Saturday, June 27, 2015

GURU GEETA गुरु गीता

GURU GEETA
गुरु गीता 
CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM 
By :: Pt. Santosh Bhardwaj

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"ॐ गं गणपतये नमः" 
अक्षरं परमं ब्रह्म ज्योतीरूपं सनातनम्। 
गुणातीतं निराकारं स्वेच्छामयमनन्तजम्॥
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि॥[श्रीमद्भगवद्गीता 2.47]
गुरु गीता स्कन्द पुराण का एक भाग है। इसमें 352 श्लोक हैं।
This sacred text is a conversation between Bhagwan Shiv and Maa Parwati. It constitute a section of Skand Puran. Bhagwan Shiv is the Ultimate Guru-Mentor (the true philosopher, friend and guide). He is the only in the whole universe who knows the Almighty a bit. He possess all knowledge. He is worshipped by all, the Trinity-Brahma, Vishnu and Mahesh. 
भगवान् शिव और माँ भगवती पार्वती का यह संवाद स्कन्द पुराण का अंग है। स्कन्द-भगवान् कार्तिकेय माँ पार्वती और भगवान् शिव के पुत्र हैं। स्कन्द पुराण में भगवान् शिव ने गुरु की महत्ता का बखान किया है। गुरु और उसकी महत्ता की व्याख्या, गुरु का स्वरूप, गुरु पूजा करने की विधि, गुरु गीता को पढने के लाभ आदि का वर्णन इस महान ग्रन्थ में किया गया है। 
This holy text signifies the Guru. One has to learn how to worship the Guru & his impotence. Learning and practicing this treatise helps one sailing through the vast ocean of repeated incarnations.  
सद्गुरु कौन हो सकता है, उसकी कैसी महिमा है। शिष्य की योग्यता, उसकी मर्यादा, व्यवहार, अनुशासन आदि को भी पूर्ण रूपेण जानना नितान्त आवश्यक है। गुरु की शरण में जाने से शिष्य को पूर्णत्व प्राप्त होता है तथा वह स्वयं ब्रह्मरूप हो जाता है। उसके सभी धर्म-अधर्म, पाप-पुण्य आदि समाप्त हो जाते हैं तथा केवल एकमात्र चैतन्य ही शेष रह जाता है। वह गुणातीत व रूपातीत हो जाता है, जो कि उसकी अन्तिम गति है। यही उसका गन्तव्य है, जहाँ वह पहुँच जाता है। यही उसका स्वरूप है, जिसे वह प्राप्त कर लेता है।
One has to know the qualities of the Guru, one has to know this, prior to joining him. The ability, intelligence, grasping power one-disciple has, is to be ascertained. Whether one will abide by the dictates-directives of the Guru, is essential to know. As a disciple one has to be obedient, caring and disciplined. Its the enlightened Guru who can make him near the God. Guru can clean the sins, mistakes, blunders of a committed disciple. One has to abide by the Dharm-Varnashram Dharm and discharge all his duties chronologically. The sole purpose of birth as a human being is to attain Moksh-Salvation and the enlightened Guru can help one in attaining this goal.
भगवान शंकर और देवी पार्वती के संवाद में प्रकट हुई यह गुरु गीता समग्र स्कंद पुराण का निष्कर्ष है। गुरु गीता का पाठ शत्रु का मुख बंद करने वाला है, गुणों की वृद्धि करने वाला है, दुष्कृत्यों का नाश करने वाला और सत्कर्म में सिद्धि देने वाला है। 
This section of Skand Puran gives the gist of it. One who learns this can conquer his enemies (Sex, anger, pride, greed, attachment). it leads one from Tamsik Gun to Satvik Gun i.e., darkness to light. Having overcome his weaknesses one will devote himself to goodness. He will attain perfection & success.
गुरुगीता अकाल मृत्यु को रोकती है, सब संकटों का नाश करती है, यक्ष, राक्षस, भूत, चोर आदि का विनाश करती है। पवित्र ज्ञानवान पुरुष इस गुरुगीता का जप-पाठ करते हैं। उनके दर्शन और स्पर्श से पुनर्जन्म नहीं होता।
It protects one from untimely death, miseries, all sorts of troubles and the thieves, Yaksh, demons, wretched spirits & keep away off. The pious, virtuous, righteous, enlightened achieve Salvation by the recitation of its Shloks, grasping and practicing them.
गुरुगीता के श्लोक भवरोग निवारण के लिए अमोघ औषधि हैं। साधकों के लिए यह परम अमृत है। स्वर्ग का अमृत पीने से पुण्य क्षीण होते हैं। यह गीता का अमृत पीने से पाप नष्ट होकर परम शांति मिलती है, स्वस्वरूप का भान होता है।The practitioner gets elixir, ambrosia and feels like being in heaven. All sorts of sins are lost by the faithful learner. He identifies himself with his roots i.e., as a organ of the Almighty.
श्री गणेशायनमः। श्री सरस्वत्यै नमः। श्री गुरुभ्योनमः।
विनियोगः :: 
ॐ अस्य श्रीगुरुगीतास्तोत्रमंत्रस्य भगवान्‌ सदाशिवऋषिः। नानाविधानि छंदांसि। श्री गुरुपरमात्मा देवता। हं बीजं। सः शक्तिः। सोऽहं कीलकं। श्रीगुरुप्रसादसिद्धयर्थे जपे विनियोगः॥
अथ करन्यासः ::
ॐ हं सां सूर्यात्मने अंगुष्ठाभ्यां नमः।
ॐ हं सीं सोमात्मने तर्जनीभ्यां नमः।
ॐ हं सूं निरंजनात्मने मध्यमाभ्यां नमः।
ॐ हं सैं निराभासात्मने अनामिकाभ्यां नमः।
ॐ हं सौं अतनुसूक्ष्मात्मने कनिष्ठिकाभ्यां नमः।
ॐ हं सः अव्यक्तात्मने करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः।
इति करन्यासः। 
अथ हृदयादिन्यासः ::
ॐ हं सां सूर्यात्मने हृदयाय नमः।
ॐ हं सीं सोमात्मने शिरसे स्वाहा।
ॐ हं सूं निरंजनात्मने शिखायै वषट्।
ॐ हं सैं निराभासात्मने कवचाय हुं।
ॐ हं सौं अतनुसूक्ष्मात्मने नेत्रत्रयाय वौषट्।
ॐ हं सः अव्यक्तात्म्ने अस्राय फट्।
ॐ ब्रह्म भूर्भुवः स्वरोमिति दिग्बन्धः।
इति हृदयादिन्यासः।
अथ प्रथमोऽध्यायः
अचिन्त्याव्यक्तरूपाय निर्गुणाय गुणात्मने। 
समस्त जगदाधारमूर्तये ब्रह्मणे नमः॥1.1
जो ब्रह्म अचिन्त्य, अव्यक्त, तीनों गुणों (सत्, रज़ और तम) से रहित (फिर भी देखनेवालों के अज्ञान की उपाधि से) त्रिगुणात्मक और समस्त जगत का अधिष्ठान रूप है, ऐसे ब्रह्म को नमस्कार हो। 
I pray to the God who is free from  all characterises, who is beyond the limits of thoughts, who is undefined, has no title and represents the entire chain of galaxies and super galaxies. 
HE is shapeless, dimensionless & project HIMSELF in various forms as & when required for the welfare of his devotees. HE is the creator, nurturer and destroyers.  
ऋषयः ऊचुः :-
सूत सूत महाप्राज्ञ निगमागमपारग। 
गुरुस्वरूपमस्माकं ब्रूहि सर्वमलापहम्॥1.2॥
ऋषियों ने कहा :- हे महाज्ञानी, हे वेद-वेदांगों के निष्णात! प्यारे सूत जी! सर्व पापों का नाश करनेवाले गुरु का स्वरूप हमें सुनाओ। 
The sages addressed Sut Ji as an enlightened person well versed with the Veds (scriptures) and requested him to narrate the GURU GEETA to them so that they could sail through this universe and attain Salvation.
यस्य श्रवणमात्रेण देही दुःखाद्विमुच्यते।  
येन मार्गेण मुनयः सर्वज्ञत्वं प्रपेदिरे॥1.3॥
यत्प्राप्य न पुनर्याति नरः संसारबन्धनम्। 
तथाविधं परं तत्वं वक्तव्यमधुना त्वया॥1.4॥ 
जिसको सुनने मात्र से मनुष्य दुःख से विमुक्त हो जाता है, जिस उपाय से मुनियों ने सर्वज्ञता प्राप्त की है, जिसको प्राप्त करके मनुष्य फ़िर से संसार बन्धन में नहीं बँधता, ऐसे परम तत्व का कथन आप करें। 
Please narrate the ultimate sacred text having grasped-attained which, one becomes free from all sorts of worries-pains, tortures & all his bonds are broken & he do not fall in the trap of repeated births & rebirths. 
गुह्यादगुह्यतमं सारं गुरुगीता विशेषतः। 
त्वत्प्रसादाच्च श्रोतव्या तत्सर्वं ब्रूहि सूत नः॥1.5॥ 
जो तत्व परम रहस्यमय एवं श्रेष्ठ सारभूत है और विशेष कर जो गुरु गीता है, वह आपकी कृपा से हम सुनना चाहते हैं। प्यारे सूतजी! वे सब हमें सुनाइये। 
Please reveal the secrets, theme  forming the core of this sacred treatise. 
इति संप्राथितः सूतो मुनिसंघैर्मुहुर्मुहुः।
कुतूहलेन महता प्रोवाच मधुरं वचः॥1.6॥
इस प्रकार बार-बार प्रार्थना किये जाने पर सूत जी बहुत प्रसन्न होकर मुनियों के समूह से मधुर वचन बोले 
Repeated requests pleased Sut Ji and he spoke to the Muni's, in soothing words.
सूत उवाच :: 
श्रृणुध्वं मुनयः सर्वे श्रद्धया परया मुदा। 
वदामि भवरोगघ्नीं गीता मातृस्वरूपिणीम्॥1.7॥ 
सूतजी ने कहा :- हे सर्व मुनियों! संसार रूपी रोग का नाश करने वाली, मातृ स्वरूपिणी (माता के समान ध्यान रखने वाली) गुरु गीता कहता हूँ उसको आप अत्यंत श्रद्धा और प्रसन्नता से सुनिये 
Hey virtuous Muni's! I am presenting the Guru Geeta which vanishes the troubles (worries, sorrow, pains) caused by birth over the earth, which is like the mother. You should be extremely attentive, happily and devotion.
पुरा कैलासशिखरे सिद्धगन्धर्वसेविते।
तत्र कल्पलतापुष्पमन्दिरेऽत्यन्तसुन्दरे॥1.8॥
व्याघ्राजिने समासिनं शुकादिमुनिवन्दितम्। 
बोधयन्तं परं तत्वं मध्येमुनिगणंक्वचित्॥1.9॥
प्रणम्रवदना शश्वन्नमस्कुर्वन्तमादरात्। 
दृष्ट्वा विस्मयमापन्ना पार्वती परिपृच्छति॥1.10॥
प्राचीन काल में सिद्धों और गन्धर्वों के आवास रूप कैलास पर्वत के शिखर पर कल्पवृक्ष के फूलों से बने हुए अत्यंत सुन्दर मन्दिर  में, मुनियों के बीच व्याघ्रचर्म पर बैठे हुए, शुक आदि मुनियों द्वारा वन्दन किये जानेवाले और परम तत्व का बोध देते हुए भगवान् शिव को बार-बार नमस्कार करते देखकर, अतिशय नम्र मुख वाली पार्वती ने आश्चर्य चकित होकर पूछा।
Maa Parwati having extremely polite-soft face, saw the Muni's sitting over tiger skin, in the temple decorated with the flowers of Kalp Vraksh, over the Kaelash Mountain-abode of Bhagwan Shiv & Maa Parwati. Revered Muni's along with Suk Dev Ji, honoured Bhagwan Shiv, bowed before him repeatedly, seeking knowledge granting them Ultimate knowledge-enlightenment. Amazed Maa Parwati questioned Bhagwan Shiv.
पार्वत्युवाच ::
ॐ नमो देव देवेश परात्पर जगदगुरो 
त्वां नमस्कुर्वते भक्त्या सुरासुरनराः सदा॥1.11॥ 
पार्वती ने कहा :- हे ॐ कार के अर्थ स्वरूप, देवों के देव, श्रेष्ठों के श्रेष्ठ, हे जगदगुरो! आपको प्रणाम हो। देव दानव और मानव सब आपको सदा भक्तिपूर्वक प्रणाम करते हैं। 
Maa Parwati addressed Bhagwan Shiv as the embodiment of "ॐ" OMKAR, deity of deities, excellent amongest the excellent and the Mentor of the whole world. She bowed before him-offered oblations. The demigods and the Demons both revered you equally. 
विधिविष्णुमहेन्द्राद्यैर्वन्द्यः खलु सदा भवान्। 
नमस्करोषि कस्मै त्वं नमस्काराश्रयः किलः॥1.12॥
आप ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र आदि के नमस्कार के योग्य हैं। ऐसे नमस्कार के आश्रयरूप होने पर भी आप किसको नमस्कार करते हैं! 
You deserve to be respected by Bhagwan Brahma, Bhagwan Vishnu and Dev Raj Indr. You are the asylum-protector of these deities. With such a status, whom do you offer oblations-prayers, bows before!
भगवन् सर्वधर्मज्ञ व्रतानां व्रतनायकम्।  
ब्रूहि मे कृपया शम्भो गुरुमाहात्म्यमुत्तमम्॥1.13॥
हे भगवान्! हे सर्व धर्मों के ज्ञाता! हे शम्भो! जो व्रत सब व्रतों में श्रेष्ठ है, ऐसा उत्तम गुरु-माहात्म्य कृपा करके मुझे कहें। 
O God! O the enlightened with all Dharm-duties! O Shambho! Please reveal, describe, discuss the best form of Vrat-endeavour, undertaking to me kindly with its pious, virtuous, righteous results.
इति संप्रार्थितः शश्वन्महादेवो महेश्वरः। 
आनंदभरितः स्वान्ते पार्वतीमिदमब्रवीत्॥1.14॥
इस प्रकार (पार्वती देवी द्वारा) बार-बार प्रार्थना किये जाने पर महादेव ने अंतर से खूब प्रसन्न होते हुए पार्वती से इस प्रकार कहा। 
Bhagwan Shiv became deeply happy-pleased with the repeated requests of Maa Parwati and said-revealed the secrets of the treatise like this. 
महादेव उवाच ::
न वक्तव्यमिदं देवि रहस्यातिरहस्यकम्। 
न कस्यापि पुरा प्रोक्तं त्वद्भक्त्यर्थं वदामि तत्॥1.15॥
श्री महादेव जी ने कहा :- हे देवी! यह तत्व रहस्यों का भी रहस्य है, इसलिए कहना उचित नहीं। पहले किसी से भी नहीं कहा। फिर भी तुम्हारी भक्ति देखकर वह रहस्य कहता हूँ। 
Bhawan Shiv said that it constituted the most confidential-secret of all knowledge. I never revealed it before anyone prior to you. Its undesirable to disclose it. Still, I am very much pleased with your devotion and curiosity. 
As a matter of fact these sermons should never be discussed with the imprudent, illiterate, ignorant, atheists and those who do not wish to listen, understand, follow them.
मम् रूपासि देवि त्वमतस्तत्कथयामि ते 
लोकोपकारकः प्रश्नो न केनापि कृतः पुरा॥1.16॥
हे देवी! तुम मेरा ही स्वरूप हो इसलिए (यह रहस्य) तुमको कहता हूँ। तुम्हारा यह प्रश्न लोक का कल्याण कारक है। ऐसा प्रश्न पहले कभी किसी ने नहीं किया। Bhagwan Shiv addressed Maa Parwati as Devi-Goddess and said that she was like him & therefore, he would reveal the secret to her, since no one had asked him this before and her question was for the welfare of masses. 
यस्य देवे परा भक्ति, यथा देवे तथा गुरौ
त्स्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः॥1.17॥ 
जिसको ईश्वर में उत्तम भक्ति होती है, जैसी ईश्वर में वैसी ही भक्ति जिसको गुरु में होती है, ऐसे महात्माओं को ही यहाँ कही हुई बात समझ में आयेगी।
Those great souls-ascetics, who have solemn devotion in the Almighty and have the same feeling for the Guru, only can understand this doctrine., 
यो गुरु स शिवः प्रोक्तो, यः शिवः स गुरुस्मृतः। 
विकल्पं यस्तु कुर्वीत स नरो गुरुतल्पगः॥1.18॥ 
जो गुरु हैं वे ही शिव हैं, जो शिव हैं, वे ही गुरु हैं। दोनों में जो अन्तर मानता है वह गुरु पत्नी गमन करने वाले के समान पापी है। 
There is no difference between the Guru & Bhagwan Shiv. One who distinguish between the Guru & Bhagwan Shiv is sinned for intercourse with the wife of the Guru-teacher. 
Physically, they are different but intellectually, the distinction exists. Just by being a teacher no one can enjoy the status of the virtuous, righteous, pious teacher. During this era forget the presence of such virtuous people.  
वेद्शास्त्रपुराणानि चेतिहासादिकानि च। 
मंत्रयंत्रविद्यादिनिमोहनोच्चाटनादिकम्॥1.19॥
शैवशाक्तागमादिनि ह्यन्ये च बहवो मताः।  
अपभ्रंशाः समस्तानां जीवानां भ्रांतचेतसाम्॥1.20॥ 
जपस्तपोव्रतं तीर्थं यज्ञो दानं तथैव च। 
गुरु तत्वं अविज्ञाय सर्वं व्यर्थं भवेत् प्रिये॥1.21॥
हे प्रिये! वेद, शास्त्र, पुराण, इतिहास आदि मंत्र, यंत्र, मोहन, उच्चाट्न (खींचकर हटाना, उखाड़ना) आदि विद्या शैव, शाक्त, आगम और अन्य सर्व मत मतान्तर, ये सब बातें गुरु तत्व को जाने बिना भ्रान्त चित्त वाले जीवों को पथ भ्रष्ट करनेवाली हैं और जप-तप, व्रत, तीर्थ, यज्ञ, दान, ये सब व्यर्थ हो जाते हैं। 
O dear! The knowledge of Veds, scriptures, Puran, History, Mantr (sacred Shloks), Yantr, Mohan (hypnotism, Mesmerisation), Uchchatan (deflexion) etc. secret pieces of knowledge, Shaev, Shakt, Agam and all other different opinions-faiths are misleading and spoiling in the absence of virtuous teacher. Jap-Tap (recitations of prayers), Vrat (fasting), Tirth-Pilgrimage, Yagy-holy sacrifices in fire-oblations, Donations goes waste. 
