Wednesday, October 29, 2025

#यजुर्वेद (1-14) #Yajur Ved

यजुर्वेद (1-14) Yajur Ved
CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM
PtSantoshBhardwaj
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ॐ गं गणपतये नम:।
अक्षरं परमं ब्रह्म ज्योतीरूपं सनातनम्।
गुणातीतं निराकारं स्वेच्छामयमनन्तजम्॥
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि
[श्रीमद्भगवद्गीता 2.47]
अध्याय (1) :: ऋषिः :- परमेष्ठी प्रजापतिः ; देवता :- सविता, यज्ञ, विष्णु, अग्नि, प्रजापति, अप्सवितरो, इन्द्र, वायु, द्योविद्युतौ; छन्द :- बृहति, उष्णिक, त्रिष्टुप, अनुष्टुप, पंक्ति, गायत्री।
हे शाखे! पलाश यज्ञ का फल जो वृष्टि के रूप में है, उसके हेतु मैं तुम्हें स्वीकार करता हूँ। हे शाखे ! रस और शक्ति की शक्ति हेतु मैं तुम्हें बिल्कुल सीधी और शुद्ध करता हूँ। हे गौ वत्से ! तुम खेल में लगी रहो। इसलिए तुम माता से प्रथक होकर विदेश में भी तीव्रगति वाली बनकर जाओ। वायुदेव तुम्हारी रक्षा करें। हे गौ माताओं! सभी को उपदेश प्रदान करने वाले, दिव्य गुणों से सम्पन्न, ज्योतिर्मान ईश्वर तुम्हें श्रेष्ठतम यज्ञ-कर्म के लिए, ऋण वाली गोचर पृथ्वी प्राप्त कराने में सहायक बने। हे अहिंसनीय गौओ ! तुम निर्मल हृदय से, बिना किसी भ्रम के तृण रूपी अन्न का भोजन करती हुई इन्द्रदेव के निर्मित अंश रूपी दूध को सभी प्रकार से बढ़ाओ। अपत्यरूपी रोगों का शमन करने वाली तुमको चोर इत्यादि दुष्ट हिंसित न करने पाएँ। व्याघ्र आदि भी तुम्हें न मार सकें। तुम इस यजमान की शरण में रहो।
तुम इस यजमान के आश्रम में ऊँचे स्थान पर बैठकर अपने स्वामी के सभी पशुओं की रक्षा करती रहो। हे दर्भ भयपवित्र ! तुम इन्द्र की इच्छापूर्ति के दूध का संरक्षण करने वाली हो, अतः तुम इसी जगह पर रहो। हे दुग्ध पात्र ! तुम वर्षा करने वाले स्वर्गलोक के ही रूप हो क्योंकि तुम्हारे द्वारा ही यजमान को स्वर्ग प्राप्त होता है। तुम मिट्टी के बने हो इसलिए तुम भूमि हो। हे मृतिका पात्र! तुम वायु का विचरण स्थान हो, इसलिए वायुमण्डल तुम्हारा स्थान है। इस कारण से तुम्हें अंतरिक्ष भी कहा 
जाता है। संसार में समाए अनेक गुणों को धारण करने से तुम तीनों लोकों में महत्वपूर्ण हो। तुम दूध को धारण करने के कारण अधिक तेजस्वी हो। इस कारण से तुम्हें हमेशा अपनी स्थिति के अनुसार ही रहना चाहिए, क्योंकि तुम्हारी स्थिति में परिर्वतन से बाधा पैदा हो सकती है।
हे छन्ने! तुम शुद्ध कहलाते हो। तुम दूध का शुद्ध को शुद्ध करने वाले हो। तुम इस हाँडी पर हजारों धाराओं वाले दूध को स्वच्छ करो। हे दुग्ध ! इस हज़ारों धारवाले छन्ने के साथ तुम पवित्र हो जाओ। सभी के प्रेरक ईश्वर तुम्हें शुद्ध करें। हे दोहनकर्त्ता पुरुष! इन गौओं में से किस गाय को तुमने दुहा है।
मैंने जिस गाय के बारे में पूछा है और तुमने जिस गाय को दुहा है, वह गाय ऋषियों की उम्र बढ़ाने वाली है और यजमान की आयु में भी वृद्धि करने वाली है। वह गाय सभी कार्यों की सम्पादिका है, उसके द्वारा ही सभी क्रियाएँ (कर्म) सम्पन्न होती हैं। वह गाय समस्त यज्ञीय देवों का पोषण करने वाली कहलाती है। हे दुग्ध ! तुम इन्द्र का अंश हो। मैं तुम्हें दही का जामन लगाकर जमाता हूँ। हे ईश्वर! तुम सभी में लीन और सभी के रक्षक हो। यह हव्य रक्षा योग्य है इसलिए तुम इसके प्रहरी बनो।
हे यज्ञ सम्पादक अग्ने! तुम वास्तविक के पर्याय और सुख समद्धि सम्पन्न हो। मैं तुम्हारी कृपा दृष्टि पर ही इस अनुष्ठान को आरम्भ कर रहा हूँ। मैं इसे पूरा करने में समर्थ होऊँ। हमारा यह अनुष्ठान बिना किसी बाधा के सम्पन्न हो। मैं यजमान हूँ। मैंने असत्य को छोड़कर सत्य की शरण में आश्रय लिया है।
हे पात्र! इस जल में परमिता परमेश्वर विद्यमान हैं। तुम इसको धारण करने वाले हो। इस कार्य को पूरा करने के लिए तुम्हें किसने नियुक्त किया है ? तुम किस कारण से नियुक्त किए गए हो। समस्त कार्य भगवान की आराधना करने हेतु किए जाते हैं। इसलिए भगवान को खुश करने के लिए तुम्हें इस कार्य में लगाया गया है। हे शूर्प और अग्नि ! तुम्हें यज्ञ कार्य करने के लिए ही नियुक्त किया गया है। तुम्हें अनेक प्रकार के कार्य कराने हैं इसलिए मैं तुम्हें ग्रहण करता हूँ। शूर्प और हवन को तृप्त करने वाली अग्नि से दुष्ट राक्षसों द्वारा पैदा हुई बाधा सब भस्म हो गई है। शत्रु भी जलकर भस्म हो गए हैं। हवन, दान आदि कार्यों में बाधा उत्पन्न करने वाली बुरी आत्माएँ इस अग्नि में जलकर राख हो गई हैं। इस अग्नि के ताप से मन में उत्पन्न बुरे विचार, दुष्टआत्माएँ और शत्रु भी वश में हो गए हैं। मैं इस सौर-मण्डल में घूमता रहता हूँ। मेरी यात्रा के समय सभी प्रकार की बाधाओं का विनाश हो जाए।
हे अग्ने! तुम समस्त अवगुणों का पतन करते और अन्धकार को समाप्त कर मिटा देते हो। अतः पापियों और हिंसा करने वाले राक्षसों को समाप्त करो। जो दुष्ट यज्ञ में बाधा पैदा कर हमारी हिंसा करना चाहें, उसे भी तुम प्रताड़ित करो। जिसे हम ख़त्म करना चाहें, उसे मारो। हे शकट के ईषादण्ड! तुम देवताओं के सेवनीय पदार्थों का वहन करते हो और अत्यन्त स्थिर हव्यादि के लायक धानों से भरे हुए इस आपत्ति को उठाते हो। अतः तुम देवताओं के स्नेह के पात्र हो और देवताओं का आह्वान करने वाले हो।
हे ईषादण्ड! तुम तिरछे नहीं हो। तुम कठोर मत बनना और तुम्हारे यजमान भी कभी भटके नहीं। हे शकट! व्यापक यज्ञ पुरुष तुम पर सवार हुए। हे शकट! वायु के आगमन से तुम सूख जाओ। इस कारण मैं तुमको विस्तृत करता हूँ। यज्ञ में विघ्न डालने वाली बाधाएँ दूर हो गई हैं। हे उँगलियों! इस हवन सामग्री को एकत्र करके इस सूप में रख दो। हे हवन के पदार्थों! सविता देव की प्रेरणा से अश्विदम और पूषा के बाहुओं और भुजाओं के द्वारा मैं तुम्हें ग्रहण करता हूँ। इस सभी हवन की सामग्री को अग्नि के सम्मुख मैं स्वीकार करता हूँ। अग्नि देवता को अर्पित करने के लिए मैं इसे ग्रहण करता हूँ।
हे शकट स्थित ब्रीहिशेष! तुम्हें ब्राह्मणों को भोजन कराने के लिए प्राप्त किया गया है, संचित करने के लिए प्राप्त नहीं किया गया है। यज्ञ भूस्वर्ग ग्रहण का साधन रूप है। मैं इसे अच्छी तरह से देखता हूँ। धरा पर बना हुआ यज्ञ मंडप मज़बूत हो। मैं इस व्यापक क्षितिज में भ्रमण करता हूँ। दोनों तरह की बाधाएँ दूर हों। हे धान्य! मैं तुम्हें पृथ्वी की नाभिरूप वेदी में निर्मित करता हूँ। तुम इस भू-भूता वेदी की गोद में भली प्रकार व्यवस्थित हो जाओ। हे अग्ने ! यह देवों की हवन सामग्री है। तुम इस हविरूप धान्य की सुरक्षा करो, जिससे कोई बाधा उपस्थित न हो।
हे दो कुशाओं! तुम शुद्ध करने वाले हो। तुम यज्ञ से संबंधित हो। हे जलो ! सभी के प्रेरक सवितादेव की शिक्षा से तुम छिद्र रहित शुद्ध करने वाले वायु रूप से सूर्य का शोधक किरणों द्वारा मंत्र को अभिमंत्रित करके शोधन करता हूँ। हे जलो ! तुम भगवान के तप से तेजस्वी हो। आज तुम इस यज्ञ अनुष्ठान को विघ्न रहित पूरा करो क्योंकि तुम हमेशा नीचे की ओर विचरण करते रहते हो। तुम पहले शोधक हो। हमारे यज्ञकर्त्ता यजमान को फल प्राप्ति में सामर्थ्यवान बनाओ। यो यजमान दक्षिणादि के द्वारा यज्ञ कर्म का पालन करता है और हवि प्रदान करने की अभिलाषा करता है, उसे यज्ञ कर्म में संलग्न करो। उसकी उमंग भंग न हो।
हे जल देवता! इन्द्रदेव ने तुम्हें व्रत वध में लगते हुए सहायक रूप से स्वीकार करके तुम्हें व्रत और शुभ कार्यों में अपना सहयोग देकर इंद्र से मित्रता बना रखी है। हे जल ! तुम्हारे द्वारा सभी हवन की सामग्री को शुद्ध किया जाता है। अतः पहले तुम्हें ही शुद्ध किया जाता है। तुम अग्नि के प्रयोग में आते हो। हे हवि ! तुम अग्नि, सोम देवता के सेवनीय हो। मैं तुम्हें शुद्ध करता हूँ। हे ऊखल, मूसल आदि यज्ञ के पात्रों ! तुम भी इस देव कार्य में प्रयोग किए जाओगे, अतः इस शुद्ध जल के द्वारा तुम्हें भी शुद्ध कर रहा हूँ क्योंकि तुम्हारे निर्माण कर्त्ता बढ़ई आदि ने तुम्हें अपवित्र कर दिया है। हे कृष्णाजन ! तुम इस ऊखल को धारण करने के लिए हमेशा उपयुक्त ही हो। हे कृष्णाजन! (काले मृग चर्म) ये जो धूल, तिनके आदि मैल छिपा हुआ था वह सब दूर हो गया है। इस कार्य से यजमान के शत्रु भी परास्त हो गए हैं। हे कृष्णाजन! तुम इस पृथ्वी की त्वचा का ही रूप हो। अतः पृथ्वी तुम्हें अपनाती हुई अपनी त्वचा ही समझे। हे उलूखल! तुम्हें लकड़ी के द्वारा बनाए जाने पर भी तुम पत्थर के समान दिखाई देते हो। तुम्हारा मूल देश नितांत स्थूल है। हे उलूखल ! नीचे बिछाई गई काली मृग चर्म जो त्वचा रूप है वह तुम्हें स्वात्यभाव से मानें।
हे हवि रूप धान्य! जब तुम इस अग्नि कुण्ड में अर्पित किए जाते हो, तब अग्नि की ज्वालाएँ जगमग होती हैं। इसलिए तुम अग्नि के शरीर रूप ही माने गए हो। तुम अग्नि में अर्पित होते ही अग्नि रूप बन जाते हो। यह हवि यजमान द्वारा मौन त्याग करने पर वाों विसर्जन नाम्नी हो जाती है। मैं तुम्हें अग्नि आदि देवों के लिए प्राप्त करता हूँ। हे मूसल ! तुम काष्ठ निर्मित होते हुए भी पत्थर के समान अटल हो। तुम अग्नि आदि देवताओं की भलाई के लिए इसे ब्रीहि आदि हवि को भूसी आदि से अलग करो। चावलों में भूसी न रहे और वे अधिक टूटने न पाएँ। इस तरह से इस कार्य को पूरा करो। हे हवि प्रदान करने वाले ! तुम इधर आओ। हे हवि संस्कार करने वाले ! इधर विचरण करो। तुम इधर आओ (3 बार आह्वान करें)।
हे शम्यारूप यज्ञ के विशिष्ट अस्त्र! तुम राक्षसों के विरुद्ध घोर ध्वनि करते हो। ऐसा होकर भी तुम देवताओं के लिए मृदु ध्वनि करने वाले हो। हे अस्त्र ! तुम असुरों के मन को चीरने वाले यजमान को अन्न आदि ग्रहण करने वाली ध्वनि करो। तुम्हारी ध्वनि से यज्ञ के फलस्वरूप अन्न का भण्डार हो। हे शूर्प ! वर्षा के जल से वृद्धि करने वाली सींकों द्वारा तुम्हें बनाया गया है। हे तण्डुलरूप हव्य तुम वर्षा के जल से बढ़ते हो और यह शूर्प भी वर्षा के जल से ही वृद्धि को प्राप्त हुआ है। अतः यह तुम्हें अपना आत्मीय माने। तुम इसके संग संगति करा। भूसी आदि व्यर्थ द्रव्य और असुरादि भी दूर हो गए। हवि के द्वेषी प्रमादादि शत्रु भी चले गए। हव्यात्मक सभी रुकावटें दूर फेंक दी गई। हे तण्डुलों! शूर्प के चलने से उत्पन्न हुई हवा तुम्हें भूसी इत्यादि के सूक्ष्मतम कणों से अलग कर दें। हे तण्डुलो ! सर्व-प्रेरक सविता देवता स्वर्ण अलंकार से सुसज्जित और स्वर्णहस्त हैं। वे उंगलीयुक्त हाथों से तुम्हें प्राप्त करें।
हे उपवेश! तुम तेज़ अंगारों को जलाने में समर्थ और बुद्धिमान हो। हे आ‌ह्वानीय अग्नि! आमाद अग्नि को त्यागकर और द्रव्यादि अग्नि का विशेष रूप से त्याग करो। हे त्राहि पत्याग्न ! देवताओं के यज्ञ योग्य अपने तृतीय रूप को प्रकट करो। हे सिकोरे ! तुम भी खड़े हो जाओ। इस भूमि को दृढ़ करो। हवन सिद्धि के लिए तुम ब्राह्मणों के द्वारा ग्रहणीय, क्षत्रीय के द्वारा भी अपनाने के योग्य हो। समान कुल में उत्पन्न यजमान के जाति वालों के हव्य योग्य! शत्रु, राक्षस और पाप को नष्ट करने के लिए तुम्हें अंगारे पर स्थित करता हूँ।
हे शून्य स्थान में दृढ़ अग्ने! तुम हमारे महान यज्ञ अनुष्ठान को प्राप्त कर बाधा रहित करो। हे द्वितीय सिकोरो ! तुम पुरोडाश के ग्रहण करने वाले हो। इसलिए अन्तरिक्ष को अटल करो। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य से स्वीकार योग्य पुरोडोश के सम्पादन के द्वारा और बैरी राक्षस, पाप आदि को नष्ट करने हेतु तुम्हें नियुक्त करता हूँ।
हे तृतीय कपाल! तुम परोडाश के धारक हो। स्वर्गलोक को तुम अटल करो। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य के द्वारा सम्पादित पुरोडाश के दिखाने वाली क्रियाओं और बाधाओं को दूर करने को मैं तुम्हें नियुक्त करता हूँ। हे चतुर्थ कपाल ! तुम सभी दिशाओं को स्थिर करने वाले हो। मैं तुम्हारी इसी कारण से स्थापना करता हूँ।
हे कपालो! तुम अलग कपाल को स्थिर करने वाले और अन्य कपालों का हित रखने वाले हो। हे समस्त कपालो! तुम भृगु और अंगिरा के कुल ऋषि के तप रूप अग्नि से तपो।
हे कृष्णाजिन! तुम शिला धारण करने में समर्थ हो। इस कृष्णाजिन (काले मृगचर्म) में जो धूल और तिनका रूपी मैल छिपा था, वह सब दूर हो गया। इस काम के द्वारा इस यजमान के शत्रु भी नष्ट हो गए हैं। हे शिले ! तुम पीसने का कार्य करती हो, तुम पर्वत के खण्ड से बनाई गई हो और बुद्धि को धारण, करने वाली हो। यह मृगचर्म पृथ्वी की त्वचा के समान हो, तुम पृथ्वी का अस्थि रूप हो। हे शम्या ! तुम स्वर्गलोक को धारण करने वाली हो। तुम इन सभी कार्यों को करने में समर्थ हो। हे शिललोढ़े ! तुम पीसने के व्यापार में कुशल हो और तुम पहाड़ से उत्पन्न शिल के पुत्री रूप हो। अतः यह शिल तुम्हें माता के समान होती हुई पुत्र भाव से अपने हृदय से धारण करें।
हे हव्य! तुम वृष्टि प्रदान करने वाले हो। अतः अग्नि देवाताओं को हर्षित करो। हे हवि ! जो प्राण मुख में हमेशा सतर्क रहता है, उस प्राण की प्रसन्नता के लिए मैं तुम्हें चूर्ण करता हूँ। हे हवि ! ऊँची जगह में प्रयास करने वाले उदान की बढ़ोतरी के लिए में तुम्हें चूर्ण करता हूँ।
हे हवि! सभी शरीर में स्थित होकर सतर्क रहने वाले ब्यान की बढ़ोतरी के लिए मैं तुम्हें चूर्ण करता हूँ। हे हवि! अविच्छिन्न कार्य को स्मृति में रखकर यजमान की आयु की वृद्धि हेतु मैं तुम्हें कृष्णाजिन पर रखता हूँ। सर्व प्ररेक और हिश्यपाणि सविता देव तुम्हें धारण करें। हे हवि! यजमान के नेत्रेन्द्रिय के श्रेष्ठ होने के लिए मैं तुम्हें देखता हूँ। हे घृत ! तुम गौदुग्ध (गाय के दूध से निर्मित होने के कारण) ही हो।
हे पिष्टी! सर्व-प्रेरक सविता देव की शिक्षा से अश्विद्वय की बाजुओं से और पूषा देव के हाथों से तुमको कलश में दृढ़ करता हूँ। हे उपसर्जनी भूत जल! तुम इन पिसे हुए चावलों से भली प्रकार से मिल जाओ। यह जल औषधियों का रस है और इसमें जो रेवती नामक जल अंश हैं, वह इस पिष्टी में भला प्रकार मिश्रित हो जाए।
इसमें जो मधुमति नामक जल का अंश है, वह भी पिष्टी के माधुर्य से मिले। हे उपसर्जनी भूत जल और पिष्ट संगठन ! तुम दोनों को पुरोडाश निर्मित करने के लिए भली-भाँति से मिश्रित करता हूँ। यह भाग अग्नि से सम्बन्धित हो। यह हिस्सा अग्नि-सोम नामक देवों का है। हे आज्य देवों को अन्न पेश करने के लिए मैं तुम्हें सिकोरे में रखता हूँ। हे पुरोडाश! तुम इस पर चमकते हो। इस कार्य के द्वारा हमारा यजमान दीर्घकाल तक जीवित रहे। हे पुरोडाश ! तुम स्वभावतः व्यापक हो, अतः तुम इस कपाल में भी भली प्रकार से विशाल बनो और तुम्हारा यह यजमान पुत्र, पशु से सम्पन्न होकर कीर्तिमान बने। हे पुरोडाश पाक क्रिया से उत्पन्न हव्य का उपद्रव्य जल छूने से शान्त हो जाए। हे पुराडाश! सर्वप्रेरक सविता देव तुम्हें अत्यन्त समृद्ध स्वर्गलोक में अटल नाक नामक दिव्य अग्नि में दृढ़ करें।
हे पुरोडाश! तुम डरो मत। तुम चंचल मत बनो स्थिर ही रहो, यज्ञ के कारण रूप पुरोडश राख को ढकने से बचें। इस प्रकार यजमान की संतान आदि भी कभी दुःखी न हों। उँगली प्रक्षालन से छने हुए जल ! मैं तुम्हें त्रित नामक देवता की तृप्ति के लिए प्रदान करता हूँ। मैं तुम्हें द्वित्त नाम एवं एकत्र देवता की तृप्ति के लिए निमित्त कर देता हूँ। हे खुरपी-कुदाली! सविता देव की प्रेरणा से अश्विनी कुमारों की भुजाओं से और पूषा देवता के हाथों से मैं तुम्हें स्वीकार करता हूँ। देवताओं की प्रसन्नता के लिए इस यज्ञ में तुम्हें वेदी खोदने का कार्य करना है। हे खुरपे! तुम इन्द्र की दाईं भुज के समान बलवान तथा हजारों शत्रुओं और राक्षसों के विनाश करने में सम्पन्न बनो तुम वायु की तरह चलते हो। वायु जिस तरह अग्नि से मिलकर उसकी ज्वालाओं क तीव्र कर देती है, उसी प्रकार से ही यह खुरपा खोदने का कार्य तीव्रता से करता है और शुभ कार्यों से घृणा करने वाले असुरों का नाश कर देता है।
हे धरा! तुम देवताओं के यज्ञ के योग्य हो। तुम्हारी प्रियतम संतान रूप औषधि के तृण, मूल आदि को मैं समाप्त नहीं करता हूँ। हे पुरीष! तुम गायों के रहने की जगह गोष्ठ (घर) को प्राप्त हो जाओ। हे वेदी तुम्हारे लिए स्वर्गलोक के अभिमानी देवता सूर्य जल की वर्षा करें। वर्षा से खनन द्वारा उत्पन्न कष्ट की शांति हो। हे सबके प्रेरक सवितादेव! जो आदमी हमसे शत्रुता करे या हम जिससे शत्रुता रखें, ऐसे दोनों प्रकार के शुत्रओं का तुम इस पृथ्वी की अनन्त सीमा रूपी नरक में डालों और सैंकड़ों बन्धनों में जकड़ लो। उसकी उस नरक से कभी मुक्ति न हो।
धरा में दृढ़ देवों के यज्ञ वाली जगह वेदी से बाधाकारी अररू नामक असुर को बाहर निकालकर समाप्त करता हूँ। हे पुरीष! तुम गायों के गोष्ठ को प्राप्त हो जाओ। हे वेदी! तुम्हारे लिए सूर्य जल वर्षा करें, जिससे तुम्हारा खननकालीन दुःख दूर हो सके। हे सवितादेव! जो हमसे शत्रुता करे या हम जिससे शत्रुता करें, ऐसे शत्रुओं को नरक में पहुँचाओ और सैकड़ों पाशों से बाँधों। वे उस नरक से कभी छूट न पाएँ। हे अररो ! यज्ञ के फलस्वरूप स्वर्गलोक जैसे श्रेष्ठतम जगह को तुम नहीं जाना। हे वेदी ! तुम्हारा धरा रूप में उपजाऊ नामक रस स्वर्गलोक में न जाने पाए। हे पुरुीष! तुम गायों के गोष्ठ (गोशाला) में जाओ। हे वेदी! सूर्य तुम्हारे लिए जल की वर्षा करे, जिससे तुम्हारी खुदाई की पीड़ा शांत हो। हे सविता देव! जो हमसे शत्रुता करे और हम जिससे शत्रुता करें, ऐसे शत्रु नरक के सैकड़ों बन्धनों में जकड़े रहें। वे उस घोर नरक से कभी मुक्त न होने पाएँ।
हे सर्वव्यापक विष्णु! जप करने वाले की, रक्षा करने वाले की, रक्षा करने वाले गायत्री छंद से प्रसन्न होने वाले मैं तुम्हें तीनों दिशाओं में ग्रहण करता हूँ। हे विष्णु! मैं तुम्हें त्रिष्टुप श्लोक से स्वीकार करता हूँ। मैं तुम्हारा जगती श्लोक से ध्यान करता हूँ। हे वेदी ! तुम पाषाणों में से निकलकर सुन्दर बन गई हो और अररू जैसे असुरों के मिट जाने से तुम शान्ति रूप हो गई हो। हे वेदी ! तुम सुख देने वाली और देवताओं के वास करने योग्य हो। हे वेदी! तुम अन्न, रस से परिपूर्ण हो जाओ। हे विष्णु ! तुम यज्ञ स्थान पर तीन वेदों के रूप में अनेक श्लोक पढ़े जाने वाले हो। तुम हमारी इस बात को विनयपूर्वक सुनो। प्राचीनकाल में देवताओं ने प्राणियों को धारण करने वाली पृथ्वी को ऊँचा उठाकर वेदों के साथ चन्द्रलोक में स्थापित कर दिया था। धर्म को मानने वाले उसी पृथ्वी के दर्शन से यज्ञ इत्यादि कार्य किया करते थे। हे आग्नीघ्र ! वेदी एक सी हो गई है। अब इसे जिनके द्वारा जल सिंचा जाता है, उसे लाकर वेदी में स्थापित करो। हे सफ्य ! तुम शत्रुओं का विनाश करने वाले हो, हमारे शत्रु का भी विनाश कर दो। इस ताप द्वारा राक्षस आदि सभी तरह की बाधाओं का विनाश हो गया है। इस अग्नि के द्वारा यहाँ पर उपस्थित सभी बाधाएँ, राक्षस और शत्रु सब जलकर भस्म हो गए। हे स्त्रुव ! तुम्हारी धार बेकार नहीं है। परन्तु तुम शत्रुओं को कमज़ोर करने वाले हो। इस यज्ञ द्वारा यह अन्न से परिपूर्ण हो। इसलिए मैं तुम्हारा आह्वान करता हूँ जिससे यज्ञ प्रकाशयुक्त हो। इस ताप के द्वारा सभी शत्रु व बाधाएँ दूर हो गईं हैं। सभी जलकर भस्म हो गए हैं।
हे सुक्त्रय! तुम्हारा प्रहार तीक्ष्ण नहीं है परन्तु तुम शत्रुओं को कमज़ोर करने वाले हो। इस यज्ञ के द्वारा यह देश अन्न से भरपूर हो। इसलिए मैं तुम्हें प्रक्षालन करता हूँ, जिससे यज्ञ प्रकाश से परिपूर्ण हो। इस ताप के द्वारा सब बाधाएँ और शत्रुगण नष्ट हो गए। इस ताप से यहाँ उपस्थित रुकावट और शत्रु आदि सब भस्मी भूत हो गए। हे सुक्त्रय ! तुम तीक्ष्ण वार वाले न होने पर भी शत्रु का पतन करने में सामर्थ्यवान हो। यह राज्य अन्न से सम्पन्न हो, इसलिए तुम्हारा प्रक्षालन करता हूँ।
हे योक! तुम भूमि की मेखला के समान हो। हे दक्षिण पाश! तुम इस सर्वव्यापी यज्ञ को करने में समर्थ हो। हे आज्य ! उत्तम रस की प्राप्ति की इच्छा से मैं तुम्हें द्रव्य रूप में करता हूँ। हे आज्य! करुणामयी दृष्टि से नीचा मुँह करके देखता हूँ। तुम अग्नि के जीभरूप हो और भली प्रकार देवताओं का आह्वान करने वाले हो। अतः मेरे इस यज्ञ फल की सिद्धि के योग्य तथा रस यज्ञ कार्य की सम्पन्नता के योग्य बन जाओ।
हे आज्य! मैं सवितादेव की शिक्षा से तुम्हें छिद्र रहित पवन के रूप समान पवित्र और सूर्य की किरणों के तेज से शुद्ध करता हूँ। हे प्रोक्षणी ! मैं सविता देव की शिक्षा से छिद्र रहित, हवा और सूर्य रश्मियों के तेज से तुम्हें शुद्ध करता हूँ। हे आज्य! तुम चमकीले शरीर वाले होने से तेजस्वी हो। स्निग्ध (शान्त) होने से प्रकाशमान हो और अमृत के समान अटल और निर्दोष हो। हे आज्य ! तुम देवों के मन स्थल हो। तुम उन्हें आनन्द प्रदान करने वाले हो। तुम्हारा नाम देवों के सम्मुख पुकारा जाता है। तुम देवताओं के स्नेह पात्र हो। सारयुक्त होने से तुम तिरस्कार के योग्य नहीं होते। तुम इस देव यज्ञ के प्रमुख स्थान हो। इस कारण मैं यजमान तुम्हें प्राप्त करता हूँ।
अध्याय (2)  :: ऋषि :- परमेष्ठी प्रजापति, देवल, वामदेव; देवता :- यज्ञ, अग्नि, विष्णु, इन्द्र, धावा, पृथ्वी, सविता, बृहस्पति, अग्निषों मौ, इंद्राग्नि, मित्रावरूणी विश्वदेवा, अग्निवायु, अग्नि सरस्वत्यौ प्रजापति, त्वष्टा, ईश्वर, पितर, आप; छन्द :- पंक्ति, लगती, त्रिदुष्प, गायत्री, ब्रहती अनुष्टप, उष्णिक।
हे ईश्वर! तुम हवन की लकड़ी हो। तुम कठोर वृक्ष से उत्पन्न हुई हो या आह्वानीय अग्नि में रहने वाले हो।
अग्नि में डालने हेतु मैं तुम्हें जल से धोकर शुद्ध करता हूँ। हे वेदी! तुम यज्ञ की नाभि कहलाती हो। तुम्हें कुश धारण हेतु अच्छी प्रकार से जल से साफ करता हूँ। हे दर्भ ! तुम कुशों का समूट होने से सक्ष्म हो। तुम्हें तीन स्त्रुवों के सहित रुकना है, इसलिए मैं तुम्हें जल से स्वच्छ करता हूँ। हे प्रोक्षण से शेषजल ! तुम इस वेदी रूप पृथ्वी को सींचते हो। हे कुशाओं! तुम यज्ञ की शिखा के समान हो। हे वेदी! तुम ऊन की तरह बहुत ही कोमल हो। मैं तुम्हें देवताओं के सुखपूर्वक बैठने का स्थान बनाने हेतु कुशाओं से ढकता हूँ। यह हवि भूवपति देवों के लिए प्रदान की है। यह हवि भुवनपति देवता के लिए प्रदान की गई है। यह हवि भूतों के स्वामी भोले शंकर को अर्पण करता हूँ।
हे परिधि ! विश्वावसु नामक गन्र्धव सभी विघ्नों की शांति हेतु तुम्हें सभी ओर से स्थापित करें और तुम केवल अग्नि की ही सीमा न होकर राक्षसों और शत्रुओं से सुरक्षा करने वाली, यजमान की भी सीमा बन जाओ। तुम पश्चिम दिशा में अटल रहो। आह्वानीय अग्नि के पहले भाई भुवपति नामक अग्नि रूप यज्ञ से प्रकट हो। हे दक्षिणी परिधि ! तुम इन्द्रदेव की दक्षिणी भुजा रूप रहो। संसार की बाधाओं को दूर करने के लिए तुम यजमान की रक्षक बनो। तुम आह्वानीय के दूसरे भाई भुवनपति की यज्ञ आदि से वन्दना की गई है। हे उत्तर परिधि ! मित्रावरुण! पवन और आदित्य तुम्हें उत्तर दिशा में स्थित करें। तुम आह्वानीय रूप से संसार की बाधाओं को दूर करने हेतु और लोक कल्याण हेतु यजमान की रक्षा करो। आह्वानीय के तीसरे भाई भूतपति यज्ञ आदि कार्य द्वारा वंदित हो।
हे क्रांतदर्शी ! अग्नि देव ! तुम पुत्र एवं पौत्र आदि प्रदान करने वाले, धन से सम्पन्न करने वाले, यज्ञ के फल रूप में सुख समृद्धि को भी प्रदान करने वाले शक्तिशाली और महान हो। हम ऐसे कार्यों के द्वारा आपको नमन करते हैं। हे इहम ! तुम अग्नि देवता को भली-भाँति प्रदिप्त करते हो। हे आह्वानीय सूर्य! पूर्व में कोई विघ्न आए तो उससे हमारी रक्षा करो। हे कुश ! तुम दोनों, सविता देव की भुजाओं के समान हो। हे कुशाओं! तुम ऊन के समान कोमल हो, मैं तुम्हें देवताओं के सुखपूर्वक बैठने हेतु ऊँचे स्थान पर बिछाता हूँ। तीनों लोकों के माननीय देवता वसुगण, रुद्रगण और मरुदगण सब ओर से हे कुशाओं! तुम पर विराजमान हों। हे जूहू! तुम घृत से पूर्ण होकर देवताओं के प्रिय उस घृत के साथ इस पाषाण रूप आसन पर बैठ जाओ। हे उपभृत! तुम घृत से पूर्ण होने वाले हो। इस समय देवताओं के प्रिय घी से युक्त होकर पाषाण रूप इस आसन पर बैठो। हे ध्रुवा ! तुम हमेशा घी द्वारा सिंचित हो। इस समय देवताओं के प्रिय इस घृत से पूर्ण होकर तुम प्रस्तर रूप इस आसन पर विराजमान हो जाओ। हे हव्य ! तुम घी के साथ स्नेहपूर्वक इस पर स्थित हो जाओ। हे विष्णु ! फल की प्रप्ति के लिए सत्यरूप यज्ञ के स्थान में जो हव्य स्थित है, उसकी रक्षा करो और साथ ही साथ हव्य की ही नहीं अपितु समस्त यज्ञ की और यज्ञ की रक्षा करने वाले यजमान की भी रक्षा करो। हे प्रभु! हे परमपिता परमेश्वर ! मुझे यज्ञ कार्य करने की भी रक्षा करो।
हे अन्नजेता अग्ने! तुम अनेक अन्नों को उत्पन्न करने वाले हो। अतः अन्नोत्पति में होने वाली बाधाओं की शान्ति हेतु मैं तुम्हारा शोधन करता हूँ। जो देवगण मेरे इस अनुष्ठान में अनुकूल हुए हैं, मैं उन्हें नमस्कार करता हूँ। जो पितर गण मेरे इस अनुष्ठान में कृपा करते हैं, मैं उन पितरों को नमस्कार करता हूँ। हे जुहू ! हे उप भृत ! तुम दोनों मेरे इस कार्य में सतर्क रहो जिससे घी न बिखरे, इस प्रकार घी को धारण करो।
हे विष्णु ! मैं अपने पैरों से तुम पर क्रोधित नहीं होता हूँ। इस वेदी पर पैर रखने से पाप का मैं भागीदार न बनूँ। हे अग्नि! मैं तुम्हारी परछाई के समान निकट ही भूमि पर बैठता हूँ। हे वसुमति ! तुम यज्ञ के स्थान रूप हो। इस देव यज्ञ के स्थान से उठकर शत्रु का वध करने के लिए बल को धारण करते हुए इन्द्र के लिए ही यह यज्ञ उत्पन्न हुआ है। हे अग्नि ! तुम होता के कर्म को और दैत्य-कर्म को अवश्य जानो। स्वर्ग और पृथ्वी तुम्हारी रक्षा करें और तुम भी उन दोनों की रक्षा करो और इन्द्र हमारी दी हुई हवि द्वारा देवताओं सहित संतुष्ट हो। वे हम पर प्रसन्न होकर हमारा यह अनुष्ठान बिना किसी बाधा के पूरा करें।
इन्द्रदेव इस प्रकार की वीरता को मुझ यजमान में स्थापित करें। दिव्य और पार्थिव सभी प्रकार के धन हमारे समक्ष आएँ। हमारी सर्व मनोकामना पूरी हो और हमारी अभिलाषाएँ सत्य फल प्रदान करने वाली हों। जो यह पृथ्वी पूजनीय है, वह संसार को निर्मित करने वाली है। यह माता के रूप समान धरा मुझे हविशेष के भक्षण करने की आज्ञा प्रदान करें। हे माता! अग्नि में आहुति अर्पित करने से मेरी जठराग्नि अत्यन्त दीप्त हो उठी हैं, अतः मैं उस हिस्से को अग्नि रूप से भक्षण करता हूँ।
सविता देव हमारे पालक पिता हैं, वे मुझे हविशेष के भक्षण की आज्ञा प्रदान करें। हे पिता ! अग्नि में आहुति देने से जठराग्नि (शरीर की ऊर्जा) बिल्कुल कम हो गई है। उसकी संतुष्टि के लिए मैं इसका भक्षण (प्रयोग) करता हूँ। हे प्राशित्र ! सविता देव की प्ररेणा से अश्विनी कुमार की भुजाओं से और पूषा देवता के हाथों से हे मध्यम परिधि ! मैं तुम्हें वसुओं का यज्ञ करने के लिए घृत-सिक्त करता हूँ। हे दक्षिण परिधि ! मैं तुम्हें रुद्रों का यज्ञ करने के लिए घृत-सिक्त करता हूँ। हे उत्तर परिधि ! मैं तुम्हें आदित्यों का यज्ञ करने के लिए घृताक्त करता हूँ। हे धावा पृथ्वी ! इसे स्वीकार कर पाषाण को तुम भली-भाँति जानो। हे पाषाण सखा वरुण, वायु और सूर्य तथा प्राणापान तुम्हें जल वर्षा की गति से बचाएँ। घृत-सिक्त प्रस्तर का आस्वाद करते हुए अंतरिक्ष में विचरण करने वाले देवता आदि छन्दों के सहित प्रस्तर लेकर विचरण करें। हे प्रस्तर! अंतरिक्ष में मरुद्गण की दिव्य गति को तुम अपनाओ। तुम सूक्ष्म देह वाली स्वाधीन गौ होकर विचरण करो। स्वर्ग में जाकर हमारे लिए वर्षा को मैं तुम्हें ग्रहण करता हूँ। हे प्राशित्र! मैं तुम्हें अग्नि देव के मुख द्वारा भक्षण (प्रयोग) करता हूँ। हे सर्वगुण सम्पन्न सविता देव! इस शुभ कार्य की यजमान तुम्हारे लिए करते हैं और तुम्हारी प्रेरणा से यज्ञ के लिए बृहस्पति जी को देवताओं का गुरु मानते हैं। अतः इस यज्ञ और मेरी दोनों की रक्षा करो।
बृहस्पति इस यज्ञ को स्वीकार करें। वे इस यज्ञ को निर्विघ्न सम्पूर्ण करें। सभी देवगण हमारे यज्ञ से प्रसन्न हो। इस प्रकार पार्थिव सविता देव यजमान के प्रति अनुकूल हो। हे अन्नि देव ! यह समिधा तुम्हें प्रदीप्त करने वाली है। तुम इस समिधा के द्वारा उन्नति को प्राप्त हो और हम सबकी उन्नति करो। तुम्हारी इस प्रकार की कृपा से हम सुदृढ़ बनेंगे और जब तुम प्रसन्न हो जाओगे, तब हम अपने पुत्र, पशु आदि से भी सम्पन्न हो जाएंगे। हे अन्न पर विजय पाने वाले अग्निदेव ! तुम अन्न की उत्पत्ति के लिए जाते हो। मैं तुम्हें शुद्ध करता हूँ। द्वितीय पुराडोश के स्वामी अग्नि सोम ने इस विघ्न रहित हवियों को ग्रहण कर लिया है। इस कारण मैं अच्छी विजय को प्राप्त कर पाया हूँ। पुरोडाश और जुहू उपभृत आदि ने मुझ यजमान को इस कार्य करने हेतु उत्साहित किया है। जो राक्षस आदि शत्रु हमारे इस शुभ कार्य को नष्ट करने के लिए शत्रुता रखते हैं, उन्हें अग्नि और सोमदेव नष्ट कर दें। पुरोडाश आदि के देवता की आज्ञा पाकर मैं हवि के बिना किसी बाधा से स्वीकार किए जाने के कारण इन दोनों का त्याग करता हूँ।
हे मध्यम परिधि! मैं तुम्हें वसुओं का यज्ञ करने के लिए घृत-सिक्त करता हूँ। हे दक्षिण परिधि! मैं तुम्हें रुद्रों का यज्ञ करने के लिए घृत-सिक्त करता हूँ। हे उत्तर परिधि! मैं तुम्हें आदित्यों का यज्ञ करने के लिए घृताक्त करता हूँ। हे धावा पृथ्वी ! इसे स्वीकार कर पाषाण को तुम भली-भाँति जानो। हे पाषाण सखा वरुण, वायु और सूर्य तथा प्राणापान तुम्हें जल वर्षा की गति से बचाएँ। घृत-सिक्त प्रस्तर का आस्वाद करते हुए अंतरिक्ष में विचरण करने वाले देवता आदि छन्दों के सहित प्रस्तर लेकर विचरण करें। हे प्रस्तर! अंतरिक्ष में मरुद्गण की दिव्य गति को तुम अपनाओ। तुम सूक्ष्म देह वाली स्वाधीन गौ होकर विचरण करो। स्वर्ग में जाकर हमारे लिए वर्षा को मैं तुम्हें ग्रहण करता हूँ। हे प्राशित्र! मैं तुम्हें अग्नि देव के मुख द्वारा भक्षण (प्रयोग) करता हूँ। हे सर्वगुण सम्पन्न सविता देव! इस शुभ कार्य की यजमान तुम्हारे लिए करते हैं और तुम्हारी प्रेरणा से यज्ञ के लिए बृहस्पति जी को देवताओं का गुरु मानते हैं। अतः इस यज्ञ और मेरी दोनों की रक्षा करो।
बृहस्पति इस यज्ञ को स्वीकार करें। वे इस यज्ञ को निर्विघ्न सम्पूर्ण करें। सभी देवगण हमारे यज्ञ से प्रसन्न हो। इस प्रकार पार्थिव सविता देव यजमान के प्रति अनुकूल हो। हे अन्नि देव! यह समिधा तुम्हें प्रदीप्त करने वाली है। तुम इस समिधा के द्वारा उन्नति को प्राप्त हो और हम सबकी उन्नति करो। तुम्हारी इस प्रकार की कृपा से हम सुदृढ़ बनेंगे और जब तुम प्रसन्न हो जाओगे, तब हम अपने पुत्र, पशु आदि से भी सम्पन्न हो जाएंगे। हे अन्न पर विजय पाने वाले अग्निदेव ! तुम अन्न की उत्पत्ति के लिए जाते हो। मैं तुम्हें शुद्ध करता हूँ। द्वितीय पुराडोश के स्वामी अग्नि सोम ने इस विघ्न रहित हवियों को ग्रहण कर लिया है। इस कारण मैं अच्छी विजय को प्राप्त कर पाया हूँ। पुरोडाश और जुहू उपभृत आदि ने मुझ यजमान को इस कार्य करने हेतु उत्साहित किया है। जो राक्षस आदि शत्रु हमारे इस शुभ कार्य को नष्ट करने के लिए शत्रुता रखते हैं, उन्हें अग्नि और सोमदेव नष्ट कर दें। पुरोडाश आदि के देवता की आज्ञा पाकर मैं हवि के बिना किसी बाधा से स्वीकार किए जाने के कारण इन दोनों का त्याग करता हूँ।
हे अग्नि! जब तुम राक्षसों से घिरी हुई थीं तब तुमने उनके विनाश के लिए जिस परिधि (सीमा) को पश्चिम दिशा में स्थापित किया था, तुम्हारी उस परिधि को मैं तुम्हें वापिस करता हूँ। यह परिधि तुमसे अलग न रहे। हे दक्षिण-उत्तर परिधि तुम अग्नि की प्रिय पात्र हो। तुम प्रयोग किए जाने वाले अन्न को ग्रहण करो।
हे विश्वे देवो ! तुम इस द्रव रूप घी या घृतयुक्त अन्न के भक्षण करने वाले होने से महान बने हो। तुम परिधि से रक्षित पत्थर पर विराजमान होते हो। तुम सभी मेरे वचन को ग्रहण करो कि यह यजमान भली प्रकार यज्ञ करता है। इस प्रकार सभी से कहते हुए हमारे यज्ञ में आकर सन्तुष्टि को प्राप्त होओ। यह आहुति भली प्रकार स्वीकार हो।
हे जुहू! और उपभृत ! तुम घी से परिपूर्ण हो। शकट वाहक! दोनों बैलों को घृताक्त करके उनकी रक्षा करो। हे सुख रूप ! तुम मुझे श्रेष्ठ सुख में स्थित करो। हे वेदी ! मैं तुम्हें नमस्कार करता हूँ। तुम प्रवृद्ध होओ। तुम इस अनुष्ठान कार्य में लगो जिससे यह यज्ञ सम्पूर्ण एवं श्रेष्ठ हो।
हे गार्हपत्य अग्ने ! तुम यजमान का मंगल करने आने और समस्त स्थानों में बसे हो। शत्रु द्वारा प्रेरित वज्र के समान रूप शस्त्र से तुम मेरी रक्षा करो। बन्धन कारण रूप पाश से बचाओ। विधि से प्रथक यज्ञ से मैं दूर रहूँ। कुत्सित भोजन न करूँ । विषयुक्त अन्न और जल से मेरी रक्षा करो। घर में रखे हुए अन्नादि खाद्य पदार्थ भी विष से बचे रहें। संवेश पति अग्नि के लिए आहुति स्वाहुत हो। विख्यात कीर्ति देने वाली वाग्देवी सरस्वती के लिए यह आहुति स्वाहुत हो। इसके फल-स्वरूप हम भी यशस्वी बनें।
हे कुश मुष्टि निर्मित पदार्थ! तुम वेद रूप हो। तुम सबके ज्ञाता हो। तुम जिस कारण वश सम्पूर्ण यज्ञ कर्मों के ज्ञाता हो और जिस कारण से तुम उसे देवताओं को बताते हो, उसी कारण से मुझे भी कल्याणकारी कार्य को बतलाओ। हे यज्ञ ज्ञाता देवताओं! तुम हमारे यज्ञ के वृतांत जानकर इस यज्ञ में आ जाओ। हे परमपिता. परमेश्वर! मैं इस यज्ञ को आपको सौंपता हूँ। तुम वायु देवता में इसकी स्थापना करो।
हे इन्द्र! तुम सर्वशक्तिमान हो। हवि वाले घी से कुशाओं को लिप्त करो। आदित्यगण, वसुगण, मरुद्गण और विश्वदेवो युक्त लिप्त करो। आदित्य रूप दीप्ति को वह बर्हि प्राप्त हो।
हे प्रणीता पात्र ! तुम्हारा कौन त्याग कर सकता है ? वह तुम्हें किस कारण से छोड़ता है। वह तुम्हें प्रजापति के संतोष के लिए तुम्हारा त्याग करता है। मैं तुम्हें यजमान के पुत्र-पौत्र आदि के पालन हेतु त्यागता हूँ। हे कणों! तुम राक्षसों के भाग रूप हो, इससे अपनी इच्छानुसार यात्रा करो।
हम आज ब्रह्म तेज से परिपूर्ण हों, दुग्धादि से सुसंगत हों। अनुष्ठान में सामर्थवान देह के अवयवों से परिपूर्ण हों, शांत कार्य से श्रद्धा से परिपूर्ण हृदय वाले हों। त्वष्टा देवता हमारे लिए धन ग्रहण कराएँ और मेरे शरीर में यदि कोई कमी हो तो उसे पूर्ण करें।
विष्णु जगती छन्द रूपी अपने चरणों से स्वर्ग पर विशेष रूप से सवार हैं। जो शत्रु हमसे द्वेष रखता है और हम जिससे शत्रुता रखते हैं, वे दोनों प्रकार के द्वेषी भाग से पृथक कर निकाल दिए गए। सर्वव्यापी ईश्वर ने अपनी त्रिष्टुप छन्द रूपी चरण से अन्तरिक्ष पर आक्रमण किया। जो शत्रु हमसे द्वेष रखते हैं वे और हम जिनसे वैर रखते हैं, वे दोनों प्रकार के शत्रु भाग से प्रथक कर निकाले गए, उन सर्वव्यापी भगवान से गायत्री छन्दरूपी चरण से धरा पर आक्रमण किया। जो द्वेषी हमसे शत्रुता करते हैं और हम जिससे शत्रुता करते हैं, वे दोनों प्रकार के द्वेषी भाग रहित धरा से निकाले गए। जो यह अन्न भाग देखा है, इस अन्न से वर्ग को हताश करते हैं। इस निकट दिखाई देने वाली यज्ञ भूमि को मान या सम्मान के निर्मित वर्ग को हताश किया। हम इस यज्ञ के फलस्वरूप पूर्व दिशा में उदित सूर्य के दर्शन करते हैं। आह्वानीय रूप प्रकाश से हम परिपूर्ण हुए हैं।
हे सूर्य! तुम स्वयं धरा हो। सबसे उत्तम, किरणों वाले और हिरण्यगर्भ हो। तुम जिस कारण से तेज को प्रदान करते हो, मेरे लिए भी उसी तेज को प्रदान करो। मैं सूर्य देव को यह आहुति प्रदान करता हूँ। है गृहपति अग्नि ! मैं तुम्हें गृह स्वामिनी के रूप में स्थापित करता हूँ। मैं एक उत्तम गृहपति बनूँ। हे अग्नि ! मुझ गृहपति द्वारा तुम भी श्रेष्ठ गृहपति बन जाओ। हम दोनों के परस्पर संयोग से स्त्री-पुरुष द्वारा किए गए कर्म सौ वर्ष तक होते रहें। मैं सूर्य देव को नमस्कार करता हूँ।
हे अग्ने ! तुम सभी व्रतों के स्वामी हो। यह जो यज्ञानुष्ठान किया है, उसे तुम्हारी कृपा दृष्टि से ही सम्पन्न करने में समर्थवान हुआ हूँ। मेरे उस कार्य को तुमने ही सिद्ध किया है। मैं जैसा मनुष्य पूर्व में था, वैसा ही मनुष्य अब भी हूँ।
पितर सम्बन्धी हव्य को कव्य (कर्ज) कहते हैं। उस कव्य को सहन करने वाले अग्नि के समक्ष पितरों को अर्पित करते हैं। यह आहुति स्वीकार हो। पितरों को मोक्ष प्राप्ति के लिए और सोम देवता के लिए यह अग्नि में आहुति स्वीकार हो। इस यज्ञ वेदी में जो असुर और राक्षस बैठे हों उन्हें वेदी से बाहर निकाल दिया जाए।
पितरों के अन्न का भक्षण करने की कामना से अपने रूपों को पितरों के रूप के समान बनाकर असुर पितृयज्ञ की जगह में विचरण करते हैं तथा जो स्थूल शरीर वाले राक्षस सूक्ष्म शरीर धारण कर अपना असुरतत्व ढकना चाहते हैं, उन असुरों को उस स्थान से अग्नि दूर कर दे।
हे पितरों तुम इन कुशाओं पर बैठकर प्रसन्न होओ। जैसे वृषभ अपनी इच्छा के अनुसार भोजन प्राप्त करके तृप्त हो जाता है, वैसे ही हवि रूप में अपने-अपने भागों को प्राप्त करते हुए तुम सब भी संतुष्ट हो जाओ। जिन पितरों से यह भाग स्वीकार करने की प्रार्थना है वे पित्रगण बड़ी प्रसन्नता के साथ अपने भाग को ग्रहण कर संतुष्ट हों।
हे पितरो ! तुम्हारे सम्बन्धित रूप रस बसंत ऋतु को नमस्कार है। हे पितरों! तुमसे सम्बन्धित ग्रीष्म ऋतु को नमस्कार है। हे पितरों! तुमसे सम्बन्धित प्राण-धारियों के प्राण रूप वर्षा ऋतु को भी नमस्कार है। हे पितरों! तुमसे सम्बन्धित स्वधा रूप बसंत ऋतु को नमस्कार है। हे पितरों! तुमसे सम्बन्धित, प्राणी मात्र को कठिन हेमन्त ऋतु
को नमस्कार है। हे पितरों! तुमसे सम्बन्धित, प्राणी मात्र को कठिन हेमन्त ऋतु को नमस्कार है। हे पितरों! तुमसे सम्बन्धित आक्रोश रूप शिशिर ऋतु को नमस्कार है। हे छः ऋतु के रूप समान वाले पितरों तुम्हें नमस्कार है। तुम हमें पत्नी पुत्रादि से परिपूर्ण घर दो। हम तुम्हारे लिए यह देय वस्तु देते हैं। हे पितरों! यह सूत्र रूप परिधेय तुम्हारे लिए वस्त्र के रूप समान हो जाएँ।
हे पितरों! जैसे इस ऋतु में देवता या पितर मनुष्यों को अपने मनवांछित फल वाले हों, वैसा ही करो। अश्विनी कुमारों के समान सुन्दर और स्वस्थ पुत्र प्राप्त कराओ।
हे जल! तुम सभी प्रकार के स्वादिष्ट सार रूप, फूलों के सार रूप, व्याधि नाशक, बन्धनों से दूर करने और दूध को धारण करने वाले हो। तुम पितरों के लिए हविरूप हो अतः मेरे पितरों को संतुष्ट करो।
यजुर्वेद (3) :: ऋषि :- अंगिरस, सुश्रुत, भरद्वाज, प्रजापति, सर्पराज़ी, कडू, गौतम, विरूप, देवात, भरतों, मावदेव, अवत्सार, याज्ञवल्लक्य, मधुच्छंदा, सुबन्धु, श्रुतबन्धु, विप्रबन्धु, मेधातिथि, सत्यद्युति वारुणि, विश्वामित्र, नारायण; देवता :- अग्नि, सूर्य, इन्द्राग्नि, आपः, विश्वेदेवा, बृहस्पति ब्रह्मणस्पति, आदित्य, इन्द्र, सविता, प्रजापति, वास्तुरग्नि, वास्तुपतिरग्नि, वास्तुपति, मरूत, यज्ञ, मन, रुद्र; छन्द :- गायत्री, बृहति, पंक्ति, त्रिदुष्प, जगति, उष्णिक, अनुस्टप।
हे ऋत्विजो! विधि के द्वारा अग्नि की सेवा करो। इन आतिथ्य कार्य वाले अग्नि को घी द्वारा प्रज्वलित करो और अनेक तरह की हवन सामग्री को यज्ञ में डालते हुए उन्हें प्रकाशमय बनाओ। हे ऋषियों! भली प्रकार से प्रज्वलित होने के लिए अग्नि को शुद्ध और स्वच्छ घृत प्रदान करो। हे अग्नि ! तुम्हें समिधाओं और घृत की आहुतियों के द्वारा प्रबुद्ध करते हैं। तुम सदा जवान रहने वाले हो। अतः वृद्धि को प्राप्त होते हुए प्रदीप्ति धारण करो।
हे अग्नि ! हवि युक्त (हवन सामग्री) एवं घी में लिप्त यह समिधा तुम्हें प्राप्त हो। तुम तेजस्वी को मेरी ये समिधाएँ स्नेहपूर्वक सेवनीय हो।
हे अग्ने ! तुम भूलोक, अंतरिक्ष लोक और स्वर्गलोक में सब जगह स्थापित हो। हे पृथ्वी ! तुम देवताओं के यज्ञ योग्य हो। तुम्हारी पीठ पर श्रेष्ठतम अन्न की सिद्धि के लिए अन्न भक्षक गार्हपत्यादि अग्नि को विद्यमान करता हूँ। फिर जैसे स्वर्गलोक नक्षत्र आदि से पूर्ण है, वैसे ही मैं भी सभी धनों से पूर्ण हो जाऊँ। अनेकों को शरण देने वाली धरा के समान रूप शरणदाता बनूँ। यह अग्नि समस्त वस्तुओं को पवित्र करने वाली होने से सर्वश्रेष्ठ हैं।
