Monday, May 4, 2020

YOG योग :: पतञ्जलि योगसूत्र

पतञ्जलि योगसूत्र 
 YOG योग
CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM 
By :: Pt. Santosh Bhardwaj
dharmvidya.wordpress.com  hindutv.wordpress.com  santoshhastrekhashastr.wordpress.com   bhagwatkathamrat.wordpress.com jagatgurusantosh.wordpress.com  santoshkipathshala.blogspot.com     santoshsuvichar.blogspot.com   santoshkathasagar.blogspot.com  bhartiyshiksha.blogspot.com
"ॐ गं गणपतये नमः" 
अक्षरं परमं ब्रह्म ज्योतीरूपं सनातनम्। 
गुणातीतं निराकारं स्वेच्छामयमनन्तजम्॥
चित्त को एकाग्र करके ईश्वर में लीन करने का विधान है। चित्त की वृत्तियों को चंचल होने से रोकना (चित्तवृत्तिनिरोधः) ही योग है अर्थात मन को इधर उधर भटकने न देना, केवल मात्र एक परमात्मा में स्थिर रखना ही योग है।
आत्मा और जगत् में सांख्य दर्शन के सिद्धांतों में कपिल मुनि के अनुरूप पचीस तत्व हैं। क्योंकि कपिल स्वयं ईश्वर के अवतार हैं, अतः पतञ्जलि ने छब्बीसवाँ तत्व पुरुष विशेष या ईश्वर भी माना है। 
पतंजलि का योग दर्शन, समाधि, साधन, विभूति और कैवल्य इन चार पादों या भागों में विभक्त है। 
समाधि पाद :: इसमें योग के उद्देश्य और लक्षण और उनका संसाधन किस प्रकार होता है, समझाया गया है। इसमें क्लेश, कर्म विपाक और कर्म फल आदि का विवेचन है। 
विभूति पाद :: इसमें यह बतलाया गया है कि योग के अंग क्या हैं, उसका परिणाम क्या होता है और उसके द्वारा अणिमा, महिमा आदि सिद्धियों की किस प्रकार प्राप्ति होती है। 
कैवल्य पाद :: इसमें कैवल्य या मोक्ष का विवेचन किया गया है। मनुष्य को अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश ये पाँच प्रकार के क्लेश होते हैं और उसे कर्म के फलों के अनुसार जन्म लेकर आयु व्यतीत करनी पड़ती है तथा भोग भोगना पड़ता है। इन सबसे बचने और मोक्ष प्राप्त करने का उपाय योग है। क्रमशः योग के अंगों का साधन करते हुए मनुष्य सिद्ध हो जाता है और अंत में मोक्ष प्राप्त कर लेता है। ईश्वर नित्य मुक्त, एक, अद्वितीय और तीनों कालों से अतीत है और देवताओं तथा ऋषियों आदि को उसी से ज्ञान प्राप्त होता है। संसार दुःखमय और हेय है। पुरुष या जीवात्मा के मोक्ष के लिये योग ही एकमात्र उपाय है।
चित्त की क्षिप्त, मूढ़, विक्षिप्त, निरुद्ध और एकाग्र ये पाँच प्रकार की वृत्तियाँ हैं, जिन्हें चित्त भूमि कहते हैं। आरंभ की तीन चित्त भूमियों में योग नहीं हो सकता, केवल अंतिम दो में हो सकता है। इन दो भूमियों में संप्रज्ञात और असंप्रज्ञात ये दो प्रकार के योग हो सकते हैं। जिस अवस्था में ध्येय का रूप प्रत्यक्ष रहता हो, उसे संप्रज्ञात कहते हैं। यह योग पाँच प्रकार के क्लेशों का नाश करने वाला है। असंप्रज्ञात उस अवस्था को कहते हैं, जिसमें किसी प्रकार की वृत्ति का उदय नहीं होता अर्थात् ज्ञाता और ज्ञेय का भेद नहीं रह जाता, संस्कार मात्र बच रहता है। यही योग की चरम भूमि मानी जाती है और इसकी सिद्धि हो जाने पर मोक्ष प्राप्त होता है।
