CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM
PtSantoshBhardwaj
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सामवेद सूक्त (1) :: ऋषि :- भारद्वाज, मेधातिथि, उशना, सुदीति पुरुमीढ़ा-वाङ्गिरसौः, वामदेव; देवता :- अग्नि; छन्द :- गायत्री।हे अग्नि देक्ता हमारी वंदना से हवि प्राप्त करने हेतु आकर देवताओं को हवि पहुँचाने हेतु, उनके आह्वान हेतु विराजमान हों। हे अग्ने ! आप सभी यज्ञों को पूर्ण करने वाले हो। आप देवताओं का आह्वान करने वाले ऋषियों द्वारा वंदना सहित प्रतिष्ठित किए जाते हो। हम देवताओं के आह्वानकर्त्ता, सर्वज्ञाता, धनपति, वर्तमान यज्ञ को सम्पन्न करने वाले अग्नि देव की प्रार्थना करते हैं। धन एवं दान के इच्छुक उपासकों को उनके द्वारा प्रकाशित अग्नि प्रार्थना से प्रसन्न हों और दुष्टों व अंधकार रूपी अज्ञान का नाश करें। हे अग्ने ! साधकों को धनदाता होने के कारण मित्र समान हर्षिता को प्रदान करने वाले पूजनीय मेरी प्रार्थना से प्रसन्न होइए। हे अग्ने ! आप हमें धन सम्पत्ति और ऐश्वर्य देते हुए हमारे शत्रुओं से हमारी रक्षा करो। हे अग्ने ! मेरे द्वारा भली प्रकार से उच्चारित प्रार्थनाओं को आकर सुनो और सोम रस से वृद्धि करो। हे अग्ने! मैं तुम्हें अपने कल्याण हेतु पृथ्वी पर आकर्षित करता हूँ। हे अग्ने! अथर्वा ने मूर्धा के समान सम्पूर्ण संसार के धारणकर्त्ता, आपको अंणियों से मथकर प्रकट किया है। हे अग्ने ! आप हमारी रक्षा के हेतु सूर्य आदि लोकों को सम्पन्न करो क्योंकि आप अत्यन्त प्रकाशमान दिखाई देते हो।[सामवेद 1.1-1]
सामवेद सूक्त (2) :: ऋषिः :- आयुङ्ख्वाहिः, वादेमर्वोगौतमः प्रयोगो भार्गवः, मधुच्छन्दाः शनुःशेषः, मेधातिथि, वत्स; देवता :- अग्नि; छन्द :- गायत्री।
हे अग्नि देव ! शक्ति की इच्छा करने वाले मनुष्य आपको प्रणाम करते हैं। इसलिए मैं भी आपको प्रणाम करता हूँ। आप अपनी शक्ति द्वारा हमारे शत्रुओं का विनाश करो। हे अग्नि देव ! आप यज्ञ के साधन रूप हवियों को ले जाने वाले और देवताओं के दूत रूप समान हो। मैं आपको वाणी रूप वंदना के द्वारा प्रसन्न और प्रवृद्ध करता हूँ। हे अग्नि देव ! भगनियों के समान साधक की प्रार्थनाएँ तुम्हारी सेवा में जाती हैं और आपको वायु के सहयोग से और अधिक प्रज्जवलित करती हैं। हे अग्नि देव ! हम आपके आराधक दिन रात नित्य ही अपनी महान बुद्धि के साथ आपकी सेवा में उपस्थित होते हैं। हे अग्नि देवता! आप प्रार्थना द्वारा प्रचण्ड होते हो। अत- सभी साधकों पर उपकार व यज्ञ को पूर्ण करने के लिए इस हमारे यज्ञ मंडप में प्रवेश करो। यह साधक आपके रुद्र के दर्शन करने के लिए आपकी वंदना कर रहा है। हे अग्नि देवता ! इस महान यज्ञ की ओर दृष्टि डालकर सोम को पीने के लिए आप बार-बार पुकारे जाते हो। अतः देवों के इस यज्ञ में प्रस्थान करो। हे अग्नि देवता! आप यज्ञों के अधिपति के रूप में प्रसिद्ध एवं पूँछ वाले अश्व के समान हो। हम वंदनाओं द्वारा आपको नमस्कार करने हेतु आतुर हैं। भृगु के समान ज्ञानी, कर्म करने वाले तथा बड़वानल रूप से समुद्र में वर्तमान महान अग्नि देवता को मैं नमन करता हूँ। अग्नि को प्रज्जवलित करने वाले मनुष्य अपनी हार्दिक भावनाओं सहित ऋषियों के सहयोग से अग्नि देवता को उत्पन्न करें। यह अग्नि जब स्वर्ग के ऊपर सूर्य रूप से प्रकाशित होती है, तब सब प्राणधारी उन लगातार घूमने वाले और शरणरूपी सूर्य के तेज का दर्शन करते हैं।[सामवेद 1.1-2]
सामवेद सूक्त (3) :: ऋषि :- प्रयोगो, भारद्वाज, वामदेव, वशिष्ठ, विरूप, शनुशेष, गोपवन, प्रस्कण्व, मेधातिथि, सिन्धुद्वीप आम्बरीष, त्रितआत्योवा, उशना; देवता :- अग्नि; छन्द :- गायत्री।
हे ऋत्विजो! तुम हिंसा न करने वाले और यज्ञ करने वालों के भाई बलशाली तथा ज्वालाओं से युक्त अग्नि देवता की सेवा में जाओ। हे अग्ने! अपनी तीक्ष्ण लपटों से सब असुरों और बाधाओं को दूर करो। यह अग्नि हम अर्चना करने वालों को सब तरह का ऐश्वर्य प्रदान करे। हे अग्नि देव ! तुम बहुत अधिक गतिमान और महान हो। हमें सुख प्रदान करो। आप देवताओं के दर्शनार्थ पूजकों के पास घास रूपी आसन पर विराजने के लिए आते हो। हे अग्नि देवता! पाप से हमारी रक्षा करो। हे अद्भुत तेज वाले अग्नि देव! आप अजर अमर हो। हमारी हिंसा करने की अभिलाषा करने वाले शत्रुओं को अपने संतापक तेज से नष्ट कर दो।
हे अग्नि देवता! तुम्हारे अति तीव्र गति वाले अश्व आपके रथ को भली-भाँति ले जाते हैं। उन अश्वों को अपने पूजक के यहाँ आने के लिए रथ में जोड़ो। हे अग्नि देवता ! आप धन के स्वामी, असंख्य यजमानों द्वारा आहूत हुए एवं आराधना के स्वामी हो। आप तेजस्वी की वंदना करने पर समस्त प्रकार के सुख देते हो। हमने आपको यहाँ विद्यमान किया है। स्वर्ग के सभी महान देवताओं में बड़े और पृथ्वी के राजा अग्नि जल के जीवों का जीवन प्रदान करते हैं। हे अग्नि देव ! हमारे इस हवि रत्न और नवीन वंदनाओं को देवताओं के सम्मुख विनतीगत करो। हे अग्नि देव! आपको वंदना रूप से आह्वान करते हैं। आप शोधन और समस्त स्थानों में जाने में समर्थ हो, हमारे इस आह्वान की तरफ ध्यान दो। क्रांतदर्शी, अन्नों के मालिक और हविदाता यजमान को रत्न आदि धन प्रदान करने वाले अग्निदेव हवियों को विद्यमान करते हैं। समस्त प्राणियों के दर्शनों के लिए सूर्य की किरणें प्रसिद्ध तथा तेजस्वी सूर्य की अग्नि को उन्नतशील करते हो। हे वंदनाकारियों! हमारे इस यज्ञ में क्रांतदर्शी, सत्य धर्म वाले, तेजस्वी और शत्रुओं का पतन करने वाले अग्नि देव की सेवा में प्रार्थना करो। हमारा कल्याण हो, देवीय जल हमारे यज्ञ के पूर्ण होने के लिए अंग बने और यह जल हमारे पीने के योग्य बने। जल हमारे सभी तरह के रोगों का नाश करने में समर्थ बने तथा जो रोग अभी तक उत्पन्न नहीं हुए हैं उन्हें भविष्य में भी उत्पन्न न होने दें। यह जल हमारे ऊपर अमृत बनकर बहे। हे सत्यरक्षक अग्नि देव ! आप इस समय किसके कार्य को वहन कर रहे हो? किस कर्म से आपकी वंदनाएँ गौओं को ग्रहण कर रही होंगी?[सामवेद 1.1-3]
सामवेद सूक्त (4) :: ऋषि :- शयुर्वाहस्पत्य, भर्ग, वशिष्ठ, प्रस्कण्व, काण्व; देवता :- अग्नि; छन्द :- बृहती।
हे श्रोतागणों! तुम सब भी अग्नि देव के लिए प्रार्थना करो। उन अविनाशी मित्र, सभी के चिरपरिचित और प्रिय अग्नि देव की हम भली प्रकार प्रार्थाना एवं वंदना स्तुति करते हैं। हे अग्नि देव ! आप अपनी एक वंदना और दूसरी वंदना से हमारी रक्षा करो। हे तरुणतम अग्नि देव ! आप उच्च गुण से सम्पन्न और शुद्ध करने वाले हो। अपने उज्जवल तेज से भारद्वाज के लिए प्रकाशित होने वाले तेजस्वी और ऐश्वर्यवान बनकर हमारे लिए भी प्रकाशित होओ। हे अग्नेि देव! आप यजमानों द्वारा आहुत हुए धन से युक्त और दानशील बनकर हमारे लिए गौएँ प्रदान करते हो। आप वंदना करने वालों से स्नेह करने वाले बनो। हे अग्नेि देव ! आप समस्त प्राणियों के स्वामी, पूजनीय और असुरों का विनाश करने वाले हो। हे गृहस्वामी अग्नि देव! आप पूजनीय यजमान के यहाँ सदैव वास करने वाले और स्वर्ग के रक्षक हो। इस यजमान के यहाँ भी हमेशा स्थिर रहो। हे अग्नेि देव! आप सब जीवों को जानने वाले और अमरणशील (अजर अमर) हो, इस हविदाता यजमान के लिए उषादेव द्वारा प्राचीन शरणयुक्त दित्यघनों को लेकर उपस्थित होओ और उषाकाल में जाने वाले देवताओं को भी यहाँ पर बुलवाओ। हे अग्नि देव ! आप दर्शनीय एवं विशाल हो। हमारे लिए अपने रक्षा के साधनों को धन सहित प्रेरणा दो क्योंकि आप इस लोक को धन की प्रेरणा देते हो। हमारे पुत्र को भी अतिशीघ्र सम्मान दिलाओ।
हे अग्नि देव! आप कष्टों को समाप्त करने वाले, क्रान्तादर्शी, सत्य स्वरूप श्रेष्ठ हो। आप समिधाओं द्वारा प्रज्जवलित होने वाले प्रतापी अग्निदेव की हम प्रार्थनाकारी आराधना करते हैं। हे पवित्र अग्निदेव ! अन्न की वृद्धि करने वाले प्रशंसित धन के साथ हमारे लिए पधारो। हे घृत के निकट उपस्थित रहने वाले अग्नि देव ! अपनी उच्च नीति के द्वारा हमारे लिए भी प्रसिद्धि रूपी धन को प्रदान करो। जो अग्निदेव आनन्दप्रदायक और होता रूप से यजमानों को सभी तरह का धन प्रदान करने वाले हैं उन अग्नि के लिए प्रसन्नतादायक सोम के मुख्य पात्र के समान श्लोक हमें ग्रहण हो।[सामवेद 1.1-4]
सामवेद सूक्त (5) :: ऋषि :- वशिष्ठ, भर्ग, मनु सुदिति पुरुर्मा दौ, प्रस्कण्व मेघातिथि-मेध्यातिथिश्च, विश्वामित्र, कण्व; देवता :- अग्नि, इन्द्र; छन्द :- बृहती।
शक्ति के पुत्र, हमारे प्रिय, उच्च ज्ञान वाले स्वामी समस्त देवों के दूत के रूप में सम्मानित एवं अविनाशी अग्नि देव को मैं प्रणाम करते हुए आहुति प्रदान करता हूँ। हे अग्निदेव ! आप वनों में पृथ्वीभूता अरणियों से युक्त हो। यज्ञ करने वाले आपको समिधाओं से प्रज्ज्वलित करते हैं, तब आप निरालस्य और प्रबुद्ध होकर यजमान की हवि को देवों के नजदीक वहन करते हो। फिर आप देवताओं के मध्य विराजमान होकर सुशोभित होते हो। जिस अग्नि के द्वारा यजमानों ने कर्म किए हैं उन मार्गों को जानने वाले अग्नि देव को देखने योग्य रूप में प्रकट हुए, उन उच्च वर्ण वाले अग्नि के लिए हमारी वंदना रूप वाणियाँ प्रस्तुत हों। उक्थ परिपूर्ण अहिंसित यज्ञ में यह अग्नि ऋत्विजों द्वारा वेदी में विद्यमान हुए जैसे सोभाभिषेक फलक कुशा पर आगे रखे जाते हैं। हे मरुद्गण ! हे ब्रह्मणस्पते ! ऋचा रूप वंदनाओं के द्वारा आपकी सेवा में उपस्थित हुआ मैं आपकी वरणीय सुरक्षा को माँगता हूँ। हे स्तोता! इन विशाल ज्वालाओं वाले अग्नि देव की रक्षा और धन की इच्छा से वंदना के द्वारा खुश करो। इनकी कीर्ति को जानकर अन्य मनुष्य भी इनकी प्रार्थना करते हैं, वे अग्नि मुझ यजमान को घर प्रदान करें। हे समर्थवान कानों वाले अग्निदेव ! हमारी प्रार्थना सुनो। मित्र और अर्चना देवता प्रातःकाल यज्ञ में प्रस्थान करने वाले देवताओं से युक्त तथा अग्नि की तरह रूप गति वाले वहिन देवता से युक्त इस यज्ञ में कुशाओं पर विराजमान हों। देवताओं के उपासकों द्वारा आहुत की गई इन्द्रात्मक अग्नि सब लोकों की आश्रय रूप पृथ्वी को देवताओं के लिए आहुति ले जाने वाले सहायता करते हैं। यजमान इन्हें बलपूर्वक पुकारते हैं। इस कारण यह अपने स्थान नक्षत्रों से जगमगाते हुए यहाँ आकर मेरे शरीर और वाणी में प्रवेश कर प्रचंड हों। उच्च कर्मवाले इन्द्र आप हमारे मनुष्यों को फलों से परिपूर्ण करो। हे अग्नि देव! वनों की जिज्ञासा करके भी उन्हें छोड़कर आप मातृरूप जलों को ग्रहण हुए हों। इसलिए आपका निवर्तन भी असहाय हो जाता है। आप अप्रकट होने पर इन अरणियों के द्वारा सब दिशाओं से प्रकट होते हो। हे अग्नि देव! आप ज्योति का स्वरूप हो। यजमानों के लिए आपको प्रजापति ने योग स्थान में स्थापित किया था। यज्ञ के लिए प्रकट और आहुतियों से तृप्त आप कण्व ऋषि के लिए प्रज्ज्वलित हुए थे। इसी तरह सब प्राणी आपको नमस्कार करते हैं।[सामवेद 1.1-5]
सामवेद सूक्त (6) :: ऋषि :- वशिष्ठ, कण्व, सौभरि, उत्कील, विश्वामित्र; देवता :- अग्नि, ब्रह्मणस्पति यूप; छन्द :- बृहती।
धन-सम्पत्ति प्रदान करने वाले अन्न देव आहुति से सम्पन्न और सब ओर से पोषित तुम्हारी स्त्रुक की भी इच्छा करें और होता के चमस को सोम से सम्पन्न करें। फिर वे अग्निदेव तुम्हारी आहुतियों का हवन करें। ब्रह्मणस्पति देवता प्राप्त हों। सत्य और प्रिय वाणी ग्रहण हो। समस्त देव हमारे शत्रुओं को समाप्त करें। मनुष्यों की भलाई करने वाले यज्ञ का सामिप्य हमें प्राप्त हो। हे अग्नि देव ! उन्नत होकर हमारी रक्षा के लिए सुप्रतिष्ठित होओ। सविता के समान उन्नत होकर हमारे लिए अन्नदाता बनो। हम ऋषियों के साथ आपको आहुति देते हैं। हे महान वास रूप अग्नि देव ! धन की इच्छा करने वाला जो आराधक आपको प्रसन्न करता है, जो व्यक्ति आपके लिए हवि देने की कामना करता है, वह उक्त आचरण करने वाला हजारों का पोषण करने वाले पुत्र को प्राप्त करता है। देवताओं का आश्रय प्राप्त अनेक प्राणियों पर कृपा हेतु सूक्त रूप वंदनाओं से महान अग्निदेव की उपासना करते हैं। उस अग्नि को अन्य ऋषियों ने भी भली प्रकार प्रकाशित किया है। यह यजनीय अग्नि सुन्दर सामर्थ्य से परिपूर्ण सौभाग्य के स्वामी हैं। गौ आदि पशु, संतान तथा धन आदि के स्वामी हैं। यह वृत्र रूप शत्रुनाशकों के भी स्वामी हैं। हे अग्निदेव ! आप हमारे इस यज्ञ में गृहस्वामी और होता रूप हो। आप ही होता संज्ञक ऋषि हो अतः उच्च आहुति का यजन करो और हमारी इच्छाओं को पूर्ण करो। हे अग्निदेव ! आप हमारे मित्र हो। महान कर्म करने वाले हम मनुष्यों को आसानी से ग्रहण होने वाले हो। हम अपनी रक्षा हेतु अहिंसनशील आपको सादर वरण करते हैं।[सामवेद 1.1-6]
सामवेद सूक्त (6) :: ऋषि :- श्यावाश्ववामदेवो, उपस्तुतो बार्हिष्टव्य, बृहदुक्थ कुत्स भारद्वाज, वामदेव, वशिष्ठ, त्रिशिरास्त्वाष्ट्र; देवता :- अग्नि; छन्द :- त्रिष्टुप, जगती, गायत्री।
हे ऋत्विजो ! अग्नि देवता को आहुति प्रदान करो। उन्हें आहुति से प्रसन्न करो। पृथ्वी को उत्तर वेदी में गृहस्वामी और होता रूप इस अग्नि की स्थापना करो। जिस अग्नि को हमने नमस्कार किया है उसे यज्ञ मण्डप में स्थापित करो। शिशु रूप एवं तरुण अग्नि का हवि वहन कार्य महान है। जो अग्नि भूभूता धावा धरा के स्तनपान को ग्रहण नहीं होता, उस अग्नि को यह संसार प्रकट करें। उत्पन्न होने पर यह श्रेष्ठतम दौत्य कर्म वाले अग्नि वहन करते हैं। हे मृत पुरुष ! यह अग्नि तुम्हारा एक अंग है। तुम उस अंग के सहित बाह्य अग्नि में सम्मिलित हो और वायु तेरा अंग है। उसके साथ बाह्य वायु में मिल आदित्य (सूर्य) रूप तेज से अपनी आत्मा को मिला। शरीर की प्राप्ति के लिए मंगल रूप होकर देवताओं के पिता सूर्य में प्रवेश कर। उत्पन्न जीवों के ज्ञाता और पूजनीय अग्नि के निर्मित इस स्तोत्र को सुसंस्कृत करते हैं। हमारी महान बुद्धि इस अग्नि की सेवा करने वाली हो। हे अग्निदेव ! हम तुम्हारे मित्र बनकर किसी के द्वारा संतृप्त न हो। स्वर्ग के मूर्द्धा रूप, पृथ्वी के राजा, कान्तदर्शी, कर्म के साधन रूप, सृष्टि के आरम्भ काल में उत्पन्न निरन्तर गतिमान देवताओं के मुख रूप वैश्वानर अग्नि को ऋषियों ने हमारे यज्ञ में अरणियों द्वारा प्रकट किया। हे अग्निदेव ! स्तोत्रों उक्थों के द्वारा अपनी अभिलाषाओं को तुम्हारे सामने प्रकट करते हैं। तुम वंदनाओं के संग वर्तमान रहने वाले को जैसे घोड़े युद्ध को अपने वशीभूत कर लेते हैं। वैसे ही वंदनाएँ अपने वशीभूत कर लेती हैं। ऋत्विजों ! यज्ञ के स्वामी होता रुद्र रूप पार्थिव अन्नों के देने वाले, हिरण रूप वाले इन अग्नि की मृत्यु से पहले ही आहुति द्वारा उपासना करो। तेजस्वी अग्नि नमस्कार युक्त ज्योतिर्मय होता है। जिन अग्नि का रूप घृत आहुति परिपूर्ण होता है और मनुष्य जिसकी वन्दना रुकावटों के उपस्थित होने पर करते हैं, वह अग्नि उषाकाल में सबसे पहले प्रज्ञ्जवलित होती है। अत्यन्त ज्ञान वाले अग्नि द्यावा को पृथ्वी को प्राप्त होकर देवताओं के आह्वान के समय वृषभ के समान ध्वनि करते हैं। अंतरिक्ष के पास प्रकाशवान सूर्य रूप होकर फैलते हैं और जलों के मध्य विद्युत रूप से प्रबुद्ध होते हैं। अत्यन्त यशस्वी, दूरस्थ दर्शनीय, घर रक्षक एवं हाथों से रचित किए अग्नि को ऋत्विग्गण उँगलियों से प्रकट करते हैं।[सामवेद 1.1-7]
सामवेद सूक्त (8) :: ऋषि :- बुधगविष्ठि, वत्सप्रिर्भालन्दन, भरद्वाज, विश्वामित्र, वशिष्ठ; देवता :- वायु, अग्नि, पूषा। छन्द :- त्रिष्टुप।
यह अग्नि समिधाओं से प्रकाशित होकर जैसे गाय के लिए प्रातःकाल उठते हैं उसी प्रकार प्रातःकाल में सावधानी के साथ गाते हुए उनकी ज्वालाएँ, शाखाओं वाले वृक्ष के समान अपने स्थान को छोड़ते हुए आसमान तक अच्छी तरह से फैल जाती हैं। हे स्तोता ! यह श्रेष्ठतम अग्नि असुरों पर विजय पाने वाले मेधावियों को धारण करने वाले पुरों के रक्षक हैं। इस अग्नि की वंदना करने की सामर्थ्य ग्रहण करो। वे अग्नि वंदनाओं से आराधना योग्य, कवच के समान रूप लपटों वाले, हरी मूँछ वाले और हर्षित स्तोत्र वाले हैं, उनकी प्रार्थना करो। हे पृषन ! एक तुम्हारा उजला रंग दिन के रूप में और दूसरा श्याम रंग रात्रि के रूप में हैं, इस प्रकार तुम विभिन्न रूप वाले हो और सूर्य की तरह प्रकाश वाले हो। तुम अन्नवान होकर समस्त प्राणियों का भरण पोषण करते हो, आपका दिया दान हमारा कल्याण करें। हे अग्निदेव ! असंख्य कामधेनु को प्रदान करने वाली इड़ा देव का निरन्तर यजन करने वाले मुझ यजमान का कार्य सम्पन्न करो। आपकी महान बुद्धि हमारी ओर हो और हम पुत्र-पौत्रादि से सम्पन्न हों। विद्युत रूप से अन्तरिक्ष में वर्तमान अग्नि ही इस यज्ञ में है। वे महान अंतरिक्ष के ज्ञाता आहुति को धारण करने वाले तुम अपने पूजक के लिए अन्न धन प्रेरित करो और शरीर के रक्षक हों। मनुष्य के अर्चनीय और इन्द्रात्मक शक्तिशाली अग्नि के महान और सुशोभित रूप की वंदना करो और उनके उत्कृष्ठ कार्यों का वर्णन करो। सब प्राणियों के जानकार अग्नि गर्भ के रूप समान अरणियों द्वारा ग्रहण किए गए हैं। वे आहुतियुक्त अग्नि अनुष्ठान आदि में जाग्रत होकर नित्य स्तुत होते हैं। हे अग्निदेव ! आप हमेशा से असुरों की रुकावट रहे और असुर तुम्हें युद्धों में परास्त नहीं कर सके। तुम ऐसे मायवी असुरों को अपने तेज से नष्ट करो। यह तुम्हारी ज्वालाओं से बच न सकें।[सामवेद 1.1-8]
सामवेद सूक्त (9) :: ऋषि :- गय; आत्रेय, वामदेव, भारद्वाज, मृक्तवाहा, द्वित, बसूयव, गोपवन, पुरुरात्रेय, वामदेव, कश्यपो वा मारीचो मनुर्वा वैवस्वत उभौवा; देवता :- अग्नि, छन्द :- अनुष्टुप।
हे अग्नि देव! आप हमें ओजयुक्त धन प्रदान करें। आपकी गति कभी नहीं रुकती। आप हमें उपासना रूपी धन से सम्पन्न करो। अन्न के रास्ते को प्रगाढ़ करो। पुत्रों के जन्म के समय व्यक्ति अग्नि को प्रज्वलित करें और हवियों द्वारा यजन करें। तब वह अद्भुत कल्याणकारी मार्ग को भोगने में समर्थवान होगा।
उज्जवल प्रकाश अंतरिक्ष में फैलता है और तेज रूप हो जाता है। हे पावक! सूर्य की समान वाली उपासना से प्रसन्न हुए तुम अपनी ज्योति से सुशोभित होते हो। हे अग्निदेव ! आप मित्र देवों के समान शुष्क काष्ठ युक्त अन्न को ग्रहण करते हो और सबके द्रष्टा होते हुए यजमान के घर में अन्न की वृद्धि करते हो। धन के धारणकर्त्ता, अनेकों मनुष्यों के प्रिय, अतिथि की तरह अग्नि की प्रातःकाल स्तुति की जाती है। उस अमर अग्नि में ही सब व्याक्ति आहुति डालते हैं। हे दीप्ति रूप अग्नि देव! आपके निमित्त महान श्लोक उच्चारित किया जाता है। आप ही अपरिमित अन्न प्रदान करो। असंख्य आराधक आपसे श्रेष्ठतम धनों को ग्रहण करते हैं। हे यजमानों! अग्नि की इच्छा करते हुए तुम सभी के प्रिय अग्नि देव की सेवा करो। मैं भी तुम्हारे लिए लाभदायी अग्नि की सुख प्राप्ति के लिए मंत्र रूप वाणी से वंदना करता हूँ। यज्ञ में ज्योतिर्मय हुए अग्नि हेतु हविरत्न दिया जाता है। इसलिए हे यजमानों! मनुष्यगण जिस अग्नि की मित्र के रूप समान वंदना करते हैं, उस अग्नि के लिए तुम भी हवि रत्न प्रदान करो। दुःखनाशक, मनुष्य हितैषी अग्नि को हम प्राप्त हुए वे अग्नि ऋक्ष के पुत्र श्रुतर्वन के लिए ज्वालाओं के रूप में प्रकट हुए। वे अग्नि ऋक्ष के पुत्र श्रुतर्वन हेतु लपटों के रूप में प्रकट हुए। हे अग्नि देव! आप महान कर्मों द्वारा रचित हुए हो। तुम ऋत्विजों के संग भू में निवास करते हो, तुम्हारे पिता कश्यप, माता श्रद्धा और स्तोता मनु हुए।[सामवेद 1.1-9]
सामवेद सूक्त (10) :: ऋषि :- अग्निस्तापस, वाम देव, काश्यपोऽसितो देवलोवा, सोमाहुतिर्भार्गवः, पायु, प्रस्कण्व; देवता :- विश्वे देव, अंगिरा, अग्नि; छन्द :- अनुष्टुप।
हम राजा सोम को वरुण, अग्नि, विष्णु, सूर्य, ब्रह्मा और बृहस्पति की रक्षा हेतु आह्वान करते हैं। जिस रास्ते से यह हवि सम्पन्न आंगिरस स्वर्गलोक को गए तथा जिस प्रकार मनुष्यगण मार्गों पर चलते हैं वैसे ही यह अग्निदेव ऊपर जाते हुए स्वर्ग की पीठ पर चढ़ गए। हे अग्निदेव! आपको महान धर्मों के निमित्त प्रज्वलित करते हैं। आप सेंचन समर्थ हो। इसलिए होम के निमित्त द्यावा पृथ्वी की स्तुति करो। इस यज्ञ में वंदनाकारी स्तोत्र का उच्चारण करते हैं और यह अग्नि उन ऋत्विजों के सब कार्यों को जानते हुए चक्र के समान सभी को अपने आधीन रखते हैं। हे अग्निदेव ! अपने तेज से असुरों के सब तरफ फैले हुए बल को समाप्त करो और उनके पराक्रम को सब तरफ से नष्ट कर डालो। हे अग्निदेव! इस कार्य में आप वसुओं, रुद्रों, आदित्यों और महान यज्ञ वाले प्रजापित द्वारा रचित जल सेंचन समर्थ देवता की आराधना करो।[सामवेद 1.1-10]
सामवेद सूक्त (11) :: ऋषि :- वामदेव, देवता :- सविता; छन्द :- जगति।
हे इन्द्र देव और श्री हरी विष्णु! मैं यह स्तोत्र और हवन आपके लिए प्रेरित करता हूँ। इसके बाद आप यज्ञ का सेवन करो। आप हमें उचित मार्ग से ले जाते हो। इसलिए हमें धन प्रदान करो। हे इन्द्रदेव और विष्णु जी ! आप वंदनाओं के कारण रूप समान हो। आपको वंदनाएँ स्वीकार हों। हे इन्द्र देव और श्री हरी विष्णु! आप सोमों के गुरु हो। तुम धन का दान करते हुए सोमों के सामने आज स्तोत्र, उक्थों के साथ तुम्हें बढ़ाएँ। हे इन्द्रदेव और श्री हरी विष्णु! हिंसकों को पराजित करने वाले अश्व तुम्हें वहन करें। तुम वंदनाओं का सेवन करते हुए मेरी विनती पर ध्यान दो। हे इन्द्रदेव और श्री हरी विष्णु! सोम के पैदा होने पर आप प्रदक्षिणा करते हो। आपने आसमान का निर्माण किया है। हमारे जीवन के लिए लोकों का निर्माण किया है। हे इन्द्रदेव और श्री हरी विष्णु! आप सोम से प्रवृद्ध होते हो। यजमान आपको नमस्कार सहित हव्य प्रदान करते हैं। इसलिए आप हमें धन प्रदान करो। आप कलश के और समुद्र के रूप समान पूर्ण हो। हे इन्द्रदेव और श्री हरी विष्णु! आप सोम पान करके अपना पेट भरो। आपके पास खुशी प्रदान करने वाला सोम है। गमन करो। आप मेरी प्रार्थनाओं को सुनो। हे इन्द्र देव और श्री हरी विष्णु! आप दोनों अजेय हो, आपमें से कभी कोई हारा नहीं है। आपने जिस पदार्थ हेतु असुरों से युक्त किया, वह अपमानित होते हुए भी तुम्हें ग्रहण हो गया।[सामवेद 1.1-11]
अध्याय (2.1) :: ऋषि :- दीर्घतमा, विश्वामित्र, गौतम, त्रित, इरिम्बिठिः, विश्वमना, वैयश्व, ऋजिस्वा भारद्वाज; देवता :- अग्नि, पवमान, अदिति, विश्वदेवा; छन्द :- उष्णिक।
हे अग्निदेव! मैं आपका सेवक आपकी शरण में आया हूँ। मैं आपसे अपरिमित धन, पुत्र आदि की प्रार्थना करता हूँ। हे याज्ञिकों! उच्च आयोजनों द्वारा प्राप्त तेज को संसार के कारण रूप एवं शरीर को ले जाने वाली अग्नि के लिए दीर्घ श्लोकों द्वारा यज्ञ को पूरा करो। हे अग्निदेव! तुम शक्ति से सम्पन्न होने वाले, गौओं से सम्पन्न अन्न के स्वामी हो, अतः हे जातवेदा अग्ने ! हमें असीमित महान अन्न प्रदान करो। हे अग्निदेव ! आप इन देवताओं के पूजन वाले, यज्ञ में देवताओं के उपासक यजमान के लिए यज्ञ कर्म पूरे करो। तुम होता रूप से यजमान को सुखी करने वाले और शत्रुओं को अपमानित एवं तिरस्कृत करने वाले होकर सुशोभित होते हो। यह अग्निदेव ! दृढ़ धनों को ग्रहण करने वाले हैं। यह लपट रूप सात जिह्वाओं युक्त प्रकट होकर कर्म का विधान करने वाले सोम को सेवा कर्म में प्रेरित करते हैं। वंदना योग्य अदिति देवी अपने रक्षा साधनों सहित हमारे पास आएँ और सुख शांति प्रदान करती हुई हमारे शत्रुओं को दूर करें। शत्रुओं के विपरित रहने वाली अग्नि की वंदना करो। उन अग्नि का धूम सर्वत्र भ्रमणशील है तथा उनकी ज्योति को असुर बहिष्कृत नहीं कर सकते। उन सर्व रचित जीवों के ज्ञाता अग्नि का पूजन करो। आहुतिदाता यजमान अग्नि को आहुति देता है। उसका शत्रु जादू की सहायता से भी उस पर विजय हे स्तोताओं। आप सब कल्याणकारी, दानवों को पराजित करने वाले, सोमरस का पान करके नहीं कर सकता। हे अग्निदेव! आप उस कुटिल, हिंसक और दुराचारी शत्रु को बहुत दूर फेंक दो। हे सत्य के पोषक ! हमारे लिए सुख की प्राप्ति को सरल बनाओ। हे शत्रु का विनाश करने वाले और उपासकों के रक्षक अग्निदेव ! मेरे इस अभिनव स्तोत्र को सुनकर मायावी असुरों को अपने महान तेज से भस्म कर दो।
अध्याय (2.2) :: ऋषि :- प्रयोगोः, भार्गव, सौभरिः, काण्वः, विश्वमना वैयश्वः; देवता :- अग्नि; छन्द :- उष्णिक।
हे स्तोताओं ! तुम सत्य यज्ञ वाले महान तेजस्वी अग्नि के लिए श्लोक पाठ करो। हे अग्निदेव! आप जिस यजमान से मित्रता करते हो, वह तुम्हारी महान संतान तथा अन्नशक्ति आदि से सम्पन्न रक्षाओं के द्वारा वृद्धि को ग्रहण होता है। हे स्तोता ! उन हव्यवाहक अग्निदेव की वंदना करो, जिन दान आदि गुण वाले देवता की मेधाजीवनी स्तुति करते हैं और जो देवताओं को आहुतियाँ पहुँचाते हैं। हे ऋत्विजों! हमारे यज्ञ से मेहमान समान अग्नि को न ले जाओ क्योंकि वे अग्नि ही देवों का आह्वान करने वाले महान याज्ञिक, वंदना और निवासप्रद हैं। आहुतियों द्वारा तृप्तता प्राप्त करने वाले अग्नि देव हमारा मंगल करें। हे धनेश ! हमें कल्याणकारक धन प्राप्त हो। उच्च यज्ञ और मंगलमयी वंदनाएँ प्राप्त हों। हे अग्निदेव ! महान याज्ञिक, देववाहक, दानशील, अविनाशी और इस यज्ञ को सम्पन्न करने वाले हो। हम आपकी वंदना करते हैं। हमें यश प्रदान करो। यज्ञ के स्थान पर आने वाले भक्षक असुरों तथा दुष्ट बुद्धि वाले शत्रुओं का और उनके क्रोध का नाश करो। समस्त प्राणधारी के रक्षक और हवियों द्वारा दीप्त अग्नि जब व्यक्तियों के घर में रहकर हर्षित होते हैं तब वे सारे असुरों आदि को नष्ट कर डालते हैं।
अध्याय (2.3) :: ऋषि :- शयुर्वार्हस्पत्यः श्रुतकक्षः, हर्यतः, प्रागाथः, इन्द्रमातरोः, देवाजमयः, गोपूक्त्यश्व सूक्तनौ, मेधातिथिराङ्गिरसः, प्रियमेधः, काण्वश्चः; देवता :- इन्द्र ; छंद :- गायत्री।
हे स्तोताओं! सोमाभिषव होने पर अनेकों यजमानों द्वारा आहुत हुए धनदाता इन्द्र के लिए उस श्लोक का गान करो जो इन्द्र के लिए गव्य के समान सुख प्रदान करने वाला है। हे शतकर्मा इन्द्रदेव ! आपके निमित यह बहुत ही तेजस्वी सोम हमने अभिषुत किया है। इसका पान कर संतुष्ट होओ और फिर हमें धन आदि से सम्पन्न करो। हे गौओं! तुम महावीर के प्रति महान हो। इस महावीर के कानों में स्वर्ण व चाँदी के दो गहने हैं। अध्ययन-शील स्तोता! इन्द्रदेव के दानरूप, घोड़ा, गाय और घर आदि की प्राप्ति के लिए महान स्तोत्र का पाठ करो। वे इन्द्र दुःखहर्त्ता और महान हैं। वे हमें धन प्रदान करें, हम उन्हें प्रसन्न करते हैं। हे इन्द्रदेव! आप अपने साहस, शक्ति और ओज के द्वारा ख्याति को ग्रहण हुए हो। आप ही महान फलों की वर्षा करने वाले श्रेष्ठ देवता हो। यज्ञ ने ही इन्द्रदेव की वृद्धि की है। फिर उन इन्द्र ने वर्षा को बादलों में सुदृढ़ किया है और पृथ्वी को जलवृद्धि द्वारा सम्पूर्ण किया है। हे इन्द्रदेव! जैसे एक मात्र आप ही समस्त धनों के स्वामी हो, वैसे ही मैं और मेरा स्तोता गौओं से सम्पन्न हों। हे सोमाभिषभ कर्त्ताओं! पराक्रमी इन्द्र के लिए इस प्रशंसा के सोग्य सोम को अर्पण करो। हे इन्द्रदेव! इस अभिषुत सोम का पान करो, जिससे आपके उदर की पूर्ति हो। हे निर्भय इन्द्रदेव! हम आपके लिए महान सोमरस अर्पण करते हैं।
अध्याय (2.4) :: ऋषि :- सुकक्षश्रुतकक्षौ भरद्वाज, मधुच्छन्दा, त्रिशोकः, वशिष्ठ; देवता :- इन्द्र; छंद :- गायत्री।
हे सूर्यात्मक इन्द्रदेव! तुम हमें धन देने योग्य और प्रसिद्ध हो। इसलिए धन की वर्षा और प्राणियों का भला करने वाले तुम कृपालु होते हुए समस्त दिशाओं को उज्जवल करते हो। हे दुःखहर्त्ता सूर्यात्मक इन्द्रदेव! आज जिन पदार्थों को उन्नतशील दशा में प्रकाशमय किया है, वे सब पदार्थ आपके वश में हों। तुर्वश और यदु को जब शत्रुओं ने दूर कर दिया था, तब उन्हें वहाँ से इन्द्रदेव ही लौटाकर लाए थे। ऐसे युवावस्था वाले इन्द्र हमारे मित्र हों। हे इन्द्रदेव! समस्त ओर आयुध फेंकने वाले और सब स्थानों में भ्रमणशील असुर रात्रियों में हमारे सम्मुख उपस्थित न हों यदि उपस्थित हों तो उन्हें हम आपके अनुग्रह से समाप्त कर डालें। हे इन्द्रदेव ! भली-भाँति भोगने योग्य तथा बैरियों को जीतने वाले, साहसपूर्ण धनों को हमारी सुरक्षा के लिए प्रदान करो। कम धन वाले हम बहुत साधन पाने के लिए वृत्र रूप राक्षसों को नष्ट करने के लिए वज्रधारी इन्द्र को आहुति देते हैं। इन्द्रदेव ने कद्रु के निष्पन्न सोम रस का पान कर सहस्त्रबाहु का पतन किया, उस समय इन्द्रदेव का पराक्रम दर्शनीय हुआ। हे काम्यवर्षक इन्द्र ! हम तुम्हारी इच्छा करते हुए तुम्हें बार-बार नमस्कार करते हैं। हे सर्वव्यापक इन्द्र ! तुम हमारी भक्ति को जानों जो याज्ञिक अग्नि को दीप्तीमान करते हैं तथा जिनके सखा इन्द्रदेव हैं, वे क्रमपूर्वक शत्रुओं को आच्छादित करते हैं। हे इन्द्रदेव! वैर करने वाले सब शत्रु सेनाओं को तितर-बितर कर दो। विनाशकारी युद्धों को समाप्त करो और फिर उन पर खर्च धन को हमारे पास ले आओ।
अध्याय (2.5) :: ऋषि :- कण्वो घोरः, त्रिशोकः, वत्सः, काण्वः, कुसीदी काण्वः, मेधातिथिः, श्रुतकक्षः, श्यावाश्वः, प्रगाथ काण्वः, इरिम्बिठिः; देवता :- इन्द्र; छंद :- गायत्री।
मरुद्गणों के हाथों में विराजित चाबुकों की ध्वनि को मैं सुनता हूँ। युद्ध क्षेत्र में वह ध्वनि वीरता को प्रोत्साहन देती है। हे इन्द्रदेव! जैसे पात्र ग्रहण कर पशु अपने स्वामी की ओर देखता है उसी प्रकार हमारे ये पुरुष आंपकी ओर देख रहे हैं। जैसे नदियाँ नीचे कर ओर बहती हुई समुद्र की ओर जाती हैं। उसी प्रकार सभी प्रजा इन्द्रदेव के क्रोध और भय से स्वयं झुक जाती है और उन्हीं के अनुसार चलती है। हे देवगण! आपकी महिमाप्रद रक्षाएँ प्रार्थनीय हैं, उन रक्षाओं की हम अपने लिए प्रार्थना करते हैं। हे ब्रह्मणस्पते ! तुम मुझ सोम का अभिषेक करने वाले को उशिज के पुत्र कक्षीवान के समान ही तेजस्वी करो। जिनके लिए सोमाभिषव किया जाता है, जो हमारी अभिलाषाओं के ज्ञाता हैं और जो युद्ध क्षेत्र में शत्रुओं को समाप्त करने में समर्थ हैं, वह दुःखहर्त्ता इन्द्रदेव हमें अपत्ययुक्त धन प्रदान करें और दुःस्वप्न के समान दुःख देने वाली दरिद्रता को हमसे दूर रखें। वे इन्द्रदेव काम्यवर्षक, युवा, लम्बी गर्दन वाले तथा किसी के सामने न झुकने वाले हैं। वे इन्द्रदेव! इस समय कहाँ हैं ? कौन-सा स्तोता उनकी उपासना करता है। पर्वतीय भूमि पर और संगम स्थल पर बुद्धिपूर्वक की गई वंदना को सुनने के लिए मेधावी इन्द्रदेव शीघ्र ही प्रकट होते हैं। भली-भाँति विद्यमान स्तोत्रों द्वारा प्रशंसनीय शत्रु बहिष्कारक और श्रेष्ठतम दानी इन्द्रदेव की उपासना करो।
अध्याय (2.6) :: ऋषि :- श्रुतकक्षः, मेधातिथिः, गौतमः, भारद्वाज, बिन्दुः पूतदक्षौ वा, श्रुतकक्षः, सुकक्षो वाः, वत्सः काण्वः, शनुःशेषः वामदेवो वा; देवता :- इन्द्र; छंद :- गायत्री।
सुन्दर ठोड़ी वाले इन्द्रदेव ने देवताओं को आहुति देने में कुशल याज्ञिक द्वारा जौं के साथ परिपक्व सोमरस अन्न के पकते हुए रस का पान किया। हे श्रेष्ठतम धनिक इन्द्रदेव! हमारी ये वन्दनाएँ तुम्हारी ओर उसी प्रकार निरन्तर विचरण करती हैं जिस तरह गौएँ अपने बछड़ों की ओर जाती हैं। इस चलायमान चन्द्रमा में त्वष्टा का जो प्रकाश समाहित है वहाँ प्रकाश सूर्य की किरणें हैं। अब अत्यधिक वर्षक इन्द्रदेव वृद्धि जलों को इस लोक में प्रेरित करते हैं तो पूषा देव उनकी सहायता करते हैं। ऐश्वर्यवान मरुद्गण को माता गौ, अन्न की इच्च्छा करती हुई अपने पुत्रों का पालन करती है। हे सोमाधिपति इन्द्रदेव! तुम अपने हर्यश्वों के द्वारा निष्पन्न सोम का पान करने हेतु हमारे यज्ञ में प्रस्थान करो। हमारे यज्ञ में सात होताओं ने आहुतियों से इन्द्र को प्रकट किया है और तेज से सम्पन्न होकर यज्ञांत तक आहुति दी। पोषणकर्त्ता और सत्य स्वरूप इन्द्रदेव की महान मति को मैंने ही प्राप्त किया है, इस कारण सूर्य के समान दीप्त करता प्रकट हुआ हूँ। हम अन्नवान मनुष्य जिन गौओं से खुश होते हैं हमारी वे गायें इन्द्र की प्रसन्नता प्राप्त होने पर दूध, घी इत्यादि से युक्त और शक्तिवान हों। देवताओं के रथ पर सवार होने वाले सूर्य इन्द्रदेव के निमित्त महानकर्मा व्यक्तियों द्वारा दी गई आहुतियों को जानें।
अध्याय (2.7) :: ऋषि :- श्रुतकक्षः, वशिष्ठ, मेधातिथिप्रितमेधौः, इरिम्बिठिः, मधुच्छन्दाः, त्रिशोक, कुसीदी शनुः शेपौ; देवता :- इन्द्र; छंद :- गायत्री।
हे ऋत्विजों ! शत्रुओं का तिरस्कार करने वाले, हजारों कर्म वाले मनुष्यों को महान धन देने वाले, सोमपायी इन्द्र की स्तुति को आज भली प्रकार गाओ। हे मित्रो! हर्यश्व और सोमपायी इन्द्रदेव को हर्षित करने वाले स्तोत्र का पाठ करो। हे इन्द्र! हम तुम्हारे मित्र तुम्हें अपना बनाने की इच्छा से तुम्हारी ही वंदना करते हैं। हमारे पुत्र सभी कण्ववंशी उक्थों द्वारा तुम्हारा यश गाते हैं। प्रसन्न हृदय वाले इन्द्रदेव के लिए निष्पन्न सोम रस की, हमारी वाणी सदैव प्रशंसा करे और सभी की उपासना के योग्य सोम की हम उपासना करें। हे इन्द्रदेव! आपके लिए यह वेदी स्थित कुशों पर निष्पन्न किया हुआ रखा है। तुम इस सोम के सम्मुख आकर इस यज्ञ स्थान में ग्रहण करो। नित्यप्रति जैसे महान दुग्धवाली गौओं को पुकारते हैं, वैसे ही सुन्दर कार्य वाले इन्द्रदेव को हम अपनी सुरक्षा के लिए प्रतिदिन पुकारते हैं। हे काम्यवर्षक इन्द्र ! सोमाभिषव के पश्चात् आपके ग्रहण करने के लिए तुम्हारी प्रार्थना करता हूँ। यह सोम अत्यधिक शक्ति-दायक है। तुम इसका रुचिपूर्वक पान करो। हे इन्द्रदेव ! यह निष्पन्न सोमरंस चमस पात्रों से भरा हुआ तुम्हारे लिए ही रखा है। हे स्वामिन ! इस सोमरस का अवश्य ही पान करो। यज्ञादि अनुष्ठानों के आरम्भ में ही अथवा युद्ध उपस्थित होने पर हम मित्र उपासक अपनी रक्षा के लिए अति पराक्रमी इन्द्र को आहुति देते हैं। हे स्तोत्रवाहक सखा रूप ऋत्विजों! तुम शीघ्र आकर बैठो और इन्द्रदेव की समस्त प्रकार से वंदना करो।
अध्याय (2.8) :: ऋषि :- विश्वामित्रः, मधुच्छंदाः, कुसीदी काण्वः, प्रियमेधः, वामदेवः, श्रुतकक्ष मेधातिथि, बिंदु पूतदक्षोः; देवता :- इन्द्र, ससस्पतिः, मरुतः; छंद :- गायत्री।
हे ऐश्वर्यवान इन्द्र ! इस ओज सम्पन्न और निष्पन्न सोम का शीघ्र पान करो। हमारे इन्द्र श्रेष्ठ हैं। यह महान गुण वाले, वज्रधारी की महिमा स्वर्ग के रूप समान महान हो और इनकी शक्ति की अत्याधिक प्रशंसा हो। हे इन्द्र! तुम महान भुजाओं वाले हो। हमें देने के लिए प्रशंसनीय, अद्भुत ग्रहणीय धन को अपने रक्षक हाथ से उठाकर इसी समय प्रदान करो। यह इन्द्रदेव गायों के स्वामी सत्योत्पन्न और सत्य के पोषण करने वाले हैं। इनकी वंदना युक्त अर्चना करो, जिससे ये हमें भली प्रकार जानें। अद्भुत गुणवाले प्रबुद्ध और मित्र इन्द्र किस श्रेष्ठ कर्म से हमारे सामने हो ? वे किस अनुष्ठान से हमारे सम्मुख आएँ? हे स्तोता! तुम असंख्यों का बहिष्कार करने वाले और स्तोता में वृद्धित हुए उन इन्द्रदेव को ही हमारी सुरक्षा हेतु अभिमुख करो। अद्भुत कर्म वाले, इन्द्र के प्रिय इच्छा के योग्य धन देने वाले सद्सम्पत्ति देवता की शरण में उच्चबुद्धि की प्राप्ति के लिए उपस्थित हुआ हूँ। हे इन्द्रदेव! जो मार्ग स्वर्ग के नीचे है तथा जिन रास्तों से मैं संसार में आया हूँ, वह मार्ग वंदना योग्य है। यजमान हमारे उस मार्ग वाली जगह को सुनें। हे सत्यकर्मा इन्द्र ! हमें अत्यन्त कल्याणकारी धन प्रदान करो। हमें शक्ति से पूर्ण अन्न और सुख प्रदान करो। यह सोम मरुद्गण द्वारा अभिषुत किया गया है। अतः अपने बल से तेजस्वी हुए मरुद्गण प्रातःकाल उस सोम का पान करते हैं और अश्विद्वय भी सवेरे ही सोमपान करते हैं।
अध्याय (2.9) :: ऋषि :- देवजामयः, इन्द्रमातरः, गोधा, दध्यऽ.डाथर्वणः, प्रस्कण्व, गौतम, मधुच्छंदा, वामदेव, वत्स, शनुःशेप वातायान उलः।
अपने कर्म की इच्छा करती हुई और रुद्र को प्राप्त होती हुई माताएँ उत्पन्न हुए इन्द्र की परिचर्चा करती है और श्रेष्ठ धन को इन्द्रदेव से प्राप्त करती हैं। हे देवताओं ! हम तुम्हारे लिए कोई उल्टे कर्म नहीं करते बल्कि मंत्रों में वर्णित तुम्हारे मार्ग पर चलते हैं। हे वृहद सोम के गायक, प्रकाशपथ के पथिक आथर्वण! ऋषियों या यजमान को भूल से लगे दोष को दूर करने के लिए तुम सविता की वंदना करो। यह प्रत्यक्ष हुई प्रसन्नता देने वाली उषा स्वर्गलोक से आकर रात्रि के अंधकार को दूर करती है। हे अश्विद्वय ! मैं तुम्हारे लिए बृहद स्तुति करता हूँ। अनुकूल ध्वनि वाले इन्द्रदेव ने दधीचि की अस्थियाँ ले आठ सौ दस असुरों को समाप्त किया। हे इन्द्रदेव! हमारे अनुष्ठान में आगमन कर सोम रूप अन्न ग्रहण द्वारा सन्तुष्ट होओ, फिर बल से अत्यन्त शक्तिशाली बनकर शत्रुओं का विनाश करो। हे वृत्रहन्ता इन्द्रदेव! तुम हमारे निकट आगमन करो। तुम अपनी महती रक्षाओं के साथ आकर सुरक्षा करो। इन्द्र का प्रसिद्ध तेज बढ़ गया। उसी ओज के द्वारा यह इन्द्र द्यावा पृथ्वी को चर्म के समान लपेट लेते हैं। हे इन्द्रदेव ! यह सोम तुम्हारे लिए सुसंस्कृत किया है। तुम इस सोम को और हमारी वंदना रूपी वाणी को भली-भाँति ग्रहण होते हो। हमारे हृदय के लिए कल्याणकारी सुखदाता औषधि की वायु हमें प्राप्त कराएँ जिससे हमारी आयु में वृद्धि हो।
अध्याय (2.10) :: ऋषि :- कण्वः, वत्स, श्रुतकक्षः, मधुच्छंदा, वामदेव, इरिम्बठिः, वारुणि, सत्यधृति; देवता :- इन्द्र; छंद :- गायत्री।
जिस यजमान की मेधावी वरुण, मित्र, अर्यमा रक्षा करते हैं उस यजमान को कोई हानि नहीं पहुँचा सकता। हे इन्द्रदेव! जैसे हमारे पूर्व यज्ञ में तुमने धन-दान के लिए प्रस्थान किया था वैसे ही हमें गौ, अश्व, रथ और प्रतिष्ठामय धन प्रदान करने हेतु अब भी प्रस्थान करो। हे इन्द्रदेव! तुम्हारी यह सत्यरूप यज्ञ के पालन करने वाल उच्च रंग की गायें घी और दूध से हमारे पात्रों को भरती हैं। हे अनेक नाम वाले, अनेकों के द्वारा वंदनीय इन्द्रदेव! तुम मेरे प्रत्येक सोम याग में जब सोमपान के लिए पधारो, तब मैं अपने लिए गायों की अभिलाषा वाली गति से सम्पन्न हो जाऊँ। अन्नवती, पवित्र करने वाली, धन को देन वाली सरस्वती, दान योग्य अन्नों के सहित हमारे यश की करती हुई आएँ और हमारे यज्ञ को उम्पन्न करें। मनुष्यों में कौन ऐया है जो इन्द्रदेव को सन्तुष्ट कर सके। वे इन्द्रदेव यज्ञ में पधारकर संतुष्ट हों और धन का दान करें। हे इन्द्रदेव! यहाँ पधारो। हमने आपके लिए यह सोम निर्मित किया है। आप इस सोम का पान करो और वेदी पर बिछे हुए इस घास के आसन पर विराजमान हों। सखा, वरुण और अर्थमा की महती रक्षाएँ हमारी सुरक्षा करने वाली बनें। हे इन्द्रदेव! आप बहुत वैभवशाली हो। कार्यों को सफलतापूर्वक सम्पन्न करते हो। हे ऐश्वर्यशाली इन्द्रदेव हमें अपना ही समझो।
