Tuesday, January 13, 2015

HOMAGE SHRADDH TO MANES पितरों का तर्पण-श्राद्ध :: HINDU PHILOSOPHY (6.1) हिन्दु दर्शन

SHRADDH-HOMAGE TO MANES
पितरों का तर्पण-श्राद्ध
HINDU PHILOSOPHY (6.1) हिंदु दर्शन
CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM
By :: Pt. Santosh Bhardwaj
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ॐ गं गणपतये नम:।
अक्षरं परमं ब्रह्म ज्योतीरूपं सनातनम्।
निराकारं स्वेच्छामयमनन्तजम्॥
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि
[श्रीमद्भगवद्गीता 2.47]
श्राद्ध पूर्वजों के प्रति सच्ची श्रद्धा का प्रतीक हैं। पितरों के निमित्त विधिपूर्वक जो कर्म श्रद्धा से किया जाता है, उसी को श्राद्ध कहते हैं।
श्राद्ध का सम्बन्ध श्रद्धा से है और श्राद्ध में जो कुछ भी दिया जाता है, वह पितरों के द्वारा प्रयुक्त होने वाले उस भोजन में परिवर्तित हो जाता है, जिसे वे कर्म एवं पुनर्जन्म के अनुसार नये शरीर के रूप में पाते हैं। अनुचित एवं अन्यायपूर्ण ढंग से प्राप्त धन से जो श्राद्ध किया जाता है, वह चाण्डाल, पुक्कस तथा अन्य नीच योनियों में उत्पन्न लोगों की सन्तुष्टि का साधन होता है।[मार्कण्डेय पुराण]
जो कुछ उचित काल, पात्र एवं स्थान के अनुसार उचित (शास्त्रानुमोदित) विधि द्वारा पितरों को लक्ष्य करके श्रद्धापूर्वक ब्राह्मणों को दिया जाता है, श्राद्ध कहलाता है।[ब्रह्म पुराण]
श्रद्धा एवं श्राद्ध :: श्राद्ध शब्द श्रद्धा से बना है। श्राद्ध में श्राद्धकर्ता का यह अटल विश्वास रहता है कि मृत या पितरों के कल्याण के लिए ब्राह्मणों को जो कुछ भी दिया जाता है वह उसे या उन्हें किसी प्रकार अवश्य ही मिलता है। [स्कन्द पुराण]
श्रद्धा को देवत्व दिया गया है और वह देवता के समान ही सम्बोधित हैं।[ॠग्वेद]
बृहस्पति ने कहा कि देव मुझ में विश्वास (श्रद्धा) रखें तो मैं उनके पुरोहित का पद प्राप्त करूँ।[तैत्तिरीय संहिता]
श्रत् एवं श्रद्धा का सत्य के अर्थ में व्यक्त किया गया है। [निरुक्त]
प्रजापति ने श्रद्धा को सत्य में और अश्रद्धा को झूठ में रख दिया है और सत्य की प्राप्ति श्रद्धा से होती है। [वाज. सं.]
श्राद्धिन् एवं श्राद्धिक वह है जिसने श्राद्ध भोजन कर लिया हो। श्राद्ध शब्द श्रद्धा  प्रकट करता है।[पाणिनी]
श्रद्धा चेत्तस: संप्रसाद:। सा हि जननीव कल्याणी योगिनं पाति॥
श्रद्धा को मन का प्रसाद या अक्षोभ (स्थैर्य) कहा गया है।[योगसूत्र] 
प्रत्ययो धर्मकार्येषु तथा श्रद्धेत्युदाह्रता। 
नास्ति ह्यश्रद्धधानस्य धर्मकृत्ये प्रयोजनम्॥
धार्मिक कृत्यों में जो प्रत्यय या विश्वास होता है, वही श्रद्धा है, जिसे प्रत्यय नहीं है, उसे धार्मिक कर्म करने का प्रयोजन नहीं है।[देवल] 
श्रद्धा युक्त व्यक्ति शाक से भी श्राद्ध करे, भले ही उसके पास अन्य भोज्य पदार्थ न हों।[कात्यायन श्राद्ध सूत्र]
पितरों की संतुष्टि के लिए श्राद्ध पर बल दिया गया है। [मनु]
श्राद्ध की प्रशस्तियाँ :: पितरों के कृत्यों से दीर्घ आयु, स्वर्ग, यश एवं पुष्टिकर्म (समृद्धि) की प्राप्ति होती है। [बौधायन धर्मसूत्र]
श्राद्ध से यह लोक प्रतिष्ठित है और इससे योग (मोक्ष) का उदय होता है। [हरिवंश पुराण]
श्राद्ध से बढ़कर श्रेयस्कर कुछ नहीं है।[सुमन्तु]
यदि कोई श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करता है तो वह ब्रह्मा, इन्द्र, रुद्र एवं अन्य देवों, ऋषियों, पक्षियों, मानवों, पशुओं, रेंगने वाले जीवों एवं पितरों के समुदाय तथा उन सभी को जो जीव कहे जाते हैं, एवं सम्पूर्ण विश्व को प्रसन्न करता है। [वायुपुराण]
पितृ पूजन से आयु, पुत्र, यश, कीर्ति, पुष्टि (समृद्धि), बल, श्री, पशु, सौख्य, धन, धान्य की प्राप्ति होती है।[यम]
प्रपितामह को दिया गया पिण्ड स्वयं वासुदेव घोषित है, पितामह को दिया गया पिण्ड संकर्षण तथा पिता को दिया गया पिण्ड प्रद्युम्न घोषित है और पिण्ड कर्ता स्वयं अनिरुद्ध कहलाता है। [श्राद्धसार एवं श्राद्धप्रकाश द्वारा उदधृत विष्णु धर्मोत्तर पुराण]
विष्णु को तीनों पिण्डों में अवस्थित समझना चाहिए।[महाभारत शान्तिपर्व]
अमावस्या के दिन पितर लोग वायव्य रूप धारण कर अपने पुराने निवास के द्वार पर आते हैं और देखते हैं कि उनके कुल के लोगों के द्वारा श्राद्ध किया जाता है कि नहीं। ऐसा वे सूर्यास्त तक देखते हैं। जब सूर्यास्त हो जाता है, वे भूख एवं प्यास से व्याकुल हो निराश हो जाते हैं, चिन्तित हो जाते हैं, बहुत देर तक दीर्घ श्वास छोड़ते हैं और अन्त में अपने वंशजों को कोसते (उनकी भर्त्सना करते हुए) चले जाते हैं। जो लोग अमावस्या को जल या शाक-भाजी से भी श्राद्ध नहीं करते, उनके पितर उन्हें अभिशापित कर चले जाते हैं।[कूर्म पुराण]
"श्रद्धया इदं श्राद्धम्"‌
जो श्रद्धा से किया जाय, वह श्राद्ध है। प्रेत और पित्तर के निमित्त, उनकी आत्मा की तृप्ति-शान्ति के लिए श्रद्धा पूर्वक जो अर्पित किया जाए, वह श्राद्ध है। उचित समय पर शास्त्र सम्मत विधि द्वारा पितरों के लिए श्रद्धा भाव से मन्त्रों के साथ जो दान-दक्षिणा आदि, दिया जाय, वही श्राद्ध कहलाता है।
प्रत्येक गृहस्थ के लिये निम्न पाँच यज्ञों को नित्य करने का निर्देश है। 
ब्रह्म यज्ञ :: प्रतिदिन अध्ययन और अध्यापन करना ही ब्रह्म-यज्ञ है।
देव यज्ञ :: देवताओं की प्रसन्नता हेतु पूजन-हवन आदि करना।
पितृ यज्ञ :: श्राद्ध और तर्पण करना ही पितृ यज्ञ है।
भूत यज्ञ :: बलि और वैश्व देव की प्रसन्नता हेतु जो पूजा की जाती है, उसे भूत यज्ञ कहते हैं।
मनुष्य यज्ञ :: इसके अन्तर्गत अतिथि सत्कार आता है।
श्राद्ध करने की योग्यता :: जो कोई व्यक्ति मृतक की सम्पत्ति ले लेता है, उसे उसके लिए श्राद्ध करना चाहिए अथवा जो भी कोई श्राद्ध करने की योग्यता रखता है अथवा श्राद्ध का अधिकारी है, वह मृतक की सम्पत्ति ग्रहण कर सकता है।[विष्णु धर्मोत्तर]
इन्द्र ने सम्राट मान्धाता से कहा कि अनार्य-दस्यु यवन, किरात आदि अनार्य-दस्यु पितृ यज्ञ कर सकते हैं और ब्राह्मणों को धन भी दे सकते हैं।[शान्ति पर्व]
म्लेच्छों को पितरों के लिए श्राद्ध करना चाहिये है। [वायु पुराण]
पुत्रहीन पत्नी को (मरने पर) पति द्वारा पिण्ड नहीं दिया जाना चाहिए, पिता द्वारा पुत्र को तथा बड़े भाई के द्वारा छोटे भाई को भी पिण्ड नहीं दिया जाना चाहिए। निमि ने अपने मृत पुत्र का श्राद्ध किया था, किन्तु उन्होंने आगे चलकर पश्चाताप किया, क्योंकि वह कार्य धर्मसंकट था।[गोभिलस्मृति]
पिता को पुत्र का एवं बड़े भाई को छोटे भाई का श्राद्ध नहीं करना चाहिए। [अपरार्क]
कभी-कभी यह सामान्य नियम भी नहीं माना जा सकता।[बृहत्पराशर]
स्नेहवश किसी के लिए भी श्राद्ध करने की, विशेषत: गया, में अनुमति दी है। ऐसा कहा गया है कि केवल वही पुत्र कहलाने योग्य है, जो पिता की जीवितावस्था में उसके वचनों का पालन करता है, प्रति वर्ष (पिता की मृत्यु के उपरान्त) पर्याप्त भोजन, (ब्राह्मणों) को देता है और जो गया में (पूर्वजों) को पिण्ड देता है।[बौधायन एवं वृद्धशातातप]
उपनयन विहीन बच्चा शूद्र के समान है और वह वैदिक मंत्रों का उच्चारण नहीं कर सकता, परन्तु अन्त्येष्टि कर्म से सम्बन्धित वैदिक मंत्रों का उच्चारण कर सकता है। अल्पवयस्क पुत्र भी, यद्यपि अभी वह उपनयन विहीन होने के कारण वेदाध्ययन रहित है, अपने पिता को जल तर्पण कर सकता है, नव श्राद्ध कर सकता है और 'शुन्धन्तां पितर:' जैसे मंत्रों का उच्चारण कर सकता है, किन्तु श्रौताग्नियों या गृह्यग्नियों के अभाव में वह पार्वण जैसे श्राद्ध नहीं कर सकता।[मेधातिथि]
अनुपनीत-जिनका अभी उपनयन संस्कार नहीं हुआ है, बच्चों, स्त्रियों तथा शूद्रों को पुरोहित द्वारा श्राद्धकर्म कराना चाहिए या वे स्वयं भी बिना मंत्रों के श्राद्ध कर सकते हैं; किन्तु वे केवल मृत के नाम एवं गोत्र या दो मंत्रों, यथा :– देवेभ्यो नम: एवं पितृभ्य: स्वधा नम: का उच्चारण कर सकते हैं। पुरुषों, स्त्रियों एवं उपनीत तथा अनुपनीत बच्चों को भी श्राद्ध करना चाहिये।[स्मृत्यर्थसार] 
प्रपौत्र द्वारा श्राद्ध :: पिता, पितामह एवं प्रपितामह तीन स्व-सम्बन्धी पूर्व पुरुषों का श्राद्ध किया जाता है।[तैत्तिरीय संहिता एवं तैत्तिरीय ब्राह्मण] 
सात प्रकार के व्यक्ति एक-दूसरे से अति सम्बन्धित हैं और वे अविभक्तदाय सपिण्ड कहे जाते हैं :– प्रपितामह, पिता, स्वयं व्यक्ति-जो अपने से पूर्व से तीन को पिण्ड देता है, उसके सहोदर भाई, उसका पुत्र-उसी की जाति वाली पत्नी से उत्पन्न, पौत्र एवं प्रपौत्र। सकुल्य वे हैं जो विभक्तदायाद हैं, मृत की सम्पत्ति उसे मिलती है, जो मृत के शरीर से उत्पन्न हुआ है।[बौधायन धर्मसूत्र]
पुत्र के जन्म से व्यक्ति उच्च लोकों-स्वर्ग आदि की प्राप्ति करता है, पौत्र से अमरता प्राप्त करता है और प्रपौत्र से वह सूर्य लोक पहुँच जाता है। व्यक्ति के तीन वंशज समान रूप से व्यक्ति को आध्यात्मिक लाभ पहुँचाते हैं।[मनु] 
आह्विक यज्ञ :: वह आह्विक यज्ञ जिसमें पितरों को स्वधा (भोजन) एवं जल दिया जाता है, पितृयज्ञ कहलाता है [शतपथ ब्राह्मण एवं तैत्तिरीय आरण्यक] 
पितृयज्ञ को तर्पण-जल से पूर्वजों की संतुष्टि, करना कहा है।[मनु]
प्रत्येक गृहस्थ को प्रतिदिन भोजन या जल या दूध, मूल एवं फल के साथ श्राद्ध करना चाहिए और पितरों को संतोष देना चाहिए। प्रारम्भिक रूप में श्राद्ध पितरों के लिए अमावस्या के दिन किया जाता था। अमावस्या दो प्रकार की होती है; विनोवाली एवं कुहू। आहिताग्नि (अग्निहोत्री) सिनीवाली में श्राद्ध करते हैं तथा इनसे भिन्न एवं शूद्र लोग कुहू अमावस्या में श्राद्ध करते हैं।[मनु] 
श्राद्ध की कोटियाँ :: श्राद्ध (या सभी कृत्य) तीन कोटियों में विभाजित किये गये हैं; नित्य, नैमित्तिक एवं काम्य।
नित्य श्राद्ध :: वह किसी निश्चित अवसर पर किया जाए यथा–आह्विक, अमावास्या के दिन वाला या अष्टका के दिन वाला।
नित्य कर्म यथा :- अग्निहोत्र, दर्श पूर्णमास याग, अवश्य करने चाहिए, भले ही कर्ता उनके कुछ उपकृत्यों को करने में असमर्थ हो। काम्य कृत्यों के सभी भाग सम्पादित होने चाहिए और यदि कर्ता सोचता है कि वह सबका सम्पादन करने में असमर्थ है तो उसे काम्य कृत्य करने ही नहीं चाहिए।[जैमिनिय] 
पंचमहायज्ञ कृत्य, जिनमें पितृयज्ञ भी सम्मिलित है, नित्य कहे जाते हैं अर्थात् उन्हें बिना किसी फल की आशा के करना चाहिए, उनके न करने से पाप लगता है। नित्य कर्मों को करने से प्राप्त फल की जो चर्चा धर्मशास्त्रों में मिलती है, वह केवल प्रशंसा मात्र ही है। उससे केवल यही व्यक्त होता है कि कर्मों के सम्पादन से व्यक्ति पवित्र हो जाता है। किन्तु ऐसा नहीं है कि वे अपरिहार्य नहीं है और उनका सम्पादन तभी होता है, जब व्यक्ति किसी विशिष्ट फल की आशा रखता है अर्थात् इन कर्मों का सम्पादन काम्य अथवा इच्छाजनित नहीं है।
श्राद्ध का सम्पादन प्रत्येक मास के अन्तिम पक्ष में होना चाहिए, दोपहर को श्रेष्ठता मिलनी चाहिए और पक्ष के आरम्भिक दिनों की अपेक्षा अन्तिम दिनों को अधिक महत्त्व देना चाहिए। [आपस्तम्ब धर्मसूत्र]
श्राद्ध प्रत्येक मास के कृष्ण पक्ष में चतुर्थी को छोड़कर किसी भी दिन किया जा सकता है। [गौतम एवं वसिष्ठ]
यदि विशिष्ट रूप में उचित सामग्रियों या पवित्र ब्राह्मण उपलब्ध हो या कर्ता किसी पवित्र स्थान (यथा–गया) में हो तो श्राद्ध किसी भी दिन किया जा सकता है। [गौतम, कूर्म पुराण]
गया में किसी भी दिन श्राद्ध किया जा सकता है। [अग्नि पुराण]
नैमित्तिक श्राद्ध :: जो ऐसे अवसर पर किया जाए जो कि अनिश्चित सा हो, यथा :– पुत्रोत्पत्ति आदि पर, उसे कहा जाता है।
काम्य श्राद्ध :: जो किसी विशिष्ट फल के लिए किया जाए यथा :– स्वर्ग, संतति आदि की प्राप्ति के लिए। कृत्तिका या रोहिणी पर किया गया श्राद्ध।
विष्णु धर्मसूत्र द्वारा वर्णित दिनों में किये जाने वाले श्राद्ध नैमित्तिक हैं और जो विशिष्ट तिथियों एवं सप्ताह के दिनों में कुछ निश्चित इच्छाओं की पूर्ति के लिए किये जाते हैं, वे काम्य श्राद्ध कहे जाते हैं। 
परा. मा. के मत से नित्य कर्मों का सम्पादन संस्कारक जो कि मन को पवित्र बना दे और उसे शुभ कर्मों की ओर प्रेरित करे, कहा जाता है। किन्तु कुछ परिस्थितियों में यह अप्रत्यक्ष अन्तर्हित रहस्य-परम तत्त्व की जानकारी की अभिकांक्षा भी उत्पन्न करता है।
श्राद्ध फल :: संक्रान्ति पर किया गया श्राद्ध अनन्त काल तक के लिए स्थायी होता है। जन्म के दिन एवं कतिपय नक्षत्रों में श्राद्ध करना चाहिए। कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि से अमावस्या तक किये गये श्राद्धों के फलों का उल्लेख आपस्तम्ब धर्मसूत्र, अनुशासन पर्व, वायु पुराण, याज्ञवल्क्य, ब्रह्म पुराण, विष्णु धर्मसूत्र, कूर्म पुराण, ब्रह्माण्ड पुराण में किया गया है।
रविवार को श्राद्ध करने वाला रोगों से सदा के लिए छुटकारा पा जाता है और वे जो सोम, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र एवं शनि को श्राद्ध करते हैं, क्रम से सौख्य (या प्रशंसा), युद्ध में विजय, सभी इच्छाओं की पूर्ति, अभीष्ट ज्ञान, धन एवं लम्बी आयु प्राप्त करते हैं।[विष्णु धर्मसूत्र]
कूर्म पुराण में सप्ताह के कतिपय दिनों में सम्पादित श्रोद्धों से उत्पन्न फलों का उल्लेख किया है।
विष्णु धर्मसूत्र ने कृत्तिका से भरणी-अभिजित को भी सम्मिलित करते हुए; तक के 28 नक्षत्रों में सम्पादित श्राद्धों से उत्पन्न फलों का उल्लेख किया है।
वे श्राद्ध जो किसी तीर्थ या युगादि एवं मन्वादि दिनों में किये जाते हैं वे पितरों को अक्षय संतुष्टि देते हैं।[अग्नि पुराण]
विष्णु पुराण, मत्स्य पुराण, पद्म पुराण, वराह पुराण, प्रजापति स्मृति एवं स्कन्द पुराण का कथन है कि वैशाख शुक्ल तृतीया, कार्तिक शुक्ल नवमी, भाद्रपद कृष्ण त्रयोदशी एवं माघ की अमावास्या युगादि तिथियाँ अर्थात् चारों युगों के प्रथम दिन कही जाती हैं, वे पितरों को अक्षय संतुष्टि देती हैं।
मत्स्य पुराण, अग्नि पुराण, सौर पुराण, पद्म पुराणने 14 मनुओं या मन्वन्तरों की प्रथम तिथियाँ इस प्रकार दी हैं :– आश्विन शुक्ल नवमी, कार्तिक शुक्ल द्वादशी, चैत्र एवं भाद्रपद शुक्ल तृतीया, फाल्गुन की अमावास्या, पौष शुक्ल एकादशी, आषाढ़ शुक्ल दशमी एवं माघ शुक्ल सप्तमी, श्रावण कृष्ण अष्टमी, आषाढ़, कार्तिक, फाल्गुन, चैत्र एवं ज्येष्ठ की पूर्णिमा; पितरों को अक्षय संतुष्टि देती हैं।
मत्स्यपुराण की सूची स्मृतिच, कृत्यरत्नाकर, परा. मा.एवं मदनपारिजात, स्कन्द पुराण एवं स्मृत्यर्थसार, स्कन्दपुराण-नागर खण्ड, में श्वेत से लेकर तीन कल्पों की प्रथम तिथियाँ श्राद्ध के लिए उपयुक्त ठहरायी गयी हैं और वे पितरों को अक्षय संतुष्टि देती हैं। 
श्राद्ध और ग्रहण :: आपस्तम्ब धर्मसूत्र, मनु, विष्णु धर्म सूत्र, कूर्म पुराण, ब्रह्माण्ड पुराण, भविष्य पुराण ने रात्रि, संध्या (गोधूलि काल) या जब सूर्य का तुरत उदय हुआ हो तब–ऐसे कालों में श्राद्ध सम्पादन मना किया है। किन्तु चन्द्र ग्रहण के समय छूट दी है। आपस्तम्ब धर्मसूत्र ने इतना जोड़ दिया है कि यदि श्राद्ध सम्पादन अपरान्ह्न में आरम्भ हुआ हो और किसी कारण से देर हो जाए तथा सूर्य डूब जाए तो कर्ता को श्राद्ध सम्पादन के शेष कृत्य दूसरे दिन ही करने चाहिए और उसे दर्भों पर पिण्ड रखने तक उपवास करना चाहिए।
अपरान्ह्न :: दोपहर और सँध्या के बीच का समय सामान्यतया अपरान्ह्न माना गया है। श्राद्ध काल के लिए मनु द्वारा व्यवस्थित अपरान्ह्न के अर्थ के विषय में अपरार्क, हेमाद्रि एवं अन्य लेखकों तथा निबन्धों में विद्वत्तापूर्ण विवेचन उपस्थित किया गया है। कई मत प्रकाशित किये गये हैं। कुछ लोगों के मत से मध्यान्ह्न के उपरान्त दिन का शेषान्त अपरान्ह्न है। पूर्वाह्न शब्द ऋग्वेद में आया है। इस कथन के आधार पर कहा है कि दिन को तीन भागों में बांट देने पर अन्तिम भाग अपरान्ह्न कहा जाता है। तीसरा मत यह है कि पाँच भागों में विभक्त दिन का चौथा भाग अपरान्ह्न है। इस मत को मानने वाले शतपथ ब्राह्मण पर निर्भर हैं। दिन के पाँच भाग ये हैं :–प्रात:, संगव, मध्यन्दिन (मध्यान्ह्न), अपरान्ह्न एवं सायाह्न (साँय या अस्तगमन)। इनमें प्रथम तीन स्पष्ट रूप से ऋग्वेद में उल्लिखित हैं। प्रजापति स्मृति में आया है कि इनमें प्रत्येक भाग तीन मुहूर्तों तक रहता है। इसने आगे कहा है कि कुतप सूर्योदय के उपरान्त आठवाँ मुहूर्त है और श्राद्ध को कुतप में आरम्भ करना चाहिए तथा उसे रौहिण मुहूर्त के आगे नहीं ले जाना चाहिए। श्राद्ध के लिए पाँच मुहूर्त (आठवें से बारहवें तक) अधिकतम योग्य काल हैं।
कुतप :: यह कु-निन्दित अर्थात् पाप एवं तप-जलाना से बना है। इसके आठ अर्थ ये हैं :– मध्याह्न, खड्गपात्र-गेंडे के सींग का बना पात्र, नेपाल का कम्बल, रूपा-चाँदी, दर्भ, तिल, गाय एवं दौहित्र-कन्या का पुत्र। अमावास्या, महालय, अष्टका एवं अन्वष्टका के श्राद्ध अपरान्ह्न में ही किये जाते हैं। वृद्धि श्राद्ध और आम श्राद्ध-जिनमें केवल अन्न का ही अर्पण होता है, प्रात: काल में किये जाते हैं। [स्मृति वचन एवं हेमाद्रि]
यदि मुख्य काल में श्राद्ध करना सम्भव: न हो तो उसके पश्चात् वाले गौण काल में उसे करना चाहिए, किन्तु कृत्य के मुख्य काल एवं सामग्री संग्रहण के काम में प्रथम को ही वरीयता देनी चाहिए और सभी मुख्य द्रव्यों को एकत्र करने के लिए गौण काल के अतिरिक्त अन्य कार्यों में उसकी प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए।[त्रिकाण्ड मण्डन]
श्राद्ध स्थल :: कर्ता को प्रयास करके दक्षिण की ओर ढालू भूमि खोजनी चाहिए, जो कि पवित्र हो और जहाँ पर मनुष्य अधिकतर न जाते हों। उस भूमि को गोबर से लीप देना चाहिए, क्योंकि पितर लोग वास्तविक स्वच्छ स्थलों, नदी-तटों एवं उस स्थान पर किये गए श्राद्ध से प्रसन्न होते हैं, जहाँ पर लोग बहुधा कम ही जाते हैं। [मनु]
श्राद्ध स्थल चतुर्दिक से आवृत, पवित्र एवं दक्षिण की ओर ढालू होना चाहिए। [याज्ञवल्क्य] 
बैलों, हाथियों एवं घोड़ों की पाठ पर, ऊँची भूमि या दूसरे की भूमि पर श्राद्ध नहीं करना चाहिए।[शंख] 
वन, पुण्य पर्वत, तीर्थस्थान, मन्दिर; इनके निश्चित स्वामी नहीं होते और ये किसी की वैयक्तिक सम्पत्ति नहीं हैं।[कूर्म पुराण]
गया :: विष्णुपद मंदिर का निर्माण भगवान विष्णु के पाँव के निशान पर इस मंदिर का निर्माण कराया गया है। यहाँ पितृदान भी किया जाता है। यहाँ फल्गु नदी के तट पर पिंडदान करने से मृत व्यक्ति को बैकुंठ की प्राप्ति होती है। विष्णुधर्मसूत्र ने श्राद्ध योग्य जिन 55 तीर्थों के नाम दिये हैं, उनमें गयाशीर्ष, अक्षयवट, फल्गु, उत्तर मानस, मतंग-वापी, विष्णुपद प्रमुख हैं। यहाँ व्यक्ति जो कुछ दान करता है उससे उसे अक्षय फल मिलता है।
श्राद्ध कर्म हेतु बिहार स्थित गया सर्वोपरि है। गया समूचे भारत वर्ष में हीं नहीं सम्पूर्ण विश्व में दो स्थान :- बोध गया और विष्णुपद मन्दिर श्राद्ध तर्पण के आवश्यक अंग हैं। विष्णुपद मंदिर वह स्थान है जहाँ स्वयं भगवान् विष्णु के चरण उपस्थित है, जिसकी पूजा करने के लिए लोग देश के कोने-कोने से आते हैं। गया में जो दूसरा सबसे प्रमुख स्थान है जिसके लिए लोग दूर दूर से आते है वह स्थान  फल्गु नदी है। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् श्री राम ने स्वयं इस स्थान पर अपने पिता महाराज दशरथ का पिंड दान किया था। इस स्थान पर आकर कोई भी व्यक्ति अपने पितरो के निमित्त पिंड दान करता है तो उसके पितृ उससे तृप्त रहते हैं और वह व्यक्ति पितृऋण से उरिण हो जाता  है। भगवान् श्री हरी विष्णु ने यहीं पर असुर गयासुर का वध किया था। 
पितरों के लिए गया में जाना, फल्गु-स्नान करना, पितृ तर्पण करना, गदाधर-विष्णु एवं गयाशीर्ष का दर्शन करना चाहिये है।[अत्रि-स्मृति 55-58]
गया तीर्थ में किये गये श्राद्ध से उत्पन्न अक्षय फल का उल्लेख किया है।[शंख]
नासिक :: नासिक से लगभग 28 किलोमीटर की दूरी पर स्थित त्रयंबकेश्वर गौतम ऋषि की तपोभूमि है। गौतम ऋषि ने भगवान् शिव की तपस्या करके माँ गंगा को यहाँ अवतरित करने का वरदान माँगा था, जिसके फलस्वरूप यहाँ गोदावरी नदी की धारा प्रवाहित हुई। इसलिए गोदावरी को दक्षिण भारत की गंगा भी कहा जाता है। इस स्थान पर किया श्राद्ध और पिण्ड दान सीधा पितरों तक पहुँचता है। इससे पितरों को प्रेत योनी से मुक्ति मिलती है और वह उत्तम लोक में स्थान प्राप्त करते हैं। यहाँ श्राद्ध, तर्पण, पिण्डदान एवं पितरों की संतुष्टि हेतु ब्राह्मण भोजन करवाने से पितर तृप्त होकर अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद प्रदान करते हैं।
श्राद्ध वर्जना :: म्लेच्छदेश में न तो श्राद्ध करना चाहिए और न ही जाना चाहिए; उसमें पुन: कहा गया है कि म्लेच्छदेश वह है जिसमें चार वर्णों की परम्परा नहीं पायी जाती है। [विष्णु धर्मसूत्र] 
त्रिशंकु देश, जिसका बारह योजन विस्तार है, जो कि महानदी के उत्तर और कीकट (मगध) के दक्षिण में है, श्राद्ध के लिए योग्य नहीं हैं। [वायु पुराण]
कारस्कर, कलिंग, सिंधु के उत्तर का देश और वे सभी देश जहाँ वर्णाश्रम की व्यवस्था नहीं पायी जाती है, श्राद्ध के लिए यथा साध्य त्याग देने चाहिए। 
श्राद्ध कर्म परिहार :: निम्नलिखित देशों में श्राद्ध कर्म का यथासम्भव परिहार करना चाहिए :- किरात देश, कलिंग, कोंकण, क्रिमि, दशार्ण, कुमार्य-कुमारी अन्तरीप, तंगण, क्रथ, सिंधु नदी के उत्तरी तट, नर्मदा का दक्षिणी तट एवं करतोया का पूर्वी भाग।[ब्रह्मपुराण] 
विसर्जन श्राद्ध के 3 प्रकार :: (1). पिण्ड विसर्जन, (2). पितृ विसर्जन और (3). देव विसर्जन।
उदक कर्म :: मृतक के लिए जल दान की क्रिया को उदक कर्म कहते हैं।
श्राद्ध और पितर :: श्राद्धों का पितरों के साथ अटूट सम्बंध है। पितरों के बिना श्राद्ध की कल्पना नहीं की जा सकती। श्राद्ध पितरों को आहार पहुँचाने का माध्यम मात्र है। मृत व्यक्ति के लिए जो श्रद्धायुक्त होकर तर्पण, पिण्ड, दानादि किया जाता है, उसे श्राद्ध कहा जाता है और जिस 'मृत व्यक्ति' के एक वर्ष तक के सभी और्ध्व दैहिक क्रिया कर्म संपन्न हो जायें, उसी की 'पितर' संज्ञा हो जाती है।
मेरे वे पितर जो प्रेतरूप हैं, तिलयुक्त जौं के पिण्डों से तृप्त हों। साथ ही सृष्टि में हर वस्तु ब्रह्मा से लेकर तिनके तक, चर हो या अचर, मेरे द्वारा दिये जल से तृप्त हों।[वायु पुराण]
पिण्ड :: श्राद्ध-कर्म में पके हुए चावल, दूध और तिल को मिश्रित करके पिण्ड बनाते हैं, उसे 'सपिण्डीकरण' कहते हैं। पिण्ड का अर्थ है शरीर। चावल के पिण्ड जो पिता, दादा, परदादा और पितामह के शरीरों का प्रतीक हैं, आपस में मिलकर फिर अलग बाँटते हैं। 
पिंडदान :: गया में आश्विन-कृष्णपक्ष में बहुत अधिक लोग श्राद्ध करने जाते हैं। पूरे श्राद्ध पक्ष वे वहाँ रहते हैं। श्राद्धपक्ष के लिए पिंडदान आदि का क्रम इस प्रकार है। 
भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी पुनपुन तट पर श्राद्ध।
भाद्रपद पूर्णिमा फल्गु नदी में स्नान और नदी पर खीर के पिंड से श्राद्ध।
आश्विन कृष्ण प्रतिपदा ब्रह्मकुंड, प्रेतशिला, राम कुंड एवं रामशिला पर श्राद्ध और काकबलि।
आश्विन कृष्ण द्वितीया उत्तरमानस, उदीची, कनखल, दक्षिणमानस और जिह्वालोल तीर्थों पर पिंडदान।
आश्विन कृष्ण तृतीया सरस्वती स्नान, मतंगवापी, धर्मारण्य और बोधगया में श्राद्ध।
आश्विन कृष्ण चतुर्थी ब्रह्मसरोवर पर श्राद्ध, आम्रसेचन और काकबलि।
आश्विन कृष्ण पंचमी विष्णुपद मंदिर में रुद्रपद, ब्रह्मपद और विष्णुपद पर खीर के पिंड से श्राद्ध।
आश्विन कृष्ण षष्ठी से अष्टमी तक विष्णुपद के सोलह वेदी नामक मंडप में 14 स्थानों पर और पास के मंडप में दो स्थानों पर पिंडदान होता है।
आश्विन कृष्ण नवमी रामगया में श्राद्ध और सीता कुंड पर माता, पितामही को बालू के पिंड दिए जाते हैं।
आश्विन कृष्ण दशमी गय सिर और गय कूप के पास पिंड दान किया जाता है।
आश्विन कृष्ण एकादशी मुंडपृष्ठ, आदि गया और धौत पाद में खोवे या तिल-गुड़ से पिंडदान।
आश्विन कृष्ण द्वादशी भीमगया, गोप्रचार और गदालोल में पिंडदान।
आश्विन कृष्ण त्रियोदशी फल्गु में स्नान करके दूध का तर्पण, गायत्री, सावित्री तथा सरस्वती तीर्थ पर क्रमशः प्रातः, मध्याह्न और सायंकाल स्नान और संध्या।
आश्विन कृष्ण चतुर्दशी वैतरणी स्नान और तर्पण।
आश्विन अमावस्या अक्षय वट के नीचे श्राद्ध और ब्राह्मण-भोजन।
आश्विन शुक्ल प्रतिपदा गायत्री घाट पर दही-अक्षत का पिंड देकर गया श्राद्ध समाप्त किया जाता है।
पिण्डदान :: पिण्ड दाहिने हाथ में लिया जाए। मन्त्र के साथ पितृतीथर् मुद्रा से दक्षिणाभिमुख होकर पिण्ड किसी थाली या पत्तल में क्रमशः स्थापित करें। 
(1). प्रथम पिण्ड देवताओं के निमित्त :- 
ॐ उदीरतामवर उत्परास, ऽउन्मध्यमाः पितरः सोम्यासः।
असुं यऽईयुरवृका ऋतज्ञाः, ते नोऽवन्तु पितरो हवेषु।
(2). दूसरा पिण्ड ऋषियों के निमित्त :- 
ॐ अंगिरसो नः पितरो नवग्वा, अथवार्णो भृगवः सोम्यासः।
तेषां वय सुमतौ यज्ञियानाम्, अपि भद्रे सौमनसे स्याम॥
(3). तीसरा पिण्ड दिव्य मानवों के निमित्त :- 
ॐ आयन्तु नः पितरः सोम्यासः, अग्निष्वात्ताः पथिभिदेर्वयानैः।
अस्मिन्यज्ञे स्वधया मदन्तः, अधिब्रवन्तु तेऽवन्त्वस्मान्॥
(4). चौथा पिण्ड दिव्य पितरों के निमित्त :- 
ॐ ऊजरँ वहन्तीरमृतं घृतं, पयः कीलालं परिस्रुत्। 
स्वधास्थ तपर्यत मे पितृन्॥
(5). पाँचवाँ पिण्ड यम के निमित्त :- 
ॐ पितृव्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः, पितामहेभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः, प्रपितामहेभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः। अक्षन्पितरोऽमीमदन्त, पितरोऽतीतृपन्त पितरः, पितरः शुन्धध्वम्॥
(6). छठवाँ पिण्ड मनुष्य-पितरों के निमित्त :- 
ॐ ये चेह पितरो ये च नेह, याँश्च विद्म याँ२ उ च न प्रविद्म।
त्वं वेत्थ यति ते जातवेदः, स्वधाभियर्ज्ञ सुकृतं जुषस्व॥
(7). सातवाँ पिण्ड मृतात्मा के निमित्त :- 
ॐ नमो वः पितरो रसाय, नमो वः पितरः शोषाय, नमो वः पितरो जीवाय; नमो वः पितरः स्वधायै, नमो वः पितरो घोराय। नमो वः पितरो मन्यवे, नमो वः पितरः पितरो; नमो वो गृहान्नः पितरो, दत्त सतो वः पितरो देष्मैतद्वः, पितरो वासऽआधत्त॥
(8). आठवाँ पिण्ड पुत्रदार रहितों के निमित्त :- 
ॐ पितृवंशे मृता ये च, मातृवंशे तथैव च। 
गुरुश्वसुरबन्धूनां, ये चान्ये बान्धवाः स्मृताः॥
ये मे कुले लुप्तपिण्डाः, पुत्रदारविवजिर्ताः। 
तेषां पिण्डो मया दत्तो, ह्यक्षय्यमुपतिष्ठतु॥
(9). नौवाँ पिण्ड उच्छिन्न कुलवंश वालों के निमित्त :- 
ॐ उच्छिन्नकुलवंशानां, येषां दाता कुले नहि। 
धमर्पिण्डो मया दत्तो, ह्यक्षय्यमुपतिष्ठतु॥
