मेधयुं न शूरं रथतुरं वातमिव ध्रजन्तम्
सब मनुष्य बलिष्ठ होकर जिस दधिक्रा देव की प्रार्थना करते हैं, वे निम्नगामी जल के तुल्य गमन शील संग्रामाभिलाषी शूर के तुल्य पद द्वारा दिशाओं के लङ्घनाभिलाषी, रथ गामी और वायु के तुल्य द्रुत गामी है।[ऋग्वेद 4.38.3]
समस्त पुरुष हर्षित होकर नीचे जाने वाले के समान, विचरण करने वाले पराक्रमी के समान पैरों से दिशाओं को पार करने वाले, रथ में चलने वाले एवं वायु के समान शीघ्र चाल वाले हैं।
All humans having acquired might pray-worship Dadhikra Dev who is like slow moving water inside the earth, braves-warriors who wish to fight, capable to moving in all directions, riding the charoite fast moving like the air.
यः स्मारुन्धानो गध्या समत्सु सनुतरश्चरति गोषु गच्छन्।
आविर्ऋजीको विदथा निचिक्यित्तिरो अरतिं पर्याप आयोः
जो संग्राम में एकत्री भूत पदार्थों को निरुद्ध करते हुए अत्यन्त भोग वासना से समस्त दिशाओं में गमन करते और वेग से विचरण करते हैं, जिनकी शक्ति आविर्भूत रहती हैं, वे ज्ञातव्य कर्मों को जानते हुए स्तुति कारी याजक गणों के शत्रुओं को तिरस्कृत करते हैं।[ऋग्वेद 4.38.4]
तिरस्कृत :: तुच्छ समझनेवाला; insult, despise, contempt, scorn.
घृणा करने वाला, तिरस्कारी, निंदात्मक, घृणात्मक, तिरस्कृतजो युद्ध में एकत्र हुए पदार्थों को रोकते हुए सभी दिशाओं में जाते हुए वेग से चलते हैं। जिनका बल स्वयं प्रकट होता है, वे किये जाने योग्य कर्मों के ज्ञाता स्तोता यजमानों के शत्रुओं को यशस्वी नहीं होने देते।
Those who, oppose the mingled multitude in battles, rushes eagerly, passing through the regions, whose vigour is manifestly, who, understanding what is to be known, puts to shame the adversary of the worshipers-Ritviz.
Those who block the collected goods in the war, move in all directions with high speed, their might emerges, they are aware of the endeavours of the Ritviz-worshipers and scorn-insult the enemy.
उत स्मैनं वस्त्रमथिं न तायुमनु क्रोशन्ति क्षितयो भरेषु।
नीचायमानं जसुरिं न श्येनं श्रवश्चाच्छा पशुमच्च यूथम्
मनुष्य जिस प्रकार से वस्त्रापहारक तस्कर को देखकर चीत्कार करता है, उसी प्रकार संग्राम में शत्रु गण दधिक्रा देव को देखकर चीत्कार करते हैं। पक्षिगण जिस प्रकार नीचे की ओर आने वाले क्षुधार्त्त श्येन पक्षी को देखकर पलायन करते हैं, उसी प्रकार मनुष्य अन्न और पशु यूथ के उद्देश्य से गमन करने वाले दधिक्रा देव को देखकर चीत्कार करते हैं।[ऋग्वेद 4.38.5]
जैसे लोग वस्त्र चुराने वाले चोर को देखकर चिल्लाते हैं, वैसे ही संग्राम भूमि से दधिक्रा देव को देखकर शत्रुगण चीखते हैं। जैसे नीचे की ओर आते हुए भूखे बाज को देखकर पक्षी नहीं ठहरते, वैसे ही पुरुष अन्न और पशुओं के लिए जाते हुए दधिक्रा को देखकर चीखते हैं।
The enemy start crying like those who see the cloth thief on seeing Dadhikra Dev in the war & the birds move away when they see the hungry falcon attacking them. The humans and the cattle cry on seeing Dadhikra Dev while moving for the sake of food stuff.
उत स्मासु प्रथमः सरिष्यन्नि वेवेति श्रेणिभी रथानाम्।
स्त्रजं कृण्वानो जन्यो न शुभ्वा रेणुं रेरिहत्किरणं ददश्वान्
वे असुर सेनाओं में जाने की अभिलाषा करके रथ पंक्तियों से युक्त होकर गमन करते हैं। वे अलंकृत है। वे मनुष्यों के हितकर अश्व के तुल्य शोभायमान हैं। वे मुखस्थित लौह दण्ड या लगाम को दाँतों से खिंचते हुए धूल-धूसरित हो जाते हैं।[ऋग्वेद 4.38.6]
वे असुर सेनाओं में जाने की इच्छा से रथों की पंक्ति के समान गमन करते हैं। वे शोभित हैं और प्राणियों का हित करने वाले अश्वों की तरह सुन्दर लगते हैं। वे मुँह में पड़ी लगाम को चबाते और पाँव से उड़ती हुई धूल को चाटते हैं।
They desire to move to the enemy army in rows of chariots. They are decorated. They are comparable to horses busy in the welfare of humans. They pull the reins placed in their mouth and covered with dust.
उत स्य वाजी सहुरिर्ऋतावा शुश्रूषमाणस्तन्वा समर्ये।
तुरं यतीषु तुरयन्नृजिप्योऽधि भ्रुवोः किरते रेणुमृञ्जन्
इस प्रकार का वह अश्व सहनशील, अन्नवान, स्वशरीर द्वारा संग्राम में कार्य साधन करता हैं। वह ऋजुगामी और वेग गामी है। शत्रु सेनाओं के बीच में वह वेग से गमन करता है। वह धूलि को उठाकर के भ्रूदेश के ऊपर विक्षिप्त करता है।[ऋग्वेद 4.38.7]
इस तरह यह अश्व अन्नवान, सहनशील और अपने शरीर के द्वारा संग्राम कार्य को सिद्ध करता है। वह गति से चलने वाला शत्रुओं की सेनाओं में गति से दौड़ता है। वह धूल को पैरों से उड़ाकर अपनी भौहों में धारण करता है।
In this manner that tolerant horse, having food grains-stuff, utilises his body in the war. He moves straight with high speed in enemy armies. He raise the dust with his hoofs above his head-eye brows and disturb the enemy.
उत स्मास्य तन्यतोरिव द्योर्ऋघायतो अभियुजो भयन्ते।
यदा सहस्रमभि षीमयोधीदुर्वर्तुः स्मा भवति भीम ऋञ्जन्
युद्धाभिलाषी लोग दीप्तिमान शब्दकारी वज्र के तुल्य हिंसाकारी दधिक्रा देव से भयभीत होते हैं। जब वे चारों ओर हजारों के ऊपर प्रहार करते हैं, तब वे उत्तेजित होकर भयंकर और अजेय हो जाते हैं।[ऋग्वेद 4.38.8]
अजेय :: असामान्य, अदम्य, अनभ्यस्त, ग़ैरमामूली, अपराजेय, न जीते जाते योग्य, दुर्गम, दुस्तर, अलंघ्य; invincible, insurmountable, unbeaten.
युद्ध की इच्छा करने वाले प्राणी निनाद करने वाले उज्जवल वज्र के समान घातक दधिक्रा से भयभीत होते हैं। जब वे सभी ओर से वार करते हैं तब वे महाबलशाली हो जाते हैं। उस समय उन्हें कोई रोक नहीं सकता।
People engaged in war are afraid of Dadhikra Dev due to the sound like Vajr created by him. He become furious and invincible when he strikes thousands of  enemies from  four directions.
उत स्मास्य पनयन्ति जना जूतिं कृष्टिप्रो अभिभूतिमाशोः।
उतैनमाहुः समिथे वियन्तः परा दधिक्रा असरत्सहस्रैः
मनुष्यों की अभिलाषा को पूर्ण करने वाले एवं वेगवान दधिक्रा देव के अभिभव कारक वेग की प्रार्थना मनुष्य गण करते हुए कहते हैं कि ये दधिक्रा देव हजारों शत्रुओं को भी पराभूत करके आगे बढ़ जाते हैं।[ऋग्वेद 4.38.9]
मनुष्यों की कामना पूर्ण करने वाले, अत्यन्त गति से परिपूर्ण दधिक्रा देव के विजयोल्लास से परिपूर्ण वेद की वंदनाकारी प्रार्थना करते हुए कहते हैं कि रिपु पराजित होगा। दधिक्रा देव सहस्र संख्यक शक्ति के साथ संग्राम में जाते हैं। 
The humans worship the defeater of thousands of  enemies pray to fast moving Dadhikra Dev who accomplish the desires of the humans. 
आ दधिक्राः शवसा पञ्च कृष्टीः सूर्यइव ज्योतिषापस्ततान।
सहस्रसाः शतसा वाज्यर्वा पृणक्तु मध्वा समिमा वचांसि
सूर्य देव जिस प्रकार से तेज द्वारा जल प्रदान करते है, उसी प्रकार से दधिक्रा देव बल द्वारा पञ्चकृष्टि (देव, मनुष्य, असुर, राक्षस और पितृगण अथवा चारों वर्ण और निषाद) को व्याप्त कर देते है। शत-सहस्र दाता, वेगवान (दधिका देव) हमारे स्तुति वाक्य को मधुर फल द्वारा संयोजित करें।[ऋग्वेद 4.38.10]
सूर्य देव अपने तेज से जैसे जल वृद्धि करते हैं वैसे ही दधिक्रा देव जल द्वारा पश्चवृष्टि की वृद्धि करते हैं। सैकड़ों क्या हजारों फलों को प्रदान करने वाले दधिक्रा देव हमारी स्तुति रूप वचनों का अभीष्ट फल प्रदान करते हुए सम्पादन करें।
The way the Sun grant water due to his shine-aura, Dadhikra Dev too grant too grant water to the demigods-deities, humans, demons-giants, manes, the fours Varn and the Nishads. Let fast moving Dadhikra Dev who grants-accomplish hundreds & thousands wishes accept our prayers.(11.04.2023)
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (39) :: ऋषि :- वामदेव गौतम, देवता :- आकाश, पृथ्वी, दधिक्रा,  छन्द :- त्रिष्टुप, अनुष्टुप।
आशुं दधिक्रां तमु नु ष्टवाम दिवस्पृथिव्या उत चर्किराम।
उच्छन्तीर्मामुषसः सूदयन्त्वति विश्वानि दुरितानि पर्षन्
हम लोग शीघ्रगामी उसी दधिक्रा देव की शीघ्र प्रार्थना करेंगे। द्यावा-पृथ्वी के समीप से उनके सम्मुख विक्षेप करेंगे। तमोनिवारिणी उषा देवी हमारी रक्षा करें एवं समस्त विपत्तियों से हमें पार करें।[ऋग्वेद 4.39.1]
उन शीघ्रगामी दधिक्रा देव की हम पुरुष शीघ्र ही उपासना करेंगे। अम्बर-धरा के पास से उनके सम्मुख घास डालेंगे। अंधकार को दूर करने वाली उषा हमारी रक्षिक बनकर सभी कष्टों को हमसे दूर करें।
Verily we praise that swift Dadhikra Dev and scatter (proved before him) from heaven and earth; may the gloom-dispelling dawns preserve for me (all good things) and bear me beyond all evils.
We will worship-pray fast-quick moving Dadhikra Dev and scatter before him in the presence of sky-heaven and earth. let Usha Devi protect us and swim us across all trouble. 
महश्चर्कर्म्यर्वतः क्रतुप्रा दधिक्राव्णः पुरुवारस्य वृष्णः।
ये पूरुभ्यो दीदिवासं नाग्निं ददथुर्मित्रावरुणा ततुरिम्
हम यज्ञ सम्पन्न करने वाले हैं। हम बहुतों द्वारा वरणीय, महान और अभीष्ट वर्षी दधिक्रा देव की प्रार्थना करते हैं। हे मित्रा-वरुण! आप दोनों दीप्तिमान अग्नि देव के तुल्य स्थित तथा त्राणकर्ता दधिक्रा देव को मनुष्यों के उपकार के लिए धारित करते है।[ऋग्वेद 4.39.2]
हम अनुष्ठान कर्म के संपादन कर्त्ता हैं। अनेकों द्वारा वरण किये जाने वाले अभिलाषा की वर्षा करने वाले दधिक्रा देव की हम वंदना करते हैं। हे मित्रा-वरुण! तुम दैदीप्यमान अग्नि के समान दुःखों से पार लगाने वाले दधिक्रा देव को प्राणियों के हितार्थ धारण करने वाले हो।
We intend to organise a Yagy. We worship great Dadhikra Dev adorned by many people, who  accomplish our desires-needs. Hey Mitra-Varun! You support Dadhikra Dev who relieve us from trouble, like the aurous Agni Dev for the welfare of humans.
यो अश्वस्य दधिक्राव्णो अकारीत्समिद्धे अग्ना उषसो व्युष्टौ।
अनागसं तमदितिः कृणोतु स मित्रेण वरुणेना सजोषाः
जो याजकगण उषा के प्रकाशित होने पर अर्थात प्रभात होने पर और अग्नि देव के समिद्ध होने पर अश्व रूप दधिक्रा की प्रार्थना करते हैं, मित्र, वरुण और अदिति के साथ दधिक्रादेव उस याजकरण को निष्पाप करें।[ऋग्वेद 4.39.3]
जो यजमान उषाकाल में अग्नि प्रज्जवलित होने पर घोड़े रूप दधिक्रा का पूजन करते हैं, उनकी सखा, वरुण, अदिति और दधिक्रा पापों से बचावें।
Those Ritviz-hosts, who worship Dadhikra Dev; when Agni Dev is being ignited with the day break, he makes them sinless in association with Mitr, Varun & Aditi.
दधिक्राव्ण इष ऊर्जो महो यदमन्महि मरुतां नाम भद्रम्।
स्वस्तये वरुणं मित्रमग्नि हवामह इन्द्रं वज्रबाहुम्
हम अन्न साधक, बल साधक, महान और स्तोताओं के कल्याण कारक दधिक्रा देव के नाम की प्रार्थना करते हैं। कल्याण के लिए हम वरुण, मित्र, अग्नि और वज्रबाहु इन्द्र देव का आह्वान करते हैं।[ऋग्वेद 4.39.4]
अन्न का साधन करने वाले, प्रार्थना। करने वालों का मंगल करने वाले श्रेष्ठ दधिक्रा देव का नाम संकीर्तन करते हैं। सुख की प्राप्ति के लिए हम मित्र वरुण, अग्नि में व्रज धारण करने वाले इन्द्रदेव को आमंत्रित करते हैं।
We worship Dadhikra Dev who is the provider of food grains, great and beneficial to hosts-devotees. We invoke Mitr Dev, Varun Dev, Agni Dev and Indr Dev wielding Vajr.
WIELD :: रखना, चलाना, बरतना, हिलाना, सँभालना, फिराना, प्रबंध करना, काम में लगाना, हाथ लगाना, उपयोग करना; hold, to have and use power, authority, to hold and be ready to use a weapon.
इन्द्रमिवेदुभये विह्वयन्त उदीराणा यज्ञमुपप्रयन्तः।
दधिक्रामु सूदनं मर्त्याय ददथुर्मित्रावरुणा नो अश्वम्
जो युद्ध करने के लिए पराक्रम करते हैं और जो यज्ञ आरम्भ करते हैं, वे दोनों ही इन्द्र देव के तुल्य दधिक्रा देव का आह्वान करते हैं। हे मित्रा-वरुण! आप मनुष्यों के प्रेरक अश्व स्वरूप दधिक्रा देव को हमारे लिए धारित करें।[ऋग्वेद 4.39.5]
जो युद्ध को तैयार करते हैं और जो यज्ञ कर्म करते हैं, वह दोनों ही इन्द्र के समान दधिक्रा देव को आमंत्रित करते हैं। हे मित्रा-वरुण! तुम मनुष्यों को शिक्षा प्रदान करने वाले अश्व के रूप वाले दधिक्रा देव को हमारे लिए धारण करो।
Those who make efforts for the war & those who begin Yagy, both invoke Dadhikra Dev just like Indr Dev. Hey Mitra-Varun! You support Dadhikra Dev-in the form of horse, who inspire humans. 
दधिक्राव्णो अकारिषं जिष्णोरश्वस्य वाजिनः।
सुरभि नो मुखा करत्प्र ण आयूंषि तारिषत्
हम जयशील, व्यापक और वेगवान दधिक्रा देव की प्रार्थना करते हैं। वे हमारे नेत्र आदि इन्द्रियों को सुगन्ध विशिष्ट कर हमारी आयु को बढ़ावें।[ऋग्वेद 4.39.6] 
विजय से परिपूर्ण, व्यापक और गति वाले दधिक्रा का हम पूजन करते हैं। हे हमारे नेत्र, मुख आदि इन्द्रियों को सुरभित करें और हमारी आयु की वृद्धि करें।
We worship-pray the winner, dynamic Dadhikra Dev. Let him make our eyes & other sense organs strong-energetic and boast our longevity.(14.04.2023)
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (40) :: ऋषि :- वामदेव गौतम, देवता :- आकाश, पृथ्वी, दधिक्रा, सूर्य, छन्द :- जगती, त्रिष्टुप।
दधिक्राव्ण इदु नु चर्किराम विश्वा इन्मामुषसः सूदयन्तु।
अपामग्नेरुषसः सूर्यस्य बृहस्पतेराङ्गिरसस्य जिष्णोः
हम बारम्बार दधिक्रा देव की प्रार्थना करेंगे। सम्पूर्ण उषा हमें कर्म में प्रेरित करें। हम जल, अग्निदेव, उषा, सूर्य, बृहस्पति और अङ्गिरा गोत्रोत्पन्न जिष्णु की प्रार्थना करेंगे।[ऋग्वेद 4.40.1]
जिष्णु :: विजयी; triumphant, victorious, winner.
उन दधिक्रादेव की हम बारम्बार उपासना करेंगे। समस्त उषायें हमको कार्यों में संलग्न करें। जल, अग्नि, उषा, सूर्य, बृहस्पति और अंगिरा वंशज विष्णु का हम समर्थन करेंगे।
We will worship-pray Dadhikra Dev repeatedly. Let Usha inspire us endeavours, every morning. We will pray to the winners in the dynasty Agni Dev, Sun, Brahaspati and Angira.
सत्वा भरिषो गविषो दुवन्यसच्छ्रवस्यादिष उषसस्तुरण्यसत्।
सत्यो द्रवो द्रवरः पतङ्गरो दधिक्रावेषमूर्जं स्वर्जनत्
गमनशील, पालन-पोषण में कुशल, गौओं के प्रेरक और परिचारकों के साथ निवास करने वाले दधिक्रा देव अभिलषणीय उषा काल में अन्न की कामना करें। शीघ्र गामी, सत्य गमन शील, वेग वान और उत्प्लवन द्वारा गमन शील दधिक्रा देव अन्न, बल और हर्ष उत्पन्न करें।[ऋग्वेद 4.40.2]
भरण-पोषण कर्म चालक, विचरणशील, धेनुओं को प्रेरणा प्रदान करने वाले, परिचारिकों के साथ रहने वाले दधिक्रा कामना गोग्य उषा बेला में अन्न की इच्छा करें। ये वेगवान, शीघ्र चलने वाले दधिक्रा देव अन्न, बल और अलौकिक गुणों को प्रकट करने वाले हों।
Let dynamic, expert in nourishment-nurturing and inspirer of cows along with his care takers, desire for food grains at dawn. Let fast moving, truthful, accelerated, possessing thrust Dadhikra Dev show the divine characters of food grains, force-might.
उत स्मास्य द्रवतस्तुरण्यतः पर्णं न वेरनु वाति प्रगर्धिनः।
श्येनस्येव ध्रजतो अङ्कसं परि दधिक्राव्णः सहोर्जा तरित्रतः 
पक्षिगण जिस प्रकार से पक्षियों की गति का अनुसरण करते हैं, उसी प्रकार सब वेगवान लोग त्वरायुक्त और आकांक्षावान दधिक्रा देव की गति का अनुसरण करते हैं। श्येन पक्षी के तुल्य द्रुतगामी और त्राणकारी दधिक्रा देव के उस प्रदेश के चारों ओर एकत्र होकर अन्न के लिए सब गमन करते हैं।[ऋग्वेद 4.40.3]
जैसे पक्षी पक्षियों की परम्परागत रास्ते पर चलते हैं, वैसे ही सभी वेगवान जीव शीघ्रता से युक्त एवं अभिलाषा वाले दधिक्रा की चाल पर चलते हैं। श्येन के समान शीघ्रगामी एवं सुरक्षा करने वाले दधिक्रा के समस्त तरफ संगठित होकर समस्त अन्न के लिए जाते हैं।
The manner in which the birds follow the route of migration of their ancestors, all dynamic, accelerated and desirous people follow Dadhikra Dev. Moving fast like the falcon, protector Dadhikra Dev move in all directions for food stuff.