अध्याय (2.11) :: ऋषि :- वामदेवः; देवता :- उषाः; छंद :- गायत्री।
ऋषियों ने जिन उषाओं को मिलाकर चमस बनाए थे, वे पुरानी उषाएँ कब की और कहाँ हैं? प्रकाशवान नवीन सुन्दर रूपवाली उषाएँ जब उज्जवल प्रकाश करती हैं, तब वे एक रूप रहती हैं। उस समय वे पर्याप्त समय पहले की हैं या नवीन, यह बात पहचानने में नहीं आती है। यज्ञ करने वाले यजमान जिन उषाओं का स्तोत्रों द्वारा उपासना करते हुए धन ग्रहण करते हैं, वे उषाएँ कल्याण करने वाली हैं। वे प्राचीन समय से आने वाली उषाएँ यजमान को धन प्रदान करें। वे यज्ञ के समय प्रकट हुई हैं। वे उषाएँ हमेशा सत्य फल देने वाली हैं। हे इन्द्रदेव! तुम हमें समस्त प्रकार का धन प्रदान करो तथा विशाल संख्या में गौएँ प्रदान करो। हम सुखपूर्वक रह सकें, राक्षसादि होकर, हमें अपना आशीर्वाद प्रदान करो। हमारा अहित न कर सकें, इसलिए हम आपकी वंदना करते हैं। तुम हम पर प्रसन्न
अध्याय (3.1) :: ऋषि :- प्रगाथ, विश्वामित्र, वामदेव, श्रुतकक्ष, अंगिरस, मधुच्छंदा गृत्समदः, भारद्वाज; देवता :- इन्द्र; छंद :- गायत्री।
हे इन्द्रदेव! यह सोम आपको प्रसन्न करे। हे वर्जिन ! आप धन प्रदान करो। ब्राह्म के शत्रुओं का विनाश करो। हे स्तुत्य ! हमारे द्वारा अभिषुत इस सोम का पान करो। प्रसन्नतादायक सोम की धाराओं द्वारा सिंचित होते हो। हे इन्द्रदेव! हमारे सम्मुख तुम् द्वारा दिया गया अन्न ही रहता है। हे यजमानों! यह इन्द्र तुम्हें यज्ञ के आयोजन के प्रेरित करते हैं। यह वीर इन्द्रदेव हमारे द्वारा वरण किए गए हैं। हे इन्द्रदेव! नदियाँ समुद्र को ग्रहण होती हैं, उसी प्रकार हमारा सोम आपको ग्रहण हो। अतः हे इन्द्र अन्य कोई देवता आपसे बढ़कर नहीं है। साम गायक अपने बृहत्साम से वंदना हैं और सामवेद रूपवाणी के द्वारा वन्दना करते हैं। हमारे द्वारा वंदनीय इन्द्रदेव श्रेष ऋभु को हमें अन्न के लिए ग्रहण करावें। हे बलशाली इन्द्र ! अग्नि प्रा लिए बलवान छोटे भाई को हमें दो। स्थिर मन वाले, विश्व को देखने वाले इन्ड भय का हनन करने वाले हैं। हे स्तुत्य इन्द्रदेव! प्रत्येक सोभाभिषव पर हमारी गायों के बछड़ों के निकट पहुँचने के समान ही तुम्हें ग्रहण हों। हम इन्द्र और आज ही मित्रता के लिए तथा अन्न और जल की प्राप्ति के हेतु बुलाते हैं। हे इन्द्रदेव! आपसे बढ़कर और कोई देवता नहीं है, आपसे महान भी कोई न
अध्याय (3.2) :: ऋषि :- त्रिशोक, मधुच्छंदा, वत्स, सुकक्ष, वामदेव, विगोषुक्त्यश्वसूक्तिनौ, श्रुतकक्ष, सुकक्षो वाः; देवता :- इन्द्र; छंद :- गायत्री
है मनुष्यों! संतान आदि के पालन करने वाले शत्रुओं को त्रासप्रद पशुओं से सम्पन्न तथा अन्न देने वाले इन्द्र की मैं हमेशा स्तुति करता हूँ। हे इन्द्रदेव! मैंने आपके लिए स्तोत्र की उत्पत्ति की है। वह स्तोत्र स्वर्ग में स्थित काम्यवर्षक, सोमपायी तुम्हारे सम्मुख गए और तुमने उन्हें ग्रहण किया। जिस यजमान की द्रोह रहित मरुद्गण या अर्थमा या मित्र देवता रक्षा करते हैं, वह यजमान उच्च यज्ञ वाला होता है। इसे सब जानते हैं। हे इन्द्रदेव! आपने जो धन दृढ़ पुरुष में विद्यमान किया है, उसी इच्छा योग्य धन को हमें प्रदान करो। प्रसिद्ध वृत्रहन्ता एवं गतिवान इन्द्र को प्रसन्न करके सोम रूप अन्न अर्पित करता हूँ। हे शूरवीर इन्द्रदेव! हम आपकी कीर्ति सुनने को उत्सुक हों। हे शुक्र ! तुम्हारे समान देव की कीर्ति को भी हम सुने। हे इन्द्र ! जौं और दूध युक्त सत्तू और पुरोडाश से युक्त प्रशंसित हमारे सोमरस का प्रातःकाल में पान करें। शत्रुओं की समस्त सेनाओं पर इन्द्रदेव ने जब विजय प्राप्त की, तब नमुचि नाम के असुर का सिर जल के फेन स्वरूप झागों से निर्मित अस्त्र द्वारा विच्छेद कर दिया। हे इन्द्रदेव! यह सोम आपके लिए ही सिद्ध किए गए हैं। जो सोम अब सिद्ध किए जाएँगे वे भी तुम्हारे ही होंगे। आप उन सब सोमों का पान कर तृप्ति प्राप्त करो। हे ऐश्वर्यवान इन्द्रदेव! आपके लिए सोम सिद्ध किए गए हैं। कुशा का आसन बिछा हुआ है, आप इस पर विराजमान होइए और सोमपान से सन्तुष्ट होकर हमें सुखी करो।
अध्याय (3.3) :: ऋषि :- शनुःशेषः, श्रुतकक्षः, त्रिशोक, मेधातिथि, गौतम, ब्रह्मातिथि, विश्वामित्र, जमदग्नि प्रस्कण्व; देवता :- इन्द्र; छंद :- गायत्री।
हे अन्न की इच्छा रखने वाले पुरुषों! यह इन्द्र सैंकड़ों कार्य करने वाले एवं महान हैं। जिस प्रकार कृषि को जल से सींचते हैं उसी प्रकार आप इन्हें सोमरस से भली-भाँति सींचों। हे इन्द्रदेव ! स्वर्ग से सैकड़ों तरह के शक्तिशाली हजारों अन्न और रसों से युक्त हमारे यज्ञ में पधारो। इन्द्रदेव ने उत्पन्न होते ही बाण को ग्रहण किया और अपनी माता से पूछा कि कौन-कौन से पराक्रमी इस विश्व में प्रसिद्धि को प्राप्त वाले चुके हैं। लोक रक्षा हेतु फैले हुए हाथ वाले, समस्त कार्यों को सिद्ध करने वाले इन्द्रदेव का हम स्मरण करते हैं। मित्र और वरुण ये मेधावी देवता हमें सरल विधि से इच्छित फल प्राप्त कराएँ और अन्य देवताओं के समान प्रीति वाले अर्यमा देवता भी हमें सरलता से मार्ग पर लाएँ। दूरस्थ से निकट आने वाले उषा देव जब अपना प्रकाश विस्तृत करते हैं। तब उनकी ज्योति अनेक तरह की होती है। हे श्रेष्ठकर्मा मित्रावरुण हमारे संगठन को घृत से युक्त दूध से भली प्रकार सिंचित करो और पारलौकिक धाम को भी मधुर रस से सम्पन्न करो। ध्वनि रूपी वाणी के रचित करने वाले मरुतों ने यज्ञ के लिए जलों का उत्कर्ष किया और जल को प्रवाहित कर प्यास के कारण रम्भाती हुई गायों को घुटने के बल झुककर जल पीने की शिक्षा दी। भगवान विष्णु ने इस संसार को लाँघते हुए तीन पाद स्थापित किए। श्री विष्णुजी के धूलियुक्त पाँव में समस्त संसार अच्छी तरह से समा गया।
अध्याय (3.4) :: ऋषि :- मेधातिथि, वामदेव, मेधातिथिप्रियमेद्यौ, विश्वामित्र कौत्सोः, दुर्मित्र सुमित्रो वा विश्वामित्रो, गाथिनोऽमीपाद् उदलो वाः, श्रुत कक्षः; देवता :- इन्द्र; छंद :- गायत्री।
हे इन्द्रदेव! जो उपासक क्रोधपूर्वक अभिषव करे उसे त्यागकर उस स्थान पर श्रेष्ठ अभिषव करने वाले को भेजो और इस यजमान के यज्ञ में निष्पन्न हुए सोम का पान करो। उन महान प्रतापी इन्द्रदेव के लिए हमारा स्तोत्र यथार्थ रूप में न होने पर भी स्वीकार हो। क्योंकि इस स्तोत्र से भी यजमान की वृद्धि सम्भव है। इन्द्रदेव उपासना न करने वाले के शत्रु हैं और याज्ञिकों द्वारा पठित श्लोक को भी जानते हैं, वे साम गायक साम को भी जानते हैं। अतः हम उन्हीं इन्द्र का स्तवन करते हैं। अन्नों में महान अन्न के स्वामी, हर्यश्ववान इन्द्रदेव होताओं द्वारा उच्चारित स्तोत्रों से प्रसन्न होकर सोम से मित्र के समान प्रेम करें। हे इन्द्रदेव! हमारे अभिषुत सोम को ग्रहण करो। दूसरों के हविस्न से प्रीति न करो। हे सर्वव्याप्त इन्द्रदेव ! हमारी वंदना की अभिलाषा करने वाले तुम कृत्रिम नदी के समान रस रूप जल प्रदान करने हेतु और निष्पन्न होमों को कब रोकोगे ? हे इन्द्रदेव! देवताओं के बाद ब्रह्मात्मक धन वाले पात्र से सोम का पान करो। देवताओं से आपकी अटूट मित्रता है। हे वन्दना योग्य इन्द्रदेव! हम आपकी वंदना करने वाले हों। हे सोमपायी ! आप हमें सब प्रकार से सन्तुष्ट करने वाले हो। हे इन्द्रदेव! हमारे शरीर के अंगों में शक्ति स्थापित करो क्योंकि आप महान शक्तिशाली हो। यज्ञ के द्वारा वश में होने वाले तुम हमें हितकारी फल प्रदान करो। हे इन्द्रदेव ! आप युद्ध क्षेत्र में शक्तिशाली शत्रुओं का वध करते हो। आप पराक्रमी और स्थिर रहो। आपकी हृदय वंदनाओं से आकृष्ट करने के योग्य हो।
अध्याय (3.5) :: ऋषि :- वशिष्ठ, भारद्वाज, बहिस्पत्य, प्रस्कण्व, नोधा, कलि, प्रगाथः मेधातिथि, भर्ग, कण्व; देवता :- इन्द्र, मरुत; छंद :- बृहती।
हे इन्द्रदेव! आप अत्यन्त पराक्रमी, स्थावर जंगम के स्वामी और सबको देखने वाले हो। बिना दुही गई पयस्विनी गायों के समान सोम से पूर्ण चमस वाले हम आपको बारम्बार नमस्कार करते हैं। हे इन्द्रदेव! हम स्तोता अन्नदान हेतु आपकी ही बन्दना करते हैं। आप सत्य के रक्षक हो। आपको अन्य प्राणी रक्षा के लिए पुकारते हैं। अश्वरोहियों द्वन्द्व में भी आपको बुलाते हैं। अनेक वैभव वाले वे इन्द्रदेव हम स्तोताओं के लिए हजारों प्रकार के धन देते हैं। हे ऋत्विजों! शत्रु बहिष्कारक दर्शनीय, विद्यमान, सोमरूप अन्न से संतुष्ट होने वाले इन्द्रदेव को बछड़ों को देखकर ध्वनि करने वाली गायों के समान वंदनापूर्वक प्रणाम करते हैं। हे ऋत्विजों! वेगवान अश्वों वाले धनदाता इन्द्र की बाधा प्राप्त होने पर बहुत सोम द्वारा रक्षा के लिए उपासना करो। हमने अपने जिस यज्ञ में सोमाभिषव किया है, वहाँ पुत्र द्वारा पिता की सेवा करने के समान ही इन्द्रदेव का आह्वान करते हैं। युद्ध आदि में शीघ्रता वाला पराक्रमी पुरुष अपनी महान बुद्धि से अन्नों को यथा शीघ्र ग्रहण करता है। जैसे बढ़ई रथ चक्र की नेमि को कोमल करता है, उसी प्रकार मैं असंख्यों द्वारा आहूत इन्द्रदेव की वंदना करके तुम्हारे लिए सम्मुख बुलाता हूँ। हे इन्द्रदेव! हमारे द्वारा अभिषुत और गव्यादि से युक्त सोमरस का पान करो, तृप्त होओ और देवताओं को प्रसन्न करने वाले यज्ञ में हमारे मित्र रूप धनदाता होते हुए हमारी वृद्धि की इच्छा करो। आपकी कृपा बुद्धि हमारी रक्षा करने वाली हो। हे इन्द्रदेव! मैं गौ धन की अभिलाषा रखता हूँ। अतः मुझे गौ धन प्रदान करो। मैं अश्व भी चाहता हूँ। अतः मुझे अश्वों से भी पूर्ण करो। हे मरुद्गण ! तुमसे जो छोटे हैं उनको भी स्तोता वशिष्ठ उपासना से वंचित नहीं करते। तुम सब एकत्र होकर सोम के अभिषव होने पर सोम का पान करो। हे वंदनाकारियों ! इन्द्रदेव के श्लोक के अतिरिक्त अन्य श्लोक उच्चारित न करो। सोमाभिषव के बाद काम्यवर्षक इन्द्रदेव की वंदना करो।
अध्याय (3.6) :: ऋषि :- अंगिरस, तुरुहन्मा, मेधातिथिर्मेध्यातिथिश्चः, विश्वामित्र, गौतम, नृमेधपुरुमेधौ, मेधातिथि, देवातिथि, काण्डव; देवता :- इन्द्र; छंद :- बृहती।
हमेशा समृद्ध, पूज्य महान बलवाले अविहष्कृत और शत्रु को दबाने वाले इन्द्र को जो यजमान यज्ञादि कर्मों से अपने अनुकूल कर चुका है उसे कोई नहीं दबा सकता। हे इन्द्र ! बिना सामग्री ही ग्रीवाओं के जोड़ को रक्त निकलने से पूर्व ही जोड़ देते हैं तथा जो असंख्य धनों के मालिक हैं, वे इन्द्रदेव शरीर के कटे हुए हिस्से को दोबारा ठीक कर देते हैं। हे इन्द्रदेव! स्वर्णयुक्त हवियों वाले यज्ञ में सोमपान के लिए आएँ। हे इन्द्रदेव! पथिक जिस तरह मरुदेश को शीघ्र ही पार करते हैं, उसी प्रकार आप अपने मोर के समान रोगों वाले अश्वों से शीघ्र ही प्रसन्न करें और जैसे पक्षियों को व्याघ्र पकड़ता है वैसे ही तुम्हें कोई भी न रोक सके। हे प्रशंसनीय इन्द्र ! तुम अपने तेज से तेजस्वी बनकर अपने उपासक की प्रशंसा करते हो। आपसे अधिक अन्य कोई देवता सुख प्रदान नहीं कर सकता। अतः मैं यह स्तोत्र आपके लिए ही करता हूँ। हे इन्द्रदेव ! आप अत्यन्त यशस्वी शक्तियों के स्वामी और सत्य रूप सोम का पान करने वाले हो और तुम अत्यन्त विकराल असुरों को भी अकेले ही समाप्त कर देते हो। देवताओं के इस यज्ञ में हम इन्द्र की ही आहुति देते हैं। यज्ञ के अवसर पर हम इन्द्र को ही बुलाते हैं। यज्ञ की समाप्ति पर भी हम इन्द्र का ही आह्वान करते हैं। धन लाभ के लिए भी इन्द्र का ही आह्वान करते हैं। हे इन्द्रदेव! मेरी वंदनारूप वाणियाँ आपको प्रवृद्ध करें। अग्नि रूप समान तेज वाले तपस्वी ऋषि स्तोत्रों द्वारा आपकी वंदना करते हैं। शत्रु विजयी, धनपति, अक्षय, रक्षक हे इन्द्रदेव! जैसे अन्नप्राप्ति हेतु ग्थ इधर-उधर गमन करते हैं वैसे ही हमारे मधुर उच्च वंदनारूपी वचन तुम्हारे लिए कहे जाते हैं। जैसे प्यासा और हिरण जल से परिपूर्ण तालाब पर जाता है उसी प्रकार मित्रता होने पर हे इन्द्रदेव! आप हमारे निकट शीघ्र प्रस्थान करो और हम कण्वों द्वारा अभिषुत सोम कृपापूर्वक पान करो।
अध्याय (3.7) :: ऋषि :- भर्ग, रेभः, काश्यप, जमदग्नि, मेधातिथि, नृमेघपुरुमेधौ, वशिष्ठ, रेभः, भरद्वाज; देवता :- इन्द्र, मित्रवरुणादिव्याः; छंद :- वृत्ती।
हे शचिपति वीर इन्द्र! सब रक्षाओं सहित अभिष्ट फल हमें प्रदान करो। आप हमें सौभाग्ययुक्त धन प्रदान करने वाले हो, मैं आपकी ही आराधना करता हूँ। हे वीर इन्द्रदेव! आपने भोगने योग्य धनों को बली राक्षसों से उनकी से उनकी विजय कर ग्रहण किया है, अतः हे ऐश्वर्यशाली इन्द्रदेव! आप अपने दान द्वारा यजमान को समृद्धशाली बनाओ। हे याज्ञिकों! मित्र अर्यमा और वरुण को प्रसन्न करने वाले श्लोकों का उनके विराजित होने पर गान करो। हे इन्द्रदेव ! स्तोतागण सोमपान हेतु, समस्त देवताओं पूर्व आपकी वंदना करते हैं। रुद्रमरुतों ने भी तुम प्राचीन पुरुषों की वंदना की थी। हे स्तोताओं! अपने महान इन्द्रदेव के लिए अमृत रूप श्लोकों का गान करो। जिन इन्द्र को ऋषियों ने सोमगान के द्वारा सूर्य के तेज से आभूषित किया है। यह पापनाशक इन्द्र अपने सैकड़ों धार वाले वज्र से पापों को दूर करें। हे इन्द्रदेव ! हमें कर्मवान बनाओ। जैसे पिता पुत्र को धन प्रदान करता है, वैसे ही आप हमें धन प्रदान करो। हम प्रातःकाल प्रतिदिन सूर्य के दर्शन करें। हे इन्द्रदेव ! हम आहुतिदाताओं को त्योगो और हमारे लिए सुख देने वाले यज्ञ में सोम पीने के लिए आओ। हे इन्द्रदेव ! हमें अपनी सुरक्षा में रखो और हमारा त्याग न करो। हे इन्द्रदेव! निम्नगामी जल के रूप समान झुकते हुए हमें आपको सोम के अभिषव युक्त ग्रहण होते है तथा कुशा के आसन बिछाने बिछाने वाला स्तोता तुम्हारी कामना करते हैं। हे इन्द्रदेव! जो धन बल मनुष्यों में है तथा जो पार्थिव धन अत्यन्त तेजवान है, उसे हमें दो और सब महान बलों को भी हमें प्रदान करो।
अध्याय (3.8) :: ऋषि :- मेधातिथि, रेभ, वत्स, भारद्वाज, नृमेध, पुरोहन्मा, नृमेध पुरोमेधौ, वशिष्ठ, मेधातिथि र्मेध्यातिथिश्च, कलि; देवता :- इन्द्र; छंद :- बृहती।
हे विकराल कर्मा इन्द्र! तुम सत्य इच्छाओं की वर्षा करने वाले हो। तुम सोमाभिवषमकर्त्ता द्वारा आहुति प्रदान किए गए हमारे रक्षक और वरदाता कहे जाते हो। तुम पास में या दूर से भी अभीष्ट पूर्ण करने वाले माने जाते हो। हे इन्द्रदेव! जब आप स्वर्ग में या अंतरिक्ष में स्थित होते हो तब आपको महिमाप्रद कान्ति वाले घोड़ों के रूप समान वंदनाओं के द्वारा सोभाभिषवकर्त्ता अपने यज्ञ में आहूत करता है। हे उद्गाताओं ! सोम का अभिषव करते हुए तुम शत्रुओं का भयप्रद, शत्रु तिरस्कारक, मेधावी पूज्य और सर्वशक्तिमान इन्द्रदेव की वंदना करो। हे इन्द्रदेव! जाड़ा, धूप, वर्षा आदि से सुरक्षा करने वाला कल्याणप्रद धन परिपूर्ण घर मुझे और मेरे यजमानों को प्रदान करो। शत्रुओं द्वारा छोड़े गए अस्त्रों को इनके निकट से दूर करो। हे मनुष्यों ! जिस प्रकार आश्रय देने वाली किरणें सूर्य की सेवा करती हैं उसी प्रकार इन्द्रदेव के समस्त धनों का उपयोग करो। वे इन्द्र जिन धनों को अपने ओज से प्रकट करते हैं, उन धनों को हम पिता द्वारा प्रदान भाग के समान ही ग्रहण करें। हे दीर्घजीवी इन्द्रदेव! तुमसे प्रथक प्राणी उन विख्यात अन्न को नहीं प्राप्त करते जो इन्द्रदेव! यज्ञ में जाने हेतु अपने हर्यश्वों को योजित करते हैं, उनकी जो वंदना नहीं करता वह उन्हें स्वीकार नहीं होता। हे स्तोताओं! असुरों के साथ युद्ध उपस्थित होने पर जिन्हें अपनी रक्षा के लिए बुलाया जाता है। उन इन्द्रदेव के लिए हमारे यज्ञ में श्लोक उच्चारण करो। जो वृत्रहन्ता, शत्रुनाशी, प्रत्यञ्चा वाले हैं, उन इन्द्रदेव को तीनों कालों में स्तुतियों से अलंकृत करो। हे इन्द्रदेव! पार्थिव निम्न धन तुम्हारा ही है। स्वर्ण आदि मध्यम धन को आप ही पुष्ट करते हो। आप समस्त रत्नादि धनों के सम्राट हो, आप जब भी गवादि धन प्रदान करते हो, तब आपको कोई भी रोक नहीं सकता। हे इन्द्रदेव! कहाँ गए थे ? अब कहाँ गए हो ? आपका मन बहुतों की ओर जाता है। हे रणकुशल और असुरनाशक इन्द्रदेव! यहाँ आओ, हमारे चतुर उपासक तुम्हारो वंदना करते हैं। हम यजमान इन इन्द्रदेव को कल सोम द्वारा संतुष्ट कर चुके हैं। हे इन्द्रदेव! आज अभिषुत हुए इस सोम को प्राप्त करो। हे अध्वर्यो ! इस समय वंदना से उन्हें सुशोभित करो।
अध्याय (3.9) :: ऋषि :- पुरुहन्मा, भर्ग, इरिम्बिठि, जमदग्नि, देवातिर्थि, वशिष्ठ, भारद्वाज, मेध्य काण्व; देवता :- इन्द्र, सूर्य, इन्द्राग्नी; छंद :- बृहती।
रथ द्वारा गमन करने वाले इन्द्र मनुष्यों के स्वामी हैं। उनके समान गमनशील कोई नहीं। वह पाप नाशक और सेनाओं को पार लगाने वाले हैं। मैं उन महान इन्द्र की स्तुति करता हूँ। हे इन्द्रदेव! हम जिससे भय ग्रस्त हैं, उन हिंसाकारक के प्रति हमें अभय प्रदान करो क्योंकि आप अभयदान के बल वाले हो। हमारी रक्षाओं के लिए शत्रु को विजय करो और हमारी हिंसा की इच्छा वालों पर विजय प्राप्त करो। हे गृहपते ! गृह का आधार भूत स्तम्भ दृढ़ हो। हम सोमाभिषव करने वालों को देहरक्षक शक्ति की प्राप्ति हो। असुरों की पुरियों को तोड़ने वाले सोमपायी इन्द्र ऋषियों के सखा बनें। हे सूर्यात्मक इन्द्र देव! आप अत्यन्त तेजस्वी हो। हे आदित्य ! तुम श्रेष्ठ हो। वन्दनाकारी तुम्हारी कीर्ति की वन्दना करते हैं। सूर्य ! आप शक्ति में भी श्रेष्ठ हो। हे इन्द्रदेव! जो व्यक्ति आपका मित्र बन जाता है वह अश्वों, रथों और गायों वाला होकर उच्च रूप और अन्न धन प्राप्त करता है। फिर सबको सुख को देने वाले स्तोत्र वाला होकर श्रेष्ठ रूप और अन्न धन से सम्पन्न होता है। हे इन्द्रदेव ! सौ स्वर्ग भी तुम्हारी बराबरी नहीं कर सकते। सौ धरा भी तुमसे अधिक नहीं हो सकती। हजारों सूर्य भी तुम्हें रोशनी नहीं दे सकते। कोई भी रचित पदार्थ और धावा धरा भी तुम्हें व्याप्त नहीं कर सकते। हे इन्द्रदेव! पूर्व दिशा में वर्तमान, पश्चिम या उत्तर में वर्तमान तथा निम्र दिशा में वर्तमान उपासकगण अपने राजा के हित के लिए प्रार्थना करते हैं। तुम तुर्वश द्वारा भी बुलाए गए थे। हे व्यापक इन्द्रदेव! आपकी प्रसिद्धि को कोई चुनौती नहीं दे सकता। तुम्हारे लिए जो श्रद्धा से परिपूर्ण यजमान हवि सम्पन्न होता है, वह सोमाभिषव के दिन हवि रत्न देने की इच्छा करता है। हे इन्द्राग्ने ! बिना पाँव वाली वह उषा पाँव वाली प्रजा से पहले आती है और प्राणियों के सिर को कंपित करके उनकी वाणी से ही बहुत अधिक आवाज करती है। यह उषा तुम्हारे प्रताप से ही एक दिन में तीस मुहूर्तों को पार करती है। हे इन्द्र देव! हमारे बिल्कुल नजदीक यज्ञशाला में महान बुद्धि और सुरक्षा युक्त आगमन करो। तुम अपनी कल्याणप्रद कामनाओं से युक्त होकर प्रस्थान करो। हे बंधो ! आप सुख प्रदायक उच्च पदों से युक्त होकर यहाँ पधारो ।
अध्याय (3.10) :: ऋषि :- नृमेध, वशिष्ठ भारद्वाज, परुच्छेप, वामदेव, मेधातिथि, भर्ग, मेधातिथिर्मेध्यातिश्च; देवता :- इन्द्र, अश्विनी; छंद :- बृहती।
हे मनुष्यों! तुम अजर, शत्रु विजेता, गतिमान, यज्ञ मंडप में जाने वाले रथियों में विशेष, अहिंसनीय, जल की वृद्धि करने वाले इन्द्र की रक्षा के लिए अपनी ओर आकर्षित करो। हे इन्द्रदेव! यजमान भी तुम्हें हमसे दूर स्थित न रखें। तुम दूर रहकर भी हमारे यज्ञ में शीघ्रता से प्रस्थान करके हमारी वंदनाओं को सुनो। हे प्राणियों ! सोमपायी वज्र धारणकर्त्ता इन्द्रदेव के लिए सोमाभिषव करो। इन्द्रदेव की तृप्ति हेतु पुरोडाशों को परिपक्व करो। यह इन्द्र यजमान को सुख देते हुए ही आहुति स्वीकार करते हैं। अतः आप भी इन्द्र को प्रसन्न करने वाला अनुष्ठान करो। जो इन्द्रदेव शत्रुओं का हनन करने वाले तथा सभी के द्रष्टा हैं, हम उन इन्द्रदेव को वन्दना द्वारा आहूत करते हैं। हे सैकड़ों तरह के आक्रोश करने वाले अनेक धनों से सम्पू सत्यधारक इन्द्रदेव ! आप युद्ध क्षेत्रों में भी हमारी वृद्धि करने वाले बनो। हे अश्विद्वय तुम हमारे द्वारा कृत कर्मों को ही धन मानते हो। हमारे यज्ञ रूप कर्म का दिन-रात फल प्रदान करो। तुम्हारा दिया हुआ धन उपेक्षा योग्य कभी नहीं होता। इसलिए हमारे दान की भी उपेक्षा न हो। जब कभी प्राणी वंदना, हविदाता यजमान हेतु वंदना करें, तब पापनाशक और विभिन्न कर्मों को धारण करने वाले वरुणदेव की रक्षा निर्मित्त वाणी से वंदना करें। हे इन्द्रदेव! मेध्यातिथे इसलिए सोम से तृप्त होकर तुम हमारी गौओं की रक्षा करो। जो इन्द्र अपने रथ में हर्यश्वों को जोतते हैं वे वज्रधारी स्वर्ण से बने रथ वाले हैं। श्लोक और अस्त्र दोनों तरह की वन्दनाओं को हमारे निकट आकर सुनें और हमारे अनुष्ठान को सम्पन्न करने वाली मति से परिपूर्ण एश्वर्यवान इन्द्रदेव सोमपान हेतु, यहाँ पर पधारें। हे वज्रिन ! मैं महान मूल्य मिलने पर भी तुम्हें नहीं बेच सकता। हजारों के लिए भी विक्रय नहीं करता। मैं अपरिमित धन के लिए भी नहीं बेचता। हे इन्द्रदेव! तुम मेरे पिताश्री से अधिक धन सम्पन्न हो। पोषण न भी करो, तो भी मेरे भाई से बढ़कर ही हो। मेरी माताश्री और आप एक समान हृदय वाले हो पर मुझे अन्न-धन से परिपूर्ण करो।
अध्याय (3.11) :: ऋषि :- वामदेव; देवता :- सविता; छंद :- जगती।
उषा आकाश से पूर्ण दिशा में फैलती हुई सब जगह जाती है। पूर्ण उषाएँ अनुष्ठान स्थान को लक्ष्य बनाती हुई किरणों के तुल्य अर्चित की जाती हैं। सभी उषाएँ एक ही रूप वाली होती हैं। समान, सुन्दर वर्णवाली, चमकदार तथा कांतिमयी हैं। अपने शरीर द्वारा प्रकाश देने वाली है और चारों ओर फैलकर अँधेरा समाप्त करती है। हे प्रकाशमयी सूर्य की बेटियों ! तुम हमें संतान और धन से युक्त करो। हम अपने सुख के लिए तुमसे प्रार्थना करते हैं, जिससे हम संतान से परिपूर्ण ऐश्वर्य के अधिपति बन सकें। हे प्रकाशवान सूर्य की बेटियों ! हम यज्ञ करके तुमसे प्रार्थना करते हैं कि हम समस्त मनुष्यों के मध्य में यश वाले और ऐश्वर्यशाली बनें।
अध्याय (4.1) :: ऋषि :- वशिष्ठ, वामदेव, मेधातिथिमेध्यातिथि, विश्वा मित्र, इत्ये मेधातिथि, बालखिल्प, नृमेध; देवता :- इन्द्र, बध्वः; छंद :- बृहती।
हे वज्रिन! दही मिश्रित यह सोम आपके हेतु ही तैयार किए थे। उन सोम सन्तुष्टि के लिए सोम को पीने के लिए हमारे यज्ञ में घोड़ों के द्वारा हमारे स उपस्थित होने की कृपा करें। हे इन्द्र देव! यह श्लोक सम्पन्न सोम तुम्हारी सन्तुि ही है। आप इसे पीते हुए हमारे यज्ञ के श्लोकों को सुनो। आप श्लोक में मग्न मुझ वंदनाकारी को इच्छित फल प्रदान करें। मैं अधिक दूध वाली, आराम जाने वाली, प्रशंसा के योग्य अनेक दुग्धधारा वाली, इच्छा के योग्य गौ के सुशोभित इन्द्र को आहुति देता हूँ। हे इन्द्र देव! बड़े-बड़े सुदृढ़ पहाड़ भी शक्ति को रोकने में असमर्थ हैं। मेरे समान जिस वंदनाकारी को आप धन करते हो, उस धन दान को कोई रोक नहीं सकता। अभिषुत सोम को ऋ साथ पान करने वाले इन्द्र सा ज्ञानी कौन है ? यह इन्द्र ही सोम से तृप्त हो परियों को अपनी ताकत से नष्ट कर डालते हैं। हे इन्द्रदेव! यज्ञ में विघ्न वालों को आप तुरन्त सजा देते हो। इसलिए हमारे अनुष्ठान के चारों तन डालने वालों को दूर करो और हमारे सोम की खूब बढ़ोतरी करो। त्व पर्जन्य, ब्राह्मणस्पते अपने पुत्रों और भाइयों के सहित अदिति हमारे यज्ञ में से वंदना रूपी वाणी की रक्षा करें। हे इन्द्रदेव! आप हिंसक वृत्ति वाले कभसकते। आप हविदाता के पास ऋत्विज को उत्साहित करते हो। हे इन्द्रदेव असंख्य दान हमें ग्रहण होता है। हे इन्द्र देव! अपने अश्वों को रथ में जोड़ों आप बहुत अधिक पराक्रमी हो। दर्शन योग्य मरुद्गण के सहित स्वर्ग से हमारे सम्मुख पधारो। हे वज्रिन! तुम्हें हविदाता यजमानों ने आज पहले सोमपान कराया था। आप हमारे अनुष्ठान में पधारकर हमारे वंदनकारी के श्लोकों को सुनने की कृपा करो।
अध्याय (4.2) :: ऋषि :- वशिष्ठ, अश्विनी, प्रस्कण्व, मेधातिथिर्मेध्यातिथि, देवातिथि, नृमेघ; देवता :- उषा, अश्विनी, इन्द्र; छंद :- बृहती।
अँधेरे को नष्ट करती हुई आने वाली उषा के सभी ने दर्शन किए वह घोर अंधकार को दूर कर अत्यन्त प्रकाश को करने वाली है। हे अश्विद्वय ! आप स्वर्ग की इच्छा रखने वालों के लिए पुकारता हूँ क्योंकि आप अपने वंदनाकारी के नजदीक पहुँचते हो। हे अश्विद्वय ! तुम स्वयं प्रकाशवान हो। कौन-सा पार्थिक देहधारी आपका प्रकाश है? आपके लिए सोमाभिषव करके भका हुआ यजमान राजा के समान ऐश्वर्यवान् होता है। हे अश्विद्वय! आपके साक्षात यह मधुर सोम अभिषुत हुआ है। पहले दिन निष्पन्न हुए मधुर सोम का पान करो और हविदाता को महान धन प्रदान करो। हे इन्द्रदेव ! सिंह के समान आपकी सोमरस के साथ वंदना करता हूँ और आपसे प्रार्थना करता हूँ। अपने स्वामी से कौन-सा मनुष्य प्रार्थना नहीं करता? हे अध्वर्यो! तुम सोम को उत्तरवेदी पर पहुँचाओ क्योंकि यह इन्द्रदेव सोमपान की इच्छा करते हैं। सारथी द्वारा योजित रथ में वत्र हन्ता इन्द्रदेव यहाँ आ गए। हे महान इन्द्र ! उस पार्थिव धन को सब ओर से लाकर दो। तुम अनेकों द्वारा प्रार्थना करने योग्य तथा युद्धों में बुलाए जाने योग्य हो। हे इन्द्रदेव ! आप जितने धन के स्वामी हो वह धन मेरा ही होगा। मैं अपने सोम गाता वंदनाकारी को धन प्रदान करने में समर्थ बनूँ। मैं बेकार समाप्त करने को धन का उपयोग न कर सकूँ। हे इन्द्र ! तुम सब युद्धों में शत्रुओं का दमन करते हो। तुम देवताओं के क्रोध से बचाते हो। तुम ही हमारे शत्रुओं को संकट देते हो और उन्हें नष्ट भी करते हो। जो दुष्ट व्यक्ति हमारे कार्य में बाधा डालते हैं, उन्हें भी नष्ट करते हो। हे इन्द्रदेव! आप स्वर्ग में महान स्थान को ग्रहण किए हुए हो। पृथ्वीलोक भी स्वर्ग से विशाल नहीं है। आप महान हैं। आप सभी का तिरस्कार करते हुए हमारी रक्षा करो।
अध्याय (4.3) :: ऋषि :- वशिष्ठ, गातु, पृथर्वेन्यः, सुप्तुगुः गौरिविति, वेनो भार्गव, बृहस्पतिर्नकुलो वा, सुहोत्र; देवता :- इन्द्र; छंद :- त्रिष्टुप।
हव्यादि से सुसंस्कृत सोम का हमने अभिषव किया है। इसके प्रति इन्द्र द्रेव स्वभाव से ही आकर्षित होते हैं। हे इन्द्र! हम आपको आहुतियों द्वारा प्रसन्न करते हैं। तुम सोम से प्रसन्न होकर हमारी वंदनाओं को सुनो। हे इन्द्रदेव! आपके बैठने के लिए यह स्थान बनाया गया है। आप असंख्य मनुष्यों के द्वारा आहूत हुए हो। मरुद्गण युक्त होकर अपने उस स्थान पर विराजमान होकर हमारे रक्षक तथा वृद्धिकारक बनो। हमें धन प्रदान करते हुए सोमों से संतुष्ट होओ। हे इन्द्रदेव! आपने जल युक्त मेघों को फाड़ डाला। मेघों में से जल निकलने के मार्गों को बनाया। जल रोकने वाले मेघों ने असुरों को नष्ट किया। हे इन्द्र देव! हम सोमाभिषवकर्त्ता आपकी वंदना करते हैं। आप धनदाता को पुरोडाश का भाग हो। अतः आप हमें धन जो अत्यन्त अभिलाषा के योग्य है, वही हमें प्रदान करो। आपके अनेक धनों को तो आपकी कृपा होने मात्र से ही प्राप्त कर लेते हैं। हे धनेश्वर ! हम आपके दाएँ हाथ को अपनी इच्छा से पकड़ते हैं। हे पराक्रमी इन्द्र देव! हम आपको गायों के स्वामी के रूप में जानते हैं। अतः हमें मनवांछित फल वाला धन प्रदान करो। हम युद्ध में सुरक्षा वाले कर्म को प्रयोग करते हैं, द्वन्द्व में इन्द्रदेव को रक्षार्थ बुलाते हैं, ऐसे इन्द्र हमारे द्वारा अन्न की विनती करने पर हमें पशुओं से सम्पन्न गृहवाला बनाओ। सुखदात्री, गतिमान, यज्ञ प्रिय दर्शनीय सूर्य की किरणें इन्द्रदेव को प्राप्त हुई हैं। हे इन्द्र ! तुम अंधकार का नाश करो। हमें दृष्टिवान करो। हमें पापों से मुक्त करो। हे वेन ! तुम महान वृद्धि करने वाले अंतरिक्ष में विचरणशील स्वर्ण पंखवाले, जल के अभिमानी देव वरुण के दूत यम के स्थान में पक्षी के रूप में स्थित और वर्षा आदि के द्वारा पालक हो। तुम्हारी इच्छा वाले वंदनाकारी अंतरिक्ष की ओर देखते हैं। वेन नामक गंधर्व ने आनन्द सूचक ध्वनि करते हुए श्र्वोत्पन्न ब्रह्मा को दर्शनीय तेज से युक्त किया है। उसी गंधर्व ने आदित्य आदि के तेज की स्थापना की। उसी से उत्पन्न हुए तथा भविष्य में उत्पन्न होने वाले प्राणियों के स्थान को बनाया। महान पराक्रमी, वीर, शीघ्रकर्मा, प्रबुद्ध और वज्रधारी उस इन्द्र के लिए स्तोतागण अत्यन्त सुखदायक एवं नवीन श्लोकों को कहते हैं।
अध्याय (4.4) :: ऋषि :- द्युतान, वृहदुक्य, वामदेव, वशिष्ठ, विश्वामित्र, गौरिवीति; देवता :- इन्द्र; छंद :- त्रिष्टुप।
दस हजार असुरों को लेकर आक्रमण करने के लिए कृष्णासुर अंशमती नदी पर पहुँचा। उन भयप्रद शब्द वाले असुरों के पास मरुद्गणों को लेकर इन्द्र पहुँचे। उन समान मन वाले देवताओं ने हिंसक असुरों की सेना का संहार कर डाला। हे इन्द्र देव! यह विश्व देव आपके सखा व मित्र थे। वे सभी वृत्रासुर के श्वास से भयग्रस्त होकर चारों ओर भागने लगे और आपका साथ छोड़ दिया परन्तु मरुदगण ने साथ नहीं छोड़ा। आप उन मरुतों से मित्रता बनाए रखो। आप इन शत्रुओं पर विजय कायम कर सकोगे। युद्ध क्षेत्र में बहुत से शत्रुओं को भगाने वाले वीर युवकों को भी इन्द्र की कृपा प्राप्त वृद्ध हरा देते हैं। जो वृद्व आज मरता है वह दूसरे दिन ही जन्म ले लेता है। इन्द्रदेव की यह सामर्थ्य महिमामयी है। हे इन्द्रदेव! आप अत्यन्त पराक्रमी होकर ही प्रकट होते हो। आपने ही सात असुरों के नगरों का पतन किया और अंधकार से ढकी द्यावा धरा को सूर्य से प्रकाशमान किया। हे इन्द्रदेव! आप शत्रुओं के बल को क्षीण करने वाले और हमें विजयी बनाने वाले हो। जैसे वर्षा कराने वाली वाणी की प्रार्थना की जाती है वैसे ही आप मेघों के प्रेरक, जलों के धारक, काम्यवर्षक दृढ़ वज्रधारी को स्तुति द्वारा प्रसन्न करता हूँ। हे ऋत्विजों! धन की वृद्धि कराने वाले श्रेष्ठ इन्द्र देव के लिए सोम अर्पण करो। वे इन्द्र देव परमज्ञानी है। उनकी उपासना करो। हे इन्द्रदेव! तुम इच्छा पूर्ण करने वाले हो, अतः हविदाता प्राणियों के निकट प्रस्थान करो। अन्न लाभ कराने वाले, विजय दिलाने वाले, युद्ध में विश्व के स्वामी इन्द्रदेव का हम आह्वान करते हैं। यह इन्द्रदेव शत्रुओं को भयभीत करने वाले असुरों के हननकर्त्ता शत्रु धन विजेता हैं। हे इन्द्र! इस प्रकार हम अपनी रक्षा के लिए तुम्हें आहुति प्रदान करते हैं। हे ऋषियों! इन्द्रदेव के लिए श्लोक और हवियों को अर्पण करो। अपने अनुष्ठान में इनकी उपासना करो। जो इन्द्रदेव सब लोकों को अपनी समृद्धि से वृद्धि करते हैं वे हमारे श्लोकों को सुनें। इन इन्द्रदेव का शस्त्र मेघ हनन के लिए आकाश में स्थित हुआ। उसी इन्द्रदेव के लिए जल को अपने आधीन किया। धरा में सींचित जल औषधियों में स्थित होता है।
अध्याय (4.5) :: ऋषि :- अरिष्टनेमिस्तार्थ्य, भारद्वाज, वसुकृद्धा वासुक्रः, वामदेव, विश्वामित्र, रेणु, गौतम; देवता :- तार्थ्य, इन्द्र, इन्द्रापर्वतौ; छंद :- त्रिष्टुप।
उन प्रसिद्ध अन्न वाले सोम के लिए प्रेरित रथों को युद्ध क्षेत्र में लाने वाले, शत्रु विजेता, द्रुतगामी तार्थ्य को कल्याण के लिए आहुति देते हैं। मैं रक्षक इन्द्रदेव का आह्वान करता हूँ। अभीष्टपूरक इन्द्रदेव का आह्वान करता हूँ। युद्ध क्षेत्रों में पुकारने योग्य इन्द्रदेव को आहूत करता हूँ। वे इन्द्रदेव हमारे दिव्य का पान करें। दाएँ हाथ में वज्रधारण करने वाले, अश्वों को रथ में जोड़ने वाले इन्द्र की हम पूजा करते हैं। सोमपान के पश्चात् दाढ़ी मूँछ को कम्पित करते हुए वे इन्द्र विभिन्न धनों को प्रदान करते हैं। हम वंदनाकारी, शत्रुहन्ता, बहिष्कारक, शत्रुओं को दूर करने वाले, काम्यवर्षक, वज्रधारी इन्द्र देव की वंदना करते हैं। वे इन्द्र वृत्रहन्ता, अन्नदाता और महान धनो को प्रदान करने वाले हैं। हमें हिंसित करने की इच्छा वाला, हम पर आक्रमण करने वाला, अपने को महान हुआ जो मनुष्य क्षीण करने वाले शस्त्रों को लेकर आक्रमण करता है, उसे हम भली प्रकार तिरस्कृत करें।
आक्रोशित मनुष्य जिसे बुलाते हैं, परस्पर हिंसा करने वाले पुरुष जिसे बुलाते हैं, जल की कामना से जिन्हें बुलाते हैं और मेघाजीवन जिन्हें हवि अर्पण करते हैं, वह और कोई नहीं, इन्द्रदेव हैं। हे इन्द्र देव और पर्वत! तुम महान् रथ द्वारा आकर प्रार्थना योग्य अन्न प्रदान करो। हमारे यज्ञों में आकर हवि का भ्रमण करो और उससे तृप्त होकर वंदनाओं से प्रसन्न होओ। निरन्तर उच्चारित जो वंदनाएँ इन्द्र द्वारा निर्माण की जाती हैं, उनसे वे जलों को आकर्षित करते हैं और धावा तथा स्वर्ग को रथ चक्र के समान स्थिर रखते हैं। हे इन्द्रदेव ! उपासकगण आपको उपासनाओं से आकर्षित करते हैं। आप उड़ते हुए अंतरिक्ष गामी हुए थे। हमारे अनुष्ठान में तेज से अत्यन्त दीप्तीमान हुए इन्द्रदेव मुझे पुत्र प्रदान करें। सत्य के ज्ञाता, इन्द्र के रथ में योजित तेजस्वी, आवेशयुक्त, इन्द्र को वहने करने वाले अश्वों के रथ-वहन की प्रशंसा करता है, वह चिरंजीवी होता है।
अध्याय (4.6) :: ऋषि :- मधुछन्दा जेता, माधुच्छंदस, गौतम, अत्रिः, तिरश्चीरंगिरस काण्वो, नीपातिथि, विश्वामित्र, शंपुर्बाहस्पत्य; देवता :- इन्द्र; छंद :- अनुष्टुप।
हे इन्द्र! उद्गाता आपकी स्तुति करते हैं। मंत्रोच्चारण करने वाले हविदाता तुम्हारी उपासना करते हैं। जैसे बाँस की नोंक पर नाचने वाले नट आदि बाँस को ऊँचा करते हैं, उसी प्रकार हम तुम्हें उच्च आसन पर प्रतिष्ठित करते हैं। समुद्र के समान श्रेष्ठ रथियों में महारथी, अन्नों के स्वामी इन्द्रदेव की हमारी समस्त वंदनाओं ने वृद्धि की। हे इन्द्र देव! इस अत्यन्त प्रशंसनीय तृप्तिप्रद अभिषुत सोम का पान करो। यज्ञ मंडप में स्थित इस उज्जवल सोम की धाराएँ तुम्हारे अभिमुख गमन करती हैं। हे इन्द्रदेव ! तुम दिव्य शक्ति वाले, वज्रधारी, मेधावी और व्याप्त हो। आपका जो देय धन इस संसार में नहीं है उसको अपने दोनों हाथों से लाकर हमें प्रदान करो। हे इन्द्रदेव! जो तुम्हारी हवियों की उपासना करता है वह मैं ही निश्चय तुम्हारी प्रार्थना करता हूँ। उसे सुनकर मुझे श्रेष्ठ अपत्य गवादि पशु और सब प्रकार का धन देकर परिपूर्ण करो क्योंकि आप महान हो। हे इन्द्रदेव ! सोम आपके लिए सम्पादित हुआ है। आप अत्यन्त बलशाली और शत्रुओं का बहिष्कार करने वाले हो। हमारे इस अनुष्ठान में प्रस्थान करो। सूर्य द्वारा अंतरिक्ष को रश्मियों से पूर्ण किए जाने के समान आपको सोम की शक्ति पूर्ण करें। हे इन्द्रदेव अपने अश्वों पर आरूढ़ होकर मुझ कण्व की श्रेष्ठ स्तुति के प्रति आओ। जब आप स्वर्गलोक का शासन करते हो तब हम प्रसन्न होते हैं। हमारे कर्म की समाप्ति पर स्वर्ग को भेजो। हे वंदनामय इन्द्रदेव! सोमाभिषव के पश्चात् हमारी वाणियों, रथ के युद्ध में पहुँचने के समान आपके सामने शीघ्र ही पहुँचती है। हे इन्द्रदेव ! हमारी वाणियाँ गौएँ जैसे बछड़ों के पास ध्वनि करती हुई जाती हैं, वैसे ही जाती हुई आपकी वंदना करती हैं। शीघ्र पहुँचकर शोधित सोम के द्वारा और शुद्ध करने वाले उकथ्य के द्वारा पवित्र हुए इन इन्द्र की वंदना करें। पापमुक्त होकर वृद्धि को प्राप्त हुए इन्द्र को श्लोकों द्वारा गौ-दूध आदि में सुसंस्कृत हुआ यह सोम हर्ष देने वाला है। हे इन्द्रदेव! जो सोम अत्यन्त सुख प्रदान करने वाला है और अपने प्रकाश से अत्यन्त तेज वाला है, वह सोम आपके भक्तों को धन देने वाला हो। हे स्वाधिपति इन्द्र देव! यह निष्पन्न हुआ सोम आपको प्रसन्नता प्रदान करने वाला होता है।
अध्याय (4.7) :: ऋषि :- भारद्वाज, वामदेव, शाकपूतोवा, प्रियमेघः, प्रगाथ, श्यावश्व, आत्रेय, शंयु, वामदेवा, जेता माथुच्छन्दस; देवता :- इन्द्र, मरुत, दधिक्रा वा; छंद :- अनुष्टप।
हे यज्ञ कर्म में नेता उध्वर्युओ! सोमपान की कामना वाले, सबके ज्ञाता, यज्ञों में जाने वाले और आगे जाने वाले इन्द्र के लिए सोम अर्पित करो। हे इन्द्रदेव! तुम हमारे मित्र हो। असंख्य गुफाओं में वर्तमान हमारे सोम को लाकर पहले ही जगत के स्थित हमारे भयानक मानवी संकल्प का पतन करो यानि हमारे मनुष्य जन्म को नष्ट कर हमें देवता बना दो। हे इन्द्र ! रक्षा के लिए जैसे रथ को घुमाते हो वैसे ही तुम अत्यन्त बली शत्रु तिरस्कारक और सत्य रक्षक इन्द्र को हम भ्रमण कराते हैं। वे इन्द्र अपने प्रमुख आराधक यजमानों के अनुष्ठानों द्वारा उनकी हवियों की अभिलाषा करते हुए आते हैं। उस इन्द्रदेव की प्राप्ति वाले अनुष्ठानों को देवों के पोषक प्राणी पाते हैं। हे इन्द्र ! जिस रथ में जुड़े वाहन तुम्हें अभिमुख करते हैं। उस अनुष्ठान में मधु रूप एवं हर्षकारक सोम का भक्षण करते हुए तुम अन्न के लिए वर्षा करने वाले, शक्ति के रक्षक, बैरी बहिष्कारक कार्यों में स्थित, विश्वरूप धन वाले इन्द्रदेव की तुम्हारे लिए वदंना करता हूँ। घोड़े के समान गति वाले विजयशील अग्नि की आराधना करता हूँ। यह अग्नि हमारे मुख आदि को सशक्त करे और हथियारों की वृद्धि करें। यह इन्द्रदेव शत्रु नगरों के विध्वंसक, नित्ययुवा, क्रांतिदर्शी अत्यन्त ओजस्वी, विश्वकर्मारूप को धारण करने वाले वज्रहस्त और असंख्यों द्वारा पूजनीय है।
अध्याय (4.8) :: ऋषि :- प्रियमेध, वामदेव, मधुच्छंदा, भारद्वाज, अत्रि, प्रस्कण्व, आप्त्यस्त्रित; देवता :- इन्द्र, उषा, विश्वेदेवा; छंद :- अनुष्टप।
हे अध्वर्यो! तुम त्रिष्टुप से युक्त अन्न को वीरों के प्रशंसक इन्द्र के प्रति निवेदित करो। वे इन्द्र अनुष्ठान के लिए अत्यन्त ज्ञान वाले कर्म का सेवन करते हैं। इन्द्र के घोड़ों के समस्त कार्य अनुष्ठान के लिए हैं। अनुष्ठान में आने के लिए ही योजित किए जाते हैं, यह बात स्वर्ग ज्ञाता पुरुष कहते हैं। हे अध्वर्यो ! इन्द्रदेव का पूजन करो। यज्ञ कर्म से प्रेम करने वाले पूजकों ! इन अभिष्ट और शत्रु तिरस्कारक का बारम्बार पूजन करो। शत्रु-नाशक इन्द्र के लिए वृद्धि के समान रूप उक्थ प्रशंसनीय है। इससे प्रसन्न हुए इन्द्रदेव हमारे पुत्र इत्यादि तथा हम मित्रों में वर्तमान होकर प्रसन्नता के शब्द करें। हे मरुद्गण! आपके सहित वैश्वानर न झुकने वाले बल के स्वामी इन्द्रदेव को अपने सैनिकों और रथों के जाने के समय में रक्षा के लिए आहुति देता हूँ। शांत हृदय से अपने कार्य में लगे हुए मनुष्यों में अद्भुत गुणयुक्त वंदना करने वाला पुरुष वंदनाकारी आपकी रक्षाओं से रक्षित होकर, शत्रुओं को पाप के समान पार करता है। हे शतकर्मा इन्द्र! आपका महान धन वाला दान बहुत है। इसलिए आप महान दानी हो। आप हमें धन प्रदान करो। हे उषे! आपकी रोशनी फैलाने वाले प्रस्थान पर प्राणी, पशु और पक्षी सभी अपनी इच्छानुसार भ्रमण करते हैं। हे देवताओं ! आप सूर्य के प्रकाश से प्रकाशित होने पर आकाश में स्थित हो। आपके श्लोक से सम्बन्धित सत्य और असत्य कहाँ हैं? आपकी पुराने समय की आहुति कौन-सी है ? जिन श्लोक आदि के द्वारा होता और उद्गाता यज्ञ कर्म करते हैं, उन ऋचा और सोम से हम अनुष्ठान करते हैं। वह ऋचाएँ श्लोक से सुसज्जित होती हैं और यज्ञीय हिस्से को देवताओं को ग्रहण कराती हैं।