(10). दसवाँ पिण्ड गभर्पात से मर जाने वालों के निमित्त :- 
ॐ विरूपा आमगभार्श्च, ज्ञाताज्ञाताः कुले मम। 
तेषां पिण्डो मया दत्तो, ह्यक्षय्यमुपतिष्ठतु॥
(11). ग्यारहवाँ पिण्ड इस जन्म या अन्य जन्म के बन्धुओं के निमित्त :- 
ॐ अग्निदग्धाश्च ये जीवा, ये प्रदग्धाः कुले मम। 
भूमौ दत्तेन तृप्यन्तु, धमर्पिण्डं ददाम्यहम्॥
(12). बारहवाँ पिण्ड इस जन्म या अन्य जन्म के बन्धुओं के निमित्त :- 
ॐ ये बान्धवाऽ बान्धवा वा, ये ऽन्यजन्मनि बान्धवाः।
तेषां पिण्डो मया दत्तो, ह्यक्षय्यमुपतिष्ठतु॥
यदि तीर्थ श्राद्ध में, पितृपक्ष में से एक से अधिक पितरों की शान्ति के लिए पिण्ड अपिर्त करने हों, तो नीचे लिखे वाक्य में पितरों के नाम-गोत्र आदि जोड़ते हुए वाञ्छित संख्या में पिण्डदान किये जा सकते हैं।
... गोत्रस्य अस्मद् ...नाम्नो, अक्षयतृप्त्यथरँ इदं पिण्डं तस्मै स्वधा॥ 
पिण्ड समपर्ण के बाद पिण्डों पर क्रमशः दूध, दही और मधु चढ़ाकर पितरों से तृप्ति की प्राथर्ना की जाती है।
निम्न मन्त्र पढ़ते हुए पिण्ड पर दूध दुहराएँ :- 
ॐ पयः पृथिव्यां पयऽओषधीषु, पयो दिव्यन्तरिक्षे पयोधाः। पयस्वतीः प्रदिशः सन्तु मह्यम्।
पिण्डदाता निम्नांकित मन्त्रांश को दुहराएँ :- 
ॐ दुग्धम्। दुग्धम्। दुग्धम्। तृप्यध्वम्। तृप्यध्वम्। तृप्यध्वम्॥
निम्नांकित मन्त्र से पिण्ड पर दही चढ़ाएँ :-
ॐ दधिक्राव्णे ऽअकारिषं, जिष्णोरश्वस्य वाजिनः। सुरभि नो मुखाकरत्प्रण, आयु षि तारिषत्।
पिण्डदाता निम्नांकित मन्त्रांश दुहराएँ :-
ॐ दधि। दधि। दधि। तृप्यध्वम्। तृप्यध्वम्। तृप्यध्वम्।
नीचे लिखे मन्त्रों साथ पिण्डों पर शहद चढ़ाएँ :-
ॐ मधुवाताऽऋतायते, मधु क्षरन्ति सिन्धवः। माध्वीनर्: सन्त्वोषधीः।
ॐ मधु नक्तमुतोषसो, मधुमत्पाथिर्व रजः। मधु द्यौरस्तु नः पिता।
ॐ मधुमान्नो वनस्पतिर, मधुमाँअस्तु सूयर्:। माध्वीगार्वो भवन्तु नः। 
पिण्डदान कर्त्ता निम्नांकित मन्त्रांश को दुहराएँ :-
ॐ मधु। मधु। मधु। तृप्यध्वम्। तृप्यध्वम्। तृप्यध्वम्। 
श्राद्ध दिवस से पूर्व दिवस को बुद्धिमान पुरुष श्रोत्रिय आदि से विहित ब्राह्मणों को ‘पितृ-श्राद्ध तथा ‘वैश्व-देव-श्राद्ध’ के लिए निमंत्रित करें। पितृ-श्राद्ध के लिए सामर्थ्यानुसार अयुग्म तथा वैश्व-देव-श्राद्ध के लिए युग्म ब्राह्मणों को निमंत्रित करना चाहिए। निमंत्रित तथा निमंत्रक क्रोध, स्त्रीगमन तथा परिश्रम आदि से दूर रहे। श्राद्ध-दिवस पर निम्न प्रक्रिया का पालन निमंत्रित तथा निमंत्रक को करना विहित है। 
श्राद्ध कर्म संक्षिप्त विधि ::
(1). सर्व प्रथम ब्राह्मण का पैर धोकर सत्कार करें।
(2). हाथ धोकर उन्हें आचमन कराने के बाद साफ आसन प्रदान करें।
(3). देवपक्ष के ब्राह्मणों को पूर्वाभिमुख तथा पितृ-पक्ष व मातामह-पक्ष के ब्राह्मणों को उत्तराभिमुख बिठाकर भोजन कराएं।
(4). श्राद्ध विधि का ज्ञाता पुरुष यव-मिश्रित जल से देवताओं को अर्घ्य दान कर विधि-पूर्वक धूप, दीप, गंध, माला निवेदित करें।
(5). इसके बाद पितृ-पक्ष के लिए अपसव्य भाव से यज्ञोपवीत को दाएँ कन्धे पर रखकर निवेदन करें, फिर ब्राह्मणों की अनुमति से दो भागों में बंटे हुए कुशाओं का दान करके मंत्रोच्चारण-पूर्वक पितृ-गण का आह्वान करें तथा अपसव्य भाव से तिलोसक से अर्घ्यादि दें।
(6). यदि कोई अनिमंत्रित तपस्वी ब्राह्मण या कोई भूखा पथिक अतिथि रुप में आ जाए तो निमंत्रित ब्राह्मणों की आज्ञा से उसे यथेच्छा भोजन निवेदित करें।
(7). निमंत्रित ब्राह्मणों की आज्ञा से शाक तथा लवणहीन अन्न से श्राद्ध-कर्ता यजमान निम्न मंत्रों से अग्नि में तीन बार आहुति दें-
प्रथम आहुति :- “अग्नये काव्यवाहनाय स्वाहा”
द्वितीय आहुति :- “सोमाय पितृमते स्वाहा”
(8). आहुतियों से शेष अन्न को ब्राह्मणों के पात्रों में परोस दें।
(9). इसके बाद रुचि के अनुसार अन्न परोसें और अति विनम्रता से कहें कि आप भोजन ग्रहण कीजिये।
(10). ब्राह्मणों को भी तद्चित और मौन होकर प्रसन्न मुख से सुखपूर्वक भोजन करना चाहिए तथा यजमान को क्रोध और उतावलेपन को छोड़कर भक्ति-पूर्वक परोसते रहना चाहिए।
(11). फिर ऋग्वेदोक्त ‘रक्षोघ्न मंत्र’ ॐ अपहता असुरा रक्षांसि वेदिषद इत्यादि ऋचा का पाठ कर श्राद्ध-भूमि पर तिल छिड़कें तथा अपने पितृ-रुप से उन ब्राह्मणों का ही चिंतन करे तथा निवेदन करें कि ‘इन ब्राह्मणों के शरीर में स्थित मेरे पिता, पितामह और प्रपितामह आदि आज तृप्ति लाभ करें। 
एकोद्दिष्ट श्राद्ध :: एकोद्दिष्ट श्राद्ध का मतलब किसी एक को निमित्त मानकर किए जाने वाला श्राद्ध जैसे किसी की मृत्यु हो जाने पर दशाह, एकादशाह आदि एकोद्दिष्ट श्राद्ध के अन्तर्गत आता है। इसमें विश्वेदेवों को स्थापित नहीं किया जाता।
एकोदिष्ट श्राद्ध मृत्यु की तिथि के दिन किया जाता है जिसमें एक पिंड और एक बलि, जबकि पार्वण श्राद्ध में पिता का श्राद्ध अष्टमी तिथि को और माता का नवमी को होता है। इसमें छह पिंड और दो बलि दी जाती हैं। श्राद्ध के पहले तर्पण किया जाता है। तर्पण का जल सूर्योदय से आधे पहर तक अमृत, एक पहर तक मधु, डेढ़ पहर तक दूध और साढ़े तीन पहर तक जल के रूप में पितरों को प्राप्त होता है। जो मनुष्य नास्तिकता और चंचलता से तर्पण करता है, उसके पितृ पिपासित होकर अपने आत्मज का स्वेद (पसीना) पीते हैं।
श्राद्ध-तर्पण की सामग्री :: जल, कुश, तिल, जौ, चन्दन, अक्षत, खगौती, श्वेत पुष्प,जौ, कुश और जल को हाथ में लेकर भगवान् विष्णु के नाम से यह शुरू होता है। 
श्राद्धकर्ता स्नान करके पवित्र होकर धुले हुए दो वस्त्र धोती और उत्तरीय धारण करता है। वह गायत्री मंत्र पढ़ते हुए शिखाबंधन करने के बाद श्राद्ध के लिए रखा हुआ जल छिड़कते हुए सभी वस्तुओं को पवित्र करता है। उसके बाद तीन बार आचमनी कर हाथ धोकर विश्वदेवों के लिए दो आसन देता है। उन दोनों आसनों के सामने भोजन पात्र के रूप में पलाश अथवा तोरई का एक-एक पत्ता रखा जाता है। 
गौमय से लिपी हुई शुद्ध भूमि पर बैठकर श्राद्ध की सामग्रियों को रखकर सबसे पहले भोजन तैयार करना चाहिए। ईशान कोण में पिण्ड दान के लिए पाक-शुद्ध सामग्री रखी जाती है। श्राद्ध में पितरों के लिए पूड़ी, सब्जी, मिठाई, खीर, रायता आदि-आदि श्रद्धा-सामर्थ के अनुरूप शामिल हैं। इस प्रक्रिया में प्रपितामह, पितामह, पिता [क्रमशः आदित्य, रूद्र और वसु स्वरुप] को जल अर्पित किया जाता है। देवताओं को सव्य होकर [दायें कंधे पर जनेऊ] और पितरों को असव्य होकर [बायें कंधे पर जनेऊ] कुश, तिल और जौ के साथ मंत्रानुसार जल अर्पित किया जाता है। इसी तरह बायें हाथ की अनामिका उंगली में मोटक धारण करना, बाँयी कमर पर नींवी रोपित करना, गोबर के ऊपर रखकर दिया जलाना और अंत में उसे एक पत्ते से एक बार में बुझाना। प्रेतात्माओं के लिए भी भोजन देना, कव्वे, कुत्ते और गाय के लिए भोजन देना। चीनी, मधु, कुश, तुलसी, दूध मिलाकर पिंड बनाते समय मन्त्र पढ़ते हुए पितरों को याद करना, घर के खिड़की दरवाजे खोले रखना, इस मान्यता के साथ कि पितृ आये हुए हैं, पितरों की पातली में यह कहते हुए दोबारा भोजन डालना कि आपको कुछ और चाहिए। श्राद्ध के उपरान्त ब्राह्मणों को भोजन कराना, यथोचित दक्षिणा, सीधा (सूखी भोजन सामग्री) और वस्त्र प्रदान करना, रायता वगैरह गाँव में खासकर बिरादरी में भेजना आदि आदि।
श्राद्ध कर्म में यह व्यवस्था है कि वेदपाठी ब्राह्मणों को जो कभी मृतक संबंधी भोज नहीं करते, को श्राद्धों में भोजनार्थ न बुलाया जाए। उन्हें वैश्व देव निमित्तिक भाग ही देना चाहिए। यदि श्राद्ध में कोई दोष रह जाए तो उसका विधि पूर्वक प्रायश्चित करना भी आवश्यक है। 
श्राद्ध करने की विधि :: श्राद्धकर्ता बाल तथा नाखून कटवाकर तेल लगाने के बाद स्नान करें और शुद्ध हो। तत्पश्चात ब्राह्मण को मंडल में लाकर पाद्य, अर्ध्य, धूप, दीप, तिल तथा माला आदि से उसका पूजन करें। श्राद्ध कर्म संपन्न होने पर ब्राह्मण को भोजन कराए। इस बात का ध्यान रखें कि सपात्रक श्राद्ध में पितरों को लक्ष्य कर संकल्प नहीं कराया जाता। ब्राह्मणों के संतुष्ट होने पर स्वस्तिवाचन करे। इस स्वस्ति वाचन से मन शुद्ध होता है। श्राद्ध में तीन पिंड दिए जाते हैं, उन्हें उठाने से पूर्व पृथ्वी को तीन बार वैष्णवी, काश्पयी और अक्षया नाम से प्रणाम करें। तब प्रथम पिंड स्वयं खाए, दूसरा पत्नी को दे और तीसरा जल में डाल दे। इस प्रकार किया गया श्राद्ध या पितृयज्ञ पूर्णतः सफल होता है। उससे पितरों की तृप्ति और श्राद्धकर्ता की समृद्धि होती है। श्राद्ध के अंत में शांति पाठ से शुभ मंगल की प्राप्ति होती है। 
यह सुनकर भगवान्  से भगवती पृथ्वी ने पूछा कि मधुपर्क किस मात्रा में और किस रूप में लेना चाहिए और उसके बनाने की विधि क्या है। वसुंधरा की बात सुनकर भगवान वराह ने कहा कि मधुपर्क मेरा ही अंश है। तुम जानती हो कि दक्षिण अंग से ही सृष्टि के समय इसकी उत्पत्ति हुई। यह विश्व कल्याण का स्वयं रूप है। इसके बनाने की विधि बहुत सरल है कि समान मात्रा में शहद, दही और घी मिलाकर पवित्र मंत्रों का उच्चारण किया जाए। यह सुनकर पृथ्वी ने फिर पूछा तो उसके पान की विधि बताते हुए भगवान वराह ने कहा कि जब मधुपर्क लिया जाए तो भक्त को कहना चाहिए हे भगवन! आपके द्वारा जगत की सृष्टि होती है। आप देवादि कर्म और यज्ञ के साक्षी हैं। हे प्रभु! आप मुझे आवागमन के चक्र से मुक्ति प्रदान करें। मुझे शांति दें। इसके उपरांत वह मुझे समर्पित करना चाहिए। मधुपर्क समर्पण करते समय ‘ओम नमो नारायणाय’ मंत्र के साथ प्रार्थना करनी चाहिए हे देवाधिदेव! देव स्रष्टा, सर्वव्यापी भगवन! आप सर्व सुपूजित हैं। भवसागर से मेरा तारण करने के लिए आप इन मधुपर्कयुक्त पात्रों में विराजमान हों। दधि, घृत, मधु आदि से बना यह मधुपर्क आपको समर्पित है। इस प्रकार भावमय स्तवन से मैं प्रसन्न होता हूं। कभी-कभी यदि कुछ नहीं मिले तो हाथ में जल लेकर ही मधुपर्क समझा जा सकता है। यदि मरणासन्न व्यक्ति को मधुपर्क दिया जाता है तो उसे शांति मिलती है। इस विषय में मैं एक प्रसंग सुनाता हूं। प्राचीन समय की बात है, एक बार राजा जनमेजय अश्वमेघ यज्ञ कर रहे थे। उस समय वैशाम्पायन उनसे मिल ने आए किंतु राजा यज्ञ में दीक्षित थे। इसलिए मुनि उनसे नहीं मिल पाए और यज्ञ की समाप्ति तक प्रतीक्षा करनी पड़ी। उधर, जब यज्ञ समाप्त हुआ तो जनमेजय को पता चला कि इस प्रकार ऋषि वैशम्पायन आए हुए हैं और प्रतीक्षा करने के लिए उन्होंने पास में ही एक आश्रम बनाकर निवास प्रारंभ कर दिया है। राजा को बहुत मानसिक कष्ट हुआ कि उनके कारण ऋषि को प्रतीक्षा करनी पड़ी और उन्होंने यह भी सोचा कि यह तो मुनि का अपमान हुआ है। उन्हें इस बात की भी चिंता हुई कि मुनि न जाने कैसा शाप दे बैठें। इस तरह चिंता से व्याकुल राजा जनमेजय स्वयं मुनि के सामने उपस्थित हुए। उन्होंने पहले तो उनका सम्मान किया और फिर उनसे क्षमा मांगी। राजा के मन में मुनि के शाप का भय बराबर विद्यमान रहा। उन्होंने कहा कि हे प्रभो! आप मुझे यमलोक की यंत्रणा से बचने का उपाय बताइए। मैं यमपुरी का रूप भी जानना चाहता हूं।[श्री वराह पुराण]
श्राद्ध और पितर :: श्राद्धों का पितरों के साथ अटूट संबंध है। पितरों के बिना श्राद्ध की कल्पना नहीं की जा सकती। श्राद्ध पितरों को आहार पहुँचाने का माध्यम मात्र है। मृत व्यक्ति के लिए जो श्रद्धा युक्त होकर तर्पण, पिण्ड, दानादि किया जाता है, उसे 'श्राद्ध' कहा जाता है और जिस मृत व्यक्ति के एक वर्ष तक के सभी और्ध्व दैहिक क्रिया कर्म संपन्न हो जायें, उसी की 'पितर' संज्ञा हो जाती है।
मेरे वे पितर जो प्रेत रूप हैं, तिलयुक्त जौ के पिण्डों से तृप्त हों। साथ ही सृष्टि में हर वस्तु ब्रह्मा से लेकर तिनके तक, चर हो या अचर, मेरे द्वारा दिये जल से तृप्त हों। [वायु पुराण]
पिण्ड, पितृ यज्ञ उपरान्त, अन्वाहार्य श्राद्ध उसी दिन सम्पादित होता है।[गोभिल गृह्य सूत्र]
मासिक श्राद्ध को अन्वाहाय कहते हैं। मासिक श्राद्ध, पिण्ड पितृ यज्ञ से पृथक् होता है। [शांखायन गृह्य सूत्र]
पितृ यज्ञ अर्थात् पिण्ड पितृ यज्ञ के सम्पादन के उपरान्त वह ब्राह्मण जो अग्नि होत्री अर्थात् आहिताग्नि है, उसे अमावास्या के दिन प्रति मास पिण्डान्वाहार्यक श्राद्ध करना चाहिए। [मनु]
आहिताग्नि को श्रौताग्नि में पिण्ड पितृ यज्ञ करना होता था और उसी दिन उसके उपरान्त एक अन्य श्राद्ध करना पड़ता था।
जो लोग श्रौताग्नि नहीं रखते थे, उन्हें अमावास्या के दिन गृह्यग्नियों में पिण्डान्वाहार्यक (या केवल अन्वाहार्य) नामक श्राद्ध करना होता था और उन्हें स्मार्त अग्नि में पिण्ड पितृ यज्ञ भी करना पड़ता था।
वर्तमान-तत्कालिक समय में अग्निहोत्री पिण्ड पितृ यज्ञ नहीं करते या करते भी हों तो वर्ष में केवल एक बार और पिण्डान्यावाहार्यक श्राद्ध लुप्त प्रायः हो गया है। 
स्मार्त यज्ञों में पशु-बलि नहीं होती, प्रत्युत उसके स्थान पर माष (उर्द) का अर्पण होता है।
आहिताग्नि श्रौताग्नियों में माँस अर्पित नहीं करते, प्रत्युत उसके स्थान पर पिष्ट पशु (आटे से बनी पशु प्रतिमा) की आहुतियाँ देते हैं।
पितरों का उद्देश्य करके, उनके कल्याण के लिए श्रद्धापूर्वक किसी वस्तु का या उससे सम्बन्धित किसी द्रव्य का त्याग श्राद्ध है। [मिताक्षरा]
पितरों का उद्देश्य करके, उनके लाभ के लिए यज्ञिय वस्तु का त्याग एवं ब्राह्मणों के द्वारा उसका ग्रहण प्रधान श्राद्ध स्वरूप है।[कल्पतरु] 
पितर लोग, यथा :- वसु, रुद्र एवं आदित्य, जो कि श्राद्ध के देवता हैं, श्राद्ध से संतुष्ट होकर मानवों के पूर्वपुरुषों को संतुष्टि देते हैं। [याज्ञवल्क्यस्मृति]
मनुष्य के तीन पूर्वज, यथा :- पिता, पितामह एवं प्रपितामह क्रम से पितृ-देवों अर्थात् वसुओं, रुद्रों एवं आदित्य के समान हैं और श्राद्ध करते समय उनकों पूर्वजों का प्रतिनिधि मानना चाहिए।
श्राद्ध से इन बातों का निर्देश होता है :- होम, पिण्डदान एवं ब्राह्मण तर्पण (ब्राह्मण संतुष्टि भोजन आदि से); श्राद्ध इन तीनों के साथ गौण अर्थ में समझा जा सकता है।
20 अंश रेतस (सोम) को 'पितृॠण' कहते हैं।
28 अंश रेतस के रूप में 'श्रद्धा' नामक मार्ग से भेजे जाने वाले 'पिण्ड' तथा 'जल' आदि के दान को श्राद्ध कहते हैं। इस श्रद्धावान मार्ग का संबंध मध्याह्न काल में श्राद्ध करने का विधान है।
हर व्यक्ति के तीन पूर्वज पिता, दादा और परदादा क्रम से वसु, रुद्र और आदित्य के समान माने जाते हैं। श्राद्ध के वक़्त वे ही अन्य सभी पूर्वजों के प्रतिनिधि माने जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि वे श्राद्ध कराने वालों के शरीर में प्रवेश करके और ठीक ढंग से रीति-रिवाजों के अनुसार कराये गये श्राद्ध-कर्म से तृप्त होकर वे अपने वंशधर को सपरिवार सुख-समृद्धि और स्वास्थ्य का आर्शीवाद देते हैं। श्राद्ध-कर्म में उच्चारित मन्त्रों और आहुतियों को वे अन्य सभी पितरों तक ले जाते हैं।
इस दृश्य संसार में स्थूल शरीर वाले को जिस प्रकार इन्द्रिय भोग, वासना, तृष्णा एवं अहंकार की पूर्ति में सुख मिलता है, उसी प्रकार पितरों का सूक्ष्म शरीर शुभ कर्म से उत्पन्न सुगन्ध का रसास्वादन करते हुए तृप्ति का अनुभव करता है। उसकी प्रसन्नता तथा आकांक्षा का केन्द्र बिन्दु श्रद्धा है। श्रद्धा भरे वातावरण के सान्निध्य में पितर अपनी अशान्ति खोकर आनन्द का अनुभव करते हैं, श्रद्धा ही इनकी भूख है, इसी से उन्हें तृप्ति होती है। इसलिए पितरों की प्रसन्नता के लिए श्रद्धा एवं तर्पण किये जाते हैं।  
माता-पिता की सेवा को सबसे बड़ी पूजा है। इसलिए धर्म शास्त्रों में पितरों का उद्धार करने के लिए पुत्र की अनिवार्यता मानी गई हैं। जन्मदाता माता-पिता को मृत्यु-उपरांत लोग विस्मृत न कर दें, इसलिए उनका श्राद्ध करने का विशेष विधान बताया गया है। 
श्राद्ध पूर्वजों के प्रति सच्ची श्रद्धा का प्रतीक हैं। पितरों के निमित्त विधिपूर्वक जो कर्म श्रद्धा से किया जाता है उसी को श्राद्ध कहते हैं। श्राद्ध संस्कार में आवाहन, पूजन, नमस्कार के उपरान्त तर्पण किया जाता है। तर्पण में प्रधानतया जल का ही प्रयोग होता है। उसे थोड़ा सुगंधित एवं परिपुष्ट बनाने के लिए जल में गंगा जल, दूध, जौ, चावल, चन्दन तिल, फूल जैसी दो-चार मांगलिक वस्तुएँ डाली जाती हैं। कुशाओं के सहारे जौ की छोटी-सी अंजलि मन्त्रोच्चार पूवर्क डालने मात्र से पितर तृप्त हो जाते हैं। तृप्ति के लिए तर्पण किया जाता है। स्वगर्स्थ आत्माओं की तृप्ति किसी पदार्थ से, खाने-पहनने आदि की वस्तु से नहीं होती, क्योंकि स्थूल शरीर के लिए ही भौतिक उपकरणों की आवश्यकता पड़ती है। मरने के बाद स्थूल शरीर समाप्त होकर, केवल सूक्ष्म शरीर ही रह जाता है। सूक्ष्म शरीर पर भूख-प्यास, सर्दी-गर्मी आदि का प्रभाव नहीं पड़ता। उसकी तृप्ति का विषय कोई, खाद्य पदार्थ या हाड़-मांस वाले शरीर के लिए उपयुक्त उपकरण नहीं हो सकते। सूक्ष्म शरीर में विचारणा, चेतना और भावना की प्रधानता रहती है, इसलिए उसमें उत्कृष्ट भावनाओं से बना अन्तःकरण या वातावरण ही शान्तिदायक होता है।
इस क्रिया के साथ आवश्यक श्रद्धा, कृतज्ञता, सद्भावना, प्रेम, शुभ कामना का समन्वय अवश्य होना चाहिए। यदि श्रद्धाञ्जलि इन भावनाओं के साथ की गयी है, तो तर्पण का उद्देश्य पूरा हो जायेगा, पितरों को आवश्यक तृप्ति मिलेगी, किन्तु यदि इस प्रकार की कोई श्रद्धा भावना तर्पण करने वाले के मन में नहीं होती और केवल लकीर पीटने या फिर मात्र पानी के इधर-उधर फैलाने से कोई विशेष प्रयोजन सिद्ध नहीं होगा।  इसलिए पितृ-कर्मों के करने वाले छोटे-छोटे क्रिया-कृत्यों को करने के साथ-साथ दिवंगत आत्माओं के उपकारों का स्मरण करें, उनके सद्गुणों तथा सत्कर्मो के प्रति श्रद्धा व्यक्त करें। 
कृतज्ञता तथा सम्मान की भावना उनके प्रति रखें और यह अनुभव करें कि यह जलांजलि जैसे अकिंचन उपकरणों के साथ, अपनी श्रद्धा की अभिव्यक्ति करते हुए स्वगीर्य आत्माओं के चरणों पर अपनी सद्भावना के पुष्प चढ़ा रहा हूँ। इस प्रकार की भावनाएँ जितनी ही प्रबल होंगी, पितरों को उतनी ही अधिक तृप्ति मिलेगी। जिस पितर का स्वगर्वास हुआ है, उसके किये हुए उपकारों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना, उसके अधूरे छोड़े हुए पारिवारिक एवं सामाजिक उत्तरदायित्व को पूरा करने में तत्पर होना तथा अपने व्यक्तित्व एवं वातावरण को मंगलमय ढाँचे में ढालना मरणोत्तर संस्कार का प्रधान प्रयोजन है। गृह शुद्धि, सूतक निवृत्ति का उद्देश्य भी इसी के निमित्त की जाती है, किन्तु तर्पण में केवल इन्हीं एक पितर के लिए नहीं, पूर्व काल में गुजरे हुए अपने परिवार, माता के परिवार, दादी के परिवार के तीन-तीन पीढ़ी के पितरों की तृप्ति का भी आयोजन किया जाता है। इतना ही नहीं इस पृथ्वी पर अवतरित हुए सभी महान् पुरुषों की आत्मा के प्रति इस अवसर पर श्रद्धा व्यक्त करते हुए अपनी सद्भावना के द्वारा तृप्त करने का प्रर्यत्न किया जाता है।
सर्वात्मभूत :: Common originator of every one.
भूत :: ghost, a spirit, goblin.
देवता और पितरों की योनि इस प्रकार की है कि वे दूर से कही गई बात, पूजन-सत्कार, अर्चा, स्तुति तथा बहुत, भविष्य, वर्तमान की सभी बातों को जान लेते हैं और वहीँ पहुँच जाते हैं।
उनका शरीर केवल नौ तत्वों (पाँच तन्मात्रा, चार अन्तःकरण) का बना होता है और दसवाँ जीव है; इसलिए उन्हें स्थूल उपभोगों की आवश्यकता नहीं होती। [काल भीति (महाकाल) करन्धम संवाद]
श्राद्ध :: सनातन धर्म में पितृपक्ष अश्विन कृष्ण पक्ष के दौरान मनाया जाने वाला ऐसा ही मौंका है जब हिंदु अपने पितरों को पिंड (पितरों के प्रतीक) और पानी देते हैं, ताकि वे अपने पितृलोक में पूरे एक साल तक पिंड  के रूप में मिले खाने और तर्पण के दौरान दिए जाने वाले पानी का उपभोग कर सकें। 
पितृपक्ष :: भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन कृष्णपक्ष अमावस्या तक के सोलह दिनों को पितृपक्ष कहते हैं। इन दिनों में हिन्दु (सनातनी, वैष्णव) पितरों (पूर्वजों) को जल देते हैं तथा उनकी मृत्यु तिथि पर पार्वण श्राद्ध करते हैं। पिता-माता आदि पारिवारिक मनुष्यों की मृत्यु के पश्चात्‌ उनकी तृप्ति के लिए श्रद्धापूर्वक किए जाने वाले कर्म को पितृ श्राद्ध कहते हैं।
माता-पिता की सेवा सबसे बड़ी पूजा है। पितरों का उद्धार करने के लिए पुत्र की अनिवार्यता मानी गई हैं। जन्मदाता माता-पिता को मृत्यु-उपरांत लोग विस्मृत न कर दें, इसलिए उनका श्राद्ध करने का विधान है। 
प्रेत :: आश्विन कृष्ण प्रतिपदा से लेकर अमावस्या तक ब्रह्माण्ड की ऊर्जा तथा उस उर्जा के साथ पितृ प्राण पृथ्वी पर व्याप्त रहता है। मृत्यु के बाद दशगात्र और षोडशी-सपिण्डन तक मृत व्यक्ति की प्रेत संज्ञा रहती है। पुराणों के अनुसार वह सूक्ष्म शरीर जो आत्मा भौतिक शरीर छोड़ने पर धारण करती है, प्रेत है। प्रिय के अतिरेक की अवस्था प्रेत है क्योंकि आत्मा जो सूक्ष्म शरीर धारण करती है तब भी उसके अन्दर मोह, माया भूख और प्यास का अतिरेक होता है। सपिण्डन के बाद वह प्रेत, पित्तरों में सम्मिलित हो जाता है।
पितृपक्ष भर में जो तर्पण किया जाता है, उससे वह पितृ प्राण स्वयं आप्यापित होता है। पुत्र या उसके नाम से उसका परिवार जो यव (जौ) तथा चावल का पिण्ड देता है, उसमें से अंश लेकर वह अम्भप्राण का ऋण चुका देता है। ठीक आश्विन कृष्ण प्रतिपदा से वह चक्र उर्ध्वमुख होने लगता है। 15 दिन अपना-अपना भाग लेकर शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से पितर उसी ब्रह्मांडीय उर्जा के साथ वापस चले जाते हैं। इसलिए इसको पितृपक्ष कहते हैं और इसी पक्ष में श्राद्ध करने से पित्तरों को प्राप्त होता है।
तीन प्रकार के प्रमुख ऋण :: पितृ ऋण, देव ऋण तथा ऋषि ऋण। इनमें पितृ ऋण सर्वोपरि है। पितृ ऋण में पिता के अतिरिक्त माता तथा वे सब बुजुर्ग भी सम्मिलित हैं, जिन्होंने हमें अपना जीवन धारण करने तथा उसका विकास करने में सहयोग दिया।
पितृपक्ष में हिन्दु मन कर्म एवं वाणी से संयम का जीवन जीते हैं, पितरों को स्मरण करके जल चढाते हैं, निर्धनों एवं ब्राह्मणों को दान देते हैं। पितृपक्ष में प्रत्येक परिवार में मृत माता-पिता का श्राद्ध किया जाता है। गया श्राद्ध का विशेष महत्व है। 
"गया सर्वकालेषु पिण्डं दधाद्विपक्षणं" 
गया में हर काल में पिंडदान करने की अनुमति है।
बिहार के गया में लगने वाला पितृपक्ष मेला ज्यादा अहमियत रखता है। इस दौरान पूरी दुनिया से हिन्दु गया में आते हैं और अपने पितरों का पिंड दान करते हैं।
पितरों को पिंड देने के बाद इस भोजन को काले कौए को खिलाने की मान्यता है। कौए अलावा गौ ग्रास और कुत्तों को भी जिमाया जाता है। 
मनुस्मृति में इस विषय में वृहद बहुमूल्य जानकारी उपलब्ध कराती है। वायु पुराण और स्कंद पुराण में भी इसका समुचित बखान है। यह शाश्वत-सनातन परम्परा है अर्थात् जिसका न आदि है न अन्त। जिसका निर्वाह ब्रह्मा के दिन अर्थात कल्प के प्रारंभ होने से ही शुरू हो जाता है, जिसकी गणना अरबों वर्षों में है।
भगवान् श्री राम ने भी महाराज दशरथ का पिंडदान किया था। भगवान् श्री कृष्ण ने भी इस रीति का पाण्डवों से निर्वाह करवाया था। यह सनातन और शास्त्र सम्मत परम्परा है। 
यह इसी प्रकार है, "मानो तो देव नहीं तो भींत का लेव"। अगर श्रद्धा है तो वही पत्थर देवता के प्रीतक रूप में श्रद्धेय है, अन्यथा दीवार में चिना गया सामान्य पत्थर। यह आस्था का प्रश्न अवश्य हैं मगर पूर्ण रूप से वैज्ञानिक और तर्क संगत है। 
एकैकस्य तिलैर्मिश्रांस्त्रींस्त्रीन् दद्याज्जलाज्जलीन्। 
यावज्जीवकृतं पापं तत्क्षणादेव नश्यति
जो अपने पितरों को तिल-मिश्रित जल की तीन-तीन अंजलियाँ प्रदान करते हैं, उनके जन्म से तर्पण के दिन तक के पापों का नाश हो जाता है।  जिस प्रकार जिसका जन्म हुआ है, उसकी मृत्यु भी निश्चित है; उसी प्रकार जिसकी मृत्यु हुई है, उसका जन्म भी निश्चित है। ऐसे कुछ विरले ही होते हैं जिन्हें मोक्ष प्राप्ति हो जाती है। पितृपक्ष में तीन पीढ़ियों तक के पिता पक्ष के तथा तीन पीढ़ियों तक के माता पक्ष के पूर्वजों के लिए तर्पण किया जाता हैं। इन्हीं को पितर कहते हैं। दिव्य पितृ तर्पण, देव तर्पण, ऋषि तर्पण और दिव्य मनुष्य तर्पण के पश्चात् ही स्व-पितृ तर्पण किया जाता है। भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन कृष्णपक्ष अमावस्या तक के सोलह दिनों को पितृपक्ष कहते हैं। जिस तिथि को माता-पिता का देहान्त होता है, उसी तिथी को पितृपक्ष में उनका श्राद्ध किया जाता है। शास्त्रों के अनुसार पितृपक्ष में अपने पितरों के निमित्त जो अपनी शक्ति सामर्थ्य के अनुरूप शास्त्र विधि से श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करता है, उसके सकल मनोरथ सिद्ध होते हैं और घर-परिवार, व्यवसाय तथा आजीविका में हमेशा उन्नति होती है। पितृ दोष के अनेक कारण होते हैं। परिवार में किसी की अकाल मृत्यु होने से, अपने माता-पिता आदि सम्मानीय जनों का अपमान करने से, मरने के बाद माता-पिता का उचित ढंग से क्रियाकर्म और श्राद्ध नहीं करने से, उनके निमित्त वार्षिक श्राद्ध आदि न करने से पितरों को दोष लगता है। इसके फलस्वरूप परिवार में अशांति, वंश-वृद्धि में रूकावट, आकस्मिक बीमारी, संकट, धन में बरकत न होना, सारी सुख सुविधाएँ होते भी मन असन्तुष्ट रहना आदि पितृ दोष हो सकते हैं। यदि परिवार के किसी सदस्य की अकाल मृत्यु हुई हो तो पितृ दोष के निवारण के लिए शास्त्रीय विधि के अनुसार उसकी आत्म शांति के लिए किसी पवित्र तीर्थ स्थान पर श्राद्ध करवाएँ। अपने माता-पिता तथा अन्य ज्येष्ठ जनों का अपमान न करें। प्रतिवर्ष पितृपक्ष में अपने पूर्वजों का श्राद्ध, तर्पण अवश्य करें। यदि इन सभी क्रियाओं को करने के पश्चात् पितृ दोष से मुक्ति न होती हो तो ऐसी स्थिति में किसी सुयोग्य कर्मनिष्ठ विद्वान ब्राह्मण से श्रीमद् भागवत् पुराण की कथा करवायें। वैसे श्रीमद् भागवत् पुराण की कथा कोई भी श्रद्धालु पुरुष अपने पितरों की आम शांति के लिए करवा सकता है। इससे विशेष पुण्य फल की प्राप्ति होती है।
ये पाकयज्ञाश्चत्वारो विधियज्ञसमन्विता:। 
सर्वे ते जपयज्ञस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥
जो चार पाकयज्ञ (पितृकर्म, हवन, बलि और वैश्वदेव) विधि यज्ञ के बराबर हैं, वे सभी यज्ञ जप यज्ञ के 16 वें भाग के बराबर भी नहीं हैं।[मनु स्मृति 2.86] 
The four sacred deeds performed by the name of Pitr Yagy, Hawan, Bali & Vaeshv Dev which are comparable to the methodical-procedural deeds does not match 1/16 of the Jap Yagy i.e., silent mode of recitation of sacred verses.