यह अग्नि दृश्यमान रूप है। यजमान ने इन्हें यज्ञ को पूर्ण करने के लिए घर में गमनशील अद्भुत ज्वाला रूप बनाया और सभी प्रकार से आह्वान की हुई गृहपत्नी (दक्षिण अग्नि) के स्थानों में पाद विक्षेप किया तथा पूर्ण दिशा में पृथ्वी को प्राप्त किया। इस अग्नि का तेज प्राणों को पार करता हुआ शरीर के मध्य में गमन करता है। यह अग्नि ही शरीर में जीवन का रूप है। इस प्रकार वायु और सूर्य संसार पर अनुग्रह करने वाले अग्नि देवता यज्ञ अनुष्ठान के लिए प्रकाशित होते हैं।
जो वाणी तीस मुहूर्त रूप जगहों में सुसज्जित होती है, वही पूजनीय वाणी अग्नि के लिए उच्चारण की जाती है। वह नित्य प्रति की वंदना रूप वाली वाणी यज्ञादि श्रेष्ठतम कार्यों में अग्नि की वन्दना करती है, किसी अतिरिक्त की वंदना नहीं करती।
यह अग्नि ही दृश्यमान प्रकाश स्वरूप ब्रह्म ज्योति है और यह दृश्यमान ज्योति ही अग्नि है। इन ज्योति स्वरूप अग्नि के लिए हवि ग्रहण की गई है। यह सूर्य की ज्योति है और यह ज्योति ही सूर्य है। उन सूर्य के लिए हवि प्रदान करता हूँ। जो अग्नि ब्रह्मतेज से सम्पन्न है, उनकी ज्योति ही ब्रह्मतेज वाली है। उन अग्नि के लिए हवि देता हूँ। जो सूर्य है, वही ब्रह्मतेज है और जो ज्योति है वह भी ब्रह्मतेज है, उन सूर्य के लिए हवि देता हूँ। ज्योति ही सूर्य है, जो सूर्य है वही ब्रह्म ज्योति है। उसके लिए हवि प्रदान करता हूँ।
सर्वप्रेरक सूर्य ईश्वर के संग समान रूप स्नेह वाले जिस रात देव के देवता इन्द्र हैं, वह रात्रि देव और हम पर दया करने वाले अग्नि भी इन्हें जानें। यह आहुति इन अग्नि के लिए ही प्रदान करता हूँ। सर्वप्रेरक सविता देव के संग समान स्नेह वाली जिस उषा के देवता इन्द्र हैं, वह उषा और समान स्नेह वाले सूर्य इस आहुति को प्राप्त करें।
यज्ञ स्थान की ओर जाते हुए हम दूर या पास में अग्नि के श्लोक उच्चारण करते हुए अभिष्ट फलदाता के श्लोकों को सुनते हैं। यह अग्नि आकाश में सबसे ऊँचे स्थान पर मुख्य है। जैसे सिर सबसे ऊपर रहता है, वैसे ही यह अपने तेज से आकाश के सर्वोच्च स्थान सूर्यमण्डल के ऊपर रहते हैं या जिस प्रकार वृषभ का कंधा ऊँचा होता है वैसे ही अग्नि का स्थान ऊँचा है। इस प्रकार संसार के महान कारण यही हैं। पृथ्वी के पालक और जलों के सार भाग को पुष्ट करने वाले हैं।
हे इन्द्राग्ने ! मैं तुम दोनों को आहूत करने की इच्छा करता हूँ। तुम दोनों को हविरूप अन्न से हर्षित करने का अभिलाषी हूँ। क्योंकि तुम दोनों ही अन्न, धन और जल के देने वाले हो। मैं अन्न और जल की इच्छा से तुम्हारा आह्वान करता हूँ।
हे अग्नि ! विशेष ऋतु में प्राप्त यह ग्रहिपत्य अग्नि तुम्हारा जन्म स्थान है। सवेरे सायं काल तुम आह्वानीय स्थान में उत्पन्न होते हो। ऐसे तुम यज्ञादि कार्यों में प्रज्जवलित होते हो। हे अग्ने ! अपने इस गार्हपत्य को जानते हुए कार्य की सिद्धि दक्षिणी वेदी में प्रतिष्ठित होओ और हमारे यज्ञ में धन की भली-भाँति वृद्धि करो।
यह अग्नि ! देवताओं के आह्वान करने वाले और पवित्र यज्ञ में स्थित होता है। यह सोम यज्ञ आदि में सन्तजनों द्वारा उच्चारित किए हुए श्लोक कर्मवानों द्वारा स्थापित किए जाते हैं। यज्ञ कर्म के ज्ञाता भृगुओं ने विविध कार्यों से अग्नि को मनुष्य के लिए निर्माण कराया है। संस्कारों के माध्यम से शुद्ध हुए और सब प्रकार योग्य होकर सब विद्याओं को प्राप्त कराने वाले संतजन ने इस अग्नि का आह्वान करके गाय के द्वारा अनेक कार्यों में उपयोगी दूध, दही आज्य-रूप हवन सामग्री के दूध को निकाला है।
हे अग्ने ! तुम स्वभाव से ही यज्ञकर्त्ताओं के शरीर की रक्षा करने वाले हो। जठराग्नि रूप से शरीर के पालन करने वाले हो। अतः मेरे शरीर की सुरक्षा करो। हे अग्ने ! तुम आयु प्रदान करने वाले हो, अतः मेरी असमय मृत्यु को दूर कर पूर्ण आयु प्रदान करो। हे अग्नि ! तुम ब्रह्मवर्चस के देने वाले हो। अतः मुझे भी तेजस्वी करो। यदि मेरे शरीर में कोई न्यूनता (कमी) हो तो उसे पूरा करो।
हे अग्नि ! हम तुम्हारी कृपा दृष्टि से तेजस्वी, अन्न सम्पन्न और बलदायक हुए हैं। हम यजमान किसी के भी द्वारा हिंसित न हों। हम इसी प्रकार के गुणों से परिपूर्ण होकर तुम्हें सौ वर्ष तक बराबर प्रज्वलित करते रहें।
हे अग्नेि ! रात्रि के समय तुम सूर्य के तेज से सुसंगत हुई हो। तुम मुनियों के श्लोकों से उच्चारित हुई हो। तुम्हारी कृपा दृष्टि से मैं भी अकाल मृत्यु के दोष से बचकर पूर्ण आयु से ब्रह्मतेज से, पुत्र पौत्र तथा धन से सम्पन्न हो जाऊँ। हे गौओं ! तुम क्षीरादि (दुग्ध) को उत्पन्न करने से अन्न रूप हो। अतः मैं भी तुम्हारे दूध, घी आदि का प्रयोग करूँ। तुम पूजा करने योग्य हो, अतः मैं भी तुम्हारे जैसी महानता को प्राप्त करूँ। तुम बल रूप हो, तुम्हारे आशीर्वाद से मैं भी बलवान हो जाऊँ। तुम धन को बढ़ाने वाली हो। अतः मैं भी तुम्हारी कृपा से धन प्राप्त कर सकूँ। हे धनवती गौओं! इस यज्ञ स्थान में दूध निकालने के बाद गोष्ठ (गौशाला) में और यजमान के घर में सदा उत्तम भाव से विराजमान रहो। तुम इस गृह से अलग न होओ।
हे गौ! तुम अद्भुत रूप वाली, दूध घी देने के लिए यज्ञ कर्मों से सुसंगत होती है। तुम अपने क्षीर आदि के द्वारा मुझमें प्रवेश हो जाओ। हे अग्नि ! तुम रात्रि में भी क्रमशः वास करने वाली हो। हम यजमान नित्यप्रति श्रद्धा से परिपूर्ण हृदय से तुम्हें नमस्कार करते हुए हवि प्रदान करते हैं और तुम्हारी ओर प्रस्थान करते हैं। अग्नि ज्योतिर्मान है। हम उन यज्ञों के सुरक्षक, सत्यनिष्ठ, प्रवृद्ध अग्नि के निकट सम्मिलित होते हैं।
हे अग्नि ! उपर्युक्त गुण वाले तुम हमें सुखपूर्वक ग्रहण करो। पुत्र ठीक जैसे पिता के सम्मुख सुख से पहुँच जाता है जैसे ही हमें तुम ग्रहण करते हुए हमारे मंगल के लिए यज्ञ कार्य में संलग्न रहो।
हे अग्नेि! तुम निर्मल स्वभाव वाली हो। तुम वस्तुओं के लिए आह्वान रूप गमन करती हो। तुम धन देने के कारण यशस्वी हो। तुम हमारे पास रहने वाले रक्षक, पुत्र आदि की हितैषी हो। तुम हमारे यज्ञ अनुष्ठान में जाओ और हमें अत्यन्त तेजस्वी धन प्रदान करो। हे अग्नि ! तुम अत्यन्त प्रकाश वाली, सबको प्रकाश देने वाली, गुणी मित्रों के धन और कल्याणकारी रूप हो। हम तुमसे अपने मित्रों का उपकार करने की प्रार्थना करते हैं। तुम हम सभी उपासकों को जानो और हमारी प्रार्थना को सुनो। सभी पापों और शत्रुओं से हमारी रक्षा करो। हे गौ ! तुम पृथ्वी के समान पालन करने वाली हो। तुम यहाँ पर आने की कृपा करो। तुम अदिति माता के समान देवताओं को घी आदि के द्वारा पालन करने वाली हो। तुम इस यज्ञ स्थान में पधारो। हे गौओं! तुम सबको मनवांछित फल प्रदान करने वाली हो, इसलिए इस यज्ञ स्थान में पधारो। आपने हमारे लिए जो फल धारण किया है वह फल मुझ अनुष्ठान करने वाले को भी प्राप्त हो। हे बृह्मणस्पते ! मुझे सोमभिषव करने वाले शब्द से सम्पन्न करो। जैसे उशिज पुत्र कक्षीवान को तुमने सोमयाग से स्तुति रूप वाणि से सम्पन्न किया था, उसी प्रकार मुझे भी सम्पन्न करो।
जो ब्रह्मण स्पति! सर्व धनों के मालिक हैं जो संसार के सभी भय रोगादि के नाशक हैं और जो सभी धन आदि के ज्ञानी और पुष्टि की वृद्धि करने वाले हैं, जो क्षण मात्र में सभी कुछ करने में सक्षम हैं, वे ब्रह्मणस्पति हम सभी को उपर्युक्त सभी कल्याणों से परिपूर्ण करें।
हे ब्रह्मणस्पते! जो यज्ञ विमुख मनुष्यों, देवताओं या पितरों के लिए कभी कोई कर्म नहीं करते, ऐसे मनुष्य के हिंसामय विरोध हमें कष्टमय न करें, तुम हमारी सभी. तरह से सुरक्षा करो।
मित्र, अर्यमा और वरुण ये तीनों देव अपने से सम्बन्धित कांतिमय स्वर्ण आदि धनों से परिपूर्ण महिमा के द्वारा हमारी सुरक्षा करें। उनकी महिमा को तिरस्कृत करने की शक्ति किसी में नहीं है। हम तीनों द्वारा रक्षित देवों की आराधना करते हैं। उन ईश्वर देव को घर, मार्ग, घोर वन और संग्राम भूमि में भी कोई रोक नहीं सकता। यजमान का कोई भी शत्रु उसे हिंसित करने में सक्षम नहीं होता।
मित्र अर्यमा और वरुण देव माता अदिति के पुत्र हैं। वे इस मृत्युलोक में यजमान को अपना अखंड तेज और लम्बी आयु प्रदान करते हैं। हे इन्द्र ! तुम हिंसक नहीं हो। हविदाता (आहुति) देने वाले यजमान की हवि! (आहुति) को शीघ्र ग्रहण करते हो। हे मधवन! तुम बहुत ही तेजस्वी हो। यजमान तुम्हारे दान को शीघ्र प्राप्त करता है। उन सर्वप्रेरक सविता देव का हम ध्यान करते हैं। वे सबके द्वारा पूजनीय सभी पापों का नाश करने वाले, सत्य, ज्ञान, आनन्द आदि तेज सम्पन्न हैं। वे हमारी बुद्धि को श्रेष्ठ कार्यों में लगाएँ। हे अग्नि ! तुम्हारा स्वच्छगति वाला रथ सभी दिशाओं में हमारे लिए स्थित हो। उसी रथ के द्वारा तुम यजमान की रक्षा करती रहो। हे अग्नेि ! मैं तुम्हारी कृपा से श्रेष्ठ अच्छे कार्यों से अच्छी भृत्यादि (पत्नी) पाकर प्रजापालक कहलाऊँ। जिस कारण सभी गुणों से सम्पन्न पुत्र प्राप्त करूँ। उसी कारण से ही श्रेष्ठ पिता भी कहलाऊँ और सभी प्रकार की सम्पत्ति पाकर ऐश्वर्यवान बनूँ। हे गार्हपत्याग्नि ! मेरे पुत्रों आदि की तुम रक्षा करना। तुम यज्ञ आदि कार्यों के द्वारा बारम्बार पूजा करने के योग्य हो। तुम मेरे पशुओं की रक्षा करो। हे दक्षिणाग्नि ! तुम निरन्तर गतिशील हो। मेरे पिता की रक्षा करो। हे अग्नेि ! तुम भली-भाँति से प्रकाशमान हो। हम तुम्हारी सेवा के लिए यहाँ आए हैं। तुम सब कार्यों की ज्ञाता हो।
तुम हमारे घर के विषय में सब कुछ जानने वाली हो। तुम हमें अपरिमित धन ग्रहण कराती हो। हे समृद्धि ! सम्पन्न अग्निदेव ! तुम अन्न, धन और शक्तियुक्त यहाँ प्रस्थान करो और हममें इन सभी की स्थापना करो।
यह दक्षिणाग्नि! पशुओं की भलाई करने वाले और पुष्टि की वृद्धि कराने वाले हैं। मैं उनकी वन्दना करता हूँ। हे दक्षिणाग्नि ! तुम हमें धन और शक्ति को सभी ओर से प्रदान करो।
हे घर के अधिष्ठाता देवताओं! तुम भयग्रस्त न बनो। कम्पित भी मत होओ। जिस कारण शक्ति को धारण करने वाले और क्षय प्रथक घर के स्वामी तुम्हारे निकट आए हैं, उस कारण तुम भी शक्ति से परिपूर्ण बनो। मैं श्रेष्ठतम मति, उत्कृष्ट हृदय से और हर्षित होता हुआ घरों में प्रवेश करूँ।
परदेश जाता हुआ यजमान जिन घरों की कुशल मंगल की इच्छा करता है और जिन घरों में अत्यन्त स्नेह है, हम उन घरों का आह्वान करते हैं। वे गृह के अधिष्ठातृ देव हमारे हित को ज्ञान में रखते हुए प्रस्थान करें और हमको किसी प्रकार अपकृत न मानें।
हे गायों! हमारे गोष्ठरूप (गौशाला) में सुखपूर्वक निवास करो। हे बकरियों और भेड़ों ! तुम भी हमारी आज्ञा से सुखपूर्वक यहाँ रहो। जिससे हमारे घर में अन्न और अनेक गुणों वाला रस हमें प्राप्त होता रहे, ऐसी मेरी आपसे प्रार्थना है। हे ग्रहों! मैं अपने धन की रक्षा के लिए, कल्याण के लिए और अनर्थ कार्य करने की शान्ति के लिए तुम्हारे पास आया हूँ। सब सुखों की कामना करने वाले मुझ यजमान का भी कल्याण करो। मैं परलोक में भी सुख की प्राप्ति करूँ। मैं दोनों लोकों में सुख को प्राप्त करूँ। हे मरुद गणों! तुम शत्रु के द्वारा प्रेरित विरोध का नाश करने वाले, तथा दही व सत्तू से प्रेम करने वाले हो। हे पापों का नाश करने वाले ! हवन सामग्री का भोग करने वाले मरुतों! हम तुम्हारा आह्वान करते हैं। गाँव में रहकर हमने जो पाप किया, वन में रहकर पशुओं को सताया एवं सभा में असत्य बोलकर तथा अपनी इन्द्रियों का गलत उपयोग कर जो पाप किया है उन सब पापों को नष्ट करने हेतु यह आहुति देता हूँ। पापनाशक देवता को यह आहुति स्वीकार हो।
हे इन्द्र देव! तुम शक्तिसम्पन्न हो। तुम मरुदगणों से युक्त हम सखाओं को युद्धों में समाप्त मत करो। तुम हमारी भली-भाँति रक्षा करो। तुम्हारा यज्ञीय भाग अलग स्थित है। तुम वर्षा द्वारा समस्त संसार को सिंचित करने वाले हो। समस्त यजमान तुम्हारा अर्चन करते हैं। हमारी वाणी तुम्हारे सखा मरुद्गणों को नमस्कार करती है।
ऋषियों ने सुख समान रूप वंदना के संग अनुष्ठान को पूरा किया है। हे ऋत्विजो! तुमने जो यज्ञ देवताओं के लिए किया है, अब उसके पूर्ण होने पर अपने गृह को प्रस्थान करो।
हे मन्दगति जलाशय अवभूथ नामक यज्ञ ! तुम अत्यन्त भ्रमणशील होते हुए भी इस जगह पर मंद चाल वाले बनो। मैंने अपनी शिक्षा में जो देवताओं के प्रति पाप किया है, उसे इस जलाशय में बहा दिया था या ऋत्विजों द्वारा यज्ञ देखने को पधारें, मनुष्यों की जो अवज्ञा होने से जो पाप आदि लगा है, उस पाप को भी इस जलाशय में बहा दिया है। हे यज्ञ ! वह पाप आपको न लगे और तुम विरुद्ध फल वाली हिंसा से हमें बचाओ।
हे काष्ठ ! आदि द्वारा निर्मित पात्र ! तुम पूर्ण स्थली के निकट से अन्न को प्राप्त करो और पूर्ण होकर इन्द्रदेव की ओर प्रस्थान करो। फिर फल से पूर्ण होकर हमारे निकट लौट आओ। हे सैकड़ों कर्म वाले इन्द्रदेव! हमारे और तुम्हारे बीच परस्पर क्रय-विक्रय जैसा आचरण सम्पन्न हो। अर्थात् मुझे हमेशा हविर्दान का फल प्राप्त होता रहे।
हे यजमान मुझे इन्द्र के लिए हवि (सामग्री) दो, फिर मैं तुझे यजमान को धन आदि दूँगा। तुम मुझे इन्द्र के निमित्त प्रथम हव्य सामग्री पूर्ण करो। फिर मैं तुम्हें उसका फल दूँगा। हे इन्द्र! मूल्य से क्रय योग मुझे दो। हम तुम्हें उसका मूल्य अर्पण कर रहे हैं, यह आहुति स्वीकार हो। इसे पितरों के हेतु कार्य में पितरों ने हवन सामग्री के रूप में अपने अन्न का भोग कर लिया है। उससे प्रसन्न होकर हमारी भक्ति से तृप्त होकर सिर हिलाते हुए उन महान पितरों ने हमारी प्रशंसा की। उसी प्रकार हे इन्द्र ! तुम भी इन पितरों से मिलने के उद्देश्य से बड़े हर्ष के साथ अपने रथ को यहाँ लाओ और पितरों के साथ तृप्त हो जाओ।
हे इन्द्र देव! तुम अत्यन्त समृद्धिशाली हो। तुम उत्तम दर्शन के योग्य या सभी को वन्दनापूर्वक देखने वाले हो। हम तुम्हारी वन्दना करते हैं। तुम हमारे द्वारा श्लोकों से प्रसन्न होकर अवश्य ही प्रस्थान करोगे। हे इन्द्रदेव! तुम हमारे अभिष्टों के पूरक हो, अतः अपने रथ में हर्यश्व योजित कर प्रस्थान करो।
हम मनुष्यों सम्बन्धी श्लोकों से और पितरों के इच्छित श्लोकों से हृदय के अधिष्ठाता का आह्वान करते हैं। यज्ञ अनुष्ठान हेतु, कार्य में उमंग हेतु लम्बी आयु के लिए तथा चिरकाल तक सूर्य दर्शन करते रहने के लिए हमारा हृदय हमें प्राप्त हो।
हे पितरों! तुम्हारी आज्ञा से दिव्य पुरुष हमारे मन और कर्म को श्रेष्ठ कर दें। इस प्रकार के कार्य करते हुए हम तुम्हारी कृपा से जीवित रहें और पुत्र व पौत्रों का सुख प्राप्त हो। हे सोम! हम यजमान तुम्हारे व्रत आदि कार्य को करते हुए और तुम्हारे शरीर के अंगों (मन) को धारण करते हुए और तुम्हारी कृपा से पुत्र-पौत्र वाले होकर सदा तुम्हारी कृपा के पात्र बनें रहें। हे रुद्रा भगिनि अम्बिका! के सहित हमारे द्वारा प्रदत्त पुरोडाश ग्रहण करने योग्य हैं, अतः तुम उनका सेवन करो। पापियों को संतप्त करने वाले, तीन नेत्र वाले अथवा जिनके नेत्र से तीनों लोक प्रकाशमान होते हैं। हे शत्रुओं को जीतने वाले प्राणियों! ये आत्मा के रूप में विराजमान और रुद्र को अन्य देवताओं ये अलग अथवा श्रेष्ठ समझकर उन्हें यज्ञ भाग प्रदान करते हैं। वे हमें समान मनुष्यों से अच्छे बनाएँ और हमें श्रेष्ठ कर्मों में लगाएँ। इसलिए हम उनको जपते हैं।
हे रुद्रदेव! तुम सभी व्याधियों को औषधि के समान रूप पतन करते हो। अतः हमारे गौओं, घोड़ों, पुत्र-पौत्र आदि के लिए सर्व रोग नाशक औषधि प्रदान करो। हमारे पशुओं के रोग-नाश के लिए भी श्रेष्ठ औषधि को अभिव्यक्त करो।
दिव्य महक से परिपूर्ण मनुष्यों को दोनों लोक का फल देने वाले, धन-धान्य से पुष्टि करने वाले, जिन त्रिनेत्र रुद्र देव की हम अर्चना करते हैं, वे रुद्रदेव हमें अकाल मृत्यु आदि से सुरक्षा करें। ठीक जैसे पका हुआ फल टूटकर पृथ्वी पर गिर जाता है वैसे ही इन रुद्रदेव की कृपा दृष्टि से हम जन्म-मृत्यु के पाश से स्वतंत्र हों और स्वर्ग रूप सुख से पृथक न हों। मुझे दोनों लोकों का फल प्राप्त हो।
हे रुद्रदेव ! तुम्हारा यह हविशेष नामक भोजन है। इसके साथ तुम हमारे शत्रुओं का दमन करने पर प्रत्यंचा उतारे हुए धनुष को वस्त्र में ढककर मूजवान नामक पर्वत के परवर्ति भाग पर जाओ। हे रुद्र! जैसे जमदग्नि और कश्यप ऋषियों के बाल, युवा और वृद्धावस्था है और देवताओं की अवस्था के जैसे चरित्र हैं, वे तीनों अवस्थाएँ मुझ यजमान को प्राप्त हों।
हे लोहक्षुरा (उस्तरे )! तुम अपने नाम से ही कल्याण करने वाले हो और वज्र तुम्हारा रक्षक है। मैं तुम्हें नमस्कार करता हूँ। तुम मुझे हिंसित (घायल) मत करना। हे यजमान इस क्रिया के कारण आयु के लिए अन्नादि के भक्षणार्थ बहु संतान और अपरिमित धन की पुष्टि के लिए तथा उत्तम शक्ति के लिए मैं तुम्हें मूंडता हूँ।
अध्याय (4) :: ऋषि :- प्रजापति, आत्रेय, आंगिरस, वत्स, गौतम; देवता :- अम्बोषध्वौ, आपःमेद्यः, परमात्मा, यज्ञ, अग्न्य ब्बृहस्पतयः, ईश्वर, विद्वान, अग्नि, वाग्विद्युत, सविता, वरुणः, सूर्यविद्वांसौ, यजमानः सूर्य; छन्द :- जगती, त्रिष्टुप, पंक्ति, अनुष्टुप, उष्णिक्, बृहति, शक्करी, गायत्री।
हम इस पृथ्वी पर देवताओं के यज्ञ वाले स्थान पर आए हैं। जिस देव यज्ञ स्थान में विश्व के सभी देवता प्रसन्नतापूर्वक बैठे हैं। वहाँ ऋक, साम और यजुर्वेद के मंत्रों से सोम करते हुए हम धन की वृद्धि और अन्न आदि के द्वारा सम्पन्न हों। मेरे लिए यह दिव्य जल अवश्य ही कल्याण करने वाला हो। हे कुश तरुण देव ! इस छोटे से यजमान की भली प्रकार रक्षा करो। हे क्षुर ! इस यजमान को घायल मत करना। माता के समान पालन करने वाले जल हमें पवित्र करें। क्षरित जलों से हम पवित्र हों। यह जल सभी पापों को अवश्य ही दूर करते हैं। मैं स्नान और आचमन द्वारा बाहर-भीतर से पवित्र होकर इस जल द्वारा उत्थान करता हूँ। हे क्षोभ वस्तु! तुम शिक्षा देने वाले और तप वाले दोनों प्रकार के यज्ञों के अवयव रूप हो। तुम सुख से स्पर्श होने योग्य और कल्याणकारी हो। मैं मंगलमयी क्रांति को प्रणाम करता हुआ तुम्हें धारण करता हूँ।
हे नवनीत (मक्खन )! तुम गौ के दूध से बने हो। तुम तीव्र सम्पादन करने वाले हो, अतः मुझे ब्रह्मतेज से सम्पन्न करो। हे अंजन ! तुम वृत्रासुर के नेत्र की कनीनिका हो। तुम नेत्रों के उत्कर्ष में साधन से रूप समान हो। अतः मेरे नेत्रों की ज्योति की बढ़ोतरी करो।
हे हृदय के अधिष्ठातृ देव ! तुम अछिद्र वायु (हवा) रूप छन्ने के द्वारा और सूर्य की किरणों से मुझ यजमान को पवित्र करो। वाणी के अधिष्ठातृ-देवता, वायु और सूर्य मुझे शुद्ध करें। सविता देव मुझे शुद्ध करें। हे परमात्मदेव ! मैं तुम्हारे द्वारा शुद्ध हुआ हूँ। अब मेरी इच्छाएँ पूरी करो। जिस इच्छा के लिए मैं शुद्ध हुआ हूँ, उसे तुम्हारी कृपा दृष्टि से प्राप्त करूँगा।
हे देवगण! यह यज्ञ शुरू हुआ है, तुम्हारे निकट जो वरणीय यज्ञ फल है उसके युक्त पधारो। हम तुम्हारी भली-भाँति वंदना करते हैं। हे देवगण ! यज्ञ के फलों को लाने के लिए हम तुम्हारा आह्वान करते हैं।
हम अपने हृदय द्वारा यज्ञ कार्य में शामिल हुए हैं और विशाल अन्तरिक्ष से स्वाहा करते हैं, स्वर्गलोक और धरालोक से स्वाहा करते हैं। हमारे द्वारा शुरू किया गया यह अनुष्ठान सम्पूर्णता को प्राप्त हो।
यज्ञ करने के लिए बलवती इच्छा से प्ररेणाप्रद अग्नि के लिए आहुति देता हूँ। मेधा के निमित, मन के प्रवर्तक अग्नि के लिए यह आहुति देता हूँ। यह आहुति वाग्देवी, सरस्वती, पूषा और अग्नि के लिए देता हूँ। हे जल ! तुम उज्जवल, महान और विश्व के सब प्राणियों को आनन्द देने वाले हो। हे स्वर्ग, पृथ्वी और अंतरिक्ष ! तुम्हारे लिए हम यज्ञ करते हैं, बृहस्पति देवता को भी हवि देते हैं। सांसारिक मनुष्यों को कर्मों के अनुसार फल प्राप्त कराने वाले नेता, दान आदि गुणों से सम्पन्न, सर्वप्रेरक, सविता देव की मित्रता के लिए वंदना करो। वे पुष्टि (वृद्धि) के लिए अन्न प्रदान करें। सभी प्राणी उनसे कामना पूर्ति हेतु उनकी वंदना करते हैं। उनके लिए आहुति स्वीकार हो। हे कृष्णाजिन द्वय की कृष्ण शुक्ल रेखा। तुम ऋक साम के मंत्रों के अधिष्ठा देवों की कर्म कुशलता के परिणाम रूप हो। मैं तुम्हारा स्पर्श करता हूँ। तुम इस यज्ञ के सम्पूर्ण होने तक मेरी रक्षा करो। हे कृष्णाजिन तुम शरण देने वाले हो, अतः मुझे शरण प्रदान करो। मैं तुम्हें नमस्कार करता हूँ। तुम मुझे दुःखी मत करना।
हे मेखले! तुम आंगिरस वाली और अन्न रस से युक्त हो। तुम उनके समान रूप मीठा स्पर्श हो। मुझ यजमान में अन्न रस स्थित करो! हे मेखले ! तुम सोमदेव के लिए हे जलो! मेरे द्वारा पान किए जाने पर तुम शीघ्र ही जीवन को प्राप्त हो और हम पीने वालों के पेट को सुख देने वाले हों। यह जल यक्ष्मारहित अन्य रोगों का नाश करने वाले, प्यास को शान्त करने वाले यज्ञ में वृष्टि करने के लिए दिव्य अमृत के समान हो। हे यज्ञ पुरुष ! यह पृथ्वी ही तुम्हारा यज्ञ स्थान है। इस कारण इस मिट्टी के ढेले को ग्रहण करता हूँ। मैं भू प्रत्याग करता हूँ। हे मूत्र रूप जल तुम अपिवत्र रूप हो। यज्ञ करते समय तुम्हें स्वाहा रूप से ग्रहण किया था परन्तु अब तुम विकार रूप वाले हो, अतः हमारे शरीर से निकलकर पृथ्वी में प्रविष्ट करो। हे भृतिके ! तुम पृथ्वी में समाहित हो जाओ। हे अग्नेि ! तुम सावधान हो जाओ। हम सुखपूर्णक विश्राम करें। तुम सब ओर से हमारी रक्षा करो और फिर हमें कार्य में प्रेरित करो। मुझ यजमान का मन-शयन काल में विलीन पुनः मेरे पास आ गया है। मेरी आयु स्वप्न में नष्ट जैसी होकर फिर प्राप्त हो गई है। वे प्राण पुनः प्राप्त हो गए हैं। जीवात्मा, दर्शनशक्ति, सुनने की शक्ति आदि मुझे दोबारा प्राप्त हो गई है। हमारे शरीरों के प्रिय हो, हमारे लिए नए रूप में हो जाओ। हे उष्णीय! तुम इस अत्यन्त व्यापक रूप वाले यज्ञ में मंगल रूप समान वाली हो। अतः मुझ यजमान का समस्त प्रकार से कल्याण करो। हे कृष्ण विषाण! तुम जिस प्रकार इन्द्रदेव के स्थान पर स्थित हो, वैसे ही मेरे लिए बनो। हे कृष्णविषाण ! तुम हमारे राज्य को उत्तम अन्न से सम्पन्न करो। इसलिए मैं पृथ्वी को खोदता हूँ। हे वनस्पति से उत्पन्न दण्ड ! तुम उन्नत बनो और इस यज्ञ की पूर्णता तक मुझे पाप से बचाओ।
हे ऋत्विजो ! दुग्ध का दोहना आदि कार्य करो। यह यज्ञाग्नि तीनों वेदों का रूप है तथा यज्ञ का साधन है। यज्ञ योग्य वनस्पति भी यज्ञ रूप ही है। अनुष्ठान की सिद्धि के लिए, देवताओं के कार्य में संलग्न होने वाली, श्रेष्ठतम मंगल प्रदान करने वाली तेजस्विनी यज्ञ निर्वाहिका मति की हम वंदना करते हैं। ऐसी सर्व प्रशंसनीय मति हमें प्राप्त हो। हृदय से उत्पन्न, हृदय से परिपूर्ण, श्रेष्टतम वचन वाले नेत्रादि इन्द्रिय रूपी प्राण, यज्ञानुष्ठान की बाधाओं को दूर कर हमारा सभी प्रकार से पोषण करें। यह हवि प्राण रूप समान देव के लिए स्वाहुत हो।
पालनकर्त्ता और सब पर उपकार करने वाले हमें दुष्कर्मों से बचाएँ।
हे अग्ने! तुम दिव्य रूप हो। तुम यज्ञ अनुष्ठानों के रक्षक हो। सभी यज्ञों में तुम्हारी वंदना की जाती है। तुम देवों और मनुष्यों को व्रतों का पालन कराते हो। हे सोम ! तुम हमें बारम्बार धन प्रदान करो। धन प्रदान करने वाले सविता देव हमें पहले ही धन दे चुके हैं। अतः तुम भी हमें बारम्बार धन प्रदान करो।
हे अग्नि! तुम उज्जवल रंग वाली हो। यह घी तुम्हारे शरीर के समान रूप है। इस घी में पड़ा हुआ स्वर्ण तुम्हारा तेज है। तुम इस घी रूप समान शरीर को एकाकार को प्राप्त होओ और फिर स्वर्ग की कांति को प्राप्त करो। हे वाणी ! तुम वेग वाली हो। तुम हृदय के द्वारा किए गए यज्ञ कर्म को सिद्ध करने के लिए स्नेह से सम्पन्न हो।
तुम्हारी उस सत्य वाणी के अनुरूप ही हम शरीर को प्राप्त हों। यह घृताहुति स्वीकार हो। हे सुवर्ण! तुम कांति वाले चन्द्रमा के समान अविनाशी और विश्वेदेवो से संबंधित हो।
हे वाणी रूप सोम क्रयणी ! तुम चित्त रूप वाली तथा मन रूप वाली हो। बुद्धि रूप और दक्षिण रूप भी हो। सोम क्रम साधन में क्षत्रिय और यज्ञ की पात्र हो। तुम अदिति के रूप वाली, दो सिर वाली, हमारे यज्ञ में पूर्व और पश्चिम में मुख हो। तुम्हें देवता दक्षिणपाद में बाँधें और यज्ञपति इन्द्र की प्रसन्नता के लिए पूषा देवता तुम्हारी मार्ग में रक्षा करें।
हे गौर्या! सोम लाने के कार्य में संलग्न तुम्हारे माता-पिता आदेश दें। भाई, मित्र, वत्स आदि भी आदेश करें। हे सोम क्रयणी ! तुम इन्द्र देव के लिए सोमदेव को ग्रहण के लिए प्रस्थान करो। सोम प्राप्त करने पर तुम्हें रुद्रदेव हमारी ओर प्रस्थान करवाएँ। तुम सोमयुक्त हमारे यहाँ कुशलता पूर्वक फिर लौट आओ।
हे सोम क्रयणी ! तुम वसुदेव के बल हो। अदिति रूपिणी हो। आदित्यों के रूप समान और चन्द्रमा के रूप समान हो। बृहस्पति तुम्हें सुखी करें। रुद्रदेव और वसुगण भी तुम्हारी रक्षा करें।
अखिण्डता धरा के शिररूप, देवयाग के श्रेष्ठ स्थान में हे घृत! मैं तुम्हें सींचता हूँ। है यज्ञ स्थान! तुम गौ के चरण रूप हो, मैं उस चरण को घृत से परिपूर्ण करने को आहुति प्रदान करता हूँ। हे सोमक्रमणी के चरण चिह्न ! हम तुम्हारे भाई के तुल्य हैं। हे यजमान! इस पद रूप से तुम में धन दृढ़ हो, यह मेरे समद्धि रूप हैं। हम ऋत्विगण समृद्धि से रहित न हों। समृद्धि, पशु-पद रूप समान से इस वंश वधु में दृढ़ हो।
हे सोम क्रमणी! तुम दिव्य यज्ञ में मुख्य दक्षिणा के योग्य, विशाल दर्शन वाली और हमें अपनी प्रकाशित बुद्धि से भली प्रकार देखने वाली हो। मेरी आयु को कम मत करो, मैं तुम्हारे दर्शन के फलस्वरूप उत्तम पुत्र को प्राप्त करने वाला बनूँ।
हे अध्वर्यों! सोम से मेरी इस प्रार्थना को कहो कि हे सोम ! तुम्हारा यह भाग गायत्री से संबंधित है। तुम्हारा क्रय गायत्री छन्द के लिए ही है। हे अध्वर्यो ! सोम से कहो कि तुम्हारा यह भाग त्रिटुष्प छंद वाला है। हे अध्वर्यों! सोम से कहो कि तुम्हारा यह भाग जगती छंद वाला है। हे अध्वर्यो ! तुम सभी छंदों के अधिकारी हो, यह बात सोम से कहो। हे सोम ! तुम क्रय द्वारा प्राप्त होकर हमारे हुए हो। यह शुक्र तुम्हारे लिए गृहणीय है। ये सभी विद्वान तुम्हारे सार और असार अंश को जानते हैं। तुम्हारे सारासार भाग विचार कर संचय किया जाता है।
उन क्षितिज धरा में स्थित, दिव्य, मतिदाता, सत्य, शिक्षा देने वाले, रत्नों के धाम, समस्त प्राणधारियों के प्रिय, क्रान्तदर्शी सवितादेव को भली-भाँति उपस्थित करता हूँ। जिनकी अपरिमित ज्योति क्षितिज में सर्वोच्च प्रतिष्ठित है जिनकी दीप्ती से नक्षत्र भी प्रकाशमय हैं। वे हिरण्यपाणि और स्वर्ग के रचनाकार हैं। मैं उन्हीं की उपासना करता हूँ। हे सोम ! तुम्हारे दर्शन मात्र से प्रजा सुख भोगे, इसलिए मैं तुम्हें बन्धन युक्त करता हूँ। हे सोम ! साँस लेती हुई समस्त प्रजा तुम्हारे मार्ग के अनुसार जीवित रहें और तुम भी श्वासवान प्रजाओं का ध्यान करो।
हे सोम! तुम अमृत रस के समान तेजस्वी और आह्लादकारक हो। मैं तुम्हें अविनाशी, दीप्तीमान और आह्लादक स्वर्ण से खरीदता हूँ। हे सोम-विक्रेता ! तुम्हारे सोम के बदले में जो गायें तुम्हें दी गई थीं, वह गौ लौटाकर दोबारा यजमान के गृह में दृढ़ हो परन्तु स्वर्ग तेरे पास ही रहे। हे सोम-विक्रेता! तुम्हें जो स्वर्ग दिया गया है वह हमारेनिकट आए। तुम्हारी गायें ही कीमत रूप में हों। हे अजे! तुम पुण्य के शरीर हो, अतः बंदना के लायक हो। हे सोम! इस उत्तम विशेषता वाले अजा नामक पशु द्वारा तुम क्रय किए जा रहे हो। तुम्हारी कृपा दृष्टि से मैं पुत्र पशु आदि की हजारों पुष्टियों वाला हो जाऊँ।
हे सोम ! तुम मित्र बनकर हम उत्तम कार्यों के मित्रों का पालन करने वाले बनें। तुम हमारी तरफ आ जाओ। हे सोम ! तुम परम् ऐश्वर्यशाली इंद्र की सोम कामना वाली, मंगलकारी दक्षिण जांघ में स्थित हो जाओ। उपदेश देने वाले, प्रकाशमान, पाप का नाश करने वाले, संसार का सुन्दर हाथों से पालन करने वाले सदा प्रसन्न रहने वाले, कमज़ोर को विजय दिलाने वाले, सोम रक्षक सात देव तुम्हारे इस सोम-क्रय द्वारा प्राप्त पदार्थ के रक्षक हो। तुम्हें शत्रु भी दुःखी न कर सकें।
हे अग्नि! मेरे पापों को सब ओर से दूर कर दो। मैं कभी पाप में संलग्न न हो सकूँ। मुझ यजमान को पुण्य कर्म में ही विद्यमान रखो। मैं सबसे उत्तम लम्बे जीवन वाली आयु से और सुन्दर दान आदि से परिपूर्ण आयु से सोम आदि देवों को देखता और उनका साथ करता हुआ उन्नति करता रहूँ।
हम सुखपूर्वक यात्रा करने योग्य, पाप और बाधाओं के बिना इस मार्ग पर चलते रहें। उस मार्ग पर जाने वाला व्यक्ति चोरी आदि दुष्कर्मों को रोकता हुआ धन को प्राप्त करने में सक्ष्म होता है।
हे कृष्णाजिन ! तुम इस संकट में पृथ्वी की त्वचा के रूप समान हो। हे सोम ! तुम इस जगह में भली-भाँति दृढ़ हो जाओ। श्रेष्ठ वरुणदेव ने स्वर्ग और अन्तरिक्ष को दृढ़ किया और धरा को विस्तरित किया, वह वरुणदेव सारे संसार में स्थित हुए। संसार के निर्माण आदि समस्त कार्य वरुणदेव ने ही किए हैं।
वरुणदेव ने वन में प्राप्त हुए जल को आकाश में विस्तीर्ण किया है। उन्होंने घोड़ों में बल को बढ़ाया, पुरुषों में पराक्रम को बढ़ाया, गायों में दूध की वृद्धि की, हृदय में उत्तम विचारों वाले मन का विस्तार किया। प्रजा में जठराग्नि को स्थित किया, स्वर्ग में सूर्य को और पर्वतों में सोम की स्थापना की।
हे कृष्णाजिन! तुम अपने पेट में सोम को रखते हो। तुम सूर्य की दृष्टि में ऊपर उठो और अग्नि की दृष्टि में भी ऊपर उठो। इन दोनों की ज्योति से अग्नि द्वारा प्रकाशयुक्त होकर सूर्य के अश्वों द्वारा गमन करते हैं।
हे अनड्वालों! तुम शकट-धूलि को धारण करने में सक्षम हो। तुम शकट वहन के दुःख से दुःखी मत होना। तुम अपने सींगों द्वारा बालकों को न मारने वाले और ब्राह्मण को यज्ञ-कार्य में प्रेरित करने वाले हो। तुम इस शकट में जुत कर शुभ मुहूर्त में यजमान के घर में प्रवेश करो। हे सोम ! तुम हमारा कल्याण करने वाले हो। तुम भूमि के स्वामी हो और सब जगहों पर समान वेग से जा सकते हो। चारों ओर घूमने वाले चोर तुम्हें न जान सकें और यज्ञ के विरोधी भी तुम्हें न जान सकें। तुम्हें हिंसक भेड़िया या पाप करने वाले मार्ग में न मिलें। तुम तीव्रगति के साथ यजमान के घर को जाओ। उन घरों में ही तुम्हारा उपयुक्त स्थान है। मित्र और वरुण देवता के तेज से प्रकाशमान, सब प्राणियों को दूर से ही देखने वाले, परबह्म से उत्पन्न, तीनों लोकों के पालक हैं। उनको और सूर्य को नमस्कार करता हूँ। हे ऋषियों! तुम भी सूर्य के लिए यज्ञ करो और उनकी वंदना करो।
हे काष्ठ-दण्ड ! तुम वरुणदेव को स्नेह हेतु इस संकट में व्यवहृत होते हो। हे शम्ये! तुम दोनों वरुणदेव की रोधकारिणी हो। मैं तुम्हें वरुण के स्नेह लिए स्वतंत्र करता हूँ। हे आसन्दी! तुम वरुणदेव के स्नेह के लिए यज्ञ प्राप्ति को जगह रूप तथा सोमदेव की सुरक्षा के लिए आधार रूप हो। हे कृष्णाजिन! तुम वरुण देव के यज्ञ के लिए स्थान रूप हो। मैं वरुण देव! के स्नेह हेतु ही तुम्हें लाया हूँ और आसन्दी पर बिछाता हूँ। हे सोम देव! तुम वरुण देव के स्नेह हेतु लाए गए हो। तुम इस उपवेशन स्थान रूप चौकी पर सुखपूर्णक बैठो।
हे सोम देव! यह मुनिगण तुम्हें प्रातः सवानादि में प्राप्त कर तुम्हारे रस से यज्ञ पुरुष को पूजते हैं, तुम्हारे वे सब स्थान तुम्हारे आश्रित रहें। तुम घर की वृद्धि करने वाले, यज्ञ को सफल करने वाले वीरों का पालन करने वाले हो। तुम हमारे पुत्र-पौत्र आदि से सम्पन्न इस यज्ञ में आगमन करो।
अध्याय (5) :: ऋषि :- गौतम, मेधातिथि, वशिष्ठ, औतथ्यो दीर्घतमा, मधुच्छन्दा, आगत्य; देवता :- विष्णुयज्ञं, यज्ञ, अग्नि, विद्युत, सोम, वाक्, सविता, सूर्य विद्वांसो, ईश्वर सभाध्यक्षौ, सौमस, वितारौ; छंद :- ब्रहती, गायत्री, त्रिटुष्प, पंक्ति, उष्णिक, ब्रहती, जगती।
हे सोम! तुम अग्नि देवता के शरीर हो। मैं तुम्हें विष्णु भगवान की प्रीति हेतु काटता हूँ। तुम सोम नामक देवता के प्रतिनिधि त्रिदुष्प छंद के अधिष्ठाता को खुश करने वाले शरीर हो। मैं तुम्हें विष्णु भगवान की प्रीति हेतु टुकड़े-टुकड़े करता हूँ। हे सोम! तुम यज्ञ में आए अतिथि को अतिथि स्वागत द्वारा सन्तुष्ट करने वाले हो। मैं तुम्हें विष्णु भगवान की प्रीति हेतु तुम्हारे टुकड़े-टुकड़े करता हूँ। हे सोम ! धन से वृद्धि करने वाले अग्नि संरक्षक सोम के दूत अनुक्त छन्द के अधिष्ठाता अग्नि की प्रीति हेतु और भगवान विष्णु की प्रीति के लिए तुम अपने टुकड़े-टुकड़े करते हो।
हे वृक्ष खण्ड! तुम अग्नि देवता को पैदा करने वाले हो। कुशद्वय ! तुम अरिणी रूप कष्ट को दबाकर अग्नि को उत्पन्न करने की शक्ति प्रदान करते हो। हे अधरारणि ! हमने तुम्हें अग्नि को उत्पन्न करने के लिए नारी भाव से कल्पना करके तुम्हारा नाम उर्वशी रख दिया है। हे स्थाली में अटल भाज्य ! तुम दो अरणियों से उत्पन्न अग्नि की आयु रूप समान हो। हे उत्तर अरिणी ! अग्नि को उत्पन्न करने के कारण हम तुम्हें उत्तर रूप में कल्पना करते हैं। तुम पुरूरवा नामक वाली हुई हो। हे अग्नि! गायत्री छंद के अधिष्ठाता अग्नि की शक्ति से मैं तुम्हें पैदा करता हूँ। हे अग्नि! जगती छंद के अधिष्ठाता विश्वे देवों की शक्ति से मैं तुम्हारा मंथन करता हूँ।
हे अग्नेि! तुम हमारे कर्मों को सिद्ध करने के लिए एकाग्र हृदय और समान चित से, हमारे द्वारा अपराध होने पर भी क्रोध न करने वाली बनो। तुम हमारे यज्ञ को समाप्त मत करना। यज्ञपति यजमान को पीड़ित न करना। तुम हमारे लिए कल्याणकारी बनो।
ऋत्विजों के पुत्र रूप या अभिशाप से रक्षक मथित आह्वानीय अग्नि में विद्यमान हुए हवि (सामग्री) का भोग करते हैं। हे अग्नेि ! ऐसे तुम्हारे लिए कल्याण रूप बनकर आलस्य को छोड़कर इस स्थान में हमेशा इंद्रादि देवताओं के लिए यज्ञ करो। तुम्हारे लिए घी की आहुति अर्पित है।
हे भाज्य! वायु देवता उत्तम चाल वाले, शक्तिशाली क्षितिज के पुत्र, समस्त कार्यों में सक्ष्म, आत्मा के पौत्र और सर्वज्ञ हो। मैं तुम्हें उन्हीं के लिए प्राप्त करता हूँ। हे भाज्य ! मुझे प्राण के स्नेह हेतु अनिष्ट उपाय की इच्छा कर, रक्षक हृदय की स्नेह भावना हेतु मैं तुम्हें प्राप्त करता हूँ। शरीर को निष्प्राण न करने वाली जठराग्नि के लिए उन्हें प्राप्त करता हूँ। हे आज्य ! तुम अतिरस्कृत, आगे भी अतिरस्कार योग्य हो। सभी तुम्हें पूजनीय मानते हैं। तुम देवताओं के लिए सार पदार्थ हो और हमारी निन्दा आदि अपयश से सुरक्षा करने वाले हो। इसलिए हे आज्य ! तुम वेद मार्ग के द्वारा मोक्ष ग्रहण कराने में मित्र हो। हम तुम्हें सत्य अन्तःकरण द्वारा छूते हैं। तुम हमें उत्तम यज्ञ अनुष्ठान में संलग्न कराओ।
हे अनुष्ठान आदि कार्यों के पालन करने वाले अग्नि देव! तुम हमारे कार्य की रक्षा करो। तुम्हारा कर्म रक्षक रूप मुझे प्राप्त हो। जो मेरा शरीर है, वह तुम में हो। हे अनुष्ठान कर्म ! हम अग्नि और यजमान से संगति (मित्रता) करें, सोम मेरी दीक्षा को और उपसद् रूप को तप माने। हे सोम ! तुम्हारे सभी अवयव और गाँठ धन को प्राप्त कराने वाले हो। तुम इन्द्र की प्रीति के लिए जन्मे हो। तुम्हारे प्रयोग के द्वारा इंद्र सभी प्रकार की वृद्धि को प्राप्त हो और तुम इन्द्र के पान के लिए वृद्धि को प्राप्त हो। मित्र के समान हम संतों को धन-दान एवं मेधा को प्राप्त करें। हे सोम ! तुम्हारे कारण हमारा कल्याण हो, मैं तुम्हारी दया से अभिषेक क्रिया को सम्पन्न कर जाऊँ। हे हे वेदी! तुम शेरनी के रूप समान विकराल बनकर शत्रुओं को पराजित करने वाली हो। तुम देवताओं की भलाई के लिए उत्तर वेदी के रूप में स्थापित होओ। हे उत्तरवेदी ! तुम शेरनी के समान शत्रुओं का बहिष्कार करने वासली और देवताओं के स्नेह के लिए पत्थर आदि से पृथक होकर सुसज्जित हुई हो।
हे उत्तर वेदी! इन्द्र अष्ट वसुओं के सहित तुम्हारी पूर्व दिशा में रक्षा करें। वरुण रुद्रगण के साथ पश्चिम दिशा में तुम्हारी रक्षा करें। हे वेदी! मन के समान वेगवान यमराज पितरों के साथ दक्षिण दिशा में तुम्हारी रक्षा करें। विश्वेदेवा ! द्वादस (बारह) आदित्यों के सहित उत्तर दिशा में तुम्हारी रक्षा करें। राक्षसों का विनाश करने के लिए मैंने जिस जल से प्रोक्षण किया था, वह जल उग्र रूप धारण करने को है। मैं इसे वेदी से बाहर फेंकता हूँ।
हे वेदी! तुम शेरनी के समान होकर असुरों का पतन करने में संलग्न होती रहो। यह हवि तुम्हारे लिए है। हे वेदी ! तुम आदित्यों की सेवा करने वाली शेरनी के रूप समान वाली हो। यह हवि तुम्हारे लिए है। हे वेदी ! तुम शेरनी के समान वीरता वाली और ब्राह्मण क्षत्रिय से स्नेह करने वाली हो। यह हवि तुम्हारे लिए है। हे वेदी! तुम शेरनी के रूप समान वीरता वाली हो। श्रेष्ठ प्रजा और धन को पुष्ट करने वाली हो। यह आहुति तुम्हारे लिए है। हे वेदी ! तुम शेरनी के रूप समान वीरता वाली हो। यजमान की भलाई के लिए देवों को यहाँ लाओ। समस्त प्राणियों के स्नेह के लिए तुम्हें वेदी पर प्राप्त करता हूँ।
हे मध्यम परिधि! तुम स्थिर होकर को दृढ़ करो। हे दक्षिण परिधि! तुम स्थिर होकर यज्ञ में रहती हो, अतः अंतरिक्ष को दृढ़ करो। हे उत्तर परिधि ! तुम अविनाशी यज्ञ में रहती हो, अतः आकाश को दृढ़ करो। हे सम्भार! तुम अग्नि के पूरक हो।
वेद पाठ से समृद्धि को प्राप्त, अद्भुत, बाह्मणों के सम्बन्धी ऋत्विज आदि, यज्ञ कर्म में लगे हुए, सभी के स्वभावों के ज्ञाताओं को उन एक ही ईश्वर ने रचा है। इसलिए सर्व-प्रेरक सविता देव की समृद्धि को श्रेष्ठ कहा गया है। यह हवि उन्हीं के लिए है।
सोम ! तुम हमारे अभीष्ट धन को प्रेरित करो। हमको महान ख्याति प्राप्त हो। द्यावा पृथ्वी को हम नमस्कार करते हैं। उनकी कृपा से हमारा कार्य निर्विघ्न पूर्ण हो।
हे अग्ने! तुम्हारी जो देह लोहप्र में वास करने वाला देवों को काम्यफल वृष्टि करने वाला और राक्षसों को गर्त में धकेलने वाला है, तुम्हारा वह शरीर दैत्यों के कर्कश बन्धनों का नाशक है। इस प्रकार के उपकारी तुम अत्यन्त उत्तम को यह आहुति स्वाहुत हो। हे अग्ने ! तुम्हारा जो शरीर रजतपुर में निवास करने वाला है, वह देवताओं के लिए अभिष्ट प्लामदायक और वर्षाकारक है। राक्षसों को गर्त में धकेलकर उनके कठोर संकल्पों को समाप्त करता और आरोपों को भी दूर करता है। उन अपमारी अग्नि के लिए यह आहुति स्वाहुत हो। हे अग्ने ! तुम्हारी स्वर्णपुर निवासी देह देवताओं के लिए अभीष्ट वर्षी और असुरों को गर्त में धकेल कर्कश कठोर ध्वनियों को नष्ट करने वाला है। उस उपकारी अग्नि के लिए यह आहुति स्वाहुत हो।
हे पृथ्वी! तुम संतप्त और निर्धनों को शरण देने वाली हो। हे पृथ्वी ! तुम मेरे लिए अनेक रत्नों की खान हो। तुम धन के लिए निर्धन व्यक्ति को प्राप्त होने वाली हो। तुम्हारी कृपा से ही वह कृषि आदि कार्य करता है। हे पृथ्वी! मुझे इच्छित ऐश्वर्य देकर मेरी रक्षा करो। हम याचना करके निर्वाह न करें। हे पृथ्वी! मन की व्यथा से हमारी रक्षा करो। हम मनोवेदना से दुःखी न हों। हे मृतिके ! हम तुम्हें खोदते हैं। नभनामक अग्नि रस बात को जाने। कम्पनशील अग्नि! तुम इस स्थान में आयु रूप में होकर प्रवेश करो। हे पृथ्वी! तुम इस दृश्यमान पृथ्वी पर निवास करती हो। तुम्हारा जो रूप अतिरिक्त और यज्ञ के योग्य है उसी को तुम्हारे रूप में यज्ञ कार्य के निमित्त इस स्थान में प्रतिष्ठित करता हूँ। हे मृतिके! मैं तुम्हें खोदता हूँ। नभ नामक अग्नि इस बात को जाने। हे कम्पनशील अग्नेि ! तुम इस स्थान में आयु नाम से आगमन करो। हे पृथ्वी! तुम जिस कारण अंतरिक्ष में रहती हो उसी कारण से तुम्हें स्थापित करता हूँ। हे पृथ्वी! तुम धरा पर वास करती हो, मैं तुम्हारे यज्ञ योग्य रूप को स्थापित करता हूँ। हे भृति! हे भृतिके! देवताओं के लिए यज्ञ करने को उत्तर वेदी बनाई जाएगी। इसलिए मैं तुम्हें इस स्थान में लाकर स्थापित करता हूँ।