अध्याय (4.9) :: ऋषि :- रेभ, सुवेदा, शैलूषि, वामदेव, सव्य आंगिरस, विश्वामित्र, कृष्ण आंगिरस, भारद्वाज, मेधातिथि, कुत्स; देवता :- इन्द्र, द्यावा-पृथ्वी; छंद :- जगती, महापंक्ति।
आक्रमण करने वाली सब ओर फैली हुई सेना एक होकर शत्रु तिरस्कारक युद्ध में इन्द्र को हथियार प्रदान करती हैं और उपासक उन ऐश्वर्यवान इन्द्रदेव को यज्ञ में प्रकट करते हैं। वे सत्य कर्म के लिए शत्रुहंता तेजस्वी इन्द्र की धन लाभार्थ उपासना करते हैं। हे इन्द्रदेव! मैं आपके मुख्य आवेश को आस्था से देखता हूँ। उस आवेश से आपने असुरों को प्रताड़ित किया और बादलों में छिपे जलों को इस संसार में भेजा है। जब द्यावा धरा तुम्हारे आश्रय में होते हैं तब विशाल अंतरिक्ष भी आपकी शक्ति से डरता है। हे प्राणियों! स्वर्ग और शक्ति के स्वामी इन्द्रदेव को श्लोक और आहुति द्वारा प्राप्त होओ। जो एकांकी हो यजमानों में अतिथि की तरह पूज्य होते हैं, वे पूज्य मनुष्य इन्द्र शत्रु जय की कामना वाले स्तोता को विजय पथ पर अग्रसर करते हैं। हे असंख्य प्राणियों द्वारा वंदित और अत्यन्त समृद्धि वाले इन्द्र देव! हम आपकी शरण में होकर ही अनुष्ठान में प्रवृत होते हैं। हमारी वंदनाओं को आपसे अलग कोई भी प्राप्त नहीं कर सकता। जैसे धरा अपने में रचित समस्त प्राणधारियों को शरण प्रदान करती है वैसे ही हमारे श्लोक को शरण प्रदान करो। हे आराधकों! वदना रूपी वाणी के अभीष्ट योद्धा, ऐश्वर्यवान, प्रशंसनीय अनेकों द्वारा पूज्य इन्द्र का गान करो। स्त्रियाँ जैसे बलवान पति की रक्षा के लिए अभिलाषा करती है, उसी प्रकार स्वर्ग में संगठित होने वाली अभिलाषा पूर्ण नदियाँ इन्द्रदेव की वंदना करती हैं। शत्रुओं से युद्ध के लिए आतुर, यजमानों द्वारा आहुत धनों के निवास स्थान इन्द्रदेव के कार्य सूर्य रश्मियों के समान मनुष्यों का भला करने वाले होते हैं। उन मेधावी और महान इन्द्रदेव का सुख के लिए पूजन करो। जिनके साथ भू ग्रहण होती है, उन शत्रुस्पर्धी धनदाता, रथ के समान गन्तव्य स्थान को ग्रहण करने वाले, घोड़े के समान द्रतुगामी इन्द्रदेव की रक्षार्थ आराधना करो और वन्दनायुक्त सौ प्रदक्षिणा करो। द्यावापृथ्वी जल वाले प्राणियों के निवास के योग्य है। यह जल को प्रेरित करने वाले वरुण की शक्ति से ठहरे हुए और महान वीर्य वाले हैं। हे इन्द्र ! जैसे उषा अपने प्रकाश से समस्त संसार को पूर्ण करती है, वैसे ही आप द्यावाधरा को अपने तेज से पूर्ण करते हो। इस तरह से तुम विशाल से विशाल प्राणियों के स्वामी इन्द्रदेव को अदिति ने निर्मित किया। इस कारण वह माताओं में महान बनीं। हे ऋत्विजों! इन्द्र के निमित्त हवियुक्त उपासना का उच्चारण करो। जिसने ऋषियों को साथ लेकर कृष्णासुर को स्त्रियों सहित नष्ट कर डाला, उन अभीष्ट वर्णक वज्रधारी मित्रभूत इन्द्र का आह्वान करते हैं।
अध्याय (4.10) :: ऋषि :- नारद, गोपूक्त्यश्वसूक्तिनौः, पर्वत, विश्वमना, वैयश्व, नृमेघ, गौतम। देवता :- इन्द्र; छंद :- उष्णिक।
हे इन्द्र! सोमाभिषव होने पर उसका बल लाभ के लिए ग्रहण और अपने पूजक को पवित्र करते हो, ऐसे तुम अत्यन्त ही महान हो। हे प्रार्थना करने वालों! असंख्यों द्वारा पुकारे गए, असख्यों से वंदित उन इन्द्रदेव की बारम्बार वंदना करो। वे इन्द्रदेव श्रेष्ठ हैं, उनकी मंत्रों से उपासना करो। हे वज्रिन! तुम्हारे उन अभीष्ट वर्षी युद्धों में, शत्रु तिरस्कारक, लोकों के रचियता और हर्यश्वों से सेवनीय सोम से उत्पन्न हुए आनन्द की प्रशंसा करते हैं। हे इन्द्र देव! विष्णुजी के प्रस्थान पर तुम उनके संग अन्न यज्ञ में सोम का भक्षण करते हो। आपके पुत्र त्रित के अनुष्ठान में भी तुम सोम का भक्षण करते हो। मरुद्गण के पधारने पर उनके साथ भी सोम पीते हो, फिर भी हमारे इन महान सोमों से खुशी को ग्रहण करो। हे अध्वर्यो! हर्षदाता सोम के आनन्ददाय रस को इन्द्र के लिए सिंचित करो। यह समर्थ इन्द्र ही श्लोक आदि के द्वारा पूजित होते हैं। हे ऋत्विजों! इस महान सोम को इन्द्र देव के लिए ही सींचो। फिर इन्द्रदेव इस रस का पान करें और वंदनाकारियों को अपनी समृद्धि से महान अन्न को अपरिमित रूप से प्रदान करें। हे सखा भूत ऋत्विजों? तुम शीघ्र ही प्रस्थान करो और सभी के स्वामी इन्द्र देव की वन्दना करो। वे इन्द्रदेव सभी शत्रु सेनाओं को स्वयं ही वशीभूत करते हैं। हे उद्गाताओं! मेधावी महान अन्न के उत्पन्न करने वाले तथा वंदना की इच्छा करने वाले इन्द्र के लिए बृहत्साम का गान करो। अकेले ही जो इन्द्र आहुतिदाता यजमान को धन देते हैं, वे इन्द्र देव सम्पूर्ण संसार के स्वामी हैं। हे ऋत्विजों! हम वज्रधारी इन्द्र देव के लिए वंदना करते हैं। तुम सभी के लिए शत्रु बहिष्कृत इन्द्र देव की मैं वन्दना करता हूँ।
अध्याय (5.1) :: ऋषि :- प्रगाथ, भारद्वाज, नृमेध, पर्वत, इरिम्बिठि, विश्वमना, वशिष्ठ; देवता :- इन्द्र, आदित्य; छंद :- उष्णिक, विराडुष्णिक।
हे इन्द्र! आपके श्रेष्ठ बल के लिए एवं यज्ञ हेतु आपको वंदना करता हूँ। आप अपनी शक्ति से वृत्र का नाश करते हो। हे इन्द्रदेव! जिस सोम पान द्वारा खुशी होने पर आपने दिवोदास के शत्रु शम्बरासुर का नाश किया उस सोम का तुम्हारे लिए अभिषव किया गया है, आप उसका पान करो। हे इन्द्रदेव! आप शत्रुओं को नष्ट करने वाले, शत्रुओं पर विजय पाने वाले, सबके प्रिय स्वर्ग के अधिपति और पर्वतों की तरह महान हो। आप हमारे समीप आओ। हे सोमपायी इन्द्रदेव! आपका सोमपान जनित खुशी वृत्र वध आदि कार्य को जानने वाला है। आप उस शक्ति से असुरों को नष्ट करते हो। हम आपकी उस शक्ति की वंदना करते हैं। हे आदित्य ! हमारे पुत्र पौत्रों को दीर्घ आयु प्रदान करो। हे वज्रिन ! बाधा उपस्थित करने वालों को दूर करने का काम आप ही जानते हो। सूर्योदय के समय कर्मशील ब्राह्मण नित्यप्रति शुद्ध होते हैं और सूर्य उदय होने पर पक्षी सभी दिशाओं में विचरण करते हैं, उसी प्रकार आपकी शक्ति के उदय होने पर शत्रु भी भाग जाते हैं। हे आदित्य ! हमसे रोगों को दूर रखो। बाधा उत्पन्न करने वाले शत्रु को हमारे पास से दूर रखो। जो हमें दुःख देने की इच्छा करे उसे दूर हटाओं और हमें पापों से दूर रखो। हे इन्द्रदेव! सोमपान करो ! यह सोम आपको प्रसन्नता प्रदान करने वाला बने। अश्वों के समान ग्रहित सोमभिवव प्रस्तर ने तुम्हारे लिए सोम को संस्कृत किया है।
अध्याय (5.2) :: ऋषि :- सोभरि, नृमेध; देवता :- इन्द्र, मरुत, ककुप।
हे इन्द्रदेव! आप जन्म से ही बाँधवरहित, शत्रुरहित और प्रभुत्व कारक से रहित हो। जब आप अपने किसी पूजक की सुरक्षा करना चाहते हो तब आप उसके मित्र बन जाते हो। हे मित्रों! जिन इन्द्रदेव ने इस महान सम्पत्ति को हमें अधिक मात्रा में पहले ही प्रदान किया था, उसी धन वाले इन्द्रदेव की तुम्हारे धन-लाभ और रक्षा हेतु वंदना करता हूँ। हे मरुद्गण ! हमारे पास आओ, हमें हानि न पहुँचाओ। आप दृढ़ पर्वत आदि को भी नियम में रखते हो इसलिए हमारा त्याग न करो। हे अश्वों, गौओं और अन्नवत्ती धरा के स्वामी इन्द्रदेव! आपके लिए यह सोम प्रस्तुत है, आप यहाँ आकर इसका पान करो। हे अभिष्टवर्षी इन्द्रदेव ! गौ आदि पशु वाले यजमान के स्थान में श्वास लेते हुए शत्रु को आपकी कृपा से ही हम उत्तर दे सकते हैं। हे मरुद्गण गौएँ भी समान जाति होने के कारण बाँधव युक्त हुई और दिशाओं में जाकर परस्पर स्नेह करती है। हे शतकर्मा इन्द्रदेव! आप हमें ओज और धन प्रदान करें। आप अपनी शक्ति से शत्रु की सेनाओं को नष्ट करते हो। हम आपका आह्वान करते हैं। हे इन्द्रदेव! हम इच्छित पदार्थों को अपने आप स्नेह वाले तुम्हारे दूध और घृत मिश्रित सोम के निकट संगठित हुए हम आपको तुम्हें बारम्बार नमस्कार करते हैं। हे वज्रिन ! सोम से तुम्हें पुष्ट करने वाले हम अपनी रक्षा के लिए आपको पुकारते हैं। जिस तरह अधिक गुणवान व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति को बुलाते हैं।
अध्याय (5.3) :: ऋषि :- गौतम, त्रित, अवस्यु; देवता :- इन्द्र, विश्वेदेवा, अश्विनौ; छन्द :- पंक्ति।
सब यज्ञों में निष्पन्न होने वाले रस युक्त मधुर सोम का सफेद रंग वाली गायें पान करती हैं। ये गायें भी अभीष्टवर्धक इन्द्र का अनुसरण करती हुई सुखी होती हैं और दूध पीती हैं और अपने स्वामी के राज्य में निवास करती हैं। हे वज्रिन! इस प्रकार तुम्हारे सोम प्राप्त करने पर वंदना करने वाले आनन्द देने की विनती करता है, तब तुम अपने साम्राज्य में दृढ़ होकर वृत्र पर शासन करते हो। हे वृत्रहन् शक्ति के लिए बल, बल के लिए याज्ञिकों द्वारा प्रबुद्ध किए तुम सभी छोटे-बड़े युद्धों में बुलाए जाते हो। हमारे द्वारा आहुत इन्द्र युद्धादि में हमारी उत्तम प्रकार से रक्षा करें। हे व्रजिन! तुम्हारी शक्ति किसी से बहिष्कृत नहीं हुई है। उसी शक्ति से तुमने अपना प्रभुत्व दिखाते हुए माया व हिरण रूप वृत्र को अपनी माया से समाप्त कर दिया। हे इन्द्र ! जल्दी से आक्रमण कर शत्रुओं को पकड़ो क्योंकि तुम्हारा बल शत्रुओं द्वारा रोका नहीं जा सकता। तुम्हारे बल के सामने सभी झुकते हैं। इस कारण हमने प्रमुख को प्रकट करने वाले तुम उस सूत्र को मारकर जलों को जीतो। युद्ध के उपस्थित होने पर जो बैरी को जीतता है उसे ही धन मिलता है। हे इन्द्रदेव ! ऐसे युद्धों में रिपु के घमंड का पतन करने वाले अपने घोड़ों को योजित करो और अपने बैरी को मारो, अपने अराधक के धन में स्थापित करो। हे इन्द्रदेव! तुम्हारे दिए हुए अन्न का यजमानों ने पान किया और उसके महान स्वाद को कहने में असमर्थ रहने के कारण हर्ष ने सिर हिलाया। फिर तेजस्वी हुए विप्रों ने अभिनव श्लोक से प्रार्थना की। अतः अपने हर्यश्वों को योजित करो। हे इन्द्र ! हमारे समीप आकर हमारी वंदनाओं को भली प्रकार सुनो। तुम हमें सत्यवाणी से सम्पन्न कब करोगे ? तुम हमारी प्रार्थनाओं को सदा ही स्वीकार करते रहे हो। अतः अपने अश्वों को जोड़कर शीघ्र ही आओ। अंतरिक्ष के जल सहित मंडल में वर्तमान सूर्य की किरणें ! तुम स्वर्ग के सामने नोंक वाली हो, तुम्हारे चरण रूप अग्रभाग को मेरी सारी इन्द्रियाँ पकड़ नहीं सकती। हे धावा-धरा! तुम मेरी प्रार्थना को जानों। हे अश्विद्वय! तुम्हारे फलवर्षक और हवि ले जाने वाले रथ को उपासक ऋषि श्लोकों से सजाता है। अतः हे मधुविद्या के ज्ञाताओं! इस बात को सुनो।
अध्याय (5.4) :: ऋषि :- वसुश्रुत, विमदः, सत्यश्रवा, गौतम, अंहोमुग्वाम-देव्य; देवता :- अग्नि, उषा, सोम, इन्द्र, विश्वेदेवा; छंद :- पंक्ति, बृहती।
हे अग्ने! तुम ज्योतिर्मान और अजर हो। हम आपको भली-भाँति प्रकाशित करते हैं। तुम्हारी स्तुति योग्य ज्योति स्वर्ग में भी दमकती है। आप हम उपासकों को अन्न प्रदान करो। हे अग्नि देव ! अपने द्वारा की गई प्रार्थना से देव आह्वान को सिद्ध करने बाले अनुष्ठानों में जिसके लिए कुशाएँ बिछाई गई हैं। ऐसे सर्वत्र विशाल तथा पवित्रता सहित ज्योति वाले तुम्हारे लिए सोम जनित प्रसन्नता के लिए प्रार्थना करते क्योकि आप श्रेष्ठ हो। हे उषे! आज इस यज्ञ के दिन हमें असीमित धन के लिए प्रकाश दो। इसी प्रकार तुमने पहले भी प्रकाश दिया था। हे सत्य रूप वाली उषा ! मुझे वय के पुत्र सत्यश्रवा पर कृपा करो। हे सोम ! तुम श्रेष्ठ हो। विशिष्ट मद वाले होकर तुम हमारे हृदय, अन्तरात्मा और कर्म को कल्याणप्रद करो। यह प्रार्थना करने बाला आपका मित्र बने, जैसे गौएँ घास को मित्र बना लेती हैं। कर्म से महान शत्रुओं को भय प्रदान करने वाले इन्द्रदेव सोमपान के पश्चात् अपनी शक्ति को प्रकट करते है। फिर वे श्रेष्ठ नासिका वाले, हर्यश्ववान इन्द्र अपने हाथों से लोह वज्र को समृद्धि लाभ के लिए ग्रहण करते हैं। हे अभीष्टवर्षक, गौएँ ग्रहण कराने वाले, रथारूढ़ इन्द्रदेव! आपका जो रथ पूर्ण पात्र को प्रकट करता है, अपने उस रथ में हर्यश्वों को योजित करो। उपासकों से धन रूप घर के समान आश्रय रूप जिन अग्नि को गौएँ तृप्त करती हैं और द्रतुगामी अश्व जिनको प्राप्त होते हैं तथा उपासक यजमान जिनके समक्ष हवि लेकर जाते हैं, मैं उन्हीं अग्नि की उपासना करता हूँ। हे अग्नि देव ! हम उपासकों को अन्न प्रदान करो। हे देवगण ! शत्रुओं को दण्ड देने वाले अर्यमा, सखा, वरुण शत्रुओं को बाँधकर जिसकी उन्नति करते हैं, उस प्राणी को कोई दोष और उसका फल विस्तृत नहीं करता है।
अध्याय (5.5) :: ऋषि :- धिष्ण्या ऐश्वरयोऽग्वन्य, त्र्यरुणत्रसदस्यु वशिष्ठ, वामदेवा; देवता :- पवनाम, मरुत, वाजिन; छन्द :- पंक्ति, उष्णिक्, इत्यादय।
हे सोम ! आपका रस अत्यन्त सुस्वादु है। आप इन्द्र के लिए, मित्र के लिए, पूषा के लिए और भग देवता के लिए सब पात्रों में स्त्रवित होओ और साहसपूर्वक शत्रुओं पर आक्रमण करो। आप हमारे कर्जों को नष्ट करने के लिए शत्रुओं का अपमान करते हो। हे सोम ! आप श्रेष्ठ प्रवाहमान सभी के पोषक और देवों के सभी धामों के पात्रों को युक्त करते हो। हे सोम ! तुम घोड़े के समान जलों से प्रक्षालित होकर वेगवान होते हो। अतः महान बल और धन के लिए पात्रों को पूर्ण करें। यह कल्याणकारी सोम महानमति द्वारा सेवनीय प्रसन्नता के लिए जलों के मध्य क्षरित होता है। हे सोम ! तुम्हारा अभिषव होने पर हम आपकी वंदना करते हैं। हे पवमान ! आप मनुष्यों के साथ राष्ट्र की रक्षा हेतु शत्रुओं से युद्ध करते हो। प्रभुत्व सम्पन, कान्तिमय, समान जगह वाले, मनुष्य हितैषी और महान अश्वों वाले ऐसे कौन हैं जो दीन वन्दना करने वालों के लिए अपने बन जाते हैं। हे अग्ने ! तुम कल्याण रूप अश्व के समान हविवाहक और इन्द्रादि देवताओं को प्राप्त कराने वाले हो। आज हम ऋषित्व तुम्हें स्तोत्रों द्वारा प्रबुद्ध करते हैं। प्राणियों की भलाई करने वाले प्रकाश से परिपूर्ण हवि ग्रहण वाले देवों सविता देव द्वारा संपादित अन्न रूप सोम को ग्रहण किया। अतः हे यजमानों स्वर्ग पर विजय ग्रहण करो। हे सोम! तुम अन्नयुक्त, प्राचीन, महान, सुन्दर, धाराओं वाले और क्रमपूर्वक संपादित होने वाले हो।
अध्याय (5.6) :: ऋषि :- त्रसदस्यु, संवर्त आंगिरस; देवता :- इन्द्र, विश्वेदेवा, उषा; छन्द :- द्विपदा, विराट।
हे शत्रुनाशक और उपासक को धन देने वाले इन्द्र! तुम हमें सब प्रकार के अभिष्ट धन प्रदान करो। तुम अत्यन्त सामर्थ्य वाले हो, अतः हम तुमसे ही प्रार्थना करते हैं। बसन्त आदि ऋतुओं में प्रकट होने वाले जो इन्द्रदेव अपने नाम से प्रसिद्ध हैं, मैं उन्हीं इन्द्रदेव की प्रार्थना करता हूँ। राक्षसों को नष्ट करने के लिए प्रशंसनीय श्लोकों से पूज्य करने वाले ब्राह्मण, इन्द्र को प्रबुद्ध करते हैं। हे इन्द्र देव! तुम्हारे रथ की शरीरधारियों और देवताओं ने उत्पत्ति की है। तुम असंख्यों के द्वारा बुलाए गए और विश्वकर्मा ने तुम्हारे वज्र को तेजस्वी बनाया। आहुतिदाता यजमान सुख, पदवी और धन को प्राप्त करते हैं और इन्द्र के लिए कर्म न करने वाला आदमी दान आदि करने में समर्थ नहीं होता और अपने अभिष्ट धन का भी स्पर्श नहीं कर सकता। इन्द्रदेव के आश्रय में जाने वाले सदैव स्वच्छ और पोषण बल तथा दानादि गुण वाले और निष्याप होते हैं। हे उषे ! इच्छा योग्य तेज के सहित आओ। प्रातःकाल की किरणें रथ की ले जाती हैं। वे सर्वसम्पन्न हैं। हे इन्द्रदेव! सम्राट द्वारा बनवाए चमस में से मधुरता सहित महान अन्न को हम आपके लिए समक्ष आकर परोसते हुए तुम्हारा विचार करते हैं। उच्च स्तोत्र वाले पूजक पूजनीय इन्द्र का आहुतियों और श्लोकों से पूजन करते हैं। वे युवा और उच्च इन्द्र उनके शत्रुओं का हनन करते हैं। ब्राह्मणों! वृत्रहन्ता इन्द्रदेव के लिए उस श्लोक का गुणगान करो, जिससे इन्द्रदेव हर्षित होते हैं।
अध्याय (5.7) :: ऋषि :- पृषघ्घ्र , बन्धु, संवर्त, भुवन आप्त्य, भारद्वाज, इत्यादय; देवता :- अग्नि, इन्द्र, उषा, विश्वेदेवा; छन्द :- द्विपदा, विराट, एकपदा।
अत्यन्त मेधावी, हवियों से युक्त एवं आहुति ग्रहण करने वाले अग्निदेव आहुति दाता को भली प्रकार जानते हैं। हे अग्ने ! सेवा करने से अनुकूल तुम हमारे बिल्कुल पास होकर रक्षक और कल्याणकारी बन जाओ। सूर्य के समान अद्भुत महान अग्नि याजिकों को श्रेष्ठ धन प्रदान करते हैं। यह अग्नि देव समस्त शत्रुओं को नष्ट करने वाले हैं। वह इस अनुष्ठान स्थान में पूर्व दिशा में स्थित होकर अर्चना करते हैं। यह उषा अपनी भगिनी रूप रात्रि के अँधकार को अपने प्रकाश से दूर कर देती है और रथ पर भी अपना उत्तम प्रकाश पहुँचाती है। इन दर्शनीय लोकों की सुख प्राप्ति हेतु शीघ्र ही वश में करता हूँ। इन्द्र देव और समस्त देवगण मुझ पर खुश होकर मेरे कार्य को सिद्ध करें। हे इन्द्रदेव! जैसे राजमार्ग से छोटे-छोटे मार्ग निकलते हैं वैसे ही तुम्हारे दान हमें प्राप्त हों। हम इद्रदेव के दान को इस वंदना के प्रभाव से भोगने वाले हों। महान पुत्रों वाले हम सौ हेमन्तों तक सुखी रहें। हे इन्द्र देव! हे मित्रा-वरुण! आप हमें बलप्रदान करने वाला अन्न प्रदान करो। हमारे अन्न को अपरिमित करो। इन्द्र देव ही समस्त संसार के स्वामी हैं।
अध्याय (5.8) :: ऋषि :- गृत्समद, गौराङ्गिवरस, परुच्छेपो, रेभ, एवयाम-रुदात्रेय, अनानत, पारुच्छेपि, नकुल; देवता :- इन्द्र, सूर्य, विश्वेदेवा, मरुत, पवमान, सविता, अग्नि; छन्द :- अष्टि, अत्यष्टि, अतिजगती।
अत्यन्त शक्तिशाली, पूजनीय इन्द्र ने ज्योति, गाय और आयु वाले दिनों में अभिषुत सोम का विष्णु के साथ इच्छानुसार पान किया। उस सोम ने वृत्रहनन कर्मों में इन महिमामय इन्द्र को हर्षयुक्त आहूत किया। यह टपकाता हुआ उच्च सोम इन इन्द्रदेव में रमण करे। हजारों मानवों वाले, दर्शनीय प्रतापी, विधाता एवं दीप्तिस्वरूप यह सूर्य अंधकार रहित इन उषाओं को प्रेरित करते हैं। तब यह दीप्तियुक्त चन्द्रमा आदि भी दिन के प्राप्त होने पर सूर्य के तेज के कारण आभाहीन हो जाते हैं। हे इन्द्रदेव! दूर देश से हमारे निकट आगमन करो। जैसे यह अग्नि और संस्कृत सोम प्राप्त हुए हैं, जैसे सत्यपालक, यजमान यज्ञ भूमि में आया है। जैसे चन्द्रमा अपने लोक को प्राप्त होता है। उसी प्रकार हम यजमान आपके सम्मुख आकर आह्वान करते हैं, जैसे अन के लिए पिता पुत्र और पुत्र पिता को पुकारते हैं, वैसे ही युद्ध में विजय पाने के लिए हम आपको पुकारते हैं। उग्र धनवान बलधारक जो शत्रु द्वारा न रुक सके ऐसे इन्द्रदेव को बारम्बार आहुत करता हूँ। वे श्रेष्ठतम इन्द्र हमारी प्रार्थनाओं के प्रति अभिमुख हो रहे हैं। वे वज्रधारी हमें धन प्राप्त होने वाली राहों को आसान बनाओ।
हे इन्द्र देव! उत्तरवेदी के अग्रभाग में आह्वानीय अग्नि को मैंने धारण किया। हम उन अग्नि की पूजा करते हैं। इन्द्र और वायु की प्रार्थना करते हैं। यह सब यजमान के लिए देवयज्ञ वाले स्थान में एकत्र होकर अभीष्ट पूर्ण करते हैं। हमारे सभी कर्म आपको प्राप्त होते हैं। एवया मरुत नामक ऋषि की वन्दना मरुत्वान और भगवान विष्णु सहित इन्द्रदेव को ग्रहण हो। यह अनुष्ठान योग्य अलंकृत बलशाली मरुद्गण की शक्ति को भी ग्रहण हो। पवित्रकर्त्ता सोम अपनी हरित वर्ण वाली धारा से सूर्य अंधकार को नष्ट करता है। वैसे ही समस्त शत्रुओं को नष्ट करता है। उस सोम की धारा तेजस्वी होती है, यही सोम अपने तेजों से सब रूपों को व्याप्त करता है। सर्वज्ञ, सत्यप्रेरक, धनदाता, प्रिय, वंदनायोग्य उन सविता देव की अर्चना करता हूँ। उन सविता देव की ज्योति ऊँची उठकर धावा धरा में चमकती हैं। महान कर्म सविता देव कृपा पूर्वक स्वर्ग के लिए सोमपान करते हैं। समस्त देवताओं में अग्रहोता, अधिक धनदाता, बल के पुत्र, सर्वज्ञाता अग्नि देवता यज्ञ का भली प्रकार निर्वाह करते हैं। वे देवता जाते हुए घृत को स्वीकार करते हैं। हे सर्वप्रेरक इन्द्रदेव! आपका प्राचीन प्राणी-हितेषी कर्म स्वर्ग में प्रशंसनीय है। आपने अपनी शक्ति से असुर के प्राणों का पतन किया और उसके द्वारा अवरुद्ध जलों को खोल दिया। ऐसे ही हे इन्द्रदेव! अपनी शक्ति से असुरों को बहिष्कृत करो। आप शक्ति और हवि रूप अन्न को ग्रहण करो।
अध्याय (5.9) :: ऋषि :- अमहीयु, मधुच्छन्दा, भृगुर्वारुणि, त्रित, कश्यप, जमदग्नि, दृढ़च्युत, आगस्त्य, काश्यपोऽसित; देवता :- पवमान, सोम; छन्द :- गायत्री।
हे सोम! तुम्हारा रस उत्पन्न हुआ। हम स्वर्ग में विद्यमान उन कल्याणकारी और महिमामय अन्न को प्राप्त करते हैं। हे सोम ! आप इन्द्रदेव के पानार्थ सुसंस्कृत हुए हो। अतः अत्यन्त स्वादवाली हर्षकारक धारयुक्त होकर क्षरित हो जाओ। हे सोम! आप पूजकों के लिए अभीष्टवर्धक होते हुए कलश में आगमन करो और मरुत्वान इन्द्रदेव के लिए सब धनों को धारण कर प्रसन्न होओ। हे सोम! तुम्हारा रस देवों द्वारा इच्छित किया हुआ, राक्षस हन्ता और अत्यन्त हर्षमय है। उस रस के युक्त कलश में आगमन करो। तीन वेदों की वाणी गायें रंभाती हैं। तब हरे वर्ण का सोमरस शब्द करता हुआ कलश में गमन करता है। हे सोम! तुम बहुत ही मृदु हो। इस यज्ञ स्थान में इन्द्र देव के लिए कलश में स्थित हो जाओ। पर्वत में उत्पन्न सोम शक्ति के लिए अभिषुत किया गया जलों में बढ़ता है। श्येन जैसे अपने स्थान को प्राप्त होता है। वैसे ही यह सोम अपने स्थान पर स्थित होता है। हे सोम ! खुशी और शक्ति के साधन रूप हो। इन्द्र आदि देवों के पाने हेतु तथा मरुद्गण के लिए कलश में स्थित हो जाओ। यह सोम पवित्र कलश में स्थित हुआ है। हे सोम ! तुम पर्वत पर उत्पन्न होने वाले हो। अभिषुव होने पर सब कामनाओं को पूर्ण करने वाले हो। बुद्धि की वृद्धि करने वाला सोम अभिषवण फलक में स्थित होकर स्वर्ग विचरण में स्नेह करने वालों को ग्रहण होते हो।
अध्याय (5.10) :: ऋषि :- श्यावाश्व, त्रित, अमहीयु, भृगु, कश्यप, निधुवि काश्यप, काश्यपोऽसित; देवता :- पवमान, सोम; छन्द :- गायत्री।
हर्ष प्रदायक सोम अभिषुत होने पर हमारे हवियुक्त यज्ञ में अन्न और यज्ञ के लिए पात्रों में स्थित होता है। बुद्धिवर्द्धक यह सोम जल की लहरों के समान तथा पशुओं के वन में जाने के समान पात्रों में जाता है। हे अभिषुत सोम ! तुम इच्छाओं को पूर्ण करने वाले होकर धाराओं सहित पात्र में स्थित होओ और हमें यश से संपन्न करो तथा समस्त शत्रुओं को समाप्त करो। हे सोम ! तुम अभिष्टवर्धक हो। हे पवमान सोम ! तुम सर्वदृष्टा को हम अनुष्ठान में आहुत करते हैं। चैतन्यप्रद देव प्रिय यम सोम ऋत्विजों की स्तुतियों के सहित पात्रों में एकत्र होता है। बलवान भाग्यशाली सोम गौओं, अश्वों और पुत्रों की इच्छा से ऋत्विजों द्वारा पवित्र होता है। हे दिव्य गुण वाले सोम ! पात्रों में स्थित होओ और हर्षकारी रस इन्द्र को प्राप्त हो। तुम दिव्य रूप से वायु को प्राप्त होओ। सोम ने वैश्वानर नामक दीप्ति को स्वर्ग के दिव्य वज्र के समान प्रकट किया। अमृत रूप सोम निचोड़े जाते हुए धारा रूप से देवताओं के हर्ष के लिए छन्ने से नीचे टपकते हैं। मेधावी समुद्र की लहरों की शरण में, स्पृहणीय प्रार्थना करने वालों को धारण करने वाला सोम पात्र में सींचित होता है।
अध्याय (6.1) :: ऋषि :- अमहीयु, आङ्गिरस, बृहन्मति, जमदग्नि, प्रभुवसु, मेध्यातिथि, निधुवि, कश्यप, उचथ्य; देवता :- पवमान, सोम; छन्द :- गायत्री।
अच्छी तरह उत्पन्न हुए जल प्रेरित शत्रुनाशक, गौ घृत आदि से मिश्रित सोम की देवता ग्रहण करते हैं। जो इष्ट सोम शत्रु सेनाओं पर आक्रमण करता है, उस सोम को शुद्धियों से सुशोभित करते हैं। कलश में प्रविष्ट हुआ निष्पन्न सोम समस्त धन की वर्षा करता हुआ इन्द्र के लिए स्थित होता है। रथ के अश्वों को जैसे छोड़ देते हैं, वैसे हीअभिषवण फलकों में अभिषुत सोम छन्ने में छोड़े जाने पर गतिवाला होकर द्वन्द्वों में आक्रमण करने वाला होता है। प्रकाशवान और गतियोग्य सोम यज्ञ में उसी प्रकार जाते हैंजैसे गायें गौशाला में जाती हैं। हे सोम ! तुम खुशी देने वाले हो, हिंसक शत्रुओं को समाप्त करने वाले हो। तुम पात्रों में दृढ़ रहने वाले होकर देव विरोधी असुरों को दूर रखो। हे सोम! मनुष्यों के हितैषी जलों को प्रेरित करते हुए तुम अपनी जिस धार से सूर्य को प्रकाशित करते हो उसी धार से पात्र में जाओ। हे सोम ! तुम जलों के रोकने वाले वृत्र के हनन करने वाले इन्द्रदेव की रक्षा करो और धारा से कलश को पूर्ण करो। हे सोम ! इन्द्रदेव की सेवा के लिए अपने रूप से कलश में स्थित हो। आपके रस ने ही राक्षसों की 99 पुरियों को नष्ट कर दिया था। देव धनों को यह सोम हमें अन्न के सहित प्रदान करें। हे सोम! तुम छानते समय कलश में टपको।
अध्याय (6.2) :: ऋषि :- अमहीयु, आङ्गिरस, बृहन्मति, जमदग्नि, प्रभुवसु, मेध्यातिथि, निध्रुवि, कश्यप, उचथ्य; देवता :- पवमान, सोम; छन्द :- गायत्री।
अभीष्टवर्धक, हरित वर्ण वाली, पूजनीय, मित्र के समान और दर्शनीय सोम जो अभिषेक काल में शब्द करता है। वह सूर्य के साथ ही प्रकाशित होता है। हे सोम ! हम याजिक तुम्हारी शक्ति की विनती करते हैं। वह शक्ति सुखमय धन ग्रहण कराने वाला, रक्षक और असंख्यों द्वारा अभिलाषित किया गया है। हे अध्वर्युओं। पत्थरों द्वारा कूटकर निकाले गए सोमरस को छन्ने में डालो और इन्द्र के पीने के लिए पवित्र बनाओ। निष्पन्न सोम की धार से जो आराधक इन्द्र को हर्ष प्रदान करता है वह पाप से लांघते हुए ऊपर गति को प्राप्त करता है। हे सोम! तुम हजारों संख्या वाले धन की वृष्टि करो और हममें अन्नों को स्थापित करो। प्राचीन और विचरणशील सोमों ने नवीन पट का आक्रमण किया और ज्योति के लिए सूर्य के समान तेजस्वी हुए। हे सोम ! तुम अत्यन्त तेजस्वी और बार-बार ध्वनि करने वाले हो। इस यज्ञ मंडप में आओ। हे सोम ! तुम काम्यवर्षक और तेजस्वी हो। हे वर्षणशील ! तुम कर्मों के स्वीकार करने वाले हो। ऋषियों द्वारा शोभित हुए अन्नलाभ के लिए धाराओं सहित स्त्रवित होओ और अन्न रूप गाय आदि पशुओं को प्राप्त करो। हे सोम ! काम्यवर्षक, देवों, द्वारा इच्छित तुम हमारी सुरक्षा करो और छन्ने में धारा रूप से टपको। इस श्रेष्ठ कर्म द्वारा महान होते हुए तुम देवताओं के लिए वृद्धि को प्राप्त होते हो। तुम खुशी देते हुए बैल के समान शब्द करते हो। चैतन्यप्रद शुद्ध पात्र में स्थित यह सोम जल में रचित अन्न को प्रदान करता हुआ जाता है। हे सोम ! तुम हमारे धन के लिए कलश में प्राप्त होते हो, तुम्हारी तरंगों को धारण करने वाले विप्र पूजन के लिए गमन करता है। इस सोम ने बैरियों की ओर आदानशीलो को मारा। यह इन्द्र देव के स्थान को ग्रहण होने वाले सोम धारा रूप में क्षरित होता है।
अध्याय (6.3) :: ऋषि :- भारद्वाज, कश्यप, गौतमोऽर्चिविश्वामित्र, जमदग्निवशिष्ठ; देवता :- पवमान, सोम; छन्द :- बृहती।
हे सोम! तुम अच्छादक हो। धारा रूप के कलश में जाते हो। रत्न आदि धन के दाता, यज्ञ स्थान में स्थित होने वाले दिव्य सोम देवों के लिए हितकारी होते हैं। जो सोम देवों के लिए श्रेष्ठतम हवि है, वह मनुष्यों का हितैषी सोम जलों में जाता है। उस सोम को पत्थरों से कूटकर जलों में सिंचित करो। हे सोम ! प्रस्तर द्वारा कूटे जाने पर तुम छन्ने को लांघते हुए कलश में जाते हो। जैसे नगर में मनुष्य होता है वैसे ही सोम लकड़ी के पात्रों में पहुँचाता है। हे सोम ! देवताओं के पानार्थ सिन्धु के समान बसतीवरी जलों के वर्षों को ग्रहण हुए तुम अपने अंशों से युक्त मृदुरस सहित कलश को ग्रहण होते हो। निचोड़ा जाता हुआ सोम शुद्ध होकर कलश में जाता है। यह सोम हरे रंग की धारा से आनन्ददायक होता हुआ प्राप्त होता है। हे सोम ! मैं नित्य प्रति तुम्हारे मित्र भाव में रहूँ। जो असंख्य राक्षस मेरे कर्म में विघ्न डालते हैं, उन्हें तुम समाप्त करो। हाथों से भली सुसंस्कृत हुए सोम ! तुम आवाज करते हो और अनेकों द्वारा इच्छित स्वर्ण धन का पूजकों को लाभ कराते रहो। हे ज्ञानी, विचरणशील, हर्षदायक, रस सिंचत करने वाले सोम ! तुम अपने रस को कलश के ऊपर सभी ओर निकालते हो। हे सोम ! तुम चैतन्ययुक्त प्रिय और पवित्र होते हुए छन्ने से टपकते हो। पितरों के नेता और बुद्धि बढ़ाने वाले हो, तथा हमारे यज्ञ को अपने मधुर रस से सिंचित करते हो। हर्ष प्रदान करने वाले से सुसंस्कृत सोम मरुत्वान इन्द्रदेव के लिए कलश में पूर्ण होता अपनी धाराओं से छन्ने में टपकता है। ऋत्विज उसे पवित्र करते हैं। तुम सब स्तोत्रों के द्वारा अन्नलाभ वाले होकर आओ और देवताओं के लिए हर्षप्रद और तृप्तिकारक होते हुए टपको। मरुद्गण युक्त इन्द्रदेव की प्रिय प्रार्थनाओं और अन्नों को लक्ष्य बनाते हुए वंदनाकारियों के अन्न लाभ के लिए यह सोम छन्ने से निकालते हैं।
अध्याय (6.4) :: ऋषि :- उशना, काव्य, वृषणों, वशिष्ट, पाराशर, शाक्यत्य, वशिष्ठों मैत्रावरुणि, प्रतर्दनो देवोदासि, प्रस्कण्व, काण्व; देवता :- पवमान, सोम; छन्द :- त्रिष्टुप।
हे सोम! तुम शीघ्र आकर कलश में विराजमान होओ। ऋत्विजों द्वारा पवित्र किए गए, इस यजमान को आप अन्न प्रदान करो। आपको अश्व के समान शुद्ध करते हुए ब्राह्मण यज्ञ में पहुँचाते हैं। उशना के समान प्रार्थना करने वाला इन्द्रदादि देवों के प्राकट्य का वर्णन करता हूँ। तेजस्वी, व्रती और पापशोधन घ्वनि करता हुआ पात्रों को भर देता है। आहुतिदाता यजमान तीनों वेदों की वाणी का पाठ करता है। सोम की सत्य और कल्याणदायी वंदना करता है। अभीष्ट की प्रार्थना वाले उपासक सोम की उपासना के लिए जाते हैं। स्वर्ण के द्वारा शुद्ध किया गया सोम अपने रस को देवों में मिलाता है। यह अभिषुत सोम ध्वनि करता हुआ छन्ने में पहुँचता है, जैसे होता पशुओं से भरे गृह में जाता है। विद्वानों को प्रकट करने वाला स्वर्ग, पृथ्वी अग्नि, आदित्य और इन्द्र को प्रकट करने वाला विष्णु को भी बुलाने वाला सोम कलश में स्थित है। तीनों काल वाले, काम्यवर्षक का अन्नदाता, ध्वनिवान सोम की अभिलाषा वाणी करती है। यह जलों में स्थित हुआ गतिमान सोम वंदना करने वालों को वरुण के समान धन प्रदान करता है। जलवर्षक, यज्ञ पालक, काम्यवर्षक, सुसंस्कृत सोम जल के धारणकर्त्ता आकाश में प्रजाओं को प्रकट करता हुआ सबको पार कर जाता है। समस्त ओर से परिस्त्रुत हरि सोम ध्वनि करता हुआ शोधा जाता है और द्रोण कलश में जाता है। यह अपने को दुग्धादि मिश्रित करता हुआ कलश में पहुँचता है। प्रार्थना करने वाले इस सोम के लिए हवि सहित श्लोक करें। हे काम्यवर्षक इन्द्र ! यह मधुर सोम तुम्हारे लिए सींचने वाला होता हुआ छनने से टपकता है। वह हजारों-सैकड़ों धन के स्वामी धन को लेने वाला अत्यन्त प्राचीन यज्ञ में विद्यमान हुआ। हे सोम ! तुम माधुर्यप्रद हो। वसतीवरी जलों को आच्छादित करते हुए छनने में गिरते हो। फिर अत्यन्त हर्षप्रदान करने वाले होकर द्रोण कलश में स्थिर होते हैं।
अध्याय (6.5) :: ऋषि :- प्रतर्दन पाराशर, शाक्त्य इन्द्रप्रमतिर्वासिष्ठ, वशिष्ठो, मैत्रवरुणि, कर्ण श्रद्धासिष्ठ, नोधा गौतम, कण्वौ धौर, मर्युर्वासिष्ठ, कुत्स, आंङ्गिरस, कश्यपो मारिच, प्रस्कण्व काण्व; देवता :- प्रबमान सोम; छन्द :- त्रिष्टुप।
सेनाओं में अग्रणी शत्रुओं के लिए बाधक सोम, गौ आदि की कामना करता हुआ रथों के आगे विचरता है। उस सोम से परिपूर्ण सेना प्रसन्न होती है। यह सोम इन्द्र के आह्वानों को मंगलमय करता हुआ इन्द्र के आगमन के लिए दुग्ध आदि को ग्रहण करता है। हे सोम! आपकी मधुप्रद धारायें प्रसन्नकारक होती हैं। वसतीवरी जलों में जब तुम पवित्र होते हो और छन्ने से निकलते हो तब गौ दुग्ध को देखकर क्षरित होते ही फिर विख्यात होकर सूर्य को अपने तेज से पूर्ण करते हो। हे उपासकों ! सोम की भली प्रकार वंदना करो। हम देवताओं की पूजा करते हैं। सोम का अभिषेक करो। वह सोम रस छन्ने से क्षरित होकर द्रोण कलश में विराजित हो। अध्यर्युओं से प्रेरित द्यावा धरा को प्रकट करने वाला, अन्न प्रदान करता हुआ तथा अस्त्रों को तीक्षण करता हुआ सोम हमें देने के लिए हाथों में धन प्राप्त करता हुआ ग्रहण होता है। उपासक की वाणी उसे संस्कृत करती है। तब यज्ञ में देवताओं को प्रसन्नता देने वाले सबके पोषक, कलश स्थित सोम की इच्छा करती हुई गाएँ अपने दूध को मिश्रित करती हैं। कर्म करती हुई अंगुलियाँ सोम का अभिषव करती हैं, तब वह हरित सोम रस सब दिशाओं में जाता हुआ घोड़े के समान गति से कलश में स्थित होता है। सूर्य में जिस तरह किरणों उदित होती हैं, वैसे ही सोम का संस्कार करने वाली दसों उंगलियाँ उपस्थित होती हैं। तब वह जलों को ढकता हुआ सोम उपासकों की इच्छा करता हुआ गौ पालक के गोष्ठ में जाने की तरह कलश में जाता है। क्षरणशील, विचरणशील, बलशाली यह इन्द्रदेव के लिए प्रेरित होता है। यह यजमान को धन लाभ कराने वाले सम्म्राट को इन्द्रदेव के बल को देने के लिए स्रवित होता है। वही असुरों को समाप्त करता और शत्रुओं को रोकता है। हे सोम ! धन से परिपूर्ण धारा के सहित सिंचित होओ। तुम वसतीवरी जलों में मिलकर कलश में जाओ, तब आदित्य और वायु के समान प्रेरकगति को ग्रहण कर इन्द्र को प्राप्त होओ। श्रेष्ठतम सोम ने बहुत से कर्म किए हैं। जलों के गर्भ रूप इस सोम ने देवों का यजन किया और इन्द्रदेव ने सोमपान से रचित शक्ति को धारण किया। इसी सोम ने सूर्य में तेज की स्थापना की। जिस सोम में देवताओं के मन रम रहे हैं वह शब्द करने वाला सोम यज्ञ में स्तुति के साथ अश्वों के समान जोड़ा गया। दस उँगलियाँ सोम को उच्च स्थान रूप छन्ने में प्रेरित करती हैं। जल की शीघ्घ्र कर्मा तरंगों के समान कर्म में शीघ्रता करने वाले ऋत्विज वंदनाओं को सोम के प्रति प्रेरित करते हैं। नमस्कार सहित वंदनाएँ इस सोम को देवों के सम्मुख पहुँचाती हुई प्रविष्ट होती हैं।
अध्याय (6.6) :: ऋषि :- अन्धीगु, श्यावाश्वि, नहुषो मानव, ययातिर्नाहुष मनु सांवरण, ऋजिण्वा भारद्वाजश्च रेभूसूनू काश्यपौ, प्रजापति-र्वाच्यो वा; देवता :- पवमान, सोम; छन्द :- अनुष्टुप, बृहती।
हे मित्रो! सोम के अभिसिक्त रस की रक्षा के लिए लम्बी जीभ वाले कुत्ते को दूर कगे। यह सेवनीय सोम छन्ने में पवित्र होकर कलश में जाता हुआ समस्त प्राणधारियों का पालक होता है और अपने तेज से धावा धरा को प्रकाशमान करता है। रसयुक्त हर्षदायक निष्पन्न सोम छन्ने में होता हुआ पात्र में टपकता है। हे सोम ! तुम्हारा हर्षकारी रस देवताओं के पास पहुँचे। महान मार्ग के ज्ञाता, देवों के मित्र, पाप रहित सोम तेजस्वी होकर प्रस्थान करते हैं। हे सोम ! सैकड़ों द्वारा इच्छा करने और हजारों द्वारा भरण करने वाले अन्न यश वाले तेजस्वी और शक्तिदाता अपत्य हमें प्राप्त कराओ। गौएँ जिस प्रकार बछड़ों को चाटती हैं, वैसे ही वसतीवरी जल इन्द्र देव के प्रिय सोम से मिलते हैं। सबके द्वारा इच्छित शत्रु तिरस्कारक सोम के लिए प्रत्यंचा के समान फैले हुए छन्ने को अध्वर्युमण आच्छादित करते हैं। सबके स्पृहणीय हरे सोम का छन्ने में छानते हैं। वह सोम इन्द्रादि देवों को अपनी हर्षकारक धाराओं से युक्त ग्रहण होता है। सोम के शब्द को कर्म में बाधा डालने वाले सुनें। हे स्तोताओं! अपने पूर्वकाल में जैसे दक्षिणा रहित मुख को भृगुओं ने दूर किया था, वैसे ही श्वान को दूर हटाओ।
अध्याय (6.7) :: ऋषि :- कविर्भार्गव, सिकता निवावरी, रेणुर्वेश्वामित्र, वेनोभार्गव, वसुर्भारद्वाज, वत्सप्री, गृत्समद, शौनक, पवित्र, आंगिरस; देवता :- पवमान, सोम; छन्द :- जगती।
भक्ष्य हितकारी सोम संसार को तृप्त करने वाले जल को प्राप्त होता है। फिर यह बुद्धि को प्राप्त हुआ सोम सूर्य के विचरण करने वाले रथ पर विश्वद्रष्टा होकर आरूढ़ होता है। अप्रेरित, पापनाशक, सिद्ध सोम देवों वाले अनुष्ठान में आवें। अदानशील शत्रु अन्न की अभिलाषा करके भी भोजन ग्रहण न करें। हमारे श्लोक देवों को ग्रहण हों। इन्द्र के वज्र के समान यह बीजवपन कर्त्ता सोम द्रोण कलश में जाता हुआ ध्वनि करता है। हमारी फलवृष्टि करने वाली जलमयी धाराएँ दुधारू गौओं के समान शब्द करती हुई प्राप्त होती हैं। यह सोम इन्द्र के उदर में जाकर उन्हें प्रसन्न करता है। वह वसतीवरी जलों से मिलकर छन्ने से छनता हुआ द्रोण कलश में जाता है। सबका धारण शोधनीय, बलदाता हरे वर्ण का स्तुत्य सोम छन्नों में आता जाता सप्त प्राणियों द्वारा शुद्ध किया जाता है। वह बिना प्रसन ही अश्व के समान वसतीवरी जल में अपने वेग को करता है। काम्यवर्षक, द्रष्टा, दिन, उषा और आदित्य की वृद्धि करने वाला संस्कारित सोम वंदनाओं द्वारा प्रेरित होकर मन में प्रवेश करने की कामना से कलशों में जाता हुआ ध्वनि करता है। यज्ञ में स्थित सोम के लिए इक्कीस गौएँ दुही जाकर दुग्ध पात्रों को भरती हैं। तब यह सोम यज्ञों द्वारा वृद्धि को प्राप्त होता हुआ शुद्ध जल के सोधन हेतु मंगल रूप हो जाता है। हे सोम! तुम प्रसिद्ध होकर इन्द्रदेव के लिए रस सींचो। व्याधि और राक्षस को दूर करो, वे तुम्हारे रसपान का आनन्द ग्रहण न करें। इस अनुष्ठान में तुम्हारे रस हमारे लिए धन से सम्पन्न हों। काम्यवर्षक हरित सोम सिद्ध होकर राजा के समान तेजस्वी होता है। वह रस निकलने के समय शब्द करता हुआ पवित्र होता है तथा छन्ने से टपकता है। मधुमय सोम देवताओं के लिए पात्र में जाता है। गौएँ जैसे अपने बछड़े बछियों को देखकर दूध टपकाती हैं। वैसे ही यज्ञ में रंभाती हुई गाय सब ओर से टपकने वाले अमृत इन्द्र के लिए धारण करती है। ऋत्विज सोम को दूध से मिश्रित करते हैं। देवगण इस भली-भाँति मिलाए गए सोम का आस्वादन करते हैं। वह सोम गौ घृत से मिलाया जाता है। वही सोम जल के आधार भूत अंतरिक्ष में उठाया गया होकर सुवर्ण से शुद्ध किया जाता हुआ ग्रहणीय होता है। हे ब्राह्मणस्पते ! हे सोम ! तुम्हारे अंग सर्वत्र फैले हुए हैं। तुम पान करने वाले शरीर में व्याप्त हो। व्रत आदि से जिसका शरीर तेजस्वी नहीं हुआ है वह अमृत पीने में समर्थ नहीं होता। परिपक्व देह वाला तेजस्वी ही इसमें समर्थ होता है।
अध्याय (6.8) :: ऋषि :- अग्निश्चाक्षुष, चक्षुर्मानव, पर्वतनारदौ, त्रित आप्त्य मनुराप्सव, द्वित आप्त्य; देवता :- पवमान, सोम; छन्द :- उष्णिक।
