Sunday, October 25, 2015

PENANCES, VED STUDY, ASCETICS, ENLIGHTENMENT प्रायश्चित्त, वेदाभ्यास, तप, ज्ञान की महत्ता, पाप, यज्ञ :: MANU SMRATI (11) मनुस्मृति

MANU SMRATI (11) मनुस्मृति
(प्रायश्चित्त, वेदाभ्यास, तप और ज्ञान की महत्ता, पाप)
CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM
By :: Pt. Santosh Bhardwaj
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ॐ गं गणपतये नम:।  
अक्षरं परमं ब्रह्म ज्योतीरूपं सनातनम्।
गुणातीतं निराकारं स्वेच्छामयमनन्तजम्॥
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि
[श्रीमद्भगवद्गीता 2.47]
इस अध्याय में जाने-अनजाने विहित कर्मों का त्याग और निषिद्ध कर्मों का अनुष्ठान करने पर प्रायश्चित्तों का, माँस आदि अभक्ष्य-भक्षण, मदिरा आदि सेवन तथा अगम्यागमन प्रभृति पातकों, गोवध, ब्रह्महत्या प्रभृति और महापातकों के करने पर उनके दण्डस्वरूप प्राजापत्य, अतिकृच्छ्र तथा चान्द्रायण प्रभृति विविध प्रायश्चित्तों का, वेदाभ्यास, तप और ज्ञान की महत्ता आदि का वर्णन हुआ है।
सान्तानिकं यक्ष्यमाणमध्वगं सार्ववेदसम्।
गुर्वर्थं पितृमात्र्यर्थं स्वाध्यायार्थ्युपतापिनः॥11.1॥
नैवतान्स्नातकान्विद्याद् ब्राह्मणान्धर्मभिक्षुकान्।
निःस्वेभ्यो देयमेतेभ्यो दानं विद्याविशेषतः॥11.2॥ 
सन्तान की इच्छा रखने वाला, यज्ञ करने की इच्छा वाला, पथिक (राहगीर), सर्वस्व दान देकर यज्ञ करने वाला, गुरु (विद्या प्रदान करने वाला) और माता-पिता के भरण-पोषण के लिये धन चाहने वाला, वेद पढ़ने वाला और रोगी व्यक्ति, धर्म भिक्षुक, ब्राह्मण स्नातक हैं अर्थात इनको स्नातक के समान समझें। इन निर्धनों को विद्या और योग्यता के अनुसार धन देना चाहिये।
One desirous of progeny, performance of Yagy, traveller, one performing Yagy by donating everything he has, the Guru, one who need money for his parents subsistence, learner of Veds, diseased, hermit and the Brahman should be considered like a celibate-Brahmchari asking alms and should be helped as per their status :- learning and ability; after examining whether they are worthy or not.
These nine categories of people requesting help should be granted alms by considering them to be Graduates in learning and Brahmans.
एतेभ्यो हि द्विजाग्र्येभ्यो देयमन्नं सदक्षिणम्।
इतरेभ्यो बहिर्वेदि कृतान्नं देयमुच्यते॥11.3॥
इन द्विजों श्रेष्ठ ब्राह्मणों को दक्षिणा से सहित अन्न देना चाहिये। इनसे भिन्न ब्राह्मणों को वेदी के बाहर सिद्ध अन्न देना चाहिये। 
The upper castes among these, the learned-enlightened Brahman should be given Dakshina-alms with food grain. Any other Brahman present there may be given food grain, which has been used for worship out side the sacred fire place.
सर्वरत्नानि राजा तु यथार्हं प्रतिपादयेत्।
ब्राह्मणान्वेदविदुषो यज्ञार्थं चैव दक्षिणाम्॥11.4॥
राजा यज्ञ के लिये वेद के जानने वाले ब्राह्मण को यथायोग्य सभी रत्न और दक्षिणा देवे। 
The king should bestow-grant valuable jewels, money & clothing to those Brahmans who are well versed with the Vedic procedures for performing Yagy.
कृतदारोऽपरान्दारान् भिक्षित्वा योऽधिगच्छति।
रतिमात्रं फलं तस्य द्रव्यदातुस्तु संततिः॥11.5॥
जो विवाह करके, फिर भिक्षा माँगकर दूसरा विवाह करता है, उसे रति मात्र फल होता है। उसकी जो सन्तति वह द्रव्य देने वाले की होती है। 
A person who survives over begging, marries second time with the help of money begged by him, is merely entitled to sex with the second wife. His progeny belongs to the person who donated him money for marriage.
धनानि तु यथाशक्ति विप्रेषु प्रतिपादयेत्।
वेदवित्सु विविक्तेषु प्रेत्य स्वर्गं समश्नुते॥11.6॥
जो पुत्र कलत्रादि से अशक्त वेदज्ञ ब्राह्मणों को धन देता है, वह मरने के बाद स्वर्ग जाता है। 
One who bestow money to a Brahman enlightened with the Veds having no son or wife goes to the heaven after his death.
यस्य त्रैवार्षिकं भक्तं पर्याप्तं भृत्यवृत्तये।
अधिकं वापि विद्येत स सोमं पातुमर्हति॥11.7॥
जिसके पास अपने भृत्यों की वृत्ति के लिये तीन वर्ष या उससे अधिक दिनों के भरण-पोषण के लिये पर्याप्त धन हो, वह सोम यज्ञ कर सकता है। 
One who has sufficient money to pay his servants for three years or more, can conduct Som Yagy.
सोम यज्ञ :: इसका वर्णन यजुर्वेद के चौथे अध्याय से दसवें अध्याय तक सोमयाग के मन्त्रों में निहित है। इसमें वसन्त ऋतु में सोमलता-सोमवल्ली का प्रयोग करके 16 ऋत्विक ब्राह्मणों द्वारा एक ही  सम्पन्न किया जाता है।
सोमयज्ञ के मुख्य सात प्रकार हैं, जिन्हें सप्त सोम संस्था कहा जाता है। अग्निष्टोम, अत्याग्निष्टोम्, अतिरात्र (उलथ्य), षोडषीनम्अ, तिरात्र, आप्तोर्याम और वाजपेय। हर अग्निहोत्री का सर्वोच्च सोपान होता है, वाजपेय सोमयाग।
सोमयज्ञ के दरम्यान सोम रस का हवन जो मुय वेदि (कुण्ड का एक प्रकार) के उपर होता है जिसे उत्तर वेदी कहा जाता है। सामान्यतः उत्तरवेदी कि आकार चोरस होता है, परंतु अग्नि चयन के सहित हुए सोमयज्ञ में उत्तर वेदी का आकार गरुड़ जैसा होता है। इसलिए अग्नि चयन को गरुड़ चयन भी कहते हैं। अग्नि चयन या गरुड़ चयन तीन प्रकार से होता है। प्रथम प्रकार में एक हज़ार ईंटों के द्वारा वेदि बनाई जाती है, दूसरे प्रकार में दो हज़ार ईंटों द्वारा वेदी बनाई जाती है और तीसरे प्रकार में तीन हज़ार ईंटों के द्वारा वेदी बनाई जाती है। यह ईंटें भी यज्ञकर्ता की उंगली के नाप के अनुसार ही बनाई जाती हैं। इन एक हज़ार ईंटों को संस्कृत में इष्टिका कहा जाता है, जिन्हें पाँच स्तर में रखा जाता है। हर एक स्तर में 200 ईंटें रखी जाती हैं। हर एक ईंट के लिए एक मंत्र होता है। एक हज़ार ईंटों के लिए एक हज़ार मंत्र होते हैं। इस गरुड़ वेदी के अंदर शेषशायी भगवान् श्री हरी विष्णु की स्वर्ण की मूर्ति की स्थापित की जाती है।
सोमयज्ञ स्थल समग्र ब्रह्मांड के केन्द्र का स्वरूप धारण कर लेता है। समग्र तीर्थ मंडप में वास करते हैं। सोमयज्ञ की परिक्रमा समग्र ब्रह्मांड की परिक्रमा का फल देती है। साधक जातक 108  से लेकर 1,008 तक सोमयज्ञ की परिक्रमा करते हैं। सोमयज्ञ का माहात्म्य निःसंतान दंपतियों में विशेष है। निःसंतान दंपतियों का सोमयज्ञ संलग्न महाविष्णुयाग भाग लेकर दीक्षित और दीक्षित पत्नी से आशीर्वाद लेना चाहिये। सोमयज्ञ में किया हुआ दान अनेक गुना फल देता है।  सोमयज्ञ में स्वर्णदान का विशिष्ट महत्व है। 
अतः स्वल्पीयसि द्रव्ये यः सोमं पिबति द्विजः।
स पीतसोमपूर्वोऽपि न तस्याप्नोति तत्फलम्॥11.8॥
इससे अल्प द्रव्य में जो द्विज सोमयज्ञ को करता है, वह पहले किये किये हुए सोमयज्ञ के फल को नहीं पाता है। 
Dwij, Swarn-upper caste who conduct this Yagy with insufficient funds-money is deprived off the reward of performing Som Yagy earlier as well. 
Lack of money would lead to abandoned Yagy and non payment of salary to servants, as well Dakshina to Brahmans-Ritvij, inviting undue trouble. 
शक्तः परजने दाता स्वजने दुःखवजीविनि
मध्वापातो विषास्वादः स धर्मप्रतिरूपकः॥11.9॥
जो दाता (दान देने वाला) अपने आत्मीयों को दुःखी देखता हुए भी; दूसरों को दान देता है, वह दान धर्म का वास्तविक स्वरूप नहीं जानता। मधु के सदृश दिखने पर भी परिणाम में यह विष समान होता है। 
The donor who donate money, prefer charity ignoring his near & dear undergoing trouble, pain, sorrow for lack money, is ignorant and do not know the gist of donation. The out come of any Yagy in such a state, though appears to be like nectar-elixir, but in reality, it is like poison in yield.
Charity begins at home. One should move from family to neighbourhood followed by village, state, country & the international boundaries respectively. Ensure that donated money never passes on to non deserving, drunkards, sinners, terror mongers. 
भृत्यानामुपरोधेन यत् करोत्यौर्ध्वदेहिकम्।
तद्भवत्यसुखौदर्कं जीवतश्च मृतस्य च॥11.10॥
वृद्धौ च मातपितरौ साध्वी भार्या शिशु: सुत:। 
अप्यकार्यशतं कृत्वा भरतवय मनुरब्रवीत्॥11.10.1॥  
जो भरण-पोषण पाने योग्य लोगों को कष्ट देकर, अपने परलोकार्थ दानादि करता है, उसका यह कर्म इहलोक और परलोक दोनों में कहीं भी सुख का हेतु नहीं होता। वृद्ध माता-पिता, पतिव्रता स्त्री, पुत्र बालक इनका अकार्य करके भी पालन-पोषण करें, ऐसा मनु ने कहा है। 
One who resort to donations-charity by depriving his dependants, letting them undergo distress, pains, tortures, financial difficulties-troubles; for improving his next birth is deprived of all comforts-pleasures in this birth as well in the next world.
Manu has doctrined that one should earn through means which do not match his Varn, to support his parents, devoted wife, son and the children; if he fails earn as per his own status-caste, Varn. 
यज्ञश्चेत्प्रतिरुद्धः स्यादेकेनाङ्गेन यज्वनः।
ब्राह्मणस्य विशेषेन धार्मिके सति राजनि11.11॥
यो वैश्यः स्याद् बहुपशुर्हीनक्रतुरसोमपः।
कुटुम्बात्तस्य तद् द्रव्यमाहरेद्यज्ञ सिद्धये11.12॥
धार्मिक राजा के रहते यज्ञ करने वालों का विशेषकर ब्राह्मण का यज्ञ यदि एक अंग से अपूर्ण रह जाये तो जिस वैश्य के यहाँ बहुत पशु हों और जो यश से हीन हो और सोम न किया हो तो उस वैश्य के कुटुम्ब से उसका धन यज्ञ सिद्धि के लिये ले लेवे। 
If the country is ruled by a righteous king and the Yagy conducted by some one, remain incomplete specifically by a Brahman for want of money, the king may take money from a Vaeshy having numerous cattle, has no pious-virtuous deeds to his credit, has not performed Som Yagy or other holy sacrifices in fire, for the completion of the Yagy.
The scriptures have prescribed that a businessman has to spend 1/6th  of his earnings over charity, donations, digging of ponds, opening hospitals, supporting Guru's Ashram, road side inn for travellers, tree plantation and performance of Yagy, supporting learned-enlightened Brahmns etc.
आहरेत्त्रीणि वा द्वे वा कामं शूद्रस्य वेश्मनः।
न हि शूद्रस्य यज्ञेषु कश्चिदस्ति परिग्रहः11.13॥
यदि यज्ञ के दो या तीन अंग शेष रह जायें तो उनकी पूर्ति के लिये  शूद्र के घर से बलपूर्वक धन ले आये, क्योंकि शूद्र का यज्ञ से किसी तरह का सम्बन्ध नहीं है। 
If two or three organs of Yagy remain unfinished the performer may take money from a Shudr even by force, since the Shudr has nothing to do with Yagy.
In reality the Shudr is not supposed to have accumulated money. But a branch of Shudr, Dasyu-Thugs are engaged in robbery, dacoity, loot etc. The money with them may be confiscated by the state for holy purposes, social welfare, after punishing them.
योऽनाहिताग्निः शतगुरयज्वा च सहस्रगुः।
तयोरपि कुटुम्बाभ्यामाहरेदविचारयन्11.14॥
जो एक सौ गाय रखकर अग्निहोत्र न करता हो और जो एक हजार गौ रखकर यज्ञ न करता हो, उसके घर से भी बिना विचार के ही धन यज्ञ पूर्ति के लिये ले ले। 
One who do not conduct Agnihotr in spite of having 100 cows and the other who do not perform Yagy even after possessing 1,000 cows are liable to compensate for the completion of the remaining portions of Yagy.
आदाननित्याच्चादातुराहरेदप्रयच्छतः।
तथा यशोऽस्य प्रथते धर्मश्चैव प्रवर्धते11.15॥
यज्ञ के लिये धन माँगने पर भी जो न देवे, उसका धन हरण कर लेना चाहिये। इससे हरण करने वाले को यश, धर्म दोनों की वृद्धि होती है। 
One who do not contribute for a Yagy on being requested-prayed, deserve to be put to extraction of money from him by the state. One who gets money from such people for conducting Yagy get honour and Dharm.
Normally, Yagy, sacrifices are community services performed by all the Varn together by contributing without hesitation, willingly. Young and old alike go from door to door to receive contributions. Though the state has no direct involvement, above postulates are strictly observed in a pious state. Yagy is meant for the welfare of the entire community, not a single person or just the one who organised it.
तथैव सप्तमे भक्ते भक्तानि षडनश्नता।
अश्वस्तनविधानेन हर्तव्यं हीनकर्मणः11.16॥
जो व्यक्ति छः शाम उपवास पर हो उसे सातवें उपवास को (याने छोटे दिन) भोजन करने के लिये भोज्य पदार्थ, यदि वह हीन कर्म करने वाले मनुष्य के घर से चुरा भी लेता है, तो उसे इसका दोष नहीं लगता। 
One who has not received meals consecutively for 6 times i.e., three days continuously but gets no food, he is not stained-slurred even if he eats food by stealing from the house of a depraved, low caste.
Its the duty of the state to ensure that each and every citizen gets regular food, work to do and survive freely without the fear of goons, criminals, politicians. Still one must prefer not to steal. Instead he should avoid a fast for which he has to steal. 
खलात्क्षेत्रादगाराद्वा यतो वाप्युपलभ्यते।
आख्यातव्यं तु तत्तस्मै पृच्छते यदि पृच्छति11.17॥
खलियान (जहाँ अन्न बैलों से दाँय चलाकर निकला जाये) से खेत से, घर से या अन्य किसी स्थान से अन्न चुराकर ले आये, तो यदि उस अन्न का स्वामी पूछे तो उसे  चुराने के कारण ठीक-ठीक बतला देना चाहिये। 
One who steals food grain from the threshing-floor (harvested fields), house or any other place and caught, should reveal the true reason for stealing the food.
ब्राह्मणस्वं न हर्तव्यं क्षत्रियेण कदाचन।
दस्युनिष्क्रिययोस्तु स्वमजीवन्हर्तुमर्हति11.18॥
क्षत्रिय कभी भी ब्राह्मण के धन का हरण न करे। यदि ब्राह्मण अपने धर्मादि क्रियाओं से च्युत हो गए हों और निषिद्ध कर्म करते हों, तो उनके धन को ले सकते हैं। 
A Kshtriy should never take the money of a Brahman. But if he is starving & the Brahman has discarded his Dharm, his money may be confiscated, fore fitted, taken-accepted by him.
योऽसाधुभ्योऽर्थमादाय साधुभ्यः सम्प्रयच्छति।
स कृत्वा प्लवमात्मानं संतारयति तावुभौ11.19॥
जो मनुष्य दुष्टों से धन लेकर सज्जनों को देता है, वह अपने को नौका बनाकर उस दोनों को (दुखों से) तार देता है। 
One who seeks-takes money from the wicked and bestows it on the virtuous, helps in releasing both of them from troubles-sins, misfortune like a boat.
If the money of the wretched is used to help the needy, it leads to reduction in his sins and improve his next birth. The money obtained by the needy helps him in over coming distress, misfortune, improving his current birth.
यद्धनं यज्ञशीलानां देवस्वं तद्विदुर्बुधाः।
अयज्वनां तु यद्वित्तमासुरस्वं तदुच्यते11.20॥
यज्ञ करने वालों के धन को पंडित-ज्ञानी देवधन और यज्ञ नहीं करने वालों के धन को आसुर (राक्षसी) धन कहते हैं। 
The money of those who conduct Yagy is called Pious money, meant for the demigods-deities while money of those who do not spend it over it Yagy is titled demonic.
 
न तस्मिन्धारयेद्दण्डं धार्मिकः पृथिवीपतिः।
क्षत्रियस्य हि बालिश्याद् ब्राह्मणः सीदति क्षुधा11.21॥
इसलिये इसमें अर्थात इस धन के चोरी जाने पर चोरों को धार्मिक राजा दण्ड न दे, क्योंकि राजा की मूर्खता से ही ब्राह्मण भूख से कष्ट पाते हैं। 
The king-state should not punish the guilty who steals the money for religious purposes-Yagy, donations, charity since it happens due to the neglect, carelessness of the king and the Brahmns suffer from hunger.
Who so ever steals the money meant for religious purposes, Yagy Hawan, Holy sacrifices in fire, donations, charity, helping the poor-needy; turn into a sinner automatically and suffer due to it.
तस्य भृत्यजनं ज्ञात्वा स्वकुटुम्बान्महीपतिः।
श्रुतशीले च विज्ञाय वृत्तिं धर्म्यां प्रकल्पयेत्11.22॥
ब्राह्मण के परिवार, उसकी विद्या और शील स्वभाव को जानकर राजा अपने कुटुम्ब से धार्मिक वृत्ति कर दे। 
The king should ascertain the size of the Brahman's family, his knowledge and nature and grant stipend so that he is able to survive hunger out of his own family-personal funds, he receives from the state.
कल्पयित्वास्य वृत्तिं च रक्षेदेनं समन्ततः।
राजा हि धर्मषड्भागं तस्मात्प्राप्नोति रक्षितात्11.23॥
उसकी वृत्ति निश्चित करके, राजा सब प्रकार से उस ब्राह्मण की रक्षा करे, क्योंकि उसकी रक्षा करने से उसके धर्म का छटा भाग राजा को मिलता है। 
Having granted stipend-maintenance to the Brahman, the Raja should protect him in all possible manners, since the 1/6th of his virtues-austerities supports the king.
न यज्ञार्थं धनं शूद्राद्विप्रो भिक्षेत कर्हिचित्।
यजमानो हि भिक्षित्वा चण्डालः प्रेत्य जायते11.24॥
यज्ञ करने के लिये ब्राह्मण कभी शूद्र से भिक्षा न माँगे, क्योंकि शूद्र से भिक्षा माँगने वाला ब्राह्मण यज्ञ कर्ता मरने पर चाण्डाल होता है। 
The Brahman should never seek contribution, donations, alms for performing a Yagy from a Shudr. The Brahman who gets alms-Dakshina from a Shudr becomes a Chandal in his next birth.
The Brahmans, Pandits, Pujaris, Purohits, Acharys accept Dan-Dakshina, alms from anyone indiscriminately without distinction or knowledge of their caste-creed or Varn. To be sure they will have to pass through low castes, inferior species in next births. To protect themselves from this penalty, they should put excess fund with them for further charity-helping destitute, poor, needy, distressed.
यज्ञार्थमर्थं भिक्षित्वा यो न सर्वं प्रयच्छति।
स याति भासतां विप्रः काकतां वा शतं समाः11.25॥
यज्ञ के लिए दान प्राप्त कर जो ब्राह्मण पूरा धन यज्ञ में उपयोग नहीं करता, वह सौ वर्ष तक के लिये माँस भक्षी पक्षी-कौआ बनता है। 
The Brahman who do not utilise the full money collected for performing the Yagy is subjected to the species of crow for 100 years in next birth.
The Brahmans, Purohit, Achary should never use the money paid to them for performing a Yagy, to their family's person use. Instead they should use the surplus money obtained in this account for charity.
देवस्वं ब्राह्मणस्वं वा लोभेनोपहिनस्ति यः।
स पापात्मा परे लोके गृध्रौच्छिष्टेन जीवति11.26॥
जो लोभ से देवता के निमित्त अर्पण किये हुए धन को या ब्राह्मण के धन का अपहरण करता है, वह पापात्मा मरने के बाद परलोक में गिद्ध की जूठन से जीता है अर्थात कट्टा, सियार, लोमड़ी, कीड़ा, मकोड़ा, कृमि बनता है। 
A person who by virtue of greed or otherwise steals-snatches, sizes the offering to demigods or belongings of a Brahman, depends-survives over the left over food-meat of dead animals, by the vultures, i.e., becomes a dog, jackal, fox, insect, bird, worm in his next birth. 
This is applicable to all those Brahmans, trustees, care takers of temples who even by mistake use the offerings of a temple to their use. Even those Brahmns who perform worship on salary basis are not spared. The Muslim invaders, the British who took away wealth-money from the temples are sure to have faced the fury of the Almighty. At present the state governments in India are using the offerings of temples to promote Islam and Christianity in states like Karnatak & Keral. The government official who extort money from the temples in Andhr Pradesh and waste it over non deserving, too are sure to be subjected to this treatment in this and next abode-births.The ministers who are behind this should be prepared to face the punishment in present & current birth.
इष्टिं वैश्वानरीं नित्यं निर्वपेदब्दपर्यये।
कॢप्तानां पशुसोमानां निष्कृत्यर्थमसंभवे11.27॥
एक वर्ष बीत जाने पर या दूसरे वर्ष के अन्दर पशु  सोम यज्ञ न कर सके तो उस दोष की शान्ति  के लिये शूद्रादि से धन लेकर वैश्वानर यज्ञ अवश्य करे। 
If one-the Swarn is unable to conduct animal Yagy or Som Yagy after the expiry of one year, he should perform Vaeshwanar Yagy by collecting money from the Shudr to rectify the error caused by the non performance earlier austerities-Yagy.
Seeking-collecting money from the Shudr in itself is a punishment for the upper castes. Animal Yagy does not mean animal sacrifice. Killing animal or meat eating is a taboo in Hinduism. Animal Yagy just means donating cows, horses, elephants, bullocks etc. to deserving Brahmans, along with sufficient Dan-Dakshina, eatables and clothing.
आपत्कल्पेन यो धर्मं कुरुतेऽनापदि द्विजः।
स नाप्नोति फलं तस्य परत्रेति विचारितम्11.28॥
जो द्विज निरापद स्थिति में आपत्कालीन धर्म का अनुष्ठान करता है, वह परलोक में उसका फल नहीं पाता, ऐसा ऋषियों ने विचार कर कहा है। 
The upper caste who resort to the Dharm (working conditions, sacred duties) during emergency, adopts to them in safe-normal conditions, do not get the desired out come of them in the next births, as per the opinion of the Rishis-sages, who doctrined this after deep thought.