सर्वव्यापक विष्णु ने इस चराचर विश्व को विभक्त कर प्रथम पृथ्वी दूसरा अंतरिक्ष और तीसरा स्वर्ग में बाँट दिया है। इन विष्णु के पद में विश्व अंतर्भूत है। हम उन्हीं परमात्मा के लिए हवि देते हैं। हे द्यावा-पृथ्वी! इस यजमान का कल्याण करने के लिए तुम बहुत अन्न वाली, बहुत गायों वाली बहुत पदार्थ वाली, विज्ञान की वृद्धि करने वाली यज्ञ साधिका हो। हे विष्णों! तुमने इन दोनों को विभक्त कर स्तंभित किया है। तुमने अपने तेजों से ही इसे सब ओर से धारण किया है। हे शकट के धुरे ! तुम देवताओं में प्रमुख देवताओं से यजमान द्वारा यज्ञ करने की बात को ऊँचे स्वर से कहो। हे हविर्धान शकट तुम पूर्वाभिमुख होकर गमन करो। ऊर्ध्वलोक (स्वर्गलोक) वासी देवताओं को हमारा यह यज्ञ प्राप्त कराओ। सावधान ! तिरछे होकर पृथ्वी पर मत गिरना। हे शकट रूप देवद्वय ! अपने वाहक पशुओं के गोष्ठ में कहो। जब तक यजमान कर जीवन है, तब तक उसे पशु धन से हीन मत करो। यजमान के पुत्र आदि से दुष्ट (कठोर) वचन मत बोलो और यजमान की आयु में वृद्धि और संतान वृद्धि की इच्छा करो।
भगवान विष्णु के किन पराक्रमों का वर्णन करूँ। उनकी समृद्धि अपरिमित है। उन्होंने धरा, अन्तरिक्ष और स्वर्ग तथा समस्त प्राणधारियों और परमाणुओं की उत्पत्ति की है। वे तीनों लोकों में अग्नि, वायु और सूर्यरूप से स्थित होकर उत्तम मनुष्यों द्वारा वंदनीय हैं। उन्होंने स्वर्गलोक को श्रेष्ठ स्थान में स्तंभित किया है। हे स्थूल काष्ठ ! मैं तुम्हें भगवान विष्णु के स्नेह के लिए दबाता हूँ।
हे विष्णों! उस स्वर्गलोक से, पृथ्वी से और महान अंतरिक्ष से लाए गए धन द्वारा अपने दोनों हाथों को भर लो। तब उन दक्षिण और वाम हाथों द्वारा विभिन्न प्रकार के रत्न-धन दो। मैं तुम्हें विष्णु भगवान की प्रीति के लिए गाढ़ता हूँ।
वह पराक्रमी पवित्र करने वाले, पृथ्वी में रमे हुए, अंतर्यामी सिंह के समान भंयकर, सर्वव्यापी विष्णु स्तुतियों को प्राप्त करते हैं। उन्हीं के पाद प्रक्षेप वाले तीनों लोकों में सब प्राणी रहते हैं।
हे दर्भमालाधर वंश ! तुम विष्णु के ललाट रूप हो। हे राटी! तुम दोनों भगवान विष्णु के ओष्ठ-संधि हो। हे ब्रह्मसूची! तुम यज्ञ मण्डप की सूची हो, मण्डप को सीने वाली हो, हे ग्रन्थि ! तुम इस यज्ञ मंडप की गाँठ रूप हो, अतः बलवान बन जाओ। हे हविर्धान ! तुम भगवान विष्णु के लिए होने के कारण विष्णु रूप समान ही हो। अतः भगवान विष्णु के स्नेह के लिए मैं तुम्हें स्पर्श करता हूँ। हे अध्रि ! सविता देव के मार्ग दर्शन से, अश्विनी कुमार की भुजाओं से और पूषा देवों के हाथों से मैं तुम्हें प्राप्त करता हूँ। हे अग्नेि ! तुम हमारी भलाई करने वाली हो। मैं चार अवट समक्ष करने को चार परिलिखन करता हूँ, इसके द्वारा यज्ञ में बाधा उपस्थित करने वाले राक्षसों की गर्दन अलग करता हूँ। हे घोर ध्वनि करने वाले उपरव ! तुम श्रेष्ठ हो। तुम इन्द्रदेव के स्नेह के लिए उच्च ध्वनि वाली वाणी को कहो।
अमात्य आदि ने किसी कारण कुपित होकर अत्यंत गलत विचार से जो असिकेश आदि (हड्डी-बाल) मेरे बुरे के लिए गाड़े हैं, मैं उस अभिचार कर्म को बाहर निकालता हूँ। जिस किसी भी पुरुष ने यह कार्य किया है, उसे मैं बाहर करता हूँ। मेरे किसी रिश्तेदार, जानने वाले ने या किसी अनजान व्यक्ति ने मेरे अहित के लिए जो यह कार्य किया है, उसे मैं दूर करता हूँ। शत्रुओं ने हमारे अहित साधन के लिए जो कार्य स्थापित किया है उन सबको सभी स्थानों से बाहर निकालता हूँ।
हे प्रथम अवट! तुम अपने आप तेजस्वी और बैरियों को समाप्त करने वाले हो। तुम्हारी कृपा दृष्टि से हमारे शत्रु समाप्त हों। हे द्वितीय अवट ! तुम सत्रों में स्थित हो। हमारे प्रति घमंड भाव से बरतने वाले का तुम पतन करते हो। हम तुम्हारी कृपा दृष्टि से शत्रु से पृथक हों। हे तृतीय अवट ! तुम इन यजमान और ऋत्विज के सामने ज्योति से परिपूर्ण हो और असुरों का सर्वनाश करने वाले हो। हम तुम्हारी कृपा दृष्टि से शत्रुओं से प्रथक रहें। हे चतुर्थ अवट! तुम सभी के स्वामी और सर्वत्र ज्योति हित वास करते हो। तुम शत्रुओं का पतन करने में समर्थ हो। हमारे सभी शत्रु विनाश को प्राप्त हों।
हे गर्त्ता! तुम राक्षसों के नाशक बुरे कार्यों को निष्फल करने वाले भगवान विष्णु से संबंधित हो। मैं तुम्हें प्रोक्षण करता हूँ। तुम राक्षसों का वध करने वाले, अभिचार कर्मों को निष्फल करने वाले भगवान विष्णु से संबंधित हो। मैं तुम्हें सींचकर शेष बचे हुए जल को अलग करता हूँ।
मैं तुम्हें कुशाओं द्वारा ढकता हूँ। दोनों गर्तों पर, दो सोमाभिषवण फलक अलग-अलग स्थापित करता हूँ। मैं तुम दोनों पलकों को पर्युगहण करता हूँ। हे अभिवषण तुम विष्णु भगवान से संबंधित यन्न कार्य के मुख्य साधन हो। हे ग्रावक्षो ! तुम भगवान विष्णु से संबंधित यज्ञ की रक्षा करने वाले हो। हे अभ्र ! सविता देव की प्ररेणा से, अश्विनी कुमारों की भुजाओं से, पूषा के हाथ से तुम्हें ग्रहण करता हूँ। हे अभ्रे ! तुम हमारा हित करने वाली हो। मैं जो चार अवट प्रस्तुत करने को परिलिखन करता हूँ। उनसे यज्ञ में विघ्न करने वाले राक्षसों की गर्दन मरोड़ता हूँ। हे शस्य ! तुम जौ हो, इस कारण से हमारे शत्रु को हमसे दूर करो। हमारे शत्रुओं को भगाकर हमें सुख-सौभाग्य प्रदान करो। हे गूलर के अग्र भाग दिव्य कीर्ति के लिए प्रोक्षण करता हूँ। हे मध्यभाग! तुम्हें अंतरिक्ष की कीर्ति के लिए प्रोक्षिण करता हूँ। हे मूलभाग ! तुम्हें पृथ्वी प्रीति के लिए प्रोक्षित करता हूँ। जिन्हें पितर कहते हैं, वे इस जल से शुद्ध हों। हे कुशाओं! तुम पितरों के आसन हो। यहाँ पितर आदरपूर्वक बैठेंगे। हे औदुम्बरी ! तुम स्वर्गलोक को स्थापित करो। अतंरिक्ष (सौरमंडल) को पूर्ण करो। पृथ्वी को दृढ़ करो। हे औदुम्बरी! तेजस्वी मरुद्‌गण तुम्हें इस गर्त से प्रक्षिप्त करें तथा मित्रावरुण तुम्हारी आदि काल तक रक्षा करें। हे औदुम्बरी! तुम बाह्मण, क्षत्रिय और वैश्य जाति द्वारा वंदना योग्य हो। मैं इस अवट में पयूँहण मृत्तिका डालकर तुम्हें स्थिर करता हूँ। हे औदुम्बरी! ब्राह्मण और क्षत्रिय को स्थिर करो। हमारी आयु और प्रजाओं को अटल करो।
हे औदुम्बरी! तुम इस जगह में अटल हो। यह यजमान अपने पुत्र-पौत्र आदि से युक्त सुख पाए और इस शरीर से दृढ़ता को ग्रहण हो। इस हवनीय घी द्वारा स्वर्ग और धरा युक्त हो। हे तृणमय चटाई ! तुम इन्द्रदेव की इस सभा मंडप से छिपाने वाली हो, इसलिए यजमान आदि समस्त के लिए छाया के रूप समान हो।
हे वन्दनाओं के योग्य इन्द्रदेव! यह प्रार्थना रूप सवन तुम्हें प्रवृद्ध करें। तुम इन वन्दनाओं को सब ओर से प्राप्त करो। यह वंदना मनुष्यों, यजमान आदि के लिए दीर्घआयु से परिपूर्ण करें। हमारी सेवा के द्वारा तुम हर्षित होओ।
हे रस्सी! तुम इन्द्र से संबंधित यज्ञ में सीवन (सिलाई) वाली हो, मैं तुम्हें सीवन के रूप में ग्रहण करता हूँ। हे गाँठ ! तुम इन्द्र से संबंधित होकर स्थिरता को प्राप्त हो। हे सभा ! तुम इन्द्र की प्रीति के लिए मेरे द्वारा बनाई गई हो। हे अग्निव ! तुम विश्व के देवताओं को आह्वान करने के स्थान हो।
हे अग्निघ्घ्रधिष्ण्य! सर्वप्रथम तुम पर ही अग्नि का स्थापन होता है। यही अग्नि क्रम से भ्रमणशील होगी। इस कारण ही अग्नि विविध रूप वाले और व्यापक हैं। तुम्हारे उत्तर दक्षिण में ऋत्विजो का आने जाने का रास्ता है। इसलिए तुम्हें प्रवाहण कहा जाता है। हे होतृधिष्ण्य ! तुम्हारे द्वारा अधिष्ठित अग्नि इस यज्ञ का निर्वाह करने वालों में मुख्य है। इसलिए तुम्हारा वहि नाम प्रसिद्ध है। सब देवताओं के लिए इस अग्नि में हवि दी जाती है। सब हवियों के वहन करने वाले होने से तुम्हें हव्यवाहन कहा गया है। हे मित्रावरुणधिष्ण्य ! तुम्हारे द्वारा विद्यमान अग्नि हमारे स्वाभाविक सखा है। इस कारण यह श्वात्र कहे जाते हैं और होता के दोषों को छिपाने वाले होने से यह ज्ञानी वरुणदेव के नाम से प्रसिद्ध हैं। हे विप्रशंसीधिष्ण्य! तुम इन विराजमान अग्नि के लिए प्रदक्षिणा के विभाजक हो। इसलिए तुम ! "तुथ" कहलाते हो। जिस ऋत्विज आदि को जो हिस्सा जिस प्रकार से ग्रहण हो, तुम सभी के ज्ञानी हो, इसलिए तुम्हें ! "विश्ववेद" कहते हैं।
हे होतृधिष्ण्य! तुम पर स्थापित यज्ञ अग्नि अधिक शोभायमान होने से कमनीम (सुन्दर) और क्रांतदर्शी है। हे नेष्टधिष्णय ! तुम पर प्रतिष्ठित यह अग्नि आपका नाश करने और सोम की रक्षा करने वाले हैं।
यह यजमान का पालन करने वाले हैं। हे अच्छावाकूधिष्ण्य! यह अग्नि पुरोडाश का भाग पाते हैं। यह पुरोडाश प्रधान हैं। अतः तुम्हारे दो नाम अन्न वाले और हवि वाले प्रसिद्ध हैं। हे हेधिष्ण्य ! यह अग्नि सब ऋत्विज आदि के शुद्ध करने वाले हैं। यह सब यज्ञ पात्र धोने और माँजने के कारण हैं। हे आह्वानीय अग्नि देव! तुम
देवताओं को संतुष्ट करने वाले हो। अतः भले प्रकार दीप्त और व्रतादि कर्मों के कारण दुर्बल शरीर वाले यजमान को अभीष्ट देते हो इसलिए कृशानु कहे जाते हो।
हे वहिप्पर्वन! तुम परिषदगण की आधार भूमि होने से परिषध कहे जाते हो। तुम्हारे आश्रम से सब शुद्ध होते हैं। इसलिए तुम पावमान कहे जाते हो। हे चत्वाल शून्यगर्भहोने से तुम नभ कहे जाते हो। तुम्हारी प्रदक्षिणा करते हुए ऋत्विगण आते जाते हैं। इससे तुम गमन रूप कहे जाते हो। शामित्र ! तुम्हारे द्वारा हव्य ! (हवन) सुस्वादु होता है। इसलिए तुम पवित्र कहलाते हो। तुम्हारे द्वारा पाक सिद्ध होता है। इसलिए तुम्हें पाचक कहते हैं। हे औदुम्बरि ! तुम उद्‌गाता के प्रमुख कार्य स्थान हो, इसलिए ऋत धाया कहे जाते हो। तुम उन्नत होने के कारण स्वर्ग का प्रकाश करने वाले होते हो।
हे ब्रह्मासन धिष्ण्य! तुम्हारे अधिष्ठाता बह्मा चारों वेदों के ज्ञाता और ज्ञान के सागर रूप हैं। इसलिए तुम ज्ञान के सागर कहलाते हो। समस्त ऋत्विजों के यज्ञ सम्बन्धी कार्य अकार्य के देखने से तुम्हें विश्ववर्चा कहते हैं। उसके कारण वेद भी यही विश्ववर्चा कहलाते हैं। इस योग्य जो हो वे यहाँ वास करें।
हे अग्नेि! तुम आह्वानीयरूप होकर यज्ञशाला में जाती हो। रक्षक, अजन्मा और जिनके एक चरण में समस्त संसार है, उस ब्रह्म को सन्तुष्ट करने वाले होने के कारण रूप तुम अज तथा एक पात कहे जाते हो। हे अग्नेि ! तुम अविनाशी हो। तुम मूल में होने वाले बुधन्य नाम से भी विख्यात हो। हे सदोमण्डप ! तुम वाणी हो, इन्द्रदेव का मुख्य स्थल होने से इन्द्रदेव रूप हो, ऋत्विजों का मुख्य सभा कर्म होने से तुम सभा हो। हे शाखे ! तुम यज्ञ के कपाट में स्थित हो। तुम मुझे किसी प्रकार पीड़ित न करना। हे सूर्य! तुम जिस मार्ग से जाओ, उन रास्तों के मध्य में भी मेरी बढ़ोत्तरी हो। इस देवयान मार्ग में मेरा कल्याण हो।
हे ऋत्विजो! मुझे मित्र के नेत्र रूप से देखो। मित्र के समान रूप इस कर्म को करो। हे धिष्ण्य में दृढ़ अग्नि ! तुम वन्दनीय होकर अपने उग्र मुख के द्वारा मेरी सुरक्षा करो या रुद्र मुख से मेरी सुरक्षा करो। मुझे समस्त धन धान्य आदि से समृद्ध करो। तुम्हारे लिए नमस्कार करता हूँ। मुझे किसी भी तरह प्रताड़ित करो।
हे आज्य! तुम अनेक आहुतियों के योग्य होने से संसार रूप, द्युतिमान और देवों के प्रकाशक हो। आज्य के भोजन द्वारा देव हर्षित होते हैं। उन देवताओं की संतुष्टि के लिए ही समिधा के आखिरी भाग को घृताक्त करता हूँ।
हे सोम! हमारे विद्रोहियों द्वारा अभिप्रेरित असुरों या अनिष्ट साधनों को तुम दण्ड देने वाले बनो। हमारे लिए श्रेष्ठतम शक्ति के रूप हो। यह आहुति तुम्हारे लिए है। हे सोम ! मेरे द्वारा प्रदत्त आज्य का सेवन करो। हमारी इस आहुति को स्वीकृत करो।
हे अग्नि! तुम सभी मार्गों के ज्ञाता और दिव्यगुणों से सम्पन्न हो। तुम हम अनुष्ठाताओं को श्रेष्ठ मार्गों द्वारा प्राप्त करो और हमारी कामनाओं को पूर्ण करने वाले कार्यों में विघ्न उपस्थित करने वाले पाप को दूर करो। हम तुम्हारे निमित्त आज्ययुक्त स्तुति को सम्पादित करते हैं।
यह अग्नि हमें धन प्रदान करें। यह अग्नि युद्ध क्षेत्र में आकर रिपु सेना को छिन्न भिन्न करें। शत्रु के आधीन अन्न को हमारे लिए जीत लो। अत्यन्त हर्षित होकर शत्रुओं को पराजित कर विजय प्राप्त करो। हमारी आहुति स्वीकृत करो। हे विष्णों! हमारे शत्रुओं को अपना भयानक पराक्रम दिखलाओ। अक्षीण्ता के लिए हमारी बढ़ोतरी करो। तुम घृत द्वारा प्रवद्ध होने वाले हो, अतः इस आहुति रूप समान घृत का रसपान करो। यजमान की बढ़ोतरी करो। यह आहुति तुम्हारे लिए है।
हे सर्वप्रेरक सविता देव! यह सोम दिव्य गुणों से युक्त है। इसे हम तुम्हारे लिए समर्पित करते हैं। तुम्हारी प्रेरणा से ही हमने इसे प्राप्त किया है। अतः तुम ही इसकी रक्षा करो। हे सोम-रक्षक ! यह किसी उपद्रव का लक्ष्य न बन पाए। इसकी रक्षा करो। हे सोम ! तुम दिव्य दृष्टि वाले हो। देवगणों को इस समय यहाँ लाओ। मैं यजमान, धन और पुष्टि के सहित अपने मनुष्यों के निमित्त यहाँ आया हूँ। देवताओं को सोम रूप अन्न देकर मैं वरुण देवता के बंधन से छूट गया हूँ।
हे अग्नि! तुम समस्त कर्मों के पोषणकर्त्ता हो और अब भी तुम मेरे अनुष्ठान कार्य का पालन कर रहे हो। इस कार्य में वंदना करते समय तुमसे सम्बन्धित जो तेज मुझमें दृढ़ हुआ था, वही तेज मेरे इस शरीर में स्थापित हो। हे व्रतों का पालन करने
वाले अग्निदेव ! हमारे यज्ञ का संपादन करो। इस अग्नि ने मेरे दीक्षा सिद्धान्त को और तपस्या को स्वीकृत किया है।
हे विष्णों! हमारे शत्रुओं और विघ्नों के प्रति अपना पराक्रम करो। क्रम को प्रबुद्ध करो। तुम घृत से वृद्धि को प्राप्त होने वाले हो, अतः इस घृत का पान करो। यजमान की विस्तृत रूप से वृद्धि करो। हमारी यह घी की आहुति तुम्हारे निमित्त है।
हे यूपवृक्ष ! तुम्हारे अतिरिक्त अन्य अपूप्य वृक्षों को लांघकर मैं यहाँ उपस्थित हुआ हूँ। जो यूप पेड़ के अनुकूल नहीं थे, मैं उनके समक्ष नहीं गया। मैं तुम्हें दूर स्थित पेड़ों के निकट जानकर तुम्हारे समक्ष आया हूँ। हे वन प्रहरी देव-पेड़। हम देव यज्ञ के कर्म के लिए तुम्हें प्राप्त करते हैं, देवता भी तुम्हें इस कर्म के लिए स्वीकृत करें। हे यूप पेड़ ! तुम्हें भगवान विष्णु के यज्ञ के लिए प्राप्त करता हूँ। हे औषध ! कुल्हाड़ी से भयग्रस्त न हो और मेरी भी उससे रक्षा करो। हे कुल्हाड़ी! इस यूप के अतिरिक्त भाग पर प्रहार न करो। हे यूप वृक्ष ! मेरे स्वर्ग को हिंसित मत करो। अंतरिक्ष को हिंसित मत करो, धरा के साथ सुसंगत होओ। हे कटे हुए पेड़ ! अत्यन्त तेज यह कुल्हाड़ी श्रेष्ठदर्शन और आम यज्ञ के लिए तुम्हें यूप के रूप में ग्रहण करती है। हे वनस्पते ! तुम इस स्थान से शत बीज युक्त होकर उत्पन्न होओ। हम भी इस कार्य की शक्ति से पुत्र रूप सहस्त्रों शाखा वाले हों।
अध्याय (6) :: ऋषि :- अगस्तयः, शाकल्य, दीर्घतमा, मेघातिथि, मधुच्छन्दा, गौतम; देवता :- सविता, विष्णु, विद्वांस, त्वष्टा, बृहस्पति, सविता, अश्विनौ, पूषा, आपः, वात धावापृथिव्यौ, अग्निः, विश्वदेवा, सेनापति, वरुण, अप्यज्ञ, सूर्या, सोम, प्रजा, प्रजासभ्य राजानः, सभापति राजा, यज्ञ, इन्द्र; छन्द :- पंक्तिः, उष्णिक, गायत्री, बृहती अनुष्टुप, जगति त्रिष्टुप।
हे अग्नि! सविता देव की प्रेरणा, अश्विद्वय (अश्वनि कुमार) की भुजाओं से और पूषा के हाथों से मैं ग्रहण करता हूँ। हे अग्नि ! तुम हमारा हित करने वाली हो। मैं जो अवट प्रस्तुत करने को परिलेख्य करता हूँ, उनमें विघ्न डालने वाले असुरों को समाप्त करता हूँ। हे यव! तुम हमारे शत्रुओं को भगाओ। हमें सुख सौभाग्य प्रदान करो। हे यूप ! दिव्य कीर्ति के लिए तुम्हारे अग्र भाग को, अंतरिक्ष कीर्ति के लिए मध्य भाग को, पृथ्वी (पार्थिव) कीर्ति के तुम्हारे मूल भाग का प्रोक्षण करता हूँ। जिन लोकों में पितृगण निवास करते हैं, वे लोक इस जल द्वारा शुद्ध हों। हे कुशा रूप आसन ! तुम पर पितृगण सुखपूर्वक विराजमान हों।
हे यूप! ऊपर की ओर उठाने वाले ऋत्विजों को सुख पूर्वक प्रविष्ट कराने के लिए आगे बढ़ो। तुम इस बात को समझ लो कि तुम्हारा द्वितीय हिस्सा और रखा जाएगा। हे यूप! सर्वप्रेरक सविता देव तुमको मृदु घी द्वारा सिंचित करें। हे चषाल! उत्तम फल वाली ब्रीहि आदि औषधियों को ग्रहण करने के लिए तुम्हें इस यूप हिस्से पर दृढ़ करता हूँ। हे यूप तुमने अपने अगले भाग से स्वर्ग लोक का स्पर्श किया है, मध्य हिस्से से अंतरिक्ष को पूर्ण किया और जड़ भाग से धरा को मजबूत किया है।
हे यूप ! हम तुम्हें जिस स्थान पर पहुँचाना चाहें, वहाँ सूर्य की प्रकाशवान किरणें विस्तृत होती हैं या श्रेष्ठगमन करने वाले संतजनों द्वारा प्रस्तुत और सामगान द्वारा स्तुतियों को प्राप्त करने वाले विष्णु का परम्धाम है, वह इस स्थान में सुशोभित होता है, वह स्थान इस यज्ञ का ही स्थान है। हे यूप! तुम ब्राह्मणों, क्षत्रिय और वैश्यों के वंदना के योग्य हो। मैं तुम्हें इस भवट में ग्रहण करता हूँ।
हे यूप! तुम ब्राह्मणों को अटल करो और क्षत्रियों को भी स्थापित करते हुए यजमान की आयु और उनकी संतान को स्थिर करो। हे ऋत्विजो! भगवान विष्णु के कार्यों को देखो। उन्होंने अपने कार्यों द्वारा ही तुम्हारे लौकिक यज्ञादि कर्मों की कल्पना की है। वह विष्णु इन्द्र देव के वृत हवन आदि कार्यों में सखा एवं सहायक होते हैं।
मेधावी व्यक्ति भगवान विष्णु को मोक्ष रूप परमपद को हमेशा देखते हैं, उन विष्णु ने ही सूर्य मण्डल में नेत्र रूप सूर्य को बढ़ाया है। हे यूप! तुम रस्सी से चारों ओर से लिपटे हुए हो। तुम स्वर्ग के पुत्र हो। हे यूप! पृथ्वी तुम्हारा आश्रय स्थान है। जंगल के पशु तुम्हारे हैं। हे तृणों! तुम पशुओं के पास में रहने वाले हो। तुम्हें देखकर पशु तुम्हारे पास आते हैं। यह दिव्य गुण वाले पशु देवताओं के पास जाएँ। यह यजमान को स्वर्ग प्राप्त करने वालों में मुख्य हैं। हे त्वष्टा देव! तुम अपने घर में रम जाओ। हे हवि! तुम सुस्वादु हो। हे पशुओं तुम क्षीर (दूध) आदि धन वाले हो। तुम यजमान के यहाँ हमेशा निवास करो। हे बृहस्पते! अनेक प्रकार के पशु आदि धन को स्थिर करो। हे दिव्य हवि! मैं तुम्हें फल वाले यज्ञ के बंधन में बाँधता हूँ। यज्ञ के द्वारा ही कर्म के बंधन से मुक्त करता हूँ। यह मनुष्य तुम्हें शांत कर सकता है। सवितादेव की प्रेरणा से अश्विनी कुमार की भुजाओं से और यूप के हाथों से अग्नि और सोम में प्रीति पात्र से तुम्हें इस कार्य में शामिल करता हूँ। मैं तुम्हें अग्नि सोम के निमित्त जल से स्वच्छ करता हूँ। इस कार्य में तुम्हारे माता-पिता, भाई, मित्र आदि सब सहमत हों।
हे पशु! तुम जलपान करने वाले हो, अतः इस जल को ग्रहण करो। यह अद्भुत मृदु जल तुम्हारे लिए सुस्वादु हो, हे पशु! तेरे प्राण वायु रूप समान हों।
हे श्वरुणाले! तुम इस घृताक्त (घी से युक्त) हव्य की सुरक्षा करो। हे घृत परिपूर्ण आशीर्वचनो! इस यजमान की इच्छाओं को पूर्ण करो और इस ज्ञानदान के लिए इसके शरीर में प्रवेश कर जाओ। वायुदेव के समान रूप स्नेह वाले बनकर इस हवि सम्पन्न यज्ञ में आहुति हो। हे तृण! तुम वर्षा जल से पैदा हुए हो। इस विशाल यज्ञ में यजमान को धारण करो। यह आहुति देवों के लिए हो। वे इसे भली-भाँति स्वीकार करें। हे नियोजनी ! तुम इस चत्वाल में डाली जाने पर सबके समान रूप एक मत हो जाना। हे यज्ञ ! तुम्हें नमस्कार है। तुम शत्रुओं से हीन होकर सम्पूर्ण होने तक यहाँ रहो। हे यजमान पत्नी ! यह विशाल यज्ञशाला शत्रुओं से रहित है, इसलिए देवयान मार्ग की धारा देखकर आओ।
हे अद्भुत जल! तुम स्वभाव से ही शुद्ध हो। पात्र में स्थित इस हव्य को देवताओं के लिए ग्रहण करो। हम भी तुम्हारी विनती से देवयज्ञ में सम्मिलित होते हैं। उन देवताओं को हम तृप्तिकारक हवि प्रदान करें। हे प्राणी! मैं तेरी इंद्रियों को और प्राण आदि को पवित्र करती हूँ।
तेरा मन शांत हो, तेरी वाणी और प्राण भी शांति को प्राप्त हो। तुम्हारा सब काम शांति से हो, तुम सब प्रकार दोष रहित हो। इस यजमान का हमेशा कल्याण हो। हे औषधि ! इसकी रक्षा करो। इसे दुःखी मत करना। हे तृण! तुम राक्षसों के भाग हो। विघ्न डालने वाले असुर नष्ट हो गए हैं। अध्वर्यु द्वारा त्याग किया हुआ तृण रूप में इस राक्षस पर अपने चरण से आघात करता हूँ। द्यावा पृथ्वी रूप यह दोनों पात्र घी द्वारा परस्पर ढके हुए हैं। हे वायु ! सबके ऊपर सार रूप घृत को जानकर पियो। है अग्नि ! इस घृत का पान करो। यह आहुति स्वीकार हो। हे श्रवणीद्वय हम तुम्हें अग्नि में डालते हैं। तुम स्वाहाकार ! (भस्म) होकर ऊपर आकाश में पहुँचकर वायु में मिल जाओ।
हे जल! इस पाप को दूर करो। श्राप आदि के रूप में प्राप्त अस्वच्छता को भी नष्ट करो। हमारे झूठे आचरण आदि के द्वारा जो दोष लगा हो, उससे भी हमें भली प्रकार मुक्ति दिलाओ। प्राण की तीव्र गति और सूर्य के प्रभाव से तुम्हें तपस्या का फल ग्रहण हो। तेरे मन को समस्त प्रकार के वैरभाव से अलग कर दिया जाए।
हे घृत पीने वाले देवताओं! इस घृत का पान करो। हे हवि ! तुम अंतरिक्ष से संबंधित हो। पूर्व दिशाओं के देवों के निमित्त यह आहुति दी गई है। अग्नि कोण आदि प्रदिशाओं में स्थित देवगण के निमित्त यह आहुति दी गई। आगे के भाग से देवताओं के लिए यह आहुति दे दी जाती है। विदिशाओं में स्थित देवताओं के लिए यह आहुति दी जाती है। उच्च दिशाओं में स्थित देवताओं के लिए यह आहुति दी जाती है। सम्पूर्ण दिशाओं में वर्तमान दिखाई पड़ने वाली या न दिखाई पड़ने वाले देवताओं के लिए यह आहुति दी जाती है। वह सब इसे स्वीकार करें।
हे प्राणी! तेरे प्राण और उदान प्रत्येक अंग में स्थापित रहें। तेरा विषम रूप एक जैसा होकर बल सम्पन्न हो जाए। अद्भुत (दिव्य) व्यक्तियों की संगति से तू उच्च स्थान को प्राप्त हो। मित्र सम्बन्धी आदि भी तुम्हारे सहायक हों।
हे हवि! तुम समुद्र को तृप्त करने के लिए गमन करो। यह हवि (सामग्री) स्वीकार हो। यह हवि अंतरिक्ष के देवताओं की तृप्ति के लिए गमन करें। यह हवि सविता देव के प्रति गमन करें। यह हवि स्वीकार हो। यह हवि मित्र वरुण को स्वीकार हो। यह हवि अहोरात्र देवता के लिए स्वीकार हो। यह हवि छंदों के अधिष्ठात्र देवता के लिए स्वीकार हो। यह हवि स्वर्ग और पृथ्वी के लिए स्वीकार हो। यह हवि यज्ञ देवता के लिए अर्पित हो। यह आहुति सोम देवता के लिए अर्पित हो। यह आहुति आकाश के लिए स्वीकार हो। यह आहुति वैश्वांतर अग्नि हेतु अर्पित हो। हे समुद्रादि देवताओं ! मेरे मन को चंचल मत होने दो। हे स्वरूकाष्ठ ! तेरा धुँआ स्वर्गलोक में पहुँचे। तुम्हारी ज्वालाएँ वर्षा के लिए अन्तरिक्ष में पहुँच जाएँ। तुम पृथ्वी को भस्म से परिपूर्ण करो। यह आहुति स्वीकार हो।
हे शलाके! इस स्थान के जल को तुम हिंसित न करो। तुम इस औषधि को भी हिंसित करो। हे वरुण देव! जब तुम्हारे अधिकार वाली जगह में हमें भय ग्रहण हो तब तुम अपनी उस जगह से हमको मुक्ति प्रदान करो। हे वरुणदेव ! जिस प्रकार गौ अबध्य है वैसे ही अन्य पशु भी हैं। तुम हमें हिंसा रूप पाप से मुक्त कराओ। जल और औषधि हमारे लिए बन्धु के समान हो। जो हमसे शत्रुता करता है या हम जिससे शत्रुता रखते हैं, उनके लिए यह जल औषधि शत्रु के समान हो। हवि वाले यजमान, इन हवि युक्त वसतीवरी जलों की परिचर्या करते हैं। यह प्रकाशमान यज्ञ हवि से सम्पन्न हो। सूर्य भी यजमान को फल प्रदान करने के लिए हविवार्न हों।
हे वसतीवरी जलों! मैं तुम्हें सुदृढ़ घर वाले अग्नि के पास स्थापित करता हूँ। हे वसतीवरी जलों! तुम इन्द्र और अग्नि को देवों के भाग रूप हो। हे वसतीवरी जलों ! तुम मित्र वरुण के भाग हो। हे वसतीवरी जलों! तुम देवताओं के भाग हो। जो जल बहुत समय तक रहने से सूर्य की किरणों द्वारा रक्षित सूर्य के पास स्थित है। वे जल हमारे यज्ञ में तृप्ति के कारण हो। हे सोम ! मैं तुम्हें कर्मवान मनुष्यों के लिए बुलाता हूँ। मैं तुम्हें मनस्वी पितरों के लिए लाता हूँ। तुम इस यज्ञ को ऊँचा करके यज्ञ के सप्त होताओं को स्वर्गलोक में देवों के मध्य ले जाकर देवत्व प्राप्त कराओ।
हे सोम! तुम इन सब ऋषियों को अपना पुत्र समझ कर कृपा करो। हे सोम! सब प्राणी प्रणाम करते हुए तुम्हारे सामने उपस्थित हो। हे अग्नि! मेरी इस आहुति को पाकर आह्वान पर ध्यान दो। जल देवता, वाणी देवता भी हमारा आह्वान सुनें। हे ग्रावासमूह ! तुम अभिवर्षक कर्म के लिए आए हो। विद्वानजनों के समान एकाग्र मन से स्तुति (वन्दना) सुनो। हे सविता देव! तुम भी मेरे आह्वान पर ध्यान दो।
हे जल देवियों! तुम्हारी कल्लोल करती हुई लहर हव्य योग्य, बलवती और संतृप्त करने वाली है। तुम अपनी इस लहर को सोमपायी देवों को दो क्योंकि तुम देवताओं के ही भाग हो।
हे घृत! तुम पाप नाशक हो। हे जलो ! मैं तुम्हें वसतीवरी जलों की अक्षुणता के लिए ग्रहण करता हूँ। हे चमसस्थित जलों! इन वसतीवरी जलों से भली प्रकार मिलो। सभी औषधियाँ आपस में मिल जाएँ।
हे अग्नि! तुम जिस पुरुष की ओर युद्ध में भी रक्षा करती हो या जिसको सम्मुख तुम हवि ग्रहण करने के लिए गमन करते हो, वह पुरुष तुम्हारी कृपा दृष्टि से श्रेष्ठतम अन्न, धन पाता है।
हे उपांशु सवन! सविता देव की प्रेरणा से, अश्विनी कुमार की भुजाओं और पूषा के हाथों से तुम्हें ग्रहण करता हूँ। तुम कामनाओं को पूर्ण करने वाले हो, हमारे इस यज्ञ को सम्पूर्ण करो। तुम्हारे द्वारा इन्द्र के निमित्त प्रेम बढ़ाने वाला, बल सम्पन्न, स्वाद एवं मधु रस दूध में मिलाता हूँ। हे जलो! हमने तुम्हें भली प्रकार ग्रहण किया है। तुम देवताओं में प्रसिद्ध हो। तुम इस यज्ञ में मुझे आश्वस्त करो।
हे निग्राभ्य! मेरे हृदय को संतुष्ट करो। मेरी वाणी को तृप्त करो। मेरे नेत्र, कान, प्राण, पुत्र-पौत्र आदि सभी को भली-भाँति संतुष्ट करो। मेरे स्वजन कभी किसी कठिनाई में न पड़ें। हे सोम ! वसु, रुद्र और इन्द्र देवताओं के लिए तुम्हें परिमित करता हूँ। हे सोम ! तीसरे सवन के देवता, आदित्य और इन्द्रदेव के लिए मैं तुम्हें परिमित करता हूँ। हे सोम ! शत्रु हन्ता इन्द्रदेव के लिए तुम्हें परिमित करता हूँ। हे सोम ! सोम के लाने वाले श्येन रूप गायत्री के लिए तुम्हें परिमित करता हूँ। हे सोम ! धन की पुष्टि प्रदान करने वाली अग्नि के लिए तुम्हें परिमित करता हूँ।
हे सोम! तुम्हारी जो दिव्य ज्योति है, जो ज्योति अंतरिक्ष में है तथा जो ज्योति पृथ्वी पर है उस ज्योति से यजमान के इच्छित धनों की वृद्धि करो।
हे जलो ! तुम कल्याण करने वाले हो। तुम वृत्र के हनन (विरोध) करने वाले और अभीष्ट पूरक सोम के पालक हो। हे जलो! इस यज्ञ को तुम देवताओं को प्राप्त और पीने योग्य हो जाओ।
हे सोमों! प्रहारों से आघात होने पर भयभीत न होना, कम्पित न होना, तुम रस धारण करो। हे द्यावा-पृथ्वी! तुम सुदृढ़ हो, इस सोम सवन को भी दृढ़ करो। इस सोम रस की वृद्धि करो। अभिषवण प्रस्तर की चोट से सोम पतन नहीं होता, वह संस्कृत होता है और उससे यजमान के समस्त पाप समाप्त हो जाते हैं।
हे सोम! तुम अपने चारों दिशाओं में बिखरे हुए अंशों को एकत्र कर यहाँ आओ। हे माता ! अपने भागों द्वारा सोम को सम्पूर्ण करो। हम तुमसे सुसंगत होकर सब न्यूनता (कमी) को पूर्ण करें। इस यज्ञ को सभी प्राणी जान लें।
हे इन्द्र देव! तुम सर्वत्र प्राप्त, सर्व समृद्धि सम्पन्न, श्रेष्ठबली, सुख देने वाले और यजमान को हर्षित करने वाले हो। तुमसे अन्यत्र कोई सुखप्रद नहीं है। हे स्वामिन! तुम अपने आप ही कल्याण करने वाले हो, मैं यह बात कहता हूँ।
अध्याय (7) :: ऋषि :- गौतम, वशिष्ठ, मधुच्छन्दा, गृत्समद, त्रिसदस्यु, मेघातिथि, वत्सार, कश्यप, भरद्वाज, देवश्रवा, विश्वामित्र, त्रिशोक वत्स, प्रस्कण्व, कुत्सअंगिरस; देवता :- प्राण, सोम, विद्वांस, मधवा, ईश्वर, योगि, वायु, इन्द्र, वायु, मित्रा वरुणों, अश्विनी विश्वेदेवा प्रजापति, यज्ञ वैश्वानर यज्ञपति, इंद्रग्नि प्रजासेनापति, सूर्य, अन्तर्यामी जगदीश्वर, वरुण, आत्मा; छन्द :-अनुष्टुप, पंक्ति जगती, उष्णिक, त्रिटुष्प, बृहती, गायत्री।
हे सोम! तुम सभी कामनाओं का फल देने वाले हो। तुम अशुद्वय और हमारे हाथों द्वारा शोषित होते हुए वाचस्पति देव के लिए इन बर्तन में जाओ। हे सोम! तुम देवताओं के समान हो, अतः देवताओं की प्रसन्नता के लिए इस पात्र में आकर देव भाग हो जाओ।
हे सोम! हमारे अन्न को मृदु रस वाला और सुस्वाद बनाओ। हे सोम ! तुम्हारा जो नाम हिंसा रहित और चैतन्यशील है, तुम्हारे उस नाम के लिए हम यह अंशुद्वय पुनः देते हैं। देवता के स्नेह के लिए यह आहुति स्वाहुत हो। मैं इस महान अंतरिक्ष में विचरण करता हूँ।
हे उपांशु ग्रह! तुम सब इन्द्रियों से, सब पार्थिव (पृथ्वी) और दिव्य प्राणियों से स्वयं उत्पन्न हुए हो। मन प्रजापति तुम्हें मेरी ओर प्रेरित करें। तुम्हारा आविर्भाव प्रशंसित है। मैं तुम्हें सूर्य की प्रीति के लिए यह आहुति देता हूँ। इसे आप स्वीकार करें। हे लेप के पात्र ! मरीचि का पालन करने वाले देवताओं को संतुष्ट करने के लिए मैं तुम्हें माँजता (साफ करता हूँ। हे अंशुदेव! तुम तेजस्वी हो। मैं अपने शत्रु के निमित्त तुम्हारी वन्दना करता हूँ। वह शत्रु शीघ्र ही नाश को प्राप्त हो। हे उपांशग्रह ! प्राण देवता की वंदना के लिए मैं तुम्हें यहाँ स्थापित करता हूँ। हे उपांशु सवन ! व्यान (वायु) देवता की प्रसन्नता के लिए मैं तुम्हें यहाँ स्थापित करता हूँ।
हे सोमरस! तुम कलश में रखे जाते हो। हे इन्द्र देव! तुम इस कलश स्थित सोमरस को अन्तग्रह पात्र में रक्षित करो। शत्रु आदि से इसकी रक्षा करो। पशुओं की रक्षा करो और अन्न आदि प्रदान करो। हमारी सन्तान आदि समस्त यज्ञ करने वाली हो।
हे मधवन इंद्र! तुम्हारी दया से ये स्वर्ग और पृथ्वी का अंतः स्थापना करूँ।
विशाल अंतरिक्ष को स्वर्ण और पृथ्वी के मध्य स्थापित करता हूँ। पृथ्वी पर रहने वाले जीव और स्वर्ग में वास करने वाले देवताओं से तुम समान प्रेम रखने वाले हो। तुम अपने को प्रसन्न करो। हे पुराण रूप उपांशु ग्रह! सब इंद्रियों से, सब पृथ्वी पर रहने वाले और दिव्य (महान) प्राणियों से तुम आविर्भाव को प्राप्त हुए हो। मन रूप प्रजापति तुम्हें मेरी ओर प्रेरित करें। हे अंतर्याम ग्रह! मैं तुम्हें उपान देवता की प्रसन्नता के लिए यहाँ स्थापित करता हूँ।
हे अग्ने! शुद्ध पान करने वाले वायो ! तुम हमारे निकट आओ। तुम सर्वत्रलीन हो। तुम्हारे हजारों वाहन हैं। तुम अपने उन वाहनों के द्वारा हमारे पास आओ। हर्षकारक सोमरूप अन्न तुम्हारी सेवा में समर्पित करता हूँ। हे देव! तुमने जिस सोम का पहले पान धारण किया है, उसी सोम को हम तुम्हारे निकट लाते हैं। हे तीसरे ग्रह सोमरस । मैं तुम्हें वायु के स्नेह के लिए प्राप्त करता हूँ।
हे इन्द्र और वायो! यहाँ सोमरस तुम्हारे लिए ही अभिषुत हुआ है। इस रस रूप अन्न को पान करने के लिए तुम शीघ्र ही हमारे पास आओ क्योंकि तुम (सोम) पीने की हमेशा इच्छा रखते हो। हे तृतीय ग्रह सोमरस ! तुम वायु के निमित्त उपयाम पात्र में एकत्र किए गए हो। मैंने तुम्हें वायु और इन्द्र के निमित्त ग्रहण किया है।
हे इन्द्र और वायों! यह तुम्हारी जगह है। तुम्हें इन्द्र और वायु के स्नेह के लिए इस स्थान पर दृढ़ करता हूँ। हे सत्य की वृद्धि करने वाले मित्रा-वरुण देवों! तुम्हारी प्रसन्नता के लिए यह सोम निष्पन्न किया गया है। तुम हमारे इस यज्ञ में आकर आह्वान को सुनो। हे चतुर्थ ग्रह सोमरस! तुम मित्रा-वरुण नामक उपनाम पात्र में अटल रहो। मैं तुम्हें मित्रा-वरुण की हर्षिता के लिए प्राप्त करता हूँ।
अपने घर में जिस गौ के रहने से हम धन वाले होते हुए सुखपूर्वक रहते हैं तथा हवि प्राप्ति द्वारा जैसे देवता प्रसन्न होते हैं और तृणमूल आदि से गौ प्रसन्न होती है, वैसे ही प्रसन्न होकर हे मित्रावरुण! उस अन्य पुरुष को प्राप्त न होने वाली गाय को हमें सदा प्रदान करो। हे ग्रह! यह तुम्हारा उत्पत्ति स्थान है। तुम्हें मित्रावरुण देवताओं की प्रसन्नता के लिए इस स्थान में स्थापित करता हूँ।
हे अश्विद्वय! तुम्हारी जो वाणी ज्योति फैलाने वाली प्रशंसा से ओत प्रोत, प्रिय सत्य से परिपूर्ण हुई है, तुम अपनी उस वाणी के द्वारा इस यज्ञ को सिंचित करो। हे पंचम ग्रह! तुम अश्विनी कुमारों की हर्षिता के लिए इस उपयाम पात्र में प्राप्त किए गए हो। हे अश्विग्रह ! यह तुम्हारा जन्म स्थान है, मृदुवाणी परिपूर्ण मन्त्र उच्चारित करने वाले अश्विद्वय के लिए मैं तुम्हें दृढ़ करता हूँ।
हे इन्द्र! जिन यज्ञ अनुष्ठानों से बार-बार सोमरस का पान करके तुम सन्तुष्टि और वृद्धि को प्राप्त करते हो, उस महान यज्ञ में तुम कुशा के स्थान पर बैठने वाले, स्वर्ग को जानने वाले, शत्रुओं को भयभीत करने वाले, जीतने योग्य धनों को जीतने वाले यजमान को यज्ञ का फल प्रदान करने वाले तुम प्राचीन कालीन ऋषियों के समान, पूर्व प्रथा के अनुसार और सब ऋषि संतानों के समान तुम यज्ञ का फल देने वाले हो, हम तुम्हारी स्तुति करते हैं। हे शुक्र ग्रह ! तुम्हारा यह स्थान है, तुम इसमें स्थित होकर हमारे बल की रक्षा करो। असुर नेता का अपमार्जन हुआ है। हे ग्रह ! सोमपायी देवता तुम्हें आह्वनीय स्थान को प्राप्त करें। हे उत्तरवेदी श्रोणी! तुम हिंसा (वध) करने वाली नहीं हो अतः इस ग्रह को तुमसे कोई भय नहीं है।
हे ग्रह! तुम अतिउत्तम शक्ति वाले हो। इस यजमान के वीर पुत्र आदि को प्रकट करते हुए तरह-तरह के धनों की पुष्टि द्वारा कृपा दृष्टि करो और यहाँ पधारो। हे शुक्रग्रह! तुम अपने शुद्ध तेज से पृथ्वी और स्वर्ग से सुसंगत होते हुए चमकते हो। शण्ड नामक राक्षस दूर हो गया। हे यूप! तुम शुक्र ग्रह के अधिष्ठान रूप हो।
हे सोम! तुम अखंडित विभाजित और उत्तम पराक्रम से परिपूर्ण हो। हम तुम्हारी दयावृष्टि से हमेशा दानशील रहें, समस्त ऋत्विजों द्वारा वरणीय यह अभिवषण क्रिया इन्द्र के निमित्त की जाने से सर्वश्रेष्ठ है। संसार का उत्पत्ति कारण होने से वरुण, मित्र, अग्नि का यह सोम अनुगामी है।
वे महान मेधावी बृहस्पति देवों में प्रमुख हैं। उन इन्द्रदेव के लिए इस निष्पन सोमदेव की आहुति दी जाती है। यह आहुति भली-भाँति ग्रहित हो। जो मृदु स्वादिष्ट सोम की कामना करने वाले देव सोम से ही हर्षित होते हैं। वे छन्दों के अभिमानी सोमपान करके सन्तुष्ट हों। जिस कारण सोम इस कार्य में प्रयुक्त हुए हैं, वह कारण देवों का सोम रस पान है। इससे देव हर्षित और प्रसन्न हुए हैं। शुक्र ग्रह हवन सम्पन हो गया। यह महान आभा से ज्योतिमान अनुपमेय चन्द्रमा जल की वर्षा करने वाला है। मेधावीजन सूर्य से जल के मिलने के समान इस सोम की शिशु के समान स्तुति करते हैं। हे सप्तम ग्रह तुम उपयाम पात्र द्वारा ग्रहण किए गए हो। असुर के निमित्त में तुम्हें स्थापित करता हूँ।
श्रेष्ठ कर्म करने वाले पुरुष उत्साहपूर्वक कार्य करते हुए अपने हृदय को लगाए रहते हैं, वह हाथों में अटल इस सोमदेव को उंगलियों द्वारा सभी ओर से सत्तू में मिश्रित करते हैं। हे मन्थिग्रह! यह तेरी जगह है। तू यहाँ वास कर इस यजमान की संतति युक्त सुरक्षा करो। राक्षस उपमार्जित हो गया। हे मन्धिग्रह! पान करने वाले देवता तुम्हें यज्ञ स्थान में पावें। हे वेद श्रेणी! तुम हिंसा न करने वाली हो।
हे सुप्रजारूप ग्रह! तुम यजमान को अपत्यवान करते हुए धन की वृद्धि के लिए यजमान के समक्ष जाओ। हे मन्धि ग्रह अपने तेज से स्वर्ग और पृथ्वी से शोभित होकर यूप की रक्षा करता है। मर्क नामक असुर दूर हुआ। यूप! तुम मन्धि ग्रह के अधिष्ठान हो। हे विश्वेदेवो! तुम अपनी महिमा से स्वर्ग में ग्यारह हो और महान होने से पृथ्वी पर बारह हो जाते हो। तुम अंतरिक्ष में भी ग्यारह ही रहते हो। तुम इस कार्य को स्वीकार करो।
हे ग्रह! तुम उपयाम पात्र में स्थित हो। तुम आग्रयण नाम से उत्तम होते हुए इस बज्ञ की रक्षा करो और इस यजमान की भी रक्षा करो। यज्ञ के अधिपति विष्णु अपनी महिमा से तुम्हारी रक्षा करें और तुम भी यज्ञस्वात्र विष्णु के रक्षक हो। तुम इस यज्ञ के तीनों सवनों की भली-भाँति रक्षा करो। यह सोम ब्राह्मणों की प्रीति के पात्र होने के निमित्त क्षरित होता है। यह सोम क्षत्रिय जाति का प्रिय होने के लिए ग्रह पात्र में क्षरित होता है। यह सोम इस अभिषवकारी यजमान के लिए क्षरित होता है। यह अन्न वृद्धि, क्षीरादि (द्रव्य पदार्थ) वृद्धि कामना की पूर्ति के लिए ब्रीहि धान्य आदि की वृद्धि के लिए क्षरित होता है। यह सोम अपने क्षरण द्वारा स्वर्ग और पृथ्वी को परिपूर्ण करता और तीनों लोकों में उत्पन्न प्राणियों की मनोकामना सफल करता है। सभी कल्याणों के लिए यह सोम ग्रह पात्र में क्षरित होता है। हे अग्रायण ! सब देवताओं को प्रसन्न करने के लिए मैं तुम्हें ग्रहण करता हूँ। हे ग्रह ! यह तुम्हारा स्थान है। हे सोम! तुम उपयाम पात्र में एकत्र हुए हो। हे उपग्रह तुम्हें मित्रा-वरुण के लिए तृप्तिकर जानता हुआ ग्रहण करता हूँ। है बृहत् सोम के प्रिय पात्र सोम ! तुम्हें इन्द्र की प्रसन्नता के लिए ग्रहण करता हूँ। हे इन्द्र! तुम्हारा जो महान सोमरस रूपी खाद्य पदार्थ है उसे पीने के लिए मैं तुम्हारी स्तुति, वंदना करता हूँ। हे सोम! मैं तुम्हें भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए ग्रहण करता हूँ। हे उक्थ ग्रह! तुम्हारा यह स्थान है। उक्थ से प्रेम करने वाले देवताओं की प्रसन्नता के लिए मैं तुम्हें स्थापित करता हूँ। मैं तुम्हें मित्र, वरुण आदि देवताओं के लिए प्रिय समझकर देवगण की तृप्ति के निमित्त ग्रहण करता हूँ तथा यज्ञ की समाप्ति पर फल मिलने तक अथवा यजमान के दीर्घ जीवन के लिए ग्रहण करता हूँ।
हे सोमांश! तुम्हें देवों को तृप्त करने वाला मानकर, मित्रावरुण की हर्षिता के लिए तथा यज्ञ के विघ्न रहित पूर्ण होने के लिए मैं प्राप्त करता हूँ। देवों की सन्तुष्टि का साधन मानकर इन्द्रादि देवों की हर्षिता प्राप्ति के लिए यज्ञ की बाधा रहित सम्पन्नता के लिए मैं तुम्हें प्राप्त करता हूँ। मैं तुम्हें देवों को तृप्त करने वाला समझता हुआ इन्द्रदेव और अग्नि देव की यज्ञ की बाधा रहित पूर्णता के लिए प्राप्त करता हूँ। देवों की सन्तुष्टि वाला समझकर इन्द्र देव और वरुण देव के स्नेह हेतु तथा यज्ञानुष्ठान को निर्विघ्न पूर्णता के लिए मैं तुम्हें प्राप्त करता हूँ। देवों की तृप्ति का निवारण रूप मानकर इन्द्रदेव और बृहस्पति देव के स्नेह हेतु तथा यज्ञ की निर्विघ्न समाप्ति हेतु मैं तुम्हें प्राप्त करता हूँ। देवों की तृप्ति करने वाला जानकर इन्द्रदेव और विष्णुदेव की संतुष्टि के लिए और यज्ञ को बिना रुकावट पूर्ण करने के लिए मैं तुम्हें प्राप्त करता स्वर्ग के मूर्द्ध रूप सूर्य प्रकाशित पृथ्वी की पूर्ति स्वरूप, वैश्नावर इस यज्ञ रूप सत्य में दो अरणियों द्वारा उत्पन्न होकर तेजस्वी क्रांतदर्शी, ज्योतिर्मानों में सम्राट, यजमान आदि के अतिथि हव्य द्वारा सुसम्मानित अग्नि देव को देवताओं ने चमस पात्र द्वारा प्रकट किया है।
हे सोम! तुम उपयाम पात्र में रखे गए हो। तुम दृढ़ वास करने वाले समस्त ग्रह नक्षत्रों से अत्याधिक स्थिर और अच्युतों में अच्युत हो। तुम ध्रुव नाम से प्रसिद्ध हो। मैं तुम्हें सभी मनुष्यों के हितार्थ देवता की हर्षिता के लिए इस स्थान पर विराजमान करता हूँ। दृढ़ हृदय और वाणी द्वारा मैं इस सोम को चमस में डालता हूँ। फिर इन्द्र. देवता ही हमारे पुत्र आदि को दृढ़ बुद्धि और शत्रुओं से शून्य करें।