योग साधना :: योगी साधक पहले किसी स्थूल विषय का आधार लेकर, उसके उपरांत किसी सूक्ष्म वस्तु को लेकर और अंत में सब विषयों का परित्याग करके चलता है। अपना चित्त स्थिर करता है। 
चित्त वृत्तियों को रोकने के उपाय :: अभ्यास और वैराग्य, ईश्वर का प्रणिधान, प्राणायाम और समाधि, विषयों से विरक्ति आदि। जो लोग योग का अभ्यास करते हैं, उनमें अनेक प्रकार को विलक्षण शक्तियाँ आ जाती है जिन्हें विभूति या सिद्धि कहते हैं। यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि ये आठों योग के अंग कहे गए हैं और योग सिद्धि के लिये इन आठों अंगों का साधन आवश्यक और अनिवार्य है। जो व्यक्ति योग के ये आठों अंग सिद्ध कर लेता है, वह सब प्रकार के क्लेशों से छूट जाता है, अनेक प्रकार की शक्तियाँ प्राप्त कर लेता है और अंत में कैवल्य (मुक्ति) का भागी होता है। सृष्टि तत्व आदि के सम्बंध में योग और साँख्य एकमत हैं। अतः साँख्य को ज्ञानयोग और योग को कर्म योग भी कहते हैं।
ग्रन्थ का सांगठन :- यह चार पादों या भागों में विभक्त है। समाधि पाद (51 सूत्र), साधन पाद (55 सूत्र), विभूति पाद (55 सूत्र), कैवल्य पाद (34 सूत्र) और कुल सूत्र 195 हैं। 
इन पदों में योग अर्थात् ईश्वर-प्राप्ति के उद्देश्य, लक्षण तथा साधन के उपाय या प्रकार हैं और उसके भिन्न-भिन्न अंगों का विवेचन है। इसमें चित्त की भूमियों या वृत्तियों का भी विवेचन है। इस योग-सूत्र का प्राचीनतम भाष्य भगवान् वेद व्यास का है, जिस पर वाचस्पति का वार्तिक भी है। योगशास्त्र नीति विषयक उपदेशात्मक काव्य की कोटि में आता है।
यह शारीरिक योग मुद्राओं का शास्त्र नहीं है अपितु आत्मा और परमात्मा के योग या एकत्व और उसको प्राप्त करने के नियमों व उपायों का विषय है। यह अष्टांग योग भी कहलाता है, क्योंकि इसकी व्याख्या अष्ट अर्थात आठ अंगों :- यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि में की गई है। 
अष्टांग योग-योग के आठ अंग :: यह आठ आयामों वाला मार्ग है, जिसमें आठों आयामों का अभ्यास एक साथ किया जाता है।
(1). यम :- पाँच सामाजिक नैतिकता। 
(1.1). अहिंसा :- शब्दों से, विचारों से और कर्मों से किसी को कोई हानि नहीं पहुँचाना। 
(1.2). सत्य :- विचारों में सत्यता, परम-सत्य में स्थित रहना। 
(1.3). अस्तेय :- चोर-प्रवृति का न होना। 
(1.4). ब्रह्मचर्य :- इसके दो अर्थ हैं :- (1.4.1). चेतना को ब्रह्म के ज्ञान में स्थिर करना और (1.4.2). सभी इन्द्रिय-जनित सुखों में संयम बरतना। 
(1.5). अपरिग्रह :- आवश्यकता से अधिक संचय नहीं करना और दूसरों की वस्तुओं की इच्छा नहीं करना। 
(2). नियम :- पाँच व्यक्तिगत नैतिकता। 
(2.1). शौच :- शरीर और मन की शुद्धि। 
(2.2). संतोष :- संतुष्ट और प्रसन्न रहना। 
(2.3). तप :- स्वयं से अनुशासित रहना। 