विश्वैश्च देवैः साध्यैश्च ब्राह्मणैश्च महर्षिभिः।
आपत्सु मरणाद्भीतैर्विधेः प्रतिनिधिः कृतः11.29॥
विश्वेदेव, साध्यगण और मृत्यु से डरे हुए ब्राह्मणों और महर्षियों ने आपत्काल में वैश्वानर यज्ञ को सोम यज्ञ का प्रतिनिधि कहा है। 
Vishvedev, Sadhygan, humans afraid of death & the Mahrishi have said that the Som Yagy can be substituted by Vaeshwanar Yagy during emergency.
प्रभुः प्रथमकल्पस्य योऽनुकल्पेन वर्तते।
न सांपरायिकं तस्य दुर्मतेर्विद्यते फलम्11.30॥
जो प्रथम कल्प (दान, कर्मादि) के करने में समर्थ होता हुआ भी आपत्कालीन विधि से कर्मादि करता है, उस दुर्बुद्धि को उस कर्म का पाप नाश करने वाला पारलौकिक फल नहीं मिलता। 
If a person (ignorant, unthoughtful, wicked) capable of performing initial duties-Dharm as per scriptures (donations, charity), in spite of having the knowledge of them, resort to the procedure-methodology meant for emergency in discharging his religious duties, is deprived of the reward, which is capable of abolishing his sins in next births.
न ब्राह्मणोSवेदयेत किञ्चिद्राजनि धर्मवित्।
स्ववीर्येणैव ताञ्छिष्यान्मानवानपकारिणः11.31॥
धर्मात्मा ब्राह्मण राजा से किसी के विषय में कुछ न कहे और अपकारियों-अहित करने वालों को अपने सामर्थ्य से दण्ड दे। 
The devoted Brahman should not complain to the king and punish the guilty who tease him, of his ascetic power.
स्ववीर्याद्राजवीर्याच्च स्ववीर्यं बलवत्तरम्।
तस्मात्स्वेनैव वीर्येण निगृह्णीयादरीन्द्विजः11.32॥
अपनी ताकत और राजा की ताकत दोनों में अपना सामर्थ्य ही बली-बलवान होता है। इसलिये ब्राह्मण अपनी ही शक्ति-सामर्थ्य से शत्रुओं का नाश करे। 
Own strength of a Brahman is more reliable as compared to that of the king. Therefore, the Brahmans should destroy the enemy through his own power-strength only.
Even today during democracy as well, its the Brahman who leads a political party to power. He can easily rectify the misdeeds of the rough political party-Congress & now BJP; which implemented reservation. The Brahmans should concentrate and find out the flaws-weaknesses of political parties and enforce their own agenda.
After independance, Nehru a dogmatic Muslim added Pandit to his name and it brought slur to the names of Brhmans. His entire family is a curse of India.
श्रुतीरथर्वाङ्गिरसीः कुर्यादित्यविचारयन्।
वाक्षस्त्रं वै ब्राह्मणस्य तेन हन्यादरीन् द्विजः11.33॥
अथर्ववेद में अङ्गिरा से कही हुई (दुष्टों के नाशार्थ) श्रुति को बिना विचार किये करे। ब्राह्मण की वाणी शस्त्र है, उसी से शत्रुओं का नाश करे। 
The religious-pious, devoted Brahman should practice the hymn uttered in Atharv Ved by Angira for destroying the wicked-culprit without going into its merits or demerits, without hesitation. His voice, speech, utterances are his weapon to destroy-perish the enemy.
The Brahman should raise the issue of reservations at all forums-platforms, where politics is discussed. He should highlight the losses, faults, negativity due to reservations. Now, the time is ripe to support only that party by the Swarn which is determined to wipe off reservations in jobs, educational institutions.
क्षत्रियो बाहुवीर्येण तरेदापदमात्मनः।(तद्धि कुर्वन्य यथाशक्ति प्राप्नोति परमां गतिम्।) धनेन वैश्यशूद्रौ तु जपहोमैर्द्विजोत्तमः11.34॥
विपत्ति को क्षत्रिय बाहुबल द्वारा पार करे। वैश्य और शूद्र धन से तथा ब्राह्मण जप-तप, तपस्या और होम से विपत्ति को टाले। 
The Kshatriy should tide over the difficulty by using his physical strength-muscle power, the Vaeshy & Shudr over come trouble by means of their money while a Brahmn should resort to asceticism, recitation of sacred hymns, holy scarifies in holy fire to swim over the difficult phase.
Misfortunes are cyclical in life. One should never loose heart and keep on striving to come out of it. He should work hard and side by side keep on remembering the Almighty. Sitting for the luck to turn is foolishness.
Every Brahman should resort to asceticism Yog, Yagy, Hawan, prayers etc. regularly without fail.
विधाता शासिता वक्ता मैत्रो ब्राह्मण उच्यते।
तस्मै नाकुशलं ब्रूयान्न शुष्कां गिरमीरयेत्11.35॥
विधाता (शास्त्रोक्त कर्मों को करने वाला), शासिता (शिष्यादिक  शासन करने वाला), वक्ता (प्रायश्चितादि का आदेश देने वाला), मैत्र (सबसे मित्रता करने वाला) ब्राह्मण कहा जाता है। उस ब्राह्मण को किसी को भी अनिष्ट वचन या रुखा वचन नहीं कहना चाहिये। 
The Brahman is Vidhata (one who perform the deeds as per doctrine of the scriptures), Shasita (one who governs the disciple-students, society), Vakta (who asks to ascertain penances), Maetr (one who has friendly relations with all, each & every one). The Brahman should never uttar such words which are indecent, painful, harsh, intolerable or curse anyone.
न वै कन्या न युवतिर्नाल्पविद्यो न बालिशः।
होता स्यादग्निहोत्रस्य नार्तो नासंस्कृतस्तथा11.36॥
कन्या, युवती, थोड़े पढ़े लिखे, मूर्ख, पीड़ित और जिनका यज्ञोपवीत नहीं हुआ है, वे अग्निहोत्र के (होता) हवनीय कार्य न करें। 
Girls, adolescent-young women, low educated & illiterates, idiots, sufferers and those who have not been initiated to Yagyopaveet-sacred thread, should not offer oblations in Agnihotr, sacred holy fire.
Each & every doctrine in Hinduism has a solid footing, foundation, reason, cause which has been given the shape of tradition, ethics since even a person of average intelligence is not capable of understanding them. This is just like one who knows driving car  is unable to repair it. One who knows driving may not navigate the ship or aeroplane or run a train. The women are running over to Sabri Mala Temple in spite of religious sanctions. The stupids are encouraging them. The court & the judges are just like illiterates in this regard. The communists, congressmen-who are basically Muslims, Christian are behind this all.
नरके हि पतन्त्येते जुह्वन्तः स च यस्य तत्।
तस्माद्वैतानकुशलो होता स्याद्वेदपारगः11.37॥
यदि ये लोग हवन करें तो नर्क में जाते हैं और जिसके द्वारा कराये जाते हैं, वो भी नर्क में जाता है। इसलिये जो वैदिक कृत्यों में कुशल हो और वेद का पारङ्गत हो, उसी को होता होना चाहिये। 
If these categories of people perform Yagy, they become entitled for Hell along with one who does it for them. Therefore, only an expert in performing Yagy and learned in Veds should conduct Yagy.
Evidence is available to prove that only those who were expert in a certain branch of Yagy were requested-assigned with the pious but extremely intricate job. This is just like useing computer-mobile keys, where just by pressing one wrong key-button something else appears over the screen.
प्राजापत्यमदत्त्वाश्वमग्न्याधेयस्य दक्षिणाम्।
अनाहिताग्निर्भवति ब्राह्मणो विभवे सति11.38॥
धनिक-अमीर होता भी ब्राह्मण अग्निहोत्र को दक्षिणा में, प्रजापति की दक्षिणा अश्व ने देकर यदि अग्न्याधान करे तो अग्न्याधान न होने के बराबर है। 
A Brahmn who does not offer horse as Dakshina to the performer of Yagy for him, even though rich-wealthy, the Agnihotr becomes null & void for him, since the fee-Dakshina fixed for this performance is a horse to be offered to the Praja Pati.
Normally, people go the learned Brahmans, Palmists, Astrologers and the Vaedy and do not pay sufficient Dakshina and generally expect him to answer their queries free. It is against rules and may harm the inquisitor, in stead of benefiting him. The Vaedy-doctor must be paid for the medicines provided by him, so that he too can maintain his dignity and respectful life. 
पुण्यान्यन्यानि कुर्वीत श्रद्दधानो जितेन्द्रियः।
न त्वल्पदक्षिणैर्यज्ञैर्यजेतेह कथञ्चन11.39॥
श्रद्धा से जितेन्द्रिय होकर अन्य पुण्य कार्यों को करें, किन्तु कभी भी अल्प दक्षिणा देकर यज्ञ न करायें। 
One should perform all pious, sacred, holy sacrifices-deeds, jobs by controlling sense organs and ascertain that sufficient Dakshina-fees, fit for the job has been paid to the Purohit, performer.
During pilgrimage, holy sacrifices, prayers, Yagy, Hawan, Agnihotr, listening-narrating sacred text; exercise full control over sense organs, sensuality, sexuality, passions etc. etc. Try to conduct the performance till end, never leave it in between.
इन्द्रियाणि यशः स्वर्गमायुः कीर्तिं प्रजाः पशून्।
हन्त्यल्पदक्षिणो यज्ञस्तस्मान्नाल्पधनो यजेत्11.40॥
यज्ञ में थोड़ी दक्षिणा देने से इन्द्रिय, यश, स्वर्ग, आयु, कीर्ति, प्रजा और पशुओं का नाश होता है, इसलिये अल्प दक्षिणा देकर यज्ञ न करे। 
Offering of low Dakshina may lead to the loss of organs-senses, fame-honour, elevation to heaven, age-longevity, subjects and the cattle.
Prior to holding Yagy one must ascertain that he is capable of liberal offerings. The money spent for this purpose should have been earned through pious-righteous means.
अग्निहीनो देहदृाष्टं मंत्रहीनस्तु ऋत्विज:
दीक्षितं दक्षिणाहीनो नास्ति यज्ञसमो रिपु:
अन्न हीन अर्थात जिस यज्ञ में अन्न न दिया जाये, वह यज्ञ राष्ट्र का, मंत्रहीन ऋत्विज-ब्राह्मणों का और दक्षिणा से हीन यज्ञ यजमान का नाश करता है। यज्ञ के बराबर कोई शत्रु नहीं है। 
The Yagy conducted by the king which is not followed by offering of food grain-cooked food, destroys the nation-country, state; the priest performing Yagy if he is not well versed with procedure, suitable Mantr and the one who is conducting it for lack of sufficient Dakshina-fees. The Yagy turns into a dreaded enemy if its not conducted through proper procedures, methodology & enchanting of Mantrs.
अग्निहोत्र्यपविध्याग्नीन् ब्राह्मणः कामकारतः।
चान्द्रायणं चरेन्मासं वीरहत्यासमं हि तत्11.41॥
ब्राह्मण अपनी इच्छा से यदि प्रातः और सायंकालिक अग्निहोत्र के हवन को न करे तो एक मास तक चान्द्रायण व्रत करे, क्योंकि अग्निहोत्र न करना पुत्र हत्या का समान है।
If a Brahmn do not perform Agnihotr in the morning and evening out of his own will he, should conduct Chandrayan Vrat-penances pertaining to appease Moon, for a month, since this failure for him is comparable to murder of son.
ये शूद्रादधिगम्यार्थमग्निहोत्रमुपासते।
ऋत्विजस्ते हि शूद्राणां ब्रह्मवादिषु गर्हिताः11.42॥
जो शूद्रों से धन लेकर यज्ञ करते हैं, वे शूद्रों के ऋत्विज-ब्राह्मण और वेदों में निन्दित कहे गए हैं। 
The Brahmn, who conduct Yagy by obtaining money from the Shudr, is titled the Priest of the Shudr and has been censured in Veds.
तेषां सततमज्ञानां वृषलाग्न्युपसेविनाम्।
पदा मस्तकमाक्रम्य दाता दुर्गाणि सन्तरेत्11.43॥
उन मूर्ख ब्राह्मणों जो शूद्रों के धन से अग्निहोत्र करते हैं, के सर पर पैर रखकर वह शूद्र, संसार के सभी दुःखों को पार करता है। 
The Shudr crosses the wordily troubles by putting over his feet over the head of the Brahmans who conduct Agnihotr with his money.
अकुर्वन्विहितं कर्म निन्दितं च समाचरन्।
प्रसक्तश्चैन्द्रियार्थेषु प्रायश्चित्तीयते नरः11.44॥
शास्त्र से विहित कर्म को न करने वाला और निन्दित कार्यों को करने वाला तथा इन्द्रियों को विषयों में आसक्त करने वाला मनुष्य प्रायश्चित्ति होता है। 
One who is inclined to omitting the duties prescribed by the scriptures, performing wretched (wicked, sinful acts, vices) acts without control over sensualities (sexuality, passions, lust, Lasciviousness) is liable to under go penances.
Failure to perform penances for the sinful acts, he is sure to be put, into hells  followed by birth in lower species like insects, worms etc.
अकामतः कृते पापे प्रायश्चित्तं विदुर्बुधाः।
 कामकारकृतेऽप्याहुरेके श्रुतिनिदर्शनात्11.45॥
अनिच्छा से किये हुए पाप का प्रायश्चित होता है, ऐसा पंडितों ने कहा है और इच्छा से किये हुए पाप का प्रायश्चित श्रुति के अनुसार होता है, ऐसा किसी का मत है।
As per doctrine put forward by the scholars-Pandits, the penances are meant for the sins committed unintentionally as per scriptures, but the penances meant for the wilful commuting sins should be carried out as per the Shruti.
Some penances are followed religiously as per the tradition or the decision of the learned in the society. Those who visited foreign countries had to drink Ganga Jal or the Cow's urine. Some were made to eat Cow dung. Meat eaters had to observe fast on Ekadashi. Time changed and more and more people are moving to foreign countries. No one ever really, bother about such penances, these days. Penances have spiritual merits which one should observe as and when he has time for them.
अकामतः कृतं पापं वेदाभ्यासेन शुध्यति।
कामतस्तु कृतं मोहात् प्रायश्चित्तैः पृथग्विधैः11.46॥
अनिच्छा से किया हुआ पाप वेदाभ्यास से  छूट जाता है जो और पाप जानबूझकर इच्छापूर्वक किया जाता है, उसका प्रायश्चित अनेक प्रकार से अलग-अलग होता है।  
The sin committed unintentionally is expiated by practicing Veds (guide lines described in the Veds) & the sins committed wilfully-intentionally can be removed-got rid of, by performing various penances undertaken in various manners discussed in scriptures.
प्रायश्चित्तीयतां प्राप्य दैवात् पूर्वकृतेन वा।
न संसर्गं व्रजेत्सद्भिः प्रायश्चित्तेऽकृते द्विजः11.47॥
प्रायो नाम तपः प्रोक्तं चित्तं निश्चय उच्यते। 
तपोनिश्च्य संयुक्तं  प्रयाश्त्तिमिति स्मृतम् 
प्रायश्चित्ती होने की अवस्था में चाहे वह जन्म पाप अथवा पूर्व जन्मार्जित दुर्दैव हो, प्रायश्चित करने वाला द्विज सज्जनों से संसर्ग न करे। "प्राय" तप और "चित्त" निश्चय  को प्रकट करता है। 
The Dwij-upper caste, who has undergone penances to settle the sins committed in this birth or earlier births, should avoid meeting gentlemen during that phase.
इह दुश्चरितैः केचित्केचित्पूर्वकृतैस्तथा।
प्राप्नुवन्ति दुरात्मानो नरा रूपविपर्ययम्11.48॥
कोई दुरात्मा इस जन्म के दुश्चरित्रों से और कोई पूर्व जन्म के किये हुए पापों से विकृत रूप पाते हैं। 
Some wicked are disfigured due to sins of this birth and yet other due to the sins of their earlier births.
सुवर्णचौरः कौनख्यं सुरापः श्यावदन्तताम्।
ब्रह्महा क्षयरोगित्वं दौश्चर्म्यं गुरुतल्पगः11.49॥
पिशुनः पौतिनासिक्यं सूचकः पूतिवक्त्रताम्।
धान्यचौरोऽङ्गहीनत्वमातिरेक्यं तु मिश्रकः11.50॥
अन्नहर्ताSSमयावित्वं मौक्यं वागपहारकः।
वस्त्रापहारकः श्वैत्र्यं पङ्गुतामश्वहारकः11.51॥
(दीपहर्ता भवेदन्ध: काणों  निर्वापको भवेत्। 
हिंसया रोगित्वम  व्याधि भूयस्त्वम  हिंसया॥)  
सोना चुराने वाले के नाखून खराब होते हैं। शराब पीने वाले के दाँत काले हो जाते हैं। ब्रह्मघात करने वाले को क्षय रोग होता है। गुरु पत्नी से व्यभिचार करने वाले की जननेंद्रिय  का ऊपर का चमड़ा खराब हो जाता है। चुगली करने वाले की नाक से और झूँठी बुराई-निंदा करने वाले के मुँख से दुर्गन्ध आती है। धान्य चुराने वाला अंगहीन हो जाता है। मिलावट करने वाले के अतिरिक्त अंग होते हैं। अन्न का हरण-चोरी करने वाले को मन्दाग्नि हो जाती है। विद्या चुराने वाले को सफ़ेद कोढ़ होता है और घोड़ा चुराने वाला पंगु हो जाता है। (दीपक चुराने वाला अँधा, दीपक बुझाने वाला बहरा, हिंसा करने वाला रोगी और हिंसा न करने वाला निरोगी होता है। 
The nails of one who steal gold become defective. The teeth of a drunkard become black. One who kills a Brahman suffers from tuberculosis. One who rapes his teacher's wife or maintain illicit relations with his teachers wife; suffers venereal diseases.
Foul smell comes out of the nose of one, who back bites or reveal the secrets of his intimates. Foul smell comes out of the mouth of one who spread lies falsehood-wrong information concerning others or his intimates. A person who steals food grain, looses his limbs. Extra limbs-organs grow-develop in the body of one who adulterate. One who snatches or steals food suffers from indigestion-Mandagni. One who steals education, suffers from white leprosy. One who steals horse looses one of his legs. One steals lamp become blind and a person who blow off the lamp so that others are unable to gain from it, become deaf. The violent becomes diseased and a person who shun violence remains fit-fine and healthy. (The meat eaters acquired multiple diseases.)
एवं कर्मविशेषेण जायन्ते सद्विगर्हिताः।
जडमूकान्धबधिरा विकृताकृतयस्तथा11.52॥
इस प्रकार कर्म विशेष के कारण मनुष्य जड़, मूक, अँधा, बहरा और विकृत रूप वाला और सज्जनों में निन्दित होता है। 
In this manner one gets birth as an idiot-ignorant, dumb or deaf, blind, disfigures due to misdeeds-sins and discarded-ignored by the gentlemen. 
चरितव्यमतो नित्यं प्रायश्चित्तं विशुद्धये।
निन्द्यैर्हि लक्षणैर्युक्ता जायन्तेऽनिष्कृतेनसः11.53॥ 
इसलिये शरीर शुद्धयर्थ हमेशा प्रायश्चित करते रहना चाहिये। जो लोग प्रायश्चित के द्वारा पापों का नाश नहीं करते, वे कुलक्षण लेकर उत्पन्न होते हैं। 
Due to this reason one should continuously resort himself to penances for healthy & clean body, in next births. Those who do not subject themselves to penances, are reborn with various deformities in the body and inauspicious omens-signs.
ब्रह्महत्या सुरापानं स्तेयं गुर्वङ्गनागमः।
महान्ति पातकान्याहुः संसर्गश्चापि तैः सह11.54॥
ब्रह्महत्या, मदिरापान, चोरी करना, गुरुपत्नी गमन; महापातक हैं। इन्हें करने वालों  साथ सम्पर्क, सम्बन्ध, संसर्ग रखने वाला भी महापातकी होता है। 
Killing a Brahmn, drinking wine, stealing, mating with teacher's wife are uttermost crimes-sins. One who deals with them too get tainted with uttermost sins.
अनृतं च समुत्कर्षे राजगामि च पैशुनम्।
गुरोश्चालीकनिर्बन्धः समानि ब्रह्महत्यया11.55॥
अपनी उन्नति के लिए झूँठ बोलना, राजा से चुगली करना और गुरु की झूँठी निन्दा करना; ये सभी ब्रह्म हत्या के बराबर हैं। 
Telling lies for own progress (elevation, development), back biting (lodging false-baseless complaints, false reporting) with the king-state (police), false (wrong) depraving-slurring the Guru are grievous crimes-sins equivalent to Brahm Hatya-murdering a Brahman.
ब्रह्मोज्झता वेदनिन्दा कौटसाक्ष्यं सुहृद्वधः।
गर्हितानाद्ययोर्जग्धिः सुरापानसमानि षट्11.56॥
पढ़े हुए वेद का अभ्यास न करके भुला देना, वेद की निन्दा, झूँठी गवाही देना, मित्र का वध करना, गर्हित-अखाद्य वस्तुओं का खाना, ये छः कर्म मदिरापान के समान हैं।
Lack of practice of Veds (forgetting, utilising in daily life), depraving-slurring condemning Veds, false witness-evidence (false implicating), killing-slaying a friend, eating of discreditable-abhorrent & banned goods like meat are the six sins-offences comparable to drinking wine i.e., invite punishment meant for drinking wine. 
निक्षेपस्यापहरणं नराश्वरजतस्य च।
भूमिवज्रमणीनां च रुक्मस्तेयसमं स्मृतम्11.57॥
किसी की धरोहर, मनुष्य, घोड़ा, चाँदी, भूमि, हीरा और मणि इन का अपहरण करना सोने की की चोरी के समान है।  
Abducting-confiscating goods given in good faith (placed in safe custody) for protection, humans, silver, land, diamonds and gems are the sins comparable to stealing gold for punishment.
रेतः सेकः स्वयोनीषु: कुमारीष्वन्त्यजासु च।
सख्युः पुत्रस्य च स्त्रीषु गुरुतल्पसमं विदुः11.58॥
सगी बहन, कुमारी, चाण्डाल  स्त्री और पुत्र वधु इनके साथ व्यभिचार गुरु पत्नी गमन के समान है।
Intercourse-mating with real sister, a virgin, wife of a Chandal and son's wife are sins-crimes punishable like the penalty meant for raping teacher's wife.
