Monday, May 4, 2020

YOG योग :: SUN WORSHIP सूर्य नमस्कार

SUN WORSHIP सूर्य नमस्कार 
YOG योग
CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM 
By :: Pt. Santosh Bhardwaj

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 "ॐ गं गणपतये नमः" 
अक्षरं परमं ब्रह्म ज्योतीरूपं सनातनम्। 
गुणातीतं निराकारं स्वेच्छामयमनन्तजम्॥
यह अभ्यास कर्ता को शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ रखता है। सूर्य नमस्कार द्वारा सूरज की वंदना और अभिवादन किया जाता है। सूर्य ऊर्जा का स्रोत माना जाता है। उद्योग करने पर भी यदि समृद्धि न मिले तो मनुष्य स्वयँ को अपमानित न करे। मरते दम तक लक्ष्मी प्राप्ति के लिए प्रयत्न करे, उसे दुर्लभ न समझे। 
भगवान् श्री राम की वानर सेना के भी कई महारथी शहीद हो गए थे। भगवान् श्री हरी विष्णु के अवतार भगवान् श्री राम अपनी आँखों क सामने युद्ध का सारा दृश्य देख रहे थे। तभी ऋषि अगस्त्य द्वारा भगवान् श्री राम को युद्ध भूमि में जाने से पहले सूर्य नमस्कार करने की सलाह दी गई। सम्पूर्ण रूप से सूर्य नमस्कार करने के पश्चात ही श्रीराम दैत्य रावण का वध करने के लिए युद्ध भूमि में उतरे थे।
शरीर के विभिन्न अंग विभिन्न देवताओं के द्वारा संचालित होते है। मणिपुर चक्र (नाभि के पीछे स्थित जो मानव शरीर का केंद्र भी है) सूर्य से संबंधित है। सूर्य नमस्कार के लगातार अभ्यास से मणिपुर चक्र विकसित होता है। जिससे व्यक्ति की रचनात्मकता और अन्तर्ज्ञान बढ़ते हैं। यही कारण था कि प्राचीन ऋषियों ने सूर्य नमस्कार के अभ्यास के लिए इतना बल दिया।
सौर जाल (यह नाभि के पीछे स्थित होता है, जो मानव शरीर का केंद्रीय बिन्दु होता है) को दूसरे दिमाग के नाम से भी जाना जाता है, जो कि सूर्य से संबंधित होता है। ऋषि-मुनि नित्य प्रति सूर्य नमस्कार करने थे। इसका नियमित अभ्यास सौरजाल को बढ़ाता है, जो रचनात्मकता और सहज-ज्ञान युक्त क्षमताओं को बढ़ाने में सहायक होता है। 
इसमें 12 आसन होते हैं। इसे सुबह के समय करना बेहतर होता है। इसके नियमित अभ्यास से शरीर में रक्त संचरण बेहतर होता है, स्वास्थ्य बना रहता है और शरीर रोग मुक्त रहता है। इससे हृदय, यकृत, आँत, पेट, छाती, गला, पैर शरीर के सभी अंगो के लिए बहुत से हैं। सूर्य नमस्कार सिर से लेकर पैर तक शरीर के सभी अंगो को बहुत लाभान्वित करता है। 
ॐ भानवे नमः
जीवन में प्रकाश लेन वाले सूर्य भगवान् को नमस्कार है। इस मंत्र का उच्चारण भगवान् सूर्य के प्रति रौशनी व धरती पर जीवन के लिए कृतग्यता प्रकट करना है। 
सूर्य नमस्कार की प्रक्रिया के दौरान इन मंत्रों की सूर्य की स्तुति में वंदना की जाती है। यह मंत्र सूर्य नमस्कार के लाभों को और अधिक बढ़ा देते हैं। इनका शरीर और मन पर एक सूक्ष्म परंतु मर्मज्ञ प्रभाव पड़ता है। यह 12 मंत्र जो सूर्य की प्रशंसा में गाये जाते हैं इनका सूर्य नमस्कार करने कि प्रक्रिया पर गहरा प्रभाव पड़ता है।