हे सोम! तुम्हारा जो रस पात्र में डालते हैं, वह पृथ्वी पर गिर जाता है और तुम्हारे जो अंश पाषाणों द्वारा कूटते समय इधर-उधर छिटकते हैं तथा जो तुम्हारा रस अभिषवण झलक के बीच में बहता है अथवा अर्ध्वयु आदि द्वारा निष्पन्न करने में नष्ट होता है, हे सोम ! तुम्हारे वे सब भाग मन के द्वारा ग्रहण कर स्वाहाकार पूर्वक अग्नि में अर्पित करता हूँ। हे चत्वाल! तुम देवताओं के स्वर्ग जाने के लिए सोपान रूप हो। हे उपांशु ग्रह! तुम जिस प्रकार तेज प्रदान करने वाले हो, उसी प्रकार मेरे हृदय में स्थित प्राणवायु में तेज वृद्धि करने वाले हो। हे उपांशु सवन ! तुम्हारा स्वभाव ही तेज प्रदान करने वाला है। मेरे प्राण तेज बुद्धि के लिए प्रयत्नशील हों। हे अंतर्याम ग्रह ! जिस प्रकार तुम अपने स्वभाव से तेज प्रदान करने वाले हो वैसे ही मेरी तेज-वृद्धि की कामना करो। हे इन्द्र वायव ग्रह ! तुम स्वभाव से ही तेज प्रदाता हो, मेरी कार्य कुशलता और अभिष्ट संबंधी क्रांति बढ़ाओ। हे आश्विन ग्रह! तुम तेजदाता स्वभाव वाले हो, मेरी श्रोत्रेन्द्रिय को तेजस्वी करो। हे शुक्र और मंथिग्रह! तुम तेज स्वभाव वाले हो, मेरी नेत्र ज्योति की वृद्धि करो। हे आसयण ग्रह ! तुम स्वभाव से ही कांतिदाता हो। मुझे आत्मतेज दो। हे उक्थ ग्रह! तुम स्वभाव से ही तेजदाता हो, मुझे बल सम्बन्धी तेज दो। हे ध्रुव ग्रह! तुम स्वभाव से ही तेज प्रदान करने वाले हो। मेरी आयु को तेजोमय करो। हे आह्वानीय ग्रह! तुम स्वभाव से तेज देने वाले हो, सबको तेज प्रदान करो।
हे आग्रयण ग्रह! तुम स्वभाव से ही क्रान्तिदाता हो। मुझे आत्मतेज प्रदान करो। हे उक्थ ग्रह ! तुम स्वभाव से ही तेजप्रद हो, मुझे शक्ति सम्बन्धी तेज प्रदान करो। हे ध्रुव ग्रह! तुम स्वभाव से ही तेजप्रदान करने वाले हो, मेरी आयु को तेजोमय करो। हे आह्वानीय ग्रह! तुम स्वभाव से ही तेज प्रदान करने वाले हो। मेरी आयु को तेजोमयी बनाओ। हे आह्वानीय ग्रह! तुम स्वभाव से ही तेज प्रदान करने वाले हो, समस्त प्राणधारियों को तेज प्रदान करो।
हे द्रोण कलश! तुम प्रजापति हो। तुम अनेकों में से कौन से हो? तुम किस प्रजापति के हो? तुम्हारा नाम क्या है? हम तुम्हारे उस नाम को जानें। हम तुम्हें समझकर सोम से युक्त कर चुके हैं। यदि तुम वही हो तो हमारे अभिष्ट पूर्ण कर हमारे नाम को विख्यात करो। हे अग्ने ! वायु और सूर्य ! मैं तुम्हारी कृपा दृष्टि पाकर सुन्दर संतान वाला होकर यश को ग्रहण करूँ। मैं पराक्रमी पुत्रों वाला होकर प्रसिद्ध हुआ हूँ। मैं श्रेष्ठ धन से सम्पन्न होकर विख्यात हुआ हूँ।
हे प्रथम ऋतु ग्रह! तुम उपयाम पात्र में प्राप्त किए गए हो। चैत्र मास की मृदुता की इच्छा करता हुआ मैं तुमको प्राप्त करता हूँ। हे दूसरे ऋतु ग्रह! तुम उपयाम पात्र में ग्रहण किए गए हो। मैं वैशाख माह की तृप्ति के लिए तुम्हें प्राप्त करता हूँ, हे तीसरे ऋतु ग्रह! तुम उपयाम पात्र में ग्रहण किए गए हों। मैं ज्येष्ठ महीने की तृप्ति के लिए तुम्हें प्राप्त करता हूँ। हे चौथे ऋतु ग्रह ! तुम उपयाम पात्र में प्राप्त किए गए हो। मैं तुम्हें आषाढ़ महीने को तृप्ति के लिए प्राप्त करता हूँ। हे पंचम ऋतु ग्रह! तुम उपयाम पात्र में प्राप्त किए गए हो। मैं तुम्हें श्रावण महीने की तृप्ति के लिए प्राप्त करता हूँ। हे छठे ऋतु ग्रह! तुम उपयाम पात्र में प्राप्त किए गए हो। मैं तुम्हें भादों माह की तृप्ति के लिए प्राप्त करता हूँ। हे सप्तम् ऋतु ग्रह! तुम उपयाम पात्र में प्राप्त किए गए हो। मैं तुम्हें आश्विन महीने की तृप्ति के लिए प्राप्त करता हूँ। हे अष्टम ऋतु ग्रह! तुम उपयाम पात्र में प्राप्त किए गए हो, मैं तुम्हें कार्तिक माह में ईख, अन्न, ऊर्जा आदि के लिए प्राप्त करता हूँ। हे नवम् ऋतु ग्रह! तुम उपयाम पात्र में प्राप्त किए गए हों, मैं तुम्हें मार्गशीर्ष माह की सन्तुष्टि के लिए प्राप्त करता हूँ। हे दसवें ऋतु ग्रह! तुम उपयाम पात्र में प्राप्त किए गए हो। मैं तुम्हें पौष माह की तृप्ति हेतु प्राप्त करता हूँ। हे एकादश ऋतु ग्रह ! तुम उपयाम पात्र में प्राप्त किए गए हो। मैं तुम्हें माघ महीने की संतुष्टि के लिए प्राप्त करता हूँ। हे द्वादस ऋतु ग्रह! मैं तुम्हें फाल्गुन महीने की तृप्ति के लिए ग्रहण करता हूँ। हे त्रयोदश ग्रह! तुम उपयाम पात्र में प्राप्त किए गए हो। तुम्हें पाप के स्वामी अधिक महीने की तृप्ति के लिए ग्रहण करता हूँ।
हे इन्द्र और अग्नि ! तुम भी इस प्रकार आर्यषिक्त किए गए हो। तुम ऋक, साम और यजु मंत्रों द्वारा आदित्य के समान स्तुति योग्य हो। अतः सोमपान के निमित्त आगमन करो। तुम यजमान की वंदना से प्रसन्न होकर अपने भाग को ग्रहण करो। हे चौबीसवें ग्रह! तुम उपयाम पात्र में ग्रहण किए गए हो। मैं तुम्हें इन्द्र और अग्नि देवताओं की प्रीति के निमित ग्रहण करता हूँ। हे इन्द्र और अग्नि ! तुम्हारा यह स्थान है। इन्द्र अग्नि की प्रसन्नता के निमित मैं तुम्हें यहाँ प्रतिष्ठित करता हूँ।
जो यजमान अग्निदेव के अभिलाषित सोम आदि द्वारा यज्ञ करते और कुशा बिछाते हैं, वे इन्द्रदेव को अपना मित्र मानते हैं। हे ग्रह! तुम उपयाम पात्र में ग्रहित हो, अग्नि और इन्द्र देवता के लिए तुम्हें प्राप्त करता हूँ। हे इन्द्रदेव और अग्नि देव सम्बन्धी ग्रह! तुम्हारा यह स्थान है। इन देवों की हर्षिता के लिए मैं तुम्हें स्थित करता हूँ।
हे विश्वे देवो! हमारे यज्ञ में आगमन करो। मेरे इस आह्वान को सुनो। तुम इस  वृद्धित होते हुए इन्द्रदेव यजमानों द्वारा उपासित होकर हमारे बल में वृद्धि करें। हे चतुर्थ ग्रह! तुम उपयाम पात्र में गृहीत हो, मैं तुम्हें श्रेष्ठ इन्द्र देव की हर्षिता के लिए ग्रहण करता हूँ। हे महेन्द्र ग्रह! यह जगह तुम्हारी है, श्रेष्ठ इन्द्र देव के स्नेह के लिए तुम्हें यहाँ अव्यवस्थित करता हूँ।
जो इन्द्र महान हैं, अपने तेज से तेजस्वी हैं, वे वृष्टिकारक मेघ के समान वत्सल और यजमान की स्तुतियों द्वारा प्रबल होते हैं। हे ग्रह! तुम उपयाम पात्र में गृहीत हो, तुम्हें इन्द्र की प्रीति के निमित तुम्हें यहाँ स्थापित करता हूँ।
सूर्य देवता किरणों के समूह वाले समस्त पदार्थों के ज्ञानवान, दिव्य तेज वाले हैं। समस्त जगत में प्रकाशमय के लिए उनकी रश्मियाँ उर्ध्व वहन करती हैं। यह हवि उनको स्वाहुत हो।
वह अदभुत सूर्य अखण्ड ज्योति किरणों के पुंज रूप है। वे मित्र, वरुण और अग्नि के चक्षु के समान प्रकाशमान हैं। स्थावर जंगम रूप विश्व की आत्मा और संसार को प्रकाशित करने वाले वे सूर्य उदित होकर स्वर्ग, पृथ्वी और अन्तरिक्ष को अपने तेज से परिपूर्ण करते हैं। यह आहुति सूर्य के निमित्त स्वीकार हो।
हे अग्नि! तुम समस्त मार्गों के ज्ञाता हो। हम अनुष्ठान करने वालों को ऐश्वर्य के निमित्त सुंदर मार्ग से प्राप्त कराओ। कर्म में बाधा रूप पाप को दूर करो। हम तुम्हारे निमित्त नमस्कार युक्त हवन सामग्री रूप का वचन सम्पादन करते हैं।
यह अग्नेि हमें धन प्रदान करे। रण भूमि में हमारी शत्रु सेनाओं को अलग थलग करें। द्वेषी के अधिकार में जो अन्न है उसे हमें ग्रहण कराएँ। यह द्वेषियों पर विजय ग्रहण करें। यह आहुति स्वाहुत हो। हे दक्षिणा रूप गौओं। मैंने तुम्हारे रूप को प्राप्त किया है। सर्वज्ञ ब्रह्म तुम्हें बाँटकर ऋत्विजों को दें। तुम यज्ञ मार्ग से जाओ। हे दक्षिणा रूप गौओं। हम तुम्हें पाकर स्वर्ग के देवयान मार्ग को देखते हैं और अंतरिक्ष के पितृयान मार्ग को देखते हैं। हे ऋत्विजों! सब सभासदों को यथा भाग पूरा होने पर भी कुछ गौएँ दक्षिणा से बची हों तो ऐसा कर्म करो।
मैं आज यशस्वी पिता वाले और सर्वमान्य पितामह वाले ऋषियों में प्रसिद्ध ऋषि और मंत्रों को जाने वाले सभी गुणों से परिपूर्ण ब्राहाण को प्राप्त करूँ। जिनके पास सम्पूर्ण स्वर्ण दक्षिणा एकत्र की जाएँ। हे सम्पूर्ण दक्षिणा! हमारे द्वारा प्रदत्त तुम देवताओं द्वारा अधिष्ठित ऋत्विजों के पास जाओ और देवगणों को सन्तुष्ट कर, दक्षिणादाता यजमान को उसे यज्ञ का फल प्राप्त करने के लिए प्रवेश करो।
हे स्वर्ण! अग्नि रूप को प्राप्त हुए वरुणदेव मुझे दो। इस प्रकार प्राप्त स्वर्ण मुझे रोगनाशक प्रदान करें। हे स्वर्ण! तुम दाता की आयु को बढ़ाओ। मैं भी सुखी होऊँ। हे गौ। रूद्र रूप वरुण तुम्हें मुझको दें। गौ प्राप्त करने वाला मैं आरोग्य प्राप्त करूँ। हे गी! तुम दाता के प्राण बल को बढ़ाओ और मुझ प्रति ग्रह वाले की आयु वृद्धि करो। हे परिधान! बृहस्पते रूप त्ररुण तुम्हें मुझको दे रहे हैं। मैं तुम्हें पाकर अमर हो जाऊँ। तुम दाता की त्वचा को सुदृढ़ करो और मुझ प्रति गृहिता के लिए सुख की वृद्धि करो। हे अश्व! यम रूप वरुण ने तुम्हें मेरे लिए दिया है। मैं तुम्हें पाकर आरोग्य को प्राप्त करूँ। तुम दाता के लिए अश्वों की वृद्धि करो और मुझ प्रतिगृहीता के लिए भी पशुओं आदि की वृद्धि करो।
किसने दान दिया? किसको दान किया? यज्ञ फल रूपी इच्छा के लिए दान किया। अभिलाषा ही दान करने वाली है। इच्छा ही प्रतिग्रहीता है। हे अभिलाषा! ये सभी काम्य वस्तुएँ तुम्हारी ही तो हैं।
अध्याय (8) :: ऋषि :- अंगिरसः, कुत्सः, भरद्वाजः, अत्रि, शनुः, शेषः, गौतमः, मेधातिथिः, मधुच्छन्दाः, विवस्वान, बैरवानसः, प्रस्कण्वः, कुसुरुबिन्दुः, शासः, देवाः, वशिष्ठः, कश्यपः; देवता :- बृहस्पतिस्सोमः, गृहपतिर्मधवा, आदित्यो गृहपतिः, गृहपतयः, सविता गृहपतिः, विश्वेदेवा गृहपतयः, गृहपतयो विश्वेदेवाः दम्पति, परमेश्वरः, सूर्य, इन्द्रः, ईश्वरसभेशौ राजानौ, विश्व कर्मेन्द्रः, प्रजाप्रतयः यज्ञ; छन्द :- पंक्ति, जगती, अनुष्टुप गायत्री, बृहती, उष्णिक, त्रिष्टुप।
हे सोम! तुम उपयाम पात्र में गृहीत हो। हे सोम ! तुम्हें आदित्यगण की प्रसन्नता के लिए ग्रहण करता हूँ। हे महान स्तुतियों को प्राप्त करने वाले विष्णु ! यह सोम तुम्हारी सेवा में समर्पित है, तुम इस सोमरस की रक्षा करो। रक्षा करने में प्रवृत्त हुए तुम पर राक्षस आक्रमण न करें।
हे इन्द्रदेव ! तुम्हारा हिंसा कृत्य करने का स्वभाव नहीं है। तुम यजमान द्वारा प्रदान हवि के समक्ष आकर सेवन करते हो। हे इन्द्रदेव! तुम्हारा हवि रूप दान तुम्हीं से सम्बन्धित होता है। हे ग्रह! तुम्हें आदित्य के स्नेह के लिए प्राप्त करता हूँ।
हे आदित्य! तुम आलस्य कभी नहीं करते। देवताओं और मनुष्यों, दोनों की रक्षा करते हो। तुम्हारा पराक्रम माया से रहित, अविनाशी और विज्ञानमय आनन्द वाला है, वह सूर्य मंडल (सौरमंडल) में प्रतिष्ठित है। हे ग्रह! मैं तुम्हें आदित्य की प्रसन्नता के लिए ग्रहण करता हूँ।
आदित्य के स्नेह के लिए यज्ञ आता है। इसलिए हे आदित्यों! तुम हमारा कल्याण करने वाले बनो। तुम्हारी मंगलप्रद मति हमें ग्रहण हो। पापियों का भी धन को प्राप्त करने वाली मति हमारे अभिमुख हो। हे सोम! आदित्य स्नेह के लिए तुम्हें प्राप्त करता हूँ।
हे सूर्य! तुम अंधकार का नाश करने वाले हो। पात्र में स्थित यह सोम तुम्हारे पीने योग्य है। इसलिए तुम इसको पीकर प्रसन्नता को प्राप्त हो। हे कर्मवान पुरुषों! तुम आशीर्वाद प्रदान करने वाले हो। अपने इस अशीर्वचनों में विश्वास करो, जिससे यह यजमान दम्पत्ति वरणीय यज्ञ के फल को प्राप्त कर सकें और इस यजमान को पुत्र की प्राप्ति हो। इसका वह पुत्र ऐश्वर्य को प्राप्त करे और प्रतिदिन वृद्धि को प्राप्त करता हुआ पाप तथा ऋण आदि से मुक्त रहता हुआ उत्तम घर में रहे। हे सर्वप्रेरक सविता देव! आज हमारे लिए वरणीय फल को प्रेरित करो। आने वाले दिनों में भी हमें यज्ञ फल प्रदान करो। इस तरह प्रतिदिन हमें यह फल प्रदान करते हुए भजन योग्य स्थायी सिद्धि के श्रद्धामयी बुद्धि को भी हमें प्राप्त कराओ, जिससे हम यज्ञ का उत्तम फल भोगने में सब प्रकार से सक्षम बनें।
हे सोम! तुम उपयाम पात्र में प्राप्त किए गए हो। तुम सविता देव से संबंधित हो और तुम अन्न को धारण करने वाले हो। अतः मुझे भी अन्न प्रदान करो। मुझे यज्ञ फल प्रदान करो। यजमान से और मुझसे, दोनों से प्रीति करो। मैं समृद्धि से सम्पन्न, सर्वोत्पादक सवितादेव के लिए तुमको प्राप्त करता हूँ। हे महावैश्वदेव ग्रह ! तुम उपयाम पात्र में गृहीत हो। तुम भली प्रकार पात्र में दृढ़ और सुख के शरण रूप समान हो। संसार के रचनाकार और अत्यंत सेवन समर्थ प्रजापति के लिए यह अन्न है। मैं तुम्हें विश्वदेवों की खुशी के लिए ग्रहण करता हूँ।
हे सोम! तुम दिव्य हो। तुम उपयाम पात्र में ग्रहण किए गए हो। अतः ब्राह्मण, ऋत्विजों आदि द्वारा निष्पन्न हुए तुम्हें, तुम्हारे रस युक्त बल को, अन्य ग्रहों को मैं पत्नी के सहित समृद्ध करता हूँ। परमात्मा रूप होकर मैं ही स्वर्ग जैसे उत्तम लोकों में और पृथ्वी में भी स्थित हूँ। जो अंतरिक्ष लोक है वही मुझ देह धारी का पिता के समान पालन करने वाला है। परम रूप होकर ही जो हृदय रूप गुहा अत्यंत गोपनीय है वह मैं ही हूँ।
हे अग्ने! तुम त्वष्टा देव युक्त सोमपान करो। यह आहुति स्वाहुत हो। हे उदगाता ! तुम प्रजा पालक हो, वीर्यवान हो। तुम्हारी कृपा दृष्टि से मैं पुत्रवान होकर बलशाली पुत्र को प्राप्त करूँ।
हे पंचम ग्रह! तुम उपयाम पात्र में ग्रहीत हो। तुम हरे रंग वाले सोमरूप हो। मैं ऋग्वेद और सामवेद के स्नेह के लिए तुम्हें प्राप्त करता हूँ। सोम से परिपूर्ण धान्यो ! तुम इन्द्र देव के दोनों हर्यश्व के लिए इस ग्रह में मिलते हो।
हे सोम से सिक्त धान्य ! यजुर्वेद के मंत्रों द्वारा कामना किए और ऋक मंत्रों द्वारा स्तुतीय, सोम के उक्थों द्वारा प्रबुद्ध, तुम्हारे सेवन का जो फल अश्वों और गौओं को देने वाला है। तुम्हारे उस फल को भक्षण करने की इच्छा करता हुआ मैं तुम्हारा भक्षण करता हूँ।
हे शक्ल! अग्नि में अर्पित करने योग्य तुम, देवों के लिए यज्ञ आदि कार्य से अलग रहने के कारण उत्पन्न पाप को दूर करने वाले हो। हे काष्ठखण्ड! मनुष्यों द्वारा किए गए विद्रोह और निन्दा आदि पापों को दूर करते हो। हे काष्ठखण्ड ! पितरों के लिए श्राद्ध आदि कर्म न करने के कारण उत्पन्न पाप को तुम शांत करते हो। हे काष्ठ खण्ड ! तुम समस्त प्रकार प्राप्त हुए पाप दोषों से मुक्त करने वाले हो। मैंने जो पाप जानते हुए तथा जो पाप अनजाने मे किए हैं, उन सब पापों को तुम नष्ट कर देते हो। इसलिए मेरे सब प्रकार के पापों को दूर करने की कृपा करो।
हम आज ब्रह्मतेज से सम्पन्न होते हुए दूध आदि रस को प्राप्त करें और कर्म करने वाले शरीर को प्राप्त करें। त्वष्टा (त्वचा) देव हमें धन प्राप्त कराएँ और मेरे शरीर में जो कमी हो, उसे निकाल दें।
हे इन्द्र देव! तुम समृद्विशाली हो। हमें अति उत्तम हृदय वाला करो, हमें गवादि धन ग्रहण कराओ। हमें उत्तम विद्वानों से परिपूर्ण करो और उत्कृष्टमय कल्याण प्रदान करो। तुम परब्रह्म सम्बन्धी ज्ञान से परिपूर्ण करते हो। जो कार्य हमारे द्वारा देवताओं के लिए किया गया है और जो कार्य देवों की कृपा मति ग्रहण कराता है, वह यज्ञ रूप कार्य तुम्हारे लिए हो।
ब्रह्मतेज से परिपूर्ण होकर हम दूध, दही, घृत आदि रसों को प्राप्त करें और कर्म करने वाली देह से पूर्ण हो। त्वचा देव हमें ऐश्वर्य प्राप्त कराते हुए हमारे शरीर के दोष को पूर्ण करें।
दानशील धाता, सर्वप्रेरक सविता, निधियों के पालक, प्रजापति, ज्योतियुक्त अग्नि, त्वष्टादेव और भगवान विष्णु हमारी हवि को प्राप्त करें। यही देवता यजमान के पुत्र-पौत्र आदि के साथ हर्षित हुए यजमान को धन दें और यह आहुति भली-भाँति स्वीकार हो।
हे देव गण! इस यज्ञ के सेवन करने हेतु तुमने यहाँ आगमन किया है। तुम्हारे स्थानों को हमने सुख देने योग्य कर दिया है। हे देवताओं! तुम सब निवास करने वाले हो। यज्ञ के सम्पूर्ण होने पर जो रथ में बैठते हो, वे अपने हव्य को रथ में रखकर और जिनके पास रथ नहीं हैं, वे स्वयं ही आकर उसे ले जाएँ और हमारे लिए उत्तम धनों को धारण करें। यह आहुति स्वीकार हो।
हे अग्नि देव! तुम जिस हवि की अभिलाषा करने वाले देवों को बुलाकर लाए थे, उन देवों को अपने-अपने स्थान पर पहुँचाओ। हे देवताओं! तुम समस्त पुरोडाशादि का भक्षण करते हुए सोमपान कर संतुष्ट हुए इस यज्ञ के पूर्ण होने पर प्राण रूप वायु मंडल में, सूर्य मंडल में या स्वर्ग में शरण धारण करो। हे अग्ने ! इस प्रकार उनसे कहकर उन्हें अपनी-अपनी जगह को भेजो। यह आहुति स्वाहुत हो।
हे अग्नि! इस स्थान में हमने जिस कारण वरण किया था, यज्ञ के प्रारम्भ होने पर वह कारण देवताओं का आह्वान करना था। इसी कारण इस यज्ञ को सुदृढ़ करते हुए उसे पूर्ण कराया। अब तुम यज्ञ को बिना किसी बाधा के सम्पूर्ण हुआ मानकर अपने स्थान को प्रस्थान करो। यह आहुति स्वीकार हो।
हे यज्ञ के जानने वाले देव गण! तुम हमारे यज्ञ में आगमन करो और यज्ञ से संतुष्ट होकर अपने मार्ग से विचरण करो। हे हृदय के सुधारक परमात्मा देव ! इस यज्ञ अनुष्ठान को तुम्हें अर्पित करता हूँ। तुम इसे वायु देवता में दृढ़ करो।
हे यज्ञ तू सुफल (सब फलों के स्वामी) विष्णु की ओर जाओ और फल देने के लिए यजमान की ओर प्रस्थान करो। अपने कारण भूत वायु की ओर जा। यह आहुति भली प्रकार स्वीकार हो। हे यजमान ! तेरा यह भली प्रकार अनुष्ठान किया हुआ यज्ञ ऋग्वेद और सामवेद के मंत्रो वाला है और पुरोडाश आदि से सम्पूर्ण है। तुम उस यज्ञ के फल में भोग को प्राप्त हो। यह आहुति स्वाहुत हो।
हे रज्जू रूप मेखला! तुम जल में गिरकर सर्प की आकृति जैसा रूप हो जाना। हे कृष्ण विषाण! तुम अजगर सर्प की आकृति जैसी न होना। हे अग्ने ! तुम्हारा अपान्नपात नामक मुँह है, उसे जलों में प्रवेश करो। उस जगह के यज्ञ में राक्षसों के द्वारा उपस्थित विघ्नों से हमारी सुरक्षा करते हुए समिधा सहित घृत से मिश्रित हो। हे अग्ने ! तुम्हारी जिह्वा घृत प्राप्त करने के लिए उद्यत हो।
हे सोम! तुम्हारा जो हृदय समुद्र के जल में दृढ़ है, मैं तुम्हें वहीं भेजता हूँ। तुम में औषधियाँ और जल प्रवेषित हो। तुम यज्ञ के पालनकर्त्ता हो। हम तुम्हें यज्ञ में उच्चारित किए जाने वाले नमस्कार आदि संकल्पों में विद्यमान करते हैं। यह आहुति स्वाहुत हो।
हे दिव्य गुणवाले जलों! यह सोम कुंभ (कलश) तुम्हारा स्थान है। तुम इसे वृद्धि प्रदान करते हुए भली प्रकार धारण करो। हे सोम ! तुम्हारा यह स्थान रूप है। तुम दसमें स्थापित होकर कल्याण करने वाला हवन करो। और हमारे सब दुःखों को दूर कर हमारी रक्षा करो।
हे अवभृथ यज्ञ! तुम तेज गति वाले हो, किन्तु अब धीमी चाल से विचरण करो। हमारे द्वारा जो पाप देवों के प्रति हो गया है, वह हमने जल में छोड़ दिया है। हमारे ऋत्विजों द्वारा यज्ञ देखने के लिए आए हुए मनुष्यों की जो अवज्ञा हो गई है, उससे उत्पन्न पाप भी जल में छोड़ दिया है। तुम अत्यन्त विरोध फलवाली हिंसा से हमारी रक्षा करो। तुम्हारी कृपा दृष्टि से हम किसी प्रकार के पाप के हिस्सेदार न रहें। देवों से सम्बन्धित समिधा ज्योतिर्मान होती है। दस माह पूर्ण होने पर यह गर्भ जरायु युक्त चलायमान हो। जैसे यह वायु कम्पित होती है, और समुद्र की लहरें जैसे कम्पित होती हैं, वैसे ही दस महीने का यह पूर्णतः गर्भ वेष्ठन युक्त गर्भ से बाहर आए।
हे सुंदर लक्ष्णवाली नारी! तेरा गर्भ यज्ञ से संबंधित है। तेरा गर्भ स्थान स्वर्ण के समान शुद्ध है। जिस गर्भ के सभी अवयव अखंडित, कठोर और उत्तम हैं, उस गर्भको मंत्र द्वारा भली प्रकार माता से मिलता हूँ। यह आहुति स्वीकार हो।
बहुत दान देने वाले, बहुत रूप वाला, उदर में दृढ़ मेधावी गर्भ महिला को प्रकट करो। इस प्रकार से गर्भवती माँ की एक पदवाली, दो पदवाली, त्रिपदी, चतुष्पदी और चारों वर्णों से प्रशंसित, चारों आश्रम से परिपूर्ण इस प्रकार अष्टपदी रूप से हर्षित करें। यह हवि स्वाहुत हो।
हे स्वर्ग के निवासी, विशेष महिमा वाले मरुद्गण ! तुमने जिस यजमान के यज्ञ में सोम-पान किया, वह यजमान तुम्हारे द्वारा लम्बे समय तक रक्षित रहे।
श्रेष्ठ स्वर्गलोक और विस्तारित पृथ्वी हमारे यज्ञ अनुष्ठान को अपने-अपने कार्यों द्वारा सम्पूर्ण करें और कृपा पूर्वक जल वर्षा करते हुए, स्वर्ण, पशु, रत्न प्रजादि जो भी धन उपयोगी है, उन्हें अपने-अपने कार्यों द्वारा ही सम्पूर्ण करें।
हे वृत्रहन्ता इंद्र! तुम्हारे दोनों अश्व, तीनों वेद रूपी मंत्रों द्वारा रथ में जोड़े हुए हैं।
अतः तुम इस अश्वयुक्त रथ पर बैठ जाओ यह सोमाभिषवण प्रस्तुत तुम्हारे मन को अभिषण कर्म में उत्पन्न शब्द से यज्ञ के अभिमुख करें। हे सोम ! तुम उपयाम पात्र में ग्रहण किए गए हो। मैं तुम्हें षोडशी याग में बुलाए गए इन्द्र की प्रसन्नता के निमित्त ग्रहण करता हूँ। हे ग्रह ! यह तुम्हारा स्थान है। मैं तुम्हें षोडसी याग में आह्वान किए इन्द्र के लिए ग्रहण करता हूँ।
हे इन्द्र देव! तुम्हारे दोनों अश्व लम्बे बालों वाले, युवा, स्थिर अवयव वाले हरे रंग के हैं। तुम उन्हें अपने सर्वोत्तम रथ में जोड़ो। फिर यहाँ सोमपान द्वारा प्रसन्न होकर वन्दनाओं को सुनो! हे सोम ! तुम उपयाम पात्र में गृहीत हो। मैं तुम्हें इन्द्रदेव की प्रसन्नता के लिए प्राप्त करता हूँ। हे ग्रह ! तुम्हारी यह जगह है, मैं तुम्हें षोडशी भाग में आमंत्रित किए गए इन्द्रदेव की प्रसन्नता के लिए प्राप्त करता हूँ।
इन्द्र देव हर्यश्वद्वय महान बलशाली इन्द्र को ऋषि स्तोत्राओं की श्रेष्ठ स्तुतियों को पास लाते हैं और मनुष्य यजमानों के यज्ञ में भी लाते हैं।
जिस इन्द्रदेव से अन्यत्र कोई भी सर्वोत्तम नहीं हुआ, तो सभी लोकों में अन्तर्यामी रूप से विराजमान हैं, यह सोलह कलात्मक इन्द्रदेव प्रजा के स्वामी और प्रजा रूप से भली-भाँति आचारणित हुए, प्राणधारियों का पोषण करने के लिए सूर्य, वायु और अग्नि रूप समान तीनों तेजों में अपने तेज को प्रवेश करते हैं।
हे षोडशी ग्रह! भली भाँति तेजस्वी इन्द्र और वरुण दोनों ने ही तुम्हारे इस सोम का पहले भक्ष्ण किया था। उस इन्द्र और वरुण के सेवनीय अन्न उनके पश्चात मैं भोजन करता हूँ। मेरे द्वारा भक्ष्ण किए जाने पर सरस्वती प्राण के सहित तृप्ति को प्राप्त हो। यह आहुति स्वीकार हो।
हे अग्नि! तुम महान कर्म वाली हो। मुझे यजमान में धन के मान को दृढ़ करो। हमको महान शक्ति वाले ब्रह्मतेज की प्राप्ति हो। हे अति ग्राह्य पहले ग्रह ! तुम उपयाम पात्र में ग्रहीत हो, मैं तुम्हें तेज प्रदाता अग्नि की हर्षिता के लिए ग्रहण करता हूँ। हे दूसरे ग्रह ! यह तुम्हारी जगह है। तेज प्रदान करने वाले इन्द्रदेव के लिए मैं तुम्हें यहाँ स्थिर करता हूँ। हे अत्यन्त तेजस्वी अग्नि ! तुम सब देवों में अधिक तेजस्वी हो, अतः मैं तुम्हारी कृपा दृष्टि से सब मनुष्यों से अधिक तेजस्वी बन जाऊँ।
हे इन्द्र देव! तुम अपने ओज के सहित उठकर अभिषेक किए हुए सोम रस का पान करो और अपनी चिबुक को कंपित करो। हे द्वितीय अतिग्राह्य ग्रह ! तुम उपयाम पात्र में ग्रहण किए गए हो। मैं तुम्हें बल सम्पन्न इन्द्र की प्रसन्नता के लिए ग्रहण करता हूँ। हे ग्रह! तुम्हारा यह स्थान है। मैं तुम्हें ओजस्वी इन्द्र की प्रसन्नता हेतु यहाँ स्थापित करता हूँ। हे इन्द्र ! तुम ओजस्वी हो, सब देवताओं में बलशाली हो। मैं तुम्हारी कृपा से सब मनुष्यों में अधिक शक्तिशाली बन जाऊँ।
हे इन्द्र देव! तुम अपने ओज के युक्त उठकर अभिषुत किए हुए इस सोमरस का पान करो और अपनी चिबुक को कम्पायमान करो। हे दूसरे अतिग्राह्य ग्रह! तुम उपयाम पात्र में प्राप्त किए गए हो, मैं तुम्हें शक्ति सम्पन्न इन्द्रदेव की प्रसन्नता के लिए प्राप्त करता हूँ। हे ग्रह! यह तुम्हारी जगह है। मैं तुम्हें ओजस्वी इन्द्र देव की प्रसन्नता के लिए यहाँ स्थिर करता हूँ। हे इन्द्रदेव! तुम ओजस्वी हो, समस्त देवों में अत्याधिक शक्तिशाली हो। मैं तुम्हारी कृपा दृष्टि से समस्त मनुष्यों में अधिक शक्तिवान बन जाऊँ।
सारे विश्व को प्रकाशित करने वाली सूर्य किरणें सब प्राणियों में जाती हुई विशेष रूप से उसी प्रकार दिखाई पड़ती हैं, जिस प्रकार प्रज्वलित अग्नि सर्वत्र दिखाई पड़ती है। हे तृतीय अति ग्राह्य ग्रह ! तुम उपयाम पात्र में गृहीत हो। मैं तुम्हें ज्योर्तिमान सूर्य की प्रसन्नता के लिए ग्रहण करता हूँ। हे ग्रह ! यह तुम्हारा स्थान है। तेजस्वी सूर्य के लिए मैं तुम्हें यहाँ स्थापित करता हूँ। हे ज्योतिर्मान सूर्य ! तुम सब देवताओं में अधिक तेजस्वी हो। मैं भी तुम्हारी कृपा से सब मनुष्यों में अत्याधिक तेजस्वी बन जाऊँ।
ये प्रकाशप्रद किरणें समस्त प्राणधारियों के जानने वाले सूर्य को, पूर्ण जगत को, दृष्टि देने के लिए उदहन करती है तब अन्धेरा नष्ट होने पर दृष्टि फैलती है। अतिग्राह्य ग्रह! उपयाम पात्र में गृहीत को मैं सूर्य के लिए ग्रहण करता हूँ। हे ग्रह ! यह तुम्हारी जगह है। सूर्य के लिए मैं तुम्हें यहाँ दृढ़ करता हूँ।
हे महिमामयी गौ! इस द्रोण कलश को सूंघो। सोमरस की यह सुगन्ध तुम्हारी नाक के छिद्रों में प्रवेश करे। तब तुम अपने उत्तम दूध रूपी रस सहित फिर हमारे प्रति वर्तमान में आओ। इस प्रकार हमारे द्वारा वंदनीय हमें हजारों धन से सम्पन्न करो। तुम्हारी कृपा से बहुत दूध की धारों वाली गायें और धन-ऐश्वर्य मुझे दोबारा प्राप्त हो। हमारा घर उनसे पुनः पूर्ण हो जाएँ।
हे गौ! तुम सभी के द्वारा वंदनीय, रमणीय यज्ञ में आह्वान करने योग्य देवताओं और मनुष्यों द्वारा अभिलषित, प्रसन्नता प्रदान करने वाली, ज्योति प्रदान करने वाली, अदिति के रूप समान अदीना, दुग्धवती, अबध्य और महिमामयी हो। तुम्हारे ये असंख्यक नाम गुणों की दृष्टि से ही हैं। इस प्रकार से आह्वान की गई तुम हमारे देवों के प्रति किए जाने वाले इस महान यज्ञ को देवों से कहो जिससे वे हमारे कार्यों को जान लें।
हे इन्द्र! समुपस्थित युद्ध में शत्रुओं को पराजित करो। रणक्षेत्र में जाकर शत्रुओं का वध करो। जो हमें कष्ट दे उसे घोर नरक में डाल दो। हे इन्द्र ग्रह ! तुम उपयाम पात्र में ग्रहीत हो। रण क्षेत्र में गृहीत होने वाले इन्द्र के लिए तुम्हें ग्रहण करता हूँ। है इन्द्र! यह तुम्हारा स्थान है, मैं तुम्हें इन्द्र की प्रसन्नता के लिए स्थापित करता हूँ।
हम अपने उन उपास्यदेव का आह्वान करते हैं, जो महाव्रती वाचस्पति, हृदय के रूप समान तीव्र चाल वाले, सृष्टिकर्त्ता और प्रलय के कारण रूप हैं। उन इन्द्र को अन्न के ऐश्वर्य और सुरक्षा हेतु आहुत करते हैं। हे इन्द्रग्रह ! उपयाम पात्र में गृहीत तुमको विश्वकर्मा इन्द्र की हर्षिता के लिए प्राप्त करता हूँ। हे इन्द्रग्रह ! यह तुम्हारी जगह है। मैं तुम्हें विश्वकर्मा इन्द्र देव की प्रसन्नता के लिए स्थिर करता हूँ।
हे परमात्म देव! हे विश्वकर्मन! तुम भक्तों की वृद्धि करने वाले हवि हवन सामग्री के द्वारा वृद्धि करने वाले श्लोकों को चाहने वाले हो। तुम्हें प्राचीन मुनिजन आदि भी प्रणाम करते थे। तुमने इन्द्र को विश्व रक्षा के लिए और स्वयं को अवध्य रहने योग्य किया है। वे इन्द्र वज्र धारण कर आह्वान के योग्य हुए हैं, इसलिए सभी प्रणाम करते हैं। हे भगवान! तुम्हारे ऋषि रूप पराक्रम में इन्द्र की यह महिमा है। हे ग्रह! तुम उपयाम पात्र में गृहीत हो। तुम्हें परमात्मा देव की प्रसन्नता के लिए ग्रहण करता हूँ। हे ग्रह ! यह तुम्हारा स्थान है, तुम्हें विश्वकर्मा की प्रसन्नता के लिए यहाँ स्थापित करता हूँ। हे प्रथम अदम्य ग्रह सोम ! तुम उपयाम पात्र में गृहीत हो। गायत्री छंद के वरण योग्य तुम्हें मैं अग्नि की प्रीति के लिए ग्रहण करता हूँ। हे द्वितीय ग्रह ! तुम उपयाम पात्र में गृहीत हो और अनुष्टुप छंद का वरण करते हो, मैं तुम्हें इन्द्र की प्रसन्नता के लिए ग्रहण करता हूँ। हे तृतीय अदम्य ग्रह! तुम उपयाम पात्र में ग्रहीत और जगती छंद के वरण्सा करने योग्य हो, मैं तुम्हें विश्वेदेवों की प्रसन्नता की बसन्नता हेतु ग्रहण करता हूँ। हे अदम्य नामक गृहीत सोम! अनुष्टुप छन्द तुम्हारी तुति के लिए प्रयुक्त हो।
हे सोम! इधर-उधर विचरण करते हुए बादलों में स्थित जो जल है, उनकी वर्षा के लिए मैं तुम्हें कम्पायमान करता हूँ। हे सोम! संसार का भला करने वाले ध्वनिमान बादलों के अन्दर जो जल स्थित है, उनको वर्षा के लिए मैं तुम्हें कम्पित करता हूँ। हे सोम! जो पेट में जल परिपूर्ण बादल हमको अत्यन्त हर्षित करने वाले हैं उनकी वर्षा के लिए मैं तुम्हें कम्पितवान् करता हूँ। हे सोम ! बादलों युक्त जलवालों और अत्यन्त संतुष्टि प्रदान करने वाले जो बादल हैं, उनकी वर्षा के लिए मैं तुम्हें कम्पायमान करता हूँ। हे सोम ! जो मेघ अमृत रस रूप समान जल से सम्पन्न हैं, उनकी वर्षा हेतु मैं तुम्हें कम्पायमान करता हूँ। हे सोम! तुम शुद्ध हो, मैं तुम्हें पवित्रतम, शुद्ध जल में कम्पायमान करता हूँ और तुम्हें दिवस रूप सूर्य की किरणों द्वारा भी कम्पायमान करता हूँ।
हे सोम! तुम सेचन समर्थ हो, तुम्हारा कुंकुम महान आदित्य के समान तेजस्वी होता है। महान आदित्य पवित्र सोम के पुरोगामी हैं या सोम ही सोम के पुरोगामी हैं। हे सोम ! तुम अनुपहिंसित, चैतन्य नाम वाले हो। मैं ऐसे तुम्हें ग्रहण करता हूँ।
हे देवरूप सोम! तुम्हें ग्रहण करके सभी अभिलाषा वाले होते हैं, अतः तुम अग्नि के भक्षण भाव को ग्रहण होओ। हे सोम ! तुम तेजस्वी हो और इन्द्र के प्रियतम अन्न रूप हो। हे सोम ! तुम हमारे मित्र रूप और संसार के देवताओं के प्रियतम अन्न रूप हो। हे गौओं! तुम इस यजमान से स्नेह करने वाली बनो। तुम इस यजमान से संतुष्ट रहती हुई इसी के यहाँ रमण करती रहो। यह आहुति स्वाहुत हो। धारणकर्त्ता अग्नि, धारणकर्त्ता पार्थिव अग्नि को आविर्भूत करता हुआ और धरा के रस का पान करता हुआ हमें पुत्र पौत्र आदि समद्धि से सशक्त करें। यह आहुति स्वाहुत हो।
हे हविर्धान! तुम यज्ञ की समृद्धि के समान हो। हम यजमान तुम्हारी कृपा से सूर्य रूप ज्योति (प्रकाश) को प्राप्त करते हुए अमर होने की कामना करते हैं और पृथ्वी से स्वर्ग पर बैठे इंद्र आदि देवता यह जान लें कि हम इस प्रकाश मात्र स्वर्ग को देखने की इच्छा करते हैं।
हे युद्ध में आगे की तरफ बढ़ने वाले और युद्ध करने वाले इन्द्र और पर्वत! तुम उसी शत्रु को अपने वज्र रूप तीव्र आयुध से हिंसित करो और जो शत्रु सेनाएँ लेकर हमसे युद्ध करने की इच्छा करे। हे इन्द्र देव! जब आपका वज्र अत्यन्त गहरे जल में दूर से भी दूर रहते हुए शत्रुता की अभिलाषा करे, तब वह उसे ग्रहण कर ले। वह वज्र हमारे समस्त ओर से दृढ़ शत्रुओं को भली प्रकार से चीर डाले। हे अग्ने, वायु और सूर्य! तुम्हारी कृपा दृष्टि ग्रहण होने पर हम महान सन्तान वाले वीर पुत्र आदि से परिपूर्ण हों और महान सम्पत्ति को पाकर धनी कहलाएँ।
सोम यज्ञ में प्रवृत सोम के परमेष्ठी नाम होने पर यजमान, किसी विघ्न के उपस्थित होने पर परमेष्ठिनी स्वाहा मंत्र से आज्य की आहुति दे। जब यजमान सोम के निमित्त वाणी उच्चारित करे तब प्रजापति नाम होता है। किसी प्रकार की बाधा उत्पन्न होने पर प्रजापतये स्वाहा मंत्र से आज्य की आहुति दें। सोम जब अभिमुख प्राप्त होता है तब अंधनाम वाला होता है। किसी प्रकार की बाधा आने पर अन्ध से स्वाहा मंत्र से आज्य की आहुति दें। यथा भाग रक्षित होने पर सोम सविता नाम वाला होता है। विश्व की उपस्थिति पर 'सवित्रे स्वाहा' मंत्र से आज्य की आहुति दे। दीक्षा में सोम विश्वकर्मा नाम वाला होता है। विघ्न उपस्थित हो तो विश्वकर्मणे स्वाहा मंत्र से आज्य की आहुति दे। गौ को लाने में सोम का पूषा नाम होता है। यदि कोई विघ्न उपस्थित हो तो 'पूष्णे स्वाहा' मंत्र से आज्य की आहुति दें।
क्रयार्थ प्राप्त होने पर सोम इन्द्रदेव और मरुत नामक होता है। बाधा उपस्थित होने पर 'इन्द्राय मरुद्भयश्च स्वाहा' मंत्र से आज्य की आहुति दें। खरीद के समय सोम असुर नाम वाला होता है। कोई विघ्न आ जाने पर असुराय स्वाहा मंत्र से आज्य की आहुति दे। खरीद किया गया सोम मित्र नाम वाला होता है। कोई बाधा उपस्थित होने पर मित्राय स्वाहा मंत्र से आज्य की आहुति दे। यजमान के अंक में ग्रहण हुआ सोम विष्णु संज्ञक होता है। उस समय यदि कोई विघ्न उपस्थित हो तो उसकी शांति के निमित्त 'विष्णवे शिपिविष्टाय स्वाहा' मंत्र से आज्य की आहुति दें। गाड़ी में रचाकर वहन किया जाता हुआ सोम संसार पोषण विष्णु नामक होता है। उस समय कोई बाधा उपस्थित हो तो 'विष्णवे नरन्धिषाय स्वाहा' मंत्र से आज्य की आहुति दें।
शकट द्वारा आने वाला सोम, सोम होता है। उस समय बाधा के उपस्थित होने पर 'सोमाय स्वाहा' मंत्र से आज्य की आहुति प्रदान करें। सोम रखने की आलन्दि से रक्षित सोम वरुण नाम वाला होता है। उस समय कोई विघ्न उपस्थित होने पर 'वरुणाय स्वाहा' मंत्र से आज्य की आहुति दें। अग्निघ्घ्र में विद्यमान सोम अग्नि नाम वाला होता है। उस समय विघ्न उपस्थित हो तो 'आग्नेय स्वाहा' मंत्र से आज्य की आहुति दे। हविर्धान में विद्यमान सोम इन्द्र नाम वाला होता है। उस समय कोई विघ्न आए तो 'इन्द्राय स्वाहा' मंत्र से आज्य की आहुति दें। कूटने के लिए उपस्थित सोम अथर्व नामक होता है। उस समय कोई विघ्न उपस्थित होने पर 'अथर्वाय स्वाहा' से आज्य की आहुति दें।
खण्डों में खंडन करके रखा हुआ सोम 'विश्वेदेवा' नामक होता है। उस समय कोई विघ्न पड़ने पर 'विश्वेभ्यो देवेभ्यः स्वाहा' से घी की आहुति दें। वृद्धि को प्राप्त सोम उपासकों का रक्षक और विष्णु नामक होता है। उस समय कोई विघ्न पड़ने पर विष्णवे आप्रीतपाय स्वाहा से घी की आहुति दें। सोम का अभिष्व हो तभी वह यम नाम वाला होता है। उस समय रुकावट उत्पन्न हो तो 'यमाह स्वाहा' से घी की आहुति दें। अभिषुत सोम विष्णु संज्ञक है। उस समय विघ्न उत्पन्न होने पर 'विष्णवे स्वाहा' से घी की आहुति दें। छाना हुआ शुद्ध सोम वायु संज्ञक है। उस समय यदि कोई विघ्न आए तो 'वायवे स्वाहा' से घी की आहुति दें। छनकर पवित्र हुआ सोम शुक्र होता है। उस समय यदि विघ्न पड़े तो 'शुक्राय स्वाहा' मंत्र से आज्य आहुति दें। छना हुआ सोम दूध में मिलाया जाता हुआ भी शुक्र संज्ञक ही होता है। उस समय यदि कोई विघ्न उपस्थित हो तो 'शुक्राय स्वाहा' से घी की आहुति दें। सत्तू में मिश्रित सोम का नाम मन्थी होता है। उस समय यदि कोई विघ्न उपस्थित हो तो 'मन्थिने स्वाहा' मंत्र से घी की आहुति दें।
चमस पात्रों में गृहीत विश्वेदेवो के नाम वाला होता है। उस समय यदि कोई बाधा उपस्थित हो तो 'विश्वेभ्यो देवभ्यः स्वाहा' मंत्र से घी की आहुति दें। गृह होम के उद्यत सोम असु नाम वाला होता है। उस समय उपस्थित विघ्न की शक्ति के निमित्त 'असवे स्वाहा' मंत्र से घी की आहुति दें। हूप मान सोम रूप नाम वाला है।
उस समय कोई बाधा आए तो रुद्राय स्वाहा मंत्र से आज्य आहुति दें। हुत - शेष सोम भक्षणार्थ लाया हुआ वात नाम वाला है। उस समय उपस्थित बाधा के निवारण हेतु 'वाताप स्वाहा' मंत्र से घी की आहुति दें। हे ब्राह्मण! इस हेतु शेष सोम का पान करो, इस प्रकार नवेदित सोम नृच्छ नाम वाला होता है। उस समय कोई विघ्न आने पर उसके निवारण हेतु 'नृच्छ से स्वाहा' मंत्र से घी की आहुति दें। भक्ष्ण किया जाने वाला सोम भक्ष नाम वाला है। उस समय कोई विघ्न आने पर 'भक्षाय स्वाहा' मंत्र से आज्य आहुति दें।
भक्ष्ण करने पर सोम नाराशंस पितर नाम वाला होता है। उस समय यदि कोई बाधा आए तो 'पितृभ्यो नाराशंसेभ्य स्वाहा' मंत्र के द्वारा घी की आहुति प्रदान करें।
अवभृथ के लिए उद्यम सोम सिन्धु नामक होता है। उस समय उपस्थित हुई बाधा के कारण सिन्धवे स्वाहा से आज्य आहुति दें। ऋजीष कुम्भ में जल के ऊपर अवस्थित होता हुआ सोम समुद्र होता है। उस समय बाधा के उपस्थित होने पर 'समुद्राय स्वाहा' मंत्र से आज्याहुति दें। ऋजीष कुम्भ में जल मग्न किया जाता सोम सलिल होता है। उस समय बाधा उपस्थित हो तो 'सलिलाय स्वाहा' मंत्र पूर्वक घी की आहुति दें। जिन विष्णु और वरुण देव के ओज द्वारा समस्त लोक अपनी-अपनी जगह पर विराजमान हुए हैं, जो विष्णु और वरुण देव अपने पराक्रम से अत्यन्त वीर हैं, जिनकी शक्ति के सम्मुख कोई स्थिर नहीं हो सकता, वे तीनों लोकों के स्वामी यज्ञ में पहले आहूत होते हैं। उन्हीं विष्णु और वरुणदेव की तरफ सोम गया और समान रूप कार्य वाले होने से विष्णु ही वरुण और वरुण ही विष्णु हैं। यह मंगलप्रद हवि भी उनके ही निकट गई।
स्वर्ग में निवास करने वाले देवताओं के निमित यह यज्ञ उनकी ओर गया। स्वर्ग में स्थित हुए उस यज्ञ फल के फलरूप विशेष भोग के साधन रूप ऐश्वर्य मुझे प्राप्त हो। स्वर्ग से उतरता हुआ यह सोम मनुष्यों के लोक में आता हुआ जब अन्तरिक्ष लोक में जाए तब मुझे असीमित धन प्राप्त हो। यह यज्ञ धूम्र आदि के द्वारा पितरों के पास जाकर जब पृथ्वी पर आएँ तब उस स्थल में स्थित यज्ञ के फल से मुझे ऐश्वर्य की प्राप्ति हो। यह यज्ञ जिस लोक में भी गया हो, वही स्थित फल रूप सुख से मुझे परिपूर्ण करें।
चौंतीस प्रायश्चितों के पश्चात यज्ञ की वृद्धि करने वाले प्रजापति आदि चौंतीस देवता इस यज्ञ की वृद्धि करते हुए अन्न आदि का पालन प्रदान करते हैं। उन यज्ञ विस्तारक देवताओं का जो अंश छिन्न हुआ है, उसको धर्म पात्र में संगठित करता हूँ। यह आहुति भली प्रकार स्वीकार हो और देवों की हर्षिता के लिए उनकी तरफ विचरण करें।
जो यज्ञ आहुति वाला है, उस यज्ञ का प्रसिद्ध फल अनेक प्रकार से बढ़े और आठों दिशाओं में व्याप्त हो। पृथ्वी अन्तरिक्ष और स्वर्ग में व्याप्त हुआ वह यज्ञ मुझे संतान और महानता प्रदान करें। मैं धन की वृद्धि और सम्पूर्ण आयु को प्राप्त करूँ । यह घृत की आहुति स्वीकार हो।
हे सोम! तुम इस यूप स्तम्भ को पवित्र करो और हमें सुवर्ण, अश्व, गौ और अन्नादि समस्त प्रदान करो। यह आहुति स्वीकार करो।
अध्याय (9) :: ऋषि :- इन्द्रबृहस्पतिः बृहस्पति, दधि क्रावा, वशिष्ठ, नाभानेदिष्ठ, तापस, वरुण, देववात; देवता :- सविता इन्द्र अश्व, प्रजापति, वीर, इन्द्रा बृहस्पति, बृहस्पति, यज्ञ, दिश, सोभाग्न्यादित्य विष्णु सूर्य बृहस्पतय, अर्य्य भविमंत्रोक्ता, अग्नि, पूषादयो मन्त्रोक्ता, मित्रादयो मन्त्रोक्ता, वस्वादयो मन्त्रोक्ता, विश्वे देवता, रक्षोहन, यजमान; छन्द :- त्रिष्टुप, पंक्ति, शक्करी, कृति अष्टि, जगती, उष्णिक, अनुष्टुप, गायत्री, बृहती।
हे सर्वप्रेरक सविता देव! इस वाजपेय नामक यज्ञ को आरम्भ करो। इस यजमान को ऐश्वर्य प्राप्ति हेतु अनुष्ठान को प्रेरित करो। दिव्य अन्न के पवित्र करने वाले किरणों युक्त सूर्य हमारे अन्न को पवित्र करें। वाणी के स्वामी वाचस्पति हमारे हविस्न का आस्वादन करें। यह आहुति स्वीकार हो।
हे प्रथम ग्रह ! तुम उपयाम पात्र में इन्द्रदेव की हर्षिता के लिए ग्रहीत हो। तुम स्थिर लोक में, मनुष्यों के मध्य रहने वाले, हृदय में वास करने वाले और इन्द्रदेव के प्रिय हो। मैं तुम्हें ग्रहण करता हूँ। हे ग्रह! यह तुम्हारी जगह है। मैं तुम्हें इन्द्रदेव के स्नेह हेतु यहाँ दृढ़ करता हूँ। हे दूसरे ग्रह! तुम उपनाम पात्र में गृहीत हो। जल और घी में दृढ़ होने वाले तथा क्षितिज में भी दृढ़ होने वाले हो। मैं तुम्हें इन्द्रदेव की प्रसन्नता के लिए प्राप्त करता हूँ। हे ग्रह! यह तुम्हारी जगह है। इन्द्रदेव के स्नेह हेतु मैं तुम्हें स्थिर करता हूँ। हे तृतीय ग्रह ! तुम उपयाम पात्र में गृहीत हो। जल और घी में दृढ़ होने वाले तथा क्षितिज में भी दृढ़ होने वाले हो। मैं तुम्हें इन्द्रदेव की प्रसन्नता हेतु प्राप्त करता हूँ। हे ग्रह! यह तुम्हारी जगह है। इन्द्रदेव की प्रसन्नता के लिए मैं तुम्हें स्थिर करता हूँ। हे तृतीय ग्रह! तुम उपयाम पात्र में ग्रहीत हो। तुम धरा, अन्तरिक्ष स्वर्ग, दुःख पृथक देव जगह और देवों में विद्यमान होने वाले हो। मैं तुम्हें इन्द्रदेव की प्रसन्नता हेतु ग्रहण करता हूँ। हे इन्द्रदेव! यह तुम्हारी जगह है। इन्द्रदेव की प्रसन्नता के लिए तुम्हें यहाँ स्थापित करता हूँ।
हे चतुर्थ ग्रह! सूर्य में विद्यमान सभी अन्नों के उत्पादक जलों के सार रूप वायु और उनके भी सार रूप प्रजापति हैं। हे देवगण ! उप प्रजापति को तुम्हारे लिए धारण करता हूँ। हे ग्रह! तुम उपयाम पात्र में ग्रहीत हो। तुम्हें प्रजापति के निमित्त ग्रहण करता हूँ। हे ग्रह ! यह तुम्हारा स्थान है। प्रजापति की प्रसन्नता हेतु यहाँ प्रतिष्ठित करता हूँ।
हे ग्रहों! अन्न रस के आह्वान के कारण रूप तुम मेधावी इन्द्रदेव के लिए श्रेष्ठ बुद्धि को प्राप्त कराते हो। मैं उन यजमानों के लिए अन्न रस को भली प्रकार से प्राप्त करता हूँ। हे पंचम ग्रह! तुम उपयाम पात्र में ग्रहीत हो। इन्द्रदेव की हर्षिता के लिए तुम्हें प्राप्त करता हूँ। हे ग्रह ! यह तुम्हारा स्थान है। तुम्हें इन्द्रदेव के स्नेह हेतु यहाँ स्थापित करता हूँ। हे सोम! सुराग्रह! तुम दोनों शामिल हो। तुम दोनों ही मुझे कल्याण से परिपूर्ण करो। हे सोम और सुरा ग्रह! तुम दोनों परस्पर अलग हो। मुझे पापों से पृथक रखो।