शीघ्र सुसंस्कृत पात्रों में स्रावित होते हुए सर्वत्र हरित वर्ण के यह सोम काम्य वर्णक इन्द्र को प्राप्त हो। हे सोम! इस पात्र में आओ। इन्द्रदेव के लिए सभी ओर से सिंचित हो जाओ। शत्रुओं का हनन करने वाले स्वर्ग प्रापक शक्ति को हमें प्रदान करो। हे मित्रो ! प्रार्थनाओं के लिए तैयार हो जाओ। शोधे जाते हुए इस सोम के प्रति सोम की स्तुति को गाओ। जिस प्रकार एक पिता अपनी संतान को अलंकारों से सजाता है उसी प्रकार सोम को समृद्धि के लिए तैयार करो। हे सखाओ ! तुम देवताओं की खुशी के लिए सोम की प्रार्थना करो। हवियों की प्रार्थनाओं से सुस्वादु बनाओ। यज्ञ को सम्पन्न करने वाला पूज्य जलों वाला सोम यज्ञ को व्यक्त करने वाले रस को प्रेरित करता हुआ, सब हवियों को व्याप्त करता हुआ, स्वर्ग और पृथ्वी पर स्थित है। हे सोम ! देवों के सेवन के लिए शक्ति के साथ पात्र में पहुँची और रस युक्त होकर द्रोण कलश में स्थित हो जाओ। पवित्र स्तोता से आगे बार-बार शब्द करने वाला सोम अपनी धारा से छन्ने में जाता है। छन्ने से छनते हुए प्रार्थना करो। इन वन्दनाओं से हर्षित होने वाले के लिए अधिकता से वन्दना करो। हे सोम तुम सुसंस्कृत होकर गाय और अश्वों सहित धन प्रदान करो। फिर मैं तुम्हारे पवित्र रस को गोरस में मिला होने पर अधिक प्राप्त करूं। हे सोम ! तुम धन वाले हो। हमारी वाणियाँ धन लाभ के लिए तुम्हारी प्रार्थना करती हैं तथा हम तुम्हारे रस को गौ-दूध आदि से आच्छादित करते हैं। हरे रंग का सोम छन्ने से निकलता है। हे सोम ! तुम स्तोताओं को उपयुक्त यश प्रदान करो। वह सुसंस्कृत होता हुआ सोम अपने मधु रस को कलश में पहुँचाता है। सोम का ऋषियों की सत्य वाणियाँ स्तवन करती हैं।
अध्याय (6.9) :: ऋषि :- गौरवीति, शाक्त्य, उर्ध्वसद्मा आङ्गिरस, ऋजिश्वा, भारद्वाज, कृतयशा आंङ्गिरस, ऋणञ्चय, शक्तिर्वासिष्ठ, उरुरांगिरस; देवता :- पवमाना, सोम; छन्द :- ककुप, यवमध्या गायत्री।
हे सोम! अत्यन्त मधुर कर्म वाले, पूज्य और हर्षप्रद तुम इन्द्र को हर्ष प्रदान करने वाले हो। हे सोम ! हम आपकी पूजा करते हैं। आप हमें बहुत-सा अन्न प्रदान करो और अतंरिक्ष स्थित मेघ को वर्षा के लिए खोलो। हे ऋत्विजो ! अश्व के समान वेगवान, स्तुत्य, जलों के प्रेरक, तेज प्रेरक, पात्रों में फैले हुए सोम का अभिषव करते हुए बसतीबरो जलों से सींचित करो। देवों की अभिलाषा वाले ऋत्विजो ने बलप्रदायक हजारों धार वाले, धन धारक सोम का दोहन किया। जो धनों का, गायों का, धरती का और मनुष्य को लाने वाला है, वह सोम ऋषियों द्वारा अभिषुत हुआ है। हे सोम ! तुम अत्यन्त ज्योति सहित देवों को जानते हो। उनके अमृत तत्व के लिए ध्वनि उत्पन्न करते हो। अत्यन्त आनन्ददायक इधर-उधर जाता हुआ अभिषुत अमृत छन्ने से धार बनकर कलश में टपकता है। यह सोम अंतरिक्ष में बादलों के भीतर असुरों के रोके हुए प्रवाहमय जलों की अपनी शक्ति से छिन्ने भिन्न करता है। असुरों द्वारा चुराई गर्नु गौओं और घोड़ों को यह सोम सब ओर से विस्तार करता है। हे सोम! इन राक्षसों को नष्ट करो।
अध्याय (6.10) :: ऋषि :- भरद्वाज, वशिष्ठ, वामदेव, शनु शेष, गृत्समद, अमहीयु, आत्मा; देवता :- इन्द्र, वरुण, पवमान, सोम, विश्वेदेवा, अन्नम्; छन्द :- बृहती, त्रिष्टुप, गायत्री, जगती।
हे व्रज हस्त! श्रेष्ठ ठोड़ी वाले इन्द्र देव! जिस अन्न की हम इच्छा करते हैं उसे द्यावा भूमि पूर्ण करती है। उस अत्यन्त बलप्रद प्रशंनीय और तृप्तिकारक अन्न को हमें दो। जो इन्द्र देव समस्त प्राणधारियों के भगवान् और सब प्रकार के पार्थिव धनों के स्वामी हैं, वह दानशील यजमान को समस्त प्रकार के धनों को प्रदान करते हैं। वही इन्द्रदेव हमारी तरफ सब तरह के धनों को प्रेरित करें। जिन तेजस्वी इन्द्र की छाया स्तोत्र वाली है वह दानशील इन्द्र यजमान से बने स्वर्ग के कामना के योग्य हैं, इसलिए इन्द्र का दान बहुत ही अच्छा और अपरिमित है। हे वरुण देव! सिर पर बंधे पाश को उर्ध्व और पाँवों में बँधे पाश को नीचे की तरफ और मध्यम पाश को पृथक करके ढीला करो। फिर हम तुम्हारे कर्म के कारण कष्ट रहित और अपराध रहित हों। हे सोम ! छन्ने से छनते हुए तुम रणक्षेत्र में भी सहायक हो। मित्र वरुण, अदिति, सिन्धु, पृथ्वी और स्वर्ग हमें धन आदि से पूर्ण करें। मुझे फलवर्षक क्रिया वाला बनाओ। हे सोम ! तुम हमें धनग्रहण कराने वाले हो। हमारे अर्चनीय इन्द्रदेव वरुण और मरुद्गण के लिए धारयुक्त क्षरित हो जाओ। इस सोम के द्वारा सब अन्नों को पाकर हम उचित ढंग से बाँटते हैं। मैं अन्न देवता, अन्य देवों से तथा सत्यस्वरूप ब्रह्म से भी पूर्व जन्मा हूँ। जो मुझ अन्न को मेहमानों को देता है, वही समस्त प्राणधारियों की सुरक्षा करता है। जो कंजूस दूसरों को नहीं खिलाता, मैं अन्नदेव उस कंजूस का अपने आप भक्षण कर लेता हूँ।
अध्याय (6.11) :: ऋषि :- श्रुतकक्ष, पवित्र, मधुच्छन्दा, वैश्वामित्र, प्रथः गृत्समद, नृमेधपुरु मेधो; देवता :- इन्द्र, पवमान, विश्वेदेवा, वायु; छन्द :- गायत्री, जगती, त्रिष्टुप, अनुष्टुप।
हे इन्द्र! काले, लाल तथा विचित्र रंग वाली गायों में चमकते हुए सफेद दूध को तुमने स्थित किया है। यह तुम्हारा ही सामर्थ्य है। उषाकाल और आदित्य से सम्बन्धित सोम अपने आप प्रकाशमान होता है और वर्षाकारक मेघ रूप से शक्ति और अन्न दान की अभिलाषा से ध्वनि करता है। देवों ने अपनी महान बुद्धि से इसे रचित किया है। इन्द्र अपने रथ में योजित हर्यश्वों को एकत्र करने वाले वज्रधारी और स्वर्ण के आभूषणें से सुशोभित रहते हैं। हे इन्द्र देव! तुम अत्यन्त शक्तिशाली होने के कारण किसी का प्रभुत्व नहीं मानते। हमको अपनी महान सुरक्षाओं से हजारों धन लाभवाले द्वन्द्वों में रक्षित करो। वशिष्ठ पुत्र पथ और भारद्वाज पुत्र सप्रथ है मुझे वशिष्ठ ने अनुष्टुप छन्द हवि की और रथन्तर सोम की धाता देवता से और तेजस्वी विष्णु से प्राप्त किया। हे वायों! तुम अपने वाहनों पर सवार होकर प्रस्थान करो। यह सोम तुम्हारे लिए प्राप्त किया है क्योंकि तुम सोमाभिषवभर्ता यजमान के समक्ष जाते हो। अपूर्व और धनयुक्त इन्द्र ! जब वृत्र हनन के लिए प्रकट हुए, तुमने पृथ्वी को दृढ़ किया और स्वर्ग को भी स्थिर किया।
अध्याय (6.12) :: ऋषि :- वामदेवो गौतम, मधुच्छन्दा, गृत्समद, भरद्वाजौ बहिस्पत्य, ऋजिश्वा, हिरण्यस्तप, विश्वामित्र; देवता :- प्रजापति, पवमान, सोम, अग्नि, रात्रि, अपान्नपात, विश्वेदेवा, लिङ्गक्ता, इंद्र, आत्मा वैश्वानर; छन्द :- अनुष्टुप, त्रिष्टुप, गायत्री, जगती, पंक्ति।
परमेष्ठी स्वर्ग के तेज के समान मेरे शरीर में ब्रह्मा तेज की वृद्धि करें और यज्ञ संबंधी हवि को बढ़ाएँ। हे शत्रुनाशक सोम! तुम दुग्ध और हविरन्न ग्रहण हों। तुम अपने अमरत्व के लिए वृद्धि हुए स्वर्ग में हमारे सेवनीय अन्नों को धारण करते हो। हे सोम! तुमने धरती पर स्थित सब औषधियाँ उत्पन की, तुमने वृष्टि जल और गऊ इत्यादि पशुओं को पैदा किया। तुमने आकाश का विस्तार किया और प्रकाश से अंधकार को नष्ट किया। अनुष्ठान के पंडित-संज्ञक होता और रत्नों के धारण करने वाली अग्नि की मैं वंदना करता हूँ। हे अग्ने! तुम्हारी पूजा करने वाले आंगिरसों ने स्तुति साधक शब्दों को वाणी में जाना इक्कीस स्तोता रूप छन्दों को भी जाना। उन स्तुतियों को जानती वर्षा जलधरा में गिरते हैं और भू के जल में मिश्रित हो जाते हैं तब वह नदी रूप होकर समुद्र में दृढ़ बड़वानल को संतुष्ट करते हैं। जलों के पौत्र अग्नि के पास सभी पवित्र जल ग्रहण होते हैं। कल्याणमयी रात पास आ रही है। वह चन्द्रमा की रोशनी के साथ भले प्रकार सम्बन्ध स्थापित करती हुए संसार को सुलाने वाली होती है। हे वैश्वानर तुम्हारा तेज अभिष्टवर्धक हवि रत्न वाला ज्योर्तिमान है। मैं उस तेज की प्रार्थना करता हूँ। उन सर्वज्ञाता अग्नि के लिए प्रार्थना करने वालों को शुद्ध करने वाली मंगलमय वंदना सोम के समान निकल जाती है। देवता मेरे यज्ञ को स्वीकार करें। अपान्न पाँच अग्नि और द्यावा पृथ्वी मेरी प्रार्थना पर ध्यान दें। मैं देवताओं में त्याज्य वचनों को नहीं करता हूँ। श्रेष्ठ स्तोत्र का ही उच्चारण करता हूँ। अत हम तुम्हारे प्रदत्त कल्याण में ही आनन्द पाएँ। हे देव! मुझ वंदना करने वाले को द्यावा धरा की कीर्ति ग्रहण हो। इन्द्र, बृहस्पति और आदित्य संबंधी कीर्ति को भी मैं ग्रहण करूँ। मैं इस कीर्ति से हीन हो जाऊँ। मैं सदैव महानता पूर्वक बोलने वाला बनूँ। मैं इन्द्र के महान पराक्रमों को बताता हूँ। उन्होंने बादलों को भेदकर जल गिराया और पर्वतों से बहने वाली नदियों के तटों को बनाया। मैं अग्नि जन्म से ही सर्वज्ञाता हूँ। घी मेरा नेत्र हैं और अमृत रूप से मेरे मुख में है। मैं जगत का उत्पत्तिकर्ता प्राण हूँ। मैं तीन रूपसे विद्यमान हूँ और अंतरिक्ष का मालिक हूँ। आदित्य भी मैं हूँ। अग्नि में हूँ और हव्यवाहक या देना वाला भी मैं हूँ। जन्म लेते ही ज्ञानी हूँ। अग्नि पृथ्वी के मुख स्थान की रक्षा करते हैं। सूर्य के मार्ग अंतरिक्ष की भी रक्षा करते हैं। मरुद्गण और यज्ञ की भी अग्नि रक्षा करते हैं।
अध्याय (6.13) :: ऋषि :- वामदेव, नारायण; देवता :- अग्नि, पुरुष, द्यावा पृथिवी, इन्द्र, गौ; छन्द :- पंक्ति, अनुष्टुप, त्रिष्टुप।
हे अग्निदेव! आपकी जीभ रूपी ज्वालाएँ हवि भक्षण करती हैं। हे धन प्राप्त कराने वाली अग्नि। तुम हमें अन्न के साथ जरूरत के धन और तेज प्राप्त कराओ। बसन्त ऋतु, ग्रीष्म ऋतु, वर्षा, शरद, हेमन्त और शिशिर समस्त ऋतुएँ रमणीय होती हैं। विराट पुरुष, अनेक सिर, अनेक चक्षु और अनेक पैर वाले हैं। वह पृथ्वी को सब ओर से लपेटकर दशांगुल रूप हृदय में स्थित है। वही विराट पुरुष संसार के गुणदोषों से अलग रहता हुआ एक पाद को निरन्तर प्रकट करता है, फिर वह अनेक रूप से विस्तृत होकर संसार में बस जाता है। वह विश्व पुरुष है। उत्पन्न हुआ और उत्पन्न होने वाले जगत पुरुष ही है। सब प्राणी इस पुरुष का चौथा रूप हैं। इसके तीन रूप अविनाशी और प्रकाश के रूप में स्थित होता है। इस पुरुष की शक्ति ही संसार का आधार स्तम्भ है। यह अपने आप में इस गुणगान से भी श्रेष्ठ है। इससे यह समस्त देवत्व का स्वामी हुआ है क्योंकि वह प्राणधारियों के कर्म फल भोग के लिए कारण अवस्था का अतिक्रमण कर प्रत्यक्ष संसार के रूप में रचित हुआ है। उस आदि पुरुष से विराट की उत्पत्ति हुई। उससे देहाभिमानी देवता रूप जीव उत्पन्न हुआ। वही विराट पुरुष शरीर के रूप में प्रकट हुआ है। फिर पृथ्वी और प्राणियों के शरीर का विकास हुआ है। हे धावा-धरा! तुम पालन करने वाले को मैं जानता हूँ। तुम सब ओर से अपरिमित धन आदि की बढ़ोतरी करो। हमारे लिए कल्याणरूपी होकर हमें पापों से रहित करो। हे इन्द्रदेव! तुम्हारी मूंछें हरे रंग की हैं। आपके अश्वों का भी हरा रंग है। प्रतापी मनुष्य तुम्हारी भली प्रकार से वंदना करते हैं। जो तेज स्वर्ण में निहित है, जो तेज गौओं में सत्य की तरह समाया है, हम उसी तेज से सम्पन्न होने की कामना करते हैं। हे इन्द्र देव! हमें उन शत्रुओं का सर्वनाश करने वाला बल प्रदान करो। क्योंकि तुम श्रेष्ठ शक्ति के स्वामी हो। हमारे लिए सत्य के समान धन और बल प्रदान करते हुए हमारे शत्रुओं को तुम शत्रुरूप वाला होकर वृषभों और गौ के बच्चों सहित प्रातःकाल और सांयकाल में वृद्धि करो। यह विश्व तुम्हारे रहने योग्य हो और जल तुम्हारे पीने योग्य हो।
अध्याय (6.14) :: ऋषि :- शतंवैखनसा, विभ्राट, कुत्स, सार्पराज्ञी, प्रस्कण्व, काण्वा; देवता :- अग्नि, पवमान, सूर्य; छन्द :- गायत्री, जगती, त्रिष्टुप।
हे अग्ने! तुम हमारे अन्नों की वृद्धि करते हो। अतः हमारे लिए भोजन और बल की व्यवस्था करो। पूजा के समय दुष्ट स्वभाव वाले राक्षसों को हमसे दूर रखो। अत्यन्त तेजस्वी सूर्य ने यजमान में रुकावट रहित अन्न की स्थापना की वह सूर्य सोमयुक्त मधुपान करे। सूर्य ही पवन द्वारा प्रेरित होकर अपनी किरणों से जगत को छूते हैं और वृष्टि आदि से प्राणियों को संतुष्ट करते हैं। देवों के तेज, सखा, वरुण, अग्नि, आदि देवों के नेत्ररूपी सूर्य उदायाचंल में पहुँचे। उन्होंने धावाधारा और अंतरिक्ष को पूर्ण किया। वही स्थावर जङ्गम के जीवात्मा है। गमनशील यह सूर्व उदयाचल की परिक्रमा पूरी कर सब प्राणियों की माता पृथ्वी, पिता स्वर्ग और आकाश को प्राप्त होता है। इन सूर्य की ज्योति आयु को ऊपर ले जाकर अधोमुख करती हुई देह में प्राणरूप से वास करती है। ऐसे तेज वाला सूर्य अंतरिक्ष को प्रकाशमान करता है। दिन की तीस घड़ी तक सूर्य रोशनी से भरा होता है। तब देवों की वाणी सूर्य के निमित्त सब मुखों में धारण की जाती है। सभी के प्रकाशक सूर्य के उदय होने पर तारागण रात्रियों के युक्त चोरों के समान अस्त हो जाते हैं। आग की तरह किरणों वाले सूर्य की दिखने वाली रोशनी सब प्राणियों को एक साथ देखती है। हे सूर्य ! तुम अराधकों को तारते हुए समस्त प्राणधारियों को देखते हो। तुम चन्द्रमा आदि दीप्तियों को ज्योति देते हो, अतः हे सूर्य ! तुम जगत को प्रकाशमान करते हुए शोभायमान होते हो। हे सूर्य ! तुम देवताओं के अभिमुख होकर निकलते हो और दर्शन के लिए, हे पवित्र करने वाले सूर्य ! तुम सब प्राणियों को स्वस्थ रखते हो और लोक को उजाला देते हो। हम तुम्हारे उसी प्रकाश की वंदना करते हैं। हे सूर्य ! तुम दिनों को, रात्रियों से नाप तोलते हुए और देहधारियों को प्रकाशमान करते हुए स्वर्ग और अंतरिक्ष को भी विस्तृत करते हो। सूर्य ने शुद्ध करने वाली, रथ को गिरने न देने वाली, सात किरणों को अपने रथ में योजित किया। उन रश्मियों द्वारा ही यज्ञ से प्राप्त होते हैं। है सूर्य! यह सात किरणें तुम्हें वहन करती हैं। तुम रथ पर सवार का ही तेज ही केश के समान होता है।
अध्याय (6.15) :: ऋषि :- कण्व, विश्वामित्र; देवता :- सूर्य, इन्द्र आदि; छन्द :- जगती, त्रिष्टुप।
हे इन्द्र देव! आप सब कुछ जानते हो। इसलिए मार्गदर्शन पर दिशाओं को बताओ। हे सम्पूर्ण शक्तिशाली ! समस्त प्रजाओं में बसने बसाने वाले, हमें उपदेश दो। हे तीनों लोकों के स्वामी! हे चैतन्य! परम् आनन्द को प्रेरित करने वाली किरणों के समान वंदनाओं द्वारा अभिष्ट धन प्रदान करो। हे सामर्थ्यवान दाता और पूज्य ! तुम धन, ज्ञान, शांति, तेज, बल तथा अन्न के लिए हमको समर्थ करो और स्वयं आनन्दमय बनो। हे तीनों लोकों के स्वामी! महान धन के लिए हमें समर्थवान करो। तुम ज्ञान और धन के स्वामी, अर्चनीय और समर्थ हो। सब ऐश्वर्यवानों में सबसे बड़ा दाता वह सूर्य के समान कांतिवान है। हे सर्वज्ञ! ज्ञान और बल लिए मनुष्य उसी की स्तुति करते हैं। वह परमेश्वर ही सर्व समर्थ है। उस सर्व विजयी की सुरक्षा हेतु स्मरण करते हैं। वह द्वेष भावों का विनाशक, ज्ञान कर्म, शक्ति सम्पन्न, सत्य स्वरूप और श्रेष्ठ है। उस अपराजित को ऐश्वर्य के लिए स्मरण करें। वह हमारे शत्रुओं का नाश करने वाला है। हे अखण्ड ज्ञान रूप पूर्व से तुम्हारी रश्मियाँ परमानन्दमय हैं। हे सभी को निवास प्रदान करने वाले! हमें सुख प्रदान करो। तुम्हारा पालनरूप प्रशंसित है। हे समर्थ! तुम सभी को वशीभूत करने वाले हो। हे पूजनीय! मैं आपकी वंदना करता हूँ। हे विघ्नों के नाश करने वाले ! हम तुम्हारा स्तवन करते हैं। हे वीर! तुम हमारी आत्मा के मित्र और सेवा करने के योग्य, अद्वितीय हो। हे इन्द्र देव! तुम इस प्रकार परम्पिता हो। हे अग्ने! तुम ज्योति रूप हो। हे सर्वेश्वर सहित! तुम निश्चय ही ऐश्वर्यवान हो। हे पूषन! तुम पालक हो। हे सर्वदेव ! अद्भुत गुण सम्पन्न पदार्थों! तुम ईश्वरीय गुणों से परिपूर्ण, ऐसे ही हो। हे इन्द्रदेव! सवितादेव शक्तिशाली एवं प्रतापी हैं। हम उनसे वरण करने योग्य अर्चनीय धन की विनती करते हैं, उस धन को वे हविर्दान करने वाले यजमान को अपनी स्वेच्छा से प्रदान करें। क्षितिज तथा समस्त लोकों को धारण करने वाले प्राणधारियों को ज्योति और वृष्टि आदि द्वारा पोषण करने वाली प्रतापी सविता देव स्वर्ण कवच को धारण करते हुए अपने तेज से जगत को भली-भाँति परिपूर्ण करते और हर्षिता के योग्य महान सुख प्रकट करते हैं। वे सविता देव अपने तेज से क्षितिज और धरा को युक्त करते हुए अपने उत्तम कर्मों द्वारा प्रशंसा को ग्रहण करते हैं। वे नित्य प्रति जगत को कार्य की ओर प्रेरित करते तथा सृष्टि के निर्माण कार्य के लिए अपनी भुजा को फैलाते हैं। वे सवितादेव अहिंसा भावना युक्त जगतों को प्रकाशमान करते और वचनों का पालन करते हैं। वे समस्त लोकों में रहने वाले प्राणधारियों की सुरक्षा के लिए अपनी भुजाओं को व्याप्त करते हैं।
अध्याय (7.1) :: ऋषि :- असित, काश्येपा देवलो वा, कश्यपो, मारीच, शर्त-वैखानसा, भारद्वाज, विश्वामित्र, जमदग्नि, इरिम्बिठि, विश्वामित्रो गाथिन, अमीहीयुरांगिरस, सप्तर्ष, उशना काव्य, वशिष्ठ वामदेव, नोद्या, गौतम कलि, प्रगाथ, मधुच्छंदा, गौरवीतिः, अग्निश्चाक्षुष, अंधीगुः, श्यावाश्चि, कविर्भार्गव, शुयुर्वार्हस्पत्य, सौभारि नृमेद्यः; देवता :- पवमान, सोम, अग्नि, मित्रावरुणो इन्द्र, इंद्राग्नि; छन्द :- गायत्री, पादनिवृत्त, प्रगाथ, त्रिष्टुप, काकुभ, प्रगाथ, उष्णिक, अनुष्टप जगती।
हे मनुष्यों! देवों के लिए यज्ञों का आयोजन करो। पात्र में गिरते हुए शुद्ध सोम रस की स्तुति गाओ। हे दिव्य गुण वाले देवताओं! अपने अभिलाषित इस पोषक रस को साधक गौ के दूध के साथ मिलाकर पीते हैं। हे ज्योतिर्मान ईश्वर ! आप हमारे लिए गाय आदि धन, प्रजाजन, अश्वों आदि सेवा, के अंगों व प्रताप धारक पदार्थों और औषधियों से प्रफुल्लित करो। अत्यन्त तेजस्वी कान्ति से ध्वनियुक्त धारा से शुद्ध हुआ सोम गौ-दुग्ध से मिलाया जाता है। साधकों द्वारा प्रयत्न पूर्वक प्राप्त शक्तिशाली सोम हितकारी होकर प्राप्त हुआ है जैसे संघर्ष के लिए शूरवीर युद्ध भूमि में रहते हैं। हे उज्जवल सोम ! तुम उन्नत होते हुए कल्याण हेतु अंतरिक्ष से गिरते हो। हे क्रांतदर्शी सोम! शुद्ध करते समय तुम्हारी कामना करने वालों को सम्पन्न करना ही इच्छार्थी तेरी धाराएँ अश्वों के अस्तबल से निकलने के समान वेगवान होती हैं। मृदु रस टपकाए जाने वाले कलश में उंगलियाँ सोम को बारम्बार पवित्र करती हैं। टपके हुए सोम ग्स कलश में जाते हैं। जैसे दुधारु गौ अपने स्थान पर जाती है वैसे ही यह सोम अनुष्ठान के स्थान को प्राप्त होते हैं। हे अग्नि देव! तुम अजान आदि का रसपान करने तथा ज्ञान की ज्योति फैलाने के लिए अनुष्ठान को ग्रहण होओ। अद्भुत गुणों के प्रदाता तुम मेरे मन मन्दिर में बैठो। हे सुन्दर अग्नि देव! पूर्व में कहे गए गुणों से सम्पन्न तुम्हें समिधा और घृत से प्रकाशित करते हैं। हे तरुण! तुम अधिक प्रकाशवान बनो। हे अग्नि देव! तुम महान एवं समर्थ हो। हमको भी सुनने योग्य सुन्दर ज्ञान प्राप्त कराने वाले बनो। हे मित्र वरुण ! हमारी इन्द्रियों की घर रूपी देह को प्रकाश युक्त ज्ञान रस से सींचो, उत्तम रस से सींचों और उत्तम रस से हमारे पारलौकिक स्थानों को भी सिंचित करो। अत्यन्त शुद्ध कर्म वाले मित्र वरुण! आप विविध हर्षित होने के योग्य हवि रूप अन्न से महती वंदनाओं द्वारा अपने तेज से प्रकाशमान हो। दृढ़ संकल्प वाली अग्नि को अंतः करण में प्रज्जवलित करने वाले ज्ञानियों से पूज्य तुम सत्य स्थान में विराजमान होओ। हे कर्मफल प्रदान करने वाले मित्र वरुण! तुम हमारे द्वारा सिद्ध किए गए इस सोम रस का पान करो। हे इन्द्र देव! मेरे अनुष्ठान को ग्रहण होओ। मैंने सोम को सिद्ध किया है इसे पान करते हुए मन रूपी आसन पर विराजमान होओ। हे इन्द्रदेव! मंत्र रूप अश्व तुम्हें वहन करें और तुम हमारे अनुष्ठान को ग्रहण होकर श्लोकों पर ध्यान आकृष्ट करो। हे इन्द्र ! हम ब्रह्मज्ञान वाले सोम रस को सिद्ध कर तुम सोमपान करने वाले को प्रार्थनाओं द्वारा बुलाते हैं। हे इन्द्रदेव और अग्निदेव ! सिद्ध किए हुए सोम के लिए हमारी वंदनाओं से ग्रहण हो जाओ और हमारे भक्ति भाव से विनतीमय इस सोम रस का पान करो। हे इन्द्रदेव और अग्नि देव ! आप पूजक को मुक्ति प्राप्त कराने में सहायक हो। तुम्हें इन्द्रियों को जागृत रखने वाला यज्ञ साधक सोम प्राप्त होता है। हमारी वंदनाओं से आकर्षित हुए तुम इस शुद्ध सोम का पान करो। इस अनुष्ठान साधक सोम से प्रेरित अभीष्टदाता इन्द्रदेव और अग्नि की अर्चना करता हूँ। वे मेरे सोम यज्ञ से तृप्त हों। हे सोम ! तुम उच्च रसों का उत्पादक, आकाश में स्थित बल युक्त आनन्द स्वरूप बहुत अन्नों से युक्त यजमानों द्वारा ग्रहण किया जाता है। हे ऐश्वर्यदाता सोम! तुम हमारे लिए काम्य हो। तुम इन्द्र, वरुण, मरुद्गण हेतु स्रवित हो। हे सोम! मनुष्यों को प्राप्त इन सर्वज्ञ साधनों को सरलता से प्राप्त करते हुए आपकी सेवा के लिए स्तवन करते हैं। हे पवित्र किए गए सोम! तुम अपनी तरलता से पात्र में जाते हो। तुम समृद्धिदाता, तरल, शुद्ध, स्वर्ण के समान चमकते हुए अनुष्ठान स्थान में स्थित होओ। हर्षदाता, आह्लादक, स्वर्गीय आनन्द रस को टपकाता हुआ सोम हृदय रूप आकाश को प्राप्त होओ। फिर तुम ऋषियों द्वारा धोए हुए कर्मवान यजमानों को प्राप्त कराओ। हे सोम! हमारे यज्ञ में शीघ्र पधारकर द्रोण कलश में विराजमान होताओं द्वारा शोधित हविरूप अन्न को ग्रहण होओ। स्नान से पवित्र हुए अश्व के समान अपनी लम्बी उंगलियों से ऋत्विज तुम्हें पवित्र करते हैं। उत्तम अस्त्र से युक्त असुरों का विनाशक विघ्नों से रक्षा करने वाला बलवान आकाश पृथ्वी धारक, सोम! सिद्ध किया जाता है। मतिवान यज्ञकर्त्ता परमज्ञानी, साधक ऋषि ही इन इन्द्रियों में स्थित जो परमानन्द रूप दुग्ध है उसे प्रयत्नपूर्वक ग्रहण करता है। हे वीरेश्वर इन्द्रदेव! जैसे बिना दुही गाएँ बछड़ों या बछियों की ओर रम्भाती है, वैसे ही हम विश्व के स्वामी तुम सर्वज्ञ को बार-बार प्रणाम करते हैं। हे इन्द्रदेव! तुम्हारे समान अन्य कोई अनोखा संसार या पृथ्वीलोक का स्वामी नहीं है, न कभी हुआ है और न कभी होगा। अश्वगवादि की अभिलाषा वाले हम आपका आह्वान करते हैं। सतत् वृद्धि को प्राप्त इन्द्र, किस तृप्ति कारक पदार्थ अथवा किस प्रयत्न या अनुष्ठान से अब हमारे मित्र हो। आनंदमय पदार्थों में कौन-सा पदार्थ उत्तम है ? इन्द्रदेव को आनन्दमय में रमाने वाला सोमरस शत्रु के ऐश्वर्य को समाप्त करने वाला है। हे इन्द्रदेव! तुम मित्र साधकों की रक्षा करने वाले हमें सैकड़ों को पुकारती हुई गायों के समान हैं। ऋत्विज यजमानों! सूर्य के समान प्रकाशित शत्रुओं को भगाने वाले सोमपात्र से आनन्दित इन्द्र का यशगान करो? सन्तुष्ट पोषक इन्द्र से संतान और समृद्धि, सैकड़ों गाय आदि अन्न धन माँगते हैं। हे इन्द्र ऋषियों ! तुम सोम यज्ञ में वेग वाले अश्वों से युक्त ऐश्वर्य प्रदान करने वाले इन्द्र की रक्षा के लिए उपासना स्वीकार करो। जैसे बालक अपने अभिभावक को पुकारता है, वैसे ही मैं साधक अपने हित करने वाले इन्द्र को बुलाता हूँ। सुन्दर चिबुक और नासिका वाले इन्द्रदेव को द्वन्द्व में दुष्ट ग्रहण नहीं कर सकते। वह इन्द्रदेव सोम के आनन्द हेतु सोम सिद्ध करने वाले साधक को समृद्धि प्रदान करता है, हम उस इन्द्रदेव की वंदना करते हैं। हे सोम ! तुम इन्द्रदेव के लिए सिद्ध किया गया सुस्वादिष्ट आनन्ददायिनी धारा से टपको। रोग व्याधि रूप राक्षसों का शोषणकर्त्ता सोम स्वर्ण कलश में पवित्र किया हुआ रखा है। हे इन्द्रदेव! तुम अत्याधिक ऐश्वर्य एवं विभिन्न पदार्थों को देने वाला है। शत्रुओं से धन प्राप्त कराओ। हे सोम! अत्यन्त मृदुरस प्रदान करने वाले तुम अर्चनीय, उज्जवल और सुखवर्द्धक हो। इन्द्रदेव के लिए इस पात्र में दृढ़ होओ। हे सोम ! अभिष्ट वर्धक इन्द्रदेव तुम्हें पीते हुए बलशाली बन जाते हैं। तुम्हारी शक्ति से वह शत्रुओं के धन को अपने आधीन कर लेते हैं। जैसे अश्व शीघ्रता से युद्ध भूमि को ग्रहण होते हैं। शीघ्रता से निकलकर पात्रों में टपकता हुआ सोम इस अभीष्टवर्धक इन्द्र को प्राप्त होओ। शक्ति के लिए सेवनीय और संस्कारित यह सोम इन्द्रदेव के लिए पात्रों में संगठित हुआ विजयेच्छुक इन्द्रदेव को चेतना प्रदान करता है जैसे वह इन्द्रलोकों को चैतन्य करता है। इस सोम के आनन्द में रमा हुआ इन्द्र धनुष को ग्रहण करता हुआ जलवर्षक अभीष्ट देता है। हे वंदना करने वाले! जिनकी सेवा करने से विजय निश्चित होती है ऐसे सोम के लिए प्रसन्न बना देने वाले सिद्धस्थ रस से कुत्ते और अनके समान लोभियों को भगाओ। सुसंस्कृत, कर्म साधक सोम पाप शोधक, धाराओं से ऐसे प्रवाहित होता है जैसे अश्व के साथ भागता है। हे मनुष्यों ! दोषों को जलाने वाले सोम का सर्वकार्यों को सिद्ध करने वाली वृद्धि से अनुष्ठान के लिए सम्मान करो। हितकर सोम जगत को तृप्त करने वाले मनुष्यों को सिद्ध करने वाला है। यह आकाश में स्थित जल से बढ़ता और सूर्य के रथ पर चढ़ा हुआ सबको देखता है। सत्य रूप अनुष्ठान में प्रमुख प्रवक्ता के समान ध्वनि करने वाला सोम अद्भुत अव्यक्त रूप को प्राप्त करता है। दीपयुक्त सोम संस्कारित हुआ करते हैं। वह यज्ञ को प्रकाशित करते हैं। हे प्रार्थना करने वालो। तुम अनुष्ठान में दीप्तिमान हुए अग्नि की वंदना करो। हम भी उन अविनाशी सर्वज्ञ अग्नि की सखा के रूप समान प्रशंसा करें। अन्न बल से पुत्र अग्नि की प्रार्थना करें। यह अग्नि मनोरथ पूर्ण करने वाली, संग्राम रक्षक, वृद्धि करने वाली हमारी संतानों की रक्षक बने। हे अग्निदेव ! इन अति उत्तम प्रकार से उच्चारित प्रार्थनाओं को सुनो तथा अन्य देवों की वंदनाओं को सुनते हुए भी सोमरस से शक्तिशाली बनो। हे अग्ने ! तुम्हारा मन जिस यजमान के प्रति आकर्षित है, उसके यहाँ उत्तम अन्न बल धारण करते हो। हे अग्ने ! तुम्हारे तेज से नेत्रों की दीप्ति समाप्त न हो। तुम यजमानों के रक्षक हो। अतः उनके द्वारा की हुई सेवाओं को प्राप्त करो। हे अग्ने ! तुमको सोम से तुष्ट करते हुए हम रक्षा के लिए तुम्हें बुलाते हैं, उसी प्रकार जैसे ऐश्वर्य प्रदाता गुण वाले को सब बुलाया करते हैं। हे इन्द्रदेव! हमारी सुरक्षा के लिए हम आपकी शरण में उपस्थित हैं। आप शत्रुओं को पछाड़ने वाले युवा रूप से आकर उत्साह बढ़ाओ। आप सभी के रक्षक हो। हम मित्र रूप से तुम्हारे आराधक हैं। हे स्तुत्य इन्द्रदेव! तुमसे सभी अभिष्ट पदार्थ याचना करते हुए प्राप्त होते हो। उसी प्रकार जैसे अंजलि से जल उछालते हुए व्यक्ति समीप वालों को खेल-खेल में भिगो देते हैं। हे वज्रिन ! हे शूरवीर ! जैसे नदियों के जल से ही समुद्र श्रेष्ठ बनता है, वैसे ही प्रार्थना करने वाले अपने श्लोकों से ही तुम्हें वृद्धि कराते हैं। उस गतिमान इन्द्र के रथ में वचन मात्र से ही अश्व उड़ जाते हैं। इन्द्र के स्थान को द्रुतगति से जाते हुए अश्वों की प्रार्थना करने वाले अपने श्लोकों से उत्साहित करते हैं।
अध्याय (7.2) :: ऋषि :- श्रुतकक्ष, वशिष्ठ, मेधातिथिप्रेमैधौ, इरिम्बिठि कुशीदी काण्व, त्रिशोक, कण्व, विश्वामित्र, मधुच्छन्दा, शनुः शेप नारदः, अवत्सार, मेध्यातिथि असित काश्यपो, देवलो वा अमहीयुरांङ्गिरस, त्रित आपत्य, भरद्वाजादय. सप्तऋषय, श्यावाश्य, अग्निश्चाक्षुष, प्रजापतिर्वेश्वामित्रो, वाच्योवा; देवता :- इन्द्र, अग्नि, उषा अश्विन, पवमान, सोम; छन्द :- प्रगाथ, गायत्री, उष्णिक, बृहति, प्रगाथ, अनुष्टुप।
हे ऋत्विजों! सोमपान करते हुए इन्द्र की अनेक प्रार्थनाएँ करो। वह इन्द्र सब शत्रुओं का हननकत्र्त्ता, शतकर्मा, धनदाता होने से महान है। हे ऋत्विजों! अनुष्ठानों में असंख्यकों द्वारा पुकारे गए श्लोकों द्वारा वंदित असनातन देव का इन्द्रमान से कीर्तिगान करो। स्तोताओं के पशु धन दाता इन्द्र हमें ऐश्वर्यदाता हों। वह महान इन्द्र साक्षात ऐश्वर्य प्रदान करें। हे वंदना करने वाली! सोमपान करने वाले इन्द्रदेव के लिए आनन्दप्रद श्लोकों का विचरण करो। हे साधक! उत्तम दान और सत्य धन देने वाले इन्द्र के लिए सोम को समर्पण करने वाला अन्य व्यक्ति स्तोत्रों का उच्चारण करता है, वैसे ही तू भी हमारे साथ श्लोकों को गा। हे इन्द्र देव! तू हमको अन्न चाहने वाला होते हुए वीर, गवादि धन और स्वर्ण आदि के लिए सिद्धस्थ करो। हे इन्द्र! तुम्हें अपना समझने वाले मित्र प्रयोजनीय विषयों से तुम्हारी वंदना करते हैं। हमारी संतति भी तुम्हारी वंदना करती है। हे व्रजिन! तुम कर्मों के मालिक के लिए नवीन अनुष्ठान में अन्य श्लोकों को नहीं कहता। केवल तुम्हारी ही प्रार्थना करता हूँ। सोम शोधन करते हुए साधक रक्षा चाहते हैं। उसे स्वप्नावस्था से निकालकर जागृत करती है। इसलिए निरालस्य देवगण को शीघ्र प्राप्त कर लेते हैं। सोम रस चाहने वाले इन्द्रदेव के लिए संस्कृत सोम की हमारी वाणियाँ वंदना करें। फिर वंदना करने वाले उस सोम की अर्चना करें। जिस अधिक कांति वाले इन्द्र के लिए सात होता मंत्रों का उच्चारण करते हैं। सोम के सिद्ध होने पर हम उसका आह्वान करते हैं। अद्भुत इन्द्रियाँ, ज्योति और आयुवर्द्धक अनुष्ठान का जिससे विस्तार होता है। उसी अनुष्ठान को हमारी वंदनाएँ वृद्धि करें। हे इन्द्र! तुम्हारे लिए यह सोम वेदी पर बिछे कुशों पर शोधित किया है। तुम उस समय यहाँ आकर रस रूप सोम से जहाँ हवन होता है उसका पान करो।
विख्यात किरणों वाले अर्चनीय इन्द्र देव! तुम्हें आनन्दित करने हेतु यह सोम सिद्ध किया गया है। इसलिए हमारी उत्तम वंदनाओं से यहाँ पधारकर सोमपान करो। सर्वश्रेष्ठ सुख, वृष्टि रक्षक और आसानी से पान करने के योग्य सोम के प्रति इस अनुष्ठान में मन लगाओ। हे इन्द्र देव! महान भुजाओं वाले तुम हमारे अद्भुत धन को दाहिने हाथ से ग्रहण करो। हे इन्द्र! बहुत पराक्रमी देह, ऐश्वर्य वाले मान रक्षक साधक युक्त हम तुम्हें जानते हैं। हे पराक्रमी तुम दानशील को देवता या प्राणी कोई भी देने से रोकने वाला नहीं। उसी प्रकार जैसे वृषभ को घास भक्षण करने से कोई नहीं रोकता। हे इन्द्र! सोम के शुद्ध होने पर तुम्हें उसके पीने के लिए बुलाता हूँ। उससे तुम तृप्ति को प्राप्त हो। हे इन्द्रदेव! पोषण करने की अभिलाषा धूर्त तुम्हें दुःख न दें। व्यंग्य करने वाले ब्रह्मद्वेषियों से तुम अपनी सेवा न कराओ। हे इन्द्र! धन के निमित्त इस यज्ञ में तुम्हें गौदुग्ध युक्त सोमरस भेंटकर आनन्दित करें। तुम मृग द्वारा तालाब के जल पीने के समान उस सोम का पान करो। जिससे तुम्हारा पेट भी भरे। किसी से भय न रखने वाले तुम्हें यह सोम अर्पण है। ऋत्विजों ने तृण आदि दूर करके इसे सिद्ध किया है। यह पत्थरों से कूटकर निचोड़ा हुआ छानकर बल भावना से शोधन किया गया है। हे इन्द्र ! इस शोधित सोम की पुरोडाश के समान गौ दुग्धादि से मिश्रित करके तुम्हारे लिए सुस्वादु बनाया गया है। अतः इसको पान करने हेतु तुम्हें इस अनुष्ठान में पुकारता हूँ। हे इन्द्र ! तुम बलवान हुए क्रम से संस्कारित इस सोम का शीघ्र पान करो। हे इन्द्रदेव! जो सोम तुम्हारे लिए पत्थरों से पवित्र किया जाता है, उसके सिद्धस्थ होने पर अपनी देह को उसके लिए आकर्षित करो। उस सोम से तुम्हें आनंद ग्रहण हो। हे इन्द्र ! यह सोम तुम्हारे दोनों पार्श्वों में भली प्रकार रम जाए। तुम्हारे सिर आदि देह में व्याप्त हुआ। सोम धन के निमित्त तुम्हारी भुजाओं को समर्थ करें। हे प्रार्थना करने वाले मित्रों यहाँ प्रस्थान कर विराजमान हो और इन्द्रदेव के लिए सोम गुणगान द्वारा हर्षित करो। ऋत्विजों! सोम के संस्कार के योग देते हुए शत्रु नाशक इन्द्र को सब मिलकर मनाओ। वह इन्द्रदेव ज्ञान में समर्थ हुआ हमारे में पुरुषार्थ ग्रहण करवाएँ। वह धन प्राप्तिमती बढ़ोतरी में सहायक होता हुआ देय समद्धि के संग प्रकट हो। हम सभी मित्र प्रत्येक संघर्ष में विघ्नप्रहारक इन्द्र को अपनी रक्षा के लिए बुलाते हैं। सनातन स्थान में अनेकों को ग्रहण होने वाले इन्द्रदेव का आह्वान करता हूँ। हमारे पुरखों ने भी तुम्हारा आह्वान किया था। यह इन्द्र हमारी प्राथर्ना को सुनें तो स्वयं ही रक्षा साधनों एवं अन्नादि ऐश्वर्यों सहित हमारे पास आ जाएँ। हे इन्द्रदेव संस्कारित सोम को पीने पर तुम वृद्धि करने वाली शक्ति की प्राप्ति हेतु साधक को पवित्र करते हो। तुम निश्चय ही सर्वश्रेष्ठ हो। वह इन्द्र रक्षक रूप से दिव्यताओं से स्थित हुआ बढ़ाने वाला, कर्म फलदायक विजेता है। उसी का हम आह्वान करते हैं। उसी इन्द्रदेव! का अन्नमय अनुष्ठान में आह्वान करता हूँ। हे इन्द्रदेव! तुम आनंद की अभिलाषा से हमारे निकट पधारकर बढ़ोतरी करके सखा के समान हो। हे ऋषिगण! तुम्हारे लिए इन प्रार्थनाओं से बल के पुत्र, चैतन्य, श्रेष्ठ यज्ञ कर्मों में संयुक्त दूत रूप अग्नि का आह्वान करता हूँ। यह संसार पालक, उत्तम अन्न वाला, अनुष्ठान योग्य श्रेष्ठतम कर्मा अग्नि देवों का आह्वान कराने वाला शीघ्र विचरण करें। साधना करने वालों की हवियाँ अग्नि को ग्रहण हों। सूर्य की उषा को आकर अंधकार मिटाते सबने देखा। वह अपने दर्शन से ही रात के अँधेरे को दूर कर देती है। प्राणियों को उत्तम प्रेरक उषा प्रकाश देने वाली है। सभी का प्रेरक, सूर्य रश्मियों को एक साथ आविभूर्त करता है। हे उषे! तेरे और सूर्य की ज्योति को ग्रहण कर हम अन्न से सम्पन्न हों। हे अश्विनी कुमारों! सूर्य के प्रकाश की इच्छुक यह प्रजाएँ तुम्हें बुलाती हैं। यह साधक भी रक्षा के निमित्त तुम्हारा आह्वान करता है। तुम सब स्तोताओं के निकट जाते रहे हो। हे अश्विनी कुमारों! तुम दिव्य धन-धारक हो। उस धन को साधकों के लिए प्रदान करो। उस कार्य को करते हुए सोम के मृदु रस का पान करो। सोम के सनातन रूपों का ध्यान कर सहस्त्रों मनोरथों को पूर्ण करने वाले पेय रस को ज्ञानी मनुष्य निचोड़ते हैं। यह सोम के समान सब कर्मों को देखता रहता है। यह तीस अहोरात्रों को प्राप्त आकाशस्थ सात प्रवाहों में व्याप्त होता है। पवित्र किया जाता हुआ सोम सूर्य के समान सभी भुवनों के ऊपर विद्यमान होता है। यह दिव्य सोम सनातन रीति से संस्कारित किया हुआ देवों के लिए प्रयुक्त हुआ दमकता है। पूर्ववत श्लोकों द्वारा साधित यह सोम अद्भुत गुणवाला आकाशीय बल सहित हुआ साधना करने वाला साधक द्वारा गुणों में वृद्धि करता है। पूर्ववत ही पात्रों को सोमरस से पूर्ण करता हुआ शब्दमान सोम इन्द्रादि को अपने निकट बुलाता है। हे सोम! हमारे अभिष्ट पदार्थों को हमारे सम्मुख लाओ। हमारे शत्रुओं को भयग्रस्त करो। शत्रुओं के धन को हमें ग्रहण कराओ। उत्तम प्रकार से उत्पन्न गौ दुग्ध आदि से संस्कारित सोम इन्दादि देवों को प्राप्त करता है। हे मनुष्यों! इन्द्रादि देवों की आराधना के इच्छुक यजमान के लिए इस शुद्ध किए जाते हुए सोम के गुणों का वर्णन करो। बुद्धि को प्राप्त मेधावी सोम बल को प्राप्त होते हैं। जैसे बड़े मृग धरि वन को प्राप्त होते हैं। धूलि ज्योर्तिमान सोम अमृत रूप धार से पात्रों में गिरता है। हे सोम! तुम इन्द्र, वायु, वरुण, विष्णु और मरुतों के लिए संस्कारित है। हे सोम! तुम देवताओं के पीने को, सिन्धु के जल के पूर्ण होने के समान पूर्ण होता है। तुम जागृत तत्वों से परिपूर्ण हुआ लता के अंशों से मृदुरस प्रवाहित करता कलश में जाओ। चाहने योग्य शिशु के समान श्वेत वर्ण का सोम दिखाई पड़ने पर सिद्ध किया जाता है। आनन्द प्रवाहित करने वाले सोम के पवित्र होने पर हमारे अन्न और यश के लिए अनुष्ठान में ग्रहण होता है। यह सोम हंस के समूह में गति से प्रवेश करने के समान सब साधनों की बुद्धि को नियंत्रित करता है। यह सोम गौ के घृत से युक्त किया जाता है। इस सोम को इन्द्र के पान करने योग्य होने को साधक की उंगलियाँ प्रेरित करती हैं। हे सोम ! दिव्य कामनाओं वाले तुम इस धार से टपकते हुए शब्दपूर्वक छानने के लिए प्रवृत्त होओ। तुम्हारी धाराएँ तरंगित करने वाली हो जाती हैं। अभिलाषा करने योग्य साधकों की संतान, कीर्ति प्राप्त हेतु गति से छनता हुआ निकलता है। शुद्ध किए जाते हुए सोम के शब्द को कर्मों में बाधा देने वाला न सुने। हे उपासकों! कर्म रहित लालची कुत्ते को यक्ष के पास न फटकने दो।
अध्याय (7.3) :: ऋषि :- जमदग्नि, हीयु कश्यप, भृगुर्वारुणिजमदग्नि-मेधातिथि काण्व, मधुच्छन्दा, वैश्वामित्र, वशिष्ठ, उपमन्युर्वाशष्ठ, शंयुबार्हस्पत्य, प्रस्कण्व, काण्व, नृमेद्य, नहुषोमानव, सिकतानिवावरी, पश्नियोऽना, श्रुतकक्ष, सुकक्षो वा आंगिरस जेता-माधुच्छन्दसा; देवता :- पवमान, सोम, अग्नि, मित्रावरुण, इन्द्र, इंद्राग्नि; छन्द :- गायत्री, त्रिष्टुप, बृहत्य, अनुष्टुप, जगती।
हे सोम! विभिन्न रक्षा साधनों सहित हमारी वंदना को सुनता हुआ उनके शब्दों पर ध्यान दो। हे सर्वद्रष्टा सोम ! तुम ध्वनि में प्रेरणा रचित करते हुए मन आनन्द रस से मिलो। हे सोम! तुम्हारी महिमा के निमित्त यह भवन स्थित है। देवताओं को तृप्त करने वाली गौएँ तुम्हारे लिए ही उपस्थित हैं। हे सोम! सिद्ध किए हुए तुम अभिष्टवर्षक हो। तुम शुद्ध होकर हमें यशस्वी बनाओ। समस्त शत्रुओं का पतन करो। हे सोम! तुम्हारे इस यज्ञ में मित्रभाव की प्राप्ति के लिए हम साधक एकत्र हुए हैं। जो युद्ध करना चाहते हैं हम उनको भगाएँ। हे सोम! अपने शत्रुनाशक अस्त्रों से शत्रु की निन्दा करते हुए हमारी सुरक्षा करो। हे सोम ! तुम अभीष्टवर्षक और तेजस्वी हो। हे सोम के स्वामी! तुम मनोकामनाओं को पूर्ण करते हुए मनुष्यों के भले के लिए कार्य करते हो। हे अभीष्टवर्षक सोम! तुम्हारी शक्ति और सुख वृष्टि सामर्थ्य से परिपूर्ण हैं। तुम सिद्धहस्त हुए सुखों की वर्षा करो। हे अश्व समान शब्द करता हुआ, पशुधन और ऐश्वर्य को देने वाला है। हे सोम ! तुम सचमुच ही अभीष्ट फलों के वर्षक हो। अतः हम समस्त देवों के दर्शन श्रवण के योग्य तेज से तेजस्वी हुए तुम्हें अनुष्ठानों में पुकारते हैं। हे ऋत्विजों के द्वारा सिद्ध किए जाते हुए सोम ! जब तुम्हें जलों से सींचते हैं तब तुम हृदय कलश में विद्यमान होते हो। हे उत्तम अस्त्र वाले सोम! तुम देवों को सुख प्रदान करते हुए हमें भी वीर पुत्र पौत्रों से परिपूर्ण कर हमारे इस अनुष्ठान में पधारकर शोभायमान करो। हे सोम! हम साधक तुम्हारे टपकते हुए मित्र भाव के लिए प्रार्थना करते हैं। हे सोम! तुम्हारी ये लहरें बहकर छानने के वस्त्र में उठती हैं, उनसे हमें आनन्दमय करो। हे सोम! विश्व का अधीश्वर होते हुए सिद्ध होकर तुम हमें अन्न, धन और वीरतायुक्त संतति प्रदान करो।
देवताओं की वंदना करने वाले सर्व समृद्धिवान इस अनुष्ठान के कारण भूत उत्तम कर्मा हविवाहक अग्नि की आराधना करते हैं। प्रजा रक्षक, हवि को देवताओं को प्राप्त कराने वाले, प्रिय विभिन्न रूप वाले अग्नि का साधकगण हमेशा आह्वान
करते हैं। हे अग्ने ! अरणियों से प्रकट तुम कुश पर विराजित यजमान पर कृपा दृष्टि करो। इस अनुष्ठान में हवि लेने वाले देवों को पुकारो। तुम हमारे लिए अर्चना के योग्य हो। हम स्तोता सोमपान करने को यज्ञ स्थान में प्रकट होने वाले मित्र और वरुण देव को बुलाते हैं। साधक पर कृपा दृष्टि करने वाले सत्य संकल्प से ग्रहण कर्मफल की वृद्धि करने वाली ज्योति के पोषणकर्त्ता उन सखा और वरुण को पुकारता हूँ। वरुण और मित्र सब रक्षा साधनों से युक्त हुए हमारे रक्षक हों। वे दोनों बहुत सा ऐश्वर्य दें। गान के योग्य बृहत साम से गायकों ने इन्द्रदेव का पूजन किया। होताओं ने मंत्र उच्चारण के द्वारा तथा अध्वर्युओं ने वाणियों से इन्द्रदेव को मनाया।