The learned-enlightened teacher can provide necessary guidance to grasp & practices these secret pieces of sacred knowledge. This comes from one age of the teacher to next.
गुरुबुध्यात्मनो नान्यत् सत्यं सत्यं वरानने।
तल्लभार्थं प्रयत्नस्तु कर्त्तवयशच मनीषिभिः॥1.22॥ 
हे सुमुखी! आत्मा में गुरु बुद्धि के सिवा अन्य कुछ भी सत्य नहीं है, इसलिये इस आत्म ज्ञान को प्राप्त करने के लिये बुद्धिमानों को प्रयत्न करना चाहिये।
O Beautiful-pleasing! Nothing is true except the intelligent-prudence inculcated by the Guru in the soul. Hence the intelligent must try to attain self realisation.
सुमुखी :: सुन्दर मुखवाली स्त्री, दर्पण, संगीत में एक प्रकार की मूर्च्छना, सवैया छंद का तीसरा भेद जिसके प्रत्येक चरण में सात जगण और तब लघु और गुरु वर्ण होता है। मदिरा सवैया के आदि में लघु वर्ण जोड़ने से यह छंद बनता है। इसमें 11 और 12 वर्णों पर यति होती है, नीली अपराजिता। नीली कोयल, शंखपुष्पी, शंखाहुलि; Beautiful-pleasing. 
गूढाविद्या जगन्माया देहशचाज्ञानसम्भवः।  
विज्ञानं यत्प्रसादेन गुरुशब्देन कथयते॥1.23॥
जगत गूढ़ अविद्यात्मक माया रूप है और शरीर अज्ञान से उत्पन्न हुआ है। इनका विश्लेषणात्मक ज्ञान जिनकी कृपा से होता है, उस ज्ञान को गुरु कहते हैं।
The universe is intricate illusive and generated out of ignorance. One who imparts the analytic knowledge of it is called the Guru. 
देही ब्रह्म भवेद्यस्मात् त्वत्कृपार्थंवदामि तत्। 
सर्वपापविशुद्धात्मा श्रीगुरोः पादसेवनात्॥1.24॥
जिस गुरु देव के पाद सेवन से मनुष्य सर्व पापों से विशुद्धात्मा होकर ब्रह्म रूप हो जाता है, वह तुम पर कृपा करने के लिये कहता हूँ। 
To please you, I am revealing the traits-characterises, qualities of the teacher-Guru, by serving whom, one is purified-cleansed of all sins and becomes pure-pious just like the Brahm-The God.
शोषणं पापपंकस्य दीपनं ज्ञानतेजसः। 
गुरोः पादोदकं सम्यक् संसारार्णवतारकम्॥1.25॥ 
श्री गुरुदेव का चरणामृत पाप रूपी कीचड़-दलदल का सम्यक् शोषक है, ज्ञान तेज का सम्यक् उद्यीपक है और संसार सागर का सम्यक तारक है।
The blessings of the Guru can move one out of the sins which are like the mud. Enlightenment generated aura-energy which helps-one-the disciple to swim across the wast ocean constituting the world.
दलदल :: धसान, कच्छ भूमि, चहला, तंग हालत, नाज़ुक हालत; bog, marsh, quagmire.
अज्ञानमूलहरणं जन्मकर्मनिवारकम्। 
ज्ञानवैराग्यसिद्ध्यर्थं गुरुपादोदकं पिबेत्॥1.26॥
अज्ञान की जड़ को उखाड़ने वाले, अनेक जन्मों के कर्मों को निवारने वाले, ज्ञान और वैराग्य को सिद्ध करने वाले श्री गुरुदेव के चरणा मृत का पान करना चाहिये।
One must serve the enlightened teacher-Guru whole heartedly who vanishes-removes his ignorance, evils-sins of several births, inculcating enlightenment and renunciation in his disciple.
The ancient system of learning was based upon Ashram Paddhati, in which the disciple used to remain in the Guru Kul, till the age of 25 years and learnt all that he desired. He functioned a unit of the Ashram, involving himself in farming, grazing of cattle, building of huts and several other functions. 
स्वदेशिकस्यैव च नामकीर्तनम्भ वेदनन्तस्यशिवस्य कीर्तनम् 
स्वदेशिकस्यैव च नामचिन्तनम्भ वेदनन्तस्यशिवस्य नामचिन्तनम्॥1.27॥
अपने गुरुदेव के नाम का कीर्तन अनंत स्वरूप भगवान् शिव का ही कीर्तन है।  अपने गुरुदेव के नाम का चिंतन अनंत स्वरूप भगवान्  शिव का ही चिंतन है।
The learner-disciple had to subject himself to the directives of the Guru considering him at par with Bhagwan Shiv. 
Remembering the Guru is quoted as if one is remembering the God. 
काशीक्षेत्रं निवासश्च जाह्नवी चरणोदकम्।
गुरुर्विश्वेश्वरः साक्षात् तारकं ब्रह्मनिश्चयः॥1.28॥
गुरुदेव का निवास स्थान काशी क्षेत्र है। श्री गुरुदेव का पादोदक गँगा जी है। गुरुदेव भगवान्  विश्वनाथ और निश्चय ही साक्षात् तारक ब्रह्म हैं।
The Guru Ashram is just like Kashi, the abode of Bhagwan Shiv. Equate the Guru with Bhagwan Vishw Nath i.e., Shiv and the water left over after washing his feet is equated with Maa Ganga. The Guru is just like the Brahm who make it easy to swim over the vast ocean of reincarnations and tide over all difficulties in life.   
गुरुसेवा गया प्रोक्ता देहः स्यादक्षयो वटः। 
तत्पादं विष्णुपादं स्यात् तत्रदत्तमनस्ततम्॥1.29॥
गुरुदेव की सेवा ही तीर्थराज गया है। गुरुदेव का शरीर अक्षय वट वृक्ष है। गुरुदेव के श्री चरण भगवान्  विष्णु के श्री चरण हैं। वहाँ लगाया हुआ मन तदाकार हो जाता है। 
Serving the Guru is just like visiting holy places-shrines i.e., pilgrimage. The body of the Guru is like Vat Vraksh. Treat his feet like that of Bhagwan Shri Hari Vishnu from where Maa Ganga appears. One who subject himself to that environment becomes like them all. 
गुरुवक्त्रे स्थितं ब्रह्म प्राप्यते तत्प्रसादतः। 
गुरोर्ध्यानं सदा कुर्यात् पुरूषं स्वैरिणी यथा॥1.30॥ 
ब्रह्म श्री गुरुदेव के मुखारविन्द (वचनामृत) में स्थित है। वह ब्रह्म उनकी कृपा से प्राप्त हो जाता है। इसलिये जिस प्रकार स्वेच्छाचारी स्त्री अपने प्रेमी पुरुष का सदा चिंतन करती है, उसी प्रकार सदा गुरुदेव का ध्यान करना चाहिये।
The Brahm is present in the mouth-lips, words which pour elixir-ambrosia to the ears of the student. Its only the Guru who makes him near and dear to the Almighty. One must remember the Guru just like a bold-independent, lascivious woman who always thinks of her mate. 
स्वाश्रमं च स्वजातिं च स्वकीर्ति पुष्टिवर्धनम्। 
एतत्सर्वं परित्यज्य गुरुमेव समाश्रयेत्॥1.31॥
अपने आश्रम (ब्रह्मचर्याश्रमादि) जाति, कीर्ति (पद प्रतिष्ठा), पालन-पोषण, ये सब छोड़ कर गुरुदेव का ही सम्यक् आश्रय लेना चाहिये। 
The disciple-student should forget-discard his caste-Varn, status (as prince, son of a rich trader or poverty stricken Brahmn), name-fame, nourishment by the parents and confine himself to the directives of the Guru.   
गुरुवक्त्रे स्थिता विद्या गुरुभक्त्या च लभ्यते। 
त्रैलोक्ये स्फ़ुटवक्तारो देवर्षिपितृमानवाः॥1.32॥  
विद्या गुरुदेव के मुख में रहती है और वह गुरुदेव की भक्ति से ही प्राप्त होती है। यह बात तीनों लोकों में देव, ॠषि, पितृ और मानवों द्वारा स्पष्ट रूप से कही गई है। 
The deities-demigods, Rishis-ascetics Manes & the enlightened humans in all the three abodes declare that the education is present in the mouth of the Guru & is attained by respecting-honouring the Guru.
As a matter of fact-practice traditionally, the students was made to learn, remember, grasp an apply in his day to day life the knowledge-gist of Veds, scriptures, astrology etc. and the line of speciality out of the 64 branches of learning taught at the Guru Ashram. Understanding the text & its applicability was an essential feature. Human brain has vast capacity & capabilities. The most learned-highly qualified person, intelligent, genius  uses just 2% of his brain. 
गुकारश्चान्धकारो हि रुकारस्तेज उच्यते। 
अज्ञानग्रासकं ब्रह्म गुरुरेव न संशयः॥1.33॥
‘गु’ शब्द का अर्थ है अंधकार (अज्ञान) और ‘रु’ शब्द का अर्थ है प्रकाश (ज्ञान)।अज्ञान को नष्ट करनेवाल जो ब्रह्मरूप प्रकाश है वह गुरु है। इसमें कोई संशय नहीं है। 
Gu-गु stands for darkness-ignorance and Ru-रु means light. The person who is like the Brahm-God, eliminates the darkness-evils of the follower-student. There is no doubt in it. 
गुकारश्चान्धकारस्तु रुकारस्तन्निरोधकृत्। 
अन्धकारविनाशित्वात् गुरुरित्यभिधीयते॥1.34॥
‘गु’ कार अंधकार है और उसको दूर करनेवाल ‘रु’ कार है। अज्ञानरूपी अन्धकार को नष्ट करने के कारण ही गुरु कहलाते हैं।
This is the Guru, who inculcate values, virtues, righteousness, piousness in the Brahmchari-the disciple by removing his ignorance. Here Ru-रु means remover of darkness-ignorance.  
गुकारश्च गुणातीतो रूपातीतो रुकारकः।
गुणरूपविहीनत्वात् गुरुरित्यभिधीयते॥1.35॥
‘गु’ कार से गुणातीत कहा जाता है, ‘रु’ कार से रूपातीत कहा जाता है। गुण और रूप से पर होने के कारण ही गुरु कहलाते हैं। 
Gu-गु stands for transcendental-The Supreme (God) and Ru-रु comes for converted-brought into form. The Guru has no person identity of his own. He just conveys the knowledge granted to him by the Almighty. 
गुणातीत :: गुणों से अल्पित, परे और भिन्न, जिसका सत्त्व, रज आदि गुणों से कोई सम्बन्ध  न हो और जो इन सब से परे हो, परमात्मा या ब्रह्म की संज्ञा, परमात्मा; Beyond the Gun-traits, qualities, characteristics, a title of the unqualified Supreme being-Transcendental, free from or beyond all properties. जो धीर मनुष्य दुःख-सुख में सम तथा अपने स्वरूप में स्थित रहता है; जो मिट्टी के ढ़ेले, पत्थर और सोने में सम रहता है; जो प्रिय-अप्रिय में सम रहता है, जो अपनी निंदा-स्तुति में सम रहता है; जो मान-अपमान में सम रहता है; जो मित्र-शत्रु के पक्ष में सम रहता है और जो सम्पूर्ण कर्मों के आरम्भ का त्यागी है, वह मनुष्य गुणातीत कहा जाता है। जो मनुष्य प्रकृति जन्य गुणों से दूर-उदासीन-सम-तटस्थ है, वह गुणातीत है; (beyond virtues, unqualified supreme being). The patient-courageous-steadfast, who remains equanimous (indifferent, neutral) in pleasure & pain and stabilised in himself; weighs gold, like a lump of clay and stone equally; remains unaffected towards likes & dislikes; neutral towards insult & honour (censure and in praise); maintains normal relations with both friends and foes; has rejected new ventures since beginning; is relinquished, detached, renounced, transcended.
गुकारः प्रथमो वर्णो मायादि गुणभासकः। 
रुकारोऽस्ति परं ब्रह्म मायाभ्रान्तिविमोचकम्॥1.36॥
गुरु शब्द का प्रथम अक्षर गु माया आदि गुणों का प्रकाशक है और दूसरा अक्षर रु कार माया की भ्रान्ति से मुक्ति देनेवाला पर ब्रह्म है। 
Gu गु of Guru illustrate the illusion of the Almighty (the world in its self is illusory-embodiment of Maa Bhagwati) & Ru रु of Guru is the Brahm who brings one out of the enchantment.  
सर्वश्रुतिशिरोरत्नविराजितपदांबुजम्। 
वेदान्तार्थप्रवक्तारं तस्मात्संपूजयेद् गुरुम्॥1.37॥
गुरु सर्व श्रुति रूप श्रेष्ठ रत्नों से सुशोभित चरण कमल वाले हैं और वेदान्त के अर्थ के प्रवक्ता हैं। इसलिये श्री गुरुदेव की पूजा करनी चाहिये।
The Guru deserve respect-reverence, worshipped, since he is the one who possess the Shruti and is the narrator of Vedant-gist-elixir of Veds.
The Veds & the scriptures used to be propagated through the words of mouth by the Guru & the disciple utilized them by listening, understanding and application in life.
यस्यस्मरणमात्रेण ज्ञानमुत्पद्यते स्वयम्।
सः एव सर्वसम्पत्तिः तस्मात्संपूजयेद् गुरुम्॥1.38॥
जिनके स्मरण मात्र से ज्ञान अपने आप प्रकट होने लगता है और वे ही सर्व (शम-दमादि) सम्पदा रूप हैं। अतः श्री गुरुदेव की पूजा करनी चाहिये।
The Guru has to be worshipped since, just by remembering him, desired knowledge start pouring automatically. The Guru has attained this calibre by practising Sham-Dam, restraining body, mind & soul).
Lov-Kush got the sacred knowledge of Astr-Shastr and scriptures from Balmiki & Bhagwan Shri Krashn & Balram Ji attained all 64 arts & sciences through this technique fro Guru Sandeepan. This is just like transfer of information by using chips, hard disc etc. 
शम-दमादि गुण :: इनका आधार योगाभ्यास में तत्पर योगी अपनी योग विद्या के प्रचार से योग विद्या चाहने वालों का आत्म बल बढ़ाता हुआ सब जगह सूर्य के समान प्रकाशित होता है। मर्यादा-भक्ति में भगवद्प्राप्ति शमदमादि साधनों से होती है, किंतु पुष्टि-भक्ति में भक्त को किसी साधन की आवश्यकता न होकर मात्र भगवद्कृपा का आश्रय होता है। मर्यादा-भक्ति स्वीकार्य करते हुए भी पुष्टि-भक्ति ही श्रेष्ठ मानी गई है।
संसारवृक्षमारूढ़ाः पतन्ति नरकार्णवे। 
यस्तानुद्धरते सर्वान् तस्मै श्रीगुरवे नमः॥1.39॥
संसार रूपी वृक्ष पर चढ़े हुए लोग नरक रूपी सागर में गिरते हैं। उन सबका उद्धार करने वाले गुरुदेव को नमस्कार हो।  
I bow before the Guru who rescue the one who has dropped into the hells from the world of evils. 
एक एव परो बन्धुर्विषमे समुपस्थिते। 
गुरुः सकलधर्मात्मा तस्मै श्रीगुरवे नमः॥1.40॥
जब विकट परिस्थिति उपस्थित होती है, तब वे ही एक मात्र परम बान्धव  हैं और सब धर्मों के आत्म स्वरूप हैं।  ऐसे गुरुदेव को नमस्कार हो।
I prostrate-bow before the Guru who acts like the only relative-friend in an hour of need and is the embodiment of Dharm (Varnashram Dharm, duties, endeavours).
भवारण्यप्रविष्टस्य दिड्मोहभ्रान्तचेतसः। 
येन सन्दर्शितः पन्थाः तस्मै श्रीगुरवे नमः॥1.41॥
संसार रूपी अरण्य में प्रवेश करने के बाद दिग्मूढ़ की स्थिति में (जब कोई मार्ग नहीं दिखाई देता है), चित्त भ्रमित हो जाता है, उस समय जिसने मार्ग दिखाया उन गुरुदेव को नमस्कार हो। 
When badly-miserably confused, unable to find way-path in worldly forest, innerself misguided, brain stopped working; the Guru brought the disciple out of confusion and showed him the right direction. 
तापत्रयाग्नितप्तानां अशान्तप्राणीनां भुवि। 
गुरुरेव परा गंगा तस्मै श्रीगुरुवे नमः॥1.42॥
इस पृथ्वी पर त्रिविध ताप (आधि, व्याधि, उपाधि) रूपी अग्नी से जलने के कारण अशांत हुए प्राणियों के लिए गुरुदेव ही एक मात्र उत्तम गँगा जी हैं। ऐसे गुरुदेव को नमस्कार हो।
One experiences three kinds of troubles, tortures, sorrow, pains :- mental, physical & natural-from the society. Its the Guru who brings out the troubled follower-disciple.
तीन प्रकार के दुःख :- आधि, व्याधि एवं उपाधि। आधि :- मानसिक कष्ट, व्याधि :- शारीरिक कष्ट एवं उपाधि :- प्रकृति जन्य व समाज द्वारा पैदा किया गया दुःख। 
सप्तसागरपर्यन्तं तीर्थस्नानफलं तु यत्। 
गुरुपादपयोबिन्दोः सहस्रांशेन तत्फलम्॥1.43॥
सात समुद्र पर्यन्त के सर्व तीर्थों में स्नान करने से जितना फल मिलता है वह फल गुरुदेव के चरणामृत के एक बिन्दु के फल का हजारवाँ हिस्सा है।
The virtues gained by bathing in pious reservoirs of water-(holy rivers, ponds, lakes like Ganga, Man Sarovar) pilgrimage, till the end of oceans, are just one thousandth fraction-part of the gain obtained by serving the Guru. 
शिवे रुष्टे गुरुस्त्राता गुरौ रुष्टे न कश्चन। 
लब्ध्वा कुलगुरुं सम्यग्गुरुमेव समाश्रयेत्॥1.44॥
यदि भगवान् शिव नारज़ हो जायें तो गुरुदेव बचाने वाले हैं, किन्तु यदि गुरुदेव नाराज़ हो जायें तो बचाने वाला कोई नहीं। अतः गुरुदेव को संप्राप्त करके सदा उनकी शरण में रेहना चाहिए। 
The Guru is ready-capable of protecting the disciple from the rage, fury, anger of Bhagwan Shiv. But, if the Guru is angry no one can protect.
Bhagwan Shiv is the Ultimate Guru. All branches of learning emerge out of him. 
