Sunday, September 6, 2015

BRAHMAN DUTIES-DHARM :: MANU SMRATI (4) मनुस्मृति :: ब्राह्मण वृत्ति-धर्म

MANU SMRATI (4) मनुस्मृति 
 (ब्राह्मण वृत्ति-धर्म, ग्राहस्थ धर्म, स्वास्थ्य के नियम, सदाचार, वेद अनध्याय)
CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM
By :: Pt. Santosh Bhardwaj
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ॐ गं गणपतये नम:।
अक्षरं परमं ब्रह्म ज्योतीरूपं सनातनम्।
निराकारं स्वेच्छामयमनन्तजम्॥
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि
[श्रीमद्भगवद्गीता 2.47]
गृहस्थ के लिए अपनायी जाने योग्य आदर्श आचार-संहिता, निषिद्ध कर्मों से बचना तथा चरित्र की रक्षा के प्रति सदैव सतर्क रहना। गृहस्थ को जितेन्द्रिय होने के साथ-साथ दान देने में अत्यन्त उदार होने का सुझाव।
चतुर्थमायुषो भागमुषित्वाSSद्यं गुरौ द्विजः। 
द्वितीयमायुषो भागं कृतदारो गृहे वसेत्॥4.1॥ 
ब्राह्मण आयुष्य के पहले चौथे भाग को (25) गुरु के आश्रम में रहकर बिताये और दूसरा हिस्सा विवाह कर गृहस्थ जीवन व्यतीत करे (25 से 50 वर्ष)। 
A Brahman should spend first 25 years of his life in the Ashram of the Guru to acquire education and spend the second half of his life as a house hold after marriage (between 25 to 50 years of age).
अद्रोहेणैव भूतानामल्पद्रोहेण वा पुनः। 
या वृत्तिस्तां समास्थाय विप्रो जीवेदनापदि॥4.2॥ 
ब्राह्मण किसी को बिना कष्ट पहुँचाये अथवा दूसरे को थोड़ा कष्ट देकर (अर्थात याचना-वृत्ति से) निरापद जीवन निर्वाह-व्यतीत करे। 
The Brahmn should manage to live without troubling others. At the most he may request others to help-provide subsistence to survive a trouble free life.
यात्रामात्र प्रसिद्ध्यर्थं स्वै: कर्मभिरगर्हितै:। 
अक्लेशेन शरीरस्य कुर्वीत धनसञ्चयम् ॥4.3॥ 
विहित कर्मों के द्वारा, शरीर को कष्ट देकर, केवल प्राणरक्षा के निमित्त धन-धान्य का संग्रह करे। 
The Brahmn should earn only for subsistence through prescribed means, deeds-occupations by paining his body.
ऋृतामृताभ्यां जीवेत्तु प्रमृतेन वा। 
सत्यानृताभ्यामपि वा न श्र्ववृत्तया कदाचन॥4.4॥ 
ब्राह्मण ऋृत या अमृत से, मृत या प्रमृत से अथवा सत्य या असत्य से जीवन निर्वाह करे, परन्तु कुत्ते की वृत्ति का अवलम्बन कभी न करे। 
The Brahmn may adopt Rat or Amrat, Mrat or Pramrat or Saty or Asaty for survival-subsistence; but never resort to the tendency of a dog.
ऋृत :: शीलोञ्छ वृत्ति से प्राप्त अन्न; food grains collected from the harvested crop fields left over by the farmers.
शीलोञ्छ :: वह  दाने जो किसान द्वारा कटे हुए खेत में से चुनने-बीनने से रह जाते हैं; food grains left over by the farmers in the harvested crop fields. 
अमृत :: बिना माँगे जो मिले; offerings obtained without being asked.
मृत :: याचना करने से जो मिले; any thing-offerings obtained on request, asking.
प्रमृत :: कृषि कर्म से जो मिले; earnings through agriculture-cultivation-farming.
सत्यानृत :: वाणिज्य; trading, business. 
सेवा :: कुत्ते की वृत्ति; tendency of dog.
ऋृतमुञ्छ शिलं ज्ञेयममृत: स्यादयाचितम्। 
मृतं तु याचितं भैक्षं प्रमृतं कर्षणं स्मृतम्॥4.5॥ 
प्राप्त अन्न को शीलोञ्छ वृत्ति से ऋृत, बिना माँगे जो मिले उसे अमृत, याचना करने से जो मिले उसे मृत और कृषि कर्म से जो मिले उसे प्रमृत कहते हैं। 
Rat is the food grains collected from the harvested crop fields left over by the farmers, Amrat is the offerings obtained without being asked, Mrat is anything-offerings obtained on request, asking and Pramrat is the earnings made through agriculture-cultivation-farming.
सत्यानृतं तु वाणिज्यं तेन चैवापि जीव्यते। 
सेवा श्ववृत्तिराख्याता तस्मात्तां परिवर्जयेत्॥4.6॥ 
सत्यानृत वाणिज्य को कहते हैं, इससे भी जीवन-निर्वाह करे। सेवा को कुत्ते की वृत्ति को कहते हैं। इसलिये इस वृत्ति को कभी नहीं करना चाहिये। 
Satyanrat is trading, business and can be adopted for earning as a profession. Sewa-service is the tendency of dog, which must not be adopted by a Brahmn for survival-subsistence. 
In today's scenario its essential even for Brahmns to accept one or the other job. So, he should revert to Brahmn Dharm as and when he has time. He should make it a daily routine to perform morning and evening prayers. Take bath in the morning, eat only vegetarian food, shun violence unless-until he has to protect himself and his family. He should never use alcohol, smoking flirtation etc.
कुसूलधान्यको वा स्यात्कुम्भीधान्यक एव वा। 
त्र्यहैहिको वाSपि भवेदश्वस्तनिक एव वा॥4.7॥ 
कुसूलधान्यक-इतना अन्न इकट्ठा करे जिससे 3 वर्ष का या उससे भी अधिक समय तक घर का खर्च चल सके, अथवा कुम्भीधान्यक-एक साल के खर्च योग्य अन्न संचित करे, त्र्यहैहिक-3 दिन के लायक अन्न संचित करे अथवा अश्वस्तनिक-उतना ही अन्न संग्रह करे, जो अगले दिन के लिये न बचे, ऐसा ब्राह्मण गृहस्थ को होना चाहिये।
The Brahmns are categorised into sections on the basis of the food grain accumulated by them :-
(1).  Kusuldhanyak :- One who accumulate so much food grain which will suffice for 3 years,
(2). Kumbhidhanyak :- One who accumulate so much food grain which will suffice for one year,
(3). Trayhaehik :- One who accumulate so much food grain which will suffice for 3 days only & the 
(4). Ashwstnik :- One who accumulate so much food grain which will suffice for the next day only. 
चतुर्णामपि चैतेषां द्विजानां गृहमेधिनाम्। 
ज्यायान्पर: परो ज्ञेयो धर्मतो लोकजित्तम:॥4.8॥ 
इन चारों प्रकार के गृहस्थ ब्राह्मणों में एक दूसरे से उत्तरोत्तर श्रेष्ठ है, श्रेष्ठ गृहस्थ स्वर्गादि लोकों वाला होता है। 
The next category of the Brahmns is superior-higher to the former. The excellent house hold Brahmn has a right-claim over the heaven.
A Brahmn should never crave for higher abodes like Swarg. He should make efforts-endeavours for Salvation and above all he should resort to the Bhakti-devotion to the Almighty, only while performing his Varnashram Dharm.
षट्कर्मैको भवत्येषां त्रिभिरन्य: प्रवर्तते। 
द्वाभ्यामेकश्चतुर्थस्तु ब्रह्मसत्रेण जीवति॥4.9॥ 
इस चारों प्रकार के गृहस्थों में एक षट्कर्म्मी होता है अर्थात ऋतु, आयाचित (unsolicited, urgently requested or desired, not asked for, prayer, without orison, prayer, request or begging), याचित (जिसकी याचना की गई हो, प्रार्थित, माँगा गया धन; money obtained by requesting), कृषि, वाणिज्य और ब्याज, इन छहों कर्मों से जीता है। अन्य तीन कर्मों से अर्थात याजन, अन्यापन और दान लेने से और एक (याजन अन्यापन से) तथा चौथा ब्राह्मण वेदाध्ययन से ही जीता है। 
Of these 4 categories the first survives-subsists by adopting 6 professions, the second has 3 options, the third has only 2 while the 4th i.e., ultimate category has only one option i.e., survival by the learning of Veds (Its the duty of the society to offer him food).
वर्तयंश्च शिलोञ्छाभ्यामग्निहोत्रपरायण:। 
इष्टी: पार्वायनान्तीया: केवला निर्वपेत्सदा॥4.10॥ 
शिलोञ्छवृत्ति से जीवन निर्वाह करता हुआ अग्निहोत्र करे। अमावस्या, पूर्णिंमा तथा अयनों के अन्त में होने वाले इष्टी नामक यज्ञ को सदा करे। 
One should survive over the food grain collected form the harvested field, performing Agnihotr side by side. He should perform the Yagy called Ishti, which is timed at the end of the two transitions of the Sun from Southern or Northern hemisphere & on the full Moon day and the Moon less day.
अयन :: सूर्य के उत्तरावर्त या दक्षिणावर्त होने का 6 महीने का काल-समय; departure, path, time, trajectory, udder, way, period of six months when the Sun moves to either of the two hemispheres:- Southern or Northern.six months. 
एक अयन = 3 ॠतुएँ, एक वर्ष = 2 अयन, उत्तरायन = देवताओं का दिन और दक्षिणायन = देवताओं की रात।
न लोकवृत्तं वर्तेत वृत्तिहेतोः कथञ्चन। 
अजिह्मामशठां शुद्धां जीवेद् ब्राह्मणजीविकाम्॥4.11॥ 
जीविका के लिये अन्य लोगों की भाँति छल-प्रपञ्च आदि नीच वृत्ति का अवलम्बन न करे। झूंठी आत्म-प्रशंसा और दम्भ, कपट (fraud, guile) आदि त्यागकर ब्राह्मण की जो जीविका हो उसी से जीये। 
The Brahmn should not be inclined to deceit, low level tactics, cheating like others for the sake of subsistence-survival. He should not indulge in boasting, self praise, ego, fraud, guile etc. and earn through the means prescribed for the Brahmns.
संतोषं परमास्थाय सुखार्थी संयतो भवेत्। 
संतोषमूलं हि सुखं दुःखमूलं विपर्ययः॥4.12॥ 
सुख की इच्छा से परम् सन्तोष धारण कर मन को किसी ओर बहकने न दे, क्योंकि सन्तोष सुख का असन्तोष दुःख का मूल है। 
One desirous of bliss-pleasure, should be satisfied-content with himself and should not allow-permit the brain to deviate to distortions; since Santosh-contentment leads to bliss and the dissatisfaction leads to sorrow-pain.
अतोSन्यतमया वृत्या जीवंस्तु स्नातको द्विजः। 
स्वर्गायुष्ययशस्यानि वृतानीमानि धारयेत्॥4.13॥
गृहस्थ ब्राह्मणों को पूर्वोक्त वृत्तियों में से किसी एक वृत्ति के आश्रय से अपनी जीविका को चलाते हुए स्वर्ग, आयु और यश को देने वाले आगे कहे हुए व्रत्तों का पालन करे। 
The Brahmns having family-household may adopt any of the six measures described before for subsistence and prepare for attaining heaven, longevity & virtues, name-fame, by performing the austerity measures described next.
व्रत :: उपवास, किसी विषय में दृढ निश्चय करके उसे पूरा करने का निर्णय और प्रयास; fast,  service, pious austerity, obedience, vow, a firm pledge.
Apparently this practice is impossible in the current phase called Kali Yug. Still, exceptions are always there.
वेदोदितं स्वकं कर्म नित्यं कुर्यादतन्द्रितः।
तद्धि कुर्वन् यथाशक्तिं प्राप्नोति परमां गतिम्॥4.14॥ 
आलस्य को छोड़कर नित्य अपने विदोख्त कर्म को करे, क्योंकि यह यथाशक्ति करने से कर्म करने वाला परमगति को पाता है। 
The Brahmn or anyone, who reject laziness and preform the prescribed and mandatory duties listed in the Veds attains Ultimate abode, Salvation-Moksh.
नेहेतार्थन्प्रसङ्गेन न विरुद्धेन कर्मणा। 
न विद्यमानेष्वर्थेषु नार्त्यामपि यतस्ततः॥4.15॥ 
गाने-बजाने की वृति से शास्त्र विरुद्ध कर्म से धन प्राप्त न करे। पास में धन हो या न हो, विपत्ति में जिस-तिस से अर्थात पतितों से द्रव्य न ले। 
He should not earn money through music, singing or the deeds against the scriptures. Whether he has money or not he should never accept money from the out caste-downtrodden, in distress-difficult times.
इन्द्रियार्थेशु सर्वेषु न प्रसज्येत कामत:। 
अतिप्रसक्तिं चैतेषां  मनसा संनिवर्तयेत्॥[ मनुस्मृति 4.16] 
इन्द्रियों के सभी नियमों के (शब्द, रूप, रस, गंध, स्पर्श) उपभोग-बुद्धि से उनमें आसक्त न हो। विषयों को अनित्य जान इनकी अत्यासक्ति को मन से रोके।[मनुस्मृति 4.16] 
One should not be inclined to the satisfaction of sense organs through comforts-luxuries. He should be aware of the fact that they are not forever and are perishable. He should restrain his mind and intelligence not to be indulged-dragged, lured by them.
सर्वान्परित्यजेदर्थान्स्वाध्यायस्य विरोधिनः। 
यथातथाSध्यापयस्तु सा ह्यस्य कृतकृत्यता॥4.17॥ 
वेद विरुद्ध सभी प्रकार के अर्थों का त्याग कर जिस प्रकार हो वेद पढ़ाता हुआ परिवार के साथ अपनी जीविका चलाये। गृहस्थ ब्राह्मण की सार्थकता इसी में है। 
One should reject-discard all motives-allurements against the Veds and somehow earn his livelihood by teaching the Veds. The success-significance of the household Brahmn lies in it only.
With the invent of Buddhism there was a steep fall in the learning of Veds. The Buddhist, Muslims and the Britishers misinterpreted the Veds. Daya Nand too was not far behind.
वयस: कर्माणोSर्थस्य श्रुतस्याभिजनस्य च। 
वेषवाग्बुद्धिसारूप्यामाचरन्विचरेदिह॥4.18॥ 
अवस्था, क्रिया, धन, विद्या और कुल, इनके अनुरूप भेष, वचन और बुद्धि रखता हुआ संसार में रहे। 
The Brahmn should dress up, speak and act in conformity with the age, actions, money, education and the clan.
भेष  :: appearance, disguise, get-up, guise, jest, person.
बुद्धिवृद्धिकराण्याशु धन्यानि च हितानि च। 
नित्यं शस्त्राण्यवेक्षेत निगमांश्चैव वैदिकान्॥4.19॥ 
बुद्धि बढ़ाने को वाले और धन तथा आरोग्य की शिक्षा देने वाले शास्त्रों का नित्य अध्ययन करे और वेदार्थ के प्रतिपादक निगम ग्रन्थों को भी पढ़े। 
One should make it a daily routine (habit) of learning the scriptures, which help him in remaining healthy, wealthy and mentally alert-sound; along with the text called NIGAM, which describe the meaning, of the word, sentence in its original form along with use. In general, Nigam describes the origin of words in Veds, explanation-illustration and uses simultaneously, which analyse the Veds.
निगम :: शब्द, पद और शब्दों का मूल रूप या निरुक्ति; वैदिक मतों का निरूपण, प्रतिपादन और स्पष्टीकरण। सामान्यतया आगम तंत्र के लिए और निगम वेदों के लिए प्रयुक्त होता है; They describe the meaning, of the word, sentence in its original form used in Veds, along with their uses. In general they describes the origin of words in Veds, explanation-illustration and uses simultaneously.
यथा यथा हि पुरुषः शास्त्रं समधिगच्छति। 
तथा तथा विजानाति विज्ञानं चास्य रोचते॥4.20॥ 
पुरुष जैसे-जैसे शास्त्र का विशेष रूप से अध्ययन करता है, वैसे-वैसे उसका ज्ञान बढ़ता है, विज्ञान उज्जवल होता है। 
As one read & learn the scriptures specially, his knowledge & enlightenment enhances, more he goes into deep studies his understanding of science and its various branches goes further and further.
The Veds are the root of all knowledge. They have all the scientific knowledge, principals and laws embedded in them. What one needs is deep study and concentration and understanding.One must analyses them as well. It becomes easy if one study them under the expert guidance of a renowned teacher-THE GURU, for the sake of the upliftment and help of the society. The three Veds under a teacher must be studied for thirty-six years or for half that time or for a quarter or until the disciple-student, has perfectly learnt, grasped-mastered them. Bhagwan Shri Krashn and Balram Ji learnt all scriptures in just 36 days from Guru Sandeepan, at his Ashram.
ऋषियज्ञं देवयज्ञं भूतयज्ञं च सर्वदा। 
नृयज्ञं पितृयज्ञं च यथाशक्ति न हापयेत्॥4.21॥  
ऋषियज्ञ-वेदाध्ययन, देवयज्ञ-होम-हवन, भूतयज्ञ-बलि, नृयज्ञ-अतिथि सत्कार-सेवा और पितृयज्ञ-तर्पण; इनका यथाशक्ति त्याग ने करे। 
One must ensure that various Yagy like Rishi Yagy, Dev Yagy, Bhut Yagy, Nra Yagy-welcoming & feeding the guest and Pitr Yagy continue-perpetuate, throughout his life. He should invoke virtues in his progeny and see that they too transfer this learning to their progeny. 
एतानेके महायज्ञान्यज्ञशास्त्रविदो जनाः। 
अनीहमाना: सततमिन्द्रियेष्वेव जुह्वति॥4.22॥ 
यज्ञ शास्त्र के जानने वाले इन महायज्ञों को न करते हुए सदा, ज्ञानेन्द्रियों में विषयों का हवन करके इन यज्ञों का सम्पादन करते हैं। 
Those who are well versed-experts in scriptures-implement perform these Ultimate Maha Yagy-sacrifices by purifying-vanishing, controlling the allurements of the sense organs even when they do not actually organise a session for the holy sacrifices in fire.
Its reality its extremely difficult to restrain the sense organs, which always look to gratification of passions, comforts, luxuries and are ready to do anything for the sake of money.
वाच्येके जुह्वति प्राणं प्राणे वाचं च सर्वदा। 
वाचि प्राणे च पश्यन्तो यज्ञनिर्वृत्तिमक्षयाम्॥4.23॥ 
वाणी और प्राण में यज्ञ का अक्षय फल देखकर सदा वाणी में प्राण और प्राण में वाणी का हवन करते हैं अर्थात प्राण और वचन दोनों को अपने अधीन कर लेते हैं। 
The breath-respiration and the life force (being alive), both yield imperishable rewards by sacrificing each one of them, into the other, i.e., one has to control both; his  speech and breath.
One should never talk irrelevant or speak words which cause pain into others minds-hearts or cause sorrow. Never make fun-joke of others or pass livid comments. Never speak harsh words. Speak only when necessary-essential. Words should be weighed carefully, before speaking. The breath can be controlled through Yog i.e., Pranayam. Both of these are just like Yagy. Yagy award fruits (favourable outcome-results) at a later date but both of these reward one, immediately.
ज्ञानेनैवापरा विप्रा यजन्त्येतैर्मखैः सदा। 
ज्ञानमूलां क्रियामेषां पश्यन्तो ज्ञानचक्षुषा॥4.24॥ 
अन्य ज्ञानी ब्राह्मण ज्ञानचक्षु से, इन यज्ञों की क्रिया को ज्ञानमूलक जानकर, ज्ञान से ही पञ्चमहायज्ञों के फलभागी होते हैं। 
Rest of the Brahmns, who realise that the performance of these Yagy with the help of knowledge, which forms the basis-root of the whole process of Yagy, attains the reward of Panch Maha Yagy through Gyan-knowledge, enlightenment. 
अग्निहोत्रं च जुहुयादाद्यन्ते द्युनिशोः सदा। 
दर्शेन चार्धमासान्ते पौर्णामासेन चैव हि॥4.25॥ 
गृहस्थ प्रतिदिन प्रातः-सांय सन्धिवेलाओं में अग्निहोत्र करे और मास के अन्त में दर्श यज्ञ अर्थात् अमावस्या का यज्ञ करे तथा इसी प्रकार मास पूर्ण होने पर पूर्णिमा के दिन पौर्ण मास यज्ञ करे।
The Brahmn-household should perform the Agnihotr in the morning as well as in the evening and similarly he should perform the Darsh Yagy-Yagy on the day of moonless night and Pournmas Yagy on the occasion of the completion of the month.
दर्श यज्ञ-अमावस्या का यज्ञ :: Yagy-sacrifices in holy fire on the moon less night day.
पौर्ण मास यज्ञ पूर्णिमा के दिन यज्ञ :: Yagy-sacrifices in holy fire on the full moon day.
सस्यान्ते नवसस्येष्ट्या तथा र्त्वन्ते द्विजोऽध्वरैः। 
पशुना त्वयनस्यादौ समान्ते सौमिकैर्मखैः॥4.26॥ 
धान की समाप्ति होने पर नए अन्न से यज्ञ करे। ऋतु के अन्त में चातुर्मासिक यज्ञ करे, अयन आरम्भ में पशु के द्वारा यज्ञ करे तथा वर्ष के अन्त में चैत्र शुल्क प्रतिप्रदा से सौमिक अर्थात सोमरस प्रधान अग्निष्टोम आदि यज्ञ करे। 
नवीनान्न उत्पन्न होने के समय नवसस्येष्टि से हवन करें। फसल के अन्त में चातुर्मासिक यज्ञ, दोनों अयनों में पशु द्वारा हवन करें तथा वर्ष के अन्त में सोमयोग करें। नवसस्येष्टि यज्ञ को किये बिना द्विज कभी नवीन अन्न का भोजन न करे।
One should perform Yagy on the occasion of arrival of new paddy and exhaustion of the old food grain in the house, Chaturmasik Yagy at the end of the season (spring, summer, autumn and winter), a Yagy with the animals sacrifices at the beginning of Ayan  (movement of Sun from hemisphere to other) and then he should perform a Yagy at the end of the year associated with serving of Som Ras (rejuvenating extract of the Som vein).
चातुर्मासिक यज्ञ :: Yagy performed at the end of the season. 
नानिष्ट्वा नवसस्येष्ट्या पशुना चाग्निमान्द्विजः। 
नवान्नं अद्यान्मांसं वा दीर्घं आयुर्जिजीविषुः॥4.27॥ 
दीर्घायु की इच्छा वाला अग्निहोत्र ब्राह्मण, आग्रयणेष्टि और पशु यज्ञ किये बिना नवान्न और माँस न खाये। 
A Brahmn who performs the Agnihotr & nurtures-nourishes the desire to live long, shall not eat the new food grains or meat; without performing a Agraneshti Yagy and animal sacrifice.
आग्रयणेष्टि यज्ञ :: जब किसान के घर नई फसल आती है तो वह उसकी पूजा करने के बाद ही उसे भोजन हेतु ग्रहण करता है। 
Scriptures strictly forbid a Brahmn from consuming meat or holding animal sacrifices.This tenet is meant for the Rakshas-demons. Ravan was a Rakshas though Brahmn by birth.
नवेनानर्चिता ह्यस्य पशुहव्येन चाग्नयः। 
प्राणानेवात्तुं इच्छन्ति नवान्नामिषगर्धिनः॥4.28॥ 
नये अन्न और माँस अभिलाषी अग्निदेव नवान्न और पशु से पूजित न होने पर अर्थात उन दोनों वस्तुओं की आहुति न पाने  पर अग्निहोत्री ही के प्राणों को खाना चाहते हैं। 
Agni Dev the deity of fire is ready to devour the vital spirits of the performer of the Agnihotr-holy sacrifices in fire, for not offering new food grain and the meat relished by him.
DEVOUR :: खाना, निगलना, भस्म करना, चाव-ख़ुशी से खाना; eat hungrily, eat quickly, eat greedily, eat heartily, eat up, swallow, gobble (up/down), guzzle (down), gulp (down), bolt (down), cram down, gorge oneself on, wolf (down), feast on, consume. 
आसनाशनशय्याभिरद्भिर्मूलफलेन वा। 
नास्य कश्चिद्वसेद्गेहे शक्तितोऽनर्चितोऽतिथिः॥4.29॥ 
गृहस्थ को अपने घर में शक्ति के अनुसार अतिथि का आसन, भोजन, शय्या और कंदमूल, फल तथा जल से अतिथि सत्कार करना चाहिये। 
The house hold should offer couch-cushion, seat, food, bed, fruits, roots & rhizomes, tubers and bulbs and water to the guest as per his ability.
पाषाण्डिनो विकर्मस्थान्बैडालव्रतिकाञ् शठान्। 
हैतुकान्बकवृत्तींश्च वाङ्गात्रेणापि नार्चयेत्॥4.30॥ 
पाखण्डी, निषिद्ध कर्म करने वाले, वैडाल वृत्तिक (धार्मिक बनने का आडंबर करने वाले, लोभी, कपटी, दम्भ और हिंसा वृत्ति से जीवन निर्वाह करने वाले) शठ (गुरु, देवता और शास्त्रों में जिनकी श्रद्धा न हो)। हैतुक (वेद के विरुद्ध तर्क करने-देने  वाले) और वक वृत्ति (नीचे दृष्टि रखते हुए अपने स्वार्थ को सिद्ध करने वाले और झूंठे ही विनयशीलता से जीवन निर्वाह करने वाले); ये लोग यदि अतिथिरूप से घर पर आवें, तो वचन से भी उनका स्वागत-सत्कार न करे।  
राम देव, आशा राम जैसे लोग इसी श्रेणी में आते हैं। राजनीति में कदम रख चुके भगवा वस्त्र धारी भी इसी श्रेणी के लोग हैं।  The house hold should not felicitate-welcome, honour or even by a greet, heretics, men who follow forbidden occupations, men who live like cats, rogues, logicians, (arguing against the Ved) and those who live like herons.
There is no dearth of people who pose to be saints-ascetics, preachers like Asha Ram, Ram Dev, Ravi Shankar, Radhey Maa; who in reality are traders of religion. In fact they are crooks, forgers, fraudsters, whose sole aim is money, sex  & power.Any one who is a politician but wears saffron cloths too is a component of this category. 
पाखण्डी :: ढोंगी, छल करने वाला, वेद विरुद्ध आचरण करनेवाला, वेद–निंदक; impostors, hypocritical, sanctimonious. 
वैडाल वृत्तिक :: धार्मिक बनने का आडंबर करने वाला, लोभी (greedy), कपटी (deceptor), दम्भी (egoistic) और हिंसा वृत्ति से जीवन निर्वाह करने वाला; one who earns his livelihood through violent means.