गोवधोऽयाज्यसंयाज्यंपारदार्यात्मविक्रयः।
गुरुमातृपितृत्यागः स्वाध्यायाग्न्योः सुतस्य च11.59॥
परिवित्तितानुजेऽनूढे परिवेदनमेव च।
तयोर्दानं च कन्यायास्तयोरेव च याजनम्11.60॥
कन्याया दूषणं चैव वार्धुष्यं व्रतलोपनम्।
तडागारामदाराणामपत्यस्य च विक्रयः11.61॥
व्रात्यता बान्धवत्यागो भृत्याध्यापनमेव च।
भृत्या चाध्ययनादानमपण्यानां च विक्रयः11.62॥
सर्वाकारेष्वधीकारो महायन्त्रप्रवर्तनम्।
हिंसौषधीनां स्त्र्याजीवोऽभिचारो मूलकर्म च11.63॥
इन्धनार्थमशुष्काणां द्रुमाणामवपातनम्।
आत्मार्थं च क्रियारम्भो निन्दितान्नादनं तथा11.64॥
अनाहिताग्निता स्तेयमृ णानामनपक्रिया।
असच्छास्त्राधिगमनं कौशीलव्यस्य च क्रिया11.65॥
धान्यकुप्यपशुस्तेयं मद्यपस्त्रीनिषेवणम्।
स्त्रीशूद्रविट्क्षत्रवधो नास्तिक्यं चोपपातकम्11.66॥
गौ वध करना, जाति कर्म से दूषित मनुष्यों का यज्ञ कराना, परस्त्री गमन, अपने को बेचना, गुरु, माता, पिता की सेवा न करना, वेदाध्ययन न करना, स्मार्त अग्नि का परित्याग, सन्तान का भरण-पोषण न करना, परिवित्ति (विवाहित छोटे भाई का अविवाहित बड़ा भाई) और परिवेत्ता (विवाहित छोटा भाई) इन दोनों को कन्या देना, इन दोनों का यज्ञ कराना, कन्या को दूषित करना, सूद पर रुपया लगाना, ब्रह्मचर्य व्रत का लोप, तालाब, बाग़, स्त्री और सन्तान को बेचना, व्रात्यता (संस्कारहीन, वर्णसंकरता), बन्धुत्याग, वेतन लेकर शास्त्र पढ़ाना, नियत वृत्ति-प्रदान पूर्वक पढ़ाना, जो वस्तु बेचने योग्य न हो उसे बेचना, सब प्रकार की खानों में अधिकारी होना, बड़ी-बड़ी कलें-यंत्र बनाना, औषधियों की जड़ खोदना, स्त्री के व्याभिचार से जीविका चलाना, मन्त्र-यन्त्र द्वारा मारण-उच्चाटन आदि, ईंधन के लिये हरे पेड़ों को काटना, अपने लिये ही रसोई बनाना, निन्दित अन्न खाना, अग्निहोत्र न कराना, किसी की चीज चुराना, ऋण न चुकाना, वेदोक्त शास्त्रों का न पढ़ाना, अभिनय करना, धान्य, ताँबा और पशु चुराना, मद्य पीने वाली स्त्री का सेवन करना, स्त्री, शूद्र, वैश्य और क्षत्रिय का वध तथा नास्तिकता, ये सब उपपातक हैं। 
Cow slaughter, performing Yagy-Hawan, Agnihotr for the depraved either by caste or deeds i.e., unworthy people, adultery, selling oneself, failure to serve-help parents & teacher, failure to read-practice Veds as a routine, rejection of the sacred fire ignited methodically as per doctrine of the scriptures, failure to nourish-support progeny (offspring), marrying daughter with a person who's elder brother is still unmarried or the one who married prior to his elder brother or performing Yagy for either of these, intercourse with a virgin girl or own daughter, seeking interest over money, loss of chastity, selling off ponds, orchards, either women-wife or children, failure to carry out rites or absence of virtues or birth as a cross breed-mixed race, rejection of brothers, teaching of scriptures-Veds by getting salary or teaching under contract for financial gains, selling off banned-unfit (obsolete) goods, ownership of mines, manufacture of large sized machines, removing roots of medicinal herbs, earning through prostitution of wife, use of Tantr-Mantr, Yantr for killing or mesmerising (making unconscious, senseless-immobile), cutting of trees for fuel, cooking only for self only, eating uneatable (meat, fish, eggs), failure to perform Agnihotr, stealing-theft, failure to clear debt, failure to teach scriptures based on Veds, acting-dramatics, stealing food grain, money, copper, cattle, sex with a drunkard woman, killing of woman, Shudr, Vaeshy, Kshatriy, atheistic are minor sins.
उच्चाटन मन्त्र :: 
(1).  उल्लूकाना विद्वेषय फट स्वाहा:, 
(2).  क्षौं क्षौं भैरवाय स्वाहा:,, 
(3). ॐ हृलीं ब्रह्मास्त्राये विद्यमने स्तम्भन धीमही तन्नो बगला प्रचोदयात।
जैह्याँ ब्राह्मणस्य रुजः कृत्वा  घ्रातिरघ्रेयमद्ययोः।
जैह्याँ च मैथुनं पुंसि जातिभ्रंशकरं स्मृतम्11.67॥
ब्राह्मण को हाथ से या लाठी (या किसी भी तरह से) से पीड़ा पहुँचाना, अत्यन्त दुर्गन्ध युक्त (लहसुन, विष्टा आदि) और मदिरा का सूँघाना, दुष्टता, पुरुष के साथ मैथुन करना, ये सभी जातिभ्रंशकर (मनुष्य का अपनी जाति, आश्रम आदि से भ्रष्ट होना) पाप हैं।  
Torturing-paining a Brahmn with hand, baton or any other means, making -forcing him to smell extremely foul-pungent smelling goods & wine, cruelty, sodomy are the sins which lowers one from his caste or Varnashram Dharm.
खराश्वोष्ट्रमृगैभानामजाविकवधस्तथा।
सङ्करीकरणं ज्ञेयं मीनाहिमहिषस्य च11.68॥
गधा, घोड़ा, ऊँट, मृग, हाथी, बकरा, भेड़, मछली, साँप  भैँस इनका वध संकरीकरण पाप है। 
Killing of donkey, horse, camel, deer, elephant, goat, sheep, fish, snake or a buffalo are termed as Sankrikaran i.e., leading to hybridisation-cross breed.
संकरीकरण पाप :: इसके प्रायश्चित के लिये कुच्छु या अतिकृच्छ व्रत करने का विधान है।
निन्दितेभ्यो धनादानं वाणिज्यं शूद्रसेवनम्।
अपात्रीकरणं ज्ञेयमसत्यस्य च भाषणम्11.69॥
निन्दितों से धन लेना, रोजगार करना, शूद्रों की सेवा करना और झूँठ बोलना ये अपात्रिकरण पाप हैं। 
Accepting (or borrowing) money & getting employment from the depraved, serving the Shudr and telling lies, are the sins which makes one unfit (disqualifying, unacceptable) socially or otherwise. 
कृमिकीटवयोहत्या मद्यानुगतभोजनम्।
फलेधः कुसुमस्तेयमधैर्यं च मलावहम्11.70॥
कीड़ा, कीट, (चींटी आदि) पक्षियों की हत्या करना, मदिरा के साथ भोजन करना, फल, लकड़ी, फूल की चोरी और अधैर्य (असंतोष) मलावह (मलिनीकरण) पाप हैं। 
Killing of insects-with or without wings, flies (butterflies etc.), birds, eating food accompanied with wine-alcohol, stealing fruits, wood, flowers and lack of patience are termed Malavah-Malinikaran (turning unclean, impure, contaminating) sins.
एतान्येनांसि सर्वाणि यथोक्तानि पृथक्पृथक्।
यैर्यैर्व्रतैरपोह्यन्ते तानि सम्यङ्निबोधत11.71॥
ये पूर्वोक्त पाप जो अलग-अलग कहे गये हैं, वो जिन-जिन व्रतों से नष्ट होते हैं, उन्हें अच्छी तरह सुनो। 
Listen with attention the penances (manner, fasts, determinants, methods) for destroying the sins described here.  
ब्रह्महा द्वादश समाः कुटीं कृत्वा वने वसेत्।
भैक्षाश्यात्मविशुद्ध्यर्थं कृत्वा शवशिरो ध्वजम्11.72॥
ब्रह्महत्या करने वाला, बारह साल तक वन में कुटिया बनाकर रहे और मुण्ड हाथ में लेकर भिक्षा माँगकर जीवन निर्वाह करे। 
ब्रह्महत्या :: जिस ब्राह्मण की हत्या की गई हो उसकी खोपड़ी के एक भाग का खप्पर बनाकर सर्वदा हाथ में रखे। दूसरे भाग को बाँस में लगाकर ध्वजा बनाए और उस ध्वजा को सर्वदा अपने साथ रखे। भिक्षा में उपलब्ध सिद्धान्न से अपना जीवन निर्वाह करे। इन नियमों का पालन करते हुए 12 वर्ष पर्यन्त तीर्थ यात्रा करने पर ब्रह्म हत्या के पाप से छुटकारा मिलता है। एक ब्राह्मण की अथवा 12 गौओं की प्राण रक्षा करने पर अथवा अश्वमेघ यज्ञ, अवभृथ स्नान करने पर उपर्युक्त 12 वर्ष की अवधि में कमी होना सम्भव है।
The slayer of Brahman should reside in the forest in a hut and live on the alms received while begging with human skull in his hands.
लक्ष्यं शस्त्रभृतां वा स्याद्विदुषामिच्छयाऽत्मनः।
प्रास्येदात्मानमग्नौ वा समिद्धे त्रिरवाक्शिराः11.73॥
अपनी इच्छा से शस्त्रधारी विद्वानों का अपने आपको लक्ष्य-निशाना बनावे अथवा जलती हुई अग्नि में सर नीचा करके उसमें अपने को तीन बार झोंके। 
Let the armed himself either become the target of the enlightened-scholars out of his own free will  or subject his lowered head into a blazing fire thrice.
यजेत वाश्वमेधेन स्वर्जिता गोसवेन वा।
अभिजिद्विश्वजिद्भ्यां वा त्रिवृताग्निष्टुताऽपि वा11.74॥
अश्वमेध, स्वर्जित, गोसव, अभिजित्, विश्वजित् अथवा तीन बार अग्निष्टोम करे। 
Let him either conduct Ashwmedh, Swarjit, Gosav, Abhijit, Vishwjit or Agnishtom thrice.
अश्वमेध यज्ञ में घोड़े की बलि का अर्थ खाण्ड के बने हुए घोड़े से है, जिस प्रकार दीपावली के पर अवसर खाण्ड  के बने हुए हाथी, घोड़े एक दूसरे  दिये जाते हैं। 
Hinduism do not advocate animal-human sacrifices. Hinduism do not permit violence. Hinduism do not permit meat eating.  
जपन्वान्यतमं वेदं योजनानां शतं व्रजेत्।
ब्रह्महत्यापनोदाय मितभुङ्यतेन्द्रियः11.75॥
अल्पहारी जितेन्द्रिय होकर वेदों में से किसी वेद का जप करता हुआ ब्रह्महत्या जनित पाप  दूर करने  लिये एक सौ योजन तक जाये।
The guilty (repentant seeking penances) of murdering (killing, slaying) a Brahmn should travel a distance of 100 Yojan reciting the verses of any of the Veds. 
He should undertake pilgrimage.
सर्वस्वं वेदविदुषे ब्राह्मणायोपपादयेत्।
धनं वा जीवनायालं गृहं वा सपरिच्छदम्11.76॥
अथवा वेद  विद्वान् ब्राह्मण को अपना सर्वस्व दान कर दे अथवा उनके जीवनोपयोगी आवश्यक धन परिच्छेद के साथ दे। 
Either he should donate all his belongings to a Brahman well versed with the Veds or grant him sufficient money along with a house.
परिच्छेद :: काट-छाँटकर अलग करना, किसी वस्तु के अलग-अलग खंड, विभाजन; बँटवारा, अवधि, सीमा-हद, निर्णय, निश्चय, उपचार, माप, परिभाषा, किसी पुस्तक का प्रकरण, अध्याय।  
हविष्यभुग्वाऽनुसरेत्प्रतिस्रोतः सरस्वतीम्।
जपेद्वा नियताहारस्त्रिर्वै वेदस्य संहिताम्11.77॥
अथवा हविष्य भोजन करता हुआ सरस्वती नदी के स्त्रोत-मुहाने तक जाये अथवा नियत आहार करता हुआ तीन बार वेद संहिता का पाठ करे।  
Else he should undertake pilgrimage, travelling on foot, till the source of holy Saraswati river or study Ved Sanhita thrice every day, with fixed quantum of food (just sufficient to survive). 
कृतवापनो निवसेद् ग्रामान्ते गोव्रजेऽपि वा।
आश्रमे वृक्षमूले वा गोब्राह्मणहिते रतः11.78॥
अथवा सर मुँड़वाकर, गौ, ब्राह्मण का उपकार करता हुआ गाँव के बाहर गौशाला में कुटी बनाकर अथवा पेड़ के नीचे वास करे।  
Another alternative is to live outside the village in a cowshed in thatched hut or live under a tree.
ब्राह्मणार्थे गवार्थे वा सद्यः प्राणान्परित्यजेत्। 
मुच्यते ब्रह्महत्याया गोप्ता गोर्ब्राह्मणस्य च11.79॥
अथवा ब्राह्मण की रक्षा में या गौ की रक्षा में शीघ्र ही प्राण का त्याग कर दे, क्योंकि गौ और ब्राह्मण की रक्षा करने वाला ब्रह्महत्या  छूट जाता है। 
He should sacrifice his life for the sake-protection of either cow or a Brahman, since such a person is freed from the sin of Brahmhatya-killing a Brahman.
त्रिवारं प्रतिरोद्धा वा सर्वस्वमवजित्य वा।
विप्रस्य तन्निमित्ते वा प्राणालाभे विमुच्यते11.80॥
अथवा ब्राह्मण के धन को तीन बार (डाकुओं या चोरों से) बचाने वाला, सर्वस्व को जीतकर ब्राह्मण को अर्पण करने वाला अथवा उसके निमित्त प्राण देने वाला ब्रह्म हत्या से छूट जाता है। 
One who either protects the property of a Brahman from looting-theft at least thrice, restores his property or sacrifices his life for the sack of a Brahman in this act of arson (terror, looting theft, dacoity) is relieved from the sin of killing a Brahman.
एवं दृढव्रतो नित्यं ब्रह्मचारी समाहितः।
समाप्ते द्वादशे वर्षे ब्रह्महत्यां व्यपोहति11.81॥
इस प्रकार दृढ़व्रत एकाग्रचित्त और ब्रह्मचारी होकर सर्वदा नियम पूर्वक बारह वर्ष तक रहने वाला ब्रह्म हत्या  पाप से छूट जाता है। 
One who subjects himself to such rigorous penances-repentance for 12 years with firm control over himself and firm determination to accomplish, is relieved of the greatest sin of slaying a Brahman.
शिष्ट्वा वा भूमिदेवानां नरदेवसमागमे।
स्वमेनोऽवभृथस्नातो हयमेधे विमुच्यते11.82॥
अश्वमेध यज्ञ में ब्राह्मण ऋत्विज और यज्ञकर्त्ता राजा के सामने ब्रह्महत्या का खुलासा करने और अवभृथ स्नान (यज्ञ के अंत में किया जाने वाला स्नान) करने से ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति मिल जाती है। 
The murderer of a Brahmn is relieved from the sin when he admits it in front of the king & the one organising the Ashwmedh Yagy (Horse sacrifice-symbolic) once the Yagy is over and one has bathed.
Here the judiciary comes into picture. The admittance of the grave crime may compel the king to order to crucify the guilty & confiscate all his belongings. However, the king may pardon him as well, since the guilty has undergone penances. 
धर्मस्य ब्राह्मणो मूलमग्रं राजन्य उच्यते।
तस्मात् समागमे तेषामेनो विख्याप्य शुध्यति11.83॥ 
धर्म का मूल ब्राह्मण है और क्षत्रिय उसका अग्रभाग है। इसलिये उन लोगों के समागम से यज्ञ में उनके सामने अपने पापों को प्रकट करने से ब्रह्महत्या कर्ता-करने वाला शुद्ध  जाता है। 
The slayer of the Brahmn is relieved of the sin by confessing-accepting his guilt, since the Brahmn is at the root of Dharm & the Kshatriy is at the tip of it.
The Brahman postulates-defines the Dharm and the Kshatriy implements it. The religion is a very intricate subject and needs explanation time & again. The Brahman clarifies the hick ups by quoting illustrations from the Veds, Purans, scriptures.
ब्रह्मणः संभवेनैव देवानामपि दैवतम्।
प्रमाणं चैव लोकस्य ब्रह्मात्रैव हि कारणम्11.84॥
वेद की मर्यादा के अनुरूप, जन्म से ही ब्राह्मण देवताओं का देवता होता है और लोक में प्रमाण माना जाता है।  
The Brahman is a deity of the demigods as well by virtue of his birth as a Brahman. His statements, directives, assertions are considered authentic-proof as per doctrine of the Veds.
This is true but the Brahman must be enlightened, learned, unattached, pious, righteous, honest, virtuous. In today's scenario a Brahman by birth may not be a Brahman at all.
तेषां वेदविदो ब्रूयुस्त्रयोऽप्येनः सुनिष्कृतिम्।
सा तेषां पावनाय स्यात्पवित्रा विदुषां हि वाक्11.85॥
ऐसे ब्राह्मणों में से वेद को जानने वाले तीन ब्राह्मण छुटकारा पाने के लिये जो उपाय बतायें, उनसे भी पापियों की शुद्धि हो जाती है, क्योंकि पण्डितों की वाणी ही पवित्र होती है। 
The penances prescribed by three Brahmans of the status of demigods well versed in Veds are capable of diluting the sin-impact of Brahmhatya, since their words carries weight.
Here the Brahman is pure-pious, truthful through mind, speech and deeds मनसा, वचना, कर्मणा).
अतोऽन्यतममास्थाय विधिं विप्रः समाहितः।
ब्रह्महत्याकृतं पापं व्यपोहत्यात्मवत्तया11.86॥
इसलिये इनमें से किसी उपाय  संयतात्मा होकर ब्राह्मण अनुष्ठान करे। आत्मसंयम से ब्राह्मण किसी भी, कैसे भी पाप का नाश कर सकता है। 
Any of the methods prescribed above for emancipation from Brahmhatya can relieve the guilty from the sin by a Brahmn who has perfect control over himself if he undertake the job.
अनुष्ठान :: संस्कार, धार्मिक संस्कार, उत्सव, धार्मिक क्रिया, पद्धति, शास्रविधि, आचार, आतिथ्य सत्कार, समारोह, विधि, रसम, शिष्टाचार, त्योहार, पर्व, उत्सव-काल, संपादन, विधिपूर्वक संपादन; ritual, rite, ceremony, celebration, solemnisation.
हत्वा गर्भमविज्ञातमेतदेव व्रतं चरेत्।
राजन्यवैश्यौ चैजानावात्रेयीमेव च स्त्रियम्11.87॥
अज्ञात गर्भ यज्ञ करते हुए, क्षत्रिय और वैश्य को तथा रजो धर्म युक्त स्त्री को मारकर ब्रह्महत्या से छुटकारा पाने वाले उपायों (पूर्वोक्त) को ही करे। 
The penances prescribed for Brahmhatya should be adopted for foeticide (भ्रूणहत्या), killing a Kshatriy & Vaeshy and a woman undergoing periods-menstrual cycle.
उक्त्वा चैवानृतं साक्ष्ये प्रतिरुध्य गुरुं तथा। 
अपहृत्य च निःक्षेपं कृत्वा च स्त्रीसुहृत्वधम्11.88॥
झूठी गवाही देने पर, गुरु पर झूंठा आरोप लगाने पर, किसी की धरोहर का अपहरण करने पर तथा स्त्री और मित्र का वध करने पर भी ब्रह्महत्या में कहे गये प्रायश्चितों करे। 
Penances meant for Brahmhatya are applicable in case one gives false evidence-witness, falsely slur-blame his Guru-teacher, confiscate the custodian goods of someone, killing a woman and the friend.
इयं विशुद्धिरुदिता प्रमाप्याकामतो द्विजम्।
कामतो ब्राह्मणवधे निष्कृतिर्न विधीयते11.89॥
अनिच्छा से किये हुये ब्राह्मण के वध की यह विशुद्धि कही गयी है और इच्छा से-जानबूझकर किये गये ब्राह्मण वध का कोई प्रायश्चित नहीं है। 
The penances-repentance for the slaying of a Brahman unknowingly-unwittingly or against desire have been described, but their is no penance for the murder, killing of a Brahman knowingly-wilfully, intentionally.
The murderer has to suffer for millions of years in hells.
सुरां पीत्वा द्विजो मोहादग्निवर्णां सुरां पिबेत्।
तया स काये निर्दग्धे मुच्यते किल्बिषात्ततः11.90॥
ब्राह्मण यदि मोहवश मदिरा पान कर ले तो इस पाप के नाश के लिये उसे अग्नि वर्ण के समान (अर्थात वैसी ही जलती हुई) मदिरा पीये, क्योंकि उससे जब शरीर जलता है, तब जातक उस पाप से छूट नहीं जाता। 
To get rid of the sin of drinking wine due to delusion-ignorance, the Brahman should drink wine which is burning like fire, since only when his body is burnt by the fire, the doer is relieved off the sin.
गोमूत्रमग्निवर्णं वा पिबेदुदकमेव वा।
पयो घृतं वाऽमरणाद् गोशकृद्रसमेव वा11.91॥
अथवा गोमूत्र, जल, गाय का दूध, गोघृत और गाय के गोबर का रस, इनमें से किसी एक चीज को आग के समान तप्त करके मरण पर्यन्त पीता रहे। 
Another option is to drink hot any of these :- cow's urine, water, cow's milk, cow's ghee and the extract of cow dung, throughout the life.
कणान्वा भक्षयेदब्दं पिण्याकं वा सकृन्निशि।
सुरापानापनुत्त्यर्थं वालवासा जटी ध्वजी11.92॥
अथवा एक वर्ष तक मदिरापान के दोष से शान्त्यर्थ रात में एक ही बार किसी अन्न का कण अथवा तिल की खली खाये और ऊनी वस्त्र पहने, जटा रखे तथा मदिरापान का ध्वजा-चिन्ह धारण करे। 
Yet another alternative to pacify sin caused by drinking wine is that one must eat a single grain at night or eat the remains of sesame-Til, wear warm cloths, grow long hair and wear the marks to show that he had been a drunkard.
सुरां वै मलमन्नानां पाप्मा च मलमुच्यते।
तस्माद् ब्राह्मणराजन्यौ वैश्यश्च न सुरां पिबेत्॥11.93॥ 
सुरा-मदिरा, अन्न के मल को कहते हैं और मल पाप है इसलिये स्वर्ण-ब्राह्मण, क्षत्रिय  वैश्य शराब न पियें। 
Alcohol-wine is obtained from the waste products of food grain or by fermenting various goods, like wheat, barley, grapes, sugar cane juice etc. This is like shit-excreta. Therefore, the Swarn: Brahman, Kshatriy & the Vaeshy should not consume wine. The shit-excreta is comparable to sins.
गौडी पैष्टी च माध्वी च विज्ञेया त्रिविधा सुरा।
यथैवैका तथा सर्वा न पातव्या द्विजोत्तमैः11.94॥
गौड़ी, षैष्ठी और माधवी ये तीन प्रकार की मदिरा होती हैं। इनमें जैसी एक है, वैसी तीनों है, इसलिये ब्राह्मण पान  करें। 
Goudi (distilled from molasses), Shaeshthi (distilled from ground rice) & Madhvi (distilled from Madhuk flowers) are the three kinds of wines-liquors. All the three are alike in character. Therefore, the Brahman should not consume them.
They are alcoholic & toxic in nature and adversely affect the brain directly.
यक्षरक्षःपिशाचान्नं मद्यं मांसं सुराSSसवम्।
तद् ब्राह्मणेन नात्तव्यं देवानामश्नता हविः11.95॥
मद्य, माँस, मदिरा और आसव ये यक्ष, राक्षस और पिशाचों की वस्तुएँ हैं। इसलिये देवताओं के हविष्य खाने वाले ब्राह्मण इन पदार्थों का इस्तेमाल न करें।
Wine, narcotics, meat and alcoholic extracts are meant for demons, giants. The demigods, Manes & Brahmans should never consume them.
पानसद्राक्षमाध्वीकं खर्जूरं तालमैक्षवम्। माध्वीकं टाङ्कपाद्वींकगैरेयं नारिकेलजम्। सामान्यानि  द्विजातीनां मद्यान्येकादशैव च       
माँस, शराब, नशीले पदार्थ राक्षसी प्रवृति वालों  लिये हैं, ब्राह्मणों के लिये नहीं।[पुलस्त्य]  
Meat and wines (Madhy, Madira, narcotics-drugs, smoking and Asav-extracts) are the goods consumed by Yaksh, Rakshas & Pishach. Therefore, the Brahmns who consume the left over offerings meant for the demigods, should not consume them.
अमेध्ये वा पतेन्मत्तो वैदिकं वाऽप्युदाहरेत्।
अकार्यमन्यत्कुर्याद्वा ब्राह्मणो मदमोहितः11.96॥
मदिरा पान से उत्तम ब्राह्मण अपवित्र जगह में गिर पड़े या निषिद्ध जगहों में वेद पाठ या और ही कोई न करने योग्य कार्य को कर सकता है। इसलिये ब्राह्मण को मदिरा पान नहीं करना चाहिये। 
The Brahman may fall into an impure-contaminated place under the impact-influence of liquor or recite Ved Mantr at a prohibited place or may involve in indecent-obscene acts. Pronunciation of Mantr-Shloks may become vague & produce counter productive results. So, the Brahman should not drink wines-intoxicants.