सूर्य नमस्कार के मंत्रो का जिव्हा से उच्चारण कर सकते हैं अथवा मन में भी इन मंत्रो का आवाहन कर सकते हैं।
सूर्य नमस्कार के दो क्रम :- पहला दाएँ पैर के साथ किया जाता है और दूसरा बाएँ पैर के साथ किया जाता है। कम से कम 12 सूर्य नमस्कार प्रतिदिन करने चाहिए। साधक जितना भी सहज तरीके से कर सकते हैं, उतना ही करना चाहिये। यदि 6 सूर्य नमस्कार कर रहे हो तो प्रत्येक नए क्रम में मंत्र का उच्चारण करें। पहला चरण प्रारम्भ करते हुए पहले मंत्र का उच्चारण करें, जब दोनों क्रम पूरे करलें तो दूसरा चरण प्रारम्भ करने से पहले दूसरे मंत्र का उच्चारण करें और आगे बढ़ते रहे। इस तरह से 12 सूर्य नमस्कार के साथ 12 मंत्रों का उच्चारण कर लेंगे।
यदि 12 से कम सूर्य नमस्कार करते हैं, जैसे कि 2 अथवा 4, तो प्रत्येक आसन के साथ हरेक मंत्र का उच्चारण करना चाहिये। प्रत्येक आसन के साथ एक मंत्र का उच्चारण करना चाहिये।
मंत्र क्रम बद्ध सूर्य नमस्कार ::
(1).  प्रणाम आसन ::
ॐ मित्राय नमः। 
सबके साथ मैत्री भाव बनाए रखता है।
दोनों हाथों को जोड़कर सीधे खड़े हों। नेत्र बंद करें। ध्यान आज्ञा चक्र पर केंद्रित करके सूर्य भगवान का आह्वान उपरोक्त मंत्र के द्वारा करें।
(2). हस्तउत्थान आसन ::
ॐ रवये नमः।
जो प्रकाशमान और सदा उज्जवलित है।
श्वास भरते हुए दोनों हाथों को कानों से सटाते हुए ऊपर की ओर तानें तथा भुजाओं और गर्दन को पीछे की ओर झुकाएं। ध्यान को गर्दन के पीछे 'विशुद्धि चक्र' पर केन्द्रित करें।
(3). हस्तपाद आसन 
ॐ सूर्याय नम:।
अंधकार को मिटाने वाला व जो जीवन को गतिशील बनाता है। 
तीसरी स्थिति में श्वास को धीरे-धीरे बाहर निकालते हुए आगे की ओर झुकाएं। हाथ गर्दन के साथ, कानों से सटे हुए नीचे जाकर पैरों के दाएं-बाएं पृथ्वी का स्पर्श करें। घुटने सीधे रहें। माथा घुटनों का स्पर्श करता हुआ ध्यान नाभि के पीछे 'मणिपूरक चक्र' पर केन्द्रित करते हुए कुछ क्षण इसी स्थिति में रुकें। कमर एवं रीढ़ के दोष वाले साधक न करें।
(4). अश्व संचालन आसन
ॐ भानवे नमः।
जो सदैव प्रकाशमान है।
इसी स्थिति में श्वास को भरते हुए बाएं पैर को पीछे की ओर ले जाएं। छाती को खींचकर आगे की ओर तानें। गर्दन को अधिक पीछे की ओर झुकाएं। टांग तनी हुई सीधी पीछे की ओर खिंचाव और पैर का पंजा खड़ा हुआ। इस स्थिति में कुछ समय रुकें। ध्यान को स्वाधिष्ठान अथवा विशुद्धि चक्र पर ले जाएँ। मुखाकृति सामान्य रखें।
(5).  दंडासन ::
ॐ खगाय नमः।
वह जो सर्वव्यापी है और आकाश में घूमता रहता है।
श्वास को धीरे-धीरे बाहर निष्कासित करते हुए दाएं पैर को भी पीछे ले जाएं। दोनों पैरों की एड़ियां परस्पर मिली हुई हों। पीछे की ओर शरीर को खिंचाव दें और एड़ियों को पृथ्वी पर मिलाने का प्रयास करें। नितम्बों को अधिक से अधिक ऊपर उठाएं। गर्दन को नीचे झुकाकर ठोड़ी को कण्ठकूप में लगाएं। ध्यान 'सहस्रार चक्र' पर केन्द्रित करने का अभ्यास करें।
(6). अष्टांग नमस्कार ::
ॐ पूष्णे  नमः।
वह जो पोषण करता है और जीवन में पूर्ति लाता है।