आडंबर :: दिखावा, अनावश्यक आयोजन; pageantry, bombast.
शठ :: गुरु, देवता और शास्त्रों में जिनकी श्रद्धा न हो; शातिर,  दुष्ट, चालाक, मक्कार,  कुटिल, शैतान, चतुर, दक्ष, शातिर, चालू, बेईमान, कपटी, असत, प्रवंचक, ढीला, मिथ्या, छलिया, झूठा, ढोंगी, धूर्त, दुर्जन; one who has no respect for the Guru, demigods, deities and the scriptures, rascal, rogue, astute, crafty, fraudulent, vicious, wicked, deceitful,  unprincipled roguish, crafty, cunning, dishonest, fraudulent. 
वक वृत्ति :: धोखा देकर काम निकालने वाला; one who pretend to be polite for getting his job done or fulfilment of his motive-motto.
वेदविद्याव्रतस्नाताञ् श्रोत्रियान्गृहमेधिनः। 
पूजयेद्धव्यकव्येन विपरीतांश्च वर्जयेत्॥4.31॥
वेद विद्या स्नातक, व्रतस्नातक या विद्याव्रतस्नातक वैदिक गृहस्थ ब्राह्मण को, घर आने पर हव्य-कव्य से उनकी पूजा करे और जो इनके विपरीत हों उन्हें न पूजे। 
The household should honour-welcome the graduates in the studies of Veds, systems pertaining to fasting (self control, asceticism, Yog, meditation or concentration in the Almighty) or a Brahmn who has mastered both of these faculties and offer them oblations in addition to gifts, money etc., but abstain from welcoming such a person who is against these the Brahmns as well as the knowledge acquired by them.
शक्तितोऽपचमानेभ्यो दातव्यं गृहमेधिना। 
संविभागश्च भूतेभ्यः कर्तव्योऽनुपरोधतः॥4.32॥ 
जो सन्यासी या ब्रह्मचारी स्वयं भोजन न बना सके उन्हें गृहस्थ यथाशक्ति अन्न दे। कुटुंब के लोगों को तथा अन्य प्राणियों को भी कष्ट के बिना ही यथाशक्ति अन्न-जल का भाग देना चाहिये। 
The householder should give as much food as he is able to spare to those saints, ascetics-recluse celibate who do not cook for themselves and to all the members of his family without detriment-harming his own interest.
DETRIMENT :: हानिकारक, नुक़स़ान पहुँ चानेवाला, नुक़सानदेह, घातक, अहितकर; harmful, detrimental, noxious, injurious, deleterious, bad, poisonous, pestilent, maleficent, cankerous, pernicious, calamitous, malefic, noisome, disadvantageous, noisome, noxious, damaging, inimical, dangerous, destructive, ruinous, disastrous, pernicious, environmentally unfriendly, ill, evil, baleful, malign, corrupting, malignant, adverse, undesirable, prejudicial, unfavourable, unfortunate, counter productive.
राजतो धनं अन्विच्छेत्संसीदन्स्नातकः क्षुधा। 
याज्यान्तेवासिनोर्वापि न त्वन्यत इति स्थितिः॥4.33॥ 
अन्नाभाव से कष्ट उपस्थित होने पर गृहस्थ ब्राह्मण पहले राजा से और यजमान तथा विद्यार्थियों से द्रव्य की अभिलाषा प्रगट करे, परन्तु दूसरे से कुछ न माँगे। 
If the Brahmn faces trouble for want of food grain he should first request the king for money and thereafter either his clients-parishioners or the students. 
न सीदेत्स्नातको विप्रः क्षुधा शक्तः कथं चन। 
न जीर्णमलवद्वासा भवेच्च विभवे सति॥4.34॥ 
विद्वान् स्नातक ब्राह्मण दान लेने में समर्थ होते हुए (वह पूर्वोक्त राजा आदि से) दान प्राप्त होने पर उसका त्याग कर भूखों न मरे। धन मिलने पर मेले, फ़टे-पुराने वस्त्रों को धारण ने करे। 
The learned-enlightened, graduate Brahmn who is qualified to accept money from the king, householders etc. should accept the beggings, offerings, gifts and utilise them over his food and clothing. He should discard dirty, old and torn cloths
क्ल्प्तकेशनखश्मश्रुर्दान्तः शुक्लाम्बरः शुचिः। 
स्वाध्याये चैव युक्तः स्यान्नित्यं आत्महितेषु च॥4.35॥
ब्राह्मण को केश, नख और दाढ़ी मुड़ाकर साफ़-सुथरा रहना चाहिये। दाँत साफ़ रखे और स्वच्छ वस्त्र धारण करे। पवित्रात्मा हो तपस्या के क्लेश को सहने वाला वेद का नित्य अध्ययन करे तथा अपने कल्याण का सदा ध्यान रखे। 
The Brahmn should keep  his hair, nails and beard clean & clipped. His teeth and dress should be clean. The Brahmn who is bearing the stress & strain, brunt of ascetic practices by subduing his passions through austerities should keep his mind, thoughts & soul clean by studying the Veds & scriptures and make endeavours for his welfare.
Ultimate welfare of a Brahmn lies in Salvation-Moksh and devotion to the Almighty
BRUNT :: चोट, आघात, प्रहार, कठिन-घोर परिश्रम; damage, harm, boner, hit, shock, injury, concussion, knock, ictus, knock, ictus, the worst part or chief impact of a specified action, full force, impact, shock, burden, pressure, strain, stress, impetus, thrust, weight, violence.
वैणवीं धारयेद्यष्टिं सोदकं च कमण्डलुम्। 
यज्ञोपवीतं वेदं च शुभं रौक्मे च कुण्डले।॥4.36॥ 
बाँस डण्डा, सजल कमण्डलु, यज्ञोपवीत, वेद और हाथ का कुश तथा दो सुन्दर सोने के कुण्डल धारण करे। 
The Brahmn should ensure the wearing of beautiful golden rings in his ears, holding of a bamboo stick in his hand, wear Janeu-Yagyopaveet (sacred thread) around his neck across the abdomen, Kamandlu-sacred pot full of water, hold Veds (memorise them word by word) and hold Kush grass in he hand.
Please refer to :: SACRED THREAD यज्ञोपवीत-जनेऊ :: HINDU PHILOSOPHY (4.11) हिन्दु दर्शनsantoshkipathshala.blogspot.com
भागं नेक्षेतोद्यन्तं आदित्यं नास्तं यान्तं कदाचन। 
नोपसृष्टं न वारिस्थं न मध्यं नभसो गतम्॥4.37॥ 
उदय और अस्तकाल में, ग्रहण के समय, जल में प्रतिबिम्बित और आकाश के मध्यभाग में होने पर सूर्य को न देखे। 
One should never see the Sun at Sun rise, Sun set, during eclipse, its reflection-image in water and when the Sun at peak in the sky.
This statement has scientific implications. During Sun rise and Sun set the wave length of light is maximum and infrared radiations are sure to harm the eyes. The other situations too may harm one.
न लङ्घयेद्वत्सतन्त्रीं न प्रधावेच्च वर्षति। 
न चोदके निरीक्षेत स्वरूपं इति धारणा॥4.38॥ 
बछड़ा बाँधने की रस्सी को न लाँघे, मेघ बरसते समय न दौड़े और अपना परिबिम्ब पानी में न देखे; यह शास्त्र का निश्चय है। 
One should not cross the rope when the calf is tied with it, should not run when the its raining and should not see his image in water. This is prescribed by the scriptures. 
As a matter of fact what the scriptures say is correct, depending upon the situation. But discard these things being too intelligent i.e., ignorant and relate them with Hinduism.
मृदं गां दैवतं विप्रं घृतं मधु चतुष्पथम्। 
प्रदक्षिणानि कुर्वीत प्रज्ञातांश्च वनस्पतीन्॥4.39॥
बाहर जाते हुये मिट्टी का ढेर, गाय, देवमूर्ति, ब्राह्मण, घी, मधु, चौराहा, बड़े-बड़े प्रसिद्द वृक्ष; इन सबको मार्ग में अपने दाहिने करके चले। 
To keep the earth pile-mound, cow, God's idol, Brahmn, Ghee-clarified butter, honey, cross roads famous big trees on the right is a good omen.
Please refer to :: AUSPICIOUS INAUSPICIOUS OMENS शुभ अशुभ शकुनsantoshsuvichar.blogspot.com
नोपगच्छेत्प्रमत्तोऽपि स्त्रियं आर्तवदर्शने। 
समानशयने चैव न शयीत तया सह॥4.40॥
कामाक्त होने पर भी रजोदर्शन में पहले चार दिन स्त्री से प्रसङ्ग न करे और उसके साथ एक बिछौने पर न सोये। 
One should not indulge in intercourse-sex with the woman during the first 4 days of the menstrual cycle and should not share the bad with her during this phase.
रजसाभिप्लुतां नारीं नरस्य ह्युपगच्छतः। 
प्रज्ञा तेजो बलं चक्षुरायुश्चैव प्रहीयते॥4.41॥
क्योंकि रजस्वला स्त्री के साथ प्रसङ्ग करने वाले पुरुष की बुद्धि, बल, दृष्टि और आयु क्षीण होती है। 
The reason behind this is the fact that the person who mates during this phase hampers his intelligence, might, eyesight and age ultimately.
The blood released from the vagina is full of contamination, since it contains the layer of the film formed inside the uterus. It releases female hormones simultaneously.
तां विवर्जयतस्तस्य रजसा समभिप्लुताम्। 
प्रज्ञा तेजो बलं चक्षुरायुश्चैव प्रवर्धते॥4.42॥
पुरुष रजस्वला स्त्री को स्पर्श नहीं करते उनकी प्रज्ञा, तेज, बल, दृष्टि और आयु की वृद्धि होती है। 
One who avoids the woman during periods gains wisdom, energy, strength, sight and vitality.
नाश्नीयाद्भार्यया सार्धं नैनां ईक्षेत चाश्नतीम्। 
क्षुवतीं जृम्भमाणां वा न चासीनां यथासुखम्॥4.43॥
स्त्री के साथ न खाये, भोजन करती हुई, छींकती हुई, जँभाई लेती हुई या फिर एकांत में स्वच्छन्द बैठी हुई स्त्री को न देखे। 
One should not eat-dine with the woman undergoing periods. He should abstain from looking the woman-his wife, when she is sneezing, yawning or  sitting alone freely-at ease.
नाञ्जयन्तीं स्वके नेत्रे न चाभ्यक्तां अनावृताम्। 
न पश्येत्प्रसवन्तीं च तेजस्कामो द्विजोत्तमः॥4.44॥
यदि स्त्री अपनी आँखों में काजल या तेल-उबटन लगा रही हो या खुले अंग बैठी हो अथवा बच्चे को स्तनपान करा रही हो, तो उसे तेजस्काम ब्राह्मण उसे न देखे। 
The Brahmn who performs three functions viz. learning of Veds, Agni Hotr-Yagy and donation or one who desire energy-brilliance, power should not look at, watch a woman-his wife, putting scoot-eye wash in her eyes, either applying oil over the body-body massage or sitting naked or feeding the child.
तेजस्काम :: तेजस्, शक्ति या प्रताप की कामना करनेवाला, त्रिकर्मा ब्राह्मण जो वेदों का अध्ययन, यज्ञ और दान ये तीन मुख्य कर्म करते हैं; One who desire energy-brilliance, power. A Brahmn who performs three functions viz. learning of Veds, Agni Hotr-Yagy and donation.
नान्नं अद्यादेकवासा न नग्नः स्नानं आचरेत्। 
न मूत्रं पथि कुर्वीत न भस्मनि न गोव्रजे॥4.45॥
एक ही वस्त्र पहनकर भोजन न करे, नग्न होकर स्नान न करे, रास्ते में राख के ढेर में या गौशाला में मलमूत्र न करे।
One should never eat-dine in just single cloth, take bath naked or urinate-defecate in a pile of ash on his way or in the cowshed.
न फालकृष्टे न जले न चित्यां न च पर्वते। 
न जीर्णदेवायतने न वल्मीके कदाचन॥4.46॥
जोते हुए खेत में, पानी में, ईंट के भट्टे पर, पहाड़ पर, पुराने देव मन्दिर में और वल्मीक (विमोट) पर कभी मलमूत्र न करे।
One should never either ease or urinate in a ploughed field, water reservoir, brick kiln-pile, termite  hill-mountain and the ant-hill.
न ससत्त्वेषु गर्तेषु न गच्छन्नपि न स्थितः। 
न नदीतीरं आसाद्य न च पर्वतमस्तके॥4.47॥
जो गड्ढे प्राणियों से युक्त हों उनमें, चलते-चलते या खड़े होकर नदी के तट पर या पहाड़ की चोटी पर मलमूत्र न करे। 
One should never either ease or urinate in a pit-burrow nourishing creatures-organism, while walking, standing over the river bank or the mountain cliff-hill top.
वाय्वग्निविप्रं आदित्यं अपः पश्यंस्तथैव गाः। 
न कदा चन कुर्वीत विण्मूत्रस्य विसर्जनम्॥4.48॥
वायु जिस ओर बहती हो उस ओर मुँह करके तथा अग्नि, ब्राह्मण, सूर्य, जल और गाय को देखता हुआ कदापि मलमूत्र न करे। 
One should never either ease or urinate facing direction of the blowing wind, fire, Brahmn, Sun, water or the cow.
तिरस्कृत्योच्चरेत्काष्ठ लोष्ठपत्रतृणादिना। 
नियम्य प्रयतो वाचं संवीताङ्गोऽवगुण्ठितः॥4.49॥
सूखी लकड़ी, पत्ते, तृण, मिट्टी आदि से भूमि को ढँककर, वस्त्र से शरीर को ढँककर, सिर में कपड़ा लपेट कर, मौन धारण कर, स्थिर चित्त से मलमूत्र त्याग करे। 
One should ease with stable mind, having covered the place meant for easing with dry wood scraps, leaves, straw or clay after covering the body and wrapping the head with a cloth, silently.
मूत्रोच्चारसमुत्सर्गं दिवा कुर्यादुदङ्मुखः। 
दक्षिणाभिमुखो रात्रौ संध्यायोश्च यथा दिवा॥4.50॥
दिन में उत्तर दिशा की ओर और रात में दक्षिण दिशा की ओर मुँख करके मलमूत्र का त्याग करे। प्रातः काल और साँयकाल में दिन की तरह रहे। 
One should ease facing north in the morning, evening and during the day and facing south at night.
छायायां अन्धकारे वा रात्रावहनि वा द्विजः। 
यथासुखमुखः कुर्यात्प्राणबाधभयेषु च॥4.51॥
रात हो या दिन, छाया में या अन्धेरे में या जहाँ प्राण पर बाधा आ पड़ने का भय हो, वहाँ ब्राह्मण जिधर चाहे मुँख करके मलमूत्र का त्याग करें। 
The Brahmn may ease in any direction, any time viz. day, night, evening, morning, shadow or darkness, if the life is in danger.
During emergency no rules-regulations apply, when life is stake.
प्रत्यग्निं प्रतिसूर्यं च प्रतिसोमोदकद्विजम्। 
प्रतिगु प्रतिवातं च प्रज्ञा नश्यति मेहतः॥4.52॥
अग्नि, सूर्य, चन्द्र, जलाशय, ब्राह्मण, गाय, वायु इनके सामने मुख करके लघुशंका करने से बुद्धि नष्ट होती है। 
Intelligence of one will be reduced-perish if he urinate facing, fire, Sun, Moon, Brahmn, Cow or the Air.
नाग्निं मुखेनोपधमेन्नग्नां नेक्षेत च स्त्रियम्। 
नामेध्यं प्रक्षिपेदग्नौ न च पादौ प्रतापयेत्॥4.53॥
आग को मुँह से न फूँके, नग्न स्त्री को न देखे, आग में अपवित्र वस्तु न डाले और पैर आग में न तपावे। 
One should not blow the fire with his mouth; do not see-look at a naked woman; do not put contaminated-impure goods in the fire and warm the feet with fire directly.
अधस्तान्नोपदध्याच्च न चैनं अभिलङ्घयेत्। 
न चैनं पादतः कुर्यान्न प्राणाबाधं आचरेत्॥4.54॥
चारपाई के नीचे आग ने रखे, आग को लाँघ के न जाये, पायताने में आग ने रखे और ऐसा कोई काम ने करे जिससे प्राण संकट में पड़ें। 
Fire-burning, ignited objects should not be placed below the cot-bad or near the other end of the bad, where legs are placed, should not cross the fire and never do any thing-adventure which invite danger to life.
नाश्नीयात्संधिवेलायां न गच्छेन्नापि संविशेत्। 
न चैव प्रलिखेद्भूमिं नात्मनोऽपहरेत्स्रजम्॥4.55॥
सांयकाल में भोजन, ग्रामांतर की यात्रा और शयन नहीं करना चाहिये, भूमि पर रेखा खींचे और ही न लिखे;  धारण की हुई माला अपने गले से न उतारे। 
One should not eat, travel or sleep, write over the ground and should not put off-remove the rosary from the neck  in the evening.
नाप्सु मूत्रं पुरीषं वा ष्ठीवनं वा समुत्सृजेत्। 
अमेध्यलिप्तं अन्यद्वा लोहितं वा विषाणि वा॥4.56॥
पानी में मल-मूत्र न करे, थूके नहीं अथवा अन्य दूषित पदार्थ, रक्त, माँस या विष आदि न डाले। 
One should not ease-urinate or defecate in water, spit or put contaminated-polluted substances-impurities, blood, meat or poison in water.
These rules forbids flowing of sewer water, blood from butcheries, chemical from the factories and other pollutants in the river. River, ponds, reservoirs are essential for sustaining life.
नैकः सुप्याच्छून्यगेहे न श्रेयांसं प्रबोधयेत्। 
नोदक्ययाभिभाषेत यज्ञं गच्छेन्न चावृतः॥4.57॥
सूने घर में अकेला न सोवे, अपने से श्रेष्ठ पुरुष सोये हों तो उन्हें न जगावे, रजस्वला स्त्री से संभाषण न करे, बिना आमंत्रण यज्ञ में न जाये। 
One should not sleep alone in a deserted dwelling-house or even a temple; should not wake a sleeping person superior to him, should not talk-converse with a menstruating woman and visit a Yagy-Agnihotr, Hawan unless-until invited with due regard.
अग्न्यगारे गवां गोष्ठे ब्राह्मणानां च संनिधौ। 
स्वाध्याये भोजने चैव दक्षिनं पाणिं उद्धरेत्॥4.58॥
अग्निशाला में, गौशाला में, ब्राह्मणों के समीप और वेद पढ़ने तथा भोजन करने के समय दाहिना हाथ बाहर कर ले।
One should uncover his right hand, while performing Hawan or in the fire place, in the cowshed, near the Brahmns or in the company of, while learning Veds and taking food.
न वारयेद्गां धयन्तीं न चाचक्षीत कस्य चित्। 
न दिवीन्द्रायुधं दृष्ट्वा कस्य चिद्दर्शयेद्बुधः॥4.59॥ 
पानी पीती हुई गौ को न रोके और दूसरे का दाना घास खाती हो तो उसे न कहे। आकाश में इन्द्रधनुष देखकर औरों को वह इन्द्र धनुष ने दिखाये। 
One should not obstruct the cow while drinking water, should not report to a person if the cow has eaten his grain or grass. He should not ask others to view rainbow-Indr Dhanus, if he has the opportunity to view it.
नाधार्मिके वसेद् ग्रामे न व्याधिबहुले भृशम्। 
नैकः प्रपद्येताध्वानं न चिरं पर्वते वसेत्॥4.60॥
जिस गाँव में अधार्मिक लोग बसते हों और जहाँ अनेक असाध्य रोगों से पीड़ित लोग रहते हों वहाँ भी अधिक काल तक न रहे, अकेला मार्ग पर न चले और चिरकाल तक पहाड़ पर न रहे। 
One should not live at a place where wicked, irreligious people or people having vices  live or a place where people suffering from incurable diseases live for a long time, should not walk alone over a path (abandoned path, dangerous roads in lonely places, jungles) or live over the mountains for ever (this might be applicable to those who normally live in planes).
न शूद्रराज्ये निवसेन्नाधार्मिकजनावृते। 
न पाषण्डिगणाक्रान्ते नोपस्षृटेऽन्त्यजैर्नृभिः॥4.61॥
जिस देश का राजा शूद्र हो उस देश में निवास न करे, जो गाँव चोर-डाकू, छली-कपटी आदि दुरात्माओं की बस्तियों से घिरा हो या नास्तिकों वेद-निन्दकों से आक्रान्त हो या जहाँ चाण्डाल आदि अधम जातियों से उपद्रव हो, वहाँ न रहे। 
One should not reside in a country which is ruled by a Shudr, should not live in a village which is surrounded by the settlements-slums of thieves-dacoits, thugs-wicked people or atheists; who slur the Veds or inhabited by the depraved like Chandals, rogues or the degenerate.
In today's context its not possible to leave the country, since every now or then a Shudr either become chief minister, prime minister of the president. One should make endeavours to ensure that such people do not occupy high office unless-until they are fit-suitable for it. The reservations are the worst curse over the Indians. Highly qualified, intelligent young boys and girls are deprived of the opportunities at the cost of imprudent, low intelligence, corrupt people. Even judiciary and defence sectors are not spared by them. These people curse Manu Smrati without knowing-understanding, what is written in it. Slowly and gradually India is passing into the hands of incompetent people at he coast of bright-shinning youth.
अधम जाति :: Vile, scurvy, low-down. ignoble. sneaking, mean, vulgar, nefarious, villainous, trivial,despicable, base, lowest, banal, degenerate, lowly, miserable, abject, ignominious, lowest castes, wretched.
बस्ती :: आबादी, उपनिवेश, वास, मुहल्ला, पादरी का हलका, टोला, प्राचीन ऐटिका का कस्‍बा, कोशिकाओं का अविभक्‍त समूह; township, colony, habitation, parish, in-habitation, plantation, village.
DEPRAVED :: भ्रष्ट, दुष्ट, ऐयाश, ज़िनाकार, ख़राब, विकृत, दूषित; corrupt, impaired, profane, vicious, perverse, evil, rogue, nasty, malevolent, felonious, Bacchic, dissipated, lecherous, lickerish, salacious, debauched, impaired, undersized, vicious,  negatory, malformed, mutilated, denatured, distorted, deformed, contaminated, defective, guilty.
न भुञ्जीतोद्धृतस्नेहं नातिसौहित्यं आचरेत्। 
नातिप्रगे नाति सायं न सायं प्रातराशितः॥4.62॥
जिस पदार्थ की स्नेह-चिकनाई निकाल ली गई हो, उसे न खाये, एक बार तृप्ति-पूर्वक भोजन करके ऊपर से और कुछ न खाये, सूर्योदय और सूर्यास्त के समय भोजन न करे, सबेरे जिसने ज्यादा भोजन किया हो वह शाम को न खाये। 
One should not eat the food item from which oil has been extracted (like oil cakes, खली, chocolate etc.), having attained satisfaction-contentment with the food (one should not be glutton), nothing should be eaten thereafter, nothing should be eaten at the Sun rise or Sun set and if excess food has been eaten in the morning supper-dinner should be skipped. 
न कुर्वीत वृथाचेष्टां न वार्यञ्जलिना पिबेत्। 
नोत्सङ्गे भक्षयेद्भक्ष्यान्न जातु स्यात्कुतूहली॥4.63॥
निरुद्देश्य कोई कार्य न करे, अञ्जलि से जल न पीये, जाँघ  पर भक्ष्य पदार्थ रखकर ने खाये, केवल कौतूहलवश-बेमतलब किसी से कोई बात न पूछे।  
One should not do any thing without purpose, drink water in the arm pit, eat by keeping food over the thigh-or in the lap, should not talk-ask questions to anyone by way of curiosity without reason-logic.
न नृत्येदथ वा गायेन्न वादित्राणि वादयेत्। 
नास्फोटयेन्न च क्ष्वेडेन्न च रक्तो विरावयेत् ॥4.64॥
ब्राह्मण नृत्य न करे, गायन न करे, बाजा न बजावे, ताल न ठोके, दाँत न किटकिटाये और उमङ्ग में आकर गधे आदि पशुओं की बोली न बोले। 
The Brahmn has been restricted from dancing, singing, playing musical instruments, beating the drum-Tabla or invite someone for wrestling (slap his lap), chatter his teeth and make sounds in the voice of animals like donkey, under the influence of passion-pleasure. 
न पादौ धावयेत्कांस्ये कदा चिदपि भाजने। 
न भिन्नभाण्डे भुञ्जीत न भावप्रतिदूषिते॥4.65॥
काँसे के बर्तन में कभी पाँव न धोवे, अन्य किसी के फूटे बर्तन में भोजन न करे, जहाँ मन में शंका हो वहाँ भोजन न करे। 
The Brahmn is not supposed to wash his feet in a vessel made of bronze-alloy of zinc and copper, never eat in the broken vessels belonging to others, should not eat at a place, where doubt arises in the mind.
A Brahmn should avoid eating at a place-house where meat is cooked or served.One was served cooked pulses twice, having animal bones in it, first at Ballabh Garh and secondly at Gwalior, each time on Tuesdays when under fast. The hotel owner said that they did not cook meat.
उपानहौ च वासश्च धृतं अन्यैर्न धारयेत्। 
उपवीतं अलङ्कारं स्रजं करकं एव च॥4.66॥
ब्राह्मण दूसरे किसी का व्यवहार-इस्तेमाल किया हुआ जूता, वस्त्र, जनेऊ, आभूषण, माला और कमण्डलु धारण न करे। 
The Brahmn should never utilise shoes, cloths, sacred thread, rosary, ornaments-jewellery or sacred water pot used for prayers or other purposes by some one else.
Goods used by others are sure to possess germs, virus, bacteria, fungal infection, microbes or even the DNA. While the microbes are quick to cause diseases, DNA is capable of altering the hereditary characters of one. DNA can pass from one person to others by kissing, touch, using used syringes, blades etc.
नाविनीतैर्भजेद्धुर्यैर्न च क्षुध्व्याधिपीडितैः। 
न भिन्नशृङ्गाक्षिखुरैर्न वालधिविरूपितैः॥4.67॥
जो सिखाये हुए न हों, जो भूख प्यास और व्याधि से पीड़ित हों, जिनके नेत्र और खुर टूटे-फूटे हों और जिनकी पूँछ कटी हो ऐसे जुते हुए बैलों के रथ पर यात्रा न करे। 
One should not travel by a chariot-cart pulled by the bullocks which have not been trained, tormented by thirst or hunger, suffering from some disease, have problem in the eyes, hoofs are cracked-broken and the tail has been cut. 
In the present world this is applicable to all sort of travel by rail, road, air, water i.e,. train, car, aeroplane or the ship. The driver should not be fatigued or tired. He should not be in an aberrated mode i.e., drunk. The driver should be mentally-physically fit. The engine should be properly tuned in an excellent working condition.