गुकारं च गुणातीतं रुकारं रुपवर्जितम्। 
गुणातीतमरूपं च यो दद्यात् स गुरुः स्मृतः॥1.45॥
गुरु शब्द का गु अक्षर गुणातीत अर्थ का बोधक है और रु अक्षर रूप रहित स्थिति का बोधक है। ये दोनों (गुणातीत और रूपातीत) स्थितियाँ जो देते हैं, उनको गुरु कहते हैं।
Gu गु of Guru is explains that he is beyond the limits of characterises & Ru रु describes his shapelessness-formless. One grants both these is termed as Guru-the educator. 
The God exhibits HIMSELF in both ways without form and with form. Here the Guru has the traits of the God who inculcate goodness, nourishes his goodness-virtues and destroys his weaknesses-evils. 
अत्रिनेत्रः शिवः साक्षात् द्विबाहुश्च हरिः स्मृतः। 
योऽचतुर्वदनो ब्रह्मा श्रीगुरुः कथितः प्रिये॥1.46॥
हे प्रिये! गुरु ही त्रिनेत्र रहित (दो नेत्र वाले) साक्षात् शिव हैं, दो हाथ वाले भगवान् विष्णु हैं और एक मुख वाले ब्रह्मा जी हैं। 
The Guru is like three eyed Bhagwan Shiv with two eyes, Bhagwan Vishnu with two hands & Bhagwan Brahma with one mouth. 
As a whole the Guru represent the trinity :- Brahma, Vishnu, Mahesh. 
देवकिन्नरगन्धर्वाः पितृयक्षास्तु तुम्बुरुः। 
मुनयोऽपि न जानन्ति गुरुशुश्रूषणे विधिम्॥1.47॥
देव, किन्नर, गंधर्व, पितृ, यक्ष, तुम्बुरु (गंधर्व का एक प्रकार) और मुनि लोग भी गुरु सेवा की विधि नहीं जानते। 
The divine creations like Demigods, Kinnars, Gandharv, Manes, Yaksh and Rishi Tumbru-with the mouth of horse playing Veena Like Dev Rishi Narad, too are unaware of the methods for worshipping-serving the Guru.
तार्किकाश्छान्दसाश्चैव देवज्ञाः कर्मठः प्रिये।
लौकिकास्ते न जानन्ति गुरुतत्वं निराकुलम्॥1.48॥
हे प्रिये! तार्किक, वैदिक, ज्योतिषि, कर्म काँडी तथा लौकिक जन निर्मल गुरुतत्व को नहीं जानते। 
Those who argue (debate, reason and apply logic) to each and every thing, Vedic scholars, astrologers, Pandits expert in Karm Kand-experts in performing sacred sacrifices in holy fire and the normal humans are not aware of the significance of the Guru.
In modern times its rather impossible to search for-find such an enlightened Guru. Till today, I am unable to meet such a virtuous person due to bad luck (my deeds in previous births & rebirths).  
यज्ञिनोऽपि न मुक्ताः स्युः न मुक्ताः योगिनस्तथा।
तापसा अपि नो मुक्त गुरुतत्वात्पराड्मुखाः॥1.49॥
यदि गुरुतत्व से प्राड्मुख हो जाये तो याज्ञिक मुक्ति नहीं पा सकते, योगी मुक्त नहीं हो सकते और तपस्वी भी मुक्त नहीं हो सकते। 
One who is not blessed-devoid of this faculty of having an enlightened Guru, can not attain Salvation, be he a Yogi, ascetic or a person performing Yagy. 
न मुक्तास्तु गन्धर्वः पितृयक्षास्तु चारणाः। 
ॠष्यः सिद्धदेवाद्याः गुरुसेवापराड्मुखाः॥1.50॥
गुरु सेवा से विमुख गंधर्व, पितृ, यक्ष, चारण, ॠषि, सिद्ध और देवता आदि भी मुक्त नहीं होंगे। 
Gandarbh, Pitr-Manes, Yaksh, Charan, Rishi, Siddh and the demigods who alienate-do not serve their Guru will not be able to seek emancipation-Salvation. 
इति श्री स्कान्दोत्तरखण्डे उमामहेश्वरसंवादे श्री गुरुगीतायां प्रथमोऽध्यायः।
ब्रह्मानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिं। 
द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्वमस्यादिलक्ष्यम्॥2.1॥
एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षिभूतम्। 
भावतीतं त्रिगुणरहितं सदगुरुं तं नमामि॥2.2॥
जो ब्रह्मानंद स्वरूप हैं, परम सुख देनेवाले हैं जो केवल ज्ञान स्वरूप हैं, (सुख, दुःख, शीत-उष्ण आदि) द्वन्द्वों से रहित हैं, आकाश के समान सूक्ष्म और सर्वव्यापक हैं, तत्वमसि (वह तू ही है, वह दूर नहीं है, बहुत पास है, पास से भी ज्यादा पास है, तेरा होना ही वही है।) आदि महावाक्यों के लक्ष्यार्थ हैं, एक हैं, नित्य हैं, मल रहित हैं, अचल हैं, सर्व बुद्धियों के साक्षी हैं, भावना से परे हैं, सत्व, रज और तम तीनों गुणों से रहित हैं ऐसे सदगुरुदेव को मैं नमस्कार करता हूँ। 
I bow-prostrate before the enlightened teacher who is like the Brahma Nand-bliss, grants ultimate pleasure-comforts, is an embodiment of Gyan-knowledge, is free from tensions-distortions like pleasure-pain, hot-cold, minute like the sky-space and broad-spreaded all over uniformly, he is too close & too far, is unique, free from shit (evils, waste), witness of all sorts of intelligence-prudence, has no feelings, free from the three Gun-characteristics :- Satv, Raj & Tam; 
गुरुपदिष्टमार्गेण मनः शिद्धिं तु कारयेत्। 
अनित्यं खण्डयेत्सर्वं यत्किंचिदात्मगोचरम्॥2.3॥
श्री गुरुदेव के द्वारा उपदिष्ट मार्ग से मन की शुद्धि करनी चाहिए। जो कुछ भी अनित्य वस्तु अपनी इन्द्रियों की विषय हो जायें उनका खण्डन (निराकरण) करना चाहिए। The disciple-student should follow the teachings of the Guru and cleanse his innerself through the means prescribed by the Guru. Anything which attracts the sense organs, make him habitual should be totally rejected.  
किमत्रं बहुनोक्तेन शास्त्रकोटिशतैरपि। 
दुर्लभा चित्तविश्रान्तिः विना गुरुकृपां पराम्॥2.4॥
यहाँ ज्यादा कहने से क्या लाभ!? श्री गुरुदेव की परम कृपा के बिना करोड़ों शास्त्रों से भी चित्त की विश्रांति दुर्लभ है। 
Its possible to resolve all intricacies without learning million of scriptures-Shastr for the peace of mind, solace, tranquillity with the blessings of the Guru.
करुणाखड्गपातेन छित्त्वा पाशाष्टकं शिशोः। 
सम्यगानन्दजनकः सदगुरु सोऽभिधीयते॥[गुरु गीता 2.5]
एवं श्रुत्वा महादेवि गुरुनिन्दा करोति यः। 
स याति नरकान् घोरान् यावच्चन्द्रदिवाकरौ॥[गुरु गीता 2.6]
करुणा रूपी तलवार के प्रहार से शिष्य के आठों पाशों (संशय, दया, भय, संकोच, निन्दा, प्रतिष्ठा, कुलाभिमान और संपत्ति) को काटकर निर्मल आनन्द देनेवाले को सदगुरु कहते हैं। ऐसा सुनने पर भी जो मनुष्य गुरुनिन्दा करता है, वह (मनुष्य) जब तक सूर्य चन्द्र का अस्तित्व रहता है तब तक घोर नरक में रहता है। 
The Guru can break 8 kinds of bond-attachments, eliminate them Viz., doubt, pity, fear, hesitation, blasphemy (reproach, damn, reprehension), honour, pride of the high clan and property just by showing pity-kindness towards the disciple producing amusement in him. Anyone who, even after knowing all this, slur-criticise, blaspheme the teacher, has to remain in the ultimate-most troublesome hells till the existence of Sun & Moon.
यावत्कल्पान्तको देहस्तावद्देवि गुरुं स्मरेत् 
गुरुलोपो न कर्त्तव्यः स्वच्छन्दो यदि वा भवेत् ॥2.7॥
हे देवी! देह कल्प के अन्त तक रहे तब तक श्री गुरुदेव का स्मरण करना चाहिए और आत्मज्ञानी होने के बाद भी (स्वच्छन्द अर्थात् स्वरूप का छन्द मिलने पर भी) शिष्य को गुरुदेव की शरण नहीं छोड़नी चाहिए।
The disciple should remain under the protection of the Guru till the body lasts, even if the body exists till the end of Kalp-Brahma's day. He should be under the asylum of the Guru even after self realisation or attaining independence.
हुंकारेण न वक्तव्यं प्राज्ञशिष्यै कदाचन 
गुरुराग्रे न वक्तव्यमसत्यं तु कदाचन॥2.8॥
श्री गुरुदेव के समक्ष प्रज्ञावान् शिष्य को कभी हुँकार (ललकारने का शब्द, उग्र और ज़ोर का शब्द) शब्द से (मैने ऐसे किया... वैसा किया) नहीं बोलना चाहिए और कभी असत्य नहीं बोलना चाहिए। 
The prudent student should never speak lies-untruth before the teacher or make a sound called Hunkar.
Hunkar is challenging high pitch tone, furious (violent, hot blooded) voice.
उग्र :: तीव्र, हिंसक, हिंस्र, प्रचंड, उत्तेजित, गरम मिज़ाज। 
गुरुं त्वंकृत्य हुंकृत्य गुरुसान्निध्यभाषणः। 
अरण्ये निर्जले देशे संभवेद् ब्रह्मराक्षसः॥2.9॥
गुरुदेव के समक्ष जो हुँकार शब्द से बोलता है अथवा गुरुदेव को तू कहकर जो बोलता है वह निर्जन मरुभूमि में ब्रह्मराक्षस होता है। 
One who shouts-speak in furious voice or address the Guru Tu-you, reborn as Brah Rakshas in desert-baron lands.
Entire belt consisting of Arab world in deserts has the people with no virtues or morals. They are termed as barbarians.
अद्वैतं भावयेन्नित्यं सर्वावस्थासु सर्वदा।
कदाचिदपि नो कुर्यादद्वैतं गुरुसन्निधौ॥2.10॥
सदा और सर्व अवस्थाओं में अद्वैत की भावना करनी चाहिए, परन्तु गुरुदेव के साथ अद्वैत की भावना कदापि नहीं करनी चाहिए। 
The follower should not find duality with the God in any condition-circumstances. But he should not be treated as a singular in the company of the students. 
The Guru and the students form a unit in the Ashram, where his wife, children and the family of other teachers reside. It functions as a close knit, independent unit, producing all essential commodities.   
दृश्यविस्मृतिपर्यन्तं कुर्याद् गुरुपदार्चनम्।
तादृशस्यैव कैवल्यं न च तद्व्यतिरेकिणः॥2.11॥
जब तक दृश्य प्रपंच की विस्मृति न हो जाय, तब तक गुरु देव के पावन चरणार विन्द की पूजा-अर्चना करनी चाहिए। ऐसा करने वाले को ही कैवल्य पद की प्रप्ति होती है, इसके विपरीत करने वाले को नहीं होती। 
The devotee-disciple should continue serving the Guru till he breathes his last, to attain Kaevaly Pad-a form of Salvation. If one fails to do that he is denied the Ultimate abode.
अपि संपूर्णतत्त्वज्ञो गुरुत्यागी भवेद्ददा। 
भवेत्येव हि तस्यान्तकाले विक्षेपमुत्कटम्॥2.12॥
संपूर्ण तत्त्वज्ञ भी यदि गुरु का त्याग कर दे तो मृत्यु के समय उसे महान् विक्षेप अवश्य हो जाता है। 
Even if one who knows Gist-Ultimate truth of the Brahm, rejects the Guru; he faces extreme trouble at the time of his death.  
गुरौ सति स्वयं देवी परेषां तु कदाचन। 
उपदेशं न वै कुर्यात् तदा चेद्राक्षसो भवेत्॥2.13॥
हे देवी! गुरु के रहने पर अपने आप कभी किसी को उपदेश नहीं देना चाहिए। इस प्रकार उपदेश देने वाला ब्रह्म राक्षस होता है। 
The disciple should not preach-teach till the Guru is alive or in his presence (however if the Guru desires so, he may proceed with the doctrines of Dharm, scriptures etc. with his permission & blessings). One who goes against this postulate gets rebirth as a Brahm Raksh.
न गुरुराश्रमे कुर्यात् दुष्पानं परिसर्पणम्।  
दीक्षा व्याख्या प्रभुत्वादि गुरोराज्ञां न कारयेत्॥2.14॥
गुरु के आश्रम में नशा नहीं करना चाहिए, टहलना नहीं चाहिए। दीक्षा देना, व्याख्यान करना, प्रभुत्व दिखाना और गुरु को आज्ञा करना, ये सब निषिद्ध हैं। 
The student should never use narcotics or any other intoxicant. He should not loiter aimlessly around the Ashram. He should not induce anyone to the fore-clan, explain any para of the learning material, show his might-dignity or order his Guru. All these things are not allowed-banned.
नोपाश्रमं च पर्यंकं न च पादप्रसारणम्।
नांगभोगादिकं कुर्यान्न लीलामपरामपि॥2.15॥
गुरु के आश्रम में अपना छप्पर और पलंग नहीं बनाना चाहिए, (गुरुदेव के सम्मुख) पैर नहीं पसारना, शरीर के भोग नहीं भोगने चाहिए और अन्य लीलाएँ नहीं करनी चाहिए। 
One should not dwell his hut or prepare the bed in the Guru's Ashram in front of him or in his presence. He should never stretch his legs before him. Use of any luxury good is forbidden. In addition to this, the disciple should not create scenes-ruckus there in the Ashram. 
Cleaning of thatched hut or spraying of mat is a part of daily routine which has to be carried as per procedure followed in the Ashram.
गुरुणां सदसद्वापि यदुक्तं तन्न लंघयेत्।
कुर्वन्नाज्ञां दिवारात्रौ दासवन्निवसेद् गुरौ॥2.16॥
गुरुओं की बात सच्ची हो या झूठी, परन्तु उसका कभी उल्लंघन नहीं करना चाहिए।रात और दिन गुरुदेव की आज्ञा का पालन करते हुए उनके सान्निध्य में दास बन कर रहना चाहिए। 
The student never contradict, counter, deny or falsify the words of the Guru whether they are correct or wrong-false. He should serve the Guru day & night like  a slave, remaining close to him. 
अदत्तं न गुरोर्द्रव्यमुपभुंजीत कहिर्चित्। 
दत्तं च रंकवद् ग्राह्यं प्राणोप्येतेन लभ्यते॥2.17॥
जो द्रव्य गुरुदेव ने नहीं दिया हो, उसका उपयोग कभी नहीं करना चाहिए। गुरुदेव के दिये हुए द्रव्य को भी गरीब की तरह ग्रहण करना चाहिए। उससे प्राण भी प्राप्त हो सकते हैं। 
One should not use the money which is not received from the Guru. He can use the money obtained from the Guru like a poor person. This may grant him longevity, (even bring him back to life if dead). 
पादुकासनशय्यादि गुरुणा यदभिष्टितम्। 
नमस्कुर्वीत तत्सर्वं पादाभ्यां न स्पृशेत् क्वचित्॥2.18॥
पादुका, आसन, बिस्तर आदि जो कुछ भी गुरुदेव के उपयोग में आते हों उन सर्व को नमस्कार करने चाहिए और उनको पैर से कभी नहीं छूना चाहिए। 
The sleepers, seat-cushion, bed etc., used by the Guru should be honoured by the student, bow to them and never touch them with feet. 
गच्छतः पृष्ठतो गच्छेत् गुरुच्छायां न लंघयेत्। 
नोल्बणं धारयेद्वेषं नालंकारास्ततोल्बणान्॥2.19॥
चलते हुए गुरुदेव के पीछे चलना चाहिए, उनकी परछाईं का भी उल्लंघन नहीं करना चाहिए। गुरुदेव के समक्ष कीमती वेशभूषा, आभूषण आदि धारण नहीं करने चाहिए। 
While walking after the Guru, he should maintain respectable distance and never cross his shadow. He should never wear costly cloths, ornaments etc. in front of the teacher. 
गुरुनिन्दाकरं दृष्ट्वा धावयेदथ वासयेत्। 
स्थानं वा तत्परित्याज्यं जिह्वाच्छेदाक्षमो यदि॥2.20॥
गुरुदेव की निन्दा करने वाले को देखकर यदि उसकी जिह्वा काट डालने में समर्थ न हो तो उसे अपने स्थान से भगा देना चाहिए। यदि वह ठहरे तो स्वयं उस स्थान का परित्याग करना चाहिए।
The disciple should cut the tongue of the person defaming-blaspheming the Guru if capable of doing that or at least run him away from that place. If he is incapable, he himself should desert that place. 
मुनिभिः पन्नगैर्वापि सुरैवा शापितो यदि।  
कालमृत्युभयाद्वापि गुरुः संत्राति पार्वति॥2.21॥
हे पार्वती! मुनियों, पन्नगों (सर्प) और देवताओं के शाप से तथा यथा काल आये हुए मृत्यु के भय से भी शिष्य को गुरुदेव बचा सकते हैं। 
The enlightened Guru is capable of protecting his disciple from the curse of the Muni, snakes and the demigods-deities.
पन्नग :: साँप, जड़ी-बूटी,  पदम काठ, सीसा; snake, herb, a king of wood called Padam Kath, Lead. 
विजानन्ति महावाक्यं गुरोश्चरणसेवया। 
ते वै संन्यासिनः प्रोक्ता इतरे वेषधारिणः॥2.22॥
गुरुदेव के श्री चरणों की सेवा करके महावाक्य के अर्थ को जो समझते हैं, वे ही सच्चे संन्यासी हैं, अन्य तो मात्र वेशधारी हैं।
One who understand the value of serving the Guru is a true saint, rest are merely impostors in the form of sages, recluse, hermits. 
नित्यं ब्रह्म निराकारं निर्गुणं बोधयेत् परम्।
भासयन् ब्रह्मभावं च दीपो दीपान्तरं यथा॥2.23॥
गुरु वे हैं जो नित्य, निर्गुण, निराकार, परम ब्रह्म का बोध देते हुए, जैसे एक दीपक दूसरे दीपक को प्रज्ज्वलित करता है वैसे, शिष्य में ब्रह्म भाव को प्रकटाते हैं। 
The Guru can fill the disciple with the flame-enlightenment, energy of forever-eternal, free from characterises, without form Almighty, makes him feel the presence of the creator-God. 