(2.4). स्वाध्याय :- आत्मचिंतन करना। 
(2.5). ईश्वर-प्रणिधान :- ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण, पूर्ण श्रद्धा। 
(3). आसन :- योगासनों द्वारा शारीरिक नियंत्रण। 
(4). प्राणायाम :- श्वास-लेने सम्बन्धी खास तकनीकों द्वारा प्राण पर नियंत्रण। 
(5). प्रत्याहार :- इन्द्रियों को अंतर्मुखी करना। 
(6). धारणा :- एकाग्रचित्त होना। 
(7). ध्यान :- निरंतर ध्यान। 
(8). समाधि :- आत्मा से जुड़ना, शब्दों से परे परम-चैतन्य की अवस्था। 
सार-संक्षेप (पतंजलि को गुरु परम्परा में मिली योग शिक्षा) ::
(1). योग अनुशासन,
(2). योग चित्त की वृत्तियों का निरोध है,
(3). दृष्टा अपने स्वरूप में स्थित हो जाता है, 
(4). वृत्तियों का सारुप्य होता है, इतर समय में,
(5). वृत्तियाँ पाँच प्रकार की हैं :- "प्रत्यक्षनुमानागमाः प्रमाणानि"
(5.1). प्रमाण, (5.2). विपर्यय, (5.3). विकल्प, (5.4). निद्रा तथा (5.5). स्मृति, 
(5.1). प्रमाण के तीन भेद :- (5.1.1). प्रत्यक्ष प्रमाण, (5.1.2). अनुमान प्रमाण और (5.1.3). आगम प्रमाण,
वृत्ति के दो भेद :: ‘‘वृत्तयः पंचतय्य क्लिष्टाऽक्लिष्टा’’ 
वृत्तियाँ पाँच प्रकार की हैं और हर प्रकार की वृत्ति के दो भेद या रूप हैं; क्लिष्ट और अक्लिष्ट। जो वृत्तियाँ साँसारिक विषयों में आसक्त और अविद्या, राग, द्वेष आदि क्लेशों में फँसाती हैं वे क्लिष्ट वृत्तियाँ हैं और जो क्लेश रहित अर्थात अविद्या, राग, द्वेष आदि क्लेशों को क्षय या समाप्त करने वाली हों और प्रभु उपासना और योग साधना में सहायक हो वे अक्लिष्ट वृत्तियाँ हैं। योग साधना से इन अक्लिष्ट वृत्तियों द्वारा क्लिष्ट वृत्तियों को हटायें। इन पाँच प्रकार की वृत्तियों में संसार के सब विचार, ज्ञान-अज्ञान, धर्म-अधर्म समाविष्ट हो जाते हैं। 
पाँच वृत्तियाँ :: 
‘‘प्रमाणविपर्यय विकल्पनिद्रास्मृतयः’’[योगसूत्र] 
प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा एवं स्मृति [योग दर्शन 1.7-11] 
(5.1). प्रमाण वृत्ति :: यह तीन प्रकार की हैं। प्रत्यक्ष प्रमाण, अनुमान प्रमाण और आगम (शब्द) प्रमाण। 
(5.1.1). प्रत्यक्ष प्रमाण :: मन, बुद्धि और इन्द्रियों के साथ बिना किसी व्यवधान के सम्बन्ध होने से जो संशय रहित ज्ञान होता है, वह प्रत्यक्ष अनुभव से होने वाली प्रमाण वृत्ति है। जिन मनुष्यों को सांसारिक पदार्थ नित्य और सुख रूप प्रतीत होता है, भोगों में आसक्ति हो जाती है, वह प्रमाण वृत्ति क्लिष्ट है और जो संसार से नाशवान परिवर्तनशील और पदार्थों में दुःख की प्रतीती करता है, इस से सांसारिक पदार्थों से वैराग्य हो जाता है जो चित्त वृत्तियों के प्रवाह को रोकने में सहायक होती है; वह अक्लिष्ट प्रमाण वृत्ति है। इसी प्रकार दूसरी वृत्तियों में भी क्लिष्ट व अक्लिष्ट मौजूद है।
(5.1.2). अनुमान प्रमाण :: किसी प्रत्यक्ष दर्शन के सहारे युक्तियों द्वारा अप्रत्यक्ष पदार्थ के स्वरूप का ज्ञान होता है, वह अनुमान से होने वाली प्रमाण वृत्ति है। जैसे दूर से धुयें को देख कर अग्नि होने का अनुमान ।