विनीतैस्तु व्रजेन्नित्यं आशुगैर्लक्षणान्वितैः। 
वर्णरूपोपसंपन्नैः प्रतोदेनातुदन्भृशम्॥4.68॥
जो सिखाये गए हों, शीघ्र गामी हों, शुभ लक्षणों से युक्त हों, जिनका वर्ण रूप अच्छा हो, ऐसे जुते हुए बैलों के रथ में स्वार होकर, बैलों को बिना बार-बार चाबुक मारे; चाहे जब यात्रा करे। 
One is free to travel any time if the oxen-bulls are properly trained, capable of  moving fast, having auspicious characterises and external features and driven without the use of whip-flip. 
King Nal, Madr Naresh and Bhagwan Shri Krashn have been described as excellent chariot drivers who could run them as fast as a modern vehicles over the roads. The horses & bulls have certain identifiable characteristic features which distinguish them from ordinary animals. Here is stress over the driver as well.
बालातपः प्रेतधूमो वर्ज्यं भिन्नं तथासनम्। 
न छिन्द्यान्नखरोमाणि दन्तैर्नोत्पाटयेन्नखान्॥4.69॥
सूर्योदय के समय की धूप, मुर्दे का धुआँ और टूटे-फूटे आसन को त्याग देना चाहिये। बढ़े हुए नख और रोम को न काटे और नाखून को दाँत से न उखाड़े।
One should reject the Sun light in the morning at the time of Sun rise, discard the smoke emanating from the funeral pyre of the dead body-corpses and reject the broken-uncomfortable seats. He has to discard cutting-trimming hair or nails and should not cut the nails with the teeth. One should never bite nails.
These are the postulates of the treatise on good health. One who wish to live long may follow these as for as possible. They can be followed by each & every human being.
न मृल्लोष्ठं च मृद्नीयान्न छिन्द्यात्करजैस्तृणम्। 
न कर्म निष्फलं कुर्यान्नायत्यां असुखोदयम्॥4.70॥
मिट्टी के ढ़ेलों को न मलें, नाखूनों से तिनके न तोड़ें, व्यर्थ कर्म न करें और परिणाम में दुःख देने वाले कर्म कभी न करे।
One should never crushes clods, tears grass with his nails, perform undesirable-unnecessary acts or does any thing which is harmful, painful in result. Such people goes soon to perdition.
PERDITION :: A state of eternal punishment and damnation into which a sinful and unrepentant person passes after death, damnation.
लोष्ठमर्दी तृणच्छेदी नखखादी च यो नरः। 
स विनाशं व्रजत्याशु सूचकाशुचिरेव च॥4.71॥
ढ़ेले को मलने वाला, तिनके तोड़ने वाला और दाँतों से नख काटने वाला, कृपण और अनाचारी शीघ्र नष्ट हो जाते हैं। 
One who crush-powders the clods of clay with hands, breaks the straw, cuts the nails with the teeth, miser and the sinner-those who lack values-virtues, ethics perish quickly. Such people die at an early age who do not follow rules of good health.
कृपण :: जिसका लक्ष्य केवल धन का संग्रह करना हो और जो जरूरत पड़ने पर भी ख़र्च न करता हो, धन का घोर लोभी या लालची व्यक्ति, कंजूस, सूम; close fisted, shabby, skinflint, narrow minded, niggardly, penurious, curmudgeon, miser, narrow, niggard, parsimonious, screw, snippy.
न विगर्ह्यकथां कुर्याद्बहिर्माल्यं न धारयेत्। 
गवां च यानं पृष्ठेन सर्वथैव विगर्हितम्॥4.72॥
अभिमान के साथ किसी से बात न करे, केश समूह के बाहर माला न धारण करे। गौओं की पीठ पर चढ़ कर जाना सर्वथा निन्दित है। 
One should never talk in an egoistic manner or proudly, wear rosary-garland over the hair or hair locks and never ride the back of the cow. Riding the back of the cows is blemish.
BLEMISH :: a small mark or flaw which spoils the appearance of something, imperfection, fault, flaw, defect, deformity, discoloration, disfigurement, mar, spoil, impair, disfigure, blight, deface, mark, spot, speckle, blotch, discolour, scar.
अद्वारेण च नातीयाद्ग्रामं वा वेश्म वावृतम्। 
रात्रौ च वृक्षमूलानि दूरतः परिवर्जयेत्॥4.73॥
जो गाँव या घर दीवार से घिरा हो उसके भीतर, प्रधान दरवाजे को छोड़कर दूसरे रास्ते से न जाये। रात में पेड़ की जड़ को दूर से ही त्याग दे अर्थात क्षणमात्र भी वृक्ष के नीचे न रहे। 
One should not enter the village or house having a boundary wall except the main gate. He should not remain near the root of a tree at night.
A place having a boundary wall is generally guarded and the guards may attack the person considering him to be an intruder, if he tries to enter it from unauthorised-improper place. The dogs may also tear into him. The trees release carbon dioxide at night which is harmful for respiration-breathing. The roots of the tree may house snakes or poisonous-dreaded insects like scorpion.
नाक्षैर्दीव्येत्कदा चित्तु स्वयं नोपानहौ हरेत्। 
शयनस्थो न भुञ्जीत न पाणिस्थं न चासने॥4.74॥
कभी जूआ न खेले, स्वयं हाथ से जूता उठाकर न चले, बिछौने पर या आसन या हाथ में कोई चीज रखकर न खाये। 
One should avoid gambling, betting, investment in risky shares or bonds. He should not keep shoes in the hands while walking. He should not eat any thing over the bed, seat or by holding it in the hands.
Gambling of any sort is always risky and one has to face worst possible results-after effects, like the Pandavs who were exiled from their kingdom. At least thrice the share market in India tumbled down due to cheats-forgers and the crooked companies, in which millions lost their millions and became pauper. Its improper to hold shoes in the hands or over the head. When food is taken over the bed or the seat, one invite insects like ants, followed by lizards etc.
सर्वं च तिलसंबद्धं नाद्यादस्तं इते रवौ। 
न च नग्नः शयीतेह न चोच्छिष्टः क्व चिद्व्रजेत्॥4.75॥
सूर्यास्त के बाद तिल मिला हुआ कुछ भी खाये, नग्न होकर न सोये, जूठे मुँह कहीं न जाये। 
One should not eat anything prepared from sesamum after Sun set. Never sleep naked and move out of the house without washing-cleaning the mouth.
Sesamum release a lot of energy since its calorific value is very high. Therefore, its very difficult to digest it at night; since there won't be any physical movement. If one goes out of the house without cleaning mouth teeth, food particles will be seen over the teeth. Soon after the food particles start disintegrating and releasing foul smell. It leads to tooth decay as well.
आर्द्रपादस्तु भुञ्जीत नार्द्रपादस्तु संविशेत्। 
आर्द्रपादस्तु भुञ्जानो दीर्घं आयुरवाप्नुयात्॥4.76॥
भीगे पैर भोजन करे, मगर भीगे पैर सोये नहीं। भीगे पैर भोजन करने वाला दीर्घ आयु पाता है। 
One may take food with wet feet, but he should not sleep with wet feet. He who, eats with wet feet attains a long life. 
अचक्षुर्विषयं दुर्गं न प्रपद्येत कर्हिचित्। 
न विण्वमूत्रमुदीक्षेत न बाहुभ्यां नदीं तरेत्॥4.77॥
जो रास्ता घना और झाड़ियों से घिरा हो, जिससे उस तरफ की चीज इस तरफ ने दिखती हो ऐसे दुर्गम स्थान में न जाये। 
One should avoid going through a path-road-route, which is deep-dense and covered with shrubs ( difficult of access, which is impervious to his eye) through which its not possible to see the other side.  He should not go to  to a tough terrain.
IMPERVIOUS :: अभेद्य, अप्रवेश्य, अगम्य, न घुसने योग्य, अवेध्य, प्रबल, निविड़, अविवेकी; impenetrable, impermeability, impregnable, indissoluble, inexpugnable, imperviable, impenetrable, inaccessible, impassable, an out of the way corner, in accessible, path less, potent, egregious, dominant, powerful, blatant, impervious, thick, dense, deep, inconsiderate, impetuous, indecipherable, rash, imprudent.
अधितिष्ठेन्न केशांस्तु न भस्मास्थिकपालिकाः। 
न कार्पासास्थि न तुषान्दीर्घमायुर्जिजीविषुः॥4.78॥
दीर्घ जीवन की इच्छा रखने वाला पुरुष केश, भस्म, हड्डी, ठीकरे, कपास की दंठीयों और धान की भूसी पर पैर रखकर-जोर देकर खड़ा न हो। 
One who to survive long should not stand by keeping his legs in a pile of hair, ashes, bones, potsherds, pieces of the cotton plant stems and the straw of rice paddy.
न संवसेच्च पतितैर्न चाण्डालैर्न पुल्कसैः। 
न मूर्खैर्नावलिप्तैश्च नान्त्यैर्नान्त्यावसायिभिः॥4.79॥
पतित, चाण्डाल, पुल्कस (निषाद से शूद्रा द्वारा उत्पन्न), मूर्ख, धन के मद से गर्वित अन्त्यजों के साथ व्यवसाय करने वाले के साथ भी न बैठे। 
One should not accompany the out castes-degraded, Chandal (The Shudr who perform the last rights in a cremation ground), Pulkas (born out of the sexual relations by a boatman through a Shudr woman), idiot (moron, fools, ignorant), one who deals with the Anjyaj under the intoxication (ego-proud) of being wealthy.
अन्त्यज :: अछूत, पादज, अंतेवासी शूद्र, मार्जारीय, वृषल, मार्जालीय, मेहतर; one belonging to untouchable tribes, sweepers-scavengers, the people who used to collect night soil-stools excreta-fecal matter and through it away. 
न शूद्राय मतिं दद्यान्नोच्छिष्टं न हविष्कृतम्। 
न चास्योपदिशेद्धर्मं न चास्य व्रतं आदिशेत्॥4.80॥
शूद्र को युक्ति न बताये, उच्छिष्ट और हवि का शेषांश ने दे और धर्म का प्रत्यक्ष उपदेश भी न दे। 
One should neither give any sort of guidance-advice (argument, strategy, skill, way out of stress-trouble) to the Shudr not the remnants of his meal, nor food offered to the demigods. The Shudr should not be preached-advised directly. Avoid imposing sacred rules, fasts or penance over the Shudr.
Tenants of sacred law are so intricate that even the devout Brahmn may fail to follow. Learning is one of the most difficult things in the world. That's why this insertion is present there.
युक्ति :: उपाय, उपदेश, राय, तरकीब; appliance, means, device, trick, strategy, guidance, advice, argument, strategy, skill, way out of stress-trouble.
यो ह्यस्य धर्मंआचष्टे यश्चैवादिशति व्रतम्। 
सोऽसंवृतं नाम तमः सह तेनैव मज्जति॥4.81॥
जो दूसरे धर्म का उपदेश और व्रत का आदेश करता है, वह उस शूद्र के साथ असंवृत नामक अंधकारमय नर्क में जा गिरता है। 
One who dictate-directs the Shudr to follow other deeds, rules, way-style of living jumps-sinks into the hells, along with that Shudr.
For hundreds of years both Muslim & Christian missionaries have been converting the Shudr and the feeble minded to their fore. They have been using force, greed, sex and hundreds of vices, tricks for this purpose. One who has been converted and the accused of converting others; both reserve their berth in the hells for millions of years.
One can find the Muslims suffering all over the world at the hands of their brethren. In Pakistan the Sunnis are mercilessly killing the Shias. The terrorists are Muslims, torturing people of all castes, creed, nationality. The terrorists have a religion called Islam-Muslim.
न संहताभ्यां पाणिभ्यां कण्डूयेदात्मनः शिरः। 
न स्पृशेच्चैतदुच्छिष्टो न च स्नायाद्विना ततः॥4.82॥
एक साथ दोनों हाथों से अपने सर को न खुजलावे, झूँठे मुँह माथा न छुए और पहले सर घोये बिना स्नान करे। 
One should neither scratch his head with both hands nor touch the forehead without cleaning the mouth after eating and bathe without washing the head. Head can be washed thereafter.
केशग्रहान् प्रहारांश्च शिरस्येतान्विवर्जयेत्। 
शिरःस्नातुश्च तैलेन नाङ्गं किञ्चिदपि स्पृशेत्॥4.83॥ 
चोटी पकड़कर किसी के सर में न मारे। सिर से नहाया हुआ तेल से किसी अंग को स्पर्श न करे अर्थात नहाने के बाद तेल न लगावे। 
One should not strike-beat anyone over the head by holding his hair lock. He should not apply oil over the body after taking bath.
चुटिया :: चोटी, श्रेणी, जानवर की दुम, तम्बाकू की जटी या पुंगी, चोटी, शिखा; Fucker, queue, pigsty tail.
न राज्ञः प्रतिगृह्णीयादराजन्यप्रसूतितः। 
सूनाचक्रध्वजवतां वेशेनैव च जीवताम्॥4.84॥
जिस राजा का जन्म क्षत्रिय से न हो, उसका दान न ले। पशु मारकर माँस बेचने वाला कसाई, तेली, कलाल और वैशोजीवी (कुटना-कुटनियों) से भी दान ने ले। 
One should not accept donations, gifts, money from the king who is not from a Kshtriy (Marshal caste) by caste. Accepting donations-charity from the butcher, Teli (one who extract oil from oil seeds), the person who makes wine and the people who subsist over pushing women into prostitution, is prohibited-taboo.
कुटनी :: स्त्रियों को बहकाकर पर पुरुषों के पास वेश्यावृति ले जाने वाली स्त्री, झगड़ा कराने वाली स्त्री; bawd, procuress, siren, pimp. 
कुटना :: A male who lure, forces, drag woman into prostitution.
तेली :: तिलहनों यथा सरसों और तिल का तेल निकालने वाला; one who extract oil from oil seeds. 
कलाल :: शराब बनाने वाला; one who make wine, liquor.
दशसूनासमं चक्रं दशचक्रसमो ध्वजः। 
दशध्वजसमो वेशो दशवेशसमो नृपः॥4.85॥
दस वधिकों के समान एक तेली होता है, दस तेलियों के बराबर एक कलाल होता है, दस कलालों के बराबर एक वेशोपजीवी होता है, दस वेशोपजीवियों के समान एक राजा होता है।
One Teli-oil extractor is as sinful-bad as ten butchers, one Kalal (liquor-wine maker) is as vicious as 10 Teli, one Veshopjeevi is as much degraded as ten wine makers and the king other than the Kshatriy Vansh-caste is as wicked as ten Veshopjeevi.
दश सूनासहस्राणि यो वाहयति सौनिकः। 
तेन तुल्यः स्मृतो राजा घोरस्तस्य प्रतिग्रहः॥4.86॥ 
जो वधिक दस हजार प्राणियों की हिंसा करता है, उसके तुल्य राजा होता है। इसलिए उसका दान भयानक होता है। 
The king is as sinful as the butcher who kills ten thousand animals. Therefore, one must not accept offerings from such kings.
All kings are not sinners. There had been kings who are still remembered for their virtues, righteousness, piousness. But knowingly or unknowingly the kings commit crimes against humanity and suffer in the hells, thereafter. The present day kings, Neta-ministers are no exception. Their offerings bring misery to the priests who accept the money from them. For the time being life become easy for them but bring misery in next several births.
Like wise the priests, temple heads-Mahants, office bearers of the trusts who run the trusts of the temple and make use of the money for their person purposes, find suitable birth in hells, since the money poured into the coffers of the temple is generally in lieu of removal of tortures from pains, sorrow, diseases.
यो राज्ञः प्रतिगृह्णाति लुब्धस्योच्छास्त्रवर्तिनः। 
स पर्यायेण यातीमान्नरकानैकविंशतिम्॥4.87॥
जो कृपण और शास्त्र की आज्ञा न मानने वाले राजा से दान लेता है, वह क्रम से 21 नरकों में गिरता है। 
One who accepts donations, offerings from the king who does not spend money for the welfare of the citizens and discards the scriptures goes to 21 sets of dreaded hells, in succession.
तामिस्रं अन्धतामिस्रं महारौरवरौरवौ। 
नरकं कालसूत्रं च महानरकं एव च॥4.88॥
इक्कीस नरकों के नाम :: तामिस्र, अन्धतामिस्र, महारौरव, कालसूत्र, महानरक। 
Names of 21 Hells :: Tamistr, Andh Tamistr, Maha Raurav, Raurav,  Kal Sutr, Maha Narak-Hell.
संजीवनं महावीचिं तपनं संप्रतापनम्। 
संहातं च सकाकोलं कुड्मलं प्रतिमूर्तिकम्॥4.89॥
संजीवन, महावीचि, तपन, संप्रतापन, संहात, सकाकोल, कुड्मल, प्रतिमूर्तिकम। 
Sanjeevan,  Maha Vichi, Tapan, Sanpratapan, Sanhat, Sakakol, Kudmal, Prati Murtikam.
लोहशङ्कुं ऋजीषं च पन्थानं शाल्मलीं नदीम्। 
असिपत्रवनं चैव लोहदारकं एव च॥4.90॥
लोहशंकु,  ऋजीष,पन्थान,  शाल्मली, नदी, असिपत्रवन और लोहदारक; ये इक्कीस नरक हैं। 
Loh Shanku, Rijish, Panthan, Shalmali, Nadi-river, Asi Patr Van and Loh Darak are the 21 hells where the sinners are made to serve one after another in a sequence.
This is the sequences of movement of the sinners for millions of years before getting birth again as insects, microbes and thereafter they pass through 84,00,000 incarnations, in various-different inferior species,  to be born as humans yet again.
एतद्विदन्तो विद्वांसो ब्राह्मणा ब्रह्मवादिनः। 
न राज्ञः प्रतिगृह्णन्ति प्रेत्य श्रेयोऽभिकाङ्क्षिणः॥4.91॥ 
उपरोक्त श्लोकों में वर्णित शास्त्रदेश को मानकर विशेष कल्याण की इच्छा रखने वाले कर्मनिष्ठ ब्राह्मण विद्वान, जन्मांतर में, राजा का दान नहीं लेते। 
The learned Brahms, scholars do not accept donations-offerings from all the categories of people including the king, described in above Shloks-Verses for the improvement of their next numerous births.
ब्राह्मे मुहूर्ते बुध्येत धर्मार्थौ चानुचिन्तयेत्। 
कायक्लेशांश्च तन्मूलान्वेदतत्त्वार्थं एव च॥4.92॥ 
सूर्योदय के पहले ब्रह्म मुहूर्त, में जागकर धर्म और अर्थ की चिंता करे और उसके लिए जो शरीर को क्लेश उठाना पड़ता है, उसका विचार करे और वेद के तत्त्वार्थ के भी चिन्तन करे।
One should get up early in the morning before Sun rise (Brahm Muhurt, which normally begins around 4 AM) and meditate-think of the Dharm-duties prescribed and mandatory described in the scriptures and think ways and means of earning money for subsistence through pious-honest means, the trouble-pain, labour associated with it and the gist of the Veds.
If one goes by the word-meaning of the Veds, he may go wrong, since each and every Shlok of the Veds is a formula describing some secret meaning-text, side by side. Therefore, one who is willing to serve the society has to be wise and seek the guidance of the mature, learned-enlightened Guru.
उत्थायावश्यकं कृत्वा कृतशौचः समाहितः। 
पूर्वां संध्यां जपंस्तिष्ठेत्स्वकाले चापरां चिरम्॥4.93॥
इसके बाद उठकर आवश्यक कृत्य, शौचादि करके एकाग्र चित्त हो प्रातः कालिक संध्याकर, सूर्यास्त पर्यन्त गायत्री मन्त्र जपे। सायंकालिक संध्या भी ठीक समय पर करके देर तक गायत्री जपे। 
One should perform essential functions like bathing, perform morning prayers rituals, concentrate in the God and recite Gayatri Mantr till evening. He should recite evening prayers and continue Gayatri Mantr till late night.
If one keep reciting Gayatri Mantr only, then he will not get time to earn his livelihood. Therefore, one has to adjust with the recitation of Gayatri Mantr and the livelihood.
ऋषयो दीर्घसंध्यत्वाद्दीर्घंमायुरवाप्नुयुः। 
प्रज्ञां यशश्च कीर्तिं च ब्रह्मवर्चसमेव च॥4.94॥
ऋषिगण देर तक सन्ध्योपासनादि करने से ही दीर्घजीवी होते थे और बुद्धि, यश, कीर्ति तथा ब्रह्मतेज को प्राप्त करते थे। 
The sages-saints, Rishis used to perform regular prayers-prolonging the twilight devotions; to live long and gain intelligence-wisdom, honour, name-fame and the aura (glow around their face).
A common man, normal citizen can not copy the sages in to-to. A Brahmn should try to adopt himself to these tenants. However, each and every one can pray to God as and when he gets time, any where. 
श्रावण्यां प्रौष्ठपद्यां वाSप्युपाकृत्य यथाविधि। 
युक्तश्छन्दांस्यधीयीत मासान्विप्रोऽर्धपञ्चामान्॥4.95॥
ब्राह्मण को चाहिये कि सावन या भादों की पूर्णिमा को वेदविधि से उपक्रम करके साढ़े चार महीने तक तत्पर होकर वेद पढ़े।
The Brahmn should endeavour to learn Veds during the 4 and half months duration of rainy season starting from full moon of either during Srawan or Bhadon. 
One should continue with his daily routines and earning-livelihood side by side. Mere reading, cramming-mugging, rote memory, is useless unless one understand and make practical use of Veds in life. 
ROTE MEMORY :: आवृत्ति, घूर्णी, दुहराव, रटना, कण्ठस्थ करना, यंत्रवत क्रिया; cramming-mugging. 
पुष्ये तु छन्दसां कुर्याद्बहिरुत्सर्जनं द्विजः। 
माघशुक्लस्य वा प्राप्ते पूर्वाह्णे प्रथमेऽहनि॥4.96॥
उसके बाद पुष्य नक्षत्र में गाँव से बाहर वेदों का उत्सर्जन कर्म करे अथवा माघ शुक्ल की पहली तिथि के पूर्वान्ह में करे। 
Once this period is over and the Brahmn has subjected himself to rigorous study of the Veds, he should move out of the village to some water reservoir and perform various rituals in addition to Yog Karm called Shat Karm, over the beginning of Pushy Nakshtr.
श्रावणी :: श्रावणी पर्व वेदों के स्वाध्याय (पढ़ना-पढ़ाना, सुनना-सुनाना) से  जुड़ा है। 
स्वाध्याय करने वाला सुख की नींद सोता है, युक्तमना होता है, अपना परम चिकित्सक होता है, उसमें इंन्द्रियों का संयम और एकाग्रता आती है और प्रज्ञा की अभिवृद्धि होती है। स्वाध्याय न करनेवाला अब्राह्मण हो जाता है। [शतपक्ष ब्राह्मण]
वेदाध्ययन, श्रावण शुक्ल पूर्णिमा को आरंभ किया जाता था, अतः इसे श्रावणी उपाकर्म कहा जाता है।
अथातोऽध्यायोपाकर्म। 
ओषधीनां प्रादुर्भावे वणेन श्रावण्यां पौर्णमास्याम्‌।
श्रावणी कर्म अनुष्ठान में वर्तमान काल में आस्थावान्‌ यज्ञोपवीतधारी द्विज श्रावण शुक्ल पूर्णिमा को गंगा आदि पवित्र नदियों अथवा किसी पवित्र सरोवर, तालाब या जलाशय पर जाकर सामूहिक रूप से पंचगव्य प्राशनकर प्रायश्चित संकल्प करके मंत्रों द्वारा दशविध स्नान कर शुद्ध हो जाते हैं।[पारस्कर गृह्यसूत्र] 
तदनन्तर समीप के किसी देवालय आदि पवित्र स्थल पर आकर अरुन्धी सहित सप्तर्षियों का पूजन, सूर्योपस्थान, ऋथ्षतर्पण आदि कृत्य संपन्न करते हैं। तदुपरांत नवीन यज्ञोपवीत का पूजन, पितरों तथा गुरुजनों को यज्ञोपवीत दान कर स्वयं नवीन यज्ञोपवीत धारण करते हैं।
यथाशास्त्रं तु कृत्वैवमुत्सर्गं छन्दसां बहिः। 
विरमेत् प क्षिणों  रात्रिं तदेवैकमहर्निशम्॥4.97॥
यथोक्त रीति से गाँव के बाहर वेद का उत्सर्जन कर्म करके दो दिन और उनके बीच की रात को अनध्याय करे। 
One should discontinue reading Veds for two days and the intervening night, after performing Utsarjan-Utsarg, outside the village as per established procedure.
उत्सर्ग :: उत्सर्जन कर्म; setting free, oblation, emission, donation, delivering, excreta, derequisition, excretion, effusion, dedication, devotion.
अत ऊर्ध्वं तु छन्दांसि शुक्लेषु नियतः पठेत्। 
वेदाङ्गानि च सर्वाणि कृष्णपक्षेषु सम्पठेत्॥4.98॥
इस कर्म के अनन्तर शुक्ल पक्ष में एकाग्र चित्त होकर वेद पढ़े और कृष्णपक्ष में वेद का अंग शिक्षा व्याकरण आदि पढ़े। 
Having completed this procedures pertaining to oblations, excretions etc. one should restart learning Veds during the bright fortenight and thereafter learn-self study the grammar and organs of Veds, during the dark fortnight.
This will help one is understanding and interpreting the correct meaning of the Veds.
नाविस्पष्टमधीयीत न शूद्रजनसन्निधौ। 
न निशान्ते परिश्रान्तो ब्रह्माधीत्य पुनः स्वपेत्॥4.99॥ 
स्वर, वर्ण आदि का स्पष्ट उच्चारण किये बिना या शूद्रों के समीप वेद न पढ़े। रात के पिछले पहर में वेद पढ़कर थके हुए ब्राह्मण को सोना नहीं चाहिये। 
The text of the Veds should be spelled correctly with distinct pronunciation of consonants and vowels away from the Shudr. He should not sleep during the later part of the night after being tired due to the stress during learning-reading.
यथोदितेन विधिना नित्यं छन्दस्कृतं पठेत्। 
ब्रह्म छन्दस्कृतं चैव द्विजो युक्तो ह्यनापदि॥4.100॥
यथोक्त विधि से नित्य गायत्री आदि छंदों से युक्त मन्त्रों का ही पाठ करे। निरापद अवस्था में ब्राह्मण और मन्त्र दोनों भागों का अध्ययन करे। 
One has to recite the Gayatri text with proper procedure with appropriate Mantr-verses only. He should learn Brahmn (commentaries over Veds) and the sacred Mantr, when safe, i.e., when there is no disturbance.