श्वास भरते हुए शरीर को पृथ्वी के समानांतर, सीधा साष्टांग दण्डवत करें और पहले घुटने, छाती और माथा पृथ्वी पर लगा दें। नितम्बों को थोड़ा ऊपर उठा दें। श्वास छोड़ दें। ध्यान को 'अनाहत चक्र' पर टिका दें। श्वास की गति सामान्य करें।
(7). भुजंग आसन ::
ॐ हिरण्यगर्भाय नमः।
जिसका स्वर्ण के भांति प्रतिभा, रंग है।
इस स्थिति में धीरे-धीरे श्वास को भरते हुए छाती को आगे की ओर खींचते हुए हाथों को सीधे कर दें। गर्दन को पीछे की ओर ले जाएं। घुटने पृथ्वी का स्पर्श करते हुए तथा पैरों के पंजे खड़े रहें। मूलाधार को खींचकर वहीं ध्यान को टिका दें।
(8). पर्वत आसन ::
ॐ मरीचये नमः।
वह जो अनेक किरणों द्वारा प्रकाश देता है।
श्वास को धीरे-धीरे बाहर निष्कासित करते हुए दाएं पैर को भी पीछे ले जाएं। दोनों पैरों की एड़ियां परस्पर मिली हुई हों। पीछे की ओर शरीर को खिंचाव दें और एड़ियों को पृथ्वी पर मिलाने का प्रयास करें। नितम्बों को अधिक से अधिक ऊपर उठाएं। गर्दन को नीचे झुकाकर ठोड़ी को कण्ठकूप में लगाएं। ध्यान 'सहस्रार चक्र' पर केन्द्रित करने का अभ्यास करें।
(9). अश्वसंचालन आसन ::
ॐ आदित्याय नम:।
अदिति (जो पूरे ब्रम्हांड की माता है) का पुत्र।
इसी स्थिति में श्वास को भरते हुए बाएं पैर को पीछे की ओर ले जाएं। छाती को खींचकर आगे की ओर तानें। गर्दन को अधिक पीछे की ओर झुकाएं। टांग तनी हुई सीधी पीछे की ओर खिंचाव और पैर का पंजा खड़ा हुआ। इस स्थिति में कुछ समय रुकें। ध्यान को 'स्वाधिष्ठान' अथवा 'विशुद्धि चक्र' पर ले जाएँ। मुखाकृति सामान्य रखें। 
(10). हस्तपाद आसन :: 
ॐ सवित्रे नमः।
जो इस धरती पर जीवन के लिए ज़िम्मेदार है।
तीसरी स्थिति में श्वास को धीरे-धीरे बाहर निकालते हुए आगे की ओर झुकाएं। हाथ गर्दन के साथ, कानों से सटे हुए नीचे जाकर पैरों के दाएं-बाएं पृथ्वी का स्पर्श करें। घुटने सीधे रहें। माथा घुटनों का स्पर्श करता हुआ ध्यान नाभि के पीछे 'मणिपूरक चक्र' पर केन्द्रित करते हुए कुछ क्षण इसी स्थिति में रुकें। कमर एवं रीढ़ के दोष वाले साधक न करें।
(11). हस्तउत्थान आसन ::
ॐ अर्काय नमः।
जो प्रशंसा व महिमा के योग्य है।
श्वास भरते हुए दोनों हाथों को कानों से सटाते हुए ऊपर की ओर तानें तथा भुजाओं और गर्दन को पीछे की ओर झुकाएं। ध्यान को गर्दन के पीछे 'विशुद्धि चक्र' पर केन्द्रित करें।
(12). ताड़ासन ::
 ॐ भास्कराय नमः।
जो ज्ञान व ब्रह्माण्ड के प्रकाश को प्रदान करने वाला है।
यह स्थिति-पहली स्थिति की भाँति रहेगी।
सूर्य नमस्कार की उपरोक्त बारह स्थितियाँ हमारे शरीर को संपूर्ण अंगों की विकृतियों को दूर करके निरोग बना देती हैं। यह पूरी प्रक्रिया अत्यधिक लाभकारी है। इसके अभ्यासी के हाथों-पैरों के दर्द दूर होकर उनमें सबलता आ जाती है। गर्दन, फेफड़े तथा पसलियों की मांसपेशियां सशक्त हो जाती हैं, शरीर की फालतू चर्बी कम होकर शरीर हल्का-फुल्का हो जाता है।
इन 12 मंत्रो का उच्चारण आसनो के साथ करना बहुत लाभप्रद है।