वज्र और सुवर्ण कांति से सुशोभित इन्द्र के वचन मात्र से कर्म रूपी अश्व ज्ञानेन्द्रिय से मिल जाते हैं। हे इन्द्रदेव! प्रबल तेजस्वी रक्षा साधनों से परिपूर्ण हुआ तू युद्धों में हमारा रक्षक हो। यह इन्द्र दर्शन के निमित्त सूर्य को उसके मंडल में प्रतिष्ठित करता है। उस सूर्य की रश्मियाँ मेघ को प्रेरित करती हैं। सुरक्षा हेतु तत्पर इन्द्रदेव अग्नि की वृद्धि करने वाला हवि और सुन्दर वन्दना को प्रेरित कर कर्मशील वाणियों से पूजन करते हैं। उन इन्द्र और अग्नि की रक्षा प्राप्त करने को ज्ञानीजन स्तुति करते हैं और क्लेशों में फँसे हुए पुरुष अन्न के लिए उन्हें मनाते हैं। धन की अभिलाषा से वंदना करना चाहते हुए हम अनुष्ठान के लिए हे इन्द्रदेव और अग्निदेव ! उन वंदनाओं द्वारा तुम्हें बुलाते हैं। हे सोम! तुम साधकों को अभिष्ट फल प्रदान करते हुए द्रोण कलश में धारा के रूप में प्रवेश करो। फिर सर्व समृद्धिदाता जिस इन्द्रदेव के मरुत मित्र हैं, उनको हम तुम्हें अर्पण करें तो आनन्द देने वाले बनो। हे सिद्ध हुए सोम! आकाश-पृथ्वी के धारक, सर्वदशकबली तुम्हें प्रेरित करता है। अन्न आदि ऐश्वर्य प्रदान करो।
हे सोम! मेरी उँगलियों के द्वारा संस्कारित तुम हरे रंग की धार से कलश में जाता हुआ सखा रूप इन्द्रदेव को युद्धों में आनन्द प्रदान करें। गौओं को देखकर शब्द करने वाले बैल के समान प्रार्थनाओं से लक्ष्य प्राप्त होता है। सुस्वादु गौ दुग्धादि से मिलकर मृदु हुआ सोम रस भाव को ग्रहण होता है। यह जलों से सिंचित, पवित्र, धार रूप में इन्द्रदेव के लिए स्वीकार्य है। हे हर्ष युक्त सोम ! टपकता हुआ, मेघ को वर्षा के लिए प्रेरित करता हुआ कलश में जा और श्वेत वर्ण धारण करता हुआ गौ दुग्ध की इच्छा करें। हे इन्द्र देव! हम प्रार्थना करने वाले अन्न प्राप्ति के लिए वंदनाओं द्वारा आपका आह्वान करते हैं। अन्य प्राणी भी आपको सुरक्षा हेतु पुकारते हुए संघर्ष उपस्थित होने पर ही बुलाते हैं। हे वज्रिन! शत्रुओं को प्रताड़ना देने वाले हम स्तवन करते हुए ऐश्वर्य माँगते हैं। पशु इत्यादि धनों से समृद्धिवान इन्द्रदेव, हम वंदना करने वालों को हजारों धन प्रदान करते हैं। उस इन्द्रदेव को जैसे तुमसे बने, वैसे उसका उत्तम प्रकार से पूजन करो। जिस प्रकार शक्तिशाली व्यक्ति शत्रु सेना पर हमला करता है उसी प्रकार इन्द्र यजमान को नष्ट करने वाले पर हमला करता हुआ उन्हें मारते हैं। परम् ऐश्वर्यशाली इन इन्द्र के लिए धन यजमानों के पास स्थाई रहते हैं। हे वज्रिन! आपको हवि प्रदान करने वाले यजमान सोमपान करते हैं। आप मेरे श्लोक को इस अनुष्ठान में सुनों। सुन्दरचिबुक वाले ! स्तुत्य इन्द्रदेव! आपकी सेवा करने वाले उपस्थित हैं। आप सोम रस से तृप्त हो जाओ। सोमों के शुद्ध होने पर अन्न प्राप्त हों। हे सोम ! देवों को काम्य और राक्षसों का पतन करने वाले तुम्हारा हर्ष कारक रस है उसके युक्त पात्र में प्रविष्ट होओ। हे सोम ! तुम शत्रुनाशक होते हुए संग्रामसेवी हो, अधिक दुग्ध की गौ अश्व आदि के प्रदाता हो। हे सोम ! तुम सुन्दर गौओं के दूध से मिश्रित, बाज के समान शीघ्रतम ही अपने कलश को ग्रहण होकर उज्जवल होते हो। सब पोषक, आराध्य, धनकारण, सोम शुद्ध हुआ, पात्र में स्थित हुआ, प्राणियों का पालक और आकाश पृथ्वी को अपने तेज से प्रकाशित करता है। परम प्रिय उत्कृष्ट स्पर्धा करती हुई वाणियों से प्रशंसित प्रसिद्ध पवित्र सोम रस टपकता रहता है। हे सोम ! इस शक्तिमान रस को दुग्ध आदि से मिलाने के लिए हमें दो जो रस चारों वर्णों को प्राप्य है। उससे हम धन माँगते हैं प्रार्थना करने वालों को अभिष्ट दाता, दिवस, उषाकाल, क्षितिज, जल अग्नि की वृद्धि और चेतना देने वाला प्रशंसित सोम इन्द्रदेव के मन में प्रविष्ट होने की अभिलाषा सें कलशों में स्थित रहता है। सनातन मेधावी सोम पवित्र होकर कलशों में जाने के लिए सब ओर प्रवाहित होता है। वह त्रैलोक्य व्याप्त जलों को उत्पन्न करता है और मित्र भाव की वृद्धि करता है। वह सुनता है। वर्षा कारक होने से संसार का कर्त्ता सोम पवित्र होता हुआ ऊपर को प्रकाशमान करता है और जलों से समृद्ध होता है। यह सोम मनस्थ होने को व्याकुल हुआ इन्द्रियों को दुहता हुआ मग्न करता है।
हे इन्द्र देव! संघर्ष काल में शत्रुओं को नष्ट करने की इच्छा वाला होता है। क्योंकि तुम वीर और धीर हो। अतः स्तुतियों से प्रसन्न करने योग्य हो। हे ऐश्वर्यवान इन्द्र देव! आप सब देवताओं को प्रसन्नता प्रदान करने वाले हो। इसलिए हम साधकों को भी अन्न, धन आदि देकर कर्मवान बनाइए। हे अन्न शक्ति के स्वामी इन्द्रदेव ! कर्म रहित प्रमादी ब्राह्मण की तरह आप मत बनो। इस शुद्ध गाय के दूध भवित अमृत के पात्र को पाकर सुखी होओ। हमारी सभी स्तुतियों में समुद्र के रूप समान विस्तृत, महान रथी, अन्नों के अधीश्वर, सत्यपथगामियों के रक्षक इन्द्रदेव की पुष्टि की। हे बल रक्षक इन्द्र ! आपके सत्यभाव में मग्न हम अन्न युक्त हों और शत्रुओं से भय न मानें। शुद्ध विजेता, अपराजित तुम्हें अभय प्राप्त करने के लिए मनाते हैं। इन्द्रदेव तो अनादिकाल से धन दान करते आए हैं। इसलिए यह यजमान भी ऋत्विजों को गौ अन्न धन दक्षिणा में देते हैं। तब इन्द्रदेव का रक्षक बल अनेक धन देकर भी कम नहीं होता।
अध्याय (7.4) :: ऋषि :- जमदग्नि, भृगुर्वारुणि जमदग्निर्भार्गवोवा, कवि- र्भार्गव, कश्यप मेधातिथि, काण्व, मधुच्छन्दा, वैश्वामित्र, भरद्वाज वार्हस्प्त्य, पराशर, पुरुहन्मा, मेध्यातिथि, काण्व, वशिष्ठ, त्रित, ययातिर्नाहुष, पवित्र, सौभरि काण्व, गौषूक्त्यश्व-सूक्तिर्नो काण्वायनो, तिरश्ची; देवता :- पवमान, सोम, अग्नि, मित्रावरुणोः, मरुत, इन्द्रश्च, इन्द्राग्नी, इन्द्र; छन्द :- गायत्री, प्रगाथ, त्रिष्टुप, वृहती, अनुष्टुप, जगती, काकुभ, प्रगाथ, उष्णिक।
छन्ने की ओर से वेग से जाता हुआ यह सोम सौभाग्यों के लिए ऋषियों द्वारा सुसिद्ध होता है। अन्न शक्ति का दाता सोम असंख्य दोषों को दूर करता हुआ हमारी संतानों और पशुओं को सुख प्रदान करता है। हमारी गायों के और हमारे लिए दृढ़ अन्न धन प्रदाता हुए सोम हमारी सुन्दर प्रार्थनाओं को सुनते हैं। मनुष्यों के यज्ञ कर्मों में तरल सोम वंदनाओं के संग ही ऊपर से कलश में गिरते हैं। हे सोम! आकाश में स्थित धनों को हमारे लिए धारण करते हुए तुमको कल्याण रूप में अति उत्तम कर्मों द्वारा चाहते हैं। उग्र व्याधिओं के नाशक प्रशंसनीय गुणों को प्रदान करने वाला, प्रसन्नता देने वाला, असंख्यों की उन्नति करने वाला सोम हमको हर्षित करें। हे श्रेष्ठकर्मी सोम! ऐश्वर्य को प्राप्त होने वाले तुम्हें आकाश तत्वों से बाधा रहित बनाकर पत्ते पर प्राप्त करते हैं। कर्म द्रष्टा, अभिष्टदायक सोम फल को प्रेरित करता हुआ श्रेष्ठगुण वाला होता है। जल प्रेरक यज्ञ रक्षक सब देवगण के लिए समान रूप से होने वाले सोम उत्तम पत्तों से प्राप्त हुए हो। ऋत्विजों द्वारा शोधित सोम! तुम हमारे लिए धार सहित हुआ पात्र में गिरता तथा पशुओं को भी ग्रहण हो। वाणी द्वारा स्तुत्य हरितवर्ण वाले सोम! दूध में डालकर शुद्ध किया जाता हुआ तू साधकों को अन्न धन प्राप्त कराने वाला बन। हे सोम! हवि धारक यजमानों से दीप्त अनुष्ठान के लिए पवित्र हुआ हितकारक आप इन्द्र देव के स्थान को ग्रहण करो। मेधावी ग्रहस्थ का रक्षक युवा हविवाहक अग्नि आह्वानीय अग्नि से मिलकर उत्तम प्रकार से प्रज्वलित होता है। हे अग्ने ! जो हविदाता देवों को हवि ग्रहण कराने वाले तुम्हारी आराधना करता है, तुम उसके अवश्य ही रक्षक हो। हे अग्ने ! जो देव यजन करने वाला हवियुक्त यजमान तुम्हारे पास आकर उत्तम कर्म करता है, उसे सुखी बनाओ। शक्ति वाले मित्र और हिंसकों के भक्षक वरुण का इस अनुष्ठान में हवि देने हेतु आह्वान करता हूँ। वे दोनों धरा पर जल पहुँचाने वाले कार्यों में सिद्धि प्राप्त हैं। हे सखा और मित्र वरुण! तुम सत्य और यज्ञ को पुष्ट करते हो। इस सांगोपांग सोम याग को तुम समय से पूर्ण करते हो। प्रतापी उपकार के लिए रचित यजमान के यहाँ स्थित सखा और वरुण हमारे कर्म और शक्ति को स्थिर करने वाले हैं। सदा प्रसन्न तेजस्वी मरुद्गण निडर इन्द्र के साथ सबको दर्शन दें। वर्षा ऋतु के पश्चात् होने वाले अन्न जल के लिए यज्ञ धारण मरुद्गण मेघों को पुनः प्रेरित करते हैं। हे इन्द्र अग्ने ! तुमने स्थिर स्थान को भेदने वाले वाहक मरुदगणों के संग गुफा में गौओं को ग्रहण किया। उन इन्द्र देव और अग्नि को पुकारता हूँ, जिनका पूर्व समय में किया हुआ पराक्रम ऋषियों द्वारा स्तुत्य है। वे दोनों साधकों के हिंसक नहीं है। इस कारण हमारी रक्षा करें। महाशक्तिशाली शत्रु नाशक इन्द्र देव और अग्नि को हम पुकारते हैं। वे हमें इस युद्ध में निरीक्षण करें। हे इन्द्र और अग्ने! तुम कर्म करने वालों के संकट को समाप्त करते हो। सत्य बोलने वालों की रक्षा करते हो। तुम कर्म न करने वाले उपद्रवों को शत्रुओं सहित नष्ट करते हो। गतिमान हृदय वाले, हर्ष प्रदान करने वाले, तरल सोम कलश के ऊपर छन्ने पर गिरकर रस निकालते हैं। शुद्ध होता हुआ अलौकिक सत्य रूप सोम की धारा बनकर कलश में जाता है और प्रेरित होता है। वह मित्र और वरुण के लिए निकलता है। ऋत्विजों द्वारा शुद्ध अभिलाषा करने योग्य, विशेष इष्ट अद्भुत अतंरिक्षस्थ सोम इन्द्रदेव के लिए पवित्र किया जाता है। यजमान सोम रूप तीन वाणियों को बोलता हुआ यज्ञ ग्रहण किए हुए सोम का भला करने वाली वाणी बोलता है। गाय, बछड़े को प्राप्त होने के स्थान पर सोम को दूध से बनाने के लिए प्राप्त होती है। तब अभिष्ट वाणी को साधक स्तवन करते हैं। संतुष्टिकारक धेनु सोम की अभिलाषा करती है। वंदना करने वाले सोम की प्रार्थना करते हैं। संस्कारित सोम ऋत्विज शुद्ध करते हैं। हमारे द्वारा बोले गए मंत्र की वृद्धि करते हैं। हे सोम! पात्रों में सींचे जाने वाले तुम हमारे कल्याण को हर्ष के रूप से इन्द्र के हृदय में पहुँचाओ। हे इन्द्र देव! क्षितिज धरा भी तुम्हारी बराबरी नहीं कर सकते। हे वज्रिन ! सहस्त्रों सूर्य भी तुम्हारी ज्योति से बराबरी नहीं कर सकते। हे अभीष्ट पूरक इन्द्र ! तुम अपनी शक्ति से हमें पूरा करते हो, वज्र को धारण करने वाले हमारा पालन करो। हे इन्द्रदेव! जल के समान नम्र बने हुए आपको स्वीकृत करते हैं। हे व्यापक इन्द्रदेव ! सिद्ध हस्त सोम की प्राप्ति पर वंदना करने वाले तुम्हारी प्रार्थना उच्चारित करते हैं। सोम के लिए तृषित हुआ सुवर्ण धन और गाय आदि को हम तुमसे माँगते हैं। शीघ्रकर्मा मतिवान पुरुष कर्मों द्वारा अन्न स्वीकार करता है। असंख्यों द्वारा स्तुत्य इन्द्र देव को में उपयुक्त करता हूँ। धन देने वालों को बुरे शब्द नहीं बोले जाते। हमें उनकी प्रशंसा करनी चाहिए। वरना धन प्राप्त नहीं होता है। हे धनिक इन्द्र ! सोम संस्कार के समय देव धन की सुन्दर वंदना गाने वाले ही तुम्हें प्राप्त करते हैं।
अध्याय (7.5) :: ऋषि :- आंगिरस, विश्वामित्र, कण्वादि; देवता :- इन्द्राग्नि, सोम; छन्द :- जगती, अनुष्टुप, बृहती, गायत्री।
ऋषियों के द्वारा तीन वेद वाणियों को बोला जाता है। दूध देने वाली गाय रंभाती है। हरे रंग का सोम शब्द करता हुआ कलशों में प्रवेश करता है। यज्ञों का निर्माण करने वाली वंदना आकाश से शिशुरूप से सोम को पवित्र करती हुई लाती है। हे सोम ! धन वाले चारों पदार्थों को हमारे लिए दो तथा अनेक अभिष्टों को सिद्ध करो। अत्यन्त मधुर, हर्ष परिपूर्ण, संस्कारित सोम इन्द्रदेव के लिए ग्रहण होते हैं। हे सोम ! तुम्हारे रस इन्द्रादि को ग्रहण हों। इन्द्र देव के लिए सोम कलशों में गिरता है। वंदनाकारी कहते हैं कि प्रार्थना पालक, बलिष्ठ, विश्वेश्वर सोम प्रार्थनाओं से अर्चन किया जाता है। वंदना प्रेरक धनेश, इन्द्र का सखा रूप हजारों धार वाला सोम कलश में जाता है। हे मंत्रेष! तेरा शोधित अंग विशाल है। तू देह को ग्रहण होता है। व्रतों से न तपा हुआ शरीर विस्तृत नहीं होता। परिपक्व होने पर ही वह तुम्हारा स्वाद लेता है। शत्रु-तापक सोम का पवित्र अंग उच्चता को प्राप्त होता है। दूसरी ज्योति असंख्यों प्रकार से स्थित होती है। इसका शीघ्र प्रभाव कारक रस यजमान का रक्षक होता है। उषा काल वाला सूर्य प्रकाश से भरा हुआ होता है। बल से पूर्ण बादल सब लोकों में वर्षा करता हुआ अन्न को चाहता है। रचने वाले इस सोम शक्ति से संसार का निर्माण करता हुआ मनुष्यों का द्रष्टा पालक पितरों द्वारा गर्भ में धारण करता है। हे स्तोताओं! तुम परमदान देने वाले, यज्ञ करने वाले, महान तेज रखने वाले, अग्नि की प्रार्थना करो। धन, अन्न वाले यश को प्राप्त करने वाले प्रदीप्त अग्नि-पुत्र रखने वाले अन्न को यजन कर्त्ता को देता है। इस अग्नि द्वारा हम सुमति को प्राप्त करें। हे वज्रिन तुम्हारे अभीष्टपूरक, शत्रु नाशक, संसार के रचियता रूप और होम पीने से रचित आह्लाद की सभी प्रशंसा करते हैं। हे इन्द! जिस बल से तुमने उम्र वाले वैवस्वत मनु के लिए सूर्यादि के तत्वों को प्रकाशमान किया है। उसी बल से प्रशंसित हुए तुम शोभायमान होते हो। हे इन्द्र! तुम्हारे विख्यात पराक्रम की मंत्र ज्ञाता ऋषि प्रशंसा करते हैं। तुम जलों के प्रति बादलों को अपने आधीन रखने वाले हो। तुमको हवि देकर वंदना करने वाले ऋषि के आह्वान को सुनो और हे इन्द्र! हमको उत्तम पुत्र तथा गाय आदि पशु युक्त धन देकर पूरा करो क्योंकि आप महान हो। जो बार-बार अत्यन्त नूतन वंदना को तुम्हारे लिए बनाते हैं। उस पूजा को स्तवन सत्य से बढ़ाने को प्राप्त हुई वृद्धि दो। हम पूर्वोक्त इन्द्र का ही स्तवन करते हैं। जिस इन्द्र की वृद्धि का कारण हमारी वंदना है उसके अनेक पराक्रमों की वंदना करते हुए हम आपकी पूजा करते हैं। तीनों आकाश और पृथ्वी को तथा अग्नि, वायु और आदित्य को व्याप्त करते हैं। तीनों व्रत ही अपने हमारी अपनी कृपापूर्वक रक्षा करें। जो कर्मों का निर्राधरण करते हैं जो महान ऐश्वर्य को अपने पास रखते हैं, जो सभी जानना चाहते हैं तथा सब प्राणियों को अपने वश में रखने वाले हो, वे सविता देव हमारे सभी तरह के कष्टों को दूर करें और तीनों लोकों में रहते हुए भी अपार सुख प्रदान करने वाले हो। वे प्रकाशवान सविता देव ऋतुओं द्वारा विश्व का पालन करते हैं। वे हमारे वैभव को बढ़ाएँ। हमें सन्तान का सुख प्रदान करें। हर समय हम पर कृपा दृष्टि रखें। वे हमें पुत्र और पौत्रों से युक्त ऐश्वर्य प्रदान करें।
अध्याय (8.1) :: ऋषि :- अकृष्टा, भाषा अमहीयु, मेध्यातिथि, बृहन्मति, भृगुवारुणि-जमदग्नि भार्गवो वा, सुतंभर, आत्रेय, गृत्सभदौ, गौतमौ, राहुगण, वशिष्ठ, दृढच्युत आगस्त्य, सप्तर्षय, रेभ, काश्यप, पुरुहन्मा, असित, काश्यपो, देवलो वा, शक्ति उरु, अग्निश्चाक्षुष प्रतर्दनो, देवोदासि, प्रयोगो, भार्गव, अग्निर्वा, पावको बार्हस्पत्य, ग्रहपतिपविष्ठौ सहस सुतोतयोर्वान्यतर, भृगु; देवता :- पवमान, सोम, अग्नि, मित्रावरुणौ, इन्द्र, इन्द्राग्नि; छन्द :- जगती, गायत्री, प्रगाथ, अनुष्टुप, बृहती, काकुम, प्रगाथ, उष्णिक, त्रिष्टुप।
हे सोम! तुम्हारी तृप्त करने वाली धाराएँ दूध से मिलकर कलश को प्राप्त होती हैं। ऋषियों द्वारा सेवा होने पर तुम्हें जो ऋषि शुद्ध करते हैं वह तुम्हारी धाराओं को ऊपर से पात्रों में डालते हैं। संस्कारित सोम की किरण चारों ओर फैलती है। जब वह पवित्र किया जाता है तभी पात्रों में भरा जाता है। हे सर्वद्रष्टा सोम ! तुम्हारी बलवान किरणें सब देवताओं को प्रकाश से भर देती है। हे व्यापक स्वभाव वाले ! तुम रस निकलने पर पवित्र होते हो। पवित्र हुआ सोम वैश्वानर दीप्ती को क्षितिज के समान प्रकट करने वाला है। हे उज्जवल तरल रूप सोम ! तेरा रस दुष्टों के लिए वर्जित है। वह शुद्ध हुआ पात्रों को पूरा करता है। हे सोम ! पवित्र किए जाने पर तुम शक्ति प्रद उज्जवल रस से परिपूर्ण हो और विस्तृत तेज को देखने की शक्ति प्रदान करने वाले हो। जलों के समान वेगवान, उज्जवल, तेजगति, काले धब्बे वाली त्वचा को हटाते समय जो सोम पात्रों में स्थित हुए उनका हम पूजन करते हैं। सुन्दर रूप से ग्रहण हुए सोम को असुरों के बंधन से बचने हेतु ग्रहण होते हैं। हम कर्म युक्त दुष्टों के दमन में समर्थ बनें। वर्षा के शब्द के समान संस्कृत सोम का शब्द रस गिरने के समय सुनाई देता है। उस शक्तिशाली सोम का प्रकाश आकाश में चारों तरफ घूमता है। हे पात्र स्थित सोम ! तुम गौएँ, अश्वों, संतान और स्वर्ण वाले अनेक से धनों को प्रदान करने वाले होओ। हे विश्वदृढ़ता सोम! अपने रस से आकाश, पृथ्वी को भर दो। जैसे सूर्य के जलों में प्रविष्ट कर सर्वत्र प्रवाहमान करो। हे महती बुद्धि वाले सोम ! देव प्रिय धार रूप से इन्द्रादि के निकट शीघ्र प्राप्त होओ। संस्कार रहित यजमान को संस्कारित करता हुआ उसे अन्न प्राप्त कराने वाली वर्षा के कारणभूत हो। अद्भुत संसार में मंदगति वाला सोम ऊपर से डाला जाकर पवित्र होता हुआ जल रूप से टपकता है। सिद्ध सोम उज्जवल हुआ सर्वदर्शक बनकर देवताओं को दीप्त करता हुआ बल सहित प्राप्त होता है। सिद्ध सोम दूर और पास के देवताओं को रस पिलाता हुआ मधु की तरह छाना जाता है। कर्म प्रेरणा वाली बन्धुबान्धव से मिली हुई अंगुलियाँ सोम को पवित्र करने की अभिलाषा वाली हुई सोम को पात्रों में भरती है। तेज से दमकते हुए सोम ! तुम देवों के लिए पवित्र किया गया हमको बहुत-सा धन दिलाने वाला हो। हे सोम ! उत्तम पूजनीय वर्षा को देव परिचर्या के ग्रहण कराओ। हमें अन्न ग्रहण कराने को भली प्रकार से वर्षा करो। यजमान की रक्षा करने वाला, महाबली, अग्निलोक कल्याण के लिए प्रकट हुआ फिर घर से प्रदीप्त आकाशगामी तेज से युक्त ऋषियों के लिए प्रकाशवान हुआ। हे अग्ने ! ऋषिगण गुफाओं में वृक्षों द्वारा तुम्हें प्राप्त करते हैं। तुम मथे जाने पर प्रकट हुए बल को पुत्र कहा जाता है। कर्म करने वाले, ऋषियों, यजमानों द्वारा अग्नि किए अग्नि को तीन स्थानों में प्रज्वलित करते हैं। फिर वह अग्नि देवताओं का आह्वान करने वाला यज्ञ के लिए प्रतिष्ठित किया जाता है। सत्य की बढ़ोतरी करने वाले सखा और वरुण देवों के लिए यह सोम सिद्ध किया है। अतः वे इस अनुष्ठान में पधारे। प्रभु के अनुगत सखा और वरुण हजार आधार वाले उत्तम सभामंडप में पधारें। सभी के शासक, घृतभोजी अच्छे विचार वाले इन्द्र ने दधिचि की अस्थियों के वर्ष से नब्बे संघर्षों में आठ सौ दस राक्षसों को मारा। पर्वतों में रहने वाले दधिचि की अस्थि की कामना करते हुए इये समझा और उस राक्षस को खत्म किया। चन्द्रमा में सूर्य की किरणें हैं। वे छिपी हुई है। रात्रि के समय दिखाई देती हैं। वह इन्द्र जानता है। हे इन्द्रदेव और अग्नि ! तुम्हार लिए बादल के समान यह प्रमुख वंदनाएँ करने वालों ने रचना की। हे इन्द्रदेव और अग्ने ! वंदना करने वालों की वंदना पर ध्यान आकृष्ट करो। तुम भगवान रूप होते हुए हमारे कर्मों का फल प्रदान करो। हे कर्म की प्रेरणा करने वाले इन्द्रदेव और अग्ने! हमें दीन मत बनाओ, वैरी द्वारा हिंसा के लिए और मेरी निंदा हेतु मुझ पर अधिकार न करो। हे पाप नाशक सोम ! तुम बल और हर्ष को पैदा करने वाले देवताओं के लिए पात्र में जाओ। कामनाओं का वर्णक उज्जवल स्थान को तृप्त प्राप्त कर सिद्ध सोम देवताओं तृप्तिदायक होता हुआ सुशोभित होता है। हे सोम ! हमारी अँगुलियों से सिद्ध हुआ तू शब्द के साथ वायुवेग से पात्र में जा। हे स्त्रवित सोम ! तुम्हारे मित्र भाव में लगा हुआ मैं यह चाहता हूँ कि तुम्हारे सख्य भाव को प्राप्त हुए अनेक दैत्य बाधक हो गए है। उनका नाश करो। हे सोम ! मैं दिन-रात आपकी मित्रता की अभिलाषा करता रहता हूँ। मैं तुम ज्योर्तिमान को ग्रहण करूँ। संस्कार किया जाता सोम हिंसकों को प्रबल होता है। हम उनकी प्रार्थना करते हैं। साथ के कलश में दृढ़ होने पर अभीष्ट इन्द्रदेव शोधित सोम को ग्रहण करता है। हे पात्र में प्रवेश करने वाले सोम ! शीघ्र ही बहुसंख्यक धन को प्रदान करें। हे इन्द्रदेव! सोमपान करो, वह आपके लिए आनन्दायक हो। पत्थरों द्वारा निष्पन्न सोम तुम्हें आनंदित करें। हे इन्द्रदेव! तुम्हारे योग्य हर्षप्रदायक सोम ! जिसे पीकर राक्षसों का संहार करते हो तुम्हारे आनन्द से परिपूर्ण हो। हे इन्द्र ! उत्तम जितेन्द्रिय पुरुष तुम्हारी जिस स्तुति रूप वाणी को कहता है, उस वाणी को स्वीकार कर यज्ञशाला में अन्न के रूप में हवि ग्रहण करो। सभी संघर्षों को मिटाने वाले इन्द्र को साधकगण एकत्रित हुए, वंदना द्वारा सूर्य रूप इन्द्र का हम आह्वान कर विघ्न और शत्रुओं के विनाश के लिए उस महाबली इन्द्र का गुणगान करते हैं। हे प्रार्थना करने वालों! किसी से भी द्वेष न करने चले तेजस्वी तुम वंदना और कर्म करने वाले हो, अतः इन्द्रदेव की श्रेष्ठ विधि से 60 बंदना करो। सोमपान के लिए प्रार्थना करने वाले इन्द्रदेव की वंदना करते हैं। जब वह वृद्धि करने की अभिलाषा करता है तब रक्षा साधनों से पर्ण होता है। प्राणियों के स्वामी इन्द्रदेव के वेग को कोई नहीं रोक सकता। मैं उस बैरी-नाशक का पूजन करता हूँ। हे शत्रुनाशक इन्द्रदेव की आराधना करने वाले यजमान ! सुरक्षा के लिए इन्ददेव को हवि प्रदान करो। वह शत्रु के प्रति तेज और तुम पर भी अनुग्रह करने वाला श्रेष्ठ है। कर्म साधक बुद्धि को देने वाला तेजस्वी सोम प्राचीन काल से निष्पन्न अध्वर्युओं द्वारा प्राप्त है। सब हवियों में उत्तम सोम यज्ञ की वृद्धि करने वाला विश्वनियंता सूर्य मण्डल और पृथ्वी को प्रकाशित करता है। हे सोम ! बिना ईर्ष्या के पूजक द्वारा मनुष्य के सेवन के लिए पर्याप्त तुम वंदना के लिए यहाँ आओ। हे दिव्य सोम ! तुम शीघ्र शब्दवान होकर अमर तत्व को प्राप्त कराने वाले हो। श्रेष्ठ ऋषि जिस सोम से यज्ञ के द्वार खोलता है। ऋषि जिस सोम इन्द्र और आदि देवताओं को सुख प्रदान करता है, वह सोम उत्तम जल से पूर्ण, अन्न को यजमान प्राप्त कराए। सिद्ध होता हुआ सोम अब छन्ने में धार से जाता हुआ श्लोक को प्राप्त हुआ ध्वनि करता है। ऋत्विजगण जल में खेलते हुए सोम को उंगलियों से पवित्र करते हैं और कलश में जाते हुए सोम की प्रार्थनाओं द्वारा प्रशंसा करते हैं। यजमानों को अन्न की अभिलाषा करने बाला सोम द्वद्व में छोड़े जाने वाले अश्व के समान छोड़ा गया, ध्वनि करता हुआ पात्रों में दृढ़ होता है। बुद्धि का जनक, क्षितिज का प्रकाश इन्द्रदेव और विष्णु को भी प्रकट करने वाला सोम पात्रों में जाता है। ऋत्विज महान ब्रह्मा परम बुद्धि से योजना करने वाले सोम को ध्वनि करते हुए छानते हैं। प्रवाहमान नदी जैसे ध्वनि संगठन को प्रेरित करती है, उसके समान सोम हृदय की प्रिय ध्वनियों से शिक्षा देता है। वह विजय के ज्ञान वाला पराक्रम को ग्रहण करता है। हे ऋत्विजों! बलवानों के मित्र लपटों से वृद्धि को प्राप्त हो अग्नि को प्राप्त करो। बढ़ई जैसे अपने कार्यों के अनुसार लकड़ियों को प्राप्त होता है उसी प्रकार यह अग्नि हमको प्राप्त हो और हम इस अग्नि के विज्ञाता हों तेजस्वी बनें। सब देवताओं में यह अग्नि ही मनुष्य के वैभव को प्राप्त होती है। वह अग्नि हमें अन्नों के साथ मिले। हे इन्द्र देव! आनन्द देने वाले प्रशंसनीय, जो अन्य मादक द्रव्यों के समान अहितकर नहीं है। ऐसे पवित्र सोम का पान करो। यज्ञशाला में स्थित सोम की उज्जवल धाराएँ तुम्हें पाने के लिए झुकती हैं। हे इन्द्र देव! तुम्हारे समान अन्य कोई रथी नहीं है। तुम्हारे रूप समान बलशाली नहीं है। श्रेष्ठ अश्व पालक भी तुम्हारी बराबरी भी कोई नहीं कर सकता। हे ऋत्विजों! इन्द्र देव की शीघ्र अर्चना करो, श्रेष्ठ मन्त्रोच्चार द्वारा यह पवित्र सोम इन्द्रदेव के लिए आनन्द प्रदान करने वाला बनें, फिर इस अत्यन्त प्रशंसित इन्द्र को प्रणाम करो। हे वीर्यवान इन्द्रदेव! मेरे द्वारा दी गई हवियों को आकर प्राप्त करो। तुम आनन्द ग्रहण की अभिलाषा करते हुए इस संस्कारित, चेतनाप्रदान करने वाले सोम का पान करो। हे इन्द्र देव! इस संस्कारित मधुर सोम के स्तुत्य दिव्य गुण और आह्लाद तुम्हारे पास हैं। तुम स्वर्ग तुल्य अपने उदर को इससे भर लो। हे युद्धधीर इन्द्र! मित्र के समान शत्रु का संहार करते हुए दुष्टों के बल को हटाते हुए सोम की तरंग में साहसी कर्म करने वाले हैं।
अध्याय (8.2) :: ऋषि :- (अकृष्टा भाषादय) त्रय ऋषय, कश्यप, असित काश्यपो देवलो वा, अवत्सार, जमदग्नि, अरुणो, वैतहव्य, उरुचक्रिरोत्रेय, कुरुसुति काण्व, भरद्वाजो बार्हस्त्य, भृगुर्वारुणि-र्जमदग्नि भार्गवो वा, सप्तर्षय, गौतमो राहूगण, ऊर्ध्वसद्द्मा, कृतयश, त्रित, रेभू सून, काश्यपौ, मन्युर्वासिष्ठ वस्रुन्श्रुत आत्रेय, नृमेध; देवता :- पवमान, सोम, मित्रावरुणौ, इन्द्र, इन्द्राग्नि; छन्द :- जगती, गायत्री, बृहती, षड्ङ्क्ति, काकुत्र, प्रगाथ, उष्णिक, अनुष्टुप, त्रिष्टुप।
हे सोम! तुम गाय धन सोने को प्राप्त कराने वाला, धारक जलों में स्थित पात्र में प्रविष्ट हो। तुम वीर संसार का ज्ञान रखने वालों की यह ऋषि से पूजा करते हैं। हे सिद्ध होते हुए अभिष्टवर्षक सोम ! तुम समस्त संसारों में प्राणी का, साक्षी रूप सर्वत्रलीन हो, हमारे लिए टपको। हम ऐश्वर्य सहित जीवन धारण करने में समर्थ हों। हे सोम! तुम सबके स्वामी बनकर सब भुवनों को प्राप्त होते हो। तुम्हारे मधुर दीप्त जल को प्राप्त कर तुम्हारे कर्म में स्थित हों। हे विश्व दृष्टा सोम! शोधित हुए तेरी धाराएँ सूर्य किरणों जैसे चमकती हैं। हे सोम! रसवाहक तुम चेतना प्रदान करने के लिए हमारे समस्त रूपों को शुद्ध करता हुआ विभिन्न धनों को देने वाला है। हे सोम! प्रकाशित सूर्य के समान रचित तुम शुद्ध स्थान में जाकर ध्वनि को प्रेरित करते हो। हे दीप्त तरल सोम ! ग्रहण हुआ गाय के दूध से मिलकर जलों में स्त्रावित होते हो। नीचे की ओर हुए गतिमान जलों के समान छन्ने को प्राप्त हो शुद्ध होकर इन्द्र को तृप्त करते हो। हे संस्कारित सोम ! तुम इन्द्रदेव के लिए आह्लादक बनकर शुद्धि में पहुँचकर और ऋत्विजों द्वारा प्राप्त किए जाते हो। तब इन्द्रदेव के पेट को भरने वाले होते हो। हे सोम! प्राणियों को आनन्दमय तुम संस्कारित होकर पूजा के योग्य बनो। हे सोम! मंत्रों द्वारा वंदित शुद्धतादायक और श्रेष्ठ हो। शत्रु के नाश में भी प्रसिद्ध हो। प्रसिद्ध मृदु सोम अपने आप पवित्र और अन्यों के भी शोधक हो। देवताओं को संतुष्ट करने वाला वह पाप और राक्षसों के पतन करने वाला बताया जाता है। देवताओं के पीने योग्य सोम छन्ने को प्राप्त हुआ शत्रुओं को सहने वाला संघर्षों और हिंसा करने वालों का प्रतिकार करता है। संस्कारित सोम उपासकों को गाय अन्नों आदि को देन वाले हैं। हे सोम ! हवि देने वाले हम साधकों की यज्ञ, धन और अन्न प्रदान करो। अनुष्ठान निर्वाहक, संस्कारित, श्रेष्ठ, सुकर्मा सोम भगवान के समान हमारी वंदना को सुनता है। अनुष्ठान निर्वाहक वह सोम जल भावना से संस्कारित किया गया पात्रों में रखा जाता है। हे सोम! अनुष्ठान के समान दान का इच्छुक तुम वंदना करने वाले को पराक्रम प्रदान करते हुए छन्ने पर गिरते हो। हे सोम ! हमें बार बार सिद्ध हुई धार से युक्त कर और सब सौभाग्यों के प्रदाता बनो। हे सोम! तुम्हारा अन्न रूप पूजन तुम्हारे लिए ही उत्पन्न हुआ है। तुम हमारे यज्ञ में तृप्त करने वाले बनो। हे सोम!हमको गाय, अश्य दिलाने वाले अत्यन्त शीघ्र अन्न रूप द्वारा नहीं जीता जाता। वह तुम धारायुक्त वर्षा करो। हे सोम! तुम्हारी मृदु रसवाली धाराएँ सुरक्षा के लिए बनाकर रचित की जाती हैं। उन धारों से छन्ने में गिरो। हे सोम! तुम गिरते हुए छन्ने में जाते हो. अतः इन्द्रदेव के लिए पेय पदार्थ बनो। हे परम स्वादिष्ट सोम! हमको अभीष्ट धन प्रदान करने वाले तुम अंग-अंग को अद्भुत निर्मित करने के लिए दूध के समान सार रूप से बरसो। हे अग्ने! जब तुम धान, जौं आदि और कण्ठादि को अपने मुख में भक्षणार्थ ग्रहण करते हो तब तुम्हारी दिव्यताएँ, वर्षक मेघों के समान और उषा के प्रकाश के समान लगती हैं। हे अग्ने ! वायु के योग से कम्पित हुए तुम जब वनस्पतियों में व्यापते हो तब भस्म करने वाले गुण से युक्त तुम्हारा रज रथियों के समान विचित्र सा लगता है। मतिकर्त्ता, अनुष्ठान साधक, देवदूत, शत्रु, ताड़क, प्रेरक अग्नि की हम पूजा करते हैं। वह तुम्हें कम या अधिक हवि के भक्षण करने को मनाते हैं। इस कार्य के लिए अन्य किसी देवता की वंदना नहीं करते हैं। हे मित्र और वरुण! तुम दोनों ही सुरक्षा करने वाले हो। मैंने तुम्हारी कृपा पूर्वक गति की उपयुक्त व्यवस्था की है। हम वंदना करने वाले तुम दोनों द्वेष न करने वालों का पूजन करें। हम तुम्हारी मित्रता प्राप्त करें। उत्तम अन्न तथा निवास करने वाले हो। मित्र और वरुण! तुम हमारी रक्षा करो और श्रेष्ठ पदार्थों से पोषण करो। हम पुत्र-पौत्र आदि से युक्त हुए शत्रुओं को वश में करें। हे इन्द्रदेव! तुम पात्र में सुरक्षित सोम का पान कर शक्ति से उन्नतिशील हुआ चिबुक को कम्पायमान करो। स्पर्धा युक्त इन्द्रदेव! शत्रु के पतन में तुम्हें तैयार समझकर क्षितिज और पृथ्वी दोनों तुम से प्रसन्न होते हैं। चारों दिशा, चारों कोण और आकाश इन नौ स्थानों में व्यापक होने वाले को बढ़ाने वाली प्रार्थना आदि न्यून हो तो उसे मैं पूरा करता हूँ। हे इन्द्र और अग्नि ! यह स्तोता तुम्हारे प्रशंसक हैं। हे सुखदाताओं! इस सिद्ध किए गए सोम का पान करो। प्रेरणा वाले इन्द्र और अग्ने ! तुम हवि देने वाले यजमान के लिए प्रकट हुए हो। उसके हवि रूप अश्वों पर चढ़कर यज्ञ स्थान में पधारो। प्रेरणा वाले इन्द्रदेव और अग्ने ! इस सिद्ध सोम का भक्षण करने को उन घोड़ों पर सवार होकर जाओ। हे सोम! अत्यन्त तेजवान तुम अपने ही लिए पर्वतों पर उत्पन्न होते हो। तुम शब्द पार हुए कलशों की ओर जाओ। जलों में प्राप्त सोम, इन्द्र, वायु, वरुण, मरुदगण, विश्वव्यापी, विष्णु के लिए पात्र को प्राप्त होता है। हे सोम ! तुम हमारे पुत्र को और हमें अन्न, धन आदि के प्रदाता बनो। सिद्ध कर्त्ता ऋत्विजों द्वारा निष्पन्न होता हुआ सोम कलश में टपकता हुआ ग्रहण होता है। यह सोम बल और प्रसन्ता के लिए निष्पन्न होता है। हे सोम ! समस्त प्रकार प्रशंसित पार्थिव एवं अद्भुत धन है। उसे शुद्ध करता हुआ हमें दो। प्रजाओं की आयु को शुद्ध करता हुआ अभीष्ट वर्षक, शब्दवान हुआ सोम कुशों पर अपने स्थान को प्राप्त हो। हे सोम ! हे इन्द्र ! तुम दोनों ही सबके अधीश्वर गाय का पालन करने वाले वैभव के स्वामी हुए कर्मों के पोषक हो।
हे बैरी नाशक इन्द्रदेव! खुशी और शक्ति के लिए प्रार्थना करने वालों के द्वारा अधिक पुष्ट किए गए तुम्हें बड़े द्वन्द्वों में अपनी सुरक्षा के लिए पुकारते हैं। हे रण कुशल इन्द्र देव! तू अकेला ही असंख्य सेना के समान है। अतः बैरियों के धन का अपहारक है। वंदना के धन को वृद्धि करने वाला सोम निष्पन्नकर्त्ता का धन प्रदात है। संघर्ष उपस्थित होने पर हे इन्द्र! तुम अपने मदमत्त घोड़े को जोड़कर अपने विद्वेष्ष को नष्ट करो। अपने उपासक को धन में स्थित कराओ। सुस्वाद मधुर सोम रस व सफेद गाय पीकर इन्द्र के साथ शोभित होती है। अभीष्टवर्षक इन्द्र के साथ प्रसन्न से अनुगत हुई। इन्द्र के पेय सोम में अपना दूध मिलाती है। इससे पुष्ट और शर्शा संपन्न हुआ इन्द्र शत्रुओं पर वज्र चलाने में समर्थ होता है। उत्तम गाय इन्द्र के परान को अपने दूध से पुष्ट करती है। युद्ध में शत्रुओं को इन्द्र वीरता बनाने के वीर का ज्ञान प्रेरित करते हैं। पर्वतों रचित सोम बल और प्रसन्नता के लिए पवित्र जाता है और बाज के वेग से समान अपने स्थान को ग्रहण करता है। देवता प्रार्थना, सुन्दर, अन्न रूप जलों में धोए हुए सोम को वे गौएँ सुस्वाहु निर्मित कर फिर इस सोम रस को अमरतत्व ग्रहण कराने के लिए ऋत्विज उपयुक्त क उसी प्रकार जैसे रणक्षेत्र को अश्व सुशोभित करते हैं। हे स्तुत्य सोम! देवता काम्य हवि रूप अपने रस को नीचे गिरा और आकाश से मेघों को वर्षा हेतु प्रेरित करो। हे बली सोम! पात्रों में छाना हुआ तू पूजा धारक गुण वाला यजमान के लिए कर्मों की प्रेरणा कर और आकाश से बादल वर्षा कर सचेष्ट सोम अपने धारक रस को प्रेरित करता हुआ प्रिय हवियों में व्याप्त आकाश और भूमण्डलों में स्थित होता है। जब पत्थर के समान दृढ़ फलकों में सोम को ग्रहण किया तब गायत्री आदि सात छन्दों द्वारा ऋत्विज उनकी वंदना करते हैं। सोम अपनी धार से सोम गानों में धनदाता इन्द्रदेव को प्रेरित करें। उत्तम कर्म वाला याज्ञिक इन्द्रदेव की पूजा करता है। हे सोम! पवित्र हुआ तू इन्द्र, विष्णु तथा अन्य देवगण के लिए अत्यन्त मृदु हुआ, पुष्टि के लिए टपक। हे तरल सोम ! तुम्हें वस्त्र से छानने के लिए अँगुलियाँ उसी प्रकार स्पर्श करती हैं जैसे नवजात बछड़े-बछिया को गायें चाटती हैं। हे साधक सोम ! तुम पृथ्वी और आकाश के धारक हो। शुद्ध होता हुआ कवच रूप है। धुतिमान रस रूप सोम इन्द्र को बल की प्रेरणा करता हुआ सुखपूर्वक स्त्रावित होता है। सोम याज्ञिकों को धन देता हुआ शत्रुओं को नष्ट करता है। पाषाणों से निष्पन्न किया जाता सोम हर्ष प्रदायक धार से निकलता है। इन्द्र के प्रति सख्य भाव वाला इन्द्र के लिए ही बरसता है। धारक व्रती, तरल सोम क्लश में गिरता और इन्द्रादि देवों को पुष्ट करता है। हे अग्ने! तुम अजर अमर को हम दीप्तिमय करते हैं, जब तुम्हारी ज्योति क्षितिज में लीन होती है तब तुम हमको अन्न प्रदान करते हो। हे श्रेष्ठ, सुख देने वाले, शत्रुओं का हनन करने वाले, संसार पोषक, हवि वाहक अग्नि के लिए हवि को होमते हैं। हे अग्ने ! हमें वन्दना करने वालों को अन्न प्रदान करो। कलेश पालक इन्द्र ! हवि युक्त नदियों को पचा लेने वाले तुम यज्ञों में हमें फलों से पूर्ण करते हो, हमको अन्न प्रदान करो। हे स्तोताओं! वर्षा द्वारा अन्न के कर्त्ता और वंदना से प्रसन्न होने वाले इन्द्र की सोम गान द्वारा वंदना करो। हे इन्द्रदेव! हे शत्रुओं के बहिष्कारक ! हे सूर्य को अपने तेजों से तेजस्वी बनाने वाले ! तुम संसार रूप अद्भुत रूप वाले और सर्वश्रेष्ठों में भी श्रेष्ठ हो। हे इन्द्रदेव! तुम अपने तेज से सूर्य को प्रकाशमान करते हो। तुम्हारे तेज से ही अद्भुत लोक भी दीप्तिमान हैं। समस्त देव तुम्हारे मित्र भाव की अभिलाषा करते हैं। हे इन्द्रदेव! तुम्हारे लिए ये सोम शुद्ध किया रखा है। हे पराक्रम वाले! तुम शत्रु को वश में करने वाले इस यज्ञशाला में पधारो। सूर्य द्वारा आकाश को पूर्ण करने के समान तुम्हें सोमपान द्वारा उत्पन्न सामर्थ्य पूर्ण करें। हे इन्द्र ! हमारे मंत्रों में जुड़े हुए अश्वों वाले रथ पर चढ़ो। सोम निष्पन्न करने जमान है ने धार श्री आलिनाले पाषाण अपने आकर्षण शब्द से तेरे मन को हमारी ओर प्रेरित करे। जो किसी रता है हैं। तुम पूर्व अनुष्ठान में महान साधन रूप अमरत्व सोम के महान भाव को प्रकट याँ उपपत्र, पौत्रादि के क्रम से प्राणियों को लंबी आयु प्रदान करो। हे सविता देव! अज्ञानवश के द्वारा तिरस्कृत न हो सके। ऐसे इन्द्र की ऋषियों की स्तुतियाँ यज्ञ स्थान में पहुँचाती हुआ करो। हे सविता देव! आप हविदाता यजमान को ज्योति से परिपूर्ण करो और पिता, या धन के लोभ में प्रमादी होकर या शक्ति और कुटुम्ब के अहं द्वारा हमने आपका अथवा अन्य देवगणों और विद्वान प्राणियों का कोई अपराध किया हो तो आप । सोम हमको इस अनुष्ठान में उसके पाप से मुक्त करो।
अध्याय (9.1) :: ऋषि :- (अकृष्ट भाषयः) त्रय कश्यप, मेधातिथि, हिरण्यस्तूप, अवत्सार, जमदग्नि, कुत्स, आंगिरस, वशिष्ठ, त्रिशोक, काण्व, श्यावाश्व सप्तर्षय, अमहीयु, शनु, शेप, आर्जीगर्ति, मधुच्छन्दा वैश्वामित्र, मान्धाता, यौवनाश्व, गोधा, असित, काश्यपो देवलौ वा, ऋणञ्चय, शक्ति, पर्वतनारदौ, मनु, सावंरण, बन्धु सुबन्ध श्रतबन्धुर्विप्रबन्धुश्च क्रमेण गोपयना लौपयना वा, भुवन आप्त्य साधनों वा भौवन वामदेव; देवता :- पवमान, सोम, अग्नि, आदित्य इन्द्र, इन्द्राग्नी, विश्वेदेवा; छन्द :- जगती, गायत्री वृहति, प्रगांथ, पक्ति, उष्णिक, अनुष्टुप, त्रिष्टुप।