पितृ कर्म :: श्राद्ध को पितृकर्म, पितृ पूजा, पितृ यज्ञ, आदि नाम से भी जाना जाता है। मृत्यु को प्राप्त हुए पूर्वजों को पितर के नाम से जाना जाता है। उनकी आत्म तृप्ति व खुद के कल्याण हेतु धर्म ग्रंथों में श्राद्ध का उल्लेख मिलता है। श्राद्ध शब्द ही श्रद्धा का प्रतीक है। 
बलि-वैश्यदेव :: यज्ञ भूत-बलि या वैश्यदेव-यज्ञ स्थूल, सूक्ष्म, दिव्य जितने भी प्राणी या देव, सबों को तृप्त करने की भावना से भोज्य सामग्री की हवि प्रदान करना ही भूत या वैश्य देव यज्ञ है। इससे व्यक्ति का हृदय और आत्मा विशाल होकर अखिल विश्व के प्राणियों के साथ एकता सम्मिलित का अनुभव करने में होता है।
स्वाध्यायेनार्चतर्षीन्होमैर्देवान्यथाविधि। 
पितृश्राद्धैश्र्च नृनन्नैर्भूतानि बलिकर्मणा॥
वेदाध्ययन से ऋषियों का, होम से देवताओं का, श्राद्ध और तर्पण से पितरों का, अन्न से अतिथियों का और बलिकर्म से प्राणियों का सत्कार करना चाहिये।[मनु स्मृति 3.81] 
The host-house hold should welcome-honour the sages by studying-reciting the Veds, the demigods-deities by making offerings in the holy fire, the manes by offerings, prayers and charity, the guests by offering food and the creatures by sacrifices.
कुर्यादहरह: श्राद्धमन्नाध्येनोदकेन वा। 
पयोमूलफलैर्वाSपि  पितृभ्यः प्रीतिमावहन्॥
अन्नादि से या जल से या दूध से या फल-फूलों से पितरों की प्रसन्नार्थ नित्य श्राद्ध करे।[मनु स्मृति 3.82] 
One should perform daily rites-offerings with the help of food grains, water, milk, fruits, flowers, with either anyone of them or all of them, as per his ability for the appeasement-happiness of the Manes.
This is just pay off the debt over us for the Manes who brought the humans to this world to perform righteous, virtuous, pious acts, so that the humans could attain Salvation. 
एकमप्याशयेद्विप्रं पित्रर्थे पञ्चयज्ञिके। 
न चैवात्रशयेत्किंञ्चिद्वैश्र्वदेवं प्रति द्विजम्॥
पंचयज्ञ के अन्तर्गत पितृ के निमित्त एक ब्राह्मण को अवश्य भोजन करावे, पर वैश्य देव के निमित्त ब्राह्मण को भोजन कराने की आवश्यकता नहीं है।[मनु स्मृति 3.83] 
Under the procedure of Pitr Yagy, the household must offer food to one Brahmn for the satisfaction of the Manes. For the sake of Vaeshy Dev there is no such compulsion.
पृष्ठवास्तुनि कुर्वीत बलिं सर्वात्मभूतये। 
पितृभ्यो बलिशेषं तु सर्वं दक्षिणतो हरेत्॥
वास्तु के पृष्ठभाग में सर्वात्मभूत को और बचे हुये अन्न को लेकर वास्तु के दक्षिण भाग में पितरों को बलि दें।[मनु स्मृति 3.91] 
Let be sacrifices be offered in front of the Vastu Purush to the one who is the past of every one  and then rest of the food be put behind the back of the Vastu Purush for the sake of manes.
पितृयज्ञं तु निर्वत्र्य विप्रश्र्चेन्दुक्षयेSग्निमान्।
पिण्डान्वाहार्यकं श्राद्धं कुर्यान्मासानुमासिकम्॥
अग्निहोत्री ब्राह्मण अमावस्या तिथि में पितृयज्ञ करके प्रत्येक मास पिण्डान्वाहार्यक श्राद्ध करे।[मनु स्मृति 3.122] 
The Brahman committed to sacrifices in holy fire, should perform Pindanvaharyak Shraddh on the no Moon night, every month. It is a sacrifices related to the diseased-manes. 
अन्वाहार्य श्राद्ध :: अन्वाहार्य  श्राद्ध पिण्डपितृयज्ञ के उपरान्त उसी दिन सम्पादित होता है।[गोभिल गृह्य सूत्र 196] 
पिण्ड-पितृ यज्ञ के सम्पादन के उपरान्त वह ब्राह्मण जो अग्निहोत्री अर्थात् आहिताग्नि है, प्रति मास उसे अमावास्या के दिन पिण्डान्वाहार्यक श्राद्ध करना चाहिए।
पितृणां मासिकं श्राद्धमन्वाहार्यं विदुर्बुधा:। 
तच्चामिशेण कर्तव्यं प्रशस्तेन प्रयत्नतः॥
पण्डित गण पितरों के इस मासिक श्राद्ध को अन्वाहार्य कहते हैं जो कि यत्न पूर्वक करना चाहिये।[मनु स्मृति 3.123] 
This monthly Shraddh-homage is called Anvahary, by the Pandits-scholars. It should be associated with meals, gifts and fee; to the learned Brahmns for performing the rites.
अन्वाहार्य :: अन्वाहार्य मासिक श्राद्ध यज्ञ में पुरोहित को दी जाने वाली दक्षिणा या भोजन। 
तत्र ये भोजनीया: स्युर्ये च वर्ज्या द्विजोत्तमा:।
यावन्तश्र्चैव यैश्र्चानैस्तान् प्रव क्ष्याम्यशेषत:॥
उस श्राद्ध में खिलाने योग्य और न खिलाने योग्य ब्राह्मणों को किन अन्नों से कितने ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिये, इत्यादि कहता हूँ।[मनु स्मृति 3.124]  
I shall describe the grains-food-eatables and their quantum to be served to Brahmns who are eligible and the ones who are not eligible for serving meals, during anniversary-homage ceremony.
द्वौ दैवे पितृकार्ये त्रीनेकैकमुभयत्र वा। 
भोजयेत् सुसमृद्धोSपि न प्रसज्जेत विस्तरे॥
देवकार्य में 2, पितृकार्य में 3 या दोनों में एक-एक ब्राह्मण को भोजन करावे। अधिक ब्राह्मण भोजन कराने का सामर्थ्य हो तो भी इस सँख्या को न बढ़ावे।[मनु स्मृति 3.125]  
One should feed 2 Brahmns in Dev Kary sacrifices devoted to Demigods & 3 Brahmns in Pitr Kary-sacrifices to the Manes or else one-one in each category. Even if one is capable of feeding more Brahmans, he should not increase the number beyond this figure.
सत्क्रियां देशकालौ च शौचं ब्राह्मण सम्पद:। 
पञ्चैतान्विस्तरो हन्ति तस्मान्नेहेत विस्तरम्॥
ब्राह्मणों की इस सँख्या को बढ़ाने से संस्कार, देश, काल, पवित्रता और ब्राह्मणत्व श्राद्ध के इन पाँचों आवश्यक अंगों को साधने में बाधा पड़ती है। इसलिये सँख्या नहीं बढ़ानी चाहिये।[मनु स्मृति 3.126]  
Increasing the number of Brahmans for meals beyond 2-3 or 1-1 hinders in virtues, country-immediate space-place meant for the job, time-auspicious occasion, purity-piousity and the homage meant for the gaining of Brahmn rank-title. Therefore, the number should not be increased.
Brahman is the ultimate for purity in human society. But its really very-very difficult to trace such Brahmns. Soon after the advent of Mahatma Budh, Brahmans lost their significance-cult and adopted to other professions. Since, all the 4 stages of Kal-cosmic era :- Saty Yug, Treta Yug, Dwapar Yug and Kali Yug co-exist; enlightened, scholarly, devoted-devout, pious, righteous, virtuous, honest Brahmans do exist, but they do not reveal them selves.
प्रथिता प्रेतकृत्यैषा पित्र्यं नाम विधुक्षये। 
तस्मिन् युक्तस्यैति नित्यं प्रेतकृत्यैव लौकिकी
अमावस्या में जो पितृश्राद्ध किया जाता है, उसे प्रेत कृत्य-पितृ क्रिया कहते हैं। उस कर्म में जो तत्पर रहता है, उसको नित्य लौकिकी प्रेत कृत्या प्राप्त होती है अर्थात उसके पुत्र पौत्रादि और धन की वृद्धि होती है।[मनु स्मृति 3.127]  
The homages & charity performed-carried out, on No moon-dark night is termed Pret Karm (oblations-charity meant for the purpose of the deceased in the family). One who is ready to perform such deeds is blessed with progeny and grand children in addition to accumulation of money.
Traditionally, a devout Hindu spend money for the welfare of the enlightened Brahmns on day falling on No Moon nights. Such charity carries significance for the welfare of one in current as well next births.
श्रौत्रियायैव देयानि हव्यकव्यानि दातृभि:। 
अर्हत्तमाय विप्राय तस्मै दत्तं महाफलम्
दाता को वेदाभ्यासी ब्राह्मण को ही हव्य-कव्य अर्पित करना चाहिये, क्योंकि ऐसे पूज्यतम ब्राह्मण को देवान्न या श्राद्धान्न देने से ही समुचित फल प्राप्त होता है।[मनु स्मृति 3.128]  
Oblations in the form of food grains-gifts to the demigods-Manes should be offered to only such honourable Brahmns who practice Veds for attaining maximum favourable output.
One is free to offer food, money to the needy, poor but deserving person. Help extended to non deserving goes waste & on the contrary leads one to sin as well.
एकैकमपि विद्वांसं दैवे पित्र्ये च भोजयेत्। 
पुष्कलं फलमाप्रोति नामन्त्रज्ञान् बहूनपि
देवकर्म और पितृकर्म में एक भी विद्वान् ब्राह्मण भोजन कराने से जो विशेष फल प्राप्त होता है, वह विद्या से विहीन बहुत सारे ब्राह्मणों को खिलाने से भी प्राप्त नहीं होता।[मनु स्मृति 3.129]   
One do not obtain the piousity-rewards by feeding several uneducated-illiterate Brahmns who are not well versed with the Veds, which he obtain by  feeding just one enlightened Brahman, during Prayers to demigods or the Manes-Homages to the Manes-Pitres. 
दूरादेव परीक्षेत बाह्मणं वेदपारगम्।
तीर्थ तद्धव्यकव्यानां प्रदाने सोSतिथिः स्मृतः॥
वेद निष्णात ब्राह्मण को दूर से अर्थात उसकी वंश परमपरा को और उसकी पवित्रता को जाँच ले, क्योंकि हव्य-क़व्यों का पात्र और दान लेने के लिये उसे अथिति के तुल्य पवित्र कहा गया है।[मनु स्मृति 3.130]   
The family tree-hierarchy of the Brahman expert in Veds should be tested-verified, since he is equated with the Atithi (uninvited guest, a person who visits at odd hours without notice-invitation) for giving gifts, Dakshina, eatables etc.
Its a social obligation to support the Brahmans who have attained expertise in the Veds. Their conduct is always for the welfare of the society. Prayers, worship, rites, rituals, Yagy, Hawan conducted by them, are always for the welfare whole world not for the individual. Such Brahmans maintain ultimate purity, piousity in their day to day life.
सहस्त्रं हि सहस्त्राणामनृचां यत्र भुञ्जते। 
एकस्तान् मन्त्रवित् प्रीतः सर्वानर्हति धर्मतः॥
जिस श्राद्ध में वेदविहीन दस लाख ब्राह्मण भोजन करते हों, उनमें यदि वेद जानने वाला एक ही ब्राह्मण प्रसन्न होकर भोजन करे तो वह अकेला ही सम्पूर्ण ब्राह्मण भोजन के दान का फल देता है।[मनु स्मृति 3.131]   
A single Brahman, expert in Veds, equalises the rewards which is gained by serving millions of ignorant-illiterate, imprudent  Brahmans, during the feast organised for the homage of Manes-Pitr. 
ज्ञानोत्कृष्टाय देयानि कव्यानि च हवींषि च। 
न हि हस्तावसृग्दिग्धौ रुधिरेणैव शुद्ध्यत:॥
जो विद्या में बड़ा हो, उसी को हव्य (देवान्न) और कव्य (पिन्नन्न) देना चाहिये, क्योंकि लहू से भीगे हुए हाथ लहू से शुद्ध नहीं होते।[मनु स्मृति 3.132]   
The house hold should offer food, gifts, Dakshina to the Brahman who is superior by virtue of his knowledge-learning, enlightenment as compared to others, since hands, smeared with blood, cannot be washed-cleansed with blood.
यावतो ग्रसते ग्रासन् हव्यकव्येष्वमन्त्रवित्। 
तावतो ग्रसते प्रेत्य दीप्तशूलष्ठर्य्-योगुडान्॥
वेद विद्या रहित ब्राह्मण हव्य कव्यों में श्राद्ध कर्ता के मरने के जितने कौर खाते हैं, उतने ही आगे तपाये शूलर्ष्टि नाम के लोहे के गोले खाने पड़ते (मरने के बाद, नर्क, परलोक में)।[मनु स्मृति 3.133]   
One who has organised the homage to Manes-demigods should be cautious in serving the food to those Brahmns only, who have learnt the Veds. The Brahman who has not learnt-grasped Veds will have to eat-swallow red hot iron balls equal in number to the bites of food he ate.
ज्ञाननिष्ठा द्विजाः केचित्तपोनिष्ठास्तथाSपरे। 
तपः स्वाध्यायनिष्ठाश्र्च कर्मनिष्ठास्तथाSपरे॥
कोई ब्राह्मण ज्ञानी,  विद्वान्, कोई तपस्वी, कोई वेद व्रतनिष्ठ और कोई क्रियानिष्ठ होते हैं।[मनु स्मृति 3.134]   
The Brahmans may be categorised into learned, ascetic, devoted to practices described in Veds and practicality-deeds. 
ज्ञाननिष्ठेषु कव्यानि प्रतिष्ठाप्यानि यत्नतः। 
हव्यानि तु यथान्यायं सर्वेष्वेव चतुर्ष्वपि॥
ज्ञाननिष्ठों को यत्नपूर्वक कव्य-श्राद्धान्न और शेष चारों ब्राह्मणों को यथायोग्य हव्य देना चाहिये।[मनु स्मृति 3.135]  
The household should make efforts to give gifts, Dakshina-fee and the food grains to the learned-enlightened Brahmans and make offerings to the rest 4 categories of Brahmns as per his capacity.
The stress is over maintaining the learned-enlightened Brahmans.
अश्रोत्रियो पिता यस्य पुत्रः स्याद्वेदपारागः। 
अश्रोत्रियो वा पुत्रः स्यात् पिता स्याद्वेदपारागः॥
जिसका पिता वेद न जानता हो और पुत्र वेदपारङ्गत हो अथवा बाप वेदपारङ्गत हो, बेटा वेद न जानता हो। ब्राह्मण की गुणवत्ता तय करने में वेद ही एकमात्र पैमाना और सहायक हैं।[मनु स्मृति 3.136]   
When it comes to decide who is more virtuous-revered, one has to find out if the invited Brahman's father is a scholar of Veds or not. Then, father may be ignorant but the son might have attained expertise in the Veds or else the father is an expert of Veds but the son is ignorant. Recension of Veds is decisive factor in Brahman's quality.
RECENSION :: पाठ, गुण-दोष-निरूपण, पाठान्तर, शुद्ध किया हुआ मूल ग्रन्थ; the revision of a text. 
ज्यायांसमनयोर्विद्याद्यस्य स्याच्छ्रोत्त्रिय: पिता। 
मन्त्र सम्पूजनार्थं तु सत्कारमितरोSर्हति॥
दोनों में बड़ा वही है जिसका पिता-बाप वेदविज्ञ है, किन्तु दूसरा केवल वेद पड़ने के कारण सम्मान-सत्कार पाने योग्य है।[मनु स्मृति 3.137]   
Out of the two invited Brahmns one whose father is a learned-expert of Veds is more venerable. However, the other one too deserves respect-is worthy of honour, because respect is due to the study of Ved.
Mere reading of Veds do not qualify one to be respected. He should understand, analyse and apply it the life. He should be able to interpret it correctly. Most of the treatises-commentaries available on Veds are grossly distorted, vague and incorrect.
न श्राद्धे भोजयेन्मित्रं धनैः कार्योSस्य संग्रहः। 
नारिन् न मित्रं यं विद्यात्तं श्राद्धे भोजयेद् द्विजम्॥
श्राद्ध में मित्र को न खिलावे, किन्तु अन्य सत्कारों से मैत्री की रक्षा करे। जो शत्रु और मित्र न हो उसी ब्राह्मण को श्राद्ध में भोजन करावे।[मनु स्मृति 3.138]   
One should not serve food to his friend meant for homage-anniversary, to the Manes-diseased but maintain his friendship through other means of welcome, honour. The Brahman who receives food for the Shraddh should neither be a friend nor a foe.
यस्य मित्रप्रधानानि श्राद्धानि च हवींषि च। 
तस्य प्रेत्य फलं नास्ति श्राद्धेषु च हविःषु च॥
जिनके श्राद्ध और हव्य में मित्र ही प्रधान होते हैं, उन्हें मरने पर हव्य-कव्य नहीं मिलता।[मनु स्मृति 3.139]   
Those who invite their friends, relatives for performing the funeral rites of their diseased for paying anniversary-homage and serving meals, are deprived off the offerings by their descendent after their death. Such people have to remain in Pret Yoni for quite a long period of time.
These chapters have no concern with Hinduism-which is a way of life-life style. Its just a treatise describing the facts-realities of human life-birth, incarnations. One should follow these tenets irrespective of his faith. Other faiths emerged just a few hundred years ago, while civilisation persisted for trillions-trillions of years. Sufficient proofs are scattered all over the earth. Excavations and scientific studies-data retrieved clearly shows the evidence.
Hindu is since ever, for ever. No one can crush it even after concerted efforts.

यः सङ्गतानि कुरुतें मोहाच्छ्राद्धेन मानवः। 
स स्वर्गाच्च्यवते लोकाच्छ्राद्धमित्रो द्विजाधम:॥
जो मनुष्य अज्ञान से श्राद्ध द्वारा किसी के साथ मैत्री जोड़ता है, वह श्राद्धमित्र द्विजाधम स्वर्गलोक से वंञ्चित होता है।[मनु स्मृति 3.140]   
One who enters into an alliance-friendship for obtaining the sacred food meant for the Manes, diseased, demigods for homage-anniversary rites, is deprived from the heavens.
Shraddh is one of the most sacred acts and only the virtuous, learned, enlightened Brahmns should accept the offerings. Any unauthorised recipient has to face the consequences. Once the sacred rites are over, the household may distribute-serve food to anyone, who is willing to accept. It helps both, the household as well as the recipient.
Halloween festival is a distorted form of the Shraddh-homages to the Pitre-manes observed in Western World, America & Australia etc.

सम्भोजनी साSभिहिता पैशाची दक्षिणा द्विजैः। 
इहैवास्ते तु सा लोके गौरन्धेवैकवेश्मनि॥
जो मित्रादिकों के साथ भोजनादि से युत दान क्रिया होती है, उसे पैशाची दान-क्रिया कहते हैं, क्योंकि वह दान-दक्षिणा इसी लोक में रह जाती है, जैसे अन्धी गाय एक ही घर में रहती है।[मनु स्मृति 3.141]    
The food-meals served to the friends-relatives added with fee, Dakshina, gifts for accepting the meals prior to the rites-sacrifices and serving of food to the virtuous Brahmns, is useless and is termed as Paeshachi (like the spirits); which do not cross the boundary of the earth, the manner in which a blind cow is confined to the walls-boundary-stable, of the house. 
युत :: चार हाथ की माप, मिला या मिलाया हुआ,  युक्त, सहित।
यथेरिणे बीजमुत्वा न वप्ता लभते फलम्। 
तथाSनृचे हविर्दत्त्वा न दाता लभते फलम्॥
जैसे ऊसर में बीज बोने से बोने वाले को फल का लाभ नहीं होता, वैसे ही मूर्ख को हवि-देवान्न देने वाले को कोई फल नहीं मिलता।[मनु स्मृति 3.142]    
The manner in which one do not get return by sowing seeds in  a barren land, similarly one who host the ignorant-idiot do not get any return.
दात्दृन् प्रतिग्रहीन्त्दृश्र्च कुरुते फलभागिनः। 
विदुषे दक्षिणां दत्त्वा विधिवत् प्रेत्य चेह च॥
वेदविज्ञ ब्राह्मण को विधि पूर्वक दी जाने वाली दान-दक्षिणा इस लोक और परलोक में दाता और प्रतिग्रहीता दोनों को यथोक्त फल देती है।[मनु स्मृति 3.143]    
The donations and Dakshina, fee, gifts given to the learned Brahman, helps the donor and the receiver equally, in both the abodes, the earth-present birth and the next birth, made in accordance with the rules prescribed by the scriptures-Veds.
कामं श्राद्धेSर्चयेन्मित्रं नाभिरूपमपि त्वरिम्। 
द्विषता हि हविर्भुक्तं भवति प्रेत्य निष्फलम्॥
विद्वान ब्राह्मण के अभाव में गुणवान मित्र को सादर भोजन करावे पर विद्वान शत्रु को नहीं क्योंकि शत्रु का खाया हुआ श्राद्ध परलोक में निष्फल होता है।[मनु स्मृति 3.144]    
In the absence of a learned Brahman, one may offer sacrificial food to his friend with due regard to him and the Manes but never serve food to one-foe, who has enmity with him, since it will not grant favourable results in the next birth.
यत्नेन भोजयेच्छ्राद्धे बह्वृचं वेदपारगम्। 
शाखान्तगमथाध्वर्यु छन्दोगं तु समाप्तिकम्॥
श्राद्ध में यत्नपूर्वक ऐसे बाह्मण को जो बहुत ऋचाओं-मन्त्रों को जानने वाला वेद पारङ्गत हो अथवा जिसने सम्पूर्ण वेद पढ़ा हो, भोजन करावे।[मनु स्मृति 3.145]    
One should make efforts to serve food to such Brahmans who have learnt several hymns of Ved or one who is an expert in the Veds, during the Shraddh-homage ceremony.
एषामन्यतमो यस्य भुञ्जीत श्राद्धमर्चितः। 
पितृणां तस्य तृप्तिः स्याच्छाश्वति साप्तपौरुषी॥
ऐसा एक भी ब्राह्मण यदि पूजित होकर श्राद्ध में भोजन करे, तो श्राद्धकर्त्ता के पितरों को 7 पीढ़ियों तक निरन्तर तृप्ति रहती है।[मनु स्मृति 3.146]    
If even a single learned-enlightened Brahmn, accepts the food served by one, who is performing the homage to his Manes, ancestors-deceased, will satisfy 7 generations continuously. 
येष वै प्रथमः कल्पः प्रदाये हव्यकव्ययोः। 
अनुकल्पस्त्वयं ज्ञेयः सदा सद्भिरनुष्ठितः॥
हव्य-कव्य देने में यह मुख्य विचार हुआ। अब साधु पुरुषों ने जिस गौण विचार का सदा अनुष्ठान किया है, वह इस प्रकार है।[मनु स्मृति 3.147]   
This is the major postulate of the procedure for serving the gift, donations, fees, dolls offering sacrifices to the demigods and Manes. Now, let us learn, describe-discuss the minor postulates adopted by the saintly persons.
मातामहं मातुलं च स्वीस्त्रीयं श्वसुरं गुरुम्। 
दौहित्रं विट्पतिं बन्धुमृत्विज्ञाज्यौ च भोजयेत्॥
मातामह-नाना, मामा, भाँजा, श्वसुर, गुरु, दौहित्र, जमाता, मौसेरा-फुफेरा भाई, पुरोहित और यज्ञकर्त्ता, इनको श्राद्ध में भोजन करावे।[मनु स्मृति 3.148]    
One may include one's maternal grandfather, maternal uncle, sister's son, father in law, one's teacher, daughter's son, daughter's husband, cognate kinsman, one's own officiating priest for serving food in the group of participants. 
They are served food only when the homage ceremony is over. Those who are covered in the list of in laws-side can not be given gifts and fee as well. The Guru, son in law, daughter's son, the priest and the main figure performing the rituals deserve to be paid as per one's capability.
न ब्राह्मणं परीक्षेत दैवे कर्मणि धर्मवित्। 
पित्र्ये कर्मणि तु प्राप्ते परीक्षेत प्रयत्नतः॥
धर्मज्ञ पुरुष देवकर्म में ब्राह्मण की परीक्षा न करे। किन्तु पितृकर्म में उसके आचार, विचार, विद्या, कुल-शील की अच्छी तरह जॉंच कर ले।[मनु स्मृति 3.149]   
The devoted should not subject the Brahman to testing for the purpose of prayers-worship pertaining to deities-demigods. In case of Shraddh Karm-homage to Manes, one must ascertain the behaviour, thoughts, education-learning, clan-hierarchy of the Brahman invited for the sacred Hawan-Agnihotr, prior to asking him to perform the sacrifices-rituals.
In fact these rituals needs high degree of purity, perfection and expertise in the absence of which, mistakes may occur and the whole purpose of the anniversary-homage is lost and may yield adverse results. Correct pronunciation, recitation, note, cord, intensity, volume of the hymns is a must-essential, failing which the desired result is not obtained.
ये स्तेनपतितक्लीबा ये च नास्तिकवृत्तयः। 
तान्  हव्यकव्योर्विप्राननर्हान् मनुर्ब्रवीत्॥
जो चोर हों, पतित हों, नपुंसक हों, नास्तिक हों; वे ब्राह्मण हव्य कव्य के योग्य नहीं हैं, ऐसा मनुजी ने कहा है।[मनु स्मृति 3.150]   
Manu Ji has said that a Brahman who is a thief, outcasts-degraded, ashiest or eunuchs-impotent is not qualified-unworthy for receiving oblations to the gods and Manes.
जटिलं चान धीयानं दुर्बलं कितवं तथा। 
याजयन्ति च ये पूंगास्तांश्र्च श्राद्धे न भोजयेत्॥
वेदपाठ रहित, जटाधारी, ब्रह्मचारी, दुर्बल (अजितेन्द्रिय), जुआरी और ग्राम्य पुरोहित, इनको श्राद्ध न खिलावे।[मनु स्मृति 3.151] 
One should not serve food during Shraddh ceremony to a person who has not studied Veds, who has long hair-locks, celibate, weak-has no control over sensuality, sexuality, passions, gambler and the village priest (who sacrifice for a multitude, sacrificer).
चिकित्सकान् देवलकान्मांसविक्रयिणस्तथा। 
विपणेन च जीवन्तो वर्ज्या: स्युर्हव्यकव्ययोः॥
वैद्य, पुजारी (देवांश वाले), माँस बेचने वाले और वणिक्वृत्ति से जीने वाले ब्राह्मण देव और श्राद्ध दोनों में त्याज्य हैं।[मनु स्मृति 3.152] 
The Brahmns who have adopted the job of a physician-doctor, temple priests-who gets salary from the temple and who eat the offerings made to demigods-deities, butchers-meat sellers and those who trade in merchandise-businessman; should not be served food meant for the offerings to deities-demigods and the Manes.
प्रेष्यो ग्रामस्य राज्ञश्र्च कुनखी श्यावदन्तक:। 
प्रतिरोद्धा गुरौश्र्चैव त्यत्काग्निर्वार्धुषिस्तथा॥
राजा या गाँव का दास कर्म करनेवाला, जिसके नख खराब हों, किसके दाँत काले हों, गुरु की आज्ञा के प्रतिकूल चलने वाला ब्राह्मण हव्य-कव्य में त्याज्य है।[मनु स्मृति 3.153]  
A Brahman who has been employed by the king-state or who performs as a servant in the village, whose nails are in bad shape, whose teeth are black and one who functions against the directives-orders of his Guru; does not deserve to receive the food gifts, fees-Dakshina, offerings during the Shraddh.
यक्ष्मी च पशुपालश्च परिवेत्ता निराकृति:। 
ब्रह्मद्विट् परिवितिश्च फनाभ्यन्तर एव च॥
यक्ष्मा-क्षय रोगी, पशुओं पालन करने वाला, परिवेत्ता, परिवित्ती, देव-पितृ कर्मादि रहित, ब्राह्मण-द्वेषी और किसी लोकोपकार के लिये पैदा किये हुए धन में अपनी जीविका चलाने वाला, ये सब देवकर्म और श्राद्ध में त्याज्य हैं।[मनु स्मृति 3.154] 
One suffering from tuberculosis, tend cattle, marries before his elder brother and performs Agnihotr, one remain unmarried but his younger brother gets married, enemy of the Brahmans and the one who earns his livelihood from the money collected for social welfare; should be rejected from serving food in sacrifices meant for the deities-demigods and the Manes.
परिवेत्ता :: ज्येष्ठ भाई का विवाह न हुआ हो, किन्तु छोटे भाई का विवाह हुआ हो और वह अग्निहोत्र करता हो तो उसे परिवेत्ता कहते हैं; If the elder brother remain unmarried the younger brother is called Parivetta in case he performs Agnihotr.
परिवित्ती :: परिवेत्ता के बड़े-ज्येष्ठ भाई को परिवत्ति कहते हैं; The elder brother of Parivetta is called Parivitti.
कुशीलवोSवकीर्णी च वृषलीपतिरेव च। 
पौनर्भवश्च काणश्च यस्य चोपपतिर्गृहे॥
नाच-गान से जीविका चलाने वाला, ब्रह्मचर्यव्रत से रहित, कामति, ब्राह्मचारी या यति, शूद्रा स्त्री या जो पुनर्विवाहिता स्त्री का पुत्र है तथा काना और जिस घर में स्त्री का उपपति हो, ये सब देवकर्म और श्राद्ध के त्याज्य हैं।[मनु स्मृति 3.155] 
One who earns his livelihood through dance or music, devoid of celibacy, sexy-passionate, celibate or Yati (Caesura, ascetic, solitairian), born from a Shudr woman or the son of a woman who has remarried, blind of one eye and one in whose house a paramour (the second husband of a married woman) of his wife resides; are all rejected-discarded for the purpose of Shraddh meant for the Manes or the prayers devoted to the deities or the demigods. 
भृतकाध्यापको यश्च भृतकाध्यापितस्तथा। 
शूद्रशिष्यो गुरुच्श्रैव वाग्दुष्ट: कुण्डगोलकौ॥
वेतन लेकर पढ़ाने वाला, वेतन देकर पढ़ने वाला, शूद्र से पढ़ने वाला या शूद्र को पढ़ाने वाला, कटुभाषी, सधवा या विधवा के पेट से परपुरुष द्वारा उत्पन्न ब्राह्मण देव और पित्र्य दोनों कार्यों में त्याज्य हैं।[मनु स्मृति 3.156] 
One who takes salary for teaching, pays for learning, learns from a lower caste-Shudr, who teaches a Shudr, who speaks bitter (scurrilous, rude), born of a widow from some one else-other than the father or the Brahman produced by some one else-other than the father, deserve to be rejected for offering sacrifices to the demigods worship or the Manes worship i.e., Shraddh.
कटुभाषी :: कड़वा बोलने वाला; One who speaks bitter (scurrilous, rude).
अकारणपरित्यक्ता मातापित्रोर्गुरोस्तथा। 
ब्राह्म्यैयौर्नेश्च सम्बन्धै: संयोगं पतितैर्गत:॥
माता, पिता और गुरु को अकारण त्यागने वाला पतितों के साथ विवाहादि सम्बन्ध या पठन-पाठन करने वाला त्याज्य है।[मनु स्मृति 3.157]  
One who deserts his mother, father and the Guru without logic and the one who maintains marriage relations and studies or teaches the abject-degraded, outcasts, deserves to be rejected.
पतित :: गिरा हुआ, जिसका नैतिक पतन हो चका हो, आचार भ्रष्ट, अधम, नीच, पापी; जाति, धर्म, समाज आदि से च्युत, युद्ध में पराजित, अपवित्र, मलिन, नीचे की ओर झुका हुआ, नत; abject, apostate, corrupt, decadent, degenerate, dropped, fallen, lapsed, licentious, retrograde, sordid, vicious. 
अगारदाही गरद: कुण्डाशी सोमविक्रयी। 
समुद्रयायी बन्दी च तैलिक: कुटकारक:॥
घर में आग लगाने वाला, विष देने वाला, जारज का अन्न खाने वाला, मादक पदार्थ बेचने वाला, समुद्र यात्रा करने वाला, भाट-भाँड़, तिलादि से तेल निकालने वाला और झूँठी गवाही देने वाला त्याज्य है। [मनु स्मृति 3.158] 
One who burns-ignites a house, poisons some one, eats food of illegitimate, seller of narcotics-drugs, wine, an ocean traveller, a bard, extracts oil from seeds, gives false witness deserve to be rejected.
BARD :: भाट, जिरहपोश, चारण, कवि, सूत, सारिका; wandering minstrel, poet who sings praises, songster, swan, minstrel, yarn, thread, charioteer, rope, starling. 
पित्रा विवदमानश्च कितवो मद्यपस्तथा। 
पापरोग्यभिशप्तश्च दाम्भिको रसविक्रयी॥
पिता के साथ वृथा विवाद करने वाला, जुआ खेलने वाला, शराबी, महारोगी, महापाप-वाद युक्त, दाम्भिक और रसों को बेचने वाला, देवान्न-श्राद्धान्न के लिये उपयुक्त नहीं है।[मनु स्मृति 3.159] 
One who unnecessarily argues with his father, gambles, drinks wine-alcohol, having serious diseases, like aids, venereal disease, possessor of mortal sins, a hypocrite and seller of extracts-wine is not suitable for service food of sacrifices to demigods-deities and the Manes.
धनुःशराणां कर्ता च  यश्र्चाग्रेदिधिषूपति:। 
मित्रध्रुग्ध्यूतवृत्तिश्च पुत्राचार्यस्तथैव च॥
धनुष बाण बनाने वाला, उस कन्या से व्याह करने वाला जिसकी बड़ी बहन कुँआरी हो, मित्र द्रोही, जूआ वृत्ति से निर्वाह करने वाला, बेटे से वेद पढ़ने वाला श्राद्धादि कर्म में त्याज्य है।[मनु स्मृति 3.160] 
Bow and arrow maker, one who marries a girl whose elder sister is unmarried, who cheats-deceives his friend, who earn his livelihood through gambling and the one who learns the Veds from his son are not acceptable for performing Shraddh. They are rejected for serving meals for the homage to Manes-Pitre. 
औरभ्रिको माहिषिकः परपूर्वापतिस्तथा। 
प्रेतनिर्यातकच्श्रैव वर्जनीया: प्रयत्नत:
भेड़ और भैंसों से जीविका चलाने वाला, विधवा से विवाह करने वाला और द्रव्य के लिये प्रेत का दाहादि करने वाला श्राद्ध में यत्न से त्याग देना चाहिये।[मनु स्मृति 3.166]   
Those rear sheep & buffaloes for earnings, one who marries a widow and a person who perform cremation-last rights of the dead-deceased, should be solely rejected for the purpose of homages to Manes-Pitre. 
एतान् विगर्हिताचारापाङ्क्तेयान् द्विजाधमान्।    
द्विजातिप्रवरो विद्वानुभयत्र विवर्जयेत् 
इन निन्दित आचार वाले अपाङ्क्तेयै (पंक्ति में न बैठने योग्य) अधम ब्राह्मणों को देवकर्म और पितृकर्म दोनों में विद्वान त्याग दें।[मनु स्मृति 3.167] 
The enlightened-learned should reject such depraved-unworthy Brahmns (one who is born as Brahman but indulge in such professions not meant for the Brahmans. In today's times almost every Brahman is engaged in such trades-professions which are nor prescribed for them.) for serving pious food meant for homages to the Manes-Pitre.
ब्राह्मणस्तवनधीयानस्तृणाग्निरिव शाम्यति। 
तस्मै हव्यं न दातव्यं न हि भस्मनि हूयते
वेदाध्ययन से हीन ब्राह्मण तिनके की आग के समान निस्तेज होता हैं। उसको हव्य नहीं देना चाहिये, क्योंकि भस्म राख में हवन नहीं किया जाता।[मनु स्मृति 3.168]  
The condemned Brahman is like the fire in a piece of straw, which turns to ashes immediately. The condemned-depraved Brahman is not entitled to the offerings meant for the Brahmans who are well versed-enlightened in Veds. Hawan-Yagy is not performed in ashes. Its always done in blazing fire.