यस्य कायगतं ब्रह्म मद्येनाप्लाव्यते सकृत्।
तस्य व्यपैति ब्राह्मण्यं शूद्रत्वं च स गच्छति11.97॥
जिस ब्राह्मण के शरीर में  स्थित ब्रह्म (आत्मा) एक बार भी मदिरा से प्लावित हो जाती है, उसका ब्राह्मणत्व नष्ट हो जाता है और वह शूद्रवत्  हो जाता है। 
The Brahmanhood of the Brahm (the component of the Almighty-soul) residing inside the body of the Brahman is lost just by tasting-sipping wine once.
Achievement of Brahmanhood is extremely difficult, painstaking & rigorous task. Just by taking birth in a Brahman family, one does not become a Brahman.
During the course of studies, I had to suck absolutely pure alcohol for finding out its physical properties, in 1,971, at RCE, (now RIE) Ajmer. Later, I encountered taste of rum during a train journey from Jodhpur to Delhi, in 1,976, unaware of what had been said in the scriptures. While teaching, I studied the harmful effects of wine-consuming alcohol at length and guided-taught the students all that, accordingly.
Since, 1996-97 I take meals only once and do not eat food grain twice in a day. No wine, no smoking, no drugs-narcotics.
एषा विचित्राभिहिता सुरापानस्य निष्कृतिः।
अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि सुवर्णस्तेयनिष्कृतिम्11.98॥
यह मदिरापान का विचित्र प्रायश्चित कहा गया है। अब इसके बाद सोना चुराने का प्रायश्चित कहूँगा। 
Having described the bizarre penances for drinking wine by the Brahmn, I will narrate the penances for stealing gold.
जिन मुसलमानों, ईसाईयों, अंग्रेजों ने मन्दिरों और भारत वासियों का सोना लूटा, उनको और उनके परिवार और आने वाली सन्तानों को इसके घोर दुष्परिणाम भुगतने पड़े और आगे भी भुगतने पड़ेंगे। 
The Muslims & Christians who looted gold, jewellery, gems from the temples in India and the Indians had to suffer a lot. Their progeny too will suffer till end of the clan comes-materialises.
सुवर्णस्तेयकृद्विप्रो राजानमभिगम्य तु।
स्वकर्म ख्यापयन्ब्रूयात्मां भवाननुशास्त्विति11.99॥
सुवर्ण को चुराने वाला ब्राह्मण राजा के सन्मुख उपस्थित होकर अपने किये हुए कर्म का व्याख्यान करता हुआ कहे कि आप मुझे इस कर्म का दण्ड दें। 
The Brahmn, guilty of stealing gold should confess in front of the king himself and request to punish him.
गृहीत्वा मुसलं राजा सकृद्धन्यात्तु तं स्वयम्।
वधेन शुद्ध्यति स्तेनो ब्राह्मणस्तपसैव तु11.100॥ 
राजा स्वयं मूसल लेकर उस ब्राह्मण पर एक बार प्रहार करे। चोर वध से शुद्ध होता है, किन्तु ब्राह्मण तपस्या से शुद्ध होता है। 
The king should strike the Brahman who has stolen gold and committed himself for punishment to the king with a pestle-ponder (Club, Muller) once. The thief is purified by killing him but the Brahman is cleansed by Tapasya (austerities, ascetics, meditation) only.
तपसाSपनुनुत्सुस्तु सुवर्णस्तेयजं मलम्।
चीरवासा द्विजोऽरण्ये चरेदाब्राह्महणों व्रतम्11.101॥
सुवर्ण चुराने से उत्पन्न पाप तपस्या द्वारा नाश करने की इच्छा वाला ब्राह्मण पुराने कपड़े को पहनकर वन में ब्रह्महत्या के प्रायश्चित करे। 
The Brahman who wish to clear himself of the sin earned by stealing gold, should subject himself to the penances meant for Brahmhatya in a forest wearing old cloths. 
एतैर्व्रतैरपोहेत पापं स्तेयकृतं द्विजः।
गुरुस्त्रीगमनीयं तु व्रतैरेभिरपानुदेत्11.102॥
इन पूर्वोक्त व्रतों (ब्रह्महत्या  प्रायश्चितों) द्वारा ब्राह्मण चोरी सम्बन्धित पापों का नाश करे। गुरुपत्नी गमन के पाप को आगे कही हुई विधियों से नष्ट करे। 
The Brahman should cleanse himself of the sin caused by stealing, subjecting himself to penances described in earlier postulates. Next follows the penances meant for clearing oneself from the sin of intercourse-mating with teacher's wife.
गुरुतल्प्यभिभाष्यैनस्तप्ते स्वप्यादयोमये।
सूर्मीं ज्वलन्तीं स्वाश्लिष्येन्मृत्युना स विशुध्यति11.103॥
गुरु पत्नी से व्यभिचार-गमन करने वाला, अपने पाप को लोगों के सामने प्रकट करके, लोहे की जलती हुई शय्या सोये अथवा लोहे की स्त्री बनाकर उसे आग में तपाकर, उसका आलिंगन करे और मर जाये; यही उसकी शुद्धि है। 
One who had intercourse with his teacher's wife should disclose his guilt and sleep over a red hot iron bed or embrace a red hot statue of woman  & die. This is the penance for him.
Ahilya had to suffer from the curse of her husband along with Dev Raj Indr. She was turned into a stone block to be brought back to life by Bhagwan Shri Ram. She had recognised Dev Raj and she could refuse to mate with Dev Raj Indr. Dev Raj had vaginal openings all over his body as the curse, which were converted into eyes later on being subjecting himself to penances.
Those who spoil women or girls have to face tortures in hells.
स्वयं वा शिश्नवृषणावुत्कृत्याधाय चाञ्जलौ।
नैर्ऋतीं दिशमातिष्ठेदानिपातादजिह्मगः11.104॥
अथवा स्वयं ही अपने लिंग और अण्डकोषों को काटकर अपनी अञ्जलि में लेकर जब तक शरीर पात न हो जाये तब तक सीधे नैर्ऋत्य (दक्षिण-पश्चिम के कोण-दिशा) में दौड़ता हुआ जाये। 
Else he should cut his pennies & testicles, hold them in his hands and run in South-West direction, till he dies.
षट्वाङ्गी चीरवासा वा श्मश्रुलो विजने वने।
प्राजापत्यं चरेत्कृच्छ्रमब्दमेकं समाहितः॥11.105॥
अथवा खट्वाङ्ग धारण कर, पुराना कपड़ा पहनकर, दाढ़ी बढ़ाकर निर्जन वन में एक वर्ष तक निरालस्य होकर कृच्छ प्राजापत्य व्रत को करे। 
One guilty of raping-mating his teacher's wife should hold a club shaped object like the foot of a bedstead i.e. a club or staff with a skull at the top, wear old cloths, grow his beard, live in an isolated forest for one year performing Krachchh Prajapty Vrat.
कृच्छ चान्द्रायण व्रत :: 
शोधयेत् तु शरीरं स्वं पंचगव्येन मन्त्रितः। 
स शिरः कृष्ण पक्षस्य तत् प्रकुर्वीत वापनम्॥
शुक्ल वासाः शुचिर्भूखा मौञ्जों वन्धीत मेखलाम्। 
पलाश दण्डमादाय ब्रह्मचर्य व्रते स्थितः॥
कृ तोपवासः पूर्व तु शुक्ल प्रतिपादे द्विजः। 
नदी संगम तीर्थेषु शुचौ देशे गृहेऽपिवा॥
शरीर को दश स्नान-विधान से शुद्ध करें। अभिमन्त्रित करके पंचगव्य पीयें। सिर को मुँड़ाकर कृष्ण पक्ष में व्रत आरम्भ करे। श्वेत वस्त्र पहने, पवित्र रहे, कटि प्रवेश में मेखला और लँगोट धारण किये रहें। पलास की लाठी लिये रहे और ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करें। नदी के संगम, तीर्थ एवं पुष्प प्रदेशों में अथवा घर में रहकर भी शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा में चान्द्रायण व्रत आरम्भ करें।
नदीं गत्वा विशुद्धात्मा सोमाय वरु णाय च। 
आदित्याय नमस्कृत्वा ततः स्नायात् समाहितः॥
उतीर्योदक माचम्य च स्थित्वा पूर्वतो मुखः।
प्राणायामं ततः कृत्वा पवित्रेरभिसेचनम्॥
वीरघ्न मृषभं वापि तथा चाप्यधमर्वषम्।
गायत्री मम देवीं या सावित्रीं वा जपेत् ततः॥
शुद्ध मन से नदी में स्नान करे। सोम, वरुण और सूर्य को नमस्कार करें। पूर्व को मुख करके बैठे। आचमन, प्राणायाम, पवित्री कारण, अभिसिंचन, अधमर्षण आदि संध्या-कृत्यों को करता हुआ सावित्री-गायत्री का जप करें।
आधारा वाज्य भागो च प्रणवं व्याहतिस्तथा। 
वारुणं चैव पञ्चैव हुत्वा सर्वान् यथा क्रमम्॥
प्रणम्य धाग्निं सोमं च भस्य धृत्वा यथा विधि।
आधार होम, आज्य भाग, प्रणव, व्याहृति, वरुण आदि का विधि पूर्वक हवन करें और अग्नि तथा सोम को प्रणाम करके मस्तक पर भस्म धारण करें।
अंगुल्थग्रे स्थितं पिण्डं गायञ्याचाभिमन्त्रयेत्।
अंगुलीभिस्त्रिभि पिण्डं प्राश्नीयात् प्रां शुचिः॥
यथा च वर्धते सोमो ह्रसते च यथा पुनः। 
तथा पिण्डाश्च वर्धन्ते ह्रसन्ते च दिने दिने॥
तीन अँगुलियों पर आ सके इतना अन्न का पिण्ड गायत्री से अभिमन्त्रित करके पूर्व की ओर मुख करके खायें। जिस प्रकार कृष्ण पक्ष में चन्द्रमा घटता है, उसी प्रकार भोजन घटाये और शुक्ल पक्ष में जैसे चन्द्रमा बढ़ता है वैसे-वैसे बढ़ायें।
कृच्छ चान्द्रायण के भेद ::  
(1). पिपीलिका मध्य चान्द्रायण :: 
ऐकेकं ह्रासयेत पिण्डं कृष्ण शुक्ले च वर्धयेत्। 
उपस्पृषंस्त्रिषवणमेतच्चंद्रायणं स्मृतमं॥
इसमें पूर्ण मासी को 15 ग्रास खाकर क्रमशः एक-एक ग्रास घटाते हैं और अमावस्या व प्रतिपदा को निराहार रहकर दोज से एक-एक ग्रास बढ़ाते हुए पूर्णिमा को पुनः 15 ग्रासों पर जा पहुँचते हैं। इस व्रत में पूरे एक माह में कुल 240 ग्रास ग्रहण करते हैं।
(2). यव मध्य चान्द्रायण :: 
एतमेव विधि कृत्स्नमाचरेद्यवमध्यमे। 
शुक्ल पक्षादि नियतष्चरंष्चंद्रायणं व्रतम॥
यव मध्य चांद्रायण शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से प्रारम्भ होता है। अमावस्या के दिन उपवास करके शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को एक ग्रास लेवे इसके पश्चात् पूर्णिमा तक एक-एक ग्रास बढ़ाते हुए 15 ग्रास तक पहुँचे। इसके बाद कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से एक-एक ग्रास घटाते हुए अमावस्या को निराहार की स्थिति तक पहुँचें। इस व्रत में भी 240 ग्रास ही खाने का विधान है।
(3). यति चान्द्रायण :: 
अष्टौ अष्टौ समष्नीयात् पिण्डान माध्यन्दिने स्थिते।
नियतात्मा हविष्याषी यति चंद्रायणं स्मृतम्॥
प्रतिदिन मध्याह्नकाल में आठ-आठ ग्रास खाते रहें। इसे यति चांद्रायण कहते हैं। इसमें न किसी दिन कम करते हैं और न अधिक। इससे भी एक मास में 240 ग्रास ही खाये जाते हैं।
(4).  शिशु चान्द्रायण :: 
च्तुरः प्रातरष्नीयात् पिंडान् विप्रः समाहितः। 
चतुरोऽस्त मिते सूर्ये षिषुचंद्रायणं स्मृतम्॥
अर्थात इसमें प्रातः 4 ग्रास और सायंकाल 4 ग्रास खाए जाते हैं और यही क्रम नित्य रहता है। इस प्रकार शिशु चांद्रायण में प्रतिदिन आठ ग्रास खाते हुए एक मास में 240 ग्रास पूरे किये जाते हैं। तिथि की वृद्धि या क्षय हो जाने पर ग्रास की भी वृद्धि या कमी हो जाती है।
ग्रास के दो अर्थ हैं :-
"पिण्डान् प्रकृति स्थात प्राश्नति"
साधारणतया मनुष्य जितना बड़ा ग्रास खाता है वही ग्रास का परिमाण है।  [वीद्धायन]
कुम्कुटाण्ड प्रमाणं स्याद् यावद् वास्य मुख विशेत्। 
एतं ग्रासं विजानीयुः शुद्ध्यर्थे काय शोधनम्॥
मुर्गी के अण्डे की बराबर ग्रास माना जाय अर्थात जितना मुँह में समा सके उसे ग्रास कहा जाय।[महर्षि अत्रि]
चारों प्रकार के चांद्रायण व्रतों में आहार ग्रहण करते समय प्रत्येक ग्रास को प्रथम गायत्री महामंत्र से अभिमंत्रित करते हैं, तत्पश्चात् क्रमशः :: भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः, सत्यं, यशः, श्रीः, अर्क, इट्, ओजः, तेजः, पुरुषः, धर्मः, शिवः;  इन मंत्रों के आरम्भ में और अंत में नमः स्वाहा संयुक्त करके उस मंत्र को उच्चारण करते हुए ग्रास का भक्षण किया जाता है। यथा :-  सत्यं नमः स्वाहा। 
उपरोक्त मन्त्रों में से उतने ही मंत्र प्रयोग होंगे, जितने कि ग्रास भक्षण किये जाएँगे। 
उदाहरण स्वरूप, जैसे चतुर्थी तिथि को चार ग्रास लेने हैं तो :- (1). नमः स्वाहा, (2).  भूः नमः स्वाहा, (3). भुवः नमः स्वाहा, (4). स्वः नमः स्वाहा आदि। इन चार मंत्रों के साथ क्रमशः एक-एक ग्रास ग्रहण किया जाएगा।
चांद्रायण व्रतों के दिनों में संध्या, स्वाध्याय, देवपूजा, गायत्री जप, हवन आदि साधनात्मक-उपासनात्मक धार्मिक कृत्यों का नित्य-नियम रखना चाहिए। भूमिशयन एवं ब्रह्मचर्य पालन का विधान आवश्यक है। व्रत का संकल्प लेते समय मुण्डन कराने का भी शास्त्र आदेश है, साथ-ही-साथ चांद्रायण का उत्तरार्द्ध पक्ष यह है कि जो खाई खोदी गयी है अर्थात् जो दुष्कृत्य अपने से बन पड़े है, उनकी किसी-न-किसी रूप में भरपाई की जाय। व्रत की समाप्ति पर सामर्थ्यानुसार हवन-यज्ञ ब्राह्मण या कन्या भोज, ब्रह्म भोज जैसे उपक्रम भी अपनाये जा सकते हैं।
चान्द्रायणं वा त्रीन्मासानभ्यस्येन्नियतैन्द्रियः।
हविष्येण यवाग्वा वा गुरुतल्पापनुत्तये11.106॥
(षड्गुणजल पक्वधनद्रव-द्रवविशेष:।
अन्यञ्च मन्डञ्चतुSर्दशगुणे यवागू: षडगुणेSम्भसि॥)   
अथवा जितेन्द्रिय होकर तीन मास पर्यन्त हविष्य या यवागु भोजन (पतली खिचड़ी) खाकर गुरुपत्नी गमन जन्य पाप के नाशार्थ चन्द्रायण व्रत करे। 
As an alternative, the sinner of raping-mating teacher's wife should exercise full command over his sense organs and eat Havishy & Yavagu for three months while performing Chandrayan Vrat.
हविष्य :: यज्ञ के समय प्रयोग किये जाने वाले यज्ञोपयोगी खाद्यान्न; eatable meant for offering during a Yagy-Hawan, Agnihotr. 
एतैर्व्रतैरपोहेयुर्महापातकिनो मलम्।
उपपातकिनस्त्वेवमेभिर्नानाविधैर्व्रतैः11.107॥
इन पूर्वोक्त व्रतों द्वारा महापातकी अपने पापों का नाश करे और उपपातकी आगे कहे अनेक प्रकार  व्रतों से अपने पाप का नाश करे। 
The worst sinner can observe the penances described here to get rid of his sins while one who has commuted minor sins may follow the penances described next.
उपपातकसंयुक्तो गोघ्नो मासं यवान्पिबेत्।
कृतवापो वसेद् गोष्ठे चर्मणा तेन संवृतः11.108॥
गौ वध करने वाला उपपातकी एक मास पर्यन्त यवागू को पीये और शिखा सहित मुण्डन कराकर, उसी मरी हुई गाय के चमड़े को ओढ़कर गोशाला में वास करे। 
The sinner of killing a cow should drink Yavagu for one month, wear the hide-skin of the cow killed by him, live in a cow shed for rectifying this minor sin.
चतुर्थकालमश्नीयादक्षारलवणं मितम्।
गोमूत्रेणाचरेत्स्नानं द्वौ मासौ नियतेन्द्रियः11.109॥
जितेन्द्रिय होकर दो मास तक नित्य गोमूत्र से स्नान करे, तीन शाम उपवास कर चौथे शाम को खाना खाये, नमक का त्याग कर परिमित हविष्य भोजन करे। 
The culprit of killing a cow should take bath in cow's urine for two months, skip three dinners and take dinner on the fourth day, discard using of salt and eat the limited food meant for offerings in a Yagy, by restraining his organs.
Cow's urine works as medicine for hundreds of ailments. Its advised that one should drink cow's urine in some incurable diseases. Never consume the milk or urine of such cows which roam in the cities eating waste dumped by house hold or are ill. It has been proved that cow's milk contain traces of Gold.
दिवानुगच्छेदगास्तास्तु तिष्ठन्नूर्ध्वं रजः पिबेत्।
शुश्रूषित्वा नमस्कृत्य रात्रौ वीरासनं वसेत्11.110॥
दिन में गौवों के पीछे-पीछे, उनके पैर की उड़ती हुई धूलि को सहता हुआ घूमे। रात में उनकी सेवा कर, उन्हें प्रणाम करके, वीरासन में उनके करीब बैठे। 
Having killed the Brahmn or mated his teacher's wife, one should wander behind the cows tolerating the dust raised by them. At night he should serve them fodder, give them water to drink, clean their place of sitting, bow in front of them and sit in Veerasan throughout the night near them.
Muslims, Christians  and others who slaughter the cow and eat beef perhaps do not know the guilt-sin they are committing; for which they to serve in hells for a long period of time.
तिष्ठन्तीष्वनुतिष्ठेत्तु व्रजन्तीष्वप्यनुव्रजेत्।
आसीनासु तथासीनो नियतो वीतमत्सरः11.111॥
गौ के खड़ी होने पर वह खुद भी खड़ा हो जाये, जब वह चले तो खुद भी चले और  बैठने पर खुद भी बैठ जाये। यह कार्य वह तीन मास तक नियमपूर्वक क्रोध-परेशानी रहित होकर करे। 
One who is undergoing penances should stand when the cow stand, sit when it sits & move when it moves. He should do it untiredly without getting angry-irritated for three months regulatory.
आतुरामभिशस्तां वा चौरव्याघ्रादिभिर्भयैः।
पतितां पङ्कलग्नां वा सर्वौपायैर्विमोचयेत्11.112॥
जो गाय रोगग्रस्त हो, व्याघ्र आदि दुष्टों से भयभीत हो, गिर पड़ी हो या कीचड़ में फँसी हो, उसका सब उपायों से उद्धार करे। 
One should help the cow by all means which is diseased, afraid of beasts (wolfs, leopards, tiger lion etc.) or the humans ready to kill her, fallen down, struck in mud.
उष्णे वर्षति शीते वा मारुते वाति वा भृशम्।
न कुर्वीतात्मनस्त्राणं गोरकृत्वा तु शक्तितः11.113॥
गर्मी, वर्षा, जाड़े और जिस समय बड़ी तेजी से हवा चल रही हो, उस समय गौ की रक्षा किये बिना, अपने रक्षा न करे। 
One should protect the cow prior to his own safety, when its too hot, too cold, too rainy or fast wind is blowing. 
आत्मनो यदि वाऽन्येषां गृहे क्षेत्रेऽथवा खले।
भक्षयन्तीं न कथयेत्पिबन्तं चैव वत्सकम्11.114॥
अपने या अन्य के गृह में अथवा खेत में या खलियान खाती हुई गौ को और दूध पीते हुए बछड़े को न रोके और दूसरे से कार्य  लिए कहे। 
One should neither obstruct a cow eating in his own house or other's barn-threshing floor or the calf drinking milk, instead he may instruct someone else to do this.
अनेन विधिना यस्तु गोघ्नो गामनुगच्छति।
स गोहत्याकृतं पापं त्रिभिर्मासैर्व्यपोहति11.115॥
इस विधि से जो गौ हत्या करने वाला, गौ की सेवा करता है, वह  तीन मास में ही गोहत्या के पाप से छूट जाता है। 
One who serves the cows by this method, for three months, is relieved of the sin of killing a cow.
वृषभैकादशा गाश्च दद्यात्सुचरितव्रतः।
अविद्यमाने सर्वस्वं वेदविद्भ्यो निवेदयेत्11.116॥
विधि पूर्वक, भली भाँति व्रत करके, वैदिक ब्राह्मण को एक बैल और दस गाय दे। यदि इतनी गौ न हों तो उसके पास जो कुछ हो, वह सब ब्राह्मण को दे दे। 
The killer of cow should observe fast with due procedures after the penances and donate one ox and ten cows to a Brahmn who lives according to Vaedic tenets-procedure and style. If he is short of ten cows, he should give every thing that he possesses to the Brahmn.
एतदेव व्रतं कुर्युरुपपातकिनो द्विजाः।
अवकीर्णिवर्ज्यं शुद्ध्यर्थं चान्द्रायणमथापि वा11.117॥ 
अवकीर्णी (व्रत भ्रष्ट) को छोड़कर, उपपातकी द्विज पाप शुद्ध्यर्थ पूर्वोक्त व्रत को करे अथवा चान्द्रायण व्रत करे।
Baring the one who could not complete the fast under taken by him, the Brahmn who has committed minor sins should adopt the fasts described in earlier tenet or may observe Chandrayan fast.
अवकीर्णी तु काणेन गर्दभेन चतुष्पथे।
पाकयज्ञविधानेन यजेत निर्ऋतिं निशि11.118॥
(अवकीर्णी भवेद् गत्वा ब्रह्मक्षारी च योषितम्)   
अवकीर्णी (व्रत भ्रष्ट) रात को काने गधे के साथ चौराहे पर पाकयज्ञ की विधि से निर्ऋति देवता यजन करे। 
One who failed to complete his fast should perform Pak Yagy at the road crossings during night praying the Nirrati Devs-demigods accompanied by an ass blind of one eye.