सूर्य नमस्कार के द्वारा त्वचा रोग समाप्त हो जाते हैं अथवा इनके होने की संभावना समाप्त हो जाती है। इस अभ्यास से कब्ज आदि उदर रोग समाप्त हो जाते हैं और पाचनतंत्र की क्रियाशीलता में वृद्धि हो जाती है। इस अभ्यास के द्वारा हमारे शरीर की छोटी-बड़ी सभी नस-नाड़ियां क्रियाशील हो जाती हैं, इसलिए आलस्य, अतिनिद्रा आदि विकार दूर हो जाते हैं। सूर्य नमस्कार की तीसरी व पांचवीं स्थितियां सर्वाइकल एवं स्लिप डिस्क वाले रोगियों के लिए वर्जित हैं।
This exercise provides good health, longevity and vigour-youthfulness. It helps one in attaining a beautifully shaped perfect body. Perform it regularly, after 15-20 minutes of the Sun rise. Don't bother if its cloudy or raining. In case it’s raining, move to a shelter-covered area.
(1). Stand erect, facing the Sun when it’s shining.
(2). Raise the hands over the head, touching the ears, touching each other, covering each other completely. Now, start bending in the backward direction, making a smooth curve-bend, for a moment. Come back to standing posture again, slowly-gradually.
(3). Start moving the hands in the front direction slowly, bending the back bone completely, the fore head touching the knees and the palms should touch the floor. Maintain this position for a while. Balance the whole body, over the palms.
(4). Move one leg in the reverse-backward direction, so that the toe touches the ground-floor, slowly and then move the other leg, gradually by the side of it. Start raising the head gradually-slowly in the upward direction. Maintain the posture for a few seconds.
(5). Raise the hips gradually, bring the mouth parallel to the floor and maintain balance, for a while.
(6). Bring the chest close to the floor, maintaining balance of the body over the palms and the toes.
(7). Start raising the head in an upward direction gradually, maintaining balance over the toes and resting the head straight in the forward to upward direction, gradually-slowly. The knees should not touch the floor.
(8). Put the feet comfortably over the floor; raise the hips into the middle of the body, putting pressure of the body over the palms. Head will take its position between the arms.
(9). Bring one leg forward, raise the head, maintain balance over the palms and one toe, while stretching the body.
(10). Now bring the other legs by the side of the first leg, making U-shape of the body.
(11). Start raising the hands slowly over the head gradually and acquire the standing posture again. In this state, keep on banding the head in the backward direction along with the bending of vertebral column.