अव्रतैर्यद् द्विजैर्भुक्तं परिवेत्त्रादिभिस्तथा। 
अपाङ्क्तेयैर्यदन्यैश्च तद्वै रक्षांसि भुञ्जते॥
ब्रह्मचर्य से हीन और परिवेत्ता आदि जितने अपांक्तेय ब्राह्मण हैं, उनका किया हुआ भोजन राक्षस के पेट में चला जाता है।[मनु स्मृति 3.170] 
The food served to the Brahman without celibacy, Parivetta (If the elder brother remain unmarried the younger brother is called Parivetta in case he performs Agnihotr.) and the condemned (Brahmans who are not qualified to sit in the Que-row) goes to the stomach of the Rakshas-demons.
दाराग्निहोत्रसंयोगं कुरुते योSग्रजे स्थिते। 
परिवेत्ता स विज्ञेयः परिवित्तिस्तु पूर्वजः॥
बड़े भाई के रहते यदि छोटा भाई व्याह कर ले और अग्निहोत्र की क्रिया करे तो परिवेत्ता और उसका बड़ा भाई परिवित्ती कहा जाता है।[मनु स्मृति 3.171]  
If the younger brother gets married prior to his elder brother and performs Agnihotr, he is called Parivetta and his elder brother is called Parivitti.
परिवित्तिः परिवेत्ता यया च परिविद्यते सर्वे। 
ते नरकं यान्ति दातृयाजकपञ्चमा:॥
परिवित्ति, परिवेत्ता और जिस कन्या से विवाह होता है, कन्यादान करनेवाला और विवाह में होम करने वाला ये पाँचों नर्क गमी होते हैं।[मनु स्मृति 3.172]  
Parivitti-the elder brother who marries after the younger, Parivetta-the younger brother who marries prior to, before the elder, Parivetta's bride, her father-mother and the relatives who are part of donating the bride to the groom and the priest who solemnise such a marriage, all go the hells.
भ्रातुर्मृतस्य भार्यानां योSनुरज्येत कामतः। 
धर्मेणापि नियुक्तायां स ज्ञेयो दिधिषुपतिः॥
बड़े भाई के मरने पर उसकी स्त्री से धर्मपूर्वक नियोग करने पर यदि कामवश वह उस स्त्री में अनुरक्त हो तो उसे दिधिषुपति कहते हैं।[मनु स्मृति 3.173]  
One is called Didhishupati if he indulge in producing a child as per tenants of Dharm-religion through Niyog, but get involved sentimentally.
Niyog Pratha is a tradition which allows producing of children for continuance of the hierarchy-clan through some saint-sage, a Brahman, who is not a lascivious (कामुक, sexual, passionate) person. This happened in case of both Sury Vansh and Chandr Vansh. Sury Vansh was elongated by Guru Vashishth, while Chandr Vansh continues through Ved Vyas.
परदारेषु जायेते द्वौ सुतौ कुण्डगोलकौ। 
पत्यौ जीवति कुण्ड: स्यान्मृते भर्तरि गोलकः॥
परस्त्रियों में कुण्ड और गोलक दो पुत्र उत्पन्न होते हैं। जिसका स्वामी जीता है, उस स्त्री दूसरे पुरुष द्वारा उत्पन्न पुत्र कुंड कहलाता है; जबकि पति के मरने के बाद अन्य पुरुष से उत्पन्न पुत्र गोलक कहलाता है।[मनु स्मृति 3.174]  
Kund is the illegitimate son produced by a woman through someone else while her husband is alive and Golak is the son produced illegitimately by a woman through someone else after the death of her husband.
तौ तु जातौ परक्षेत्रे प्राणिनौ प्रेत्य चेह च। 
दत्तानि हव्यकव्यानि नाशयेते प्रदायिनाम्॥
परस्त्रियों से उत्पन्न ये दोनों पुत्र (कुण्ड और गोलक) दाताओं के दिये हुए हव्य-कव्य को नष्ट करते हैं। इस लोक में या परलोक में कहीं भी दाता को फल नहीं मिलता।[मनु स्मृति 3.175]  
These two types of sons, Kund & Golak produced illegitimately by one through other women leads to loss of pious result-rewards in the present & the next several births for, giving Dakshina, gifts, money, donations to virtuous Brahmns, while preforming sacrifices, serving food for the sake of  Manes.
अपाङ्तक्यो यावतः पाङ्तक्यान् भुञ्जा नाननुपश्यति। 
तावतां न फलं तत्र दाता प्राप्नोति बालिशः॥
पांक्तेय ब्राह्मणों को श्राद्ध में भोजन करते समय, जितने अपांक्तेय ब्राह्मणों की दृष्टि पड़ती है, श्राद्धकर्त्ता को उतने ब्राह्मणों को भोजन कराने का फल नहीं मिलता।[मनु स्मृति 3.176]  
The household do not get return-reward for serving food to the virtuous Brahmans to the extant-tune of the number of those non deserving Brahmans who witness-see the deserving-virtuous Brahmans being served food for the demigods-deities during Shraddh-homage ceremony.
पांक्तेय ब्राह्मण :: वे ब्राह्मण जो पंक्ति में बैठाकर श्राद्ध या देवकर्म में भोजन करने योग्य हों। The virtuous deserving Brahmns who are served food during the prayers dedicated to demigods-deities of the Shraddh-homage ceremony.
वीक्ष्यान्धो नवतेः काण: षष्टे: श्वित्री शतस्य तु। 
पापरोगी सहस्त्रस्य दार्तुनाशयते फलम्॥
श्राद्ध में भोजन करने वाला एक अन्धा 90 सद्ब्राह्मणों को काना 60 ब्राह्मणों, श्वेतकुष्ठ वाला 100 ब्राह्मणों को और पाप रोगी दाता के 1,000 ब्राह्मणों को खिलाने का फल नाश कर देता है।[मनु स्मृति 3.177]  
The virtuous-auspicious impact of feeding pious Brahmans is lost by feeding blind, who spoils the piousness equal to 90 virtuous Brahmans, a boss-eyed (one-eyed, single eyed) spoils the purity equivalent to 60 Brahmans, one with leprosy equal to 100 and a sinner equal to 1000 Brahmans.
यावतः संस्पृशेदङ्गैर्ब्राह्मणाञ्छूद्रयाजक:।  
तावतां न भवेद्दातु: फलं दानस्य पौर्तिकम्॥
शूद्रों का यज्ञ कराने वाला विप्र जितने ब्राह्मणों को अपने शरीर से स्पर्श करता है, उतने ब्राह्मणों को भोजन करने का पूरा फल श्राद्धकर्त्ता को नहीं मिलता।[मनु स्मृति 3.178]  
The household performing homage ceremony losses the piousness-reward equivalent to as many Brahmans as are served food to those who are touched by a Brahman who organise Yagy-sacrifices in fire for the Shudr.
वेदविच्चापि विप्रोSस्य लोभात् कृत्वा प्रतिग्रहम्। 
विनाशं व्रजति क्षिप्रमामपात्रमिवाम्भसि॥
वेद जानने वाला ब्राह्मण यदि लोभ से शूद्र के पुरोहित का दान ले लेता है तो वह पानी में डाले हुए मिट्टी के कच्चे घड़े की तरह नष्ट हो जाता है।[मनु स्मृति 3.179]  
If a Brahmn learned in the Veds, accepts the donation-gifts from a person who acts as the priest of a Shudr will perish like the unbaked pitcher made of clay, due to covetousness-greed. 
सोमविक्रयिणे विष्ठा भिषजे पूयशोणितम्। 
नष्टं देवलके दत्तमप्रतिष्ठं तु वार्धुषौ॥
सोमरस बेचने वाले को दिया हुआ श्राद्धान्न विष्ठा और वैद्य को दिया हुआ दान पीब लहू होकर प्राप्त होता है। देवांश भोजी को दिया हुआ दान नष्ट हो जाता है और सूदखोर को दान देने से कोई फल नहीं मिलता।[मनु स्मृति 3.180]  
The sacrificial food served to the seller of Some Ras (a tonic that energise the demigods) turns into faeces, food served to Vaedy-Ayur Ved physician turns into pus mixed with impure-contaminated blood, donation to priest in the temple who consumes the gifts meant for the demigods-deities is lost and there is no use donating to one who earns interest over his money by lending it. These are categories of Brahmns who are engaged in such trades-practices.
यत्तु वाणिजके दत्तं नेह नामुत्र तद्भवेत्। 
भस्मनीव हुतं तथा पौनर्भवे द्विजे॥
वणिक्वृत्ति से जीने वाले को श्राद्धान्न खिलाने से इहलोक और परलोक दोनों में कुछ महीन फल मिलता है। पुनर्विवाहिता स्त्री के पुत्र को दिया हुआ हव्य भी भस्म में डाली हुई आहुति के तुल्य निष्फल होता है।[मनु स्मृति 3.181]   
The sacrificial food served to one who is engaged in trading-selling goods meant for homage to the Manes does not serve any purpose in the present or the next births. The food offered to the son of a woman who has married again is lost like the  oblation-sacrifices made in the ashes.
इतरेषु वतपंक्त्येषु यथाद्दिष्टेष्वसाधुषु। 
मे दो सृङ्मांसमज्जास्थि वदन्त्यन्नं॥
अन्य अपांक्तेय और नीच वृत्ति वाले ब्राह्मण त्याज्य कहे गए हैं, उन्हें श्राद्धादि में दिया हुआ अन्न दाता के जन्मान्तर में मेद, मांस, रक्त, मज्जा और हड्डी होता है, ऐसा पण्डित लोग कहते हैं।[मनु स्मृति 3.182]   
The food served to the non deserving Brahmans with bad-sinful tendencies-instincts turns into adipose, fats, tissue, blood, boons meat-flash in various next incarnations in their body.
The food offered to any one should be free from bias & contempt. It should be done-served happily without expecting any return.
The food should be able to satisfy the appetite of the hungry, needy be him a beggar or else.

अपांक्त्योपहता पंक्तिः पाव्यते यैर्द्विजोत्तमै:। 
तान्निबोधत कात्स्न्र्येन द्विजाप्रयान् पङ्क्तिपावनान्॥
अपांक्तियों से दूषित पंक्ति जिन श्रेष्ठ ब्राह्मणों से पवित्र होती है, उन पंक्तिपावन ब्राह्मणों का परिचय सुनिये।[मनु स्मृति 3.183]  
Now, let me describe the characterises of the virtuous Brahmasns who are capable of sanctifying-purifying the impure row-place occupied by the sinner, bad-unworthy Brahmans. 
 अग्रया: सर्वेषु वेदेषु सर्वप्रवचनेषु च। 
श्रोतियान्व्यजांश्चैव विज्ञेया: पंक्तिपावना:॥
जो षडङ्ग सहित चारों वेदों में अग्रगण्य हों, श्रोत्रिय के वंश में जिनका जन्म हो, उन्हें पंक्तिपावना जानना चाहिये।[मनु स्मृति 3.184]   
One who is ahead & has learnt the 6 organs of the Veds as well as 4 Veds and is born in the family of those who learn just by hearing are termed as Shrotriy-pure for constituting the rows of Brahmns fit for serving the sacred food meant for Manes, demigods, deities.
त्रिणाचिकेत: पंचाग्निस्त्रीसुपर्ण: षडङ्गवित्। 
ब्रह्मदेयात्मसन्तानो ज्येष्ठसामग एव च॥
त्रिणाचिकेन (अर्थात यजुर्वेद को पढ़कर उसमें कहे हुए व्रत को किया है) और अग्निहोत्र, त्रिसुपर्ण (ऋग्वेद का ज्ञाता या तदुक्त व्रत का व्रती) शिक्षा आदि छः अंगों का ज्ञाता तथा उसकी शिक्षा देने वाला, ब्राह्मविवाह से विधिपूर्वक ब्याही हुई स्त्री के गर्भ से उत्पन्न और आरण्यक उपनिषदों में गीयमान सामवेद का गाने वाला; ये छः पंक्तिपावन हैं।[मनु स्मृति 3.185]    
(1). Trinachiken-one who had learnt Yajur Ved and observe  the fasts described in it, (2). who keeps five sacred fires for carrying out Agnihotr sacred sacrifices in sacred fire, (3). Trisuparn, one who is well versed in Rig Ved, (4). follows the fasts described in it along with being the scholar of 6 Ang-organs of education and teaches them simultaneously, (5). born out of the wedding performed as per Brahmn process and (6). sings the songs-verses listed in Arnayak Upnishad of Sam Ved; is qualified to sit in the rows of Virtuous Brahmns for sacred feast of Homage to Manes, demigods-deities. 
वेदार्थवित् प्रवक्ता च ब्रह्मचारी सहस्रदः। 
शतायुश्चैव विज्ञेया ब्राह्मणा: पंक्तिपावना:॥
वेद का अर्थ जानने वाला, वेदवक्ता, ब्रह्मचारी, सहस्त्रों गौओं का दान करने वाला और सौ वर्ष का वृद्ध ब्राह्मण; ये सभी पंक्तिपावन हैं।[मनु स्मृति 3.186]   
The Brahmn who knows the gist-meaning-explanation of the Veds, who explains-teaches-elaborate the content of Veds, a celibate, one who has donated thousands of cows and the one who has completed 100 years of age are qualifies to sit in the rows meant for the serving of the sacred-virtuous food.
पूर्वेद्यु रपरेद्युर्वा श्राद्धकर्मण्युपस्थिते। 
निमन्त्रयेत त्र्यवरान्सम्यग्विप्रान् यथोदितान्॥
श्राद्धकर्म उपस्थित होने पर, श्राद्ध के पहले दिन या उसी दिन पूर्वोक्त लक्षणों से युक्त 3 ब्राह्मणों को विनयपूर्वक निमन्त्रण दे।[मनु स्मृति 3.187]   
One should invite 3 Brahmns having above mentioned characteristics a day before the occasion of Shraddh or on the same day with due respect, politely.
निमन्त्रितो द्विजः पित्र्ये नियतात्मा भवेत्सदा। 
न च छन्दांस्यधीयीत यस्य श्राद्धं च तद्भवेत्॥
श्राद्ध में निमंत्रित ब्राह्मण (निमन्त्रण पाने के समय से) संयतेन्द्रिय होकर रहे। नित्य के कर्म जपादि के अतिरिक्त अन्य वेदपाठ ने करे। श्राद्धकर्त्ता भी इस नियम का पाकलन करे।[मनु स्मृति 3.188]   
From the very moment the Brahmn has received an invitation for the homage ceremony of the Manes, he should restrict himself from the passions, control himself and perform daily routine including recitation of prayers excluding the study-reading of Veds.
निमन्त्रितान् हि पितर उपतिष्ठन्ति तान्द्विजान्। 
वायुवच्चानुगच्छन्ति तथासीनानुपासते॥
उन निमन्त्रित ब्राह्मणों में पितर गुप्त रुप से निवास करते हैं। प्राणवायु की भाँति उनके चलते समय वे चलते और बैठते हैं।[मनु स्मृति 3.189]   
The Manes occupy the physique of the invited Brahmans and reside in them secretly. They move or sit like the breath vital along with them.
केतितस्यु यथान्यायं हव्यकव्ये द्विजोत्तमः। 
कथञ्चिदप्यतिक्रामन् पापः सूकरतां व्रजेत्॥
देवकर्म या पितृकर्म में निमन्त्रित ब्राह्मण निमन्त्रण स्वीकार करके किसी कारण से यदि भोजन न करे तो उस पाप के कारण वह जन्मान्तर में सूअर होता है।[मनु स्मृति 3.190]  
If the Brahman fails to turn up for accepting the sacred food for the purpose of offerings to the Manes, deities or the demigods due to one or the other reason he will be subjected to became a pig-hog in next birth by virtue of this sin.
विराटसुताः सोमसद: सध्यानां पितरः स्मृता। 
अग्निष्वात्ताश्च देवानां मारीचा लोकविश्रुताः॥
विराट के पुत्र सोमसद साध्यगण के पितर हैं। मरीचि के प्रसिद्ध पुत्र अग्निष्वाता देवताओं के पितर हैं।[मनु स्मृति 3.195]   
Somsad-the sons of Virat, are the Manes of Sadhygan. Agnishvata the famous sons of Marichi are the Manes of demigods.
दैत्यदानवयक्षाणां गन्धर्वोरगरक्षसाम्। 
सुपर्ण किन्नराणां च स्मृता बर्हिषदोSत्रिजा:॥
अत्रि के पुत्र बर्हिषद दैत्य, दानव, यक्ष, गंदर्भ, नाग, राक्षस, सुपर्ण और किन्नरों के पितर हैं।[मनु स्मृति 3.196]  
Barhishad-the sons of Atri, are the Manes of Giants, Demons, Yaksh, Gandarbh, Rakshas, Suparn and Kinnars.
सोमपा नाम विप्राणां क्षत्रियाणां हविर्भुजः। 
वैश्यानामाज्यपा: पुत्रा वशिष्ठस्य तु सुकालिनः॥
ब्राह्मणों के पितर सोमप, क्षत्रियों के हविष्मन्त, वैश्यों के आज्यप और शूद्रों के सुकलिन हैं।[मनु स्मृति 3.197]   
Somap are the Manes of Brahmans, Havishmant are the Manes of Kshatriy, Ajyap are the Manes of Vaeshy and Suklin are the Manes of Shudr.
सोमपास्तु कवेः पुत्रा हविष्मन्तोSङ्गिर: सुता:। 
पुलस्त्यस्याज्यपा: पुत्रा वशिष्ठस्य सुकालिनः॥
सोमप भृगु के, हविष्मन्त अङ्गिरा के, आज्यप पुलस्त्य के और सुकालिन वशिष्ठ के पुत्र हैं।[मनु स्मृति 3.198]   
Somap are the sons of Bhragu, Havishmant are the sons of Angira, Ajyap are the sons of Pulasty and Sukalin are the sons of Vashishth.
अग्निदग्धानग्निदग्धान् काव्यान् बर्हिषदस्तथा। 
अग्निष्वात्तांश्च  सौम्यांश्च विप्राणामेव निर्दिशेत्॥
अग्निदध, अनग्निग्ध, काव्य, बर्हिषद, अग्निष्वात्ता और सौम्य ये ब्राह्मणों के पितर हैं।[मनु स्मृति 3.199]   
Agnidadh, Anagnidadh, Kavy, Barhishad, Agnishvatta and Somy are the Pitre-Manes of the Brahmns.
य एते तु गणा मुख्याः पितृणां परिकीर्तितता:। 
तेषामपीह विज्ञेयं पुत्रपौत्रमनन्तकम्॥
पितरों के जो इतने मुख्य गण हैं और उनके भी असंख्य पुत्र पौत्रादि हैं।[मनु स्मृति 3.200]   
These major tranches of the Manes have numerous sons and grandsons.
ऋषिभ्यः पितरो जाताः पितृभ्यो देवमानवाः। 
देवेभ्यस्तु जगत्सर्वं चरं स्थाण्वनुपूर्वशः॥
ऋषियों से पितर, पितरों से देवता और मनुष्य उत्पन्न हुए हैं। देवताओं से यह सारा चराचर जगत् क्रम से उत्पन्न हुआ है।[मनु स्मृति 3.201]   
The Pitre-Manes evolved from the sages-Rishis, the demigods and the humans evolved from the Manes and the entire universe then evolved from the demigods sequentially, (both the movable and the immovable in due order).
राजतैर्भाजनैरेषामथो वा राजतान्वितै:। 
वार्यपि श्रद्धया दत्तमक्षयायोपकल्पते॥
इन पितरों को चाँदी के बर्तन में या चाँदी मिले ताँबे के पात्रों में श्रद्धा से दिया हुआ जल अक्षय सुख के लिये होता है।[मनु स्मृति 3.202]    
The water offered to the Manes in the pots made of either Silver or an alloy of Silver & copper grants permanent-endless bliss to one who has organised the Shraddh ceremony in remembrance of his ancestors, clan, deceased elders.
देवकार्याद् द्विजातीनां पितृकार्यं विशिष्यते। 
दैवं हि  पितृकार्यस्य पूर्वमाप्यायं श्रुतम्॥
द्विजातियों का देवकर्म से पितृकर्म विशेष है, क्योंकि देवकर्म पितृकर्म का ही सदा परिपूरक कहा गया है।[मनु स्मृति 3.203]    
For the Upper castes, the Homage to the Manes is important-significant, since the prayers offered to the demigods-deities are complementary of sacrifices offered to the Manes.
तेषामारक्षभूतं तु पूर्वं दैवं नियोजयेत्। 
रक्षांसि हि विलुम्पन्ति श्राद्धमारक्षवर्जितम्॥
उन पितरों के रक्षास्वरूप दैवकर्म-वैश्र्वदेव, पहले श्राद्ध को, रक्षा रहित होने पर राक्षस लोप कर देते हैं।[मनु स्मृति 3.204]    
If the offerings meant for the sacrifices to the Manes-demigods, during the Homage-Shraddh ceremony are unprotected, they are removed-taken over by the Rakshas-demons. 
दैवाद्यन्तं तदीहेत पित्राद्यन्तं न तद्भवेत्। 
पित्राद्यन्तं त्वीहमान: क्षिप्रं नश्यन्ति सान्वय:॥
श्राद्धकर्म का आदि और अन्त भी देवकर्म से ही करें, पित्राद्यन्त न करें। पित्राद्यन्त जो श्राद्ध करता है, वह सवंश नष्ट होता है।[मनु स्मृति 3.205]    
The beginning and termination of the Pitre Karm-Shraddh should accompany prayers to the deities-demigods, failing which the doer meets the end of his dynasty, clan, hierarchy. The rites pertaining to the Manes should come in between the prayers to the demigods-deities.
पित्राद्यन्त :: beginning and ending with a rite to the Pitṛ-Manes during Shraddh. 
If the Brahman fails to turn up for accepting the sacred food for the purpose of offerings to the Manes, deities or the demigods due to one or the other reason he will be subjected to became a pig-hog in next birth by virtue of this sin.
शुचिं देशं विविक्तं च गोमयेनोपलेपयेत्। 
दक्षिणाप्रवणं चैव प्रयत्नेनोपपादयेत्॥
श्राद्ध का स्थान पवित्र और निर्जन हो। उसे गोबर से लीप दें। पिण्ड स्थान ऐसा बनाना चाहिए कि वह दक्षिण दिशा की ओर ढ़लाव लिये हुए हो।[मनु स्मृति 3.206]    
The place selected for the homage should be pure-pious and located at an uninhibited, secluded, isolated place. The floor for the purpose of Shraddh should be coated-pasted with Gobar-cow dung. It should be there in the South direction, having a slope (5 degrees or slightly less).
Cow dung has anti bacterial, anti fungal properties due to the presence of multiple enzymes in the stomach of the cow. Cow is sacred and should never be killed or eaten by the human beings. Its urine, dung, Ghee, curd, milk, butter milk are too good for human health & hygiene.
लीपना :: लिप्त करना, पोतना, सानना, आवरण, लेप करना, pasted, coat, slake. 
अवकाशेषु चोक्षेषु नदीतीरेषु चैव हि। 
विविक्तेषु च तुष्यन्ति दत्तेन पितरः सदा॥
उपवन या वन की पवित्र भूमि में या नदी तट या निर्जन स्थान में पिण्डदान आदि से पितर सदा संतुष्ट होते हैं।[मनु स्मृति 3.207]    
The Manes feels satisfied, contaminated, pleased if the lobs of dough of wheat or barley are made-prepared and donated over the pious land of a secluded place,  river bank, in an orchard, garden. 
DOUGH :: लोई, गुंथा हुआ आटा, साना हुआ गौला आटा, आटे के पिण्ड; plaid.  
आसनेषुपक्लृप्तेषु बर्हिष्मत्सु पृथक्पृथक्। 
उपस्पृष्टोदकान् सम्यग्विप्रांस्तानुपवेशयेत्॥
सम्यक् प्रकार से स्नान और आचमन किये हुए उन निमन्त्रित ब्राह्मणों को पृथक-पृथक कुशासन पर बैठावे।[मनु स्मृति 3.208]    
The sacrificer should offer separate seats (mats, cushion), made of Kush grass to the invited Brahmns, who have performed their daily rites-oblations, after bathing and dropping water over the ground along with the recitation of Mantr.
उपवेश्य तु तान्विप्रानासनेष्वजुगुप्सितान्। 
गन्धमाल्यै: सुरभिभिरर्चयेद् देवपूर्वकम्॥
उन ब्राह्मणों को आसन पर बैठाकर चन्दन, माला और धूप आदि से देवपूर्वक पूजन करे। पहले वैश्वदेव निमित्तक और पीछे पितर निमित्तक।[मनु स्मृति 3.209]    
Once the Brahmns have occupied their seats, the household should use sandal wood paste, rosary and incense to perform prayers dedicated to the demigods-deities by first performing Vaeshv Dev followed by the the worship of the Pitres-Manes.
वैश्व देव :: वह होम या यज्ञ आदि जो विश्वदेव के उद्देश्य से किया जाय इसमें केवल पके हुए अन्न से विश्व-देव के उद्देश्य से आहुति दी जाती है और ब्राह्मणों को भोजन कराने को आवश्यकता नहीं होती है। यह उत्तराषाढा नक्षत्र में विश्वदेव को प्रसन्न करने के उद्देश्य से किया जानेवाला यज्ञ है। पंच महायज्ञों मे से भूत यज्ञ नाम का चौथा महायज्ञ। सूक्ष्म, दिव्य जितने भी प्राणी या देव, सबों को तृप्त करने की भावना से भोज्य सामग्री की हवि प्रदान करना ही भूत या वैश्य देव यज्ञ है। इससे व्यक्ति का हृदय और आत्मा विशाल होकर अखिल विश्व के प्राणियों के साथ एकता सम्मिलित का अनुभव करने में होता है। 
वैश्व देव विधि :: अग्निकुंडमें ‘रुक्मक’ अथवा ‘पावक’ नामक अग्निकी स्थापना कर अग्नि का ध्यान करें। अग्निकुंड के चारों ओर छः बार जल घुमाकर अष्ट दिशाओं को चंदन-पुष्प अर्पित करें तथा अग्नि में चरु की (पके हुए चावलों की) आहुति दें। तदुपरांत अग्नि कुंड के चारों ओर पुनः छः बार जल घुमाकर अग्नि की पंचोपचार पूजा करें तथा विभूति धारण करें।
उपवासके दिन बिना पके चावलकी आहुति दें (उपवास के दिन चावल पकाए नहीं जाते; इसलिए आहुतियाँ चरू की न देकर, चावल की देते हैं) 
अत्यधिक संकट काल में केवल उदक-जल, से भी (देवताओं के नामों का उच्चारण कर ताम्र पात्र में जल छोडना), यह विधि कर सकते हैं।
यदि यात्रा में हों, तो केवल वैश्वदेव सूक्त अथवा उपरोक्त विधि के मौखिक उच्चारण मात्र से भी पंच महायज्ञ का फल प्राप्त होता है।
तेषामुदकमानीय सपवित्रांस्तिलानपी। 
अग्नौ कुर्यादनुज्ञातो ब्राह्मणो ब्राह्मणै: सह॥
उन ब्राह्मणों को तिल और कुश से अर्ध्य देकर, उनसे आज्ञा लेकर, श्राद्धकर्त्ता अग्नि में मन्त्र पूर्वक होम करे।[मनु स्मृति 3.210]    
The host should give sesame seeds and Kush grass to the Brahmans-Purohit, seek their permission and perform Agnihotr-sacrifices in holy fire, along with the recitation of sacred rhymes. 
अग्ने: सोमयमाभ्यां च कृत्वाप्यायनमादित:। 
हविर्दानेन विधिवत् पश्चात्सन्तर्पयेत्पितृन्॥
पहले अग्नि, सोम और यम के निमत्त विधि पूर्वक पर्युक्षण करके हविष्य देकर पीछे पिण्डदानादि से पितरों को तृप्त करे।[मनु स्मृति 3.211]    
The host should first sprinkle water for the sake of deities named Fire, Moon and Yam, make offerings to them with sacrificial food, gifts and then satisfy the Manes.
पर्युक्षण  :: सींचना, श्राद्ध, होम, पूजा आदि के बिना मंत्र पढ़े छिड़का जानेवाला जल।
पर्युक्षणी :: पर्युक्षण के लिए जल से भरा पात्र।
अग्न्यभावे तु विप्रस्य पाणावेवोपपादयेत्। 
यो ह्यग्निः स द्विजो विप्रैर्मन्त्रदर्शिभिरुच्यते॥
अग्नि के अभाव में ब्राह्मण के हाथ में ही पूर्वोक्त देवताओं के निमित्त आहुति दे। वेद मन्त्र के तत्वदर्शियों ने ब्राह्मण और अग्नि को एक ही कहा है।[मनु स्मृति 3.212]    
In the absence of fire, the host should present the offerings in the hands of the Brahmn, since those who know the gist have recognised the fire and the Brahmns as one.
अक्रोधन्नासुप्रसादान्वदन्त्येतान्पुरातनान्। 
लोकस्याप्यायने युक्ताञ्छ्राद्धदेवान्द्विजोत्तमान्॥
जो क्रोध रहित, प्रसन्न मुख और लोकोपकार में निरत हैं, ऐसे ब्राह्मणों को मुनियों ने श्राद्ध के लिये देवतुल्य कहा है। [मनु स्मृति 3.213]   
Those Brahmns who never get angry, remain happy & are devoted to the welfare of the society; have been considered by the sages to be equivalent to the demigods for the purpose of sacrifices-offering pertaining to Shraddh-homage to the Manes..
अपसव्यमग्नौ कृत्वा सर्वमावृत्य विक्रमम्।
अपसव्येन हस्तेन निर्वपेदुदकं भुवि॥
पितृकर्म के आरम्भ में देवताओं के निमित्त, अपसव्य-जनेऊ को दाहिने कंधे पर रखकर, अग्नि में होम करे। इसके बाद दाहिने हाथ से पिण्ड रखने जगह में जल का प्रक्षेप करे।[मनु स्मृति 3.214]    
One should keep the sacred tread over his right shoulder prior to beginning of the Hawan-sacrifice in holy fire & then sprinkle holy water over the pious place, meant for keeping the flour lobs with his right hand.
त्रींस्तु तस्माद्धविः शेषात्पिण्डान्कृत्वा समाहितः।
औदकेनैव विधिना निर्वपेद्दक्षिणामुखः॥
इसके बाद एकाग्रचित्त होकर होम से बचे हुए अन्न के तीन पिण्ड बनाये। उन पिण्डों को उदक-जल से विधि पूर्वक अभिषिक्त करके दक्षिण दिशा में मुँह करके उन पिण्डों को उनके स्थान पर रख दे।[मनु स्मृति 3.215]    
Now, one should concentrate his mind in the Almighty and make three lobes of the remaining-unused flour-dough. He should sprinkle holy-sacred water over them and place them at proper place, facing South direction.
यजमान :: यज्ञ करने वाला, परिवार या जाति का मुखिया, ब्राह्मण को भरण-पोषण के लिए अन्न आदि देने वाला; host, sacrificer. 
न्यूप्य  पिण्डांस्ततस्तांस्तु प्रयतो विधिपूर्वकम्। 
तेषु दर्भेषु तं हस्तं निमृज्याल्लेपभागिनाम्॥
उन पिण्डों को विधिपूर्वक कुशों पर रखकर कुशों के मूल में लेप भाग पितरों की तृप्ति के लिये रखकर अपना हाथ पोंछ लें।[मनु स्मृति 3.216]    
Having placed the lobs of dough systematically-as per procedure laid down in the scriptures, in the roots of the Kush grass, the host should wipe his hand with the Kush grass.
आचम्योदक्परावृत्य त्रिराचम्य शनैरसून्।
षड्ऋतूंश्च नमस्कुत्र्यात्पितृणेव च मन्त्रवित्॥
इसके बाद आचमन कर उत्तराभिमुख तीन बार प्राणायाम करके छः ऋतुओं को और पितरों को नमस्कार करे। [मनु स्मृति 3.217]   
Next to it the host should sip a little water thrice and perform inhaling and exhaling air into the lungs, facing North and pray-bow to six seasons and the Pitre-Manes.
उदकं निनयेच्छेषं शनैः पिण्डान्तिके पुनः। 
अवजिघ्रेच्च तान्पिण्डान्यथान्यूप्तान्समाहित:॥
पिण्डदान के पहले भूमि पर जल छोड़ने के पश्चात् बचे हुये जल को पुनः प्रत्येक पिण्ड के समीप छोड़े और उन पिण्डों को जिस क्रम से जल दिया हो उसी क्रम से एक-एक सूंघे।[मनु स्मृति 3.218]    
The sequence in which the lobs of dough were donated has to be maintained while the water was released to the lobs of dough over the ground and the remaining water has to be poured in the same sequence and thereafter the lobs have to be smelled in the same sequence.
पिण्डेभ्यस्त्वल्पिकां मात्रां समादायानुपूर्वशः। 
तेनैव विप्रानासीनान्विधिवत्पूर्वमाशयेत्॥
पिण्डान्न से थोड़ा-थोड़ा भाग लेकर, भोजन के पूर्व उन आमन्त्रित (पितृ, पितामह, प्रपितामह रूप) ब्राह्मणों को यथाक्रम खिलावे।[मनु स्मृति 3.219]    
A bit of the food meant for the sacrificial acts should be taken from each of the categories-articles and be served to the invited Brahmns, for the sake of the Pitres (considering them to represent the father, grandfather and great grandfather till at least 7 generations) as per system-hierarchy.
ध्रियमाणे तु पितरि पूर्वेषामेव निर्वपेत्। 
विप्रवद्वाSपि  तं श्राद्धे स्वकं पितरमाशयेत्॥
यदि पिता जीवित हों तो पितामहादि का श्राद्ध करे और उन्हीं को पिण्ड दे और जीवित पिता को ब्राह्मणों के स्थान में भोजन करावे।[मनु स्मृति 3.220]   
If the father is alive, one should perform the Shraddh-homage for the sake of grandfather etc. and serve food to his father in place of the Brahmans.
Normally, the grandson is not entitled to perform the Shraddh till father is alive. But under exceptional circumstances when father is seriously ill-critical, mentally unsound, physically incapable, then its the grandson who has to do it.
पिता यस्य निवृत्त: स्याज्जीवेच्चापि पितामह:। 
पितुः स नाम सङ्कीर्त्य कीर्तयेत्प्रपितामहम्॥
जिसका पिता मर गया हो और पितामह-दादा/बाबा जीवित हो वह पितामह को छोड़कर पिता और प्रपितामह का श्राद्ध करे। [मनु स्मृति 3.221] 
If the father has died and the grandfather is alive, one should preform Shraddh for the sake of the father and the great grandfather.
पितामहो वा तच्छ्राद्धं भुञ्जीतेत्यब्रवीन्मनुः। 
कामं वा समनुज्ञातः स्वयमेव समाचरेत्॥
श्राद्ध में पिता को खिलाने की जो विधि कही गई है उसी विधि से पितामह जीता हो तो उसे भी खिलावे अथवा पितामह अपने लिये जो आज्ञा दे वही करे ऐसा मनु ने कहा है।[मनु स्मृति 3.222]  
Manu has said that one should serve the same food to his grand father, if he is alive that is being offered to his father or he should arrange for the food as is being desired by the grandfather.
This is an exceptional situation when both father and grandfather are alive and the grandson is performing sacred rites pertaining to Shraddh. This is possible only when both are incompetent.
तेषां दत्त्वा तु हस्तेषु सपवित्रं तिलोदकम्। 
तत्पिण्डाग्रं प्रयच्छेत स्वधैषामस्त्विति ब्रुवन्॥
उन ब्राह्मणों के हाथों में पवित्र कुश सहित तिलोदक देकर पूर्वोक्त पिण्डों में से थोड़ा उन्हें दे।[मनु स्मृति 3.223] 
One should put pious, pure, clean Kush grass in the pit formed by holding the two hands together by the Brahmns and give them sesame seeds called Tilodak along with the pieces of lobs for the sacrifice.
तिलोदक Tilodak :: तिलांजली अर्थात वह तिल मिला अँजुली भर जल जो मृतक के उद्देश्य से दिया जाता है; process of disconnecting one from the departed soul by keeping sesame seeds in the pit formed by  joining the two hands.
अँजुली :: करसंपुट, चुल्लू, ओक, अंजुरी, अंजलि दोनों हथेलियों को ऊपर की ओर जोड़ने से बनने वाला गड्ढा जिसमें पानी या कोई वस्तु भरकर दी जाती है; the pit formed by joining the two hands.
पाणिभ्यां तूपसंग्रह्य स्वयन्नस्य वर्धितम्। 
विप्रान्तिके  पितृरं ध्यायञ्शनकैरुपनिक्षिपेत्॥
भोजन की सामग्रियों से भरे पात्र को दोनों हाथों से धीरे-धीरे लाकर पितरों का ध्यान करता हुआ ब्राह्मणों के समीप रख दे।[मनु स्मृति 3.224]  
One should bring the pots-utensils full of the food meant for the Pitre, slowly and keep them near the Brahmans remembering the Pitres-Manes, forefathers.