(5.1.3). आगम प्रमाण :: वेद, शास्त्र और आप्त पुरूषों के वचन को ‘आगम’ कहते हैं। जो पदार्थ मनुष्य के अन्तः करण और इन्द्रियों के प्रत्यक्ष नहीं हैं एवं जहाँ अनुमान की भी पहुँच नहीं है, उसके स्वरूप का ज्ञान वेद, शास्त्र और महापुरूषों के वचनों से होता है, वह आगम से होने वाली प्रमाण वृत्ति है।
(5.2). विपर्यय :: मिथ्या ज्ञान या विपरीत ज्ञान अर्थात असली स्वरूप को न समझ कर उसको दूसरी ही वस्तु समझ लेना विपर्यय वृत्ति है जैसे अन्धेरे में पत्थर को रीछ समझ लेना या रस्सी को साँप समझ लेना। यह विपर्यय ज्ञान प्रमाण नहीं है क्योंकि प्रमाण से खण्डित हो जाता है।  
‘‘विपर्यय भेदाः पंच’’ [साँख्य दर्शन 3.36] 
विपर्यय अर्थात मिथ्या ज्ञान के पाँच भेद अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश को भी विपर्यय वृत्ति ही दर्शाया है। योग दर्शन के अगले सूत्रों में यह ऐसे क्लेश बताए गए हैं जो कि असम्प्रज्ञात समाधि की योग्यता बिना क्षीण नहीं होते। इस कारण अविद्या आदि क्लेशों को कई एक महानुभावों ने विपर्यय वृत्ति नहीं माना है। इस बारे विचारों की भिन्नता है।
(5.3). विकल्प :: केवल शब्द के आधार पर बिना हुए पदार्थ की कल्पना करने वाली जो चित्त कि वृत्ति है, वह विकल्प वृत्ति है। ऐसी वृत्ति को विकल्प कहते हैं। इसी प्रकार भगवान् के रूप की कल्पना करके, भगवान् का ध्यान करता है। लेकिन जिस स्वरूप का वह ध्यान करता है, उसे न तो देखा है न वेद शास्त्र सम्मत है; केवल कल्पना मात्र ही है। यह विकल्प वृत्ति मनुष्य को भगवान् के चिन्तन में लगाने वाली होने के कारण अक्लिष्ट है। जो भोगों में प्रवृत करने वाली हों, वे विकल्प वृत्तियांँ क्लिष्ट हैं।
(5.4). निद्रा :: जो वृत्ति अज्ञान और अविद्या के अंधकार में फँसी हों, उस वृत्ति का नाम निद्रा है। इस वृत्ति में तमोगुण ही प्रधान है। निद्रा वृत्ति का भी जागृत होने पर विशेष विचार किया जाता है। अनुभूतियाँ जाग्रत अवस्था में होती हैं। निद्रा भी एक वृत्ति है; जागने पर उसकी स्मृति होती है।
(5.5). स्मृति :: जिस व्यवहार या वस्तु का अनुभव या प्रत्यक्ष देख लिया है, उसी का संस्कार ज्ञान में बना रहता है उसका निमित्त पा कर याद आना ही स्मृति है। इस प्रकार पहले वर्णित प्रमाण, विपर्यय, विकल्प और निद्रा, इन चारों प्रकार की वृत्तियों द्वारा अनुभव में आए हुए विषयों के संस्कार जो चित्त में पड़े हैं, उनका पुनः किसी निमित को पाकर जाग्रत होना ही स्मृति है।
(6). विपर्यय वृत्ति मिथ्या ज्ञान अर्थात जिससे किसी वस्तु के यथार्थ रूप का ज्ञान न हो, 
(7). ज्ञान जो शब्द से उत्पन्न होता है, पर वस्तु होती नहीं, विकल्प है, 
(8). ज्ञेय विषयों के अभाव :- ज्ञान का आलंबन, निद्रा, 
(9). अनुभव में आए हुए विषयों का न भूलना, स्मृति, 