पाकयज्ञ :: वृषोत्सर्ग और गृहप्रतिष्ठा आदि के समय किया जाने वाला होम जिसमें खीर की आहुति दी जाती है। पंच महायज्ञ में ब्रह्मयज्ञ के अतिरिक्त अन्य चार यज्ञ :- वैश्वदेव, होम बलिकर्म, नित्य श्राद्ध और अतिथि भोजन, हैं। शूद्र को भी पाक यज्ञ (वह यज्ञ जिसमें हिंसा न हो पाक-शुद्ध हो) का अधिकार है। ऋग्वेद का पाकयज्ञ अन्न से ही अधिक सम्बन्धित है। उसमें हिंसा का स्थान नहीं है। मनु ने कामायनी के आरम्भ में यही पाकयज्ञ किया था, जो ऋषियों के अनुकूल है। 
नैर्ऋति देव :: ये नैर्ऋत्य कोण के स्वामी हैं। ये सभी राक्षसों के अधिपति और परम पराक्रमी हैं। दिक्पाल निर्ऋति के लोक में जो राक्षस रहते हैं, वे जाति मात्र के राक्षस हें। आचरण में वे पूर्णरूप से पुण्यात्मा हैं। वे श्रुति और स्मृति के मार्ग पर चलते हैं। वे ऐसा खान-पान नहीं करते, जिनका शास्त्रों में विधान नहीं है। वे पुण्य का अनुष्ठान करते हैं। ये पालकी पर चलते हैं। इनका तेज काफी प्रखर है।[मत्स्य पुराण]
इन्हें सभी प्रकार के भोग सुलभ हैं। निर्ऋति देवता भगवदीय जनों के हित के लिए पृथ्वी पर आते हैं।[स्कन्द पुराण]
इनका वर्ण शरीर गाढ़े काजल की भाँति काला है तथा बहुत विशाल है। ये पीले आभूषणों से भूषित और हाथ में खड्ग लिये हुए हैं। राक्षसों का समूह इन्हें चारों ओर से घेरे रहता है।
हुत्वाऽग्नौ विधिवद्होमानन्ततश्च समेत्यृचावा।
वातेन्द्रगुरुवह्नीनां जुहुयात्सर्पिषाऽहुतीः11.119॥
विधिवत अग्नि में हवन करने के बाद "समासिञ्चन्तुमरुतः" इस ऋचा के साथ वायु, इन्द्र, वृहस्पति और अग्नि को घी  आहुति दे।  
Having completed offering in holy fire, the seeker of penances should make offering to Indr-king of demigods, Vayu (Pawan, air),  Brahaspati and fire, by reciting "Samasinchntumaturt:" and pour ghee in the Agnihotr fire.
कामतो रेतसः सेकं व्रतस्थस्य द्विजन्मनः।
अतिक्रमं व्रतस्याहुर्धर्मज्ञा ब्रह्मवादिनः11.120॥
जो व्रतस्थ-ब्रह्मचारी द्विज इच्छा से वीर्य सिंचन करता है, उसका व्रत नष्ट है। धर्मज्ञ वेदवादियों ने ऐसा कहा है। 
The learned & followers of Veds have opined that if the celibate or one who has under gone fasting involves in intercourse or discharges his sperms, his celibacy, endeavour-Vrat, penances, oblations are lost.
मारुतं पुरुहूतं च गुरुं पावकमेव च।
चतुरो व्रतिनोऽभ्येति ब्राह्मं तेजोऽवकीर्णिनः11.121॥
अबकीर्णी (व्रत भंग हुए) ब्रह्मचारी का ब्रह्मतेज, वायु, इंद्र, वृहस्पति और अग्नि  देवताओं के पास चला जाता है। 
The spiritual powers-aura of a celibate, who could not keep up his fasting-goals is distributed amongest Pawan Dev, Indr Dev, Dev Guru Brahaspati and Agni Dev.
एतस्मिन्नेनसि प्राप्ते वसित्वा गर्दभाजिनम्।
सप्तागारांश्चरेद्भैक्षं स्वकर्म परिकीर्तयन्11.122॥
इस पाप के (अवकीर्ण होना) हो जाने पर ब्रह्मचारी गदहे का चमड़ा पहनकर और पूर्वोक्त गदर्भ यज्ञ करके, अपने पाप को कहता हुआ, सात घरों से भिक्षा माँगकर लाये। 
The celibate who could not keep up his fasting should wear the skin of a donkey and beg from seven houses, describing his sin in front of the household.
तेभ्यो लब्धेन भैक्षेण वर्तयन्नेककालिकम्।
उपस्पृशंस्त्रिषवणं त्वब्देन स विशुद्ध्यति11.123॥
उस पाई हुई भिक्षा से दिन और रात में केवल एक बार भोजन कर और तीन बार स्नान करता हुआ वकीर्ण एक वर्ष में उस पाप से शुद्ध होता है। 
The celibate who could not keep up his fasting, becomes sin free in one year by eating only once in a day, out of the beggings he has received, bathing thrice a day.
जातिभ्रंशकरं कर्म कृत्वाऽन्यतममिच्छया।
चरेत् सांतपनं कृच्छ्रं प्राजापत्यमनिच्छया11.124॥
अपनी इच्छा से कोई अपकर्म जातिभ्रंशकर पापों में करे तो कृच्छ्रसांतपन व्रत करे और अनिच्छा से किया गया हो तो आगे कहे हुए प्राजापत्य व्रत करे।  
One who has committed a bad deed-sin intentionally, should perform the Krachchhsantpan Vrat meant for those who have been lowered in caste system  but if is has been done unwillingly, he should subject himself to Prajapaty Vrat described next.
संकरापात्रकृत्यासु मासं शोधनमैन्दवम्। 
मलिनीकरणीयेषु तप्तः स्याद्यावकैस्त्र्यहम्11.125॥
अपनी इच्छा से संकरीकरण अथवा अपात्रिकरण इन दोनों पापों में से किसी एक को करने वाला किये हुए पाप के शान्त्यर्थ चान्द्रायण व्रत करे और मलिनीकरण पापों के शान्त्यर्थ तीन दिन पर्यन्त गर्म लपसी पीवे। 
One who has committed either Sankarikaran (production of mixed race, hybrid castes) or Apatrikaran (unsuitability) sins should subject himself to Chandrayan Vrat to get relieved-atonement from the impact of these. One who did Malinikaran (impurity) sins should drink hot Lapsi (barley-gruel) for three consecutive days.
लपसी :: Halva (wheat floor fried with ghee, mixed with Jaggery or sugar, added with milk or water) with excess of water, porridge.
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तुरीयो ब्रह्महत्यायाः क्षत्रियस्य वधे स्मृतः।
वैश्येऽष्टमांशो वृत्तस्थे शूद्रे ज्ञेयस्तु षोडशः11.126॥
क्षत्रिय का वध करने पर ब्रह्महत्या का चौथा भाग, अपने काम में लगे हुए वैश्य का वध करने  पर आठवाँ भाग और शूद्र का वध करने पर सोलहवाँ भाग प्रायश्चित करे। 
For the atonement of killing a Kshatriy one should commit himself to 1/4 of the penances meant for Brahmhatya, 1/8 for killing a Vaeshy busy in his deals and 1/16 for killing a Shudr.
अकामतस्तु राजन्यं विनिपात्य द्विजोत्तमः।
वृषभैकसहस्रा गा दद्यात्सुचरितव्रतः11.127॥
अनिक्षा या अनजाने में क्षत्रिय की हत्या करे तो ब्राह्मण विधिवत् व्रत का आचरण करके एक बैल और एक सहस्त्र गौ ब्राह्मणों को दे। 
If a Brahmn unknowingly-unintentionally or against his will kills a Kshatriy, he should follow the Vrat-penances systematically as per Shastr and donate one bull and 1,000 cows to Brahmns. 
त्र्यब्दं चरेद्वा नियतो जटी ब्रह्महणो व्रतम्।
वसन्दूरतरे ग्रामाद् वृक्षमूलनिकेतनः11.128॥
अथवा जटा बढ़ाकर गाँव के बाहर किसी वृक्ष के नीचे रहकर, तीन वर्ष तक ब्रह्म हत्या का प्रायश्चित करे। 
Alternatively, he may grow his hair and reside out side the village under a tree for three years and follow the penances meant for killing a Brahman.
एतदेव चरेदब्दं प्रायश्चित्तं द्विजोत्तमः।
प्रमाप्य वैश्यं वृत्तस्थं  दद्याच्चैकशतं गवाम्11.129॥
अपनी वृत्ति में लगे हुए वैश्य का वध करे तो वर्ष तक पूर्वोक्त प्रायश्चित करे और एक सौ गौ ब्राह्मणों को दान में दे। 
One may follow-adopt the penances quoted above in case he happen to kill a Vaeshy busy in his business and donate 100 cows to Brahmans.
एतदेव व्रतं कृत्स्नं षण्मासांशूद्रहा चरेत्।
वृषभैकादशा वाऽपि दद्याद्विप्राय गाः सिताः11.130॥
अज्ञानवश शूद्र वध करने वाला यही पूर्वोक्त व्रत को छः मास तक करे अथवा एक सफ़ेद बैल दस गाय ब्राह्मण को दे। 
One should undergo the penances meant in earlier tenets for killing a Shudr due to ignorance for six months and donate one white ox-bull and ten cows to a Brahman. 
मार्जारनकुलौ हत्वा चाषं मण्डूकमेव च।
श्वगोधो लूककाकांश्च शूद्रहत्याव्रतं चरेत्11.131॥
बिल्ली, नेवला, नीलकण्ठ पक्षी, मेघा, कुत्ता, गोह, उल्लू और कौआ; इनमें किसी को मारने पर शूद्र के वध का प्रायश्चित करे। 
One should perform the penances meant for killing a Shudr for killing a cat, mongoose, Neel Kanth (blue jay-a bird), frog, a dog, an iguana or the crow. 
पयः पिबेत् त्रिरात्रं वा योजनं वाऽध्वनो व्रजेत्।
उपस्पृशेत्स्रवन्त्यां वा सूक्तं वाऽब्दैवतं जपेत्11.132॥
अथवा तीन रात तक दूध ही पीकर रहे या एक योजन पैदल चले या नदी में स्नान करे अथवा आपोहिष्ठेत्यादि ऋचा का जाप करे। 
As an alternative one may survive just by drinking milk for three consecutive nights or walk one Yojan on foot or bathe in a river or recite Apohishthetyadi hymn-verse.
अभ्रिं कार्ष्णायसीं दद्यात्सर्पं हत्वा द्विजोत्तमः।
पलालभारकं षण्ढे सैसकं चैकमाषकम्॥11.133॥
साँप को मारकर ब्राह्मण लोहे का नोकदार डण्डा और हिजड़े मारकर एक भार पुआल और एक मासा सीसा ब्राह्मण को दे। 
Having killed a snake one should give a pointed-sharp iron rod and after killing an eunuch one Bhar of paddy and one Masha of lead should be given-donated to the Brahman.
घृतकुम्भं वराहे तु तिलद्रोणं तु तित्तिरौ।
शुके द्विहायनं वत्सं क्रौञ्चं हत्वा त्रिहायनम्॥11.134॥
वराह-शूकर (सूअर) मारने पर एक घड़ा भर घी, तीतर को मारने पर एक द्रोण तिल, सुग्गा-तोता मारने पर दो वर्ष का बछड़ा और क्रौञ्च पक्षी को मारने पर तीन वर्ष का बछड़ा ब्राह्मण को दे। 
Having killed a pig one should offer one pitcher of Ghee, for killing a partridge one Dron of sesame seeds, for killing a parrot a calf of 2 years and for killing a crane a calf of 3 years should be given to the Brahman.
हत्वा हंसं बलाकां च बकं बर्हिणमेव च।
वानरं श्येनभासौ च स्पर्शयेत् ब्राह्मणाय गाम्11.135॥ 
हंस, बलाका (मादा बगुला), बगुल (वक), मोर, वानर, बाज, भास-शकुंत अथवा गिद्ध पक्षी; इनमें से किसी को मारने पर एक गौ स्पर्श कर ब्राह्मण को दे। 
One should offer a cow after touching it, to the Brahmn if any of these is killed by him :- Swan, Balaka-female wader, heron, peacock, Vanar, falcon or Bhas-Vulture or Shakunt bird.
वासो दद्याद्धयं हत्वा पञ्च नीलान्वृषान्गजम्।
अजमेषावनड्वाहं खरं हत्वैकहायनम्11.136॥ 
घोड़े को मारने पर वस्त्र, गज-हाथी का वध करने पर पाँच नीले बैल, बकरा और भेड़ को मारने पर एक बैल और गधे को मारने पाए एक वर्ष का बछड़ा ब्राह्मण को दान में दे। 
One should give cloths on killing a horse, 5 blue bulls-oxen for killing an elephant, on killing goat and sheep one ox and on killing an  ass one year old calf should be given to the Brahman.
क्रव्यादांस्तु मृगान् हत्वा धेनुं दद्यात् पयस्विनीम्।
अक्रव्यादान् वत्सतरीमुष्ट्रं हत्वा तु कृष्णलम्11.137॥
कच्चे माँस को खाने वाला पशुओं को मारने पर दुधारु गाय, तृण, घास-पात खाने वाले शाखाहारी पशुओं यथा हिरण को मारने पर जवान बछिया और ऊँट को मारने पर रत्ती भर सोना दान करे। 
 Those who eat raw meat should donate a milch-cow to the Brahman on killing herbivores like deer a young cow and on killing a camel one Ratti (unit od weight) gold should be donated to the Brahman.
जीनकार्मुकबस्तावीन् पृथग् दद्याद् विशुद्धये।
चतुर्णामपि वर्णानां नारीर्हत्वाऽनवस्थिताः11.138॥
चारों वर्णों की अव्यवस्थित-दुराचारिणीं स्त्रियों को मारकर, शरीर शुद्धयर्थ क्रमशः (ब्राह्मणादि क्रम से) चर्मपुट, धनुष, बकरा और भेड़ दान करें। 
On killing adulterous-characterless women of the four Varn-caste one should donate leather goods, bow, goat-ram and sheep for purifying the body in order of women's caste i.e., Brahman, Kshatriy, Vaeshy and Shudr.
दानेन वधनिर्णेकं सर्पादीनामशक्नुवन्।
एकैकशश्चरेत्कृच्छ्रं द्विजः पापापनुत्तये11.139॥
यदि द्विज सर्पादिकों के मारने का प्रायश्चित करके दान करने में असमर्थ हो तो प्रत्येक पाप के शान्त्यर्थ-निवारण हेतु एक कृच्छ्र प्रजापत्य व्रत को करे। 
If the Swarn-upper caste is unable to perform penances through donations, due to lack of money, he should subject himself to performance of Krachchhr Prajapaty Vrat. 
अस्थिमतां तु सत्त्वानां सहस्रस्य प्रमापणे।
पूर्णे चानस्यनस्थ्नां तु शुद्रहत्याव्रतं चरेत्11.140॥
हड्डी वाले एक सहस्त्र जीवों का वध करने पर तथा बहुत से बिना हड्डी वाले जानवरों का वध करने पर शुद्र वध का प्रायश्चित करना चाहिये। 
One should subject himself to penances for killing a Shudr, equivalent to killing of thousands of bony animals and those without bones.
किञ्चिदेव तु विप्राय दद्यादस्थिमतां वधे।
अनस्थ्नां चैव हिंसायां प्राणायामेन शुध्यति11.141॥
हड्डी वाले जीवों का वध करने पर ब्राह्मण को कुछ दे देवे। बिना हड्डी वाले जीवों की हत्या करने पर प्राणायाम से ही शुद्धि हो जाती है। 
On killing bony animals, one should donate something to the Brahman and perform Pranayam to cleanse himself for killing the organism without bones.
फलदानां तु वृक्षाणां छेदने जप्यमृक्शतम्
गुल्मवल्लीलतानां च पुष्पितानां च वीरुधाम्11.142॥
फल देने वाले वृक्ष, गुल्म, बल्ली, लतर और फैलने वाले वृक्षों को काटने पर एक सौ बार गायत्री का जाप करे। 
For cutting fruit trees, shrubs, creepers, vines, the trees which spread wide or flowering plants, one should recite Gayatri Mantr 100 times after becoming fresh.
अन्नाद्यजानां सत्त्वानां रसजानां च सर्वशः।
फलपुष्पोद्भवानां च घृतप्राशो विशोधनम्11.143॥
अनाजों में उत्पन्न जीवों का तथा रसों (गुड़ आदि में) और फल-पुष्पों में उत्पन्न जीवों का वध करने पर घी चाट लेने से ही शुद्धि हो जाती है। 
Cleansing comes just by licking Ghee on killing organisms-insects etc. present in food grains, juice extracts like sugar cane, flowers & fruits.
Wine, vinegar are formed by fermentation and worms grow in them which are removed-killed. Fruits, vegetables, flowers have insects, worms in them.
कृषिजानामोषधीनां जातानां च स्वयं वने।
वृथालम्भेऽनुगच्छेद्गां दिनमेकं पयोव्रतः11.144॥
जोते हुए खेत में उत्पन्न औषधियों और जंगल में स्वयं उत्पन्न वृक्षों-खरपतवार को वृथा काटने से एक दिन केवल दूध ही पीकर रहे और गाय के पीछे-पीछे घूमे। 
One should depend over just milk for a day and roam behind the cows if he happen to cut the trees in the jungle, which have grown up by themselves or removal of weeds from the fields.
Normally, farmers observe Amavasya Vrat to get rid of necessary evils like killing of insects, worms, weeds or removal of undesirable trees-plants, shrubs. They conduct Hawan-Pooja, Saty Narayan Katha as well and donate some money, food, useful goods, clothing to the priests-Brahmans.
एतैर्व्रतैरपोह्यं स्यादेनो हिंसासमुद्भवम्।
ज्ञानाज्ञानकृतं कृत्स्नं शृणुतानाद्यभक्षणे11.145॥
ज्ञान पूर्वक-जानबूझ कर अथवा अज्ञानपूर्वक किये हुए हिंसा जनित पापों का प्रायश्चित पूर्वोक्त विधि से दूर करे। अब अभोग्य  पदार्थ भक्षण के प्रायश्चितों को सुनों।
One should get rid of the sins done unknowingly or willing by adopting the procedures-penances described earlier. Now, listen to the penances for the removal of sins committed by eating non eatables (meat, eggs, fish, flesh, wine etc.). 
अज्ञानाद्वारुणीं पीत्वा संस्कारेणैव शुध्यति।
मतिपूर्वमनिर्देश्यं प्राणान्तिकमिति स्थितिः11.146॥
अनजाने में-अज्ञान से वारुणी-शराब पी लेने पर पुनः संस्कार से शुद्ध होता है। किन्तु ज्ञान पूर्वक-इच्छापूर्वक पीने से जिस प्रायश्चित से प्राणान्त हो जाये, वैसा ही प्रायश्चित उसके लिये हो सकता है। यही शास्त्र का निर्णय है। 
One can be purified for drinking Varuni (wine, liquor, alcohol) unknowingly-unintentionally. But if it is consumed knowingly-willingly one has to adopt such penances, which leads to death. This is the dictate of the scriptures.
अपः सुराभाजनस्था मद्यभाण्डस्थितास्तथा।
पञ्चरात्रं पिबेत्पीत्वा शङ्खपुष्पीश्रितं पयः11.147॥
सुरापात्र (पैष्टीपात्र) में अथवा मद्य के पात्र में रखा हुआ जल पी लेने से शंखपुष्पी के साथ औटाया हुआ दूध, पाँच रात्रि पीये। 
If one happen to drink water stored in a wine pot, he should drink milk in which Shankh Pushpi (a medicinal herb) has been boiled, for five consecutive nights.
This is an antidote for curing the adverse effects of drinking wine.
स्पृष्ट्वा दत्वा च मदिरां विधिवत्प्रतिगृह्य च।
शूद्रोच्छिष्टाश्च पीत्वापः कुशवारि पिबेत्र्यहम्11.148॥
मदिरा को स्पर्श कर विधिवत् उसे ग्रहण करने पर या शूद्र का जूठा जल पीने पर, तीन दिन तक कुशा मिलाकर औटाया हुआ जल पिये। 
One should drink water which has been boiled with Kush-grass, for three days if he happen to drink Madira-wine after touching-confirming that its wine or drinking the water left over by a Shudr after drinking. 
ब्राह्मणस्तु सुरापस्य गन्धमाघ्राय सोमपः।
प्राणानप्सु त्रिरायम्य घृतं प्राश्य विशुद्ध्यति11.149॥
सोम पीने वाला ब्राह्मण यदि सुरा पीने वाले के मुँह की बदबू-गंध को सूँघ ले तो वह जल के भीतर तीन बार प्राणायाम करके, घी चाट कर शुद्ध होता है। 
The Brahmn who drinks the divine Som, should perform Pranayam three times in water and lick Ghee if he happen to smell the foul odour emanated out of the mouth of a drunkard.
अज्ञानात्प्राश्य विण्मूत्रं सुरासंस्पृष्टमेव च।
पुनः संस्कारमर्हन्ति त्रयो वर्णा द्विजातयः11.150॥
तीनों द्विजाति वर्ण, यदि अज्ञान से विष्ठा, मूत्र या मदिरा मिला हुआ कोई रस आस्वादन कर लें, तो फिर से संस्कार कराने योग्य हो जाते हैं। 
The Upper castes (Brahmn, Kshatriy & the Vaeshy) if happen to drink or eat any thing mixed-contaminated by faecal matter (shit), urine or wine become impure and they should under go Sanskars-rites yet again.
The food grain, eatables, vegetables are grown in sewer's-gutter's highly contaminated-polluted water. They are dangerous for the health of the users. The irrigation canal which has its source near Kalindi Kunj in Noida is full of germs, viruses, bacteria, microbes and the consecutive governments are wasting huge sums of money for cleaning river without any visible output. Most of the money is pocketed by the officials, politicians. Water supplied to Noida residents too is extremely polluted and create health hazards for the masses, without moving the politicians & the bureaucrats. 
All efforts during the last 37 years failed to wake up the politicians and the New Okhla  Industrial Development Authority officials. The corruption is too deep rooted and eradication seems to be impossible.
No MLA or MP made efforts to supply clean drinking-potable water in Noida. We elect the wretched people as MP  and MLA.
वपनं मेखला दण्डो भैक्षचर्या व्रतानि च।
निवर्तन्ते द्विजातीनां पुनःसंस्कारकर्मणि11.151॥
द्विजातियों के पुनः संस्कार कर्म में मुण्डन, मेखला, दण्ड, भिक्षा और ब्रह्मचर्य व्रत नहीं करना होता। 
Repetition of Sanskars is exempted from Mundan-tonsure, Mekhla-Janeu (wearing of sacred thread around the loin), carrying of staff, begging and celibacy.
अभोज्यानां तु भुक्त्वान्नं स्त्रीशूद्रोच्छिष्टमेव च।
जग्ध्वा मांसमभक्ष्यं च सप्तरात्रं यवान्पिबेत्11.152॥
जिनका अन्न नहीं खाना चाहिये, उनका अन्न खाने पर और स्त्री, शूद्र का जूठा खाने पर और अभक्ष्य-माँस आदि खा लेने पर, सात रात्रि तक यवाग् या जल और जौ का सत्तू पीये। 
One should drink Yavagu or drink Sattu (gruel, flour of fried barley mixed with jaggery) of barley for seven nights, in case he has eaten food from the house of one prohibited by scriptures, left over food of woman or Shudr or eating undesirable goods like meat, shit etc.
शुक्तानि च कषायांश्च पीत्वा मेध्यान्यपि द्विजः।
तावद्भवत्यप्रयतो यावत्तन्न व्रजत्यधः11.153॥
सिरका और अर्क शुद्ध होते हुए भी उसको पीने वाला, द्विज तब तक अपवित्र रहता है, जब तक कि यह शरीर से निकल नहीं जाता। 
The upper caste-Swarn remains impure till vinegar or extracts (wine etc.) remains in the body.
विड्वराहखरोष्ट्राणां गोमायोः कपिकाकयोः।
पाश्य मूत्रपुरीषाणि द्विजश्चान्द्रायणं चरेत्11.154॥
गाँव में रहने वाले सूअर, गधा, ऊँट, सियार, बन्दर  कौए का विष्ठा खा लेने पर चान्द्रायण व्रत करे। 
One should commit himself to Chandrayan Vrat if he happen to eat the shit of pig, donkey, camel, jackal, monkey or crow living in the village.
शुष्काणि भुक्त्वा मांसानि भौमानि कवकानि च।
अज्ञातं चैव सूनास्थमेतदेव व्रतं चरेत्11.155॥
सूखे माँस या जिसके बारे में पता न हो तथा जो माँस कसाई के यहाँ हो तथा गोबर छत्ता खा लेने पर भी चान्द्रायण व्रत करे। 
One should conform to Chandrayan Vrat if he happen to eat dry meat or the meat the origin of which in not known in addition to the meat obtained from the butcher or eating mushrooms.
क्रव्यादसूकरोष्ट्राणां कुक्कुटानां च भक्षणे।
नरकाकखराणां च तप्तकृच्छ्रं विशोधनम्11.156॥ 
कच्चा माँस खाने वाले पशु, सूअर, ऊँट, मुर्गा, कौआ और गधा; इनमें से किसी माँस अपनी जानकारी में खाये तो तृप्तकृच्छ व्रत करे। 
If one consumes the meat of beasts-carnivorous animals, those who eat meat, pig, camel, cock, crow or donkey; one should purify himself by resorting to Taptkrachchh Vrat.