इमान्नित्यं अनध्यायानधीयानो विवर्जयेत्। 
अध्यापनं च कुर्वाणः शिष्याणां विधिपूर्वकम्॥4.101॥
विधि पूर्वक नित्य वेद पढ़ने वाला और अध्यापक इन अनध्यायों का त्याग करे। 
One who learns the Veds everyday-regularly and the teacher who teaches them; should avoid learning-teaching Veds and sacred text at certain occasions listed hence forth.
कर्णश्रवेऽनिले रात्रौ दिवा पांसुसमूहने। 
एतौ वर्षास्वनध्यायावध्यायज्ञाः प्रचक्षते॥4.102॥
रात में यदि वर्षाऋतु में वायु बहने का शब्द सुनाई दे और दिन में धूल उड़ाती हुई हवा चले तो वे दोनों रात-दिन उस ऋतु में अनध्याय होते हैं, ऐसा अध्यापन के जानने वाले मुनि कहते हैं। 
The sages-scholars, experts in teaching opines that teaching & learning of Veds & the scriptures should be suspended if the sound of wind (howling) is heard during rainfall at night and the wind is associated with dust during the day.
OPINES :: राय देना, मत प्रस्तुत करना; suggest, submit, advance, propose, venture, volunteer, put forward, moot, propound, posit, air, hazard, say, declare, observe, comment, remark. 
विद्युत्स्तनितवर्षेषु महोल्कानां च संप्लवे। 
आकालिकमनध्यायमेतेषु मनुरब्रवीत्॥4.103॥
यदि मेघ और बिजली के गरजते हुए वर्षा हो रही हो तथा अत्यधिक उल्कापात हो रहा हो तो मनु महाराज का कहना है कि ऐसे समय "अकालिक अनध्याय काल" में वेदाभ्यास न करे। 
Manu Maha Raj has said that one should stop learning Veds when its raining with lightening and thunder, associated with the showering of meteors.
अकालिक अनध्याय काल :: ऐसा समय जब अत्यधिक उल्कापात हो रहा हो और मेघों के गरजते हुए, बिजली के कड़कते-चमकते हुए वर्षा हो रही हो वेदाध्ययन के लिये अनुपयुक्त है; the period when its raining with the thundering of clouds associated with the showering of meteors, is not suitable for the learning or recitation of Veds, prayers, scriptures. 
एतांस्त्वभ्युदितान्विद्याद्यदा प्रादुष्कृताग्निषु। 
तदा विद्यादनध्यायमनृतौ चाभ्रदर्शने॥4.104॥
वर्षाकाल में संध्या समय में होमार्थ अग्नि प्रज्वलित करते समय, यदि विद्युत और मेघ गरजता हो तो अनध्याय जानना चाहिये। अन्य ऋतु में अग्नि प्रज्वलित करने के समय अभ्र (बार-बार आवाज करने वाला मेघ-बादल), देखने से ही अनध्याय हो जाता है। 
If there is a sound of the thunderbolt or lightening associated with the rattling of clouds at the time igniting sacred fire for the Hawan-Agnihotr in the evening, one should suspend reading of the Veds. If there of rattling of clouds again and again in other seasons at the time of igniting sacred fire, one should stop reading-recitation of Veds, scriptures.
निर्घाते भूमिचलने ज्योतिषां चोपसर्जने। 
एतानाकालिकान्विद्यादनध्यायानृतावपि॥4.105॥
दिग्गर्जन, भूकम्प और ग्रह-ताराओं के परस्पर युद्ध होने से अन्य ऋतु और वर्षाऋतु में भी यह आकालिक अनध्याय जानना चाहिए। 
If one happen  to observe-hear preternatural sound from the sky or that of earthquake or a halo (striking of the meteors together) in the rainy season or other seasons, one should stop learning Veds.
PRETERNATURAL :: दिग्गर्जन, भूकम्प और ग्रह-ताराओं के परस्पर टकराने-घर्षण की आवाज़; beyond what is normal or natural, extraordinary, out of the ordinary, exceptional, unusual, uncommon, rare, singular, signal, peculiar, unprecedented, outstanding, remarkable, phenomenal, abnormal, anomalous, inexplicable, unaccountable.
प्रादुष्कृतेष्वग्निषु तु विद्युत्स्तनितनिःसने। 
सज्योतिः स्यादनध्यायः शेषे रात्रौ यथा दिवा॥4.106॥
प्रातः संध्या करने के समय होमार्थ अग्नि प्रज्वलित करने पर यदि बिजली चमकने के साथ-साथ मेघ गरजे, तो यह सज्योति अनध्याय है अर्थात सूर्य के प्रकट होने तक अनध्याय है और यदि साँयकाल में हो तो नक्षत्रों के उदय होने तक साँयकाल में अनध्याय होता है। 
One should stop learning Veds if it starts lightening associated with the thunders at the time of igniting holy-sacred fire for morning prayers, i.e., avoid till the Sun shines again. Similarly, if this phenomenon is repeated in evening session, then again one has to abstain from learning the Veds till the constellations-stars are visible in the sky.
नित्यानध्याय एव स्याद्ग्रामेषु नगरेषु च। 
धर्मनैपुण्यकामानां पूतिगन्धे च सर्वदा॥4.107॥
धर्म की विशेष अभिलाषा वालों को ग्राम में, नगर तथा जहाँ दुर्गन्ध हो वहाँ सदा अनध्याय होता है।
One who is decorous of Dharm-religious merit should abstain from learning of Veds in the village, city and the places where foul smell emanates. 
Ved's, scripture's study is prescribed in the Ashrams-hermitages away from human hustle-bustle at calm & quite places, under the expert guidance of the Guru. These places are suitable for self study as well, since study, understanding, interpretation of Veds require highest degree of concentration and meditation. Word by word translation is far-far away from the gist-theme (basics, central idea) of the Veds. As present several versions of transcripts of the Veds are available, none of which is close to the reality or the facts described in Veds.
अन्तर्गतशवे ग्रामे वृषलष्य च सन्निधौ। 
अनध्यायो रुद्यमाने समवाये जनस्य च॥4.108॥
गाँव में मुर्दा पड़ा हो, अधार्मिक मनुष्य समीप हों और जहाँ लोगों की भीड़ हो वहाँ अनध्याय होता है। 
Study of Veds is prohibited-forbidden at a place where a dead body is lying, irreligious, company of unrighteous wicked, viceful, sinful people are there  or a gathering is there. 
Dead body, corpse, carcasses emit foul smell, irreligious people interrupt and the gathering produces undesirable voices, sounds, noises. 
उदके मध्यरात्रे च विण्मूत्रस्य विसर्जने। 
उच्छिष्टः श्राद्धमुक्चैव मनसाSपि न चिन्तयेत्॥4.109॥
जल में खड़े होकर, मध्य रात्रि में, मल-मूत्र विसर्जन करते वक्त, जूठे मुँह, श्राद्ध भोजन करने के पश्चात् मन से भी वेद का चिन्तन न करे। 
Remembrance, reading, recitation or any kind of reference of Veds is prohibited while standing in waters, mid night, excretion, while eating, after having Shraddh-Pitr meals.
प्रतिगृह्य द्विजो विद्वानेकोदिष्टस्य केतनम्। 
त्र्यहं न कीर्तयेद्ब्रह्म राज्ञो राहोश्च सूतके॥4.110॥
विद्वान् ब्राह्मण एकोद्दिष्ट (श्राद्ध) निमन्त्रण स्वीकार करके तीन दिन तक वेदपाठ न करे। राजा के सम्बन्धी अशौच में सूर्य और चन्द्र ग्रहण में भी तीन दिन तक अनध्याय करे। 
The learned Brahmn should stop learning of Veds after accepting invitation for the Pitr-Mans feast-meals for 3 days. He should abstain from reading-learning of Veds if their is a child birth to the king or some death has taken place in the king's family for 3 days. The same rule is application for 3 days when there is either solar or lunar eclipse.
यावदेकानुद्दिष्टस्य गन्धो लेपश्च तिष्ठति। 
विप्रस्य विदुषो देहे तावद् ब्रह्म  न कीर्तयेत्॥4.111॥
विद्वान ब्राह्मण के शरीर पर जब तक एकोदिष्ट श्राद्ध का गंध और लेप रहे तब तक वह वेदाध्ययन न करे। 
The learned Brahmn should not study the Veds till there is smell-scent and coatings of the materials applied over the body while performing Shraddh ceremonies.
एकोद्दिष्ट श्राद्ध का मतलब किसी एक को निमित्त मानकर किए जाने वाला श्राद्ध जैसे किसी की मृत्यु हो जाने पर दशाह, एकादशाह आदि एकोद्दिष्ट श्राद्ध के अन्तर्गत आता है। इसमें विश्वेदेवों को स्थापित नहीं किया जाता।
एकोदिष्ट श्राद्ध मृत्यु की तिथि के दिन किया जाता है जिसमें एक पिंड और एक बलि, जबकि पार्वण श्राद्ध में पिता का श्राद्ध अष्टमी तिथि को और माता का नवमी को होता है। इसमें छह पिंड और दो बलि दी जाती हैं। श्राद्ध के पहले तर्पण किया जाता है। तर्पण का जल सूर्योदय से आधे पहर तक अमृत, एक पहर तक मधु, डेढ़ पहर तक दूध और साढ़े तीन पहर तक जल के रूप में पितरों को प्राप्त होता है।  जो मनुष्य नास्तिकता और चंचलता से तर्पण करता है, उसके पितृ पिपासित होकर अपने आत्मज का स्वेद (पसीना) पीते हैं। 
तर्पण की सामग्री :: जल, कुश, तिल, जौ, चन्दन, अक्षत, खगौती, श्वेत पुष्प,जौ, कुश और जल को हाथ में लेकर भगवान् विष्णु के नाम से यह शुरू होता है।  
श्राद्धकर्ता स्नान करके पवित्र होकर धुले हुए दो वस्त्र धोती और उत्तरीय धारण करता है। वह गायत्री मंत्र पढ़ते हुए शिखाबंधन करने के बाद श्राद्ध के लिए रखा हुआ जल छिड़कते हुए सभी वस्तुओं को पवित्र करता है। उसके बाद तीन बार आचमनी कर हाथ धोकर विश्वदेवों के लिए दो आसन देता है। उन दोनों आसनों के सामने भोजन पात्र के रूप में पलाश अथवा तोरई का एक-एक पत्ता रखा जाता है। 
गौमय से लिपी हुई शुद्ध भूमि पर बैठकर श्राद्ध की सामग्रियों को रखकर सबसे पहले भोजन तैयार करना चाहिए। ईशान कोण में पिण्ड दान के लिए पाक-शुद्ध सामग्री रखी जाती है। श्राद्ध में पितरों के लिए पूड़ी, सब्जी, मिठाई, खीर, रायता आदि-आदि श्रद्धा-सामर्थ के अनुरूप शामिल हैं। इस प्रक्रिया में प्रपितामह, पितामह, पिता [क्रमशः आदित्य, रूद्र और वसु स्वरुप] को जल अर्पित किया जाता है।  देवताओं को सव्य होकर [दायें कंधे पर जनेऊ] और पितरों को असव्य होकर [बायें कंधे पर जनेऊ] कुश, तिल और जौ के साथ मंत्रानुसार जल अर्पित किया जाता है। इसी तरह बायें हाथ की अनामिका उंगली में मोटक धारण करना, बाँयी कमर पर नींवी रोपित करना, गोबर के ऊपर रखकर दिया जलाना और अंत में उसे एक पत्ते से एक बार में बुझाना। प्रेतात्माओं के लिए भी भोजन देना, कव्वे, कुत्ते और गाय के लिए भोजन देना। चीनी, मधु, कुश, तुलसी, दूध मिलाकर पिंड बनाते समय मन्त्र पढ़ते हुए पितरों को याद करना, घर के खिड़की दरवाजे खोले रखना, इस मान्यता के साथ कि पितृ आये हुए  हैं, पितरों की पातली में यह कहते हुए दोबारा भोजन डालना कि आपको कुछ और चाहिए। श्राद्ध के उपरान्त ब्राह्मणों को भोजन कराना, यथोचित दक्षिणा, सीधा (सूखी भोजन सामग्री) और वस्त्र प्रदान करना, रायता वगैरह गाँव में खासकर बिरादरी में भेजना आदि आदि।
शयानः प्रौढपादश्च कृत्वा चैवावसाक्थिकाम्। 
नाधीयीतामिषं जग्ध्वा सूतकान्नाद्यमेव च॥4.112॥
बिछौने पर लेटकर, पाँव पर पाँव रखकर, घुटनों के बल बैठकर तथा अशौचान्न और माँस खाकर वेद न पढ़ें। 
Ved should not be read while laying down in the bed, keeping one leg over the other-cross legged, bending over the knees, either after eating food served by a family where a child is born or a death has occurred or after eating meat.
नीहारे बाणशब्दे च संध्ययोरेव चोभयोः। 
अमावास्याचतुर्दश्योः पौर्णमास्यष्टकासु च॥4.113॥
धूल उड़ती हो, बाण का शब्द सुनाई देता हो, ऐसे समय में प्रातः, साँय, संध्या के समय और अमावस्या, चतुर्दशी, पूर्णिंमा और अष्टमी, इन तिथियों को त्याग चाहिये। 
If there is s dust storm and the sound of shooting of an arrow is heard, one should reject the reading of Ved in the morning & evening prayers, moonless night, Chaturdashi-fourteenth day full moon night and Ashtami-eight day deserve to be rejected.
अमावास्या गुरुं हन्ति शिष्यं हन्ति चतुर्दशी। 
ब्रह्माष्टकपौर्णमास्यौ तस्मात्ताः परिवर्जयेत्॥4.114॥
अमावस्या गुरु का और चतुर्दशी शिष्य का नाश करती है। पूर्णिमा और अष्टमी पढ़े हुए वेद मंत्रों को भुला देती है इसलिये वेदों के अध्ययन में इन तिथियों को त्याग देना चाहिये। 
Recitation-learning of Veds should be discarded-prohibited on Amavasya-moon less light, since it destroys-kills the teacher and the fourteenth tithi-date destroys the student. Purnima-full moon night & Ashtami leads to forgetting of the Ved Mantr. There  is a loss of memory if Veds are read on these 2 dates, as per Hindu calendar.
पांसुवर्षे दिशां दाहे गोमायुविरुते तथा। 
श्वखरोष्ट्रे च रुवति पङ्क्तौ च न पठेद् द्विजः॥4.115॥
धूल बरस रही हो, दिग्दाह हो रहा हो, शृगाल, कुत्ते, गधे और ऊँट उच्च स्वर से शब्द कर रहे हों, ऐसे समय और इनके साथ बैठकर वेदाध्ययन ने करे। 
Neither one should not recite-learn Veds when the dust is falling from the sky, its extremely hot-almost everything seems to be burning, jackals (howl), dogs (bark), donkeys (bray) and the camels (grunt) are making loud noises, nor one should study Veds when any of these animals is nearby.
नाधीयीत श्मशानान्ते ग्रामान्ते गोव्रजेऽपि वा। 
वसित्वा मैथुनं वासः श्राद्धिकं प्रतिगृह्य च॥4.116॥
श्मशान के समीप, ग्राम के समीप, गोशाला में, रतिकाल में पहने हुए वस्त्र धारण करके और श्राद्धीय वस्तुएँ प्रतिग्रह करके वेद ने पढ़े। 
One should not read-recite Veds near the cremation ground, village, inside the cow shed, while wearing cloths used-dressed during intercourse and after receiving gifts from funeral sacrifices or performing Shraddh at the venue of the host.
प्राणि वा यदि वाSप्राणि यत्किं चि यत्किञ्चिच्छ्राद्धिकं भवेत्। 
तदालभ्याप्यनध्यायः पाण्यास्यो हि द्विजः स्मृतः॥4.117॥
श्राद्धीय वस्तु सजीव हो (गौ, घोड़े आदि) अथवा निर्जीव हो (वस्त्र, आभूषण आदि) उनका दान लेने से अनध्याय हो जाता है, क्योंकि ब्राह्मण के हाथ को मुनियों ने मुख कहा है। 
Whether the gifts-goods received by the Brahmn at the Shraddh ceremony for the Manes are living (cows, horses etc.) or nonliving (cloths, ornaments etc.), it turns into a session fit for non recital of Veds, since the sages describe the hands of the Brahmn as mouth (receptor).
चोरैरुपद्रुते ग्रामे संभ्रमे चाग्निकारिते। 
आकालिकमनध्यायं विद्यात्सर्वाद्भुतेषु च॥4.118॥
गाँव में चोरों का उपद्रव, गृहदाहादि का भय और सब प्रकार के अद्भुत उत्पात दृष्टिगोचर हों तो अकालिक अनध्याय मानना चाहिये। 
One should consider the period inauspicious-unfit for study of Veds if the village is experiencing the trouble from thieves, fear of house burning and all sorts of untimely amazing portents, incidents, occurrence.
PORTENTS :: पूर्वसूचना, सगुन-शकुन, लक्षण, चेतावनी, अचंभा; presage, omen, prophet, symptom, trait, feature, sign, character, warning, alert, caveat, alarm, caution, prognostic,  augury, prognostication, marvel, phoenix, astonishment, miracle.
उपाकर्मणि चोत्सर्गे त्रिरात्रं क्षेपणं स्मृतम्। 
अष्टकासु त्वहोरात्रमृत्वन्तासु च रात्रिषु॥4.119॥
उपाकर्म और उत्सर्ग में तीन मार्गशीष की पूर्णिमा के बाद कृष्णपक्ष की अष्टमी में एक अहोरात्र और ऋतु के अन्त की रात्रियों में भी एक अहोरात्र (दिन और रात, day and night) अनध्याय होता है। 
The period followed by three full moon nights in the month of Marg Sheesh on the eight of the dark phase of the moon and at the end of the season there a break of one day and one night for the study of Veds for the purpose of initiation or termination of the session of study.
उपाकर्म-उपाकरण :: प्रारंभ करनाया आरंभ करने के लिए निमंत्रण या निकट लाना। वेदों के अध्ययन के लिए विद्यार्थियों का गुरु के पास एकत्रित होने का काल। इसका आयोजन काल तब होता है, जब वनस्पतियाँ उत्पन्न होती हैं। श्रावण मास के श्रवण व चंद्र के मिलन (पूर्णिमा) या हस्त नक्षत्र में श्रावण पंचमी को उपाकर्म होता है। यह अध्ययन सत्र का समापन, उत्सर्जन या उत्सर्ग कहलाता था। 
नाधीयीताश्वमारूढो न वृक्षं न च हस्तिनम्। 
न नावं न खरं नोष्ट्रं नेरिणस्थो न यानगः॥4.120॥
हाथी, घोड़े, गधे, ऊँट, नाव, पेड़, ऊसर भूमि अथवा रथ में स्वर व्यक्ति भी वेदमंत्रों का पाठ न करे। 
One should not recite the Ved Mantr while sitting on the horse back, elephant, ass, camel or in a chariot. Recitation of Ved Mantr is prohibited over unfertilised land as well.
In the present day context its applicable to cars, aeroplane, ship or any kind of moving object-vehicle.
न विवादे न कलहे न सेनायां न संगरे। 
न भुक्तमात्रे नाजीर्णे न वमित्वा न शुक्तके॥4.121॥
किसी के साथ विवाद होता हो या झगड़ा, ऐसे समय और सेना के बीच, युद्ध में, भोजन करके तुरन्त अजीर्ण होने पर, वमन करने और खट्टी डकार आने पर वेद का पाठ ने करे। 
One should abstain from the recitation of Veds during marriage, quarrel-verbal altercation, mutual assault, in between the armies camps ready to fight, during fight-battle, soon after eating, affected by indigestion, belch, burps-sour eructation's, vomiting.
अतिथिं चाननुज्ञाप्य मारुते वाति वा भृशम्। 
रुधिरे च स्रुते गात्राच्छस्त्रेण च परिक्षते॥4.122॥
अतिथि को बताये बिना, हवा खूब तेज बहती हो उस समय शरीर से लहू गिरने या कोई अंग हथियार से कट जाने पर अध्ययन नहीं करना चाहिये। 
One should avoid studying Veds without informing guests or ascertaining their willingness to listen to the recitation, blowing of fast winds, when blood ooze out of the body or some organ has been cut by weapons.
सामध्वनावृग्यजुषी नाधीयीत कदाचन। 
वेदस्याधीत्य वाप्यन्तमारण्यकमधीत्य च॥4.123॥
सामवेद की ध्वनि सुनाई देती हो तो ऋग्वेद और यजुर्वेद का कभी अध्ययन न करे। किसी वेद को या आरण्यक संज्ञक वेद के एक अंश को समाप्त कर उस दिन या उस रात में पुनः वेद का कोई भाग न पढ़े। 
Rig Ved or Sam Ved should not be read if recitation of Sam Ved is heard. Having completed the Ved or a section of the Arnayak studying of Veds should be postponed for a day and night.
मुख्य आरण्यक :- (1). ऐतरेय, (2). शांखायन, (3). बृहदारण्यक, (4). तैत्तिरीय और (5). तवलकार।
अन्य ग्रन्थ स्मृति के अंतर्गत आते हैं। संहिता इसका मन्त्र भाग है।
ARANYAK :: Out of 1,180 Aranyak only a few full branches are available. Upnishads, the main section of the Aranyak, are available. The Sanhita and the Brahman part of the Veds relate to the Yagy and Vedic rituals only along with the performance pious, righteous, virtuous deeds-Karm. They describe the Almighty without emphasising over prayers like in Purush Sukt and Ishavasyopnishad, etc.
Aranyak describe the gist of the creator-Almighty and discuss various forms, procedures, methods-modes of worship. The Vidhi-methodology, postures of sitting, direction, rhythm, pronunciation of the Mantr, time, duration etc. Upnishads are called the Gyan Khand (the true knowledge) of the Veds. About 75% of the entire Veds (Sanhita, Brahman and Aranyak) relate to Yagy and rituals, 19% of it relates to the Vidhi, Bhakti-devotion,  only 6% of it relates to the Gyan Khand-enlightenment (the Upnishads).
ऋग्वेदो देवदैवत्यो यजुर्वेदस्तु मानुषः। 
सामवेदः स्मृतः पित्र्यस्तस्मात्तस्याशुचिर्ध्वनिः॥4.124॥
ऋग्वेद के देवता देव हैं, यजुर्वेद के मनुष्य और सामवेद के पितृ देवता हैं। इसलिए उसकी-सामवेद ध्वनि अपवित्र होती है। 
The demigods-deities are worshipped with the rhymes of the Rig Ved, the Yajur Ved is meant for the humans and the Sam Ved is devoted to the Manes, making it impure.
एतद्विद्वन्तो विद्वांसस्त्रयीनिष्कर्षं अन्वहम्। 
क्रमतः पूर्वं अभ्यस्य पश्चाद्वेदं अधीयते॥4.125॥
पूर्वोक्त तीनों वेदों के देवताओं को जानता हुआ विद्वान् पहले प्रणव व्याहृति पूर्वक सावित्री का क्रम से अभ्यास करने के पश्चात वेद का अध्ययन करे। 
The learned-scholar-Brahmn should first practice the Pranav (Om, ॐ) rhythmical utterance of Om, Bhuh, Bhuvah, Swah, representing the upper 7 abodes of the pious, virtuous, righteous souls; followed by the Savitri Mantr and only then he should initiate the learning-reading-study of Veds.
प्रणव व्याहृति :: ॐ, भूः, भुवः, स्वः, आदि सप्त लोकात्मक मंत्रों द्वारा उच्चारण; rhythmical utterance of Om, Bhuh:, Bhuvah:, Swah:, representing the upper 7 abodes of the pious, virtuous, righteous souls.
पशुमण्डूकमार्जारश्वसर्पनकुलाखुभिः। 
अन्तरागमने विद्यादनध्यायमहर्निशम्॥4.126॥
पशु (गाय, भैंस आदि ) मेढ़क , बिल्ली, कुत्ता, साँप नेवला और चूहा; इनमें से कोई गुरु के पास होकर निकल जायें तो वह एक दिन-रात का अनध्याय होता है। 
If a cattle, a frog, a cat, a dog, a snake, an ichneumon-mongoose or a rat happen to pass near the teacher-Guru, it becomes a period temporary suspension of teaching-learning for a day and night.
द्वावेव वर्जयेन्नित्यमनध्यायौ प्रयत्नतः। 
स्वाध्यायभूमिं चाशुद्धात्मानं चाशुचिं द्विजः॥4.127॥
स्वाध्याय की अशुद्ध भूमि और अपना अशुद्ध शरीर इन दो अनध्यायों का नित्य यत्नपूर्वक त्याग करे। 
A break in study of Veds is essential on account of the need to clean the place of study and the cleaning of the body i.e., bathing. 
अमावास्यामष्टमीं च पौर्णमासीं चतुर्दशीम्। 
ब्रह्मचारी भवेन्नित्यमप्यृतौ स्नातको द्विजः॥4.128॥
स्नातक ब्राह्मण अमावस्या, अष्टमी, पूर्णिमा और चतुर्दशी तिथि को ब्रह्मचारी रहे। ऋतुमती स्त्री के साथ समागम न करे। 
The graduate Brahmn should not indulge in sex on moonless night, eight, fourth day and full moon night. He should observe celibacy on these dates. He should not have sex with a woman having periods-menstrual cycle.
न स्नानमाचरेद् भुक्त्वा नातुरो न महानिशि। 
न वासोभिः सहाजस्रं नाविज्ञाते जलाशये॥4.129॥
भोजन करके स्नान न करे, रोगी होने पर स्नान न करे, रात के दूसरे-तीसरे पहर में स्नान न करे। बहुत कपड़ों के साथ स्नान न करे।  बिना जाने हुए जलाशय में भी स्नान न करे। 
One should never bathe, after taking meals, when he is sick-ill, second and third segment of the night, by wearing too many cloths and should never bathe in a pond-reservoir which is not known to him completely.
These are general precautions applicable to each and every person. Now and then one observes that someone has drowned either in a river or a water pool. One should never take the risk as far as possible. Unless-until one is an expert swimmer, he should avoid entering the reservoirs or the sea. On this account hundreds of people have died for taking selfie. 
देवतानां गुरो राज्ञः स्नातकाचार्ययोस्तथा। 
नाक्रामेत्कामतश्छायां बभ्रुणो दीक्षितस्य च॥4.130॥
देवता, गुरु, राजा, स्नातक, आचार्य, अग्नि और दीक्षित,  इनकी  छाया न लांघे।
One should never cross the shadow of the demigods, Guru, king, a graduate in the learning of Veds and scriptures, the teacher (Maestro, Master), fire and the one who has been initiated into learning of Veds-Shastr-scriptures.
मध्यंदिनेऽर्धरात्रे च श्राद्धं भुक्त्वा च सामिषम्। 
संध्ययोरुभयोश्चैव न सेवेत चतुष्पथम्॥4.131॥
दोपहर या आधी रात को माँस सहित श्राद्धान्न खाने पर और दोनों साँझ, चौराहे पर देर तक न रहे। 
One should not remain at the cross roads after eating the food served to the Manes with meat-flesh, either at noon or after mid night or both evening and morning (the two twilights).