(10). अभ्यास तथा वैराग्य के द्वारा उनका निरोध, 
(11). उनमें स्थित रहने का यत्न, अभ्यास, 
(12). अभ्यास दीर्घ काल तक निरन्तर सत्कार पूर्वक सेवन किए जाने पर दृढ़ भूमिका वाला होता है, 
(13). देखे हुए सुने हुए विषयों की तृष्णा रहित अवस्था वशीकार नामक वैराग्य है, 
(14). वैराग्य, वह अवस्था जब पुरुष तथा प्रकृति की पृथकता का ज्ञान, उससे परे परम् वैराग्य जब तीनों गुणों के कार्य में भी तृष्णा नहीं रहती, 
(15). वितर्क विचार आनन्द तथा अस्मिता नामक स्वरूपों से संबंधित वृत्तियों का निरोध सम्प्रज्ञात है, 
(16). वैराग्य से वृत्ति निरोध के बाद) शेष संस्कार अवस्था, असम्प्रज्ञात, 
(17). जन्म से ही ज्ञान, विदेहों अथवा प्रकृति लयों को होता है, 
(18). गुरु, साधन, शास्त्र में) श्रद्धा, वीर्य (उत्साह), बुद्धि की निर्मलता, ध्येयाकार बुद्धि की एकाग्रता, उससे उत्पन्न होने वाली ऋतंभरा प्रज्ञा :- पाँचों प्रकार के साधन, बाकि जो साधारण योगी हैं, उनके लिए, 
(19). तीव्र उपाय, संवेग वाले योगियों को शीघ्रतम सिद्ध होता है,  
(20). तीव्र संवेग के भी मृदु मध्य तथा अधिमात्र, यह तीन भेद होने से, अधिमात्र संवेग वाले को समाधि लाभ में विशेषता है या 
(21). फिर सब ईश्वर पर छोड़ देने से (ईश्वर प्रणिधान),
(22). अविद्या अस्मिता राग द्वेष तथा अभिनिवेष यह पाँच क्लेश कर्म, शुभ तथा अशुभ, फल, संस्कार आशय से परामर्श में न आने वाला, ऐसा परम पुरुष ईश्वर है,
(23). उस (ईश्वर में) अतिशय की धारणा से रहित सर्वज्ञता का बीज है, 
(24). काल से पार होने के कारण वह ईश्वर पूर्वजों का भी गुरु है, 
(25). उसका बोध कराने वाला प्रणव है (ॐ), 
(26). उस (प्रणव) का जप, उसके अर्थ की भावना सहित (करें),  
(27). उससे प्रत्यक्ष चेतना की अनुभवी रूपी प्राप्ती होगी और अन्तरायों का अभाव होगा, 
(28). शारीरिक रोग, चित्त की अकर्मण्यता, संशय, लापरवाही, शरीर की जड़ता, विषयों की इच्छा, कुछ का कुछ समझना, साधन करते रहने पर भी उन्नति न होना, ऊपर की भूमिका पाकर उससे फिर नीचे गिरना, वित्त में विक्षेप करने वाले नौ विध्न हैं, 
(29). दुख, इच्छा पूर्ति न होने पर मन में क्षोभ, कम्पन, श्वास प्रवास विक्षेपों के साथ घटित होने वाले, 
(30). उनके प्रतिषेध के लिए एक तत्त्व का अभ्यास करना चाहिए, 
(31). सुखी, दुखी पण्यात्मा तथा पापात्मा व्यक्तियों के बारे में यथा क्रम मैत्री, करुणा, हर्ष तथा उदासीनता, की भावना रखने से चित्त निर्मल एवं प्रसन्न होता है,या
(32). श्वास प्रवास की क्रिया को रोककर शरीर के बाहर स्थित करना अथवा अन्तर में धारण करने से वृत्ति निरोध होता है, अथवा 
(33). शब्द, स्पर्ष, रूप, गंध वाली दिव्य स्तर की वृत्ति, उत्पन्न होने पर चित्त वृत्ति का निरोध करती है क्योंकि वह मन को बांधने वाली होती है अथवा
(34). ज्योतिषमती नाम की विशोका ज्योतियों से अथवा 
(35). उनका महात्माओं का ध्यान करने से, जिनका चित्त वीतराग हो गया है, अथवा निद्रा में ध्यान करने से, 