हे अन्नदाता रथ! तुम इन्द्र के वज्र की तरह हो। यह यजमान तुम्हारे वज्र के समान सहायता को प्राप्त होकर अन्न लाभ प्राप्त करें। अन्न की इच्छा में लगे हुए हम संसार का निर्माण करने वाली पूजनीय पृथ्वी माता को वन्दना के द्वारा अपने अनुकूल करते हैं जिसमें ये लोक प्रविष्ट हुए हैं। सर्वप्रेरक सविता देव इस पृथ्वी पर हमें दृढ़तापूर्वक प्रतिष्ठित करें।
जल में अमृत है और जल में ही आरोग्यदायिनी तथा पुष्टि देने वाली औषधियाँ विद्यमान हैं। हे अश्वों! इस प्रकार से अमृत और औषधि रूप समान जलों से वेगवान होकर जलों को प्रशस्त मार्गों में प्रवेश करो। हे उज्जवल जल ! तुम्हारी जो ऊँची लहरें शीघ्र विचरणीं और अन्नदात्री हैं। उनके द्वारा सिंचित यह अश्व यजमान के द्वारा अभीष्ट अन्न को प्रदान करने में सर्वदा सक्षम हो।
वायु, मन अथवा सत्ताइस गन्धर्व और पृथ्वी के धारणकर्त्ता नक्षत्र, वातादि के प्रथम अश्व को रथ में योजित करते हैं और उन्होंने इस अश्व में अपने-अपने वेग रूप अंश को धारण किया है।
हे अश्व! योजित किए जाने पर तुम वायु के समान रूप वेग वाले बन जाओ। दक्षिण भाग में खड़े हुए इन्द्रदेव के अश्व के रूप समान सुसज्जित बनो। तुम्हें सभी के जानने वाले मरुद्‌गण रथ में जोड़ें और त्वष्टा तुम्हारे पैरों में वेग की स्थापना करें।
हे अश्व ! तुम्हारा जो वेग हृदय में स्थित है, जो वेग श्येन पक्षी में है और जो वेग वात में स्थित है, तुम अपने उस वेग से वेगवान बनकर हमारे लिए अन्न के विजेता बनो और युद्ध में शत्रु की सेना को हराकर हमारे लिए यथेष्ट अन्न उत्पन्न करो। हे अन्न विजेता अश्वो ! तुम अन्न की ओर जाते हुए बृहस्पति के भाग चरु को सूंघो।
सत्य की शिक्षा प्रदान करने वाले सविता देवता की अनुज्ञा में रहने वाला मैं बृहस्पति उत्तम लोक स्वर्ग में चढ़ता हूँ। सत्यप्रेरक सवितादेव की अनुज्ञा में चलने वाला मैं इन्द्रदेव से सम्बधित, महान स्वर्ग की कामना से चढ़ता हूँ। सत्यप्रेरक सविता देव की अनुज्ञा के वशीभूत मैं बृहस्पति के महान स्वर्ग की कामना से इस रथ के पहिए (चक्र) पर आरूढ़ होता हूँ। सत्यप्रेरक सवितादेव की अनुज्ञा के वशीभूत हुआ मैं इन्द्रदेव सम्बन्धी स्वर्ग की अभिलाषा से इस पहिए पर सवार हुआ हूँ।
हे दुंदुभियों! तुम बृहस्पति के प्रति इस प्रकार निवेदन करो कि हे बृहस्पते ! तुम अन्न के जीतो। हे दुंदुभियों! तुम बृहस्पति को अन्न लाभ कराओ। हे दुदंभियों! तुम इन्द्र से इस प्रकार कहो कि हे इन्द्र ! तुम अन्न पर विजय पाओ ! तुम स्वयं भी इन्द्र को जीतने वाले बनाओ। हे दुंदुभियों ! तुम्हारी वाणी सत्य हो, जिसके द्वारा बृहस्पति से अन्न को विजय दिलवाई अब तुम प्रसन्न होकर बृहस्पति के रथ को दौड़ने वाला करो।
सविता देव के आदेश में मग्न रहने वाला मैं अन्न को जीतने वाला बृहस्पति सम्बन्धी अन्न को जीतूं। हे अश्वो! तुम अन्न विजेता हो। तुम मार्गों को त्यागते हुए द्रुत गति से योजनों को पार करो। तुम अठारह निमेष मात्र में ही योजन तक चले जाते हो।
यह अश्व ग्रीवा, कक्ष और सुख में भी बँधा हुआ है। वह मार्ग को रोकने वाले पत्थर, धूल, काँटे आदि को रोकने वाला और रथी के (रथ को चलाने) वाले के अभिप्राय को समझकर उसके अनुसार तेजगति से दौड़ता है। यह आहुति स्वीकार हो।
यह अश्व धूल, काँटे, पत्थर आदि को पार करता हुआ वेग से आता जाता है। जैसे पक्षी के पंख सुसज्जित होते हैं उसी प्रकार अश्व के शरीर में अलंकार आदि शोभायमान हैं।
देव कार्य के लिए यज्ञ में आहुत किए जाने पर जो तेज दौड़ने वाले और श्रेष्ठ आकाश युक्त हैं, वे अश्व सर्प भेड़िये, राक्षस आदि का विनाश करके कल्याण करने वाले हैं। वे हमारी नई पुरानी व्याधियों को दूर करें।
यजमान के हृदय के अनुसार दौड़ने वाले वे अश्व हमारे आह्वान को सुनने वाले हैं। वे कुटिल मार्ग वाले, असंख्यों को अन्न आदि से संतुष्ट करते हैं। वे यज्ञ की जगह को पूर्ण करने वाले अश्व हमारे आह्वान को सुनकर द्वन्द्व से अपरिमित धनों को जीत लाते हैं।
हे अश्वो! तुम मेधावी और अविनाशी हो। तुम हमें सभी अन्न और धनों में प्रतिष्ठित करो। तुम दौड़ने से पहले सूंघे हुए माधुर्यमय हवि को पीकर तृप्त हो जाओ और देवयान मार्गों से जाओ।
उत्पन्न अन्न हमारे घर में आए। यह सर्व रूप वाले स्वर्ग, धरा हमारे मातृ पितृ रूप से हमारी सुरक्षा के लिए आगमन करें। यह सोम हमारे पीने में अमृत रूप समान हो। हे अश्वो ! तुम अन्न को विजय प्राप्त करने के लिए चरु को पवित्र करते हुए बृहस्पति से सम्बन्धित भाग को सूंघो।
व्यापक संवत्सर और आदित्य के हेतु यह आहुति स्वीकार हो। सर्वव्यापक प्रजापति हेतु दी गई यह आहुति स्वीकार हो। सर्वव्यापक प्रजापति के निमित्त स्वीकार हो। पुनः पुनः प्रकट होने वाले के निमित्त यह आहुति स्वीकार हो। यज्ञ रूप के लिए यह आहुति स्वीकार हो। संसार की स्थिति के निमित्त और कारण के निमित्त यह आहुति स्वीकार हो। दिन के स्वामी के लिए यह आहुति स्वीकार हो। मुग्ध नाम वाले के लिए आहुति स्वाहुत हो। विनाशशील नाम वाले के लिए यह आहुति स्वीकार हो। त्रिभुवन को सोमापान के लिए यह आहुति स्वीकार हो। सब लोकों के स्वामी के निमित्त लिए यह आहुति स्वीकार हो। सब प्राणियों की स्थिति, उत्पत्ति और विनाश करने वाले के निमित्त यह आहुति स्वीकार हो।
इस वाजपेय यज्ञ के फल से हमारी आयु में वृद्धि हो। वाजपेय यज्ञ के फल से हमारे प्राणों की वृद्धि हो। इस यज्ञ के फल से हमारे नेत्र और इन्द्रियाँ सक्षम हों। इस यज्ञ के फल से हमारी कर्ण इन्द्रिय सक्षम हों। इस यज्ञ के फल से हमारी पीठ की शक्ति में वृद्धि हो। इस यज्ञ के फल से यज्ञ की क्षमता में वृद्धि हो। हम प्रजापति की संतान हो गए। हे ऋत्विजों! हमको स्वर्ग की प्राप्ति हुई है। हम अमृत वाले बन गए हैं। हे चारों दिशाओं! तुमसे संबंधित इन्द्रियाँ हममें हों। तुम्हारा धन हमें ग्रहण हो और तुमसे सम्बन्धित यज्ञ कर्म और तेज हमारे लिए हों। माता के रूप समान धरा को नमस्कार है, पृथ्वी माता को नमस्कार है। हे आसन्दी ! यह तुम्हारा राष्ट्र है। हे यजमान ! तुम सभी के नियन्ता और धारक हो। अपने आप भी संयमशील दृढ़ और धारक हो। तुम समस्त प्रजा पर शासन करने वाले और राज्य की शान्ति रक्षार्थ के कृतकार्य हो। तुम्हें धन की वृद्धि और प्रजा पालन के लिए इस जगह पर उपविष्ट करते हैं।
अन्न के उत्पादनकर्त्ता प्रजापति ने सर्वप्रथम, सृष्टि के आदि में औषधि और जल के मध्य इस सोमरूप तेजस्वी पदार्थ को उत्पन्न किया। सोम के उत्पादक वे औषधि और जल हमारे लिए रसयुक्त मधुरता से सम्पन्न हों। यज्ञादि कर्मों में उन प्रमुख के द्वारा अभिषेक हुए अपने राज्य में सबका कल्याण करने वाले होते हुए हमेशा सावधानीपूर्वक रहें।
इस समस्त अन्न के उत्पादक ईश्वर ने इस स्वर्ग को इन सभी लोकों की रचना की है। वे सभी के स्वामी मुझे हवि प्रदान करने की अभिलाषा न करने वाली की मति को आहुति दान के लिए अग्रसर करते हैं। वे हमें पुत्र आदि से सम्पन्न धन प्रदान करें। यह आहुति स्वीकार हो।
अन्न को उत्पन्न करने वाले प्रजापति ने हमारा पालन करने के निमित्त राजा सोम, वैश्वानर अग्नि, बारह आदित्य, ब्रह्मा और बृहस्पति को नियुक्त किया है। हम उन देव रूप प्रजापति को आहुति अर्पित करते हैं। हे प्रभु! तुमने अर्थमा, बृहस्पति, इन्द्र वाणी की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती, विष्णु आदि को सब प्राणियों को अन्न देने के लिए बनाया है। इनको धन प्रदान करने के लिए प्रेरित करो। यह आहुति स्वीकार हो। हे अग्नि ! इस यज्ञ में हमारे हितकारी वचनों को अभिमुख होकर कहा। हमारे लिए श्रेष्ठ मन वाले हो। हे विजेता श्रेष्ठ ! तुम स्वभाव से ही धन प्रदान करने वाले हो, अतः हमको भी धन प्रदान करो। तुम हमारी प्रार्थना पूर्ण करने में सक्षम हो। अतः हमारे निवेदन को स्वीकार करो। यह आहुति स्वीकार करो।
हे भगवन्! तुम्हारी कृपा दृष्टि से अर्यमा हमें इच्छित फल प्रदान करें। पूषा भी काम्य धन दें। बृहस्पति हमारी अभिलाषा पूरी करें और वाग्देवी सरस्वती भी हमें अभिष्ट समृद्धि प्रदान करने वाली हो।
सर्वप्रेरक सविता की प्रेरणा से, अश्विनी कुमारों की भुजाओं से और पूषा के हाथों द्वारा मैं तुम यजमान का बृहस्पति के साम्राज्य से अभिषेक करता हूँ। हे यजमान ! मैं तुम्हें सरस्वती के ऐश्वर्य में स्थापित करता हूँ। हे वाणी की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती नियमन करें। मैं अमुक नाम वाले यजमान को अभिषेक करता हूँ।
एकाक्षर के प्रभाव से अग्निदेव ने उत्कृष्ठ प्राण पर विजय प्राप्त की है। मैं भी उस प्राण को एकाक्षर के प्रभाव से ही जीतूं। दो अक्षर वाले छन्द से अश्विनी कुमारों ने दो चरणवाले मनुष्यों को भली-भाँति विजय किया है। मैं भी द्वयअक्षर वाले छन्द से मनुष्यों पर विजय प्राप्त करूँ। तीन अक्षर छन्द के प्रभाव से विष्णु ने तीनों लोकों पर विजय प्राप्त कर ली, मैं भी उनके प्रभाव से तीनों लोकों पर विजय प्राप्त करने वाला बन जाऊँ। चतुरक्षर छन्द से सोम देवता ने समस्त चार पाँव वाले पशुओं को जीता है। मैं भी उनके प्रभाव से उन पशुओं को जीत लूँ।
पंचाक्षरी छन्द के प्रभाव से पूषा ने पाँचों दिशाओं को भली प्रकार जीता है। मैं भी उसी प्रकार पाँचों दिशाओं को भली प्रकार विजय कर लूँ। छः अक्षर छन्द से सविता देव ने छहों ऋतुओं को जीत लिया है, मैं भी उसी प्रकार उन छहों ऋतुओं पर विजय प्राप्त करूँ। सात अक्षर छन्द के द्वारा मरुद्गण ने सात (गाय, भेड़, बकरी) आदि गाँव के पशुओं को जीत लिया। मैं भी उन्हें उसी प्रकार जीत लूँ। आठ अक्षर छन्द के बल से गायत्री छन्द के अभिमानी देवता बृहस्पति ने जीता है, मैं भी उसी अष्टाक्षर छन्द से उसे जीत लूँ।
नवाक्षर मंत्र के प्रभाव से मित्र देवता ने त्रिवृत स्तोत्र को जीत लिया। मैं भी उसे नवाक्षर स्तोत्र के द्वारा अपने वशीभूत करूँ। दशाक्षर मंत्र से वरुण देव ने विराट को जीत लिया है। मैं भी उसी प्रकार विराट् को जीतूं। एकादश अक्षर वाले स्तोत्र से इन्द्रदेव ने त्रिष्टुप छन्द के अभिमानी देवता को अपने वश में कर लिया है, मैं भी उसी प्रकार उसे अपने आधीन करूँ।
तेरह अक्षर वाले छन्द से वसुगण ने तेरह स्तोत्र को जीत लिया। मैं भी उसे उसी प्रकार जीत लूँ। चतुर्दशाक्षर छन्द से रुद्रगण ने चौदह स्तोत्र को भली प्रकार विजय कर लिया। मैं उसे उसी प्रकार विजय प्राप्त करूँ। पंचदशाक्षर छन्द के द्वारा आदित्य गण ने पन्द्रहवें स्तोत्र पर विजय प्राप्त की है, मैं भी उसी प्रकार जीतने वाला बनूँ। सोलह अक्षर छंद के प्रभाव से अदिति ने सोलहवें स्तोत्र को भली प्रकार जीत लिया। मैं भी उसे श्रेष्ठ रूप से अपने वश में करूँ। सत्रह अक्षर छंद के प्रभाव से प्रजापति ने सत्रहवें स्तोत्र को उत्कृष्ट रूप से जीत लिया है। मैं भी उसे उत्कृष्ट प्रकार से विजय कर लूँ।
हे धरा ! तुम अपने इस हिस्से को प्रसन्नता पूर्वक सेवन करो। यह आहुति स्वीकार हो। पूर्व दिशा में वास करने वाले जिन देवताओं के नेता अग्नि हैं उनके लिए यह आहुति स्वीकार हो। दक्षिण दिशा में वास करने वाले जिन देवताओं के नेता यम हैं, उनके लिए यह आहुति स्वीकार हो। पश्चिम दिशा में वास करने वाले जिन देवताओं के नेता विश्वेदेवा हैं, उनके लिए यह आहुति स्वीकार हो। उत्तर दिशा में वास करने वाले जिन देवताओं के नेता मित्रा वरुण या मरुद्गण हैं, उन देवताओं के लिए यह आहुति स्वीकार हो। जो देवता अन्तरिक्ष में या स्वर्ग में वास करते हैं, जो हव्य सेवन करने वाले हैं, जिनके नेता सोम हैं, उन देवों के लिए यह आहुति स्वीकार हो।
पूर्व में निवास करने वाले जिन देवताओं के नेता अग्नि हैं, उनके लिए यह आहुति स्वीकार हो। दक्षिण में निवास करने वाले जिन देवताओं के नेता यम है, उनके लिए यह आहुति स्वीकार हो। पश्चिम में निवास करने वाले जिन देवताओं के नेता विश्वेदेवा हैं, उनके लिए यह आहुति स्वीकार हो। जो देवता उत्तर में निवास करते हैं, उनके नेता मरुद्गण या मित्रा-वरुण हैं, उनको यह आहुति स्वीकार हो। ऊपर के लोकों में निवास करने वाले जिन देवताओं के नेता सोम है, उन हव्य सेवी देवताओं को यह आहुति स्वीकार हो।
हे अग्नि! तुम शत्रुओं की सेनाओं को पराजित करो। शत्रुओं को चीर फाड़ डालो। तुम किसी के द्वारा रोकी नहीं जा सकतीं। आप शत्रुओं का बहिष्कार कर अनुष्ठान करने वाले यजमान को तेज प्रदान करो।
सबको कर्तव्य की प्रेरणा देने वाले सविता देव की प्रेरणा से अश्विनी कुमारों की भुजाओं से और पूषा के दोनों हाथों से, उपांशु गृह के पराक्रम से तुम्हें आहुति देता हूँ। यह आहुति स्वीकार करो। हे स्त्रुव ! मैं तुम्हें असुरों के संहार हेतु प्रक्षेप करता हूँ। असुर वंश का नाश करो। अमुक शत्रु का वध किया। यह शत्रु हत हो गया। हे यजमान ! सर्व नियन्ता सविता देव प्रजा के शासन कार्यों में तुम्हें आकृष्ट करें।
गृहस्थों के उपास्य अग्निदेव तुम्हें गृहस्थों पर अधिकार योग्य कराएँ। सोम देव तुम्हें वनस्पति विषयक सिद्धि प्रदान करें। बृहस्पति देव तुम्हें वाणी पर स्थित करें। इन्द्रदेव तुम्हें ज्येष्ठ अधिकार योग्यों में रुद्र देव तुम्हें पशुओं पर आधिपत्य में, मित्र तुम्हें सत्य आचरण के अधिकार में और वरुण देव तुम्हें धर्म के आधिपत्य में अधिष्ठित करें।
हे देवताओं! तुम इस यजमान को अमुक अमुकी के पुत्र के महान क्षत्रिय धर्म के निमित्त, ज्येष्ठ होने के निमित्त जनता पर शासन करने के निमित्त और आत्मज्ञान के निमित्त शत्रुओं से शून्य करो और इसे अमुकजाति वाली प्रजाओं का राजा बनाओ। हे प्रजागण! यह अमुक नाम वाला यज्ञ आज तुम्हारा राजा हो और हम ब्राह्मणों का राजा सोम हो।
अध्याय (10) :: ऋषि :- वरुण, देववात, वामदेव, शनु शेप; देवता :- आप, वृषा, अपापति, सूर्योदयो मन्त्रोक्ता, वरुण यजमान, प्रजापति परमात्मा, मित्रावरुणों, क्षत्रपति, इंद्र, सूर्य, अग्नि, सावित्रादि, मन्त्रोक्ता, अश्विनों; छन्दः - त्रिष्टुप, पंक्ति, जगती धृति बृहति, अष्टि, अनुष्टप।
इन मधुर स्वाद वाले, विशिष्ट अन्न रस वाले, राज्याभिषेक वाले, ज्ञान सम्पादक जलों के इन्द्र आदि देवताओं ने ग्रहण किया। जिन जलों से मित्रावरुण देवताओं ने अभिषेक किया और जिस जल से देवगणों ने शत्रुओं को तिरस्कृत कर इन्द्र का अभिषेक किया, उस जल को हम ग्रहण करते हैं।
हे कल्लोल! तुम सेचन समर्थ मनुष्यों से संबंधित तरंग हो। तुम स्वभाव से ही राष्ट्र प्रदान करने वाली हो। अतः मुझे भी राष्ट्र दो। यह आहुति तुम्हारी प्रसन्नता के लिए स्वीकार हो। हे कल्लोल! तुम सेचन समर्थ पुरुष से सम्बन्धित तरंग हो, स्वभाव से ही राष्ट्र को देने वाली हो, अतः अमुक यजमान को राष्ट्र प्रदान करो। हे सेचन समर्थवान जलो! तुम राष्ट्र के देने वाले हो, अतः मुझे भी राष्ट्र दो। यह आहुति स्वीकार हो। हे सेचन समर्थ जलो ! तुम राष्ट्र के देने वाले हो, इसलिए अमुक यजमान को राष्ट्रदान करो।
हे प्रवाहयुक्त जलो! तुम स्वभाव से ही राष्ट्रदाता हो। मुझ यजमान को राष्ट्र दो। यह आहुति स्वीकार हो। हे जलो ! तुम राष्ट्रदाता हो। अमुक यजमान को राष्ट्र प्रदान करो। हे ओजस्वी जलो ! तुम राष्ट्र के देने वाले हो, इसलिए मुझे भी राष्ट्र दो। यह आहुति स्वीकार हो। हे पवित्र जलो ! तुम राष्ट्र दाता हो। अमुक यजमान को राष्ट्र दान करो। हे समुद्र के जलो ! तुम राष्ट्र के देने वाले हो। मुझे भी राष्ट्र प्रदान करो। यह आहुति स्वीकार हो। हे समुद्र के जलो! तुम राष्ट्र-दाता हो। अमुक यजमान को राष्ट्र प्रदान करो। हे भवर के जलो। तुम राष्ट्र के देने वाले हो। मुझे भी राष्ट्र प्रदान करो। यह आहुति स्वीकार हो। हे भंवर के जलो! तुम राष्ट्रदाता हो। अमुक यजमान को राष्ट्र दान करो।
हे जलो! तुम सूर्य की त्वचा में रहने वाले हो और स्वभाव से ही राष्ट्र दाता हो।
तुम मुझे राष्ट्र प्रदान करो। यह आहुति स्वीकार करो। हे सूर्य त्वचा में दृढ़ जलो ! तुम स्वभाव से ही राष्ट्र को प्रदान करने वाले हो। तुम अमुक यजमान को राष्ट्र प्रदान करो। हे जलो! तुम सूर्य के तेज में वास करने वाले हो और राष्ट्र दान वाले स्वभाव के हो। इसलिए मुझे भी राष्ट्र प्रदान करो। यह आहुति स्वीकार करो। हे सूर्य के तेज में दृढ़ जलो! तुम राष्ट्र दाता हो। अमुक यजमान को राष्ट्र प्रदान करो। हे व्रजक्षितस्थ जलो ! तुम स्वभाव से ही राष्ट्र प्रदान करने वाले हो, अतः मुझे भी राष्ट्र प्रदान करो। यह आहुति स्वीकार करो। हे व्रजक्षितस्थ जलो! तुम राष्ट्रदाता हो। अमुक यजमान को राष्ट्र प्रदान करो। हे जलो ! तुम तृणाग्र में दृढ़ हो और राष्ट्र के देने वाले हो। मुझे भी राष्ट्र दो। यह आहुति स्वीकार करो। हे तृणस्थ जलो ! तुम राष्ट्र प्रदाता हो। अमुक यजमान को राष्ट्र प्रदान करो। हे मांदजलो ! तुम स्वभाव से ही राष्ट्र के देने वाले हो। तुम मुझे भी राष्ट्र प्रदान करो। तुम्हारे लिए यह आहुति स्वीकार हो। हे मांदजलो! तुम राष्ट्र-दायक हो। अमुक यजमान को राष्ट्र प्रदान करो। हे मधु रूप जलो! तुम त्रिदोष नाशक होने से शक्ति प्रदान करते हो और स्वभाव से ही राष्ट्र के देने वाले हो। मुझे भी राष्ट्र प्रदान करो। यह आहुति स्वीकार करो। हे मधुरूप जलो! तुम राष्ट्र प्रदाता हो। अमुक यजमान को राष्ट्र प्रदान करो। हे जलो! तुम संसार का कल्याण करने वाली गौ से सम्बन्धित और राष्ट्र प्रदाता हो। मुझे भी राष्ट्र प्रदान करो। यह आहुति स्वाहुत हो।
हे शक्वरी जलो! तुम राष्ट्र के देने वाले हो। अमुक यजमान को भी राष्ट्र प्रदान करो। यह आहुति स्वाहुत हो। हे जनभूत जलो ! तुम राष्ट्र प्रदाता हो, मुझे भी राष्ट्र प्रदान करो। हे विश्वभूत जलो। तुम स्वभाव से ही राष्ट्र के देने वाले हो। मुझे भी राष्ट्र प्रदान करो।
यह आहुति स्वाहुत हो। हे विश्वभृत जलो ! तुम राष्ट्र प्रदाता हो। अमुक यजमान को के राष्ट्र प्रदान करो। हे मरीचि रूप जलो! तुम अपने राज्य में दृढ़ हो और स्वभाव से ही राष्ट्र के देने वाले हो। इसलिए इस अमुक यजमान को भी राष्ट्र प्रदान करो। हे मधुरस वाले जलो ! समस्त माधुर्यप्रद जलो ! के युक्त महान क्षत्रिय शक्ति वाले सम्राट यजमान लिए राष्ट्र देते हुए उसे अपने रसों से अभिषिक्त करो। हे जलो ! तुम असुरों से पराजित न होने वाली शक्ति को इस सम्राट में दृढ़ करते हुए इस स्थान पर रहो।
हे चर्म! तुम सोम की क्रान्ति से युक्त हो, तुम्हारी क्रान्ति मुझमें प्रवेश करे। यह आहुति अग्नि की प्रीति हेतु स्वाहुत हो। सोम की प्रसन्नता के लिए यह आहुति स्वीकार हो। सविता की प्रसन्नता के लिए आहुति स्वीकार हो। प्रवाह रूप सरस्वती के निमित्त यह आहुति स्वीकार हो। पूषा देवता के निमित्त यह आहुति स्वीकार हो। बृहस्पति देवता के निमित्त यह आहुति स्वीकार हो। इन्द्र की प्रीति के लिए यह आहुति स्वीकार हो। घोषयुक्त देवता के लिए यह आहुति स्वीकार हो। प्राणियों द्वारा प्रशंसित कार्यों के लिए यह आहुति स्वीकार हो। भग देवता के निमित्त यह आहुति स्वीकार हो। अर्यमा देवता के निमित्त यह आहुति स्वीकार हो।
हे पवित्र कुशद्वय! तुम यज्ञ के कार्य में लगो। सर्वप्रेरक सविता देव की आज्ञा में वर्तमान रहकर छिद्र रहित पवित्र और सूर्य की किरणों से मैं तुम्हें उत्पवन सींचता हूँ। हे जलो ! तुम राक्षसों से कभी पराजित नहीं हुए। तुम वाणी के बन्धु रूप हो। तुम तेज से उत्पन्न सोम की रचना करने वाले हो। स्वाहाकार द्वारा पवित्र होकर तुम इस यजमान को राज्य श्री से अलंकृत करो।
ये जल चार पात्रों में स्थित है। ये वीर्यवान, अपराजेय पात्रों को पूर्ण करने वाले इस समय अभिषेक कार्य में वरण किए गए हैं। यह सबके धारण करने में घर की तरह और संसार का निर्माण करने में माता के समान हैं। इन जलों के शिशु रूप यजमान ने इन्हें आदर सहित स्थापित किया है।
हे ताप वस्त्र! इन छात्र धर्म वाले यजमान के लिए तुम गर्भ आधार भूत जल के रूप समान हो। हे रक्त कम्बल ! तुम इस छात्र धर्म वाले यजमान के लिए जरायु रूप समान हो। हे अधिवास ! तुम इस क्षात्रधर्म वाले यजमान के लिए गर्भ स्थल के रूप समान हो। हे उष्णीष ! तुम इस छात्र धर्म वाले यजमान के गर्भ बंधन जगह स्थल समान हो। हे धनुष! तुम इस इन्द्रदेव रूप समृद्धिवान यजमान के लिए वृत्र के रूप समान शत्रुओं के लिए शस्त्र हो। हे दक्षिणी कोटि ! तुम सखा सम्बन्धी और हे वामकोटि! तुम वरुण सम्बन्धी हो। हे धनुष! तुम्हारे द्वारा यह यजमान सब शत्रुओं को समाप्त करें। हे बाणों! तुम शत्रुओं का वध करने वाले बनो। तुम शत्रुओं को नष्ट करने वाले बनो। हे बाणों! तुम शत्रुओं को कम्पित करने वाले हो। हे बाणों! तुम पूर्व दिशा की ओर से इस यजमान की सुरक्षा करो। हे बाणों! तुम उत्तर दिशा की ओर से यजमान की सुरक्षा करो। सब दिशाओं से इसकी सुरक्षा में योगदान दो।
पृथ्वी पर रहने वाला मनुष्य समाज इस यजमान को जाने। गृह पालक अग्नि इस यजमान को जानें। यश में बढ़े हुए इन्द्र की वृत्तधारी मित्रावरण, सूर्य, चन्द्रमा, सर्वज्ञाता पूषा, विश्वेदेवा विश्व का कल्याण करने वाली धावा पृथ्वी सुख की आश्रय रूपी अदिति इस यजमान को जानें।
दंश स्वभाव वाले सर्प आदि सभी विनिष्ट हुए हैं। हे यजमान तुम पूर्व दिशा में जाओ। गायत्री छन्द तुम्हारी रक्षा करें। सामों के रथन्तर साम, स्तोत्रों में त्रिवृत स्तोत्र, ऋतुओं में बसंत ऋतु, परब्रह्म और धन रूप समद्धि तुम्हारी रक्षा करें।
हे यजमान! तुम दक्षिण दिशा में प्रस्थान करो। बृहत साम, पंच दश स्तोत्र, ग्रीष्म ऋतु, क्षात्र धर्म और ऐश्वर्य तुम्हारी रक्षा करें।
हे यजमान! तुम स्तोत्र पश्चिम दिशा में विचरण करो। जगती छन्द, वैरूप साम, सत्रह स्तोत्र, वर्षा ऋतु, वैश्य धर्म वाला ऐश्वर्य तुम्हारी रक्षा करे।
हे यजमान! तुम उत्तर दिशा में जाओ। अनुष्टुप छन्द वैराज साम, इक्कीस स्तोत्र, शरद ऋतु और यज्ञात्मक ऐश्वर्य तुम्हारी रक्षा करें।
हे यजमान! तुम ऊपर वाले लोक में प्रस्थान करो। पंक्ति छन्द, शाक्बर साम शिशिर ऋतु, तेजात्मक ऐश्वर्य तुम्हारे रक्षक तिरानवे और तैंतीस स्तोम, हेमन्त और बनें। नमूचि नाम के असुर का सिर दूर फेंक दिया।
हे व्याघ्घ्र चर्म! तुम सोम की त्वचा के रूप समान तेजस्वी हो। तुम्हारा तेज मेरे अन्दर में भी विद्यमान रहे। हे स्वर्ण ! तुम मुझे शत्रु से बचाओ। हे स्वर्ण के मुकुट! तुम विजय प्राप्त करने में साहसी हो। तुम धन के साहस के कारण ही शक्ति रूप हो और अविनाशी हो।
हे शत्रु का निवारण करने वाली दक्षिणी भुजा! और हे सखा के रूप समान हितैषी वाम भुजा! तुम दोनों ही पुरुष में परिपूर्ण बनो। स्वर्ण आदि अलंकार से परिपूर्ण, स्वर्ण के समान सामर्थ्य वाली तुम दोनों रात्रि के अन्त में जागृत रहो। उसी समय सूर्य भी तुम्हारे कार्य सम्पादनार्थ उदय होते हैं। फिर अदिति और दिति यथाक्रम पुण्य और पाप की दृष्टि से देखें। हे वामभुजा! तुम मित्र रूप हो और हे दक्षिणी भुजा! तुम वरुण रूप हो।
है यजमान! मैं तुम्हारा चन्द्रमा के प्रकाश से अभिषेक करता हूँ और तुम अभिषेक करके राजाओं के भी अधिपति होकर वृद्धि को प्राप्त हो और शत्रु के बाणों को निष्फल करते हुए प्रजा का पालन करो। हे सोम ! तुम भी यजमान की रक्षा करो। हे यजमान ! अग्नि के तेज से तुम्हारा अभिषेक करता हूँ। तुम क्षत्रियों के अधिपति होकर वृद्धि को प्राप्त होओ। शत्रुओं को जीतकर प्रजा का पालन करो। हे हवि वाले देवताओं! इस यजमान को शत्रु रहित करके महान आत्म लाभ वाला बनाओ। हे यजमान सूर्य के प्रचड तेज से तुम्हारा अभिषेक करता हूँ। तुम क्षत्रियों के अधिपति होकर आगे बढ़ो और शत्रुओं को विजय कर प्रजा का पालन करो। हे यजमान ! इन्द्र के ऐश्वर्य से तुम्हारा अभिषेक करता हूँ। तुम क्षत्रियों के राज राजेश्वर होकर प्रबुद्ध बनो और शत्रु विजेता बनकर प्रजा का पालन करने वाले बनो।
हे महान हवि वाले देवताओं! इस अमुक, अमुकी के पुत्र, अमुक नाम वाले यजमान के लिए महान क्षात्र धर्म, श्रेष्ठ बड़प्पन, महान जनराज्य और इन्द्रदेव की समृद्धि के लिए अमुक जाति वाली प्रजा का पोषण करने के लिए इसे विद्यमान करो और शत्रु को पृथक करके इसे शिक्षा दो। हे देशवासियों ! यह तुम्हारे सम्राट हैं और ब्राह्मणों के राजा सोम देव है।
संसार को स्वयं ही सींचने वाले गमनशील, फल देने वाले, आहुति के परिणाम स्वरूप जल वर्षाकारी पवर्त की पीठ से सूर्य मण्डल की ओर जाने वाले हैं। हे प्रथमक्रम! तुम विष्णु के प्रथम पाद प्रक्षेप से जीते हुए पृथ्वीलोक हो। तुम्हारी कृपा से यह यजमान अच्छी प्रकार से जीतने वाला हो। हे द्वितीय पराक्रम! तुम विष्णु के दूसरे पाद प्रक्षेप द्वारा जीते हुए अन्तरिक्ष हो। आपकी कृपा से यह यजमान अन्तरिक्ष पर यश प्राप्त करे। हे तृतीय पराक्रम! आप विष्णु के तृतीय पाद प्रक्षेप द्वारा जीते हुए त्रिविष्टप रूप हो। तुम्हारे आशीर्वाद से यह यजमान स्वर्गलोक को विजय करे।
हे प्रजापते! आपके अतिरिक्त अन्यत्र कोई भी संसार के विभिन्न कार्यों में समर्थ नहीं है, अतः आप ही हमारी मनोकामना पूर्ण करने में सक्षम हो। हम जिस इच्छा से आपका यज्ञ करते हैं, वह पूरी हो। यह और इसका पिता दीर्घजीवी बने और हम भी श्रेष्ठतम समृद्धिशाली रहें। यह आहुति स्वाहुत हो। हे रुद्र द्रेव! तुम्हारा प्रलय करने वाला जो महान नाम हैं, हे हवि तुम उस रुद्र देव नाम से स्वाहुत होओ। आप हमारे गृह में हुत होने से समस्त प्रकार कल्याण करने वाली हो। यह आहुति स्वीकार करो।
हे रथ! तुम इन्द्र देव के वज्र के समान काष्ठ से बने हो। हे घोड़ों! तुम्हें मित्र वरुण के बल से इस रथ में जोतता हूँ। हे रथ! अहिंसित अर्जुन के समान, इन्द्र के समान मैं भय निवारणार्थ और राज्य में सुभिक्ष सम्पादन के निमित्त तुम पर सवार होता हूँ। हे रथ वाहक अश्व! तुम मरुद्गण की आज्ञा पाकर गतिवान हो और शत्रुओं पर विजय प्राप्त करो। हमने आरम्भ किए कार्य को मन के द्वारा पूरा कर लिया, हम वीर्य (तेज) से सम्पन्न हो गए।
हे इन्द्र देव! तुम शत्रुओं का शीघ्र बहिष्कार करने वाले वज्रधारी और तेजस्वी हो । आप जिस रथ पर सवार होकर चतुर घोड़ों की लगाम पकड़ते हो, आपके उसी रथ से हम विमुक्त न हों और पीड़ा को न पाएँ, हम अमान्य करने वाले न हों।
गृह के पालनकर्त्ता अग्नि को स्वीकार हों। सोम की खुशी के लिए स्वीकार हों। मरुग्रगण की ओज के लिए स्वीकार हों। इन्द्र के पराक्रम के लिए स्वीकार हो। हे पृथ्वी! तुम समस्त प्राणियों की माता हो। तुम मुझे पीड़ित न करो और मैं भी आपको असन्तुष्ट न करूँ ।
आदित्य रूप आत्मा शुद्ध स्थान में दृढ़ होकर गर्व को दूर करता हूँ और वायु रूप से अंतरिक्ष में दृढ़ तथा अग्नि रूप से वेदी में दृढ़ होकर देवाह्वान होता है। वह आह्वानिय-रूप से यज्ञ स्थल में सभी के द्वारा पूजनीय मनुष्यों में प्राण रूप से दूढ़ इस प्रकार सभी स्थानों में स्थित रहता हूँ। मत्स्य आदि रूप से जल में, पशु आदि के रूप से वीर्य में, अग्नि रूप से पाषाण में और बादल रूप से सभी स्थानों को ग्रहण होता है। उसी पर ब्रह्म को स्मरण कर मैं रथ से उतरता हूँ।
हे शतमान! तुम सौ रत्ती परिणाम के हो, तुम साक्षात जीवन हो, अतः मुझ में प्राण धारण करो। हे शतमान ! तुम रथ में दक्षिणायुक्त होते हुए तेज वृद्धि के कारण रूप हो, तुम मुझमें तेज धारण कराओ। हे उद्‌म्बरि! तुम अन्न वृद्धि के कारण रूप हो। अतः मुझ में अन्न की स्थापना करो। यजमान की दोनों भुजाओं! तुम मित्रा-वरुण की प्रसन्नता के लिए रक्षित हुई हो, मैं तुम्हें उन्हीं की प्रीति के लिए पार्थित करता हूँ।
हे आसन्दि! तुम सुख रूप हो और आनन्द प्रदान करने वाली हो। हे अधोवास (बिछौन) तुम इस क्षत्रिय यजमान के स्थल रूप हो। हे यजमान! सुख प्रदान करने वाली आसन्दी पर चढ़ो। यह अधोवास और आसन्दी तुम्हारे उपवेशन के योग्य है, इस कारण इस पर विराजमान होओ। महान वचन वाले व्रतधारी इस यजमान ने साम्राज्य के लिए प्रजा पर आधिपत्य स्थापित किया है।
हे यजमान! तुम सबके जीतने वाले हो अतः पाँचों दिशाएँ तुम्हारे आधीन हों। हे ब्राह्मण! तुम ब्रह्म की महिमा से सम्पन्न हों। हे यजमान ! तुम अत्यन्त महिमा वाले, उपदेश देने में सक्ष्म और प्रजा के दुःख दूर करने वाले होने से सविता हो। हे यजमान ! तुम प्रजा की विपत्ति दूर करने वाले अमोघ वीर्य (तेज) होने से वरुण हो। हे ब्रह्म महिमा वाले यजमान ! तुम ऐश्वर्यवानों के रक्षक होने के कारण इन्द्र हो। हे यजमान! तुम आश्रितों को सुख देने वाले और शत्रुओं की महिलाओं को रुलाने वाले रुद्र हो। हे यजमान! तुम महिमामय हो इस कारण ब्रह्मा हो।
हे पुरोहित! तुम समस्त कार्यों में निपुण और महान कार्यों के प्रवर्त्तक हो, अतः इस जगह में आओ। हे स्फ्य! तुम इन्द्रदेव के वज्र हो, अतः मेरे यजमान के अनुकूल होकर कार्य सिद्ध करो। अग्निदेव, समस्त देवों में पहले पूजनीय एवं श्रेष्ठतम हैं। वे संसार के धारणकर्त्ता, हवि-सेवन करने वाले, स्वामी बढ़ोतरी स्वभाव वाले, गृहस्थ, धर्म के साक्षी हैं। वे अग्निदेव हमारी आज्याहुति का सेवन करें। यह आहुति स्वाहुत हो। हे अक्षो! आहुति प्रदान ग्रहण किए गए तुम सूर्य की किरणों से स्पर्द्धा करने वाले हो। सजन्मा क्षत्रियों में मेरे महान होने की घोषणा करो।
सर्वप्रेरक सविता, वाणी रूपी सरस्वती, रूप के अधिष्ठाता त्वष्टा (त्वचा) पशुओं के अधिष्ठाता पूषा, इन्द्र देवयोग में ब्राह्मणत्व प्राप्त बृहस्पति, ओजस्वी वरुण, तेजस्वी अग्नि, चन्द्रमा और यज्ञ के स्वामी विष्णु की आज्ञा में रहने वाला मैं समर्पण करता हूँ। हे ब्रीहि! तुम देवों के योग्य हो। अश्विद्वय की हर्षिता के लिए रस रूप समान हो।
ब्रीहि! तुम सरस्वती के स्नेह के लिए रस रूप में परिणत होओ। रक्षक और इन्द्रियों को अपने-अपने कार्य में संलग्न करने वाले इन्द्र देव की हर्षिता के लिए हे ब्रीहि तुम शुद्धता को ग्रहण होओ। इन्द्रदेव के मित्राभूत छन्ने द्वारा छाना गया, वायु द्वारा पवित्र हुआ सोम नीचा मुख करके इस छन्ने को गया है। हे सोम ! जैसे इस पृथ्वी में बहुत से जौं वाला एक किसान शस्य को विचारपूर्वक अलग करके दंश करता है। उसी प्रकार आप थोड़े से भी देवों के प्रिय हो। तुम यजमानों से सम्बन्धित भोज्य पदार्थ इस यजमान को ग्रहण कराओ। कुशा के आसनों पर विर। जमान हुए ऋत्विज हविअन्न प्राप्त कर आज्य का नाम लेकर यज्ञ करते हैं। हे सोम! तुम उपयाम पात्र में गृहित हो, अश्विद्वय की हर्षिता के लिए मैं तुम्हें प्राप्त करता हूँ। हे सोम! तुम उपयाम पात्र में ग्रहित हो, सरस्वती की प्रसन्नता के लिए मैं तुम्हें प्राप्त करता हूँ। हे सोम! तुम उपयाम पात्र में ग्रहित हो, इन्द्रदेव के स्नेह के लिए मैं तुम्हें प्राप्त करता हूँ। हे अश्विद्वय! नमुचि नामक राक्षस में स्थित सोम का भली प्रकार पान करते हुए तुमने इन्द्र की अनेक कार्यों में रक्षा की है।
हे इन्द्र! हितैषी अश्विद्वय मन्त्रद्रष्टा ऋषियों के मंत्र और कर्मों के प्रयोग द्वारा राक्षस के साथ रहे अशुद्ध सोम को पीकर विपत्ति में पड़े। जिस प्रकार पिता पुत्र की रक्षा करता है, वैसे ही अश्विद्वय (अश्विनी कुमार ने तुम्हारी रक्षा की है) हे मधवन! तुमने नमुचि का वध करके खुशीपूर्वक सोम का पान किया। देवी सरस्वती तुम्हारे अनुकूल होकर परिचर्या करती हैं।
अध्याय (11) :: ऋषि :- प्रजापति, नाभानेदिष्ठ, कुश्रि, शुन शेष, पुरोधा, भयो भू, गृत्समद सोभक, पायुः भरद्वाज, देवश्रवो देववात, पुस्कण्व, सिन्धु द्वीप विश्वमना, कण्वत्रित, चित्र, उत्कील, विश्वामित्र, आत्रेय, सोमाहुति, विरूप, वारुणि, जमदग्नि नाभानेदि; देवता :- सविता, वाणी, क्षत्रपति, गणपति, अग्नि, द्रविणोदा, प्रजापति, दम्पत्ति जायापति, होता, आप, वायु, मिश्र, रुद्र, सिनीवाली, अदिति, वसु रुद्रादित्य विश्वेदेवा, वस्वादयो मन्त्रोक्ता, आदित्यादयोलिंगोक्ता वस्वादयो त्रिंगोक्ता, अगन्या, दयो मन्त्रोक्त, अम्बा, सेनापति, अध्यापकोपदेशको, पुरोहित यजमानौ, सभापति यर्जमान, यजमान पुरोहितो; छन्द :- अनुष्टुप गायत्री, जगती, त्रिदुष्प, शम्बरी, पंक्ति, बृहती, कृति, घृति, उष्णिक्।
सर्व प्रेरक प्रजापति अपने मन को एकाग्र कर अग्नि के तेज का विस्तार कर और उसे पशु आदि में प्रवेश कहा जानकर प्रारम्भ में अग्नि को पृथ्वी से लाएँ। सर्वप्रेरक सविता देव की प्ररेणा से हम एकाग्र मन के द्वारा स्वर्ग प्राप्ति वाले कार्यों में लगाते हैं।
सर्वप्रेरक सविता देव कर्मानुष्ठान, यज्ञ या ज्ञान से अद्भुत हुए स्वर्गलोक में विचरण करने वाले और श्रेष्ठ प्रकाश के संस्कार करने वाले हैं। वे देवों को यज्ञ कार्य में योजित कर अग्निदेव के तेज को प्रकाशमान करते हुए देवों को अग्निचयन में लगाते हैं।
मेधावी ब्राह्मण यजमान के होता, मध्वर्यु आदि इस अग्नि चमन कार्य में अपने धन को लगाते हैं और बुद्धि को भी उधर लगाते हैं। एक अद्वितीय सविता देव बुद्धि के ज्ञाता त्रऋत्विजों और यजमान के उद्देश्य के जानने वाले हैं। उन्हीं ने संसार की त्याना की है। उनके द्वारा वेदों की स्तुति बहुत ही महिमामयी है।
हे यजमान दम्पत्ति! मैं तुम्हारे निमित्त नमस्कार वाला, अन्न घी की आहुति वाला, प्राचीन ऋषियों द्वारा अनुष्ठित, आत्मज्योति को बढ़ाने वाला अग्नि चयन कार्य सम्पादित करता हूँ। इस यजमान का यज्ञ दोनों लोकों में वृद्धि को प्राप्त हो, प्रजापति के अविनाशी पुत्र समस्त देव भी उसके यश को सुनें। अन्य समस्त देव जिन सविता देव की प्रशंसा को अपने तप की शक्ति से अनुकूल कर लेते हैं और जिन सविता देव से समस्त लोकों की उत्पत्ति की है, वे देवता समस्त प्राणधारियों में अपनी प्रशंसा से विद्यामान है। हे सविता देव! यज्ञ कर्म ग्राह्यता के लिए यजमान को समृद्धि के लिए प्रेरित करो। वे अद्भुत लोक में वास करने वाले ज्ञान के सोधक, वाणी के ग्रहणकर्त्ता सविता देव हमारे हृदय के ज्ञान को ब्रह्मज्ञान से शुद्ध करें। वही वाणी के स्वामी हमारी वाणी को सुमधुर करें।
हे सविता देव! यह यज्ञ देवताओं को सन्तुष्ट करने वाला, मित्रता निष्पादन करने वालों का ज्ञाता, सब यज्ञ कर्मों को या ब्रह्म को वश में करने वाले और धन को विजय करने वाला है। तुम स्वर्ग को जिताने वाले इस फल युक्त यज्ञ को सम्पन्न करो। हे प्रभु! स्तोत्र को समृद्ध करो और गायत्री साम वाले रथन्तर साम से वृहत् साम को सम्पन्न करो। यह आहुति स्वीकार हो। हे अग्नि ! सर्व प्रेरक सविता देव की प्रेरणा से गायत्री छन्द के प्रभाव से अश्विनी कुमारों के और पूषा के हाथों से, मैं तुम्हें अंगिरा के समान ग्रहण करता हूँ। तुम अंगिरा के समान त्रिष्टुप छंद के प्रभाव से पृथ्वी के भीतर से पशुओं के हितकारी अग्नि को अंगिरावत आहरण करो।
हे अग्नि! तुम काष्ठ विशेष के लिए स्त्री रूपा और शत्रुओं से शून्य हो। हम तुम्हारे द्वारा जगती छन्द के प्रभाव से धरा के भीतर विद्यमान अंगिरा के रूप समान अग्नि को खोदकर निकालने में समर्थ हों।
सर्वप्रेरक सविता देव अंगिरावत स्वर्ण की अग्नि को हाथ में लेकर अग्नि की ज्योति का निश्चय करके पृथ्वी के नीचे से अनुष्टुप छंद के प्रभाव से निकाल लाए।
हे शीघ्रगामी अश्व! इस श्रेष्ठतम यज्ञ स्थल को गन्तव्य मानकर शीघ्र प्रस्थान करो। तुम स्वर्गलोक में आदित्य के समान उत्पन्न हुए हो, अंतरिक्ष में तुम्हारी नाभि और भू पर तुम्हारी जगह है। हे यजमान दम्पत्ति! तुम दोनों धन की वृद्धि करने वाले हो। इस अग्नि कार्यों में अपने हितकारी, अग्नि रूप मिट्टी वहन करने वाले रासभ को परिपूर्ण करो। परस्पर मित्र भाव को प्राप्त हुए हम ऋत्विज और यजमान सब कार्यों में उत्साह युक्त, बलवान अज को देवता और पितरों के रस यज्ञ में, रक्षा के लिए आहुत करते हैं।
हे अश्व! तुम रिपुहन्ता और निन्दा के निवारक हो। तुम हमारे सुख के कारण आधार रूप यहाँ आगमन करो। क्योंकि तुम रुद्रदेव के गणों पर आधिपत्य प्राप्त हो। हे रासभ ! तुम कल्याण प्रद मार्ग वाले अभय दाता, ऋतविज यजमान के भय को दूर करने वाले, कार्य में समान भाव से नियुक्त, धरा के एवं विस्तृत अंतरिक्ष को विशेषतः विचरण करने वाले होओ।
हे अग्ने! पृथ्वी के स्थान से पशुओं से संबंधित अंगारे के समान अग्नि को निकालो। पशु सम्बन्धी अग्नि को अंगारे के समान प्राप्त करने के लिए सामने होते हैं। पशु सम्बन्धी अग्नि को हम अंगारे के समान सम्पादित करें।
ऊषा काल से पहले जो अग्नि दीप्तिमय रहे, वह अग्नि पहले दिनों को प्रकाशमान करते हुए सूर्य किरणों को असंख्य प्रकार से संचालन करते हैं। हम लोकों के रचनाकार उस अग्नि को स्वर्ग और धरा में भली प्रकार से क्रमपूर्वक विस्तृत हुआ देखते हैं।
यह तेज गति वाला घोड़ा युद्ध मार्ग में जाता हुआ शत्रु को कंपित करता है। महिमामयी पृथ्वी के यज्ञ स्थान को प्राप्त होता हुआ यह अश्व स्थिर नेत्रों द्वारा अग्नि को देखता है।
हे अश्व ! तू धरा (पृथ्वी) को खोदता हुआ अग्नि को ढूँढ, भूमि के तल को स्पर्श कर यह प्रदेश अग्नियुक्त मृतिका वाला है यह बता, जिससे उस स्थान पर अग्नि को खोदकर हम निकालें।
हे अश्व! स्वर्ग तुम्हारी पीठ है। पृथ्वी तुम्हारे पैर हैं। अंतरिक्ष तुम्हारी आत्मा है। समुद्र तुम्हारी योनि (उत्पत्ति स्थान) है। तुम अपने नेत्रों द्वारा मृत्तिका देखकर रण के इच्छुक शत्रु और असुरों को मृत्तिका में स्थिर जानकर अपने पैरों से रौंद डालो।
हे अश्व! तुम धन प्रदान करने वाले हो। श्रेष्ठतम सौभाग्य की वृद्धि के लिए इस स्थान से उठो और हम भी पृथ्वी के ऊपरी भाग में अग्नि को कुरेदते हुए उत्कृष्ट मति से युक्त हों।
यह धन देने वाला भ्रमणशील अश्व मृत्पिण्ड से पृथ्वी में उतर आया और इसने श्रेष्ठलोक को पुण्य कर्म वाला किया। हम उस देश में दुख शून्य और अत्यन्त श्रेष्ठ स्वर्ग पर चढ़ने की कामना करने वाला श्रेष्ठ सुख को देने वाली अग्नि को मृत्पिण्ड से खोदने का प्रयत्न करते हैं। हे अग्नि! सब लोकों में निवास करते हुए तिर्यक ज्योति द्वारा विशाल धूम से महान और अनेक स्थानों में व्याप्त होने वाले, विविध अन्नों के लिए उत्साहित, साक्षात दृष्टि के द्वारा प्रकाशित करता हूँ।
हे अग्नि! तुम प्रत्यक्ष रूप से सर्वत्र व्याप्त हो। मैं तुम्हें आज्य आहुति द्वारा दीप्त करता हूँ। तुम शांत हृदय से उस आहुति का सेवन करो। अग्नि रूप मनुष्यों द्वारा सेवन करने के योग्य और दर्शनीय अग्नि अग्राह्य करने के योग्य नहीं है।
क्रान्तदर्शी अग्नि अन्नों के स्वामी हैं। वे हवि देने वाले यजमान को अनेक प्रकार से श्रेष्ठ रत्न देते हुए हवियों को ग्रहण करते हैं।
हे अग्ने! तुम बलपूर्वक मंथन द्वारा उत्पन्न होती हो। तुम पुरु से सबके शरीरों में निवास कर उनका पालन करने वाले, ब्रह्मरूप, नित्य राक्षसों या पापों को नष्ट करने वाले हो, हम तुम्हारा अब ओर से ध्यान करते हैं।
हे अग्ने! तुम मनुष्यों का पोषण करने वाले, परम शुद्ध और तेज से अंधकार व गर्मी को दूर करने वाले, रोज और मंथन द्वारा रचित होने वाले हो। तुम जलों में विद्युत रूप से आज, पाषाण घर्षण से और अरणियों के घर्षण से प्रकट होते हो। तुम यज्ञकर्त्ता यजमानों के रूप हो।
हे अभ्रे! सविता देव की प्रेरणा से, अश्विनी कुमारों की भुजाओं से और पूषा के हाथों से भूमि के उत्तरी प्रदेश से, पशु सम्बन्धी अग्नि को अंगिरा के समान खनन करता हूँ।
हे अभ्रे! तुम ज्वालामुखी रूपी, श्रेष्ठमुख वाले, निरन्तर विद्यमान किरणों द्वारा चमकते हुए और अहिंसक, प्रजा की भलाई हेतु शांत रहने वाले हो। मैं तुम्हें धरा के नीचे से अंगिरा के समान रूप खोदता हूँ।
हे मित्र! तुम जलों के ऊपर रहने से उनकी पीठ के समान हो। अग्नि के कारण रूप के भी कारण हो, सिंचनशील जल समुद्र को सब ओर से बढ़ाते हुए, महान जल में भली प्रकार विस्तृत हो।
हे कृष्णाजिन! और हे पुष्कर पर्ण! तुम दोनों छिद्र रहित और अत्यन्त विस्तारित हो। तुम अग्नि के लिए सुख प्रदाता और कवच (ढाल) रूप समान तुल्य रक्षक हो। तुम पुरीष्य अग्नि को आच्छादित और धारण करो।
हे कृष्णाजिन और हे पुष्करपर्ण! तुम स्वर्ग प्राप्ति के साधन रूप समान मन वाले, निरन्तर तेज वाले अग्नि को भीतर पेट में धारण करते हुए अपने हृदय से अग्नि को हमेशा अच्छादित और धारण करो।