गुरुप्रादतः स्वात्मन्यात्मारामनिरिक्षणात्। 
समता मुक्तिमर्गेण स्वात्मज्ञानं प्रवर्तते॥2.24॥
श्री गुरुदेव की कृपा से अपने भीतर ही आत्मानंद प्राप्त करके समता और मुक्ति के मार्ग द्वारा शिष्य आत्म ज्ञान को उपलब्ध होता है।
Self realisation, bliss equanimity and Salvation are granted-evolved in the disciple by the worthy Guru. 
स्फ़टिके स्फ़ाटिकं रूपं दर्पणे दर्पणो यथा। 
तथात्मनि चिदाकारमानन्दं सोऽहमित्युत॥2.25॥
जैसे स्फ़टिक मणि में स्फ़टिक मणि तथा दर्पण में दर्पण दिख सकता है, उसी प्रकार आत्मा में जो चित् और आनन्दमय दिखाई देता है, वह मैं हूँ। 
The manner, the Quartz Crystal is visible in it and the mirror is seen in mirror I am-Bhagwan Shiv is visible in the one-devotee-enlightened, seen in the soul as psyche-innerself and the Bliss. 
स्फ़टिक मणि :: एक प्रकार का सफेद बहुमूल्य पारदर्शी पत्थर या रत्न, जिसका व्यवहार मालाएँ, मूर्तियाँ तथा दस्ते आदि बनाने में होता है। इसके भेद :- बिल्लौर, (पेबुल), सूर्यकांत मणि, काँच, सीशा, कपूर, फिटकरी, a Gem-Sury Kant Mani. 
Bhagwan Shiv is the Ultimate Guru and Kal as well. HE was present prior to evolution when Bhagwan Vishnu evolved followed by Brahma Ji.  
अंगुष्ठमात्रं पुरुषं ध्यायेच्च चिन्मयं हृदि। 
तत्र स्फ़ुरति यो भावः श्रुणु तत्कथयामि ते॥2.26॥
हृदय में अंगुष्ठ मात्र परिमाण वाले चैतन्य पुरुष का ध्यान करना चाहिए। वहाँ जो भाव स्फ़ुरित होता है, वह मैं तुम्हें कहता हूँ, सुनो।
The disciple-devotee concentrate in the Almighty present in his heart of the size of thumb.
अजोऽहममरोऽहं च ह्यनादिनिधनोह्यहम्। 
अविकारश्चिदानन्दो ह्यणियान् महतो महान्॥2.27॥
मैं अजन्मा हूँ, मैं अमर हूँ, मेरा आदि नहीं है, मेरी मृत्यु नहीं है। मैं निर्विकार हूँ, मैं चिदानन्द हूँ, मैं अणु से भी छोटा हूँ और महान् से भी महान् हूँ। 
I AM (The Almighty) unborn. I AM forever (imperishable, eternal), I have no beginning, I AM free from death, I AM defect less, I AM Ultimate Bliss, I AM smaller than the Atom-Molecule (minutest) I AM greatest amongst the greatest. 
चिदानन्द :: वह परमात्मा जो परम और नित्य चेतन सत्ता, जगत का मूल कारण और सत्, चित्त, आनन्द स्वरूप है, चैतन्य और आनन्दमय पर ब्रह्म; Ultimate Bliss. 
अपूर्वमपरं नित्यं स्वयं ज्योतिर्निरामयम्।
विरजं परमाकाशं ध्रुवमानन्दमव्ययम्॥2.28॥
अगोचरं तथाऽगम्यं नामरूपविवर्जितम्। 
निःशब्दं तु विजानीयात्स्वाभावाद् ब्रह्म पर्वति॥2.29॥
हे पार्वती! ब्रह्म को स्वभाव से ही अपूर्व (जिससे पूर्व कोई नहीं ऐसा), अद्वितीय, नित्य, ज्योतिस्वरूप, निरोग, निर्मल, परम आकाशस्वरूप, अचल, आनन्दस्वरूप, अविनाशी, अगम्य, अगोचर, नाम-रूप से रहित तथा निःशब्द जानना चाहिए। 
The Brahm is unique, has no precedent, forever, aura-energy, free from illness-diseases, pure, Ultimate like the sky, immovable, Ultimate Bliss, imperishable, unreachable-beyond the reach of sense organs, free from names-titles and quite. 
अगोचर :: इंद्रियातीत, अप्रकट, वह जो देखा न जा सके, ब्रह्म; inconspicuous, unmarked.
यथा गन्धस्वभावत्वं कर्पूरकुसुमादिषु।
शीतोष्णस्वभावत्वं तथा ब्रह्मणि शाश्वतम्॥2.30॥
जिस प्रकार कपूर, फ़ूल इत्यादि में गन्धत्व, (अग्नि में) उष्णता और (जल में) शीतलता स्वभाव से ही होते हैं, उसी प्रकार ब्रह्म में शाश्वतता भी स्वभाव सिद्ध है।
HIS presence in flowers like the smell, heat in fire, coolness like water, eternity (continuity, prolongevity) as Brahm is self established.  
शाश्वतता :: शाश्वत, निरंतरता; eternity, perpetuity.
यथा निजस्वभावेन कुंडलकटकादयः। 
सुवर्णत्वेन तिष्ठन्ति तथाऽहं ब्रह्म शाश्वतम्॥2.31॥
जिस प्रकार कटक (पैर का कड़ा), कुण्डल आदि आभूषण स्वभाव से ही सुवर्ण हैं, उसी प्रकार मैं स्वभाव से ही शाश्वत ब्रह्म हूँ।
I am imperishable-eternal Brahm just as the anklet, ear rings, ornaments are gold.
There are infinite universes and each and every universe-world has the Trinity of Brahma, Vishnu & Mahesh. Out of these three the Mahesh-Bhagwan Sada Shiv last longer, four times as compared to Brahma Ji, twice as long as Bhagwan Shri Hari Vishnu. Since, Sada Shiv is Maha Kal he is present at all times.  
कटक :: समूह, पैर का कड़ा; spine.
स्वयं तथाविधो भूत्वा स्थातव्यं यत्रकुत्रचित्। 
कीटो भृंग इव ध्यानात् यथा भवति तादृशः॥2.32॥
स्वयं वैसा होकर किसी न किसी स्थान में रहना। जैसे कीड़ा भ्रमर का चिन्तन करते-करते भ्रमर हो जाता है, वैसे ही जीव ब्रह्म का धयान करते-करते ब्रह्म स्वरूप हो जाता है।
भ्रमर :: भौंरा, black beetle.
One has to adopt himself according to place where he live just as the insect which turns into Bilni or black beetle thinking of Bilni all the times. A person who always think of the Brahm-Almighty too become like HIM just as he keep on thinking & thinking of the GOD. 
Kans always thought of Bhagwan Shri Krashn, though as an enemy, merged with HIM after as death. Shishu Pal, too did keep on thinking of Bhagwan Shri Krashn & he too immersed in HIM.
गुरोर्ध्यानेनैव नित्यं देही ब्रह्ममयो भवेत्। 
स्थितश्च यत्रकुत्रापि मुक्तोऽसौ नात्र संशयः॥2.33॥
सदा गुरुदेव का ध्यान करने से जीव ब्रह्म मय हो जाता है। वह किसी भी स्थान में रहता हो फ़िर भी मुक्त ही है। इसमें कोई संशय नहीं है। 
The learner-follower acquires the traits-qualities of his enlightened Guru thinking of him-concentrating in him. Through the blessings of the Guru, he remains free from worldly matters and ultimately achieves Salvation. 
ज्ञानं वैराग्यमैश्वर्यं यशः श्री समुदाहृतम्। 
षड्गुणैश्वर्ययुक्तो हि भगवान् श्री गुरुः प्रिये॥2.34॥
हे प्रिये! भगवत्स्व रूप श्री गुरुदेव ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य (Opulence, grandeur, वैभव, शोभा), यश, लक्ष्मी और मधुर वाणी, ये छः गुण रूप ऐश्वर्य से संपन्न होते हैं। 
वैराग्य :: शांति, स्थिरता, संतोष, निस्तब्धता, तपस्या, मान हानि, संयम, हड्डी, माँस आदि का सड़ना; renunciation, detachment from the world, quietness, mortification, quietude.
By virtue of the blessings of the Guru who is like the God, the learner-devotee, follower attains enlightenment, renunciation, opulence, name & fame, wealth and pleasing-smoothing voice-words six gifts. 
गुरुः शिवो गुरुर्देवो गुरुर्बन्धुः शरीरिणाम्।
गुरुरात्मा गुरुर्जीवो गुरोरन्यन्न विद्यते॥2.35॥
मनुष्य के लिए गुरु ही शिव हैं, गुरु ही देव हैं, गुरु ही बान्धव हैं गुरु ही आत्मा हैं और गुरु ही जीव हैं। (सचमुच) गुरु के सिवा अन्य कुछ भी नहीं है।
For a human being the Guru is like Bhagwan Shiv-Ultimate Guru, deities-demigods, relatives, soul and an organism. In reality their is nothing except a renounced Guru. 
एकाकी निस्पृहः शान्तः चिंतासूयादिवर्जितः। 
बाल्यभावेन यो भाति ब्रह्मज्ञानी स उच्यते॥2.36॥
अकेला, कामना रहित, शान्त, चिन्ता रहित, ईर्ष्या रहित और बालक की तरह जो शोभता है, वह ब्रह्म ज्ञानी कहलाता है।
One who remains alone-in solitude, free from desires, quite-peaceful, free from worries, envy just like a child is Brahmn Gyani-one who knows the Gist (elixir, nectar) of the God. 
न सुखं वेदशास्त्रेषु न सुखं मंत्रयंत्रके।
गुरोः प्रसादादन्यत्र सुखं नास्ति महीतले॥2.37॥
वेदों और शास्त्रों में सुख नहीं है, मंत्र और यंत्र में सुख नहीं है। इस पृथ्वी पर गुरु देव के कृपा प्रसाद के सिवा अन्यत्र कहीं भी सुख नहीं है।
Veds, scriptures have no pleasure-comfort, Mantr and Yantr-machines  do not provide solace-happiness. The blessings of the Guru provides all these things automatically.
Reading of Veds-scriptures is of no use if one is not able to apply the Gist of this knowledge in daily life. Recitation of Mantr and possession of machines to do not grantee comforts, happiness. Its the Guru who enable the disciple to use the knowledge to his practical use. 
चावार्कवैष्णवमते सुखं प्रभाकरे न हि। 
गुरोः पादान्तिके यद्वत्सुखं वेदान्तसम्मतम्॥2.38॥
गुरुदेव के श्री चरणों में जो वेदान्त निर्दिष्ट सुख है, वह सुख न चावार्क मत में, न वैष्णव मत में और न प्रभाकर (साँख्य) मत में है।
The happiness generated by understanding the Gist of Vedant is more as compared to other philosophies like Charvak, Vaeshnav and Sankhy.
Veds are the source of highest scientific & engineering knowledge provided one is able to understand and apply it for the social welfare. It has been proved beyond doubt that the present scientific discoveries have nothing new. It has been all been said and practices from time immemorial.
न तत्सुखं सुरेन्द्रस्य न सुखं चक्रवर्तिनाम्।
यत्सुखं वीतरागस्य मुनेरेकान्तवासिनः॥2.39॥ 
एकान्तवासी वीतराग मुनि को जो सुख मिलता है, वह सुख न इन्द्र को और न चक्रवर्ती राजाओं को मिलता है। 
The pleasure gained by the enunciated practitioner in solitude, remembering the Almighty is far-far better-superior than the pleasure to Indr (the King of Heaven, demigods) or the emperors who have won the earth from one end to another. 
Pleasure and pains are merely conditions which arise and vanish according to the deeds performed by one in his present or previous lives. 
नित्यं ब्रह्मरसं पीत्वा तृप्तो यः परमात्मनि।
इन्द्रं च मन्यते रंकं नृपाणां तत्र का कथा॥2.40॥
हमेशा ब्रह्म रस का पान करके जो परमात्मा में तृप्त हो गया है, वह (मुनि) इन्द्र को भी गरीब मानता है, तो राजाओं की तो बात ही क्या? 
The Muni (one who speaks too little) who is deeply dissolved in the nectar-elixir, ambrosia of the God, has attained ultimate satisfaction.
He do not need any thing. 
यतः परमकैवल्यं गुरुमार्गेण वै भवेत्। 
गुरुभक्तिरतिः कार्या सर्वदा मोक्षकांक्षिभिः॥2.41॥
मोक्ष की आकांक्षा करनेवालों को गुरु भक्ति खूब करनी चाहिए, क्योंकि गुरुदेव के द्वारा ही परम मोक्ष की प्राप्ति होती है।  
One desirous of Salvation-Moksh must serve the Guru with devotion. 
एक एवाद्वितीयोऽहं गुरुवाक्येन निश्चितः। 
एवमभ्यास्ता नित्यं न सेव्यं वै वनान्तरम्॥2.42॥
अभ्यासान्निमिषणैव समाधिमधिगच्छति। 
आजन्मजनितं पापं तत्क्षणादेव नश्यति॥2.43॥
गुरुदेव के वाक्य की सहायता से जिसने ऐसा निश्चय कर लिया है कि मैं एक और अद्वितीय हूँ और उसी अभ्यास में जो रत है, उसके लिए अन्य वनवास का सेवन आवश्यक नहीं है, क्योंकि अभ्यास से ही एक क्षण में समाधि लग जाती है और उसी क्षण इस जन्म तक के सब पाप नष्ट हो जाते हैं। 
With the help of the Guru, one who has decided that he is unique (a fraction of the Almighty-God) does not need isolation in forests-jungles (caves or Mountain), since he gets the capability to attain stanch meditation with in seconds leading to loss of sins. 
गुरुर्विष्णुः सत्त्वमयो राजसश्चतुराननः। 
तामसो रूद्ररूपेण सृजत्यवति हन्ति च॥2.44॥
गुरुदेव ही सत्वगुणी होकर विष्णु रूप से जगत का पालन करते हैं, रजोगुणी होकर ब्रह्मारूप से जगत का सर्जन करते हैं और तमोगुणी होकर शंकर रूप से जगत का संहार करते हैं। 
Guru support-nurture the universe-the disciple, as Bhagwan Vishnu with Satv Gun, creates it like Brahma with the Rajo Gun and destroys the sins by attaining the characterises of Mahesh with Tamo Gun.  
तस्यावलोकनं प्राप्य सर्वसंगविवर्जितः। 
एकाकी निःस्पृहः शान्तः स्थातव्यं तत्प्रसादतः॥2.45॥
उनका (गुरुदेव का) दर्शन पाकर, उनके कृपा प्रसाद से सर्व प्रकार की आसक्ति छोड़कर एकाकी, निःस्पृह और शान्त होकर रहना चाहिए। 
Having seen the Guru the disciple should loose all sorts of attachments and become alone, unattached and quite (solace, peaceful) by his grace.
The learner-disciple had to resort to Yog-asceticism in the Ashram under the patronage of the enlightened Guru. 
सर्वज्ञपदमित्याहुर्देही सर्वमयो भुवि। 
सदाऽनन्दः सदा शान्तो रमते यत्र कुत्रचित्॥2.46॥
जो जीव इस जगत में सर्वमय, आनंदमय और शान्त होकर सर्वत्र विचरता है, उस जीव को सर्वज्ञ कहते हैं। One is called omniscient who moves every where recognised-patronised by all, full of joy-happiness & peaceful.
सर्वज्ञ :: सब कुछ जानने वाला, भगवान् श्री हरी विष्णु;  omniscient, Almighty. 
सर्वमय :: सब के द्वारा मान्य, जिसे सब लोग मानते हों, जिससे सब सहमत हों; recognised, patronised by all, one with whom all agree, 
यत्रैव तिष्ठते सोऽपि स देशः पुण्यभाजनः। 
मुक्तस्य लक्षणं देवी तवाग्रे कथितं मया॥2.47॥
ऐसा पुरुष जहाँ रहता है वह स्थान पुण्यतीर्थ है। हे देवी! तुम्हारे सामने मैंने मुक्त पुरूष का लक्षण कहा। 
A detached has these traits as I have described above. The place where he lives turns into a holy place-pilgrimage site. 
यद्यप्यधीता निगमाः षडंगा आगमाः प्रिये।
आध्यामादिनि शास्त्राणि ज्ञानं नास्ति गुरुं विना॥2.48॥
हे प्रिये! मनुष्य चाहे चारों वेद पढ़ ले, वेद के छः अंग पढ़ ले, आध्यात्म शास्त्र आदि अन्य सर्व शास्त्र पढ़ ले फ़िर भी गुरु के बिना ज्ञान नहीं मिलता। 
One remains without enlightenment even if he reads the four Veds, six segments-commentaries of the Veds and all scriptures.
Merely reading, mugging, cramming does not helps. Learning follows understanding, analysis-synthesis, application, skill development, ability, interest and appreciation. 
शिवपूजारतो वापि विष्णुपूजारतोऽथवा। 
गुरुतत्वविहीनश्चेत्तत्सर्वं व्यर्थमेव हि॥2.49॥
शिव जी की पूजा में रत हो या विष्णु की पूजा में रत हो, परन्तु गुरुतत्व के ज्ञान से रहित हो तो वह सब व्यर्थ है।
Learning goes waste even after praying to Bhagwan Shiv or Bhagwan Shri Hari Vishnu without the patronage-blessing of the Guru. 
While praying, one has to be solely concentrated in the Almighty. His mind should not deviate hither or thither. The Guru has attained such a stage that he can help the disciple in devoting himself into the feet of the God. 
सर्वं स्यात्सफलं कर्म गुरुदीक्षाप्रभावतः। 
गुरुलाभात्सर्वलाभो गुरुहीनस्तु बालिशः॥2.50॥
गुरुदेव की दीक्षा के प्रभाव से सब कर्म सफल होते हैं। गुरुदेव की संप्राप्ति रूपी परम लाभ से अन्य सर्वलाभ मिलते हैं। जिसका गुरु नहीं वह मूर्ख है।
दीक्षा :: संस्कार, दीक्षा, नियुक्ति, विधान; initiation, ordination.
संप्राप्ति :: वह शारीरिक अवस्था जो शरीर में किसी रोग के रोगाणु पहुँचने, उस रोग के परिपक्व होने और बाह्य लक्षण उपस्थित होने तक माना जाता है, प्राप्त होने, हाथ में आने या मिलने की क्रिया या भाव, घटना का घटित होना; attainment.
One without a Guru-guide is ignorant-duffer, idiot. All efforts become fruitful by the ordination of the Guru. Attainment of a virtuous Guru leads to ultimate gains (Salvation-detachment) and all sorts of gains, comforts. 
Dharm (Varnashram Dharm, performance of duties, discharging liabilities),  Arth (earning), Kam (marriage, sex) & Moksh are the 4 gains one has to achieve in his life. 