(12). Here the deep breathing is experienced. Calm down the breath and revert back to the initial position of erect body standing posture, with folded hands, facing the Sun, again. Repeat the exercise 15-20 times regularly, without fatigue. Inhale, capture and exhale the air regularly. This exercise need fresh air and open space. Initially one may seek the guidance of an expert.
IMPORTANCE :: This Asan removes the foul gas filled in the stomach, moves the blood to the head, refreshing brain cells.
APPLICATION-UTILITY TO THE HUMAN BODY :: One should get up in the morning before Sun rise, which is possible when he goes to bed around 10 PM. It means that one is paying obeisance or prostrations (Salutation-respect-Namaskar) to the Sun (Sury). The Yogic exercise are always performed empty stomach.
(1). This exercise is composed of twelve bodily postures and does not strain or cause injuries to the body. Normally it’s performed in the morning, to relieve stiffness and revitalises the body along with refreshing the mind. 
(2). It provides sufficient activity for the muscles, joints, ligaments and the skeletal system in addition to improving posture and balance. The internal vital organs become more functional.
(3). It increase blood flow through the digestive tract and stimulate the intestinal action, known as peristalsis making the digestion more efficient, leading to effective elimination of stools-excreta. Bending in the forward direction will increase the space in the abdomen and facilitate the release of entrapped gases. These postures warm up the front of the body and cool the body back.
(4). It helps in curing insomnia and related disorders, by calming the brain, thus helping in sound sleep.
(5). It regulates irregular menstrual cycles, ensures the easy childbirth and cures hormonal imbalance. 
(6). It boosts blood circulation, prevents greying of hair, hair fall, dandruff and improves hair growth.
(7). It’s extremely useful in weight loss, giving proper shape to the tummy-abdominal muscles. Thyroid gland which controls mood and body weight may be reactivated.
(8). It reduces-prevents ageing and on set of wrinkles along with reduction in blemishes and acne.
(9). It boosts endurance power, provides vitality and strength and reduces restlessness and anxiety.
(10). Daily practice of Surya Namaskar makes body flexible. It improves flexibility in spine and the limbs.
(11). It influences the pineal gland and hypothalamus to prevent pineal degeneration and calcification.
The body absorbs sun light which stimulates the production of vitamin D in the body. Knee joints too absorb vitamin D to produce RBC.
One suffering from slip-disk, arthritis, heart attack etc. including pregnant women should avoid this exercise.
SURY NAMASKAR-SALUTING THE SUN सूर्य नमस्कार :: This exercise provides good health, longevity and vigour-youthfulness. It helps one in attaining a beautifully shaped perfect body. Perform it regularly, after 15-20 minutes of the Sun rise. Don't bother if its cloudy or raining. In case it’s raining, move to a shelter-covered area.
(1). Stand erect, facing the Sun when it’s shining.
(2). Raise the hands over the head, touching the ears, touching each other, covering each other completely. Now start bending in the backward direction, making a smooth curve-bend, for a moment. Come back to standing posture again, slowly-gradually.
(3). Start moving the hands in the front direction slowly, bending the back bone completely, the fore head touching the knees and the palms should touch the floor. Maintain this position for a while. Balance the whole body, over the palms.
(4). Move one leg in the reverse-backward direction, so that the toe touches the ground-floor, slowly and then move the other leg, gradually by the side of it. Start raising the head gradually-slowly in the upward direction. Maintain the posture for a few seconds.
(5). Raise the hips gradually, bring the mouth parallel to the floor and maintain balance, for a while.
(6). Bring the chest close to the floor, maintaining balance of the body over the palms and the toes.
(7). Start raising the head in an upward direction gradually, maintaining balance over the toes and resting the head straight in the forward to upward direction, gradually-slowly. The knees should not touch the floor.
(8). Put the feet comfortably over the floor; raise the hips into the middle of the body, putting pressure of the body over the palms. Head will take its position between the arms.