Read sweets for meat.
उद्वर्तनमपस्नानं विण्मूत्रे रक्तंमेव च। 
श्लेश्मनिष्ठ्यूतवान्तानि नाधितिष्ठेत्तु कामतः॥4.132॥
उबटन का मैल, स्नानजल, मल, मूत्र, लहू, कफ, थूक और वमन आदि दूषित वस्तुओं के समीप जाकर ने बैठे। 
One should not sit near the waste-remain after bathing, waste water left after bathing, excreta, urine, blood, cough, spit-mucus, vomited waste and polluted things-objects.
Good belonging to all these categories contain microbes or the DNA of other person which may harm one. One should observe purity, cleanliness as far as possible. This is applicable to the fumes emitted by the vehicles, factories, power stations, garbage piles, dumping grounds etc. 
The air inside trains, buses, taxies, aeroplanes, ships congested markets, gatherings too become impure and unfit for breathing. Therefore, one must move to spots where he can have sufficient quantity of fresh air-oxygen to rejuvenate his lungs.
In Delhi there are mounts of garbage like Ghazipur, which keep on liberating foul gases in the air & some of the piousness components present in the garbage moulds reach the earth from where drinking ware is withdrawn. Such sites in metros are extremely dangerous for the residents but the politicians have no concern for their health or welfare.
वैरिणं नोपसेवेत सहायं चैव वैरिणः। 
अधार्मिकं तस्करं च परस्यैव च योषितम्॥4.133॥
शत्रु या शत्रु के मंत्री, अधर्मी, चोर और पराई स्त्री की सेवा न करे। 
One should not entertain-serve the enemy or his minister-associates, wicked, thief and the woman to belong-married to some one else.
This is the blunder committed by Prathvi Raj Chauhan and suffered later due to this. Padmani's husband too committed this mistake.
न हीदृशमनायुष्यं लोके किञ्चन विद्यते। 
यादृशं पुरुषस्येह परदारोपसेवनम्॥4.134॥ 
संसार में पुरुष की आयु घटाने वाला ऐसा कोई पाप नहीं है, जैसा कि पर स्त्री गमन। 
There is no other sin as grave as mating-intercourse with the wife of other men, which is sure to reduce the longevity-survival-life of the guilty.
Mating with other woman directly contaminate the pennies of the guilty, through he transmission of DNA, sperm of the other person, chlamydia, gonorrhea and syphilis, AIDS, etching and several other ailments. A sexually transmitted infection (STI) is an infection spread by sexual contact. Trichomoniasis (or trich) is a very common sexually transmitted disease (STD). It is caused by infection with a protozoan parasite called Trichomonas vaginalis. Although symptoms of the disease vary, most people who have the parasite cannot tell whether they are infected or not. The women too suffer simultaneously, since their period cycles are directly affected and they too acquire various diseases affecting their life span and health.
क्षत्रियं चैव सर्पं च ब्राह्मणं च बहुश्रुतम्। 
नावमन्येत वै भूष्णुः कृशानपि कदाचन॥4.135॥ 
क्षत्रिय, साँप और वेदपाठी ब्राह्मण निर्बल भी हों तो भी हितेच्छु पुरुष कभी इनका अपमान न करे। 
One who desire his welfare-prosperity should never insult-harm or tease a Kshtriy, serpent-snake or a Brahmn who is learned in Veds, Shastr-scriptures, even if they are feeble-weak, unsupported.
These three never forget enmity-insult and take revenge as and when they get suitable chance-opportunity. They are furious by nature-genetically. Example of Chanky fits the case, since he vanished the mighty empire of Maha Nand who had conquered almost all emperors around Magadh.
एतत्त्रयं हि पुरुषं निर्दहेदवमानितम्। 
तस्मादेतत्त्रयं नित्यं नावमन्येत बुद्धिमान्॥4.136॥
ये तीनों अपमानित होने पर अपमान करने वाले को भस्म-नष्ट कर देते हैं। अतः बुद्धिमान कभी भी इनका अपमान न करे। 
These three turn the person who has insulted them into ashes on being insulted. Therefore, one who is intelligent-prudent should never insult them.
As a matter of fact one should never insult anyone. An ant is capable of killing the elephant when it enters its nostrils.
नात्मानमवमन्येत पुर्वाभिरसमृद्धिभिः। 
आमृत्योः श्रियमन्निच्छेन्नैनां मन्येत दुर्लभाम्॥4.137॥
उद्योग करने पर भी यदि समृद्धि न मिले तो मनुष्य स्वयँ को अपमानित न करे। मरते दम तक लक्ष्मी प्राप्ति  के लिए प्रयत्न  करे, उसे दुर्लभ न समझे। 
One should not be disheartened for not becoming rich in-spite of endeavours, efforts hard labour. He should continue efforts in the right direction to achieve his goal, target, ambition through righteous, virtuous, honest, pious means, till death. Success may elude him temporarily but ultimately success is sure.
Efforts must be made in the right direction. Proper planning and execution are a must. One should seek advice from seniors, elders, Guru, well wishers. He should study the pros & cons of the project to be undertaken-handled by him. His previous deeds may hinder his working temporarily, but ultimately the success will knock at his door. Remember the story of the spider who was trying to reach the top of the cave and reached there in 28th attempt. The disheartened king who was watching it curiously got up, gathered energy and won his kingdom back. What ever may be the case one must not commit suicide. those who commit suicide find birth in hell.
सत्यं ब्रूयात्प्रियं ब्रूयान्न ब्रूयात्सत्यमप्रियम्। 
प्रियं च नानृतं ब्रूयादेष धर्मः सनातनः॥4.138॥ 
सत्य बोले, प्रिय बोले, ऐसा सत्य न बोले तो अप्रिय हो, ऐसा प्रिय न बोले जो असत्य हो-यही सनातन धर्म है। 
One should speak the truth, speak sweet-pleasant word, should not speak the truth which is bitter, undesirable, disliked, should not speak sweet word which are untrue-false (should not utter what is not agreeable or is falsehood) and this is eternal Dharm-Sanatan Dharm.
The decoits were chasing a rich person having jewels with him. He sought shelter in the hut of a Muni who always spoke the truth. The decoits asked where is the rich man and the Muni pointed towards him. It was quite easy for him to the protect the man by keeping silent or pretending to be unaware. Bhagwan Shri Krashn said that such truth is undesirable-not admirable. If your falsehood can save an innocent, then its better than the truth.
भद्रं भद्रं इति ब्रूयाद्भद्रमित्येव वा वदेत्। 
शुष्कवैरं विवादं च न कुर्यात्केनचित्सह॥4.139॥ 
अशुभ बातों को अच्छे शब्दों में ही कहे अथवा केवल भद्र वचन (शुभ) हो बोले। बेमतलब किसी से बैर या विवाद न करे। 
One should avoid inauspicious words to anyone. If he is under compulsion to speak, he should speak only selected words discarding inappropriate words, which may create anger or vice in anyone. He should not enter into enmity or dispute-argument with anyone unless until under compulsion-forced for that or for self defence which is essential.
One must not curse, abuse, shout or behave erratically. One must not be harsh with anyone.
नातिकल्यं नातिसायं नातिमध्यंदिने स्थिते। 
नाज्ञातेन समं गच्छेन्नैको न वृषलैः सह॥4.140॥ 
बहुत सवेरे, अधिक शाम हुए, दोपहर में अपरिचित या अधार्मिक व्यक्ति के साथ अकेला ने जाये। 
One must avoid roaming alone in the early morning or late in the evening with unknown or irreligious-wicked person. He should avoid deserted-lonely places and the mid noon as well when its too hot.
There is always a danger of being looted-abducted or even killed in such cases. The evil forces are at work during these hours and the isolated places.
हीनाङ्गानतिरिक्ताङ्गान्विद्याहीनान्वयोऽधिकान्। 
रूपद्रविणहीनांश्च जातिहीनांश्च नाक्षिपेत्॥4.141॥
हीन अंग वाले, अधिक अंग वाले, मुर्ख, कुरूप, वृद्ध, दरिद्र और हीन जाति के मनुष्यों को उनके दोषों को बताकर-सुनकर तिरस्कार न करे। 
One should never insult or degrade a person with under developed or over grown defective limbs or body organs-parts. The ignorant-idiot, ugly, old, poor or one from lower caste should not be insulted by telling them their weakness, inferior position, caste.
It constitute bad manner and lack of etiquette. Civilised society do not approve such behaviour.A Brahmn is not supposed to speak harsh words.
तिरस्कार :: निरादर, अपमान, अनादर, अवज्ञा; disdain, insult, reproach, censure,  scorned.
न स्पृशेत्पाणिनोच्छिष्टो विप्रो गोब्राह्मणानलान्। 
न चापि पश्येदशुचिः सुस्थो ज्योतिर्गणान्दिवि॥4.142॥
जूठे मुँह गौ, ब्राह्मण और आग को हाथ से स्पर्श ने करे। स्वस्थ रहते कभी अपवित्र अवस्था में कभी आकाश में नक्षत्रों और ग्रहों को न देखे।  
One should not touch a cow, Brahmn or fire with stale-unclean mouth. He should never observe the planets or the constellations in the sky if he is fit-healthy but unclean.
स्पृष्ट्वैतानशुचिर्नित्यमद्भिः प्राणानुपस्पृशेत्। 
गात्राणि चैव सर्वाणि नाभिं पाणितलेन तु॥4.143॥
अशुचि अवस्था में ब्राह्मणादि का स्पर्श करने पर आचमन करे और हाथ में जल लेकर नासिका और आँख आदि इन्द्रियों का और सर, कन्धा, घुटने, पैर और नाभि को जल से स्पर्श करे। 
In case one happen to have touched a Brahmn or God's, demigod's, deity's idol by mistake during the period of impurity due the birth of a child or death in the family, he should take a little water in his hand and touch his nose, eyes, sense organs, head, shoulders, knees, legs-feet and the navel.
This state of impurity prevails for the woman during the menstrual cycle, during which period, she is not supposed to perform household chores like cooking, prayers, touching elder's feet or even coming in front of the respected-honoured person. She should remain away from Tulsi plant. One probable reason is to give her rest and the second is infected-impure blood which comes out of the body due to the disintegration of the ovum-fetus.
अशुचि :: अपवित्र होने की अवस्था या भाव, अपवित्रता, मर्मशास्त्र के अनुसार घर के लोगों की वह स्थिति जो घर में किसी के जन्म लेने या मरने के 10 दिन बाद तक रहती है और जिसमें न तो औरों को छू सकते हैं और न ही कोई शुभ या धर्म-कार्य कर सकते हैं। स्त्रियों में यह अवस्था मासिक धर्म के समय होती है; state of impurity due to the birth or death in the family. For the woman its the state of menstrual cycle. 
अनातुरः स्वानि खानि न स्पृशेदनिमित्ततः। 
रोमाणि च रहस्यानि सर्वाण्येव विवर्जयेत्॥4.144॥ 
स्वस्थ अवस्था में इन्द्रियों के छिद्र तथा गुप्तांगों के रोमों को निष्कारण न छुये।
One should not touch any of the 9 the holes (2 eyes, 2 ears, 2 nostrils, anus, pennies, mouth) in the body and the hair over the private parts-organs, unnecessarily, when healthy. However, cleaning of anus, pennies and the mouth, including teeth is essential which should be done regularly-carefully.
There is always  a danger of causing injury to these parts due to scratches. Hair being pulled leads to injury or wounds.
मङ्गलाचारयुक्तः स्यात्प्रयतात्मा जितेन्द्रियः। 
जपेच्च जुहुयाच्चैव नित्यमग्निमतन्द्रितः॥4.145॥
शुभ आचारों से युक्त, पवित्र हृदय, जितेन्द्रिय पुरुष आलस्य रहित होकर गायत्री मन्त्र जपे और अग्नि में हवन करे।
One who has conquered his senses, pious at heart and is virtuous-righteous should recite the Gayatri Mantr and offer sacrifices-oblations in holy-sacred fire without experiencing laziness.
मङ्गलाचारयुक्तानां नित्यं च प्रयतात्मनाम्। 
जपतां जुह्वतां चैव विनिपातो न विद्यते॥4.146॥
जो पवित्रात्मा शुभ आचारों से युक्त होकर नित्य जप और हवन करते हैं, उन्हें दैवी या मानुषी उपद्रव कभी परेशान नहीं करते। 
One who performs the regular recitation of Gayatri Mantr and prayers devoted to the Almighty and offer sacrifices in holy fire in the form of Hawan-Agni Hotr & is virtuous-pious at heart, is never perturbed by the divine or human-man made calamities, disasters like wars.
The Muslim's world is continuously facing turmoil which is man made, as well as natural due to the inauspicious demons, who have taken birth as humans. These people are wretched, wicked possessing vices in their hearts. They have taken to terrorism to crush the humanity. Their forefathers were Hindus who worshipped Bhawan Shiv. Now, these people are bent upon vanishing the marks of ancient civilisation possessing the proof of traditional worship of deities, demigods and the Almighty. They were cursed by Maa Saraswati due to their wickedness.
वेदमेवाभ्यसेन्नित्यं यथाकालमतन्द्रितः। 
तं ह्यस्याहुः परं धर्ममुपधर्मोऽन्य उच्यते॥4.147॥
नित्य यथा समय आलस्य रहित होकर वेदमंत्रों का जप करे। यह ब्राह्मण का मुख्य धर्म है, बाकि को उपधर्म कहते हैं। 
The main duty of the Brahmn is to recite the Ved Mantr without laziness regularly as per schedule described earlier, skipping the periods unfit for this purpose. Every thing else-duty (Dharm) is also essential but comes next to Veds.
To become a Brahmn in deed, is extremely difficult task on this earth. Learning is the toughest job. Ignorant people like Maya Wati, Nitish Kumar, Lalu Yadav, Mulayam Singh Yadav, Mamta Baner Ji, Communists, Congressmen; keep on cursing Manu Smrati to gain political mileage. The communities & the Congress advocate secularism without understanding the meaning of secularism. The BJP is not far behind it too degrade the upper class for the sake of votes.
वेदाभ्यासेन सततं शौचेन तपसैव च। 
अद्रोहेण च भूतानां जातिं स्मरति पौर्विकीम्॥4.148॥
निरन्तर वेद के अभ्यास, पवित्रता, तप और प्राणियों की अहिंसा से पूर्वजन्म का स्मरण होता है। 
Regular practice of Veds, purity-piousity-austerities, asceticism and non violence lead to the awakening-recollection of the memory of previous birth.
One gets birth in the family of a Brahmn only, when he perform pious, righteous,virtuous deeds and adhere to honesty & truth.
पौर्विकीं संस्मरन्जातिं ब्रह्मैवाभ्यस्यते पुनः। 
ब्रह्माभ्यासेन चाजस्रमनन्तं सुखमश्नुते॥4.149॥
पूर्वजन्म के जातिस्मरण होने पर भी वह नित्य वेद का ही अभ्यास करता है। निरन्तर ब्रह्माभ्यास से वह अनन्त सुख (मोक्ष) को प्राप्त होता है। 
Remembrance of the previous birth and continuance of the practice of Veds ascertains his liberation-assimilation in the Almighty. One ultimately obtains Salvation-Moksh, Ultimate abode.
Once the soul is liberated i.e., it gets Salvation, it never get rebirth.
सावित्राच्छान्तिहोमांश्च कुर्यात्पर्वसु नित्यशः। 
पितॄंश्चैवाष्टकास्वर्चेन्नित्यमन्वष्टकासु च॥4.150॥ 
सावित्री नित्य होम और अनिष्ट निवृत्यर्थ प्रत्येक पर्वों में शांति होम करना चाहिये। उसी प्रकार अष्टका और अन्वष्टका में पितरों का श्राद्ध कर्म करे। 
One should carry out regular-daily Savitri Hawan-morning prayers and oblations for reverting unfortunate events-mishappenings during various holy, auspicious days-occasions. Similarly, he should perform homage-Shraddh for the satisfaction of the Manes on the eight day of the month during dark phase.
सावित्री :: सूर्य की किरण, ऋग्वेद का गायत्री नामक मंत्र जिसमें सूर्य की स्तुति की गई है, सूर्य को समर्पित ऋग्वैदिक गायत्री मंत्र, सूर्य की एक पुत्री जो ब्रह्मा को ब्याही थी, दक्ष की एक कन्या जो धर्म की पत्नी थी, सूर्य की किरण-सूर्यरश्मि, मत्स्य नरेश अश्वपति की कन्या जिसने अपने सतीत्व के बल पर यमराज के हाथ से अपने पति सत्यवान को छुड़ाया था, उपनयन संस्कार, सधवा स्त्री, सरस्वती नदी, अनामिका उँगली, आँवला।
अष्टका :: चान्द्र मास के किसी पक्ष की आठवीं तिथि अष्टमी, अगहन, पूस, माघ और फाल्गुन के कृष्ण पक्ष की अष्टमी, अष्टमी के दिन किये जानेवाले धार्मिक कृत्य, अष्टका में मातृक श्राद्ध किया जाता है, इस दिन श्राद्ध करने से पितरों की तृप्ति होती है। 
अन्वष्टका :: मातृक श्राद्ध जो अष्टका के अनंतर पूस माघ और फागुन की कृष्ण नवमी को किया जाता हैं।
दूरादावसथान्मूत्रं दूरात्पादावसेचनम्। 
उच्छिष्टान्न निषेकं च दूरादेव समाचरेत्॥4.151॥
अग्निशालों दूर जाकर मल-मूत्र त्याग करे, पैर धोये, उच्छिष्ट फेंके, गर्भाधान क्रिया भी वहाँ से दूर ही करे। 
One should move to a separate-distant region to reject stools & urine, washing feet-legs, throwing condemned goods-stale food-remnants of food etc. One should perform acts of pregnancy-fertilisation too, away from the site of Yagy, Hawan, Agni Hotr-sacred fire for holy sacrifices.
मैत्रं प्रसाधनं स्नानं दन्तधावनमञ्जनम्। 
पूर्वाह्ण एव कुर्वीत देवतानां च पूजनम्॥4.152॥
शौच, तैलाभ्यङ्ग, दन्तधावन, स्नान, अञ्जन और देवताओं का पूजन पूर्वान्ह में ही करना चाहिये। 
One should perform the acts of daily routine like freshening-bathing, messaging, cleaning teeth, applying collyrium to his eyes and worshiping of demigods-deities before noon-during the first quarter of the day.
दैवतान्यभिगच्छेत्तु धार्मिकांश्च द्विजोत्तमान्। 
ईश्वरं चैव रक्षार्थं गुरूनेव च पर्वसु॥4.153॥
अपनी रक्षा लिये देवताओं, धार्मिकों, ब्राह्मणों, गुरुओं तथा राजा के दर्शनार्थ (अमावश्यादि) पर्वों में, उनके सामने जाये। 
One should go to the demigods, religious minded people, the Brahmns, the Guru and the king on some auspicious occasion-festivity for his protection-safety.
पर्व :: उत्सव, त्योहार, उत्सव मनाने या कोई विशिष्ट धार्मिक कृत्य करने का समय या दिन, जैसे :- अमावस्या, पूर्णिमा आदि, पुस्तक का कोई खंड, अंश या अध्याय, जैसे :- महाभारत में अठारह पर्व हैं, मौका, अवसर, शरीर के अवयवों का संधिस्थान, गाँठ,जोड़, गलियों के पोर, गन्ने की गाँठों में से प्रत्येक; fete, fiesta, festival, section-subsection of a chapter.
अभिवादयेद् वृद्धांश्च दद्याच्चैवासनं स्वकम्। 
कृताञ्जलिरुपासीत गच्छतः पृष्ठतोऽन्वियात्॥4.154॥
वृद्धों (श्रेष्ठ पुरुषों) को घर आने पर उठकर उन्हें प्रणाम करे, अपना आसन बैठने को दे और अंजलिबद्ध होकर आगे खड़ा रहे। जब वे जाने लगें तब कुछ दूर तक उनके पीछे जाये। 
One should get up to honour whenever a respected or elderly person visits his house and stay in front of them with folded hand after offering them his seat and accompany them to some distance when they leave.
VENERABLE :: आदरणीय, सम्मानित, बुज़ुर्ग, पूजित, श्रद्धेय, इज़्ज़तदार; respected, venerated, reverenced, worshipped, esteemed, hallowed, august, distinguished, acclaimed, celebrated, reputable, respectable, honourable, reputed, deserved, well-earned, elderly, aged,  hallow, revered, reverenced, reverend, honoured.
श्रुतिस्मृत्युदितं सम्यङ् निबद्धं स्वेषु कर्मसु। 
धर्ममूलं निषेवेत सदाचारमतन्द्रितः॥4.155॥
श्रुति स्मृति में कहे हुए सदाचर जो अपने कर्म में सम्यक रूप से मिले हुए हैं और जो धर्म के मूल है, निरालस्य होकर उनका पालन करना चाहिये। 
One should follow the dictates of virtuous conduct pertaining to the deeds as are described in the scriptures like Smrati or conveyed orally through generation to generation, without laziness.
आचाराल्लभते ह्यायुराचारादीप्सिताः प्रजाः। 
आचाराद्धनमक्षय्यमाचारो हन्त्यलक्षणम्॥4.156॥
आचार से आयु प्राप्त होती है, आचार से अभिमत सन्तान प्राप्त होती है, आचार से अक्षय धन लाभ होता है, आचार से अशुभ लक्षणों का नाश होता है। 
Virtuous conduct grants long life, desirable offspring, imperishable wealth and it destroys the impact of inauspicious happenings-signs-characterises.
दुराचारो हि पुरुषो लोके भवति निन्दितः। 
दुःखभागी च सततं व्याधितोऽल्पायुरेव च॥4.157॥
दुराचारी  पुरुष संसार में निन्दित, सर्वदा दुःखी, रोगी और अल्पायु होता है। 
A man with bad character is always condemned in the society-world. He is always worried, ill and has low life span-short lived.
One with doubtful character is isolated from the society. His own people hate him and discard him. None respect him.
सर्वलक्षणहीनोऽपि यः सदाचारवान्नरः। 
श्रद्दधानोऽनसूयश्च शतं वर्षाणि जीवति॥4.158॥
सब लक्षणों से हीन होने पर भी जो पुरुष सदाचारी और श्रद्धालु होता है तथा दूसरों के दोष को नहीं कहता, वह सौ वर्ष जीता है। 
One who is entirely destitute of auspicious marks, does not possess talent, skills, qualities, do not back bite or describe-discuss-expose weaknesses-guilt of others, is virtuous and devoted to the God; survives for 100 years (with honour, respect and comforts).
यद्यत्परवशं कर्म तत्तद्यत्नेन वर्जयेत्।
यद्यदात्मवशं तु स्यात्तत्तत्सेवेत यत्नतः॥4.159॥
जो-जो कर्म दूसरे के वश में हों उन कर्मों को यत्न पूर्वक त्याग दे और जो-जो कर्म अपने अधीन हों, उन-उन कर्मों को यत्न पूर्वक सेवन करे। 
One should discard-reject the performance of those jobs, duties, endeavours for which he has to depend over others and conform to such tasks, which he can do independently-freely with honour & dignity.
One can employ his talent, skills, ability freely as per his own will, discretion in which he is independent. Its easy to obtain success in such circumstances-atmosphere, where he is able to take his own decisions. To serve others is painful, tiring, punishing. Jobs undertaken under partnership too may not yield desired results.
सर्वं परवंशं दुःखं सर्वमात्मवशं सुखम्। 
एतद्विद्यात् समासेन लक्षणं सुखदुःखयोः॥4.160॥
पराधीन सभी कर्म दुःख देनेवाले और स्वाधीन सभी कर्म सुख देने वाले होते हैं, संक्षेप यही में सुख-दुःख का लक्षण है।
Any job, activity, endeavour, performance, deed which is done independently-freely, of own self, yield pleasure-happiness and the work done under someone else is painful-torturous. In short this is the gist of pain-pleasure. 
Slavery is a curse. India had been under the rule of traitors for more than 1,000 years. The traitors took away India's wealth and left behind misery, worries, pain and tears. The Muslim & British traitors both deserve condemnation. The Muslims live in India and sing songs in favour of Pakistan. They demand implementation of Sharia  laws, which is an anti national activity. Anyone who desire & demand this should be packed to Mecca-Medina forever. The Sharia orders beheading of any one who do not follow Islam.
यत्कर्म कुर्वतोऽस्य स्यात्परितोषोऽन्तरात्मनः। 
तत्प्रयत्नेन कुर्वीत विपरीतं तु वर्जयेत्॥4.161॥
जिसके करने से चित्त को संतोष हो उसे अवश्य करे और जिसके करने से दुःख हो उसे न करे। 
An act (pious, righteous, virtuous) which generate happiness in the heart-psyche must be done with diligence and  a deed which create trouble, tension, unrest must be discarded.
The vices, wicked actions, criminal acts are sure to bring the doer under the purview of law and order and the doer must be punished.
आचार्यं च प्रवक्तारं पितरं मातरं गुरुम्। 
न हिंस्याद्  ब्राह्मणान्गांश्च सर्वांश्चैव तपस्विनः॥4.162॥
उपनयन, वेदाध्ययन करने वाला आचार्य, वेदार्थ, व्याख्या, पिता-माता, गुरु, ब्राह्मण, गाय और तपस्वी, इनकी हिंसा न करे (दुःख न दे) इनके विरुद्ध आचरण न करें। 
One should never harm, tease, torture or kill the Achary, (Pandit Ji, Priest-Purohit) who initiated him into education (becoming a socially useful human being), who performed the sacred thread ceremony, those who explain-interpret the meaning of Veds, mother and father, Guru-teacher, Brahmn, cow, ascetics.
नास्तिक्यं वेदनिन्दां च देवतानां च कुत्सनम्। 
द्वेषं दम्भं च मानं च क्रोधं तैक्ष्ण्यं च वर्जयेत्॥4.163॥
नास्तिकता-ईश्वर में अविश्वास, वेद और देवताओं की निन्दा, ईर्ष्या भाव, दम्भ, अभिमान, क्रोध और क्रूरता को त्याग देना चाहिये। 
One must reject atheism (criticism, condemnation, censure, cavilling) of Veds and demigods-deities, envy (jealousy, hatred) boasting (ego, pride), anger-fury and cruelty.
CAVIL :: कमी, वितण्डा, दोष ढूँढना, छिद्रान्वेषक करना, नुक्ताचीनी करना, बाल की खाल निकलना, छेद ढूँढ़ना, अवगुण ढूँढ़ना, हुज्जत करना, मीन मेख निकालना, खोट निकालना, झूँठा-इलज़ाम आक्षेप; make petty or unnecessary, objections, complain, carp, grumble, moan, grouse, grouch, whine, bleat, find fault with, quibble about, niggle about, finding weaknesses.