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन सर्वसंगविवर्जितः। 
विहाय शास्त्रजालानि गुरुमेव समाश्रयेत्॥2.51॥
इसलिए सब प्रकार के प्रयत्न से अनासक्त होकर, शास्त्र की मायाजाल छोड़कर गुरुदेव की ही शरण लेनी चाहिए। 
One should get detached, avoid the intricacies of scriptures and come under the asylum of the Guru.
Knowledge of the Veds-scriptures, history is essential but if there is difficulty in understanding them, then the disciple should seek interpretations-explanations from the enlightened Guru, who would guide him to achieve what he needs. 
ज्ञानहीनो गुरुत्याज्यो मिथ्यावादी विडंबकः। 
स्वविश्रान्ति न जानाति परशान्तिं करोति किम्॥2.52॥ 
ज्ञान रहित, मिथ्या बोलने वाले और दिखावट करने वाले गुरु का त्याग कर देना चाहिए, क्योंकि जो अपनी ही शांति पाना नहीं जानता, वह दूसरों को क्या शांति दे सकेगा।
One should reject the Guru who is not well versed with scriptures-Shastr, speaks lies, shows off. A person who himself does not know-understand the gist of the Veds, how to achieve peace, solace tranquillity, can not help his followers. 
This is an age in which the society is full of such impostors. Therefore, the subject should himself analyse the knowledge of the person, he has to accept as Guru. Please refer to :: SAFFRON CLAD-IMPOSTORS पाखण्डी-ढ़ोंगी-धूर्त-ठग bhartiyshiksha.blogspot.com
शिलायाः किं परं ज्ञानं शिलासंघप्रतारणे।  
स्वयं तर्तुं न जानाति परं निसतारेयेत्कथम्॥2.53॥
पत्थरों के समूह को तैराने का ज्ञान पत्थर में कहाँ से हो सकता है? जो खुद तैरना नहीं जानता वह दूसरों को क्या तैरायेगा। 
The person who himself do not swimming can not help-teach others how to swim!?A stone can not have the skill to sail stones.
न वन्दनीयास्ते कष्टं दर्शनाद् भ्रान्तिकारकः। 
वर्जयेतान् गुरुन् दूरे धीरानेव समाश्रयेत्॥2.54॥
जो गुरु अपने दर्शन से (दिखावे से) शिष्य को भ्रान्ति में ड़ालता है, ऐसे गुरु को प्रणाम नहीं करना चाहिए। इतना ही नहीं दूर से ही उसका त्याग करना चाहिए। ऐसी स्थिति में धैर्यवान् गुरु का ही आश्रय लेना चाहिए।
The person who influences the public with his attires, confuse the followers; does not deserve respect. He should be solely discarded at once. One should seek asylum under a well versed patient Guru.  
पाखण्डिनः पापरता नास्तिका भेदबुद्धयः। 
स्त्रीलम्पटा दुराचाराः कृतघ्ना बकवृतयः॥2.55॥ 
कर्मभ्रष्टाः क्षमानष्टाः निन्द्यतर्कैश्च वादिनः। 
कामिनः क्रोधिनश्चैव हिंस्राश्चंड़ाः शठस्तथा॥2.56॥
ज्ञानलुप्ता न कर्तव्या महापापास्तथा प्रिये।  
एभ्यो भिन्नो गुरुः सेव्य एकभक्त्या विचार्य च॥2.57॥
भेद बुद्धि उत्पन्न करने वाले, स्त्री लम्पट, दुराचारी, नमक हराम, बगुले की तरह ठगने वाले, क्षमा रहित, निन्दनीय तर्कों से वितंडावाद करने वाले, कामी, क्रोधी, हिंसक, उग्र, शठ तथा अज्ञानी और महापापी पुरुष को गुरु नहीं बनाना चाहिए। ऐसा विचार करके ऊपर दिये लक्षणों से भिन्न लक्षणों वाले गुरु की एक निष्ठ भक्ति से सेवा करनी चाहिए। 
ठग :: चाटुकार, चापलूस, फुरतीला मनुष्य, झांसिया, वंचक, दुष्ट, उचक्का, चोर; smoothie, swindler.
शठ :: शातिर, दुष्ट, चालाक, मक्कार, कुटिल, शैतान; Chatter, rogue, crafty, wicked.
उग्र :: तीव्र, हिंसक, हिंस्र, प्रचंड, उत्तेजित, प्रंचड, गरम मिज़ाज; furious, fiery, hot blooded, violent.
One should not accept a person as Guru who generate confusion-makes wrong-misleading interpretations of scriptures, sensual-lascivious, bad charactered, treacherous, swindler, lack forgiveness-who do not pardon others, gives unsustainable arguments, cheat, sexual, furious-who become angry, violent, ignorant, rogue, furious-fiery. 
Normally, in ancient India, the Guru had an image, identity as virtuous, righteous, pious, holy, truthful person. His name & fame brought the kids to his Ashram at an early age 5-6 years. Their knowledge and enlightenment were known throughout India & abroad. Their devotion to God was well known. Their integrity was unparalleled.
सत्यं सत्यं पुनः सत्यं धर्मसारं मयोदितम्।  
गुरुगीता समं स्तोत्रं नास्ति तत्वं गुरोः परम्॥2.58॥
गुरुगीता के समान अन्य कोई स्तोत्र नहीं है। गुरु के समान अन्य कोई तत्व नहीं है।समग्र धर्म का यह सार मैंने कहा है, यह सत्य है, सत्य है और बार-बार सत्य है। There is no other source to grant peace (solace, enlightenment, Salvation). No one equals the Guru to provide gist of Almighty. This is the gist of all the Dharm. Its ultimate truth. 
अनेन यद् भवेद् कार्यं तद्वदामि तव प्रिये। 
लोकोपकारकं देवि लौकिकं तु विवर्जयेत्॥2.59॥
हे प्रिये! इस गुरुगीता का पाठ करने से जो कार्य सिद्ध होता है, अब वह कहता हूँ। हे देवी! लोगों के लिए यह उपकारक है। मात्र लौकिक का त्याग करना चाहिए। Learning of Guru Geeta helps in execution of all deeds-endeavours. It helps the learners in all possible ways. It tells that one has to reject only the worldly acts and continue working for the next abode.
लौकिकाद्धर्मतो याति ज्ञानहीनो भवार्णवे। 
ज्ञानभावे च यत्सर्वं कर्म निष्कर्म शाम्यति॥2.60॥
जो कोई इसका उपयोग लौकिक कार्य के लिए करेगा वह ज्ञानहीन होकर संसाररूपी सागर में गिरेगा। ज्ञान भाव से जिस कर्म में इसका उपयोग किया जाएगा वह कर्म निष्कर्म में परिणत होकर शांत हो जाएगा। 
One, who will utilise the knowledge granted by Guru Geeta for worldly purposed will fall from grace and continue hovering-venturing in this vast ocean in the form of world, i.e., he will not attain Salvation. One, who will exercise this deep knowledge, will sail through and will neutralise all his worldly deeds and become quite with solace. 
इमां तु भक्तिभावेन पठेद्वै शृणुयादपि। 
लिखित्वा यत्प्रसादेन तत्सर्वं फलमश्नुते॥2.61॥
भक्ति भाव से इस गुरुगीता का पाठ करने से, सुनने से और लिखने से वह (भक्त) सब फल भोगता है। 
The devotee attains all that he desires by reading, writing or listening to this sacred text-Guru Geeta.
गुरुगीतामिमां देवि हृदि नित्यं विभावय। 
महाव्याधिगतैदुःखैः सर्वदा प्रजपेन्मुदा॥2.62॥
हे देवी! इस गुरुगीता को नित्य भावपूर्वक हृदय में धारण करो। महा व्याधि वाले दुःखी लोगों को सदा आनंद से इसका जप करना चाहिए। 
Let this secret knowledge be absorbed in the mind. Those suffering from grave troubles should keep on reciting this to get rid of pains, sorrow, all sorts of troubles. 
गुरुगीताक्षरैकैकं मंत्रराजमिदं प्रिये। 
अन्ये च विविधा मंत्राः कलां नार्हन्ति षोड्शीम्॥2.63॥
हे प्रिये! गुरुगीता का एक-एक अक्षर मंत्रराज है। अन्य जो विविध मंत्र हैं, वे इसका सोलहवाँ भाग भी नहीं। 
All letters-words of this text are superiors to other Shloks-sacred verses. The other texts are not equal-comparable to 1/16th part of this holy text, in granting enlightenment. 
अनन्तफलमाप्नोति गुरुगीताजपेन तु। 
सर्वपापहरा देवि सर्वदारिद्रयनाशिनी॥2.64॥
हे देवी! गुरुगीता के जप से अनंत फल मिलता है। गुरुगीता सर्व पाप को हरने वाली और सर्व दारिद्रय का नाश करने वाली है। 
Guru Geeta grants infinite gains by purifying one of sins & removal of poverty.
This sacred text goes with the devotee in his next births and he keeps on practicing its holy tenets to ultimately attain assimilation in the God. 
अकालमृत्युहंत्री च सर्वसंकटनाशिनी। 
यक्षराक्षसभूतादिचोरव्याघ्रविघातिनी॥2.65॥
गुरुगीता अकाल मृत्यु को रोकती है, सब संकटों का नाश करती है, यक्ष, राक्षस, भूत, चोर और बाघ आदि का घात करती है।
Guru Geeta prevents untimely death, protects one from all troubles and keeps off Yaksh, Rakshas, spirits, thieves and the tigers.
सर्वोपद्रवकुष्ठदिदुष्टदोषनिवारिणी। 
यत्फलं गुरुसान्निध्यात्तत्फलं पठनाद् भवेत्॥2.66॥
गुरुगीता सब प्रकार के उपद्रवों, कुष्ठ और दुष्ट रोगों और दोषों का निवारण करनेवाली है। श्री गुरुदेव के सान्निध्य से जो फल मिलता है, वह फल इस गुरुगीता का पाठ करने से मिलता है। 
Learning understanding and application of Guru Geeta grants the benefits, one deserves from the company of an enlightened guru. It eliminates all sorts of hindrances-disturbances, troubles, the diseases like tuberculosis, even Corona and all sorts of defects. 
महाव्याधिहरा सर्वविभूतेः सिद्धिदा भवेत्। 
अथवा मोहने वश्ये स्वयमेव जपेत्सदा॥2.67॥
इस गुरुगीता का पाठ करने से महाव्याधि दूर होती है, सर्व ऐश्वर्य और सिद्धियों की प्राप्ति होती है। मोहन में अथवा वशीकरण में इसका पाठ स्वयं ही करना चाहिए।
Recitation of this treatise grants elimination of all sorts of dreaded diseases, all  sorts of comforts and accomplishments. One who is practicing mesmerisation & hypnotism, has to recite it by himself. 
मोहनं सर्वभूतानां बन्धमोक्षकरं परम्।
देवराज्ञां प्रियकरं राजानं वश्मानयेत्॥2.68॥
इस गुरुगीता का पाठ करने वाले पर सर्व प्राणी मोहित हो जाते हैं, बन्धन में से परम मुक्ति मिलती है, देवराज इन्द्र को वह प्रिय होता है और राजा उसके वश होता है।One who practice this treatise attracts all and gets freedom from bonds-ties, becomes dear to the king of heavens-Dev Raj Indr and the King-authorities are controlled by him.  
मुखस्तम्भकरं चैव गुणाणां च विवर्धनम्।
दुष्कर्मनाश्नं चैव तथा सत्कर्मसिद्धिदम्॥2.69॥
इस गुरुगीता का पाठ शत्रु का मुख बन्द करनेवाला है, गुणों की वृद्धि करनेवाला है, दुष्कृत्यों का नाश करनेवाला और सत्कर्म में सिद्धि देनेवाला है। 
It shuts the mouth of the enemies, enhances the virtues, eliminates the vices and grants accomplishment in righteous, virtuous, pious deeds. 
असिद्धं साधयेत्कार्यं नवग्रहभयापहम्।
दुःस्वप्ननाशनं चैव सुस्वप्नफलदायकम्॥2.70॥
इसका पाठ असाध्य कार्यों की सिद्धि कराता है, नव ग्रहों का भय हरता है, दुःस्वप्न का नाश करता है और सुस्वप्न के फल की प्राप्ति कराता है। 
One who learns this, attains all sorts of accomplishments, fears of the planets is lost, bad dreams never trouble him and he sees virtuous dreams. 
मोहशान्तिकरं चैव बन्धमोक्षकरं परम्
स्वरूपज्ञाननिलयं गीतशास्त्रमिदं शिवे॥2.71॥
हे शिवे! यह गुरुगीता रूपी शास्त्र मोह को शान्त करने वाला, बन्धन में से परम मुक्त करने वाला और स्वरूप ज्ञान का भण्डार है।
मोह :: टोना, संमोहन, जादू, प्यार, लाड, चाव, ममता; worldly affections, fascination, endearment, disenchant.
Guru Geeta cuts the bonds-ties and grants detachment-renunciation. It removes desires, worldly affections and allurements. It boosts knowledge.
यं यं चिन्तयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्चयम्। 
नित्यं सौभाग्यदं पुण्यं तापत्रयकुलापहम्॥2.72॥
व्यक्ति जो-जो अभिलाषा करके इस गुरुगीता का पठन-चिन्तन करता है, उसे वह निश्चय ही प्राप्त होता है। यह गुरुगीता नित्य सौभाग्य और पुण्य प्रदान करने वाली तथा तीनों तापों (आधि, व्याधि, उपाधि) का शमन करनेवाली है। 
One who reads-listen this treatise-Guru Geeta, with some desires in his mind gets the desires fulfilled. It eliminates all types of troubles, tensions, tortures. It grants good luck and virtues to the reader. 
सर्वशान्तिकरं नित्यं तथा वन्ध्यासुपुत्रदम्। 
अवैधव्यकरं स्त्रीणां सौभाग्यस्य विवर्धनम्॥2.73॥
यह गुरुगीता सब प्रकार की शांति करनेवाली, वन्ध्या स्त्री को सुपुत्र देने वाली, सधवा स्त्री के वैध्व्य का निवारण करनेवाली और सौभाग्य की वृद्धि करनेवाली है। 
The learner is blessed with peace (solace, tranquillity), infertile woman is blessed with sons, widowhood does not occur and good luck shines. 
आयुरारोग्मैश्वर्यं पुत्रपौत्रप्रवर्धनम्। 
निष्कामजापी विधवा पठेन्मोक्षमवाप्नुयात्॥2.74॥
यह गुरुगीता आयुष्य, आरोग्य, ऐश्वर्य और पुत्र-पौत्र की वृद्धि करनेवाली है। कोई विधवा निष्काम भाव से इसका जप-पाठ करे तो मोक्ष की प्राप्ति होती है। 
It grants longevity with good health, comforts-luxuries, sons & grand sons. If a widow learns and practices she become entitled to Salvation-Moksh.  
अवैधव्यं सकामा तु लभते चान्यजन्मनि। 
सर्वदुःखभयं विघ्नं नाश्येत्तापहारकम्॥2.75॥
यदि वह (विधवा) सकाम होकर जप करे तो अगले जन्म में उसको संताप हरनेवाल अवैध्व्य (सौभाग्य) प्राप्त होता है। उसके सब दुःख, भय, विघ्न और संताप का नाश होता है। 
If a widow recites this with desires, she gets rebirth and her husband is granted long life so that she do not face widowhood again. All her troubles, fears, disturbances, worries, pains & sorrow are lost.
सर्वपापप्रशमनं धर्मकामार्थमोक्षदम्। 
यं यं चिन्तयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्चितम्॥2.76॥
इस गुरुगीता का पाठ सब पापों का शमन करता है, धर्म, अर्थ और मोक्ष की प्राप्ति कराता है। इसके पाठ से जो-जो आकांक्षा की जाती है वह अवश्य सिद्ध होती है।Guru Geeta fulfils all desires and grants Dharm, Arth & Moksh. It vanishes all sins-evils one had acquired.
लिखित्वा पूजयेद्यस्तु मोक्षश्रियम्वाप्नुयात्। 
गुरूभक्तिर्विशेषेण जायते हृदि सर्वदा॥2.77॥
यदि कोई इस गुरुगीता को लिखकर उसकी पूजा करे तो उसे लक्ष्मी और मोक्ष की प्राप्ति होती है और विशेष कर उसके हृदय में सर्वदा गुरुभक्ति उत्पन्न होती रहती है।
One who writes this treatise and pray to it, attains Laxmi-wealth & Moksh-Salvation. His heart (mind & soul) are filled with the devotion to Guru (Bhagwan Shiv is Ultimate Guru). 
जपन्ति शाक्ताः सौराश्च गाणपत्याश्च वैष्णवाः। 
शैवाः पाशुपताः सर्वे सत्यं सत्यं न संशयः॥2.78॥
शक्ति के, सूर्य के, गणपति के, शिव के और पशुपति के मतवादी इसका (गुरुगीता का) पाठ करते हैं, यह सत्य है, सत्य है इसमें कोई संदेह नहीं है।
Its a fact-truth that the devotees of Shakti (Maa Bhagwati Parwati), Sury-Sun, Ganpati (son of Maa Parwati & Bhagwan Shiv), Bhagwan Shiv and Pashu Pati Nath (God of the animals including Humans Bhagwan Shiv) prays to it, there is no doubt in it.  
जपं हीनासनं कुर्वन् हीनकर्माफलप्रदम्। 
गुरुगीतां प्रयाणे वा संग्रामे रिपुसंकटे॥2.79॥
जपन् जयमवाप्नोति मरणे मुक्तिदायिका। 
सर्वकमाणि सिद्धयन्ति गुरुपुत्रे न संशयः॥2.80॥
बिना आसन किया हुआ जप नीच कर्म हो जाता है और निष्फल हो जाता है। यात्रा में, युद्ध में, शत्रुओं के उपद्रव में गुरुगीता का जप-पाठ करने से विजय  मिलता है। मरणकाल में जप करने से मोक्ष मिलता है। गुरुपुत्र के (शिष्य के) सर्व कार्य सिद्ध होते हैं, इसमें संदेह नहीं है। 
Recitation without Asan (sitting quietly, in solitude, with out deep concentration-dedication in the Almighty), goes waste. It grants victory in war, success in travel, suppression of revolt. Remembering the Almighty-recitation of Guru Geeta at the time of death grants Moksh-assimilation in God, liberation, emancipation. 
गुरुमंत्रो मुखे यस्य तस्य सिद्धयन्ति नान्यथा। 
दीक्षया सर्वकर्माणि सिद्धयन्ति गुरुपुत्रके॥2.81॥
जिसके मुख में गुरु मंत्र है, उसके सब कार्य सिद्ध होते हैं, दूसरे के नहीं। दीक्षा के कारण शिष्य के सर्व कार्य सिद्ध हो जाते हैं। All deeds-desires of one who recite the Guru Mantr are accomplished. Initiation into Guru Geeta accomplishes all purposes of the disciple(Student, follower).  