उत स्य वाजी क्षिपणिं तुरण्यति ग्रीवायां बद्धो अपिकक्ष आसनि।
क्रतुं दधिक्रा अनु संतवीत्वत्प थामङ्कांस्यन्वापनीफणत्
वह अश्वरूप देव कण्ठ प्रदेश में कक्ष प्रदेश और मुख प्रदेश में बद्ध होते हैं एवं बद्ध होकर पैदल शीघ्र गमन करते हैं। दधिक्रा देव अधिक बलवान होकर यज्ञाभिमुख कुटिल मार्गों का अनुसरण करके सभी जगह गमन करते हैं।[ऋग्वेद 4.40.4]
यह देव अश्वरूपी वाले हैं। यह काष्ठ कक्ष और मुख में बंधे हुए होते हैं और पैदल ही तेजी से चलते हैं। वे दधिक्रा अत्यन्त पराक्रमी होकर टेढ़े रास्तों को भी लांघते हुए अनुष्ठान के सम्मुख मुख करके समस्त ओर जाते हैं।
Dadhikra Dev remain in the form of horse. He moves fast on foot tied in the neck, mouth & the body. He become mighty, moving towards the Yagy site, following the uneven routes, all around-every where. 
हंसः शुचिषद्वसुरन्तरिक्षसद्धोता वेदिषदतिथिर्दुरोणसत्। नृषद्वरसदृतसव्द्योमसदब्जा गोजा ऋतजा अद्रिजा ऋतम्
हंस (आदित्य) दीप्त आकाश में अवस्थित रहते हैं। वसु (वायु) अन्तरिक्ष में अवस्थिति करते है। होता (वैदिकाग्नि) वेदीस्थल पर गार्हपत्यादि रूप से अवस्थिति करते हैं एवं अतिथिवत पूज्य होकर धर में (पाकादिसाधन रूप से) अवस्थिति करते हैं। ऋत (सत्य, ब्रह्म, यक्ष ) मनुष्यों के बीच में अवस्थान करते हैं, वरणीय स्थान में अवस्थान करते हैं, यज्ञस्थल में अवस्थान करते हैं एवं अन्तरिक्ष स्थल में अवस्थान करते हैं। वे जल में, रश्मियों में, सत्य में और पर्वतों में उत्पन्न हुए हैं।[ऋग्वेद 4.40.5]
अवस्थित नभ में वायु अंतरिक्ष में और होता इत्यादि वेदी पर आते हैं। अदिति के समान पूजनीय होकर गृह में निवास करते हैं। ऋभु मनुष्यों में वरणीय स्थान तथा यज्ञ-स्थल में रहते हैं। वे नत, रश्मि, सत्य और शैलों में उत्पन्न हुए हैं।
Swans (Hans-Adity) stay-establish in the sky. Vasu Vayu stay in the space. The hosts-Ritviz stay at the Yagy site like the fire and honoured like Aditi. Rat dev (Truth, Brahm & Yaksh) establish between-amongest the humans & the space-sky. They are born in the waters, rays of light and the mountains.(16.04.2023)
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (41) :: ऋषि :- वामदेव गौतम, देवता :- इन्द्र देव, वरुण, छन्द :- त्रिष्टुप।
इन्द्रा को वां वरुणा सुम्नमाप स्तोमो हविष्माँअमृतो न होता।
यो वां हृदि क्रतुमाँ अस्मदुक्तः पस्पर्शदिन्द्रावरुणा नमस्वान्
हे इन्द्र देव, हे वरुण! हमारे द्वारा ज्ञान पूर्वक और विनम्रता पूर्वक उच्चारण किया हुआ कौन-सा स्तोत्र है, जो आपके हृदय को स्पर्श कर सके? हे इन्द्र देव, हे वरुण! अविनाशी और आहुति से युक्त अग्नि देव के तुल्य प्रदिप्त वह स्तोत्र आपके अन्तःस्थल में प्रवेश करे।[ऋग्वेद 4.41.1]
हे इन्द्र देव! हे वरुण! अमरतत्व-ग्रहण होता! अग्नि के तुल्य हवि परिपूर्ण कौन सा श्लोक तुम दोनों की कृपा दृष्टि ग्रहण कर सकता है? वह श्लोक हमारे द्वारा अर्पण हुआ हवियों से परिपूर्ण होकर तुम दोनों के अन्तः करण में प्रवेश करें।
Hey Indr Dev! Hey Varun Dev! Let us know the Strotr learnt by us which touches your heart. Which excellent Shlok can please you like the offerings in imperishable holy fire-Agni Dev?!
इन्द्रा ह यो वरुणा चक्र आपी देवौ मर्त सख्याय प्रयस्वान्।
स हन्ति वृत्रा समिथेषु शत्रूनवोभिर्वा महद्भिः स प्र शृण्वे
हे प्रसिद्ध इन्द्र और वरुण देव! जो मनुष्य हवि लक्षण अन्नवान होकर संख्या के लिए आप दोनों से मित्रता करता है, वह मनुष्य पापों का नाश करता है, युद्ध में शत्रुओं का विनाश करता हैं और महती रक्षा द्वारा प्रख्यात होता है।[ऋग्वेद 4.41.2]
हे इन्द्र, वरुण! तुम दोनों विख्यात हो। जो व्यक्ति पापों का विनाश करने में सक्षम है, वह संग्राम में शत्रु को मार देता है और विशाल रक्षा साधनों द्वारा विख्याति प्राप्त करता है।
Hey famous Indr Dev, Varun Dev! The humans who is friendly with you, makes offerings of food grains; destroys his sins. He kills the enemy in the war and becomes famous under your protection-shelter.
इन्द्रा ह रत्नं वरुणा धेष्ठेत्था नृभ्यः शशमानेभ्यस्ता।
यदी सखाया सख्याय सोमैः सुतेभिः सुप्रयसा मादयैते
हे प्रसिद्ध इन्द्र देव और वरुण देव! आप दोनों देव हम स्तोत्र करने वाले मनुष्यों के लिए रमणीय धन देने वाले होवें। यदि आप दोनों परस्पर मित्र हैं और मित्रता के लिए अभिषुत सोमरस तथा उत्तम अन्नों से प्रसन्न हैं, तो ऐश्वर्य प्रदान करने वाले हो।[ऋग्वेद 4.41.3]
हे प्रख्यात इन्द्र व वरुण! तुम दोनों देवता हम स्तोताओं को सुन्दर धन प्रदान करने वाले बनो। यदि तुम यजमान के मित्र रूप हो सखा भाव लिए सिद्ध किये गये इस सोम रस से पुष्टि को ग्रहण होओ और धन ग्रहण करने वाले बनो।
Hey famous Indr Dev & Varun Dev! You should be able to grant us grandeur, reciting hymns-verses in your honour. If both of you are friends and ready to drink Somras for the sake of friendship and pleased with the excellent grains used for extracting Somras, grant us grandeur.
इन्द्रा युवं वरुणा विद्युमस्मिन्नोजिष्ठमुग्रा नि वधिष्टं वज्रम्।
यो नो दुरेवो वृकतिर्दभीतिस्तस्मिन्मिमाथामभिभूत्योजः
हे उग्र इन्द्र देव और वरुण देव! आप दोनों इस शत्रु के ऊपर दीप्त और अतिशय तेजो विशिष्ट वज्र का प्रक्षेप करें। जो शत्रु हम लोगों के द्वारा दुर्दमनीय, अत्यन्त अदाता और हिंसक है, उस शत्रु के विरुद्ध आप दोनों अभिभव कर वज्र का प्रयोग करें।[ऋग्वेद 4.41.4]
हे इन्द्रदेव और वरुण! तुम दोनों विकराल कार्य वाले हो। हमारे शत्रु पर तुम दोनों ही अत्यन्त तेज वाले शस्त्र का प्रहार करो। जो शत्रु अदानशील, हिंसक तथा हमारे दमन किए हुए जाने योग्य नहीं हैं, उस शत्रु के विरुद्ध तुम दोनों उसे पराजित करने वाले शक्ति से हराओ।
Hey furious Indr Dev & Varun Dev! Strike radiant Vajr possessing enormous energy, over this enemy. Defeat the enemies who do not donate, are violent & not qualified to be vanished by us.
इन्द्रा युवं वरुणा भूतमस्या धियः प्रेतारा वृषभेव धेनोः।
सा नो दुहीयद्यवसेव गत्वी सहस्त्रधारा पयसा मही गौः
हे इन्द्र देव और वरुण देव! बैल जिस प्रकार से गाय से प्रेम करता है, उसी प्रकार आप दोनों स्तुतियों से प्रसन्न होवें। तृणादि का भक्षण करके सहस्र धारा महती गौ जिस प्रकार से दुग्ध दोहन के लिए उपस्थित रहती है, उसी प्रकार से स्तुति रूपा धेनु हम लोगों की अभिलाषाओं को पूर्ण करें।[ऋग्वेद 4.41.5]
तृणादि को भक्षण कर जैसे गौ दूध देती है, वैसे ही तुम्हारी वंदना रूपी धेनु इच्छाओं को सदैव प्रदान करती रहे।
Hey Indr Dev & Varun Dev! Be happy-affectionate with our hymns, the way the bull loves the cow.  The manner in which the cow yield milk by eating straw, the prayers-worship should accomplish our desires.
तोके हिते तनय उर्वरासु सूरो दृशीके वृषणश्च पौंस्ये।
इन्द्रा नो अत्र वरुणा स्यातामवोभिर्दस्मा परितक्म्यायाम्
हे इन्द्र देव और वरुण देव! आप दोनों रात्रि में रक्षा युक्त होकर शत्रुओं की हिंसा करने के लिए अवस्थान करें, जिससे हम लोग पुत्र, पौत्र और उपजाऊ भूमि से लाभ प्राप्त कर सकें एवं चिरकाल पर्यन्त सूर्य देव को देख सकें अर्थात् चिरजीवी हों तथा सन्तान उत्पन्न करने की शक्ति को प्राप्त कर सकें।[ऋग्वेद 4.41.6]
हे इन्द्र और वरुण देव! शीघ्रकाल से तुम दोनों अपने सुरक्षा साधनों से परिपूर्ण होकर शत्रुओं का पतन करने के लिए चल दो जिससे हम सन्तान आदि धन एवं उर्वरा धरा को पास के उम्र पर्यन्त सूर्य के दर्शन करते रहें। हे इन्द्र और वरुण! गाय जैसे बैल को प्रेम करती है वैसे ही तुम दोनों स्तुतियों को प्रेम करने वाले बनो।
Hey Indr Dev & Varun Dev! Move to destroy the enemy at night, well equipped with the means of protections. We wish to survive for long accompanied by our sons & grandsons.
To see Sun means survival for long. Power to produce progeny means having sons & grandsons.
युवामिद्ध्यवसे पूर्व्याय परि प्रभूती गविषः स्वापी।
वृणीमहे सख्याय प्रियाय शूरा मंहिष्ठा पितरेव शंभू
हे इन्द्रदेव और वरुण देव! हम लोग धेनु लाभ की अभिलाषा से आप लोगों के निकट प्राचीन रक्षा की प्रार्थना करते हैं। आप दोनों क्षमता शाली, बन्धु स्वरूप, शूर एवं अतिशय पूजनीय हैं। हम लोग आप दोनों के निकट सुखदायक पिता के तुल्य मित्रता और स्नेह की प्रार्थना करते हैं।[ऋग्वेद 4.41.7]
हे इन्द्र वरुण! गाय की अभिलाषा करने वाले हम तुमसे हमारे पुरातन काल से चले आ रहे पोषण सामर्थ्य की विनती करते हैं। तुम दोनों ही सभी कर्मों को करने वाले हो, सखा रूप एवं अत्यन्त पूजनीय हो। तुम दोनों से हम पुत्र को प्रदान करने वाले पिता के तुल्य अत्यन्त प्रेम प्रदान करने की विनती करते हैं।
Hey Indr Dev & Varun Dev! We pray-request you to grant us cows from ancient times. You are mighty, brave, revered-worship able and brotherly with us. We expect fatherly love & affection from you.
ता वां धियोऽवसे वाजयन्तीराजिं न जग्मुर्युवयूः सुदानू।
श्रिये न गाव उप सोममस्थुरिन्द्रं गिरो वरुणं मे मनीषाः
हे शोभन फल देने वाले देवद्वय! योद्धा जिस प्रकार से संग्राम की कामना करता है, उसी प्रकार से हम लोगों की रत्नाभिलाषिणी स्तुतियाँ आप दोनों की कामना करती हुई रक्षा लाभ के लिए आप दोनों के निकट गमन करते हैं। दध्यादि द्वारा शोभन करने के लिए जिस प्रकार से गौएँ सोम के पास रहती हैं। उसी प्रकार हमारी आन्तरिक स्तुतियाँ इन्द्र देव और वरुण देव के पास जाती हैं।[ऋग्वेद 4.41.8]
हे इन्द्रा-वरुण! तुम दोनों देवता सुन्दर फल प्रदान करने वाले हो। जैसे शक्तिशाली पुरुष युद्ध की कामना करते हैं, वैसे ही हमारी स्तुतियाँ रत्नादि धन की कामना से रक्षा प्राप्ति के लिए तुम्हारे समीप जाती हैं। जैसे गायें दूध दही आदि सुन्दर पदार्थों के लिए तुम्हारे समीप जाती हैं, वैसे ही हमारी हार्दिक वंदनाएँ इन्द्र के समीप पहुँचती हैं।
Hey beautiful reward granting duo! The way a warrior desire to take part in the war, we desirous of jewels-gems recite hymns and move closer to you for safety. The way the cows move to you for milk & curd, our heartiest prayers reach Indr Dev & Varun Dev.
इमा इन्द्रं वरुणं मे मनीषा अग्मन्नुप द्रविणमिच्छमानाः।
उपेमस्थुर्जोष्टार इव वस्वो रघ्वीरिव श्रवसो भिक्षमाणाः
धन-लाभ के लिए जिस प्रकार से सेवक धनवानों के निकट गमन करते हैं, उसी प्रकार हमारी स्तुतियाँ सम्पत्ति लाभ की इच्छा से इन्द्र देव और वरुण देव के निकट गमन करें। भिक्षुक स्त्रियों के तुल्य अन्न की भिक्षा माँगते हुए इन्द्र देव के पास जावें।[ऋग्वेद 4.41.9]
जैसे सेवक गणा धन के लिए धनिकों की सेवा करने को जाते हैं, वैसे ही हमारी वंदनाएँ धन की इच्छा करती और वरुण के निकट जावें। वंदनाएँ अन्न की भीख माँगने वाले भिखारियों के तुल्य इन्द्र देव के पास पहुँचे।
The way the servants move closer to the wealthy, our prayers-hymns reach Indr Dev & Varun Dev for the sake of riches. Let our prayers fruitily like the bagger women, who go to Indr Dev expecting food grains.
अश्व्यस्य त्मना रथ्यस्य पुष्टेर्नित्यस्य रायः पतयः स्याम।
ता चक्राणा ऊतिभिर्नव्यसीभिरस्मत्रा रायो नियुतः सचन्ताम्
हम लोग बिना प्रयत्न के अश्व समूह, रथ समूह, पुष्टि एवं अविचल धन के स्वामी हों। वे दोनों देव गमन शील हों एवं नूतन रक्षा के साथ हम लोगों के अभिमुख अश्व और धन नियुक्त करें।[ऋग्वेद 4.41.10]
वे इन्द्र देव और वरुण दोनों देवता गमनशील हैं। अपने अभिनव रक्षा साधनों के साथ हमारे सम्मुख अश्व आदि पशु धन सम्पादित करें। तब हम बिना प्रयास किये ही अश्वों, रथों, बैलों और स्थिर धनों के अधीश्वर होंगे।
Hey Indr Dev & Varun Dev! You are the master of horses, charoites, might and immovable wealth. You both are dynamic. Appoint-grant horses and new wealth for our safety.
आ नो बृहन्ता बृहतीभिरूती इन्द्र यातं वरुण वाजसातौ।
यद्दिद्यवः पृतनासु प्रक्रीळान्तस्य वां स्याम सनितार ओजः
हे महान इन्द्र देव और वरुण देव! आप दोनों महान रक्षा के साथ आगमन करें। जिस अन्न प्रापक युद्ध में शत्रु सेना के आयुध क्रीड़ा करते हैं, उस युद्ध में हम लोग आप दोनों के अनुकम्पा से विजय प्राप्त कर सकें।[ऋग्वेद 4.41.11]
हे इन्द्रा-वरुण! तुम सर्वश्रेष्ठ हो। तुम अपने श्रेष्ठ सुरक्षा साधनों से युक्त यहाँ पधारो। अन्न प्राप्ति के जिस युद्ध में शत्रु सेना के हथियार आघात करते हैं, उस संग्राम में हम तपस्वी गण तुम दोनों देवों की कृपा दृष्टि से विजय ग्रहण करें।
Hey mighty-great Indr Dev & Varun Dev! Come to us with your great means of protection. We should be victorious in that war, in which you fight with your weapons for us & which yield food grains.(17.04.2023)
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (42) :: ऋषि :- त्रसदस्यु, पुरुकुत्सदेवता :- आत्मा, इन्द्र देव, वरुण, छन्द :- त्रिष्टुप।
मम द्विता राष्ट्रं क्षत्रियस्य विश्वायोर्विश्वे अमृता यथा नः।
क्रतुं सचन्ते वरुणस्य देवा राजामि कृष्टेरुपमस्य वव्रेः
हम क्षत्रिय जाति में उत्पन्न (अतिशय बलवान) और सम्पूर्ण मनुष्यों के स्वामी हैं। हमारा राज्य दो प्रकार का है। सम्पूर्ण देवगण जिस प्रकार से हमारे हैं, उसी प्रकार समस्त प्रजा भी हमारी ही है। हम रूपवान और समीपस्थ वरुण देव है। देवगण हमारे यज्ञ की सेवा करते हैं।[ऋग्वेद 4.42.1]
हम क्षत्रिय हैं। समस्त व्यक्तियों के हम स्वामी हैं। हमारा राष्ट्र दो प्रकार का है। जैसे समस्त देव हमारे हैं, उसी प्रकार समस्त प्रजाजन भी हमारे ही हैं। हम सुन्दर रूप वाले एवं वरुण के समान यशस्वी हैं।
We are born in Kshatriy clan, mighty & king of all humans. Our kingdom is of two types. The manner in which the demigods-deities belong to us, the humans too belong to us. We are beautiful-handsome like Varun Dev. 
Kshatriy is the second Varn in the Hindus. The British referred them as marshal castes. Generally, they are warriors and constitute the army.
अहं राजा वरुणो मह्यं तान्यसुर्याणि प्रथमा धारयन्त।
क्रतं सचन्ते वरुणस्य देवा राजामि कृष्टेरुपमस्य वव्रे:
हम ही राजा वरुण देव हैं। देवगण हमारे लिए ही असुर विघातक श्रेष्ठ बल धारण करते है। हम रूपवान और समीपस्थ वरुण देव हैं। देवगण हमारे यज्ञ की सेवा करते हैं, हम मनुष्य के स्वामी हैं।[ऋग्वेद 4.42.2]
देवता हमारे यज्ञ की सुरक्षा करते हैं। हम तरुण तेजस्वी सम्राट हैं। देवता हमारे लिए ही असुरों को समाप्त करने वाला बल धारण करते हैं। हम सुन्दर रूप वाले वरुण के अंतकस्थ हैं। हमारे यज्ञ के देवता रक्षक हैं और हम प्राणियों के दाता हैं।
We are like the king Varun Dev. We are close to Varun Dev and beautiful-youthful. The demigods-deities protect our Yagy. We are the king of humans.
अहमिन्द्रो वरुणस्ते महित्वोर्वी गभीरे रजसी सुमेके।
त्वष्टेव विश्वा भुवनानि विद्वान्त्समैरयं रोदसी धारयं च
हम इन्द्र देव और वरुण देव हैं। अपनी महत्ता के कारण विस्तीर्ण, दुरवगाहा, सुरूपा, द्यावा-पृथ्वी हम ही हैं। हम विद्वान हैं। हम सकल भूतजात को प्रजापति के तुल्य प्रेरित करते हैं। हम द्यावा-पृथ्वी को धारित करते हैं।[ऋग्वेद 4.42.3]
महत्ता :: महत्त्व, अहमियत, महिमा, प्रभुता, प्रभाव, अर्थ, अभिप्राय, गौरव, प्रतिष्ठा, महानता, विपुलता, विस्तार, अधिकता; importance, significance, greatness.
भूतजात :: मृत, दिवंगत, पितृगण; deceased, Manes-Pitres.