(9). Bring one leg forward, raise the head, maintain balance over the palms and one toe, while stretching the body.
(10). Now bring the other legs by the side of the first leg, making U-shape of the body.
(11). Start raising the hands slowly over the head gradually and acquire the standing posture again. In this state, keep on banding the head in the backward direction along with the bending of vertebral column.
(12). Here the deep breathing is experienced. Calm down the breath and revert back to the initial position of erect body standing posture, with folded hands, facing the Sun, again. Repeat the exercise 15-20 times regularly, without fatigue. Inhale, capture and exhale the air regularly. This exercise need fresh air and open space. Initially one may seek the guidance of an expert.
SIGNIFICANCE :: This Asan removes the foul gas filled in the stomach, moves the blood to the head, refreshing brain cells.
SURY SADHNA सूर्य साधना सूर्य एवं चन्द्र चक्र, आज्ञा चक्र, ह्रदय चक्र एवं मूलाधार चक्र :: 
(1). दिव्य दर्शन हेतु प्रक्रिया :: ध्यान साधक द्वारा की गई दिव्य दर्शन हेतु प्रक्रिया है। इसके साकार तथा निराकार दोनों पक्ष हैं। गायत्री माता के ध्यान-जप को साकार एवं सविता (सूर्य) देव में अरुणोदय स्वरूप के ध्यान को निराकार ध्यान कहते हैं। इनमें बाहर से भीतर के प्रवेश के लिए आकर्षण किया जाता है।
(2). सविता का ध्यान :: इसमें नेत्र बन्द करके प्रातः कालीन स्वर्णिम सूर्य का ध्यान किया जाता है। उसकी सुनहरी किरणों का साधक के कण-कण में प्रवेश की कल्पना की जाती है। जिससे उसके शरीर में निष्ठा, प्रज्ञा, श्रद्धा का उद्भव हो और उसके आलोक से, ऊर्जा से शरीर का कण-कण अनुप्रमाणित हो उठे। अपने स्वरूप की प्रकाश पुंज, अग्निपिंण्ड जैसी अनुभूति होने लगे। सविता देव के इस अनुदान से साधक की पवित्रता और प्रखरता में अभिवृद्धि होने लगती है।
(3). सूर्य योग :: भगवान सूर्य की अनन्त शक्तियां उपयोग करने के लिए साधक को अपने अन्दर क्षमता उत्पन्न करनी पड़ती है।
(4). सूर्योपासना के साधारण उपक्रम :: रविवार का व्रत रखना, निराहार, फलाहार, एक समय का, एक अन्न का एक दाल, शाक के साथ स्वाद रहित-बिना नमक अथवा मीठे के सात्विक भोजन अर्थात् अर्द्ध उपवास रखना। उपवास के दिन या नित्य-प्रति सूर्य को अर्घ्य देना-जल चढ़ाना, सूर्य का ध्यान करना, उसकी मानसिक परिक्रमा करना, नमस्कार करना, ऊँ सूर्याय नमः मन्त्र का जप करना–यह सभी सूर्योपासना के साधारण उपक्रम कहलाते हैं।
(5). सूर्य स्नान, धूप में रखे गरम पानी से नहाना, वस्त्रों को धूप में सुखाना, घर में धूप आने देना सभी स्वास्थ्यकर हैं।