भवमूलविनाशाय चाष्टपाशनिवृतये। 
गुरुगीताम्भसि स्नानं तत्वज्ञ कुरुते सदा॥2.82॥
सर्वशुद्धः पवित्रोऽसौ स्वभावाद्यत्र तिष्ठति
तत्र देवगणाः सर्वे क्षेत्रपीठे चरन्ति च॥2.83॥
तत्वज्ञ पुरूष संसारूपी वृक्ष की जड़ नष्ट करने के लिए और आठों प्रकार के बन्धन (संशय, दया, भय, संकोच, निन्दा, प्रतिष्ठा, कुलाभिमान और संपत्ति) की निवृति करने के लिए गुरुगीता रूपी गंगा में सदा स्नान करते रहते हैं। स्वभाव से ही सर्वथा शुद्ध और पवित्र ऐसे वे महापुरूष जहाँ रहते हैं, उस तीर्थ में देवता विचरण करते हैं।
Enlightened, who knows the gist of Dharm (purposes behind actions) recites Guru Geeta every day to vanish all the eight types of bonds doubt, pity-kindness, fear, hesitation, scorn (defaming, blasphemy), honour-reputation, pride of being from a reputed clan and wealth. The place where such enlightened-pious, virtuous people reside; the demigods too come & live there.  
आसनस्था शयाना वा गच्छन्तष्तिष्ठन्तोऽपि वा। 
अश्वरूढ़ा गजारूढ़ा सुषुप्ता जाग्रतोऽपि वा॥2.84॥
शुचिभूता ज्ञानवन्तो गुरुगीतां जपन्ति ये। 
तेषां दर्शनसंस्पर्शात् पुनर्जन्म न विद्यते॥2.85॥
आसन पर बैठे हुए या लेटे हुए, खड़े रहते या चलते हुए, हाथी या घोड़े पर सवार, जाग्रतवस्था में या सुषुप्तावस्था में, जो पवित्र ज्ञानवान् पुरूष इस गुरुगीता का जप-पाठ करते हैं, उनके दर्शन और स्पर्श से पुनर्जन्म नहीं होता।
One who is face to face with such enlightened person-devotee, who keep on reciting the tenets of this treatise on Guru Geeta while laying-sleeping, walking or standing, moving over the back of elephant or horse, active or dormant (sleeping or awake( too is granted Salvation just by seeing him or touching him. 
Touch the feet of the enlightened when ever face to face with the real, virtuous saints. It means that one has to be alike with such enlightened saints. 
कुशदुर्वासने देवि ह्यासने शुभ्रकम्बले। 
उपविश्य ततो देवि जपेदेकाग्रमानसः॥2.86॥
हे देवी! कुश और दुर्वा के आसन पर सफ़ेद कम्बल बिछाकर उसके ऊपर बैठकर एकाग्र मन से इसका (गुरुगीता का) जप करना चाहिए।  
One should sit over a cushion-mat made of Kush or Durva grass and lay a white woollen blanket over it & sit there to recite Guru Geeta with concentration of mind in the Almighty. 
One  should sit erect, keeping his back bone in vertical form in Sukhasan-keeping his legs crossed. 
शुक्लं सर्वत्र वै प्रोक्तं वश्ये रक्तासनं प्रिये।  
पद्मासने जपेन्नित्यं शान्तिवश्यकरं परम्॥2.87॥
सामान्यतया सफ़ेद आसन उचित है, परन्तु वशीकरण में लाल आसन आवश्यक है। हे प्रिये! शांति प्राप्ति के लिए या वशीकरण में नित्य पद्मासन में बैठकर जप करना चाहिए। 
One who wish to attain accomplishment in hypnotism-mesmerisation has to opt of red cushion. To attain peace (solace, tranquillity) one has to adopt Padma San.
Feet have to be brought up sitting crossed legged left foot over right thigh & right foot over left thigh.  
वस्त्रासने च दारिद्रयं पाषाणे रोगसंभवः। 
मेदिन्यां दुःखमाप्नोति काष्ठे भवति निष्फलम्॥2.88॥
कपड़े के आसन पर बैठकर जप करने से दारिद्रय आता है, पत्थर के आसन पर रोग, भूमि पर बैठकर जप करने से दुःख आता है और लकड़ी के आसन पर किये हुए जप निष्फल होते हैं।  
Recitation by sitting over a cushion of cloth brings poverty, cushion of stone brings diseases, cushion of earth brings grief and recitation by sitting over wood nullifies recitation. 
कृष्णाजिने ज्ञानसिद्धिः मोक्षश्री व्याघ्रचर्मणि। 
कुशासने ज्ञानसिद्धिः सर्वसिद्धिस्तु कम्बले॥2.89॥
काले मृगचर्म और दर्भासन पर बैठकर जप करने से ज्ञान सिद्धि होती है, व्याग्र चर्म पर जप करने से मुक्ति प्राप्त होती है, परन्तु कम्बल के आसन पर सर्व सिद्धि प्राप्त होती है। 
Prayers-recitation performed by sitting over woollen cushion grants all sorts of accomplishments, deer skin & mat of grass brings enlightenment while doing prayers sitting over tiger skin leads to detachment-Salvation. 
आग्नेय्यां कर्षणं चैव वयव्यां शत्रुनाशनम्। 
नैरॄत्यां दर्शनं चैव ईशान्यां ज्ञानमेव च॥2.90॥
अग्नि कोण की तरफ मुख करके जप-पाठ करने से आकर्षण, वायव्य कोण की तरफ़ शत्रुओं का नाश, नैऋत्य कोण की तरफ दर्शन और ईशान कोण की तरफ मुख करके जप-पाठ करने से ज्ञान की प्रप्ति है।
पूर्व, उत्तर, उत्तर-पूर्व (ईशान कोण), पश्चिम, उत्तर-पश्चिम (वायव्य कोण), दक्षिण, दक्षिण- पश्चिम (नैऋत्य कोण), दक्षिण-पूर्व (आग्नेय कोण)। 
Prayers done while facing Agni Kon (South-East) grants attraction, Vayvy Kon (West, North West) leads to elimination of enemy. Naeraty Kon (South, South-West) grants sighting the God and facing Ishan Kon (East, North, North-East) leads to enlightenment. 
उदंमुखः शान्तिजाप्ये वश्ये पूर्वमुखतथा।
याम्ये तु मारणं प्रोक्तं पश्चिमे च धनागमः॥2.91॥
उत्तर दिशा की ओर मुख करके पाठ करने से शांति, पूर्व दिशा की ओर वशीकरण, दक्षिण दिशा की ओर मारण सिद्ध होता है तथा पश्चिम दिशा की ओर मुख करके जप-पाठ करने से धन प्राप्ति होती है। 
Prayers-recitation of Mantr, facing North grants peace (solace, tranquillity), facing East gives power to mesmerise-hypnotise, facing South grants power to eliminate, vanish some one-the enemy and facing West leads to gain of wealth.  
इति श्री स्कान्दोत्तरखण्डे उमामहेश्वरसंवादे श्री गुरुगीतायां द्वितीयोऽध्यायः। 
अथ काम्यजपस्थानं कथयामि वरानने।
सागरान्ते सरित्तीरे तीर्थे हरिहरालये॥3.1॥
शक्तिदेवालये गोष्ठे सर्वदेवालये शुभे।
वटस्य धात्र्या मूले व मठे वृन्दावने तथा॥3.2॥
पवित्रे निर्मले देशे नित्यानुष्ठानोऽपि वा।
निर्वेदनेन मौनेन जपमेतत् समारभेत्॥3.3॥
हे सुमुखी! अब सकामियों के लिए जप करने के स्थानों का वर्णन करता हूँ। सागर या नदी के तट पर, तीर्थ में, शिवालय में, विष्णु के या देवी के मंदिर में, गौशाला में, सभी शुभ देवालयों में, वट वृक्ष के या आँवले के वृक्ष के नीचे, मठ में, तुलसी वन में, पवित्र निर्मल स्थान में, नित्यानुष्ठान के रूप में अनासक्त रहकर मौन पूर्वक इसके जप का आरंभ करना चाहिए।
Those who perform prayers with motive should pray near the sea beach, river front, pilgrimage site, temples dedicated to Bhagwan Shiv, Bhagwan Vishnu or the deities, cow shed, pious-virtuous temples, below the banyan tree, Gooseberry tree, Monastery, Tulsi forests or any pious-sacred place. It should be done quietly, everyday without attachment. 
जाप्येन जयमाप्नोति जपसिद्धिं फलं तथा।
हीनकर्म त्यजेत्सर्वं गर्हितस्थानमेव च॥3.4॥
जप से जय प्राप्त होता है तथा जप की सिद्धि रूप फल मिलता है। जपानुष्ठान के काल में सब नीच कर्म और निन्दित स्थान का त्याग करना चाहिए।
Prayers-recitation of sacred Mantr leads to victory-success. One should discard all places which are used for impious-evil, , vicious, wicked works.
This is a period when almost all pious rivers carry filth. Pious cities like Varanasi are inhibited by Muslims. One has to be extremely careful in selecting the place for prayers. 
स्मशाने बिल्वमूले वा वटमूलान्तिके तथा।
सिद्धयन्ति कानके मूले चूतवृक्षस्य सन्निधौ॥3.5॥
श्मशान में, बिल्व वृक्ष (Indian bael), वट वृक्ष या कनक वृक्ष (Pterospermum acerifolium) के नीचे और आम्र वृक्ष के पास जप करने से से सिद्धि जल्दी होती है। 
Quick accomplishment is attained by praying in cremation ground, under the Bilv tree, banyan tree or the Kanak tree. 
Those who wish to attain Siddhi-accomplishment in Tantr-Mantr pray in the cremation grounds at night. Those who are wicked are struck back by these Siddhis.
आकल्पजन्मकोटीनां यज्ञव्रततपः क्रियाः। 
ताः सर्वाः सफला देवि गुरुसंतोषमात्रतः॥3.6॥
हे देवी! कल्प (ब्रह्मा जी का एक दिन) पर्यन्त के, करोंड़ों जन्मों के यज्ञ, व्रत, तप और शास्त्रोक्त क्रियाएँ, ये सब गुरुदेव के संतोष मात्र से सफल हो जाते हैं।
Austerities (Yagy, Tap Vrat) & sacred performances as per the scriptures of previous millions of years, in millions of rebirths become fruitful just as the Guru is satisfied with the disciple. 
Guru's blessing makes it easier for the disciple to attain the desired. If the disciple had been trying to attain salvation, it become easier. 
मंदभाग्या ह्यशक्ताश्च ये जना नानुमन्वते।
गुरुसेवासु विमुखाः पच्यन्ते नरकेऽशुचौ॥3.7॥
भाग्यहीन, शक्तिहीन और गुरुसेवा से विमुख, जो लोग इस उपदेश को नहीं मानते वे घोर नरक में पड़ते हैं।
Those without luck & strength, devoid of Guru's blessings; do not obey him, are destined for worst possible hells.  
विद्या धनं बलं चैव तेषां भाग्यं निरर्थकम्।
येषां गुरुकृपा नास्ति अधो गच्छन्ति पार्वति॥3.8॥
जिसके ऊपर श्री गुरुदेव की कृपा नहीं है, उसकी विद्या, धन, बल और भाग्य निरर्थक हैं। हे पार्वती! उसका अधःपतन होता है।
Possession of education, wealth, power and good luck goes waste without the blessings of the Guru (enlightened teacher-guide, parents, elders). Down fall such people is certain.  
धन्या माता पिता धन्यो गोत्रं धन्यं कुलोदभवः।
धन्या च वसुधा देवि यत्र स्याद् गुरुभक्तता॥3.9॥
जिसके अंदर गुरुभक्ति हो उसकी माता धन्य है, उसका पिता धन्य है, उसका वंश धन्य है, उसके वंश में जन्म लेनेवाले धन्य हैं, समग्र धरती माता धन्य है।
धन्य :: सौभाग्यशाली; gratefulness, auspicious, fortunate, blessed, felicitous, happy, prosperous.
The mother, father, clan, decedents and the entire earth are blessed-fortunate to have one with Guru Bhakti-devotion for the teacher-superiors. 
शरीरमिन्द्रियं प्राणच्चार्थः स्वजनबन्धुतां।
मातृकुलं पितृकुलं गुरुरेव न संशयः॥3.10॥
शरीर, इन्द्रियाँ, प्राण, धन, स्वजन, बन्धु-बान्धव, माता का कुल, पिता का कुल, ये सब गुरुदेव ही हैं, इसमें संशय नहीं है। 
There is no doubt that the body, senses, life, wealth, relatives, mother's clan, father's clan, all these constitute of the Guru.
Even today, the descendants of the students of Mahrishi Bhardwaj use the title-surname Bhardwaj. 
गुरुर्देवो गुरुर्धर्मो गुरौ निष्ठा परं तपः। 
गुरोः परतरं नास्ति त्रिवारं कथयामि ते॥3.11॥
गुरु ही देव हैं, गुरु ही धर्म हैं, गुरु में निष्ठा ही परम तप है। गुरु से अधिक और कुछ नहीं है, यह मैं तीन बार कहता हूँ। 
I repeat this trice that the Guru is the deity, Dharm, faith-devotion in Guru is ultimate ascetic & nothing parallels the Guru.
समुद्रे वै यथा तोयं क्षीरे क्षीरं घृते घृतम्। 
भिन्ने कुंभे यथाऽऽकाशं तथाऽऽत्मा परमात्मनि॥3.12॥
जिस प्रकार सागर में पानी, दूध में दूध, घी में घी, अलग-अलग घटों में आकाश एक और अभिन्न है, उसी प्रकार परमात्मा में जीवात्मा एक और अभिन्न है।
The manner water in ocean, Ghee in Ghee, sky in different places are one & the same, the God & the organism too are alike.
All organism, animals, vegetation and the humans have the soul, which is a component of the Almighty.  
तथैव ज्ञानवान् जीव परमात्मनि सर्वदा।
ऐक्येन रमते ज्ञानी यत्र कुत्र दिवानिशम्॥3.13॥
ज्ञानी सदा परमात्मा के साथ अभिन्न होकर रात-दिन आनन्द विभोर होकर सर्वत्र विचरते हैं।
The enlightened become a unit of the God and roam freely filled with bliss-happiness. 
गुरुसन्तोषणादेव मुक्तो भवति पार्वति।
अणिमादिषु भोक्तृत्वं कृपया देवि जायते॥3.14॥
हे पार्वति! गुरुदेव को संतुष्ट करने से शिष्य मुक्त हो जाता है। हे देवी! गुरुदेव की कृपा से वह अणिमादि सिद्धियों का भोग प्राप्त करता है।
The satisfaction of the Guru grants accomplishments like Anima to the disciple to enjoy and he is detached.
The person who is detached, roams freely without any burden, liabilities and attain Salvation ultimately, which is the sole goal of birth as a human. 
साम्येन रमते ज्ञानी दिवा वा यदि वा निशि।
एवं विधौ महामौनी त्रैलोक्यसमतां व्रजेत्॥3.15॥
ज्ञानी दिन में या रात में, सदा सर्वदा समत्व में रमण करते हैं। इस प्रकार के महामौनी अर्थात् ब्रह्मनिष्ठ महात्मा तीनों लोकों मे समान भाव से गति करते हैं।The enlightened always keep on remembering the God all times whether its day or night. The great souls devoted to the Par Brahm, having achieved emancipation, remain quite and roam in all the three abodes :- earth, heaven & the netherworld. 
गुरुभावः परं तीर्थमन्यतीर्थं निरर्थकम्।
सर्वतीर्थमयं देवि श्रीगुरोश्चरणाम्बुजम्॥3.16॥
गुरु भक्ति ही सबसे श्रेष्ठ तीर्थ है। अन्य तीर्थ निरर्थक हैं। हे देवी! गुरुदेव के चरण कमल सर्व तीर्थ मय हैं।
Devotion to Guru is Ultimate pilgrimage with which one need not visit other pilgrimage sites. The feet of the enlightened guru have all pilgrimage sites contained in them. 
कन्याभोगरतामन्दाः स्वकान्तायाः पराड्मुखाः।
अतः परं मया देवि कथितन्न मम प्रिये॥3.17॥
हे देवी! हे प्रिये! कन्या के भोग में रत, स्वस्त्री से विमुख (पर स्त्री गामी) ऐसे बुद्धि शून्य लोगों को मेरा यह आत्म प्रिय परम बोध मैंने नहीं कहा।
This discourse is not meant for the one who indulge in sex with a girl or the one who is deviated from his wife. The lascivious does not qualify to listen, read or write this Ultimate understanding-knowledge. 
अभक्ते वंचके धूर्ते पाखंडे नास्तिकादिषु।
मनसाऽपि न वक्तव्या गुरुगीता कदाचन॥3.18॥
अभक्त, कपटी, धूर्त, पाखण्डी, नास्तिक इत्यादि को यह गुरुगीता कहने का मन में सोचना तक नहीं।
धूर्त :: शरारती, शातिर, कपटी, धोखेबाज़, चतुर; sly, crafty,  Machiavellian, artful.
Never preach-teach this Guru Geeta to the person who is not devoted to the God, deceptors, crafty, impostors or is an atheists. 
गुरवो बहवः सन्ति शिष्यवित्तापहारकाः।
तमेकं दुर्लभं मन्ये शिष्यह्यत्तापहारकम्॥3.19॥
शिष्य के धन को अपहरण करनेवाले गुरु तो बहुत हैं, लेकिन शिष्य के हृदय का संताप हरने वाला एक गुरु भी दुर्लभ है, ऐसा मैं मानता हूँ। 
One will find several Gurus who snatch-loot the belongings of the devotee (Asa Ram, Nirmal Baba, Radhey Maa, Ram-Rahim, Ram Vachan etc. etc.) but a Guru who relieves the disciples of their pains, distress are extremely rare. 
चातुर्यवान्विवेकी च अध्यात्मज्ञानवान् शुचिः।
मानसं निर्मलं यस्य गुरुत्वं तस्य शोभते॥3.20॥
जो चतुर हों, विवेकी हों, अध्यात्म के ज्ञाता हों, पवित्र हों तथा निर्मल मानस वाले हों उनमें गुरुत्व शोभा पाता है।
The title of Guru is meant for only those who are prudent, intelligent, aware of the spirituality, pious, pure and pure-clear thoughts-ideas.