उभर्योहस्तयोर्मुक्तं यदन्नमुपनीयते। 
तद्विप्रलुम्पन्त्यसुराः सहसा दुष्टचेतसः॥
परोसने के लिये जो अन्न एक हाथ से लाया जाता है, उसे दुष्ट बुद्धि राक्षस सहसा हरण कर लेते हैं।[मनु स्मृति 3.225]  
The food which is brought for serving with one hand is snatched instantaneously by the malevolent-wicked demons, Rakshas.
MALEVOLENT :: द्रोही, अशुभचिंतक, बदख़्वाह, दुर्भावनापूर्ण, अपकारी, दुष्ट, कुबुद्धि, बद; malevolent, deceitful, perfidious, evil, rogue, nasty, felonious, depraved, patchy, scratchy, scathing, malicious, harmful,  malign.
गुणांश्च सूपशाखाद्यान् पयो दधि घृतं मधु। 
विन्यसेत् प्रयतः पूर्वं भूमावेव समाहितः॥
पहले अचार, चटनी, रायता आदि व्यञ्जन, सूप, शाकादि तथा दूध, दही, घी और मधु आदि पदार्थ यत्नपूर्वक सावधानी से भूमि पर ही लेकर रखें।[मनु स्मृति 3.226] 
Various eatables like pickles, chutney, rayta-curd milk, soup, vegetables, milk, ghee-clarified butter, honey etc. should be placed carefully over the ground.
भक्ष्यं भोज्यं च विविधं मूलादि च फलानि च। 
हृद्यानि चैव मांसांनि पानानि सुरभिणि च॥
विविध प्रकार के भक्ष्य, भोज्य, फल, मूल, रोचक मांस और सुगन्धित जलादि, ये सब चीजें भी रखें।[मनु स्मृति 3.227]  
Various kinds of eatables (foods, edible, esculents), fruits, roots, savoury meat and scented water should be kept ready. 
उपनीय तु तत्सर्वं शनकैः सुसमाहितः। 
परिवेषयेत् प्रयतो गुणान् सर्वान् प्रचोदयन्॥
बड़ी सावधानी से भोजन की सब वस्तुएँ लाकर उनके गुण वर्णन करते हुए परोसे।[मनु स्मृति 3.228]  
One should bring all items of the dishes, food, eatables and serve them describing their characteristic-qualities to the guests-Brahmans invited for Shraddh-homage to the Pitre-Manes. 
नास्त्रमापातयज्जातु न कुप्येन्नानृतं वदेत्। 
न पादेन स्पृशेदन्नं न चैतदवधूनयेत्॥
ब्राह्मण भोजन के समय कदापि आँसू न गिरावे, क्रोध न करे, झूँठ न बोले, पैर से अन्न को न छुये और न उसे परोसते हुए हिलावे।[मनु स्मृति 3.229]  
One-the Brahmn should not shed tears, become angry, speak untruth, do not touch the food with feet or shake it.
अस्त्रं गमयति प्रेतान् कोषोSरीननृतं शुनः। 
पादस्पर्शस्तु रक्षांसि दुष्कृतीनवधूननम्॥
आँसू गिराने से श्राद्धान्न भूतों को, क्रोध करने से शत्रुओं को, झूँठ बोलने से कुत्तों को, पैर छुआने से राक्षसों को और उछालने से पापियों को प्राप्त होता है।[मनु स्मृति 3.230]  
Weeping sends the food to evil spirits, anger sends it to enemies, telling lies sends it to dogs, touching it with feet sends it to demons-Rakshas  and hurling it sends it to sinners. 
यद्यद्रोचेत विप्रेभ्यस्तत्तद्दद्यादमत्सरः। 
ब्रह्मोद्याश्च कथाः कुर्यात्पितदृणामेतदीप्सितम्॥
ब्राह्मणो को जो वस्तु अच्छी लगे वह प्रसन्न होकर उन्हें देवें। परमात्मा के सम्बन्ध की कथा-वार्ता करें; क्योंकि पितरों को यही कथा प्रिय लगती है।[मनु स्मृति 3.231]   
Gift-donate the goods liked by the Brahmns happily and listen to the story pertaining to the Almighty since its the only story which is liked by the Pitre-Manes. 
स्वाध्यायं श्रावयेत्पित्र्ये धर्मशास्त्राणि चैव हि। 
आख्यानानीतिहासांश्च पुराणानि खिलानि च॥
श्राद्ध में वेद, धर्मशास्त्र, आख्यान इतिहास (महाभारत आदि), पुराण (ब्रह्म पुराण अदि) और खिल (श्री सुक्तादि) पितरों को सुनावे।[मनु स्मृति 3.232]   
The host should narrate-recite the Veds, Dharm Shastr-scriptures, history, epics, Maha Bharat etc., Purans, Khil-Shri Sukt etc.  to the Pitres who have occupied the invited Vedic Brahmans. 
खिल :: Rig Vedic khilanis, Appendices (परिशिष्ट)-explanatory notes pertaining to  to the Ṛig Ved are known as Khil or  khilanis.
हर्षयेद् ब्राह्मणां सन्तुष्टो भोजयेच्च शनैः शनैः। 
अन्नाद्येनासकृच्चैतान् गुणैश्च परिचोदयेत्॥
प्रसन्न होकर ब्राह्मणों को हर्षित करे। उन्हें धीरे-धीरे भोजन करावे।  खाद्य पदार्थों के गुणों का वर्णन करते हुए बार-बार उन्हैं लेने के लिये आग्रह करे।[मनु स्मृति 3.233]    
One should feel delighted-pleasure in offering the pious food to the Brahmns and request them to accept more of it by explaining the good qualities-characteristics of the food items.  
व्रतस्थमपि दौहित्रं श्राद्धे यत्नेन भोजयेत्। 
कुतपं चासने दद्यात्तिलैश्च विकिरेन्महीम्॥
यदि कन्या का पुत्र ब्रह्मचारी हो तो भी उसे श्राद्ध में यत्नपूर्वक भोजन करावे। नेपाली कम्बल उन्हें बैठने के लिये दे और जिस स्थान पर श्राद्ध करना हो, वहाँ तिलों को छिड़क दे।[मनु स्मृति 3.234]   
If the daughter's son is a celibate he should be requested and persuaded to accept the meals meant for the Shraddh and offer him a Nepali blanket for sitting and spread sesame seeds over the place meant for the rites-Shraddh.
त्रीणी श्राद्धे पवित्राणि दौहित्र: कुतपस्तिलाः। 
त्रीणि चात्र प्रशंसन्ति शौचमक्रोधमत्वराम्॥
दौहित्र, कुतप और तिल, ये तीनों श्राद्ध में पवित्र कहे गये हैं और शौच (पवित्रता) शांतचित्तता तथा स्थिरता, इन तीनों की प्रशंसा की गई है।[मनु स्मृति 3.235]   
Daughter's son, Nepali blanket and the sesame seeds are considered pious for the purpose of homage. Piousity, stability and peacefulness are appreciable during the process of Shraddh.
पौत्रदौहित्रयोर्लोके विशेषो नोपपद्यते।
दौहित्रोऽपि ह्यमुत्रैनं संतारयति पौत्रवत्
संसार में पौत्र और दौहित्र में विशेषता नहीं है, दौहित्र भी पिण्डदानादि क्रियाओं से मातामह का उसके अनुसार ही परलोक में उद्धार करता है।[मनु स्मृति 3.239]   
There is no distinction between the son and daughter's son for performing rites pertaining to the Manes, since the maternal grandson can also release one from the next abode.
Next birth is a tie up, bond which keeps one hovering from one birth to yet another. There may be a person in either of the two sides; parental or maternal who through Yog, asceticism, Tapasya-piousity etc., not only releases himself from the cycle of reincarnations but releases the Manes as well.
The purpose of birth in human form is to seek release from reincarnations.

मातुः प्रथमतः पिण्डं निर्वपेत्पुत्रिकासुतः।
द्वितीयं तु पितुस्तस्यास्तृतीयं तत्पितुः पितुः
पुत्रिका का पुत्र-दौहित्र, पहला पिंड माता को दूसरा मातामह-नाना को और तीसरा प्रमातामह-परनाना को दे।[मनु स्मृति 3.240]   
Daughter's son should offer the first lob of dough (barley or wheat floor) to the deceased mother, second to mother's father (Nana) and the third to the father of mother's father Par Nana, परनाना).
घ्राणेन सूकरो हन्ति पक्षवातेन कुक्कुटः। 
श्र्वा तु दृष्टिनिपातेन स्पर्शेनावरवर्णजः॥
सूअर के सूँघने से, मुर्गे के पंख की हवा लगने से, कुत्ते के देखने से और शूद्र के छूने से श्राद्धान्न निष्फल हो जाता है।[मनु स्मृति 3.241]    
One has to maintain absolute purity during the Shraddh ceremony. Smelling by the pig, blowing of air by the cock's feather, seeing by the dog and touching by the Shudr makes the food unfit for consumption by the Manes.
The pig eats excreta, cock eats the insects, dog eats anything impure and even excreta and the Shudr performs such functions which makes them contaminated by fungous, virus, bacteria, microbes etc., they consume wine and do not follow rules-norms pertaining to good health-purity and remain impure-without taking a bath.
खञ्जो वा यदि वा काणो दातुः प्रेष्योSपि वा भवेत्। 
हीनातिरिक्तगात्रो वा तमप्यपनयेत् पुनः॥
लंगड़ा, काना, श्राद्धकर्त्ता का सेवक, हीनाङ्ग और अधिकाङ्ग; इन सबको श्राद्ध स्थल से हटा दे।[मनु स्मृति 3.242]    
One should remove the one eyed, lame, his servant, a person with deficient or excess organs from the place meant for the Shraddh-feeding the Brahmns.
ब्राह्मणं भिक्षुकं वाSपि भोजनार्थमुपस्थितम्। 
ब्राह्मणैरभ्यनुज्ञात: शक्तित: प्रतिपूजयेत्॥
ब्राह्मण या भिक्षुक कोई भोजनार्थ उपस्थित हो तो निमन्त्रित ब्राह्मणों से आदेश पाने पर श्राद्धकर्ता उन्हैं यथाशक्ति भोजन देकर सत्कार करे।[मनु स्मृति 3.243]    
One should honour the Brahmn or an ascetic-hermit, who comes to him for the sake of food and offer him food with the approval of the Brahman guests.
सार्ववर्णिकमन्नाद्यं सन्नीयाप्लाव्य वारिणा। 
समुत्सृजेद् मुक्तवतामग्रतो विकरन् भुवि॥
सब प्रकार के भोजन के अन्नों को लाकर उन्हें जल से आप्लावित करके, भोजन किये हुए ब्राह्मणों के आगे भूमि में कुशों पर रख दे।[मनु स्मृति 3.244]    
As soon as food intake by the Brahmns is over, the host should bring all sorts of food grains used for preparing meals for the rites and sprinkle water over them and then spread them over the Kush grass-seats just before the Brahmns. 
असंस्कृतप्रमितानां त्यागिनां कुलयोषिताम्। 
उच्छिष्टं भागधेयं स्याद्दर्भेषु विकिरैश्च यः॥
यह कुशा पर डाला अन्न दाह-संस्कार से हीन और कुल बन्धुओं को त्यागने वालों का भाग होता है।[मनु स्मृति 3.245]    
The food grains scattered over the Kush grass and the seats is the share of those who are not cremated (small children) and those who have deserted their relatives belonging to same clan. 
उच्छेषणं भूमिगतमजिह्मस्याशठस्य च। 
दासवर्गस्य तत्पित्र्ये भागधेयं प्रचक्षते॥
श्राद्ध में भूमि पर गिरा हुआ जूठा अन्न शील स्वभाव वाले दास वर्ग का भाग होता है, ऐसा ऋषियों ने कहा है।[मनु स्मृति 3.246]    
The sages have ruled that the food which falls over the ground while eating by the Brahmans is the share of the slaves (servants, workers) who are good nature-disposition.
आसपिण्डक्रियाकर्म द्विजाते: संस्थितस्य तु। 
अद्वैवं भोजयेच्छ्राद्धं पिण्डमेकं तु निर्वपेत्॥
मृत द्विजाति का सपिण्डीकरण श्राद्ध पर्यन्त अर्थात एकोदिष्ट श्राद्ध में देवस्थान में ब्राह्मण न बैठाकर केवल पितृस्थान में ब्राह्मण को भोजन कराके ही करना चाहिये और एक पिंड ही देना चाहिये।[मनु स्मृति 3.247]    
The upper castes should perform the Sapindikaran of the deceased during the period available for Shraddh-homage to the Manes and the Brahmans should be asked to sit only in the Pitr Sthan instead of Dev Sthan and only one lob should be offered.
सपिण्डीकरण :: The ceremony usually done on the 12th day of one's death; after this the dead person becomes eligible for Parvan (पार्वण oblations to ancestors) and the Grahasth becomes eligible for performing Nandi Shraddh; in Sapindikaran fresh invocation to the demigods-deities; leads up to the cleansing of the pollution. स + पिण्डी + करण Sapindikaran-formation of one or common block-unit. After death one has joined the group of the deceased.
सहपिण्डक्रियायां तु कृतायामस्य धर्मतः। 
अनयैवावृता कार्यं पिण्डनिर्वपणं सुतै:॥
सपिण्डीकरण श्राद्ध कर चुकने पर अमावस्या में जो पार्वण श्राद्ध की विधि कही गई है, उसी विधि से क्षयाहादि में पुत्रों को पितृनिमित्त पिंडदान करना चाहिये।[मनु स्मृति 3.248]    
The sons should offer the lobes of dough for the sake of their Pitre-Manes according to the method-procedure described in Parvan Shraddh on moonless night, having performed the Sapindikaran Shraddh.
श्राद्धं भुक्त्वा य उच्छिष्ठं वृषलाय प्रयच्छति। 
स मूढो नरकं याति कालसूत्रमवाक्शिरा:॥
श्राद्धान्न खाकर जो ब्राह्मण शूद्र को उच्छिष्ट देता है, वह नीचे मुड़ी ऊपर टाँग करके कालसूत्र नामक नरक में जा गिरता है।[मनु स्मृति 3.249]    
The Brahman who offers the remaining food served to him to the Shudr, falls into the hell called Kal Sutr bending his legs upside down (headlong).
श्राद्धभुग्वृषलीतल्पं तदहर्योSधिगच्छति। 
तस्याः पुरीषे तन्मासं पितरस्तस्य शेरते॥
श्राद्धान्न खाकर यदि ब्राह्मण उस दिन शूद्रा के साथ रमण करे तो उसके पितर एक मास तक इस स्त्री की विष्ठा में बास करते हैं।[मनु स्मृति 3.250]    
The deceased ancestors, Pitre-Manes of the Brahmn who enters into sexual relations with a Shudr woman on the day of the Shraddh, are subjected to  the ordure of that woman.
विष्ठा ORDURE :: मल-मूत्र, गोबर; something regarded as vile or abhorrent, excrement, excreta, dung, manure, muck, droppings, faeces, stools, cowpats, guano, night soil, sewage, dirt, filth, jakes, doings, scat.
पृष्ट्वा स्वदितमित्येवं तृप्तानाचामयेत्ततः। 
आचान्तांश्चानुजानीयादभि भो रम्यतामिति॥
भोजन से तृप्त हुये ब्राह्मणों से पूछे कि अच्छी तरह भोजन हुआ कि नहीं ? तब उनके मुखादि प्रक्षालन और आचमन कर चुकने पर उनसे विनय के साथ कहे कि अब आपकी जैसे इच्छा हो, यहाँ रहें या फिर अपने घर जायें।[मनु स्मृति 3.251]    
When the Brahmans have completed the eating of the food-offerings, the host should question them politely if they had food to their satisfaction or not? Once the Brahmans have cleaned their mouth and washed off their hands, he should ask them to stay there  (for a while) or leave as per their discretion.
स्वधाSस्त्वित्येव तं ब्रूयुर्ब्राह्मणास्तदनन्तरम्। 
स्वधाकारः परा ह्याशी: सर्वेषु पितृकर्मसु॥
इसके अनन्तर ब्राह्मण उसे स्वधाSस्तु कहें, क्योंकि पितृ कर्मों में स्वधाकार सबसे श्रेष्ठ आशीर्वाद है।[मनु स्मृति 3.252]    
The Brahmans should say Swadha to the host-highest form of benison-blessing preparing to depart.
स्वधा :: पितरों के निमित्त दिया जानेवाला अन्न या भोजन, दक्ष प्रजापति की एक कन्या,जो पितरों की पत्नी कही गई है, अव्य, एक शब्द या मंत्र जिसका उच्चारण देवताओं या पितरों को हवि देने के समय किया जाता है; self-position, self-power, inherent, power, own state, nature or condition, ease, comfort or pleasure, own place or home. Swadha is a name of Ganesh Ji used as a powerful Mantr that symbolises clarity of sound.  Here exclamation used in presenting the oblation to the deities, Manes, demigods.
ततो भुक्तवतां तेशामन्नशेषं निवेदयेत्। 
यथा ब्रूयुस्तथा कुर्यादनज्ञातस्ततो द्विजैः॥
इसके बाद जो भोज्य सामग्री बची हो वह भोजन किये हुए उन ब्राह्मणों से निवेदन करे। वे उस बचे अन्न के सम्बन्ध में जो करने को कहें, वह करे।[मनु स्मृति 3.253]    
The host should ask the Brahmns about the utility of the remaining food and use it in a manner prescribed-asked by them. 
पित्र्ये स्वदितमित्येव वाच्यं गोष्ठे तु सुश्रुतम्।
सम्पन्नमित्यभ्युदये देवे रुचितमित्यपि॥
एकोद्दिष्ट श्राध्द में स्वहितं, गोष्ठी श्राद्ध में सुश्रुतं, आभ्युदयिक श्राद्ध में सम्पन्नं और देवताप्रीत्यर्थ श्राद्ध में रुचितं इस प्रकार तृप्ति का प्रश्न करे।[मनु स्मृति 3.254]   
The host should ask the guests-Brahmns if they content with the food, its quality, taste, flavour etc. in different Shraddh-Homage to Manes :- like Ekodist, Aabhhudyik, Goshthi,  and Devta Preetyarth etc.
स्वहितं :: दूर का रिश्तेदार जो अलग से मृतक को पिंड दान करता है; a distant relation who offers the funeral rice-ball separately and not together with other relations. 
सुश्रुतं :: श्राद्ध के समय ब्राह्मण को भोजन करा चुकने पर उनसे यह पूछना की आप भली-भाँति तृप्त हो गये न ?
अपराह्णस्तथा दर्भा वास्तुसम्पादनं तिलाः। 
सृष्टिर्मृष्टिर्द्विजाश्चाग्रया: श्राद्धकर्मसु सम्पदः॥
अपराह्ण, कुश, गाय के गोबर से श्राद्ध स्थान का संशोधन, तिल, उदारतापूर्वक अन्नदान, भोज्य पदार्थ का परिष्कार, पंक्ति पावन (वेदाध्यायी) ब्राह्मण, यही सब श्राद्ध की सम्पत्ति है।[मनु स्मृति 3.255]    
The goods, acts and the humans associated with the performance of Shraddh in the afternoon are Kush grass, sesame seeds, offering of food liberally, serving of food items, company of the Brahmans who are scholars of Veds and a place properly purified-cleansed with cow's dung. They all together are called the asset of Homage to the Manes.
दर्भा: पवित्रं पूर्वाह्णो हविष्याणि  च सर्वशः। 
पवित्रं यच्च पूर्वोक्तं विज्ञेया हव्यसम्पदः॥
कुश, मन्त्र, पूर्वाह्ण, सब प्रकार के हविष्य और पूर्व श्लोक में जो पवित्र वस्तुएँ कही गईं हैं। यह सब हव्य-सम्पदा अर्थात देव-कर्म की सम्पत्ति है।[मनु स्मृति 3.256]    
Kush, rites, Mantr-sacred rhymes, morning period, all sorts of offerings and everything, pious goods, listed in the earlier Shlok are the assets of the Dev Karm, prayer of deities-demigods.
मुन्यन्नानि पयः सोमो मांसं यच्चानुपस्कृतम्। 
अक्षारलवणं चैव प्रकृत्या हविरुच्यते॥
मुनियों के खाद्य-अन्न, दूध, सोमरस, अविकृत (जो विकृत न हो; जिसका रूप बिगड़ा न हो, जिसके अंदर कोई विकृति या बुराई न आ पाई हो; (unspoiled, damaged, rotten, normal), माँस (यहाँ माँस का अर्थ मिष्ठान्न है) और सैंधा नमक; ये स्वभाव से ही हवि कहे गए हैं।[मनु स्मृति 3.257]   
The food-grains eaten by the sages, hermits, saints, milk, Extract of Som, sweets, rock salt are considered to be sacrificial foods by nature. 
Please refer to :: SOMRAS-THE EXTRACT OF SOMVALLI सोमवल्ली-लता और सोमवृक्षsantoshsuvichar.blogspot.com
विसृज्य ब्राह्मणां स्तांस्तु नियतो वाग्यतः शुचि। 
दक्षिणां दिशमकाङ्कशन् याचेतेमान्वरान्पितृन्॥
निमंत्रित ब्राह्मणों को विदा कर एकाग्रचित्त, मौन और पवित्र होकर दक्षिण दिशा की ओर देखता हुआ पितरों से ये अभिलषित वर माँगे।[मनु स्मृति 3.258]   
Having departed the invited Brahmns, one should purify himself, sit silently, concentrate in the Pitres facing South direction and request them for the following blessings-boons.
दातारो नोSभिवर्धन्तां वेदाः स्ततिरेव च। 
श्रद्धा च नो बहुदेयं च नोSस्ित्वती॥
हमारे कुल में दाता-पुरुषों की वृद्धि हो, यज्ञादिकों के अनुष्ठान से वेद की वृद्धि हो, पुत्र-पौत्रादि संतति की वृद्धि हो, वेद, ब्राह्मणों के प्रति हमारी श्रद्धा न घटे और हमारे पास दातव्य अन्न-धन भी बहुत हो।[मनु स्मृति 3.259]    
Kindly bless our hierarchy, clan, dynasty to see the growth of donators-those who perform charity, enhancement in holding of sacrifices in the holy fire i.e., Yagy, Agnihotr, Hawan; progeny-sons & grand sons should continue to increase, respect to the Veds & Brahmans should remain firm and we should have a lot of money to perform all these activities.
Money is essential to perform rites, charity, donations sacrifices in holy fire.
एवं निर्वपणं कृत्वा पिण्डां स्तांस्तदनन्तरम्। 
गां विप्रमजमग्निं वा प्राशयेदप्सु वा क्षिपेत्॥
इस प्रकार पिण्डदान करके वर माँगने के पश्चात् वे पिण्ड गौ या ब्राह्मण या बकरे को खिलावे अथवा आग या पानी में डाल दे।[मनु स्मृति 3.260]    
After the completion homage ceremony & offering of lobes of dough to the Manes; one may feed them either to the cows, Brahmans or the goats or put them in fire or immerse them in water.
These lobes become eatable if the they are backed-put over mild fire developed by burning charcoal of dung cakes. In Rajasthan they are called Baati and eaten with pulses in the form of dal-baati (दाल-बाटी). The cooked lobes may be turned into small pieces mixed with pure deshi ghee & sugar or raw sugar or jaggery and eaten as a tasty dish called Churma (चूरमा). 
पिण्डनिर्वपणं केचित्परस्तादेव कुर्वते। 
वयोभि; खादयन्त्यन्ये प्रक्षिन्त्यनलेSप्सु वा॥
कोई आचार्य ब्राह्मण भोजन के बाद पिण्डदान करते हैं, कोई पक्षियों को खिलाते हैं, कोई आग या पानी में डाल देते हैं।[मनु स्मृति 3.261]    
Some Brahmns who performed the Shraddh Karm for the host donate the lobes of dough after the completion of Shraddh-Homage ceremony, some feed them to birds while others put them in either water or fire.
पतिव्रता धर्मपत्नी पितृपूजनतत्परा। 
मध्यमं तू ततः पिण्डमद्यात्सम्यक्सुतार्थिनी॥
जो पतिव्रता धर्मपत्नी, पितरों की पूजा में तन-मन से लगी हो और पुत्र की इच्छा रखती हो, वह तीन पिण्डों के बीच के (पितामह के निमित्त दिया हुआ) पिंड को खाये तो... [मनु स्मृति 3.262]   
A woman who is loyal to her husband and is devoted to the prayer of the Manes through her body and the mind (devotion) and is desirous of having a son; eats the middle lobe-meant for the grand father will be blessed with...
आयुष्मन्तं सुतं सूते यशोमेधासमन्वितम्। 
धन्वन्तं प्रजावन्तं सात्त्विकं धार्मिकं तथा॥
उस स्त्री को दीर्घजीवी, यशस्वी, बुद्धिमान, धनवान, प्रजावान, सत्वगुणी और धार्मिक पुत्र पैदा होता है।[मनु स्मृति 3.263]    
... a son, who is long lived, famous, intelligent, rich-wealthy, loved-admired by the public-citizens, virtuous and religious.
प्रक्षाल्य हस्तावाचम्य ज्ञातिप्रायं प्रकल्पयेत्। 
ज्ञातिभ्य: सत्कृतं दत्त्वा बान्धवानपि भोजयेत्॥
इसके पश्चात हाथ धोकर-आचमन करके कुटुम्बियों को सादर भोजन करा कर बान्धवों को भी खिला दे।[मनु स्मृति 3.264]    
After this, one-host should wash his hands, sip and sprinkle a few drops of water around the place of oblations and then serve food to the members of his clan and feed his family members as well.
उच्छेषणं तु तत्तिष्ठेद्यावद्विप्रा विसर्जिताः। 
ततो गृहबलिं कुर्यादिति धर्मो व्यवस्थितः॥[मनु स्मृति 3.265]
जब तक ब्राह्मणों का विसर्जन न हो तब तक उनका जूठा न हटाये। श्राद्ध-क्रिया सम्पन्न हो जाने पर बलिवैश्वदेव होम आदि नित्यकर्म करना चाहिये।[मनु स्मृति 3.265]    
By the time Brahmans have not departed their left over food should not be removed. Once Shraddh-Homage to Manes ceremony is over, one should perform his daily routine prayers.
हविर्यच्चिररात्राय यच्चानन्त्याय कल्प्यते। 
पितृभ्यो विधिवद्दत्तं तत्प्रवक्ष्याम्यशेषतः॥
पितरों को विधिवत् दिया हुआ हव्य जो उन्हें चिरकाल या अनन्त काल के लिये तृप्ति देने वाला होता है, वह सब में कहता हूँ।[मनु स्मृति 3.266]    
I am revealing the type-kind of sacrificial food which can give satisfaction to the Manes for a long-infinite period-eternity, as per the procedures-methodology.
तिलैव्रीहियवैर्माषैद्भिर्मूलफलेन वा। 
दत्तेन मासं तृप्यन्ति विधिवत्पितरो नृणाम्॥
तिल, धान्य, यव, उर्द-मूल और फल इनमें से कोई एक वस्तु विधिवत्  देने से मनुष्यों के पितृ एक महीने तक तृप्त रहते हैं।[मनु स्मृति 3.267]    
The Manes-Pitre remain content for one month by offering sesamum grains, rice, barley, masha beans, tuberous roots and fruits according to the prescribed procedures-rules.  
द्वौ मासौ मत्स्यमांसेन त्रीन्मासान्हरिणेन तु। 
औरभ्रेणाथ चतुरः शाकुनेनाथ पञ्च वै॥
मछलियों के माँस से 2 महीने, हिरण के माँस से 3 महीने, भेड़ के माँस से 4 महीने और खाद्य-पक्षी के माँस से 5 महीने तक पितरों की तृप्ति होती है।[मनु स्मृति 3.268]   
यह केवल उन लोगों पर लागु होता है जिनके पूर्वज माँसाहारी थे। धर्म शास्त्र में माँस भक्षण निषेध है। अन्यत्र माँस शब्द का प्रयोग मिष्ठान्न के लिए हुआ है। श्राद्ध प्रणाली को राक्षस भी  मानते थे और वे ज्यादातर मान्साहारी ही थे। 
The Manes-Pitre remain content for 2 months by offering fish, three months with the meat of deer-gazelles, four with mutton and five months with the flesh of eatable meat of birds.
This is applicable to only those whose ancestors were meat eaters. Meat eating is prohibited in Dharm Shastr. Its dangerous for the humans as well. 
Scriptures allow eating meat in case of emergency for survival, when there is a danger to life in the absence of veg eatables.
Vishwa Mitr had stolen meat from the house of a Chandal, when he failed to control his appetite-hungar.
षण्मासांच्छागमांसेन पार्षतेन च सप्त वै। 
अष्टावेणस्य मांसेन रौरवेण नवैव तु॥
बकरे के माँस से 6 महीने, प्रषत्-चित्र मृग के माँस से 7 महीने, एण जातीय हिरण के माँस से 8 महीने, और रुरु नामक मृग के माँस से 9 महीने तक पितरों की तृप्ति होती है।[मनु स्मृति 3.269]    
The Manes-Pitre remain content for  6 months by offering the flesh of goat, seven months with that of spotted deer, eight with that of the black antelope and nine months with that of the (deer called) Ruru.
दशमासांस्तु तृप्यन्ति वराहमहिषामिषै:। 
शशकूर्मयोस्तु मांसेन मासानेकादशैव तु॥
जङ्गली सूअर और जङ्गली भैंसे के माँस से 10 मास तक और खरगोश तथा कछुए के माँस से 11 महीने तक तृप्त रहते हैं।[मनु स्मृति 3.270]    
The Manes remain satisfied with the meat of wild bore and wild buffalo for 10 months & with the flesh-meat of hare and tortoise for 11 months. 
सम्वत्सरं तु गव्येन  पयसा पायसेन च। 
वार्ध्रीणस्य मांसेन तृप्तिर्द्वादशवार्षिकी॥
गाय के दूध या पायस-खीर से एक वर्ष तक और वार्ध्रीणस-जल पीते समय जिस बकरे के कान भीगें और वह स्वेत वर्ण का हो, के माँस से 12 वर्ष तक पितरों की तृप्ति होती है।[मनु स्मृति 3.271]  
Cow's milk or Kheer-Pudding, satisfies the Manes for one year and flesh-meat of white goat whose ears becomes wet while drinking water satisfied them for 12 years.
कालशाकं महाशल्का: खङ्गलोहामिषं मधु। 
आनन्त्यायैव कल्प्यन्ते मुन्यन्नानि च सर्वशः॥
कालशाक, महाशल्क-मछली, गैंडे और लाल वर्ण के बकरे का माँस, शहद तथा नीवार आदि पवित्र अन्न-इन सबसे पितरों को अनन्त काल तक तृप्ति होती है।[मनु स्मृति 3.272]  
Leaves called Kalshak, Mahashalk-fish, meat of Rhino or red coloured goat, honey and Neewar satisfies the Manes-Pitre for infinite period of time.
नीवार :: जलीय भूमि में आप से आप होनेवाला धान, the raw rice-paddy which grows by itself in wet lands.
यत्किञ्चिन्मधुना मिश्रं प्रदद्यात्तु त्रयोदशीम्। 
तदप्यक्षयमेव स्याद्वर्षासु च मधासु च॥
वर्षा ऋतु की मघा नक्षत्र युक्त त्रयोदशी तिथि में मधु से मिला हुआ, जो कुछ भी पितरों को दिया जाता है, वह भी अक्षय होता है।[मनु स्मृति 3.273]  
Anything-sacrificial food mixed with honey offered to the manes-Pitre during the rainy season under the asterism-impact of Magh Nakshtr on the 13th, becomes imperishable.
ASTERISM :: a prominent pattern or group of stars that is smaller than a constellation.
अपि न: स कुले जायाद्यो नो दद्यात् त्रयोदशीम्। 
पायसं मधुसर्पिभ्यां प्राक्छाये कुञ्जरस्य च॥
पितर यह आशा करते हैं कि हमारे कुल में कोई ऐसा जन्म ले जो हम लोगों को त्रयोदशी तिथि में या ऐसे समय में जब हाथी की छाया पूर्व दिशा में हो, मधु और घृत मिला हुआ पायस (गौ दुग्ध की खीर) प्रदान करे।[मनु स्मृति 3.274]  
The Manes expect the birth of some one in their clan-hierarchy who would offer them pudding made from cow's milk mixed with honey and ghee (clarified butter) on the 13th of the lunar month as per Hindu calendar or when the shadow of an elephant moves to the east.
यद्यद्ददाति विधिवत्समयक् श्रद्धासमन्वितै:।
तत्तत्पितृणां भवति परत्रानन्तमक्षयम्॥
श्रद्धा सहित विधिपूर्वक सम्यक् प्रकार से जो कुछ पितरों को दिया जाता है, वह परलोक में उनकी तृप्ति के लिये सदा अक्षय होता है।[मनु स्मृति 3.275]  
Whatever is being offered to the Manes with reverence, in sufficient quantity, makes them content in the eternal abodes, becoming perpetual and imperishable gratification.
सम्यक् :: पूरा, सब, समस्त,  उचित, उपयुक्त, ठीक, सही, मनोनुकूल, पूरी तरह से, सब प्रकार से, अच्छी तरह। भली-भाँति; right, appropriate, sufficient, enough.
कृष्णपक्षे दशम्यादौ वर्जयित्वा चतुर्दशीम्। 
श्राद्धे प्रशस्तास्तिथयो यथैता न तथेतरा:
कृष्ण पक्ष की दशमी से लेकर अमावस्या पर्यन्त तिथियों में चतुर्दशी को छोड़ शेष तिथियाँ श्राद्ध के लिये जैसे श्रेष्ठ हैं, वैसी अन्य तिथियाँ नहीं हैं।[मनु स्मृति 3.276]  
The dates for performing Shraddh in Krashn Paksh-dark phase, between 10th to Moonless night except the 14th day are excellent.
यक्षु कुर्वन्दिनर्क्षेषु सर्वान्कामान्समश्नुते। 
आयुक्षु तु पितृन्सर्वान्प्रजां प्रान्पोति पुष्कलाम्॥
युग्म (सम) तिथि और नक्षत्र में श्राद्ध करने से सम्पूर्ण कामनायें सिद्ध होती हैं। विषम तिथि और नक्षत्र में श्राद्ध करने से धन-विद्या से परिपूर्ण सन्तानें प्राप्त होती हैं।[मनु स्मृति 3.277]  
All desires are fulfilled by performing Shraddh on even dates and the Nakshtr. While performance of Shraddh in odd dates grants progeny with wealth and education. 
तथा चैवापर: पक्ष: पूर्वपक्षा द्विशिष्यते। 
तथा श्राद्धस्य पूर्वाह्णादपराह्णो विशिष्यते
श्राद्ध में जैसे पूर्व (शुक्ल) पक्ष से अपर (कृष्ण) पक्ष विशेष है, वैसे ही पूर्वाह्ण विशेष है।[मनु स्मृति 3.278]  
The manner in which the dark phase is superior to bright phase for performing Shraddh, similarly the later part-phase too is superior.
प्राचीनावीतिना सम्यगपसव्यमतन्द्रिणा। 
पित्र्यमानिधनात्कार्यं विधिवद्दर्भपाणिना॥
दाहिने कन्धे पर जनेऊ रख (अपसव्य :- दाहिने-उलटे कन्धे पर रखने  के बाद) आलस्य रहित हो हाथ में कुशा लेकर शास्त्रोक्त विधि से जब तक जिये पितृकर्म करे।[मनु स्मृति 3.279]   
One should keep performing this Shraddh, ritual-rite till he survives, without delay, laziness-sluggishness by keeping his sacred thread over the right shoulder, holding Kush grass in his hands.
रात्रौ श्राद्धं न कुर्वीत राक्षसी कीर्तिता हि सा। 
संध्ययोरुभयोश्चैव सूर्ये चैवाचिरोदिते॥
रात में श्राद्ध न करे, क्योंकि रात राक्षसी कही गई है। दोनों समय (प्रातः और सांयकाल) में श्राद्ध न करे और सूर्योदय समकाल में भी श्राद्ध न करे।[मनु स्मृति 3.280]  
Shraddh should not be performed during the night since its dominated by the demons-Rakshas. It should not be done during the morning or evening in addition to the time of Sun rise or when the Sun has just risen.
अनेन विधिना श्राद्धं त्रिरब्दस्येह निर्वपेत्। 
हेमन्तग्रीष्मवर्षासु पाञ्चयज्ञीकमन्वहम्॥
इस प्रकार वर्ष में तीन बार अर्थात् हेमन्त, ग्रीष्म और वर्षा में श्राद्ध अवश्य करना चाहिये और पञ्चमहायज्ञान्तर्गत श्राद्ध तो नित्य ही करे।[मनु स्मृति 3.281]   
In this manner one has to perform the Shraddh ceremony, funeral sacrifices, rites, thrice in a year during Hemant-winters, summers and the rainy season and perform the Panch Maha Yagy everyday.