परस्य दण्डं नोद्यच्छेत्क्रुद्धो नैनं निपातयेत्। 
अन्यत्र पुत्राच्छिष्याद्वा शिष्ट्यर्थं ताडयेत्तु यौ॥4.164॥
दूसरे के लिये क्रुद्ध होकर लाठी न उठावे और न मारे। पुत्र तथा शिष्य के अतिरिक्त अन्य किसी व्यक्ति पर दण्ड से प्रहार (दण्डित) न करे। पुत्र और शिष्य के लिये ताड़न अवश्य करे। 
One must neither raise the staff-stick in anger nor strike anyone else. He should never strike anyone else with stuff other than his son and student (only when essential only to discipline them). He must rebuke-guess, smash or punish the son and the student if they do any thing wrong.
The son or the student have to be warned, cautioned against any wrong doing, misunderstanding. It does not necessarily mean beating, punishing, rebuking, insulting.
The scriptures says that the son or the disciple-student should be punished in isolation & not in public.
ताड़ना :: चमड़े के वाद्य यंत्रों से अच्छी आवाज़-ध्वनि प्राप्त करने के लिए रस्सी-नट बोल्ट को कसना, धूप में सेंकना आदि को ताड़ना कहते हैं। 
घूरना, टकटकी लगाकर देखना, परखना या भाँपना,  ताड़न करने अर्थात् मारने-पीटने की क्रिया या भाव, किसी के कार्य, व्यवहार आदि से असंतुष्ट होकर उसे सचेत करने तथा कर्तव्य परायण बनाने के उद्देश्य से कही हुई कड़ी बात, प्रहार, मार, किसी को दिया जाने वाला कष्ट, दुःख, किसी के कार्य, व्यवहार आदि से अप्रसन्नता प्रकट करते हुए उस व्यक्ति को सचेत करना और उसका ध्यान कर्तव्य पालन की ओर आकृष्ट करना, दंड या सजा देना, कुछ दूरी पर लोगों की आँखे बचाकर या लुक-छिपकर किये जाते हुए काम को अपने कौशल या बुद्धि-बल से जान या देख लेना; It does not necessarily mean beating, punishing, rebuking, insulting.
ब्राह्मणायावगुर्यैव द्विजातिर्वधकाम्यया। 
शतं वर्षाणि तामिस्रे नरके परिवर्तते॥4.165॥
जो द्विजाति ब्राह्मण को मारने की इच्छा से क्रुद्ध होकर लाठी उठता है वह सौ वर्ष तक तामिस्त्र नामक नरक में चक्कर खाता है। 
One who raise the staff-arms with the aim-desire of killing, striking a Brahmn has to stay-roam in deadliest-dreaded hell called Tamistr for 100 years.
ताडयित्वा तृणेनापि संरम्भान्मतिपूर्वकम्। 
एकविंशतीमाजातीः पापयोनिषु जायते॥4.166॥
जो क्रोध में आकर ज्ञानतः एक तिनके से भी ब्राह्मण को मारता है, वह उस पाप के फल स्वरूप 21 बार पाप योनियों में अर्थात कुत्ता आदि नीच योनियों में जन्म लेता है। 
One who knowingly-intentionally strike a Brahmn even with a straw, with anger goes to inferior species like dogs for 21 rebirths 
अयुध्यमानस्योत्पाद्य ब्राह्मणस्यासृगङ्गतः। 
दुःखं सुमहदाप्नोति प्रेत्याप्राज्ञतया नरः॥4.167॥
जो कोई न लड़ने वाले ब्राह्मण के शरीर से लहू बहाता है, वह अपनी मूर्खता के कारण परलोक में कष्ट पाता है। 
The ignorant-idiot, who shed blood out of the body of a Brahmn who does not fight, suffers in next births-other abodes.
शोणितं यावतः पांसून्संगृह्णाति महीतलात्। 
तावतोऽब्दानमुत्रान्यैः शोणितोत्पादकोऽद्यते॥4.168॥
ब्राह्मण का गिरा हुआ रक्त मिट्टी के जितने अणुओं को भिगोता है, उतने वर्ष परलोक में उस रक्त बहाने वाले को हिंस्त्र जीव काटते और खाते हैं। 
One who shed the blood of a Brahmn, has to be bitten and eaten by the carnivorous animals in next births-abodes for as many years as the atoms-molecules of the earth were damped, soaked, wrapped by the Brahmn's blood.
न कदाचित्  द्विजे तस्माद्विद्वानवगुरेदपि। 
न ताडयेत्तृणेनापि न गात्रात्स्रावयेदसृक्॥4.169॥
इसलिये विद्वान पुरुष ब्राह्मण पर भूलकर भी दण्ड उठावे, तृण से भी न मारे उसके शरीर से रक्त न बहावे। 
A wise man should therefore neither raise the staff to harm, threaten, punish a Brahmn nor strike him even with a straw-blade of grass and never  bleed him.
अधार्मिको नरो यो हि यस्य चाप्यनृतं धनम्। 
हिंसारतश्च यो नित्यं नेहासौ सुखमेधते॥4.170॥
अधर्मी-पापी, झूँठ ही बोलने वाले, दूसरे की हिंसा में लगे रहने  पुरुष इस लोक में सुख नहीं पाते। 
Atheist-one who do not follow the tenets of religion, liars, those who are busy harming others, through violent means never find comfort-solace in this world.
न सीदन्नपि धर्मेण मनोऽधर्मे निवेशयेत्। 
अधार्मिकाणां पापानामाशु पश्यन्विपर्ययम्॥4.171॥
अधर्माचारी पापियों का शीघ्र नाश होता (दुर्दशा) हुआ देखकर और धर्माचरण से दुःख पाता हुआ भी मनुष्य अधर्म में मन को न लगावे। 
One should never deviate himself to falsehood-irreligiosity even though suffering by following the religious acts, deeds, righteousness, virtuousness, piousity, by observing the suffering of the wicked, viceful, wretched, unrighteous.
नाधर्मश्चरितो लोके सद्यः फलति गौरिव। 
शनैरावर्त्यमानस्तु कर्तुर्मूलानि कृन्तति॥4.172॥
किया हुआ पाप पृथ्वी में बोये हुए बीज की भाँति तत्काल फल नहीं देता, अपितु धीरे-धीरे फलित होने का समय आने पर पापकर्त्ता का मूलोच्छेदन के देता है। 
The sin does not yield immediately, but results slowly and gradually like the seed sown in the soil over the earth. It vanishes the doer leaving none behind in the family.
Mughal dynasty in India is known for its cruelty, conversion of Hindus to Islam, killing innocent people, destroying Hindu places of worship etc. With Bahadur Shah Jafar the dynasty came to an end. However, some people through illegitimate relations survived and ruled India further. But their future is too dark-bleak. Rahul and Varun are non-entity now. They are Muslims, who adopted Gandhi as their surname.
यदि नात्मनि पुत्रेषु न चेत्पुत्रेषु नप्तृषु। 
न त्वेव तु कृतोऽधर्मः कर्तुर्भवति निष्फलः॥4.173॥
यदि पाप का फल अपने आपको न मिला तो पुत्रों को, पुत्रों को न मिला तो पौत्रों को मिलता ही है। बाप का किया हुआ पाप कभी निष्फल नहीं होता। 
The outcome of the sins of father has to be faced by the son. If the son passes away the grandson is sure to face the result of the grand father's sin, since they all enjoyed the comforts, riches attained through sin.
If the punishment-curse does fall over the offender himself, it falls on his sons, if not on the sons, at least on his grandsons; but an iniquity (once) committed, never fails to produce fruit to him who wrought it.
Imagine the future of the grandson and the great grand son who are still busy committing sins after sins. Frauds, corruption, cheating, investments abroad, dual citizens ship and an unending trail of sins.
अधर्मेणैधते तावत्ततो भद्राणि पश्यति। 
ततः सपत्नान्जयति समूलस्तु विनश्यति॥4.174॥
अधर्म-पाप से कुछ काल वृद्धि होती है, उससे सभी प्रकार का वैभव दिखाई देता है। उससे शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है। उसके बाद उसका जड़-मूल नाश हो जाता है। 
Irreligiosity, sins, wretchedness, unrighteousness yield gains temporarily for some time resulting in all sorts of comforts. One is able to win-conquer his enemy as well, but thereafter his clan comes to an end and everything perishes..
The Muslim traitors who looted India are no more. Their clans-dynasties have wiped off. The British crown too will meet the same fate one day or the other.
सत्यधर्मार्यवृत्तेषु शौचे चैवारमेत् स दा। 
शिष्यांश्च शिष्याद्धर्मेण वाग्बाहूदरसंयतः॥4.175॥
सत्य, धर्म, सदाचर और पवित्रता में सदा रत रहे। वाणी, बाहु और पेट को संयत रखता हुआ धर्म पूर्वक शिष्यों को शिक्षा दे। 
कम खाना, कम बोलना और संयम से रहना कभी दुःख नहीं देता। 
One should be dedicated (resort) to truth, Dharm-religiosity, virtues and purity. He should restrain his speech (refrain from absurdity), muscle power and over eating and teach the students as per scriptures.
One should always restrain his tongue. He should not speak unnecessarily, never eat more than the appetite, what is needed for survivor. Even if capable, one should try not to indulge in the use of muscle power. However, when there is no way out, he should over power the attacker and subject him to law.
परित्यजेदर्थकामौ यौ स्यातां धर्मवर्जितौ। 
धर्मं चाप्यसुखोदर्कंं  लोकसंक्रुष्ट मेव च॥4.176॥
जो अर्थ, काम, धर्म के विरुद्ध हों उन्हें त्याग दे और ऐसे धर्म (कार्य, व्यवहार) को भी न करे जिससे पीछे दुःख हो। लोगों को रुलाने वाले कार्य न करे। 
One should discard those people who are against the essentials of earning, reproduction and the righteous (pious, virtuous deeds). He should restrain-refrain from doing such things which will produce sorrow-pain in future, i.e., anything against the law of land, criminal acts, sins, teasing others, thefts etc. He should never act in such a manner, which may bring tears in other's eyes.
न पाणिपादचपलो न नेत्रचपलोऽनृजुः। 
न स्याद्वाक्चपलश्चैव न परद्रोहकर्मधीः॥4.177॥
हाथ वृथा किसी वस्तु को न ले और निष्प्रयोजन घूमे नहीं। नेत्र चपल न हों (अर्थात किसी को बुरी निगाह से न देखे), व्यर्थ बहुत न बोले, कुटिल न हो, दूसरों की हानि की चेष्टा न करे। 
One should not hold any thing unnecessarily in hands and roam-loiter aimlessly like a vagabond. His eyes should not be playful (blink unnecessary, staring at others unnecessarily, turning quickly reflecting notoriety, deceit, vulgarity, greed), should not speak irrelevantly-uselessly, should not be cunning, devious, crooked and never harm others.
चपल :: गतिमान्, अस्थिर, चंचल; playful, agile.
कुटिल :: टेढ़ा, छली, चालबाज; devious, crooked.
येनास्य पितरो याता येन याताः पितामहाः। 
तेन यायात्सतां मार्गं तेन गच्छन्न रिष्यते॥4.178॥
जिस सन्मार्ग-सत्यपथ, पर बाप-दादा चले हों, उसी अच्छे-सन्मार्ग पर स्वयं भी चले। उस मार्ग पर चलने से पाप का भागी नहीं हों पड़ता। 
One should adopt-follow the holy(righteous, pious, virtuous) path followed by his ancestors-forefathers (father & the grandfather) to be protected from sin.
ऋत्विक्पुरोहिताचार्यैर्मातुलातिथिसंश्रितैः। 
बालवृद्धातुरैर्वैद्यैर्ज्ञातिसंबन्धिबान्धवैः॥4.179॥
मातापितृभ्यां जामीभिर्भ्रात्रा पुत्रेण भार्यया। 
दुहित्रा दासवर्गेण विवादं न समाचरेत्॥4.180॥
यज्ञ  करने वाला, पुरोहित, आचार्य, मामा, अतिथि, आश्रित वर्ग, बालक, वृद्ध, रोगी, वैद्य, दामाद, सम्बन्धी, (साले, जमाता, आदि) और मातृकुल के लोगों के साथ तथा माँ, बाप, बहन, पतोहू, भाई, बेटा, बेटी, स्त्री और नौकरों के साथ विवाद ने करे। 
One should never entangle himself in argument-quarrels with the person performing sacrifices, priest, teacher, maternal uncle, dependants, children, old-aged, diseased-ill, doctor (Vaedy, physician, surgeon), relatives (brother in law, son in law), those belonging to the maternal side, mother, father, son, daughter, son's, grandson's wife, wife, servants.
It create unnecessary tensions, headache, anger, sorrow, pain, uneasiness, blood pressure etc. Arguments are avoidable and sorted out tactically. One should be willing-ready for compromise, as far as possible. If someone is adamant over quarrel-fight, its better to discard such a person. Still, if one insists, its not possible to escape, then its better to settle the issue-matter once for all.People troubling unnecessarily must be punished.
एतैर्विवादान्  संत्यज्य सर्वपापैः प्रमुच्यते। 
एभिर्जितैश्च जयति सर्वांल्लोकानिमान्गृही॥4.181॥
जो इन लोगों विवाद नहीं करता, वह सब पापों से छूट जाता है। इनसे झगड़ा न करने वाला पुरुष इन (आगे कहे गये) लोकों को प्राप्त करता है। 
One who does not indulge in argument-quarrel with the above mentioned categories of people, is protected from all sins and gets the higher abodes-heavens describes next.
Argument-quarrel is a chain reaction and disturbs life. Under the influence of tension-anger one may commit several mistakes-sins, crimes. The quarrel-argument is a two way process. If one remain silent, the other one is left with with no alternative except to shut mouth.
आचार्यो ब्रह्मलोकेशः प्राजापत्ये पिता प्रभुः। 
अतिथिस्त्विन्द्रलोकेशो देवलोकस्य चर्त्विजः॥4.182॥
आचार्य को ब्रह्म लोक का, पिता को प्राजापत्य लोक का, अतिथि को इंद्रलोक का और यज्ञ पुरोहित को देवलोक का उत्तम निवास प्राप्त होता है। 
The enlightened teacher-guide gets place in Brahm Lok-creator's abode, the father reaches the abode of Prajapati, the guest attains Indr Lok-heaven and the priest performing the Yagy-holy sacrifices in fire attains the abode of demigods.
जामयोऽप्सरसां लोके वैश्वदेवस्य बान्धवाः। 
संबन्धिनो ह्यपां लोके पृथिव्यां मातृमातुलौ॥4.183॥
बहन और वधू का अप्सरा लोक पर, बान्धवों का वैश्वदेव लोक पर, सम्बन्धियों का वरुण लोक में, माता और मामा का भूलोक पर प्रभुत्व होता है। 
The sister and the daughter in law are placed comfortably in the abode of nymphs-fairies, the brothers get the abode of Vaeshv Dev, the relatives goes to the abode of Varun Dev-deity of water, mother and the maternal uncle are located over the earth with comforts-powers.
आकाशेशास्तु विज्ञेया बालवृद्धकृशातुराः। 
भ्राता ज्येष्ठः समः पित्रा भार्या पुत्रः स्वका तनुः॥4.184॥
बालक, वृद्ध, कृश और रोगी आकाश के स्वामी होते हैं। बड़ा भाई पिता के तुल्य होता है।  स्त्री और पुत्र तो अपना शरीर ही ठहरा। फिर उनसे विवाद कैसा ?!
Infants, aged, fragile and sick are equated with space-sky. The elder brother is like the father. The wife and the son constitute one's own body. Then why should one entangle with these in arguments?!
Infants, aged, fragile and sick are too weak to argue-debate or respond to a situation.
छाया स्वो दासवर्गश्च दुहिता कृपणं परम्। 
तस्मादेतैरधिक्षिप्तः सहेतासंज्वरः सदा॥4.185॥
दास वर्ग अपनी छाया के समान होते हैं। बेटी बड़ी दया की पात्र होती है। इस कारण ये तिरस्कार भी करें तो चुपचाप सुन लें, विवाद ने करें। 
One's servants-slaves constitutes one's own image, replica, shadow. One's daughter deserve pity, kindness, tenderness. Hence, if one is offended by anyone of these, one must bear it without resentment.
प्रतिग्रहसमर्थोऽपि प्रसङ्गं तत्र वर्जयेत्। 
प्रतिग्रहेण ह्यस्याशु ब्राह्मं तेजः प्रशाम्यति॥4.186॥
दान लेने की योग्यता रखता हुआ भी बार-बार दान लेने की इच्छाओं को त्याग दे, क्योंकि प्रतिग्रह से ब्रह्मतेज लुप्त हो जाता है। 
Even if one is qualified to accept donations-charity, being a Brahmn-Poor, he should not desire to be obliged repeatedly-again and again; since it lowers his capabilities-Aura-brilliance-powers produced through celibacy, asceticism Yog, devotion, prayers to the Almighty.
One must earn his own livelihood sufficient to support him as well his family & dependants. The scholars, learned, enlightened too, should earn for themselves in stead of depending over charity, begging, mercy, alms. If one is obliged by some one, he should be quick to distribute the remaining alms amongest the needy.
न द्रव्याणामविज्ञाय विधिं धर्म्यं प्रतिग्रहे। 
प्राज्ञः प्रतिग्रहं कुर्यादवसीदन्नपि क्षुधा॥4.187॥ 
द्रव्यों के दान लेने में धार्मिक विधान को न जानकर क्षुधा से पीड़ित होने पर भी बुद्धिमान ब्राह्मण दान न ले। 
An offering without the sanction of scriptures-religious procedures should never be accepted by a wise, learned, enlightened, intelligent, prudent Brahmn, even if he dying of hunger.
हिरण्यं भूमिमश्वं गामन्नं वासस्तिलान्घृतम्। 
प्रतिगृह्णन्नविद्वांस्तु भस्मीभवति दारुवत्॥4.188॥
सोना, भूमि, घोडा, गाय, अन्न, वस्त्र, तिल, और घृत आदि वस्तुओं का दान लेने वाला मूर्ख ब्राह्मण लकड़ी की तरह भस्म हो जाता है। 
The ignorant-idiot Brahmn who accepts gold, land, horse, cow, food grain, clothing-dress, sesamum Ghee-clarified butter, is reduced to ashes like wood.
Donations made through the money earned through honest-righteous means only, give auspicious results to the donor. Similarly, the donations accepted by the Brahmn should be with the permission of scriptures. Donations from irreligious people, criminals, atheist should never be accepted.
There are people who frequently visit religious places to take meals called Prasad or Langar. These meals sooner or later are bound to yield negative impact. The Prasad equal to a rice grain is sufficient. If more than this is received, it should be distributed in more and more people. The donations received by the Muslims or the terrorists in Punjab, Kashmir and the Muslim countries are utilised for murdering innocent people bringing unaccounted sins over the heads of the donors.
हिरण्यमायुरन्नं च भूर्गौश्चाप्योषतस्तनुम्। 
अश्वश्चक्षुस्त्वचं वासो घृतं तेजस्तिला: प्रजा:॥4.189॥
सोना और अन्न दान आयु को, भूमि और गाय का दान शरीर को घोड़ा नेत्र को, वस्त्र त्वचा को, घृत-घी तेज को और तिल का दान लेना सन्तानों को जलाता है। 
The donations received in the form of gold and food destroy longevity, land or cow weakens the body, horse harms the eyes (sight), garment affect the skin, clarified butter consumes energy leading to impotency, sesamum affect the progeny-offspring.
One's grand mother was dead against receiving anything from any one in the form of donations-charity, even though one's own family is a Brahmn and one is the author of these scripts. She was against taking meals during Shraddh conducted by others. One believes in earning through honest means and maintained this till today at the age of 68. One never saw a Brahmn flourishing with the donations. One is still a Brahmn with heart-mind & soul, speech and the deeds.
One do not believe in preaching, wearing saffron cloths or accepting anything as charity.
अतपास्त्वनधीयानः प्रतिग्रहरुचिर्द्विजः। 
अम्भस्यश्मप्लवेनेव सह तेनैव मज्जति॥4.190॥
तपस्या और वेदविद्या से रहित दान लेने वाला ब्राह्मण यजमान के साथ नर्क में डूबता है, जैसे पत्थर की बनी नाव से पार उतरने वाले नाव के साथ पानी में डूबते हैं। 
One who is a Brahmn by birth, but do not practice asceticism, do not study Veds-scriptures, do not perform Yog or prayers to the Almighty; drowns in the hells just like the one who drowns in the river while travelling in a boat made of stone, if he accepts donations-charity.
वेदानभिज्ञ ब्राह्मण को जल तक भी न दे। 
The donor should not offer even water to one who claims to be a Brahmn but has not studied-practiced Veds.
In today's scenario hundreds of preachers give lectures on Dharm, Veds & scriptures and collect huge sums of money, even though they never studied them. They secure their place in the hells.
तस्मादविद्वान्बिभियाद्यस्मात्तस्मात्प्रतिग्रहात्।
स्वल्पकेनाप्यविद्वान्हि पङ्के गौरिव सीदति॥4.191॥
इसलिये थोड़ा सा भी द्रव्य प्रतिग्रह करने से डरे, क्योंकि ऐसे थोड़े से प्रतिग्रह से भी दलदल में फँसी हुई गौ की भाँति मूर्ख ब्राह्मण नर्क में धँसता जाता है और क्लेश भोगता है। 
The ignorant-idiot Brahmn, sinks in the hells just like the cow who sinks in a marsh, if he accepts slightest favour in the form of donation, gifts, charity.
न वार्यपि प्रयच्छेत्तु बैडालव्रतिके द्विजे। 
न बकव्रतिके पापे नावेदविदि धर्मवित्॥4.192॥
धर्मज्ञ को चाहिये कि वह बैडाल व्रतिक, वक् व्रतिक ब्राह्मण को जल तक भी न दे। 
One who understands the intricacies-gist of the Dharm-religion should not offer even a single drop of water to the Brahmn who is unaware of the Veds-scriptures, earns his livelihood just like the cat or the heron.
Cat eats rats and the heron catches fish or crabs for eating. The cat normally enters houses and eats food, drinks milk or curd kept uncovered by the house hold.
Majority of Brahmns these days constitute of those who are Brahmns for the names sake only. They indulge in eating meat, drinking wine, flirtation with other women. They stay away from the study of Veds or scriptures. Virtues, piousity, honesty, devotion are like poison for them.
त्रिष्वप्येतेषु दत्तं हि विधिनाSप्यर्जितं धनम्। 
दातुर्भवत्यनर्थाय परत्रादातुरेव च॥4.193॥
उपयुक्त तीनों को न्यायोपार्जित धन भी दिया जाये, तो भी वह दाता और प्रति ग्रहीता दोनों के लिये अनर्थ का कारण होता है। 
Even if the donation is made from the earnings made through virtuous, righteous, pious, honest means to the above three categories of Brahmns, it will create trouble for the donor and the acceptor-recipient equally in the next birth-abode.
This is what happens to the ignorant, illiterate or those Brahmns never studied scriptures-Veds etc. Think of those who are non Brahmns and are busy doing all sorts of sins. 
यथा प्लवेनौउपलेन निमज्जत्युदके तरन्। 
तथा निमज्जतोऽधस्तादज्ञौ दातृप्रतीच्छकौ॥4.194॥
जैसे पत्थर की नाव से पार उतरने वाला नाव के साथ पानी में डूब जाता है वैसे ही दोनों मूर्ख दाता और ग्रहीता नर्क में डूब जाते हैं। 
The manner in which one travelling by a boat made of stone drowns in water, the donor and the acceptor; both sinks into the hell.
धर्मध्वजी सदा लुब्धश्छाद्मिको लोकदम्भकः। 
बैडालव्रतिको ज्ञेयो हिंस्रः सर्वाभिसंधकः॥4.195॥
धर्मध्वजी-जो लोगों को दिखाने के लिये धर्म का दिखावा करते हैं; यथार्थ में दूसरे के धन का लोभी, कपट वेशधारी और बंचक होता है। जो सदा दूसरों को निन्दा करता है और हिंसा में रत रहता है, उसे वैडालिक कहते हैं। 
One who shows off to be religious, in fact is a hypocrite-greedy and tries to snatch others earnings-wealth. He is a deceptor-cheat-swindler. One who is always busy in violence and  condemning-censuring others, is person of the nature of cat.
Please refer to :: SAFFRON CLAD-IMPOSTORS पाखण्डी-ढ़ोंगीbhartiyshiksha.blogspot.com 
 अधोदृष्टिर्नैष्कृतिकः स्वार्थसाधनतत्परः। 
शठो मिथ्याविनीतश्च बकव्रतचरो द्विजः॥4.196॥
जो नम्रता दिखलाने के लिये अपनी दृष्टि को सदा नीचे रखता है, पर आचरण क्रूरता का करता है। स्वार्थ में सदा रहता है, टेढ़ी चाल चलने वाला, कपट से युक्त नम्रता दिखाता है ऐसे ब्राह्मण को बकवादी कहते हैं। 
One who is cruel, but keeps his eyes low to show off, is always busy in selfishness with sole intention of attaining his own motives-ends-goals, uses tricks to fulfil his desires, shows off false politeness is a Brahmn who is identified as one who speaks like a heron.
This society has people who can go to any extent to achieve their goals through fraudulent means. Most of the politicians, bureaucratises, businessman in India and abroad are made up of this stuff these days. Brahmn has been poor and remain so.
ये बकव्रतिनो विप्रा ये च मार्जारलिङ्गिनः। 
ते पतन्त्यन्धतामिस्रे तेन पापेन कर्मणा॥4.197॥ 
जो ब्राह्मण बकव्रती और वैडाल व्रतिक होते हैं, वे उस पापकर्म के फल स्वरूप अंध्रतामिस्त्र नर्क में गिरते हैं। 
Those Brahmns who's intent is like the cat and the heron fall into Andhtamistr hell.
This is applicable to all those who belong to this category of people of any race, creed, cast, region, religion, country. Its another aspect that most of the people around the world are ignorant about this and are sure to discard this since they discard Hinduism as a religion.
Hinduism is purely a way of life, style, means of virtuous living and summation of purity, honesty, virtues, righteousness. The rules which are mentioned in the scriptures are time tested over millions of years in a continuous civilisation present in India.
This text is not meant for the ignorant, one who argue a lot, does not understand reason-logic and lacks prudence.
न धर्मस्यापदेशेन पापं कृत्वा व्रतं चरेत्। 
व्रतेन पापं प्रच्छाद्य कुर्वन् स्त्रीशूद्रदम्भनम्॥4.198॥
पाप करके (उसके प्रायश्चित हेतु) किसी व्रत का अनुष्ठान करना और फिर उस अनुष्ठान से स्त्री शूद्रादि अज्ञ जनों को भरमाकर उस पाप को कभी छिपाना नहीं चाहिये। 
One should not befool, deceive the women or the ignorant through penances after committing a sin.