यज्ञ! प्रकाशक सोम दिव्य रस का वर्षक, पालक, सफलोकत्पादक, ऐश्वर्यवान, हर्षप्रदायक और इन्द्र द्वारा सेवा किया गया है। इसका रस आकाश, पृथ्वी में छिपे धन को यजमानों के लिए प्रकट करता है। दिव्य गुणों का स्वामी शतधर, बुद्धि बढ़ाने वाला, बलि, हरित सोम रस शब्द करता हुआ कलश में आता है व अभीष्ट पूरक मित्र के समान हितैषी होता है। हे सोम! तुम जलों से पहले संस्कारित हुए आहुतियों से अंतरिक्ष में जाते हो, शत्रुओं का अन्न ग्रहण करने के लिए श्रेष्ठ अश्वों वालों द्वारा निष्पन्न होता है। बलि चमकते हुए एवं वेगवान सोम का यजमान, गवादि पशु एवं संतान प्राप्ति की कामना से रस निचोड़ते हैं। यज्ञ की इच्छा करने वालों द्वारा अपने हाथों से सोधकर सुशोभित किए गए सोम छन्ने में पवित्र होता है। वह सोम हवि देने वाले यजमान को दिव्य और पार्थिव धनों की वर्षा करें। हे देवताओं द्वारा इच्छित ! तुम वेगवान हुए अभिष्टवर्षक हो और हन्द्र को प्राप्त हो। हे सोम ! उपासक को अभिष्ट फलदाता एवं धारक बनाकर तुम हमको असंख्य अन्न-धन दिलाते हुए स्थापित होओ। निचोड़ी हुई सोम की धारा आह्लादक अमरत्व से परिपूर्ण हुई पात्र को पूर्ण करती है। हे सोम ! गौ दुग्धादि से मिश्रित होने पर गुणों से परिपूर्ण अनेक से जलों के सार रूपों को प्राप्त करता है। अद्भुत रसों को प्रवाहित करने वाला काम्य सोम जल-योग से बार-बार पवित्र किया जाता है। अभीष्ट पूरक, हरित, महान, मित्र के समान दिखाई देने वाला सोम शब्द करता हुआ सूर्य की सी दीप्ति वाला है। हे सोम ! तेरे बल से ही कर्म की प्रेरणा देने वाली वंदना रची जाती है। वंदना की उन वाणियों के लिए तुमको सिद्ध किया जाता है। हे सोम! तुम्हें महान प्रशंसित बनाने के निमित्त हम तुम्हें लोकनियन्ता से पीने का निवेदन करते हैं। हे सोम ! यज्ञ का सनातन आत्मा तू ही हमें गवादि देने वाला तथा अन्नों के देने वाला है। हे सोम ! वृष्टि मेघ के समान हमारे लिए इन्द्र देव के सेवनीय, पुरुषार्थ वृद्धि वाले रस की अमृत रूप से वर्षा करो। हे संस्कारित सोम ! हमारे यज्ञ में पूज्य देवगण का आगमन सेवनीय हो और बाधा पहुँचाने वालों का हरण करो। हे सोम ! हमको तेजस्वी बनाओ। सभी स्वर्ग के सुखों को हमें प्रदान करते हुए हमारा कल्याण करो। हे सोम ! हमको हमारे यज्ञ का फल प्रदान करो और शत्रुओं का नाश करो। हमको कल्याणमय बनाओ। हे सोम को संस्कारित करने वाले ! इन्द्र के पीने को सोम को पवित्र करो, फिर हमको कल्याणमय बनाओ। हे सोम! तुम अपनी रक्षाओं से हमको सूर्य की आराधना को प्रेरित कर और हमें कल्याणमय बनाओ। हे सोम ! तुम्हारे द्वारा प्रदान ज्ञान से तुम्हारे आधीन हुए हम चिरकाल तक सूर्य को देखने वाले हों। तुम हमें कल्याण का भागीदार बनाओ। हे महान साधन सम्पन्न सोम! क्षितिज धरा के समृद्धि को हमें प्रदान करता हुआ सुख का भागीदार बनाओ। हे शक्तिवान सोम ! द्वंद्व में शत्रुओं को विजय करने वाले कलश में रहकर फिर हमें सुख का भागीदार बनाओ। हे शुद्ध होते हुए सोम ! अनेक फल वाले यज्ञों के साधन रूप स्तोत्रों से यजमान द्वारा बढ़े हुए तुम हमको सुख का भागी बनाओ। देवताओं को प्रसन्न करने वाला सोम छन्ने से धार रूप में गिरता है तथा वंदना करने वालों को मुक्त करने वाला होता है। सर्व ऐश्वर्य दायिनी सोम धाराएँ यजमान की रक्षक, देवगण को आनन्द प्रदान करने वाली, प्रार्थना करने वालों को पाप से बचाने वाली, छन्ने में से गिरती है। हज़ारों धनों को हम प्राप्त करें, वह धन हमको शुभ्रता प्रदान करें। अद्भुत आनन्द वाला सोम हमारा रक्षक हो। हे सोम ! हमको वस्त्रादि भी शुभता दे। अद्भुत आनन्द वाला सोम पापों से बचाए। अद्भुत आनन्ददायक रसों से परिपूर्ण यह सोम वंदनाओं से पुष्ट शक्ति के लिए पात्र में स्थित होते हैं। हे सोम ! देवताओं के सेवानार्थ गौ दूध आदि का पवित्र करता हुआ तू पात्रों में जाता और सुख वर्षक होता है। हे सोम ! ऋषि द्वारा पूजित तू हमको गवादि से युक्त करने वाला और सब अन्नों को प्रदान करता है। पूज्य अग्नि के प्रति अपनी वृद्धि में स्तोत्र पाठ करते हैं। इस अग्नि की भली प्रकार प्रार्थना करते हमारी बुद्धि कल्याण रूपी है। हे अग्ने ! तुम्हारे मित्र हुए हम किसी के द्वारा हिंसा न करें। हे अग्ने ! तुम्हारे अनुष्ठान की समिधाओं को संगठित करते हैं। तुम्हारे लिए हवियाँ देते हैं। तुम हमारे अनुष्ठान आदि कर्मों के सहायक बनो। तुम्हारी मित्रता ग्रहण होने पर हमें कोई मार न सके। हे अग्ने ! तुम्हें यह उत्तम प्रकार से प्रज्जवलित करें। तुम हमारे कर्मों को साधक होओ। तुम समस्त देवों को अनुष्ठान स्थान में लाओ। उनका इस समय हम आह्वान करते हैं। सखा वरुण ! सूर्योदय समय में तुम बैरी भक्षकों की वंदना करता हूँ। हमारी यह प्रार्थना अखण्ड बल दिलाने वाली हो। हे विप्रो ! इन स्तुतियों को यज्ञ प्राप्ति के निमित्त करो। हे वरुण ! हे मित्र ! हम स्तोता ऋषियों सहित वैभववान हों। अन्न, धन और स्वर्गीय सुख को प्राप्त करें। हे इन्द्र! शत्रुओं को मारो। शत्रुओं को ललचाने वाले धन को हमें दो। हे इन्द्र देव ! जिन अनेक धनों को मनुष्य बहुत समय से पहचानता है, उन इच्छित धनों को प्रदान करो। हे इन्द्र देव ! विचलित, अचल, विचारवान, प्राणियों को जो धन तुम प्रदान करते आए हो वह इच्छित धन हमें प्रदान करो। हे इन्द्राग्ने ! तुम दोनों यज्ञ में यजन करने योग्य हो। अनुष्ठान कर्मों में शुद्ध हुए तुम हमारी वंदनाओं पर ध्यान दो। शत्रुनाशक, कभी न हारने वाले इन्द्र और अग्ने! मेरी वंदना को सुनो। हे इन्द्र और अग्ने ! ऋषियों ने तुम्हारे निमित्त अमृत रूप सोम को निचोड़कर पात्रों में रखा है। उनके लिए मेरी वंदना पर ध्यान दो। हे सोम! अत्यन्त मधुर पूज्य यज्ञ के लिए मरुद्गणें के साथी इन्द्र के लिए वर्षणशील हों। हे सोम! तुम धारक को विख्यात साधक शोधक कार्यों द्वारा सुशोभित करते हो। हे ज्ञानी सोम! तुम्हारे संस्कारित रस को सखा, अर्यमा, वरुण, मरुद्गण पान करें। हे सुंदर हाथों से सिद्ध किए सोम ! तुम ध्वनि करते हुए पात्र में जाते हो। तुम साधकों को अनेक स्वर्णादि समृद्धि प्रदान करने वाले हो। अभीष्ट देने वाला संस्कारित सोम सबका शोधक है। गाय का दूध और घृतादि से युक्त हुआ दिव्य गुण वाला होता है। जिस सोम की जननी समृद्ध है उसका दस अंगुलियाँ शोधन करती हैं। यह सूर्य तेज से संगठित करता है। निष्पन्न सोम कलश के संग इन्द्र देव को ग्रहण होता है तथा पवन से मिलकर सूर्य किरणों में व्याप्त होता है। हे सोम! तू मधुमय मंगलकारी अनुष्ठान में भग, पवन, पूसा, सखा और वरुण के लिए वर्षणशील हो। जिन गौओं को प्राप्त कर हम अन्न वाले सुख भोगते हैं। हमारी वे गौएँ इन्द्र देव के हर्षित होने पर घी-दूध देने वाली और पुष्ट हों। हे धारक इन्द्रदेव! तुम हम पर कृपा बुद्धि से हमारा अभीष्टअवश्य ही हमको दिलाएँ। हे इन्द्र ! पूजकों द्वारा काम्य धन, उन पर कृपा करके उनके निमित्त लाकर दो। उत्तम कर्मों के कर्त्ता इन्द्र को हम अपनी रक्षा के निमित्त नित्य बुलाते हैं। उनके निमित्त दोहन को सुंदर गौओं को नित्य हरते हैं। हे सोमपायी इन्द्र देव! सोमपान के लिए यहाँ पधारो। तुम्हारे प्रसन्न होने से ही गौएँ ग्रहण होती हैं। हे इन्द्र देव ! हम श्रेष्ठ बुद्धि वाले होकर तुम्हें समझें। तुम हमसे किसी अन्य पर अपना रूप प्रकट न करो। हे इन्द्र देव! क्षितिज धरा दोनों को तुम पूर्ण करने वाले हो, इससे वह उत्तम जननी कहलाती है। ज्ञानी इन्द्र देव! तुम शक्तिमान और वैभवशाली हो। तुम्हें उत्पन्न करने वाली माता अदिति महान हैं। हे इन्द्रदेव! मनुष्यों के शत्रुओं का बल समाप्त करो। हमारी हिंसा करने वालों को धराशायी करो। तुम अदिति पुत्र हो, इसलिए तुम्हारी वह माता महान हैं। पाषाणों से शब्द करता हुआ सोम छन्ने से टपकता है। वह हर्ष प्रदायक सबका पोषक है। हे सोम ! तुम संतुष्टिदायक, मतिवर्धक और अन्नज रस को देने वाले तथा बल प्रदान करने वाले पदार्थों में धारक हो। हे सोम! समस्त देवता एक-दूसरे से स्नेह रखते हुए तुमको पान करते हैं। तुम बल पदार्थों के धारक और अभीष्टदायक हो। जो सोम धनों, दुधारू गौओं, अन्नों, उत्तम संतान और वैभव को प्रदान करने वाला है, उसे ऋत्विज शोधते हैं। हे सोम! तेरे जिस रस को इन्द्र, मरुद्गण, अर्थमा, भग देवता पान करते हैं। उनके द्वारा रक्षार्थ, मित्र, वरुण और इन्द्र को उपयुक्त करते हो। हे मित्रों! तुम देवताओं के हर्ष के लिए रस युक्त सोम स्तवन करो। रक्षक, आनन्दमय, पूजन योग्य सोम जलों से सिंचित होता है, जैसे गौवत्स गौओं द्वारा सींचा जाता है। यह सोम शक्ति बुद्धि का साधन है। यह देवों के सेवानार्थ पवित्र किया गया मधुर गुणों से परिपूर्ण है। देवों को सखा समान शोधित सोम स्वर्गीय आनन्द वाला हमारे कलश में आए। पवित्र मतिवर्धक दही, घृत परिपूर्ण सोम सूर्य के समान पात्रों में दर्शीनीय होता है। गाय के दूध में दशर्नीय, पाषाणों से निष्पन्न धन दायक यह सोम आपको अन्न प्रदान करता है। हे सोम ! इस शुद्ध करने वाली धार से धन की वर्षा करो। इस सोम के शुद्ध होने पर ही सूर्य भी वायु वेग वाला हुआ। अति बुद्धिमान इन्द्र मुझ सोम को प्राप्त करने वाले को कर्म करने वाला पुत्र प्राप्त हो। हे सोम ! सभी के श्रवण योग्य तुम हमारे पवित्र अनुष्ठान में पधार कर अनेकों धनों को हमें देने वाला हो। बाण वृष्टि एवं शत्रु का नाश करना यह दोनों कार्य सोम द्वारा सिद्ध होते हैं। हे सोम ! शत्रुओं को समाप्त कर याज्ञिकों को अभय प्रदान करो। हे अग्ने ! यजन योग्य तुम हमारे निमित्त रक्षक और सुख देने वाले हो। व्यापक अन्न युक्त सबका अग्रगण्य अग्नि दीप्तिमान और हमको धनदायक बनो। हे तेजवान प्रकाशित ! अग्ने सुख और पुत्रादि आदि के निमित्त से प्रार्थना करते हैं। सब भुवन हमको शीघ्र सुखकारी हों। इन्द्र और विश्वेदेवा मेरे अभीष्ट पूर्ण करें। अन्य देवों के संग इन्द्रदेव हमारी कीर्ति शरीर और संतान को सिद्ध अभिलाषी बनाएँ। अदिति पुत्र सखादि, मरुद्गण सहित इन्द्रदेव हमारे लिए गुण वाली औषधियों परिपूर्ण करें। हे यजमानों! तुम पास से इन्द्रदेव की श्रेष्ठ प्रकार से वंदना करो।
अध्याय (9.2) :: ऋषि :- वृषगणों, वशिष्ठ, असित, काश्यपोदेवलो वा, भृगुर्वारुणि-र्जमदग्नि भार्गर्वा वा, भरद्वाजो बार्हस्पत्य, यजत आत्रेय, मधुच्छन्दा वैश्वामित्र सिकता निवावरी, पुरुहन्मा, पर्वतानारदौ काण्वो शिखण्डिन्य पावप्सरसौ काश्यपौ वा, अग्नये धिष्णये ऐश्वरा, वत्स काण्व, नृमेद्य, अत्रि; देवता :- पवमान, सोम, वैश्वानर, मित्रावरुणौ, इन्द्र, इन्द्राग्नि, अग्नि; छन्द :- त्रिष्टुप, गायत्री, जगती, प्रगाथ, उष्णिक, द्विपदा विराट, अनुष्टुप, ककुपु, पुर उष्णिक।
ऋषि समान वंदना करने वाला पूजक इन्द्र और देवताओं से प्रकट होने का निवेदन करता है। विविध बल सोम संस्कार होने पर शब्द युक्त हुआ पात्रों को प्राप्त होता है। शत्रुओं के द्वारा सताए हुए त्रषिगण अभिषव ध्वनि पर ध्यान देते हुए यज्ञशाला में पधारें। सखा वंदना करने वालों ने शत्रुओं को न सहन होने वाले सोम के लिए बाण सुसज्जित किए। वह सोम अपनी गति को आकाश में प्रेरित करता है। उसकी गति का अनुमान कठिन है। वह अपने तेज को फैलाता हुआ दिन में हरित और रात में उज्जवल दिखाई देता है। रथों के समान ध्वनि करता हुआ यजमानों के लिए वीरता को प्रदान करने वाला होता है। युद्ध को जीते हुए रथों जैसा यज्ञगामी सोम ऋषियों के बाहुओं में स्थित होता है। वंदनाओं के राजाओं के समान ऋत्विजों से अनुष्ठान में सोम का गौघृत आदि से संस्कारित होता है। पवित्र किया जाता सोमवाणी युक्त मधुर रस युक्त धार विस्तार वर्षणशील होते हैं। इन्द्रदेव के पीने को सोम उषा की पूजा करते हुए शोधन काल में ध्वनि करते हैं। सोम प्राप्त करने वाले पूजक, सोम के यज्ञ द्वारों का उद्घाटन करते हैं। उत्तम जाति के सोम को पूर्ण करते हुए वंदनाकारी कार्य अनुष्ठान में युक्त होते हैं। नेत्रों द्वारा सूर्य दर्शन हेतु यज्ञनाभि सोम की अपनी नाभि में स्थापित करता हुआ उसकी तंरगों को पूर्ण करता है। उत्तम बलशाली इन्द्र देव नेत्रों द्वारा अपने प्रिय अर्ध्वयुओं द्वारा हृदयस्थ हुए सोम को देखता है। यजमान और देवताओं के सम्बन्धों को जानते हुए सोम कर्मों में यज्ञ मार्ग से प्रयुक्त होता है। हवियों में प्रशंसित सोम जलों का मर्दन करता हुआ अपनी धार बरसाता है। हवियों में श्रेष्ठ सोम वाणी का उत्पादक अभीष्ट पूरक और अहिंसक हुआ यज्ञस्थ जल में शब्द करता है। सोम से जल पवित्र होता है। वह जब श्लोकों से वृद्धि करता है, तब अन्नवान इन्द्रदेव यज्ञ में हिस्सा लेने के लिए अपनी शक्ति भाग को उपयुक्त करता है। कर्मकर्त्ता ऋत्विज सोम को प्रेरित करते हैं। तब वह वर्षणशील हुआ सम्राट के समान यज्ञ बाधाओं को समाप्त करता है, देवप्रिय हरा सोम जलों में मिश्रण होकर छनता है, ध्वनि करता हुआ सोम वंदना द्वारा प्राप्त किया जाता है। सोम को सिद्ध करने के कार्यों को क्रीड़ा रूप से करने वाला यजमान वायु, इन्द्र और आश्विनी कुमारों को प्राप्त करता है। जो यजमान अपने सोम की तरंगों को मित्र वरुण भग देवताओं को अर्पित करते हैं। वे सोम के ज्ञाता यजमान सुखों का उपभोग करते हैं। हे आकाश, पृथ्वी के अधीश्वरों ! तुम दिव्यानंद वाले सोम के लाभ के लिए हमको अन्न, पशु आदि से युक्त वैभव प्रदान करो। हे सोम! हम याज्ञिक नत मस्तक होकर तुम्हारी शक्ति को चाहते हैं। तुम्हारी शक्ति सुखोंत्पादक, धनदाता, रक्षक और अभीष्ट प्राप्ति के लिए असंख्यों द्वारा अभिलाषित किया जाता है। हे खुशी प्रदान करने वाले सोम! हे सर्व सेव्य ! तुम्हारी उपासना और सेवा करते हैं। तू मति परिपूर्ण, पूजनीय, रक्षक और असंख्यों द्वारा काम्य है। हे उत्तम प्रजा वाले! धन, ज्ञान और रक्षा के निमित्त हम तुम्हारी वंदना और उपासना करते हैं। आकाश के मूर्धा रूप यज्ञार्थ सृष्टि के शुरू में उत्पन्न अतिथि के समान पूज्य, देवताओं में मुख्य वैश्वानर अग्नि को अरणियों द्वारा प्रकट किया गया। हे अमृत रूपी अग्नि! अरणियों से उत्पन्न तेरी सब स्तोता बच्चे के समान प्रशंसा करते हैं। तुम आकाश और पृथ्वी के बीच प्रदीप्त होते हो। तब यजमान दिव्य गुणों को प्राप्त होते हैं। अनुष्ठान नाभि धन के ग्रह श्रेष्ठ आहुति परिपूर्ण अग्नि की याज्ञिकगण भली-भाँति वंदना करते हैं। अनुष्ठानों का निर्वाहक अग्नि मंथन द्वारा प्रकट होता है। हे ऋत्विज! तुम सखा वरुण की विशाल उपासना करो और दोनों तुम्हारे अनुष्ठानों में पधारें। मित्र और वरुण दोनों सभी के अधिष्ठाता, जलोत्पादक, प्रकाशवान सब देवताओं में महान हैं। उनकी वंदना करो। मित्र और वरुण पवित्र और दिव्य धनों को देने वाले हो। हे देवद्वय! देवताओं में भी तुम्हारे महिमावान बल की प्रशंसा करते हैं। हे अद्भुत प्रतिभा वाले इन्द्र! इस यज्ञ कर्म में आकर ऋषियों द्वारा शुद्ध इस सोमरस को अपनाओ। हे इन्द्र देव! हमारी आराधना से प्रेरित इस निष्पन्न सोम वाले ऋत्विज के वेद वर्णित श्लोकों को यहाँ पधारकर प्राप्त करो। हे इन्द्रदेव! इन श्लोकों को सुनने के लिए बहुत शीघ्र ही पधारो। हमारे हवि रूप अन्न के धारण करने वाले बनो। जिस अग्नि की प्रचंड ज्वालाएँ सब वनों को घेरकर भस्मीभूत कर काला कर देती हैं उसी अग्नि की पूजा करो। इन्द्र के लिए प्रज्जवलित अग्नि में हवि देने वाला इन्द्र से अन्न सुख के लिए वर्षा के रूप में जल प्राप्त करता है। हे इन्द्राग्ने! तुम दोनों को हवि प्रदान करने के लिए हमें शक्ति देने वाला अन्न और द्रुतगामी अश्व प्रदान करो। सोम इन्द्रदेव के पेट में स्थित होता हुआ सखा रूप से बढ़ता है। तरुणियों को ग्रहण होने वाले पुरुष के समान सोम जलों को ग्रहण करता है। हे सोम ! ध्यानी स्तुति करने वाले यज्ञ कर्मों को करते और सोम को शोधते हैं। गाय इस सोम को देखते हुए अधिक दूध देने वाली होती है। वृद्धिदायक, शत्रु तिरस्कारक इन्द्र देव की अनुष्ठान कर्म अनुकूल करने वाला शत्रुओं से हिंसित नहीं होता परमपराक्रमी इन्द्र देव की वंदना करता हूँ, जिसके प्रकट होने पर गौएँ, बकरियाँ और क्षितिज-धरा के समस्त जीव सिर झुकाते हैं। हे मित्रों! सोम की वंदना का गान करो। पिता द्वारा शिशु को सुशोभित करने के समान हवि आदि पदार्थों से सोम को सजाया जाता है। हे ऋषियों ! साधक दिव्य गुण रक्षक हर्ष प्रदायक बलवदर्धक सोम को जलों से मिलाओ। वेग प्राप्त करने के लिए देवताओं के पीने को मित्र-वरुण के लिए सुखदायक बनाने के लिए सोम को शुद्ध करो। पराक्रमी, अनेक धार वाला सोम छनकर अनेक धाराओं में टपकता है। अनेक वीर्य वाला, जलों से पवित्र किया गया, गौघृत आदि से मिश्रित सोम क्षरित होता है। हे सोम ! ऋषियों द्वारा नियमपूर्वक शोधित और पत्थरों से निष्पन्न तुम इन्द्रदेव में उदर रूप कलश को ग्रहण हो। पास या दूर की जगहों में शोधे जाने वाले सोम इन्द्र देव के लिए होते हैं। वह हमारे अभिष्टदाता बने। जो सोम पास या दूर के कर्म प्रधान देशों करने वाले हों। वर्षणशील निष्पन्न सोम हमारे लिए वर्षा और संततिदाता हो। हे में नदियों के पास उत्पन्न होते हैं और संस्कारित किए जाते हैं वे हमारा मनोरथ पूर्ण अग्ने! उपासक, इच्छित स्तुतियों द्वारा तुम्हारे मन को सूर्यलोक से भी खींच लाते हैं। हे अग्ने! तुम समान दृष्टि वाला सभी दिशाओं का ईश हो। युद्धों में रक्षा के लिए आह्वान करते हैं। संघर्ष शक्ति के लिए सुरक्षा के लिए पूजा योग्य धनवान अग्नि का आह्वान करते हैं। हे असंख्य कर्म वाले इन्द्र देव! हमें अन्न व शक्ति प्रदान करो। शत्रु का नाश करके वीर पुत्र का दाता होओ। हे इन्द्रदेव! तुम पिता समान पालनहार बनो। माँ समान प्यार करने वाले बनो। हम तुमसे भीख माँगते हैं। स्तुति करने वाले से बलवान हुए यजमानों द्वारा स्तुत्य बल की कामना से प्रार्थना करते हुए उत्तम ऐश्वर्य भी माँगते हैं। हे वज्रिन! जो धन तुम दे सकते हो, वह तुम्हारे पास नहीं है। हे इन्द्र देव! हमको वह धन प्रदान करो। हे इन्द्रदेव ! जिस अन्न को तुम महान मानते हो, वह अन्न हमें प्रदान करो। हे इन्द्रदेव! पूजनीय एवं प्रसिद्ध हृदय से स्थित अन्न को तुम हमारे लिए देने वाले होओ। हे इन्द्रदेव! आप हमारी पृथ्वी को हरा-भरा करो। हरी-भरी पृथ्वी गौओं को अच्छी लगती है। पृथ्वी हरी-भरी होगी तो हम गौओं के दुग्ध और घी के सेवन से स्वस्थ रहेंगे। आप हमारे लिए हरा-भरा बनो।
हे वज्रिन! तुम हमें श्रेष्ठ धन प्रदान करो, हमारे शत्रुओं का धन हरण कर हमें प्रदान करो। हम तुम्हारे स्तोता हैं। हे इन्द्र ! तुम न हो तो यह भूमि मृत हो जाए। इसलिए मैं तुम्हारी वंदना करता हूँ।
अध्याय (10.1) :: ऋषि :- प्रतर्दनो दैवोदासि, असित, काश्यपो देवलो वा, उच्थ्य, अमहीयु, निघुवि, काश्यप, वशिष्ठ, सुकक्ष, कवि देवातिथि, कण्व, भर्ग, प्रगाथ, अम्बरीष, ऋजिश्वा च अग्नयेधिष्ण्या ऐश्वरा, उशना काव्य, नृमेघ जेता माधुच्छन्दस; देवता :- पवमान, सोम, अग्नि, इन्द्र; छन्द :- त्रिष्टुप, गायत्री, जगती, प्रगाथ, अनुष्टुप, उष्णिक।
उत्पन्न शिशु के समान सबको प्रसन्न करने वाले सोम को मरुद्गण शोधित करते हैं। फिर वह प्राथनाओं द्वारा ध्वनि करता हुआ कलश में जाता है। समदर्शी, सर्वसेवी, पूजनीय, परमपूज्य, सोम, जगत की अभिलाषा वाला पूजनीय हुआ इन्द्रदेव को प्रकाशमान करता है। प्रशंसित सामर्थों का दाता जल प्रेरक आकाश की इच्छा वाला सोम चन्द्रलोक को जाता है। इन्द्रदेव के बल की वृद्धि करने वाला यह सोम इन्द्रदेव को हर्षित करने वाले रसों की वृष्टि करता है। हे शोभित सोमों! तुम पवन और अश्विनी कुमार को ग्रहण हुए हमें पराक्रमी बनाओ। हे सोम! हृदय को इन्द्र की उपासना के लिए प्रेरित करो। मैं देव यजन साधन यज्ञ को कर रहा हूँ। हे सोम! तुम्हें दसों उँगलियाँ शोधती हैं और होता संतुष्ट करते हैं तथा वंदना करने वाले हर्षप्रदायक बनाते हैं। हे सोम ! छन्ने में शोधा जाता है तथा देवताओं को प्रसन्न करने के लिए तुम्हें गोघृतादि से युक्त किया जाता है। कलशों में निचौड़ा जाता हुआ तरल सोम।
तुम्हें हरे रंग का, गाय का दूध आदि पर ढके वस्त्रों पर, डाला जाता है। हे सोम! हम समृद्धि युक्त हुओं के समान गिरता हुआ समस्त शत्रुओं का विनाशक हो और मित्र इन्द्रदेव के साथी हो। हे सोम ! सर्वज्ञ इन्द्रदेव के तुम पेय पदार्थ का सेवन करते हुए हम पुत्रादि से परिपूर्ण अन्न आदि सुखों का प्रयोग करें। हे सोम ! आकाश से जल वृष्टि कर धरा पर अन्न को उत्पन्न करो, द्वन्द्वों में हमारी शक्ति को व्याप्त करो। परिष्कृत, अनेक धार युक्त शोधक सोम वायु इन्द्र के पान करने के लिए पात्र में स्थित होता है। हे सुरक्षा करने वालों! तुम सोधक, तृप्तिकर, देवपान योग्य सिद्ध किए गए सोम के सम्मुख नतमस्तक होकर वंदना गान करो। अन्न प्राप्ति के लिए किए गए इस देव की सफलता के लिए पूजनीय और शक्तिदायक सोम टपकते हैं। हे सोम ! तेजवान उत्तम सामर्थों की वर्षा करो और जीवन के संघर्षों के लिए अन्न की वर्षा करो। युद्ध की प्रेरणा वाले सोम ऋषियों द्वारा छन्ने में डालकर छाने जाते हैं। वह अद्भुत सोम हमको असंख्य समृद्धि और श्रेष्ठ पराक्रम प्रदान करें। गाय के बछड़े की तरफ जाने के समान ध्वनि करते हुए सोम पात्र में लाते हुए, हाथों में रहते हैं। सोम ही इन्द्रदेव को प्रसन्न करने के लिए तृप्तिकारक हैं। वह अपने शब्द से हमारे शत्रुओं का नाश करें। हे सोमों ! आदानशील का नाश करते हुए सबको देखने वाले तुम यज्ञ स्थान में स्थित हो जाओ। अनुष्ठान के लिए शोधे, बने मधुर रस से परिपूर्ण सोम की इन्द्रदेव के लिए उपयुक्त करते हैं। हे ऋत्विजों! बछड़े की तृप्ति के लिए ध्वनि करती हुई गौओं के समान इन्द्रदेव की वंदना करो। हर्ष प्रदान करने वाले राजवर्षक सोम यज्ञ स्थान में प्रतिष्ठित होता है। नदी की तरंगों के समान वाणी को तरंगित करता है। उत्तम सोम अंतरिक्ष नाभि के समान ऊन के छन्ने में संस्कृत होता है। कलशों में स्थित सोम अंश भूत सोम में चन्द्रमा का सौम्य गुण प्रविष्ट होता है। मधुदायक कलश को पूर्ण करने वाला सोम अतंरिक्ष के आश्रय स्थान में ध्वनित होता है। हमेशा प्रशंसा धनों का अधीश्वर सोम अमृतमयी वाणी में स्तुतियों को ग्रहण करें। हे शोधित सोम ! सुन्दर गृह और ऐश्वर्य को हमारे लिए स्थापित करो। निष्पन्न सोम अपनी तृप्तिकारक धारा से अद्भुत जगहों का मार्ग दर्शन देता है।
हे सोम! तरंगित ध्वनि के समान तुम भी तरंगित होते हो। तुम बाण की ध्वनि की शिक्षा दो। तुम्हारे प्राकट्य पर अनुष्ठान इच्छकों के ऋक यजु सोम रूप शब्द प्रकट होते हैं। अद्भुत, हरे पत्थरों से चूर्ण किए गए मधुर रस प्रदान करने वाले सोम को छन्ने में डालते हैं। हे आह्लादक सोम ! इन्द्रदेव के पेट में पहुँचाने के लिए छनता हुआ टपको! हे आह्लादक सोम! गाय के दूध आदि के मिश्रण से प्रशंसित तुम वृष्टि करते हुए इन्द्रदेव के पेट में जाओ। हे सोम! इन्द्र के सेवनार्थ अपने रस की वर्षा करो। तुम शत्रुओं के नाशक हो। इन्द्र के लिए हुए सोम द्वारा शत्रु का ध्वंस होता है। हे सोम ! हमको गौ, अश्व, स्वर्ण आदि वैभव और अन्न को देने वाला हो। हिंसको का नाशक, अदानशीलों का हिंसक सोम इन्द्र स्थल को ग्रहण हुआ धार रूप में गिरता है। हे तरल सोम ! हमको बहुत-सा धन, पुत्र और यश प्राप्त कराते हुए शत्रुओं का नाश करो। हे सोम ! तुम धन की इच्छा करते हो तो तुम्हें कोई नहीं रोक सकता। हे सोम! मनुष्यों के हितैषी जलों को प्रेरित करते हुए सूर्य को प्रकाशित करने वाली धारा से वर्षा करो। अतंरिक्ष मार्ग से जाने को प्रेरित सोम सूर्य अश्व रूपी तेज को जोड़ने वाला है। सोम को बुलाते हुए इन्द्रदेव हरे रंग वाले घोड़ों को सूर्य के समान प्रकाशमान रास्ते से परिपूर्ण करता है। हे देवताओं! यज्ञ के इस पूज्य अग्नि को दूत बनाओ। यह देवता होकर भी मनुष्यों का साथी है। यज्ञ से संबंधित ताप युक्त तेज वाला घृत-रक्षक एवं शोधक है। पृथ्वी पर चरते हुए अश्वों के समान दावानल फले हुए वृक्षों में जाता है, तब इसकी लपटें पवन के अनुगत होती हैं, फिर तुम्हारा रास्ता भी काले रंग का होता है। हे अग्ने! तुम्हारी ज्वालाएँ प्रदीप्त हैं। राक्षसों के नाश के लिए सोम और स्तुतियों से इन्द्र को बल देते हैं। वह धन प्रदान करने वाले इन्द्र हमको भी धन देने वाले हैं। प्रजापति ने इन्द्रदेव को धन देने के लिए निर्मित किया है। वह बलदाता इन्द्रदेव सोमपान के लिए ब्रह्मा ने नियुक्त किया है। वंदना द्वारा शक्तिशाली किया गया श्रेष्ठ अस्त्र से अपराजित इन्द्रदेव वंदना करने वालों को धन देने की अभिलाषा करता है। हे अध्वर्यु ! पाषाणों से सम्पन्न इस सोम को इन्द्र के पीने के लिए शुद्ध कर। हे सोम वह इन्द्रादि और मरुद्गण तेरे हर्ष प्रदायक रस का सेवन करते हैं। अत्यन्त मधुर, अद्भुत, अमृत के समान श्रेष्ठ सोम को वज्र धारण करने वाले इन्द्रदेव के लिए शोधो। शोधन योग्य रस से परिपूर्ण सर्वधारक सोम छन्ने में गिरता है। उसे हम जीव ही उपयुक्त करते हैं। वह सोम यजमान को गायों की कामना से इन्द्रदेव की पुष्टि को प्रेरित करता है। यह ऋषियों द्वारा दूध से मिलाया जाता है। हे संस्कार के लिए जाते हुए सोम ! तुम इन्द्र के उदर में जाओ। बिजली द्वारा बादलों के दुहे जाने के रूप समान हमारे लिए अद्भुत और पार्थिव गुणों का दोहन करो। कर्म करते हुए तुम अन्न की उत्पत्ति करो। हे इन्द्र देव! तुम दिशाओं में वर्तमान स्तोताओं द्वारा कार्यावसर पर बुलाए जाते हो। हे शत्रु तिरस्कार! तुम ऋषियों द्वारा प्रेरणा किए जाते हो। हे इन्द्र ! तुम मिलकर प्रसन्न किए जाते हो। ऋषि तुम्हें विभिन्न श्लोकों से वशीभूत करते हैं। हे इन्द्र ! आप हमारा कार्य करो। हमारे श्लोक और शास्त्र सम्मत वाणियों को इन्द्रदेव हमारे सम्मुख पधारकर श्रवण करें। प्रतिष्ठा वाली बुद्धि से परिपूर्ण इन्द्र पराक्रमी हुए। हमारे यहाँ पधारकर सोमपान करें। आकाश और पृथ्वी पर रहने वाले लोग संसार के उपकारक इन्द्र को अपनी शक्ति से पाते हैं। वह इन्द्रदेव देवताओं में श्रेष्ठ बनकर वेदी में प्रतिष्ठित हुए सोम की इच्छा करते हैं। हे सोम! अद्भुत हुए तुम वर्णशील हो। तुम्हारा तरंगपूर्ण रस इन्द्रदेव को ग्रहण हो। धारक रस पवन को मिले। हे तरल सोम! शत्रु को प्रताड़ित करने वाले तुम कलश को ग्रहण होओ। हे क्रियाओं के प्रेरक सोम! तुम आह्लादक और पवित्र प्रवाह वाले हो। तुम पापियों को दूर करो। हे हर्षप्रदायक! तुम हमको प्राणशक्ति देने वाले, अभिष्ट पालक, तेज और ऐश्वर्य के प्रदाता हो। हे श्रेष्ठ वास देने वाले सोम ! हम तुम्हारे मार्ग दर्शन स्वरूप धन देने के करीब पहुँचे तुम्हारे द्वारा ग्रहण आनन्द में स्थित हो। वह हर्षोत्पादक सोम प्रेरणा करता हुआ, आनन्द रस की वर्षा करता हुआ आए और इस यज्ञ में ज्ञान की प्रकाश वाली धाराओं को प्रेरित करे। हे सोम ! दिव्य गुणों को देने वाले तुम रस बहाने वाले पालक और वर्षणशील हो। हे सोम ! तुम अद्भुत गुणों के लिए प्रवाहित हो और प्रजाओं को सुखी करो। हे सोम ! तुम चमकदार पेय और अद्भुत गुणों के धारक हो। हे शक्तिशाली तुम अनुष्ठान में सत्य रूप से बरसो। हे अग्ने ! वंदना करने वालों को धन के निमित्त अत्यन्त प्रिय एवं मेहमान तुल्य, पूज्य हवि वाहक मित्र के समान सुखदायक तुम्हारा हम स्तवन करते हैं। अग्नि को मित्र आदि देवगण ने गार्हपत्य और आह्वानीय रूपों से दृढ़ किया है। हे सतत युवा इन्द्रदेव! हविदाताओं की सुरक्षा करते हुए उनकी वंदनाओं पर ध्यान आकृष्ट कर और हमारे पुत्र के भी रक्षक बनो। हे सभी को विजय करने वाले इन्द्र ! तुम दिखाई न देने वाले हमारे निकट प्रकट होओ। पर्वत के समान विशाल और प्रकाश के पालक हो। सत्य रूप आनन्द रस के पीने वाले इन्द्र ! तुम आकाश और पृथ्वी के सब रसों में श्रेष्ठ हो। हे इन्द्र ! तुम मन को साधक की ओर आकर्षित करने वाले तथा प्रकाश के स्वामी। हे इन्द्रदेव ! तुम शाश्वत, दोषनाशक, अज्ञान को खत्म करने वाले, यज्ञ करने वालों की वृद्धि करने वाले और अद्भुत लोक के स्वामी हो। यह दुष्ट नगरों का भेदक, सतत्, युवा कार्यों का पोषक, यजमान का रक्षक, पूजनीय इन्द्र द्वारा रचित हुआ है। हे वज्रिन ! तू शक्ति के द्वार को खोलने वाला तथा इन्द्रियों का शरण स्थल है। लोक को वश में रखने वाले इन्द्रदेव की वंदना करने वाले मानते हैं। उस इन्द्र देव का दान सहस्त्रों से भी पूर्ण है।
अध्याय (10.2) :: ऋषि :- पाराशर, शनु शेष, असित काश्यपो देवलो वा, राहुगण, प्रियमेघ, नृमेघ, पवित्रो आंगिरसो वा वशिष्ठों वा, उभौ वा, वशिष्ठ, वत्स, काण्व, शर्तवैखानसा, सप्तर्षय, वसुभारद्वाज, भर्गः प्रगाथ, भरद्वाज, मनुराप्सव, अम्बरीश ऋजिस्वा च, अग्नि धिष्णया, ऐश्वर्य, अमहीयु, त्रिशोक, काण्व, गौतमों राहूगण, मधुच्छन्दा वैश्वामित्र; देवता :- पवमान, सोम, पवमानाध्ये तृस्तुति, अग्नि, इन्द्र; छन्द :- त्रिष्टुप, गायत्री, अनष्टुप, बार्हत प्रगाथ, षङ्क्ति, जगती, उष्णिक।
जल की वर्षा करने वाला, सर्वरक्षक सोम विस्तृत जल धारक आकाश में प्रजोत्पत्ति के कारण महान अभीष्टपूरक संस्कारित सोम ऊन के छन्ने में वृहद होता है। हे स्तुत्य सोम ! अन्न धन के लिए वायु को प्रसन्नकर संस्कारित हुए तुम मित्र, वरुण, मरुत, इन्द्रादि एवं आकाश पृथ्वी को हर्षदायक हो। जलों के गर्भ रूप सोम देवताओं का सेवन करता हुआ, उसी ने इन्द्र को बल दिया, वही सूर्य को तेज देने वाला है। सोम बहुकर्मा है। प्रकाशमान, मृत्यु धर्म रहित यह सोम वेग पूर्वक कलश की ओर गति करता है। वंदना करने वालों से प्रशंसा को ग्रहण हविदाता को धन प्रदान करता हुआ जलों में वास करता है। यह तरल सोम वरण करने के योग्य समृद्धि को बल से वशीभत करता हुआ, देने की अभिलाषा करता है। यह दिव्य सोम यज्ञ में आने की इच्छा वाला अभीष्टदायक और शब्दवान है। यह दिव्य सोम प्रशंसकों द्वारा गीतों से सजाया जाता है। अंगुलियों से निचोड़ा हुआ अद्भुत सोम किसी के द्वारा न मारा जाकर शत्रुओं को समाप्त करता है। धाररूप वर्षा करता ध्वनिवान सोम अनुष्ठान स्थल से अद्भुत लोक को ऊपर की ओर जाने वाला है। उत्तम यज्ञवाला सोम किसी के द्वारा भी हिंसित न होता हुआ यज्ञ स्थान से दिव्यलोक को प्राप्त होता है। हरा चमकता हुआ यह सोम दिव्य गुणों के लिए सिद्ध किया जाता है। यह सोभ अन्नोत्पादक होता हुआ वर्षणशील असंख्य कर्मा है। अंगुलियों से निष्पन्न सोम इन्द्रस्थल को जाता हुआ कर्मों द्वारा पहुँचता है। श्रेष्ठदेव अनुष्ठान में असंख्य कार्यों वाला होता है। विभिन्न रस रूप अन्नों के वर्षक, पवित्र होने योग्य सोम को ऋत्विज कलशों में छानते हैं। हवियों से संगत यह सोम अग्नि के सम्मुख ले जाकर मध्य में डाले जाते हैं। अध्वर्युओं द्वारा देवार्पण के निमित्त होते हैं। श्वेत रश्मियों वाले वेगवान सोम बहते हुए अध्वर्युओं की संगति करता है। शक्ति से ऐश्वर्यों को धारण कराने वाला यह सोम वृषभ द्वारा सींगों को कंपाने के समान अपनी तरंगों से कंपित करता है। अकर्मण्य दुष्टों को पीड़ित करता हुआ यह सोम लाँघने की शक्ति वाला हुआ हिंसा योग्य दुष्टों को मारने के लिए जाता है। परमायुध युक्त आह्लादक हरे रंग वाले सोम को दसों अँगुलियाँ गतिवान करती हैं। अभीष्टवर्षक गतिमान सोम यजमानों का हजारों अन्न देने हेतु छनता हुआ कलश में प्रवेश करता है। इन्द्रदेव को पीने के लिए अँगुलियाँ इस हरे रंग के सोम को प्रेरित करती है। यह सोम प्राणियों में आग्रहपूर्वक आकर प्रेमी के समान अदृश्य रूप से स्थिर होता है। आकाश में उत्पन्न हुआ है। इस कारण उनके पुत्र तुल्य यह सोम हर्षयुक्त रस के रूप में सत्रको दिखाई देता है। देवताओं के लिए सम्पन्न हर सोम ध्वनि करता हुआ कलश में जाता है। इस सोम ! को दस अँगुलियाँ इन्द्र को प्रसन्न करने के लिए शुद्ध करती हैं। गति से पात्रों में जाता हुआ यह मनस्वी सोम ऊन के छन्ने में से धार रूप में गिरता है। देवताओं के लिए निष्पन्न यह सोम छनकर पवित्र होता हुआ देवों के शरीरों में दृढ़ होता है। मरण धर्म से अलग यह शत्रु नाशक सोम अद्भुत गुणों की अभिलाषा से कलश में स्थित होता है। अभिष्ट वर्षक यह सोम शब्द करता हुआ कलश में प्रविष्ट होता है। प्रसन्नताप्रद संस्कारित सोम सूर्य मंडल में स्थित सूर्य को प्रकाश प्रदान करता है। वागीश्वर अहिंसित सोम सबको ढकता हुआ प्रकाशित सूर्य द्वारा छन्ने पर डाला जाता है। पूजनीय सोम पवित्र होता हुआ शत्रु रहित काले हिरन की छाल पर कूटा जाता है। शक्तिसाधक, विजेता सोम इन्द्र देव और पवन के लिए निचोड़ा जाता है। अद्भुतलोक के मूर्धा रूप, अभीष्ठवर्षक सोम काठ के पात्रों में धार बाँधकर छोड़ा जाता है। गौ और स्वर्णादि धनों को हमारे लिए अभिलाषा करने वाला शत्रु विजेता अहिंसित सोम ध्वनि करने वाला है। अभीष्टपूरक हरे वर्ण का पवित्र करने वाला उज्जवल सोम छन्ने में टपकता है। यह इन्द्रदेव को तृप्त करने वाला है। देवताओं की सुरक्षा करने वाला, पाप कर्मियों को समाप्त करने वाला, समाप्त न करने योग्य पवित्र पराक्रमी सोम कलश में जाता है। दिव्य कामना वाला यह सोम इन्द्र के द्वारा निकाला गया, अभीष्टवर्षक दुष्टों का नाश करने के लिए छन्ने में जाता है। सर्व-द्रष्टा पाप-नाशक, धारक सोम छनता हुआ ध्वनि करता हुआ और कलरव होता है। आकाश में गमन करने वाला वेगयुक्त दैत्यनाशक, शोधित सोम छनकर धारयुक्त है। यह सोम यज्ञ में संस्कारित हुए अत्यन्त तेज से सूर्य को प्रकाशित करता है। शत्रुनाशकवर्षक, निष्पन्न, धनदायक, अहिंसनीय सोम अश्व वेग से कलश में प्रवेश करता है। दिव्य तरल सोम अपने रस से इन्द्र की पूजा करता हुआ कलशों की ओर वेग से जाता है। ऋषियों द्वारा सम्पादित वेद के सार रूप पवमान वाले श्लोकों का पाठ करने वाला पुरुष शुद्ध हुई भोज्य सामग्री को स्वाद से सेवन करता है। ऋषि सम्पादित वेद की चार ऋचाओं के पाठ करने वाले के लिए सरस्वती अनुष्ठान साधक दूध घृत एवं आनन्द परिपूर्ण पेय को अपने आप दुहती हैं अर्थात् उसे वेदज्ञान स्वयं हो जाता है। पवमानी ऋचाएँ कल्याणकारी और श्रेष्ठ फलदायी हैं। मंत्र द्रष्टाओं ने उनका संपादन कर अविनाशी बल की स्थापना की है। देवताओं द्वारा सम्पादित पवमानी ऋचाएँ हमें इहलोक और परलोक में सुखी करें और हमारे अभीष्ट की पूरक हों। देवगण जिन शुद्ध साधनों से अपने शरीर को पवित्र रखते हैं, उन साधनों द्वारा पवमानी ऋचाएँ हमको भी पवित्र बनाएँ। अनि और सूर्यमान सोम से संबंधित पवमानी ऋचाएँ अमर फल प्रदान करती हैं। उन ऋचाओं का पूजन करने वाले दिव्य धाम को जाते हैं और पुण्य भोग कर अमरतत्व को प्राप्त होते हैं। अपने आह्वानीय स्थलों में कोष्ठों द्वारा ज्योतिर्मय क्षितिज भू के मध्य में दिव्य ज्योति वाले श्रेष्ठ आहुति परिपूर्ण अग्नि का प्रणाम पूर्वक शरण ग्रहण करते हैं। अपने तेज से पापनाशक, धन का गृह वह अग्नि स्थल में पूजित होता है। वह हम उपासकों की पाप कर्म और निन्दा से रक्षा करें। हे अग्ने ! तुम पाप का नाश करने वाले वरुण और पुण्य कर्मों में मित्र रूप हो, श्रेष्ठ जितेन्द्रिय साधक तुम्हें स्तुतियों द्वारा वृद्धि को प्राप्त कराते हैं। तुम्हारे देय धन हमारे लिए सेवनीय हों और तुम समस्त देवों से युक्त हमारे रक्षक बनो। वृष्टि मेघ के समान अपने तेज से श्रेष्ठ वह इन्द्रदेव पुत्र समान वंदना करने वालों की वंदनाओं से बढ़ोतरी को ग्रहण होता है। वंदना करने वालों द्वारा इन्द्रदेव को अनुष्ठान का साधन बनाते हो, शास्त्र निरर्थक हो गए। क्षितिज को पूर्ण कर अनुष्ठान के लिए साक्षात हुए इन्द्रदेव को उसके घोड़े ले जाते हैं, तब अनुष्ठान को सफल कराने वाले श्लोक से ऋत्विज इन्द्रदेव का गुणगान करते हैं। अंधकार का बार-बार विनाश करने वाले,, हरे रंग वाले सर्वत्र गमनशील तेज होने वाले सोम की आनन्दवर्षक धार छन्ने में से गिरती है। अधिक चमकता हुआ हरे रंग का सोम मरुद्गण की सहायता से पुष्ट सबको तरंगित करता है। हे सोम! अत्यन्त बल और अन्नदायक तुम पूजकों को उत्तम संतान और धन प्रदान करते हुए संसार को तरंगित करते हो। देवताओं का उत्तम पुत्र हवि मनुष्यों का हितैषी जलों में प्रविष्ट होता है। अध्वर्यु उसे पत्थरों से काटते हैं। उस सोम का सेवन करो। हे सोम! किसी के द्वारा भी नष्ट किया जाता तू अत्यन्त सुगंधित शुद्ध भाग गौ के घृत से मिलकर हमारे द्वारा सम्पन्न हो। दिव्य तृप्ति, यज्ञ साधक, चमकता हुआ सोम सबके देखने के लिए कलश में टपकता है। प्रकाश बरसाने वाला, हरा सोम छन्नों की ओर ध्वनि करता हुआ छनता है। वह पक्षी के वेग से जल से पूर्ण पात्र में जाता है। बड़े पात्र वाले सोम पृथ्वी की नाभि रूप पर्वत पर स्थापित होते हैं। वे जलों और स्तुतियों को प्राप्त करते हुए यज्ञस्थान को जाते हैं। हे सोम ! तुम यज्ञ विधान की कामना वाले छन्ने को प्राप्त होता है व हमारे पापों का नाश करता है। वह हमें सुखी करे। जल छाया दोषरहित है। हे पूर्व पुरुषों! सूर्य को सेवन करने वाली किरणों के समान इन्द्रदेव का सेवन करो। अपनी शक्ति से इन्द्रदेव जिन धनों को प्रकट करता है। उन्हें हम पूर्वजों के हिस्से के समान ग्रहण करते हैं। हे वंदना करने वालों! सत्यानुयायियों को प्रदान करने वाले इन्द्रदेव की पूजा करो। वह कल्याणरूप दान का मार्ग दर्शन करने वाला आराधक की अभिलाषा व्यर्थन नहीं होने देता। हे इन्द्रदेव! हिंसा करने वाले डर से हमें बचाओ। हमारी रक्षा के लिए सामर्थ्य ग्रहण कर शत्रु और हिंसकों को समाप्त करो। हे धनेश इन्द्रदेव! हमारे देने को तुम असंख्य धनों के धारक हो। हे पूजनीय! सोम को सिद्ध कर हम तुम्हें पुकारते हैं। हे सोम ! परम सुख वालों तुम हमारे अहिंसा वाले यज्ञ में अपनी धाराओं को धन देने वाली बनाकर साधकों के इच्छित कलश में सिद्ध हों। हे सोम ! तुम अत्यन्त शक्ति से यज्ञ धारक दीप्ति विजेता और किसी से भी नष्ट न होने वाले हो। हे सोम ! देवताओं के सेवनार्थ धारा रूप कलशस्थ हो। शक्तियुक्त हुआ हमारे पात्रों में आओ। जलों में प्रविष्ट हुए तेरी शक्ति को इन्द्रदेव बढ़ाते हैं। फिर देवगण अमरत्व प्राप्ति हेतु तुम्हारा पान करते हैं। क्षितिज से वर्षक तक आराधकों को अद्भुताप्रद संस्कारित! तुम हमको धन दिलाओ। हम सभी के इच्छित, पापनाशक सोम को शुद्ध करते हैं। वह समस्त देवताओं को हर्ष परिपूर्ण रस युक्त ग्रहण हो। पत्थरों द्वारा कूटे हुए इन्द्रदेव के प्रिय तथा सभी की अभिलाषा किए हुए सोम को दसों उँगलियाँ भली-भाँति पवित्र करती हैं। हे सोम! दुष्टनाशक इन्द्र के पान करने को जिसके लिए जाना वाला यज्ञ दक्षिण वाला होत है। उसके लिए तथा यज्ञ करने वाले के लिए तुम मंत्रों में टपकते हो। हे सोम ! अश के समान जल से स्वच्छ किया हुआ तुम ऐश्वर्य और शक्ति के लिए पात्र में आओ हे सोम ! हर्ष के लिए तुम्हें साधकगण शुद्ध करते हैं। अन्न और यश के लिए तुझ् शोधा जाता है। देवताओं के निमित्त उनके पुत्र के समान प्रिय और संस्कार वाले सोम को ऋषि शुद्ध करते हैं। प्रकट मार्ग दर्शन से, शत्रु-नाशक, गौ-घृत आदि सिद्ध किए गए सोम को देवगण ग्रहण करते हैं। इन्द्रदेव के हृदय का सेवन करने वाले सोम को हमारी वंदनाएँ वृद्धि करें, उसी प्रकार, जैसे शिशु की माताएँ अपने दुग्ध से उसकी वृद्धि करती हैं। हे सोम ! हमारी गौओं को सुखवर्षक बनो। अन्न राशि से हमारे ग्रह को पूर्ण करो। हे पूजनीय ! कलश रूप की वृद्धि करो। अग्नि प्रज्जवलित करने वाले साधकों का इन्द्र सदैव मित्र रहते हैं। वे साधक क्रमपूर्वक कुशाएँ बिछाय करते हैं। ऋषियों के पास समिधाएँ पर्याप्त मात्रा में रहें। श्लोक भी असंख्य है उनका इन्द्रदेव सदैव मित्र रहते हैं। इन्द्र जिनके मित्र हैं, उसमें जो युद्धा होते हैं वह शत्रु को अपने बल के सम्मुख झुका लेते हैं। हविदाता को धन देने वाले इन्द्रदेव, जिनके कोई प्रतिकूल नहीं रहता, वह संसार का स्वामी है। जो यजमान सोम का संस्कार करता हुआ तुम्हारी आराधना करता है, उसे हे इन्द्रदेव! तुम शीघ्र ही शक्ति देते हो। वह हमारी वंदनाओं को सुनते ही असाधक को क्षुद्र पौधे के समान समाप्त कर देते हैं। हे इन्द्रदेव! वंदना करने वाले तुम्हारा गुणगान करते और मंत्रोच्चार द्वारा अर्चना करते हैं। ऋत्विज तुम्हें उच्च पदवी देते हैं। यजमान सोम समिधा आदि के निमित्त पर्वत पर जाते हैं और यह यज्ञ में जाने को उद्यत होते हैं। हे सोमपायी इन्द्र! पुष्ट अश्वों को रथ में जोड़कर प्रार्थनाएँ सुनने के लिए यहाँ पधारो।
अध्याय (11.1) :: ऋषि :-
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संतोष महादेव-धर्म विद्या सिद्ध व्यास पीठ (बी ब्लाक, सैक्टर 19, नौयडा)
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अक्षरं परमं ब्रह्म ज्योतीरूपं सनातनम्।
गुणातीतं निराकारं स्वेच्छामयमनन्तजम्॥
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि॥
[श्रीमद्भगवद्गीता 2.47]
अग्न आ याहि वीतये गृणानो हव्यदातये।
नि होता सत्सि बर्हिषि॥
हे अग्नि देव! सभी लोग आपकी वन्दना करते हैं। यज्ञ में हम आपको आमन्त्रित करते हैं। आप हमारे यज्ञ को गति देने हेतु आएं, क्योंकि आप ही सभी पदार्थों को देने वाले हैं।(सामवेद 1.1.1)
Hey Agni Dev! Everyone worship you. We invite in the Yagy. Come to accelerate our Yagy, since its you who grant us all materials.