न पैतृयज्ञियो होमो लौकिकेSग्नौ विधीयते। 
न दर्शेन विना श्राद्धमाहिताग्नोर्द्वजन्मनः॥
पितृ यज्ञीय होम लौकिक अग्नि में नहीं करना चाहिये। आदृताग्नि द्विज को अमावश्या तिथि के अतिरिक्त अन्य तिथि में श्राद्ध नहीं करना चाहिये।[मनु स्मृति 3.282]   
The Pitr Yagy should not be performed in normal-worldly fire. The Brahman should not perform Shraddh on the dates falling other than the Amavashya-no Moon nights phase. 
यदेव तर्पयत्यद्भि:पितृन्स्नात्वा द्विजोत्तमः। 
तेनैव कृत्स्नमाप्रोती पितृयज्ञक्रियाफलम्॥
ब्राह्मण स्नान करके जो जल से पितृ तर्पण करता है, उसी से नित्य श्राद्ध क्रिया का फल पाता है।[मनु स्मृति 3.283]    
The Brahman is rewarded for the offering of water to the Manes, after taking a bath regularly, like performing Shraddh everyday.
वसून्वदन्ति तु पितृन् रुद्रांश्चैव पितामहान्। 
प्रपितामहांस्तथादित्यान्  श्रुतिरेषा सनातनी॥
ऋषियों ने पिता को वसु, पितामह को रुद्र और प्रपितामह को आदित्य कहा है। इसलिए मनुष्य पितरों का ध्यान देवता के रूप में करे। यह सनातन श्रुति है।[मनु स्मृति 3.284]   
The Rishis have recognised the father as Vasu, grandfather as Rudr and the great grandfather as Adity. Its therefore, suggested that one should identify them as demigods. This is the eternal message. 
विघसाशी भवेन्नित्यं वाSमृतभोजनः। 
विघसो भुक्तशेषं तु तथाSमृतम्॥
नित्य विघसाशी हो या नित्य अमृत भोजी हो अतिथि ब्राह्मणों को खिलाकर जो अन्न बचे उसे विघस कहते हैं और यज्ञावशिष्ट अन्न को अमृत कहते हैं। गृहस्थी को चाहिए कि वह प्रतिदिन ‘विघस’ भोजन को खाने वाला होवे अथवा ‘अमृत’ भोजन को खाने वाला होवे।[मनु स्मृति 3.285]   
विघस :: अतिथि, मित्रों आदि सभी व्यक्तियों के खा लेने पर बचा भोजन को ‘विघस’ कहा जाता है; The remainder food after serving the guests, friends and all invites is called Vighas. 
अमृत :: यज्ञ में आहुति देने के बाद बचा भोजन ‘अमृत’ कहलाता है; The left over food after offerings in the holy fire is called Amrat, ambrosia, nectar, elixir.
The house hold should make it a habit of consuming food after serving to all; the left over food after the performance of sacrifices in holy fire. The remainder food after serving the guests, friends and all invites is called Vighas, while that left over after offerings in the holy fire is called Amrat-ambrosia-nectar-elixir.
एतोद्वोSभिहितं सर्वं विधानं पाञ्चयज्ञिकम्। 
द्विजातिमुख्यवृत्तीनां विधानं श्रूयतामिति॥
यह पञ्चयज्ञ-सम्बन्धी सारा विधान आप लोगों से कहा, अब ब्राह्मणों की वृत्ति का विधान सुनिये।[मनु स्मृति 3.286]   
Thus all the ordinances, procedures-methodology pertaining to the five daily great sacrifices have been described and now please listen to rules-laws governing the tendencies-way of earning by the Brahmans. 
श्राद्ध के नियम :: दैनिक पंच यज्ञों में पितृ यज्ञ को ख़ास बताया गया है। इसमें तर्पण और समय-समय पर पिण्ड दान भी सम्मिलित है। पूरे पितृ पक्ष भर तर्पण आदि करना चाहिए। इस दौरान कोई अन्य शुभ कार्य या नया कार्य अथवा पूजा-पाठ अनुष्ठान सम्बन्धी नया काम नहीं किया जाता। साथ ही श्राद्ध नियमों का विशेष पालन करना चाहिए। परन्तु नित्य कर्म तथा देवताओं की नित्य पूजा जो पहले से होती आ रही है, उसको बन्द नहीं करना चाहिए।
अनुष्ठान :: अपने दिवंगत बुजुर्गों को हम दो प्रकार से याद करते हैं :-
स्थूल शरीर के रूप में और भावनात्मक रूप से। स्थूल शरीर तो मरने के बाद अग्नि को या जलप्रवाह को भेंट कर देते हैं, इसलिए श्राद्ध करते समय हम पितरों की स्मृति कर उनके भावनात्मक शरीर की पूजा करते हैं ताकि वे तृप्त हों और हमें सपरिवार अपना स्नेहपूर्ण आर्शीवाद दें।
श्राद्ध सूक्ष्म शरीरों के लिए वही काम करते हैं, जो जन्म के पूर्व और जन्म के समय के संस्कार स्थूल शरीर के लिए करते हैं। यहाँ से दूसरे लोक में जाने और दूसरा शरीर प्राप्त करने में जीवात्मा की सहायता करके मनुष्य अपना कर्तव्य पूरा कर देता है। इसलिए इस क्रिया को श्राद्ध कहते हैं, जो श्रृद्धा से बना है। श्राद्ध की क्रियाएँ दो भागों में बँटी हुई हैं। पहला प्रेत क्रिया और दूसरा पितृ क्रिया। ऐसा माना जाता है कि मरा हुआ व्यक्ति एक वर्ष में पितृ लोक पहुँचता है। अत: सपिंडीकरण का समय एक वर्ष के अन्त में होना चाहिए। परन्तु इतने दिनों तक अब लोग प्रतिक्षा नहीं कर पाते हैं। इस स्थिति में सपिंडीकरण की अवधि छह महीने से अब 12 दिन की हो गई है। इसके लिए गरुड़ पुराण का निम्न श्लोक आधार है :-
अनित्यात्कलिधर्माणांपुंसांचैवायुष: क्षयात्।
अस्थिरत्वाच्छरीरस्य द्वादशाहे प्रशस्यते
कलियुग में धर्म के अनित्य होने के कारण पुरुषों की आयु क्षीणता तथा शरीर के क्षण भंगुर होने से बारहवें दिन सपिंडी की जा सकती है। वर्णानुसार यह दिन आगे भी बढ़ जाता है। बारहवाँ दिन उनके लिए है, जिनकी शुद्धि दस दिन में हो जाती है।
श्राद्ध सूक्ष्म शरीरों के लिए वही काम करते हैं, जो कि जन्म के पूर्व और जन्म के समय के संस्कार स्थूल शरीर के लिए करते हैं। इसलिए शास्त्र पूर्व जन्म के आधार पर ही कर्म काण्ड में श्राद्धादि कर्म का विधान निर्मित करते हैं। 
जिस प्रकार सभी संस्कार प्रकृति के कार्य को सहायता पहुँचाने के लिए बने हैं, उसी प्रकार प्रेत क्रिया का भी उद्देश्य यही है कि वह प्राणमय कोश की, अन्नमय कोश के यथावत रहने के समय तक उस पर अवलंबित रहने की प्रकृति को नष्ट कर दे और जब तक प्रकृति अपनी साधारण प्रक्रिया में पहुँचाना चाहे, उस मनुष्य को भूलोक में इस प्रकार धारण किए रहे। इस विषय में सबसे पहला आवश्यक कार्य यह है कि अन्नमय कोश नष्ट कर दिया जाए और वह दाह करने से हो जाता है।
छान्दोग्योपनिषद में उल्लेख है :–
ते प्रेतं दिष्टमितो अग्नय ऐ हरन्ति यत एवेतो यत: संभूतो भवति। 
जैसा निर्दिष्ट है, वे मृतात्मा को अग्नि के पास ले जाते हैं, जहाँ से वह आया था और जहाँ से वह उत्पन्न हुआ था। शव में आग लगाने से पूर्व दाहकर्ता चिता की परिक्रमा करता है और उस पर इस मंत्र के साथ जल छिड़कता है :–
अयेत वीत वि च सर्पत अत:।
जाओ, अपसरण करो, विदा हो जाओ, जब तक दाह होता रहता है, तब तक कहा जाता है। बाद में बची हुई अस्थियों-हड्डियों का संचय करके प्रवाह कर दिया जाता है। इसके बाद मनोमय कोष के विश्लेषण करने का काम आता है, जिससे प्रेत बदल कर पितृ हो जाता है। सभी संस्कारों विवाह को छोड़कर श्राद्ध ही ऐसा धार्मिक कृत्य है, जिसे लोग पर्याप्त धार्मिक उत्साह से करते हैं। विवाह में बहुत से लोग कुछ विधियों को छोड़ भी देते हैं, परन्तु श्राद्ध कर्म में नियमों की अनदेखी नहीं की जाती है। क्योंकि श्राद्ध का मुख्य उद्देश्य परलोक की यात्रा की सुविधा करना है।
श्राद्ध में ब्राह्मण भोजन :: श्राद्ध के दौरान पंडितों को खीर-पूरी खिलाने का महत्त्व होता है। माना जाता है कि इससे स्वर्गीय पूर्वजों की आत्मा तृप्त होती है। पुरुष के श्राद्ध में ब्राह्मण को तथा स्त्री के श्राद्ध में ब्राह्मण महिला को भोजन कराया जाता है। लोग अपनी श्रद्धा अनुसार खीर-पूरी तथा सब्जियाँ बनाकर उन्हें भोजन कराते हैं तथा बाद में वस्त्र व दक्षिणा देकर व पान खिलाकर विदा करते हैं। सुबह स्नान आदि से निवृत्त होकर अपने पूर्वज का चित्र रखकर पंडित नियम पूर्वक पूजा व संकल्प कराते हैं। इस दिन बिना प्याज व लहसुन का भोजन तैयार किया जाता है। बाद में पंडित व पंडिताइन के श्रद्धा पूर्वक पैर छूकर उन्हें भोजन कराते हैं। भोजन में खीर-पूरी व पनीर, सीताफल, अदरक व मूली का लच्छा तैयार किया जाता है। उड़द की दाल के बड़े बनाकर दही में डाले जाते हैं। पंडित सर्वप्रथम गाय का नैवेद्य निकलवाते हैं। इसके अलावा कौओं व चिड़िया, कुत्ते के लिए भी ग्रास निकालते हैं। पितृ अमावस्या को आख़िरी श्राद्ध करके पितृ विसर्जन किया जाता है तथा पितरों को विदा किया जाता है। कई जगहों पर अमावस्या के दिन पंडित बहुत कम मिलते हैं, क्योंकि एक धारणा यह है कि श्राद्ध का भोजन या तो कुल पंडित या किसी ख़ास ब्राह्मण को कराया जाता है। कई जगह व्यस्त होने के चलते भी पंडितों की कमी रहती है। मान्यता है कि ब्राह्मणों को खीर-पूरी खिलाने से पितृ तृप्त होते हैं। यही वजह है कि इस दिन खीर-पूरी ही बनाई जाती है।
ऐसी मान्यता है कि कौओं को खाना खिलाने से पितरों को खाना मिलता है। श्राद्ध के दौरान पितरों को खाना खिलाने के तौर पर सबसे पहले कौओं को खाना खिलाया जाता है। जो व्यक्ति श्राद्ध कर्म कर रहा है वह एक थाली में सारा खाना परोसकर अपने घर की छत पर जाता है और ज़ोर ज़ोर से 'कोबस कोबस' कहते हुए कौओं को आवाज़ देता है। 
श्राद्ध विधि :: श्राद्ध दिवस से पूर्व दिवस को बुद्धिमान पुरुष श्रोत्रिय आदि से विहित ब्राह्मणों को पितृ-श्राद्ध तथा वैश्व-देव-श्राद्ध के लिए निमंत्रित करें। पितृ-श्राद्ध के लिए सामर्थ्यानुसार अयुग्म तथा वैश्व-देव-श्राद्ध के लिए युग्म ब्राह्मणों को निमंत्रित करना चाहिए। निमंत्रित तथा निमंत्रक क्रोध, स्त्रीगमन तथा परिश्रम आदि से दूर रहे।
पितर या पितृ गण :: पितृ गण मनुष्य के पूर्वज  हैं, जिनका उसके ऊपर ऋण है। पितृगणों ने कोई ना कोई उपकार मनुष्य के जीवन के लिए अवश्य किया है। 
मनुष्य लोक से ऊपर पितृ लोक है, पितृ लोक के ऊपर सूर्य लोक है एवं इस से भी ऊपर स्वर्ग लोक है। आत्मा जब अपने शरीर को त्याग कर सबसे पहले ऊपर उठती है तो वह पितृ लोक में जाती है, वहाँ पूर्वज  मिलते हैं। अगर उस आत्मा के अच्छे पुण्य हैं तो ये पूर्वज भी उसको प्रणाम कर अपने को धन्य मानते हैं कि इस आत्मा ने हमारे कुल में जन्म लेकर हमें धन्य किया।  
इसके आगे आत्मा अपने पुण्य के आधार  पर सूर्य लोक की तरफ बढती है। वहाँ से आगे,  यदि और अधिक पुण्य हैं, तो आत्मा सूर्य लोक को बेध कर स्वर्ग लोक की तरफ चली जाती है, लेकिन करोड़ों में एक आध आत्मा ही ऐसी होती है, जो परमात्मा में समाहित  होती है, जिसे दोबारा जन्म नहीं लेना पड़ता।   
मनुष्य लोक एवं पितृ लोक में बहुत सारी आत्माएं पुनः अपनी इच्छा वश, मोह वश अपने कुल में जन्म लेती हैं।
संकरो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च। 
पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः॥
वर्णसंकर कुलघातियों को और कुल को नरक में ले जाने वाला होता है। लुप्त हुई पिण्ड और जल की क्रिया वाले अर्थात श्राद्ध और तर्पण से वंचित, इनके पितर लोग भी अधोगति को प्राप्त होते हैं।[श्रीमद्भगवद्गीता 1.42]
The mix breed (One whose caste can not be ascertained, defined, fixed) leads the Pitre-Manes, ancestors to undefined hells, by degrading-isolating them. The PITRE-MANES (root, basic, original ancestors), from whom the clan-caste chain begun, are left without offerings-prayers for their clemency-relief-worship, leading to their downfall to difficult hells. 
आज के युग में नौजवान लड़कों और लड़कियों को यह समझाना बहुत मुश्किल है, क्योंकि यह कलयुग है और फिर उनमें ऐसों की संख्या बहुत है, जो स्वयं इस तरह से पैदा हुए होंगे। वर्णसंकर (अवैध, हरामी-हरामजादा) में धार्मिक बुद्धि का नितान्त अभाव होता है। मर्यादा-कुलधर्म-धर्म वे ना तो जानते हैं और ना ही समझना चाहते हैं। उन्हें ऐसा कुलघाती कहा जा सकता है, जो पितरों को पिण्ड दान-तर्पण श्राद्ध और पानी तक अर्पित नहीं करेगा और वे अधोगति को प्राप्त होंगे। पितृ गण दो प्रकार के हैं: आजान और मर्त्य। आजान पितृलोक में  हैं, परन्तु मृत्युलोक से मर कर गए पितर-पितृ मर्त्य हैं; जिनका पतन होता है। कुटुंब-सन्तान से सम्बन्ध रहने के कारण, उनको श्राद्ध-तर्पण-पिण्ड दान-पानी की आशा होती है।
Its extremely difficult to explain-elaborate, to the young generation, the importance of rituals like :- holding of Shanti path (clemency rituals), prayers for the peace of the deceased, Shraddh, terahvan, barsi-annual ceremonies-offerings to Brahmns-poor-needy, after the death of the parents-grand parents, since they are born in Kali Yug & they may not be aware of the family tradition. Still this postulate is meant for those who are born out of illicit relations, between the parents from two diversified castes-religions-regions-countries in the name of love affair-marriage or those who produce children by living together, without marriage and illicit-forced relations.
The cross breed is (bastard, scoundrel, illegitimate) without piousness, virtues, religiosity, family norms, traditions. They are generally termed as those, who lead their family tree to termination-fatal end. They will not hold prayers, make offerings, visit holy places for the peace-liberty-Salvation of their ancestors, fore fathers, Manes, unaware of the facts-traditions. Their ancestors-Pitre are sure to lead to hells.
Pitre are of two categories: First one are present in the divine abodes and next are those who deceased over the earth. The second category will be the victim of the absence of these proceedings by their off springs. Whether one is born normally or through illegitimate relations; must hold prayers for the liberation-peace of the deceased soul, of their departed parents-grand parents.
The fashion of live in relation is on the rise. The child born out of this relation is generally socially unacceptable and lacks virtues, morals, ethics. He is mentally imbalanced. A new group is appearing in the society by the name of cosmopolitan, as a consequence of this.
Bastard, scoundrel, illegitimate born as an outcome of rape, illicit relations is always dangerous for those who are intentionally involved in it; since, they will have to remain in hells for a very long period of time as a consequence of it. Majority of Muslims all over the world born out of the illicit relations will led to abolition of Islam sooner or later. The impact is seen clearly in their large scale migration to Europe and else where. But the countries who are giving them shelter and allowing to build mosques and worship Islam are committing a grate blunder for which they will have to repent sooner or later.
दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसंकरकारकैः। 
उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः॥
इन वर्णसंकर कारक-पैदा करने वाले दोषों से कुलघातियों के सनातन-सदा से चलते आये, कुल-धर्म और जाति-धर्म नष्ट हो जाते हैं।[श्रीमद्भगवद्गीता 1.43]
The defects which create these cross breeds, distort the ancient Varnashram Dharm of clans-descendants-segregating the populations leading to the diminishing-vanishing-loss of varied casts-groups traits, practices.
वर्ण और जाति प्रथा मानव जाति की उत्पत्ति से ही जारी है। कश्यप ऋषि से मैथुनी सृष्टि: समस्त प्राणियों और मनुष्यों का प्रादुर्भाव हुआ। इसका वैज्ञानिक दृष्टिकोण और आधार है। मनुष्यों में 23 जोड़े गुणसूत्र-क्रोमोसोम्स पाये जाते हैं, जिनको परिवर्तित किया जा सकता है, जिससे नई जातियाँ-जीव उत्पन्न हो सकते हैं। इसके प्रमाण उपलब्ध हैं। मनुष्यों के व्यवहार को क्रोमोसोम्स पर पाये जाने वाले जीन्स के आधार पर तय किया जा सकता है। 
समूह का व्यवहार और उसमें रहने वालों का बहुत गहरा सम्बन्ध है। जाति-वर्ण, काम-धन्धे का मूलाधार है। किसी भी जाति और परिवार में पैदा हुए बच्चे अपने पैतृक कार्य को अधिक आसानी से सीख और अधिक कुशलता से कर सकते हैं। 
The caste system is ancient-since the beginning of evolution on earth by Kashyap Rishi through intercourse. It is perfect and has a scientific basis. Number of chromosomes and the genes present over them, determine the characteristics of a species. Humans have 23 pairs of chromosomes, which can be altered to create new species-living beings. It can be proved-demonstrated that human behaviour too has its seeds in the genetic structure over the chromosomes.
Traits of various individuals can be analysed by studying the group behavior. Behavior of different people belonging to various castes and sub castes, too show remarkable similarities. There are practical advantages of this system as the progeny of one caste learns the parental skills much quicker-with remarkable ease.
A person born out of illicit relations, inter caste marriages do not follow the cultural values, ethics. He is not recognised as a member of either of the two sides-communities of marriage partners. Scientifically, there is a mutation in genes found over the chromosomes. New features are seen in him physically. There may be sizeable changes in intelligence level as well. Normally, such progeny do not command any respect in the society.Family norms, etiquette are lost completely. Indians are quick in following western style of living together without marriage. Majority of people in Australia do not accept wed lock. The results are obvious.
Wife of king of Mathura Ugr Sen, went to her father in spite of refusal to allow her to go. She was seen on her way, by a Yaksh. He established sexual relations with her, as a result of which Kans was born & the whole world knows his story. He was later killed by Bhagwan Shri Krashn. 
श्राद्ध करने को उपयुक्त :: साधारणत: पुत्र ही अपने पूर्वजों का श्राद्ध करते हैं। किन्तु शास्त्रानुसार ऐसा हर व्यक्ति जिसने मृतक की सम्पत्ति विरासत में पायी है और उससे प्रेम और आदर भाव रखता है, उस व्यक्ति का स्नेहवश श्राद्ध कर सकता है। विद्या की विरासत से भी लाभ पाने वाला छात्र भी अपने दिवंगत गुरु का श्राद्ध कर सकता है। पुत्र की अनुपस्थिति में पौत्र या प्रपौत्र भी श्राद्ध-कर्म कर सकता है। नि:सन्तान पत्नी को पति द्वारा, पिता द्वारा पुत्र को और बड़े भाई द्वारा छोटे भाई को पिण्ड नहीं दिया जा सकता। किन्तु कम उम्र का ऐसा बच्चा, जिसका उपनयन संस्कार न हुआ हो, पिता को जल देकर नवश्राद्ध कर सकता। शेष कार्य उसकी ओर से कुल पुरोहित करता है।
श्राद्ध के लिए ::
उचित द्रव्य हैं :- तिल, माष (उड़द), चावल, जौ, जल, मूल, (जड़युक्त सब्जी) और फल।
तीन चीज़ें शुद्धिकारक हैं :- पुत्री का पुत्र, तिल और नेपाली कम्बल या कुश।
तीन बातें प्रशंसनीय हैं :- सफ़ाई, क्रोधहीनता और चैन (त्वरा (शीघ्रता)) का न होना।
महत्त्वपूर्ण बातें :- अपरान्ह का समय, कुशा, श्राद्धस्थली की स्वच्छ्ता, उदारता से भोजन आदि की व्यवस्था और अच्छे ब्राह्मण की उपस्थिति।
अनुचित बातें :- कुछ अन्न और खाद्य पदार्थ जो श्राद्ध में नहीं प्रयुक्त होते; मसूर, राजमा, कोदों, चना, कपित्थ, अलसी, तीसी, सन, बासी भोजन और समुद्र जल से बना नमक। भैंस, हिरणी, उँटनी, भेड़ और एक खुर वाले पशु का दूध भी वर्जित है पर भैंस का घी वर्जित नहीं है। श्राद्ध में दूध, दही और घी पितरों के लिए विशेष तुष्टिकारक माने जाते हैं। श्राद्ध किसी दूसरे के घर में, दूसरे की भूमि में कभी नहीं किया जाता है। जिस भूमि पर किसी का स्वामित्व न हो, सार्वजनिक हो, ऐसी भूमि पर श्राद्ध किया जा सकता है।
श्राद्ध में कुश और तिल का महत्त्व :: दर्भ या कुश को जल और वनस्पतियों का सार माना जाता है। यह भी मान्यता है कि कुश और तिल दोनों विष्णु के शरीर से निकले हैं। गरुड़ पुराण के अनुसार, तीनों देवता ब्रह्मा, विष्णु, महेश कुश में क्रमश: जड़, मध्य और अग्रभाग में रहते हैं। कुश का अग्रभाग देवताओं का, मध्य भाग मनुष्यों का और जड़ पितरों का माना जाता है। तिल पितरों को प्रिय हैं और दुष्टात्माओं को दूर भगाने वाले माने जाते हैं। मान्यता है कि बिना तिल बिखेरे श्राद्ध किया जाये तो दुष्टात्मायें हवि को ग्रहण कर लेती हैं।
कम ख़र्च में श्राद्ध :: विष्णु पुराण के अनुसार दरिद्र व्यक्ति केवल मोटा अन्न, जंगली साग-पात-फल और न्यूनतम दक्षिणा, वह भी ना हो तो सात या आठ तिल अंजलि में जल के साथ लेकर ब्राह्मण को देना चाहिए या किसी गाय को दिन भर घास खिला देनी चाहिए अन्यथा हाथ उठाकर दिक्पालों और सूर्य से याचना करनी चाहिए कि हे! प्रभु मैंने हाथ वायु में फैला दिये हैं, मेरे पितर मेरी भक्ति से संतुष्ट हों।
पितृ पक्ष :: भाद्रपद पूर्णिमा-आश्विन कृष्ण प्रतिपदा से लेकर अमावस्या सोलह दिन पितृपक्ष कहलाते हैं। इन पंद्रह दिनों में लोग अपने पितरों-पूर्वजों को जल देते हैं तथा उनकी मृत्यु तिथि पर पार्वण श्राद्ध करते हैं। पिता-माता आदि पारिवारिक मनुष्यों की मृत्यु के पश्चात्‌ उनकी तृप्ति के लिए श्रद्धा पूर्वक किए जाने वाले कर्म को पितृ श्राद्ध कहते हैं।
अनुष्ठान श्राद्ध-कर्म में पके हुए चावल, दूध और तिल को मिश्रित करके पिण्ड-शरीर रचना करते हैं। यह एक पारंपरिक विश्वास है कि हर पीढ़ी के भीतर मातृकुल तथा पितृकुल दोनों में पहले की पीढ़ियों के समन्वित गुणसूत्र उपस्थित होते हैं। यह प्रतीकात्मक अनुष्ठान जिन जिन लोगों के गुणसूत्र (chromosomes-each chromosome has millions of genes, carriers of heredity characters) श्राद्ध करने वाले की अपनी देह में हैं, उनकी तृप्ति के लिए होता है।
आश्विन कृष्ण प्रतिपदा से लेकर अमावस्या तक ब्रह्माण्ड की ऊर्जा तथा उस उर्जा के साथ पितृप्राण पृथ्वी पर व्याप्त रहता है। मृत्यु के बाद दशगात्र और षोडशी-सपिण्डन तक मृत व्यक्ति की प्रेत संज्ञा रहती है। वह सूक्ष्म शरीर जो आत्मा भौतिक शरीर छोड़ने पर धारण करती है, प्रेत कहलाता है। प्रिय के अतिरेक की अवस्था प्रेत है, क्योंकि आत्मा जो सूक्ष्म शरीर धारण करती है, तब भी उसके अन्दर मोह, माया भूख और प्यास का अतिरेक होता है। सपिण्डन के बाद वह प्रेत, पित्तरों में सम्मिलित हो जाता है।
पितृपक्ष भर में जो तर्पण किया जाता है, उससे वह पितृ प्राण स्वयं आप्यापित होता है। पुत्र या उसके नाम से उसका परिवार जो यव (जौ) तथा चावल का पिण्ड देता है, उसमें से अंश लेकर वह अम्भप्राण का ऋण चुका देता है। ठीक आश्विन कृष्ण प्रतिपदा से वह चक्र उर्ध्वमुख होने लगता है। 15 दिन अपना-अपना भाग लेकर शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से पितर उसी ब्रह्मांडीय उर्जा के साथ वापस चले जाते हैं। इसलिए इसको पितृपक्ष कहते हैं और इसी पक्ष में श्राद्ध करने से पित्तरों को प्राप्त होता है।
भाद्रपद में ही श्राद्ध :: हमारा एक माह चंद्रमा का एक अहोरात्र होता है। इसीलिए ऊर्ध्व भाग पर रह रहे पितरों के लिए कृष्ण पक्ष उत्तम होता है। कृष्ण पक्ष की अष्टमी को उनके दिनों का उदय होता है। अमावस्या उनका मध्याह्न है तथा शुक्ल पक्ष की अष्टमी अंतिम दिन होता है। धार्मिक मान्यता है कि अमावस्या को किया गया श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान उन्हें संतुष्टि व ऊर्जा प्रदान करते हैं। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार पृथ्वी लोक में देवता उत्तर गोल में विचरण करते हैं और दक्षिण गोल भाद्रपद मास की पूर्णिमा को चंद्रलोक के साथ-साथ पृथ्वी के नज़दीक से गुजरता है। इस मास की प्रतीक्षा हमारे पूर्वज पूरे वर्ष भर करते हैं। वे चंद्रलोक के माध्यम से दक्षिण दिशा में अपनी मृत्यु तिथि पर अपने घर के दरवाज़े पर पहुँच जाते है और वहाँ अपना सम्मान पाकर प्रसन्नतापूर्वक अपनी नई पीढ़ी को आर्शीवाद देकर चले जाते हैं। ऐसा वर्णन 'श्राद्ध मीमांसा' में मिलता है। इस तरह पितृ ॠण से मुक्त होने के लिए श्राद्ध काल में पितरों का तर्पण और पूजन किया जाता है। भारतीय संस्कृति एवं समाज में अपने पूर्वजों एवं दिवंगत माता-पिता के स्मरण श्राद्ध पक्ष में करके उनके प्रति असीम श्रद्धा के साथ तर्पण, पिंडदान, यक्ष तथा ब्राह्मणों के लिए भोजन का प्रावधान किया गया है। पितरों के लिए किए जाने वाले श्राद्ध दो तिथियों पर किए जाते हैं। प्रथम मृत्यु या क्षय तिथि पर और दूसरा पितृ पक्ष में। जिस मास और तिथि को पितृ की मृत्यु हुई है अथवा जिस तिथि को उनका दाह संस्कार हुआ है, वर्ष में उम्र उस तिथि को एकोदिष्ट श्राद्ध किया जाता है।
एकोदिष्ट श्राद्ध में केवल एक पितर की संतुष्टि के लिए श्राद्ध किया जाता है। इसमें एक पिण्ड का दान और एक ब्राह्मण को भोजन कराया जाता है। यदि किसी को अपने पूर्वजों की मृत्यु की तिथियाँ याद नहीं है, तो वह अमावस्या के दिन ज्ञात-अज्ञात पूर्वजों का विधि-विधान से पिंडदान तर्पण, श्राद्ध कर सकता है। इस दिन किया गया तर्पण करके 15 दिन के बराबर का पुण्य फल मिलता है और घर परिवार, व्यवसाय तथा आजीविका में विशेष उन्नति होती है। यदि परिवार के किसी सदस्य की अकाल मृत्यु हुई है, तो पितृदोष के निवारण के लिए शास्त्रीय विधि के अनुसार उसकी आत्मशांति के लिए किसी पवित्र तीर्थ स्थान पर श्राद्ध करना चाहिए। सामर्थ्यनुसार किसी सुयोग्य कर्मनिष्ठ ब्राह्मण से श्रीमद्‌ भागवत पुराण की कथा अपने पितरों की आत्मशांति के लिए करवा सकते हैं। इससे विशेष पुण्य फल की प्राप्ति होती है। इसके फलस्वरूप परिवार में अशांति, वंश वृद्धि में रुकावट, आकस्मिक बीमारी, धन से बरकत न होना सारी सुख सुविधाओं के होते भी मन असंतुष्ट रहना आदि परेशानियों से मुक्ति मिल सकती है।
मातामह श्राद्ध :: मातामह श्राद्ध अपने आप में एक ऐसा श्राद्ध है जो एक पुत्री द्वारा अपने पिता को व एक नाती द्वारा अपने नाना को तर्पण किया जाता है। इस श्राद्ध को सुख शांति का प्रतीक माना जाता है क्योंकि यह श्राद्ध करने के लिए कुछ आवश्यक शर्तें है अगर वो पूरी न हो तो यह श्राद्ध नहीं निकाला जाता। शर्त यह है कि मातामह श्राद्ध उसी औरत के पिता का निकाला जाता है जिसका पति व पुत्र ज़िन्दा हो अगर ऐसा नहीं है और दोनों में से किसी एक का निधन हो चुका है या है ही नहीं तो मातामह श्राद्ध का तर्पण नहीं किया जाता।
मनुष्य पर तीन प्रकार के ऋण प्रमुख माने गए हैं :- पितृ ऋण, देव ऋण तथा ऋषि ऋण। इनमें पितृ ऋण सर्वोपरि है। पितृ ऋण में पिता के अतिरिक्त माता तथा वे सब बुजुर्ग भी सम्मिलित हैं, जिन्होंने हमें अपना जीवन धारण करने तथा उसका विकास करने में सहयोग दिया।
पितृपक्ष में लोग मन कर्म एवं वाणी से संयम का जीवन जीते हैं; पितरों को स्मरण करके जल चढाते हैं; निर्धनों एवं ब्राह्मणों को दान देते हैं। पितृपक्ष में प्रत्येक परिवार में मृत माता-पिता का श्राद्ध किया जाता है, परंतु गया श्राद्ध का विशेष महत्व है। वैसे तो इसका भी शास्त्रीय समय निश्चित है, परन्तु "गया सर्वकालेषु पिण्डं दधाद्विपक्षणं" कहकर सदैव पिंडदान करने की अनुमति दे दी गई है।
एकैकस्य तिलैर्मिश्रांस्त्रींस्त्रीन् दद्याज्जलाज्जलीन्। 
यावज्जीवकृतं पापं तत्क्षणादेव नश्यति।
जो अपने पितरों को तिल-मिश्रित जल की तीन-तीन अंजलियाँ प्रदान करते हैं, उनके जन्म से तर्पण के दिन तक के पापों का नाश हो जाता है। 