हे अग्नि! तुम पशुओं की हितैषी और सभी प्राणियों को पालनकर्त्ता हो। सबसे पहले अथर्वा ने तुम्हें उत्पन्न किया है। हे अग्नि ! अथर्वा ने जल के मंथन द्वारा तुम्हें प्रकट किया और संसार के सभी ऋत्विजों ने आदरसहित तुम्हारा मंथन किया।
अथर्वा के पुत्र दध्यडऋषि ने उस वृत्रनाशक रूप द्वारा तुम्हें प्रज्वलित किया। हे अग्ने ! तुम श्रेष्ठतम मार्ग में अवस्थित और हृदय को सींचने वाले हो। तुम शत्रुओं और पापों को पराभूत करने वाले तथा धनों को विजय करने वाले हो। मैं तुम्हें प्रकाशमान करता हूँ। r
हे अग्ने! तुम आह्वान कार्य में नियुक्त होते ही, तुम सचेष्ट होने वाले और कृष्णाजिन पर स्थापित पुष्करपर्ण पर विद्यमान हो। तुम उत्कृष्ट कर्म रूप यज्ञ को आरम्भ करो। हे देवताओं के लिए प्रसन्नताप्रद अग्नि! तुम हवन सामग्री देवताओं को यज्ञ करते समय उन्हें सन्तुष्ट करती हो। अतः यजमान में दीर्घ वायु और अन्न को स्थापित करो।
हे देव आह्वानकर्त्ता! अपने कार्य के ज्ञाता, तेजस्वी भ्रमणशील, निपुण, सिद्ध कार्य वाले तथा अत्युत्कृष्टमति वाले, सहस्त्रों के पोषक, पार्थिव अग्नि अत्यन्त शुद्ध जीभ वाले होम के लिए प्रतिष्ठित हुए। हे अग्निदेव ! तुम यज्ञ के उपयुक्त देवों के स्नेह पात्र और महान हो। इस कृष्णाजिन पर स्थापित पर्ण पर दृढ़ होकर प्रज्जवलित होती हुई आज्य आहुति द्वारा दर्शनीय होती हो। तुम अपने सघन धूम का त्याग करो।
हे अध्वर्यो! प्राणियों के आरोग्य के निमित्त दिव्य और तेज सम्पन्न अमृत रूप जलों को इस खनन के प्रदेश में सींचो और सींचे हुए जलों के स्थान से श्रेष्ठ फल वाली उत्तम औषधियाँ प्राप्त हों।
हे पृथ्वी! उत्तान मुख से अव्यस्थित तुम्हारा हृदय श्रेष्ठ एवं विकसित है, उस स्थान को वायु देवता जल प्रक्षेप और तृणादि द्वारा भली प्रकार पूर्ण करें। हे देव ! तुम समस्त देवों के आत्मा रूप भ्रमण करते हो। इसलिए यह पृथ्वी तुम्हारे लिए प्रजापति रूप से वषट्‌कार से परिपूर्ण हो। यह अग्नि भली-भाँति प्रकट होकर अपनी प्रदीप्ति से सुख रूप स्वर्ग के रूप समान ग्रह कृष्णाजिन (काले मृर्ग चर्म) पर विराजमान हों। हे अग्नि! तुम प्रकाशमय वैभव वाले हो। तुम इस अद्भुत रंग वाले कृष्णाजिन रूपी वस्त्र को ग्रहण करो।
हे अग्नि ! तुम उत्कृष्ट यज्ञ का निर्वाह करने वाली हो अतः उठो और हमें दिव्य गुण-कार्य वाली बुद्धि के द्वारा समृद्ध करो। तुम उत्तम किरणों से युक्त महान तेज से सब प्राणियों के दर्शन के निमित्त श्रेष्ठ यश के साथ आओ।
हे अग्नि! सर्वप्रेरक सविता देव हमारी सुरक्षा हेतु देवों के समान रूप उठकर दृढ़ हो। उन्नत होते हुए तुम भी अन्न को प्रदान करने वाले हो। इसलिए ऋत्विज मंत्रों के उच्चारण पूर्वक आह्वान करते हैं। उसी भाँति तुम ऊँचे उठकर सविता देव के रूप समान अन्न प्रदान करते हो।
हे अग्ने ! तुम श्रेष्ठ पूजन के योग्य, औषधियों के पोषण के लिए स्थित अद्भुत वर्ण ज्वालाओं से युक्त, नित्य नवीन होने से शिशु रूप, स्वर्ग पृथ्वी के मध्य उत्पन्न गर्भ के समान हो। तुम रात्रि रूप अंधकार को हटाते हुए और औषधियों, वनस्पतियों के सकाश से शब्द करते हुए भ्रमण करो। हे गमन शील प्राणी ! तुम स्थिर शरीर वाले हो। वेगवान होकर अन्न के कारण रूप होते हो। तुम पाशुरूप भृतिका के वहन करने वाले हो।
हे अग्नि के शिशु समान रूप अज तुम भी अग्नि रूप ही हो। तुम मनुष्यों की प्रजाओं का कल्याण करने वाले हो। तुम द्यावा पृथ्वी अंतरिक्ष और औषधियों को संतृप्त मत करना।
गतिमान घोड़ा गर्जना करता हुआ यात्रा करे। दिशाओं को ध्वनिमान करता हुआ रासभ पीछे चले। यह अश्व पुरीष्य अग्नि को धारण करके कर्म से पूर्ण नष्ट न हो। यह आहुति के फल रूप दान में समर्थ जलों में विद्युत रूप, समुद्र में वरुण रूप अग्नि को धारण करता हुआ चले। हे अग्नि ! हवि भक्षण (हवन सामग्री का भोग) करने हेतु आओ।
जो आदित्य रूप अग्नि है उस ऋतु और सत्य रूप अग्नि को अज पर रखते हैं। पुरीष्य अग्नि को अंगिरा के समान चुनाव करते हैं। समस्त औषधियों! इस शान्त और कल्याणमय जगह में अपने अभिमुख आते हुए अग्नि को हर्षित करो। हे अग्ने ! तुम यहाँ बैठकर हमारे समस्त अकल्याणमय जगह में अपने अभिमुख आते हुए अग्नि को हर्षित करो। हे अग्ने! तुम यहाँ बैठकर हमारे सभी अकल्याण और व्याधियों को समाप्त करते हुए, हमारी जो बुद्धि यज्ञ आदि से पराङ्मुख हो गई है उसे शुद्ध करो।
हे श्रेष्ठ पुष्पों वाली और उत्तम फलों वाली औषधियों! तुम इस अग्नि को ग्रहण करो। यह अग्नि गर्भ रूप ऋतु काल को प्राप्त कर प्राचीन स्थान में स्थित हुई हो।
हे अग्नि देव! तुम श्रेष्ठ शक्तिवाले हो। समस्त शत्रुओं, राक्षसों और रोगों को नष्ट करो। मैं महान कल्याण के लिए श्रेष्ठ सुख से आह्वान के योग्य अग्नि को हर्षित करने वाले कर्म में शान्त हृदय से संलग्न हूँ।
हे जलो! तुम कल्याण प्रद हो, स्नान-पान आदि के द्वारा सुखी करने वाले हो। तुम हमारे लिए श्रेष्ठ दर्शन और ब्रह्मानंद की अनुभूति के निमित्त स्थापित हो।
हे जलो! तुम्हारा जो कल्याणप्रद रस इस लोक में विद्यमान है, हमें उस रस का भागी बनाओ। जैसे स्नेहमयी माता अपने शिशु को दूध पिलाती है वैसे ही रस प्रदान करो।
हे जलो! तुमसे सम्बन्धित उस रस की प्राप्ति हेतु हम शीघ्रता पूर्वक विचरण करें।
जिस रस के एक हिस्से से तुम समस्त संसार को संतुष्ट करते हो और उसके हिस्सों को हमारे लिए उत्पन्न करते हो, उस रस की प्राप्ति के लिए हम तुम्हारे नजदीक आए हैं। हे जलो! तुम हमें प्रजा उत्पादक बनाओ।
स्वर्ग और पृथ्वी को ज्योति रूप अज सोम के सहित मित्र देवता मुझे अध्वर्यु को देते हैं और मैं तुम श्रेष्ठ जन्म वाले प्रज्ञावान अग्नि को प्राणियों के रोग निवारणार्थ पिंड में युक्त करता हूँ।
जिन रुद्रों ने पार्थिव पिण्ड को पत्थर चूर्ण कर श्रेष्ठ दीप्ति वाली अग्नि को प्रकाश मान किया है, उन रुद्रों का तेज देवताओं के नीचे भली-भाँति प्रकाशमान होता है। अमावस्या के अभिमानी देव सिनीवाली, मतिवान वसुगण और रुद्रगण द्वारा सुसिद्ध मृतिका को हाथों में लें। मधुर करके उस कार्य के योग्य बनाएँ।
हे पूजनीय देवमाता अदिति! हे सुन्दर केश, मस्तक और शरीर वाली! अपने हाथों में पवित्र पात्र उषा को स्थापित करो।
अपनी सामर्थ्य द्वारा अदिति देवी सुमतिपूर्वक अपने हाथों से पवित्र पात्र को पकड़े और वह पवित्रपात्र भले प्रकार अपने मध्य में अग्नि को उसी प्रकार धारण करे। जिस प्रकार माता अपने शिशु को गोदी में लेती है। हे मृत्तिका-पिण्ड तुम यज्ञाहवनीय के मस्तक रूप हो।
हे उखे! तुम्हें गायत्री छन्द के प्रभाव से वसुगण अङ्गिरा के रूप समान करें। तब तुम स्थिर होकर धरा के समान होओ और मुझ यजमान के लिए संतान, धन पुष्टि, वीर्य, गौओं का स्वामित्व, सजातीय बाँधवों का सौहार्द आदि धारण कराओ। हे उखे ! त्रिष्टुप छन्द के प्रभाव से रुद्रगण तुम्हें अंगिरा के रूप समान बनाएँ। तुम अंतरिक्ष के समान दृढ़ होकर मुझ यजमान को संतान, धन, गौ आदि की प्राप्ति कराओ। हे उखे ! जगती छन्द के द्वारा आदित्यगण तुम्हें अंगिरा के रूप समान बनाएँ। तुम स्वर्ग के समान स्थिर होकर मुझ यजमान को संतान, गौ आदि पशुधन और सौहार्द को ग्रहण कराओ। हे उखे! अनुष्टुप छन्द के द्वारा सर्व हितैषी विश्वेदेवा तुम्हें अंगिरा के रूप समान बनाएँ। तुम दिशाओं के रूप वाले होकर दृढ बनो और मुख यजमान को महान अपत्य, गवादि धन और समान रूप मनुष्यों का सौहार्द ग्रहण कराओ। हे रेखा ! तुम मिट्टी से बनी हो। तुम अदिति के प्रभाव से इस उखा की काच्ची गुण स्थान से परिपूर्ण हो। हे उखे ! अदिति तुम्हारे मध्य को प्राप्त करें। देवमाता अदिति ने इस धरा रूप मृत्तिका की अग्नि की जगह भूत उखा को निर्मित किया है और यह कहते हुए कि हे पुत्रो! तुम इसे पकाओ पवित्र कार्य हेतु अपने पुत्रों देवताओं को प्रदान किया।
हे उखे! गायत्री छन्द के प्रभाव से वसुगण तुम्हें अंगिरा के समान धूप देते हैं। हे उखे ! त्रिटुष्प छन्द के प्रभाव से रुद्रगण तुम्हें अंगिरावत धूमिल करते हैं। हे उखे! जगती छन्द के प्रभाव से आदित्यगण तुम्हें अंगिरा के समान धूपित करते हैं। हे उखे! अनुष्टुप छन्द के प्रभाव से वैश्नावर विश्वे देवा तुम्हें अंगिरावत धूपित करते हैं। हे उखे! इन्द्र तुम्हें धूपित करें। हे उखे ! विष्णु तुम्हें धूपित करें।
हे गर्त! समस्त देवों की अधिष्ठात्री देवी समस्त अद्भुत गुण सम्पन्न अदिति धरा के ऊपरी हिस्से में अंगिरा के समान रूप तुझे खुदाई करें। हे उखे! देवों की पत्नियाँ समस्त देवताओं के युक्त दीप्तिप्रद धरा के ऊपर तुम्हें अंगिरा के रूप समान स्थापित करें। हे उखे ! समस्त देवताओं का अधिष्ठात्री देवी वाणी की अधिष्ठात्री तुम्हें धरा के ऊपर अंगिरा के रूप समान दीप्ति से परिपूर्ण करें। हे उखे! समस्त देवों से परिपूर्ण अहोरात्र के अभिमानी देव तुम्हें धरा अंगिरा के समान पकाएँ। हे उखे! गमनशील, नक्षत्रों के अभिमानी देवता, समस्त देवों के युक्त तुम्हें धरा के ऊपर अंगिरा के समान रूप से पकाएँ।
जो मनुष्यों को पुष्ट करने वाला, दीप्तिमान, मित्र देवता से रक्षित, यश नाम से प्रसिद्ध अद्भुत और सुनने योग्य है, उस यश की हम याचना करते हैं।
हे उखे! सुन्दर हाथ, उंगली और भुजा वाले देवता सर्व प्ररेक सविता अपनी बुद्धि और शक्ति के द्वारा तुम्हें प्रकाशित करते हैं।
हे उखे! तुम पाक-गर्त से बाहर आकर महिमामयी बनो और स्थिर होकर अपने कार्य में लगो। हे मित्र देवता! प्राणियों की हितकारिणी इस उखा को तुम्हें रक्षार्थ देता हूँ। यह उखा किसी प्रकार टूटे नहीं, इसी प्रकार रहें।
हे उखे! गायत्री छन्द के प्रभाव से वसुगण तुम्हें अंगिरा के रूप समान बकरी के दूध से सींचे। हे उखे! त्रिष्टुप छन्द के प्रभाव से रुद्रगण तुम्हें अंगिरा के समान बकरी के दूध से सींचें। हे उखे ! जगती छन्द के प्रभाव से आदित्यगण तुम्हें अंगिरा के समान अजा दुग्ध से सिंचित करें। हे उखे! अनुष्टुप छन्द के प्रभाव से विश्वेदेवा तुम्हें अंगिरा के समान अजादुग्ध से सींचें।
यज्ञ संकल्प की प्रेरणा करने वाले अग्नि को यह आहुति स्वीकार हो। मन, मेधा, श्रुति, स्मृति की प्रेरणा करने वाले अग्नि के निमित्त स्वीकार हो। अविज्ञात अनुष्ठान के ज्ञान साधक और विज्ञान की प्रेरणा वाले अग्नि के लिए स्वीकार हो। वाणी और धारणा के प्रेरक अग्नि के निमित्त यह आहुति स्वाहुत हो। मन्वन्तर के लिए यह आहुति स्वाहुत हो। वैश्वानर अग्नि के निमित्त दी गई यह आहुति स्वीकार हो।
समस्त मनुष्य फल ग्रहण कराने वाले ईश्वर की मित्रता की इच्छा करें, ज्ञान की संतुष्टि के लिए अन्न की मनोकामना करें। जिस ईश्वर से धन की प्रार्थना की जाती है। उनके लिए यह आहुति स्वाहुत हो।
हे उखे! तुम विदीर्ण मत होना, तुम विनष्ट मत होना। तुम प्रगल्भतापूर्वक इस वीर कार्य को करो। अग्नि और तुम दोनों ही हमारे इस कार्य को सम्पूर्ण करोगे।
हे उखे! यजमान का मंगलमय करने के लिए मजबूती को ग्रहण कसे। अन्न के लिए तुमने माया धारण की है। यह हवि रत्न देवों को हर्षित करने वाला हो। जब तक कार्य पूर्ण हो तब तक इसी यज्ञ में उपस्थित रहो।
जिन अग्नि का मुख्य भक्ष्य पलाश काष्ठ है, जिनका मुख्य पान घृत है जो प्रचीन होता है और बलपूर्वक मन्थन द्वारा उत्पन्न होने वाले हैं, वह अदभुत रूप वाले अग्नि देव इन समिधाओं का भक्षण करें।
शत्रुओं के संग्राम में हमारे व्यक्तियों की सुरक्षा हेतु उनके निकट प्रस्थान करो। हे अग्ने! मैं जिस स्थान में दृढ़ हूँ उस स्थान की भली-भाँति सुरक्षा करो।
हे रोहित नामक अश्व वाले अग्नि देव! तुम अनेकों के प्रिय और अत्यन्त दूरवर्ती स्थान में निवास करने वाले हो। तुम हमारे इस यज्ञ में आओ और रणक्षेत्र में शत्रुओं को नष्ट कर कार्य को सम्पन्न करो।
हे अग्नि! तुम्हें जो भी काष्ठ अर्पित किया जाए, वही तुम्हें घृत के समान प्रिय लगे। हे अग्नि! तुम उस काष्ठ को प्रसन्नतापूर्वक भक्षण करो।
हे अग्नि! उपजिह्विका (दीपक) जिस काष्ठ का भक्षण करती है, बल्मिक (दीमक) जिस काष्ठ को नष्ट करती हुई व्याप्त होती है, वह काष्ठ तुम्हें घृत के समान प्रिय लगे और उस काष्ठ को तुम प्रसन्नतापूर्वक उपभोग करो।
हे अग्ने! हम तुम्हारी शरण वाले निरन्तर सचेत रहते हुए समिधा रूप तुम्हारे भक्ष्य को सम्पादित करते हैं। जैसे अश्वशाला में स्थित घोड़े को प्रतिदिन तृणादि देते हैं। वैसे ही प्रसन्न होते हुए हम धन की सन्तुष्टि और अन्न की वृद्धि से प्रसन्नचित्त होते हुए कभी हिंसित न बने। धरा की नाभि के रूप समान उखा के बीच प्रज्जवलित आह्वानीय अग्नि के दीप्तिमान होने पर अन्न से तृप्त होने वाले वृद्ध उक्थ वाले, यजन योग्य युद्धों में विजय युक्त शत्रुओं के बहिष्कारकर्त्ता अग्नि को हम श्रेष्ठ धन द्वारा पालन के लिए आहुत करते हैं। जो शत्रु सेना हमारे सम्मुख आकर ललकार देने वाली हैं, जो अस्त्रधारी चार, डाकू है, उन सभी को हे अग्ने! तुम्हारे मुख में स्थापित करता हूँ।
हे ऐश्वर्य सम्पन्न अग्नि! गाँव में प्रत्यक्ष चोरी करने वाले या अन्य प्रकार से धन को हरण करने वाले तस्करों को तुम अपनी दाढ़ों में रखकर चबा डालो। निर्जन स्थान में डकैती डालने वालों को अगले दाँतों द्वारा और अन्य प्रकार के चोरों को ठोड़ी द्वारा घायल करो। इस प्रकार से सब दुष्कर्मियों का भक्षण करो।देहात में वास करने वाले जो मलिम्लुच और स्तेम संज्ञक अज्ञात चोर तथा सुनसान देश में विचरण करने वाले पापी हैं उन सभी को तुम्हारी दाढ़ों में डाल देता हूँ।
जो व्यक्ति हमसे शत्रुता करता है, जो पुरुष हमारे देय धन को हमें न दे, जो हमारा निन्दक है और जो हमारा विनाश चाहता है ऐसे सब प्रकार के पापी पुरुषों को हे अग्नि तुम भस्म कर डालो।
हे अग्ने! तुम्हारी कृपा दृष्टि से मेरा ब्राह्मणत्व तीक्ष्ण (तीव्र) हुआ है और मेरी समस्त इंद्रियाँ अपने अपने कर्मों में समर्थवान हुई हैं। मैं जिसका पुरोहित हूँ। उसका क्षात्र धर्म भी विजयशील हो गया।
इस अग्नि की कृपा पाकर इन ब्राह्मणों और राजाओं के मध्य अपनी बाहु को ऊँचा किया। ब्रह्म तेज ने सबकी दीप्ति को लाँघा और बल ने सबके बल पर विजय पाई है। मैं शत्रुओं को मंत्र के जल से नष्ट करता हूँ और अपने पुत्र, पौत्रादि को श्रेष्ठ बनाता हूँ।
हे अन्न के पालनकर्त्ता अग्नि देव! हमारे लिए रोग रहित, शक्ति देने वाला अन्न दो। अन्न को देने के बाद हमें हर प्रकार से बढ़ाओ और हमारे मनुष्यों तथा पशुओं को भी अन्न प्रदान करो।
इन्द्र देव सविता को प्राप्त करें। पूषा उसे भली-भाँति पकड़े, जिससे जल और अन्न से सम्पन्न होकर उत्तरोत्तर समृद्धि को ग्रहण करें। वह जल को खाली सुखपूर्वक धरा को खोदे। किसान सुखपूर्वक वृषभों को जोतें। मेघ मृदुजल की वर्षा करता हुआ धरा को जल से युक्त करे। हे अन्न और क्षेत्र में अधिपतियों! हमें सुखी बनाओ।
हे अग्नि देव! तुम हमारे पूर्वजों की धरोहर हो। तुम्हारा यजन कर ही हमारे पूर्वज महान विद्वान धनवान और गौओं से सम्पन्न हुए। उसी प्रकार हम भी तुम्हारी वन्दना करते हैं। हमें भी सम्पन्न बनाओ।
अध्याय (12) :: ऋषि :- वतसप्रि, कुत्स श्यावाश्वा, ध्रुव, शनु, शेप, त्रित, विरुपाक्ष, विरूप, तापस, वशिष्ठ, दीर्घतमा, सोमाहुति, विश्वामित्र, प्रिय मेधा, सुत जेतृ मधुच्छन्दा, मधुच्छन्दा, विश्वावसु, कुमार हारित, भिषग वरुण, हिरण्यगर्भ, पावकाग्नि, गौतम, वत्सार, प्रजापति; देवता :- अग्नि, सविता, वारुत्यान, विष्णु, वरुण, जीवेश्वरो, आप, पितर, इन्द्र दम्पत्ति पत्नी, निर्ऋति, यजमान, कृषिवला, कवयोवा, कृषिवला, मित्रादयो लिंगोक्ता, अधन्या, अश्विनी, वैद्य, विकित्सु औषध, वैधा, भिषज भिषावटा, औषधि, विद्वान, सोम; छन्द :- पंक्ति, त्रिटुष्प, जगती, घृति, कृति, अनुष्टप गायत्री, उष्णिक बृहती।
सूर्य प्रत्यक्ष दिखाई देने वाले, अवहिष्कृत और जीवन रूप होते हुए लक्ष्मी प्रदान करने के लिए दिव्य प्रकाश से प्रकाशमान होते हैं। उसी प्रकार यह अग्नि पुरोडास आदि से प्रकाशित होते हैं। स्वर्ग के निवासी देवताओं ने इस अग्नि को प्रकट किया है।
हे उखे! समान हृदय वाले रात-दिन कृष्ण और शुक्ल रूप में एक दूसरे से मिलते हुए शिशु रूप अग्नि को तृप्त करते हैं। इस तरह से दिन और रात्रि रूप इन्दु से उखा को प्राप्त करता हूँ। धावा धरा के बीच रूप अंतरिक्ष में उठाई गई उखा अत्यन्त सुसज्जित होती है, मैं उसे प्राप्त करता हूँ। यज्ञ द्वारा धन रूप समान फल प्रदान करने वाले देवताओं ने अग्नि को धारण किया या यज्ञकर्त्ता यजमान के प्राणों ने इस उखा रूप अग्नि को भली-भाँति धारण किया है।
वरणीय एवं विद्वान सविता देव की अनुज्ञा में वर्तमान विश्व की सभी वस्तुएँ अनेक रूप धारण करती हैं। मनुष्य और पशु आदि सब प्राणी उन सविता से ही अपने-अपने कर्म की प्ररेणा पाते हैं। वही सविता स्वर्ग को प्रकाशित करते हुए उया के जाने पर विराजमान होते हैं। हे उषा के अग्र भाग! जिस कारण तुम ऊर्ध्वगामी होने में समर्थ और महान हो, उसी कारण तुम श्रेष्ठ पंख वाले गरुड़ के समान गति वाले भी हो। त्रिवृत स्तोम तुम्हारा सिर, गायत्री छन्द तुम्हारे नेत्र, बृहत्साप और रथान्तर तुम्हारे पंख, स्तोत्र तुम्हारी आत्मा, इक्कीस छंद तुम्हारे शरीर के विभिन्न अवभव हैं। यजु तुम्हारे नाम, वामदेव, नामक सोम तुम्हारा देह यज्ञायज्ञिय सक्य तुम्हारी पूँछ और धिष्ण्य में स्थित अग्नि तुम्हारे खुर, नख आदि हैं, इसलिए हे अग्नि ! तुम स्वर्ग की ओर प्रस्थान करो।

हे प्रथम पाद-विन्यास ! तुम यज्ञाग्नि के शत्रुओं की हिंसा करने वाले हो, अतः गायत्री छन्द को नमस्कार करो। फिर पृथ्वी के इस अद्भुत प्रदेश को ग्रहण हो। हे द्वितीय पाद-विन्यास ! तुम यज्ञाग्नि के शत्रुनाशक क्रम हो अतः त्रिष्टुप छन्द को कृपा दृष्टिपूर्वक स्वीकृत करो। फिर स्वर्ग लोक को ग्रहण होओ। तुम्हारी कृपा दृष्टि से हिंसक पशुओं का पतन हो। हे तृतीय पाद विन्यास ! तुम यज्ञाग्नि के शत्रुनाशक क्रम हो। अतः जगती छन्द को कृपा दृष्टिपूर्वक स्वीकृत करो। फिर स्वर्गलोक को प्राप्त होओ। तुम्हारी कृपा दृष्टि से अहंकारी और लालची मनुष्य समाप्त हों। हे चतुर्थपाद विन्यास ! तुम यज्ञाग्नि के शत्रुनाशक क्रम हों। अतः अनुष्टुप छन्द को अनग्रहता पूर्वक प्राप्त करो। फिर तुरीयलोक में जाओ। तुम्हारे बल से दुष्ट कार्य करने वाले पापी पतन को प्राप्त हों। हे अग्ने ! तुम दिशाओं और समस्त उपदिशाओं में अपना विक्रम करने वाले हों।
हे अग्नि तुम आकाश के समान गर्जना करते हुए पृथ्वी का आस्वादन करो। यह अग्नि वृक्षों को अंकुरित करते हुए और अपनी ज्वालाओं से औषधियों को प्राप्त करते हुए प्रदीप्त होते हैं। यह प्रकट होते ही दीप्त होते हुए आकाश और पृथ्वी के मध्य में प्रकाशित होते हैं। जैसे मेघ विपुल द्वारा आकाश पृथ्वी के बीच में प्रकाश युक्त होता है, उसी प्रकार इन अग्नि को भी पर्जन्य के समान स्तुति करते हैं।
हे अग्नि! तुम हमारे अभिमुख प्रत्यक्ष रहती हो। तुम आने जाने में समर्थवान हो। तुम उम्र, तेज, अपत्य, अभिष्ट लाभ, महानमति, सुर्वण, अलंकार और देह पोषण आदि के युक्त मेरे अभिमुख शीघ्र आगमन करो।
हे अंगिरा अग्नि! तुम सैकड़ों पराक्रमों से युक्त हो। तुम्हारी निवारण शक्ति भी सहस्त्रों हैं। अतः हमारी प्रार्थना है कि तुम अपनी शक्तियों के प्रभाव से लाखों प्रकार की पुष्टियों द्वारा हमारे व्यय हुए धन को पुनः प्राप्त कराओ और हमारे पूर्व सम्पादित धन का पुनः सम्पादन करो।
हे अग्ने ! तुम दुग्ध आदि रस से युक्त फिर यहाँ पधारो और अन्न तथा आयु को संग लेकर आते हुए समस्त प्रकार के पापों से हमारी सुरक्षा करो।
हे अग्ने! तुम धन के साथ प्रत्यावर्तित हो। सम्पूर्ण संसार के उपयोग के योग्य वृष्टि जल की धारा से सभी तृण, लता और धान्यादि औषधियों, वनस्पतियों, वृक्षों आदि को सिंचित करो।
हे अग्नि! मैंने तुम्हारा आहरण किया है। तुम अत्यन्त अविरल रहकर उषा के बीच दृढ़ता पूर्वक स्थित होओ। हमारी समस्त प्रजा तुम्हारी इच्छा करे। हमारा राष्ट्र तुमसे शून्य कभी न हो।
हे वरुण देव! तुम समस्त बंधनों और सन्तापों से मुक्त करने वाले हो। हमारे उत्तम अंग में स्थापित अपने पास से हमें अलग करो। नीचे के अंगों में स्थापित अपने पास को खींच लो और मध्य भागों में स्थापित अपने पाश को भी हमसे दूर कर दो। इसके पश्चात हम अपराधों से मुक्त होकर तुम्हारे कर्म में लगें। हे आदित्य पुत्र वरुण ! हम दीनता से रहित अखंडित ऐश्वर्य को भोगें।
हे प्रशंसनीय अग्नि! उषाकाल के पूर्व उन्नत हुए। रात्रि रूपी अन्धकार से निकलकर दिन रूपी प्रकाश के संग यहाँ प्रकट हो गए। अंधकार को दूर करने वाली किरणों के जाल से प्रकट हो व सुन्दर शरीर वाले हुए। यह अग्नि उत्पन्न होते ही सर्व लोकों और स्थानों को अपने तेज से युक्त करते हैं।
पवित्र स्थान से दीप्त अग्नि वायु रूप से अन्तरिक्ष में तथा मनुष्यों के प्रवर्त्तक होकर वेदी में स्थित होते हैं। वे होता रूप से सबके पूजनीय तथा मनुष्यों में प्राण भाव से स्थित हैं। हे अग्नि ! तुम अत्यन्त महिमा वाले तथा सब प्रकार प्रबुद्ध हो।
हे अग्नि! तुम समस्त ज्ञानों के निवारणों के ज्ञाता हो। तुम माता के रूप समान इस उखा की गोद में दृढ़ हो। अतः इसे अपने ताप से सन्तृप्त न करना तथा अपनी लपटों से दग्ध न करना क्योंकि तुम इस उखा के बीच में अपनी उज्जवल दीप्ति से भली-भाँति प्रकाशमान हो।
हे अग्नि! तुम इस उषा के मध्य दीप्त होकर अपने गृह में विराजमान हो। हे सर्वज्ञाता अग्नि ! तुम अपन ज्योति से तेजस्वी होते हुए इस उषा के लिए भी मंगल करने वाले हो।
हे अग्नि! तुम मेरे लिए भी कल्याणकारी होकर समस्त मंगलरूप होते हुए और समस्त दिशाओं को भी मेरे लिए कल्याण करने वाली निर्मित करके अपने इस उखा रूप महान जगह में विद्यमान हो।
जातवेदा अग्नि सर्वप्रथम स्वर्ग में सूर्य रूप से उत्पन्न हुए द्वितीय अग्नि ब्राह्मणों के आकाश में अविर्भूत हुए। तृतीय अग्नि जल के गर्भ में बड़वा रूप से उत्पन्न हुए। इस प्रकार यह अग्नि बहुत जन्म वाली हैं। श्रेष्ठ बुद्धि वाला यजमान इन अग्नि को प्रकट करता है।
हे अग्नि! तुम्हारे जो तीन रूप सूर्य, अग्नि और बड़वा है, उन रूपों को हम भली-भाँति जानते हैं। गार्हपत्य, आह्वानीय, अन्वाहार्य पचन अग्रीघ्घ्री आदि तुम्हारे समस्त स्थानों को भी हम जानते हैं और तुम्हारा मंत्र स्थित गुह्य नाम है उसके भी हम ज्ञाता हैं। तुम्हारे उस जल रूप जगह को भी हम जानते हैं जिससे तुम विद्युत रूप से प्रकट हुए हो। हे अग्नि ! तुम्हें मनुष्यों की भलाई करने वाले प्रजापति ने बड़वा रूप से प्रकट किया। मंत्र-पाठियों में श्रेष्ठतम प्रजापति ने तुम्हें वर्षा जलों के बीच विद्युत रूप से दीप्तिमान किया है। तृतीय रंजक सूर्य मण्डल में सूर्य रूप से तुम्हें प्रजापति ने ही प्रकाशमान किया है। जलों में उपस्थित तुम्हें श्रेष्ठतम प्राणों ने प्रवृद्ध किया।
मेघ के समान गर्जनशील अग्नि पृथ्वी का आस्वादन करते हुए औषधि और वृक्षादि को अंकरित करते हैं। वे शीघ्र प्रकट होकर स्वर्ग और पृथ्वी में व्याप्त होते हुए अपनी महिमा से तेजस्वी होते हैं।
हे अग्नि श्रेष्ठ समन्द्धि प्रदान करने वाले, धनों को धारण करने वाले अभिष्टों को प्राप्त कराने वाले, यजमान के सोमयाग रक्षक सभी के निवास के कारण रूप, मंथन द्वारा शक्ति प्रकट होने के कारण पुत्र रूप जल में दृढ़ होने से वरुण मेघों में विद्युत रूप से प्रदीप्तमान और उषा से पहले सूर्य रूप से प्रकाशमय होते हैं।
ये अग्नि समस्त संसार के केतु रूप, सब प्राणियों के हृदयों में वायु रूप से आत्मा और सूर्य रूप से प्रकट होकर स्वर्ग और पृथ्वी को तेज से परिपूर्ण करते हैं। ये चद्रमा के रूप में सब जगह घूमने वाले और अत्यन्त दृढ़ मेघ को विदीर्ण करते हैं, उन्हीं अग्नि के लिए पंचजन यज्ञ करते हैं।
प्राणधारियों के द्वारा अभिलाषित किए गए, पवित्र करने वाले, दुष्टों से स्नेह न करने वाले, मेधावी, मरणधर्म से हीन ये अग्नि मरण धर्म वाले मनुष्यों में देवों द्वारा दृढ़ किए गए हैं। ये अग्नि अपने निरुपद्रव धूम को क्षितिज में व्याप्त कर जल वर्षा के कारण बनते हैं। यही इस संसार को धारण कर अपनी समृद्धि से स्वर्ग को विस्तृत किए गए हैं।
प्रत्यक्ष प्राप्त अग्नि अतिरस्कृत होते हुए दिव्य प्रकाश से प्रकाशित होकर प्राणियों को श्री सम्पन्न करते हैं। पुरोडास आदि से प्रदीप्त अग्नि प्रकाशमान होती है। देवताओं ने इन महान कर्मा अग्नि को प्रकट किया।
हे मंगलमयी ज्योति और अद्भुत गुणों से सम्पन्न अग्नि ! इस प्रतिपदा में जो यजमान तुम्हें घृत से सिंचित करता है या घृताक्त पुरोडास देता है, तुम उस यजमान को अत्यन्त उत्कृष्ट स्थान को ग्रहण कराते हुए देवों के भोगने योग्य सुख को भी भली-भाँति प्राप्त कराओ।
हे अग्नि! इस यजमान को यश वृद्धि वाले यज्ञानुष्ठान में सब प्रकार से अनुकूल तुम इस यजमान को अब प्रीति-पात्र बनाओ और सूर्य के लिए भी प्रिय करो। वह उत्पन्न सन्तान द्वारा सुख को प्राप्त करें और उत्पन्न होने वाले पौत्रादि का सुख भी मिले। इसकी हर प्रकार से समृद्धि हो।
हे अग्नि! तुम्हारी सेवा में संग किए यजमान प्रतिदिन समस्त धन धान्य आदि को ग्रहण करते हैं और तुम्हारे यज्ञ आदि कार्य करने की इच्छा करने वाले मेधावीजन यज्ञ फल रूप से देवयान मार्ग को ग्रहण होते हुए स्वर्ग को प्रस्थान करते हैं। जठराग्नि रूप सभी को हितैषी और मनुष्यों को सुख प्रदान करने वाले सोमरक्षक अग्नि की ऋषिवृन्द वन्दना करते हैं और शत्रु विमुख स्वर्ग धरा अधिष्ठातृ देव को आहुत करते हैं। हे देवगण ! तुम हममें पराक्रमी पुत्र आदि तथा महान समृद्धि की भली प्रकार से स्थापना करो।
हे ऋत्विजो! समिधाएँ प्रदान करते हुए तुम अग्नि देव की सेवा करो। ये अग्नि अतिथि रूप हैं। तुम इन्हें प्रदीप्त करने के लिए आज्य आहुति दो।
हे अग्नि! समस्त देव अपनी महानबुद्धि द्वारा तुम्हें उन्नत करें और ऊँचे उठते हुए तुम महानमुख आकृति वाले और शोभामान ज्योति वाले होकर हमारा सब प्रकार का कल्याण करने वाले बनो।
हे अग्नि! तुम अपनी कल्याणकारी ज्वालाओं के द्वारा प्रकाशवान होकर भ्रमण करो। तुम अपनी महती किरणों द्वारा प्रकाशित हमारे पुत्र-पौत्रादि को किसी प्रकार की पीड़ा न पहुँचाना।
हे अग्नि ! ज्योति के समान गर्जनयुक्त होते हुए तुम धरा का आस्वादन करो। यह अग्नि पेड़ आदि को अंकुरित करते हुए ज्योतिमान है। जैसे बादल विद्युत द्वारा द्युलोक और पृथ्वी के बीच प्रकाशमान होता है, उसी प्रकार बादल के रूप समान अग्नि भी समृद्धि से परिपूर्ण होती है।
यह अग्नि हवि धारण करने वाले यजमान के आह्वान को भली-भाँति श्रवण करते हैं और अत्यन्त दीप्तिमान होते हुए सूर्य के समान प्रकाशित होते हैं। जो युद्धों में राक्षसों से सामना करते हैं, वह अग्नि हमारे लिए कल्याणप्रद होते हुए प्रकाशवान हो।
हे अद्भुत गुण सम्पन्न जलो ! तुम भस्म को प्राप्त करो। यह मंगलप्रद भस्म फूल वरुणदेव हैं, वे पेड आदि को उत्पन्न कर अग्नि को प्रकट करने वाले हैं। हे जलो धूप आदि के सहयोग से सरभित हुई हो, तुम इसे धारण करो। इनके महान स्थायी तुम इस भस्म रूप अग्नि के लिए नम्र बनो। जैसे माता बेटे को अपने अंक में समेटनी है, उसी प्रकार तुम भी इस भस्म को धारण करो। अनुष्ठाता तुम्हें नमस्कार करते हैं।
हे भस्म रूप अग्नि। तुम्हारा स्थान जल में ही है। वही भस्म जल के द्वारा यज्ञादि रूप में परिणित हुई अरणी के बीच से पुनः प्रकट होती है।
हे अग्नि! तुम औषधियों की गर्भ रूप हो, वनस्पतियों का गर्भ हो तथा समस्त प्राणधारियों के गर्भ रूप उत्पत्ति करने वाली हो। तुम भी सम्पूर्ण जलों के गर्भ रूप एवं उत्पन्न करने वाली हो।
हे अग्नि! तुम भस्म के द्वारा इस पृथ्वी को और जलों को प्राप्त होकर मातृभूमि जलों में मिलकर तेज युक्त होते हुए उपा में स्थित हो जाओ। हे अग्नि। तुम महान कल्याणकारी हो। तुम जल और पृथ्वी के स्थान को प्राप्त होकर उषा के बीच में, जैसे माता की गोद में बच्चा शयन करता है वैसे ही शयन करती हो।
हे अग्नि! तुम दूध से परिपूर्ण होकर पुनः जाओ। जब तुम अन्न और जीवन के सहित यहाँ पधारो तब पापों से हमारी रक्षा करना।
हे अग्नि! तुम धन के साथ लौट आओ और सब प्राणियों के लिए उपयोगी वर्षा रूपी जल धारा को सब तृणलता और वनस्पतियों को सींचो। हे युवकतम, धन-सम्पत्ति अग्नि! मेरे इस बार-बार निवेदन को सुनते हुए तुम मेरे अभिप्रायः को समझो। एक तुम्हारा निन्दक है और एक तुम्हारी स्तुति करता है, यह मनुष्य का स्वभाव ही है। परन्तु मैं तुम्हारा प्रसंशक हूँ और हमेशा तुम्हारी वंदना करता रहता हूँ।
हे धन के स्वामी एवं दाता अग्ने! तुम समस्त के समझने वाले हो। अतः हमारे उद्देश्य को समझो और हमसे प्रसन्न होकर भाग्य की हीनता को हमसे प्रथक करो। तुम संसार की उत्पत्ति आदि कार्य करने वाले हो, अतः यह आहुति तुम्हारे लिए स्वाहुत हो।
हे अग्नि धन के निमित्त तुम्हें आदित्यगण, रुद्रगण और वसुगण पुनः प्रदीप्त करें। ऋत्विज यजमान भी तुम्हें पुनः यज्ञ कार्य में प्रकाशित करें और तुम घृत के द्वारा अपने शरीर की वृद्धि करो क्योंकि आपकी वृद्धि से ही यजमान के सब मनोरथ पूरे होते हैं।
हे यमदूतों! तुम पुराने या नए जैसे भी इस जगह में हो यहाँ से दूर प्रस्थान करो। संघात छोड़कर तुम अनेकों स्थानों में अत्यन्त दूर चले जाओ। इस यजमान को यम ने धरा का अवकाश प्रदान किया है और पितरों ने भी इस यजमान के लिए यह लोक कल्पित किया है।
हे उषा! तुम पशुओं के सम्यक ज्ञान की साधना रूप हो तथा यज्ञ के द्वारा श्रेष्ठ ज्ञान का सम्पादन करती हो। अतः तुम्हारी ज्ञान सम्पदा वाली सामर्थ्य मुझ यजमान में भी हो। हे सिकता ! तुम भस्म रूप हो और अग्नि को पूर्ण करने वाली हो। हे शर्करा! तुम पृथ्वी पर डाले हुए सब ओर स्थापित हो। अतः गार्हपत्य स्थान का सेवन करो।
यह अग्नि है। अग्नि चुनाव के इच्छुक इन्द्रदेव के अभिष्णव किए और सहस्त्रों के पान योग्य अन्न को भक्षण करते हुए अपने पेट में धारण किया। हे अग्ने ! तुम भी भक्षण करते हुए ऋत्विजों से वंदनाएँ ग्रहण करते हो।
अग्नि! तुम्हारी जो ज्योति स्वर्ग में है और तेज पृथ्वी में औषधियाँ हैं तथा जलों में जिस ज्योति ने विद्युत रूप से महान अन्तरिक्ष को व्याप्त किया है वह संसार को प्रकाशित करने वाली तुम्हारी ज्योति मनुष्यों के कार्यों को देखती रहती है।
हे अग्ने! तुम अद्भुत जलों को अभिमुख होकर ग्रहण करते हो। बुद्धि को अभिप्रेरित करने वाले जो प्राण कहलाते हैं उन प्राण रूप देवताओं के सामने भी विचरण करते हो। सूर्य मण्डल में दृढ़ सूर्य के परे जो जल है तथा जो जल नीचे है, उस समस्त जलों में तुम विराजमान रहते हो।
अग्नि पशुओं के हितैषी समान मन वालों में प्रीतियुक्त, अहिंसाशील है। वह अभिष्ट रूप इस यज्ञ को भूख प्यास शान्त करने वाले बहुत अन्न से युक्त होकर सेवन करें।
हे अग्ने! जो अन्न अनेक कार्यों का साधक है तथा जो गौ निरन्तर दूध देती है, उनसे सम्बन्धित दान का तुम सम्पादन करो। हम प्रजावान पुत्र को ग्रहण करें। हे अग्ने ! अन्न गौ, पुत्र आदि के देने वाली तुम्हारी सुन्दर हितकारिणी-मति हम ग्रहण करें।
हे अग्नि! गार्हपत्य अग्नि तुम्हारा उत्पत्ति स्थान है। तुम जिस गार्हपत्य से उत्पन्न होकर प्रदीप्त होते हो, उसे जानकर अनुष्ठान सिद्धि के लिए दक्षिण दिशा में आरोहण करो। फिर यज्ञादि कर्म करने के लिए हमारे निमित्त धन की वृद्धि करो।
हे इष्टके! तुम भोगों को संगठित करने वाली हो। उस विख्यात वाक् रूप देव द्वारा दूढ़ होकर तुम अंगिरा के रूप समान इस स्थान में दृढ़ता से विद्यमान होओ। हे इष्टके ! तुम सब ओर से भोगो को संगठित करने वाली और विख्यात वाक् देवता द्वारा दृढ़ बनो। आप अंगिरा के रूप समान इस स्थान पर दृढ़ता से विद्यमान रहो।
हे इष्टके ! तुम गार्हपत्य के चयन के स्थान में पूर्व इष्टकाओं द्वारा आक्रान्त होती हुई स्थान को परिपूर्ण करो और छिद्रों को भर दो तथा दृढ़ता से स्थित रहो। इन्द्र, अग्नि और बृहस्पति देवताओं ने तुम्हें इस स्थान में स्थापित किया है।
दिव्यलोक से क्षरित होने वाले, अन्नरूप धान्य आदि के सम्पादन करने वाले जल और अन्न से परिपूर्ण व विख्यात जल, देवताओं के उत्पन्न करने वाले संवत्सर में स्वर्ग, धरा और अन्तरित लोकों में यज्ञात्मक सोम परिपक्व करते हैं।
समस्त वाणी रूप स्तुति, समुद्र के समान विशाल, सब रथियों में महारथी, अन्न के स्वामी और सत्य के अधीश्वर इन्द्र को बैठाती है।
हे अग्नियों! तुम दीप्तिमान, समान हृदय वाले, श्रेष्ठतम विचार वाले हो। तुम इन अन्न, घृत आदि रस का भोग करते हुए एक हृदय से यहाँ आकर यज्ञ कर्म को भली-भाँति सम्पन्न करो।
हे अग्नियों! तुम्हारे मनों में सुसंगत करता हूँ। तुम्हारे कर्म को सुन्दर करता हूँ। तुम्हारे मनोगत संस्कार को एक करता हूँ।
हे पुरीष्य अग्नि! तुम हमारे स्वामी हो। तुम हमारे यजमान को अन्न और बल प्रदान करो।
हे अग्ने! तुम पुरीष्य, धन सम्पन्न और पुष्टि से सम्पन्न हो। हम तुम्हारी कृपा दृष्टि से समृद्धि और सन्तुष्टि को ग्रहण करें। तुम समस्त दिशाओं को हमारे लिए कल्याणकारी बनाते हुए अपने इस स्थान पर स्थित रहो। हे अग्निद्वय ! हमारे कार्य की सिद्धि के लिए तुम समान हृदय और समान चित्त वाले तथा आलस्य आदि से प्रथक होते हुए हमारे यज्ञ को हिंसित मत होने दो। यज्ञपति यजमान की भी हिंसा न हो। तुम हमारे लिए कल्याण रूप बनो।
पृथ्वी रूप मृत्तिका से बनी हुई उषा ने पशुओं का भला करने वाली अग्नि को अपने स्थान में माता द्वारा पुत्र को धारण करने के समान धारण किया। विश्वेदेवो और सभी ऋतुओं द्वार समान मति को प्राप्त उषा ने यह महान कार्य किया। ऐसा कहते हुए विश्वकर्मा प्रजापति उस उषा को शिक्य पाश से मुक्त कराएँ।
हे निऋते (हे पाप देवता अलक्ष्मी)! जो पुरुष यज्ञ आदि कर्मों को नहीं करते या जो देवताओं को हव्य आदि प्रदान नहीं करते तुम उन्हीं पुरुषों के समक्ष जाओ। तुम छिपकर या प्रकट रूप से चोर का संग करो। हमसे दूर स्थान को चले जाओ क्योंकि वही तुम्हारी गति है। हे देवी! हम तो तुम्हें नमस्कार करते हैं।
हे निऋते! तुम तीक्ष्ण तेज वाले और क्रूर कर्म रूप हो। हम तुम्हें नमस्कार करते हैं। तुम हमारे लौह-पाश के समान दृढ़ जन्म-मरण रूप पाश का नाश करो और यम यमी के एकमत को प्राप्त होकर इस आदमी को उत्तम स्वर्गलोक में स्थापित करो।
हे क्रूरतम रूप वाली निर्ऋते! इन यजमानों के पाप रूपी पापों का पतन करने के लिए तुम्हारे मुख में आहुति के रूप समान इष्ट को धारण करता हूँ। समस्त शास्त्र न जानने वाले आदमी तुम्हें "भू है" ऐसा कहते हुए वंदना करते हैं। परन्तु मैं शास्त्रों का ज्ञाता तुम्हें समस्त प्रकार पाप देवी को जानता हूँ।
हे यजमान! निर्ऋति देव ने तुम्हारे कंठ में जो न करने योग्य दृढ़ पाश को बाँधा था, उसे मैं अग्नि के मध्य निर्ऋति के अनुमति क्रम द्वारा अभी दूर करता हूँ। पाश के हटने पर निर्ऋति की अनुज्ञा प्राप्त हो। हे यजमान! इस रक्षा करने वाले श्रेष्ठ अन्न का भक्षण करो। जिस देवी की कृपा से यह समस्त कार्य पूर्ण हो गए, ऐश्वर्य रूपी देवी को मैं प्रणाम करता हूँ।
अग्नि यजमान को उनके ग्रह में स्थिर करते, धनों को ग्रहण कराते और अवश्यम्भावी फल से परिपूर्ण यज्ञ का सम्पादन करते हैं। यही अग्नि अपने-अपने कर्मों से परिपूर्ण समस्त रूपों को प्रकाशमान करते हैं। सविता देवता के समान रूप प्रकाशित होकर यह अग्नि इन्द्र देव के रूप समान ही संग्राम में दृढ़ होते हैं। मेधावी और क्रान्तदर्शी अग्नि स्वर्ग की भलाई करने को हलों को बैलों से जोड़ते हैं और बैलों के जोडों को अलग-अलग वहन कराते हैं। हे कृषको! हलों को युक्त करो। हल आदि को ठीक करके बैलों के कंधों पर जुए रखो। फिर इस संस्कारित भूमि में बीज की बुआई करो। सभी अन्न फल आदि से सम्पन्न होकर पष्टि को प्राप्त हों। फिर पके हुए अन्न को दराँति से शीघ्र काट लो और हमारा घर जो अत्यन्त निकट है, उसमें इसे रख दो।
हे हल! तुम महान फाल से युक्त हो। इस भू को सुखपूर्वक रोपो। हल सहित कृषक बैल आदि से युक्त सुखपूर्वक विचरण करो। हे वायु और आदित्य! तुम दोनों हमारी भूमि को जल से सिंचित करो और इन औषधियों को महान फलप्रद बनाओ।
विश्वेदेवो और मरुतो से अनुमति प्राप्त यह हल की फाल मधुर घी द्वारा सिंचित हो। हे फाल! तुम अन्नप्रद होकर दूध, दही, घृत आदि से दिशाओं को पूर्ण कर और सब प्रकार हमारे अनुकूल बनो। इस खेत में उत्पन्न होने वाली सब औषधि आदि अमृत गुण वाले जल से पुष्ट और तेज से परिपूर्ण रहे।
वह फाल परिपूर्ण हल यजमान के लिए पृथ्वी को खोदने वाला, सोम, निष्पा‌क सुखप्रद है। वह भेड़, गौ और रथ वहन करने वाले अश्व आदि को ग्रहण करता है।
हे हल ! तुम अभिष्ट पूर्ण करने वाले हो। मित्र वरुण, इन्द्र, पूषा और दोनों अश्विनी कुमार प्रजाओं के लिए और औषधियों के लिए कामना किए हुए भोगों का सम्पादन करें।
हे कर्म द्वारा देवयान मार्ग ग्रहण करने वाले देव! अहिंसित गौ वृषभ आदि से संसार की स्थिति के लिए कृषि कार्य का सम्पादन करो। तुमसे अलग होकर अब तुम्हारी कृपा दृष्टि से हम क्षुधा-पिपासा (भूख-प्यास) रूप दुःखी से पार लगें और दीप्ति रूप यज्ञ को ग्रहण हों।
जलों को प्रदान करने वाला संवत्सर मास दिवस आदि अपने भागों से प्रीति युक्त होता है। उषा गौओं से प्रेम करती है। अश्विनी कुमार चिकित्सा आदि कार्यों से प्रेम करते हैं। सूर्य अश्व से और वैश्वानर अग्नि, अन्न, घी से प्रेम करते हैं। इन सबके निमित्त यह आहुति स्वीकार हो।
सृष्टि के आरम्भ में जो औषधियाँ देवताओं द्वारा बसन्त, वर्षा और शरद ऋतु में उत्पन्न हुई थीं, उन संसार की उत्पत्ति में समर्थवान, पककर एक पीले रंग की हुई औषधियों के सैकड़ों और ब्रीहि आदि के सात-सात नामों को मैं जानता हूँ।
हे औषधियों! तुम माता के समान हित करने वाली हो। तुम सबके ही सैकड़ों नाम हैं और अंकुर असंख्य हैं। तुम्हारे कर्म द्वारा संसार के सैकड़ों कार्य बनते हैं। भूख-प्यास और अतः हे कर्मों को सिद्ध करने वाली औषधियों ! तुम इस यजमान को रोग आदि से रक्षित करो।
हे औषधियों! तुम फूलों से परिपूर्ण और फलों का उत्पादन करने वाली हो। घोड़ों के समान वेगवती, असंख्य प्रकार के रोगों को दूर भगाने वाली, फल जैसी पवित्र वाली और दीर्घ समय तक कार्य में संलग्न रहने वाली हो। तुम मोदवती बनो और फूलों तथा फलों से सम्पन्न रहो।
हे औषधियों! तुम माता के समान पालन करने वाली, दिव्य गुण वाली, जगत का निर्माण करने वाली हो। हे यज्ञ पुरुष ! हम तुम्हारी कृपा से अश्व, गाय, वस्त्र और निरोग शरीर वाले हों। हमारी इस प्रार्थना को औषधियों भी सुन लें।
हे औषधियों! तुम्हारा स्थान पीपल की लकड़ी से बने उपमृत और स्त्रुच पात्र में है। पलाश के पत्र से निर्मित जुहू में भी तुमने अपना स्थान बनाया है। हे हविर्भूत औषधियों! तुम अवश्य ही आदित्य का भजन करती हो क्योंकि अग्नि में होमी गई आहुतियाँ आदित्य को ग्रहण होती हैं, जिससे तुम इस यजमान को अन्नादि से सम्पन्न करो।
हे औषधियों! तुम जिस चिकित्सक के पास रोग जीतने के लिए वैसे ही भ्रमण करती हो, जिस प्रकार राजा अपने शत्रु का जीतने के लिए रणभूमि को प्रस्थान  करता है, बह तुम्हारा आश्रित चिकित्सक औषधि देकर भयानक रोगों को नष्ट करता है और रोग का नाश करने वाला होने से ही उसे वैद्य कहा जाता है।
इस यजमान की व्याधि को नष्ट करने के लिए अश्व आदि पशुओं को उपयोगी, सोम यज्ञ आदि शक्ति और प्रण को पुष्ट करने वाली, ओज की सम्पादिका इन समस्त औषधियों से मैं भली-भाँति परिचित हूँ।
हे यज्ञ पुरुष! तुम्हारे शरीर के लिए धन रूप हवि देने की कामना करती हुई औषधियों की शक्ति प्रकट होती है। जैसे गोष्ठ से गाय निकलती है, वैसे ही कर्म में प्रयुक्त होने पर औषधियों की सामर्थ्य का प्रकाश होता है।
हे औषधियों! तुम्हारी माता का नाम भूमि है। वह समस्त रोगों को नष्ट करने वाली है और तुम भी समस्त व्याधियों को नष्ट करती हो। तुम अन्न से युक्त परिपूर्ण तथा वेग से विचरण करने वाली हो। मनुष्यों में स्थित व्याधियों को तुम समाप्त करो और क्षुधा रूपी राक्षसी से हमें मुक्ति दिलाओ।