मासिकान्नं तु योऽश्नीयादसमावर्तको द्विजः।
त्रीण्यहान्युपवसेदेकाहं चोदके वसेत्॥11.157॥
जिसका समावर्तन संस्कार नहीं हुआ हो, ऐसा द्विज-ब्रह्मचारी यदि मासिक श्राद्ध सम्बन्धी अन्न खाये तो उसे तीन दिन तक उपवास करके मात्र जल पीकर रहना चाहिए। 
समावर्तन 12 वाँ संस्कार है। गुरुकुल में शिक्षा पूर्ण होने के पश्चात जब जातक की गुरुकुल से विदाई की जाती है तो आगामी जीवन के लिये उसे गुरु द्वारा उपदेश देकर विदाई दी जाती है। 
The celibate who has not undergone due advice from the Achary-Guru on completion of his education, happen to attend the monthly Shraddh Karm, should subject himself to three days of fasting depending solely over water.
ब्रह्मचारी तु योऽश्नीयान्मधु मांसं कथञ्चन।
स कृत्वा प्राकृतं कृच्छ्रं व्रतशेषं समापयेत्11.158॥
जो ब्रह्मचारी किसी प्रकार से मधु, माँस खा ले तो वह प्रजाप्रत्य व्रत को करके ब्रह्मचर्य व्रत को समाप्त करे। 
If the celibate happen to eat meat or honey, he should conform to Prajapaty Vrat and complete his Brahmchary Vrat.
बिडालकाकाखूच्छिष्टं जग्ध्वा श्वनकुलस्य च।
केशकीटावपन्नं च पिबेद् ब्रह्मसुवर्चलाम्11.159॥
बिल्ली, कौआ, मूसा, कुत्ता और नेवले, जूठा और केश, कीड़े से व्याप्त अन्न को खा लेने पर ब्रह्म सुवर्चला (क्वाथ) को पीये। 
In case he happen to eat the left over food of cat, rat, dog, an ichneumon or the food infested with insects-worms or hair, he should drink the extract-decoction of called Brahm Suvarchla.
BRAHM SUVARCHLA :: Centella asiatica, Umbelliferae, मण्डूकपर्णी, सरस्वती, माण्डुकी, सुवर्चला, ब्राह्मी।
Its used to energige the brain, treat mental disorder, enhance memory, soth (oedema), Pandu (anaemia), Jat (fever) since ancient times in India. It is a prostate herb, rooting at the nodes.
अभोज्यमन्नं नात्तव्यमात्मनः शुद्धिमिच्छता।
अज्ञानभुक्तं तूत्तार्यं शोध्यं वाप्याशु शोधनैः11.160॥
अपनी शुद्धि चाहने वाला अभोज्य-अभक्ष्य अन्न को न खाये और यदि अज्ञान वश-अनजाने में खाले तो उसे उलटी करके निकाल दे अथवा शीघ्र  प्रयाश्चित द्वारा  शुद्ध कर ले। 
One desirous of his purity, should not eat the contaminated-adulterated, undesirable, non-vegetarian food. If he has eaten something of this kind unknowingly, he must vomit it out or adopt suitable penances for this as soon as possible.
एषोऽनाद्यादनस्योक्तो व्रतानां विविधो विधिः।
स्तेयदोषापहर्तॄणां व्रतानां श्रूयतां विधिः11.161॥
इस प्रकार अभक्ष्य पदार्थ भक्षण के अनेक प्रायश्चित कहे। अब चोरी के दोषों को हरने वाले प्रायश्चितों की विधि सुनो। 
In this manner the penances to rectify the defects, sins generated through eating of undesirable food have been discussed. Now, listen to the penances meant for the purification-eradication of the defects-caused by theft-stealing.
धान्यान्नधनचौर्याणि कृत्वा कामाद् द्विजोत्तमः।
स्वजातीयगृहादेव कृच्छ्राब्देन विशुध्यति11.162॥
ब्राह्मण इच्छा से अर्थात जानबूझकर, अपने स्वजातीय के घर से धान्य, अन्न (दाल-भात, रोटी और धन की चोरी करे तो एक वर्ष तक कृच्छ्र प्रजापत्य व्रत को करने से शुद्ध होता है। 
The Brahmn attains purity by observing Krachchhr Prajapty Vrat for one year, if he happen to commit theft of food, food grain, money from his own caste-fellow people.
मनुष्याणां तु हरणे स्त्रीणां क्षेत्रगृहस्य च।
कूपवापीजलानां च शुद्धिश्चान्द्रायणं स्मृतम्11.163॥
मनुष्य, स्त्री, खेत, गृह, कूँआ और बाबली का जल चुराने वाला चान्द्रायण व्रत करने से शुद्ध होता है। 
One who happen to steal water of a man or woman, fields-crops, home, well or pond-reservoir is purified by observing penances pertaining to Chandrayan Vrat.
द्रव्याणामल्पसाराणां स्तेयं  कृत्वान्यवेश्मतः। 
चरेत्सांतपनं कृच्छ्रं तन्निर्यात्यात्मशुद्धये11.164॥
दूसरे के घर से अल्प मूल्य की वस्तु चुराने पर आत्मशुद्धयार्थ वह वस्तु उसके मालिक को लौटा दे और कृच्छ्र सांतपन व्रत करे।   
One should return the good with low price stolen by him to the owner and observe Krachchhr Santpan Vrat for purification, as a penance.
भक्ष्यभोज्यापहरणे यानशय्यासनस्य च।
पुष्पमूलफलानां च पञ्चगव्यं विशोधनम्11.165॥
भक्ष्य (मोदकादि), भोज्य (दूध आदि), सवारी, शय्या, आसन, फूल, मूल और फल को चुराने पर पञ्चगव्य प्राशन से शुद्धि होती है। 
One who steals eatables like Laddhu, milk, vehicles, seat, flowers, roots, fruits should drink Panch Gavy for his purification as a penance.
तृणकाष्ठद्रुमाणां च शुष्कान्नस्य गुडस्य च।
चेलचर्मामिषाणां च त्रिरात्रं स्यादभोजनम्11.166॥
तृण, काष्ठ, पेड़, सूखा अन्न, गुड़, वस्त्र, चमड़ा और माँस; इन सब पदार्थों में से किसी एक पदार्थ को चुराने पर तीन रात तक उपवास करे। 
One should observe fast for three nights for staling any of these :- Straw (animal feed), wood, tree, dry food grain, jaggery, cloths, leather and meat.
मणिमुक्ताप्रवालानां ताम्रस्य रजतस्य च।
अयः कांस्यौपलानां च द्वादशाहं कणान्नता॥11.167॥
मणि, मोती, मूँगा, ताँबा, चाँदी, लोहा, काँसा और पत्थर में से किसी एक को चुराने पर शुद्धि बारह दिन तक अन्न का कण खाने से होती है। 
One should survive-depend over food grain pieces for 12 days,  for staling any of these :- gems, pearls, coral, copper, silver, iron, brass or stone.
कार्पासकीटजोर्णानां द्विशफेकशफस्य च।
पक्षिगन्धौषधीनां च रज्ज्वाश्चैव त्र्यहं पयः11.168॥
सूती, रेशमी, ऊनी कपड़े, घोड़ा, बैल और पक्षी, कपूर, चन्दन और औषधि तथा रस्सी में से किसी एक की चोरी करने पर तीन दिन तक दूध पीकर रहे। 
One should survive-depend over milk for 3 days for staling any of these :- cotton, silk, wool, ox, horse (an animal with cloven hoofs or one with uncloven hoofs), a bird, perfumes, camphor, sandal wood, medicinal herbs or a rope.
एतैर्व्रतैरपोहेत पापं स्तेयकृतं द्विजः।
अगम्यागमनीयं तु व्रतैरेभिरपानुदेत्11.169॥
इन पूर्वोक्त उपायों द्वारा द्विज चोरी के पापों से शुद्ध-मुक्त होवे और अगम्या गमन के पापों को आगे कहे गए व्रतों-उपायों से नष्ट करे।  
The Brahmn should get rid of the sins caused by stealing by observing these methods and cleanse-purify himself of the sins caused by mating the non deserving women (prostitutes, low caste women, virgin girls etc.) through the methods, (procedures, penances) described next.
गुरुतल्पव्रतं कुर्याद्रेतः सिक्त्वा स्वयोनिषु।
सख्युः पुत्रस्य च स्त्रीषु कुमारीष्वन्त्यजासु च11.170॥
सगी बहन, मित्र की स्त्री, कुमारी और चण्डालिन के साथ स्त्री प्रसङ्ग करने वाला गुरु पत्नी गमन का प्रायश्चित करे। 
One who indulged in sex with his real sister, wife of a friend, virgin or the Chandalin should undergo penances meant for the removal of sins for mating with teacher's wife.
पैतृष्वसेयीं भगिनीं स्वस्रीयां मातुरेव च।
मातुश्च भ्रातुस्तनयां गत्वा  चान्द्रायणं चरेत्11.171॥ 
फुफेरी, मौसेरी, ममेरी बहनों के साथ प्रसङ्ग करके चान्द्रायण व्रत करे। 
On having sex with the cousin sisters (daughter of father's sister, mother's sister's daughter, mother's brother's daughter) one should perform Chandrayan Vrat.
It shows that the Muslims following Islam are the greatest sinner in this world. Islam is a distorted virgin of Hinduism spread by the ignorant, extremely biased, illiterate power hungry sinners by murdering innocent, helpless, unarmed people. 
Sharia too is a distorted version of Manu Smrati and Quran is a distorted-motivated version of Purans. 
These people are mongering all over the world in the form of terrorists.
China ha s done well by retaining Muslim.
एतास्तिस्रस्तु भार्यार्थे नोपयच्छेत् तु बुद्धिमान्।
ज्ञातित्वेनानुपेयास्ताः पतति ह्युपयन्नधः11.172॥
बुद्धिमान इन तीनों (फुफेरी, मौसेरी, ममेरी बहनों को) स्त्री बनाने के लिये उपयोग न करें, क्योंकि ये बहनें होने के कारण ब्याहने योग्य नहीं हैं। यदि कोई ऐसा करता है तो वह नरकगामी होता है। 
The prudent should neither have sex with these cousin sister nor marry them since, he may have suffer in the hells on this account.
In India Punjabi & South Indian Hindus do not mind marrying their cousin sisters under the influence of Muslim traitors. There are cases where the real maternal uncles marry thier real sister's daughters. All of them are sure to reach hell sooner or later. 
अमानुषीषू पुरुष उदक्यायामयोनिषु।
 रेतः सिक्त्वा जले चैव कृच्छ्रं सांतपनं चरेत्11.173॥
जो मनुष्य अमानुषी (मनुष्य से भिन्न योनि, चौपाये बगैरा) में, रजस्वला स्त्री में, योनि से भिन्न स्थान में तथा जल में वीर्यपात करता है, उसकी कृच्छ्र सान्तवन व्रत करने से शुद्धि होती है। 
One who discharges sperms in any other species other than humans, woman passing through periods-menstrual cycle, anus-homosexuality, masturbation etc. or in water, may be purified by observing Krachchhrsantvan Vrat.
All unnatural sexual activities-acts are sins.
मैथुनं तु समासेव्य पुंसि योषिति वा द्विजः।
गोयानेऽप्सु दिवा चैव सवासाः स्नानमाचरेत्11.174॥
जो द्विज पुरुष या स्त्री के साथ बैलगाड़ी (या रथ, जिसमें बैल जुते हुए हों) जल में या दिन में मैथुन करे तो उसे सचैल स्नान (जो कपड़े पहन कर होता है) करना चाहिये। 
The upper caste who indulge in sex in a bullock cart or chariot driven by oxen, in water or during the day, should bathe along with the cloths.
Sex in a moving vehicle is sin. 
चण्डालान्त्यस्त्रियो गत्वा भुक्त्वा च प्रतिगृह्य च।
पतत्यज्ञानतो विप्रो ज्ञानात्साम्यं तु गच्छति11.175॥
यदि ब्राह्मण अज्ञानवश चाण्डाल या म्लेच्छ स्त्री के साथ संभोग करे, उनका अन्न खाये अथवा उनका दान ले तो पतित हो जाता है। यदि जान-बूझकर ऐसा नहीं किया गया हो तो उसके बराबर-स्तर का हो जाता है। 
The Brahmn falls from his status-grace if he enters into sexual relations-mating with a Chandal woman of a Mallechchh woman (Muslims or Christians). If he do this unintentionally he comes to the level of these woman in caste structure-status.
A Brahman should never marry his progeny in the family of such people. These days such people advertise in matrimonial columns of News Papers under the head :: Cosmopolitans.
Thus sex with prostitutes or any woman, other than own wife, is a grave offence-sin, leading to hells.
विप्रदुष्टां स्त्रियं भर्ता निरुन्ध्यादेकवेश्मनि।
यत्पुंसः परदारेषु तच्चैनां चारयेद् व्रतम्11.176॥
स्वेच्छा से व्यभिचार में प्रवृत्त स्त्री को उसका पति एक घर में बन्द कर दे और पुरुषों को परस्त्री गमन के विषय में जो प्रायश्चित कहा है, वही करे। 
One whose wife indulges into sex with other men voluntarily should be locked in a house and her husband should perform purification rites-penances pertaining to sex with other woman.
Such women are generally criminal minded. So, one should be cautious with them. This type of woman may kill her husband as well.The current law does not permit this-closing in a house. One should divorce such a woman and then enter into purification process.
सा चेत्पुनः प्रदुष्येत् तु सदृशेनोपमन्त्रिता।
कृच्छ्रं चान्द्रायणं चैव तदस्याः पावनं स्मृतम्11.177॥ 
पूर्वोक्त प्रकार से नियन्त्रित होते हुए भी यदि वह स्त्री अपने स्वजातीय के साथ फिर व्यभिचार करे तो उसके लिये कृच्छ्र चान्द्रायण व्रत कराये।
If the woman subjected to enclosure in house again repeats the offence even with her own caste person, she should be subjected to Krachchhr Chandrayan Vrat.
Once a woman enters into sexual relations with more than one person, she never revert back-retract. 
यदि शेर के मुँह इन्सान का खून लग जाये तो वह आदमखोर बन जाता है और यही स्थिति ऐसी पतित-पथभ्रष्ट औरतों की होती है। 
यत्करोत्येकरात्रेण वृषलीसेवनाद् द्विजः।
तद्भैक्षभुज्जपन्नित्यं त्रिभिर्वर्षैर्व्यपोहति11.178॥
द्विज एक रात में चाण्डालिन के सेवन से जो पाप संचित करता है, उस को तीन वर्ष पर्यन्त भिक्षा का अन्न खाकर, गायत्री का जप करता हुआ नष्ट करता है। 
The should Brahman eradicate the sin earned by mating with the Chandalin by surviving over the grain-food obtained through alms-begging and reciting Gayatri Mantr for three years.
Such women generally lack character-morals and enter into sexual alliance with anyone, inviting sexual diseases unknowing and thereafter passing them to the sexual partners. One should never enter into sexual alliance with prostitutes, whores, society-call girls. He should be confined to his wife only.
एषा पापकृतामुक्ता चतुर्णामपि निष्कृतिः।
पतितैः सम्प्रयुक्तानामिमाः शृणुत निष्कृतीः11.179॥
यह चार प्रकार (हिंसा, अभक्ष्य, चोरी, अगम्या गमन) के पापों को करने वालों का प्रायश्चित कहा है। अब पतितों के संसर्गियों का प्रायश्चित सुनों। 
The penances-cure from the sins committed through four means :- violence, eating undesirable, theft-stealing and mating with other women have been described. Now, listen to the penances meant for the accomplices, associates or the once who roam-live with him, or accompany him.
One who deal with such people, invite trouble for himself, even without actually indulging in these nefarious (evil, wretched, criminal, sinful) activities.
संवत्सरेण पतति पतितेन सहाचरन्।
याजनाध्यापनाद्यौनान्न तु यानासनाशनात्11.180॥
पतित के साथ सवारी करने से, एक आसन पर बैठने से, उसके साथ भोजन करने से एक वर्ष में पतित हो जाता है। किन्तु उसका यज्ञ कराने, पढ़ाने या उसके साथ विवाहादि सम्बन्ध बनाने से ब्राह्मण-जातक तत्काल ही पतित हो जाता है। 
The Brahman is slurred, depraved, falls from grace by travelling, sharing seat, eating-dinning with him (the wretched, criminal, sinner) within a year but is affected immediately, if he perform his Yagy, teach him or maintain relations like marriage with him.
काजल की कोठरी में दाग़ लागे ही लागे। 
यो येन पतितेनैषां संसर्गं याति मानवः।
स तस्यैव व्रतं कुर्यात् तत्संसर्गविशुद्धये11.181॥
जो मनुष्य जिस प्रकार के पतित के साथ संसर्ग करने से पतित हुआ है, उसी पतित के ही शुद्ध होने वाले प्रायश्चित करे।  
One should adopt the purification rites-penances meant for the sinner in whose company he acquired the sin.
पतितस्योदकं कार्यं सपिण्डैर्बान्धवैर्बहिः।
निन्दितेऽहनि सायाह्ने ज्ञात्यर्त्विग्गुरुसंनिधौ11.182॥
पतित के सपिण्ड बान्धवगण ग्राम से बाहर जाति, ऋत्विज (पुरोहित) और गुरु के सामने निन्दित-पतित को दिन में सन्ध्या समय, किसी अशुभ दिन में जीते जी जलाञ्जली देवें। 
The brothers of the sinner should offer libation of water outside the village in front of the same caste fellow, Guru & Purohit in the evening, on an inauspicious day (like solar or lunar eclipse).
They just detach themselves from him and do not keep any connection-dealing with him, considering him to be dead for them.
दासी घटमपां पूर्णं पर्यस्येत्प्रेतवत् पदा।
अहोरात्रमुपासीरन्नशौचं बान्धवैः सह11.183॥
दासी दक्षिणाभिमुख होकर जल से भरे हुए घड़े को पैर से जैसे प्रेत के लिये लुढ़का दिया जाता है, वैसे ही लुढ़का दे, इसके बाद सपिण्ड (दयाद) लोग एक अहोरात्र का अशौच का व्यवहार करें। 
The maid servant (female slave) should tilt-strike the pitcher full of water, with her foot facing South, in a manner prescribed for the deceased and the brothers should observe rites meant for impurity for a day & night. 
निवर्तेरंश्च तस्मात्तु संभाषणसहासने।
दायाद्यस्य प्रदानं च यात्रा चैव हि लौकिकी11.184॥
उस पातकी से बोलना, एक ही आसन पर बैठना, लेन-देन करना और उसके साथ भोजनादि का व्यवहार सब छोड़ दें। 
All sorts of dealings like talking, sitting on the same couch-seat, money matters, dinning etc. with that sinner should be stopped at once. 
ज्येष्ठता च निवर्तेत ज्येष्ठावाप्यं च यद् धनम्। 
ज्येष्ठांशं प्राप्नुयाच्चास्य यवीयान् गुणतोऽधिकः11.185॥
पतित होने के बाद बड़े भाई की जयेष्ठता नहीं रहती और जेठे भाई का प्राप्य धन और जो ज्येष्ठांश हो, सब भाइयों में श्रेष्ठ और गुणी छोटा भाई पाता है। 
The elder brother losses all rights over the inherited properties, receivables as inheritance after becoming a sinner. The younger brother who excels amongest the younger brothers is entitled to all that belonging to the elder brother.
प्रायश्चित्ते तु चरिते पूर्णकुम्भमपां नवम्।
तेनैव सार्धं प्रास्येयुः स्नात्वा पुण्ये जलाशये11.186॥
पतित के प्रायश्चित कर लेने पर उसके सपिण्ड बान्धव गण, उसके साथ पवित्र जलाशय में स्नान कर जल से भरा नया घड़ा पानी में फेंक दें। 
Once the depraved-sinner completes the penances, his brothers should bathe with him in a pious-holy pond and drop a new pitcher full of water in that pond.
स त्वप्सु तं घटं प्रास्य प्रविश्य भवनं स्वकम्।
सर्वाणि ज्ञातिकार्याणि यथापूर्वं समाचरेत्11.187॥
वह उस घड़े को जल में फेंककर अपने घर में प्रवेश कर सभी भाई बन्धुओं के साथ जैसा व्यवहार था, वैसा करें। 
After throwing the pitcher in water, he should enter the house and interact with his brothers normally, as he was behaving earlier. 
एतदेव विधिं कुर्याद्योषित्सु पतितास्वपि। 
वस्त्रान्नपानं देयं तु वसेयुश्च गृहान्तिके11.188॥
वही विधि पतित स्त्रियों के साथ इस्तेमाल करनी चाहिये; किन्तु उन्हें अन्न, जल और वस्त्र ही देना चाहिये और वह घर के समीप झोंपड़ी में रहे। 
The sinner-depraved women having undergone penances, should adopt the process described earlier. But she should reside out side the house in a hut. She should be given food, water and clothing only. 
Family members are not supposed to interact with her.
एनस्विभिरनिर्णिक्तैर्नार्थं किं चित् सहाचरेत्।
कृतनिर्णेजनांश्चैव न जुगुप्सेत कर्हिचित्11.189॥
जिन पापात्माओं ने प्रायश्चित नहीं किया है, उनके साथ किसी प्रकार का व्यवहार-सम्बन्ध नहीं रखना चाहिये। जिन लोगों ने प्रायश्चित कर लिया हो उनकी निंदा कभी न करे। 
One should not deal-interact with those who have not undertaken penances. Never criticise, defame, reproach one who has undergone penances.
बालघ्नांश्च कृतघ्नांश्च विशुद्धानपि धर्मतः।
शरणागतहन्तॄंश्च स्त्रीहन्तॄंश्च न संवसेत्11.190॥
बालकों का वध करने वाले, कृतघ्न, शरणागत की हत्या करने वाले और स्त्री की हत्या करने वाले की हत्या करने वाले, यदि प्रायश्चित करके शुद्ध हो जायें तो भी उनका संसर्ग न करे। 
One should maintain distance from the killer of children, thankless, protected person-under his shelter and the women, even if they undergo penances.
येषां द्विजानां सावित्री नानूच्येत यथाविधि:।
तांश्चारयित्वा त्रीन्कृच्छ्रान्यथाविध्युपनाययेत्11.191॥
जिन द्विजों का शास्त्रानुसार यज्ञोपवीत संस्कार न हुआ हो, उनसे तीन कृच्छ्र प्राजापत्य व्रत कराके विधिवत उनका यज्ञोपवीत संस्कार करा दे। 
The upper castes, who could not perform Yagyopavit ceremony, should be allowed to do so by performing three Krachchhr Prajapaty Vrat.
प्रायश्चित्तं चिकीर्षन्ति विकर्मस्थास्तु ये द्विजाः।
ब्रह्मणा च परित्यक्तास्तेषामप्येतदादिशेत्11.192॥
जो द्विज निषिद्ध धर्म करने वाले हों और वेदाध्ययन से रहित हों, उनसे यदि वे प्रायश्चित करना चाहें तो उन्हें भी यही विधि अपनानी चाहिये। 
The Swarn-upper castes who indulge in forbidden activities & have not studied the Veds and are willing to undergo penances, they should also adopt the method described above.
यद्गर्हितेनार्जयन्ति कर्मणा ब्राह्मणा धनम्।
तस्योत्सर्गेण शुध्यन्ति जप्येन तपसैव च11.193॥
जो ब्राह्मण गर्हित, निन्दित तरीके, कर्म से धन इकट्ठा करता-कमाता है, उसकी शुद्धि जप-तप से होती है। 
Having acquired money-wealth through condemned means, the Brahman should resort to ascetics, penances, prayers of the Almighty.
He may resort to fasting and charity as well.