हम इन्द्र, वरुण और पृथ्वी भी स्वयं हैं। हम प्राणधारी मात्र को प्रजापति के तुल्य शिक्षा प्रदान करने वाले हैं। हम आकाश और पृथ्वी के धारण करने वाले तथा प्रज्ञावान हैं।
We are Indr Dev & Varun Dev. We constitute the sky-space (heaven) & the earth due to our significance & greatness and support them. We are learned-enlightened. We inspire the deceased, Manes-Pitres like Prajapati.
अहमपो अपिन्वमुक्षमाणा धारयं दिवं सदन ऋतस्य।
ऋतेन पुत्रो अदितेर्ऋतावोत त्रिधातु प्रथयद्वि भूम
हमने ही सिचमान जल की वर्षा की, उदक या आदित्य के स्थान भूत द्युलोक को धारित किया अथवा आकाश में आदित्य को धारित किया। जल के निमित्त से हम अदिति पुत्र ऋतावा (यज्ञवान) हुए। हमने व्याप्त आकाश को तीन प्रकार से प्रथित किया अर्थात परमेश्वर ने हमारे लिए ही क्षिति आदि तीन लोकों को बनाया।[ऋग्वेद 4.42.4]
क्षिति :: पृथ्वी, निवास स्थान; earth.
हमने ही वर्षा रूप जल को सींचा हैं। सूर्य के आश्रित जगत अम्बर को हमने ही धारण किया है। हम अदिति पुत्र जल के लिए यज्ञवान हुए हैं। हमने ही व्यापक नभ के तीनों लोकों के रूप में परिवर्तित किया है।
We showered rains for irrigation and supported the space-sky the abode of Sun. For the sake of water we turned into Ritava-the son of Aditi i.e., became performers of Yagy. We divided the space-sky into three abodes (earth, heavens and the Nether world).
मां नरः स्वश्वा वाजयन्तो मां वृताः समरणे हवन्ते।
कृणोम्याजिं मघवाहमिन्द्र इयर्मि रेणुमभिभूत्योजाः
सुन्दर अश्व वाले और युद्ध के इच्छुक नेता अनुगमन करते हैं। वे सब वृत होकर युद्ध के लिए संग्राम में हमारा ही आह्वान करते हैं। हम धनवान इन्द्र देव होकर युद्ध करते हैं। हम पराजित करने वाले बल से युक्त होकर धूल उड़ाते हैं।
युद्ध में नेतृत्व करने वाले, सुन्दर अश्ववान वीर हमारे पीछे चलते हैं। वे सभी संकल्पवान हुए युद्ध में हमकों ही आमंत्रित करते हैं। हम समृद्धिशाली इन्द्रदेव के रूप में अनुष्ठान करते हैं। हम शत्रु को पराजित करने वाली शक्ति से युक्त हैं। हमारी प्रबल गति से संग्राम स्थान में धूल उड़कर अम्बर में छा जाती है।
The warriors-stalwarts desirous of war, possessing beautiful horses follow us. They decide to fight and invoke us. We become wealthy Indr Dev and fight in the war.  Our might produces-spread dust in the sky. 
अहं ता विश्वा चकरं नकिर्मा दैव्यं सहो वरते अप्रतीतम्।
यन्मा सोमासो ममदन्यदुक्थोभे भयेते रजसी अपारे
हमने उन सभी कार्यों को किया। हम अप्रतिहत दैव बल से युक्त हैं। कोई भी हमे रोक नहीं सकता। जब सोमरस हमें हर्षित करता है एवं उक्थ समूह हमें हर्षित करता है, तब अपार और उभय द्यावा-पृथ्वी भयभीत हो जाती हैं।[ऋग्वेद 4.42.6]
हम अलौकिक पराक्रम से परिपूर्ण हैं। हमको हमारे कार्यों में कोई बाधित नहीं कर सकता। हमने इन सभी कार्यों को पूर्ण किया है। जब सोमरस और श्लोक हमें पुष्ट करते हैं, तब हमारे पराक्रम को देखकर विस्तृत नभ और भू-मण्डल दोनों ही चलायमान हो जाते हैं।
We possess extreme might and none can block us. We accomplished the current deeds. When Somras & hymns nourish-nurse us, the earth and the sky become movable-dynamic.
Each & every thing in the universe is movable-dynamic.
विदुष्टे विश्वा भुवनानि तस्य ता प्र ब्रवीषि वरुणाय वेधः।
त्वं वृत्राणि शृण्वषे जघन्वान्त्वं वृताँ अरिणा इन्द्र सिन्धून्
हे वरुण देव! आपके कर्म को सकल लोक जानते हैं। हे स्तोता! वरुण देव की प्रार्थना करें। हे इन्द्र देव! आपने रिपुओं का वध किया; यह आपकी प्रसिद्धि है। हे इन्द्र देव! आपने अवरुद्ध की हुई नदियों को प्रवाहित किया।[ऋग्वेद 4.42.7]
हे वरुण! तुम्हारे कार्य को सभी प्राणधारी जानते हैं। वंदना करने वालों! वरुण देव की प्रार्थना करो। हे इन्द्र देव! तुमने शत्रुओं का पतन किया है, तुम्हारे इस कार्य को सभी जानते हैं। तुमने रुकी हुई नदियों को भी प्रवाहित किया है।
Hey Varun Dev! Entire universe is aware of your might-power. Hey Stota! Pray-worship Varun Dev. Hey Indr Dev! You are famous since  you killed the enemies. Hey Indr Dev! You made the dry-blocked rivers flow.
अस्माकमत्र पितरस्त आसन्त्सप्त ऋषयो दौर्गहे बध्यमाने।
त आयजन्त त्रसदस्युमस्या इन्द्रं न वृत्रतुरमर्धदेवम्
दुर्गह के पुत्र पुरुकुत्स के बन्दी होने पर इस देश या पृथ्वी के पालयिता सप्तर्षि हुए। उन्होंने इन्द्र देव और वरुण देव के अनुग्रह से पुरुकुत्स की स्त्री के लिए यज्ञ करके त्रसदस्यु को उपलब्ध किया। त्रसदस्यु इन्द्र देव के तुल्य शत्रु विनाशक और अर्द्धदेव देवताओं के समीप में वर्तमान या देवताओं के अर्द्धभूत इन्द्र देव के तुल्य थे।[ऋग्वेद 4.42.8]
पुरुकुत्स के बन्धन में पड़ने पर सप्तऋर्षि इस पृथ्वी के पालनकर्त्ता हुए। उन्होंने इन्द्र और वरुण की दया से पुरुकुत्स की पत्नी के लिए यज्ञ किया और त्रसदस्यु को पाया। वह त्रसदस्यु इन्द्र के समान शत्रुओं का नाश करने वाला हुआ और वह अर्द्ध देवत्व का भी अधिकारी हुआ।
When Purukuts, son of Durgah was arrested-imprisoned, Sapt Rishi Gan became the nurturers of the earth. They made Trasdasyu, who was as capable as Indr Dev in destroying the enemies, available for conducting the Yagy of the wife of Purukuts & the semi demigods by virtue of the grace of Indr Dev & Varun Dev.
पुरुकुत्सानी हि वामदाशब्द्धव्येभिरिन्द्रावरुणा नमोभिः।
अथा राजानं त्रसदस्युमस्या वृत्रहणं ददथुरर्धदेवम्
हे इन्द्र देव और वरुण देव! ऋषियों द्वारा प्रेरित होने पर पुरुकुत्स की पत्नी ने आप दोनों को हव्य और स्तुति द्वारा प्रसन्न किया। अनन्तर आप दोनों ने उसे शत्रु नाशक अर्द्ध देव राजा त्रसदस्यु को प्रदान किया।[ऋग्वेद 4.42.9]
हे इन्द्रा-वरुण! मुनि की शिक्षा से पुरुकुत्स की पत्नी ने तुम दोनों को हविरत्न और प्रार्थनाओं के द्वारा हर्षित किया। फिर तुम दोनों ने उसे अर्द्ध देवत्व ग्रहण शत्रुओं का पतन करने वाले त्रसदस्यु को प्रदान करके संतुष्ट होगी।
Hey Indr Dev & Varun Dev! On being inspired by the Rishis, the wife of Purukuts pleased both of you with offerings and prayers. Thereafter, you both sent her to Trasdasyu, who has had obtained semi demigod hood and was the slayer of of the enemy.
राया वयं ससवांसो मदेम हव्येन देवा यवसेन गावः।
तां धेनुमिन्द्रावरुणा युवं नो विश्वाहा धत्तमनपस्फुरन्तीम्
हम लोग आप दोनों की प्रार्थना करके धन द्वारा परितृप्त होंगे। देवगण हव्य द्वारा तृप्त हों और गौएँ तृणादि द्वारा परितृप्त हों। हे इन्द्र और वरुण! आप दोनों विश्व के हन्ता हैं। आप दोनों हम लोगों को सदा अहिंसित धन प्रदान करें।[ऋग्वेद 4.42.10]
देवता हविरत्न से तथा गाय तृणादि से संतुष्टि को प्राप्त होती है। हे इन्द्रा वरुण! तुम दोनों विश्व की उत्पत्ति और संहार करने वाले हो। हमको स्थिर धन प्रदान करो।
You both are pleased with prayers-worship and the cow is satisfied by the straw. Hey Indr Dev & Varun Dev! You are the creator & destroyer of the universe. Grant us wealth which cannot be snatched from us.(18.04.2023)
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (43) :: ऋषि :- पुरुमीलहाजमीलह सौहोत्रदेवता :- अश्विनीकुमार, छन्द :- त्रिष्टुप।
क उ श्रवत्कतमो यज्ञियानां वन्दारु देवः कतमो जुषाते।
कस्येमां देवीममृतेषु प्रेष्ठां हृदि श्रेषाम सुष्टुतिं सुहव्याम्
यज्ञार्ह देवों के बीच में कौन देव इसे सुनेंगे? कौन देव इस वन्दनशील स्तोत्र का सेवन करेंगे? देवताओं के बीच में किस देव के हृदय में इस प्रियतरा द्योतमाना, हव्य युक्ता शोभन प्रार्थना को सुनावें अर्थात अश्विनी कुमारों के अतिरिक्त प्रार्थना के स्वामी कौन देव होंगे?[ऋग्वेद 4.43.1]
अनुष्ठान के देवताओं में कौन से देवता इस प्रार्थना को सुनेंगे? कौन से देव इस
अर्चना के योग्य श्लोकों को प्राप्त करेंगे। देवताओं में ऐसे किस देव को हम अपनी प्रेममयी, उज्ज्वल, हविरत्न वाली सुन्दर प्रार्थना को सुनावें जो इसके अधिकारी हों।
Which demigod-deities will listen to our prayers? Who will hear these worship Strotr? To whom should we offer these descent prayers, aided by offerings, in addition to Ashwani Kumars, who deserve it?
को मृळाति कतम आगमिष्ठो देवानामु कतमः शंभविष्ठः।
रथं कमाहुर्द्रवदश्वमाशुं यं सूर्यस्य दुहितावृणीत
कौन देवता हम लोगों को सुखी करेंगे? कौन देवता हमारे यज्ञ में सबकी अपेक्षा अधिक आगमन करते हैं? देवों के बीच में कौन देवता हम लोगों को सबकी अपेक्षा अधिक सुखी करते हैं? इस तरह उपर्युक्त गुणों से विशिष्ट अश्विनी कुमार ही हैं। कौन रथ वेगवान अश्व युक्त और शीघ्रगामी है, जिसको सूर्य की पुत्री ने स्वीकार किया था?[ऋग्वेद 4.43.2]
हमको कौन से देवता सुख देंगे? हमारे यज्ञ में कौन से देवता सर्वाधिक आते हैं? देवगणों में कौन से देवता हमको कल्याणप्रद सिद्ध होंगे? किसका रथ सुन्दर अश्वों से युक्त और अधिक वेगवान है, जिसका सूर्य की पुत्री सूर्या ने सम्मान किया था?
Which demigods-deities will grant us comforts? Which demigods-deities visit this Yagy as compared to others? Only Ashwani Kumars possess these qualities. Which charioteer is more accelerated-dynamic and moves quickly, who was accepted-revered by the daughter of Sun?
मक्षू हि ष्मा गच्छथ ईवतो द्यूनिन्द्रो न शक्तिं परितक्म्यायाम्।
दिव आजाता दिव्या सुपर्णा कया शचीनां भवथः शचिष्ठा
रात्रि के व्यतीत होने पर इन्द्र देव जिस प्रकार से अपनी शक्ति प्रदर्शित करते हैं, हे गमनशील अश्विनी कुमारों! आप दोनों भी उसी प्रकार से अभिषवण काल में गमन करें। आप दोनों ने द्युलोक से आगमन किया है। आप दोनों दिव्य और शोभन गति से विशिष्ट है। आप दोनों के कर्मों के बीच में कौन कर्म सर्वापेक्षा श्रेष्ठ हैं?[ऋग्वेद 4.43.3]
उपर्युक्त कर्मों के करने वाले अश्विनी कुमार ही हैं। हे अश्विनी कुमारों! रात्रि के अवसान होने पर इन्द्र देव जैसे अपनी वीरता दिखाते हैं, वैसे ही तुम दोनों सोमाभिषव के समय पधारो। तुम दोनों आकाश मार्ग से पधारते हो। तुम सुन्दर गति वाले तथा अदभुत गुण वाले हो। तुम्हारे कार्यों से कौन सा कार्य सबसे अधिक श्रेष्ठ है?
Hey Ashwani Kumars! You should also establish your might like Indr Dev who demonstrate it, after the night. Both of you have come from the heavens & possess divine movements. Which of your deeds-endeavours is best?
का वां भूदुपमातिः कया न आश्विना गमथो हूयमाना।
को वां महश्चित्त्यजसो अभीक उरुष्यतं माध्वी दस्रा न ऊती
कौन प्रार्थना आप दोनों के समान हो सकती है? जिस स्तुति द्वारा बुलाये जाने पर आप दोनों हमारे निकट आगमन करेंगे? कौन आप दोनों के महान क्रोध को सहन कर सकता है? हे मधुर जल के सृष्टिकर्ता एवं शत्रु विनाशक अश्विनी कुमारों! आप दोनों हम लोगों को आश्रय प्रदान कर रक्षित करें।[ऋग्वेद 4.43.4]
तुम दोनों के उपयुक्त कौन सी वंदना है? तुम किस श्लोक द्वारा आमंत्रित किये जाने पर आओगे? तुम दोनों के भयंकर क्रोध को सहन करने की शक्ति किसमें है? हे मृदुजल के रचित करने वालों! तुम शत्रुओं का पतन करने वाले हो, तुम अपनी शरण प्रदान करके हमारी सुरक्षा करो।
Which prayers suits you? which prayers will bring you to us? Which of you can tolerate furiosity? Hey creators of sweet waters, destroyers of enemies Ashwani Kumars! Both of you grant us protection.
उरु वां रथः परि नक्षति द्यामा यत्समुद्रादभि वर्तते वाम्।
मध्वा माध्वी मधु वां प्रुषायन्यत्सी वां पृक्षो भूरजन्त पक्काः
हे अश्विनी कुमारों! आप दोनों का रथ द्युलोक के चारों ओर विस्तृत भाव से गमन करता से आप दोनों के अभिमुख गमन करता है। आप दोनों के लिए पके जौ के साथ सोमरस संयोजित हुआ है। हे मधुर जल के सृष्टिकर्ता, शत्रु विनाशक अश्विनी कुमारो! अध्वर्युगण मधुर दुग्ध के साथ सोमरस को मिश्रित कर रहे हैं। है।[ऋग्वेद 4.43.5] 
हे अश्विनी कुमारों! तुम्हारा रथ अम्बर से चतुर्दिक अधिकाधिक विचरणशील है। यह समुद्र में भी चलता है। तुम्हारे लिए परिपक्व जौं के समान सोम रस मिला हुआ है। तुम मधुरजल के उत्पन्न करने वाले हो और शत्रुओं का विनाश करते हो। यह अध्वर्यु तुम्हारे लिए सोम रस में दूध मिश्रित करते हैं।
Hey Ashwani Kumars! Your charoite roams-move all over the space-sky & in the four directions. It drives over the ocean as well. Somras has been extracted out of ripe barley for you. Hey creator of sweet waters and destructors of the enemies, Ashwani Kumars! The priests are mixing Somras with milk for you.
सिन्धुर्ह वां रसया सिञ्चदश्वान्घृणा वयोऽरुषासः परि ग्मन्।
तदू षु वामजिरं चेति यानं येन पती भवथः सूर्यायाः
मेघ या उदक रस द्वारा आप दोनों के अश्वों का सेवन हुआ है। पक्षी सदृश अश्व गण द्वारा दीप्यमान होकर गमन करते हैं। जिस रथ द्वारा आप दोनों सूर्य के पालन करने वाले हुए, आप दोनों का वह शीघ्रगामी रथ प्रसिद्ध है।[ऋग्वेद 4.43.6]
मेघ द्वारा तुम्हारे अश्वों को अभिषिक्त किया है। ज्योति से ज्योतिवान ये तुम्हारे अश्व पक्षियों के समान चलते हैं जिस रथ के द्वारा तुम दोनों ने सूर्या की सुरक्षा की थी, तुम दोनों का वह विख्याति ग्रहण रथ शीघ्रता से चलने वाला है।
Your horses have been anointed-crowned with rain waters. The radiant horses move like the birds.  Your fast moving charoite with which you protected the daughter of Sun is famous.
इहेह यद्वां समना पपृक्षे सेयमस्मे सुमतिर्वाजरत्ना।
उरुष्यतं जरितारं युवं ह श्रितः कामो नासत्या युवद्रिक्
हे अश्विनी कुमारों! इस यज्ञ में आप दोनों समान मन वाले हैं। हम स्तुति द्वारा आप दोनों को संयुक्त करते हैं। वह शोभन प्रार्थना हम लोगों के लिए फलवती हो। हे रमणीय अन्न वाले अश्विनी कुमारो ! आप दोनों स्तोता की रक्षा करें। हे नासत्यद्वय! हमारी अभिलाषा आप दोनों के निकट जाने से पूर्ण होती है।[ऋग्वेद 4.43.7]
हे अश्विनी कुमारों! तुम दोनों एक समान हो। इस यज्ञ में हम स्तुति द्वारा तुम दोनों को समान मानते हुए एकत्र आहूत करते हैं। यह सुन्दर स्तुति हमको श्रेष्ठ जल प्रदान करने वाली हो। हे अश्विद्वय! तुम शोभन अन्न से युक्त हो। हम स्तोताओं की रक्षा करो। हमारी अभिलाषा तम्हारे समीप पहुँचते ही पूरी हो जाती है।
Hey Ashwani Kumars! Both of you have the same feelings-respect for this Yagy. We make offerings for you in this Yagy considering you as one entity. Hey possessors of desired food grains Ashwani Kumars! You both protect the Stota-Ritviz. Hey duo! our desires are accomplished as soon as we reach-approach you.(19.04.2023)
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (44) :: ऋषि :- पुरुमीलहाजमीलह सौहोत्रदेवता :- अश्विनी कुमार, छन्द :- त्रिष्टुप।
तं वां रथं वयमद्या हुवेम पृथुज्रयमश्विना संगतिं गोः।
यः सूर्यां वहति वन्थुरायुर्गिर्वाहसं पुरुतमं वसूयुम्
हे अश्विनी कुमारों! हम आज आपके विख्यात वेग वाले और गोसंगत गौप्रद रथ का आह्वान करते हैं। वह रथ सूर्या को धारित करता है। उसके निवासाधारभूत काष्ठ बंधुर है। वह रथ स्तुतियों को ढोने वाला, विशाल और धनवान है।[ऋग्वेद 4.44.1]
हे अश्विद्वय! हम तुम्हारे गौ दाता एवं प्रसिद्ध गतिवान रथ को पुकारते हैं। वह सूर्य को शरण दे चुके हैं। उसमें बैठने की जगह लकड़ी की बनी है। तुम्हारा वह रथ वंदनाओं को वहन करने वाला तथा अन्न व धन से परिपूर्ण परमऐश्वर्य वाला है।
Hey Ashwani Kumars! We invoke your charoite which is famous for its high speed and grants cows. It bears Surya, the daughter of Sun. Its seats are made up of wood. It carries prayers-Strotr, is large-spacious and possess grandeur.
युवं श्रियमश्विना देवता तां दिवो नपाता वनथः शचीभिः।
युवोर्वपुरभि पृक्षः सचन्ते वहन्ति यत्ककुहासो रथे वाम्
हे आदित्य या द्युलोक के पुत्र स्थानीय अश्विनी कुमारों! आप दोनों देवता है। आप दोनों कर्म द्वारा प्रसिद्ध शोभा को प्राप्त करते हैं। आप दोनों के शरीर को सोमरस प्राप्त करता है। महान अश्व आप दोनों के रथ का वहन करता है।[ऋग्वेद 4.44.2]
हे अश्विनी कुमारों! तुम दोनों ही देवता हो। तुम दोनों ही अपने श्रेष्ठ कर्म द्वारा सुशोभित होते हो। तुम दोनों के शरीर में सोमरस व्याप्त रहता है। तुम्हारे रथ को उत्तम अश्व खींचते हैं।
Hey son of Sun, residents of heavens, Ashwani Kumars! Both of you are demigods. You are known for your great deeds-endeavours. You are nourished with Somras. Excellent horses pull your charoite.