People generally cover off their guilt under the cover of charity, donations, religious holdings, vows, fasting etc. to look neat and clean. They may shroud off the sin but cannot escape its impact under any circumstances. One is sure to undergo reward or punishment for his actions.
प्रेत्येह चेदृशा विप्रा गर्ह्यन्ते ब्रह्मवादिभिः। 
छद्मनाSSचरितं यच्च व्रतं रक्षांसि गच्छति॥4.199॥
ऐसे ब्राह्मण इस लोक और परलोक दोनों जगह वेदवेत्ताओं द्वारा निन्दित होते हैं। जो व्रत छल से किया जाता है उसका फल राक्षसों को प्राप्त होता है। 
Such Brahmns are reprehended-rebuked after death in this world as well as the next abodes by the enlightened-who know the gist of the Veds. The outcome-reward for the fast-sacrifices made with the money earned through dubious-fraudulent means goes to the demons instead of the performer. 
This postulate is widely applicable to the cheats, fraudsters, cunning, impostors, politicians etc. of all communities. The impact of these means is more in their case since the Brahmn has some virtues left over with them as result of previous births. Such unrepentant people are left to bear tortures in the hells for millions of years.
अलिङ्गो लिङ्गिवेषेण यो वृत्तिमुपजीवति। 
स लिङ्गिनां हरत्येनस्तिर्यग्योनौ च जायते॥4.200॥
जो ब्रह्मचारी न होकर भी ब्रह्मचारी के चिन्ह धारण करके, उनकी वृत्ति से जीवन-निर्वाह करता है, वह ब्रह्मचारियों के पापों को अपने लिये बटोरता है और मरने के बाद वह कुत्ते आदि तिर्यग योनियों में जन्म लेता है। 
One who is not a celibate but earns his livelihood by pretending to be a celibate by wearing the marks-signs meant for the celibate, collects the sins of the celibate and as a result of it get birth in inferior species like dogs.
परकीयनिपानेषु न स्नायाद्धि कदा चन। 
निपानकर्तुः स्नात्वा तु दुष्कृतांशेन लिप्यते॥4.201॥
दूसरे के बनाये हुए जलाशय में कभी स्नान न करे। स्नान करने से स्नानकर्ता पुष्कर खुदवाने वाले के पापों के अंश (चतुर्थ भाग) का भागी होता है। 
One should not bath in the ponds-water tanks constructed-dig by the other people for their own-personal use; since the one baths in them bears one fourth of the sins earned by the owner of the pond-reservoir. This is icon-like the sin of digging Pushkar lake in Ajmer meant for Jagat Pita Brahma Ji.
Such small ponds-tanks gets contaminates soon and the germs, virus, DNA of the owner are retained by the water in it. Anyone else who takes bath in it is sure to be affected by the microbes-diseases.
यानशय्यासनान्यस्य कूपौद्यानगृहाणि च। 
अदत्तान्युपयुञ्जान एनसः स्यात्तुरीयभाक्॥4.202॥
किसी के रथ, शय्या, आसन, कुँआ, बगीचा और गृह को दाता के दिये बिना, उपभोग करने वाले, उसके पाप के चतुर्थांश के भागी होते हैं। 
One invariably attract the 1/4th of the sins of the doer, if he uses his chariot-(vehicle), bed, seat, well, garden-orchard and the house without seeking permission.
नदीषु देवखातेषु तडागेषु सरःसु च। 
स्नानं समाचरेन्नित्यं गर्तप्रस्रवणेषु च॥4.203॥
नदी, देवकुण्ड, पोखरा, सरोवर, सोते और झरने में नित्य स्नान करना चाहिये।
One must take bath in a rive, divine water body-Kund, pond, lack, springs and waterfalls or a source of pure water like tap in the house.
Human skin acts as the third kidney and removes harmful wastes in the form of sweat. It forms a white layer all over the body which cause etching. The main component of sweat is urea. Other than this nitrogenous foul smelling chemicals do appear which chokes the pores of skin leading to several diseases. When one takes a bath, these water soluble chemical are washed off. Its not essential to use soap, which is again a chemical made up of bases-alkalies.
यमान्सेवेत सततं न नित्यं नियमान्बुधः। 
यमान्पतत्यकुर्वाणो नियमान्केवलान्भजन्॥4.204॥
नियमों का पालन नित्य न करे तो भी यमों का सेवन सदा करना चाहिये। केवल नियमों का सेवन करके ही यम न करे तो वह नीचे गिरता है। 
If one finds it difficult to follow rules-dictates discussed in the scriptures, he must follow the restraints for healthy, virtuous living. However, if one just follow rules but discards the restraints, he falls into lower categories of humans, organisms,m in next-coming births.
Please refer to :: (1).  SALVATION: मोक्ष साधना(2). SALVATION मोक्षsantoshsuvichar.blogspot.com  
नाश्रोत्रियतते यज्ञे ग्रामयाजिकृते तथा। 
स्त्रिया क्लीबेन च हुते भुञ्जीत ब्राह्मणः क्वचित्॥4.205॥
जिस यज्ञ में वैदिक ब्राह्मणों का अभाव हो और मूर्ख पुरोहित या अन्य मनुष्यों द्वारा गया हो, जिस यज्ञ में स्त्री या नपुंसक ने हवन किया हो, उस यज्ञ में ब्राह्मण कदापि भोजन न करे। 
A Brahmn must not dine at a Yagy-Hawan-Holy sacrifice in fire which is not attended by learned-Vaedic Brahmns, conducted by ignorant-idiot priest, other people, women or eunuchs-important.
अश्लीकमेतत्साधूनां यत्र जुह्वत्यमी हविः। 
प्रतीपंमेतद्देवानां तस्मात्तत्परिवर्जयेत्॥4.206॥
इस प्रकार पूर्वोक्त याजक स्त्रियाँ आदि जिस यज्ञ में हवन करती हैं, वह सज्जनों के लिये अमंगलकारी तथा देवताओं के प्रतिकूल होता है। इसलिए ऐसा होम नहीं करना चाहिये। 
The Yagy which is conducted by the above category of people and is performed by the women is inauspicious for the virtuous people and against the demigods. Therefore, such Hawan should not be held.
This is the period in which women guided by the communists, seculars are bent upon defying the laws described by Manu Smrati. Some politically motivated imprudent women, are demanding such things which are against the religion, culture, values, ethics. Their minds have been washed off. They do not believe in the institution of marriage, as well.
Worst of all the Supreme Court judges do not mind pocking their nose in these silly affairs.
मत्तक्रुद्धातुराणां च न भुञ्जीत कदाचन। 
केशकीटावपन्नं च पदा स्पृष्टं च कामतः॥4.207॥
क्षुब्ध, क्रोधी और रोगियों का अन्न कभी न खायें। जिस अन्न में केश और कीड़े पड़ गए हो, जो अन्न जानकर पैरों से छुआ गया हो, वह न खाया जाये। 
One should not eat the food offered by a disturbed, angry or sick person. The food which has insects or hair in it or touched with feet knowingly-intentionally, should never be eaten.
The woman who cook food should be extremely careful while cooking. She should tie her hair and cover her head with cloth. Food infested with insects has larvae-eggs of insects which are sure to grow and cause stomach trouble. However, the woman of today summarily reject these postulates as rubbish, without understanding logic-scientific reason behind them.
There was a time when dough was prepared by the feet for cooking in jails and the bakery owners adopted this practice as a rule.
भ्रूणघ्नावेक्षितं चैव संस्पृष्टं चाप्युदक्यया। 
पतत्रिणावलीढं च शुना संस्पृष्ट मेव च॥4.208॥
जो अन्न भ्रूण हत्यादि करने वालों से देखा गया हो, रजस्वला से छू गया हो, कौए आदि पक्षियों से जूठा हो गया हो या कुत्ते से छू गया गया हो, वह अन्न न खाये। 
One should not eat the food seen by the person who abort the child, the woman having periods-menstruating woman, eaten by birds like crow-meat eaters or touched by the dog. 
Entry of dog is prohibited at a place where the food is cooked. Menstruating women are not allowed to enter the kitchen or see Tulsi-Basil plant.
This entire treatise is meant for those who are rational, thoughtful, open minded and posses scientific attitude & aptitude. People with blocked-choked brains cannot understand the logic behind this.
गवां चान्नमुपघ्रातं घुष्टान्नं च विशेषतः। 
गणान्नं गणिकाSन्नं च विदुषां च जुगुप्सितम्॥4.209॥
जिस अन्न को गौ ने सूँघा हो, "कौन भोजन करना चाहता है"? ऐसा पूछकर जो अन्न दिया गया हो, शठ, ब्राह्मणों के गणों का और वेश्या का अन्न और विद्वानों द्वारा निन्दित, अन्न न खाय। 
The food which has been smelled by the cow, served after enquiring who wants to eat, belonging to rogues, servants of Brahmns, prostitutes-harlots and rejected by the enlightened-learned should not be eaten.
शठ :: शातिर,  दुष्ट, चालाक, मक्कार,  कुटिल, शैतान, चतुर, दक्ष, शातिर, चालू, बेईमान, कपटी, असत, प्रवंचक, ढीला, मिथ्या, छलिया, झूठा, ढोंगी, धूर्त, दुर्जन; roguish, crafty, wicked, astute, cunning, dishonest, deceitful, fraudulent, rascal. 
स्तेनगायनयोश्चान्नं तक्ष्णो वार्धुषि कस्य च। 
दीक्षितस्य कदर्यस्य बद्धस्य निगडस्य च॥4.210॥
चोर, गवैये, बढ़ई, और सूद खाने वालों का अन्न न खाया जाये। यज्ञ की दीक्षा लिये हुये यजमान का दिया हुआ हवन के पूर्व का अन्न, कृपण का अन्न और कैदी का अन्न न खाये। 
One should not eat the food offered by a thief, singer-musician, a miser, carpenter, prisoner, narrow minded, niggardly, penurious, skinflint or the food offered by the host prior to performing the Hawan (Yagy, Agnihotr, holy sacrifice in fire).
अभिशस्तस्य षण्ढस्य पुँश्चल्या दाम्भिकस्य च। 
शुक्तं पर्युषितं चैव शूद्रस्योच्छिष्टमेव च॥4.211॥
जनापवाद से दूषित, नपुंसक, व्याभिचारिणी और कपट धर्मचारी अर्थात वैडालव्रतिक आदि का, अन्न न खाया जाये। सिरका, बासी अन्न और शूद्र का उच्छिष्ट अन्न न खाय। 
One should never eat food from a person blamed of moral turpitude, hermaphrodite (impotent, eunuch), a characterless woman, a hypocrite-one earning through dubious means. Vinegar, stale food and left over food of the the Shudr should not be eaten.
Vinegar is obtained through fermentation and fungus, insects grow in the sugar cane juice from which vinegar is prepared. Most of the bakery items cause obesity and has been banned in schools in Europe. Indians have a tendency to copy whatever is happening abroad, including vulgarity, nudity.
चिकित्सकस्य मृगयोः क्रूरस्योच्छिष्टभोजिनः। 
उग्रान्नं सूतिकान्नं च पर्याचान्तमनिर्दशम्॥4.212॥
वैद्य, व्याध, क्रूर व्यक्ति का, जूठन खाने वाले का, भयङ्कर कर्म करने वाले का और सूतिका के लिये तैयार किया हुआ अन्न न खाये।  एक पंक्ति में बैठकर खाने वालों में किसी ने यदि आचमन कर लिया हो तो शेष और अशौचान्न न खायें। 
The food offered by a doctor-surgeon, a hunter-bird catcher, a cruel person, one who perform devilish jobs and the food meant for the woman who has given birth to a child or one who eats left over food of others, should never be eaten. If some one sitting in a row for eating food in a function (Shraddh-Homage to Pitre-Manes) or some ceremony and has washed his hands after taking food, priors to all others; others should stop eating at once.
In India food used to be served to guests when they sat in rows or columns. The entire group used to keep waiting till each and every one had finished eating.
अनर्चितं वृथामांसमवीरायाश्च योषितः। 
द्विषदन्नं नगर्यन्नं पतितान्नमवक्षुतम्॥4.213॥
सम्मान पूर्वक जो अन्न न दिया गया हो, वृथा माँस-मिठाई (जो देवता, पितरों को समर्पित न किया गया हो) अबीरा (पुरोहित स्त्री) का अन्न, शत्रु का अन्न, नगर में मिलने वाला अन्न, पतित का अन्न तथा जिस अन्न पर किसी ने छींक दिया हो वह अन्न न खाये। 
The food which has not been offered with due regards-respect, excess-extra meat which has been left over unoffered to demigods-deities, food from the wife of the priest, food grain from the enemy, grain offered in the cities or the depraved, the food contaminated by sneezing should never be eaten.
पिशुनानृतिनोश्चान्नं क्रतुविक्रयिणस्तथा। 
शैलूषतुन्नवायान्नं कृतघ्नस्यान्नमेव च॥4.214॥
चुगली खाने वाले, झूठ बोलने वाले, यज्ञ विक्रयी अर्थात यज्ञ का फल आपको मिले यह कहकर धन जमा करने वाले, नट, दर्जी  और कृतघ्न; इनका अन्न नहीं खाना चाहिये।
One should not eat the grain-food offered by a back biter-informer, liar, one who sells the reward of performing a Yagy-sacrifice, acrobat, tailor, ungrateful person. 
नट :: कलाबाज़, करतबी, (लोगों के मनोरंजन के लिए) शरीर को प्रकार से मोड़ने वाला मनुष्‍य, तने हुए रस्से पर नाचने वाला; contortionist, acrobat, posture-maker, rope dancer-walker, roper, equilibrist, rope drive, distortionist.
कर्मारस्य निषादस्य रङ्गावतारकस्य च। 
सुवर्णकर्तुर्वेणस्य शस्त्रविक्रयिणस्तथा॥4.215॥
लोहार, केवट, रङ्गोपजीवी, सुनार, बाँस वाला और हथियार बेचने वाले का अन्न नहीं खाना चाहिये। 
One should not eat the food offered by a black smith, gold smith, boat driver-boat man, ferryman, stage artist-dramatist (film actors, actresses), bamboo dealer-seller, arms dealer-seller.
श्ववतां शौण्डिकानां च चैलनिर्णेजकस्य च। 
रञ्जकस्य नृशंसस्य यस्य चोपपतिर्गृहे॥4.216॥
कुत्ता पोसने वाले, मद्य बेचने वाले, धोबी, रंगरेज, निर्दय और जिसके घर में उपपति अर्थात परस्त्री गामी पुरुष हो, इन सबका अन्न न खाये। 
One should not eat the food offered by dog trainer, wine seller, washer man, cloth dyer, cruel person and the woman who keeps her paramour in her house.
मृष्यन्ति ये चोपपतिं स्त्रीजितानां च सर्वशः। 
अनिर्दशं च प्रेतान्नमतुष्टिकरमेव च॥4.217॥
घर पत्नी के उपपति को जानकर भी जो सहन करते हैं, जो स्त्री के वशीभूत हैं, उनका और मृताशौच का अन्न जो तृप्तिकारक न हो,  उस अन्न को न खाया जाये। 
One should not eat the food offered by those who tolerate the paramour of their wife in their house in spite of full knowledge, those who are under the control of their wife, those having impurity on account of death in the family and the food which is unpalatable.
राजान्नं तेज आदत्ते शूद्रान्नं ब्रह्मवर्चसम्।  
आयुः सुवर्णकारान्नं यशश्चर्मावकर्तितः॥4.218॥
राजा का अन्न तेज को, शूद्रान्न ब्रह्मतेज को, सुनार का अन्न आयु को और चमार का अन्न यश को नष्ट करता है। 
The food offered by the king reduces vigour, energy, ascetic powers, food accepted from the Shudr destroys the Brahmn Tej-Aura acquired through staunch meditation-Yog, food from goldsmith reduces age and the food from  leather worker, Chamar-cobbler reduces the honour, fame, good will of one who eats it.
कारुकान्नं प्रजां हन्ति बलं निर्णेजकस्य च। 
गणान्नं गणिकान्नं च लोकेभ्यः परिकृन्तति॥4.219॥
सूपकारादि का अन्न सन्तानों को और धोबी का अन्न बल को नष्ट करता है। गणों का और गणिकाओं का अन्न स्वर्गादि लोकों से विरत करता है। 
The food of an artisan destroys the offspring, that of a washer man destroys the physical strength; the food of a multitude and of harlots excludes one from the higher abodes, if he happen to consume it. 
पूयं चिकित्सकस्यान्नं पुंश्चल्यास्त्वन्नमिन्द्रियम्। 
विष्ठा वार्धुषिकस्यान्नं शस्त्रविक्रयिणो मलम्॥4.220॥
चिकिसक का अन्न पीव, पुंश्चली का अन्न वीर्य, सूद खाने वाले का अन्न विष्ठा और शस्त्र बेचने वाले का अन्न मल के समान होता है।  
The food received from a medical practitioner is like vile-pus, that from an unchaste woman is like sperms-semen, that of a money lander is like faecal matter and the food from the arm dealer is like excreta. 
पुंश्चली :: फ़ाहिशा, दुश्चरित्र स्त्री, कुलटा, व्यभिचारिणी, कुटिल और भ्रष्ट स्त्री; woman of loose character, unchaste woman,  stripper, amorous.
य एतेऽन्ये त्वभोज्यान्नाः क्रमशः परिकीर्तिताः। 
तेषां त्वगस्थिरोमाणि वदन्त्यन्नं मनीषिणः॥4.221॥
जिन-जिनका अन्न खाना निषिद्ध बताया गया है तथा अन्य व्यक्ति जिनका अन्न अभोज्य है, उनका अन्न चमड़े, हड्डी और रोग के बराबर है, ऐसा विद्वान कहते है। 
The learned-enlightened opines that the food of other categories of persons who have been successively enumerated before should not be eaten, being impure, contaminated, inauspicious. It is equated with eating of skin, bones and hair.
भुक्त्वातोऽन्यतमस्यान्नमसत्या क्षपणं त्र्यहम्। 
मत्या भुक्त्वाSSचरेत्कृच्छ्रं रेतोविण्मूत्रमेव च॥4.222॥
अतएव इनमें से किसी का अन्न अज्ञानता वश खाने पर तीन दिन उपवास करे और जानकर खाय तो कृच्छ्व्रत करे। वीर्य, विष्ठा और मूत्र खाने से भी यही प्रायश्चित करे। 
If one eats the food served by any of these category of people unknowingly-unwittingly, he should observe fast-penance for three consecutive days. If the food is accepted knowingly, he should perform Krachchh Vrat. For swallowing sperms, stools-excreta, urine one should perform these penances.
KRACHCHH VRAT कृच्छ चान्द्रायण व्रत ::  (1). पिपीलिका मध्य चान्द्रायण, (2). यव मध्य चान्द्रायण,  (3). यति चान्द्रायण और (4). शिशु चान्द्रायण। इन चारों में ही 240 ग्रास भोजन एक महीने में करना पड़ता है। पिपीलिका मध्य चान्द्रायण वह है, जिसमें पूर्णमासी का 15 ग्रास खाकर क्रमशः एक-एक ग्रास घटाते हैं और अमावस्या व प्रतिपदा को निराहार रहकर दोज से एक-एक ग्रास बढ़ाते हुए पूर्णिमा को पुनः 15 ग्रासों पर जा पहुँचते हैं। 
प्रायः पापं विजानीयात् चित्तं वै तद्विषोधनम्। 
प्रायोनाम् तपः प्रोक्तं चित्तं निश्चय उच्यते॥
प्रायश्चित शब्द प्रायः और चित्त शब्दों से मिलकर बना है। इसके दो अर्थ होते हैं। प्रायः का अर्थ है पाप और चित्त का अर्थ है शुद्धि। अतः प्रायश्चित का अर्थ है, पाप की शुद्धि। प्रायः का अर्थ है तप और चित्त का अर्थ है निश्चय। अतः प्रायश्चित्त का अर्थ हुआ, तप करने का निश्चय।
यह शास्त्र विहित वह कृत्य है जिसके करने से मनुष्य के पाप छूट जाते हैं। अर्थात जिस अनुष्ठान के द्वारा किए हुए पाप का निश्चित रूप से शोधन हो उसे प्रायश्चित्त कहते हैं। जैसे साबुन से वस्त्र की शुद्धि होती है वैसे ही प्रायश्चित्त से पापी की शुद्धि होती है।
वेद द्वारा विहित धर्म एवं उससे विरुद्ध अधर्म है। धर्म के आचरण से पुण्य तथा अधर्म के आचरण से पाप होता है। पुण्य से इष्ट साधन एवं पाप से अनिष्ट की प्राप्ति होती है।[जैमिनि]
शास्त्रों में भिन्न भिन्न प्रकार के कृत्यों का विधान है। किसी पाप में व्रत का, किसी में दान का, किसी मे व्रत और दान दोनों का विधान है। लोक में भी समाज के नियम विरुद्ध कोई काम करने पर मनुष्य को समाज द्वारा निर्धारित कुछ कर्म करने पड़ते हैं, जिससे वह समाज में पुनः व्यवहार योग्य होता है। इस प्रकार के कृत्यों को भी प्रायश्चित कहते हैं।
देश, काल और पातकी की परिस्थिति के अनुकूल प्रायश्चित्त होना चाहिए। बालक, वृद्ध, स्त्री और आतुर को आधा प्रायश्चित्त विहित हैं। पाँच वर्ष की अवस्था तक प्रायश्चित्त का विधान नहीं है। पाँच से पौने बारह वर्ष तक चौथाई प्रायश्चित्त है और यह प्रायश्चित्त बालक के पिता या गुरु को करना चाहिए। बारह से सोलह वर्ष तक आधा और सोलह से अस्सी वर्ष तक पूरा प्रायश्चित्त का विधान है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र को क्रमश: पूरा, आधा, तीन भाग और चौथाई प्रायश्चित्त करना चाहिये। ब्रह्मचारी को द्विगुणित, वानप्रस्थी को त्रिगुणित और यति को चतुर्गुणित प्रायश्चित्त करना चाहिए। प्रायश्चित्त करने में विलंब करना अनुचित है। आरंभ के पूर्वदिन सविधि क्षौर, स्नान और पंचगव्य का प्राशन करना चाहिए।  
FOOD-अन्न :: जैसा खाओ अन्न, वैसा होगा मन। 
(1). A sage had to dine with the jail superintendent. As soon as he had the first bite, he was shocked and stopped eating and asked the jailer to call the cook. The jailer was astonished and asked the reason. The sage said that the cook was weeping bitterly, while cooking. The jailer had faith in the sage and called the prisoner who cooked the meals. The sage asked him the reason for being in the jail. The prisoner replied that he was innocent & was convicted of murder and was sure to be hanged. After a while the sage asked he jailer to request the reopening of the case and desired thorough investigation. The matter was proved beyond doubt that the prisoner was really innocent and was later freed following due procedure. (This is real life story.)
(2). Nanak Dev an incarnation of Rishi Durvasa refused to eat the food offered by the tribal leader and preferred to eat the bread of a peasant. The head got curious and asked the reason. Nanak Dev asked for the breads from the kitchen of both. The breads were squeezed. Tribal head's bread yielded blood while that of the peasant yielded milk.
Some one called the author Durvasa, while visiting LIC for depositing installments of Life Insurance premium. Having analysed thoroughly the whole life till today, at 68, there is no doubt that some of the traits of Durvasa Rishi & Nanak Dev are present in me. Nanak was an incarnation of Durvasa & Durvasa is an incarnation of Bhagwan Shiv. I have been blessed by Bhagwan Shiv by his Bhakti-devotion.
(3). Nanak Dev's followers called Sikh, Shishy, Disciples-students started the concept of community kitchen and langar for the poor, down trodden. Langar is a form of Prasad-offering in the form of food, offered by the devotees. Its well known that most of the people visit religious places to get rid of the suffering and make donations in the chest of the institution. Some of the money is used for cooking Prasad. The scriptures state that Prasad equivalent to a rice is enough. If one get more of it, he should distribute it amongest as many people as possible. Ambanis, Bachchans, Amar Singh, Ambanis and the like make fatty donations in the temples. The money is impure, earned through evil-dubious means. Thus the sins of the high, mighty, rich reach the poor, who is already suffering, to prolong his suffering. The motor part dealers of Kashmiri Gate offer money in the chest of Gurudwaras periodically. They buy components at lowest rates and sell them at a price 10 times higher than the initial price. Most of the parts sold by them are duplicate-fake and the vehicle stops working after a few days.
(4). One used to eat 4-5 walnuts (अखरोट) distributed by the colleague teachers after visiting Vaeshno Devi temple, in the school. One day by chance, father in law told that the Prasad should to minimum, equivalent to the rice grain for eating. The gist had been grasped and followed till today.
(5). It a sad commentary. One had to dine in the Guru Dwara recently, at Astral-NSW, Australia; twice or thrice. Money equivalent to the cost was put in the chest. When it happened the fourth time, one had to refuse flatly. Its prayed that the Almighty will absolve-pardon, since this was not deliberate. Its an established fact that the Sikh terrorists are operating through Guru Dwaras throughout the world.
नाद्याच्छूद्रस्य पक्वान्नं विद्वानश्राद्धिनो द्विजः। 
आददीताममवास्मादवृत्तावेकरात्रिकम्॥4.223॥
विद्वान ब्राह्मण को श्राद्धादि पञ्चयज्ञ के अनधिकारी शूद्र का पक्वान्न भी नहीं खाना चाहिये। किन्तु खाने की कोई वस्तु  न मिलने पर एक रात के निर्वाह योग्य कच्चा अन्न उससे ले ले। 
The learned Brahmn should not eat the cooked food-delicacies offered by a Shudr, who is not entitled for performing homage rites in the form of Panch Yagy-five sacrifices in holi fire. However, he may accept uncooked food grain sufficient just for spending one night for subsistence.
श्रोत्रियस्य कदर्यस्य वदान्यस्य च वार्धुषेः। 
मीमांसित्वोभयं देवाः सममन्नमकल्पयन्॥4.224॥ 
एक वेद पढ़ा हुआ है पर कृपण है, दूसरा दाता है पर बुद्धिजीवी है; देवताओं ने इन दोनों के गुण-दोषों पर विचार कर दोनों के अन्न को तुल्य बताया। 
The demigods compared the merits-demerits, characterises, qualities, traits of a skinflint-narrow minded, niggardly, penurious, who has learnt the Veds and the other person who donates freely and earns through intellectual means i.e., by using his intellect-brain and declared that the  food of both of these is comparable for accepting for eating.