 गुरवो निर्मलाः शान्ताः साधवो मितभाषिणः।
कामक्रोधविनिर्मुक्ताः सदाचारा जितेन्द्रियाः॥3.21॥
गुरु निर्मल, शांत, साधु स्वभाव के, मितभाषी, काम-क्रोध से अत्यंत रहित, सदाचारी और जितेन्द्रिय होते हैं।
The Guru is pious-pure, peaceful, with the nature of saints, speaks as per need-too little, free from sensualities-passions, anger, a virtuous person with high morals and one who has over come his sense organs.
सूचकादि प्रभेदेन गुरवो बहुधा स्मृताः।
स्वयं समयक् परीक्ष्याथ तत्वनिष्ठं भजेत्सुधीः॥3.22॥
सूचक आदि भेद से अनेक गुरु कहे गये हैं। बुद्धिमान मनुष्य को स्वयं योग्य विचार करके तत्वनिष्ठ सदगुरु की शरण लेनी चाहिए।
The Guru are distinguished in may ways according to their nature, knowledge, behaviour etc. The intelligent-prudent person should analyse, think and consider the ability, qualities of the Guru and join one who has grasped the gist of the Ultimate. 
12 प्रकार के गुरु :: नामचिंता मणि में गुरुओं के निम्न बारह प्रकार बताये हैं :- 
(1). धातुवादी गुरु :: बच्चा! मंत्र ले लिया, अब जाओ तीर्थाटन करो। भिक्षा माँग के खाओ अथवा घर का खाओ तो ऐसा खाओ, वैसा न खाओ। लहसुन न खाना, प्याज न खाना, यह करना, यह न करना। इस बर्तन में भोजन करना, ऐसे सोना आदि बातें कहकर अंत में ज्ञानोपदेश देनेवाले धातुवादी गुरु होते हैं ।
(2). चंदन गुरु :: जिस प्रकार चंदन वृक्ष अपने निकट के वृक्षों को भी सुगंधित बना देता है, ऐसे ही अपने सान्निध्य द्वारा शिष्य को तारनेवाले गुरु चंदन गुरु होते हैं। चंदन गुरु वाणी से नहीं, आचरण से जातक-शिष्य को संस्कारों से भर देते हैं। उनकी सुवास का चिन्तन भी समाज को सुवासित कर देता है।  
(3). विचार प्रधान गुरु :: जो सार है वह ब्रह्म-परमात्मा है, असार है अष्टधा प्रकृति का शरीर। प्रकृति का शरीर प्रकृति के नियम से रहे लेकिन आप अपने ब्रह्म-स्वभाव में रहें, इस प्रकार का विवेक जगाने वाले आत्म-विचार प्रधान गुरु होते हैं ।
(4). अनुग्रह-कृपाप्रधान गुरु :: अपनी अनुग्रह-कृपा द्वारा अपने शिष्यों का पोषण करें, मार्गदर्शन करें; अच्छा काम करें तो प्रोत्साहित करें, गड़बड़ी करें तो गुरु की मूर्ति मानो नाराज हो रही है, ऐसा अहसास करायें। 
(5). पारस गुरु :: जैसे पारस अपने स्पर्श से लोहे को सोना कर देता है, ऐसे ही ये गुरु अपने हाथ का स्पर्श अथवा अपनी स्पर्श की हुई वस्तु का स्पर्श कराके शिष्य के चित्त के दोषों को हर कर चित्त में आनन्द, शान्ति, माधुर्य एवं योग्यता का दान करते हैं।
(6). कूर्म अर्थात् कच्छपरूप गुरु :: जैसे मादा कछुआ दृष्टिमात्र से अपने बच्चों को पोषित करती है, ऐसे ही गुरुदेव कहीं भी हों अपनी दृष्टिमात्र से शिष्य को दिव्य अनुभूतियाँ कराते रहते हैं। 
(7). चन्द्र गुरु :: जैसे चन्द्रमा के उगते ही चन्द्रकांत मणि से रस टपकने लगता है, ऐसे ही गुरु को देखते ही शिष्य के अंतःकरण में उनके ज्ञान का, उनकी दया का, आनन्द, माधुर्य का रस उभरने, छलकने लगता है। गुरु का चिन्तन करते ही, उनकी लीलाओं, घटनाओं अथवा भजन आदि का चिंतन करके किसी को बताते हैं तो भी रस आने लगता है।
(8). दर्पण गुरु :: जैसे दर्पण में अपना रूप दिखता है, ऐसे ही गुरु के नजदीक जाते ही शिष्य-जातक को अपने गुण-दोष दिखते हैं और अपनी महानता का, शान्ति, आनन्द, माधुर्य आदि का रस भी आने लगता है, मानो गुरु एक दर्पण हैं। गुरु के पास गये तो हमें गुरु का स्वरूप और अपना स्वरूप मिलता-जुलता, प्यारा-प्यारा लगता है। 
(9). छायानिधि गुरु ::  साधक को अपनी कृपा छाया में रखकर उसे स्वानंद प्रदान करने वाले गुरु छाया निधि गुरु होते हैं। जिस पर गुरु की दृष्टि, छाया आदि कुछ पड़ गयी वह अपने-अपने विषय में, अपनी-अपनी दुनिया में राजा हो जाता है। राजे-महाराजे भी उसके आगे घुटने टेकते हैं।
(1). नादनिधि गुरु :: नादनिधि मणि ऐसी होती है कि वह जिस धातु को स्पर्श करें वह सोना बन जाती है। पारस तो केवल लोहे को सोना करता है।
(11). क्रौंच गुरु :: जैसे मादा क्रौंच पक्षी अपने बच्चों को समुद्र-किनारे छोडकर उनके लिए दूर स्थानों से भोजन लेने जाती है तो इस दौरान वह बार-बार आकाश की ओर देखकर अपने बच्चों का स्मरण करती है। आकाश की ओर देख के अपने बालकों के प्रति सदभाव करती है तो वे पुष्ट हो जाते हैं। ऐसे ही गुरु अपने चिदाकाश में होते हुए अपने शिष्यों के लिए सदभाव करते हैं तो अपने स्थान पर ही शिष्यों को गुदगुदियाँ होने लगती हैं, आत्मानंद मिलने लगता है और वे समझ जाते हैं कि गुरु ने याद किया। 
(12). सूर्यकांत गुरु ::  सूर्यकांत मणि में ऐसी कुछ योग्यता होती है कि वह सूर्य को देखते ही अग्नि से भर जाती है, ऐसे ही अपनी दृष्टि जहाँ पडे वहाँ के साधकों को विदेह मुक्ति देने वाले गुरु सूर्य कांत गुरु होते हैं। शिष्य को देखकर गुरु के हृदय में उदारता, आनंद उभर जाय और शिष्य का मंगल-ही-मंगल होने लगे, शिष्य को उठकर जाने की इच्छा ही न हो। 
वर्णजालमिदं तद्वद्बाह्यशास्त्रं तु लौकिकम्।
यस्मिन् देवि समभ्यस्तं स गुरुः सूचकः स्मृतः॥3.23॥
हे देवी! वर्ण और अक्षरों से सिद्ध करनेवाले बाह्य लौकिक शास्त्रों का जिसको अभ्यास हो वह गुरु सूचक गुरु कहलाता है।
The one who has acquired the knowledge of the worldly matters, processes and practices them is called SUCHAK GURU-informed teacher. 
The knowledge begins with the alphabets and goes on till mastering & interpreting the Veds, scriptures, history, epics and 64 branches of learning. 
वर्णाश्रमोचितां विद्यां धर्माधर्म विधायिनीम्।
प्रवक्तारं गुरुं विद्धि वाचकस्त्वति पार्वति॥3.24॥
हे पार्वती! धर्माधर्म का विधान करनेवाली, वर्ण और आश्रम के अनुसार विद्या का प्रवचन करनेवाले गुरु को तुम वाचक गुरु जानो। 
The VACHAK GURU Guru is one who grants knowledge-education according to Varnashram Dharm. 
He analyse the traits of the students before admitting them to his fore. 
पंचाक्षर्यादिमंत्राणामुपदेष्टा त पार्वति। 
स गुरुर्बोधको भूयादुभयोरमुत्तमः॥3.25॥
पंचाक्षरी आदि मंत्रों का उपदेश देनेवाले गुरु बोधक गुरु कहलाते हैं। हे पार्वती! प्रथम दो प्रकार के गुरुओं से यह गुरु उत्तम हैं।
The Guru who preach the Panchakshri Mantr is called BODHAK GURU who explains the gist of the Mantr. He is better than the first two types of Gurus. 
The Mantrs are coded intricate formulae containing valuable sacred information in science, technology, architecture etc.
 मोहमारणवश्यादितुच्छमंत्रोपदर्शिनम्।
निषिद्धगुरुरित्याहुः पण्डितस्तत्वदर्शिनः॥3.26॥
मोहन, मारण, वशीकरण आदि तुच्छ मंत्रों को बताने वाले गुरु को तत्व दर्शी पंडित निषिद्ध गुरु कहते हैं।
The person who teaches the Tantr-Mantr pertaining to hypnotism-mesmerism, controlling one's brain and killing others has been titled as Nishiddh-unacceptable Guru (NISHIDDH GURU) by the Pandits-scholars who are aware of the gist of the Almighty and nature. 
A person who uses Tantr-Mantr for harming others is doomed and suffer. 
अनित्यमिति निर्दिश्य संसारे संकटालयम्। 
वैराग्यपथदर्शी यः स गुरुर्विहितः प्रिये॥3.27॥
हे प्रिये! संसार अनित्य और दुःखों का घर है, ऐसा समझाकर जो गुरु वैराग्य का मार्ग बताते हैं, वे विहित गुरु कहलाते हैं।
The Guru who tells the disciples-followers that this perishable world is a place full of unforeseen troubles-tortures, worries, pain, sorrow, grief and show the path of renunciation is called VIHIT GURU.
तत्वमस्यादिवाक्यानामुपदेष्टा तु पार्वति।
कारणाख्यो गुरुः प्रोक्तो भवरोगनिवारकः॥3.28॥
हे पार्वती! तत्व मसि आदि महा वाक्यों का उपदेश देनेवाले तथा संसार रूपी रोगों का निवारण करने वाले गुरु कारणाख्य गुरु कहलाते हैं।
तत्त्वमसि (तत् त्वम् असि) हिन्दु धर्म शास्त्रों व उपनिषदों में वर्णित चार महा वाक्यों में से एक है, जिसका अर्थ है :- वह तुम ही हो, तू वही है, तत्सत्।[चंदोग्य उपनिषद 6.8.7]
यह महावाक्य उद्दालक और उनके पुत्र ववकेतु के बीच संवाद के रूप में है।
अन्य महावाक्य :- अयमात्मा ब्रह्म-अहम् ब्रह्मास्मि, नेति-नेति, प्रज्ञानं ब्रह्म, यद् पिण्डे तद् ब्रह्माण्डे। 
The KARNAKHY GURU preaches TATVMASI, YOU are the person-God & guides the followers how to swim across the vast ocean of worries, diseases-ills.
सर्वसन्देहसन्दोहनिर्मूलनविचक्षणः।
जन्ममृत्युभयघ्नो यः स गुरुः परमो मतः॥3.29॥
सर्व प्रकार के सन्देहों का जड़ से नाश करने में जो चतुर हैं, जन्म, मृत्यु तथा भय का जो विनाश करते हैं, वे परम गुरु कहलाते हैं, सदगुरु कहलाते हैं।
The SAD GURU is capable of clearing all doubts-suspicions, queries  vanishes the fear, birth & death, reincarnations is called the Ultimate Guru. 
बहुजन्मकृतात् पुण्याल्लभ्यतेऽसौ महागुरुः।
लब्ध्वाऽमुं न पुनर्याति शिष्यः संसारबन्धनम्॥3.30॥
अनेक जन्मों के किये हुए पुण्यों से ऐसे महागुरु प्राप्त होते हैं। उनको प्राप्त कर शिष्य पुनः संसार बन्धन में नहीं बँधता अर्थात् मुक्त हो जाता है।
One gets such enlightened Guru by virtue of the accumulates virtues-piousness in several earlier births. Having found such a virtuous-versatile Guru, the disciple is cleared from the troubles-fangs of reincarnations i.e., he gets Moksh-Salvation. 
एवं बहुविधालोके गुरवः सन्ति पार्वति।
तेषु सर्वप्रत्नेन सेव्यो हि परमो गुरुः॥3.31॥
हे पार्वती! इस प्रकार संसार में अनेक प्रकार के गुरु होते हैं। इन सबमें एक परम गुरु का ही सेवन सर्व प्रयत्नों से करना चाहिए।
One should select-choose the most appropriate Guru out of the various categories of them available in this world, who is excellent, enlightened and sail him through the vast ocean of pains, sorrow, difficulties.
पार्वत्युवाच माता पार्वती ने कहा:-
स्वयं मूढा मृत्युभीताः सुकृताद्विरतिं गताः।
दैवन्निषिद्धगुरुगा यदि तेषां तु का गतिः॥3.32॥
प्रकृति से ही मूढ, मृत्यु से भयभीत, सत्कर्म से विमुख लोग यदि दैवयोग से निषिद्ध गुरु का सेवन करें, तो उनकी क्या गति होती है।
Mata Parwati asked Bhagwan Shiv to describe the movement-end, next births of the person who is ignorance, imprudent afraid of death, devoid of virtues and joins the Worst-Nishiddh Guru under the influence of destiny.
श्री महादेव उवाच :-
निषिद्धगुरुशिष्यस्तु दुष्टसंकल्पदूषितः। 
ब्रह्मप्रलयपर्यन्तं न पुनर्याति मृत्यताम्॥3.33॥
निषिद्ध गुरु का शिष्य दुष्ट संकल्पों से दूषित होने के कारण ब्रह्म प्रलय तक मनुष्य नहीं होता, पशु योनि में ही रहता है।
Bhagwan Shiv relied that an ignorant person who learns from the Nishiddh Guru remains in animal species till the end of all populace from the earth under the impact of vast devastation-Brahm Pralay (annihilation) by acquiring evils-vices. 
श्रृणु तत्वमिदं देवि यदा स्याद्विरतो नरः। 
तदाऽसावधिकारीति प्रोच्यते श्रुतमस्तकैः॥3.34॥
हे देवी! इस तत्व को ध्यान से सुनो :- मनुष्य जब विरक्त होता है, तभी वह अधिकारी कहलाता है, ऐसा उपनिषद कहते हैं अर्थात् दैव योग से गुरु प्राप्त होने की बात अलग है और विचार से गुरु चुनने की बात अलग है।
Bhagwan Shiv quoted Upnishad and said that only the enunciated deserve an enlightened Guru. Impact of destiny and selection of the Guru are two different things.
Destiny & demigods too help the deserving one in reaching the enlightened-Ultimate Guru due to his virtues in previous births.  
अखण्डैकरसं ब्रह्म नित्यमुक्तं निरामयम्।
स्वस्मिन संदर्शितं येन स भवेदस्य देशिकः॥3.35॥
अखण्ड, एक रस, नित्य मुक्त और निरामय (जिसे कोई रोग न हो, निरोग, स्वस्थ,  निर्मल, सकुशल) ब्रह्म जो अपने अंदर ही दिखाते हैं, वे ही गुरु होने चाहिए।
निरामय :: जिसे कोई रोग न हो, निरोग, स्वस्थ, निर्मल, सकुशल, आरोग्य; free from illness, pure, untainted, free from disease.
A person who can exhibit the absolute, unique, always free, untainted Brahm in himself, deserve to be a Guru. 
जलानां सागरो राजा यथा भवति पार्वति।
गुरुणां तत्र सर्वेषां राजायं परमो गुरुः॥3.36॥
हे पार्वती! जिस प्रकार जलाशयों में सागर राजा है, उसी प्रकार सब गुरुओं में से ये परम गुरु राजा हैं।
The manner sea is the king amongest the water reservoirs, the Ultimate Guru is the Supreme-king amongest the Guru (preachers, teachers). 
मोहादिरहितः शान्तो नित्यतृप्तो निराश्रयः।
तृणीकृतब्रह्मविष्णुवैभवः परमो गुरुः॥3.37॥
मोहादि दोषों से रहित, शांत, नित्य तृप्त, किसी के आश्रय रहित अर्थात् स्वाश्रयी, ब्रह्मा और विष्णु के वैभव को भी तृणवत् समझने वाले गुरु ही परम गुरु हैं।
वैभव :: भव्यता, तेज, प्रताप, शान, चमक, महिमा, गौरव, बड़ाई, राज-प्रताप, आडंबर, ठाट-बाट; splendour, majesty, pomp.
The Ultimate Guru is free from affections-attachments, is peaceful (has solace, tranquillity), content-satisfied, without the support of anyone, considers the splendour (majesty & pomp) of Bhagwan Shri Hari Vishnu & Brahma Ji just like a straw.
सर्वकालविदेशेषु स्वतंत्रो निश्चलस्सुखी।
अखण्डैकरसास्वादतृप्तो हि परमो गुरुः॥3.38॥
सर्व काल और देश में स्वतंत्र, निश्चल, सुखी, अखण्ड, एक रस के आनन्द से तृप्त ही सचमुच परम गुरु हैं। 
सुखी :: आनंदित, आनंदमय, मगन, भाग्यवान, आरामदायक, आरामदेह, सुखद, शांतिप्रद; happy, comfortable, blessed.
एक रस :: नीरस, एक रस, उतार-चढ़ावहीन, (चित्रकला में) बिना प्रकाश और छाया का, उबा देने वाले; without light shade, monotone.
The Ultimate Guru is free in every country-place (has no tensions, worries), at all times, unmoved, happy (blessed, at ease, pleasure), unique-one piece, enjoying, monotonous. 
द्वैताद्वैतविनिर्मुक्तः स्वानुभूतिप्रकाशवान्।
अज्ञानान्धमश्छेत्ता सर्वज्ञ परमो गुरुः॥3.39॥ 
द्वैत और अद्वैत से मुक्त, अपने अनुभुव रूप प्रकाश वाले, अज्ञान रूपी अंधकार को छेदने वाले और सर्वज्ञ (Omniscient) ही परम गुरु हैं। 
The Ultimate Guru is free duality, penetrates the darkness in the form of ignorance and is aware of everything-Omniscient. 
यस्य दर्शनमात्रेण मनसः स्यात् प्रसन्नता।
स्वयं भूयात् धृतिश्शान्तिः स भवेत् परमो गुरुः॥3.40॥
जिनके दर्शन मात्र से मन प्रसन्न होता है, अपने आप धैर्य और शांति आ जाती है,  वे परम गुरु हैं।
The sight of the Ultimate Guru fills the innerself (heart, mind & soul) with pleasure-bliss, patience & solace comes automatically. 