को वामद्या करते रातहव्य ऊतये वा सुतपेयाय वार्कैः।
ऋतस्य वा वनुषे पूर्व्याय नमो येमानो अश्विना ववर्तत्
कौन सोम दाता याजक गण, आज रक्षा के लिए, सोमपान के लिए, यज्ञ की पूर्ति के लिए अथवा सम्भजन के लिए आप दोनों की प्रार्थना करता है? हे अश्विनी कुमारों! कौन नमस्कार करने वाला आप दोनों को यज्ञ के लिए प्रवृत्त करता है।[ऋग्वेद 4.44.3]
हे अश्विद्वय! सोम देने वाला कौन सा यजमान सोमपान के लिए और अपनी सुरक्षा अभिलाषा करता हुआ तुम्हारी वंदना करता है। कौन सा नमस्कारकर्त्ता यजमान तुम दोनों को अनुष्ठान की ओर पुकारता है?
Hey Ashwani Kumars! Who is the needy, who offer you Somras calling-inviting you for the completion of Yagy and his own safety? Hey Ashwani Kumars! Which Ritviz-devotee invite you in his Yagy?
हिरण्ययेन पुरुभू रथेनेमं यज्ञं नासत्योप यातम्।
पिबाथ इन्मधुनः सोम्यस्य दधथो रत्नं विधते जनाय
हे नासत्यद्वय! आप दोनों बहुविध है। इस यज्ञ में हिरण्मय रथ द्वारा आप दोनों पधारें। मधुर सोमरस का पान करें और पुरुषार्थी मनुष्यों को रमणीय धन प्रदान करें।[ऋग्वेद 4.44.4]
पुरुषार्थी :: पुरुषार्थ करने वाला, उद्योगी; effort maker, endeavourers.
हे अश्विनी कुमारों! तुम दोनों अनेक कार्य करने वाले हो। तुम अपने स्वर्ण से परिपूर्ण रथ युक्त इस यज्ञ में पधारो और मधुर-मधुर सोमरस का पान करो। हम तपिस्वयों को सुन्दन धन प्रदान करो।
Hey Ashwani Kumars! You carry out multiple tasks. Join the Yagy by coming here in your charoite carrying gold. Enjoy sweet Somras and provide gold to the endeavourers.
आ नो यातं दिवो अच्छा पृथिव्या हिरण्ययेन सुवृता रथेन।
मा वामन्ये नि यमन्देवयन्तः सं यद्ददे नाभिः पूर्व्या वाम्
शोभन आवर्तन वाले हिरण्मय रथ द्वारा आप दोनों द्युलोक या पृथ्वीलोक से हमारे सम्मुख आगमन करते हैं। आप दोनों की इच्छा करने वाले दूसरे याजक गण आप दोनों को नहीं रोक सकते, इसलिए हमने पूर्व में ही प्रार्थना अर्पित की है।[ऋग्वेद 4.44.5]
हे अश्विद्वय! तुम अपने स्वर्णिम रथ से नभ से हमारे समीप पधारो। तुम्हें आहुत करने वाले अन्य यजमान तुम्हें यहाँ आने से रोक न लें, इसलिए हमने अपनी प्रार्थनाओं को पहले ही निवेदन कर दिया है।
Hey Ashwani Kumars! You travel to us in your golden charoite either from the heaven or the earth. Other Ritviz-devotees can not stop you from coming here since we had already requested you.
नू नो रयिं पुरुवीरं बृहन्तं दस्रा मिमाथामुभयेष्वस्मे।
नरो यद्वामश्विना स्तोममावन्त्सधस्तुतिमाजमीळ्हासो अग्मन्
हे वस्त्रद्वय! आप लोग हम दोनों को शीघ्र ही बहुपुत्र युक्त प्रभूत धन प्रदान करें। हे अश्विनी कुमारों! पुरुमीळ्ह के ऋत्विकों ने आप दोनों को स्तोत्र द्वारा प्राप्त किया एवं अजमीळ्ह के ऋत्विकों की प्रार्थना भी उसी के साथ संगत हुई।[ऋग्वेद 4.44.6]
हे अश्विनी कुमारों! तुम दोनों हमको अनेक संतान युक्त धन प्रदान करो। मुझ पुरमी हरण के ऋत्विजों ने अपने श्लोक की शक्ति से तुमको यहाँ पुकारा और अजमीहण के ऋत्विजों ने जो श्लोक प्रस्तुत किया है उसके बल भी इसी के साथ मिले हुए हैं।
Hey Ashwani Kumars! Grant us several sons and a lot of wealth. The Ritviz of Purumilh attained you through the Strotr & the Ritviz of Ajmilh too, did the same.
इहेह यद्वां समना पपृक्षे सेयमस्मे सुमतिर्वाजरत्ना।
उरुष्यतं जरितारं युवं ह श्रितः कामो नासत्या युवद्रिक्
हे अश्विनी कुमारों! इस यज्ञ में आप दोनों समान विचार वाले हैं। हम जिन स्तुति द्वारा आप दोनों को संयुक्त करते हैं, वह शोभन प्रार्थना हम लोगों के लिए फलवती हो। हे रमणीय अन्न वाले अश्विनी कुमारों! आप दोनों स्तोता की रक्षा करें। हे नासत्यद्वय! हमारी कामनाएँ आप दोनों के निकट जाने से पूर्ण होती है।[ऋग्वेद 4.44.7]
हे अश्विनी कुमारों! तुम दोनों इस अनुष्ठान में समान हृदय वाले बनो! हम जिस श्लोक द्वारा तुम दोनों को एक करते हैं उस सुन्दर स्त्रोत द्वारा हम तुम्हारे लिए फल वाले हो जाओ। तुम दोनों उत्तम अन्न वाले हो। मुझ वंदना करने वाले की तुम सुरक्षा करो। हमारी अभिलाषा तुम्हारे समीप पहुंचने से पूर्व हो जाती है।
Hey Ashwani Kumars! You have the same feelings, thoughts, ideas for this Yagy. We connects both of you with prayers. Let our prayers be successful. You possess excellent food grains. Protect the worshipers. You accomplish our desires.(20.04.2023)
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (45) :: ऋषि :- वामदेव गौतम, देवता :- अश्विनी कुमार, छन्द :- जगती, त्रिष्टुप।
एष स्य भानुरुदियर्ति युज्यते रथः परिज्मा दिवो अस्य सानवि।
पृक्षासो अस्मिन्मिथुना अधि त्रयो दृतिस्तुरीयो मधुनो वि रप्शते
हे अश्विनी कुमारों! दीप्तिमान आदित्य उदित होते हैं। आप दोनों का रथ चारों ओर गमन करता है। वह द्युतिमान सूर्य देव के साथ ऊँचे स्थान में मिलते हैं। इस रथ के ऊपरी भाग में मिथुनी भूत त्रिविध (अशन, पान, खाद) अन्न है एवं सोमरस पूर्ण चर्ममय पात्र चतुर्थ रूप में शोभा पाता है।[ऋग्वेद 4.45.1]
ज्योर्तिमान सूर्य देव उदित हो रहे हैं। अश्विनी कुमारों का महान रथ सब ओर विचरण करता है। वह तेजस्वी रथ से जुड़ा रहता है। इस रथ से ऊपरी तरफ विविध अन्न है तथा सोम रस से भरा हुआ चमस चतुर्थ रूप से सुशोभित है।
Hey Ashwani Kumars! Radiant Sun rises. Your charoite moves in all directions. They meet shinning Sun at the elevated places. The upper segment of the charoite contains different types of food grains. Your Chamas-pot is full of Somras.
उद्वां पृक्षासो मधुमन्त ईरते रथा अश्वास उषसो व्युष्टिषु।
अपोर्णुवन्तस्तम आ परीवृतं स्व १ र्ण शुक्रं तन्वन्त आ रजः
उषा के आरम्भ काल में आप दोनों का त्रिविधान्नवान, सोमरसोपेत, अश्व युक्त रथ चारों ओर, व्याप्त अन्धकार को दूर करता हुआ और सूर्य के तुल्य दीप्त तेज को विस्तारित करता हुआ उन्मुख होकर गमन करता है।[ऋग्वेद 4.45.2]
हे अश्विद्वय! उषा आरम्भ में तुम्हारा सुंदर विविध अन्न और सोम से युक्त रथ सभी ओर अंधकार को दूर करता हुआ सूर्य के समान उज्जवल प्रकाश को फैलाता हुआ ऊपर की ओर उड़ता है।
Hey Ashwani Kumars your rises up, full of three kinds of food grains, possessing Somras, when the Usha-day break start removing darkness, shinning like the Sun.
मध्वः पिबतं मधुपेभिरासभिरुत प्रियं मधुने युञ्जाथां रथम्।
आ वर्तनिं मधुना जिन्वथस्पथो दृतिं वहेथे मधुमन्तमश्विना
सोमपान करने योग्य मुख द्वारा आप दोनों सोमरस का पान करें। सोमरस के लाभ के लिए प्रिय रथ की योजना करें और याजक के घर में पधारें। गमनमार्ग को मधुर रस से परिपूर्ण करें और सोमरस से पूर्ण पात्र को धारित करें।[ऋग्वेद 4.45.3]
हे अश्विद्वय! तुम अपने सोम पीने के अभ्यासी मुख द्वारा सोम रस पियो। सोमरस का पान करने हेतु तुम अपने रथ को जोड़कर यजमानों के ग्रह में लाओ। अपने विचरण मार्ग को सोमरस की इच्छा करते हुए शीघ्र पूर्ण कर लो और सोमपूर्ण पात्र को प्राप्त करो।
Hey Ashwani Kumars! You pour Somras in your mouth, being experienced in it. Come to the house of the Ritviz for drinking Somras, in your charoite. Cover the distance quickly and hold the pot full of Somras.
हंसासो ये वां मधुमन्तो अस्त्रिधो हिरण्यपर्णा उहुव उषर्बुधः।
उदप्रुतो मन्दिनो मन्दिनिस्पृशो मध्वो न मक्षः सवनानि गच्छथः
आप दोनों के पास शीघ्रगामी, माधुर्य युक्त, द्रोह रहित, हिरण्मय, पक्ष विशिष्ट, वहनशील, उषाकाल में जागरण कारी, जल प्रेरक, हर्ष युक्त एवं सोम स्पर्शी अश्व हैं, जिनके द्वारा आप लोग हम लोगों के सवनों में आगमन करते हैं, जैसे मधुमक्खियाँ मधु के समीप गमन करती हैं।[ऋग्वेद 4.45.4]
हे अश्विद्वय! तुम्हारे निकट तीव्र गति वाले, मधुरिमा से युक्त, द्वेष से शून्य, सुवर्ण के समान तेज वाले, पंख से युक्त, उषाकाल में चैतन्य होने वाले जलों को प्रेरित करने वाले एवं सोम को छूने की कामना वाले सुन्दर अश्व हैं। जिनके द्वारा तुम मधु मक्खी के मधु के पास जाने के समान हमारे यज्ञों में आगमन करते हो।
You possess fast moving beautiful horses, touching Som, free from envy, capable of carrying, inspiring water, in all segments of the day, riding golden charoite, the way honey bee move to honey, 
स्वध्वरासो मधुमन्तो अग्नय उस्रा जरन्ते प्रति वस्तोरश्विना।
यन्निक्तहस्तर णिर्विचक्षणः सोमं सुषाव मधुमन्तमद्रिभिः
जब कर्म करने वाले अध्वर्युगण अभिमंत्रित जल से हस्त शोधन करते हुए, प्रस्तर खण्ड द्वारा मधु युक्त सोमरस का अभिषव करते हैं, तब यज्ञ के साधनभूत सोमवान गार्हपत्यादि अग्नि देव एकत्र निवासकारी अश्विनी कुमारों प्रार्थना करते हैं।[ऋग्वेद 4.45.5]
कर्मवान अध्वर्यु जब अभिमंत्रित जल के द्वारा हाथ धोकर पाषाण से मधुर सोम को कूटते हो, तब अनुष्ठान के साधन रूपी गार्हपत्यादि अग्नि अश्विनी कुमारों का पूजन करते हैं।
Endeavourer priests cleanse the hands with enchanted water, extract the Somras by crushing it with stones, mixes it with honey, Garhpaty & other forms of Agni pray Ashwani Kumars-you.
आकेनिपासो अहभिर्दविध्वतः स्व१र्ण शुक्रं तन्वन्त आ रजः। सूरश्चिदश्वान्युयुजान ईयते विश्वाँ अनु स्वधया चेतथस्पथः
समीप में अवतरित होने वाली रश्मियाँ दिवस द्वारा अन्धकार को नाश करती हुई सूर्य के तुल्य दीप्त तेज को विस्तारित करती हैं। सूर्य देव अश्व योजना करके गमन करते हैं। हे अश्विनी कुमारों! आप दोनों सोमरस के साथ उनका अनुगमन करके समस्त पथ प्रज्ञापित करें।[ऋग्वेद 4.45.6]
निकट में पड़ती हुई रश्मि दिन के द्वारा अंधेरे को समाप्त करती और सूर्य के समान ज्योति को फैलाती है। उस समय सूर्य अपने गृह पर चढ़कर चलते हैं। हे अश्विनी कुमारों! तुम दोनों सोमरस के साथ उनके चलते हुए सभी पथ को पूर्ण करो।
Radiations created around you, kill darkness like the Sun. Sun harness his horses, ride the charoite and move. Hey Ashwani Kumars! You both follow his path with Somras.
प्र वामवोचमश्विना धियन्धा रथः स्वश्वो अजरो यो अस्ति।
येन सद्यः परि रजांसि याथो हविष्मन्तं तरणिं भोजमच्छ
हे अश्विनी कुमारों! यज्ञ करने वाले हम आप दोनों की प्रार्थना करते हैं। आप दोनों का सुन्दर अश्व युक्त यह जो नित्य तरुण रथ है एवं जिस रथ द्वारा आप दोनों क्षण मात्र में तीनों लोकों का परिभ्रमण करते हैं, उसी रथ द्वारा आप दोनों हव्य युक्त, तीनों लोकों का शीघ्र अतिवाही एवं भोगप्रद यज्ञ में आगमन करें।[ऋग्वेद 4.45.7]
हे अश्विद्वय! हम याज्ञिकगण तुम दोनों की वंदना करते हैं। जो तुम्हारा सुन्दर अश्वों से परिपूर्ण नित्य नवीन रथ है, जिस रथ के द्वारा तुम दोनों लोकों का विचरण करते हो, अपने उस रथ से युक्त तुम हविरत्न वाले हमारे अनुष्ठान में पधारो।
Hey Ashwani Kumars! We the organisers of the Yagy request your presence in it. Come & join the Yagy associated with offerings, riding your beautiful charoite, which is always new, in which you travel the three abodes in few moments.(22.04.2023)
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (46) :: ऋषि :- वामदेव गौतम, देवता :-  इन्द्र देव, वायु देव, छन्द :- गायत्री
अग्रं पिबा मधूनां सुतं वायो दिविष्टिषु। त्वं हि पूर्वपा असि
हे वायु देव! स्वर्ग प्रापक यज्ञ में आप सर्वप्रथम अभिषुत सोमरस का पान करें; क्योंकि आप सबसे पहले सोमरस का पान करने वाले हैं।[ऋग्वेद 4.46.1]
हे वायु! स्वर्ग में स्थान बनाने वाले अनुष्ठान में इस अभिषुत सोम रस को आकर पीओ क्योंकि तुम सबसे पहले सोमरस का पान करने वाले हो।
Hey Vayu Dev! Drink this freshly extracted Somras first of all, since you are one who clears the way to heavens and you are entitled to drink it first.
शतेना नो अभिष्टिभिर्नियुत्वाँ इन्द्रसारथिः। वायो सुतस्य तृम्पतम्
हे वायु देव! आप नियुद्वान् हैं और इन्द्र देव आपके सारथि हैं। आप अपरिमित कामनाओं को पूर्ण करने के लिए आगमन करें। आप अभिषुत सोमरस का पान करें।[ऋग्वेद 4.46.2]
हे वायु देव! हे इन्द्र देव! तुम दोनों सोमपान के द्वारा संतुष्टि को प्राप्त हो जाओ। हे वायु! तुम संसार के कल्याणकारी कर्म में नियुक्त हुए हो। तुम इन्द्र देव के सारथी होकर हमारी दृढ़ कामनाओं को पूरा करने के लिए यहाँ आओ।
Hey Vayu Dev! Indr Dev is your charioteer & you are appointed to perform the welfare of the humans-world.  Invoke to accomplish our unfulfilled desires. Drink the freshly extracted Somras.
आ वां सहस्रं हरय इन्द्रवायू अभि प्रयः। वहन्तु सोमपीतये
हे इन्द्र देव और वायु देव! आप दोनों को हजारों संख्या वाले अश्व युक्त रथ द्रुतगति से सोमपान के लिए ले आवें।[ऋग्वेद 4.46.3]
हे इन्द्र और वायु! तुम दोनों को हजारों अश्व शीघ्रतापूर्वक सोमपान के लिए यहाँ ले आएँ।
Hey Indr Dev & Vayu Dev! Come here fast, riding the charoite pulled by thousands of horses, to drink the Somras.
रथं हिरण्यवन्धुरमिन्द्रवायू स्वध्वरम्। आ हि स्थाथो दिविस्पृशम्
हे इन्द्र देव और वायु देव! आप दोनों हिरण्मय निवासाधार काष्ठ से युक्त द्युलोक स्पर्शी और शोभन यज्ञशाली रथ पर आरोहण करें।[ऋग्वेद 4.46.4]
हे इन्द्रदेव और वायु! तुम दोनों स्वर्ण के उज्जवल काष्ठ के मूल वाले तथा अम्बर से तुम दोनों ही महान शक्तिशाली रथ से ही हवि प्रदान करने वाले यजमान के निकट पधारो।
Hey Indr Dev & Vayu Dev! Come to the Yagy of the Ritviz, for accepting offerings riding the charoite in which wood is studded with gold, from the heavens.
रथेन पृथुपाजसा दाश्वांसमुप गच्छतम्। इन्द्रवायू इहा गतम्
हे इन्द्र देव और वायु देव! आप दोनों प्रभूत बल सम्पन्न रथ द्वारा हव्य दाता याजक गण के निकट आगमन करें तथा इस यज्ञ मण्डप में पधारें।[ऋग्वेद 4.46.5]
तुम दोनों यजमान के लिए ही इस महान अनुष्ठान में पधारो।
Hey Indr Dev! Hey Vayu Dev! Visit the Yagy of the Ritviz making offerings, riding the charoite associated with your might.  
इन्द्रवायू अयं सुतस्तं देवेभिः सजोषसा। पिबतं दाशुषो गृहे
इन्द्र देव और वायु देव! यह सोमरस आपके लिए अभिषुत किया गया है। आप दोनों देवताओं के साथ समान प्रीति युक्त होकर हव्य दाता याजक गण की यज्ञशाला में उसका पान करें।[ऋग्वेद 4.46.6]
हे इन्द्र देव! हे वायो! यह प्रसिद्ध सोम रखा है। तुम दोनों समान प्रीति वाले होकर हविदाता यजमान के यज्ञ स्थल में आकार सोम रस पीओ।
Hey Indr Dev! Hey Vayu Dev! This Somras has been extracted for you. Drink it along with the demigods-deities happily, in the Yagy Shala-house of the Ritviz.
इह प्रयाणमस्तु वामिन्द्रवायू विमोचनम्। इह वां सोमपीतये
हे इन्द्र देव और वायु देव! इस यज्ञ में आप दोनों का आगमन हो। यहाँ पधार कर सोमपान के निमित्त आप दोनों अपने अश्वों को रथ से मुक्त करें।[ऋग्वेद 4.46.7]
हे इन्द्रदेव! हे वायो! इस अनुष्ठान में तुम्हें सोमरस पान करने के लिए अश्व खोल दिए जाएँ। तुम दोनों इस यज्ञ स्थल में आओ।
Hey Indr Dev! Hey Vayu Dev! Join this Yagy. Come here and release your horses from the charoite.(23.04.2023)
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (47) :: ऋषि :- वामदेव गौतम, देवता :-  इन्द्र देव, वायु देव, छन्द :- गायत्री
वायो शुक्रो अयामि ते मध्वो अग्रं दिविष्टिषु।
आ याहि सोमपीतये स्पार्हो देव नियुत्वता
हे वायु देव! व्रतचर्यादि के द्वारा दीप्त-पवित्र होकर हम द्युलोक जाने की अभिलाषा से आपके लिए मधुर सोमरस का प्रथम आनयन करते हैं। हे वायु देव! आप स्पृहणीय हैं। आप अपने अश्व वाहन द्वारा सोमपान के लिए यहाँ आगमन करें।[ऋग्वेद 4.47.1]
हे वायो! महान कर्मानुष्ठानों द्वारा शुद्ध बने हुए हम अद्भुत संसार प्राप्ति की इच्छा करते हुए पहले तुम्हारे लिए ही सोमरस को लाते हैं। तुम अभिलाषा के योग्य हो। अपने वाहन के युक्त सोमपान करने के लिए उस स्थान से पधारो।
Hey Vayu Dev! We extract the sweet Somras with great efforts for you, adopting penances, fasts etc. You are desirable. Ride your charoite deploying horses and come here to drink Somras.