जपित्वा त्रीणि सावित्र्याः सहस्राणि समाहितः।
मासं गोष्ठे पयः पीत्वा मुच्यतेऽसत्प्रतिग्रहात्11.194॥
ब्राह्मण यदि समाहित चित्त होकर तीन सहस्त्र गायत्री का जाप करे अथवा एक मास तक दूध पीकर गोशाला में रहे तो दूषित दान लेने का दोष नहीं होता। 
If the Brahman recite Gayatri Mantr 3,000 times by concentrating in it or depend solely upon milk and live in the cow shed, the impurity caused by accepting donations made by the wicked-wretched people; who had earned their wealth through dubious-improper means, will be cleansed-rectified.
उपवासकृशं तं तु गोव्रजात्पुनरागतम्।
प्रणतं प्रति पृच्छेयुः साम्यं सौम्येच्छसीति किम्11.195॥
उपवास से दुर्बल और गोशाला  से आये हुए उस कृशित ब्राह्मण से लोग पूछें कि क्या तुम हम लोगों के साथ मिलना चाहते हो!?  
People should ask the Brahman who has become weak due to fasting, depending solely upon milk & staying in the cow shed for one month,  if he wanted to interact with them!?
One should never make fun of him or taunt over him, since he has purified himself by subjecting to extreme penances and tough life.
सत्यमुक्त्वा तु विप्रेषु विकिरेद्यवसं गवाम्।
गोभिः प्रवर्तिते तीर्थे कुर्युस्तस्य परिग्रहम्11.196॥
वह ब्राह्मणों से सत्य कहकर (मैं अब दूषित दान नहीं लूँगा) गौ के आगे घास रख दे। यदि गौ उसके हाथ का घास खा ले तो अन्य ब्राह्मण उसको अपने समाज में शामिल कर लें। 
He should swear-forsooth (I will not offend again), in front of other Brahmns that he will not accept donations from the wretched and put grass in front of the cow. If the cow eats the grass, they should admit him in their fold-community.
FORSOOTH :: सत्य, सचमुच, वास्तव में, veritable, fact, literally, indeed, of truth, to be sure, actually, concretely, in facto, practicably.
व्रात्यानां याजनं कृत्वा परेषामन्त्यकर्म च।
अभिचारमहीनं च त्रिभिः कृच्छ्रैर्व्यपोहति11.197॥
व्रात्यों का यज्ञ, अपने कुटुम्ब से भिन्न लोगों की दाहादी क्रिया, अभिचार और अहिन यज्ञ कराकर या करके तीन प्रजापत्य करके ब्राह्मण शुद्ध होता है।  
He should perform Vraty Yagy, perform the obsequies of those who are not related to him, incantation & Ahin Yagy or perform three Prajapaty Yagy to attain purity.
अभिचार :: मंत्र-तंत्र द्वारा मारण तथा उच्चाटन आदि हिंसक कार्य, तंत्र मंत्र द्वारा मारण, मोहन, उच्चाटन आदि द्वारा किये जानेवाले अनुचित कर्म; incantation. 
OBSEQUIES :: दफ़न, समाधि, अण्त्यकर्म, अंत्येष्टि क्रिया, मरणोत्तर क्रियाएँ; committal, entombment, mausoleum, trance, tomb, grave, reliquary. 
शरणागतं परित्यज्य वेदं विप्लाव्य च द्विजः।
संवत्सरं यवाहारस्तत्पापमपसेवति11.198॥
शरणागत का त्याग करने से (अर्थात रक्षा ने करने वाला) और अनधिकारी को वेद पढ़ाने से एक वर्ष तक केवल जौ का आहार करने से उस पाप से छुटकारा मिलता है। 
One is relieved of the sin of not protecting one who desires protection and teaching Veds to one who is not entitled for learning them by eating barley meals (bread, Sattu etc.) for one year.
Protection can be given only by a person who is capable of doing so. However, protection should be given to only one who deserve it. Never try to protect people who are wretched, attackers, rapists, dacoits, thieves, sinners, evil creators-mongers etc.
श्वशृगालखरैर्दष्टो ग्राम्यैः क्रव्याद्भिरेव च।
नराश्वोष्ट्रवराहैश्च प्राणायामेन शुध्यति11.199॥
कुत्ता, सियार, गधा, कच्चे माँस को खाने वाले, ग्राम्य पशु, मनुष्य, घोड़ा, ऊँट और सूअर जिसको काटें, वह प्राणायाम कर लेने से ही शुद्ध हो जाते है। 
One who is bitten by the domesticated animals, cattle, dog, jackal, donkey, eaters of red meat, humans, horse, camel and pig are cleanse just by performing Pranayam-Yog.
Pranayam leads to deep breathing which enriches the blood with oxygen leading to killing of germs, virus, bacteria, pathogens, microbes etc.
षष्ठान्नकालता मासं संहिताजप एव वा।
होमाश्च सकला नित्यमपाङ्क्त्यानां विशोधनम्11.200॥
जो अपांक्तेय-पतित हैं, उनकी शुद्धि के लिए यह विधान है कि एक मास तक छटी शाम को भोजन करें, वेद की संहिताओं का जप करें अथवा वेदोक्त मन्त्रों से नित्य हवन करें। 
Those depraved, who been excluded due to some sin from the society (not from Hinduism, out castes) should take meals only on the sixth evening, recite Ved Mantr-Sanhita and conduct Hawan everyday to be cleansed.
उष्ट्रयानं समारुह्य खरयानं तु कामतः।
स्नात्वा तु विप्रो दिग्वासाः प्राणायामेन शुध्यति11.201॥
जो ब्राह्मण अपनी मर्जी-इच्छा से ऊँट या गधे पर चढ़े और नंगा होकर स्नान करे वह प्राणायाम मात्र से शुद्ध हो जाता है। 
The Brahman who willingly rides an ass or a camel or baths naked is purified just by performing Yog-Pranayam.
One should never unclothe or bath openly whether a woman or a man. One should never let others see him naked, except a doctor.
विनाद्भिरप्सु वाप्यार्तः शारीरं संनिवेश्य च।
सचैलो बहिराप्लुत्य गामालभ्य विशुद्ध्यति11.202॥
अत्यन्त वेग से पीड़ित होकर पानी के बिना या पानी में मलमूत्र का त्याग करे तो गाँव के बाहर नदी वगैरह में स्कैल्य (वस्त्रादि पहने हुए ही) स्नान करके गौ का स्पर्श करके शुद्ध होता है। 
One become pure by bathing in a river or pond outside the village while wearing cloths if he happen to defecate without the use of water in a water body-pit, in case the urge for this is too hard. Thereafter, he should touch a cow.
Changing times makes the Hindus use toilets where excreta passes directly into water present in the sheet and then they use paper napkins. Excreta is then flushed. Its not all, those who are present abroad use sanitisers in stead of washing hands with water. India has already banned use of sanitisers by the bank employees counting currency notes manually.
During Corona Kal use of sanitises has increased too much, beyond limits; which too is dangerous-harmful.
वेदोदितानां नित्यानां कर्मणां समतिक्रमे।
स्नातकव्रतलोपे च प्रायश्चित्तमभोजनम्11.203॥
वेद में कहे हुए नित्यकर्मों का अतिक्रमण हो जाने पर एक दिन भोजन न करें, यही इस दोष का प्रायश्चित। 
In case one happen to skip the daily routine-purification measures prescribed in the Veds, he may subject himself to one day's fasting.
हुङ्कारं ब्राह्मणस्योक्त्वा त्वङ्कारं च गरीयसः।
स्नात्वाऽनश्नन्नहः शेषमभिवाद्य प्रसादयेत्11.204॥
ब्राह्मण को हुंकार (अर्थात चुप बैठने को कहना) और अपने से बड़े को तू कह दे तो उस समय से सांयकाल तक स्नान कर उसकी सेवा करके उसको प्रसन्न करे। 
If one happen to ask a Brahmn to sit quietly or spell "tu" (you, it shows disrespect) to elders, he should bathe and serve him till evening.
To speak "tu" to elders is considered as bad manner & against etiquette in India. However, people generally speak "tu" to the Almighty and close friends, relatives etc. "Tu" and "tum" are part of slang used by Hindi speaking people in North India, especially Uttar Pradesh. Proper word for addressing unknown person is Aap. 
ताडयित्वा तृणेनापि कण्ठे वाऽबध्य वाससा।
विवादे वा विनिर्जित्य प्रणिपत्य प्रसादयेत्11.205॥
ब्राह्मण को तृण से भी मारने पर अथवा उसके कण्ठ में कपड़ा डालने या विवाद करने पर उसको प्रणाम कर प्रसन्न करना चाहिये। 
Appeasement of Brahmn by saluting-prostrating in front of him, in case he is struck even if by mistake even with a straw, tying his neck with a cloth or altercation should be done very politely, in soothing language.
अवगूर्य त्वब्दशतं सहस्रमभिहत्य च।
जिघांसया ब्राह्मणस्य नरकं प्रतिपद्यते11.206॥
ब्राह्मण को मारने की धमकी देने पर सौ वर्ष और दण्ड से प्रहार करने पर एक हजार वर्ष तक नर्क भोगना पड़ता है। 
Threatening a Brahman by death leads to 100 years of stay in hell and strucking him with a baton leads to one thousand years of stay in the hell.
शोणितं यावतः पांसून्सङ्गृह्णाति महीतले।
तावन्त्यब्दसहस्राणि तत्कर्ता नरके वसेत्11.207॥
ब्राह्मण का रुधिर-खून धरती पर गिरकर धूल के जितने कणों को भिगोता है, उतने ही हजार वर्ष तक रुधिर बहाने वाला नर्क में वास करता है। 
One is subjected to stay in hell for as many thousand years as the number of dust particles are smeared by the blood of the Brahmn which oozes out of his body on striking him. 
अवगूर्य चरेत्कृच्छ्रमतिकृच्छ्रं निपातने।
कृच्छ्रातिकृच्छ्रौ कुर्वीत विप्रस्योत्पाद्यशोणितम्11.208॥
ब्राह्मण को मारने के लिए लाठी उठाने पर कृच्छ्रव्रत करे और मार देने पर अतिकृच्छ्र व्रत करे और खून बहाने पर दोनों कृच्छ्र व्रत और अतिकृच्छ्र व्रत करे। 
One should observe Krachchhr Vrat having raised baton-hand over the Brahmn. In case the Brahman is struck with the baton, he should observe Atikrachchhr Vrat. If blood comes out of the body of the Brahman as a result of striking him, one should under go both penances i.e., Krachchhr and Atikrachchhr Vrat.
अनुक्तनिष्कृतीनां तु पापानामपनुत्तये।
शक्तिं चावेक्ष्य पापं च प्रायश्चित्तं प्रकल्पयेत्11.209॥
जिन पापों के प्रायश्चित नहीं कहे गये हैं उनके प्रायश्चित के लिये पापकर्त्ता अपनी शक्ति-सामर्थ्य को देखकर व्यवस्था करे। 
The sinner may undergo penances as per his own strength & tolerance for those sins the penances of which have not been mentioned-discussed. 
यैरभ्युपायैरेनांसि मानवो व्यपकर्षति।
तान्वोऽभ्युपायान्वक्ष्यामि देवर्षिपितृसेवितान्11.210॥
जिन उपायों से मनुष्य अपने पापों का प्रायश्चित करता है, देवता, पितरों और ऋषियों से अनुष्ठित उन उपायों को कहता हूँ।
I am describing those measures which are to be adopted for the Penances approved by demigods-deities, Manes and the sages.
त्र्यहं प्रातस्त्र्यहं सायं त्र्यहमद्यादयाचितम्।
त्र्यहं परं च नाश्नीयात्प्राजापत्यं चरन्द्विजः11.211॥
प्राजापत्य व्रत  का आचरण करता हुआ द्विज तीन दिन सवेरे, तीन दिन शाम और तीन दिन बिना किसी से कुछ माँगे ही, जो कुछ मिल जाये उसे ही खाये। इसी को प्राजापत्य व्रत कहते हैं। 
The Swarn-upper caste should eat whatever is available without being asked, for three days in the morning & three days in the evening. This process is termed as Prajapaty Vrat.
गोमूत्रं गोमयं क्षीरं दधि सर्पिः कुशोदकम्।
एकरात्रोपवासश्च कृच्छ्रं सांतपनं स्मृतम्11.212॥
गोमूत्र, गाय का गोबर, गाय का दूध, गौ के दूध की दही, गौ का घी, कुश का जल; इन सबको मिलाकर भोजन करे, दूसरे दिन उपवास करे। इसी को कृच्छ्रसान्तापन व्रत कहते हैं। 
As a penance one should mix cow's urine, dung, milk, curd, ghee and the extract of Kush grass and eat them. Next day he should observe a fast. This is called Krachchhr Sanatapan Vrat.
एकैकं ग्रासमश्नीयात्त्र्यहाणि त्रीणि पूर्ववत्।
त्र्यहं चोपवसेदन्त्यमतिकृच्छ्रं चरन्द्विजः11.213॥
तीन दिन तक सवेरे एक ग्रास और तीन दिन तक शाम को एक-एक ग्रास और तीन दिन तक बिना माँगे अन्न भी एक-एक ग्रास खाये। इसी को अतिकृच्छ्र व्रत कहते हैं।
One who undergoes penances, should eat one mouthful only once in a day for three days in the morning followed by eating one mouthful for next three days in the evening and thereafter for the next three days, he should eat one mouthful food which he has obtained without being asked. This is known as Atikrachchhr Vrat.
तप्तकृच्छ्रं चरन्विप्रो जलक्षीरघृतानिलान्।
प्रतित्र्यहं पिबेदुष्णान्सकृत्स्नायी समाहितः11.214॥
ब्राह्मण नित्य एक बार स्नानकर एकाग्रचित्त होकर प्रत्येक तीन-तीन दिन के क्रम से गर्म दूध, गर्म घी और गर्म वायु का सेवन करे (अर्थात तीन दिन जल, तीन दिन दूध इत्यादि)।  इसी को तप्तकृच्छ्र व्रत कहते है। 
The Brahmn should consume warm milk for three days, followed by warm Ghee for another three days and warm air for yet another three consecutive days after becoming fresh-bathing once in a day, every day. This is described as Taptkrachchhr Vrat.
यतात्मनोऽप्रमत्तस्य द्वादशाहमभोजनम्।
पराको नाम कृच्छ्रोऽयं सर्वपापापनोदनः11.215॥
संयत चित्त होकर मन और इन्द्रियों को रोककर-काबू में करके, बारह दिन उपवास करने को पराककृच्छ्र व्रत कहते हैं, जो कि समस्त पापों का नाश करने वाला है। 
Observance of fast for twelve days after controlling the innerself-psyche and passions-sense organs, is Parakkrachchhr Vrat which leads to destruction from all sins.
This penance relieves one from all sins, guilt.
एकैकं ह्रासयेत्पिण्डं कृष्णे शुक्ले च वर्धयेत्।
उपस्पृशंस्त्रिषवणमेतच्चान्द्रयणं व्रतम्11.216॥ 
कृष्ण पक्ष में तिथि के अनुसार एक-एक ग्रास कम करके और शुल्क पक्ष में तिथि के अनुसार एक-एक ग्रास बढ़कर भोजन करे, इसको चान्द्रायण व्रत कहते हैं। 
Reduction of one mouthful of food every day during dark phase of Moon as per date in Hindu calendar and increasing of food intake one mouthful each day, is Chandrayan Vrat.
एतमेव विधिं कृत्स्नमाचरेद्यवमध्यमे।
शुक्लपक्षादिनियतश्चरंश्चान्द्रायणं व्रतम्11.217॥
शुक्ल पक्षादि से पूर्वोक्त प्रकार से (अर्थात तिथि के अनुसार) व्रत को करे तो यवमध्यम चान्द्रायण व्रत कहते हैं। 
If one undergoes penances as described above during bright phase of Moon (as per dates-Tithi) is termed as Yavmadhyam Chandrayan Vrat.
अष्टावष्टौ समश्नीयात्पिण्डान्मध्यंदिने स्थिते।
नियतात्मा हविष्याशी यतिचान्द्रायणं चरन्11.218॥
शुल्कपक्षादि वा कृष्णपक्षादि से आरम्भ कर एक मास तक जितेन्द्रिय होकर दोपहर में आठ ग्रास हविष्य अन्न का भोजन, यति चान्द्रायण व्रत कहलाता है। 
One undertaking penances beginning from either the bright or dark phase of the Moon performing them with control over sense organs, eating eight mouthful of food during the mid day is called Yati Chandrayan Vrat.
चतुरः प्रातरश्नीयात्पिण्डान्विप्रः समाहितः।
चतुरोऽस्तमिते सूर्ये शिशुचान्द्रायणं स्मृतम्11.219॥
एक मास तक चार ग्रास सबेरे और चार ग्रास शाम को नियम से भोजन करे। इसको शिशु चान्द्रायण व्रत मुनियों ने कहा है। 
One willing to take penances should eat four mouthfuls of food in the morning & four mouthfuls in the evening regularly. The sages have termed it as Shishu Chandrayan Vrat.
यथा कथं चित् पिण्डानां तिस्रोऽशीतीः समाहितः।
मासेनाश्नन् हविष्यस्य चन्द्रस्यैति सलोकताम्॥11.220॥
जो नियत चित्त होकर एक मास तक किसी भी प्रकार से 240 ग्रास केवल हविष्य ही खाकर निर्वाह करता है, वह चन्द्रलोक को जाता है। 
One solely survives on 240 mouthfuls of the sacrificial offerings of food to deities-Hawan for on month, goes to Chandr Lok.
एतद्रुद्रास्तथादित्या वसवश्चाचरन्व्रतम्।
सर्वाकुशलमोक्षाय मरुतश्च महर्षिभिः॥11.221॥
इस व्रत को रूद्र, आदित्य-सूर्य, वसु, मरुत देवता और महिर्षियों ने भी सभी पापों से मुक्त होने के लिये किया था। 
This penances-Vrat was adopted-performed by Rudr (Bhagwan Shiv), Adity-Sun, Vasu, Marut, and the Great Sages to get rid of all sins.
महाव्याहृतिभिर्होमः कर्तव्यः स्वयमन्वहम्।
अहिंसासत्यमक्रोधमार्जवं च समाचरेत्॥11.222॥
स्वयं प्रतिदिन महाव्याहृति होम घी से करे। हिंसा, क्रोध और कुटिलता और झूँठ न बोले। 
One should resort to Mahavyahrati Hawan with Ghee everyday and keep off from violence, anger, diplomacy-treachery and never tell a lie.
त्रिरह्नस्त्रिर्निशायां च सवासा जलमाविशेत्।
स्त्रीशूद्रपतितांश्चैव नाभिभाषेत कर्हिचित्॥11.223॥
दिन और रात में तीन-तीन बार कपड़ों सहित जल में प्रवेश करे और स्त्री, शूद्र और पतित से सम्भाषण न करे। 
One ready to undertake penances should enter the water body or bathe thrice with cloths in the morning, mid day and evening, discarding conversation with women, Shudr and the depraved-out caste.
स्थानासनाभ्यां विहरेदशक्तोऽधः शयीत वा।
ब्रह्मचारी व्रती च स्याद् गुरुदेवद्विजार्चकः॥11.224॥
अपने स्थान पर घूमे या अपने आसन पर बैठे अथवा अस्वस्थ होने पर भूमि पर सोये। ब्रह्मचारियों के नियम के अनुसार (अर्थात मौञ्जी मेखला, दण्ड धारण करके) रहे और गुरु, देवता और ब्राह्मण की पूजा करे। 
One following penances should move around his own place or occupy his seat and sleep over the ground when ill (over mat or cushion). He should subject himself to rules meant for chastity-celibacy and regard the Guru, demigods and the Brahmns. 
This is just like quarantine during Corona Kal of today. 
सावित्रीं च जपेन्नित्यं पवित्राणि च शक्तितः।
सर्वेष्वेव व्रतेष्वेवं प्रायश्चितार्थमादृतः॥11.225॥
नित्य सावित्री का जप करे और अपने सामर्थ्य का अनुसार पवित्र सूक्तों का जप करे। सभी व्रतों में प्रायश्चित के लिये ऐसा करना उत्तम है। 
One resorting to penances should recite Savitri (Mantr-prayers) as per his capacity, capability, ability & recite other pious Sukt. This is considered to be an excellent penance.
एतैर्द्विजातयः शोध्या व्रतैराविष्कृतैनसः।
अनाविष्कृतपापांस्तु मन्त्रैर्होमैश्च शोधयेत्॥11.226॥
आविष्कृत (प्रकट) पापों के शमन के लिये द्विजों को पूर्वोक्त चान्द्रायण आदि व्रतों को करना चाहिये और अनाविष्कृत अर्थात गुप्त पापों के शान्त्यर्थ मन्त्रों का जप-हवन करना चाहिये।
The Brahmn and the upper caste should observe Chandrayan Vrat for the pacification of revealed sins and the unrevealed sins should be pacified with the help of recitation of Mantr and performing Hawan (offering oblations in holy fire).   
ख्यापनेनानुतापेन तपसाऽध्ययनेन च।
पापकृत्मुच्यते पापात्तथा दानेन चापदि॥11.227॥
अपने पापों को लोगों में प्रकट करके पछताने से, तप तथा अध्ययन करने से पाप करने वाला पाप के दोष से मुक्त हो जाता है और यदि तप आदि करने में असमर्थ हो तो दान करके भी पाप से मुक्त हो सकता है। 
Confession of sins followed by repentance-penances, austerity, Tapasya and studying the sacred text-Ved, Shastr leads to the removal of the impact of sins. If one is not able to adopt ascetics he may resort to donations.
In this era if one reveals his sins in font of wicked people there is a great danger of his being black mailed. Thus reveal the sins in front of virtuous people, enlightened Guru or the trusted people like parents. Then take a pledge not to repeat them in future under any circumstances. Remain firm-determined over this decision. 
यथा यथा नरोऽधर्मं स्वयं कृत्वाऽनुभाषते।
तथा तथा त्वचेवाहिस्तेनाधर्मेण मुच्यते॥11.228॥
जैसे-जैसे मनुष्य अपने किये गए पापों को लोगों में ठीक-ठीक बताता है, वैसे-वैसे वह उस अधर्म के कैंचुल से साँप की तरह मुक्त हो जाता है। 
One gradually gets freedom from the impact of sins as he repent, observe penances & by accepting his sins in publicly. He is freed from the sins the way the snake is liberated from the exo skin, slough
Confession followed by repentance and determination not to repeat such things in future leads to purification of soul just like air and water which become free from impurities-pollutants.
यथा यथा मनस्तस्य दुष्कृतं कर्म गर्हति।
तथा तथा शरीरं तत् तेनाधर्मेण मुच्यते॥11.229॥
जैसे-जैसे पापी का मन पाप कर्म की निन्दा करता है, वैसे-वैसे उसका शरीर (मन  आत्मा) उस पाप से छुटकारा पता जाता है। 
The sinner is relieved off the impact of sins over his mind, heart, body & the soul, gradually, as he himself condemn the sins committed by him.
कृत्वा पापं हि संतप्य तस्मात्पापात्प्रमुच्यते।
नैवं कुर्यात् पुनरिति निवृत्त्या पूयते तु सः॥11.230॥
पाप करके अपने किये हुए पर पश्चाताप करे तो वह पाप से छूट जाता है। फिर ऐसा नहीं करुँगा, मन में ऐसा संकल्प करके निवृत हो जाये तो वह पवित्र हो जाता है। 
One is relieved off the guilt of having committed a sin by undergoing repentance-penances. He should determine that he would not repeat the offence-guilt again and is purified finally.
एवं सञ्चिन्त्य मनसा प्रेत्य कर्मफलोदयम्।
मनोवाङ्मूर्तिभिर्नित्यं शुभं कर्म समाचरेत्॥11.231॥
इस प्रकार मन से अच्छे और बुरे कर्मों का फल परलोक में अच्छा और बुरा मिलेगा विचारते हुए मन, वाणी और शरीर से शुभ कर्म करे। 
One should analyse the impact of good and bad deeds and realise that he would be subjected to the impact of these deeds in next births. He should resort to pious-virtuous, righteous, honest deeds through heart & mind, speech and the body.
अज्ञानाद्यदि वा ज्ञानात्कृत्वा कर्म विगर्हितम्।
तस्माद्विमुक्तिमन्विच्छन्द्वितीयं न समाचरेत्॥11.232॥
अज्ञान (भूल से) अथवा ज्ञान (जानबूझ कर) निन्दित कर्म को करके यदि उसके पाप से छुटकारा चाहे तो दूसरे निन्दिन के कार्य न करे। 
One who wants to be liberated from the impact of the sins committed knowingly or unknowingly, should not repeat the offences.