स्वशरीरं शवं पश्यन् तथा स्वात्मानमद्वयम्। 
यः स्त्रीकनकमोहघ्नः स भवेत् परमो गुरुः॥3.41॥
जो अपने शरीर को शव समान समझते हैं अपने आत्मा को अद्वय जानते हैं, जो कामिनी और कंचन के मोह का नाशकर्ता हैं, वे परम गुरु हैं।
The Ultimate Guru considered his body as a dead log, the soul as the component of the Almighty & clears-removes the attachment for sex and gold in the mind of the disciple.  
मौनी वाग्मीति तत्वज्ञो द्विधाभूच्छृणु पार्वति।
न कश्चिन्मौनिना लाभो लोकेऽस्मिन्भवति प्रिये॥3.42॥
वाग्मी तूत्कटसंसारसागरोत्तारणक्षमः। 
यतोऽसौ संशयच्छेत्ता शास्त्रयुक्त्यनुभूतिभिः॥3.43॥
हे पार्वती! सुनो; तत्वज्ञ दो प्रकार के होते हैं। मौनी और वक्ता। हे प्रिये! इन दोंनों में से मौनी गुरु द्वारा लोगों को कोई लाभ नहीं होता, परन्तु वक्ता गुरु भयंकर संसार सागर को पार कराने में समर्थ होते हैं;  क्योंकि शास्त्र, युक्ति (तर्क) और अनुभूति से वे सर्व संशयों का छेदन करते हैं।
Those who understand the gist of the Almighty are of two types. The first one is quite-does not reveal the truth and the second one speaks-elaborates the intricacies of the perishable world. He utilises logic, reasoning and feelings (cognition, affections) to clear all sorts of doubts of the devotee, followers, disciple. 
गुरुनामजपाद्येवि बहुजन्मार्जितान्यपि।
पापानि विलयं यान्ति नास्ति सन्देहमण्वपि॥3.44॥
हे देवी! गुरु नाम के जप से अनेक जन्मों के इकठ्ठे हुए पाप भी नष्ट होते हैं, इसमें अणुमात्र संशय नहीं है।
There is no confusion-doubt that recitation-remembrance of the names of the Guru removes sins accumulated over several births.
It is true provided one considers the Guru as a component of God. He recites the names of Guru has the Almighty in his mind. Ultimate Guru is the Almighty himself in the form of Bhagwan Sada Shiv.  
कुलं धनं बलं शास्त्रं बान्धवास्सोदरा इमे।
मरणे नोपयुज्यन्ते गुरुरेको हि तारकः॥3.45॥
अपना कुल, धन, बल, शास्त्र, नाते-रिश्तेदार, भाई, ये सब मृत्यु के अवसर पर काम नहीं आते। एक मात्र गुरुदेव ही उस समय तारण हार हैं। 
One's name-title, wealth, power-strength, relatives, brothers; all turn useless, when the death knocks the door i.e., end comes. Its only the Guru who helps in sailing through this vast oceans of troubles.
कुलमेव पवित्रं स्यात् सत्यं स्वगुरुसेवया।
तृप्ताः स्युस्स्कला देवा ब्रह्माद्या गुरुतर्पणात्॥3.46॥
सचमुच, अपने गुरुदेव की सेवा करने से अपना कुल भी पवित्र होता है। गुरुदेव के तर्पण से ब्रह्मा आदि सब देव तृप्त होते हैं।
Serving the Guru purifies-cleanse the entire clan-hierarchy. Satisfaction of the Guru leads to the satisfaction-contentment of the creator-Praja Pati Brahma Ji. 
स्वरूपज्ञानशून्येन कृतमप्यकृतं भवेत्।
तपो जपादिकं देवि सकलं बालजल्पवत्॥3.47॥
हे देवी! स्वरूप के ज्ञान के बिना किये हुए जप-तपादि सब कुछ नहीं किये हुए के बराबर हैं, बालक के बकवाद के समान (व्यर्थ) हैं। 
Without identifying self prayers, Jap-Tap, ascetic practices are useless-fruitless, null & void, just like the useless talk of a child. 
One has to search the God within himself. He has to search his innerself and prepare for Moksh-Salvation. 
न जानन्ति परं तत्वं गुरुदीक्षापराड्मुखाः।
भ्रान्ताः पशुसमा ह्येते स्वपरिज्ञानवर्जिताः॥3.48॥
गुरुदीक्षा से विमुख रहे हुए लोग भ्रांत हैं, अपने वास्तविक ज्ञान से रहित हैं। वे सचमुच पशु के समान हैं। परम तत्व को वे नहीं जानते। 
Those devoid of initiation to  Guru's fold are confused and lack the real knowledge. Their existence is just like that of animals. They do not know the Ultimate gist.
The gist of the Ultimate can be grasped-understood by the enlightened not the ignorant, idiots, morons, duffers. 
तस्मात्कैवल्यसिद्धयर्थं गुरुमेव भजेत्प्रिये।
गुरुं विना न जानन्ति मूढास्तत्परमं पदम्॥3.49॥
इसलिये हे प्रिये! कैवल्य की सिद्धि के लिए गुरु का ही भजन करना चाहिए। गुरु के बिना मूढ लोग उस परम पद को नहीं जान सकते।
Those who are desirous of Kaevaly Moksh-emancipation must listen to the Guru and follow his teachings. Without having an enlightened Guru they can not reach the Ultimate abode-destination. 
Its really dangerous to have Guru's like Asa Ram Bapu, Ram Dev, Ram Rahim, Nirmal Baba, Ram Vraksh, Radhey Maa. Not only will they go the hells, but they will drag their followers to hells as well. 
भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः।
क्षीयन्ते सर्वकर्माणि गुरोः करुणया शिवे॥3.50॥ 
हे शिवे! गुरुदेव की कृपा से हृदय की ग्रन्थि छिन्न हो जाती है, सब संशय कट जाते हैं और सर्व कर्म नष्ट हो जाते हैं।
The blessings of the enlightened Guru will clear all doubts-confusions, bonds-attachments, ties, allurements, desires in the mind of the disciple. This will ultimately lead to nullifying all deeds and the devotee will attain Ultimate abode-the abode of the Almighty. 
Detachment-renunciation occurs and one automatically qualified for assimilation in God.
कृताया गुरुभक्तेस्तु वेदशास्त्रनुसारतः।
मुच्यते पातकाद् घोराद् गुरुभक्तो विशेषतः॥3.51॥
वेद और शास्त्र के अनुसार विशेष रूप से गुरु की भक्ति करने से गुरु भक्त घोर पाप से भी मुक्त हो जाता है।
One devoted to the Guru is relieved of the gravest sins if he resort to special efforts as per the doctrine of the Veds & scriptures. 
दुःसंगं च परित्यज्य पापकर्म परित्यजेत्।
चित्तचिह्नमिदं यस्य तस्य दीक्षा विधीयते॥3.52॥ 
दुर्जनों का संग त्यागकर पाप कर्म छोड़ देने चाहिए। जिसके चित्त में ऐसा चिह्न देखा जाता है, उसके लिए गुरु दीक्षा का विधान है।
One who has the desire to reject all sorts of evils and vicious company  may be initiated into the fold of pious, virtuous enlightened Guru.
Its extremely difficult to move away from evils, but people like Balmiki-a Brahmn by birth can easily do this, by virtue of the advice of saints, learned, scholars, philosophers.   
Marichi and Narad Ji along with other Brahm Rishis guided Balmiki and he was all together a changed man. 
चित्तत्यागनियुक्तश्च क्रोधगर्वविवर्जितः।
द्वैतभावपरित्यागी तस्य दीक्षा विधीयते॥3.53॥
चित्त का त्याग करने में जो प्रयत्नशील है, क्रोध और गर्व से रहित है, द्वैत भाव का जिसने त्याग किया है, उसके लिए गुरु दीक्षा का विधान है। 
One who is willing-ready to shun the evil thoughts, moods, dictates of mind, free from anger and ego-pride, duality may be initiated into the fold of the enlightened teacher-Guru. 
एतल्लक्षणसंयुक्तं सर्वभूतहिते रतम्। 
निर्मलं जीवितं यस्य तस्य दीक्षा विधीयते॥3.54॥
जिसका जीवन इन लक्षणों से युक्त हो, निर्मल हो, जो सब जीवों के कल्याण में रत हो उसके लिए गुरु दीक्षा का विधान है।
One who has acquired Satvik traits described above , is pure-pious, is busy in helping-welfare of the weak-helpless is suitable for initiation into the fold of the virtuous GURU.  
अत्यन्तचित्तपक्वस्य श्रद्धाभक्तियुतस्य च।
प्रवक्तव्यमिदं देवि ममात्मप्रीतये सदा॥3.55॥
हे देवी! जिसका चित्त अत्यन्त परिपक्व हो, श्रद्धा और भक्ति से युक्त हो, उसे यह तत्व सदा मेरी प्रसन्नता के लिए कहना चाहिए। 
One whose innerself is perfect-pure, has devotion and respect for the Guru is entitled to listen (and act) this treatise narrated by Bhagwan Sada Shiv for his happiness i.e., to appease HIM.
शिवक्रोधाद् गुरुस्त्राता गुरुक्रोधाच्छिवो न हि।
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन गुरोराज्ञां न लंघयेत्॥3.61॥
शिव के क्रोध से गुरुदेव रक्षण करते हैं, लेकिन गुरुदेव के क्रोध से शिवजी रक्षण नहीं करते। अतः प्रयत्न पूर्वक गुरुदेव की आज्ञा का उल्लंघन नहीं करना चाहिए।
The Guru protects the disciple from the anger of Bhagwan Shiv but Bhagwan Shiv do not protect from the anger of the Guru. Hence one must not disobey Guru's directives-orders. 
सप्तकोटिमहामंत्राश्चित्तविभ्रंशकारकाः।
एक एव महामंत्रो गुरुरित्यक्षरद्वयम्॥3.62॥
सात करोड़ महामंत्र विद्यमान हैं। वे सब चित्त को भ्रमित करनेवाले हैं। गुरु नाम का दो अक्षर वाला मंत्र एक ही महा मंत्र है। 
7 crore Mantr are available to pray to God but they all create-generate illusion. The Mantr in the form of Guru is a Maha Mantr-most powerful Mantr constituting of two letters.
The 7 crore Mantr used for prayers are meant for the fulfilment of worldly desires. But this two letter-syllable word directs the disciple-devotee towards the God, rejection of desires, sensualities, passions, allurements, ties-bonds, attachments. One then make endeavours to achieve Salvation (Moksh, emancipation, assimilation in the God, Liberation Moksh, i.e., freedom from birth & death, reincarnations). 
न मृषा स्यादियं देवि मदुक्तिः सत्यरूपिणि।
गुरुगीतासमं स्तोत्रं नास्ति नास्ति महीतले॥3.63॥
हे देवी! मेरा यह कथन कभी मिथ्या नहीं होगा। वह सत्य स्वरूप है। इस पृथ्वी पर गुरु गीता के समान अन्य कोई स्तोत्र नहीं है। 
Bhagwan Shiv-Maha Kal says that his words in respect to Guru Geeta will never prove to be false-wrong. This Guru Geeta is a form of Truth. No other Strotr-Holy Verse, treatise is comparable-equivalent to Guru Geeta
गुरुगीतामिमां देवि भवदुःखविनाशिनीम्।
गुरुदीक्षाविहीनस्य पुरतो न पठेत्क्वचित्॥3.64॥
भव दुःख का नाश करने वाली इस गुरुगीता का पाठ गुरु दीक्षा विहीन मनुष्य के आगे कभी नहीं करना चाहिए। 
One must not reveal the secrets of this Guru Geeta who has not been initiated-inducted into the fold of the enlightened Guru, which is capable to removes all sorts of trouble fangs in this world. 
One follows the tenets of this treatise will never face problems. 
रहस्यमत्यन्तरहस्यमेतन्न पापिना लभ्यमिदं महेश्वरि। 
अनेकजन्मार्जितपुण्यपाकाद् गुरोस्तु तत्वं लभते मनुष्यः॥3.65॥
हे महेश्वरी! यह रहस्य अत्यंत गुप्त रहस्य है। पापियों को वह नहीं मिलता। अनेक जन्मों के किये हुए पुण्य के परिपाक से ही मनुष्य गुरुतत्व को प्राप्त कर सकता है।The secrets of this treatise are highly confidential. They are not passed on the sinners. One who has purified himself by virtue of his virtues in several births receives it. 
A Mantr has two forms, first one is the body in the form of a verse and second one is activation of secret coded energy enclosed in them. Its only the Guru who is aware of decoding the energy in them. The process of decoding is transferred orally from one generation to the next. Prior to decoding the energy the Guru will ascertain that the student is worthy, capable & will never use it for personal gains or destruction of the society. Some times demons too acquire these secret reservoirs of infinite energy and use them for the destruction of humanity. Shukrachary though a Guru himself, had demonic tendencies and all his disciple met a fateful end.  
सर्वतीर्थवगाहस्य संप्राप्नोति फलं नरः।
गुरोः पादोदकं पीत्वा शेषं शिरसि धारयन्॥3.66॥
श्री सदगुरु के चरणामृत का पान करने से और उसे मस्तक पर धारण करने से मनुष्य सर्व तीर्थों में स्नान करने का फल प्राप्त करता है। 
One gets the awards equal to the piousity of visiting a pilgrimage site by praying-serving to the Sad Guru-the Guru who shows right direction to his disciples. 
Here Charnamrat stands for the water obtained after washing off the feet of the Guru. Drinking it and sprinkling it over the head relieves the disciple of numerous troubles. 
The Guru always wears wooden scandals which protects his feet from being dirty or infected by germs, virus, bacteria, pathogens, microbes. It was applicable in ancient times. At present it has lost significance, since neither the virtuous Guru is available nor talented & obedient disciples are there. One is not able to identify even a single ashram these days of the elegance of the yesteryears. 
गुरुपादोदकं पानं गुरोरुच्छिष्टभोजनम्।
गुरुर्मूर्ते सदा ध्यानं गुरोर्नाम्नः सदा जपः॥3.67॥
गुरुदेव के चरणामृत का पान करना चाहिए, गुरुदेव के भोजन में से बचा हुआ खाना, गुरुदेव की मूर्ति का ध्यान करना और गुरुनाम का जप करना चाहिए।
One should consume the Charnamrat and the left over food after serving the Guru, keep the Guru always in his mind & heart and recite his names. 
In India its a tradition that the left over food available in the plate should not to be served again. It fed to the birds or stray animals. 
गुरुरेको जगत्सर्वं ब्रह्मविष्णुशिवात्मकम्। 
गुरोः परतरं नास्ति तस्मात्संपूजयेद् गुरुम्॥3.68॥
ब्रह्मा, विष्णु, शिव सहित समग्र जगत गुरुदेव में समाविष्ट है। गुरुदेव से अधिक और कुछ भी नहीं है, इसलिए गुरुदेव की पूजा करनी चाहिए।
The trinity-Bhagwan Brahma, Vishnu and Shiv-Mahesh are present in the form of the Guru. One who is able to perceive the trinity in his Guru has achieved every thing and nothing is left for him to achieve. That is why the Guru deserve to be prayed. 
If one is praying his Guru he is praying the Almighty. 
ज्ञानं विना मुक्तिपदं लभ्यते गुरुभक्तितः। 
गुरोः समानतो नान्यत् साधनं गुरुमार्गिणाम्॥3.69॥
गुरुदेव के प्रति (अनन्य) भक्ति से ज्ञान के बिना भी मोक्ष पद मिलता है। गुरु के मार्ग पर चलने वालों के लिए गुरुदेव के समान अन्य कोई साधन नहीं है। 
Unilateral devotion to the Guru grants Moksh to the disciple. One who follows the foot steps of the Guru achieves every thing. 
गुरोः कृपाप्रसादेन ब्रह्मविष्णुशिवादयः।
सामर्थ्यमभजन् सर्वे सृष्टिस्थित्यंतकर्मणि॥3.70॥
गुरु के कृपा प्रसाद से ही ब्रह्मा, विष्णु और शिव यथाक्रम जगत की सृष्टि, स्थिति और लय करने का सामर्थ्य प्राप्त करते हैं।
By virtue of the blessings of the Guru Brahma, Vishnu and Mahesh attains the power to create, nurture and destroy.
Bhagwan Brahma, Vishnu and Shiv undertake asceticism for very-very periods of time, praying to the Almighty. The Almighty is Ultimate Guru. 
मंत्रराजमिदं देवि गुरुरित्यक्षरद्वयम्।
स्मृतिवेदपुराणानां सारमेव न संशयः॥3.71॥
हे देवी! गुरु यह दो अक्षर वाला मंत्र सब मंत्रों में राजा है, श्रेष्ठ है। स्मृतियाँ, वेद और पुराणों का वह सार ही है, इसमें संशय नहीं है। 
This two letter syllable Mantr rules supreme, being the extract of the Smratis, Veds and the Purans, there is no doubt in it. 
The Guru is a person who has mastered Veds, learnt all Smratis and grasped the Purans. He is aware of the finest details of these scriptures including epics and the history. That's why the Guru is excellent. 
यस्य प्रसादादहमेव सर्वं मय्येव सर्वं परिकल्पितं च। 
इत्थं विजानामि सदात्मरूपं त्स्यांघ्रिपद्मं प्रणतोऽस्मि नित्यम्॥3.72॥
मैं ही सब हूँ, मुझ में ही सब कल्पित है, ऐसा ज्ञान जिनकी कृपा से हुआ है, ऐसे आत्मस्वरूप श्री सद्गुरुदेव के चरण कमलों में मैं नित्य प्रणाम करता हूँ।
I am all in all, every thing is assumed in me; I pray & worship the Guru who has awakened me by realising this. 
अज्ञानतिमिरान्धस्य विषयाक्रान्तचेतसः।
ज्ञानप्रभाप्रदानेन प्रसादं कुरु मे प्रभो॥3.73॥
हे प्रभो! अज्ञान रूपी अंधकार में अंध बने हुए और विषयों से आक्रान्त चित्त वाले मुझ को ज्ञान का प्रकाश देकर कृपा करो।
Hey Almighty! Enlighten me-one who is blinded by the ignorance with the contaminated innerself (heart, mind & soul; mood, psyche) attracted-attached to the never ending desires, passions. Kindly, enlighten me and show the path-way to Salvation & Bhakti-devotion in the feet of the Ultimate.  
इति श्री स्कान्दोत्तरखण्डे उमामहेश्वरसंवादे श्री गुरुगीतायां तृतीयोऽध्यायः। 
The dialogue between Bhagwan Sada Shiv and Maa Parwati has been completed with the grace-kindness of Mata Saraswati, Ganesh Ji Maha Raj & Bhagwan Ved Vyas, today i.e., 07.07.2020, Tuesday, at Noida, UP, India & is presented to the learned, virtuous, righteous, pious devotees of the God. Anyone who learns it, grasp it, follows it, is qualified for Moksh-assimilation in the Almighty.  
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