इन्द्रश्च वायवेषां सोमानां पीतिमर्हथः।
युवां हि यन्तीन्दवो निम्नमापो न सध्र्यक्
हे वायु देव! आप और इन्द्र देव इस गृहीत सोमरस के पान योग्य हो, आप दोनों ही सोमरस को प्राप्त करते हैं; क्योंकि जल जिस प्रकार से गर्त की ओर गमन करता है, उसी प्रकार से सकल सोमरस आप दोनों के अभिमुख गमन करते हैं।[ऋग्वेद 4.47.2]
हे वायो! उस ग्रहण किये हुए सोम पीने के पात्र तुम हो और इन्द्रदेव हैं। जैसे जल गड्ढे की ओर जाता है, वैसे ही सभी प्रकार के सोम तुम्हारे समीप जाते हैं।
Hey Vayu Dev! You and Indr dev are qualified to drink Somras. The way water moves to low lying areas, all sorts of Somras comes to you automatically.
वायविन्द्रश्च शुष्मिणा सरथं शवसस्पती।
नियुत्वन्ता न ऊतय आ यातं सोमपीतये
हे वायु देव! आप ही इन्द्र देव हैं। आप दोनों बल के स्वामी है। आप दोनों पराक्रमशाली और नियुद्गण से युक्त हैं। आप दोनों एक ही रथ पर आरोहण करके हम लोगों को आश्रय प्रदान करने के लिए और सोमरस का पान करने के लिए यहाँ पधारें।[ऋग्वेद 4.47.3]
तुम दोनों अत्यन्त शक्तिशाली एवं अश्वों से युक्त हो। तुम दोनों एक ही रथ पर विराजमान होकर सोमरस का पान करो तथा हमें आश्रय प्रदान करने के लिए यहाँ पर पधारो।
Hey Vayu Dev! You are Indr Dev. Both of you are mighty and possess the horses. Ride the same charoite and come to us for drinking Somras and grant us asylum-protection.
या वां सन्ति पुरुस्पृहो नियुतो दाशुषे नरा। 
अस्मे ता यज्ञवाहसेन्द्रवायू नि यच्छतम्
हे नायक तथा यज्ञ वाहक इन्द्र देव और वायु देव! आप दोनों के पास अनेकों द्वारा कामना किए जाने योग्य जो अश्व हैं, उन अश्वों को मुझ दान देने वाले यजमान को प्रदान करें।[ऋग्वेद 4.47.4]
हे इन्द्रदेव और वायो! तुम दोनों ही यज्ञ हवन करने वालों एवं समस्त देवों में अग्रणी हो। हम तुमको हवि रत्न प्रदान करने वाले यजमान हैं। तुम्हारे पास अभिलाषा के योग्य जो अश्व हैं उन्हें हमें प्रदान करो।
Hey leaders and supporter of the Yagy Vayu Dev & Indr Dev! Grant me-the Ritviz, the horses which several people desire to have-possess.(23.04.2023)
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (48) :: ऋषि :- वामदेव गौतम, देवता :-  वायु देव, छन्द :- अनुष्टुप्
विहि होत्रा अवीता विपो न रायो अर्यः।
वायवा चन्द्रेण रथेन याहि सुतस्य पीतये
हे वायु देव! शत्रुओं को कम्पायमान करने वालों को राजा की तरह आप पूर्व ही दूसरे के द्वारा अपीत सोमरस का पान करें एवं स्तोताओं के धन का सम्पादन करें। हे वायु देव! आप सोमपान के लिए शीतलता दायक रथ द्वारा पधारें।[ऋग्वेद 4.48.1]
हे वायो! शत्रुओं को कम्पित करने वाले सम्राट के तुल्य तुम अन्यों के द्वारा व पान किये गये सोमरस को पूर्व ही पान करो और प्रार्थना करने वालों के लिए धनों को ग्रहण कराओ। तुम अपने कल्याणकारी रथ के द्वारा सोम को पान करने के लिए यहाँ पधारो।
Hey Vayu Dev! Arrive here in your charoite, which is cooled and trembles-hake the enemy, to drink Somras prior to others and grant wealth-money to the hosts-organisers of the Yagy.
निर्युवाणो अशस्तीर्नियुत्वाँ इन्द्रसारथिः।
वायवा चन्द्रेण रथेन याहि सुतस्य पीतये
हे वायु देव! आप अभिशस्ति का नि:शेष नियोग करते है। आप नियुद्गण से युक्त हैं और इन्द्र देव आपके सारथि हैं। हे वायु देव! आप सोमपान के लिए आह्लादकर रथ द्वारा पधारें।[ऋग्वेद 4.48.2]
हे वायु! तुम इन्द्र देव सहित सारथी के रूप में सुवर्णमय रथ द्वारा अश्वादि से युक्त होकर सौम्य स्वभाव वाले शक्तिवान प्राणियों से युक्त तथा अनेक दुष्ट प्राणियों से परे हो। तुम हर्षकारी सोम को पीने के लिए यहाँ पधारो।
Hey Vayu Dev! Arrive here to drink stimulating Somras in your golden charoite driven by Indr Dev.
अनु कृष्णे वसुधिती येमाते विश्वपेशसा।
वायवा चन्द्रेण रथेन याहि सुतस्य पीतये
हे वायु देव! कृष्ण वर्ण, वसुओं की धात्री, विश्व रूपा द्यावा-पृथ्वी आपका अनुगमन करती है। हे वायु देव! आप सोमपान के लिए तेजस्वी रथ द्वारा पधारें।[ऋग्वेद 4.48.3]
हे वायु! काले रंग वाली, वसुओं को धारण करने वाली विश्वरूप अम्बर-धरा तुम्हारे पदचिह्नों पर चलती है। तुम अपने हर्षिता परिपूर्ण रथ के द्वारा सोम को पीने के लिए यहाँ विराजमान होओ।
Hey Vayu! Blackish heaven & earth constituting the universe, who supports the Vasus, follows you. Come to drink Somras in your radiant charoite.
वहन्तु त्वा मनोयुजो युक्तासो नवतिर्नव।
वायवा चन्द्रेण रथेन याहि सुतस्य पीतये
हे वायु देव! मन के तुल्य वेगवान, परस्पर संयुक्त, निन्यान्वें अश्व आपका वहन करते है। हे वायु देव! आप सोमपान के लिए आह्लादकर रथ द्वारा पधारें।[ऋग्वेद 4.48.4]
हे वायु! मन के समान वेगवान आपस में मिले हुए निन्यानवें अश्व तुम्हें यहाँ लाते हैं। तुम सोम पीने के लिए प्रसन्नतापूर्वक सुन्दर रथ पर पधारो।
Hey Vayu Dev! Come here to drink Somras producing joy-pleasure, in your charoite, supported by 99 horses, which moves as fast as the brain. 
वायो शतं हरीणां युवस्व पोष्याणाम्।
उत वा ते सहस्रिणो रथ आ यातु पाजसा
हे वायु देव! आप सैकड़ों सँख्या वाले पोषणीय अश्वों को रथ में नियोजित करें अथवा सहस्र संख्यक अश्वों को रथ में नियोजित करें। उनसे युक्त होकर आपका रथ वेग पूर्वक यहाँ आवें।[ऋग्वेद 4.48.5]
हे वायु! तुम सैकड़ों अश्वों को रथ में जोड़ो और उनके साथ यहाँ आओ।
Hey Vayu Dev! Let your charoite driven by hundred or thousands of well nourished-stout horses, running fast come here.(24.04.2023)
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (49) :: ऋषि :- वामदेव गौतम, देवता :- इन्द्र देव, बृहस्पति,  छन्द :- गायत्री।
इदं वामास्ये हविः प्रियमिन्द्राबृहस्पती। उक्थं मदश्च शस्यते
हे इन्द्र देव और बृहस्पति देव! आप दोनों के मुँह में हम इस प्रिय सोमरूप हवि का प्रक्षेप करते हैं। हम आप दोनों को उक्थ (शस्त्र) और मद जनक सोमरस प्रदान करते हैं।[ऋग्वेद 4.49.1]
हे इन्द्रदेव और बृहस्पति! तुम परमप्रिय सोमरूपी हविरत्न को तुम दोनों के मुख में डालते हैं। तुम दोनों को हम हर्षकारक सोमरस प्रदान करते हैं।
Hey Indr Dev & Brahaspati Dev! We pour Somras as offering in your mouth. Somras gives joy-pleasure.
अयं वां परि षिच्यते सोम इन्द्राबृहस्पती। चारुर्मदाय पीतये
हे इन्द्र देव और बृहस्पति देव ! आप दोनों के मुँह में पान के लिए और हर्ष के लिए यह मनोहर सोमरस भली-भाँति से दिया जाता है।[ऋग्वेद 4.49.2]
हे इन्द्रदेव और बृहस्पति! तुम दोनों की दृष्टि के लिए तथा पान करने के लिए वह सुस्वादु सोमरस हम तुम्हारे मुख में डालते हैं।
Hey Indr Dev & Brahaspati Dev! For your pleasure we provide you tasty Somras, to drink.
आ न इन्द्राबृहस्पती गृहमिन्द्रश्च गच्छतम्। सोमपा सोमपीतये
हे सोमरस पान करने वाले इन्द्र देव और बृहस्पति देव! आप दोनों सोमरस पान के लिए हमारे यज्ञगृह में पधारें।[ऋग्वेद 4.49.3]
हे इन्द्र देव और बृहस्पति! आप दोनों सोमरस पीने वाले हो। आप दोनों हमारे यज्ञ भवन में सोम पीने के लिए आओ।
Somras drinking Indr Dev & Brahaspati Dev! Visit our Yagy site to drink Somras.
अस्मे इन्द्राबृहस्पती रयिं धत्तं शतग्विनम्। अश्वावन्तं सहस्रिणम्
हे इन्द्र देव और बृहस्पति देव! आप दोनों हमें सैकड़ों गौएँ और हजारों अश्वों से युक्त ऐश्वर्य प्रदान करें।[ऋग्वेद 4.49.4]
हे इन्द्र और बृहस्पति! आप दोनों ही हमें सैकड़ों गायों और हजारों अश्वों से युक्त धन प्रदान करो।
Hey Indr Dev & Brahaspati Dev! Grant us grandeur constituting of hundreds of cows & thousands of horses.
इन्द्राबृहस्पती वयं सुते गीर्भिर्हवामहे। अस्य सोमस्य पीतये
हे इन्द्र देव और बृहस्पति देव! सोमरस के अभिषुत होने पर हम स्तुति द्वारा आप दोनों का सोमरस पान के लिए आह्वान करते हैं।[ऋग्वेद 4.49.5]
हे इन्द्र और बृहस्पते! हम तुम्हें सोम रस पीने के लिए बुलाते हैं।
Hey Indr Dev & Brahaspati Dev! We invite-invoke your enjoying Somras.
सोममिन्द्राबृहस्पती पिबतं दाशुषो गृहे। मादयेथां तदोकसा
हे इन्द्र देव और बृहस्पति देव! आप दोनों हव्यदाता याजकगण के घर में सोमरसपान करें और उसके घर में निवास करके हर्षित होवें।
हे इन्द्र देव और बृहस्पते! हवि प्रदान करने वाले यजमान के गृह में निवास करते हुए आप दोनों सोम पान करके हर्षित हो जाओ।
Hey Indr Dev & Brahaspati Dev! Both of you enjoy Somras at the residence of the Ritviz and be pleased with them.(25.04.2023)
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (50) :: ऋषि :- वामदेव गौतम, देवता :- इन्द्र देव, बृहस्पति,  छन्द :- त्रिष्टुप्, जगती।
यस्तस्तम्भ सहसा वि ज्मो अन्तान्बृहस्पतिस्त्रिषधस्थो रवेण।
तं प्रत्नास ऋषयो दीध्यानाः पुरो विप्रा दधिरे मन्द्रजिह्वम्
वेद या यज्ञ के पालयिता बृहस्पति देव ने बलपूर्वक पृथ्वी की दसों दिशाओं को स्तम्भित किया। वे शब्द द्वारा तीनों स्थानों में वर्तमान हैं। उन आह्लादक जिह्वा विशिष्ट बृहस्पति देव को पुरातन, द्युतिमान मेधावियों ने पुरोभाग में स्थापित किया है।[ऋग्वेद 4.50.1]
वेद रक्षक बृहस्पति ने अपनी शक्ति से पृथ्वी की दसों दिशाओं को अपने वशीभूत किया। वे ध्वनि तीनों लोकों में विद्यमान हैं। उन विशिष्ट जिह्वा वाले, हर्षिता प्रदान करने वाले बृहस्पति को प्राचीन मुनियों ने पंडित के पद पर दृढ़ किया।
Protector-saviour of Veds Brahaspati stunned-controlled, over powered the all ten directions with might. They are present in three directions. The ancient scholars-enlightened established Brahaspati, who speaks pleasant, as a prime intellectual.
SAVIOUR :: रक्षक, मुक्तिदाता, उद्धारक, बचानेवाला; protector, defender, keeper, life saver, intercessor, rescuer, salvation, upholder, saver.
धुनेतयः सुप्रकेतं मदन्तो बृहस्पते अभि ये नस्ततस्त्रे। 
पृषन्तं सुप्रमदब्धपूर्वं बृहस्पते रक्षतादस्य योनिम्
हे प्रभूत प्रज्ञावान बृहस्पति देव! जिनकी गति शत्रुओं को कँपाने वाली है, जो आपको आनन्दित करते हैं और जो आपकी प्रार्थना करते हैं, उनके लिए आप फलप्रद, वर्द्धन शील और अहिंसित होते हुए आप उनके विस्तृत यज्ञ की रक्षा करते है।[ऋग्वेद 4.50.2]
हे मेधावी बृहस्पति देव! तुम्हारी गति से शत्रुगण भयभीत हो जाते हैं जो आपको पुष्ट करने के लिए स्तुति करते हैं, तुम उनके लिए फल देने वाले, वृद्धि करने वाले तथा हिंसा रहित होते हो और तुम उनके श्रेष्ठ यज्ञ के पालनकर्त्ता हो।
Hey intelligent Brahaspati Dev! Your mighty create-generate fear amongest the enemy, though you are non violent. You support the vast-large scale Yagy of those, who worship-pray you, reward them & lead to their progress.
 बृहस्पते या परमा परावत आ त ऋतस्पृशो नि षेदुः।
तुभ्यं खाता अवता अद्रिदुग्धा मध्वः श्चोतन्त्यभितो विरप्शम्
हे बृहस्पति देव! जो अत्यन्त दूरवर्ती स्वर्ग नामक उत्कृष्ट स्थान है, उस स्थान से आपके अश्व यज्ञ में आगमन करके प्रसन्न होते हैं। खात कूप के चारों तरफ से जिस प्रकार से जल स्राव होता है, उसी प्रकार से आपके चारों ओर स्तुतियों के साथ प्रस्तर द्वारा अभिषुत सोम मधुर रस का अभिसिञ्चन करता है।[ऋग्वेद 4.50.3]
हे बृहस्पति देव! जो दूरस्थ अद्भुत संसार है, वह अत्यन्त उत्कृष्ट है, वहाँ से तुम्हारे अश्व इस अनुष्ठान में आते हैं। जैसे खाद्य से भरे हुए कुएँ के चारों तरफ जल उबलता है, वैसे ही पाषाण द्वारा निष्पन्न मधुर सोमरस वंदनाओं के द्वारा तुम्हें चारों तरफ खींचता है।
Hey Brahaspati Dev! Horses become happy on being arrived from the distant heavens to the Yagy. The manner in which water discharges into the well, prayer-worship hover all around you and Somras obtained by crushing with stone, attracts you.
बृहस्पतिः प्रथमं जायमानो महो ज्योतिषः परमे व्योमन्।
सप्तास्यस्तुविजातो रवेण वि सप्तरश्मिरधमत्तमांसि
मन्त्राभिमानी बृहस्पति देव जब महान सूर्य देव के निरतिशय आकाश में प्रथम जायमान हुए, तब सप्त छन्दोमय मुख विशिष्ट होकर और बहु प्रकार से सम्भूत होकर तथा शब्द युक्त एवं गमनशील तेजो विशिष्ट होकर उन्होंने अन्धकार का नाश कर दिया।[ऋग्वेद 4.50.4]
जब वे मंत्रज्ञ बृहस्पति सूर्य मण्डल में प्रथम बार प्रकट हुए, तब मुख से सप्त छंदोमय तथा शब्द से युक्त होकर उन गमनशील बृहस्पति ने अपने तेज से तम को नष्ट किया।
When expert of Mantr Shakti Brahaspati Dev appeared in the solar system-space for the first time, he recited the seven couplets composed of six stanzas and spelled several other related words, acquiring radiance-aura and vanished the darkness.
स सुष्टुभा स ऋक्वता गणेन वलं रुरोज फलिगं रवेण।
बृहस्पतिरुस्त्रिया हव्यसूदः कनिक्रदद्वावशतीरुदाजत्
बृहस्पति देव ने दीप्ति युक्त और स्तुति शाली अङ्गिरा गण के साथ शब्द द्वारा बल नामक असुर को विनष्ट किया। उन्होंने शब्द करके भोग प्रदात्री और हव्य प्रेरिका गौओं को बाहर निकाला।[ऋग्वेद 4.50.5]
उन बृहस्पति ने वंदना करती हुई अंगिराओं सहित घोर शब्द द्वारा "बल" नामक असुर का संहार किया। उन्होंने शब्द से ही श्रेष्ठ दूध प्रदान करने वाली गायों को गुफा से निकाला था।
Brahaspati Dev associated with aura-radiance and the Angiras killed the demons names Bal. He uttered words which derived the milch cows out of the caves. These cows grant comforts and inspire offerings.
Brahaspati-Jupiter in the largest planet in space which emit light just like Sun.
एवा पित्रे विश्वदेवाय वृष्णे यज्ञैर्विधेम नमसा हविर्भिः।
बृहस्पते सुप्रजा वीरवन्तो वयं स्याम पतयो रयीणाम्
हम लोग इस प्रकार से पालक, सर्व देवता स्वरूप और अभीष्ट वर्षी बृहस्पति देव की यज्ञ द्वारा, हव्य द्वारा और स्तुति द्वारा, सेवा करेंगे। हे बृहस्पति देव! हम लोग जिससे सुपुत्रवान, वीर्यशाली और धन के स्वामी हो सकें।[ऋग्वेद 4.50.6]
हे बृहस्पति! सभी के देव स्वरूप, पोषण करने वाले, अभिलाषाओं की वृद्धि करने वाले हैं, हम अनुष्ठान में हविरल द्वारा वंदना किये उनकी प्रार्थना करेगे, जिससे हम संतान तथा शक्ति से परिपूर्ण समृद्धि का स्वामित्व ग्रहण कर सकें।
Hey Brahaspati Dev! You are the nurturer of all, like the Sun-Sury Dev & accomplish desires. We will make offerings and prayers for you, serve you to have virtuous sons, have wealth and might.
स इद्राजा प्रतिजन्यानि विश्वा शुष्मेण तस्थावभि वीर्येण।
बृहस्पतिं यः सुभृतं बिभर्ति वल्गयति वन्दते पूर्वभाजम्
जो बृहस्पति देव का सुन्दर रूप से पोषण करता है एवं उन्हें प्रथम हव्यग्राही कहकर उनकी स्तुति कर नमस्कार करता हैं, वह राजा अपने वीर्य द्वारा शत्रुओं के बल को अभिभूत करके अवस्थित करता है।[ऋग्वेद 4.50.7]
जो सम्राट बृहस्पति का भली प्रकार रक्षक है तथा प्रथम हव्य स्वीकार करने वाला मानकर उनको हवि प्रदान करता हुआ प्रणाम युक्त वंदना करता है। वह नृप अपने बल से शत्रुओं को सामर्थ्य को निरर्थक करता हुआ उसे हर लेता है।
The king who serve Brahaspati Dev, making offerings, prayers-worship for him, wins the enemies with his might-power.