(6). सूर्य चक्र के दो स्थान हैं, ह्रदय (प्रधान) तथा आमाशय (शाखा)। किन्हीं वांछित शक्तियों को विकसित करने, उत्तेजित करने के लिए ह्रदय स्थित प्रधान सूर्य चक्र का ध्यान करना चाहिए। इसे ही ‘ह्रदय चक्र’ भी कहते हैं, जो कि वक्षस्थल की दोनों पसलियों के बीच स्थित होता है। यह श्वेत वर्ण का, तेजवान प्रकाश स्वरूप, गोल आकार एवं उष्ण प्रकृति का माना जाता है। जिस भावना को उत्तेजित करना-बढ़ाना हो उसे मन में धारण करते हुए सूर्य चक्र का ध्यान किया जाता है।
(7). आमाशय स्थित (शाखा) सूर्य चक्र को चन्द्र चक्र भी कहते हैं। इसका वर्ण पीला, चन्द्रमा जैसा प्रकाश, आकार दीपक की लौ जैसा एवं प्रकृति ‘शीतल’ होती है। किन्हीं अनावश्यक वृत्तियों को शान्त या समाप्त करने के लिए ‘चन्द्र चक्र’ का ध्यान किया जाता है। सूर्य योग अद्भुत योग है, जो अभ्यास, प्रयत्न और धैर्य के साथ अविचल साधना करने से सिद्ध होता है।
(8). भीतर से बाहर उभरने वाले-अन्तर्मुखी ध्यानों में आज्ञा चक्र, ह्रदय चक्र और मूलाधार चक्र के जागरण को प्रमुख माना जाता है। त्रिपदा गायत्री के इन तीन केन्द्रों को ज्योतिर्मय बनाने से काम चल जाता है।
(9). आज्ञा चक्र मस्तक पर दोनों भौहों के मध्य स्थान पर स्थित होता है। इसे तीसरा नेत्र भी कहते हैं। इस नेत्र में जब ज्योति का अवतरण होता है, तो अदृश्य जगत में प्रवेश सामर्थ्य मिलती है। मन, बुद्धि और चित्त उत्कृष्टता की दिशा में बढ़ते हैं। यह अतीन्द्रिय क्षमताओं का केन्द्र भी समझा जाता है। नेत्र बन्द करके सुखासन मुद्रा में बैठ कर (एक निश्चित समय-स्थान पर) एकाग्रता पूर्वक नियमित अभ्यास साधना से इस चक्र को जागृत किया जा सकता है।
(10). ह्रदय चक्र को सूर्य चक्र या ब्रह्म चक्र भी कहते हैं, जो दोनों पसलियों के बीच स्थित होता है। ईश्वर की प्रकाश ज्योति यहीं प्रकट होती है। जिस अंगुष्ठ मात्र ब्रह्म ज्योति का स्वरूप वेदों, पुराणों में बताया गया है-उसका निवास इसी केन्द्र में होता है। यह अन्तःकरण-अन्तरात्मा का केन्द्र है। इसके जागरण से आध्यात्मिक क्षेत्र की “ऋद्धियों” को पाया जाता है।
(11). मूलाधार चक्र को नाभि चक्र, प्राण चक्र, प्रसुप्त सर्प कुण्डलिनी केन्द्र भी कहते हैं। यद्यपि इसका स्थान मल-मूत्र छिद्रों के मध्य केन्द्र में माना जाता है। लेकिन सुषुम्ना नाडी का अन्तिम सिरा उस स्थान से काफी ऊँचा पड़ता है और वह लगभग नाभि की सीध में जा पहुँचता है। मूलाधार का ध्यान करने में जननेन्द्रिय का बार-बार स्मरण आने से ऊर्ध्वगमन में अवरोध-रुकावट उत्पन्न होती है, इसलिए वहाँ तक पहुँचने के लिए नाभि चक्र का ध्यान किया जाता है। मूलाधार चक्र तथा नाभि चक्र को एक ही मान लिया गया है।
(12). प्राण रूपी जीवन्त ऊर्जा-प्रतिभा का यही केन्द्र है। साहस, पराक्रम, उल्लास, उमंग जैसी सचेतन धाराऐं इसी केन्द्र से उभरती हैं। बलिष्ठता, समर्थता, प्रखरता हेतु इसी चक्र को सक्रिय-प्रकाशित करने का यत्न करना चाहिए। दाम्पत्य जीवन और सु-प्रजनन की सफलता, रस से इस केन्द्र का सीधा सम्बन्ध है।
 
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