A sin done intentionally is more serious as compared to the one, done due to ignorance unintentionally. Still one must perform penances.
यस्मिन्कर्मण्यस्य कृते मनसः स्यादलाघवम्।
तस्मिंस्तावत्तपः कुर्याद्यावत् तुष्टिकरं भवेत्॥11.233॥
जिस धर्म-कर्म प्रायश्चित आदि को करने से पापात्मा के चित्त को जब तक शान्ति न मिले, तब तक वह उस कर्म को करता रहे। 
The sinner who wish to be liberated from the impact of sins should continue carrying out penances till he do not feel satisfaction in his innerself.
Solace, peace, tranquillity is essential for virtuous life.
तपो मूलमिदं सर्वं दैवमानुषकं सुखम्।
तपोमध्यं बुधैः प्रोक्तं तपोऽन्तं वेददर्शिभिः॥11.234॥
देवता और मनुष्यों के सभी सुख तपोमलक हैं, तप ही मध्य है और तप ही अन्त है, ऐसा वेदविज्ञों ने कहा है। 
All the comforts-bliss of demigods-deities and men have generated from the ascetics, this is the doctrine of the scholars of Veds. 
Tapasya (Austerity, ascetics) form the core of all comforts & bliss. Its eternal and present in the middle as well as termination of life.
ब्राह्मणस्य तपो ज्ञानं तपः क्षत्रस्य रक्षणम्।
वैश्यस्य तु तपो वार्ता तपः शूद्रस्य सेवनम्॥11.235॥
ब्राह्मण का ज्ञान ही तप है, क्षत्रिय का रक्षण तप है और शूद्र का वार्त्ता (पशुपालन आदि) और शूद्र का सेवा तप है। 
Enlightenment-knowledge of Veds (studying, understanding, applying) is ascetics-austerity for the Brahmn, for the Kshatriy its the protection of public-subjects, for Vaeshy its animal husbandry & agriculture and for the Shudr serving the upper castes is ascetics-austerity.
One who resort to Varnashram Dharm with full dedication is an ascetic even if he is performing his domestic-household duties. It is even better when he prayers to God regularly.
ऋषयः संयतात्मानः फलमूलानिलाशनाः।
तपसैव प्रपश्यन्ति त्रैलोक्यं सचराचरम्॥11.236॥
फल-मूल और वायु का सेवन करने वाले संयतात्मा महर्षिगण तपस्या से ही चराचर तीनों लोकों को देखते हैं। 
The great sages who survives just over fruits-roots and the air, visualise the three abodes (heaven, earth & the nether world) due to the strength-power granted to them by the asceticism-Tapasaya. 
औषधान्यगदो विद्या दैवी च विविधा स्थितिः।
तपसैव प्रसिध्यन्ति तपस्तेषां हि साधनम्॥11.237॥
औषध, आरोग्य, विद्या और अनेक प्रकार की दैवी स्थिति (स्वर्गादि लोक) तप से ही प्राप्त होते हैं। 
Medicines, good health, enlightenment-learning, higher abodes and the divinity are the outcome of Tapasaya-asceticism.
यद्दुस्तरं यद्दुरापं यद्दुर्गं यच्च दुष्करम्।
सर्वं तु तपसा साध्यं तपो हि दुरतिक्रमम्॥11.238॥
जो दुस्तर (जिसे पार करना कठिन हो) जो दुरप (पाना कठिन हो), जो दुर्ग (जहाँ तक पहुँचना कठिन हो) और जो दुष्कर (जिसे करना कठिन हो), वह सब तपस्या से साध्य होता है, क्योंकि तपस्या दुर्लभ (बेहद कठिन) है। 
Whatever is hard to be traversed, whatever is hard to be attained, whatever is hard to be reached, whatever is hard to be performed, all (this) may be accomplished by Tapsya-ascetics, austerities; since Tapsya is a very difficult task. 
One who perform his Varnashram duties along with remembering the God can achieve all that he deserve. Nothing is difficult in this world for one who is determined, dedicated.
महापातकिनश्चैव शेषाश्चाकार्यकारिणः।
तपसैव सुतप्तेन मुच्यन्ते किल्बिषात्ततः॥11.239॥
महापातकी तथा शेष अकार्य कर्म करने वाले, तपस्या से तप्त होकर पापमुक्त हो जाते हैं। 
The greatest sinners and those who perform undesirable deeds too get liberated from the impact of worst possible sins if they resort to Tapasya.
कीटाश्चाहिपतङ्गाश्च पशवश्च वयांसि च।
स्थावराणि च भूतानि दिवं यान्ति तपोबलात्॥11.240॥
कीड़े-मकोड़े, साँप-सरीसृप, पतंग, पशु-पक्षी और स्थावर (वृक्षादि) भी तपोबल से स्वर्ग को जाते हैं। 
Insects, snakes, moths, bees, animals, birds and trees (plants, shrubs etc.), bereft of motion, reach heaven by the power of austerities.
By virtue of remaining pious deeds, the lower species may have the memories of their past life which pulls them into Tapasya-remembrance of the God. It leads them to higher abodes. The scriptures describe the presence of animals, insects, snakes etc. in higher abodes as well, where they perform virtuous acts and become non violent-devoted to God.
All our efforts should be concentrated over Salvation, emancipation, liberation, assimilation in God-Moksh, since one has to return back to earth after enjoying the fruits-rewards of his Tapasya, austerities done to achieve higher abodes. 
यत्किंचिदेनः कुर्वन्ति मनोवाङ्मूर्तिभिर्जनाः।
तत्सर्वं निर्दहन्त्याशु तपसैव तपोधनाः॥11.241॥
मनुष्य मन, वाणी और शरीर से जो पाप करते हैं, उन सब पापों को तपोधन-तपस्वी शीघ्र ही अपनी तपस्या से नष्ट कर देते हैं। 
The Tapasvi-ascetic are able to dissolve-destroy the sins committed by them, through innerself, speech (voice, words) & the body with the help of Tapsya (ascetics, austerities) soon.
Repentance aided with penances, firmness-determination and resolve not to commit such mistakes again, leads one to purification of body, mind and the soul.He do not crave for Salvation as well. He only wish to attain Ultimate devotion in the feet of the Almighty.
तपसैव विशुद्धस्य ब्राह्मणस्य दिवौकसः।
इज्याश्च प्रतिगृह्णन्ति कामान्संवर्धयन्ति च॥11.242॥
देवता तप से विशुद्ध ब्राह्मण का यज्ञ में दिया हुआ हविष्य ग्रहण करते हैं और उसके अभीष्टों को सिद्ध करते हैं। 
The demigods accept the offerings-oblations of the Brahman who has purified himself through Tapsya-austerities and grant him all he desires.
The Tapasvi has no desire left to be fulfilled.
प्रजापतिरिदं शास्त्रं तपसैवासृजत्प्रभुः।
तथैव वेदान्ऋषयस्तपसा प्रतिपेदिरे॥11.243॥
समर्थ ब्रह्मा जी ने तपस्या से ही शास्त्र-सृष्टि को बनाया। उसी प्रकार ऋषियों ने भी तपस्या से ही वेदों को प्राप्त किया। 
Brahma Ji evolved life and the scriptures with the help of Tapasya. Similarly, the Mahrishi, Brahmrishi, sages too got the Veds with the help of Tapasya.
इत्येतत्तपसो देवा महाभाग्यं प्रचक्षते।
सर्वस्यास्य प्रपश्यन्तस्तपसः पुण्यमुत्तमम्॥11.244॥
तपस्या के इस उत्तम पुण्य को देखकर देवता संसार के सम्पूर्ण सौभाग्य को तपस्या से सिद्ध बताते हैं। 
The excellent result of Tapasya led the demigods to proclaim the best output of luck.
Tapasya can grant all that one desires whether fair or foul. The Rakshas-demons too undertake Tapasya and demand such things which are against the humanity, from Brahma Ji. 
वेदाभ्यासोऽन्वहं शक्त्या महायज्ञक्रिया क्षमा।
नाशयन्त्याशु पापानि महापातकजान्यपि॥11.245॥
प्रतिदिन वेदाभ्यास शक्ति के अनुसार करना, पञ्चमहायज्ञ और क्षमा (माफ़ करना, शान्ति धारण करना) ये कार्य महापातिकियों के पापों को भी शीघ्र ही नष्ट कर देते हैं।
Regular-daily practice (study-follow up) of Veds as per own strength (availability of time), performance of Panch Maha Yagy and pardon, leads to the destruction of greatest sins of greatest sinners. 
Slowly and gradually one start becoming pure-free from bad habits & company as he reads and follows the sacred text.
यथैधस्तेजसा वह्निः प्राप्तं निर्दहति क्षणात्।
तथा ज्ञानाग्निना पापं सर्वं दहति वेदवित्॥11.246॥
जिस प्रकार से अग्नि अपने तेज से क्षण भर में ही लकड़ी को भस्म कर देती है, उसी प्रकार वेदज्ञ ब्राह्मण ज्ञानरूपी अग्नि से सभी पापों का नाश कर देता है। 
The manner in which the fire burns the wood in a few moments by its energy the the Vedagy Brahman too, burn all sorts of sins by virtue of his enlightenment.
Being a Brahman by birth is not enough to do such a feat. The Brahman should be enlightened and an ascetic as well.
इत्येतदेनसामुक्तं प्रायश्चित्तं यथाविधि।
अत ऊर्ध्वं रहस्यानां प्रायश्चित्तं निबोधत॥11.247॥
यह सब यथाविधि प्रकट पापों के प्रायश्चितों को कहा। अब अप्रकट पापों के प्रायश्चितों को कहता हूँ। 
Penances for the revealed-disclosed sins have been described with methodology to perform them. Now, let the penances meant for removal of sins for undisclosed sins be described.
सव्याहृतिप्रणवकाः प्राणायामास्तु षोडश।
अपि भ्रूणहणं मासात्पुनन्त्यहरहः कृताः॥11.248॥
व्याह्रति (कथन, उक्ति; भूः भुवः आदि सप्त लोकात्मक मंत्र) और प्रणव के साथ गायत्री का विधिपूर्वक प्रतिदिन सोलह प्राणायाम करने से एक मास में भ्रूणहत्या करने वाला भी पाप से छूट जाता है। 
One gets rid of the sin due to the abortion of a child in the womb if he recites Gayatri Mantr, aided with OM (& Bhu, Bhuvah, Swah) along with Pranayam 56 times everyday for a month.
कौत्सं जप्त्वाप इत्येतद्वासिष्ठं च प्रतीत्य ्चम्।
माहित्रं शुद्धवत्यश्च सुरापोऽपि विशुध्यति॥11.249॥
कौत्स का "अपन:शोशुच्धम्" और वशिष्ठ का "प्रतिस्तो मेभिरुषसं""महित्रीणामवोस्तु" तथा "एतोन्विद्रं सत्वाम" इन ऋचाओं के जप करके सुरापान करने वाला भी एक मास में शुद्ध हो जाता है। 
The drunkard becomes purified by the recitation of the verses "Apnh Shoshuchdhm" by Kouts, "Pratisto Mebhirushsn", "Mahitrinamvostu" & "Etonvidrn Satvam" by Vashishth within a month.
सकृत्जप्त्वाऽस्यवामीयं शिवसङ्कल्पमेव च।
अपहृत्य सुवर्णं तु क्षणाद्भवति निर्मलः॥11.250॥
सुवर्ण की चोरी कर ब्राह्मण एक मास  तक प्रतिदिन एक बार "अस्य वामस्य पलितस्य" और शिव संकल्पं  "यज्जाग्रतोदुरम्" इन मन्त्रों का जप करने से शीघ्र ही उस पाप से छूट जाता है।
The Brahman who happen to steal gold, get rid of the sin by reciting "Asy Vamsy Palitasy" and Shiv Sanklpan "Yajjagratoduram" everyday for one month. 
हविष्यान्तीयमभ्यस्य नतमंह इतीति च।
जपित्वा पौरुषं सूक्तं मुच्यते गुरुतल्पगः॥11.251॥ 
"हविष्यान्तमजरं स्वर्विदि""नतमहोनदुरितम्""इति वा इति मे मनः" या "सहस्त्रशीर्षा" इत्यादि ऋचाओं अथवा पुरुष सूक्त का एक मास तक प्रतिदिन पाठ करने वाला गुरुपत्नीगमन रूपी दोष से मुक्त हो जाता है। 
One who mated (raped) with his teacher's wife, get rid of the sin by reciting "Havishyantmanjaran Swarvidi", Natmhonduritam", "Iti Va Iti Me Manh" or " Sahastrsheersha" etc. verses or Purush Sukt everyday for one month.
एनसां स्थूलसूक्ष्माणां चिकीर्षन्नपनोदनम्।
अवेत्यर्चं जपेदब्दं यत्किंञ्चेदमितीति  वा॥11.252॥
स्थूल और सूक्ष्म पापों से मुक्त होने की इच्छा वाला पुरुष "अवते हेडो वरुण नमोभिः" अथवा "यत् किंचेदं वरुण दैव्ये जने" अथवा "इति वा इति मे मनः" इन ऋचा और सूक्तों का पाठ प्रति दिन एक वर्ष तक करे। 
One who desires to expiate sins of high or low intensity should recite "Avte Hedo Varun Namobhi:" or "Yat Kinchedan Varun Daevye Jane" or "Iti Va Iti Me Manh" for on year everyday.
प्रतिगृह्याप्रतिग्राह्यं भुक्त्वा चान्नं विगर्हितम्।
जपंस्तरत्समन्दीयं पूयते मानवस्त्र्यहात्॥11.253॥
न लेने योग्य दान को लेकर और निषिद्ध अन्न को खाकर "तरतस्मन्दी धावति" इत्यादि ऋचाओं का पाठ तीन दिन तक करने से जातक शुद्ध हो जाता है।  
One contaminated by accepting forbidden donation and eating prevented-uneatable food is purified by reciting "Trtsmandi Dhavti" and other related verses for three days.
सोमारौद्रं तु बह्वेनाः मासमभ्यस्य  शुध्यति।
स्रवन्त्यामाचरन्स्नानमर्यम्णामिति च तृचम्॥11.254॥
बहुत पाप करने वाला भी "सोमरुद्रा भारयेथामसूर्यम्" और "अर्थमणं वरुणं मित्रं" इत्यादि ऋचाओं का एक मास तक नदी में स्नान करके, जप करने वाला भी शुद्ध हो जाता है। 
One who has committed numerous sins too gets purified by the recitation of "Somrudra Bharyethamsuryam" and "Arthmann Varunn Mitran" and other verses for three months.
Its not a licence-permit to commit further sins. The prudent should never repeat offences having undergone penances.Repeated offences bring unbearable tortures, troubles and residency in hells.
अब्दार्धमिन्द्रमित्येतदेनस्वी सप्तकं जपेत्।
अप्रशस्तं तु कृत्वाऽप्सु मासमासीत भैक्षभुक्॥11.255॥
पापी मनुष्य पाप से मुक्त होने के लिये "इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निम्" इत्यादि सात ऋचाओं का जप करे और जल में मल-मूत्रादि करने वाला एक मास पर्यन्त भिक्षा का अन्न खाकर शुद्ध हो जाता है। 
To get rid of the sin, the sinner should recite "Indran Mitran Varunmgnim" etc. seven verses. One who passes stools, urine, spit or through waste in water should depend over the begged food for one month.
Having copied the European style of living every one is using toilets where water is already present in the commodes.Its a sin committed unaware.
मन्त्रै: शाकलहोमीयैरब्दं हुत्वा घृतं द्विजः।
सुगुर्वप्यपहन्त्येनो जप्त्वा वा नम इत्यृचम्॥11.256॥
शाकल होमीय मन्त्रों से एक वर्ष तक घी से हवन करने से अथवा "नम इन्द्रश्च" ऋचा को अथवा "इति वा इति मे मनः" मन्त्र का जप करने से द्विज बहुत बड़े-बड़े पाप का नाश करता है। 
Carrying out of Hawan aided by Shakal Homiy Mantr for one year, with the sacrifices of Ghee in holy fire or recitation of "Nmah Indrashch" verse or "Iti Va Iti me Manh" verse leads to eradication of greatest sins by the Brahmns.
महापातकसंयुक्तोऽनुगच्छेद्गाः समाहितः।
अभ्यस्याब्दं पावमानीर्भैक्षाहारो विशुद्ध्यति॥11.257॥
महापातकी पुरुष समाहित चित्त होकर एक वर्ष तक भिक्षा के अन्न का भोजन करे और गौओं को चरावे तथा "पावमानी रध्येति" इत्यादि ऋचाओं का जप करे तो पाप से शुद्ध होता है। 
The greatest sinner is purified-cleansed by eating the food earned by begging and grazing the cows for one year and recitation of "Pavmani  Radhyeti" etc. verses. 
अरण्ये वा त्रिरभ्यस्य प्रयतो वेदसंहिताम्।
मुच्यते पातकैः सर्वैः पराकैः शोधितस्त्रिभिः॥11.258॥
तीन बार पराक व्रत से शुद्ध पुरुष संयत चित्त होकर तीन बार जंगल में वेद संहिता का पाठ करने से सभी पातकों से शुद्ध हो जाता है। 
One cleansed through Parak Vrat is purified by the recitation of Ved Sanhita in the Jungle (forest in isolation) with balanced state of mind (cool & calm) thrice.
यतात्मनोऽप्रमत्तस्य द्वादशाहमभोजनम् ।
पराको नाम कृच्छ्रोऽयं सर्वपापापनोदनः॥ 
इन्द्रिय निग्रह पूर्वक सावधान मन से निरन्तर बारह दिनों तक भोजन का परित्याग कर किये गये इस व्रत से सभी प्रकार के यानी छोटे बड़े सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।One who practice this Vrat by controlling all his senses & rejecting food for 12 days, get rid of all sins.
त्र्यहं तूपवसेद्युक्तस्त्रिरह्नोऽभ्युपयन्नपः।
मुच्यते पातकैः सर्वैस्त्रिर्जपित्वाऽघमर्षणम्॥11.259॥
तीन दिन उपवास कर संयत चित्त होकर प्रतिदिन तीन बार (प्रातः, मध्यान्ह, सायंकाल) स्नान करते समय पानी में "ऋतं च सत्यं  च" इस अघमर्षण सूक्त का तीन बार जप करे तो सभी पापों का नाश हो सकता है। 
One is relieved of all sins if he recites "Ritan Ch Satyan Ch" Aghmarshan Sukt thrice, while bathing in the morning, midday-noon and the evening, staying in water, observing fast with balanced headedness (exercising control over the brain).
यथाऽश्वमेधः क्रतुराट् सर्वपापापनोदनः।
तथाऽघमर्षणं सूक्तं सर्वपापापनोदनम्॥11.260॥
जिस प्रकार सभी प्रकार के पापों के नाशार्थ यज्ञों का राजा अश्वमेध यज्ञ है, उसी प्रकार सभी पापों का नाश करने वाला यह अघमर्षण सूक्त है। 
The way the Ashwmedh Yagy is greatest of all Yagy, Aghmarshan Sukt too is capable of destroying all sins.
अघमर्षण सूक्त ::
संकल्प :: जल में तीर्थावाहन, मृत्तिका प्रार्थना, मृत्तिका द्वारा अङ्ग लेपन ‘ॐ आपो हिष्ठा मयो भुवः’ इत्यादि मन्त्रों से जल द्वारा शिरः प्रोक्षण, तदनन्तर सूर्याभिमुख नाभि मात्र जल में स्नान, पुनः ‘ॐ चित्पतिर्मा पुनातु’ इत्यादि मन्त्रों से शरीर का पवित्रीकरण करने के पश्चात् अघमर्षण सूक्त का जप करना चाहिये।
अघमर्षण का विनियोग ::  
ॐ अघमर्षणसूक्तस्य अघमर्षणऋषिनुष्टुप्छन्दः भाववृतो देवता अघमर्षणे विनियोगः।
अघमर्षण सूक्त ::
ॐ ऋतं च सत्य्म चाभीद्धात्तपसोध्यजायत ततो रात्र्यजायत, ततः समुद्रो अर्णवः समुद्रादर्णवादधि संवत्सरो अजायत, अहोरात्राणि विद्वधद्विश्वस्थ मिषतो वशी सूर्याच्चन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत् दिवञ्ज पृथिवीञ्चान्तरिक्षमथो स्वः॥
अघमर्षण सूक्त के बाद मन्त्र स्नान करके प्राणायाम करें फिर मूल मन्त्र से षडङ्गन्यास करें।
हत्वा लोकानपीमांस्त्रीनश्नन्नपि यतस्ततः।
ऋग्वेदं धारयन्विप्रो नैनः प्राप्नोति किञ्चन॥11.261॥
तीनों लोकों की हत्या करके और इधर-उधर भोजन करके भी ऋग्वेद के अभ्यासी को कुछ पाप नहीं लगता। 
One who practices Rig Ved, kills innumerable people, loiter hither & thither, takes food any where is not contaminated-slurred, sinned.
One who practices Rig Ved avoids the actions prohibited by Veds.
ऋक्संहितां त्रिरभ्यस्य यजुषां वा समाहितः।
साम्नां वा सरहस्यानां सर्वपापैः प्रमुच्यते॥11.262॥
जो समाहित चित्त होकर ऋग्वेद संहिता, यजुर्वेद संहिता अथवा रहस्य के साथ सामवेद का तीन बार अभ्यास करता है; वह सभी पापों से छूट जाता है। 
One who practices Rig Ved Sanhita, Yajur Ved Sanhita or the secrets of Sam Ved thrice with dedication-absolute concentration is relinquished of all sins.
यथा महाह्रदं प्राप्य क्षिप्तं लोष्टं विनश्यति।
तथा दुश्चरितं सर्वं वेदे त्रिवृति मज्जति॥11.263॥
जिस प्रकार बड़े तालाब में फेंका हुआ मिट्टी का ढ़ेला नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार तीन बार वेद की तीन बार आवृति करने, पढने-अभ्यास करने से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।
As a clod of earth-clay, falling into a great lake, quickly dissolves, all sorts of sins are lost by the repetition of Veds thrice with due regard, concentration and practice. 
ऋचो यजूंषि चान्यानि सामानि विविधानि च।
एष ज्ञेयस्त्रिवृद्वेदो यो वेदैनं स वेदवित्॥11.264॥
ऋग्वेद और यजुर्वेद के मन्त्र तथा सामवेद के अनेक मन्त्र; इन तीनों वेदों के अलग-अलग मन्त्रों को जानने वाला ही त्रिवृत् ब्राह्मण, वेदविद् है। 
One-the Brahmn, who has grasped the Mantrs of three Veds Viz. Rig Ved, Yajur Ved and Sam Ved is learned-enlightened & is called Vedvid.
आद्यं यत्त्र्यक्षरं ब्रह्म त्रयी यस्मिन्प्रतिष्ठिता।
स गुह्योऽन्यस्त्रिवृद्वेदो यस्तं वेद स वेदवित्॥11.265॥
आदि जो त्र्यक्षर ब्रह्म (ॐ ओम, प्रणव) है, जिसमें तीनों वेद स्थित हैं, वह प्रथम संज्ञक, दूसरा गुह्य त्रिवृत् है। उसे जो जानता है वह वेदविद् है।  
One who knows the Ultimate-initiator, three alphabet Brahm, "Primordial sound :- ॐ-Om", in which the three Veds exists, which is absolutely secret-confidential; is learned-enlightened & is called Vedvid. 
By the blessings of the Almighty, Ganesh Ji Maha Raj, Maa Bhagwati Saraswati & Bhagwan Ved Vyas the eleventh chapter of Manu Smrati is concluded today at Noida on February the 25th, 2019 and is dedicated to the learned, enlightened devotees of the God.
Thorough revision of this chapter is completed today i.e., September 19, 2022 and presented to the virtuous, enlightened readers-devotee of the Almighty. One who learns this and propagate it further will be relinquished from all sins and progress in life along with attaining Salvation-Moksh. 
Hari Om Tat Sat.

 
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संतोष महादेव-धर्म विद्या सिद्ध व्यास पीठ (बी ब्लाक, सैक्टर 19, नौयडा)
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