तान्प्रजापतिराहैत्य मा कृध्वं विषमं सम्। 
श्रद्धापूतं वदान्यस्य हतमश्रद्धयेतरत्॥4.225॥
तब ब्रह्मा जी ने उन देवताओं से कहा कि इन विषम अन्नों को सम मत बनाओ, क्योंकि दाता का श्रद्धा से दिया गया अन्न पवित्र होता है, जबकि कृपण का अश्रद्धा से दिया गया अन्न दूषित होता है। 
Brahma Ji asked the demigods not to equalise the quality of the food offered by a niggardly and an intellectual, since the food offered by the donor had faith in the Almighty, while the niggardly lacked respect for the God.
श्रद्धयेष्टं च पूर्तं च नित्यं कुर्यादतन्द्रितः।
श्रद्धाकृते ह्यक्षये ते भवतः स्वागतैर्धनैः॥4.226॥
इसलिये इष्ट (अग्निहोत्र-यज्ञ, पूर्णमास, चातुर्मास) और पूर्त दोनों कर्मों को सदा आलस्य रहित होकर श्रद्धा पूर्वक करना चाहिये। न्यायोचित धन से श्रद्धा द्वारा किये गए ये दोनों शुभ कार्य मोक्ष के कारण होते हैं। 
Veds have described two types of Karm which one should do with faith-devotion without laziness. The first is Isht Karm that includes Yagy as daily routine, monthly practice and after the completion of 4 months. Purt Karm are social-religious activities pertaining to digging of wells, water bodies for storage etc. However, one should utilise the money by earning it through honest, virtuous, pious means and offer happily with faith in the Almighty. These two practices leads one to Salvation-assimilation in the God, Moksh, freedom from rebirth.
दानधर्मं निषेवेत नित्यमैष्टिकपौर्तिकम्। 
परितुष्टेन भावेन पात्रमासाद्य शक्तितः॥4.227॥ 
यज्ञ और पूर्त सम्बन्धी दान-धर्म सत्पात्र को पाकर सदा प्रसन्न मन से यथाशक्ति करना चाहिये। 
One should donate freely-open heartedly-happily as per his capability for sacrifices in holy fire i.e., Yagy (Hawan, Agnihotr, sacrifices in holy fire) or construction of garden, inn, temple, roads, hospitals, water reservoirs, community center or some religious activity if he finds a suitable-deserving person performing that job etc.
पूर्त :: पूरी तरह से भरा हुआ, छाया या ढका हुआ, आवृत्त, पालित, रक्षित, पूर्णता,  खोदने अथवा निर्माण करने का कार्य; पुष्करिणी, सभा, वापी, बावली, देवगृह, आराम बगीचा, सड़क, देवगृह, वापी आदि का बनवाना जो धार्मिक दृष्टि से उत्तम कर्म माना गया है; construction of garden, inn, temple, roads, hospitals, water reservoirs, community center etc. for religious purpose.
यत्किञ्चिदपि दातव्यं याचितेनानसूयया। 
उत्पत्स्यते हि तत्पात्रं यत्तारयति सर्वतः॥4.228॥ 
किसी के याचना करने पर जो कुछ हो सके उसे श्रद्धा पूर्वक (सत्पात्र को) देना चाहिये, क्योंकि दानशील पुरुष के पास किसी दिन ऐसा पात्र-अतिथि भी आ जाता है, जो उसका सब पापों से उद्धार कर देता है। 
One should oblige-donate happily on being requested by some one-needy, since occasionally someone comes to the person who donates happily, who can liberate him from all sins.
वारिदस्तृप्तिमाप्नोति सुखमक्षय्यमन्नदः। 
तिलप्रदः प्रजामिष्टां दीपदश्चक्षुरुत्तमम्॥4.229॥
 प्यासे को पानी देने वाला तृप्त होता है, भूखे को अन्न देने वाला सुख पाता है, तिल दान करने वाला अभिलक्षित सन्तान और दीप दान केरे वाला, उत्तम नेत्र प्राप्त करता है। 
One who quench the thirst of the thirsty, gets contentment-satisfaction, one who feed the hungry gets comforts, one who offer-donate sesame gets the desired progeny and the one who donates a lamp is to get excellent eyes. 
भूमिदो भूमिमाप्नोति दीर्युमार्हिरण्यदः। 
गृहदोऽग्र्याणि वेश्मानि रूप्यदो रूपमुमत्तम्॥4.230॥
भूमि देने वाला भूमि, स्वर्ण देने वाला दीर्घ आयु, गृह उत्सर्ग करने वाल उत्तम भवन और चाँदी दान करने वाला सुन्दर रूप पता है। 
One who donate land gets more land, one who donate gold gets long life-age, one who gives house gets excellent palace and one who donate silver gets beautiful-exquisite body.
वासोदश्चन्द्रसालोक्यमश्विसालोक्यमश्वदः। 
अनडुहः श्रियं पुष्टां गोदो ब्रध्नस्य विष्टपम्॥4.231॥
वस्त्र दाता चन्द्र लोक, घोड़ा दान करने वाला अश्विलोक, वृषभ का दाता लक्ष्मी, गोदान करने वाला सूर्य लोक पाता है। 
Cloth donor goes to abode of Moon, horse donor gets the abode of Ashwani Kumars, donor of bull gets wealth-money and the donor of cows goes to the aboard of Bhagwan Sury-Sun.
यानशय्याप्रदो भार्यांमैश्वर्यंभयप्रदः।
धान्यदः शाश्वतं सौख्यं ब्रह्मदो ब्रह्मसार्ष्टिताम्॥4.232॥
रथ और पलंग का दाता पत्नी को, अभयदाता ऐश्वर्य को, अन्नदाता चिरस्थायी सुख को और वेद की शिक्षा देने वाला ब्रह्मतुल्य गति को प्राप्त होता है। 
One who grants chariot or a bed gets a wife, the protector-defender gains comforts-luxury, food donor gets everlasting pleasure and one who teaches Veds, gets abodes like that Brahma Ji's i.e., Brahm Lok. One who is entitled to Brahm Lok may assimilate in the Almighty.
Teaching of Veds is not enough. Rote memory, cramming remembering in not enough,. One should know the gist, exact meaning, applicability in real life; for social welfare is essential. Only that enlightened who has grasped Veds can do it, non else. Mere word by word translation is not enough. At points Veds becomes symbolic, gives formulation and leave it to one to find theme.
सर्वेषामे व दानानां ब्रह्मदानं विशिष्यते। 
वार्यन्नगोमहीवासस्तिलक ञ्चनसर्पिषाम्॥4.233॥
जल, अन्न, गौ, पृथ्वी, वस्त्र, टिल, सोने और घी आदि सब दानों में वेद का दान सबसे बढ़कर है। 
The teaching of  Veds surpasses all other gifts-offerings-donations like water, food grain, cows, land, clothes, sesamum, gold or clarified butter.
येन येन तु भावेन यद्यद्दानं प्रयच्छति। 
तत्तत्तेनैव भावेन प्राप्नोति प्रतिपूजितः॥4.234॥
जिस-जिस भाव से जिस फल की इच्छा कर जो-जो दान करता है, जन्मान्तर में सम्मानित होकर वह उन-उन वस्तुओं को उसी भाव से पाता है। 
One who donate the goods to others with specific desires and the feeling-sentiment behind the donation leads to receiving all these good back in next incarnations with the same feeling attached with which he donated the goods.
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In fact its cyclic in natures. Do good have good. If one just donate without any feeling or desire attached with it, do not seek any reward from the God, he just perform it, as his pious job-duty, he inches towards the Almighty-Ultimate. Do the virtuous, righteous, pious acts and offer the result of this Karm to the Almighty. Salvation is must.
योऽर्चितं प्रतिगृह्णाति ददात्यर्चितमेव च। 
तावुभौ गच्छतः स्वर्गं नरकं तु विपर्यये॥4.235॥
जो दाता आदर से प्रतिग्राही को दान देता है और प्रतिग्राही आदर से उस दान को ग्रहण करता है, वे दोनों स्वर्ग जाते हैं। इसके उलटा अपमान से दान देने वाला और दान लेने वाला दोनों नरक में जाते हैं। 
The donor who donates respectfully and the acceptor who too accepts it with due regard-honour goes to the heaven, while both go to the hell if the donor gives it with insult-contempt and the receiver too receive it with contempt-dishonour.
न विस्मयेत तपसा वदेदिष्ट्वा च नानृतम्। 
नार्तोऽप्यपंवदेद्विप्रान्न दत्त्वा परिकीर्तयेत्॥4.236॥
तपस्या करके आश्चर्य ने करे, यज्ञ करके झूँठ न बोले, विप्रों से पीड़ित होने पर भी उनकी निंदा ने करे और दान करके लोगों में उसकी ख्याति ने करे। 
One should not be surprised having completed ascetics, austerities successfully. He should not tell lies after the completion of Yagy. He should not condemn even though rebuked by the Brahmns. One should never tell anyone else about the charity, donations made by him. 
The learned Brahmn will inform, ask his Yajman-host, if anything goes wrong during the ascetic practices, charity, Yagy by him. One should never feel irritated by that and try to correct his actions at the earliest.
यज्ञोऽनृतेन क्षरति तपः क्षरति विस्मयात्। 
आयुर्विप्रापवादेन दानं च परिकीर्तनात्॥4.237॥
यज्ञ झूँठ बोलने से, तप आश्चर्य करने से, आयु ब्राह्मण की निंदा करने से, दान लोगों के आगे कहने से क्षीण होता है। 
The value, importance, credit of performing a Yagy is reduced-lost by telling lies-falsehood. Expressing surprise, reduces the intensity of ascetic practice-austerities. Condemnation-rebuking a Brahmn reduces the longevity. The credit of having made donations, become null and void after disclosing it or boasting about it.
धर्मं शनैः सञ्चिनुयाद्वल्मीकमिव पुत्तिकाः। 
परलोकसहायार्थं सर्वभूतान्यपीडयन्॥4.238॥
अन्य किसी भी प्राणी को पीड़ा ने देकर अपना परलोक सुधारता हुआ अपनी शक्ति के अनुसार धीरे-धीरे धर्म संचय करे। जैसे दीमक धीरे-धीरे मिट्टी की दीवार खड़ी करती है। 
One should endeavour to improve his next incarnations-births slowly and gradually without teasing, harming, troubling the other organism according to his own calibre-capacity, just like the termite which erects  a wall of mud-clay.
नामुत्र हि सहायार्थं पिता माता च तिष्ठतः। 
न पुत्रदारा न ज्ञातिर्धर्मस्तिष्ठति केवलः॥4.239॥
परलोक में कोई सहायता नहीं करता चाहे वो माँ, बाप, स्त्री, पुत्र या हितकर-परिजन हो; केवल धर्म ही सहायक होता हे। इसलिये यत्न पूर्वक धर्म संचय करना चाहिये। 
No one i.e., father, mother, son, wife, relatives, friends or  the well wishers; come to the rescue-helps in the other abodes. Its only the Dharm-virtues, donations, honesty, piousness, devotion to the Almighty, help extended to others which helps one in the next abodes.
एकः प्रजायते जन्तुरेक एव प्रलीयते। 
एकोऽनुभुङ्क्ते सुकृतमेक एव च दुष्कृतम्॥4.240॥
यह जीव अकेला आता है और अकेला ही जाता है और अकेला ही पुण्य-पाप का फल भोगता है। 
The soul comes alone departs alone and bears the impact of the virtues or the sins done by him alone, in successive births.
The creator brings the organism together to get punishment for their sins or reward for their virtues at the common place.
MANU SMRATI (3) मनु स्मृति :: ब्राह्मण वृत्ति-धर्म santoshkipathshala.blogspot.com
मृतं शरीरमुत्सृज्य काष्ठलोष्टसमं क्षितौ। 
विमुखा बान्धवा यान्ति धर्मस्तमनुगच्छति॥4.241॥
मृत शरीर-लाश को काठ और ढेले की तरह धरती पर छोड़कर बंधू-बान्धव लोग मुँह फेरकर चले जाते हैं, केवल धर्म ही उसके पीछे-पीछे जाता है। 
The friends, relatives, well wishers abandon the dead body as if it is a piece of clod of earth, clay-mould or a wooden log and moves away-depart. Its only the Dharm which follows him to the next abodes and let him prepare for Salvation.
तस्माद्धर्मं सहायार्थं नित्यं संचिनुयाच्छनैः। 
धर्मेण हि सहायेन तमस्तरति दुस्तरम्॥4.242॥
इसलिए अपनी सहायता के लिये धर्म का संग्रह अवश्य करना चाहिये। धर्म की सहायता से ही पुरुष घोर तम को पार करता है। 
This is the reason why one should follow the tenets of Dharm and accumulate virtues, piousity, righteousness. Failure to do so lead one to absolute darkness.
धर्मप्रधानं पुरुषं तपसा हतकिल्बिषम्। 
परलोकं नयत्याशु भास्वन्तं खशरीरिणम्॥4.243॥
तपस्या से जिसका पाप नष्ट हो चुका है, ऐसे धर्म प्रधान ब्रह्म स्वरूप पुरुष को धर्म, ब्रह्म लोक की प्राप्ति करता है। 
One who has burnt all his sins by virtue of asceticism, austerities, Yog, meditation, helping the deserving needy, is sure to reach the abode of the creator Brahma Ji, from where he will reach the Ultimate abode when Brahma Ji will merge-assimilate with the Almighty, if he continues his endeavours of devotion to the Almighty there as well. Otherwise, on completion of the pious deeds there he will return to earth to get birth in learned, enlightened, pious families.
उत्तमैरुत्तमैर्नित्यं संबन्धानाचरेत्सह। 
निनीषुः कुलं उत्कर्षंमधमानधमांस्त्यजेत्॥4.244॥
वंश को उन्नत करने की इच्छा रखने वाला पुरुष अच्छे कुल, शील, विद्या, आचार वालों के साथ विवाहादि सम्बन्ध करे, पर नीचों के साथ कभी सम्बन्ध में करे। 
One who want to promote his clan-wish the progress of his progeny, should enter into marital alliance-form connexions, with only that family which is respectable, revered, educated, virtuous. He should discard the wretched, disgraced families.
CONNEXIONS ::  संसर्ग, समास, कड़ी, जोड़, मेल, लगाव, संबंध, संयोग, संयोजन, संश्रय; alliance, relations.  
उत्तमानुत्तमान् गच्छन्हीनांश्च वर्जयन्। 
ब्राह्मणः श्रेष्ठतामेति प्रत्यवायेन शूद्रताम्॥4.245॥
हीन सम्बन्ध को त्याग कर, उत्तम पुरुषों के साथ सम्बन्ध करने वाला ब्राह्मण श्रेष्ठता को प्राप्त होता है। किन्तु इसके विपरीत आचरण अर्थात नीचों के साथ सम्बन्ध करने से वह शूद्रता को प्राप्त होता है। 
The Brahmn who always look forward to have relations-marital alliance with dignified-reputed, refined families amongest the Brahmns only, gain superiority-prestige, while one who connects him self with low caste, low moral, virtue less family leads himself to the lowest strata of the society i.e., Shudr.
दृढकारी मृदुर्दान्तः क्रूराचारैरसंवसन्। 
अहिंस्रोदमदानाभ्यां जयेत्स्वर्गं तथाव्रतः॥4.246॥
दृढ संकल्प, कोमल, दान्त, क्रूरकर्म करने वालों के संसर्ग से दूर रहने वाला, किसी को न सताने वाला, ऐसा व्रती पुरुष अपने इन्द्रिय निग्रह और दान से स्वर्ग को जीत लेता है। 
One who is firm-determined, gentle (soft, polite) and patient, shuns the company of the cruel, does no injury to organism-creature, leads to heavens after death, through self control-restraint and charity-donations.
एधोदकं मूलफलमन्नमभ्युद्यतं च यत्। 
सर्वतः प्रतिगृह्णीयान्मध्वथाभयदक्षिणाम्॥4.247॥
लकड़ी, पानी, फल, मूल, कच्चा अन्न, और मधु तथा अभय दक्षिणा बिना माँगे कोई दे तो ग्रहण कर लेना चाहिये। 
One should accept wood, water, fruit, food-roots, uncooked food grain, honey, protection if offered-extended without being requested-asked.
आहृताभ्युद्यतां भिक्षां पुरस्तादप्रचोदिताम्। 
मेने प्रजापतिर्ग्राह्यामपि दुष्कृतकर्मणः॥4.248॥
घर पर लाई हुई, सामने रखी हुई, जो किसी से माँगी न गई हो और न किसी ने पहले उसके देने की बात कही हो, ऐसी भिक्षा पापी की ओर से भी गई हो तो वह ले ले, प्रजापति ने इस दक्षिणा को ग्राह्य कहा है। 
Prajapati Brahma Ji, the creator has directed that the offerings-alms which have been offered at home, placed in front, which have not been requested-begged or no one has ever promised to give it, may be accepted even it comes from a sinner.
The sin does not affect the Brahmn who accepts such alms which have been offered by the sinner. Still the Brahmn must continue devotion prayers to thank the God and express his gratitude. The alms which remain unutilised may then be distributed by him amongest the needy, animals, dogs, crow, ants etc. 
नाश्नन्ति पितरस्तस्य दश वर्षाणि पञ्च च। 
न च हव्यं वहत्यग्निर्यस्तामभ्यवमन्यते॥4.249॥
जो उस भिक्षा का अनादर करता है उसके पितर उसका दिया हुआ कव्य पन्द्रह वर्ष तक नहीं खाते और अग्नि भी उसका हव्य देवताओं के पास नहीं पहुँचाती। 
One who disdain-dishonour such alms i.e., refuse to accept, his Manes (Pitre, deceased ancestors) do not accept his offerings for next 15 years and the fire does not carry his offerings to the demigods-deities.
शय्यां गृहान्कुशान्गन्धानपः पुष्पं मणीन्दधि। 
धानामत्स्यान्पयो मांसं शाकं चैव न निर्णुदेत्॥4.250॥
शय्या, गृह, कुश, गन्ध (चन्दन, कपूर आदि) जल, फूल, मणि, दही, चवैना, साग, मछली और माँस कोई बिना माँगे दे तो उसे अस्वीकार न करे। 
One should not refuse to accept bed-couch, house, Kush grass, scents, water, jewels, curd, roasted gram and barley, vegetables, fish & meat if he is given-offered without being asked. 
One should straight way tell that he is a pure vegetarian if some one ask him to accept fish or meat. If any of these things are surplus with him, he should further distribute them amongest the needy, poor, downtrodden.
गुरून्भृत्यांश्चोज्जिहीर्षन्नर्चिष्यन्देवतातिथीन्। 
सर्वतः प्रतिगृह्णीयान्न तु तृप्येत्स्वयं ततः॥4.251॥
गुरुओं (माता-पिता आदि) और भृत्यों के पोषणार्थ तथा देवता और अतिथियों के पूजनार्थ सबसे (अर्थात शूद्रादि से भी) धन का दान स्वीकार कर ले, किन्तु उस धन का स्वयं उपयोग ने करे। 
One may accept money from the low caste person for supporting the parents, elders, teachers, guests and for performing prayers of the demigods-deities, but should never use that for his personal use.
गुरुषु त्वभ्यतीतेषु विना वा तैर्गृहे वसन्। 
आत्मनो वृत्तिमन्विच्छन्गृह्णीयात्साधुतः सदा॥4.252॥ 
माँ-बाप आदि गुरुजनों के न रहते या उनके जीवित रहते हुए, उनसे पृथक वास करने वाला पुरुष अपने निर्वाह के लिए सदा सज्जन पुरुष से ही दान ले।
One whose parents-elders are not with him or have died-expired or if one is staying away from his parents, he may accept donations-subsistence from gentle man-virtuous person only.
आर्धिकः कुलमित्रं च गोपालो दासनापितौ। 
एते शूद्रेषु भोज्यान्ना याश्चात्मानं निवेदयेत्॥4.253॥ 
खेत जोतने वाला, अनेक कुल का मित्र, गौओं का पालक, टहलू और नाई तथा आत्म समर्पण करने वाला, ये  शूद्रों में भोज्यान्न हैं अर्थात इनका अन्न खाने योग्य है। 
The person who ploughs the fields, family-clan friend, he who serves the cows, servant, the barber and one who has surrendered; are the Shudr categories whose food grain can be accepted by one. 
शूद्र :: पैसे लेकर दूसरों की सेवा-नौकरी करने वाले शूद्र है, गन्दा रहने वाला, स्नान न करने वाला अछूत है, मैला-कुचैला रहने वाला अछूत है;The definition of Shudr given by the dictionary and the translators is totally wrong. Shudr never mean untouchable. Anyone who remain unclean is untouchable. Shudr and slave are two different things. An ignorant, illiterate, unthoughtful who serves others for money sake is a Shudr.
As per scriptures-Shastr, anyone who serves others is a Shudr.
यादृशोऽस्य भवेदात्मा यादृशं च चिकीर्षितम्। 
यथा चोपचरेदेनं तथात्मानं निवेदयेत्॥4.254॥
उपरोक्त शूद्रों की जैसी आत्मा हो, जो करने की इच्छा हो, जिस प्रकार सेवा करनी हो, उस प्रकार शुद्ध भाव से निवेदन करे। 
The Shudr should offer his services as per his wish, desire, mentality, the manner in which he deem it fit, the type of service he wish-chooses to extend, with pure thoughts.
It may be paid, voluntary, free or purely social-community service. One who is merely a Brahmn by caste is no Brahmn unless until he studies scriptures, pray to God, perform Yog, Hawan-Yagy, practice ascetics and observes voluntary fasts. Voluntary celibacy is also essential.
योऽन्यथा सन्तं आत्मानं अन्यथा सत्सु भाषते। 
स पापकृत्तमो लोके स्तेन आत्मापहारकः॥4.255॥ 
जो अपना परिचय साधुजनों को ठीक-ठीक नहीं देता है, कुछ का कुछ कहता है; वह संसार में बड़ा पापी, चोर है क्योंकि वह आत्मा का अपहरण करता है। 
One who do not reveal himself in front of the gentle-revered and hides his real identity, boasts of himself; is a sinner comparable to a thief since he masks, hide soul.
वाच्यर्था नियताः सर्वे वाङ्गूला वाग्विनिःसृताः। 
तांस्तु यः स्तेनयेद्वाचं स सर्वस्तेयकृन्नरः॥4.256॥
सब शब्दार्थ-वाच्यार्थ नियत है, शब्द ही उनका मूल है, शब्दों से ही उनके अर्थों का बोध होता है। इसलिये जो व्यक्ति शब्दों की चोरी करता है, वह सब कुछ चुराने वाला होता है। 
Meaning of all words is fixed-predetermined. The word is at the root of the meaning-interpretation of Veds, scriptures, speech. Therefore, one who misinterpret is a sinner like a thief.
One finds different interpretations with respect to specific words in Sanskrat and different people give different meaning of Sanskrat words. The Britishers and Germans grossly misinterpreted Veds and scriptures. Germans started calling themselves Aryans and changed Swastic to its mirror image and suffered during the two word wars.
The congressmen, communists and the Muslims did their best in giving wrong notations, interpretation and meanings of the scriptures and wrote wrong-biased Indian history. They distorted the facts.The social sites like "Face Book"immediately block the write up-contents, if anyone tries to say something against these grossly distorted writings-versions calling them abusive.They do not justify their action.
महर्षिपितृदेवानां गत्वानृण्यं यथाविधि। 
पुत्रे सर्वं समासज्य वसेन्माध्यस्थ्यं आश्रितः॥4.257॥ 
महर्षि, पितर और देवता इनके ऋण से यथाविधि उत्तीर्ण होकर, गृहस्थी का सारा भार पुत्र पर छोड़कर स्वयं भव्य भाव का अवलम्बन कर घर पर रहे।
One should get rid of the various debts over him by virtue of his birth as a human being. He should hand over the responsibility of homely chores-duties to his son and spend a retired life praying the Almighty, at home.
However, he should do his best to train his offspring to lead a decent life and take care of his parents & the family.
It does not mean that he has to be isolated. His advice, concerns, needs must be met, cared and regarded. In case of need the members of the family should provide him due care including medial felicities. Those who try to copy the western world blindly, are mistaken. One has found virtuous families in America, Australia and elsewhere, caring for their aged parents and grand parents. The ignorant, selfish, self centred, idiotic-ignorant need not be taught all this.
एकाकी चिन्तयेन्नित्यं विविक्ते हितं आत्मनः। 
एकाकी चिन्तयानो हि परं श्रेयोऽधिगच्छति॥4.258॥
निर्जन स्थान-एकान्त में अकेले बैठकर, अपने हित की चिन्ता-आत्मचिन्तन करने वाला पुरुष परम कल्याण-मोक्ष को प्राप्त होता है। 
Now, that one has discharged his household duties and handed over the charge to his son, he should consider his own welfare and sit alone in solitude, at a deserted-isolated-calm & quite place and meditate in such a manner that he ultimately assimilate in the Almighty.
Assimilation in the God-salvation, Moksh is the sole purpose-goal of birth as a human being.
एषोदिता गृहस्थस्य वृत्तिर्विप्रस्य शाश्वती। 
स्नातकव्रतकल्पश्च सत्त्ववृद्धिकरः शुभः॥4.259॥
गृहस्थ ब्राह्मण की यह नित्य की वृत्ति कही गई है और सत्वगुणों को बढ़ाने वाले स्रौतक व्रतों की शुभ विधि का वर्णन हुआ है। 
The probable daily routine for a virtuous, righteous, pious God fearing Brahmn has been described along with the various penances-fasts, which he has to observe while surviving as a household along with the procedure-methodology.
One can find himself that the restrictions imposed upon the Brahmns, makes them superior to anyone else if they observe them in To-To. However, anyone, even a Shudr may try these and attain Moksh. There is no restriction, at all. 
अनेन विप्रो वृत्तेन वर्तयन्वेदशास्त्रवित्। 
व्यपेतकल्मषो नित्यं ब्रह्मलोके महीयते॥4.260॥
वेद शास्त्र का ज्ञाता ब्राह्मण इस आचार का पालन करे, तो सब पापों से मुक्त होकर ब्रह्मलोक में महान उत्कर्ष को पाता है। 
A Brahmn who, has learnt, understood, practices the Veds  scriptures; attain Brahm Lok-the highest heaven and elevated in rank to other souls after the elimination of all sins.
One must remember that Brahm Lok is not Ultimate, after the completions of his reward of virtuous deeds, he will take birth as a human being in some respectable Brahmn family again. Therefore, one must try to attain Salvation by neutralising his sins and the reward of virtuous deeds.
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Thus, by the grace of The Almighty chapter four of Manu Smrati has been presented to the virtuous readers. May the God bless the readers with wisdom, enlightenment and Salvation.
The text has been thoroughly revised and presented to the worthy, virtuous readers by the grace of Maa Saraswati, Bhagwan Ved Vyas and Ganpati Ji Maharaj at Noida, today i.e., 24.10.2019.
Revision of this chapter has been completed today i.e., 16.10.2021, at Noida.
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संतोष महादेव-धर्म विद्या सिद्ध व्यास पीठ 
(बी ब्लाक, सैक्टर 19, नौयडा)

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