जिस प्रकार जिसका जन्म हुआ है, उसकी मृत्यु भी निश्चित है; उसी प्रकार जिसकी मृत्यु हुई है, उसका जन्म भी निश्चित है। ऐसे कुछ विरले ही होते हैं, जिन्हें मोक्ष प्राप्ति हो जाती है। पितृपक्ष में तीन पीढ़ियों तक के पिता पक्ष के तथा तीन पीढ़ियों तक के माता पक्ष के पूर्वजों के लिए तर्पण किया जाता हैं। इन्हीं को पितर कहते हैं। दिव्य पितृ तर्पण, देव तर्पण, ऋषि तर्पण और दिव्य मनुष्य तर्पण के पश्चात् ही स्व-पितृ तर्पण किया जाता है। 
जिस तिथि को माता-पिता का देहांत होता है, उसी तिथी को पितृपक्ष में उनका श्राद्ध किया जाता है। शास्त्रों के अनुसार पितृपक्ष में अपने पितरों के निमित्त जो अपनी शक्ति सामर्थ्य के अनुरूप शास्त्र विधि से श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करता है, उसके सकल मनोरथ सिद्ध होते हैं और घर-परिवार, व्यवसाय तथा आजीविका में हमेशा उन्नति होती है।[धर्म-दर्शन]
पितृ दोष के कारण :: परिवार में किसी की अकाल मृत्यु होने से, अपने माता-पिता आदि सम्मानीय जनों का अपमान करने से, मरने के बाद माता-पिता का उचित ढंग से क्रियाकर्म और श्राद्ध नहीं करने से, उनके निमित्त वार्षिक श्राद्ध आदि न करने से पितरों को दोष लगता है। इसके फलस्वरूप परिवार में अशांति, वंश-वृद्धि में रूकावट, आकस्मिक बीमारी, संकट, धन में बरकत न होना, सारी सुख सुविधाएँ होते भी मन असन्तुष्ट रहना आदि पितृ दोष हो सकते हैं। यदि परिवार के किसी सदस्य की अकाल मृत्यु हुई हो तो, पितृ दोष के निवारण के लिए शास्त्रीय विधि के अनुसार उसकी आत्म शांति के लिए किसी पवित्र तीर्थ स्थान पर श्राद्ध करवाएँ। अपने माता-पिता तथा अन्य ज्येष्ठ जनों का अपमान न करें। प्रतिवर्ष पितृपक्ष में अपने पूर्वजों का श्राद्ध, तर्पण अवश्य करें। यदि इन सभी क्रियाओं को करने के पश्चात् पितृ दोष से मुक्ति न होती हो तो ऐसी स्थिति में किसी सुयोग्य कर्मनिष्ठ विद्वान ब्राह्मण से श्रीमद् भागवत् पुराण की कथा करवायें। श्रीमद् भागवत् पुराण की कथा कोई भी श्रद्धालु पुरुष अपने पितरों की आम शांति के लिए करवा सकता है। इससे विशेष पुण्य फल की प्राप्ति होती है।
तीन प्रकार के श्राद्ध प्रमुख :: नित्य, नैमित्तिक एवं काम्य श्राद्ध कहते हैं।[मत्स्य पुराण] 
पाँच प्रकार के श्राद्ध :: नित्य, नैमित्तिक, काम्य, वृद्धि और पार्वण के नाम से श्राद्ध है।[यमस्मृति]
नित्य श्राद्ध :- प्रतिदिन किए जानें वाले श्राद्ध को नित्य श्राद्ध कहते हैं। इस श्राद्ध में विश्वेदेव को स्थापित नहीं किया जाता। केवल जल से भी इस श्राद्ध को सम्पन्न किया जा सकता है।
नैमित्तिक श्राद्ध :- किसी को निमित्त बनाकर जो श्राद्ध किया जाता है, उसे नैमित्तिक श्राद्ध कहते हैं। इसे एकोद्दिष्ट के नाम से भी जाना जाता है। एकोद्दिष्ट का मतलब किसी एक को निमित्त मानकर किए जाने वाला श्राद्ध जैसे किसी की मृत्यु हो जाने पर दशाह, एकादशाह आदि एकोद्दिष्ट श्राद्ध के अन्तर्गत आता है। इसमें भी विश्वेदेवोंको स्थापित नहीं किया जाता।
काम्य श्राद्ध :- किसी कामना की पूर्ति के निमित्त जो श्राद्ध किया जाता है। वह काम्य श्राद्ध के अन्तर्गत आता है।
वृद्धि श्राद्ध :- किसी प्रकार की वृद्धि में जैसे पुत्र जन्म, वास्तु प्रवेश, विवाहादि प्रत्येक मांगलिक प्रसंग में भी पितरों की प्रसन्नता हेतु जो श्राद्ध होता है उसे वृद्धि श्राद्ध कहते हैं। इसे नान्दीश्राद्ध या नान्दीमुखश्राद्ध के नाम भी जाना जाता है, यह एक प्रकार का कर्म कार्य होता है। दैनंदिनी जीवन में देव-ऋषि-पित्र तर्पण भी किया जाता है।
पार्वण श्राद्ध :- पार्वण श्राद्ध पर्व से सम्बन्धित होता है। किसी पर्व जैसे पितृपक्ष, अमावास्या या पर्व की तिथि आदि पर किया जाने वाला श्राद्ध पार्वण श्राद्ध कहलाता है। यह श्राद्ध विश्वेदेवसहित होता है।
सपिण्डन श्राद्ध :- सपिण्डनशब्द का अभिप्राय पिण्डों को मिलाना। पितर में ले जाने की प्रक्रिया ही सपिण्डनहै। प्रेत पिण्ड का पितृ पिण्डों में सम्मेलन कराया जाता है। इसे ही सपिण्डनश्राद्ध कहते हैं।
गोष्ठी श्राद्ध :- गोष्ठी शब्द का अर्थ समूह होता है। जो श्राद्ध सामूहिक रूप से या समूह में सम्पन्न किए जाते हैं। उसे गोष्ठी श्राद्ध कहते हैं।
शुद्धयर्थ श्राद्ध :- शुद्धि के निमित्त जो श्राद्ध किए जाते हैं। उसे शुद्धयर्थश्राद्ध कहते हैं। जैसे शुद्धि हेतु ब्राह्मण भोजन कराना चाहिए।
कर्माग श्राद्ध :- कर्मागका सीधा साधा अर्थ कर्म का अंग होता है, अर्थात् किसी प्रधान कर्म के अंग के रूप में जो श्राद्ध सम्पन्न किए जाते हैं। उसे कर्मागश्राद्ध कहते हैं।
यात्रार्थ श्राद्ध :: यात्रा के उद्देश्य से किया जाने वाला श्राद्ध यात्रार्थ श्राद्ध कहलाता है। जैसे :- तीर्थ में जाने के उद्देश्य से या देशान्तर जाने के उद्देश्य से जिस श्राद्ध को सम्पन्न कराना चाहिए वह यात्रार्थ श्राद्ध ही है। इसे घृत श्राद्ध भी कहा जाता है।
पुष्ट्यर्थ श्राद्ध :- पुष्टि के निमित्त जो श्राद्ध सम्पन्न हो, जैसे शारीरिक एवं आर्थिक उन्नति के लिए किया जाना वाला श्राद्ध पुष्ट्यर्थश्राद्ध कहलाता है।
श्राद्ध के 96 अवसर :: एक वर्ष की अमावास्याएं 12,  पुणादितिथियां 4, मन्वादि तिथियां 14, संक्रान्तियां 12, वैधृति योग 12, व्यतिपात योग 12, पितृ पक्ष 15, अष्टका श्राद्ध 5, अन्वष्टका 5 तथा पूर्वेद्यु 5। पितरों की संतुष्टि हेतु विभिन्न पित्र-कर्म का विधान है।[धर्मसिन्धु]
पुराणोक्त पद्धति के अनुरूप कर्म :- एकोदिष्ट श्राद्ध, पार्वण श्राद्ध, नाग बलि कर्म, नारायण बलि कर्म, त्रिपिण्डी श्राद्ध। महालय श्राद्ध पक्ष में श्राद्ध कर्म उपरोक्त कर्मों हेतु विभिन्न संप्रदायों में विभिन्न प्रचलित परिपाटी चली आ रही हैं। अपनी कुल-परंपरा के अनुसार पितरों की तृप्ति हेतु श्राद्ध कर्म अवश्य करना चाहिए।
तर्पण :: पितरों की तृप्ति के लिए तर्पण किया जाता है। इसका उद्देश्य पूर्वजों के प्रति सच्ची श्रद्धा प्रकट करना है।  यह देवताओं, ऋषियों या पितरों को तन्दुल या तिल मिश्रित जल अर्पित करने की क्रिया है।
आवाहन, पूजन, नमस्कार के उपरान्त तर्पण किया जाता है। गँगा जल अथवा सामान्य जल में दूध, जौ, चावल, चन्दन डाल कर तर्पण कार्य में प्रयुक्त करते हैं। स्वगर्स्थ आत्माओं की तृप्ति किसी पदार्थ से, खाने-पहनने आदि की वस्तु से नहीं होती, क्योंकि स्थूल शरीर के लिए ही भौतिक उपकरणों की आवश्यकता पड़ती है। मरने के बाद स्थूल शरीर समाप्त होकर, केवल सूक्ष्म शरीर ही रह जाता है। सूक्ष्म शरीर को भूख-प्यास, सर्दी-गर्मी आदि की आवश्यकता नहीं रहती, उसकी तृप्ति का विषय कोई, खाद्य पदार्थ या हाड़-माँस वाले शरीर के लिए उपयुक्त उपकरण नहीं हो सकते। सूक्ष्म शरीर में विचारणा, चेतना और भावना की प्रधानता रहती है, इसलिए उसमें उत्कृष्ट भावनाओं से बना अन्तःकरण या वातावरण ही शान्तिदायक होता है।
तिथि भाद्रपद शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा से सर्वपितृ अमावस्या अर्थात् आश्विन कृष्ण पक्ष अमावस्या तक अनुष्ठान श्राद्ध-कर्म में पके हुए चावल, दूध और तिल को मिश्रित करके पिण्ड (शरीर) बनाते हैं। यह एक पारंपरिक विश्वास है, कि हर पीढ़ी के भीतर मातृ कुल तथा पितृ कुल दोनों में पहले की पीढ़ियों के समन्वित गुण सूत्र उपस्थित होते हैं। यह प्रतीकात्मक अनुष्ठान जिन-जिन लोगों के गुण सूत्र श्राद्ध करने वाले की अपनी देह में हैं, उनकी तृप्ति के लिए होता है।
श्राद्ध संस्कार में आवाहन, पूजन, नमस्कार के उपरान्त तर्पण किया जाता है। स्वगर्स्थ आत्माओं की तृप्ति किसी पदार्थ से, खाने-पहनने आदि की वस्तु से नहीं होती, क्योंकि स्थूल शरीर के लिए ही भौतिक उपकरणों की आवश्यकता पड़ती है। मरने के बाद स्थूल शरीर समाप्त होकर, केवल सूक्ष्म शरीर ही रह जाता है। सूक्ष्म शरीर को भूख-प्यास, सर्दी-गर्मी आदि की आवश्यकता नहीं रहती, उसकी तृप्ति का विषय कोई, खाद्य पदार्थ या हाड़-मांस वाले शरीर के लिए उपयुक्त उपकरण नहीं हो सकते। सूक्ष्म शरीर में विचारणा, चेतना और भावना की प्रधानता रहती है, इसलिए उसमें उत्कृष्ट भावनाओं से बना अन्तःकरण या वातावरण ही शान्तिदायक होता है।
इस दृश्य संसार में स्थूल शरीर वाले को जिस प्रकार इन्द्रिय भोग, वासना, तृष्णा एवं अहंकार की पूर्ति में सुख मिलता है, उसी प्रकार पितरों का सूक्ष्म शरीर शुभ कर्म से उत्पन्न सुगन्ध का रसास्वादन करते हुए तृप्ति का अनुभव करता है। उसकी प्रसन्नता तथा आकांक्षा का केन्द्र बिन्दु श्रद्धा है। श्रद्धा भरे वातावरण के सान्निध्य में पितर अपनी अशान्ति खोकर आनन्द का अनुभव करते हैं, श्रद्धा ही इनकी भूख है, इसी से उन्हें तृप्ति होती है। इसलिए पितरों की प्रसन्नता के लिए श्रद्धा एवं तर्पण किये जाते हैं। इन क्रियाओं का विधि-विधान इतना सरल एवं इतने कम खर्च का है कि निर्धन से निर्धन व्यक्ति भी उसे आसानी से सम्पन्न कर सकता है। तर्पण में प्रधानतया जल का ही प्रयोग होता है। उसे थोड़ा सुगंधित एवं परिपुष्ट बनाने के लिए जौ, तिल, चावल, दूध, फूल जैसी दो-चार मांगलिक वस्तुएँ डाली जाती हैं। कुशाओं के सहारे जौ की छोटी-सी अंजलि मन्त्रोच्चारपूवर्क डालने मात्र से पितर तृप्त हो जाते हैं, किन्तु इस क्रिया के साथ आवश्यक श्रद्धा, कृतज्ञता, सद्भावना, प्रेम, शुभकामना का समन्वय अवश्य होना चाहिए। यदि श्रद्धाञ्जलि इन भावनाओं के साथ की गयी है, तो तर्पण का उद्देश्य पूरा हो जायेगा, पितरों को आवश्यक तृप्ति मिलेगी, किन्तु यदि इस प्रकार की कोई श्रद्धा भावना तर्पण करने वाले के मन में नहीं होती और केवल लकीर पीटने के मात्र पानी इधर-उधर फैलाया जाता है, तो इतने भर से कोई विशेष प्रयोजन पूर्ण न होगा, इसलिए इन पितृ-कर्मों के करने वाले यह ध्यान रखें कि इन छोटे-छोटे क्रिया-कृत्यों को करने के साथ-साथ दिवंगत आत्माओं के उपकारों का स्मरण करें, उनके सद्गुणों तथा सत्कर्मो के प्रति श्रद्धा व्यक्त करें। कृतज्ञता तथा सम्मान की भावना उनके प्रति रखें और यह अनुभव करें कि यह जलांजलि जैसे अकिंचन उपकरणों के साथ, अपनी श्रद्धा की अभिव्यक्ति करते हुए स्वगीर्य आत्माओं के चरणों पर अपनी सद्भावना के पुष्प चढ़ा रहा हूँ। इस प्रकार की भावनाएँ जितनी ही प्रबल होंगी, पितरों को उतनी ही अधिक तृप्ति मिलेगी। जिस पितर का स्वगर्वास हुआ है, उसके किये हुए उपकारों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना, उसके अधूरे छोड़े हुए पारिवारिक एवं सामाजिक उत्तरदायित्व को पूरा करने में तत्पर होना तथा अपने व्यक्तित्व एवं वातावरण को मंगलमय ढाँचे में ढालना मरणोत्तर संस्कार का प्रधान प्रयोजन है। गृह शुद्धि, सूतक निवृत्ति का उद्देश्य भी इसी के निमित्त की जाती है, किन्तु तर्पण में केवल इन्हीं एक पितर के लिए नहीं, पूर्व काल में गुजरे हुए अपने परिवार, माता के परिवार, दादी के परिवार के तीन-तीन पीढ़ी के पितरों की तृप्ति का भी आयोजन किया जाता है। इतना ही नहीं इस पृथ्वी पर अवतरित हुए सभी महान् पुरुषों की आत्मा के प्रति इस अवसर पर श्रद्धा व्यक्त करते हुए अपनी सद्भावना के द्वारा तृप्त करने का प्रर्यत्न किया जाता है।
तर्पण को छः भागों में विभक्त किया गया है :-
देव तर्पण, ऋषि तर्पण, दिव्य मानव तर्पण, दिव्य पितृ तर्पण, यम तर्पण, मनुष्य पितृ तर्पण।
छः प्रकार का तर्पण :: (1). देव-तर्पण, (2). ऋषि-तर्पण, (3). दिव्य-मानव-तर्पण, (4). दिव्य-पितृ-तर्पण, (5). यम-तर्पण और (6). मनुष्य-पितृ-तर्पण।
देवर्षि मनुष्य पितृ तर्पण विधि :: प्रातःकाल संध्योपासना करने के पश्चात् बायें और दायें हाथ की अनामिका अङ्गुलि में निम्न मन्त्र को पढते हुए पवित्री (पैंती) धारण करें :-
"पवित्रे स्थो वैष्णव्यौ सवितुर्वः प्रसव उत्पुनाम्यच्छिद्रेण पवित्रेण सूर्यस्य रश्मिभिः"
फिर हाथ में त्रिकुश, यव, अक्षत और जल लेकर निम्नाङ्कित रूप से संकल्प पढें :-
ॐ विष्णवे नम:। हरि: ॐ तत्सदद्यैतस्य श्रीब्रह्मणो द्वितीयपरार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे जम्बूद्वीपे भरतखण्डे भारतवर्षे आर्यावर्तैकदेशे अमुकसंवत्सरे अमुकमासे अमुकपक्षे अमुकतिथौ अमुकवासरे अमुकगोत्रोत्पन्न: अमुकशर्मा (वर्मा, गुप्त:) अहं श्रीपरमेश्वरप्रीत्यर्थं देवर्पिमनुष्यपितृतर्पणं करिष्ये।
तीन कुश ग्रहण कर निम्न मंत्र को तीन बार कहें :-
ॐ देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च। 
नमः स्वाहायै स्वधायै नित्यमेव नमोनमः।
तदनन्तर एक ताँवे अथवा चाँदी के पात्र में श्वेत चन्दन, जौ, तिल, चावल, सुगन्धित पुष्प और तुलसी दल रखें, फिर उस पात्र के ऊपर एक हाथ या प्रादेश मात्र लम्बे तीन कुश रखें, जिनका अग्रभाग पूर्व की ओर रहे। इसके बाद उस पात्र में तर्पण के लिये जल भर दें। फिर उसमें रखे हुए तीनों कुशों को तुलसी सहित सम्पुटाकार दायें हाथ में लेकर बायें हाथ से उसे ढँक लें और निम्नाङ्कित मन्त्र पढते हुए देवताओं का आवाहन करें :-
ॐ विश्वेदेवास ऽआगत श्रृणुता म ऽइम, हवम्।
एदं वर्हिनिषीदत॥
हे विश्वेदेवगण! आप लोग यहाँ पदार्पण करें, हमारे प्रेमपूर्वक किये हुए इस आवाहन को सुनें और इस कुश के आसन पर विराजमान हों।[शु० यजु० 7.34]
विश्वेदेवा: श्रृणुतेम, हवं मे ये ऽअन्तरिक्षे य ऽउपद्यविष्ठ।
येऽअग्निजिह्वाऽउत वा यजत्राऽआसद्यास्मिन्बर्हिषि मादयद्ध्वम्॥
हे विश्वेदेवगण! आप लोगों में से जो अन्तरिक्ष में हों, जो द्युलोक (स्वर्ग) के समीप हों तथा अग्नि के समान जिह्वावाले एवं यजन करने योग्य हों, वे सब हमारे इस आवाहन को सुनें और इस कुशासन पर बैठकर तृप्त हों।[शु० यजु० 33.53]
आगच्छन्तु महाभागा ब्रह्माण्डोदर वर्तिनः। 
ये यत्र विहितास्तत्र सावधाना भवन्तु ते॥
इस प्रकार आवाहन कर कुश का आसन दें और उन पूर्वाग्र कुशों द्वारा दायें हाथ की समस्त अँगुलियों के अग्रभाग अर्थात् देवतीर्थ से ब्रह्मादि देवताओं के लिये पूर्वोक्त पात्र में से एक-एक अञ्जलि तिल चावल-मिश्रित जल लेकर दूसरे पात्र में गिरावें और निम्नाङ्कित रूप से उन-उन देवताओं के नाम मन्त्र पढते रहें :-
देव तपर्ण :: देव शक्तियाँ ईश्वर की वे महान् विभूतियाँ हैं, जो मानव-कल्याण में सदा निःस्वार्थ भाव से प्रयतनरत हैं। जल, वायु, सूर्य, अग्नि, चन्द्र, विद्युत् तथा अवतारी ईश्वर अंगों की मुक्त आत्माएँ एवं विद्या, बुद्धि, शक्ति, प्रतिभा, करुणा, दया, प्रसन्नता, पवित्रता जैसी सत्प्रवृत्तियाँ सभी देव शक्तियों में आती हैं। यद्यपि ये दिखाई नहीं देतीं, तो भी इनके अनन्त उपकार हैं। यदि इनका लाभ न मिले, तो मनुष्य के लिए जीवित रह सकना भी सम्भव न हो। इनके प्रति कृतज्ञता की भावना व्यक्त करने के लिए यह देव-तर्पण किया जाता है। यजमान दोनों हाथों की अनामिका अँगुलियों में पवित्री धारण करें।
ॐ आगच्छन्तु महाभागाः, विश्वेदेवा महाबलाः। 
ये तपर्णेऽत्र विहिताः, सावधाना भवन्तु ते॥ 
जल में चावल डालें। कुश-मोटक सीधे ही लें।  
यज्ञोपवीत सव्य (बायें कन्धे पर) सामान्य स्थिति में रखें। तर्पण के समय अंजलि में जल भरकर सभी अँगुलियों के अग्र भाग के सहारे अपिर्त करें। इसे देवतीर्थ मुद्रा कहते हैं। प्रत्येक देवशक्ति के लिए एक-एक अंजलि जल डालें। पूवार्भिमुख होकर देते चलें।
ॐ ब्रह्मादयो देवाः आगच्छन्तु गृह्णन्तु एतान् जलाञ्जलीन्।
ॐ ब्रह्म तृप्यताम्। ॐ विष्णुस्तृप्यताम्। ॐ रुद्रस्तृप्यताम्।
ॐ प्रजापतितृप्यताम्। ॐ देवास्तृप्यताम्। ॐ छन्दांसि तृप्यन्ताम्।
ॐ वेदास्तृप्यन्ताम्। ॐ ऋषयस्तृप्यन्ताम्। ॐ पुराणाचायार्स्तृप्यन्ताम्।
ॐ गन्धवार्स्तृप्यन्ताम्। ॐ इतराचायार्स्तृप्यन्ताम्। 
ॐ संवत्सरः सावयवस्तृप्यन्ताम्। ॐ देव्यस्तृप्यन्ताम्। 
ॐ अप्सरसस्तृप्यन्ताम्। ॐ देवानुगास्तृप्यन्ताम्।
ॐ नागास्तृप्यन्ताम्। ॐ सागरास्तृप्यन्ताम्। ॐ पवर्ता स्तृप्यन्ताम्।
ॐ सरितस्तृप्यन्ताम्। ॐ मनुष्यास्तृप्यन्ताम्। ॐ यक्षास्तृप्यन्ताम्।
ॐ रक्षांसि तृप्यन्ताम्। ॐ पिशाचास्तृप्यन्ताम्। ॐ सुपणार्स्तृप्यन्ताम्।
ॐ भूतानि तृप्यन्ताम्। ॐ पशवस्तृप्यन्ताम्। ॐ वनस्पतयस्तृप्यन्ताम्।
ॐ ओषधयस्तृप्यन्ताम्। ॐ भूतग्रामः चतुविर्धस्तृप्यन्ताम्।
ऋषि तर्पण :: दूसरा तर्पण ऋषियों के लिए है। व्यास, वसिष्ठ, याज्ञवल्क्य, कात्यायन, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र, नारद, चरक, सुश्रुत, पाणिनी, दधीचि आदि ऋषियों के प्रति श्रद्धा की अभिव्यक्ति ऋषि तर्पण द्वारा की जाती है। ऋषियों को भी देवताओं की तरह देवतीर्थ से एक-एक अंजलि जल दिया जाता है।
इसी प्रकार निम्नाङ्कित मन्त्रवाक्यों से मरीचि आदि ऋषियों को भी एक-एक अञ्जलि जल दें :-
ॐ मरीच्यादि दशऋषयः आगच्छन्तु गृह्णन्तु एतान्जलाञ्जलीन्।
ॐ मरीचिस्तृप्यताम्। ॐ अत्रिस्तृप्यताम्। ॐ अङ्गिरास्तृप्यताम्। 
ॐ पुलस्त्यस्तृप्यताम्।
ॐ पुलहस्तृप्यताम्। ॐ क्रतुस्तृप्यताम्। ॐ वसिष्ठस्तृप्यताम्। 
ॐ प्रचेतास्तृप्यताम्। ॐ भृगुस्तृप्यताम्। ॐ नारदस्तृप्यताम्॥
दिव्य मनुष्य तर्पण :: तीसरा तर्पण दिव्य मानवों के लिए है। जो पूर्ण रूप से समस्त जीवन को लोक कल्याण के लिए अपिर्त नहीं कर सकें, पर अपना, अपने परिजनों का भरण-पोषण करते हुए लोक मंगल के लिए अधिकाधिक त्याग-बलिदान करते रहे, वे दिव्य मानव हैं। राजा हरिश्चंद्र, रन्तिदेव, शिवि, जनक, पाण्डव, शिवाजी, महाराणा प्रताप, भामाशाह, तिलक जैसे महापुरुष इसी श्रेणी में आते हैं। दिव्य मनुष्य तर्पण उत्तराभिमुख किया जाता है। जल में जौ डालें।
इसके बाद जनेऊ को माला की भाँति गले में धारण कर अर्थात् पूर्वोक्त कुशों को दायें हाथ की कनिष्ठिका के मूल-भाग में उत्तराग्र रखकर स्वयं उत्तराभिमुख हो निम्नाङ्कित मन्त्रों को दो-दो बार पढते हुए दिव्य मनुष्यों के लिये प्रत्येक को दो-दो अञ्जलि यव सहित जल प्राजापत्य तीर्थ कनिष्ठिका के मूला-भाग) से अर्पण करें :-
ॐ सनकादयः दिव्यमानवाः आगच्छन्तु 
गृह्णन्तु एतान्जलाञ्जलीन्॥ (2 पुनरावृत्ति)
ॐ सनकस्तृप्यताम्॥ (2 पुनरावृत्ति) 
ॐ सनन्दनस्तृप्यताम्॥ (2 पुनरावृत्ति)
ॐ सनातनस्तृप्यताम्॥(2 पुनरावृत्ति) 
ॐ कपिलस्तृप्यताम्॥ (2 पुनरावृत्ति)
ॐ आसुरिस्तृप्यताम्॥(2 पुनरावृत्ति) 
ॐ वोढुस्तृप्यताम्॥ (2 पुनरावृत्ति)
ॐ पञ्चशिखस्तृप्यताम्॥ (2 पुनरावृत्ति)
दिव्य पितृ तर्पण :: चौथा तर्पण दिव्य पितरों के लिए है। जो कोई लोक सेवा एवं तपश्चर्या तो नहीं कर सके, पर अपना चरित्र हर दृष्टि से आदर्श बनाये रहे, उस पर किसी तरह की आँच न आने दी। अनुकरण, परम्परा एवं प्रतिष्ठा की सम्पत्ति पीछे वालों के लिए छोड़ गये। ऐसे लोग भी मानव मात्र के लिए वन्दनीय हैं, उनका तर्पण भी ऋषि एवं दिव्य मानवों की तरह ही श्रद्धा पूवर्क करना चाहिए। इसके लिए दक्षिणाभिमुख हों।
तत्पश्चात उन कुशों को द्विगुण भुग्न करके उनका मूल और अग्रभाग दक्षिण की ओर किये हुए ही उन्हें अँगूठे और तर्जनी के बीच में रखे और स्वयं दक्षिणाभिमुख हो बायें घुटने को पृथ्वी पर रखकर अपसव्य भाव से जनेऊ को दायें कँधे पर रखकर पूर्वोक्त पात्रस्थ जल में काला तिल मिलाकर पितृ तीर्थ से अँगूठा और तर्जनी के मध्य भाग से दिव्य पितरों के लिये निम्नाङ्कित मन्त्र-वाक्यों को पढते हुए तीन-तीन अञ्जलि जल दें :-
ॐ कव्यवाडादयो दिव्यपितरः आगच्छन्तु गृह्णन्तु एतान् जलाञ्जलिन्।
ॐ कव्यवाडनलस्तृप्यताम् इदं सतिलं 
जलं (गङ्गाजलं वा) तस्मै स्वधा नम:॥(3 पुनरावृत्ति)
ॐ सोमस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं 
(गङ्गाजलं वा) तस्मै स्वधा नम:॥(3 पुनरावृत्ति)
ॐ यमस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं 
(गङ्गाजलं वा) तस्मै स्वधा नम:॥(3 पुनरावृत्ति)
ॐ अर्यमा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं 
(गङ्गाजलं वा) तस्मै स्वधा नम:॥(3 पुनरावृत्ति)
अग्निष्वात्ता: पितरस्तृप्यन्ताम् इदं सतिलं जलं 
(गङ्गाजलं वा) तेभ्य: स्वधा नम:॥(3 पुनरावृत्ति)
ॐ सोमपा: पितरस्तृप्यन्ताम् इदं सतिलं जलं 
(गङ्गाजलं वा) तेभ्य: स्वधा नम:॥(3 पुनरावृत्ति)
ॐ बर्हिषद: पितरस्तृप्यन्ताम् इदं सतिलं जलं 
(गङ्गाजलं वा) तेभ्य: स्वधा नम:॥(3 पुनरावृत्ति)
यम तर्पण :: यम नियन्त्रण-कर्त्ता शक्तियों को कहते हैं। जन्म-मरण की व्यवस्था करने वाली शक्ति को यम कहते हैं। मृत्यु को स्मरण रखें, मरने के समय पश्चात्ताप न करना पड़े, इसका ध्यान रखें और उसी प्रकार की अपनी गतिविधियाँ निधार्रित करें, तो समझना चाहिए कि यम को प्रसन्न करने वाला तर्पण किया जा रहा है। राज्य शासन को भी यम कहते हैं। अपने शासन को परिपुष्ट एवं स्वस्थ बनाने के लिए प्रत्येक नागरिक को, जो कत्तर्व्य पालन करता है, उसका स्मरण भी यम तर्पण द्वारा किया जाता है। अपने इन्द्रिय निग्रहकर्त्ता एवं कुमार्ग पर चलने से रोकने वाले विवेक को यम कहते हैं। इसे भी निरंतर पुष्ट करते चलना हर भावनाशील व्यक्ति का कत्तर्व्य है। इन कत्तर्व्यों की स्मृति यम-तर्पण द्वारा की जाती है। इसी प्रकार निम्नलिखित मन्त्र-वाक्यों को पढते हुए चौदह यमों के लिये भी पितृतीर्थ से ही तीन-तीन अञ्जलि तिल सहित जल दें :-
ॐ यमादिचतुदर्शदेवाः आगच्छन्तु गृह्णन्तु एतान् जलाञ्जलिन्। 
ॐ यमाय नम:॥ (3 पुनरावृत्ति) 
ॐ धर्मराजाय नम:॥ (3 पुनरावृत्ति) 
ॐ मृत्यवे नम:॥ (3 पुनरावृत्ति) 
ॐ अन्तकाय नम:॥ (3 पुनरावृत्ति) 
ॐ वैवस्वताय नमः॥ (3 पुनरावृत्ति) 
ॐ कालाय नम:॥ (3 पुनरावृत्ति) 
ॐ सर्वभूतक्षयाय नम:॥ (3 पुनरावृत्ति) 
ॐ औदुम्बराय नम:॥ (3 पुनरावृत्ति)
ॐ दध्नाय नम:॥ (3 पुनरावृत्ति) 
ॐ नीलाय नम:॥ (3 पुनरावृत्ति) 
ॐ परमेष्ठिने नम:॥ (3 पुनरावृत्ति) 
ॐ वृकोदराय नम:॥ (3 पुनरावृत्ति) 
ॐ चित्राय नम:॥ (3 पुनरावृत्ति) 
ॐ चित्रगुप्ताय नम:॥ (3 पुनरावृत्ति)
तत्पश्चात् निम्न मन्त्रों से यम देवता को नमस्कार करें :-
ॐ यमाय धमर्राजाय, मृत्यवे चान्तकाय च। 
वैवस्वताय कालाय, सवर्भूतक्षयाय च॥
औदुम्बराय दध्नाय, नीलाय परमेष्ठिने। 
वृकोदराय चित्राय, चित्रगुप्ताय वै नमः॥
मनुष्य पितृ तर्पण :: इसके बाद अपने परिवार से सम्बन्धित दिवंगत नर-नारियों का क्रम आता है। पिता, बाबा, पर बाबा, माता, दादी, पर दादी। नाना, पर नाना, बूढ़े नाना, नानी पर नानी, बूढ़ी नानी। पतनी, पुत्र, पुत्री, चाचा, ताऊ, मामा, भाई, बुआ, मौसी, बहिन, सास, ससुर, गुरु, गुरुपतनी, शिष्य, मित्र आदि।
यह तीन वंशावलियाँ तर्पण के लिए है। पहले स्वगोत्र तर्पण किया जाता है :-
गोत्रोत्पन्नाः अस्मत् पितरः आगच्छन्तु गृह्णन्तु एतान् जलाञ्जलीन्।
अस्मत्पिता (पिता) अमुकशमार् अमुकसगोत्रो वसुरूपस्तृप्यताम्।
इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नमः॥(3 पुनरावृत्ति)
अस्मत्पितामह (दादा) अमुकशमार् अमुकसगोत्रो रुद्ररूपस्तृप्यताम्।
इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नमः॥(3 पुनरावृत्ति)
अस्मत्प्रपितामहः (परदादा) अमुकशमार् अमुकसगोत्रो वसुरूपस्तृप्यताम्।
इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नमः॥(3 पुनरावृत्ति)
अस्मन्माता (माता) अमुकी देवी दा अमुक सगोत्रा गायत्रीरूपा तृप्यताम्।
इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नमः॥(3 पुनरावृत्ति)
अस्मत्पितामही (दादी) अमुकी देवी दा 
अमुक सगोत्रा सावित्रीरूपा तृप्यताम्।
इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नमः॥(3 पुनरावृत्ति)
अस्मत्प्रत्पितामही (परदादी) अमुकी देवी दा अमुक सगोत्रा लक्ष्मीरूपा तृप्यताम्।
इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नमः॥ (3 पुनरावृत्ति)
अस्मत्सापतनमाता (सौतेली माँ) अमुकी देवी दा अमुक सगोत्रा वसुरूपा तृप्यताम्। इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नमः॥ (3 पुनरावृत्ति)
मनुष्य पितृ तर्पण इसके पश्चात् निम्नाङ्कित मन्त्र से पितरों का आवाहन करें :-
ॐ उशन्तस्त्वा निधीमह्युशन्त: समिधीमहि।
उशन्नुशत ऽआवह पितृन्हाविषे ऽअत्तवे॥
‘हे अग्ने! तुम्हारे यजन की कामना करते हुए हम तुम्हें स्थापित करते हैं। यजन की ही इच्छा रखते हुए तुम्हें प्रज्वलित करते हैं। हविष्य की इच्छा रखते हुए तुम भी तृप्ति की कामनावाले हमारे पितरों को हविष्य भोजन करने के लिये बुलाओ।[[शु. यजु.16.70]
ॐ आयन्तु न: पितर: सोम्यासोऽग्निष्वात्ता: पथिभिर्देवयानै:।
अस्मिन्यज्ञे स्वधया मदन्तोऽधिव्रुवन्तु तेऽवन्तस्मान्॥
हमारे सोमपान करने योग्य अग्निष्वात्त पितृगण देवताओं के साथ गमन करने योग्य मार्गों से यहाँ आवें और इस यज्ञ में स्वाधा से तृप्त होकर हमें मानसिक उपदेश दें तथा वे हमारी रक्षा करें। [शु. यजु.16.58]
तदनन्तर अपने पितृगणों का नाम-गोत्र आदि उच्चारण करते हुए प्रत्येक के लिये पूर्वोक्त विधि से ही तीन-तीन इसके बाद निम्नाङ्कित नौ मन्त्रों को पढते हुए पितृ तीर्थ से जल गिराता रहे :-
ॐ उदीरतामवर ऽउत्परास ऽउन्मध्यमा: पितर: सोम्यास:।
असुं य ऽईयुरवृका ऋतज्ञास्ते नोऽवन्तु पितरो हवेषु॥ 
इस लोक में स्थित, परलोक में स्थित और मध्यलोक में स्थित सोमभागी पितृगण क्रम से ऊर्ध्वलोकों को प्राप्त हों । जो वायु रूप को प्राप्त हो चुके हैं, वे शत्रु हीन सत्यवेत्ता पितर आवाहन करने पर यहाँ उपस्थित हो और हम लोगों की रक्षा करें।[शु.य.16.46]
ॐ अङ्गिरसो न: पितरो नवग्वा ऽअथर्वाणो भृगव: सोम्यास:।
तेषां वय, सुमतौ यज्ञियानामपि भद्रे सौमनसे स्याम। 
अङ्गिरा के कुल में, अथर्व मुनि के वंश में तथा भृगुकुल में उत्पन्न हुए नवीन गति वाले एवं सोम पान करने योग्य जो हमारे पितर इस समय पितृ लोक को प्राप्त हैं, उन यज्ञ में पूजनीय पितरों की सुन्दर बुद्धि में तथा उनके कल्याण कारी मन में हम स्थित रहें। अर्थात् उनकी मन-बुद्धि में हमारे कल्याण की भावना बनी रहे।[शु.य. 16.70]
ॐ ऊर्ज्जं वहन्तीरमृतं घृतं पय: कीलालं परिस्त्रुतम्। 
स्वधास्थ तर्पयत मे पितृन्॥ 
ॐ आयन्तु न: पितर: सोम्यासोऽग्निष्वात्ता:पथिभिर्देवयानै:।
अस्मिन्यज्ञे स्वधया मदन्तोऽधिब्रुवन्तु तेऽवन्त्वस्मान्॥ 
हे जल! तुम स्वादिष्ट अन्न के सारभूत रस, रोग-मृत्यु को दूर करनेवाले घी और सब प्रकार का कष्ट मिटानेवाले दुग्ध का वहन करते हो तथा सब ओर प्रवाहित होते हो, अतएव तुम पितरों के लिये हविः स्वरूप होये इसलिये मेरे पितरों को तृप्त करो।[शु.य.16.34,16.58]
ॐ पितृभ्य:स्वधायिभ्य: स्वधा नम: पितामहेभ्य: स्वधायिभ्य: स्वधा नम: प्रपितामहेभ्य: स्वधायिभ्यं: स्वधा नम:। अक्षन्पितरोऽमीमदन्त पितरोऽतीतृप्यन्त पितर: पितर:शुन्धध्वम्॥
स्वधा (अन्न) के प्रति गमन करने वाले पितरों को स्वधा संज्ञक अन्न प्राप्त हो, उन पितरों को हमारा नमस्कार है। स्वधा के प्रति जाने वाले पिता महों को स्वधा प्राप्त हो, उन्हें हमारा नमस्कार है। स्वधा के प्रति गमन करनेवाले प्रपिता महों को स्वधा प्राप्त हो, उन्हें हमारा नमस्कार है। पितर पूर्ण आहार कर चुके, पितर आनन्दित हुए, पितर तृप्त हुए हे पितरो! अब आप लोग आचमन आदि करके शुद्ध हों।[शु.य.16.36]
ॐ ये चेह पितरो ये च नेह याँश्च विद्ययाँऽउ च न प्रविद्द्म।
त्वं वेत्थ यति ते जातवेदरू स्वधाभिर्यज्ञ, सुकृतं जुपस्व॥ 
जो पितर इस लोक में वर्तमान हैं और जो इस लोक में नही किन्तु पितृ लोक में विद्यमान हैं तथा जिन पितरों को हम जानते हैं और जिनको स्मरण न होने के कारण नही जानते हैं, वे सभी पितर जितने हैं, उन सबको हे जात वेदा-अग्निदेव! तुम जानते हो। पितरों के निमित्त दी जाने वाली स्वधा के द्वारा तुम इस श्रेष्ठ यज्ञ का सेवन करो-इसे सफल बनाओ।[शु.य. 16.67]
ॐ मधु व्वाता ऽऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धव:। 
माध्वीन: सन्त्वोषधी:॥
यज्ञ की इच्छा करनेवाले यजमान के लिये वायु मधु पुष्प रस-मकरन्द की वर्षा करती है। बहने वाली नदियाँ मधु के समान मधुर जल का स्नोत बहाती हैं। समस्त ओषधियाँ हमारे लिये मधु-रस से युक्त हों। [शु.य.13.27]