स इत्क्षेति सुधित ओकसि स्वे तस्मा इळा पिन्वते विश्वदानीम्।
तस्मै विशः स्वयमेवा नमन्ते यस्मिन्ब्रह्मा राजनि पूर्व एति
जिस राजा के निकट ब्रह्मा (ब्रह्मण स्पति) अग्र गमन करते है, घर में निवास करता है। पृथ्वी उसके लिए सब काल में फल उत्पन्न करती है। प्रजागण स्वयं उसके निकट सदैव रहते हैं।[ऋग्वेद 4.50.8]
जिसके पास बृहस्पति सर्वप्रथम पधारते हैं, वह सम्राट संतुष्ट होकर अपने स्थान पर रहते हैं। उसके लिए धरा भी हर ऋतु में फल प्रदान करने वाली होती है। उसकी प्रजा उसके सामने सदैव सिर झुकाकर रहती है।
The empire of the king become stable, who is visited by Brahaspati Dev. The nature grants him all sorts of amenities. His citizens always abide by him.
अप्रतीतो जयति सं धनानि प्रतिजन्यान्युत या सजन्या।
अवस्यवे यो वरिवः कृणोति ब्रह्मणे राजा तमवन्ति देवाः
जो राजा रक्षण कुशल और धन रहित ब्राह्मण या बृहस्पति को धन दान करता है, वह अप्रतिहत रूप से शत्रुओं और प्रजाओं का धन जीतता है एवं महान होता है। देवगण उसी की रक्षा करते हैं।[ऋग्वेद 4.50.9]
सम्राट रक्षा चाहने वाले धनहीन विद्वान को धन प्रदान करता हैं, वह शत्रुओं का धन विजय करता है। देवता हमेशा उसकी रक्षा करते हैं।
The king who is able-expert in war fare, donate money to the Brahmans-poor, he over power the enemies and become great-mighty. The demigods-deities protect-save him.
इन्द्रश्च सोमं पिबतं बृहस्पतेऽस्मिन्यज्ञे मन्दसाना वृषण्वसू।
आ वां विशन्त्विन्दवः स्वाभुवोऽस्मे रयिं सर्ववीरं नि यच्छतम्
हे बृहस्पति देव! आप और इन्द्र देव इस यज्ञ में हर्षित होकर याजक गणों को धन प्रदान करें। सर्वव्यापक सोमरस आप दोनों के शरीर में प्रवेश करे। आप दोनों हम लोगों को पुत्र-पौत्रादि से युक्त धन प्रदान करें।[ऋग्वेद 4.50.10]
हे बृहस्पते! तुम और इन्द्र दोनों ही यज्ञ में हर्ष प्राप्त कर यजमानों को धन प्रदान करो। यह सोमरस सर्वव्यापक है, यह तुम्हारे शरीरों में प्रविष्ट है। तुम दोनों ही हमारे लिए संतान से परिपूर्ण रमणीय धन को प्रदान करो।
Hey Brahaspati & Indr Dev! You should be happy-pleased and grant-donate money to the Ritviz in this Yagy. Let Somras be enjoyed-drunk by you. Grant us sons & grandsons along with money-riches.
बृहस्पत इन्द्र वर्धतं नः सचा सा वां सुमतिर्भूत्वस्मे।
अविष्टं धियो जिगृतं पुरन्धीर्जजस्तमर्यो वनुषामरातीः
हे बृहस्पति देव और इन्द्र देव! आप दोनों हम लोगों को संवर्द्धित करें। हम लोगों के प्रति आप दोनों का अनुग्रह एक समय में ही प्रयुक्त होता है। आप दोनों हम लोगों के यज्ञ की रक्षा करते हुए हमारी प्रार्थना से जाग्रत होवें और याजकों के शत्रुओं का आप विनाश करें।[ऋग्वेद 4.50.11]
हे बृहस्पते! हे इन्द्रदेव! तुम दोनों ही हमको हर तरह से बढ़ाओ । हमारे प्रति तुम दोनों की दया एक साथ ही प्रेरित हो। हमारे इस यज्ञ के तुम दोनों ही रक्षक हो। वंदना से चैतन्य को ग्रहण हो जाओ।
Hey Brahaspati Dev! Hey Indr Dev! Both of you nurture-support us and oblige us together, at the same moment. Accept our prayers and protect our Yagy. Destroy the enemies of the Ritviz-hosts in the Yagy.(28.04.2023)
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (51) :: ऋषि :- वामदेव गौतम, देवता :- उषा,  छन्द :- त्रिष्टुप्।
इदमु त्यत्पुरुतमं पुरस्ताज्ज्योतिस्तमसो वयुनावदस्थात्।
नूनं दिवो दुहितरो विभागीर्गातुं कृणवन्नुषसो जनाय
हम लोगों के द्वारा स्तुति, सर्व प्रसिद्ध, अत्यन्त प्रभूत और कान्तिशाली तेज पूर्व दिशा से अन्धकार के बीच से उदय होता है। आदित्य पुत्री और दीप्तिमती उषा याजकगणों के गमन कार्य में वास्तव में सामर्थ्य युक्ता हों।[ऋग्वेद 4.51.1]
यह व्यापक रूप से फैली हुई और इंद्रिय प्रदत्त रोशनी पूर्व में अंधेरे से बाहर निकली है; वास्तव में उज्ज्वल उषाएँ, स्वर्ग की बेटियाँ, मनुष्य को (कार्य करने की क्षमता) दे रही हैं।
Prayed-worshiped by us, the shine appears in the east removing darkness. Radiant Usha, the daughter of Sury Bhagwan makes the Ritviz move-perform their activities like Yagy.
अस्थुरु चित्रा उषसः पुरस्तान्मिता इव स्वरवोऽध्वरेषु।
व्यू व्रजस्य तमसो द्वारोच्छन्तीरव्रञ्छुचयः पावकाः
यज्ञखात के यूपकाष्ठ के तुल्य शोभमाना होकर विचित्रा उषा पूर्व दिशा को व्याप्त कर अवस्थिति करती हैं। वे बाधा जनक अन्धकार के द्वार का उद्घाटन करके एवं दीप्त और पवित्र हो करके प्रकाशित होती हैं।[ऋग्वेद 4.51.2]
The many-limbed dawns rise up in the east, like the pillars at sacrifices round the altar; radiant and purifying, they are manifested, opening the gates of the obstructing gloom.
Beautiful Usha is lighting east like the pillar-mast of wood at the Yagy site. She removes the obstructing darkness, purify & shines.
उच्छन्तीरद्य चितयन्त भोजान्राधोदेयायोषसो मघोनीः।
अचित्रे अन्तः पणयः ससन्त्वबुध्यमानास्तमसो विमध्ये
आज तमोनिवारिका और धनवती उषा भोज्य दाता याजक गण को सोमादि धन प्रदान करने के लिए जाग्रत करती हैं। अत्यन्त गाढ़ अन्धकार के बीच में बनियों के तुल्य अदातृगण अप्रबुद्धभाव से शयन करते रहें।[ऋग्वेद 4.51.3]
The gloom-dispelling, affluent Usha animate the pious worshippers to offer sacrificial treasure; may the churlish traffickers sleep on unawaken, in the unlovely depth of darkness.
Usha having-granting riches, is rising removing darkness awake the Ritviz to provide Somras & offerings. Those who do not wish to donate keep on sleeping like imprudents comparable to the businessmen.
कुवित्स देवी: सनयो नवो वा यामो बभूयादुषसो वो अद्य।
येना नवग्वे अङ्गिरे दशग्वे सप्तास्ये रेवती रेवदूष॥
हे द्योतमान उषाओं! जिस रथ द्वारा आप लोगों ने सप्त छन्दोयुक्त मुख वाले नवग्व और दशग्व अङ्गिराओं को धनशाली रूप से प्रदीप्त किया, हे धनवती उषाओं! आप लोगों का वही पुरातन अथवा नूतन रथ आज इस यज्ञगृह में अनेकानेक बार आगमन करे।[ऋग्वेद 4.51.4]
Hey shinning-brilliant Usha-dawn! The charoite riding which you illuminated-enlightened the Angiras with 7 Strotr-stanzas, having 9 & 10 cows, granted them wealth-riches. Let your ancient-eternal charoite arrive at the Yagy site again & again.
यूयं हि देवीर्ऋतयुग्भिरश्वैः परिप्रयाथ भुवनानि सद्यः।
प्रबोधयन्तीरुषसः ससन्तं द्विपाच्चतुष्पाच्चरथाय जीवम्
हे द्युतिमती उषाओं! आप लोग निद्रित द्विपदों और चतुष्पदों को अर्थात मनुष्यों और गौओं आदि को अपने-अपने गमन आदि कार्यों में प्रबोधित करके यज्ञ में गमनकारी अश्वों के द्वारा भवनों का क्षणमात्र में परिभ्रमण करें।[ऋग्वेद 4.51.5]
Hey shinning Usha! Awake the 4 & 2 legged, animals & humans respectively and let them initiate their daily routine, illuminate-lit the buildings-Yagy site, riding your horses.
क स्विदासां कतमा पुराणी यया विधाना विदधुर्ऋभूणाम्।
शुभं यच्छुभ्रा उषसश्चरन्ति न वि ज्ञायन्ते सदृशीरजुर्याः
जिन उषा के लिए ऋभुओं ने चमस आदि का निर्माण किया, वे पुरातन उषा कहाँ हैं? दीप्त, नित्य नूतन, समान रूप विशिष्ट उषाएँ, जब दीप्ति प्रकाश करती हैं, तब वे विज्ञात नहीं होती हैं अर्थात् वे सब दिनों में एकरूप सदृश रहती हैं, इसलिए ये पुरातन और ये नूतन उषा हैं, इस तरह से वे पहचानी नहीं जा सकती हैं।[ऋग्वेद 4.51.6]
Where are the ancient-eternal Ushas for whom Ribhu Gan created Chamas? When illuminated, ever new, similar-identical Ushas appear, they can not be identified-distinguished as old or new.
ता घा ता भद्रा उषसः पुरासुरभिष्टिद्युम्ना ऋतजातसत्याः।
यास्वीजानः शशमान उक्थैः स्तुवञ्छंसन्द्रविणं सद्य आप
यज्ञकर्ता गण जिन उषाओं का उक्थों द्वारा प्रार्थना करके एवं स्तोत्रों और शस्त्रों द्वारा उच्चारण करके शीघ्र धन लाभ करते हैं, वे ही कल्याण कारिणी उषाएँ पुरातन काल से ही अभिगमन करके धन प्रदान करें। वे यज्ञ के लिए उत्पन्न हुई हैं और सत्य फल प्रदान करती हैं।[ऋग्वेद 4.51.7] 
Verily those auspicious dawns-Ushas have been of old, rich with desired blessings, truthful bestower of the results of sacrifice; at which the sacrificer, adoring with silent praise, glorifying with hymns, has quickly obtained wealth.
Let the Ushas accomplishing welfare-beneficial means grant wealth to the Ritviz, who pray-glorify them with the recitation of Strotr for quick earning. They are born for the Yagy and grant truthful rewards.
ता आ चरन्ति समना पुरस्तात्समानतः समना पप्रथानाः।
ऋतस्य देवी: सदसो बुधाना गवां न सर्गा उषसो जरन्ते
एकरूप विशिष्ट और समान विख्यात उषाएँ पूर्व दिशा में एक मात्र अन्तरिक्ष देश से सभी जगह भ्रमण करती है। द्युति मती उषाएँ यज्ञगृह को प्रबेधित करके जल सृष्टि कारिणी रश्मियों की तरह प्रशंसित होती हैं।[ऋग्वेद 4.51.8]
Famous Ushas bearing identical shape & sizes, rise in the east & travel through the space. Radiant-glowing Ushas enter the Yagy site with their water forming-producing rays.  
ता इन्न्वे३ व समना समानीरमीतवर्णा उषसश्चरन्ति।
गृहन्तीरभ्वमसितं रुशद्भिः शुक्रास्तनूभिः शुचयो रुचानाः
वे उषाएँ एक समान, एक रूप विशिष्ट, अपरिमित वर्ण युक्त, दीप्त, शुद्ध और कान्ति पूर्ण शरीर द्वारा दीप्ति युक्त हैं। वे अत्यन्त महान अन्धकार का नाश करके भ्रमण करती हैं।[ऋग्वेद 4.51.9]
The Ushas are identical, have the same form, infinite-unlimited colours, pure and radiant-glowing bodies. They destroy the extreme darkness while travelling-moving.
रयिं दिवो दुहितरो विभातीः प्रजावन्तं यच्छतास्मासु देवीः।
स्योनादा वः प्रतिबुध्यमानाः सुवीर्यस्य पतयः स्याम
हे द्योतमान आदित्य की दुहिताओं! आप हम लोगों को पुत्र-पौत्रादि से युक्त कर धन प्रदान करें। हे देवियों! हम लोग सुख लाभ के लिए आप लोगों से निवेदन करते हैं, जिससे हम लोग पुत्र-पौत्रादि से युक्त धन के स्वामी हो सकें।[ऋग्वेद 4.51.10]
Hey the daughters of glowing-shinning Sun-Adity! Grant us wealth along with sons & grandsons. Hey goddess! We pray you for the sake of riches and comforts.
तद्वो दिवो दुहितरो विभातीरुप ब्रुव उषसो यज्ञकेतुः।
वयं स्याम यशसो जनेषु तद्द्यौश्च धत्तां पृथिवी च देवी
हे द्योतमान आदित्य की दुहिताओं! हम लोग यज्ञ के निदेशक हैं। आपके निकट हम लोग प्रार्थना करते हैं, जिससे लोगों के बीच में हम लोग कीर्ति और अन्न के स्वामी हो सकें। द्युलोक और द्युतिमती पृथ्वी वह यश धारित करें।[ऋग्वेद 4.51.11]
Hey the daughters of shinning Sun-Adity! We are the organisers of the Yagy. We worship you so that we earn goodwill (name & fame) and have food grains. Let the heavens and radiant earth bear the fame.(29.04.2023)
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (52) :: ऋषि :- वामदेव गौतम, देवता :- उषा,  छन्द :- गायत्री।
प्रति ष्या सूनरी जनी व्युच्छन्ती परि स्वसुः। दिवो अदर्शि दुहिता
वह आदित्य की पुत्री उषा दृष्ट होती है। वह प्रार्थित है और प्राणियों की नेत्री है एवं सुन्दर फलों की उत्पादयित्री हैं। वह बहन स्वरूपा रात्रि के अन्त में अन्धकार का विनाश करती है।[ऋग्वेद 4.52.1]
Daughter of Adity, Usha become appears. She is worshiped-prayed, is like the eye of the living beings and the producer of beautiful-tasty fruits. She is like the sister of darkness eliminating it, at the end of night.
 अश्वेंव चित्रारुषी माता गवामृतावरी। सखाभूदश्विनोरुषाः॥
अश्व के तुल्य मनोहरा, दीप्तिमती, रश्मियों की माता और यज्ञवती उषा अश्विनी कुमारों के साथ स्तूयमान हो अर्थात अश्विनी कुमारों की मित्र हैं।[ऋग्वेद 4.52.2]
Usha is like a beautiful mare, the radiant, mother of the rays of light, performing Yagy-the object of sacrifice, is the friend of the Ashwani Kumars.
उत सखास्यश्विनोरुत माता गवामसि। उतोषो वस्व ईशिषे 
आप अश्विनी कुमारों की मित्र और रश्मियों की माता हैं। हे उषा! आप धन की ईश्वरी हैं।[ऋग्वेद 4.52.3]
Hey Usha! You are the friend of Ashwani Kumars and the source of rays of light & the goddess of wealth-money.
यावयद् द्वेषसं त्वा चिकित्वित्सूनृतावरि। प्रति स्तोमैरभुत्स्महि
हे सुनृता उषा! आप रिपुओं को पृथक कर दें, आप ज्ञान युक्त हैं। हम स्तुतियों द्वारा आपको प्रबोधित करते हैं।[ऋग्वेद 4.52.4]
सूनृता :: सत्य और प्रिय भाषण, सत्य, धर्म की पत्नी का नाम, उत्तानपाद की पत्नी का नाम, एक अप्सरा का नाम, ऊषा, खाद्य, आहार, उत्कृष्ट संगीत; truthful, speaks dearly-lovely.
Hey truthful Enlightened Usha speaking lovely words! Repel-separate enemies. We worship you with Strotr-Stuti, hymns.
प्रति भद्रा अदृक्षत गवां सर्गा न रश्मयः। ओषा अप्रा उरु ज्रयः
स्तुति योग्य रश्मियाँ दृष्ट होती हैं। उषा ने इस संसार को वर्षा की धारा के तुल्य महान तेज से परिपूर्ण किया है।[ऋग्वेद 4.52.5]
Rays of light deserving worship-prayers become visible. Usha filled the universe with energy like the rains showers.
आपप्रुषी विभावरि व्यावर्ज्योतिषा तमः। उषो अनु स्वधामव
हे कान्ति मती उषा! आप संसार को अपने तेज द्वारा परिपूर्ण करें, तेज द्वारा अन्धकार को दूर करें उसके अनन्तर नियमानुसार हविर्लक्षण अन्न की रक्षा करें।[ऋग्वेद 4.52.6]
Hey radiant-aurous Usha! Fill the universe-world with your energy-aura, remove darkness and protect the food grains meant for offerings, methodically following procedures.
आ द्यां तनोषि रश्मिभिरान्तरिक्षमुरु प्रियम्। उषः शुक्रेण शोचिषा
हे उषा! आप दीप्त तेजोयुक्त होकर रश्मि द्वारा द्युलोक को एवं विस्तीर्ण और प्रिय अन्तरिक्ष को पूर्ण कर देती हैं।[ऋग्वेद 4.52.7]
Hey Usha! You become radiant-aurous, fill the heavens & the vast space-sky, with the rays of light.(30.04.2023)
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (53) :: ऋषि :- वामदेव गौतम, देवता :- सविता, छन्द :- जगती।
तद्देवस्य सवितुर्वार्यं महद्वृणीमहे असुरस्य प्रचेतसः।
छर्दिर्येन दाशुषे यच्छति त्मना तन्नो महाँ उदयान्देवो अक्तुभिः
हम लोग असुर और बुद्धिमान प्रेरक सविता देव के उस वरणीय एवं पूज्य धन की प्रार्थना करते हैं, जिसे वे याजक गण हव्य दाता को स्वेच्छापूर्वक देते हैं। वे महान सविता देव हमें उस तेज को प्रदत्त करते हुए निशा के अवसान के समय उदित होते हैं।[ऋग्वेद 4.53.1]
हम दिव्य, शक्तिशाली और बुद्धिमान सविता की याचना करते हैं जो वांछनीय और पर्याप्त धन प्रदान करते हैं, जिसके साथ वह अपने स्वयं के बलिदान के प्रस्तावक को आवास प्रदान करता है; महान देवता हमें हर दिन ऐसा प्रदान करें।
We pray-worship divine, mighty, intelligent Savita Dev who grant wealth to the Ritviz who make offerings (in the Yagy). He Provide energy (heat, light and several other kinds of radiations) and rises when the night is over.
दिवो धर्ता भुवनस्य प्रजापतिः पिशङ्गं द्रापिं प्रति मुञ्चते कविः।
विचक्षणः प्रथयन्नापृणन्नुर्वजीजनत्सविता सुम्नमुक्थ्यम्
द्युलोक एवं समस्त लोक के धारक, प्रजाओं को प्रकाश, वृष्टि आदि के द्वारा पालन करने वाले कवि सविता देव हिरण्मय कवच परिधान करते हैं। विचक्षण सविता देव प्रख्यात होकर भी संसार को तेज द्वारा परिपूर्ण करते हैं और स्तुति योग्य प्रभूत सुख उत्पादित करते हैं।[ऋग्वेद 4.53.2]
विचक्षण :: विवेक शील; prudent.
Savita Dev who lit the heavens and the whole universe, support the living beings by granting light, rains wear golden shield. Prudent Savita Dev, fills the universe with aura-light and evolve comforts which deserve appreciation.
आप्रा रजांसि दिव्यानि पार्थिवा श्लोकं देवः कृणुते स्वाय धर्मणे। 
प्र बाहू अस्राक्सविता सवीमनि निवेशयन्प्रसुवन्नक्तुभिर्जगत्
सविता देव तेज द्वारा द्युलोक और पृथ्वी लोक को परिपूर्ण करते हैं एवं अपने कार्य की प्रशंसा करते हैं। वे प्रतिदिन संसार को अपने-अपने कार्य में स्थापित करते हुए प्रेरित करते हैं। वे सृजन कार्य के लिए भुजाओं को प्रसारित करते हैं।[ऋग्वेद 4.53.3]
Savita Dev fills the heavens & the earth with aura-light. He inspire the living beings to be active-busy with their work, who extend their limbs to do creative work.