ये सब औषधियों सब तरफ से रोगों को वशीभूत करती हैं। दस्यु गायों के गोष्ठ का व्याप्त करता है, वैसे ही ये भक्षित हों केसर देह को व्याप्त करती है। उस समय शरीर में जो कुछ भी रोग होता है उस सबको ये अपनी सामर्थ्य से नष्ट करती हैं। जब मैं इस औषधि की उपासना कर इसे हाथ में प्राप्त करता हूँ, तब यक्ष्मा रोग का स्वरूप इसके भक्षित होंने से पूर्व ही समाप्त होने लगता है। जैसे मृत्यु गृह को ले जाया जाता हुआ पुरुष मृत्यु से पूर्व ही अपने को मरा हुआ मानने लगता है वैसे ही व्याधि भी अपने को समाप्त हुआ मानने लगती है।
हे औषधियों! तुम जिस रोगी के अंग, ग्रंथि और केश आदि तक में रमण करती है और यक्ष्मा रोग के लिए बाधा देने वाली होती हो, जैसे मर्म भाग को पीड़ित करने वाला उग्र मनुष्य शत्रु को बाधा पहुँचाता है, वैसे ही तुम रोगी की शरीरगत रोग को बाधा पहुँचाती हो।
हे व्याधियों! तुम कफ़ द्वारा अवरुद्ध गले से निकलने वाली ध्वनि से खेलने वाले शलेष्म व्याधि और पित्त रोग के संग चली जाओ तथा वात रोग के संग पतन को ग्रहण होओ। जो रोगी घोर वेदना से चिल्लता है, उसकी इस घोर वेदना से तुम समाप्त हो जाओ।
हे औषधियों! तुम परस्पर एक-दूसरे औषधि के गुणों की रक्षा करने वाली हो। रक्षित औषधि अरक्षित औषधि की रक्षा करने के लिए उससे संगति करें। सब प्रकार की ये औषधियाँ समान बुद्धि वाली होकर मेरे निवेदन को सच करें।
फलवाली औषधि, पुष्पप्रद औषधि, फल रहित औषधि और फूल पृथक औषधि, ये समस्त औषधियाँ बृहस्पति द्वारा रचित होकर हमें व्याधि से मुक्त करें।
शपथ के कारण उत्पन्न हुए पाप से जो रोग शरीर को प्राप्त हुआ है जल विहार करते हुए जो रोग उत्पन्न हो गया है, यम से सम्बन्धित किसी पाप से जो रोग प्रकट हुआ है और देवताओं के क्रोध से जिस रोग की प्राप्ति हुई है उन सब प्रकार के रोगों से ये औषधियाँ मुझे बचाएँ।
स्वर्गलोक से पृथ्वी पर आती हुई औषधियाँ कहती हैं कि हम जिस प्राणधारी की देह में रम जाती हैं, वह पतन को प्राप्त नहीं होता, व्याधि उस पर आक्रमाण नहीं बोलती। जिन औषधियों के राजा सोम हैं, वे औषधियाँ अनेक गुणोंवाली हैं। उनके मध्य में रहती हुई, हे औषधि! तुम श्रेष्ठ हो और हमारी कामना के लिए हृदय के निमित्त कल्याणकारी हो।
जिन औषधियों के राजा सोम हैं और वे जो विभिन्न रूपों से धरा पर दृढ़ हैं, वे बृहस्पति द्वारा उत्पन्न दवाइयाँ हमारे द्वारा प्राप्त की हुई इस औषधि को वीर्यवती करें, जिससे यह हमारी सुरक्षा कर सके।
जो औषधि निकट में स्थित है या जो औषधियाँ दूरी पर खड़ी हैं और जो हमारे निवेदन पर ध्यान देती हैं, वे वृक्षादि से उत्पन्न औषधियाँ सुसंगत होकर हमारी इस औषधि को बलवती करें जिससे यह हमारी भली-भाँति रक्षा कर सकें।
हे औषधियों! रोग का इलाज के लिए तुम्हारे मूल को प्राप्त करने के लिए जो खुदाई कर्त्ता तुम्हारे मूल को खोदता है, उसको खुदाई के अपराध मे कोई नुकसान न हो। तुम्हें रोगी के इलाज के लिए मैं खोदता हूँ। अतः मेरा भी बुरा न हो। हमारे स्त्री, पुत्र, पशु आदि सब रोग मुक्त रहें।
अपने राजा सोम के सहित उन औषधियों ने कहा कि यह ब्राह्मण जिस रोगी की चिकित्सा के लिए हमारे मूल, फल, पत्ते आदि को ग्रहण करता है, हे सोम राजा! उस रोगी को हम निरोग करते हैं।
हे औषधि! तुम क्षय, अर्श, मेद रोग, श्यवसु, श्लीपद आदि रोगों को नष्ट करने वाली हो और सैकड़ों अन्य मुख पाकादि रोगों को भी नष्ट करती हो।
हे औषधि! गन्धर्वों ने तुम्हारी खुदाई की है, इन्द्र ने भी खोदा है, बृहस्पति ने भी खुदाई की है तब सोम ने तुम्हारी सामर्थ्य को जानकर तुमको सेवन किया और यक्ष्मा रूप रोग से मुक्ति प्राप्त की और फिर तुम्हारी गुणों के जानने वाले तुम्हें प्राप्त कर व्याधियों से मुक्त हो गए।
हे औषधि! तुम शत्रुओं को बहिष्कृत करने में समर्थवान हो। अतः मेरे अदानशील शत्रुओं की सेना को बहिष्कृत करो। युद्ध के अभिलाषी शत्रुओं पर अच्छी प्रकार से विजय प्राप्त करो और सब प्रकार के अमंगल को हमारे पास से दूर कर दो।
हे औषधि! तुम्हें खोदने वाला पुरुष दीर्घ आयु को प्राप्त हो। जिस रोगी के लिए तुम्हारी खुदाई की जा रही है, वह भी दीर्घ आयु को प्राप्त हो। तुम भी दीर्घ आयु वाली बनकर सैकड़ों अंकुरों से सम्पन्न हो और सब प्रकार की वृद्धि प्राप्त करो।
हे औषधि! तुम श्रेष्ठ हो! तुम्हारे पास स्थित ताल, शाल, तमाल आदि वृक्ष उपद्रवों को दूर करने वाले और छाया आदि के द्वारा आदमियों का उपकार करने वाले हैं। जो शत्रु हमसे बहुत समय से द्वेष करता आ रहा है, वह द्वेष को छोड़कर हमारा अनुगामी बन जाए।
जो प्रजापति पृथ्वी को उत्पन्न करने वाले, सत्य को धारण करने वाले, स्वर्गलोक को रचित करने वाले हैं। जो आदि पुरुष संसार के आह्वान, धन और सन्तुष्टि के साधन करने वाले, जल को उत्पन्न करने वाले हैं वे प्रजापति मुझे हिंसिंत न करें। वे हमारे रक्षक बनें। हम उनके लिए हव्य देते हैं।
हे पृथ्वी! यज्ञानुष्ठान और उसके फल स्वरूप वर्षा से युक्त तुम हमारे अभिमुख होओ। प्रजापति द्वारा अभिप्रेरित अग्नि तुम्हारी पीठ पर विद्यमान हो।
हे अग्नि! तुम्हारा शरीर उज्जवल ज्योति वाला है तथा जो देह चन्द्रमा की ज्योति के समान आह्वादक है और जो तेजस्वी अंग गृहकार्य के योग्य पवित्र है, जो यज्ञ कार्य का भली प्रकार सम्पादक है, उस ज्योति रूप श्लाघनीय अंग को हम देव कार्य की सिद्धि के लिए प्रदीप्त करते हैं।
सत्य रूप यज्ञ की उत्पत्ति के कारण रूप अन्न, दही, दूध और घृत आदि की महान कामना वाले अग्नि के निमित्त उदीचि दिशा से धारण करता हूँ। यह सब इड़ा आदि मुझमें प्रवेश हों और मेरे पुत्र आदि के शरीरों में भी प्रवेश करें। अन्न के अभाव में उत्पन्न हुई क्लेशदायिनी व्याधि को मैं दूर करता हूँ। हे अग्ने! तुम दीप्तिमय समद्धि वाले, श्रेष्ठ दीप्तिवान और यजमान की इच्छाओं को अच्छी प्रकार से जानने वाले हो। यज्ञ अनुष्ठान की बात करने वाला तुम्हारा धूम प्रकाशमय होकर देवों के निकट पहुँचता है। तुम हवि प्रदान करने वाले यजमान के लिए शक्तिशाली शस्त्र आदि से परिपूर्ण योग्य अन्न को प्रदान करने वाले बन जाओ। हे अग्ने! तुम पवित्र करने वाली दीप्ति से सम्पन्न और निर्मल ज्योति वाले हो। तुम अपनी समृद्धि द्वारा महानता को प्राप्त होकर पूर्ण बल सम्पन्न होते हो। तुम सब ओर भ्रमण करते हुए देवों और मनुष्यों से युक्त समस्त संसार की सुरक्षा करते हो। जैसे पुत्र अपने बूढ़े पिता-माता की सुरक्षा करता है, उसी प्रकार तुम माता-पिता रूपी स्वर्ग और पृथ्वी की हर प्रकार से रक्षा करते हो। हे जलो के पौत्र अग्नि! तुम अन्नों के पालक हो। तुम यज्ञ कार्य के लिए स्थापित किए जाने पर श्रेष्ठ श्लोकों के द्वारा वर्द्धित एवं अनेक रूप वाले होते हो। तुम अद्भुत अन्न वाले सुन्दर जन्म वाले और यजमानों द्वारा हवन में दी हुई आहुतियों का ग्रहण करने वाले हो। तुम इस हवि दाता के कार्य को सफल करने के लिए अनुकूल हो।
हे अविनाशी अग्नि! हविदाता यजमानों द्वारा प्रकाश-मान किए जाते हुए हमारे पास अनेक प्रकार के धनों का विशाल भण्डार करो। तुम बहुत ही दर्शनीय और शरीर के मध्य विशिष्ट प्रकार से प्रज्वलित होने वाले हो। तुम हमारे श्रेष्ठ संकल्पों को पूरा करने में सक्षम हो।
हे अग्ने! तुम महान हृदय वाले और यज्ञ आदि अनुष्ठानों के सृजन करने वाले हो। तुम यज्ञ स्थान में वास करने वाले यजमान के लिए श्रेष्ठतम धन और उत्कृष्ट ऐश्वर्य वाला अन्न धारण करते हो। अतः इस यजमान को उत्तम धन प्रदान करो।
हे अग्ने! सुबुद्धि वाले मनुष्य ऋत्विज और यजमान पूर्णिमा अथवा अमावस्या आदि त्यौहारों पर वेदवाणी द्वारा तुम्हारी उपासना करते हैं और सत्य स्वरूप, प्रशंसनीय, दर्शनीय, श्रेष्ठ कीर्ति वाले, देवताओं के हितैषी तुम्हें यज्ञ अनुष्ठान हेतु आह्वानीय रूप से पूर्व भाग में विद्यमान करते हैं।
हे सोम! तुम्हें समस्त प्राणियों की रचना वाला तेज सब तरफ से प्राप्त हो। तुम अपने उत्तम वीर्य (ओज) द्वारा स्वयं ही प्रबुद्ध हो। तुम यज्ञादि उत्तम कार्यों के हेतु अपने उपयोगी रस रूप अन्न के सहित शीघ्र हमें प्राप्त हों।
हे सोम! तुम पापों को दूर करने वाले उत्तम पेय हो। हम तुमसे शोभित होते हैं। तुमसे दूध, रूप, अन्न और पराक्रम सुसंगति करें और इनके द्वारा बढ़ते हुए तुम अमृत तत्व दीर्घ आयु वाले पुत्र-पौत्र आदि की इस यजमान के लिए वृद्धि करो। उत्तम स्वर्गलोक में श्रेष्ठ आहुति वाले अन्न को भी धारण करो।
हे सोम! तुम्हारा अन्तःकरण अत्यन्त संतुष्ट रहता है। तुम्हारी कीर्ति सब जगह विशाल है। तुम अपने समस्त सूक्ष्म अवयवों द्वारा हमेशा वृद्धि करो और हमारी वृद्धि के लिए भी सखा रूप होकर हमारी सहायता करो।
हे अग्ने! यह यजमान तुम्हारे पुत्र के समान है। यह तुम्हारी उपासना करना चाहता है। यह वेदवाणी के द्वारा तुम्हारे हृदय को स्वर्गलोक से पृथक कर अपने यज्ञ की ओर आकृष्ट करता है।
हे अग्नि! तुम हवि-भक्षक हो जो अनेक प्रकार की श्रेष्ठ स्तुतियाँ प्रसिद्ध स्वर्गलोक को प्राप्त कराने वाली और अभिष्टों को पूर्ण करने वाली है। वे सब आपके निमित्त ही की जा रही हैं। उत्पन्न हुए और उत्पन्न होने वाले प्राणियों की इच्छाओं को पूर्ण करने वाले सबके सम्राट रूप में अग्नि आपने श्रेष्ठ स्थानों में विराजमान होती है।
अध्याय (13) :: ऋषि :- वत्सार, हिरण्यगर्भ, वामदेव, त्रिशिरा, अग्नि, इंद्राग्नि, सविता, गौतम, भारद्वाज, विरूप, उशना; देवता :- अग्नि, आदित्य, प्रजापति, ईश्वर, सूर्य, हिरण्यगर्भ, बृहस्पति, ऋतव, क्षत्रपति, विश्वेदेवा, वरुण, द्यावा, पृथिव्यौ, विष्णु, जातवेदा, आप, प्राण; छंद :- पंक्ति, त्रिष्टुप, उष्णिक, जगति, बृहति, गायत्री, कृति।
मैं, यजमान धन की वृद्धि की इच्छा करता हुआ, सुन्दर संतान आदि को चाहता हुआ और श्रेष्ठ पराक्रम की कामना करता हुआ इस अग्नि को अपनी आत्मा में ग्रहण करता हूँ। सब देवता भी मुझे आशीर्वाद प्रदान करें।
हे पुत्र! तुम जलों के ऊपर रहने के कारण पृष्ठ रूप हो और अग्नि के लिए पिण्ड के कारण हो। सींचते हुए जल समुद्र को सब ओर से वृद्धि करते हुए दिव्य जल में मिल जाएँ। इस प्रकार तुम वृहद आकृति वाले होकर पुरीष्य अग्नि के शरण रूप बनो। हे पुत्र ! तुम दिव्य परिणाम से विशाल होते हुए व्यापक होओ।
इस सूर्य रूपी ब्रह्मा ने पूर्व दिशा से प्रथम उदित होकर भूगोल मध्य से शुरू करके श्रेष्ठ रमणीय इन लोकों को अपने प्रकाश से प्रकाशित किया और उन्होंने अत्यन्त मेधावी, अवकाशयुक्त, अंतरिक्ष में होने वाली दिशाओं और घट, पट आदि वायु आदि के स्थान को प्रकाशित किया।
सबसे पहले हिरण्यगर्भ रूप प्रजापति उत्पन्न होते ही वे इस समस्त विश्व के एक मात्र स्वामी बन गए। उन्होंने स्वर्ग, अन्तरिक्ष और धरा इन तीनों लोकों को रचित किया उन्हीं श्रेष्ठ देव के स्नेह के लिए हम हवि का विधान करते हैं।
जो सर्व प्रथम उत्पन्न, सबके आदि रूप द्रप्स नाम से प्रसिद्ध आदित्य रूप के कारणभूत, अंतरिक्ष को, प्राणियों को तथा इस भूमि को भी आहुति परिव्यय रस से तृप्त करता है, तीनों लोकों में भ्रमणशील है, उन आदित्य को सात दिशाओं में स्थापित करता हूँ।
धरा के अनुगत जितने भी लोक और नक्षत्र हैं उन सबको नमस्कार करता हूँ। जो लोक अन्तरिक्ष में तथा जो स्वर्गलोक में शरणागत हैं, उन समस्त लोकों और उनमें स्थित सर्पों को मैं नमस्कार करता हूँ।
राक्षसों के द्वारा अभिप्रेरित बाण रूप सर्प, चंदन आदि पेड़ों की शरण में रहने वाले सर्प, बिलों में रहने वाले सर्प, इन समस्त सर्पों को नमस्कार करता हूँ।
जो भी सर्प या प्राणी स्वर्ग की दीप्तिमय स्थान में हैं, जो हमें दिखाई नहीं देते या सूर्य की किरणों में या जल में निवास करते हैं, उन सब प्रकार के जीवों को नमस्कार करता हूँ।
हे अग्नि! तुम शत्रुओं को दूर करने में समर्थ हो। अतः शत्रुओं के ऊपर हो। जिस प्रकार शक्तिशाली राजा हाथी पर विराजमान होकर शत्रुओं पर आक्रमण करता है, उसी प्रकार तुम भी आक्रमण करो। पक्षियों को फँसाने वाले बड़े जाल के समान तुम अपनी शक्ति को बढ़ाओ और अपने दृढ़ जल द्वारा हिंसक संताप देने वाले राक्षसों को ललकारो।
हे अग्ने! अपनी द्रतगामी लपटों द्वारा दीप्तिमान होते हुए तुम संतृप्त करने वाले राक्षसों और पिशाचों को नष्ट कर डालो और स्त्रुक द्वारा हूयमान तुम अहिंसित रहते हुए अपनी विषय लपटों को राक्षसों का पतन करने के लिए अग्रसर करो। तब वे राक्षस तुममें प्रवेश करते हुए पतन को प्राप्त हों।
हे अग्नि! हमारे जो शत्रु दूर देश में निवास करते हैं और जो शत्रु हमारे निकटवर्ती स्थान में निवास कर रहे हैं, उन दोनों प्रकार के शत्रुओं पर तुम अपने अत्यन्त वेगवान बंधन को प्रेरित करो। हमारे पुत्र-पौत्रादि की तुम भली-भाँति रक्षा करो। कोई भी शत्रु तुम्हारा सामना न कर सके।
हे अग्नि! उठो, चैतन्य लेकर अपनी ज्वालाओं को बढ़ाओ, उत्साह ही तुम्हारा अस्त्र है, तुम उत्साहित होकर शत्रुओं को भलि-भाँति नष्ट करो। हे तेजस्वी अग्नि ! जो शत्रु दान में रुकावट पैदा करता है, उसे जैसे तुम सूखे हुए अतस नामक वृक्ष के समान भस्म कर डालो। वह शत्रु पतित और समाप्त हो जाए।
हे अग्नि! ऊँचा उठो! हमारे ऊपर आक्रमण करने वाले शत्रुओं को प्रताड़ित करो और देवताओं से संबंधित कार्यों को प्रारम्भ करो। असुरों के मजबूत धनुषों को तोड़ डालो। ललकारे या न ललकारे गए नए एवं पुराने सब तरह के शत्रुओं को नष्ट कर डालो। हे स्त्रुक ! मैं तुम्हें अग्नि के तेज के द्वारा स्थापित करता हूँ।
यह अग्नि स्वर्गलोक के सिर के रूप समान मुख्य है। जैसे बैल का कन्धा सबसे ऊँचा होता है, उसी प्रकार अग्नि ने सबसे ऊँचा स्थान ग्रहण किया है। यह अग्नि ही संसार का श्रेष्ठ कारण रूप है। यह पृथ्वी का पोषण करने वाले जलों के सारों को पुष्ट करने वाला है। हे स्त्रुक! मैं तुम्हें इन्द्रदेव के ओज के द्वारा स्थिर करता हूँ।
हे अग्नि देव! जब तुम अपनी हवि धारिणी ज्वालाओं को प्रकट करते हो तब द्रव्य देवता त्याग रूप यज्ञ के साथ यज्ञ के फलस्वरूप जल को प्रवृत करने वाले होते हो। तुम घोड़ों के सहित कल्याण रूप होते सूर्य मण्डल में स्थित सूर्य को धारण करते हो।
हे स्वयं मातृणें! तुम पृथ्वी रूप में संसार को धारण करने वाली हो और विश्वकर्मा द्वारा विस्तृत किए जाने पर दृढ़ता को प्राप्त होती हो। तुम्हें समुद्र नष्ट न करे। तुम्हें वायु भी नष्ट न करे। तुम अविचल रहकर भू भाग को दृढ़ करने वाली हो, अतः हमारी भूमि को दृढ़ करो।
हे स्वयं मातृणे! तुम अवकाशमान और विस्तृत जलों के ऊपर समुद्र के स्थान में प्रजापति द्वारा स्थापित की जाओ। तुम प्रजापति द्वारा ही विस्तृत को प्राप्त हो। तुम पृथ्वी के प्रकट मिट्टी द्वारा बनने के कारण पृथ्वी रूप ही हो।
हे स्वयंमातृणे ! तुम सुख की भावना वाली भूमि हो। तुम संसार को पुष्ट करने वाली अदिति हो। समस्त संसार को धारण करने वाली होकर इस पृथ्वी के अनुकूल हो और भू-भाग को दृढ़ करती हुई इसे कभी नष्ट मत करना।
हे स्वयमातृणे! संसार के प्राण, अपान, व्यान, उदान नामक शरीर में स्थित वायु की उन्नति के लिए और यश लाभ के लिए मैं तुम्हें इस स्थान पर स्थापित करता हूँ। अपनी अत्यन्त कृपा और कल्याणमयी महिमा के द्वारा तथा उत्तम सुख देने वाले ग्रह के द्वारा अग्निदेव तुम्हारी रक्षा करें। तुम उन महान कार्य करने वाली अग्नि की कृपा को प्राप्त होकर अंगिरा के समान दृढ़ होती हुई स्थित रहो।
हे दूर्वा इष्टके! तुम प्रत्येक कांड और पर्व से अंकुरित होती हो। तुम सैकड़ों या हजारों की तरह हमारे पुत्र-पौत्र आदि की वृद्धि करो।
हे महान गुण वाली इष्टके ! तुम हजारों शाखाओं सहित वृद्धि करती हो और हजारों अंकुरों से सम्पन्न होती हुई अंकुरित होती हो। तुम्हारे हित के लिए हम हवन की विधि अपनाते हैं।
हे अग्ने! तुम्हारा प्रकाश सूर्य मण्डल में दृढ़ किरणों से स्वर्गलोक को आलोकित करता है। तुम अपनी उस महान दीप्ति को इस समय हमारे पुत्र, पौत्र आदि की प्रसिद्धि के लिए अग्रसर करो और सब प्रकार से हमारी शोभा में वृद्धि करो।
हे इन्द्र अग्ने! हे बृहस्पते! हे देवो! तुम्हारी जो ज्योतियाँ सूर्य मण्डल में स्थित हैं तथा जो ज्योतियाँ गायों और घोड़ों में वर्तमान हैं, उन ज्योतियों से बहुत अधिक शोभायमान हुए तुम हमारे लिए आरोग्य और कान्ति का विधान करो।
इस अत्यन्त शोभायमान और विराट रूप इस लोक ने अग्नि की दीप्ति को धारण किया। अपने दीप्तिमान एवं विराट रूप स्वर्गलोक ने इस अग्नि रूप तेज को धारण किया। हे इष्टके ! सारे संसार में प्राण, अपान, व्यान के लिए प्रजापति रूपवान एवं दीप्तिवान तुम्हें इस पृथ्वी पर दृढ़ करें। तुम सब ज्योतियों पर शासन करो। अग्नि तुम्हारी ईश्वर है, उन विख्यात देवता के साथ स्थित होकर तुम अंगिरा के रूप समान दृढ़ बनो।
चैत्र और बैशाख, ये दोनों माह बसंत ऋतु से संबंधित हैं। हे ऋतु रूप इष्काद्वय! तुम अग्नि के अंतर में स्थित होकर, जैसे छत में मजबूती के लिए काष्ट की लकड़ी का प्रयोग करते हैं, वैसे ही तुम दृढ़ता के साथ लगे रहो। मुझ अग्नि का चुनाव करते हुए यजमान की उत्कृष्टता के लिए ये आकाश-पृथ्वी उपकार करने वाले हैं। जल और औषधि भी हमें श्रेष्ठता देने वाले बने। समान कार्य में स्थित अनेक नामों वाली अग्नियाँ बसंत ऋतु का सम्पादन करती हुई इस कार्य की आश्रित बनें। जैसे देवता इन्द्र की सेवा करके कार्य को पूरा करते हैं, वैसे ही यह इष्टका है। हे इष्टके! उन प्रसिद्ध देवता के द्वारा अंगिरा के समान दृढ़ होकर तुम भी स्थित होओ।
हे इष्टके! तुम स्वभाव से ही शत्रुओं को विजय करने वाली हो। तुम शत्रु को सहन नहीं करतीं। इसलिए हमारे शत्रुओं का बहिष्कार करो। युद्ध की अभिलाषा वाले शत्रुओं को पराजित करो क्योंकि तुम अनन्त पराक्रम वाली और मेरे ऊपर प्रसन्न रहने वाली हो।
यज्ञ अनुष्ठान करने की कामना करने वाले यजमान के लिए वायु पुष्प रस रूप मधु का वहने करते हैं, प्रवाहमान नदियाँ मधु के समान मधुर जल को बहाती हैं, सभी औषधियाँ हमारे लिए मीठे रस से सम्पन्न हों।
पिता के रूप समान हमारा पोषक स्वर्गलोक मधुरमय हो, माता के रूप समान हमारी सुरक्षा करने वाली धरा मधुर रस से परिपूर्ण हो। रात और दिन भी मधुरिमामय हों। सभी तरफ से हमारा कल्याण ही हो।
समस्त वनस्पतियाँ हमारे लिए रस को प्रदान करने वाली बनें। सूर्य हमें माधुर्य से सरोबार कर दें। गायें हमें मीठा दूध प्रदान करें।
हे कूर्म! तुम जलों के गहन स्थान सूर्य मण्डल में स्थित हो। तुम्हारे वहाँ स्थित होने से सूर्य तुम्हें सन्तुष्ट करे। सब मनुष्यों का हित करने वाले वैश्वानर अग्नि तुम्हें संतप्त न करे। सभी अंगों से पूर्ण अखंडित इष्टका तुम्हें लगातार देखे तथा दिव्य वर्षा तुम्हारा हमेशा उपयोग करें। हे जलो के स्वामी कूर्म ! तुम इष्टकाओं के मुख्य अंग हो। तुमने भोग के साधन रूप तीनों लोकों को अच्छी तरह प्राप्त किया है। तुम पशुओं को आच्छादित करते हुए पुण्य आत्माओं के लोक में उस जगह पर जाओ जहाँ अग्नियों में आहुति द्वारा पुरातन कूर्म गए है।
महान स्वर्ग और धरा हमारे इस यज्ञ को अपने-अपने अंशों द्वारा पूर्ण करें। जल वर्षा, धान्य, स्वर्ण, पशु प्रजादि समस्त प्रयोजनीय वस्तुओं से हमें समृद्ध करते हुए हमारा समस्त प्रकार से कल्याण करे।
हे ऋत्विजो! विष्णु भगवान के सृष्टि रचना और संहार आदि के चरित्रों को देखा। जिन्होंने अपने महान कार्यों द्वारा तुम्हारे व्रत, अनुष्ठान आदि का विधान किया है, वह विष्णु इन्द्र के व्रत-हनन आदि कार्यों में मित्र होते हैं। यह सभी दिखाई देने वाले पदार्थ भगवान विष्णु के बल विक्रम के साक्षी रूप हैं।
हे उषे! तुम संसार को धारण करने वाली हो और स्थिर हो। इस उषा से पहले अग्नि उत्पन्न हुई, वही अग्नि फिर अपने स्थान से प्रकट होकर अपने कार्य को भली-भाँति जानने वाली होती हैं।
तुम इस हवि को गायत्री, त्रिष्टुप और अनुष्टुप छन्द के प्रभाव से वहन करो।
हे उषे! तुम अन्न, धन, बल, यश, दूध आदि रस और पुत्र-पौत्र आदि प्रदान करने के लिए यहाँ चिरकाल तक वास करो। तुम भूमि को भली प्रकार प्रकाशित करने वाली विशाल और स्वर्ग को प्रकाशित करने वाली स्वराट् हो। सरस्वती देवी तुम्हारी वाणी को तेज करें।
हे दिव्य लक्ष्ण सम्पन्न अग्नि! तुम्हारे गमन-भ्रमण में जो अश्व तुम्हें यज्ञ हेतु लाते हैं, अपने उन्हीं अश्वों को रथ में जोड़ो।
हे अग्नि! देवताओं को बार-बार यज्ञ में पुकारने वाले अश्वों को रथी के समान रूप शीघ्र ही रथ जोड़ो क्योंकि तुम पुरातन होता हो। हमारे इस महान यज्ञ अनुष्ठान में पधारकर इस स्थान पर विराजो।
अग्नि के मध्य में स्थित हिरण्यमय पुरुष अपने हृदय में वर्तमान विषयों के विकारों से विमुक्त श्रद्धायुक्त मन के द्वारा शुद्ध किए हुए अन्न और घृत की धारा स्त्रावित करते हैं। जिस प्रकार नदियाँ समुद्र में पहुँचती हैं उसी प्रकार हवन में दी गई आहुतियाँ उस हिरण्यमय पुरुष को प्राप्त होती हैं।
हे हिरण्य-शकल! मैं तुम्हें यज्ञ आदि कर्मों की सिद्धि हेतु बाईं नासिका में प्रवेश कराता हूँ। हे हिरण्य शकल! भली प्रकार से ज्योति के लिए मैं तुम्हें दाईं नासिका में प्रवेश कराता हूँ। हे हिरण्य-शकल! मैं तुम्हें कान्ति हेतु बाएँ नेत्र का स्पर्श कराता हूँ। हे हिरण्य शकल ! मैं तुम्हें कान्ति हेतु दायें नेत्र का स्पर्श करता हूँ। यह कान सब प्राणधारियों और सब मनुष्यों की भलाई करने वाली अग्निके संकल्प को समझते हैं, मैं इनका प्राशन कराता हूँ।
ये अग्नि हिरण्मय काँति से कांतिमान है। ये प्रकाशमान अग्नि सुवर्ण के तेज से तेजस्वी है। हे पुरुष! यजमान की हजारों इच्छाओं को सफल करने में समर्थ हो। अतः मैं तुम्हें सहस्त्रों कामनाओं की पूर्ति के निमित्त अपने अनुकूल कराता हूँ।
हे पुरुष! तुम चयन कार्य में संलग्न हो। देवताओं की उत्पत्ति स्थान समस्त प्राणधारी पशु के रूप समान है। उनके पोषण करने वाले हजारों मूर्ति एवं संसार रूप आदित्य इस अग्नि को दूध आदि से सिंचित करें और सभी की वीरता को वशीभूत करने वाले अग्नि के तेज से यजमान को हिंसित न होने दें एवं इस चयन वाले यजमान को सुखप्रदान करते हुए सौ वर्ष की आयु वाला बनाएँ।
हे अग्नि! तुम वायु के समान वेगवान हो। वरुण के नाभि रूप जल के बीच में आविर्भूत, नदियों के शिशु रूप, हरित (हरे) वर्ण वाले इस लोक में निवास करने वाले, खुरों से पर्वत को खोदने वाले अश्व को पीड़ित न करो।
ऐश्वर्यवान, अविनाशी, शेष रहित, प्राचीन कालीन ऋषियों द्वारा चयनीय, अन्नों द्वारा समस्त प्राणधारियों के पालक अग्नि की मैं उपासना करता हूँ। वह अग्नि पर्वो या इष्टकाओं द्वारा प्रत्येक ऋतु में कार्यों का सम्पादन करते हैं। वे दूध आदि से सम्पन्न अदिति रूपिणी गाय की किसी भी प्रकार से हिंसा न करें।
हे अग्नि! तुम श्रेष्ठ आकाश में स्थापित रूपों की रचना करने वाली वरुण की नाभि के समान रक्षा योग्य दिशा रूप लोक से उत्पन्न होने वाली करुणामयी प्रार्थियों का उपकार करने वाली हवि को बाधित मत करो। जो अग्नि रूप अज प्रजापति के संताप से उत्पन्न हुआ है, उस अज पर हे अग्नि! तुम्हारा क्रोध न पड़े।
यह कितने आश्चर्य की बात है कि रश्मियों के संगठित रूप तथा मित्र वरुण और अग्नि के नेत्र के समान प्रकाश-वान समस्त प्राणियों के अन्तर्यामी सूर्य समस्त संसार को प्रकाशवान करने के लिए उदय को ग्रहण होते हैं। ये अपने तेज से तीनों लोकों को पूर्ण करते हैं। इन सूर्य के लिए यह आहुति स्वाहुत हो।
हे अग्नि देव! तुम यज्ञ कार्य के निमित्त चयन किए गए हो। तुम सहस्त्र नेत्रों वाले हो। इस दो पैर वाले पुरुष की हिंसा न करो। तुम्हारा दुःख देने वाला क्रोध किसी अन्य पुरुष को या जो शत्रु हमसे द्वेष करता हो उसे ही दुःखी करो।
हे अग्नि! इस हिनहिनाते वेगवान घोड़े को हिंसित न करो। तुम्हारा संताप देने वाला आक्रोश और हिरण को ग्रहण हो और जो द्वेषी हमसे शत्रुता रखता हो उसे तुम्हारा आक्रोश पीड़ित करे।
हे अग्नि! यह गौ श्रेष्ठ स्थान में रहने वाली है। यह सहस्त्रों उपकार करने वाली, दूध आदि की हजारों धारा वाली, कुँए के समान दूध का भंडार वाली, लोकों से विभिन्न व्यवहार को प्राप्त और मुनष्यों का हित करने को घी, दूध, दही आदि देने वाली है। अदिति के समान रूप वाली इस गाय को दुःखी मत करो। तुम्हारा क्रोध गौ नामक पशु को प्राप्त हो और जो हमसे द्वेष करते हैं वे तुम्हारे संताप को प्राप्त हों।
हे अग्नि! महान स्थान में दृढ़ होकर इस ऊन से परिपूर्ण और वरुणदेव की नाभि के रूप समान, मनुष्यों और पशुओं को कम्बल आदि से ढकने वाली त्वचा-रक्षक, प्रजापति की सृष्टि में प्रथम उत्पन्न होने वाली अवि (गाय) को हिंसित मत करो। तुम अपनी लपटों को जंगली ऊँट पर डालो और मुझसे द्वेष करने वाले शत्रुओं को
पीड़ित करो। यह अज प्रजापति अग्नि के संताप से पैदा हुई है। इसने पैदा करने वाले प्रजापति को देखा। देवगण इसी के द्वारा देवत्व को प्राप्त हुए और यजमानों ने भी स्वर्ग की प्राप्ति की। अतः हे अग्नि ! इसको दुःखी मत करना। तुम अपनी ज्वाला को सिंहघाती
शरभ पर प्रेरित कर उसे पीड़ा पहुँचाओ और हमसे शत्रुता रखने वाले को संताप दो। हे तरुणतम अग्नि! तुम हमारी प्रार्थना को सुनो। आहुति दान करने वाले यजमानों की रक्षा करो उनके पुत्र पौत्र आदि की भी रक्षा करो।
हे अपस्या नामक इष्टके! मैं तुम्हें जलों की जगह में स्थापित करता हूँ। हे अपस्ये! मैं तुम्हें औषधियों में दृढ़ करता हूँ। हे अपस्ये ! मैं तुम्हें अभ्र में दृढ़ करता हूँ। हे अपस्य ! तुम्हें विद्युत में विद्यमान करता हूँ। हे अपस्ये! तुम प्राण के स्थान में स्थापित करता हूँ। हे अपस्ये! तुम्हें हृदय के स्थान मैं स्थापित करता हूँ। हे अपस्ये ! वाणी के स्थान में तुम्हारा स्थापन करता हूँ। हे अपस्ये! तुम्हें धरा में स्थित करता हूँ। हे अपस्ये! तुम्हें चक्षु के स्थान में स्थित करता हूँ। है अपस्ये! तुम्हें श्रोत्र में स्थापित करता हूँ। हे अपस्ये! तुम्हें स्वर्ग में दृढ़ करता हूँ। हे अपस्ये! तुम्हें अंतरिक्ष में स्थित करता हूँ। हे अपस्ये! तुम्हें समुद्र में विद्यमान करता हूँ। हे अपस्ये! तुम्हें सिकता में स्थापित करता हूँ। हे अपस्ये! तुम्हें अन्नों में लीन करता हूँ। हे अपस्ये! तुम्हें गायत्री छन्दों में समाहित करता हूँ। हे अपस्ये! तुम्हें त्रिष्टुप छन्द में स्थित करता हूँ। हे अपस्ये ! तुम्हें जगती छन्द से स्थापित करता हूँ। हे अपस्ये! तुम्हें पंक्ति छन्द से स्थापित करता हूँ।
हे इष्टके! यह अग्नि प्रथम उत्पन्न हुए हैं। तुम इन अग्नि के समान रूपवाली हो। प्राण अग्नि रूप आगे प्रतिष्ठित होता है। अतः मैं तुम अग्नि रूप वाली को स्थापित करता हूँ। प्राण उस भुव नामक अग्नि का पुत्र होने से भोवायन कहा गया है। अतः मैं उस भोवायन देवता का स्मरण करता हुआ इष्ट को स्थापित करता हूँ। प्राण का पुत्र वसंत प्रणापन नाम वाला है, उस प्राणापन देव के लिए इष्ट को स्थापित करता हूँ। वसंत की सन्तान गायत्री का मनन करता हुआ मैं इष्ट को स्थापित करता हूँ। गायत्री से उत्पन्न गायत्र सोम का मनन करता हुआ मैं इष्ट को स्थापित करता हूँ। गायंत्री से सोम उत्पन्न उपांशु ग्रह का मनन करता हुआ इष्ट का सादन करता हूँ। त्रिवृत स्तोम से उत्पन्न त्रिवृत स्तोम का मनन करता हुआ सादन करता हूँ। त्रिवृत स्तोत्र से उत्पन्न रथंतर सोम का मनन करता हुआ इष्ट का सादन करता हूँ। रथंतर सोम द्वारा विदित वशिष्ठ रूप प्राण का मनन करता हुआ इष्ट का सादन करता हूँ। हे इष्टके! तुम प्रजापति द्वारा गृहीत को मैं प्रजाओं और आरोग्यता लाभ के लिए ग्रहण करता हूँ। संतानों की आयु वृद्धि हेतु स्थापित करता हूँ।
यह इष्टका विश्वकर्मा नाम वाली है। यह दक्षिण दिशा में प्रवाहमान होती है।
दक्षिण में वायु देवता का मनन करता हुआ मैं इष्ट का सादन करता हूँ। उन विश्वकर्मा की संतान हृदय में है। अतः वैश्वकर्म नाम वाले हृदय का मनन कर इष्टका सादन करता हूँ। हृदय की संतान ग्रीष्म ऋतु है। अतः ग्रीष्म ऋतु का मनन करता हुआ मैं इष्टका सादन करता हूँ। ग्रीष्म ऋतु से उत्पन्न त्रिष्टुप छन्द का मनन करता हुआ मैं इष्ट का सादन करता हूँ। स्वार साम त्रिष्टुप छन्द से प्रकट हुआ है। मैं स्वार साम का मनन कर इष्ट का सादन करता हूँ। स्वार साम द्वारा अन्तर्याम ग्रह उत्पन्न होता है। मैं अन्तर्याम ग्रह का मनन कर इष्टका सादन करता हूँ। अन्तर्याम से पंचदश स्तोत्र उत्पन्न हुआ है। पंचदश स्तोत्र का मनन कर इष्टका सादन करता हूँ। पंचदश स्तोत्र से उत्पन्न बृहत साम का मनन कर इष्ट का विद्यमान करता हूँ। वृहत्साम से प्रसिद्ध भरद्वाज का मनन कर इष्ट का सादन करता हूँ। हे इष्टके ! तुम प्रजापति द्वारा आदर युक्त ग्रहण हो। मैं तुम्हारी कृपा दृष्टि से प्रजाओं के मन को ग्रहण करता हूँ।
यह आदित्य पश्चिम की ओर गमन करते हैं। इनका मनन करता हुआ मैं इष्ट का सादन करता हूँ। आदित्य से उत्पन्न हुए चक्षु का मनन करता हुआ मैं इष्टका सादन करता हूँ। चक्षु ऋतु से प्रकट है। मैं ऋतु का मनन करता हुआ इष्टका सादन करता हूँ। ऋतु से जगती छन्द उत्पन्न हुआ है। अतः जगती छन्द का मनन करता हुआ इष्टका सादन करता हूँ। जगती छन्द में उत्पन्न ऋक सोम का मनन करता हुआ इष्ट का सादन करता हूँ। ऋक सोम से शुक्र ग्रह की उत्पत्ति हुई। शुक्र ग्रह का मनन करता हुआ इष्ट का सादन करता हूँ। शुक्र ग्रह से प्रकट सप्रदश स्तोत्र का मनन कर इष्ट को सादन करता हूँ। सप्तदश स्तोत्र से उत्पन्न वैरूप पृष्ठ का मनन करता हुआ इष्ट का सादन करता हूँ। वैरूप से प्रकट चक्षु रूप जमदग्नि का मनन कर इष्ट का सादन करता हूँ। हे इष्टके ! तुम प्रजापति द्वारा सादर ग्रहण की हुई प्रजा के लिए नेत्र रूप से ग्रहण करता हूँ।
उत्तरी दिशा में स्वर्गलोक विद्यमान है। उस स्वर्गलोक का मनन करते हुए इष्टका सादन करता हूँ। उस स्वर्गलोक से सम्बंधित क्षेत्र का मनन करता हुआ इष्टका सादन करता हूँ। श्रोत्र से विदित्त शरद ऋतु का मनन कर इष्टका सादन करता हूँ। अनुष्टुप छन्द से प्रकट ऐडसाम का मनन कर इष्टका सादन करता हूँ। ऐडसाम द्वारा विदित मंथी ग्रह का मनन कर इष्टका विद्यमान करता हूँ। मंथी ग्रह से उत्पन्न 21 वें स्तोत्र का मनन कर इष्टका सादन करता हूँ। 21 वें स्तोत्र से उत्पन्न वैराज नामक साम का मनन कर इष्टका सादन करता हूँ। वैराज नामक साम से विदित विश्वामित्र का मनन कर इष्टका सादन करता हूँ। हे इष्टके! तुम प्रजापति द्वारा आदर से ग्रहण की हुई सहायता से प्रजा के निमित्त श्रोत्र को प्राप्त करता हूँ।
सर्वोपरि विराजमान चन्द्रमा को मनन कर इष्ट का सादन करता हूँ। चन्द्रमा रूप मति से उत्पन्न वाणी को मनन कर इष्ट का सादन करता हूँ। वाणी से प्रकट हेमन्त ऋतु का मनन कर इष्ट का सादन करता हूँ। हेमन्त से प्रकट हेमन्ति नामक पंक्ति छंद का मनन कर इष्ट का सादन करता हूँ। पंक्ति छंद से प्रकट विद्यनवत सोम का मनन कर इष्ट का सादन करता हूँ। निधन वत्साम से प्रकट आग्रयण ग्रह का मनन कर इष्ट सादन करता हूँ। आग्रयण ग्रह से विदित त्रिणव और गयस्त्रिश नामक दो सोमों का मनन कर इष्ट का सादन करता हूँ। त्रिवण और गयस्त्रिश स्तोमों से विदित शाक्वर और रैक्त सोम देवताओं का मनन करते हुए इष्ट का सादन करता हूँ। शाक्वर और रेवत सोम से विदित विश्वकर्मा नामक ऋषि का मनन कर इष्ट का सादन करता हूँ। हे इष्टके ! तुम प्रजापति के द्वारा गृहित हों। तुम्हारी अनुकूलताओं से प्रजाजनों की आरोग्य वृद्धि निमित इन दस मंत्रों से वाणी को ग्रहण करता हूँ। हे इष्टके ! इन पचास प्राणभृत इष्टकाओं के मिलन स्थान में रहे छिद्र को पूर्ण करती हुई तुम अत्यन्त स्थिरतापूर्वक स्थित हो। इंद्र, अग्नि और विश्वकर्मा इस स्थान में तुम्हारी स्थापना करते हैं। अन्न का सम्पादन करने वाले जल स्वर्ग से पृथ्वी पर गिरते हैं और देवताओं के जन्म वाले दिन स्वर्ग पृथ्वी और अंतरिक्ष में इस यजात्मक सोम को भली प्रकार से परिपक्व करते हैं। समुद्र के समान विशाल सब स्तुतियाँ, महारथी, अन्नों के स्वामी और कर्मवानों के रक्षक इन्द्र को भली प्रकार सेवन करती हुई बनती हैं।
अध्याय (14) :: ऋषि :- उशना, विश्वेदवा, विश्वकर्मा; देवता :- अश्विनों, ग्रीष्मरे ऋतव, छंदासि, पृथिव्यावय, अग्नादय, विदुषी, यज्ञ, मेघाविन, वस्वादयो लिंगोक्ता, ऋभव, ईश्वर, जगदीश्वर, प्रजापति; छंद :- त्रिदुष्प, बृहती पंक्ति, उष्णिक, जगती, गायत्री, कृति।
हे इष्टके! तुम दृढ़ स्थिति वाली, अविचला अग्नि के पूर्व प्रथम चिति रूप स्थान को सेवन करती हुई स्थिर होओ। देवताओं के अध्वर्यु दोनों अश्वनीकुमार तुम्हें इस सर्वश्रेष्ठ स्थान में स्थापित करें।
हे इष्टके! पक्षी के घौंसले के रूप समान घर खाली, आहुति रूप घृत से सम्पन प्रथम चित्ति इष्टकाओं के धारण करने वाली तुम इस पृथ्वी के कल्याणकारी स्थान में रहो। रुद्रगण और वसुगण तुम्हारी वंदना करें। तुम समृद्धि लाभ श्लोकों को प्रवृद्ध करो। देवों के अध्वर्यु अश्विद्वय तुम्हें इस महान स्थान में स्थापित करें।
हे इष्टके ! तुम बल की रक्षा करने वाली हो। तुम देवों के अत्यन्त श्रेष्ठ सुख के लिए अपनी शक्ति से दूसरी चिति के स्थान में स्थित होकर सर्वमंगलकारिणी हो। जिस प्रकार पुत्र के लिए पिता सुख का विधान करता है, उसी प्रकार तुम सुख रूप बनकर सशरीर यहाँ पर रहो। देवताओं के अध्वर्यु कुमार तुम्हें यहाँ इस स्थान में स्थापित करें।
हे इष्टके! तुम प्रथम चिति को पूर्ण करने वाली और जल से उत्पन्न हो। ऐसी तुम सभी देवताओं द्वारा उपस्थित हुई हो। जिसमें श्लोक पाठ होता है। उस यज्ञ में तुम हवन घुत से परिपूर्ण होकर दूसरी चिति में दृढ़ होओ। हमें पुत्र पौत्र आदि तथा धन समस्त ओर से प्रदान करो। अश्विद्वय तुम्हें इस जगह में विद्यमान करें।
हे इष्टके तुम अंतरिक्ष को धारण करने वाली, दिशाओं को स्तंभित करने वाली और सब प्राणियों की अधीश्वरी हो। मैं तुम्हें प्रथक चिति पर स्थापित करता हूँ। तुम जलों को द्रव तरंग के समान हो। विश्वकर्मा तुम्हारे द्रष्टा हैं। अश्विनी कुमार तुम्हें यहाँ स्थापित करें।
ज्येष्ठ-आषाढ़ भी ग्रीष्मात्मक ही हैं। हे ऋतुरूप इष्टकाद्वय। तुम अग्नि के मध्य श्लेष रूप हो। तुम मेरी महानता को स्वर्ग और पृथ्वी पर कल्पित करो। जल औषधि और समानकर्मा इष्ट का मेरी महानता कल्पित करें। जैसे देवता इन्द्र के समक्ष उपस्थित होते हैं उसी प्रकार धावा भू के मध्य वर्तमान अन्य मनुष्यों द्वारा दृढ़ ग्रीष्म ऋतु की सम्पादिका इष्टकाएँ इस जगह में दृढ़ हों। हे इष्टके! तुम अद्भुत गुणवाली अंगिरा के समान रूप दृढ़ बनो।
हे इष्टके! ऋतुओं और जलों से प्रीति करने वाली अवस्था प्राप्त कराने वाले प्राणों के सहित, इन्द्र आदि देवताओं का भजन करने वाली तुम्हें सर्व हितैषी अग्नि की प्रसन्नता के लिए धारण करते हैं। अध्वर्यु अश्विनी कुमार तुम्हें द्वितीय चित्ति में स्थित करें। हे इष्टके ! ऋतुओं, जलों, वसुओं, प्राणों तथा सब देवताओं से प्रीति करने वाली तुम्हें संसार का कल्याण करने वाले अग्नि के निमित्त ग्रहण करता हूँ। अध्वर्यु अश्वनी कुमार तुम्हें द्वितीय चित्ति में स्थापित करते हैं। हे इष्टके! ऋतुओं, जलों, रुद्रों, प्राणों और सब देवताओं से प्रीति करने वाली तुम्हें संसार के हित चिंतक अग्नि देवता की प्रीति के लिए ग्रहण करता हूँ। तुम्हें अध्वर्यु अश्विनी कुमार इस द्वितीय चित्ति में प्रीति करने वाली तुम्हें, मैं विश्व का हित करने वाली अग्नि की प्रीति के लिए ग्रहण करता हूँ। अध्वर्यु अश्विनी कुमार तुम्हें इस द्वितीय चिति में स्थापित करें। हे इष्टके! ऋतुओं, जलों, प्राणों और विश्वेदेवों से प्रीति करने वाली तुम्हें संसार का हित करने वाली अग्नि की प्रसन्नता के लिए ग्रहण करता हूँ। अध्वर्यु अश्विनी कुमार तुम्हें इस द्वितीय चित्ति में स्थापित करें।
हे इष्टके! तुम मेरे प्राणों की रक्षा करो। हे इष्टके ! तुम मेरी अपान की सुरक्षा करो। हे इष्टके! तुम मेरे ध्यान की रक्षा करो। हे इष्टके ! तुम मेरी आँखों को सुरक्षा करो। हे इष्टके! तुम मेरे कानों की रक्षा करो। हे इष्टके ! तुम्हारी अनुकूलता को ग्रहण करके यह पृथ्वी वर्षा के जल से सिंचित हो। हे इष्टके ! औषधियों को पुष्ट करो। हे इष्टके ! मनुष्यों की सुरक्षा करो। हे इष्टके! चतुष्पाद (पशु) की सुरक्षा करो। हे इष्टके ! स्वर्ग से जल वर्षा को आकृष्ट करो।
गायत्री रूप होकर प्रजापति ने वय द्वारा मूल रूप ब्राह्मण की रचना की। आनिरुक्त छन्द रूप से वम द्वारा प्रजापति ने क्षत्रिय की रचना की। संसार की रचना करने वाले प्रजापति रूप ईश्वर ने छंद रूप से वैश्य को बनाया। परमेष्ठी विश्वकर्मा वय द्वारा छंद को प्राप्त हुए और उन्होंने शूद्र की उत्पत्ति की। एक पद नामक छंद से प्रजापति ने अजा को ग्रहण किया, इससे अजा (बकरी) पशु उत्पन्न हुए। गायत्री छंद से मेष की उत्पत्ति की। पंक्ति छंद होकर प्रजापति ने किन्नर को ग्रहण किया। तब पुर्लिंग पशु उत्पन्न हुए। विराट छंद होकर व्याघ्र को ग्रहण कर प्रजापति ने व्याघ्र (चीते) की उत्पत्ति की। जगती आदि छंद रूप होकर प्रजापति ने सिंह को उत्पन्न किया। निरुक्त छंदों द्वारा प्रजापति ने निरुक्त पशुओं (गर्दभ आदि) को उत्पन्न किया। ककुप छन्द से भ्रमण करते हुए प्रजापति ने उक्षा को ग्रहण कर उक्षा जाति को पैदा किया। बृहती छंद से भ्रमण करते हुए प्रजापति ने ऋषभ को ग्रहण किया। इससे भालू आदि की उत्पत्ति हुई।
पंक्ति छंद होकर विचरण करते हुए प्रजापति ने बलीवर्द की वय द्वारा प्राप्त किया। जगती छंद रूप से विचरण करते हुए प्रजापति ने गायों की रचना की। त्रिष्टुप छंद रूप से विचरण करते हुए प्रजापति ने त्रयवि जाति की रचना की। विराट छंद होकर विचरण करने वाले प्रजापति ने दित्यवाट् जाति की रचना की। गायत्री छंद के रूप में जाते हुए प्रजापति ने पंचावि जाति की रचना की। उष्णिक छंद के रूप में विचरण करते हुए प्रजापति ने त्रिवत्सा पशु को रचित किया। अनुष्टुप छंद होकर विश्वकर्मा ने तुर्यवाट् जाति की रचना की। हे इष्टके ! पूर्व स्थापित इष्टकाओं द्वारा हिंसित न होती हुई तुम समस्त छिद्रों को पूर्ण करती हुई अत्यन्त दृढ़ता से दृढ़ हो जाओ। इन्द्र, अग्नि और बृहस्पति तुम्हें इस महान जगह पर दृढ़ करें। अन्नसम्पादक जलों के धरा पर गिरने से देवों के जन्म वाले संवत्सर में स्वर्ग, पृथ्वी और अतंरिक्ष इस यज्ञ वाले सोम को परिपक्व करते हैं। जिन देवताओं की वंदना समुद्र से समा रूप विस्तारित हैं, वे वन्दनाओं महारथी, अन्नों के स्वामी और अनुष्ठान आदि कर वाले यजमानों के सुरक्षक को भली-भाँति सेवा और बढ़ोत्तरी करती हैं।
हे इन्द्र और अग्नि ! तुम अचल और अव्यथित रहते हुए इष्ट को दृढ़ करो। इष्टके! तुम अपने ऊपरी भाग में द्यावा, पृथ्वी और अंतरिक्ष को व्याप्त करने में सम् हो।
हे स्वयंमातृणे! तुम अवकाश परिपूर्ण तथा विस्तारित हो। विश्वकर्मा तुम्हें अंत पर दृढ़ करें। हे इष्टके! तुम समस्त शरीरधारियों के प्राणापान, व्यान और उदान लिए, प्रतिष्ठा और व्यवहार के लिए अंतरिक्ष को धारण योग्य बनाओ। उस अंत को निरुपद्रव करो। वायु अपनी कल्याणप्रद शक्ति से तुम्हारी भली-भाँति स करें। तुम अपनी अधिष्ठातृ देव की कृपा दृष्टि को ग्रहण करती हुई अंगिरा के समान दृढ़ अचल होओ।
हे इष्टके! तुम दिशाओं में विराजमान होती हुई, पूर्व में गायत्री रूप हो। हे इ तुम विभिन्न रूप से सज्जित होकर त्रिष्टुप रूप से दक्षिण में स्थित हो । हे इष्ट भली प्रकार सुशोभित होकर जगती रूप से पश्चिम में स्थापित होओ।
हे इष्टके! तुम स्वयं सुशोभित होती हुई अनुष्टुप रूप से उत्तर में हो। हे तुम अत्यन्त रक्षा वाली, भक्ति रूप से ऊर्ध्व दिशा में अधीश्वरी होती हुई प होओ।
हे इष्टके! तुम वायु रूप को विश्वकर्मा अंतरिक्ष के ऊपर स्थित करें। तुम् के प्राणापान, व्यान और उदान के लिए, समस्त तेजों को प्रदान करो। व अधिपति हैं, उनकी कृपा दृष्टि को प्राप्त हुई तुम अंगिरा के समान रूप इस अग्नि चुनाव कार्य में दृढ़ रूप से अवस्थित होओ।