ॐ मधु नक्तमुतोषसो मधुमत्पार्थिव, रज:। मधु द्यौरस्तु न पिता॥
हमारे रात-दिन सभी मधुमय हों। पिता के समान पालन करने वाला द्यु लोक हमारे लिये मधु मय-अमृत मय हो। माता के समान पोषण करनेवाली पृथिवी की धूलि हमारे लिये मधु मयी हो। [शु.य.13.28]
ॐ मधुमान्नो वनस्पतिर्मधुमाँऽअस्तु सूर्यः। माध्वीर्गावो भवन्तु न:॥
ॐ मधु। मधु। मधु। तृप्यध्वम्। तृप्यध्वम्। तृप्यध्वम्।
वनस्पति और सूर्य भी हमारे लिये मधुमान् मधुर रस से युक्त हों। हमारी समस्त गौएँ माध्वी-मधु के समान दूध देनेवाली हों। [शु.य.13.26]
अब नीचे लिखे मन्त्र का पाठ मात्र करे :-
ॐ नमो व: पितरो रसाय नमो व: पितर: शोषाय नमो व: पितरो जीवाय नमो वर: पितर: स्वधायै नमो व: पितरो घोराय नमो व: पितरो मन्यवे नमो वर: पितर: पितरो नमो वो गृहान्न:पितरो दत्त सतो व: पितरो देष्मैतद्व: पितरो व्वास ऽआधत्त। 
हे पितृगण! तुमसे सम्बन्ध रखनेवाली रस स्वरूप वसन्त-ऋतु को नमस्कार है, शोषण करने वाली ग्रीष्म-ऋतु को नमस्कार है, जीवन-स्वरूप वर्षा-ऋतु को नमस्कार है, स्वधा रूप शरद-ऋतु को नमस्कार है, प्राणियों के लिये घोर प्रतीत होनेवाली हेमन्त-ऋतु को नमस्कार है, क्रोध स्वरूप शिशिर-ऋतु को नमस्कार है। अर्थात् तुमसे सम्बन्ध रखनेवाली सभी ऋतुएँ तुम्हारी कृपा से सर्वथा अनुकूल होकर सबको लाभ पहुँचानेवाली हों। हे षडऋतुरूप पितरो! तुम हमें साध्वी पत्नी और सत्पुत्र आदि से युक्त उत्तम गृह प्रदान करो। हे पितृगण! इन प्रस्तुत दातव्य वस्तुओं को हम तुम्हें अर्पण करते हैं, तुम्हारे लिये यह सूत्ररूप वस्त्र है, इसे धारण करो।[शु.य.2.32]
द्वितीय गोत्र तर्पण इसके बाद द्वितीय गोत्र मातामह आदि का तर्पण करे, यहाँ भी पहले की ही भाँति निम्नलिखित वाक्यों को तीन-तीन बार पढकर तिल सहित जल की तीन-तीन अञ्जलियाँ पितृ तीर्थ से दे, यथा :-
अस्मन्मातामह: नाना अमुकशर्मा अमुकसगोत्रो वसुरूपस्तृप्यन्ताम् इदं सतिलं गङ्गाजलं वा तस्मै स्वधा नम:। (3 पुनरावृत्ति)
अस्मत्प्रमातामह: परनाना अमुकशर्मा अमुकसगोत्रो रुद्ररूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नम:। (3 पुनरावृत्ति)
अस्मद्वृद्धप्रमातामह: बूढे परनाना अमुकशर्मा अमुकसगोत्र आदित्यरूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नम:। (3 पुनरावृत्ति)
अस्मन्मातामही नानी अमुकी देवी दा अमुकसगोत्रा वसुरूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नम:। (3 पुनरावृत्ति)
अस्मत्प्रमातामही परनानी अमुकी देवी दा अमुकसगोत्रा रुद्ररूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नम:। (3 पुनरावृत्ति)
अस्मद्वृद्धप्रमातामही बूढी परनानी अमुकी देवी दा अमुकसगोत्रा आदित्यरूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नम:। (3 पुनरावृत्ति)
पत्न्यादितर्पण अस्मत्पत्नी भार्या अमुकी देवी दा अमुकसगोत्रा वसुरूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नम:। (3 पुनरावृत्ति)
अस्मत्सुतरू बेटा अमुकशर्मा अमुकसगोत्रो वसुरूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नम:। (3 पुनरावृत्ति)
अस्मत्कन्या बेटी अमुकी देवी दा अमुकसगोत्रा वसुरूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नम:। (3 पुनरावृत्ति)
अस्मत्पितृव्य: पिता के भाई अमुकशर्मा अमुकसगोत्रो वसुरूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नम:। (3 पुनरावृत्ति)
अस्मन्मातुल: मामा अमुकशर्मा अमुकसगोत्रो वसुरूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नम:। (3 पुनरावृत्ति)
अस्मद्भ्राता अपना भाई अमुकशर्मा अमुकसगोत्रो वसुरूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नम:। (3 पुनरावृत्ति)
अस्मत्सापत्नभ्राता सौतेला भाई अमुकशर्मा अमुकसगोत्रो वसुरूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नम:। (3 पुनरावृत्ति)
अस्मत्पितृभगिनी बूआ अमुकी देवी दा अमुकसगोत्रा वसुरूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नम:। (3 पुनरावृत्ति)
अस्मन्मातृभगिनी मौसी अमुकी देवी दा अमुकसगोत्रा वसुरूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नम:। (3 पुनरावृत्ति)
अस्मदात्मभगिनी अपनी बहिन अमुकी देवी दा अमुकसगोत्रा वसुरूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नम:। (3 पुनरावृत्ति)
अस्मत्सापत्नभगिनी सौतेली बहिन अमुकी देवी दा अमुकसगोत्रा वसुरूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नम:। (3 पुनरावृत्ति)
अस्मच्छवशुर: श्वशुर अमुकशर्मा अमुकसगोत्रो वसुरूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नम:। (3 पुनरावृत्ति)
अस्मद्गुरु: अमुकशर्मा अमुकसगोत्रो वसुरूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नम:। (3 पुनरावृत्ति) 
अस्मदाचार्यपत्नी अमुकी देवी दा अमुकसगोत्रा वसुरूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नम:। (3 पुनरावृत्ति)
अस्मच्छिष्य: अमुकशर्मा अमुकसगोत्रो वसुरूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नम:। (3 पुनरावृत्ति) 
अस्मत्सखा अमुकशर्मा अमुकसगोत्रो वसुरूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नम:। (3 पुनरावृत्ति) 
अस्मदाप्तपुरुष: अमुकशर्मा अमुकसगोत्रो वसुरूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नम:। (3 पुनरावृत्ति)
इसके बाद सव्य होकर पूर्वाभिमुख हो नीचे लिखे श्लोकों को पढते हुए जल गिरायें :-
देवासुरास्तथा यक्षा नागा गन्धर्वराक्षसा:। 
पिशाचा गुह्यका: सिद्धा: कूष्माण्डास्तरव: खगा:॥
जलेचरा भूमिचराः वाय्वाधाराश्च जन्तव:। 
प्रीतिमेते प्रयान्त्वाशु मद्दत्तेनाम्बुनाखिला:॥
नरकेषु समस्तेपु यातनासु च ये स्थिता:। 
तेषामाप्ययनायैतद्दीयते सलिलं मया॥
येऽबान्धवा बान्धवा वा येऽन्यजन्मनि बान्धवा:। 
ते सर्वे तृप्तिमायान्तु ये चास्मत्तोयकाङ्क्षिण:॥
देवता, असुर, यक्ष, नाग, गन्धर्व, राक्षस, पिशाच, गुह्मक, सिद्ध, कूष्माण्ड, वृक्ष वर्ग, पक्षी, जलचर जीव और वायु के आधार पर रहने वाले जन्तु-ये सभी मेरे दिये हुए जल से भीघ्र तृप्त हों।
जो समस्त नरकों तथा वहाँ की यातनाओं में पड़े-पड़े  दु:ख भोग रहे हैं, उनको पुष्ट तथा शान्त करने की इच्छा से मैं यह जल देता हूँ। जो मेरे बान्धव न रहे हों, जो इस जन्म में बान्धव रहे हों अथवा किसी दूसरे जन्म में मेरे बान्धव रहे हों, वे सब तथा इनके अतिरिक्त भी जो मुझ से जल पाने की इच्छा रखते हों, वे भी मेरे दिये हुए जल से तृप्त हों।
ॐ आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं देवषिंपितृमानवा:। 
तृप्यन्तु पितर: सर्वे मातृमातामहादय:॥
अतीतकुलकोटीनां सप्तद्वीपनिवासिनाम्। 
आ ब्रह्मभुवनाल्लोकादिदमस्तु तिलोदकम्॥
येऽबान्धवा बान्धवा वा येऽन्यजन्मनि बान्धवा:। 
ते सर्वे तृप्तिमायान्तु मया दत्तेन वारिणा॥
ब्रह्मा जी से लेकर कीटों तक जितने जीव हैं, वे तथा देवता, ऋषि, पितर, मनुष्य और माता, नाना आदि पितृगण-ये सभी तृप्त हों मेरे कुल की बीती हुई करोडों पीढियों में उत्पन्न हुए जो-जो पितर ब्रह्म लोक पर्यम्त सात द्वीपों के भीतर कहीं भी निवास करते हों, उनकी तृप्ति के लिये मेरा दिया हुआ यह तिल मिश्रित जल उन्हें प्राप्त हो जो मेरे बान्धव न रहे हों, जो इस जन्म में या किसी दूसरे जन्म में मेरे बान्धव रहे हों, वे सभी मेरे दिये हुए जल से तृप्त हो जायँ।
निष्पीडन :: तत्पश्चात् वस्त्र को चार आवृत्ति लपेट कर जल में डुबावे और बाहर ले आकर निम्नाङ्कित मन्त्र को पढते हुए अपसव्य-होकर अपने बाएँ भाग में भूमि पर उस वस्त्र को निचोड़े। पवित्रक को तर्पण किये हुए जल में छोड़ दे। यदि घर में किसी मृत पुरुष का वार्षिक श्राद्ध आदि कर्म हो तो वस्त्र-निष्पीडन नहीं करना चाहिये। वस्त्र-निष्पीडन का मन्त्र यह है :-
ये के चास्मत्कुले जाता अपुत्रा गोत्रिणो मृतारू। 
ते गृह्णन्तु मया दत्तं वस्त्रनिष्पीडनोदकम्॥
भीष्म तर्पण :: अन्त में भीष्म तर्पण किया जाता है। दक्षिणाभिमुख हो पितृ तर्पण के समान ही अनेऊ अपसव्य करके हाथ में कुश धारण किये हुए ही बाल ब्रह्मचारी भक्त प्रवर भीष्म के लिये पितृ तीर्थ से तिल मिश्रित जल के द्वारा तर्पण करे। ऐसे परमार्थ परायण महा मानव, जिन्होंने उच्च उद्देश्यों के लिए अपना वंश चलाने का मोह नहीं किया, भीष्म उनके प्रतिनिधि माने गये हैं, ऐसी सभी श्रेष्ठात्माओं को जलदान दें :-
ॐ वैयाघ्रपदगोत्राय, सांकृतिप्रवराय च। 
गंगापुत्राय भीष्माय, प्रदास्येऽहं तिलोदकम्॥
अपुत्राय ददाम्येतत्, सलिलं भीष्मवमर्णे। 
अर्घ्य दान फिर शुद्ध जल से आचमन करके प्राणायाम करे। तदनन्तर यज्ञोपवीत सव्य कर बाएँ कंधेपर करके एक पात्र में शुद्ध जल भरकर उसके मध्यभाग में अनामिका से षडदल कमल बनावे और उसमें श्वेत चन्दन, अक्षत, पुष्प तथा तुलसीदल छोड दे। फिर दूसरे पात्र में चन्दल से षडदल-कमल बनाकर उसमें पूर्वादि दिशा के क्रम से ब्रह्मादि देवताओं का आवाहन-पूजन करे तथा पहले पात्र के जल से उन पूजित देवताओं के लिये अर्ध्य अर्पण करे।
अर्ध्यदान के मन्त्र निम्नाङ्कित हैं :-
ॐ ब्रह्म जज्ञानं प्रथमं पुरस्ताद्वि सीमत: सुरुचो व्वेन ऽआव:।
स बुध्न्या ऽउपमा ऽअस्य व्विष्ठा: सतश्च योनिमसतश्व व्विव:॥ 
ॐ ब्रह्मणे नम:। ब्रह्माणं पूजयामि॥
सर्वप्रथम पूर्व दिशा से प्रकट होनेवाले आदित्यरूप ब्रह्मने भूगोल के मध्यभाग से आरम्भ करके इन समस्त सुन्दर कान्ति वाले लोकों को अपने प्रकाश से व्यक्त किया है तथा वह अत्यन्त कमनीय आदित्य इस जगत् की निवास-स्थान भूत अवकाश युक्त दिशाओं को, विद्यमान-मूर्त्त पदार्थ के स्थानों को और अमूर्त्त वायु आदि के उत्पत्ति स्थानों को भी प्रकाशित करता है।[शु.य. 13.3]
ॐ इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेधा निदधे पदम्। समूढमस्यपा, सुरे स्वाहा॥ 
ॐ विष्णवे नम:। विष्णुं पूजयामि॥
सर्वव्यापी त्रिविक्रम वामन अवतार धारी भगवान् श्री हरी विष्णु ने इस चराचर जगत् को विभक्त करके अपने चरणों से आक्रान्त किया है । उन्होंने पृथ्वी, आकाश और द्युलोक-इन तीनों  स्थानों में अपना चरण स्थापित किये हैं अथवा उक्त तीनों स्थानों में वे क्रमश: अग्नि, वायु तथा सूर्य रूप से स्थित हैं। इन विष्णु भगवान् के चरण में समस्त विश्व अन्तर्भूत है। इम इनके निमित्त स्वाहा हविष्य दान करते हैं।
ॐ नमस्ते रुद्र मन्यव ऽउतो त ऽइषवे नम:। 
वाहुब्यामुत ते नम:॥ 
ॐ रुद्राय नम:। रुद्रं पूजयामि॥
हे रुद्र! आप के क्रोध और वाण को नमस्कार है तथा आपकी दोनों भुजाओं को नमस्कार है।
ॐ तत्सवितुर्व रेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो न: प्रचोदयात्॥ 
ॐ सवित्रे नम:। सवितारं पूजयामि॥
हस स्थावर-जङ्गमरूप सम्पूर्ण विश्व को उत्पन्न करनेवाले उन निरति शय प्रकाश मय सूर्य स्वरूप परमेश्वर के भजने योग्य तेज का ध्यान करते हैं, जो कि हमारी बुद्धियों को सत्कर्मों की ओर प्रेरित करते रहते हैं।
ॐ मित्रस्य चर्षणीधृतोऽवो देवस्य सानसि। द्युम्नं चित्रश्रवस्तमम्॥ 
ॐ मित्राय नम:। मित्रं पूजयामि॥
मनुष्यों का पोषण करनेवाले दीप्तिमान् मित्र देवता का यह रक्षण कार्य सनातन, यश रूप से प्रसिद्ध, विचित्र तथा श्रवण करने के योग्य है।
ॐ इमं मे व्वरूण श्रुधी हवमद्या च मृडय। त्वामवस्युराचके॥ 
ॐ वरुणाय नम:। वरूणं पूजयामि॥
हे संसार-सागर के अधिपति वरुणदेव! अपनी रक्षा के लिये मैं आपको बुलाना चाहता हूँ, आप मेरे इस आवाहन को सुनिये और यहाँ शीघ्र पधारकर आज हमें सब प्रकार से सुखी कीजिये।
फिर भगवान सूर्य को अर्ध्य दें :-
एहि सूर्य सहस्त्राशों तेजो राशिं जगत्पते। 
अनुकम्पय मां भक्त्या गृहाणाघ्र्य दिवाकरः॥
हाथों को उपर कर उपस्थाप मंत्र पढ़ें :-
चित्रं देवाना मुदगादनीकं चक्षुर्मित्रस्य वरूणस्याग्नेः।
आप्राद्यावा पृथ्वी अन्तरिक्ष सूर्यआत्माजगतस्तस्थुशश्च
फिर परिक्रमा करते हुए दशों दिशाओं को नमस्कार करें।
ॐ प्राच्यै इन्द्राय नमः। ॐ आग्नयै अग्नयै नमः। 
ॐ दक्षिणायै यमाय नमः। ॐ नैऋत्यै नैऋतये नमः।
ॐ पश्चिमायै वरूणाय नमः। ॐ वाव्ययै वायवे नमः।
ॐ उदीच्यै कुवेराय नमः। ॐ ईशान्यै ईशानाय नमः।
ॐ ऊध्र्वायै ब्रह्मणै नमः। ॐ अवाच्यै अनन्ताय नमः।
सव्य होकर पुनः देव तीर्थ से तर्पण करें :-
ॐ ब्रह्मणै नमः। ॐ अग्नयै नमः। ॐ पृथिव्यै नमः। ॐ औषधिभ्यो नमः। ॐ वाचे नमः। ॐ वाचस्पतये नमः। ॐ महद्भ्यो नमः। ॐ विष्णवे नमः। ॐ अद्भ्यो नमः। ॐ अपां पतये नमः। ॐ वरूणाय नमः।
फिर तर्पण के जल को मुख पर लगायें और तीन बार "ॐ अच्युताय नमः" मंत्र का जप करें।
इतर तर्पण :: जिनको आवश्यक है, केवल उन्हीं के लिए तर्पण कराया जाए :-
अस्मत्पतनी अमुकी देवी दा अमुक सगोत्रा वसुरूपा तृप्यताम्।
इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नमः॥ (3 पुनरावृत्ति)
अस्मत्सुतः (बेटा) अमुकशमार् अमुकसगोत्रो वसुरूपस्तृप्यताम्।
इदं अमुकी देवी दा अमुक सगोत्रा वसुरूपा तृप्यताम्।
इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नमः॥ (3 पुनरावृत्ति)
सतिलं जलं तस्मै स्वधा नमः॥ (3 पुनरावृत्ति)
अस्मत्कन्याः (बेटी) अमुकी देवी दा अमुक सगोत्रा वसुरूपा तृप्यताम्।
इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नमः॥ (3 पुनरावृत्ति)
अस्मत्पितृव्यः (चाचा) अमुकशमार् अमुकसगोत्रो वुसरूपस्तृप्यताम्।
इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नमः॥ (3 पुनरावृत्ति)
अस्मन्मातुलः (मामा) अमुकशमार् अमुकसगोत्रो वुसरूपस्तृप्यताम्।
इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नमः॥ (3 पुनरावृत्ति)
अस्मद्भ्राता (अपना भाई) अमुकशमार् अमुकसगोत्रो वुसरूपस्तृप्यताम्।
इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नमः॥ (3 पुनरावृत्ति)
अस्मत्सापतनभ्राता (सौतेला भाई) अमुकशमार् अमुकसगोत्रो वुसरूपस्तृप्यताम्। इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नमः॥ (3 पुनरावृत्ति)
अस्मत्पितृभगिनी (बुआ) अमुकी देवी दा अमुक सगोत्रा वसुरूपा तृप्यताम्।
इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नमः॥ (3 पुनरावृत्ति)
अस्मान्मातृभगिनी (मौसी) अमुकी देवी दा अमुक सगोत्रा वसुरूपा तृप्यताम्।
इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नमः॥ (3 पुनरावृत्ति)
अस्मदात्मभगिनी (अपनी बहिन) अमुकी देवी दा अमुक सगोत्रा वसुरूपा तृप्यताम्। इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नमः॥ (3 पुनरावृत्ति)
अस्मत्सापतनभगिनी (सौतेली बहिन) अमुकी देवी दा 
अमुक सगोत्रा वसुरूपा तृप्यताम्।
इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नमः॥ (3 पुनरावृत्ति)
अस्मद श्वशुरः (श्वसुर) अमुकशमार् अमुकसगोत्रो वसुरूपस्तृप्यताम्।
इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नमः॥ (3 पुनरावृत्ति)
अस्मद श्वशुरपतनी (सास) अमुकी देवी दा अमुक सगोत्रा वसुरूपा तृप्यताम्।
इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नमः॥ (3 पुनरावृत्ति)
अस्मद्गुरु अमुकशमार् अमुकसगोत्रो वसुरूपस्तृप्यताम्।
इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नमः॥ (3 पुनरावृत्ति)
अस्मद् आचायर्पतनी अमुकी देवी दा अमुक सगोत्रा वसुरूपा तृप्यताम्।
इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नमः॥ (3 पुनरावृत्ति)
अस्मत् शिष्यः अमुकशमार् अमुकसगोत्रो वसुरूपस्तृप्यताम्।
इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नमः॥ (3 पुनरावृत्ति)
अस्मत्सखा अमुकशमार् अमुकसगोत्रो वसुरूपस्तृप्यताम्।
इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नमः॥ (3 पुनरावृत्ति)
अस्मद् आप्तपुरुषः (सम्मानीय पुरुष) अमुकशमार् अमुकसगोत्रो वसुरूपस्तृप्यताम्।
इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नमः॥ (3 पुनरावृत्ति)
अस्मद् पतिः अमुकशमार् अमुकसगोत्रो वसुरूपस्तृप्यताम्।
इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नमः॥ (3 पुनरावृत्ति)
निम्न मन्त्रों से पूर्व विधि से प्राणि मात्र की तुष्टि के लिए जल धार छोड़ें :-
ॐ देवासुरास्तथा यक्षा, नागा गन्धवर्राक्षसाः। 
पिशाचा गुह्यकाः सिद्धाः, कूष्माण्डास्तरवः खगाः॥
जलेचरा भूनिलया, वाय्वाधाराश्च जन्तवः। 
प्रीतिमेते प्रयान्त्वाशु, मद्दत्तेनाम्बुनाखिलाः॥
नरकेषु समस्तेषु, यातनासुु च ये स्थिताः। 
तेषामाप्यायनायैतद्, दीयते सलिलं मया॥
ये बान्धवाऽबान्धवा वा, येऽ न्यजन्मनि बान्धवाः। 
ते सवेर् तृप्तिमायान्तु, ये चास्मत्तोयकांक्षिणः॥
आब्रह्मस्तम्बपयर्न्तं, देवषिर्पितृमानवाः। 
तृप्यन्तु पितरः सवेर्, मातृमातामहादयः॥
अतीतकुलकोटीनां, सप्तद्वीपनिवासिनाम्। 
आब्रह्मभुवनाल्लोकाद्, इदमस्तु तिलोदकम्॥
ये बान्धवाऽबान्धवा वा, येऽ न्यजन्मनि बान्धवाः। 
ते सवेर् तृप्तिमायान्तु, मया दत्तेन वारिणा॥
श्राद्ध पितृ तर्पण ::
(1). पितृ पक्ष का (महालय पक्ष) का महत्त्व :: वृश्चिक राशिमें प्रवेश करनेसे पूर्व, जब सूर्य कन्या एवं तुला राशि में होता है, वह काल महालय कहलाता है।
इस कालावधि में पितर यम लोक से आकर अपने परिवार के सदस्यों के घर में वास करते हैं। इसीलिए शक संवत अनुसार भाद्र पद कृष्ण प्रतिपदासे भाद्रपद अमावास्या तक के एवं विक्रम संवत अनुसार आश्विन कृष्ण प्रतिपदा से आश्विन अमावस्या तक के पंद्रह दिनकी कालावधि में पितृ तर्पण एवं तिथि के दिन पितरोंका श्राद्ध अवश्य करना चाहिए ।
ऐसा करनेसे पितृव्रत यथा सांग पूरा होता है। इसीलिए यह पक्ष पितरोंको प्रिय है। इस पक्षमें पितरोंका श्राद्ध करनेसे वे वर्ष भर तृप्त रहते हैं। जो लोग पितृ पक्ष में कुछ कारण वश महालय श्राद्ध नहीं कर पाते, उन्हें पितृ पक्ष के उपरांत सूर्य के वृश्चिक राशिमें प्रवेश करने से पहले तो महालय श्राद्ध करना ही चाहिए।
श्राद्धं कन्यागते भानौ यो न कुर्याद् गृहाश्रमी। 
धनं पुत्राः कुततस्य पितृकोपाग्निपीडनात्॥
यावच्च कन्यातुलयोः क्रमादास्ते दिवाकरः। 
शून्यं प्रेतपुरं तावद् यावद् वृश्चिकदर्शनम्॥ 
कन्या राशि में सूर्य के रहते, जो गृहस्थाश्रमी श्राद्ध नहीं करता, उसे पितरों की कोपाग्नि के कारण धन, पुत्र इत्यादि की प्राप्ति कैसे होगी? उसी प्रकार सूर्य जब तक कन्या एवं तुला राशियों से वृश्चिक राशि में प्रवेश नहीं करता, तब तक पितृ लोक रिक्त रहता है।[महाभारत]
पितृ लोक के रिक्त रहने का अर्थ है, उस काल में कुल के सर्व पितर आशीर्वाद देनेके लिए अपने वंशजों के समीप आते हैं। वंशजों द्वारा श्राद्ध न किए जानेपर शाप देकर चले जाते हैं। अतः इस कालमें श्राद्ध करना महत्त्वपूर्ण है।
(2). पितृ पक्ष अर्थात महालय में श्राद्ध के लिए आने वाले पितर गण :: (2.1). पितृ त्रय-पिता, दादा, पर दादा, (2.2). मातृ त्रय-माता, दादी, पर दादी, (2.3). सापत्न माता-सौतेली माँ, (2.4). माता मह त्रय :- माँ के पिता, नाना एवं परनाना, (2.5). माता मही त्रय-माँ की माताजी, नानी एवं पर नानी, (2.6). भार्या, पुत्र, पुत्रियां, चाचा, मामा, भाई, बुआ, मौसियां बहनें, ससुर, अन्य आप्तजन, (2.7). श्राद्ध कर्ता किसी के शिष्य हों, तो गुरु और (2.8). श्राद्धकर्ता किसी के गुरु हों, तो शिष्य।
यह स्पष्ट है कि मनुष्य मृत्यु के पश्चात पुनर्जन्म लेकर पुनः-पुनः उसी परिवार में तब तक आता है जब तक कि उसके उस परिवार सम्बन्धी संस्कार उपस्थित हैं। मृत्यु के उपरांत भी जीव के सुख एवं उन्नति से संबंधित इतना गहन अभ्यास केवल हिन्दु धर्म ने ही किया है।
(3). भरणी श्राद्ध :: गया जाकर श्राद्ध करनेपर जो फल मिलता है, वही फल पितृ पक्ष के भरणी नक्षत्र पर करने से मिलता है। भरणी श्राद्ध, वर्ष श्राद्ध के पश्चात् करना चाहिए। वर्ष श्राद्ध से पूर्व सपिंडीकरण (सपिंडी) श्राद्ध किया जाता है। तत्पश्चात् भरणी श्राद्ध करने से मृतात्मा को प्रेत योनि से छुड़ाने में सहायता मिलती है। यह श्राद्ध प्रत्येक पितृ पक्ष में करना चाहिए। पूर्वजों का भूत, प्रेत, पिशाच योनि में होना अहितकर है।
कालानुरूप प्रचलित पद्धतिनुसार व्यक्ति की मृत्यु होने के पश्चात् 12 वें दिन ही सपिंडी करण श्राद्ध किया जाता है। व्यक्ति की मृत्यु के पश्चात् उस वर्ष पड़ने वाले पितृ पक्ष में ही भरणी श्राद्ध भी कर सकते हैं ।
(4). सर्व पित्री अमावस्या :: यह पितृ पक्ष की अमावस्या का नाम है। इस तिथि पर कुल के सर्व पितरों को उद्देशित कर श्राद्ध करते हैं। वर्ष भर में सदैव एवं पितृ पक्ष की अन्य तिथियों पर श्राद्ध करना संभव न हो, तब भी इस तिथि पर सबके लिए श्राद्ध करना अत्यंत आवश्यक है; क्योंकि पितृ पक्ष की यह अंतिम तिथि है।
शास्त्र में बताया गया है कि श्राद्ध के लिए अमावस्या की तिथि अधिक उचित है, जबकि पितृ पक्ष की अमावस्या सर्वाधिक उचित तिथि है।
इस दिन प्रायः सभी घरों में कम से कम एक ब्राह्मण को तो भोजन का निमंत्रण दिया ही जाता है। उस दिन मछुआरे, ठाकुर, बुनकर, कुनबी इत्यादि जातियों में पितरों के नाम से भात का अथवा आटे का पिंड दान दिया जाता है और अपनी ही जाति के कुछ लोगों को भोजन कराया जाता है। इस दिन ब्राह्मणों को सीधा (अन्न सामग्री) देने की भी परंपरा प्रचलित है।
(5). पितृ पक्ष में भगवान् दत्तात्रेय का नाम जपने का महत्त्व :: पितृ पक्ष में श्री गुरु देव दत्त का नाम जप अधिकाधिक करने से पितरों को गति प्राप्त होने में सहायता मिलती है।
(6). परिवार में किसी की मृत्यु होने पर उस वर्ष महालय श्राद्ध न करना :: परिवार में जिस व्यक्ति के पिता अथवा माता की मृत्यु हो गई हो, उस श्राद्ध कर्ता को उनके लिए उनके देहांत के दिन से आगे एक वर्ष तक महालय श्राद्ध करने की आवश्यकता नहीं होती; क्योंकि उनके लिए वर्ष भर में श्राद्ध कर्म किया ही जाता है।
श्राद्ध कर्ता पुत्र के अतिरिक्त अन्यों को, यथा श्राद्ध कर्ता के चचेरे भाई एवं जिन्हें सूतक लगता है, ऐसे लोगों को अपने पिता इत्यादि के लिए प्रति वर्ष की भाँति महालय श्राद्ध करना चाहिए। किंतु, सूतक के दिनों में महालय पक्ष पडने पर श्राद्ध न करें। सूतक समाप्त होने पर आने वाली अमावस्या पर श्राद्ध अवश्य करें।
(7). महालय श्राद्ध के लिए आमंत्रित ब्राह्मण :: महालय श्राद्ध के समय प्रत्येक पितर के लिए एक ब्राह्मण होना चाहिए। ब्राह्मण को पितृ स्थान पर बिठाकर देवस्थान पर शालिग्राम अथवा बाल कृष्ण की मूर्ति, प्रतिमा, तस्वीर रखें। देवस्थान पर बाल कृष्ण एवं पितृ स्थान पर दर्भ रखें अथवा दोनों ही स्थानों पर दर्भ रखें। इसे चट अथवा दर्भ बटु (कुश से बनी कूँची) कहते हैं। चट रखकर किए गए श्राद्ध को चट श्राद्ध कहते हैं। इस श्राद्ध में दक्षिणा भी देते हैं।
श्राद्ध से पितरों की पूर्ती ::
नारद जी कहते हैं :– अर्जुन! इसके बाद राजा करन्धम ने महाकाल से पूछा :-भगवन! मेरे मन में सदा ये संशय रहता है कि मनुष्यों द्वारा पितरों का जो तर्पण किया जाता है, उसमें जल तो जल में ही चला जाता है; फिर हमारे पूर्वज उससे तृप्त कैसे होते हैं? इसी प्रकार पिंड आदि का सब दान भी यहीं देखा जाता है। अतः हम यह कैसे कह सकते हैं कि यह पितर आदि के उपभोग में आता है?
महाकाल ने कहा :– राजन! पितरों और देवताओं की योनि ही ऐसी होती है कि वे दूर की कही हुई बातें सुन लेते हैं, दूर की पूजा भी ग्रहण कर लेते हैं और दूर की स्तुति से भी संतुष्ट होते हैं। इसके सिवा ये भूत, भविष्य और वर्तमान सब कुछ जानते और सर्वत्र पहुचते हैं। पाँच तन्मात्राएँ, मन, बुद्धि, अहंकार और प्रकृति, इन नौ तत्वों का बना हुआ उनका शरीर होता है। इसके भीतर दसवें तत्व के रूप में साक्षात् भगवान् पुरुषोत्तम निवास करते हैं। इसलिए देवता और पितर गंध तथा रस तत्व से तृप्त होते हैं। शब्द तत्व से रहते हैं तथा स्पर्श तत्व को ग्रहण करते हैं और किसी को पवित्र देख कर उनके मन में बड़ा संतोष होता है। जैसे पशुओं का भोजन तृण और मनुष्यों का भोजन अन्न कहलाता है, वैसे ही देव योनियों का भोजन अन्न का सार तत्व है। सम्पूर्ण देवताओं की शक्तियाँ अचिन्त्य एवं ज्ञानगम्य हैं। अतः वे अन्न और जल का सार तत्व ही ग्रहण करते हैं, शेष जो स्थूल वस्तु है, वह यहीं स्थित देखी जाती है।
करन्धम ने पूछा :– श्राद्ध का अन्न तो पितरों को दिया जाता है, परन्तु वे अपने कर्म के अधीन होते हैं। यदि वे स्वर्ग अथवा नर्क में हों, तो श्राद्ध का उपभोग कैसे कर सकते हैं? और वैसी दशा में वरदान देने में भी कैसे समर्थ हो सकते हैं ?
महाकाल ने कहा :– नृपश्रेष्ठ! यह सत्य है कि पितर अपने अपने कर्मों के अधीन होते हैं, परन्तु देवता, असुर और यक्ष आदि के तीन अमूर्त तथा चार वर्णों के चार मूर्त; ये सात प्रकार के पितर माने गए हैं। ये नित्य पितर हैं, ये कर्मों के अधीन नहीं, ये सबको सब कुछ देने में समर्थ हैं। वे सातों पितर भी सब वरदान आदि देते हैं। उनके अधीन अत्यंत प्रबल इकतीस गण होते हैं। राजन! इस लोक में किया हुआ श्राद्ध उन्ही मानव पितरों को तृप्त करता है। वे तृप्त होकर श्राद्धकर्ता के पूर्वजों को जहाँ कहीं भी उनकी स्थिति हो, जाकर तृप्त करते हैं। इस प्रकार अपने पितरों के पास श्राद्ध में दी हुई वस्तु पहुँचती है और वे श्राद्ध ग्रहण करने वाले नित्य पितर ही श्राद्ध कर्ताओं को श्रेष्ठ वरदान देते हैं।
राजा ने पूछा :– विप्रवर! जैसे भूत आदि को उन्हीं के नाम से "इदं भूतादिभ्यः" कह कर कोई वस्तु दी जाती है, उसी प्रकार देवता आदि को संक्षेप में क्यों नहीं दिया जाता है? मंत्र आदि के प्रयोग द्वारा विस्तार क्यों किया जाता है?
महाकाल ने कहा :– राजन! सदा सबके लिए उचित प्रतिष्ठा करनी चाहिए। उचित प्रतिष्ठा के बिना दी हुई कोई वस्तु देवता आदि ग्रहण नहीं करते। घर के दरवाजे पर बैठा हुआ कुत्ता, जिस प्रकार ग्रास (फेंका हुआ टुकड़ा) ग्रहण करता है, क्या कोई श्रेष्ठ पुरुष भी उसी प्रकार ग्रहण करता है? इसी प्रकार भूत आदि की भाँति देवता कभी अपना भाग ग्रहण नहीं करते। वे पवित्र भोगों का सेवन करने वाले तथा निर्मल हैं। अतः अश्रद्धालु पुरुष के द्वारा बिना मन्त्र के दिया हुआ जो कोई भी हव्य भाग होता है, उसे वे स्वीकार नहीं करते। यहाँ मन्त्रों के विषय में श्रुति भी इस प्रकार कहती है :-
"सब मन्त्र ही देवता हैं, विद्वान पुरुष जो जो कार्य मन्त्र के साथ करता है, उसे वह देवताओं के द्वारा ही संपन्न करता है। मंत्रोच्चारण पूर्वक जो कुछ देता है, वह देवताओं द्वारा ही देता है। मन्त्र पूर्वक जो कुछ ग्रहण करता है, वह देवताओं द्वारा ही ग्रहण करता है। इसलिए मंत्रोच्चारण किये बिना मिला हुआ प्रतिग्रह न स्वीकार करे। बिना मन्त्र के जो कुछ किया जाता है, वह प्रतिष्ठित नहीं होता"।
इस कारण पौराणिक और वैदिक मन्त्रों द्वारा ही सदा दान करना चाहिए।
राजा ने पूछा :- कुश, तिल, अक्षत और जल, इन सब को हाथ में लेकर क्यों दान दिया जाता है? मैं इस कारण को जानना चाहता हूँ।
महाकाल ने कहा :- राजन! प्राचीन काल में मनुष्यों ने बहुत से दान किये और उन सबको असुरों ने बलपूर्वक भीतर प्रवेश करके ग्रहण कर लिया। तब देवताओं और पितरों ने ब्रह्मा जी से कहा :- "स्वामिन! हमारे देखते-देखते दैत्यलोग सब दान ग्रहण कर लेते हैं। अतः आप उनसे हमारी रक्षा करें, नहीं तो हम नष्ट हो जायेंगे"। तब ब्रह्मा जी ने सोच विचार कर दान की रक्षा के लिए एक उपाय निकला। पितरों को तिल के रूप में दान दिया जाए, देवताओं को अक्षत के साथ दिया जाए तथा जल और कुश का सम्बन्ध सर्वत्र रहे। ऐसा करने पर दैत्य उस दान को ग्रहण नहीं कर सकते। इन सबके बिना जो दान किया जाता है, उस पर दैत्य लोग बलपूर्वक अधिकार कर लेते हैं और देवता तथा पितर दुखपूर्वक उच्ह्वास लेते हुए लौट जाते हैं। वैसे दान से दाता को कोई फल नहीं मिलता। इसलिए सभी युगों में इसी प्रकार (तिल, अक्षत, कुश और जल के साथ) दान दिया जाता है।
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संतोष महादेव-धर्म विद्या सिद्ध व्यास पीठ 
(बी ब्लाक, सैक्टर 19, नौयडा)

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