(36). पहले निद्रा को सत्वगुणी बनाना आवश्यक है, गीता में कहा गया है कि जब सब नींद में होते हैं, योगी जागता है। उससे यही अर्थ बनता है अथवा 
(37). जैसे भी (श्रद्धा से अभिमत) ध्यान, 
(38). उस ध्यान से, परमाणु-सूक्ष्मतम कण, से परम महान तक उस निरुद्ध योगी की वशीकार अवस्था हो जाती है, 
(39). वह द्रष्टा, जिसकी, अभिजात मणि के समान वृत्तियाँ  क्षीण हो गयी हैं; वृत्तियों से उत्पन्न ज्ञान, जिन विषयों का ज्ञान ग्रहण किया जाता है या जिस पर उस चित्त की सथिति होती है, उसी के समान रंगे जाने से, उसी के समान हो जाता है, 
(40). उन में से शब्द अर्थ तथा ज्ञान के तीनों विकल्प सहित मिली हुई, सवितर्क समापत्ती है, 
(41). शब्द तथा ज्ञान, इन विषयों के हट जाने पर तथा अपने स्वरूप की भी विस्मृती सी हो जाने पर, जब अर्थ मात्र का आभास ही शेष रह जाता है, निर्वितर्क सम्प्रज्ञात है, 
(42). इस प्रकार सवितर्क एवं निर्वितर्क समाधि के निरुपण से सविचार एवं निर्विचार सम्प्रज्ञात, जो कि सूक्ष्म विषय है, की भी व्याख्या हो गयी, 
(43). उन विषयों की सूक्ष्मता अव्यक्त प्रकृति तक है, 
(44). आगम तथा अनुमान से उदय ज्ञान से यह ज्ञान अलग है क्योंकि इसमें विशेष रूप से अर्थ का साक्षात्कार होता है, 
(45). उस ऋतम्भरा प्रज्ञा से उदय होने वाले संस्कार, बाकी सब संस्कारों को काटने वाले होते हैं,
(46). ऋतम्भरा प्रज्ञा के संस्कारों का भी निरोध हो जाने से, सभी संस्कारों का बीज नाश हो जाने से निर्बीज समाधि होती है। 
साधनपाद :: (1). तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान, यह क्रिया योग है, 
(2). क्रिया योग का अभ्यास समाधि प्राप्ति की भावना से, वित्त में विद्यमान क्लेशों को क्षीण करने के लिए है,
(3). अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष तथा अभिनिवेश, यह पाँच क्लेश है, 
(4). अविद्या बाकी चारों, अस्मिता राग द्वेष अभिनिवेश, इन क्लेशों की उत्पत्ती के लिए क्षेत्र रूप है,
(5). अनित्यत्व अपवित्र दुख, अनात्म में क्रमशः नित्यत्व, पवित्रता, सुख तथा आत्मभाव की बुद्धि का होना अविद्या है,
(6). देखने वाली शक्ति तथा देखने का माध्यम चित्त शक्ति दोनों की एकात्मता अस्मिता है,
(7). सुख भोगने पर, उसे फिर से भोगने की इच्छा बनी रहती है, वह राग है,
(8). दुख भोगने पर, उससे बचने की इच्छा, द्वेष है, 
(9). स्वभाव से प्रवाहित होने वाला, सामान्य जीवों की भाँति ही विद्वानों को भी लपेट लेने वाला, अभिनिवेश है,
(10). शरीर के बचाव की इच्छा, क्रिया योग द्वारा तनु किए गए पंच क्लेश, शक्ति के प्रति प्रसव क्रम द्वारा त्यागे जाने योग्य हैं, जो सूक्ष्म रूप में हैं,
(11). जब चेतना, प्रत्यक् चेतना होकर ऊपर की ओर चढ़ती है, तो कारव को कारण में विलीन करती है, इसे शक्ति का प्रति प्रसव क्रम कहते हैं। ध्यान द्वारा त्याज्य उन की वृत्तियाँ हैं, 