त्वमग्ने यज्ञानां होता विश्वेषां हितः। देवेभिर्मानुषे जने॥
हे अग्निदेव! आप उन सभी दैवीय शक्तियों को एकत्रित करने वाले हैं, जिनकी विद्यमानता (प्राप्ति) यज्ञों में अटल मानी गई है। आपको समस्त देवताओं के द्वारा मानव समूह के बीच सम्मानित किया जाता है।(सामवेद 1.1.2)
Hey Agni Dev! You bring together all divine powers, the presence of which is essential during the Yagy. You are honoured by all the demigods-deities in the presence of all humans beings.
अग्निं दूतं वृणीमहे होतारं विश्ववेदसम्। अस्य यज्ञस्य सुक्रतुम्॥
हे अग्निदेव! आप इस संसाररूपी यज्ञ के श्रेष्ठ विधाता हैं, आप में सभी दैवीय शक्तियों को तृप्त करने की क्षमता है। आप यज्ञ के निर्माता हैं तथा बुरे कर्मों में लिप्त हुए लोगों को दंड देने वाले हैं। ऐसे परमेश्वर की हम वन्दना करते हैं।(सामवेद 1.1.3)
Hey Agni Dev! You are the Lord of Yagy in the form of this universe, having the power to satisfy-satiate all divine powers. You are the builder of Yagy and punish those who are engaged is sinful-vicious acta. We worship such deity-God.
अग्निर्वृत्राणि जंघनद् द्रविणस्युर्विपन्यया। समिद्धः शुक्र आहुतः॥
यज्ञ करने वालों के उत्तम प्रयासों से आनन्दित होकर उन्हें सम्पन्नता प्रदान करने वाले हे सर्व व्यापक अग्ने! आप उन समस्त लोगों को नष्ट कर दें, जो बुरे कर्मों में लिप्त हैं।(सामवेद 1.1.4)
Hey all pervading Agni Dev! You gladden with the best efforts of accomplishing Yagy and grant pleasure to those who perform Yagy. Destroy all those who are engaged in nefarious, wicked-sinful deeds.
प्रेष्ठं वो अतिथिं स्तुषे मित्रमिव प्रियम्। अग्ने रथं न वेद्यम्॥
हे सर्व व्यापक अग्नि देव! आप आराधकों की मनोकामना पूर्ण करने वाले, समस्त प्राणियों पर सदैव अपनी कृपादृष्टि रखने वाले एवं सखा के भाँति आचरण करने वाले हैं।(सामवेद 1.1.5)
Hey All pervading Agni Dev! You accomplish the ambitions, desires-motives of the worshipers, has blissful watch over them and act like a colleague-friend.
त्वं नो अग्ने महोभिः पाहि विश्वस्या अरातेः। उत द्विषो मर्त्यस्य॥
हे अग्नि देव! आप विश्व के उन सभी लोगों के संपर्क से हमारी रक्षा करें जो ईर्ष्या करने वाले तथा विद्वेष रखने वाले हैं तथा असाधारण परिस्थितियों में हमें धैर्यशील बनायें।(सामवेद 1.1.6)
Hey Agni Dev! Protect us from all those who have enmity and envy with us. Make us patient during distress, abnormal circumstances.
एह्यूषु ब्रवाणि तेऽग्न इत्थेतरा गिरः। एभिर्वर्धास इन्दुभिः॥
हे अग्नि देव! हम आपकी ही वन्दना करना चाहते हैं। आप हमारी वन्दना सुनकर आप हमें प्राप्त हों तथा इस सोमरस द्वारा अपनी महानता का प्रसार करने की कृपा करें।(सामवेद 1.1.7)
Hey Agni Dev! We wish to worship you only. You should respond to us and extend your glory with this Somras.
हे अग्नि देव! हम आपके पुत्र रूप जीव अपने हृदय से आपकी वन्दना करके आपको प्राप्त करने की इच्छा रखते हैं।(सामवेद 1.1.8)कृपा दृष्टि :: kind glance, favour, benevolent gaze.सामवेद आग्नेयं पर्व (1.7) :: ऋषि :- श्यावाच वामदेव, उपस्तुत वार्हिष्ट, बृहदुक्य, कुल्स, भरद्वाज, वामदेव, वसिष्ठ, त्रिशिरा, त्याष्ट्र; देवता :- अग्नि; छन्द :- त्रिष्टुप्, जगती गायत्री।
आ जुहोता हविषा मर्जयध्वं नि होतारं गृहपतिं दधिध्वम्।
इडस्पदे नमसा रातहव्यं सपर्यता यजतं पस्त्यानाम्॥
हे मनुष्यों! आप सदैव पवित्रता में वृद्धि करने हेतु हवन करें। आप अपने पूजा-स्थल में भी उस अग्नि देव की प्रतिदिन आराधना करें, जो सम्पूर्ण जगत् के पालनकर्ता हैं। आप अपने यज्ञ में प्रयुक्त होने वाले पदार्थों के संग ही शरीर रूपी घर के अधिपति अग्नि देव को भी प्रति स्थापित करें और उनकी वन्दना करते हुए उनका आदर करें।(सामवेद 1.7.1)
Hey humans! Perform Hawan-Yagy for the sake of purity-piousity. Worship Agni Dev who is the supporter-nurturer of the universe at your prayer site every day. Establish the Lord of home Agni Dev along with the Yagy materials and honour him while worshiping-praying.
चित्र इच्छिशोस्तरुणस्य वक्षथो न यो मातरावन्वेति धातवे।
अनूधा यदजीजनदधा चिदा ववक्षत्सद्यो महि दूत्यां 3 चरन्॥
हे अविनाशी अग्नि देव! आपका बाल्यावस्था से सीधे तरुण रूप (प्रखर) हो जाने का क्रम बहुत ही अलौकिक है। आप जन्म लेने के पश्चात् अपनी स्तनर हित दोनों ही माताओं (धरती एवं अरणियों) के निकट दुग्धपान (आहार पाने) के उद्देश्य से नहीं जाते, बल्कि उत्तम देवदूतों की भूमिका निभाते हुए देवताओं के समीप हवि (हवनीय पदार्थ) पहुँचाते हैं।(सामवेद 1.7.2)
Hey immortal Agni Dev! Your direct conversion from infancy to youth is divine. With your birth you do not approach your mothers viz earth and wood for drinking milk, in stead perform the job of divine messenger and carry the offerings to demigods-deities.
इदं त एकं पर ऊ त एकं तृतीयेन ज्योतिषा सं विशस्व।
संवेशनस्तन्वे 3 चारुरेधि प्रियो देवानां परमे जनित्रे॥
हे मृत्यु के मुख में जाने वाले मनुष्य! अग्नि तेरा एक हिस्सा है, दूसरा अंश वायुरूप है, तीसरे सूर्य रूप प्रखर से अपने शरीर को संयुक्त कर दो। उन तीनों से जुड़कर हे मनुष्य! बलशाली बनकर और पवित्र स्थल में उत्पन्न होकर, देवताओं के प्रिय तथा महान् बनो।(सामवेद 1.7.3)
Hey human going into the mouth of death! Join-combine the first segment of your body as Agni-fire, second segment as Vayu-air and the third segment constituting of the Sun. Hey human! Become mighty-strong, evolve at the pious site and become dear to demigods and mighty.
इमं स्तोममर्हते जातवेदसे रथमिव सं महेमा मनीषया।
भद्रा हि नः प्रमतिरस्य संसद्यग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव॥
आदरणीय जातवेद (अग्निदेव) को हवन में उत्पन्न करने हेतु वन्दनीय हवि को रथ की भाँति सोच समझकर प्रयोग करते हैं। अग्नि से परिपूर्ण होने वाले हवन में हमारी भलाई के विषय में विचार करने वाली बुद्धि संलग्न है। हे अग्ने! हमें सदैव आपकी मित्रता प्राप्त हो और हम कभी किसी के द्वारा दुःखी न हों।(सामवेद 1.7.4)
Worship able offerings are used as charoite in the Yagy for evolving revered Jat Ved-Agni Dev. Our intellect is fused with the ideas of our welfare, pertaining to Yagy, full of Agni-fire. Hey Agne! We should always have your friendship and should not suffer from any pain-sorrow.
मूर्धानं दिवो अरतिं पृथिव्या वैश्वानरमृत आ जातमग्निम्।
कविं सम्राजमतिथिं जनानामासन्नः पात्रं जनयन्त देवाः॥
समस्त देवताओं से ऊपर स्वर्ग लोक में निवास करने वाले, पृथ्वी लोक के अधिपति, कर्म के रूप में समस्त जीवों में विद्यमान, महान् ज्ञानी तथा प्रचण्ड तेज से युक्त, हवि में उपस्थित होने वाले अतिथि के समान, वेदों के कर्ता, पूजा करने योग्य देवताओं के मुखरूप, अविनाशी अग्नि देव! देवताओं के माध्यम से उत्पन्न किये गये।(सामवेद 1.7.5)
Immortal Agni Dev evolved in the heavens over-above all demigods, lord of earth, present in all living beings as effort, great scholar, possessing great aura-radiance, present in the offerings-oblations as a guest, performer of Veds, like the mouth of worship able demigods, hey Agni Dev! You are evolved through the demigods.
वि त्वदायो न पर्वतस्य पृष्ठादुक्थेभिरग्ने जनयन्त देवाः।
तं त्वा गिरः सुष्टुतयो वाजयन्त्याजिं न गिर्ववाहो जिग्युरश्वाः॥
हे सर्वव्यापक अग्नि देव! जिस तरह हिमालय के शिखर से जल का बहाव नीचे की ओर होता है, उसी तरह महान् पुरुष यज्ञकर्ता अपनी वन्दना के माध्यम से आपको उत्पन करते हैं। जिस तरह अश्व रणभूमि में जाकर विजेता का पद प्राप्त करते हैं, उसी तरह हमारी श्रद्धा से युक्त वन्दनाओं से आप परम शक्तिशाली बन जाते हैं।(सामवेद 1.7.6)
Hey all pervading Agni Dev! The way water from the Himalay flow in the down ward direction, similarly the great humans performing Yagy produces you by means of worship. The way the horse attains the title of winner, similarly our prayers accompanied with honour make you mighty.
आ वो राजानमध्वरस्य रुद्रं होतारं सत्ययजं रोदस्योः।
अग्निं पुरा तनयित्नोरचित्ताद्धिरण्यरूपमवसे कृणुध्वम्॥
हवन के अधिपति ईश्वर ने स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक में परमार्थभूत हवि परिपूर्ण करने वाले प्रखर प्रकाश से युक्त अग्नि देव को अपने यज्ञादि के प्रक्रिया की रक्षा करने हेतु बिजली की प्रथम नाद से उत्पन्न किया।(सामवेद 1.7.7)
Lord of Hawan the God evolved Agni Dev shinning with sharp light, with the sound-thunder of lightening for the protection of Yagy, for the fulfilment of offerings-oblation for the welfare of others.
इन्धे राजा समर्यो नमोभिर्यस्य प्रतीकमाहुतं घृतेन।
नरो हव्येभिरीडते सबाध आग्निरग्रमुषसामशोचि॥
यह तेजस्वी स्वरूप वाले, वैश्वानर के रूप में सभी जीवों में स्थित अग्निदेव (पोषक आहार) अनाज एवं (प्रेम) घी के माध्यम से प्रदीप्त होते हैं। समस्त मानव जन इस स्वतः संचालित हवन में हिस्सा बनते हैं। यह (जीवन रूपी यज्ञ की) अग्नि उषा काल के पहले (पृथ्वी पर उत्पन्न होने के पहले माता के गर्भ में ही) प्रदीप्त हुई है।(सामवेद 1.7.8)
Agni Dev with radiance, present as Vaeshwanar Agni in all living beings lit up by virtue of Ghee. All humans beings automatically become the part & partial of the Hawan-life process, cycle. This fire in the form of life Yagy is evolved during dawn (Usha Kal-morning) in the womb of mother.
प्र केतुना बृहता यात्यग्निरा रोदसी वृषभो रोरवीति।
दिवश्चिदन्तादुपमामुदानडपामुपस्थे महिषो ववर्ध॥
प्रकाश से युक्त ये अग्नि देवता पृथ्वी और स्वर्ग के मध्य में स्थित (आकाश) से उत्पन्न होकर, दोनों लोक एवं धरती के मध्य अपने स्वरूप को तीव्रता से प्रदर्शित करते हैं। (बिजली गर्जना के रूप में) एवं पानी (बादलों) के मध्य यह प्रवर्धमान होते हैं।(सामवेद 1.7.9)
Accompanied with light Agni Dev present between the heavens & earth i.e., sky; indicate his sharpness as thunderous lightening and boost due to clouds-water.
अग्निं नरो दीधितिभिररण्योर्हस्तच्युतं जनयत प्रशस्तम्। दूरेदृशं गृहपतिमथव्युम्॥
गुणगान करने योग्य, यशस्वी, गति से युक्त, दूर से ही देखकर सब कुछ समझ जाने वाले, गृह के निर्माता, रक्षा करने वाले तथा समस्त जनों का उद्धार करने वाले अग्नि देव को यज्ञकर्ताओं ने अरणि मन्थन के माध्यम से उत्पन्न किया।(सामवेद 1.7.10)
Deserving prayers, honourable, dynamic, capable of understanding every thing from a distance, protector of all and rescuer of all huma beings Agni Dev is evolved by the Yagy performers by rubbing of wood.
सामवेद आग्नेयं पर्व (1.8) :: ऋषि :- बुधगविष्ठि, वत्सप्रिर्भालन्दन, भरद्वाज, विश्वामित्र, वसिष्ठ; देवता :- वायु, अग्नि, पूषा; छन्द :- त्रिष्टुप्।
अबोध्यग्निः समिधा जनानां प्रति धेनुमिवायतीमुषासम्।
यह्वा इव प्र वयामुज्जिहानाः प्र भानवः सस्रते नाकमच्छ॥
यज्ञ कर्ताओं की श्रद्धा के माध्यम से प्रदीप्त, इन अलौकिक अग्निदेव की शिखाएँ उसी प्रकार उषाकाल में अपनी ज्योति के माध्यम से स्वर्गलोक तक विस्तारित हो जाती है, जिस प्रकार पेड़ की डालियाँ प्रसारित हो जाती हैं।(सामवेद 1.8.1)
Evolved by virtu of the honour of the Yagy accomplishers, the flames of divine Agni Dev move towards the heavens during Usha Kal-dawn, like the branches of trees which grow further.(02.11.2025)
सामवेद आग्नेयं पर्व (1.8) :: ऋषि :- बुधगविष्ठि, वत्सप्रिर्भालन्दन, भरद्वाज, विश्वामित्र, वसिष्ठ; देवता :- वायु, अग्नि, पूषा; छन्द :- त्रिष्टुप्।
प्र भूर्जयन्तं महां विपोधां मूरैरमूरं पुरां दर्माणम्।
नयन्तं गीर्भिर्वना धियं घा हरिश्मश्रुं न वर्मणा धनर्चिम्॥
हे ऋत्विजों! दैत्यों पर विजय प्राप्त करने वाले, सूर्य की भाँति तेजस्वी किरणें से युक्त, धरती को गति देने वाले, ज्ञानी लोगों के रक्षक, बुद्धिहीन मनुष्यों के आधार का विनाश करने वाले, महाज्ञानी, बन्दना करने वाले पुरुषों को धन, वैभव प्राप्त कराने वाले, सम्पूर्ण जगत् के पालनकर्ता, वन्दनीय अग्नि देव को अपनी वेदवाणी से युक्त वन्दना से संतुष्ट करो।(सामवेद 1.8.2)
Hey Ritviz Gan! Satisfy revered, great scholar, nurturer of the universe, victorious over demons, aurous-radiant like Sury Dev, maker of the earth dynamic, protector of the enlightened, destroyer of the duffers-idiots with roots, grants wealth and grandeur to the worshipers; Agni Dev with prayers and the Ved Vani.
शुक्रं ते अन्यद्यजतं ते अन्यद्विषुरूपे अहनी द्यौरिवासि।
विश्वा हि माया अवसि स्वधावन्भद्रा ते पूषन्निह रातिरस्तु॥
एक-दूसरे के विपरीत स्वरूप वाले दिवस एवं रात्रि आपकी कृपा से ही होते हैं। हे जगत् के पालन-पोषण कर्ता पूषन् देव! दोनों लोकों के समतुल्य आभामय आप सम्पूर्ण जीव-जगत् का संरक्षण करने वाले हैं। आप सूर्य की भाँति तेज से युक्त हैं। आपका कृपारूपी अनुदान जो सबका भला चाहने वाला है, वह हमें प्राप्त हो।(सामवेद 1.8.3)
Day & night with opposite traits, appear due to your grace. Hey nurturer of the universe Pusha Dev! You grant protection-support to the living beings of both abodes (heavens & earth). You are energetic like the Sun. By virtue of your grace we should avail the help-donation, which is meant for the welfare of all.
इडामग्ने पुरुदंसं सनिं गोः शश्वत्तमं हवमानाय साध।
स्यान्नः सूनुस्तनयो विजावाग्ने सा ते सुमतिर्भूत्वस्मे॥
हे अविनाशी अग्ने! आपकी उदारशयता, भली-भाँति आराधना करने वाले हम (याजकों) लोगों के लिए हितकारी सिद्ध हो। आप हमें गाएँ एवं धरा अविरल प्रदान करते हैं, जिसका उपयोग करके हम अपने अभीष्ट कार्यों को पूर्ण करते हैं। हमारे द्वारा उत्पन्न हुई संतान हमारे वंश को आगे बढ़ाने में समर्थ हो।(सामवेद 1.8.4)
Hey immortal Agni Dev! Your liberal nature should be beneficial to us-the Yajak, properly. You continuously grant us cows & land by using which, we accomplish our goals-targets. Let our progeny be capable of continuing our clan.
प्र होता जातो महान्नभोविन्नृषद्मा सीददपां विवर्ते।
दधद्यो धायी सुते वयांसि यन्ता वसूनि विधते तनूपाः॥
सभी गृहों में उपस्थित रहने वाली अग्नि, सूर्य की भाँति आकाश के मध्य बिजली के रूप में समाहित रहती है। वही यज्ञ के लिए प्रयुक्त होने वाली अग्नि के रूप में प्रति स्थापित है। वह (अग्नि) हवन कुण्ड में भली-भाँति प्रदीप्त होकर यज्ञकर्ताओं को आहार, धन, वैभव प्रदान करने तथा उनके शरीर को संरक्षण प्रदान करने वाली सिद्ध हो।(सामवेद 1.8.5)
Agni present in all houses-planets remain present in the sky like the Sun in the form of lightening. Its used for the Yagy. On being lit in the Hawan Kund properly, this Agni grants food, wealth, grandeur and protection to the Yagy performers.
प्र सम्राजमसुरस्य प्रशस्तं पुंसः कृष्टीनामनुमाद्यस्य।
इन्द्रस्येव प्र तवसस्कृतानि वन्दद्वारा वन्दमाना विवष्णु॥
इंद्र देवता के समतुल्य शक्तिशाली, मानवों द्वारा पूजा करने योग्य तथा स्तुत्य, ईश्वर के उत्तम स्वरूप अग्नि देव की वन्दना करो। प्रसन्न चित्त भाव से उनकी स्तुति कर उनकी आराधना का लाभ प्राप्त करो। जो लोग अग्नि देव की स्तुति करते हैं, वह सदैव उनसे संतुष्ट रहते हैं।(सामवेद 1.8.6)
Worship Agni Dev who is powerful like Indr Dev, worshipable and excellent form of the God. Worship him happily and obtain the benefits of his Stuti. Those who worship Agni Dev always remain satisfied-content.
अरण्योर्निहितो जातवेदा गर्भ इवेत्सुभृतो गर्भिणीभिः।
दिवेदिव ईड्यो जागृवद्भिर्हविष्मद्भिर्मनुष्येभिरग्निः॥
यह अग्नि जो सब कुछ जानने वाली है, गर्भवती स्त्री के गर्भ में सुरक्षित शिशु की भाँति अरणियों (आत्मा व प्रणव) में विद्यमान रहती है। हवन की जिज्ञासा रखने वाले याजकों के माध्यम से यह नित्य स्तुति करने योग्य है।(सामवेद 1.8.7)
Agni which knows every thing is present in the wood like the foetus in the womb of mother. It deserve worship everyday by the desirous of Yagy everyday.
सनादग्ने मृणसि यातुधानान्न त्वा रक्षांसि पृतनासु जिग्युः।
अनु दह सहमूरान्कयादो मा ते हेत्या मुक्षत दैव्यायाः॥
हे अग्नि देव! आप अजेय हैं। आप सदैव असुरों का विनाश करते हैं। आपने सदैव शत्रुओं को रणभूमि में परास्त किया है। आप कुटिल प्रकृति के दुराचारियों को, जो कुटिल कृत्य द्वारा प्राप्त भोजन करते हैं, विनष्ट करें। वे पापीजन आपकी तेजस्विता से बचकर न निकल सकें।(सामवेद 1.8.8)
Hey Agni Dev! you are invincible. You keep destroying the demons-wicked. You always defeat the enemy in the battle field. Destroy the vicious-wicked, depraved who attain food through wicked-impious means. Those sinners should not escape your might-power.
सामवेद आग्नेयं पर्व (1.9) :: ऋषि :- गय, आत्रेय, भरद्वाज, मृक्तवाहा, द्वित, बसूयव, गोपवन, पुरुरात्रेय, वामदेव, कश्यप, या मारीचो, मनु या वैवस्वत अथवा दोनों; देवता :- अग्नि; छन्द :- अनुष्टुप्।
अग्न ओजिष्ठमा भर द्युम्नमस्मभ्यमध्रिगो। प्र नो राये पनीयसे रत्सि वाजाय पन्थाम्॥
हे प्रतिबंध से रहित गति वाले अग्नि देव! आप हमें तेज प्रदान करने वाली सम्पत्ति देने की कृपा करें। हे ईश्वर! हमें संतुष्टि प्रदान करने वाले धन एवं अन्न प्राप्त कराने वाले उत्तम मार्ग की ओर अग्रसर करें ताकि हमें पराक्रम प्राप्त हो सके।(सामवेद 1.9.1)
Hey Agni Dev, free from restrictions! Grant us the property which should grant us aura-radiance. Hey Almighty! Direct us to the excellent path which can grant us wealth and food grains to satisfy us leading us to bravery-invincibility.
यदि वीरो अनु ष्यादग्निमिन्धीत मर्त्यः। आजुह्वद्धव्यमानुषक् शर्म भक्षीत दैव्यम्॥
हे ऋत्विजों! आप शूरवीर, पराक्रमी पुत्र प्राप्त करने हेतु अग्नि को प्रज्वलित करें तथा सदैव आहुति के रूप में दिए जाने योग्य पदार्थों का उपयोग करके अलौकिक आनन्द पाने का मार्ग प्रशस्त करें।(सामवेद 1.9.2)
Hey Ritviz Gan! Ignite Agni Dev to grant brave-invincible son and always utilise the best materials for oblations-offerings as sacrifices, leading the path to divine pleasure.
त्वेषस्ते धूम ऋण्वति दिवि सञ्छुक्र आततः। सूरो न हि द्युता त्वं कृपा पावक रोचसे॥
जब अग्नि को प्रज्वलित किया जाता है तो उनका निर्मल धूम आकाश में विस्तारित होता हुआ प्रतीत होता है। हे शुद्ध अग्नि देव! सूर्य के समतुल्य वन्दना के माध्यम से आप अपनी शिखा से सुशोभित होते हैं।(सामवेद 1.9.3)
When Agni-fire is ignited, its pure smoke appears to extend through the sky. Hey pure-pious Agni Dev! Prayers comparable to the Sun-Sury Dev, make you appear with your beautiful flames.
त्वं हि क्षैतवद्यशोऽग्ने मित्रो न पत्यसे। त्वं विचर्षणे श्रवो वसो पुष्टिं न पुष्यसि॥
हे समस्त जनों को देखने वाले, सभी को सहारा (गृह) प्रदान करने वाले, सूर्य की भाँति प्रतापी अग्नि देव! आप हमारे श्रद्धापूर्वक अन्न को ग्रहण करके उसे अत्यधिक मात्रा में पूर्ण रूप से परिपोषित कर दें।(सामवेद 1.9.4)
Hey Agni Dev watching all subjects, granter of house to every one, mighty like Sury Dev! Accept our food grains offered with due respect-honour and nurture it thoroughly.(03.11.2025)
प्रातरग्निः पुरुप्रियो विश स्तवेतातिथिः। विश्वे यस्मिन्नमर्त्ये हव्यं मर्तास इन्यते॥
समस्त जनों को अत्यधिक प्रिय प्रतीत होने वाले, धन के स्वामी, सभी मानवों के गृहों में अतिथि के समतुल्य आदरणीय, प्रातः स्मरण करने योग्य, मृत्यु को कभी न प्राप्त होने वाले अग्नि में सभी लोग यज्ञ में ग्रहण किये जाने वाले पावन पदार्थों (अन्नों) से आहुति निवेदित करते हैं।(सामवेद 1.9.5)
Agni Dev appear to be extremely dear to all humans, Lord of wealth, reside in the homes of all humans as a guest, worth remembering in the morning, never perish-immortal, all being sacrifice pious-pure goods, offerings in the Yagy to him.
यद्वाहिष्ठं तदग्नये बृहदर्घ विभावसो। महिषीव त्वद्रयिस्त्वद्वाजा उदीरते॥
हे अग्नि देव! अत्यन्त शीघ्र अपना प्रभाव दिखाने वाले स्तोत्रों से आपकी वन्दना की जाती है। आप हमें अत्यधिक धन-सम्पत्ति तथा अन्नादि प्रदान करने की कृपा करें।(सामवेद 1.9.6)
Hey Agni Dev! For quick response you are prayed with Strotrs. Grant us lots of wealth, prosperity and food grains.
विशोविशो वो अतिथिं वाजयन्तः पुरुप्रियम्। अग्निं वो दुर्यं वचः स्तुषे शूषस्य मन्मभिः॥
आहार (अन्न) तथा शक्ति की कामना करने वाले हे मनुष्यों! आप समस्त जनों को प्रिय लगने वाले, सबके द्वारा पूजनीय अग्नि देव की वन्दना करें। हम (ऋत्विग्गण) भी गृहों के अधिपति अग्नि देव की आनन्द प्रदान करने वाले स्तोत्रों से वन्दना करते हैं।(सामवेद 1.9.7)
Hey humans, desirous of food grains and power-might! Worship Agni Dev who is loved by all humans. We, the Ritviz too worship Agni Dev, the Lord of house, with gladdening Strotrs.
बृहद्वयो हि भानवेऽर्चा देवायाग्नये। यं मित्रं न प्रशस्तये मर्तासो दधिरे पुरः॥
यज्ञादि करने या कराने वाले मित्र की भाँति, प्रतापी अग्नि देव को, वन्दना हेतु अपने समक्ष प्रतिस्थापित करके उसमें पर्याप्त मात्रा में हविष्यान्न (यज्ञादि में खाये जाने वाले पावन पदार्थ) को आहुति प्रदान करते हैं।(सामवेद 1.9.8)
प्रतापी :: प्रताप संबंधी, दुःख-सताने से मुक्तिदायक; glorious, august.
Sacrifices are made to glorious-august Agni Dev like a friend, who help in Yagy-Hawan etc, establish him with sufficient offerings (food grains, Ghee etc) before us.
अगन्म वृत्रहन्तमं ज्येष्ठमग्निमानवम्। यः स्म श्रुतर्वन्नार्क्षे बृहदनीक इध्यते॥
ऋक्ष के पुत्र श्रुतर्वा के विनाश हेतु, प्रखर ज्वालाओं वाले, वृत्र का नाश करने वाले, सज्जन पुरुषों हेतु कल्याणकारी अग्नि देव की हम आराधना करते हैं।(सामवेद 1.9.9)
We worship Agni Dev having blazing flames, who destroyed Raksh's son Shrutrva, destroyed Vratr, beneficial to the virtuous-gentle humans.
जातः परेण धर्मणा यत्सवृद्धिः सहाभुवः।
पिता यत्कश्यपस्याग्निः श्रद्धा माता मनुः कविः॥
हे अग्नि देव! कश्यप आपके पिता, श्रद्धा आपकी माता तथा स्तोता मनु हैं। आप हमारे श्रेष्ठ कर्मों के माध्यम से आरम्भ किये गए याग में उपस्थित हों।(सामवेद 1.9.10)
Hey Agni Dev! Kashyap is your father, Shraddha is your mother and Manu is your Stota. Invoke in the Yagy begun with excellent performances by us.
सामवेद आग्नेयं पर्व (1.9) :: ऋषि :- अग्निस्तापस, वामदेव, कश्यप, देवल या असित, सोमाहुति भार्गव, पायु, प्रस्कण्व; देवता :- विश्वेदेवा, अंगिरा, अग्नि; छन्द :- अनुष्टुप्।
सोमं राजानं वरुणमग्निमन्वारभामहे। आदित्यं विष्णुं सूर्यं ब्रह्माणं च बृहस्पतिम्॥
हम प्रार्थना करने वाले यजमान, उत्तम वन्दना के द्वारा राजा सोम, वरुण, अग्नि, आदित्य, सूर्य, ब्रह्मा, विष्णु एवं बृहस्पति को आमन्त्रित करते हैं।(सामवेद 1.10.1)
We invite the Yajman, with request-prayer, king Som, Varun, Agni, Adity, Sury, Brahma, Vishnu and Brahaspati with excellent worship.
इत एत उदारुहन्दिवः पृष्ठान्या रुहन्। प्र भूर्जयो यथा पथोद्द्यामङ्गिरसो ययुः॥
अंगिरस् ऋषि ने उत्तम याग के प्रभाव द्वारा स्वर्ग लोक को प्राप्त किया एवं श्रेष्ठ यज्ञ के प्रभाव से ही उसके ऊपर प्रतिष्ठित हो गये।(सामवेद 1.10.2)
Angiras Rishi attained heavens through the impact of excellent Yagy and established over it by virtue of excellent Yagy.
राये अग्ने महे त्वा दानाय समिधीमहि। ईडिष्वा हि महे वृषं द्यावा होत्राय पृथिवी॥
हे पूजनीय अग्नि देव! आप सुखों के अधिपति हैं। महान् धन, वैभव प्राप्त करने की अभिलाषा से हम आपको श्रद्धापूर्वक प्रज्वलित करते हैं। हे याजकों! आप प्रकृति में हो रहे हवि को सम्पन्न करने के लिए पृथ्वी और स्वर्ग लोक की वन्दना करें।(सामवेद 1.10.3)
Hey worshipable Agni Dev! You are the Lord of comforts-pleasure. We ignite you with the desire of great wealth, grandeur with reverence-honour. Hey Yajak Gan! Worship earth & heavens for the offerings produced by nature.
दधन्वे वा यदीमनु वोचद्ब्रह्मेति वेरु तत्। परि विश्वानि काव्या नेमिश्चक्रमिवाभुवत्॥
चक्र को धारण किये रहने वाली धुरी के समतुल्य, समस्त काव्यों (कर्मों) को जानने वाले इन अग्नि देव को संतुष्ट करने के उद्देश्य से हम उनका ध्यान करते हैं।(सामवेद 1.10.4)
We meditate-concentrate in Agni Dev to satisfy him, who is aware of our all efforts-endeavours, like the axle-pivot of the wheel.
प्रत्यग्ने हरसा हरः शृणाहि विश्वतस्परि। यातुधानस्य रक्षसो बलं न्युब्जवीर्यम्॥
हे अग्नि देव! आप अपने महान् बल के माध्यम से चारों ओर उपद्रव करने वाले दानवों का विनाश करें। आप इन दानवों के शक्ति और पराक्रम को पूर्ण रूप से समाप्त कर दें।(सामवेद 1.10.5)
Hey Agni Dev! Destroy all giants-demons creating trouble all around with your great strength. Abolish the might & power of these demons completely.
त्वमग्ने वसूँरिह रुद्राँ आदित्याँ उत। यजा स्वध्वरं जनं मनुजातं घृतप्रुषम्॥
वसु, रुद्र एवं आदित्य आदि ईश्वरों को प्रसन्न करने के उद्देश्य से यज्ञ कर्म करने वाले हे अग्ने! आप घी की आहुति से उत्तम हवि सम्पन्न करने वाले मनु सन्तानों (मानवों) का आर्थिक सहायता आदि द्वारा सत्कार करें।(सामवेद 1.10.6)
Hey Agni Dev accomplishing-performing deeds for appeasement of Vasu, Rudr, Adity etc deities. Honour the humans (sons of Manu) with wealth who make sacrifices of ghee & offerings in you.
सामवेद आग्नेयं पर्व (1.9) :: ऋषि :- दीर्घतमा, विश्वामित्र, गौतम, त्रित, इरिम्बिठि, विश्वमना, वैयश्व, ऋजिश्वा, भरद्वाज; देवता :- अग्नि, पवमान, अदिति, विश्वेदेवा; छन्द :- उष्णिक्।
पुरु त्वा दाशिवाँ वोचेऽरिरग्ने तव स्विदा। तोदस्येव शरण आ महस्य॥
महान् सम्पत्तिशाली की शरण में आये हुए, धन सम्पत्ति प्राप्त करने के उद्देश्य से याचकों के समान हम अग्नि देव के निमित्त आहुति प्रदान करते हुए विनती करते हैं।(सामवेद 1.11.1)
याचक :: मुद्दई, वादी, भिक्षुक-भिक्षुणी, मंगता; petitioner, mendicant, beggar, demandant.
Under asylum of those who possess great wealth and prosperity like Yachak-beggar, we pray for making sacrifices for Agni Dev.
प्र होत्रे पूर्व्य वचोऽग्नये भरता बृहत्। विपां ज्योतींषि बिभ्रते न वेधसे॥
हे ऋत्विजों! उत्तम अनुष्ठानों के द्वारा प्राप्त आभा को धारण करने वाले ज्ञानियों के सदृश, ब्रह्मा आदि ईश्वर की उपासना करने वाले अग्नि देव की उत्तम एवं प्राचीन हवनीय पदार्थों से वन्दना करो।(सामवेद 1.11.2)
अनुष्ठानों :: संस्कार, धार्मिक उत्सव, आचार, आतिथ्य सत्कार, धार्मिक क्रिया, धार्मिक संस्कार, पद्धति, शास्रविधि, समारोह, विधि, रसम, धर्मक्रिया; rituals, rite, ceremony.
Hey Ritviz Gan! Worship Agni Dev who worship Brahma Ji and Almighty with excellent offerings for the Yagy like the enlightened having attained aura due to excellent rituals, rites, ceremonies.(04.11.2025)
अग्ने वाजस्य गोमत ईशानः सहसो यहो। अस्मे देहि जातवेदो महि श्रवः॥
हे अग्नि देव! आप (अरणि-मन्थन स्वरूप) पराक्रम से जन्म लेने वाले, गायों से उत्पन्न पोषक पदार्थों, धनों एवं ज्ञान के अधिष्ठाता है। आप हमें विद्या, धन-ऐश्वर्य प्रदान करें। (सामवेद 1.11.3)
Hey Agni Dev! You evolve by rubbing wood pieces. You are the lord of the nourishing goods obtained from cows, wealth and learning. Grant us enlightenment-learning, wealth & grandeur.
अग्ने यजिष्ठो अध्वरे देवां देवयते यज। होता मन्द्रो वि राजस्यति स्त्रिधः॥
हवि में आराधना करने योग्य, देवताओं का आवाहन करने वाले, शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने वाले हे अग्ने! आप यज्ञकर्ताओं और देवताओं के (कल्याण के लिए) याग करते हुए विभूषित होते हैं। (सामवेद 1.11.4)
Worshipable in the offerings-sacrifices, invoker of demigods-deities, winner of the enemies, hey Agni Dev! You are adorned while accomplishing Yagy for the welfare of the Yagy performers and demigods-deities.
जज्ञानः सप्त मातृभिर्मेधामाशासत श्रिये। अयं ध्रुवो रयीणां चिकेतदा॥
सात माताओं (ज्वालाओं), सतलज, व्यास, रावी, चिनाव, झेलम, सरस्वती एवं सिन्धु के माध्यम से उत्पन्न हुए, (वृद्धि को प्राप्त याजकों की) धारण करने की क्षमता में वृद्धि करने के लिए प्रयत्नशील ये अग्नि देव धन (ज्ञान) संपदाओं इत्यादि को भली-भाँति समझने वाले हैं।(सामवेद 1.11.5)
Born out of seven mothers (flames) viz Satluj, Vyas, Ravi, Chinav, Jhelum, Saraswati and Sindhu; Agni Dev thoroughly understand the scholarly wealth and make efforts to support them, for the sake of the Yajak who seek growth.
उत स्या नो दिवा मतिरदितिरूत्यागमत्। सा शन्ताता मयस्करदप स्त्रिधः॥
हे देवताओं की माता अदिति! आप सम्पूर्ण रक्षा करने वाले साधनों के साथ हमारे सम्मुख प्रकट हों एवं शत्रुओं का संहार करें तथा हमारे समस्त दोषों का निवारण कर हमें सुख-शान्ति प्रदान करें। (सामवेद 1.11.6)
Hey mother of demigods, Aditi! Invoke with all means of protection, destroy the enemies, remove our defects-short comings and grant us peace & tranquillity.
ईडिष्वा हि प्रतीव्यां 3 यजस्व जातवेदसम्। चरिष्णुधूममगृभीतशोचिषम्॥
हे स्तुति करने वाले ऋत्विजों! शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने वाले प्रबल ज्वालाओं से युक्त, सर्वव्यापी धूम्र वाले, सब कुछ जानने वाले अग्नि देव की स्तुति एवं आराधना करो। (सामवेद 1.11.7)
Hey Ritviz making prayers-Stuti! Worship & pray Agni Dev who is victorious over the enemy, has furious flames and all pervading smoke.
न तस्य मायया च न रिपुरीशीत मर्त्यः। यो अग्नये ददाश हव्यदातये॥
जो यजमान यज्ञ आदि के अवसर पर खाये जाने वाले अन्नों (हविष्यान्न) की आहुति अग्नि देव को समर्पित करते हैं। ऐसे यजमानों पर किसी भी दुष्ट के छल-प्रपंच का प्रभाव नहीं पड़ता है। (सामवेद 1.11.8)
The Yajak who make sacrifices of eatable food grains in the Yagy, remain un affected by the treachery of the wicked-cheats, fraudsters.