अदाभ्यो भुवनानि प्रचाकशद्व्रतानि देवः सविताभि रक्षते।
प्रास्राग्बाहू भुवनस्य प्रजाभ्यो धृतव्रतो महो अज्मस्य राजति
सविता देव अहिंसित होकर भुवनों को प्रदीप्त करते हैं और व्रतों की रक्षा करते हैं। वे भुवनस्थ प्रजाओं के लिए भुजाओं को प्रसारित करते हैं। धृतव्रत सविता देव महान जगत के ईश्वर हैं।[ऋग्वेद 4.53.4]
Savita Dev protect the deeds-endeavours without being violent.  He extend his arms for the living beings of all abodes. Determined Savita Dev is the nurturer-God of the whole universe.
त्रिरन्तरिक्षं सविता महित्वना त्री रजांसि परिभूस्त्रीणि रोचना।
तिस्रो दिवः पृथिवीस्तिस्त्र इन्वति त्रिभिर्व्रतैरभि नो रक्षति त्मना
सविता देव महिमा द्वारा परिभव करते हुए अन्तरिक्षत्रय को व्याप्त करते हैं। वे लोकत्रय को व्याप्त करते है। वे तीन पृथ्वियों को व्याप्त करते हैं। वे तीन व्रतों (ग्रीष्म, वर्षा और हिम) द्वारा हम लोगों का अनुग्रह पूर्वक पालन करें।[ऋग्वेद 4.53.5]
Savita Dev pervade the three abodes in the space Heaven, earth & the Nether world. He support-nurture us with the summer, rains and the cold, carefully.
बृहत्सुम्नः प्रसवीता निवेशनो जगतः स्थातुरुभयस्य यो वशी।
स नो देवः सविता शर्म यच्छत्वस्मे क्षयाय त्रिवरूथमंहसः
जिनके पास प्रभूत धन है, जो कर्मों को उत्पन्न करते हैं, जो सभी के लिए गन्तव्य हैं एवं जो स्थावर और जंगम दोनों को वश में रखते हैं, वे सविता देव हम लोगों के पापक्षय के लिए हम लोगों को तीनों लोकों का सुख प्रदान करें।[ऋग्वेद 4.53.6]
Let Savita Dev grant us comforts of the three world, destroy over sins. He possess the ultimate wealth, generate the deeds-endeavours, controls both the movable & fixed living beings and the ultimate goal for all.
Life on earth is possible by virtue of the Sun.
आगन्देव ऋतुभिर्वर्धतु क्षयं दधातु नः सविता सुप्रजामिषम्।
स नः क्षपाभिरहभिश्च जिन्वतु प्रजावन्तं रयिमस्मे समिन्वतु
सविता देव ऋतुओं के साथ आगमन करें। हम लोगों के घर को वर्द्धित करें। हम लोगों को पुत्र-पौत्रादि से युक्त कर अन्न प्रदान करें। दिन और रात्रि दोनों में हम लोगों के प्रति उनका प्रेम हो। वे हम लोगों को अपत्य युक्त धन प्रदान करें।[ऋग्वेद 4.53.7]
Let Savita arrive with the seasons. Enlarge over homes. grant us sons, grandsons & food grains. We should have love & affection for him during the day as well as night. He should grant us progeny along with wealth.(02.05.2023)
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (54) :: ऋषि :- वामदेव, गौतम, देवता :- सविता, छन्द :- जगती, त्रिष्टुप्
अभूद्देवः सविता वन्द्यो नु न इदानीमह्न उपवाच्यो नृभिः।
वि यो रत्ना भजति मानवेभ्यः श्रेष्ठं नो अत्र द्रविणं यथा दधत्
सविता देव प्रादुर्भूत हुए हैं। हम शीघ्र ही उनकी वन्दना करेंगे। वे इस समय और तृतीय सवन में होताओं द्वारा प्रार्थित होवें। जो मनुष्यों को रत्न प्रदान करते हैं, वे सविता देव हम लोगों को इस यज्ञ में श्रेष्ठ धन प्रदान करें।[ऋग्वेद 4.54.1]
Savita Dev has arisen. We will worship-pray him soon. Let him be prayed in the morning & evening (first & third segment of the day). Let Savita Dev who grant jewels-gems to the humans, grant us best-excellent riches in this Yagy.
देवेभ्यो हि प्रथमं यज्ञियेभ्योऽमृतत्वं सुवसि भागमुत्तमम्।
आदिद्दामानं सवितर्व्यूर्णुषेऽनूचीना जीविता मानुषेभ्यः
आप पहले यज्ञार्हदेवों के लिए अमरत्व के साधन भूत सोम के उत्कृष्टतम भाग को उत्पन्न करें। हे सविता देव! उसके अनन्तर आप हव्य दाता को प्रकाशमय करें, इस प्रकार पिता, पुत्र और पौत्रादि क्रम से मनुष्यों को जीवन दान करें।[ऋग्वेद 4.54.2]
Initially you evolve the excellent segment of Som for the immorality of the demigods-deities. Hey Savita Dev! Thereafter you enlighten-lit the hosts-Ritviz and grant life-longevity to father, sons and grandsons.
अचित्ती यच्चकृमा दैव्ये जने दीनैर्दक्षैः प्रभूती पूरुषत्वता।
देवेषु च सवितर्मानुषेषु च त्वं नो अत्र सुवतादनागसः
हे सविता देव! अज्ञानतावश अथवा दुर्बल अथवा बलशाली लोगों के प्रमाद वश अथवा ऐश्वर्य के गर्व से या परिजन के गर्व से आपके प्रति अथवा देव या मनुष्यों के प्रति हमने जो अपराध किया है, इस यज्ञ में आप हमें उस पाप से मुक्त करें।[ऋग्वेद 4.54.3]
अपराध :: दोष, जुर्म, दंड योग्य कर्म; crime, guilt.
Hey Savita Dev! Make us sinless in this Yagy, remove our guilts-faults committed by us due to ignorance, intoxication, grandeur or pride towards the demigods-deities or the humans, under the impression-influence of either the weak or mighty or our relatives.
न प्रमिये सवितुर्देव्यस्य तद्यथा विश्वं भुवनं धारयिष्यति।
यत्पृथिव्या वरिमन्ना स्वङ्गुरिर्वर्ष्मन्दिवः सुवति सत्यमस्य तत्
सविता देव का वह कर्म हिंसा योग्य नहीं है; क्योंकि वे विश्व भुवन धारित करते हैं। वे अंगुलि विशिष्ट होकर पृथ्वी को विस्तीर्ण होने के लिए प्रेरित करते हैं एवं द्युलोक को भी विस्तीर्ण सुन्दर होने के लिए प्रेरित करते हैं। उन सविता देव का यह कर्म सत्य है।[ऋग्वेद 4.54.4]
That function of Savita Dev is non violent, since he supports the three abodes. His gracious fingers inspire the earth to expand, increase fertility along with the beauty of the heavens. This is the true endeavour-effort of Savita Dev.
इन्द्रज्येष्ठान्बृहद्भ्यः पर्वतेभ्यः क्षयाँ एभ्यः सुवसि पस्त्यावतः।
यथायथा पतयन्तो वियेमिर एवैव तस्थुः सवितः सवाय ते
हे सविता देव! परमैश्वर्यवान इन्द्र देव हम लोगों के बीच में पूजनीय हैं। आप हम लोगों को महान पर्वतों की अपेक्षा और भी उन्नत करें। इन सम्पूर्ण याजक गणों को गृह विशिष्ट निवास (ग्राम, नगर आदि) प्रदान करें। वे सब गमन काल में जिससे आपके द्वारा नियत हों और आपकी आज्ञा के अनुसार चलें।[ऋग्वेद 4.54.5]
Hey Savita Dev! Indr Dev, the possessor of ultimate grandeur is worshiped by us. Make us progress beyond the mountains. Grant homes-houses to the worshipers. Let them follow your dictates in all segments of time-day.
ये ते त्रिरहन्त्सवितः सवासो दिवेदिवे सौभगमासुवन्ति।
इन्द्रो द्यावापृथिवी सिन्धुरद्भिरादित्यैर्नो अदितिः शर्म यंसत्
हे सविता देव! जो याजक गण आपके उद्देश्य से प्रति दिन तीन बार सौभाग्य जनक सोम का अभिषव करता है, इन्द्र देव, द्यावा-पृथ्वी, जल विशिष्ट सिन्धु, देवता और आदित्यों के साथ अदिति उस याजक गण को और हमें सुख प्रदान करें।[ऋग्वेद 4.54.6]
Hey Savita Dev! Grant comforts to the Ritviz who extract auspicious Somras for you, thrice during the day along with Indr Dev, earth & heavens, Aditi and us.(02.05.2023)
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (55) :: ऋषि :- वामदेव, गौतम, देवता :- विश्वेदेव, छन्द :- त्रिष्टुप्, गायत्री
को वस्त्राता वसवः को वरूता द्यावाभूमी अदिते त्रासीथां नः।
सहीयसो वरुण मित्र मर्तात्को वोऽध्वरे वरिवो धाति देवाः 
हे वसुओं! आप लोगों के बीच में कौन रक्षक है? कौन दुःखों का निवारक है? हे अखण्डनीया द्यावा-पृथ्वी! हम लोगों की रक्षा करें। हे वरुण, हे मित्र! आप दोनों बलशाली मनुष्यों से हम लोगों की रक्षा करें। हे देवो! यज्ञ में आप लोगों के बीच में कौन देव धन प्रदान करता है?[ऋग्वेद 4.55.1]
Hey Vasus! Who amongest you is a protector? Who removes pain-sorrow? Hey inseparable earth & heavens! Protect us. Hey Varun, Hey Mitr! Both of you protect us from the powerful-mighty humans. Hey demigods-deities! Who from amongest you, provide money for the Yagy?
प्र ये धामानि पूर्व्याण्यर्चान्वि यदुच्छान्वियोतारो अमूराः।
विधाता वि ते दघुरजस्त्रा ऋतधीतयो रुरुचन्त दस्माः
जो देव स्तोताओं को पुरातन स्थान प्रदान करते हैं, जो दुःखों के अमिश्रयिता है, जो है अमूढ़ हैं और जो अन्धकार को विनष्ट करते हैं, वही देव विधाता है और नित्य अभीष्ट फल प्रदान करते हैं। वे सत्य कर्म विशिष्ट और दर्शनीय होकर शोभा पाते हैं।[ऋग्वेद 4.55.2]
अमूढ़ :: चतुर, विद्वान; apt, brilliant, clever, brainy, smart.
The demigods-deities) who bestow ancient-eternal enjoyment to the worshippers with unperplexed minds, are the separators of light from darkness; they distribute desired rewards are truthful and shine.
Those Dev Gan, who grant eternal locations, remove worries, pain, sorrow, are smart, removes darkness constitute the Daev-Brahm and always grant desired rewards. They are truthful and aurous.
प्र पस्त्या ३ मदितिं सिन्धुमर्के: स्वस्तिमीळे सख्याय देवीम्।
उभे यथा नो अहनी निपात उषासानक्ता करतामदब्धे
सभी के द्वारा गन्तव्य देवमाता अदिति, सिन्धु और स्वस्ति देवी की हम मन्त्र द्वारा मित्रता के लिए प्रार्थना करते हैं, जिससे द्यावा-पृथ्वी हम लोगों का विशेष रूप से पालन करें, उसी के लिए प्रार्थना करते हैं। उषा और अहोरात्राभिमानी देव हम लोगों की कामनाओं को पूर्ण करें।[ऋग्वेद 4.55.3]
मैं पूज्य अदिति, सिंधु और दिव्य स्वस्ति को उनकी मित्रता के लिए प्रणाम करता हूँ, मैं आपकी स्तुति करता हूँ। दिन और रात दोनों की आप हमारी बेरोक-टोक रक्षा कर सकते हैं; रात और भोर करते हैं, जो हम चाहते हैं।
We request, pray-worship for friendship with Dev Mata Aditi, Sindhu, Swasti Devi by the recitation of Mantr; so that heaven & earth take special care of us. Let demigods-deities protect and accomplish our desires during Usha and the Ahoratr (whole day). 
व्यर्यमा वरुणश्चेति पन्थामिषस्पतिः सुवितं गातुमग्निः।
इन्द्राविष्णू नृवदु षु स्तवाना शर्म नो यन्तममवद्वरूथम्
अर्यमा और वरुण देव ने यज्ञ मार्ग को प्रकाशित कर दिया। हविर्लक्षण अन्न के पति अग्नि देव ने सुख प्रद मार्ग दिखा दिया। इन्द्र देव और श्री विष्णु सुन्दर रूप से प्रार्थित होकर हम लोगों को पुत्र-पौत्रादि से युक्त कर बल युक्त रमणीय सुख प्रदान करें।[ऋग्वेद 4.54.4]
Aryma & Varun Dev illuminated the way to the Yagy. Acceptor of offerings Agni Dev guided-showed the comfortable route. Let Indr Dev & Bhagwan Shri Hari Vishnu grant us sons & grandsons with pleasing comforts along with might.
आ पर्वतस्य मरुतामवांसि देवस्य त्रातुरव्रि भगस्य।
पात्पतिर्जन्यादंहसो नो मित्रो मित्रियादुत न उरुष्येत्
इन्द्र देव के मित्र पर्वत, मरुद्गण तथा भगदेव से हम रक्षा की याचना करते हैं। स्वामी वरुणदेव जन-सम्बन्धियों के पाप से हमारी रक्षा करें और मित्रदेव मित्रभाव से हम लोगों की रक्षा करें।[ऋग्वेद 4.55.5]
We request Parwat, the friend of Indr Dev, Marud Gan & Bhag Dev for our protection. Let Varun Dev protect us from the sins of our relations and Mitr Dev protect us like a friend.
नू रोदसी अहिना बुध्न्येन स्तुवीत देवी अप्येभिरिष्टैः।
समुद्रं न संचरणे सनिष्यवो धर्मस्वरसो नद्यो ३ अप व्रन्
हे द्यावा-पृथ्वी रूप देवी द्वय! जिस प्रकार धनाभिलाषी मनुष्य समुद्र के बीच में जाने के लिए समुद्र की स्तुति करता है, उसी प्रकार हम भी अभिलषित कार्यलाभ के लिए अहिबुध्न्य नामक देवता के साथ आप दोनों की स्तुति करते हैं। वे देवगण दीप्त ध्वनि युक्त नदियों को मुक्त करें।[ऋग्वेद 4.55.6]
Hey heaven & earth goddess duo! We pray-worship both of you & demigod Ahibudhany, like a person desirous of gems-jewels worshiping the ocean. Let the demigods-deities release the rivers possessing-making sound.
देवैर्नो देव्यदितिर्नि पातु देवस्त्राता त्रायतामप्रयुच्छन्।
नहि मित्रस्य वरुणस्य धासिमर्हामसि प्रमियं सान्वग्नेः
देवमाता अदिति अन्य देवों के साथ हम लोगों का पालन करें। त्राता इन्द्र देव प्रमादित होकर हम लोगों का पालन करें। मित्र, वरुण और अग्नि देव के सोमादिरूप पोषक अन्न की हम लोग हिंसा नहीं कर सकते। किन्तु अनुष्ठानों के द्वारा संवर्धित कर सकते हैं।[ऋग्वेद 4.55.7]
त्राता :: रक्षक; saviour.
Let Dev Mata Aditi nurture-support us like the other demigods-deities. Saviour Indr Dev nurture-nourish us. We can not destroy-spoil the nourishing food grains like Som, belonging to Mitr, Varun & Agni Dev. Instead, we can boost-promote them by virtue of Yagy-Hawan etc.
अग्निरीशे वसव्यस्याग्निर्महः सौभगस्य। तान्यस्मभ्यं रासते॥
अग्नि देव धन के ईश्वर हैं और महान् सौभाग्य के ईश्वर हैं; इसलिए वे हम लोगों को धन और सौभाग्य प्रदान करें।[ऋग्वेद 4.55.8]
Agni dev is the God of wealth-prosperity and good luck, hence he should grant us wealth and good luck.
उषो मघोन्या वह सूनृते वार्या पुरु। अस्मभ्यं वाजिनीवति
हे धनवती, हे प्रिय सत्य रूप वचन की अभिमानिनी और हे अन्न वती उषा! हम लोगों को आप अत्यधिक रमणीय धन प्रदान करें।[ऋग्वेद 4.55.9]
Hey possessor of wealth & food grains truthful Usha! Grant us pleasing-graceful wealth.
तत्सु नः सविता भगो वरुणो मित्रो अर्यमा। इन्द्रो नो राधसा गमत्
जिस ऐश्वर्य के साथ सविता, भग, वरुण, मित्र, अर्यमा और इन्द्र देव आगमन करते हैं, उस ऐश्वर्य को वे सब देवगण हमें प्रदत्त करें।[ऋग्वेद 4.55.10]
Let the demigods Savita, Bhag, Varun, Mitr, Aryma and Indr Dev who arrive with the grandeur, grant-provide it to us.(07.05.2023)
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (56) :: ऋषि :- वामदेव, गौतम, देवता :- आकाश, पृथ्वी, छन्द :- त्रिष्टुप्, गायत्री।
मही द्यावापृथिवी इह ज्येष्ठे रुचा भवतां शुचयद्भिरकैः।
यत्सीं वरिष्ठे बृहती विमिन्वन्रुवद्धोक्षा पप्रथानेभिरेवैः
महती और श्रेष्ठा द्यावा-पृथ्वी इस यज्ञ में दीप्तिकर मन्त्र और सोमादि से युक्त होकर दीप्ति विशिष्ट हों। जिस लिए कि सेचनकारी पर्जन्य विस्तीर्ण और महती द्यावा-पृथ्वी को स्थापित करते हुए प्रथमान और गमन शील मरुतों के साथ सभी जगह शब्द करते हैं।[ऋग्वेद 4.56.1]
पर्जन्य :: गरजता तथा बरसता हुआ बादल-मेघ, इंद्र, विष्णु, कश्यप ऋषि के एक पुत्र जिसकी गिनती गंधर्वों में होती है।
Let the excellent & significant-important heaven & earth become aurous-shinning by the recitation of sacred hymns, chants-Mantr, associated by Somras. The vast-broad showering clouds make thundering sound along with the Marud Gan.
Vast and excellent Heaven and Earth, be present with splendour at this Yagy-sacrifice, attracted by sanctifying Mantr-chants, hymns; since that the showerer sounds everywhere with his heralds, the rapid winds, passing through the two spacious and mighty regions.
HERALD :: इस बात का संकेत होना कि कुछ घटित होने वाला है; indications that something is going to happen soon.
देवी देवेभिर्यजते यजत्रैमिनती तस्थतुरुक्षमाणे।
ऋतावरी अद्रुहा देवपुत्रे यज्ञस्य नेत्री शुचयद्धिरकैः
यजन योग्य, अहिंसक, अभीष्ट वर्षी, सत्य शील, द्रोह रहित, देवों के उत्पादक और यज्ञों के निर्वाहक द्यावा-पृथ्वी रूप देवी द्वय यष्टव्य देवों के साथ दीप्तिकर मन्त्रों या हवि लक्षण अन्नों से युक्त होवें।[ऋग्वेद 4.56.2]
द्रोह :: दुष्टता, हानिकरता, नुक़सानदेहता, कपट, नमकहरामी, बेवफ़ाई, राज-द्रोहिता, द्वेष, डाह, दुष्ट भाव, बदख़्वाहता; treachery, malignancy, disloyalty, malevolence.
Let worship deserving, non violent, accomplishment granting, truthful, free from treachery heaven & earth in the form of goddess duo, accompanied by the demigods-deities be associated with aurous, energetic, inspiring Mantr-chants offerings in the form of food grains. 
स इत्स्वपा भुवनेष्वास य इमे द्यावापृथिवी जजान।
उर्वी गभीरे रजसी सुमेके अवंशे धीरः शच्या समैरत्॥
जिन्होंने इस द्याव-पृथ्वी को उत्पन्न किया; जिन बुद्धिमान ने विस्तीर्ण, अविचला सुरूपा और आधार रहिता द्यावा-पृथ्वी को सम्यक रूप से कुशल कर्म द्वारा परिचालित किया, वे ही भुवनों के बीच में शोभन कर्मा हैं।[ऋग्वेद 4.56.3]
The intelligent, who created the earth-heavens, extended the unbalanced earth & heavens, operated them skilfully is present between the abodes, performing the great-beautiful deeds.
नू रोदसी बृहद्धिर्नो वरूथैः पत्नीवद्भिरिषयन्ती सजोषाः।
उरूची विश्वे यजते नि पातं धिया स्याम रथ्यः सदासाः॥
हे द्यावा-पृथ्वी! आप दोनों हम लोगों के लिए अन्न दान की अभिलाषिणी और परस्पर सङ्गता है। विस्तीर्णा प्रदान करें, व्याप्ता एवं याग योग्या होकर आप दोनों हमें पत्नी युक्त महान गृह प्रदान करें तथा हम लोगों की सुरक्षा करें। हम लोग अपने अच्छे कर्म के द्वारा रथ और दास से युक्त होवें।[ऋग्वेद 4.56.4]
Hey earth & heavens, complementary of each other! You wish to donate food grains. Grant us protection, progress and houses along with wife. Let us become the possessors of charoite and servants by virtue of our pious-righteous deeds.