(12). क्लेश ही मूल हैं उस कर्माशय के जो दिखने वाले अर्थ वर्तमान तथा न दिखने वाले अर्थ भविष्य में होने वाले जन्मों का कारण हैं, 
(13). जब तक जीव को क्लेशों ने पकड़ रखा है, तब तक उसके कारण उदय हुए कर्माशय का फल, जाति आयु तथा भोग होता है, 
(14). वह आयु जाति भोग की फसल सुख दुख रूपी फल वाली होती है, क्योंकि वह पुण्य तथा अपुण्य का कारण है, 
(15). परिणाम दुख, ताप दुख तथा संस्कार दुख बना ही रहता है तथा गुणों की वृत्तियों के परस्पर विरोधी होने के कारण, सुख भी दुख ही है, ऐसा विद्वान जन समझते हैं,
(16). त्यागने योग्य है, वह दुख जो अभी आया नहीं है, 
(17). यह योग का उद्देश्य है। दुख का मूल कारण, द्रष्टा का दृश्य में संयोग, उलझ जाना है, 
(18). प्रकाश सत्व, स्थिति अर्थ तम् तथा क्रियाशील अर्थ रज्, पंचभूत तथा इन्द्रियाँ अंग हैं जिसके, भोग तथा मोक्ष देना जिसका प्रयोजन है, वह दृश्य है, 
(19). योग में दृश्य को दृष्टा का सेवक अथवा दास माना गया है। गुणों के चार परिणाम हैं, विशेष अर्थ पाँच महाभूत आकाश वायु अग्नि जल तथा पृथ्वी, अविशेष अर्थ प्रकृति की सूक्ष्म तन्मात्राएँ शब्द स्पर्ष रूप रस और गंध तथा छठा अहंकार, लिंग अर्थ प्रकृति में बीजरूप, अलिंग अर्थ अप्रकट, देखने वाला द्रष्टा अर्थ आत्मा, देखने की शक्ति मात्र है, इसलिए शुद्ध भी है, वृत्तियों के देखने वाला भी है,
(21). दृश्य का अस्तित्व क्यों है? केवल दृष्टा के लिए,
(22). जो मुक्ति, सिद्धि को प्राप्त हो गये हैं, उनके लिए दृश्य समाप्त होकर भी, अन्य साधारण जीवों के लिए तो वैसा ही बना रहता है, 
(23). दृश्य के स्वरूप का कारण क्या है? उसके स्वामि अर्थ दृष्टा की शक्ति, 
(24). दृश्य के संयोग का, उलझने का कारण अविद्या है, 
(25). उस अविद्या के अभाव से, संयोग का भी अभाव हो जाता है, यही हान है जिसे कैवल्य मुक्ति कहा जाता है,
(26). विवेक अर्थ दृश्य तथा दृष्टा की भिन्नता का निश्चित ज्ञान, हान का उपाय है,
(27). उस विवेक ख्याति की सात भूमिकायें हैं, 
(28). अष्टांग योग के अनुष्ठान से अशुद्धि का क्षय तथा विवेक ख्याति पर्यन्त प्रकाश होता है,
(29). यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान एवं समाधि, यह योके आठ अंग हैं, 
(30). यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान एवं समाधि, यह योग के आठ अंग हैं,
(31). दूसरे को मन, वाणी, कर्म से दुख न देना, सत्य बोलना, ब्रह्मचर्य, तथा संचय वृत्ति का त्याग, यह पाँच यम कहे जाते हैं, 
(32). ये यम जाति, देश, काल तथा समय की सीमा से अछूते, सभी अवस्थाओं में पालनीय, महाव्रत हैं, 
(33). शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय तथा ईश्वर प्रणिधान, यह नियम हैं। 
Contents of these blogs are covered under copy right and anti piracy laws. Republishing needs written permission from the author.

No comments:

Post a Comment