श्रावण भादों दोनों ही वर्षात्मक मास हैं। ये मास रूप इष्टकाएँ अग्नि के श्लेष होकर हमारी श्रेष्ठता कल्पित करो। द्यावा-पृथ्वी, जल, औषधि भी हमारी श्रेष्ठता रूप से अंकरित हुए। एक रूप और एक कार्य में लगी हई तुम दोनों समान वाक्य का विधान करें। जैसे सब देवता इन्द्र से मिलकर कार्य करते हैं. उसी प्रकार द्यावा पृथ्वी में स्थित समस्त इष्टकाएँ समान मन वाली होकर वर्षा ऋतु में इस यज्ञ स्थान में तुमसे मिलें और तुम इन्द्र की अनुकूलता से यहाँ दृढ़ता-पूर्वक स्थापित हो।
आश्विन और कार्तिक ये दोनों शरदात्मक हैं। ये ऋतु रूप इष्टकाएँ अग्नि के श्लेष रूप हुई। यह मुझ यजमान की महानता कल्पित करें। धावाधरा, जल, औषधि भी मेरी महानता कल्पित करें। जैसे समस्त देव इन्द्रदेव की सेवा करते हैं, वैसे ही समस्त इष्टकाएँ इस जगह में समान हृदयवाली होकर मिलें और उन विख्यात देव और अंगिरा के समान दृढ़ रूप से स्थित हों।
हे इष्टके! मेरी आयु की रक्षा करो। हे इष्टके! मेरे प्राणों की रक्षा करो। हे इष्टके! मेरे अपान की रक्षा करो। हे इष्टके! मेरे व्यान की रक्षा करो। हे इष्टके! मेरे चक्षुओं की रक्षा करो। हे इष्टके! मेरे कानों की रक्षा करो। हे इष्टके ! मेरी वाणी को सम्पूर्ण करो। हे इष्टके ! मेरे मन को पोषित करो। हे इष्टके! मेरी आत्मा की रक्षा करो। हे इष्टके ! मेरे तेज की रक्षा करो।
हे इष्टके! तुम्हें इस लोक का मनन कर दृढ़ करता हूँ। हे इष्टके! अंतरिक्ष के मनन पूर्वक तुम्हें स्थित करता हूँ। हे इष्टके ! द्युलोक के मनन पूर्वक स्थित करता हूँ। हे इष्टके! अस्त्रीवय छंद के मनन पूर्वक तुम्हें स्थित करता हूँ। हे इष्टके! बृहती छंद के मनन से तुम्हें दृढ़ करता हूँ। हे इष्टके! अनुष्टुप छंद का मनन कर तुम्हें स्थापित करता हूँ। हे इष्टके! विराट छंद के मनन द्वारा तुम्हें सादित करता हूँ। हे इष्टके! गायत्री छंद के मनन करके तुम्हें स्थापित करता हूँ। हे इष्टके! त्रिष्टुप छंद को मनन करके तुम्हें दृढ़ करता हूँ। हे इष्टके! जगती छंद को मनन करके तुम्हें स्थापित करता हूँ।
मैं पृथ्वी देवता से सम्बन्धित छंद के मननपूर्वक, इष्ट को स्थापित करता हूँ। अंतरिक्ष से सम्बन्धित छंद में मननपूर्वक मैं दृष्ट को स्थापित करता हूँ। स्वर्गात्मक इन्द के मनन से इष्ट को स्थापित करता हूँ। वर्षा देवता के छंद का मनन कर इष्ट को स्थापित करता हूँ। नक्षत्र देवता के छंद को मननपूर्वक इष्ट की स्थापना करता हूँ। वाग्देवता के छंद को मनन करता हुआ मैं इष्ट की स्थापना करता हूँ। मन देवता के छंद को मनन करते हुए मैं इष्ट को स्थापित करता हूँ। कृषि देवता के छंद को मनन करता हुआ मैं इष्ट को स्थापित करता हूँ। हिरण्य देवता के छंद को मनन करता हुआ मैं इस इष्ट को स्थापित करता हूँ। अजा (बकरी) देवता के छंद का मनन करते हुए मैं इष्ट को स्थापित करता हूँ। गाय देवता के छंद से इष्ट को स्थापित करता हूँ। घोड़े देवता के छंद के मनन से इष्ट को स्थापित करता हूँ।
अग्नि देव के मनन से इष्ट को स्थापित करता हूँ। वायु देवता के मनन पूर्वक इष्टको स्थापित करता हूँ। सूर्य देवता के मनन पूर्वक इष्टको स्थापित करता हूँ। चन्द्र देव का मनन कर इष्ट को स्थिर करता हूँ। वसुगण देव का मनन कर इष्टका की स्थापना करता हूँ। रुद्रगण देव का मनन कर इष्ट को सादित करता हूँ। आदित्य गण देवता के मनन पूर्वक इष्ट का सादित करता हूँ। मरुद गण के मनन द्वारा इष्टका सादित करता हूँ। विश्वेदेवा के मनन से इष्ट को स्थापित करता हूँ। बृहस्पति के मनन से इष्टका स्थापित करता हूँ। इन्द्र देवता के मननपूर्वक इष्टका की स्थापना करता हूँ। वरुण देव के मननपूर्वक इष्ट को स्थापित करता हूँ।
हे बाल खिल्ये इष्टके! तुम मूर्धा के समान सर्वश्रेष्ठ हो। हे बाल खिल्ये! तुम धारण करने वाली और स्थिर हो, अतः स्थिर रूप से इस स्थान को धारण करो। हे बाल खिल्ये ! तुम धारण करने वाली भूमि के समान स्थिर हो। इस स्थान को धारण करो। हे बाल खिल्ये! आयु की वृद्धि के लिए मैं तुम्हें स्थापित करता हूँ। हे बाल खिल्ये! तुम्हें अन्न की वृद्धि हेतु स्थापित करता हूँ। हे बाल खिल्ये! तुम्हें तेज के निमित्त स्थापित करता हूँ। हे बाल खिल्ये ! तुम्हें कल्याण की वृद्धि के निमित्त स्थापित करता हूँ।
हे बालखिल्ये! तुम इस जगह में विधिपूर्वक वास करो। तुम अपने आप नियम अनुकूल रहकर अन्यत्र से भी नियम का पालन कराने वाली हो. इस स्थान में रही। तुम दृढ़ धरा के समान रूप अवचिल हो. नीचे रखी इष्टका को धारण कराई के लिए मैं तुम्हें स्थित करता हूँ। हे बालखिल्ये! धन की प्राप्ति हेतु तुम्हें स्थापि बालखिल्ये! अन्न ग्रहण के लिए में तुम्हें स्थापित करता हूँ। हे बालखिल्ये! अन्नपि करता है। हे बालखिल्ये ! धन पुष्टि के लिए मैं तुम्हें स्थित कराता हूँ। हे इष्टके! त्रिवृत सोम में आशु रूप में व्याप्त तुम्हें यहाँ स्थापित करता हूँ। 15 कलाओं द्वारा नित्यप्रति घटने-बढने वाले चन्द्रमा को मनन कर तुम्हें इस स्थान में स्थापित करता है। सब प्रकार रक्षा करने वाले व्योम 17वें स्तोत्र रूप है उन व्याम का मनन कर तुम्हें स्थापित करता हूँ। धारण करने वाले और स्वयं प्रतिष्ठित 21 स्तोत्र का मनन कर तम्हें स्थापित करता है। संवत्सर 18 अवयवों वाला है. उसका मनन कर इष्ट को स्थापित करता है। 19 अवयवों वाले तप रूप स्तोत्र का मनन कर उष्ट का स्थापित करता हैं। 20 अवयवों वाला और सब प्राणियों को आवृत्त करने वाला अभिवृत नामक सविश स्तोम का मनन कर इष्ट को स्थापित करता हूँ। महान तेज को देने वाला तथा 22 अवयवों से युक्त जो द्राविंश स्तोम है, उस वर्चयुक्त देवना का मनन कर इष्टका स्थापित करता हूँ। भली प्रकार पुष्टि देने वाला 23 अवयवों में युक्त स्तोम है, उस संभरण देवता का मनन कर इष्टका स्थापित करता हूँ। प्रजा को उत्पन्न करने वाले 24 अवयवों से युक्त स्तोम है, उस 24 योनि देवता का मनन कर इष्टका स्थापित करता हूँ। सामगर्भ रूप जो 25 स्तोम है, उसका मनन कर इष्टका स्थापित करता हूँ। जो त्रिणव स्तोम ओजस्वी और वज्र के समान महिमामय है उसका मनन कर इष्टका स्थापित करता हूँ। जो 31 अवयव वाला यज्ञ के लिए उपयोगी स्तोम है, उस क्रतु स्तोम का मनन कर इष्टका स्थापित करता हूँ। जो 33 अवयवों वाला, प्रतिष्ठा का कारण रूप अथवा सब में व्याप्त होने वाला जो प्रतिष्ठा नामक स्तोम है, उसका मनन कर इष्टका स्थापित करता हूँ। 34 अवयवों वाला जो स्तोम सूर्यलोक की प्राप्ति कराने वाला अथवा स्वयं सूर्य का स्थान रूप है उस स्तोम का मनन कर इष्टका स्थापित करता हूँ। 36 अवयवों वाला जो स्तोम है वह सुख काम्य एवं स्वर्ग प्राप्त कराने वाला है। उस स्तोम का मनन कर इष्टका स्थापित करता हूँ। 48 अवयवों वाला, साम के आवर्तनो से युक्त जो स्तोम है उसमें सभी प्राणी अनेक प्रकार से रहते हैं। उस विकृत नामक स्तोम का मनन कर इष्टका स्थापित करता हूँ। त्रिवृत 15वें 17वें 19वें इन चारों स्तामों का समूह चतुष्टोम सबका धारक है उस धर्तृ देवता का मनन कर इष्टका सादन करता हूँ।

हे इष्टके ! तुम अग्नि के भाग रूप हो, दीक्षा का तुम पर अधिकार है, इसलिए त्रिवृत स्तोम के द्वारा तुमसे ब्राहाणों की मृत्यु से सुरक्षा हुई, त्रिवृत स्तोम के मनन पृर्वक मैं तुम्हें स्थित करता हूँ। हे इष्टके ! तुम इन्द्रदेव का हिस्सा हो, तुम पर विष्णु का अधिकार है, तुमने पंचदश स्तोत्र के द्वारा क्षत्रियों की मृत्यु से सुरक्षा की थी उस पंचदश स्तोम का मनन करता हुआ मैं तुम्हें स्थित करता हूँ। हे इष्टके ! जो देवता मनुष्यों के शुभाशुभ कार्यों के ज्ञाता हैं, तुम उनका हिस्सा हो, धाता का तुम पर आधिपत्य है, तुमने सप्तदश स्तोम के द्वारा वैश्यों की सुरक्षा की है, उस सप्तदश स्तोम के मनन पूर्वक स्तोम स्थित करता हूँ। हे इष्टके! तुम मित्र देव का हिस्सा हो, तुम पर वरुण देव का अधिकार है। तुमने एकविंश स्तोत्र के द्वारा वृष्टि जल और वायु की सुरक्षा की है। उस एकविंश स्तोम का मनन कर तुम्हें स्थित करता हूँ।
हे इष्टके! तुम वसुओं का भाग हो। तुम पर रुद्रगण का अधिकार है। तुमने चौबीस स्तोम के द्वारा पशुओं को मृत्यु मुख से बचाया है। उस चौबीसवें स्तोम का मनन करके तुम्हें स्थापित करता हूँ। हे इष्टके! तुम आदित्यों का भाग हो। तुम पर मरुदगण का अधिकार है। तुमने पंचविश (पच्चीसवें) स्तोम के द्वारा गर्भ में स्थित प्राणियों की मृत्यु से रक्षा की है, उस पच्चीसवें स्तोम के मननपूर्वक तुम्हें स्थापित करता हूँ। हे इष्टके! तुम अदिति का भाग हो। तुम पर पूषा देवता का अधिकार है। तुमने त्रिवण स्तोम के द्वारा प्रजाओं के ओज (वीर्य) की रक्षा की है। उस त्रिणव स्तोम के मननपूर्वक तुम्हें स्थापित करता हूँ। हे इष्टके! तुम सर्वप्रेरक सविता देव के भाग हो। तुम पर बृहस्पति का अधिकार है। तुमने चतुष्टोम स्तोम द्वारा सब मनुष्यों के भ्रमण करने योग्य दिशाओं की रक्षा की है। उस चतुष्टोम स्तोम का मनन करता हुआ मैं तुम्हें स्थापित करता हूँ।
हे इष्टके! तुम शुक्ल पक्षीय तिथि के भाव रूप हो, आप पर कृष्णपक्ष की निशि का अधिकार है। तुमको चत्वारिश स्तोम के द्वारा मनन पूर्वक आपको स्थित करता हैं। हे इष्टके! आप ऋतुओं का हिस्सा हो। आप पर विश्वदेवो का अधिकार है। अपने त्र्यस्त्रिश स्तोम के द्वारा प्राणधारी मात्र को मृत्यु के मुख से रक्षित किया है। उस त्र्यस्त्रिंश स्तोम के मनन से आपको स्थापित करते हैं।
मार्गशीर्ष और पौष हेमन्त के भाग हैं। यह अग्नि के अंतर में श्लेषरूप होते हैं। अग्नि चयन करते हुए मुझे यजमान की श्रेष्ठता कल्पित करे। जल और औषधि भी हमारी श्रेष्ठता कल्पित करें। द्यावा पृथ्वी के मध्य हेमन्त ऋतु को सम्पादित करती सभी अग्नियाँ समान मनवाली होकर इस कार्य की ओर आश्रित हो और इस इष्टका में मिले। हे इष्टके! उस प्रसिद्ध देवता द्वारा तुम अंगिरा के समान दृढ़तापूर्वक प्रतिष्ठित हो।
प्रजापति ने एक वाणी द्वारा आत्मा का स्तव किया, जिससे यह सभी अचेतन प्रजा पैदा हुई और प्रजापति ही उनके अधिपति हुए। प्राण, दान और व्यान के द्वारा उपासना की, जिससे ब्रह्मा की सृष्टि हुई और उस सृष्टि से अधिपति ब्रह्मणस्पति बने। पाँचों के द्वारा वंदना की। उन पंच भूतात्मक सृष्टि के अधिपति भूतनाथ महादेव हुए। श्रोत, नासिका, चक्षु, जिव्हा वंदना करने पर सप्तर्षि की रचना हुई, उनके अधिपति धाता हुए।
नवद्वार शरीर द्वारा प्रार्थना की जिससे पितर अग्नि और वायु की उत्पत्ति हुई, उनके स्वामी अदिति हैं। दस प्राण और ग्यारहवें आत्मा द्वारा प्रार्थना की, जिससे बसंत आदि ऋतुओं की उत्पत्ति हुई, उनके अधिपति ऋतु पालक देवता हुए। यश, प्राण, दो पाद और एक आत्मा द्वारा प्रार्थना की, जिससे चैत्र आदि बारह मास और एक अधिक माह वाले संवत्सर की उत्पत्ति हुई, उनका अधिपति संवत्सर हुआ। दोनों हाथ, दस अंगुलियाँ, दो भुजाएँ और एक नाभि के ऊपर के भाग द्वारा प्रार्थना की जिससे क्षत्रिय उत्पन्न हुए। उनके स्वामी इन्द्र हुए। दो पाँव, पैरों की दस अंगुलियाँ, दो जाँघ और नाभि के निचले भाग द्वारा वंदना की, जिससे ग्राम्य पशुओं की सृष्टि हुई। बृहस्पति उनके स्वामी बने।
हाथों की दसों अंगुलियों और ऊपर नीचे के छिद्र रूपी नौ वाणी द्वारा वंदना की, उससे शुद्र और आर्यजाति की रचना हुई, उनकी स्वामिनी अहोरात्रि हुई। हाथ और पैर की बीसों अंगुलियों और आत्मा युक्त इन इक्कीस ने वंदना की, उनसे एक खुर वाले पशु उत्पन्न हुए और उनके स्वामी वरुणदेव हुए। हाथ, पैर बीसों की अंगुलियाँ, दो पैरों और एक आत्मा से वंदना की, उनसे प्रजा आदि पशु उत्पन्न हुए, उन पशुओं के अधिपति पूषा हुए। बीस अंगुलियाँ, दो पैर, दो हाथ, एक आत्मा से वंदना की। उनसे वन के हिरण आदि पशुरचित हुए। उनके अधिपति वायुदेव हुए। बीस अंगुलियाँ दो बाहु, दो प्रतिष्ठा एक आत्मा से वंदना की, उनसे धावाधरा प्रकट हुए, वसुगण, रुद्रगण, आदित्यगण इनके स्वामी बने।
बीस अंगुलियों और नवप्राण के छिद्रों सहित स्तुति की उससे वनस्पतियों की उत्पत्ति हुई, उनके स्वामी सोम बने। बीस अंगुली, दस इंद्रियों और एक आत्मा से वंदना की, उससे सभी प्राणियों की उत्पत्ति हुई, सृष्टिके स्वामी पूर्व पक्ष और उत्तर पक्ष हुए। बीस अंगुलियों, दस इंद्रियों, दो पैरों और एक आत्मा से वंदना की जिससे प्रकट हुए सब प्राणियों ने कल्याण की प्रीति की परमेष्ठी प्रजापति उनके स्वामी बने।
अध्याय (15) :: ऋषि :- परमेष्ठी प्रिय मेधा, मधुच्छन्दा, वसिष्ठ; देवता :- अग्नि दंपति, विद्वांस, प्रजापति, वसव, रुद्रा आदित्या मरुता, विश्वेदेवा, वसंतऋतु, ग्रीष्मऋतु, वर्षा ऋतु, शरदऋतु, हेमन्त ऋतु, शिशिर ऋतु, विदुषी, इन्द्राग्नि, आप, इंद्र, परमात्मा, विद्वान; छन्द :- त्रिष्टुप, कृति, अनुष्टय, जगती, गायत्री, उष्णिक, पंक्ति।
हे जात वेदा अग्नि! हमारे पूर्वोत्पन्न शत्रुओं को भली प्रकार नष्ट करो। जो अभी पैदा नहीं हुए हैं, उन्हें उत्पन्न होने से रोको। तुम उत्तम मन वाले होकर तथा क्रोध मुक्त रहते हुए हमें अभिष्ट वर प्रदान करो। हे अग्नि! तुम्हारे कल्याण के आश्रित मनुष्य समोदण्डप, हविधीन, आग्रीन इन तीनों स्थानों में यज्ञ करें।
हे अग्नि! तुम बल द्वारा उत्पन्न हुए हो। हमारे शत्रुओं को समस्त ओर से समाप्त करो। भविष्य में पैदा होने वाले शत्रुओं को रोको। तुम क्रोध रहित महान अन्तः करण सके हमें अभिष्ट वरदान प्रदान करो। मैं तुम्हारी कृपा दृष्टि से सब प्रकार के शत्रुओं से अधिक शक्तिशाली बनूँ।
हे इष्टके! तुम्हें सोलहवें स्तोम के प्रभाव से स्थापित करता हूँ। इस स्थान में तेज और धन की प्राप्ति हो, दक्षिण दिशा की ओर से पाप का विनाश हो। हे इष्टके ! चौवालिसवें स्तोम से तुमको स्थापित करता हूँ। इस स्थान में तेज और धन की प्राप्ति हो, उत्तर दिशा की ओर से हमारी पाप से रक्षा हो। हे इष्टके ! तुम रक्षक नाम वाले पन्द्रह कलाओं से युक्त चन्द्रमा की तरह अग्नि को पूर्ण करने वाली हो। ऐसी तुम्हारी समस्त देवता वंदना करें। सभी स्तोम पृष्ठ मंत्रों के प्रभाव से होते हुए घृत से युक्त होती हुई तुम इस चतुर्थ चिति के ऊपर स्थित हो। हमको इस कार्य के फलस्वरूप पुत्र और धन आदि दो। सब देवता तुम्हारी प्रार्थना करें और इसके फलस्वरूप तुम हमें ऐश्वर्य प्रदान करो।
हे इष्टके! जिस धरा पर समस्त प्राणधारी भ्रमण करते हैं, उस धरा पर मनन पूर्वक तुमको स्थित करता हूँ। हे इष्टके ! प्रभामण्डल से विस्तारित अंतरिक्ष के मनन पूर्वक तुमको दृढ़ करता हूँ। कल्याणकारी द्युलोक के मनन पूर्वक तुम्हें स्थापित करता हूँ। सभी ओर से विद्यमान दिशा को मनन पूर्वक तुम्हें स्थित करता हूँ। अपने रस से देह को पुष्टतम करने वाले अन्न के मननपूर्वक तुम्हें स्थित करता हूँ। प्रजापति के समान हृदय के मननपूर्वक तुम्हें स्थित करता हूँ। समस्त संसार में व्याप्त करने वाले आदित्य के मननपूर्वक तुम्हें स्थित करता हूँ। नाड़ियों द्वारा शरीर को व्याप्त करने वाले वायु के मननपूर्वक तुम्हें स्थित करता हूँ। समुद्र के समान मननशील हृदय से मननपूर्वक तुम्हारी स्थापना करता हूँ। मुख से निकलने वाली वाणी को मनन कर तुम्हारी स्थापना करता हूँ। देह को ओज प्रदान करने वाले प्राण का मनन कर तुम्हारी स्थापना करता हूँ। पीत जल को तीन प्रकार का कर देने वाले उदान का मनन कर तुम्हें स्थित करता हूँ। वेदत्रय का मनन कर तुम्हें स्थापित करता हूँ। कुटिल चाल वाले जल के मननपूर्वक तुम्हें स्थापित करता हूँ। अविनाशी स्वर्ग का मनन कर तुम्हें स्थापित करता हूँ। चरणान्यास वाले भूलोक का मनन कर तुम्हें स्थापित करता हूँ। पाताल का मनन कर तुम्हें दृढ़ करता हूँ। क्षितिज में दीप्त होने वाली विद्युत के मननपूर्वक तुम्हें दृढ़ करता हूँ।
शरीर के आच्छादक अन्न का मनन कर तुम्हें स्थापित करता हूँ। सब कार्यों को निवृत पूरा करने वाली रात्रि का मनन कर तुम्हें स्थापित करता हूँ। सब कार्यों के प्रवर्त्तक दिवस का मनन कर तुम्हें स्थापित करता हूँ। विस्तारित दोनों लोकों का मनन कर तुम्हें स्थापित करता हूँ। जिस पृथ्वी पर रथ आदि भ्रमण करते हैं, उसका मनन कर तुम्हें स्थापित करता हूँ। घोर शब्द करने वाली वायु का मनन कर तुम्हें स्थापित करता हूँ। जहाँ विभिन्न आकृति वाले भूत, पिशाच आदि अपने कर्मों का फल भोगते हैं, उनके मनपूर्वक तुम्हें स्थापित करता हूँ। प्रकाश से सम्पन्न अग्नि का मनन करते हुए तुम्हें स्थापित करता है। वैखरी वाणी के मननपूर्वक तुम्हें स्थापित करता है। मध्यम वाणी को मनन कर तुम्हें स्थापित करता है। श्लोक को मनन कर तुम्हें स्थापित करता हूँ। प्रभा मण्डल का मनन कर तुम्हें स्थापित करता हूँ। बाल्यादि अवस्था के करने वाले जठराग्नि के मननपूर्वक तुम्हें स्थापित करता हूँ। विविध ऐश्वर्य वाले स्वर्ग का मनन कर तुम्हें स्थापित करता हूँ। जिस भूमि पर मनुष्य हर तरह की शोभा पाते हैं उसके मननपूर्वक तुम्हें स्थापित करता हूँ। सूर्य की किरणों से व्याप्त अंतरिक्ष के मननपूर्वक तुम्हें सादन करता हूँ। यज्ञ आदि कर्मों से सिद्ध हुए ज्ञानरूपी सूर्य का मनन कर तुम्हें स्थापित करता हूँ। सूर्य की किरणों से व्याप्त अंतरिक्ष के मननपूर्वक तुम्हें सादन करता हूँ। यज्ञ आदि कर्मों से सिद्ध हुए ज्ञान रूपी सूर्य के मनन कर तुम्हें स्थापित करता हूँ। गर्त और पाषाण से युक्त जल का मनन करने से तुम्हें स्थापित करता हूँ।
हे इष्टके! तुम अपनी रश्मि रूप अन्न के द्वारा सत्य के लिए सत्य रूपवाणी को पुष्ट करो। हे इष्टके! शरीर में गति प्रदान करने वाले अन्न के प्रभाव से कर्म के लिए उत्साहित हुई तुम, धर्म को प्रवृद्ध करो। हे इष्टके ! शरीर में गति देने वाले अन्न को शक्ति से स्वर्गलोक के लिए उपहित हुई तुम स्वर्गलोक को पुष्ट करो। हे इष्टके! तुम अन्न शक्ति को पुष्ट करने वाली हो, उनके प्रभाव से उपाहित हुई तुम अन्तरिक्ष को पुष्ट करो। हे इष्टके ! तुम अन्न शक्ति को पुष्ट करने वाली हो, उनके प्रभाव से उपाहित हुई तुम अंतरिक्ष को पुष्ट करो। हे इष्टके! समस्त इन्द्रियों को शरण देने वाले अन्न की शक्ति से धरा के लिए उपहित हुई तुम धरालोक को पुष्ट करो। हे इष्टके! शरीरादि को आश्चर्य चकित करने वाले अन्न की शक्ति से वर्षा के लिए उपहति हुई तुम वर्षा जल को आकृष्ट करो। हे इष्टके! शरीर में विचरणा विचरण करने वाले अन्न के प्रभाव से रात्रि के लिए उपहति हुई तुम, रात्रि को पुष्ट करो। हे इष्टके! देहगत नाड़ियों में विचरणशील अन्न के प्रभाव से रात्रि के लिए उपहित हुई तुम रात्रि को पुष्ट करो। हे इष्टके! समस्त प्राणधारियों द्वारा कामना करने योग्य अन्न की शक्ति से उपहित हुई तुम, वसुओं के संग स्नेह करो। हे इष्टके! सुख की अनुभूति कराने वाले अन्न के प्रभाव से आदित्यों के लिए उपहित हुई तुम आदित्यगण के संग स्नेह करो।
हे इष्टके! शरीर को बढ़ाने वाले अन्न के प्रभाव से धन की पुष्टि के निमित्त उपहित हुई तुम, धन के पोषण से प्रीति करो। सब इन्द्रियों में रमने वाले अन्न के प्रभाव से शास्त्रों के लिए उपहित हुई तुम शास्त्रों की वृद्धि करो। हे इष्टके! प्रसिद्ध अन्न के बल से औषधियों के लिए उपहित हुई तुम औषधियों को पुष्ट करो। हे इष्टके! पृथ्वी के श्रेष्ठ पदार्थ अन्न के प्रभाव से शरीरों के निमित्त उपहित हुई तुम, शरीरों को पुष्ट करो। हे इष्टके! शरीर के उपचय करने वाले अन्न के प्रभाव से अध्ययन के निमित्त उपहित हुई तुम, अध्ययन में प्रीति करो। हे इष्टके! बल के अन्न के प्रभाव से तेज के निमित्त उपहित हुई तुम, तेज की वृद्धि करो।
हे इष्टके! तुम जीवन का अस्तित्व कराने वाले अन्न के रूप समान हो। मैं तुम्हें अन्न लाभ हेतु स्थापित करता हूँ। हे इष्टके ! तुम इन्द्रियों को अपने-अपने कार्य में समर्थ करने वाले अन्न के समान हो, मैं तुम्हें अन्न के लिए स्थापित करता हूँ। हे इष्टके ! तुम अन्न का प्रतिपादन करने वाले अन्न के रूप समान हो, मैं तुम्हें सम्पत्ति लाभ के लिए विद्यमान करता हूँ। हे इष्टके ! तुम देह को तेजस्वी बनाने वाले अन्न के समान हो, मैं तुम्हें तेज के लिए स्थापित करता हूँ। हे इष्टके! तुम कृषि, वर्षा और अंकुर द्वारा रचित होने वाले अन्न के समान हो, मैं तुम्हें अन्न लाभ के लिए स्थापित करता हूँ।
हे इष्टक! कृषि, वर्षा और बीज द्वारा उत्पन्न होने वाले अन्न के समान हो, मैं तुम्हें अन्न लाभ के लिए स्थापित करता हूँ। हे इष्टके! जो अन्न सब प्राणियों को कर्म में प्रवृत्त करने वाला है, तुम इस अन्न के समान हो। मैं तुम्हें कार्य में प्रवृत्ति हेतु स्थापित करता हूँ। हे इष्टके! जो अन्न इन्द्रियों को अपने-अपने कार्य में प्रवृत्ति के निमित्त स्थापित करता है। हे इष्टके! जो अन्न जीवन के साथ चलता है, तुम उस अन्न के समान हो। मैं तुम्हें अन्न के लिए स्थापित करता हूँ। हे इष्टके ! जो अन्न भूख मिटाने में सक्षम है तुम उसी अन्न के समान हो। मैं तुम्हें अन्न लाभ के निमित्त स्थापित करता हूँ। हे इष्टके ! तुम जन्म को देने वाले अन्न के समान हो। मैं तुम्हें उत्क्रमार्थ स्थापित करता हूँ। हे इष्टके ! तुम श्रेष्ठ गमन वाले अन्न के समान हो। मैं तुम्हें गमन के निमित्त स्थापित करता हूँ। हे इष्टके ! अत्यन्त पालन करने वाले अन्न रस के लिए उपघटित हुई तुम, अन्न रस से प्रीति करो।
हे इष्टके! तुम पूर्वी दिशा की स्वामिनी हो। तुम्हारे अधिपति आठों वसु हैं। अग्नि देव! तुम्हारे समस्त रुकावटों का निवारण करने वाले हैं। त्रिवृत स्तोम तुम्हें धरा पर स्थित करें। आज्य और उक्त तुम्हें दृढ़ करें। पहले उत्पन्न प्राण और देवगण तुम्हें स्वर्गलोक में व्याप्त करें और इष्टका का अभिमानी देव भी तुम्हारी वृद्धि करें। इस प्रकार समस्त देव सुख रूप स्वर्ग में यजमान को पहुँचाएँ।
हे इष्टके! तुम विशाल दक्षिण दिशा रूप हो। रुद्र गण तुम्हारे स्वामी हैं। इन्द्र विघ्नों को दूर करने वाले हैं। पन्द्रह स्तोम तुम्हें धरा पर स्थापित करें। प्रथम नामक उक्थ तुम्हें दृढ़ करें, बृहत साम तुम्हें अन्तरिक्ष में प्रतिष्ठित करें। प्रथम उत्पन्न देव तुम्हें दिव्यलोक में स्थापित करें। सब देवता इस यजमान को कल्याण रूप स्वर्ग की प्राप्ति करें।
हे इष्टके! तुम पश्चिमी रूप हो। आदित्य तम्हारे अधिपति हैं। सोम तुम्हारे कष्टों को नष्ट करने वाले हैं। सप्तदश स्तोम तुम्हें धरा में विद्यमान करें। मरुतात्मक उक्थ तुम्हें दृढ़रूप से स्थापित करें। वैरूप साम तुम्हें अंतरिक्ष में दृढ़ करें। प्रथम उत्पन्न देवगण तुम्हें दिव्यलोक में व्याप्त करें। वे देव इस यजमान को कल्याण रूप स्वर्ग की प्राप्ति कराएँ।
हे इष्टके! तुम स्वयं राजमाता उत्तर दिशा हो। मरुदगण तुम्हारे स्वामी हैं। सोम तुम्हारी बाधाओं को दूर करने वाले हैं। इक्कीस स्तोम तुम्हें धरा में स्थापित करें। निष्कैवल्य उक्थ तुम्हें दृढ़ता के निमित्त प्रतिष्ठित करें। बैराज साम तुम्हें अंतरिक्ष में स्थित करें। समस्त प्राणियों से पहले उत्पन्न हुए सभी देवता तुम्हें स्वर्गलोक में विस्तृत करें। वे सभी देवता इस यजमान को श्रेष्ठ कल्याण रूप स्वर्गलोक की प्राप्ति कराएँ।
हे इष्टके! तुम उर्ध्व दिशा रूप अधिश्वरी हो। विश्वे देवा तुम्हारे अधिपति हैं। बृहस्पति देव समस्त बाधाओं को शान्त कराने वाले हैं। त्रिणवत्रयस्त्रिश स्तोत्र तुम्हें पृथ्वी पर स्थापित करें। वैश्वदेव अग्निमारूत उक्थ तुम्हें स्थिरता के लिए विद्यमान करें। शाक्वर और रैवत दोनों साम तुम्हें दृढ़ता के लिए अंतरिक्ष में दृढ़ करें। समस्त प्राणधारियों से पहले उत्पन्न समस्त देव तुम्हें स्वर्गलोक में व्यापक करें। वे समस्त देव इस यजमान को कल्याणरूप स्वर्ग की प्राप्ति कराएँ।
पूर्व दिशा में स्थापित यह इष्ट का रूप अग्नि अपनी हिरण्यमय ज्वालाओं से युक्त रश्मि सम्पन्न है। उन अग्नि के रण चालन में चतुर और रणकुशल वीर वसंत ऋतु है। रूप सौन्दर्य, सौभाग्य आदि की खान तथा सत्यसंकल्प आदि की स्थान रूप यह दिशा, उपदिशा, अप्सराएँ हैं। काठने वाले व्याघ्र (शेर, चीता) आदि पशु इनके शस्त्र हैं। आपस में वध करना ही इनके शत्रु हैं। इन सब परिचारिकों के सहित अग्नि को हम नमस्कार करते हैं। वे सभी हमको सुख प्रदान-पूर्वक हमारी रक्षा करें। जिनसे हम द्वेष करते हैं, उन सबको हम इन अग्नि की दाढ़ों में डालते हैं।
दक्षिण दिशा में स्थापित यह इष्टका जगत कर्मा है। उनका रथी, रथ में बैठकर ध्वनि करने वाला सेनापति और ग्राम रक्षक ग्रीष्म ऋतु है। मेनका और सहजन्या इनकी दो अप्सरा हैं। राक्षसों के विभिन्न अन्तर इनके हथियार तथा घोर राक्षस इनके तीक्ष्ण हथियार हैं। इन सभी से युक्त विश्व कर्मा को हम नमस्कार करते हैं। वे सुख प्रदान करते हुए हमारी सुरक्षा करें। जिससे हम द्वेष करते हैं और जो हमसे दुश्मनी रखता है ऐसे शत्रुओं को हम अपनी दाढ़ों के नीचे रखते हैं।
पश्चिम दिशा में स्थापित यह इष्टका रूप, विश्व को प्रकाशित करने वाले आदित्य हैं। उनके रथी और रणकुशल वीर सेनापति और ग्राम रक्षक ऋतु वर्षा है। प्रमलोचंती और अनुकलोचंती नामक दो अप्सराएँ है। व्याघ्रादि इनके आयुध तथा सर्प तीक्ष्ण शस्त्र हैं। इन सबके सहित आदित्य को हम नमस्कार करते हैं। वे हमें सुखी करते हुए हमारी रक्षा करते हैं। जिससे हम द्वेष करते हैं ऐसे शत्रुओं को हम यज्ञ रूप अग्नि की दाढ़ों में डालते हैं।
उत्तर दिशा में स्थापित यह इष्टका धन से साध्य यज्ञ है। उसके तीक्ष्ण पक्ष रूप अस्त्रों की वृद्धि वाले और अरिष्टों का पतन करने वाले सेनापति और ग्राम रक्षक शरद ऋतु हैं। विश्वाची और घृताची दो अप्सराएँ हैं। वे हमें समस्त प्रकार सुखी करें और हमारी सुरक्षा करें। जिससे हम दुश्मनी रखते हैं और जो हमसे शत्रुता करते हैं, ऐसे शत्रुओं को हम यज्ञ रूप अग्नि की दाढ़ों में डालते हैं।
मध्य दिशा में प्रस्थापित यह इष्टका पर्जन्य है। उसके विजेता वीर सेनापति और ग्राम रक्षक हेमन्त ऋतु है। उर्वशी और पूर्वाधिति नाम वाली दो अप्सराएँ हैं। वज्र के समान घोर शब्द उनके आयुध और विद्युत तीक्ष्ण शस्त्र हैं। इन सबके सहित पर्जन्य को हम नमस्कार करते हैं। वे हम सब प्रकार के सुख प्रदान करें और रक्षा करें। हम जिनसे द्वेष करते हैं ऐसे शत्रुओं को हम उनकी दाढ़ों में डालते हैं।
यह अग्नि स्वर्ग की मूर्छा के रूप समान मुख्य हैं। जैसे बैल का कंधा सर्वोच्च होता है, वैसे ही अग्नि ने ऊँचा स्थान पाया है। यह संसार के कारण रूप तथा पृथ्वी के रक्षक हैं। यह जलों के सारों को पुष्ट करने वाले हैं।
यह अग्नि हजारों और सैकड़ों अन्नों के स्वामी हैं। यह क्रांतदर्शी और सब घनों में मूर्धा का रूप है।
हे अग्ने! अथर्वा ने तुम्हें जल के प्रकाश से मंथन किया। समस्त ऋत्विजों ने संसार में मूर्धा के समान मुख्य मानकर तुम्हारा मंथन किया।
हे अग्नि! जब तुम अपनी हवि (आहुति) धारण करने वाली ज्वाला रूप जिह्वा को प्रकट करते हो, तब तुम यहाँ के और यज्ञ फल रूप जल के नेता होते हो। तुम यज्ञ कल्याण रूप घोड़ों के सम्बन्ध को प्राप्त होकर सूर्य मंडल में स्थित सूर्य को धारंण करते हो।
ज्ञान, सत्य, कर्म आदि से सम्पन्न याज्ञिकों की समिधाओं द्वारा अग्नि उसी प्रकार मति वाले होते हैं जिस प्रकार अपनी तरफ आती हुई गौ को देखकर उसका बछड़ा मति से परिपूर्ण होता है। जैसे उषा के आगमन पर मनुष्य चैतन्यमति वाले होते हैं और उनके ज्ञान की किरणें स्वर्ग के चारों तरफ फैलती हैं या जिस प्रकार पक्षी पेड़ की शाखा से ऊपर उड़ जाते हैं।
क्रान्तदर्शी, यज्ञ योग्य और बलिष्ठ तथा सेचन समर्थ अग्नि की प्रार्थना वाले वाक्यों का हम उच्चारण करते हैं। वाणी में स्थिर पुरुष अन्नवति स्तुति को आश्वानीय अग्नि को वैसे ही अर्पित करता है, जैसे आदित्य के निमित्त की हुई स्तुतियाँ अर्पित की जाती हुई स्वर्ग में भ्रमण करती हैं।
यह अग्नि यज्ञ में दृढ़ होता सोमयाग आदि में वंदनाओं को ग्रहण करने वाले हैं।
अनुष्ठानों द्वारा इस यज्ञ में इनकी स्थापना की गई है। यजमानों के हितार्थ भृगुंवशी ऋषियों ने इन दिव्य कर्म वाले, व्यापक बल से सम्पन्न अग्नि को वनों में प्रज्जवलित किया।
अनेक रूप से यज्ञादि कार्यों में विचरणशील है। तुम्हें अंगिरावंशी ऋषियों ने, जल के गहन स्थान से और वनस्पतियों से खोज कर प्राप्त किया था। तुम उत्तम बल द्वारा मथे जाकर अरणियों से उत्पन्न होते हो। इसलिए तुम बल के पुत्र कहे जाते हो।
हे सखा रूप ऋत्विजों! अग्नि प्राणियों के वरिष्ठ जल के पौत्र रूप और महान बल वाले है। तुम उनके निमित्त श्रेष्ठ आहुति रूप अन्न और स्त्रोतों (मंत्रों) का भली प्रकार सम्पादन करो।
हे अग्नि! तुम सेचन समर्थ और सबके स्वामी हो सभी यज्ञों के फलों को तुम सब प्रकार से यजमान को प्राप्त कराती हो। तुम कर्म के निमित्त पृथ्वी पर स्थित उत्तर वेदी में प्रकाशित होती हो। हम यजमानों के निमित्त तुम उत्तम धनों को सब ओर से लाकर दो।
हे अग्नि! तुम अद्भुत धन वाली और आहुतियों से प्रीति करने वाली हो। सब मनुष्यों में कर्मवान और ऋषिगण आहुति देने के लिए सदा तैयार रहते हैं।
हे यजमानों! हम तुम्हारे इस हवि रूप अन्न से जलों के पौत्र रूप, अत्यन्त प्रिय, अत्यन्त सावधान एवं कर्मों से प्रेरित करने वाले कर्म करने में हमेशा तत्पर, यज्ञ को सम्पूर्ण करने वाले, देवताओं के दूत रूप अविनाशी अग्नि को प्रार्थनापूर्वक आह्वान करते हैं।
जो अग्नि अविनाशी और दूत के समान कार्य में रत रहती है, उन अग्नि का हम आह्वान करते हैं। वे अग्नि अपने रथ में बिना क्रोध, यज्ञ के भाग पाने वाले अश्वों को जोड़कर आह्वान के प्रति तेजगति से प्रस्थान करती हैं।
ऋषियों से युक्त उत्तम कार्य वाले, यज्ञ में भली-भाँति आहुत किए हुए अग्नि में शीघ्रता से पहुँचते हैं। यजमानों के दैदीप्यमान धन वाले और वसु आदि देवताओं वाले, श्रेष्ठ यज्ञ में आह्वान किए जाने पर वे अग्नि देवता द्रुतगति से जा पहुँचते हैं।
हे अग्नि! तुम शक्ति से उत्पन्न हुई हो। तुम गौओं से युक्त, ज्ञानवान और अन्न के स्वामी हो। अतः हम सेवकों के लिए महान धन प्रदान करो।
हे अग्नि! तुम अनेक मुख वाले, प्रकाशवान, सबको वास देने वाली क्रातंदर्शी हो। तुम वेदवाणी से स्तुत्य और यज्ञ में सर्वप्रथम होने वाले हमारे लिए धन के समान तेजस्वी हो।
हे अग्नि! तुम विकराल दाढ़ वाली, दीप्तिमान और स्वभाव से ही राक्षसों का विनाश करने वाली हो। अतः तुम दिन के उषाकाल के सब पाप रूप राक्षसों को नष्ट करो।
हे अग्नि देव! तुम महान समृद्धि से सम्पन्न और ऋत्विजों द्वारा आहूत किए जाते हो। तुम हमारे लिए कल्याण देने वाले हो। तुम्हारा दान हमारा मंगल करने वाला हो। यह यज्ञ हमारा मंगल करे। प्रशस्तियाँ भी कल्याण करें।
हे अग्नि देव! तुम अपने जिस हृदय से रणक्षेत्र में दृढ़ शत्रुओं को समाप्त करते हो। उसी हृदय से हमारे पाप पतित करने के लिए कल्याण प्रद कर्म करो। तुम्हारी प्रशस्तियाँ भी कल्याणकारी हों।
हे अग्नि! तुम जिस हृदय से युद्ध स्थल में स्थित शत्रुओं की हिंसा करती हो। अपने उसी हृदय से अत्यन्त शक्तिशाली शत्रु के धनुषों की प्रत्यंता पृथक करो और हम तुम्हारे दिए हुए समृद्धि द्वारा सुख भोग करें।
जो अग्नि, भला करने वाली समृद्धि रूप है, मैं उस अग्नि को जानता हूँ। उसी अग्नि को प्रज्जवलित हुआ जानकर गौएँ अपने-अपने घर में आती हैं। द्रतगामी अश्व अपनी शक्ति से वेगवान होकर उस अग्नि को प्रज्जवलित हुआ देखकर विचरण करते हैं। हे अग्नि ! स्तोता यजमानों के लिए समस्त ओर से अन्न लाओ।
वासप्रद अग्नि ही यह अग्नि है। मैं इन्हीं की वन्दना करता हूँ। जिन अग्नि की गौएँ सेवा करती हैं और अश्व भी जिन्हें ग्रहण करते हैं, उस अग्नि की मेधावीजन परिचर्या करते हैं। हे अग्नि ! वंदनाकारी के लिए समस्त ओर से अन्न लाकर दो।
यह अग्नि चन्द्रमा के समान धन प्रदान करने वाली है। हे अग्नि! तुम अपने मुख में घृत पान हेतु दोनों दर्भी के आकार वाले हाथों का सेवन करती हो। तुम उक्थवाले यज्ञों में हमें धनों से पूर्ण करो और हम वंदनाकारी को महान अन्न लाकर प्रदान करो।
हे अग्नि! आज तुम्हारे उस यज्ञ को फलप्रापक स्तोत्रों से समृद्ध करते हैं। जैसे असंख्य वंदनाओं द्वारा अश्वमेघ यज्ञ के घोड़ों को प्रवृद्ध किया जाता है वैसे ही कल्याणमय यज्ञ, वचन को दृढ़ करते हैं।
हे अग्नि! जैसे सारथी रथ का निर्वाह करता है, उसी प्रकार अपने फल दान में समर्थ भली प्रकार अनुष्ठित कल्याण रूप फल वाले हमारे यज्ञ का निर्वाह करो।
हे अग्नि! हमारे द्वारा पठित स्तोत्रों के द्वारा हर्षित हृदय वाले होकर अभिमुख होओ। जैसे सूर्य अपने मण्डल में उदय होकर संसार के सम्मुख आते हैं, उसी प्रकार वंदनाओं के प्राप्त होने पर तुम हमारे अभिमुख होओ।
जो अग्नि अद्भुत गुणवाली, महान यज्ञ से सम्पन्न, देवों के निकट जाने वाली अपनी लपटों से प्रकाशित और विस्तार परिपूर्ण होकर घृतपान की अभिलाषा करतें हैं, उन अग्नियों को मैं महान निवास देने वाले मंथन द्वारा शक्ति के पुत्र देव आह्वानकर्त्ता और सभी प्रकार के ज्ञान से सम्पन्न शास्त्र ज्ञाता विप्र के समान जानता हूँ।
हे अग्नि! तुम निवास रूप और आह्वानीय वाले तथा धन दान द्वारा कीर्तियुक्त हो। तुम हमारे अत्यन्त आत्मीय और रक्षिका हो। तुम हमारा हित करने वाली, निर्मल स्वभाव वाली, हमारे यज्ञ स्थान को प्राप्त होओ। हे अग्नि! तुम प्रकाशमान तथा सबको प्रकाशित करने वाली, गुण युक्त हो। हम सखाओं के निमित्त और सुख के निमित्त तुम्हारी प्रार्थना करते हैं।
जिस मन को एकाग्र करने वाले ऋषियों ने अग्नि को प्रदीप्त कर स्वर्ग प्राप्ति वाला कर्म किया। उस मन की एकाग्रता रूप में भी स्वर्ग प्राप्त कराने वाली अग्नि की स्थापना करता हूँ। उन अग्नि को विद्वानजन यज्ञ को सिद्ध करने वाला बताते हैं।
हे ऋत्विजो ! तृतीय स्वर्ग के ऊपर श्रेष्ठ कर्म रूप फल के आश्रय स्थान सूर्य मण्डल में उत्कृष्ट स्थानको प्राप्त करने की कामना करते हुए हम स्त्रियों, पुत्रों और मित्रों तथा स्वर्ण आदि धन सहित उन अग्नि की सेवा करते हैं। इसके द्वारा हम श्रेष्ठ स्वर्ग को प्राप्त करेंगे।
यह अग्नि श्रेष्ठ पुरुषों के पालन करने वाले, संसार को रचने वाले, हमेशा सावधान पृथ्वी की पीठ पर स्थापित प्रकाशमान और चयन के मध्य स्थान में स्थित होने वाले हैं। जो शत्रु युद्ध की इच्छा करते हुए हमें मारना चाहे, तुम उन्हें अपने चरणों से कुचल डालो।
यह अग्नि अत्यन्त वीर, आहुति ग्रहण करने वाली सहस्त्रों इष्टकाओं से युक्त है। यह अनुष्ठान कार्य में आलस्य न करते हुए शीघ्र प्रचण्ड हो और तीनों लोकों के मध्य में तेजस्वी स्थान को प्राप्त हों। हम इसकी कृपा से स्वर्ग लाभ प्राप्त करें।
हे ऋषियों! अग्नि के पास जाओ और इन्हें अच्छी तरह से प्रदीप्त करौ। हे अग्नि! तुम हमारे लिए देवयान मार्ग को सिद्ध करो। इस यज्ञ को ऋषियों ने वाणी और मन को तरुणता देते हुए ही विस्तृत किया है।
हे अग्नि! तुम सावधान एवं जागृत होकर इस यज्ञ में यजमान में सुसंगति करो। तुम्हारे आशीर्वाद से इस यजमान का अभिष्ट पूर्ण हो। हे विश्वे देवो! यह यजमान देवताओं के साथ निवास करने योग्य स्वर्ग में दीर्घ समय तक रहे।
हे अग्नि! तुम अपने जिस पराक्रम से सहस्त्र दक्षिणा वाले और सर्वस्व दक्षिणा वाले यज्ञों को प्राप्त करते हो, उसी पराक्रम से हमारे यज्ञ को भी प्राप्त करो। यज्ञ के स्वर्ग में पहुँचने के कारण हम भी वहाँ जा सकेंगे।
हे अग्नि! यह तुम्हारा उपस्थित स्थल है। जिस ऋतुकाल वाले गार्हपत्य से रचित हुए तुम कार्य के समय प्रञ्चलित होते हो, उस गार्हपत्य को जानकर दक्षिणी कुण्ड में विद्यमान हो और अनुष्ठान आदि हेतु तुम हमारे धन की समस्त प्रकार से बढ़ोत्तरी करो।
माघ, फाल्गुन, शिशिर ऋतु के अवयव हैं। यह अग्नि के भेद में श्लेष रूप हैं।
मुझ यजमान की महानता के लिए धावा-धरा कल्पना करें। जल और औषधि भी हमारी महानता कल्पित करें। धावाधरा में विद्यमान अन्य यजमानों के द्वारा चुनाव की गई इष्टकाएँ भी शिशिर ऋतु के काम को सम्पादन करती हुई इस कर्म की शरणागत हो। हे इष्टके ! तुम इस प्रसिद्ध देव के द्वारा अंगिरा के समान रूप स्थिर रूप में दृढ़ हो।
हे इष्टको! तुम वायु रूप तथा ज्योतिमती हो। तुम्हें विश्वकर्मा दिव्यलोक के ऊपर स्थित करें। तुम्हारे अधिपति सूर्य हैं। यजमान के समस्त प्राण, अपान और व्यान के लिए दीप्ति दो। तुम वायु देवता के प्रभाव से अंगिरा के समान इस कार्य में स्थित होओ।
हे इष्टके! तुम पहले इष्टकाओं द्वारा अनाक्रान्त होती हुई चुने गए स्थान को पूर्ण करती हुई, अवकाश को भर दो और स्थिर रूप से दृढ़ होओ। तुम्हें इन्द्रदेव अग्नि और बृहस्पति ने इस स्थान में स्थित किया है।
स्वर्ग से प्राप्त होने वाले, अनुरूप ब्रीहि आदि धान के सम्पादक वे प्रख्यात जल देवताओं के जन्म वाले संवत्सर में, तीनों लोकों में सोम को भले प्रकार परिपक्व करते हैं।
समस्त वाणियाँ समुद्र के रूप समान विस्तृत सब रथियों में महारथी, अन्नों के स्वामी और अपने धर्म में दृढ़ रहने वाले प्राणधारियों के पोषणकर्त्ता इन्द्रदेव की वृद्धि करती हैं।
जब महिमामय काष्ठ रूप अरणियों (लकड़ियों) से अग्नि उत्पन्न होती है, तब जैसे घोड़े को भूख लगने पर घास को याद करता है. वैसे ही अग्नि काष्ठ को याद करती है। फिर उन्हें प्रज्जवलित करने में सहायक वायु उनकी ज्वालाओं को वहन करती है। हे अग्नि ! उस समय तुम्हारा जाने का मार्ग कृष्णवर्ण वाला होता है।
हे स्वयं मातृणे ! संसार के पालक ! वर्षा प्रदाता होने से समुद्र रूप, आयु को बढ़ाने वाले आदित्य के मन स्थान में तुम असंख्य किरणों वाली प्रकाश युक्त को मैं स्थित करता हूँ। तुम स्वर्ग, धरा और अन्तरिक्ष तीनों लोकों को ज्योति से पूर्ण करने वाली हो।
हे स्वयं मातृणे! विश्वकर्मा स्वर्ग के आसन पर स्थापित करें। तुम सब प्राणियों के प्राणपान, व्यान, अपान के लिए स्वर्गलोक को धारण योग्य करो। उसे पीड़ित मत करो। सूर्य देवता तुम्हारी सब तरह से रक्षा करें। अपने अधिष्ठात् देव की कृपा पाकर तुम अंगिरा के समान दृढ़ रूप से स्थित होओ।
हे अग्नि! तुम हजारों इष्टकाओं में रूप समान हो। हे अग्नि ! तुम हजारों इष्टिकाओं के प्रतिनिधि हो। हे अग्नि ! तुम हजारों इष्टिकाओं के लिए तुला के समान हो। मैं अनन्तफल की ग्रहणता के लिए तुम्हें प्रेक्षित करता हूँ।
अध्याय (16) :: ऋषि :- परमेष्ठी, वाकुत्स, बृहस्पति, प्रजापति कुत्स, परमेष्ठी प्रजापतिर्वा देवाः; देवता :- रुद्रः, एक रुद्रः, बहुरुद्राः; छंद :- गायत्री, अनुष्टुप, वृहती पंक्ति, उष्णिक जगति, घृति, अष्टिः, शक्वरी, त्रिष्टुप।
हे रुद्र! तुम्हारे क्रोध को नमस्कार। तुम्हारे बाणों को नमस्कार, तुम्हारे बाहुओं को नमस्कार।
हे रुद्र देव! तुम पहाड़ पर वास करने वाले हो। तुम्हारा जो कल्याणप्रद रूप सौम्य है और पाप के फल को न देकर पुण्य फल ही प्रदान करता है, अपने उस मंगलमय शरीर से हमारी ओर देखो।
हे रुद्र! तुम पहाड़ पर या मेघों के अन्दर स्थित होते हो। तुम सब प्राणियों के रक्षक हो। अपने जिस बाण को प्रलय के लिए हाथ में ग्रहण करते हो, उस बाण को विश्व कल्याण करने वाला करो। तुम हमारे पुरुषों और पशुओं को हिंसित मत करो।
हे कैलाश पति! मंगलप्रद वंदना रूप वाणी से तुम्हें ग्रहण करने के लिए वंदना करते हैं। सम्पूर्ण संसार हमारे लिए आरोग्यप्रद और श्रेष्ठ हृदय वाला हो सके, वैसा करो।
अधिक उपदेशकारी, सब देवताओं में प्रथम पूज्य देवताओं के हितैषी स्मरण मात्र से ही सब रोगों को दूर करने वाले चिकित्सक वैद्य के समान रुद्र हमारे कार्यों का अधिकता से वर्णन करें और सर्प आदि को नष्ट कर अधोगमन वाले असुर आदि को हमसे दूर रखें।
यह रुद्रदेव सूर्य रूप से प्रत्यक्ष, उदित समय में अत्यन्त लाल और अस्तकाल में अरुण रंग वाले होते हैं। यह दोपहर के समय में पिंगल रंग के रहते हैं। प्रातः के समय













 
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संतोष महादेव-धर्म विद्या सिद्ध व्यास पीठ (बी ब्लाक, सैक्टर 19, नौयडा)
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