प्र वां महि द्यवी अभ्युपस्तुतिं भरामहे। शुची उप प्रशस्तये॥
हे द्युतिमती द्यावा-पृथ्वी! हम लोग आप दोनों के उद्देश्य से महान स्तुतियों को सम्पादित करेंगे। आप दोनों विशुद्ध हैं। हम लोग प्रशंसा करने के लिए आपके निकट गमन करते हैं।[ऋग्वेद 4.56.5]
Hey aurous-shinning, pure earth & heavens! We will perform-conduct great prayers for you. We come closure to you to appreciated you.
पुनाने तन्वा मिथः स्वेन दक्षेण राजथः। ऊह्याथे सनादृतम्॥
हे देवियों! आप दोनों अपनी मूर्तियों और बल द्वारा परस्पर प्रत्येक को शोधित करके शोभमाना होवें और सदैव यज्ञ का निर्वाह करें।[ऋग्वेद 4.56.6]
Hey goddesses! You should be established by virtue of your might, purify each & every one, always conducting Yagy.
मही मित्रस्य साधयस्तरन्ती पिप्रती ऋतम्। परि यज्ञं नि वेदथुः॥
हे महती द्यावा-पृथ्वी! आप दोनों मित्र भूत स्तोता को अभीष्ट फल प्रदान करती हैं। यज्ञ की पूर्णता के लिए संरक्षण देती हुई यज्ञ को अवलम्बन प्रदान करती हैं।[ऋग्वेद 4.56.7]
Hey earth & heavens! You grant rewards of our deeds like friends, support the Yagy to accomplish it.(07.05.2023)
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (57) :: ऋषि :- वामदेव, गौतम, देवता :- क्षेत्रपति आदि, छन्द :- अनुष्टुप्, त्रिष्टुप्, उष्णिक्।
क्षेत्रस्य पतिना वयं हितेनेव जयामसि।
गामश्वं पोषयित्न्वा स नो मृळातीदृशे॥
हम याजक गण मित्र के समान क्षेत्रपति के साथ क्षेत्रों को विजित करें। वे हम लोगों की गौओं और अश्वों को पुष्टि प्रदान करें। वे देव हम लोगों को उक्त प्रकार से दातव्य धन देकर हर्षित करें।[ऋग्वेद 4.57.1]
With the master of the land, our friend, we triumph; may he bestow upon us cattle, horses, nourishment and  make us happy.
Let the Ritviz share-divide the land with the master-owner. They should nourish our cows, horses. The demigods-deities grant us wealth and make us happy.
क्षेत्रस्य पते मधुमन्तमूर्मिं धेनुरिव पयो अस्मासु धुक्ष्व।
मधुश्चुतं घृतमिव सुपूतमृतस्य नः पतयो मृळयन्तु॥
हे क्षेत्रपति देव! गौ जिस प्रकार से दुग्ध प्रदान करती है, उसी प्रकार से आप मधुस्रावी, सुपवित्र, घृत तुल्य और माधुर्य युक्त प्रभूत जल प्रदान करें। यज्ञ के स्वामी हम लोगों को सुखी करें।[ऋग्वेद 4.57.2]
Hey Dev-master of land! Grant us sufficient water, which is as good as honey, Ghee, sweet, pure. Let the deity of the Yagy comfort us.
मधुमतीरोषधीर्द्याव आपो मधुमन्नो भवत्वन्तरिक्षम्।
क्षेत्रस्य पतिर्मधुमान्नो अस्त्वरिष्यन्तो अन्वेनं चरेम॥
ब्रीहि और प्रियंगु आदि औषधियाँ हम लोगों के लिए मधु युक्त हों। तीनों द्युलोक, जल समूह और अन्तरिक्ष हम लोगों के लिए मधु युक्त हों। क्षेत्रपति हम लोगों के लिए मधु युक्त हो। हम शत्रुओं द्वारा अहिंसित होकर उनका अनुगमन करें।[ऋग्वेद 4.57.3]
May the herbs-Ayur Vedic medicines be sweet for us; may the heavens, the waters, the firmament, be kind to us; may the deity  o the land be gracious to us; let us, undeterred by foes, have recourse to him.
Let the herbs-medicines called Brihi & Piynagu should we stuffed with honey. The heavens, water bodies and the space-sky should have honey. Kshetr Pati-demigod should possess honey. We should follow them saved-protected from the enemy.
Honey here specify pleasure, happiness.
शुनं वाहाः शुनं नरः शुनं कृषतु लाङ्गलम्।
शुनं वरत्रा बध्यन्तां शुनमष्ट्रा मुदिङ्गय॥
अश्व आदि वाहन हमारे लिए हर्षकारी हों। मनुष्य गण सुख पूर्वक कृषि कार्य करें। सुख पूर्वक हल को खेतों में चलायें। हल के जुवे सुख पूर्वक बाँधे जायँ और चाबुक भी मधुरता के साथ प्रयुक्त हों।[ऋग्वेद 4.57.4] 
बैलों का जूआ :: yoke. 
चाबुक :: कोड़ा, whip, lash, scourge.
Horses etc. used for moving-travel be pleasant-beneficial to us. Let the humans perform agriculture comfortably. Plough-cultivate the fields comfortably. Let the yoke be placed over the neck of the bullocks, softly-comfortably and the lash-whip may be used dearly.
शुनासीराविमां वाचं जुषेथां यद्दिवि चक्रथुः पयः। तेनेमामुप सिञ्चतम्॥
हे शुना और सीर! आप दोनों हमारी इस प्रार्थना को श्रवण करें। आप दोनों ने धुलोक में जिस जल को उत्पन्न किया है, उसी के द्वारा इस पृथ्वी को सिंचित करें।[ऋग्वेद 4.57.5]
Hey Shuna & Seer! Listen-respond to our prayers. The manner in which you created water in the space-sky, irrigate the earth similarly.
अर्वांची सुभगे भव सीते वन्दामहे त्वा।
यथा नः सुभगाससि यथा नः सुफलाससि॥
हे सौभाग्यवती सीते! आप हमारे ऊपर अनुकम्पा करने वाली होवें। हम आपकी प्रार्थना करते हैं। आप हम लोगों को सुन्दर धन प्रदान करें और सुन्दर फल दें। इसलिए हम आपकी वन्दना करते हैं।[ऋग्वेद 4.57.6]
शुभ सीता, तुम निकट आओ! हम तुम्हारी वंदना और पूजा करते हैं ताकि तुम हमें आशीर्वाद दो और समृद्ध करो और हमें प्रचुर मात्रा में फल दो।
सीता उर्वरता देवी हैं और उनकी पूजा की जाती है।
(अथर्ववेद के कौशिका सूत्र में सीता का उल्लेख पर्जन्य की पत्नी  में किया गया है। शुक्ल यजुर्वेद के पारस्कर गृह्य सूत्र में एक अन्य सीता के बारे में बताया गया है, जो इंद्र कि पत्नी हैं।)
Hey lucky Seete-the goddess of fertility! Bless us. We worship you. Grant us pleasant wealth & rewards.
इन्द्रः सीतां नि गृह्णातु तां पूषानु यच्छतु।
सा नः पयस्वती दुहामुत्तरामुत्तरां समाम्॥
इन्द्र देव हल की मुठ सँभालें। पूषा उस सीता को नियमित करें। वे उदकवती द्यौ संवत्सर के उत्तर संवत्सर में सस्य दोहन करें।[ऋग्वेद 4.57.7]
सस्य :: अनाज, पौधों, वृक्षों आदि का उत्पादन; produce food grains, fruits, trees, herbs etc.
सीता :: वनदेवी, भगवान् श्री राम की पत्नी, माँ लक्ष्मी की अवतार; goddess-deity of the forests-jungles. 
Let Indr Dev hold the plow handle. Let Pusha regularise Seeta-goddess-deity of the forests-jungles. Let them produce food grains, fruits, trees, herbs etc. through out the year.
शुनं नः फाला वि कृषन्तु भूमिं शुनं कीनाशा अभि यन्तु वाहैः।
शुनं पर्जन्यो मधुना पयोभिः शुनासीरा शुनमस्मासु धत्तम्॥
फाल (भूमि विदारक काष्ठ) सुख पूर्वक भूमि कर्षण करें। रक्षक गण बैलों के साथ अभिगमन करें। पर्जन्य मधुर जल द्वारा पृथ्वी को सिक्त करें। हे शुन, सीर (इन्द्र-वायु या वायु-आदित्य), हम लोगों को सुख प्रदान करें।[ऋग्वेद 4.57.8]
हल का फाल  :: लकड़ी या लोहे का बना हल का वह नुकीला हिस्सा जो खेत की भूमि में घुसकर उसे खोलता है ; ploughshares, coulter.
Let the plough shares-coulter open the soil easily. The protectors-farmers should move with the oxen-bulls. Let the clouds irrigate the soil. Hey Indr dev & Adity Dev-Sun grant comforts to us.(09.05.2023)
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (58) :: ऋषि :- वामदेव, गौतम, देवता :- अग्नि देव, सूर्य, वाष्प, गौ या घृत, छन्द :- त्रिष्टुप्,  जगती।
समुद्रादूर्मिर्मधुमाँ उदारदुपांशुना सममृतत्वमानट्।
घृतस्य नाम गुह्यं यदस्ति जिह्वा देवानाममृतस्य नाभिः॥
समुद्र (अग्नि, अन्तरिक्ष, आदित्य अथवा गौओं के ऊध: प्रदेश) से मधुमान ऊर्मि उद्भूत होती है। मनुष्य किरण द्वारा अमृतत्व प्राप्त करते हैं। घृत का जो गोपनीय नाम है, वह देवों का नाम है, वह देवों की जिव्हा और अमृत की नाभि है।[ऋग्वेद 4.58.1]
आकाश से मीठा जल उमड़ पड़ता है;  मनुष्य सौर किरण द्वारा अमरत्व प्राप्त करता है; वह जो स्पष्ट मक्खन का गुप्त नाम है वह देवताओं की जीभ है, अमृत की नाभि है।
ऊर्मि :: छोटी लहर, प्रवाह, बहाव, तरंग, हल्की लहर, वेग, किरण-प्रकाश की रश्मि; small wave, flow.
The sweet water swells up from the sky-space; by virtue of the rays of Sun and the humans attain immortality. The secret name of Ghee-clarified butter constitute the tongue of the demigods-deities and it form the  navel of nectar-ambrosia.
Small waves arise in the ocean sweetened by honey. Rays of light emerge from fire, Adity-Sun, the lower segment of the cows inducing immortality in the humans. Ghee obtained from the cows is the basis of nectar licked by the demigods-deities.
वयं नाम प्र ब्रवामा घृतस्यास्मिन्मज्ञे धारयामा नमोभिः।
उप ब्रह्मा शृणवच्छस्यमानं चतुःशृङ्गोऽवमीद्गौर एतत्॥
हम उस याजक घृत की प्रशंसा करते हैं। इस यज्ञ में नमस्कार द्वारा उसे धारित करते हैं। ब्रह्माजी इस प्रार्थना को श्रवण करें। वेद चतुष्टय रूप शृङ्ग विशिष्ट गौर वर्ण देव इस संसार का निर्वाह करते हैं।[ऋग्वेद 4.58.2]
हम इस यज्ञ-हवन, अग्निहोत्र में घी की प्रशंसा करते हुए उसे धारण करते हैं। चार रूपों वाले वेद और गौर वर्ण देवता ऐसे धारण करते हैं। ब्रह्मा जी हमारी प्रार्थना स्वीकार करें। 
We celebrate the name Ghee at this sacrifice, we offer it with adoration. Let the Veds in the form of fair coloured demigods-deities nurture-support the universe. Let Brahma Ji endorse our prayers.
We appreciate the Ghee and accept it in the Yagy. Let Brahma Ji listen to our prayer. The four Veds support the universe in the form of fair coloured demigods-deities.
चत्वारि शृङ्गा त्रयो अस्य पादा द्वे शीर्षे सप्त हस्तासो अस्य। 
त्रिधा बद्धो वृषभो रोरवीति महो देवो मत्य आ विवेश॥
इस यज्ञात्मक अग्नि के चार शृङ्ग हैं अर्थात् शृङ्ग स्थानीय चार देव हैं। इसे सवन स्वरूप तीन पाद हैं। ब्रह्मोदन एवं प्रवग्य स्वरूप दो मस्तक हैं। छन्द स्वरूप सात हाथ हैं। ये अभीष्ट वर्षी हैं। ये मंत्र, कल्प एवं ब्राह्मण द्वारा तीन प्रकार से बद्ध हैं। ये अत्यन्त शब्द करते हैं। वे महान देव मर्त्यों के बीच में प्रवेश करते हैं।[ऋग्वेद 4.58.3]
The holy-sacred fire of the Yagy has 4 elevations-horns-demigods. The three segments of the day are its legs. It has two heads, seven arms in the form of hymns-stanzas. They grant accomplishments and are tied-associated with Mantr, Kalp & the Brahman. They produce enormous sound. The great deity enters the perishables.
त्रिधा हितं पणिभिर्गुह्यमानं गवि देवासो घृतमन्वविन्दन्।
इन्द्र एकं सूर्य एकं जजान वेनादेकं स्वधया निष्टतक्षुः॥
प्राणियों ने गौओं के बीच में तीन प्रकार के दीप्त पदार्थों (क्षीर, दधि और घृत) को छिपाकर रखा। देवों ने उन्हें प्राप्त किया। इन्द्र देव ने एक क्षीर को उत्पन्न किया तथा सूर्य ने भी एक को उत्पन्न किया। देवों ने कान्तिमान् अग्नि या गमनशील वायु को निकट से अन्न द्वारा और एक पदार्थ घृत को निष्पन्न किया।[ऋग्वेद 4.58.4]
क्षीर :: दूध, खीर, किसी वृक्ष आदि का सफ़ेद रस, कोई तरल पदार्थ, जल; latex.
The cows have three divine objects :- milk, curd and Ghee. The demigods-deities obtained them. Indr Dev created one kind of milk-sap, latex followed by another by the Sun. The aurous demigods evolved fire, air, food grains & the ghee.
एता अर्षन्ति ह्यद्यात्समुद्राच्छतव्रजा रिपुणा नावचक्षे।
घृतस्य धारा अभि चाकशीमि हिरण्ययो वेतसो मध्य आसाम्॥
अपरिमित गति विशिष्ट यह जल हृदयङ्गम अन्तरिक्ष से अधोदेश में प्रवाहित होता है। प्रतिबन्धकारी शत्रु उसे नहीं देख सकते। उस सकल घृत धारा को हम देख सकते हैं। इसके बीच में अग्नि को भी देख सकते हैं।[ऋग्वेद 4.58.5]
The Ghee (sap-water) flow from the space to the earth unseen-undetected  by the enemy. We can see the flowing Ghee and the fire in it.
सम्यक्त्रवन्ति सरितो न धेना अन्तहृदा मनसा पूयमानाः।
एते अर्षन्त्यूर्मयों घृतस्य मृगा इव क्षिपणोरीषमाणाः॥
घृत की धारा प्रीति प्रद नदी के तुल्य क्षरित होती है। यह सकल जल हृदय मध्यगत चित्त के द्वारा पूत होता है। घृत की ऊर्मि प्रवाहित होती है। जैसे शिकारी के पास से मृग भाग जाता है।[ऋग्वेद 4.58.6]
घृत की धारा प्रीति प्रद नदियों की तरह निर्बाध रूप से बहती हैं, जो हृदय में विराजमान मन से शुद्ध होती हैं; घी की ये धाराएँ (आग पर) उतरती हैं, जैसे हिरण शिकारी से उड़ता है।
The current of Ghee appears like the dear-lovely river, purified-cleansed by the innerself. The waves formed by the Ghee flow like the deer who escape the hunter.
सिन्धोरिव प्राध्वने शूघनासो वातुप्रमियः पतयन्ति यह्वाः।
घृतस्य धारा अरुषो न वाजी काष्ठा भिन्दन्नूर्मिभिः पिन्वमानः॥
नदी का जल जिस प्रकार नीचे की ओर शीघ्र गमन करता है, उसी प्रकार वायु के तुल्य वेग शालिनी होकर महती घृत-धारा द्रुत वेग से गमन करती है। यह धृत राशि परीधि भेद करके ऊर्मि द्वारा वर्द्धित होती है, जिस प्रकार से गर्ववान अश्व गमन करता है।[ऋग्वेद 4.58.7]
The way the water in the river flow in the down ward direction quickly, strong current of Ghee flow at a very fast speed just like the air. It moves like the waves and horses, breaking barriers.
अभि प्रवन्त समनेव योषाः कल्याण्य १: स्मयमानासो अग्निम्।
घृतस्य धाराः समिधो नसन्त ता जुषाणो हर्यति जातवेदाः॥
कल्याणी और हँसने वाली स्त्री जिस प्रकार से एक चित्त होकर पति के प्रति आसक्त होती है, उसी प्रकार घृत धारा अग्नि देव के प्रति गमन करती है, वह सम्यक् रूप से दीप्ति प्रद होकर सभी जगह व्याप्त होती है। जातवेदा हर्षित होकर इस सकल धाराओं की कामना करते हैं।[ऋग्वेद 4.58.8]
कल्याणी :: कल्याण या मंगल करनेवाली, भाग्य शालिनी, रूपवती, सुन्दरी, कामधेनु, गाय, गौ, एक देवी का नाम, माषपर्णी
The way-manner in which a devoted and smiling wife is attached-attracted towards her husband, the current of Ghee bows-assimilate in Agni Dev, glow uniformly and illuminate all places. Agni Dev pleased-happy with it, desires to have its all currents. 
कन्याइव वहतुमेतवा उ अञ्ज्यञ्जाना अभि चाकशीमि।
यत्र सोमः सूयते यत्र यज्ञो घृतस्य धारा अभि तत्पवन्ते॥
कन्या (अनूढ़ा बालिका) जिस प्रकार से पति के निकट जाने के लिए अलंकृत होती है, हम देखते हैं, यह सकल घृत धारा उसी प्रकार से करती है। जिस स्थल में सोमरस अभिषुत होता है अथवा जिसके स्थल में यज्ञ विस्तीर्ण होता है, उसी को लक्ष्य कर वह धारा गमन करती है।[ऋग्वेद 4.58.9]
The current of Ghee behaves like a newly wed girl to accompany her husband, the entire Ghee current behaves similarly. The Ghee current moves to the place where Somras is extracted and the Yagy is conducted.
अभ्यर्षत सुष्टुतिं गव्यमाजिमस्मासु भद्रा द्रविणानि धत्त।
इमं यज्ञं नयत देवता नो घृतस्य धारा मधुमत्पवन्ते॥
हे हमारे ऋत्विकों! गौओं के निकट आगमन करें, उनकी शोभन प्रार्थना करें। हम याजकों के लिए वह प्रार्थना योग्य धन धारित करें। हमारे इस यज्ञ को देवों के निकट ले जावें। घृत की धारा मधुर भाव से गमन करती है।[ऋग्वेद 4.58.10]
Hey Ritviz! Move close to the cows and pray-worship them. Let these prayers grant us wealth and make our Yagy close to the demigods-deities. The current of Ghee flow to the Yagy happily.
धामन्ते विश्वं भुवनमधि श्रितमन्तः समुद्रे हृद्य १ न्तरायुषि।
अपामनीके समिथे य आभृतस्तमश्याम मधुमन्तं त ऊर्मिम्॥
आपका तेज समुद्र के बीच में वड़वाग्नि रूप से, अन्तरिक्ष के बीच में सूर्य मण्डल रूप से, हृदय के मध्य में वैश्वानर रूप से, अन्न में आहार रूप से, जल समूह में विद्युत रूप से और संग्राम में शौर्याग्नि रूप से विद्यमान है। समस्त लोक आपके आश्रित हैं। उसमें जो घृत रूप रस स्थापित हुआ है, उस मधुर रस को हम प्राप्त करते हैं।[ऋग्वेद 4.58.11]
Your energy is embedded in the ocean as Vadvagni, as Vaeshwanar in the heart of the solar system, as food in the food grains, as electricity in the water and bravery-valour in the war-battle. All abodes are dependent upon you. The Ghee established-present in them is required-desired by us.
आज 10.05.2023 को ऋग्वेद मंडल (4) का अँग्रेजी अनुवाद भगवान्  वेदव्यास, माँ भगवती सरस्वती और गणपति की असीम कृपा से सम्पन्न हुआ। मेरी परदादी-बूढ़ी माँ, पिताजी के ताऊ, दादा-दादी, अम्मा-पिताजी के आशीर्वाद मैं यह कर पाया।
    
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