अप त्यं वृजिनं रिपुं स्तेनमग्ने दुराध्यम्। दविष्ठमस्य सत्पते कृधी सुगम्॥
हे सत्य के स्वामी अग्नि देव! आप मायावी शत्रुओं तथा दुर्धर्ष (उग्र) चोरों को हमसे दूर करते हुए हमारे उत्तम भलाई चाहने वाले मार्ग को सरल बनाने की कृपा करें। (सामवेद 1.11.9)
Hey Lord of truth, Agni Dev! Repel the illusive enemies & furious thieves and make the path to our welfare clear.
श्रुष्ट्यग्ने नवस्य मे स्तोमस्य वीर विश्पते। नि मायिनस्तपसा रक्षसो दह॥
हे जगत् के पालनहार अग्नि देव! हमारे इस अद्भुत स्तुत्यात्मक श्लोक को श्रवण कर उत्साह से युक्त होकर आप मायावी (छल एवं कपटी) दुष्टों को अपने प्रचण्ड ज्वालाओं से जलाकर राख कर दें। (सामवेद 1.11.10)
Hey nurturer-supporter of the universe, Agni Dev! Encouraged by our Stuti Shlok burn-roast our illusive enemies and the wicked-vicious into ashes.
सामवेद आग्नेयं पर्व (1.12) :: ऋषि :- प्रयोगो भार्गव, सौभरि, काण्व, विश्वमना वैयश्व; देवता :-अग्नि; छन्द :- उष्णिक्।
प्र मंहिष्ठाय गायत ऋताव्ने बृहते शुक्रशोचिषे। उपस्तुतासो अग्नये॥
हे स्तुति करने वाले ऋत्विजों! आप अपनी उत्तम स्तुति के माध्यम से अग्नि देव की वन्दना करें। वे महान् सत्य एवं हवि के अधिष्ठाता, महान् पराक्रमी एवं महान् जगत् के रक्षक हैं।(सामवेद 1.12.1)
Hey Ritviz resorting to Stuti! Worship-pray Agni Dev with best Stuti. He is great protector of the universe, invincible and Lord of truth and oblations.
प्र सो अग्ने तवोतिभिः सुवीराभिस्तरति वाजकर्मभिः। यस्य त्वं सख्यमाविथ॥
हे अविनाशी अग्ने। आप जिनके सखा बनकर सहायता करते हैं, वे स्तोतागण आप से उत्तम संतान, अन्न, सामर्थ्य आदि समृद्धि प्राप्त कर लेते हैं।(सामवेद 1.12.2)
Hey immortal Agni Dev! Those Stota Gan who are helped by you as a friend, attain excellent progeny, prosperity & food grains from you.
तं गूर्धया स्वर्णरं देवासो देवमरतिं दधन्विरे। देवत्रा हव्यमूहिषे॥
हे स्तोताओं! द्युलोक के निमित्त हवनीय पदार्थों को पहुँचाने वाले अग्नि देव की वन्दना करो। यज्ञ करने वाले लोग वन्दना करते हैं एवं देवताओं को हवनीय पदार्थ पहुँचाते हैं।(सामवेद 1.12.3)
Hey Stota Gan! Worship-pray Agni Dev who carry oblations to heavens. Yagy performers worship and manage to send oblations-offerings to demigods via Agni Dev.
मा नो हृणीथा अतिथिं वसुरग्निः पुरुप्रशस्त एषः। यः सुहोता स्वध्वरः॥
हमारे प्रिय अतिथि स्वरूप अग्नि देव को हवन से दूर मत हटाओ। वे देवताओं का आवाहन करने वाले, धन के स्वामी तथा अनेकों ऋत्विजों द्वारा प्रशंसनीय हैं।(सामवेद 1.12.4)
Do not keep off Agni Dev; our dear guest from the Yagy. He invoke demigods, is Lord of wealth and appreciated by several Ritviz Gan.
भद्रो नो अग्निराहुतो भद्रा रातिः सुभग भद्रो अध्वरः। भद्रा उत प्रशस्तयः॥
हवनीय पदार्थों से प्रसन्न हुए हे अग्ने! आप हमारे लिए सौभाग्यशाली हों। हे वैभवशाली! हमें शुभ कार्यों को करने वाले धन की प्राप्ति हो तथा स्तुतियां हमारे लिए मंगलकारी सिद्ध हों।(सामवेद 1.12.5)
Hey Agni dev, gladdened with Yagy materials! Let you become lucky. Hey grandeur possessor! Let us have wealth-money for pious, virtuous, righteous activities. Our prayers should become auspicious for us.
यजिष्ठं त्वा ववृमहे देवं देवत्रा होतारममर्त्यम्। अस्य यज्ञस्य सुक्रतुम्॥
हे देवों के देव अग्नि देव! आप उत्तम याज्ञिक हैं। आप इस हवन को भली-भाँति परिपूर्ण करने वाले हैं। हम आपकी वन्दना करते हैं।(सामवेद 1.12.6)
Hey deity of the demigods, Agni Dev! You are best Yagyik. You accomplish Yagy-Hawan in best possible manner. We worship you.
तदग्ने द्युम्नमा भर यत्सासाहा सदने कं चिदत्रिणम्। मन्युं जनस्य दूक्यम्॥
हे अग्नि देव! आप हमें श्रेष्ठ ज्ञान एवं पराक्रम प्रदान करें, जिससे हवन में सम्मिलित होने वाले अति-भोगी दुष्पवृत्ति वाले लोगों को नियन्त्रित किया जा सके। इसके साथ ही आप कुटिल विचारों से युक्त लोगों के क्रोध को भी दूर हटा दें।(सामवेद 1.12.7)
Hey Agni Dev! Grant us excellent knowledge and courage (might), so that wicked-vicious who participate in the Yagy are controlled. Remove-eliminate the anger of the treacherous-fraudsters, along with it.
यद्वा उ विश्पतिः शितः सुप्रीतो मनुषो विशे। विश्वेदग्निः प्रति रक्षांसि सेघति॥
यज्ञ कर्ताओं की रक्षा करने वाले, सदैव दूसरों पर अपनी कृपादृष्टि बनाए रखने वाले, हविष्यान्न से प्रज्वलित ये अग्नि देव संतुष्ट होकर, याजकों के यहाँ (यज्ञ में) प्रतिस्थापित होते हैं और समस्त कुटिल, दुष्ट आचरण करने वाले लोगों का अपने प्रखर तेज से संहार कर देते हैं।(सामवेद 1.12.8)
Agni Dev who protect the Yagy performers, always keep merciful watch over others, ignited with offerings-oblations, is established in the Yagy and destroy the notorious-wicked, devious-cynical with his blazing Tej-radiance.(05.11.2025)
(between 6-9 November, I visited Kashi Vishwa Nath and Ram Lala temple in Ayodhya)
सामवेद ऐन्द्रं पर्व (2.1) :: ऋषि :- शंयु अथवा वार्हस्पत्य, श्रुतकक्ष, हर्यत, प्रागाथ, इन्द्रमातरो देवजामय, गोषुक्त्यश्व-सूक्तिनौ, मेधातिथिरांगिरस, प्रियमेध, काण्वश्च; देवता :- इन्द्र; छन्द :-गायत्री।
तद्वो गाय सुते सचा पुरुहूताय सत्वने। शं यद्गवे न शाकिने॥
हे स्तुति करने वाले ऋत्विजों! जब सोमरस तैयार हो जाता है, तब अनेकों लोग जिनकी वन्दना करते हैं, उन पराक्रमी इंद्र देव हेतु सभी लोग एक साथ मिलकर वन्दना करें। ऐसा करने से इन्द्र देव को उसी प्रकार के आनन्द की प्राप्ति होगी, जिस प्रकार गौ को घास द्वारा प्राप्त होती है।(सामवेद 2.1.1)
Hey Ritviz Gan, conducting Stuti! Worship Indr Dev along with the several people, when Somras is ready. By doing this Indr Dev will get such pleasure, which is obtained by the cow while grazing grass.
यस्ते नूनं शतक्रतविन्द्र द्युम्नितमो मदः। तेन नूनं मदे मदेः॥
हे शतकर्मा इन्द्र देवता! अत्यधिक तेजस्वी, अभिषेक किया हुआ सोमरस आपको प्रदान करने हेतु तैयार है। उस सोमरस को ग्रहण कर आप सन्तुष्ट हो जाएं तथा हमें धन-संपदा आदि प्रदान कर सुखी करें।(सामवेद 2.1.2)
Hey performer of hundred Yagy, Indr Dev! Highly aurous-energetic, extracted Somras is ready for serving you. You should be satisfied by drinking that Somras and grant us wealth, prosperity and comforts-pleasure.
गाव उप वदावटे मही यज्ञस्य रप्सुदा। उभा कर्णा हिरण्यया॥
सूर्य की किरणें यज्ञार्थ विद्यमान, उस धरती को (अन्नादि पैदा करके) यज्ञीय स्वरूप देने वाली है, जिसके दोनों ध्रुव चुम्बकीय ऊर्जा के कारण चमकीले हैं।(सामवेद 2.1.3)
The rays of Sun, provide food grains etc for granting the form of Yagy leading to shinning of its two poles through magnetism.
अरमश्वाय गायत श्रुतकक्षारं गवे। अरमिन्द्रस्य धाम्ने॥
हे श्रुतकक्ष, ऋषि! आप गायों, घोड़ों एवं इन्द्र देवता के निवास स्थान अर्थात् स्वर्ग को प्राप्त करने हेतु पर्याप्त स्तोत्रों का गान करें।(सामवेद 2.1.4)
Hey Shrut Kaksh Rishi! Recite enough Strotr for the attainment of heaven, abode of Indr Dev.
तमिन्द्रं वाजयामसि महे वृत्राय हन्तवे। स वृषा वृषभो भुवत्॥
जो वृत्रासुर का संहार करने वाले हैं, हम यज्ञ करने वाले लोग उनके गुणों का गान एवं उनकी वन्दना करते हैं, वे धन के अधिष्ठाता इन्द्र देव हमारी सभी मनोकामनाओं को पूर्ण कर हमें सुख-समृद्धि प्रदान करने की कृपा करें।(सामवेद 2.1.5)
We worship Indr Dev slayer of Vratra Sur, who is the deity of wealth, for accomplishment of comforts-pleasure and prosperity to us.
त्वमिन्द्र बलादधि सहसो जात ओजसः। त्वं सन्वृषन्वृषेदसि॥
हे देवेन्द्र! आप हमारी समस्त कामनाओं की पूर्ति करने वाले, महान् बल शाली हैं। आप अपने पराक्रम, उग्रता एवं शक्ति के निमित्त सबसे श्रेष्ठ सिद्ध हुए हैं। आप उत्तम फलों की वर्षा करने में सक्षम हैं।(सामवेद 2.2.6)
Hey Devendr! You are mighty, powerful and accomplish our all desires. You proved to be the best by virtue of your invincibility, furiousity. You are capable of granting-shower excellent rewards.
यज्ञ इन्द्रमवर्धयद्यद्भूमिं व्यवर्तयत्। चक्राण ओपशं दिवि॥
जिस हवि प्रक्रिया ने धरती को अम्बर में टांगकर घुमाते हुए रखा है अर्थात् सूर्य पृथ्वी को घुमाता रहता है। उस हवि ने राजा इन्द्र के ऐश्वर्य में वृद्धि भी की है।(सामवेद 2.1.7)
The process of sacrifices led to revolution of earth around the Sun in elliptical orbits and increased the grandeur of Indr Dev.
यदिन्द्राहं यथा त्वमीशीय वस्व एक इत्। स्तोता मे गोसखा स्यात्॥
हे इन्द्र देवता! जिस तरह आप सम्पूर्ण वैभव के अधिपति हैं, यदि मैं भी आपकी तरह धन-संपदा से सम्पन्न हो जाऊँ, तो मेरी स्तुति करने वाली गौएँ आदि भी धन-धान्य से परिपूर्ण हो जाएँ।(सामवेद 2.1.8)
Hey Indr Dev! The manner in which you are the Lord-deity of all sorts of grandeur, I too should possess cows and riches and food grains.
पन्यंपन्यमित्सोतार आ धावत मद्याय। सोमं वीराय शूराय॥
हे सोम-शोधन में मनोयोग से जुटे हुए याजको! बलशाली, शूरवीर राजा इन्द्र हेतु सुख प्रदान करने वाले सोम समर्पित करो।(सामवेद 2.1.9)
Hey Yagy performers devoted to extraction of Som! Offer Somras to brave, invincible king Indr Dev; who grant comforts-pleasure.
इदं वसो सुतमन्धः पिबा सुपूर्णमुदरम्। अनाभयिब्ररिमा ते॥
हे भय से रहित देवराज इन्द्र! आप अभिषेक द्वारा तैयार किये हुए सोम का पान करें, जिससे आप सन्तुष्ट हो। आपको प्रसन्न करने के निमित्त यह सोमरस अर्पित है।(सामवेद 2.1.10)
सामवेद ऐन्द्रं पर्व (2.2) :: ऋषि :- सुकक्षश्रुतकक्षौ, भरद्वाज, मधुच्छन्दा, त्रिशोक, वसिष्ठ। देवता-इन्द्र। छन्द-गायत्री।
उद्घेदभि श्रुतामधं वृषभं नर्यापसम्। अस्तारमेषि सूर्य॥
विश्व में प्रसिद्ध, धन, वैभव से परिपूर्ण, महान् बलशाली, मनुष्य मात्र के हितेच्छु एवं दुर्जनों पर अस्त्रों से प्रहार करने वाले, ये सभी दिशाओं को प्रकाशित करने वाले सूर्य (इन्द्र) देवता हैं।(सामवेद 2.2.1)
Sun (Indr Dev) famous in the universe, possessing wealth, grandeur, mighty-power, well wisher of humans, striking the wicked-vicious, lit all directions.
Sun & Indr are synonym to God here, being HIS excellent forms-Vibhuti.
यदद्य कच्च वृत्रहन्नुदगा अभि सूर्य। सर्वं तदिन्द्र ते वशे॥
हे वृत्र का संहार करने वाले, तत्काल उदित हुए (सूर्य) देवराज इन्द्र! वह समस्त पदार्थ आपके अधीन (वश में) है, जिसे आपने प्रकाशित किया है।(सामवेद 2.2.2)
Hey slayer of Vratra Sur, rising Sun i.e., Devraj Indr! All those means which lead to light, are controlled by you.
य आनयत्परावतः सुनीती तुर्वशं यदुम्। इन्द्रः स नो युवा सखा॥
जिन तुर्वश एवं यदु (शक्तिशाली राजाओं) को शत्रुओं के द्वारा दूरस्थ फेंक दिया गया था। वहाँ से देवराज इन्द्र ही उन्हें श्रेष्ठता पूर्वक नीति से सरलता पूर्वक वापस ले आए थे। वे युवावस्था (स्फूर्तिवान्) देवराज इन्द्र हमारे सखा हैं।(सामवेद 2.2.3)
Mighty kings Turvash & Yadu, who were thrown away by the mighty enemies, were brought back by Devraj Indr easily. Mighty-smart king Indr Dev is our friend.
मा न इन्द्राभ्या3 दिशः सूरो अक्तुष्वा यमत्। त्वा युजा वनेम तत्॥
हे देवराज इन्द्र! सभी जगह घूमने वाले, सब ओर शस्त्र फेंकने वाले दानव रात के समय हमारे समीप न आ सकें। यदि वे हमारे समीप आ भी जाएं तो आपकी कृपा से उनका विनाश हो जाए।(सामवेद 2.2.4)
Hey Devraj Indr! Prohibit the demons who launch missiles in all directions during night, from a distant, coming near-close to us. If they approach us, they should be killed instantaneously, due to your mercy-blessings.
एन्द्र सानसिं रयिं सजित्वानं सदासहम्। वर्षिष्ठमूतये भर॥
हे देवराज इन्द्र! आप हमारी रक्षा करने हेतु एवं शत्रुओं को पराजित करने के उद्देश्य से हमें धन-धान्य से सम्पन्न करें।(सामवेद 2.2.5)
hey Devraj Indr! For our protection & defeating our enemies, enrich us with wealth and food grains.
इन्द्रं वयं महाधन इन्द्रमर्भे हवामहे। युजं वृत्रेषु वज्रिणम्॥
हम जीवन के छोटे-बड़े समस्त युद्धों में, वृत्र नामक असुर का विनाश करने वाले, वज्र धारण करने वाले देवराज इन्द्र को सहयोग करने के निमित्त आमंत्रित करते हैं।(सामवेद 2.2.6)
We invoke Indr Dev in fighting small or large scale wars, throughout the life for the destruction of demons like Vratra Sur.
अपिबत्कद्रुवः सुतमिन्द्रः सहस्त्रबाहे। तत्राददिष्ट पौंस्यम्॥
कटु के द्वारा निष्पन्न सोमरस का देवराज इन्द्र ने सेवन किया तथा सहस्रों भुजाओं वाले शक्तिशाली शत्रु का हनन किया, जिससे देवराज इन्द्र का दर्शन करने योग्य बल प्रस्तुत हुआ।(सामवेद 2.2.7)
Indr Dev drunk the Somras extracted with Katu (a tool) and killed the enemy with thousands of arms leading to grant of might-power and aura to him.(10.11.2025)
सामवेद ऐन्द्रं पर्व (2.2) :: ऋषि :- सुकक्षश्रुतकक्षौ, भरद्वाज, मधुच्छन्दा, त्रिशोक, वसिष्ठ। देवता-इन्द्र। छन्द-गायत्री।
वयमिन्द्र त्वायवोऽभि प्र नोनुमो वृषन्। विद्धी त्वा 3 स्य नो वसा॥
हे अति उत्तम शूरवीर देवराज इन्द्र! हम आपकी अभिलाषा करते हुए बार-बार आपको नमस्कार करते हैं। हे सभी जनों को आश्रय प्रदान करने वाले! आप हमारे द्वारा की गयी विनतियों को श्रवण करें और उन्हें समझें।(सामवेद 2.2.8)
Hey excellent warrior Devraj Indr! We invoke you and salute you again & again. Hey granter of asylum to all! Respond to our request-prayers, understanding them.
आ घा ये अग्निमिन्धते स्तृणन्ति बर्हिरानुषक्। येषामिन्द्रो युवा सखा॥
अति उत्तम अग्नि को प्रज्वलित करने वाले याजकों के सखा चिर युवा देवराज इन्द्र हैं। वे (याजक) उनके लिए कुश-आसन फैलाते हैं।(सामवेद 2.2.9)
Always young Indr Dev is the friend of the Yajak who light-ignite excellent fire. The Yajak spread cushion for him.
भिन्धि विश्वा अप द्विषः परि बाधो जही मृधः। वसु स्पार्हं तदा भर॥
हे इन्द्र देव! आप सम्पूर्ण जगत् के बैर भाव रखने वाले शत्रुओं का शमन करें, बाधा उत्पन्न करने वाले दुर्जनों को पराभूत कर दें तथा प्रशंसनीय ऐश्वर्य हमें परिपूर्ण मात्रा में प्रदान करें।(सामवेद 2.2.10)
Hey Indr Dev! Control-destroy the enemies who are envious to the whole world, defeat those who create obstructions-trouble and grant us appreciable grandeur in sufficient quantity.
सामवेद ऐन्द्रं पर्व (2.3) :: ऋषि :- कण्वो घोर, त्रिशोक, वत्स, काण्व, कुसीदी काण्व, मेधातिथि, श्रुतकक्ष, श्यावाश्व, प्रगाथ, काण्व, इरिम्बिठि; देवता :- इन्द्र; छन्द :- गायत्री।
इहेव शृण्व एषां कशा हस्तेषु यद्वदान्। नि यामं चित्रमृञ्जते॥
मरुद्गणों (युद्ध भूमि में सारथी) के करों में स्थित चाबुकों से जो ध्वनियां हमें सुनाई पड़ती हैं, जैसे वे यहीं हो रही हों। वे ध्वनियां युद्ध के दौरान वीरों के भीतर उत्साह का संचार करती हैं।(सामवेद 2.3.1)
The sound produced by the lash present in the hands of Marud Gan in the battle field are heard by us, as if they are close to us. These sound encourage the brave warriors in the war.
इम उ त्वा वि चक्षते सखाय इन्द्र सोमिनः। पुष्टावन्तो यथा पशुम्॥
हे देवराज इन्द्र! जैसे पशुओं को पालने वाला अपने हाथों में घास लेकर प्रेम पूर्वक पशुओं की ओर देखता है, वैसे ही याजक आपको संतुष्ट करने के निमित्त सोमादि को हाथों में लेकर आपकी ओर देखते रहते हैं।(सामवेद 2.3.2)
Hey Devraj Indr! The way the animal nurturer hold grass in his hands and look at them with love, similarly the Yajak keep Somras etc in hands and look at you, to satisfy you.
समस्य मन्यवे विशो विश्वा नमन्त कृष्टयः। समुद्रायेव सिन्धवः॥
सभी मानव जन (प्रजा) देवराज इन्द्र (जो कि असुरों के प्रति अत्यधिक क्रोधित भाव रखते हैं) के प्रकोप से बचने हेतु सदैव उनका नमन करते हुए आकर्षित होते हैं, जिस प्रकार सभी नदियां सागर में मिलने हेतु अत्यन्त तीव्र गति से जाती हैं।(सामवेद 2.3.3)
The humans-subjects bow before-salute Devraj Indr (who has acute anger-furiosity towards demons) to be protected from the demons being attracted by him, like the rivers who are eager to assimilate in the ocean with high speed.
देवानामिदवो महत्तदा वृणीमहे वयम्। वृष्णामस्मभ्यमूतये॥
हे देवता गण! आपका हमें सुरक्षा प्रदान करना हमारे लिए पूजा करने योग्य है। आप समस्त अभिलाषाओं की पूर्ति करने वाले हैं। आपके महिमामय रक्षण को हम स्वीकार करते हैं।(सामवेद 2.3.4)
Hey demigods-deities! Granting protection to us deserve worship-prayers for you. You accomplish all desires. We accept your majestic protection.
सोमानां स्वरणं कृणुहि ब्रह्मणस्पते। कक्षीवन्तं य औशिजः॥
हे ब्रह्मण स्पते! सोमयज्ञ करने वाले याजक, उशिज के पुत्र कक्षीवान् को स्वर्ण से युक्त तेज प्रदान करें।(सामवेद 2.3.5)
Hey Brahman Spatye! Grant aura-radiance like gold to Kakshiwan son of Ushij.
बोधन्मना इदस्तु नो वृत्रहा भूर्यासुतिः। शृणोतु शक्र आशिषम्॥
जिस देवता हेतु अनेकों लोग एकजुट होकर सोमरस तैयार करते हैं, जो हमारी सभी अभिलाषाओं को जानने वाले हैं, रणभूमि में शत्रुओं को परास्त करने वाले हैं। वे महा शक्तिशाली, वृत्रहन्ता देवराज इन्द्र हमारे द्वारा की गई वन्दनाओं को ध्यानपूर्वक श्रवण करें।(सामवेद 2.3.6)
Devraj Indr slayer of Vratr, who defeat the enemy in the war field should respond to our prayers accomplish all of our desires. Several people together extract Somras for him.
अद्या नो देव सवितः प्रजावत्सावीः सौभगम्। परा दुःष्वप्न्यं सुव॥
हे सविता देव! आप आज हमें पुत्र-पौत्रों के साथ शुद्ध वैभव प्रदान करने की कृपा करें। कष्टदायी स्वप्नों की भाँति दुर्भाग्य को आप हमसे दूर कर दे।(सामवेद 2.3.7)
Hey Savita Dev! You should grant pure grandeur along with sons and grandsons to us. Repel the bad luck from us like bad-painful dreams.
क्व 3 स्य वृषभो युवा तुविग्रीवो अनानतः। ब्रह्मा कस्तं सपर्यति॥
युवा, मजबूत गर्दन वाले तथा किसी के भी सम्मुख न झुकने वाले वे इन्द्र देव (विधाता) इस समय कहाँ है? कौन यज्ञकर्ता उनका याजक करता है?(सामवेद 2.3.8)
Where is young Indr Dev with strong neck, who never bow before any one? Which Yagy performer is holding Yagy for him.
उपह्वरे गिरीणां सङ्गमे च नदीनाम्। धिया विप्रो अजायत॥
(इसके पूर्व दिए गए मन्त्र का उत्तर यहाँ दिया जा रहा है) (परमेश्वर) पर्वत की घाटियों (श्रांत स्थलों) तथा नदियों के मिलन, पावन स्थानों पर श्रद्धा पूर्वक ध्यान के माध्यम से सज्जन पुरुष (परमेश्वर की) अर्चना करते हैं तथा उसी स्थान पर उन्हें (इन्द्र देव को) प्राप्त (साक्षात्कार) करते हैं।(सामवेद 2.3.9)
The gentle men worship the Almighty (here Indr Dev) at pious, places, junctions of rivers, valleys of mountains; with devotion, seeking his invocation at that place.
प्र संम्राजं चर्षणीनामिन्द्रं स्तोता नव्यं गीर्भिः। नरं नृषाहं मंहिष्ठम्॥
मानव जनों में अच्छी तरह सम्मान प्राप्त, वन्दना करने योग्य, शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने वाले शासक, उन महान् इन्द्र देवता की वन्दना करें।(सामवेद 2.3.10)
Worship-pray great Indr Dev honoured by the humans thoroughly, who is worshipable, emperor & victorious over the enemies.
सामवेद ऐन्द्रं पर्व (1.4) :: ऋषि :- श्रुतकक्ष, मेधातिथि, गौतम, भरद्वाज, बिन्दु या पूतदक्ष, श्रुतकक्ष अथवा सुकक्ष, वत्स, काण्व, शुनःशेप, वामदेव; देवता :- इन्द्र; छन्द :- गायत्री।
अपादु शिप्रयन्धस: सुदक्षस्य प्रहोषिणः। इन्दोरिन्द्रो यवाशिरः॥
मुकुट धारण करने वाले देवराज इन्द्र ने देवताओं हेतु हवनीय द्रव्य प्रदान करने में कुशल याजको के जौ के आटे एवं दूध से तैयार किये हुए सोमरस रूपी हविष्यान्न (यज्ञादि के दौरान खाने वाले पदार्थ) का सेवन किया।(सामवेद 2.4.1)
Devraj Indr wearing crown ate the offerings prepared by expert Yajak with barley flour and milk in the form of Somras.
इमा उ त्वा पुरूवसोऽभि नोनुवुर्गिरः। गावो वत्सं न धेनवः॥
हे वैभवशाली इन्द्र! दुग्ध प्रदान करने वाली गाएँ जैसे अपने बछड़ों के समीप जाने हेतु उत्सुक रहती है। उसी प्रकार हम याजक भी आपको प्राप्त करने के उद्देश्य से उत्सुकतापूर्वक आपकी स्तुति करते हैं।(सामवेद 2.4.2)
Hey grandeur possessing Indr Dev! The way the cows are curious to feed their calf, we the Yajak too are praying to you for your invocation.
अत्राह गोरमन्वत नाम त्वष्टुरपीच्यम्। इत्था चन्द्रमसो गृहे॥
बुद्धिमान् मनुष्यों की मान्यता के अनुरूप जब संसार को प्रकाशित करने वाले सूर्य देव रात में छिप जाते हैं, उस समय भी उनका अलौकिक तेज, गतिमान् चन्द्रमण्डल में दिखलाई पड़ता है।(सामवेद 2.4.3)
When the Sun illuminating the whole universe sets at night, his divine aura-radiance is seen in the dynamic Moon, as per the belief of the intellectuals.
यदिन्द्रो अनयद्रितो महीरपो वृषन्तमः। तत्र पूषाभुवत्सचा॥
जब महाशक्तिशाली देवराज इन्द्र, गतिमान् पृथ्वी पर अत्यधिक तेज जल वर्षा के रूप में जल को नीचे गिराते हैं, तब पोषण करने में सक्षम (पूषादेव) भी उनकी सहायता करते हैं।(सामवेद 2.4.4)
When mighty Indr Dev shower rains-downpour with great speed down wards, over the earth, Push Dev capable of nourishing, too help him.(11.11.2025)
गौर्धयति मरुतां श्रवस्युर्माता मघोनाम्। युक्ता वह्नी रथानाम्॥
धन-सम्पन्न, मरुतों (वायु) के साथ अग्निरथ के द्वारा जुड़ी हुई, अन्न पैदा करने की अभिलाषा रखने वाली धरती माता, प्राणियों का पालन-पोषण करती हैं।(सामवेद 2.4.5)
Mother earth rich in wealth, joined with Agni Rath through Marud Gan, desirous of producing food grains nourish-nurture the living beings.
उप नो हरिभिः सुतं याहि मदानां पते। उप नो हरिभिः सुतम्॥
हे सोम के स्वामी देवराज इन्द्र! आप अपने अति उत्तम अश्वों के माध्यम से हमारे सोमयज्ञ में बारम्बार पदार्पण करें।(सामवेद 2.4.6)
Hey Lord of Som, Devraj Indr! Invoke-arrive in our Som Yagy riding your excellent horses again and again.
इष्टा होत्रा असृक्षतेन्द्रं वृधन्तो अध्वरे। अच्छावभृथमोजसा॥
देवराज इन्द्र का गुणगान करने वाले याजकगण अपने सामर्थ्य से हमारे हवन में अवभृत स्नान (हवन समाप्त हो जाने पर होने वाला स्नान) होने तक आहुतियाँ प्रदान करते हैं।(सामवेद 2.4.7)
The Yajak Gan who sing songs in the honour of Devraj Indr, make sacrifices in our Yagy as per their capability till bathing at the completion of Yagy.
अह मिद्धि पितुष्परि मेधामृतस्य जग्रह। अहं सूर्य इवाजनि॥
हम याज्ञिकों ने समस्त जनों का पालन-पोषण करने वाले यज्ञरूपी देवेन्द्र के विवेक को अपनी ओर आकर्षित कर लिया है। ऐसा करने से हम सूर्य देवता के सदृश प्रखर तेज (ज्ञान) से युक्त होकर समस्त लोगों को प्रकाशित करने वाले बन गये हैं।(सामवेद 2.4.8)
We the Yagyik have attracted the prudence-attention of Devendr in the form of Yagy towards us. By doing this we have become enlightened to guide the humans like Sury Dev.
रेवतीर्नः सधमाद इन्द्रे सन्तु तुविवाजाः। क्षुमन्तो याभिर्मदेम॥
जिन (इन्द्रदेव) के सहयोग करने से हम धन-सम्पदा से सम्पन्न होकर आनन्दित होते हैं, उन देवराज इन्द्र के प्रभाव से युक्त होकर हमारी गाएँ दूध, अन्नादि देकर हमें अत्यधिक शक्ति प्रदान करने वाली बन जाती है।(सामवेद 2.4.9)
By virtue of whom-Dev Indr, we become prosperous with wealth and attain pleasure. By virtue of the impact of Devraj Indr our cows become more capable of yielding milk and food grains etc.
Cow dung is used as manure which increase to fertility of the land-field leading to better crops.
सोमः पूषा च चेततुर्विश्वासां सुक्षितीनाम्। देवत्रा रथ्योर्हिता॥
देवगणों के रथ में विराजमान सोम एवं पूषादेव (वायु) मानव मात्र को उत्तेजना प्रदान करने वाले है।(सामवेद 2.4.10)
Som & Pusha Dev present in the charoite of demigods grants excitement to the humans.
सामवेद ऐन्द्रं पर्व (2.5) :: ऋषि :- श्रुतकक्ष, वसिष्ठ, मेधातिथिप्रितमेध, इरिम्बिठि, मधुच्छन्दा त्रिशोक, कुसीदी, शुनःशेप; देवता :- इन्द्र; छन्द :- गायत्री।
पान्तमा वो अन्धस इन्द्रमभि प्र गायत। विश्वासाहं शतक्रतुं मंहिष्ठं चर्षणीनाम्॥
हे याज्ञिक गण! महाशक्तिशाली, सैकड़ों तरह के कर्म करने वाले, शत्रुओं का विनाश करने वाले एवं सोमरस का पान करने वाले देवराज इन्द्र की विलक्षण वन्दनाओं के द्वारा विनती करो।(सामवेद 2.5.1)
Hey Yagyik Gan! Worship Devraj Indr, who is extremely powerful-mighty, performer of hundreds of deeds, destroyer of the enemy, drunker of Somras, through amazing prayers
प्र व इन्द्राय मादनं हर्यश्वाय गायत। सखायः सोमपाव्ने॥
हे याजकों! रश्मिरूपी अश्वों के अधिपति, सोमरस का पान करने वाले देवराज इन्द्र को प्रफुल्लित करने वाले स्तुत्यात्मक श्लोकों (स्तोत्रों) का गान करो।(सामवेद 2.5.2)
Hey Yajak Gan! Sing Strotrs which gladden Devraj Indr; who is the Lord of horses in the form of rays and drinks Somras.
वयमु त्वा तदिदर्था इन्द्र त्वायन्तः सखायः। कण्वा उक्थेभिर्जरन्ते॥
हे देवराज इन्द्र! आपसे मित्रता चाहने वाले आपके मित्र हम, आपके स्तोता एवं समस्त कण्ववंशी, वन्दनाओं के माध्यम से आपका गुणगान करते हैं।(सामवेद 2.5.2)
Hey Devraj Indr! We desirous of your friendship, your Stotas and all Kavy Vanshi-clan people, sing your glory through prayers.
इन्द्राय मद्वने सुतं परि ष्टोभन्तु नो गिरः। अर्कमर्चन्तु कारवः॥
प्रफुल्लित स्वभाव वाले देवराज इन्द्र के उद्देश्य से अभियुत किये कये अद्भुत सोमरस का हम वाणी के माध्यम से गुणगान करें। स्तोतागण (स्तुतिगान करने वाले) इस पूजा करने योग्य सोम की प्रार्थना करें।(सामवेद 2.5.4)
We should appreciate the amazing Somras which gladden Devraj Indr. Stotas should worship this Som deserving prayers.
अयं त इन्द्र सोमो निपूतो अधि बर्हिषि। एहीमस्य द्रवा पिब॥
हे देवाधिपति इन्द्र! वेदिका पर विराजमान कुशों पर निष्पन्न किया हुआ सोमरस आपके लिए रखा हुआ है। आप अति शीघ्र यहाँ पधारें एवं इस दिव्य सोमरस को ग्रहण करने की कृपा करें।(सामवेद 2.5.5)
Hey Lord of demigods, Devraj Indr! Extracted-sanctified Somras has been kept over the Kush. Come quickly and accept the divine Somras.
सुरूपकृत्नुमूतये सुदुघामिव गोदुहे। जुहूमसि द्यविद्यवि॥
नित्य मधुर दुग्ध देने वाली गौ को, जिस तरह बुलाया जाता है, उसी तरह हम अपनी रक्षा करने के निमित्त सुंदर स्वरूपों का निर्माण करने वाले देवराज इन्द्र को आमन्त्रित करते हैं।(सामवेद 2.5.6)
The way a cow yielding sweet milk is called, similarly Devraj Indr is invited for protecting us adopting beautiful forms.
अभि त्वा वृषभा सुते सुतं सृजामि पीतये। तृम्पा व्यश्नुही मदम्॥
हे शक्तिशाली इन्द्र देवता! हम आपको सोमरस का पान कराने के निमित्त इस सोमयज्ञ में आपके लिए सोमरस अर्पित करते हैं। आप इस संतुष्टि प्रदान करने वाले सोमरस का सेवन करें।(सामवेद 2.5.7)
Hey mighty Indr Dev! We offer you Somras in this Som Yagy. Drink this satisfying -satiating Somras.
य इन्द्र चमसेष्वा सोमश्चमूषु ते सुतः। पिबेदस्य त्वमीशिषे॥
हे बलशाली देवराज इन्द्र! आपके लिए पवित्र सोमरस (छोटे-बड़े) चमस पात्रों (सोमरस का पान काने हेतु चम्मच की भाँति लकड़ी का बना हुआ पात्र) में परिपूर्ण करके रखा हुआ है। आप इस अद्भुत सोमरस का सेवन करें।(सामवेद 2.5.8)
Hey mighty Devraj Indr! Pious Somras has keen kept in the Chamas pots made of wood for you. Drink this amazing Somras.
योगेयोगे तवस्तरं वाजेवाजे हवामहे। सखाय इन्द्रमूतये॥
अच्छे कर्मों को आरम्भ करने में तथा सभी प्रकार (जीवन) के युद्ध में अत्यन्त शक्तिशाली देवराज इन्द्र की, अपनी रक्षा करने के निमित्त मित्रवत् स्तुति करते हैं।(सामवेद 2.5.9)
We worship Indr Dev like a friend for our protection-safety, prior to beginning of virtuous endeavours in the fight for all sorts of wars-struggle in life.
आ त्वेता नि षीदतेन्द्रमभि प्र गायत। सखायः स्तोमवाहसः॥
हे यज्ञ करने वाले सखागण! देवराज इन्द्र को हर्ष से सम्पन्न करने हेतु, विनती करने के लिए शीघ्र आकर स्थान ग्रहण करो तथा सभी तरह से उनकी वन्दना करो।(सामवेद 2.5.10)
Hey Yagy accomplishing friends! Come quickly and occupy your place to appease-gladden Devraj Indr, praying in every possible manner.
सामवेद ऐन्द्रं पर्व (2.6) :: ऋषि :- विश्वामित्र, मधुच्छन्दा, कुसीदी काण्व, प्रियमेध, वामदेव, श्रुतकक्ष, मेधातिथि, बिन्दु, पूतदक्षो; देवता :- इन्द्र, सदसस्पति, मरुत; छन्द :- गायत्री।
इदं ह्यन्वोजसा सुतं राधानां पते। पिबा त्वा3स्य गिर्वणः॥
हे ऐश्वर्याधिपति, वन्दनीय देवराज इन्द्र! पराक्रम द्वारा निकाले (निचोड़े) गये, इस सोमरस का रुचि पूर्वक सेवन करें।(सामवेद 2.6.1)
Hey Lord of grandeur, worshipable Devraj Indr! Consume this Somras extracted by making efforts, tastefully.
महाँ इन्द्रः पुरश्च नो महित्वमस्तु वज्रिणे। द्यौर्न प्रथिना शवः॥
हमारे ये इन्द्र देव अत्यन्त श्रेष्ठ एवं महान् हैं। वज्रधारी इन्द्र देव की कीर्ति स्वर्गलोक के सदृश विस्तृत होकर प्रसारित हो और इनके पराक्रम का गुणगान चारों दिशाओं में सब ओर हो।(सामवेद 2.6.2)
Our Devraj Indr is excellent-best & great. Let the fame of Vajr wielding Devraj Indr spread like the heavens in all directions describing his valour.(12.11.2025)
आ तू न इन्द्र क्षुमन्तं चित्रं ग्राभं से गृभाय। महाहस्ती दक्षिणेन॥
सहस्रों भुजाओं वाले, हे देवराज इन्द्र! आप हमें सत्य के मार्ग पर अग्रसर कर, प्रशंसा करने योग्य अन्न, धन आदि (वैभव) अपने दाहिने हाथ से (सम्मानपूर्वक) प्रदान करें।(सामवेद 2.6.3)
Hey Devraj Indr with thousands arms! Move us to truth, grant appreciable food grains, wealth & grandeur.
अभि प्र गोपतिं गिरेन्द्रमर्च यथा विदे। सूनुं सत्यस्य सत्पतिम्॥
हे याज्ञिकों! गायों के पालनकर्ता, सज्जन पुरुषों के रक्षक देवराज इन्द्र की वैदिक मन्त्रों के उच्चारण द्वारा स्तुति करो जिससे उनकी शक्तियों का आभास हो।(सामवेद 2.6.4)
Hey Yagyik Gan! Pray to Indr Dev, who is nurturer of cows, protector of gentle men, with Vaedik Mantrs so that his might & power are demonstrated-illustrated.
कया नश्चित्र आ भुवदूती सदावृधः सखा। कया शचिष्ठया वृता॥
अविच्छिन्न उन्नति करने वाले, हे देवराज इन्द्र! आप किन-किन संतुष्टि प्रदान करने वाले पदार्थों को चढ़ाने से, किस प्रकार की अर्चना-विधि से आनन्दित होकर एवं किन अद्भुत शक्तियों के साथ हमारे सहायतार्थ बनेंगे?(सामवेद 2.6.5)
Hey Devraj Indr making continuous progress! Which offerings, worship procedures will make you helpful to us, with your amazing powers.
त्यमु वः सत्रासाहं विश्वासु गीर्ध्वायतम्। आ च्यावयस्यूतये॥
हे यज्ञकर्ताओं! अपनी सभी वाणियों में व्याप्त वन्दनाओं के द्वारा, अपनी रक्षा करने हेतु, दानवों पर विजय प्राप्त करने वाले देवराज इन्द्र का आवाहन करो।(सामवेद 2.6.6)
Hey Yagy performers! Recite prayers devoted to Devraj Indr for his invocation & victory over the demons.
सदसस्पतिमद्भुतं प्रियमिन्द्रस्य काम्यम्। सनिं मेधामयासिषम्॥
देवराज इन्द्र के प्रिय, इच्छुक पदार्थों को प्रदान करने में सक्षम, लोकों के अधिपति, अलौकिक बुद्धि (मेधा) को हमने प्राप्त किया।(सामवेद 2.6.7)
We have attained Devraj Indr Lord of the abodes, who is dear, capable to granting dear-desirable objects and divine intellect.
ये ते पन्था अधो दिवो येभिर्व्यश्वमैरयः। उत श्रोषन्तु नो भुवः॥
हे देवराज इन्द्र! द्युलोक से धरती की ओर वृद्धि करते हुए आपके मार्ग, जिनसे आप इस जगत् को गति प्रदान करते हैं, वे (मार्ग) हमारे याग करने के स्थान पर पहुँचते हैं, आप उन्हीं मार्गों के माध्यम से हमारे यज्ञ स्थल में उपस्थित हों।(सामवेद 2.6.8)
Hey Devraj Indr! Your routes-way, progressing from heavens to earth through which you accelerate the universe leading to the Yagy site. Come to the Yagy through those paths.
भद्रंभद्रं न आ भरेषमूर्ज शतक्रतो। यदिन्द्र मृडयासि नः॥
हे शतक्रतु देवराज इन्द्र! सुख प्रदान करने वाले अन्न-बल से युक्त वैभव आप हमें परिपूर्ण मात्रा में देने की कृपा करें; क्योंकि आपकी कृपा से ही हम सुखी होते हैं।(सामवेद 2.6.9)
Hey performer of hundred Yagy, Indr Dev! Grant us food grains, strength and grandeur in sufficient quantity; since we become comfortable due to your mercy-blessings only.
अस्ति सोमो अयं सुतः पिबन्त्यस्य मरुतः। उत स्वराजो अश्विना॥
हमारे (याज्ञिकों) द्वारा निष्पन्न किये हुए इस सोमरस का सेवन पराक्रमी मरुद्गण एवं अश्विनयुगल करते हैं।(सामवेद 2.6.10)
The Somras extracted-sanctified by us , the Yagyik is consumed by the invincible Marud Gan and Ashwani Kumars, duo.
सामवेद ऐन्द्रं पर्व (2.7) :: ऋषि :- देवजामय, इन्द्रमातर, गोधा, दध्यंगाथर्वण, प्रस्कण्व, गौतम, मधुच्छन्दा, वामदेव, वत्स, शुनःशेप, वातायान उल; देवता :- इन्द्र; छन्द :- गायत्री।
ईङ्खयन्तीरपस्युव इन्द्रं जातमुपासते। वन्वानासः सुवीर्यम्॥
श्रेष्ठ पराक्रम एवं कार्य की अभिलाषा करने वाली देवराज इन्द्र की माता, उत्पन्न हुए इन्द्र देवता की उपासना करती हैं।(सामवेद 2.7.1)
Desirous of excellent valour and endeavours, the mother of Devraj Indr, worship Indr Dev who has evolved.
न कि देवा इनीमसि न क्या योपयामसि। मन्त्रश्रुत्यं चरामसि॥
हे देवगणों! वैदिक मन्त्रों के आधार पर व्यवहार करने वाले हम याज्ञिक तुम्हारे विपरीत अर्थात् धर्म के विरुद्ध कोई कार्य नहीं करते हैं एवं न ही किसी को कोई नुकसान पहुँचाते हैं।(सामवेद 2.7.2)
Hey demigods-deities! We the Yagyik, do not behave against the Dharm, i.e., behave as per the Vaedik Mantr without harming any one.
दोषो आगाद् बृहद्गाय द्युमद्गामन्नाथर्वण। स्तुहि देवं सवितारम्॥
हे प्रकाश मार्ग के राहगीर अथर्व वेदीय विप्र! हे बृहत् नामक साम के गायक! हवन कार्य के विकारों को स्वच्छ करने हेतु सविता (स्वप्रकाशित) देवता का स्तुति गान करो।(सामवेद 2.7.3)
Hey Athrv Vediy, Vipr-Brahman, following the lightened route! Hey singer of Brahat Sam! For the purification of the Hawan related defects-impurities sing-recite the prayer for Savita Dev.
एषो उषा अपूर्व्या व्युच्छति प्रिया दिवः। स्तुषे वामश्विना बृहत्॥
यह हर्ष प्रदान करने वाली उषा स्वर्ग लोक से आकर रात के तिमिर को दूर कर प्रकाशित होती है। हे (उषा के कार्य में सहायता करने वाले) अश्वि युगलों! हम आपकी बृहद् (विशेष) वन्दना करते हैं।(सामवेद 2.7.4)
This Usha comes from the heavens and remove the darkness of night. Hey Ashwani Kumars duo, helping in the functions of Usha! We perform-conduct your Brahat worship.
इन्द्रो दधीचो अस्थभिर्वृत्राण्यप्रतिष्कुतः। जघान नवतीर्नव॥
कभी न परास्त होने वाले देवराज इन्द्र ने दधीचि की अस्थियों के द्वारा (निर्मित वज्र के माध्यम से) असंख्य दानवों का सर्वनाश किया।(सामवेद 2.7.5)
Invincible-never defeated Indr Dev, destroyed numerous demons with the Vajr made of the bones of Dadhichi Rishi.
इन्द्रेहि मत्स्यन्धसो विश्वेभिः सोपर्वभिः। महाँ अभिष्टिरोजसा॥
हे इन्द्र देवता! अन्नरूपी सम्पूर्ण सोमरस द्वारा आप आनन्दित होते हैं। आप महान् हैं तथा हमारे सारे ऐच्छिक फलों को देने वाले हैं। आप हमारे यहाँ पधारें तथा (सोमरस का सेवन करके) अपने पराक्रम से दुर्जन शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने का सामर्थ्य प्राप्त करें।(सामवेद 2.7.6)
Hey Indr Dev! You gladden with the Somras as food grains. You are grant-award us desired rewards. Come to our house and sip Somras; there after attain the capability of winning the wicked enemies with your valour.
आ तू न इन्द्र वृत्रहन्नस्माकमर्थमा गहि। महान्महीभिरूतिभिः॥
हे वृत्र संहारक इन्द्र! आप महान् बनकर रक्षा करने के अनेकों साधनों के साथ हमारे समीप पधारें।(सामवेद 2.7.7)
Hey slayer of Vratr, Indr Dev! Become great and come to us with several protection means.
ओजस्तदस्य तित्विष उभे यत्समवर्तयत्। इन्द्रश्चर्मेव रोदसी॥
देवराज इन्द्र का वह तेज चमक उठा है, जिसको वह स्वर्गलोक से भूलोक तक चर्म के सदृश प्रसारित कर देते हैं।(सामवेद 2.7.8)
Tej-aura of Indr Dev is shinning, which is transmitted by him to the earth through the heavens, like skin (protective layer).
अयमु ते समतसि कपोत इव गर्भधिम्। वचस्तच्चिन्न ओहसे॥
हे देवराज इन्द्र! जिस प्रकार कबूतर गर्भ धारण करने वाली कबूतरी के संग निरंतर बना रहता है, उसी प्रकार आपके पान करने के उद्देश्य से तैयार किये गये सोमरस के समीप आप जाते हैं एवं हमारे स्तवन को ध्यानपूर्वक श्रवण करते हैं।(सामवेद 2.7.9)
Hey Devraj Indr! The manner in which a pigeon remain with the female pigeon when she is pregnant, similarly you move to the Somras extracted for you and listen to our prayers.
वात आ वातु भेषजं शम्भु मयोभु नो हृदे। प्र न आयूंषि तारिषत्॥
हे परमेश्वर! हमारे हृदय के लिए शान्ति प्रदान करने वाली एवं सुख देने वाली औषधियों को वायु देव (पूषा) हमारे समीप ले आएँ। ये औषधियाँ हमें शतायु प्रदान करें।(सामवेद 2.7.10)
Hey Almighty-Parmeshwar! Let Pusha-Vayu Dev bring the medicines (Jadi-Buti, herbs) granting solace-peace and pleasure-comforts to us. Let these medicine grant us a life extending to hundred years.(13.11.2025)
सामवेद ऐन्द्रं पर्व (2.8) :: ऋषि :- कण्व, वत्स, श्रुतकक्ष, मधुच्छंदा, वामदेव, इरिम्बिठि, वारुणि, सत्यधृति; देवता :- इन्द्र; छन्द :- गायत्री।
यं रक्षन्ति प्रचेतसो वरुणो मित्रो अर्यमा। न किः स दभ्यते जनः॥
जिस याजिक को श्रेष्ठ ज्ञान से युक्त वरुण, मित्र एवं अर्थमा देवता गण का रक्षण प्राप्त हो, उसे कोई भी नुकसान नहीं पहुँचा सकता है।(सामवेद 2.8.1)
The Yagyik who is under protection of enlightened Varun, Mitr & Aryma Dev Gan can not be harmed by any one.
ग व्यो षु णो यथा पुराश्वयोत रथया। वरिवस्या महोनाम्॥
हे देवराज इन्द्र! आप सर्वदा की भाँति हमें श्रेष्ठ गायों, अति उत्तम अश्वों से युक्त रथ एवं सम्मानित धन प्रदान करने की कामना से हमारे समीप पदार्पण करें।(सामवेद 2.8.2)
Hey Devraj Indr! Come to us to grant us best cows, charoite deploying excellent horses and wealth.
इमास्त इन्द्र पृश्नयो घृतं दुहत आशिरम्। एनामृतस्य पिप्युषीः॥
हे देवराज इन्द्र! आपकी ये गाएँ सत्य स्वरूप याग का विस्तार करने वाली हैं। ये गाएँ हमें घी एवं दुग्ध देती है।(सामवेद 2.8.3)
Hey Devraj Indr! Your cows are the propagator of Truthful Yagy, They grant us ghee and milk.
अया धिया च गव्यया पुरुणामन्पुरुष्टुत। यत्सोमेसोम आभुवः॥
हे अनेकों नामों से चर्चित, अनेक लोगों द्वारा गुणगान करने योग्य देवराज इन्द्र! हर एक सोमयज्ञ में जहाँ आप जाते हैं, वहाँ गायों की अभिलाषा रखने वाली बुद्धि से हम आपकी उपासना करते हैं।(सामवेद 2.8.4)
Hey praise worthy Indr Dev, famous with several names! We worship you with the desire of cows in every Som Yagy visited by you.
पावकाः न सरस्वती वाजेभिर्वाजिनीवती। यज्ञं वष्ट्टु धियावसुः॥
पावन करने वाली, अन्न प्रदान करने वाली, बुद्धिमानी से धन प्रदान करने वाली वीणा वादिनी, ज्ञान एवं कर्म से हमारे यज्ञ को सार्थक बनायें।(सामवेद 2.8.5)
Let purifying, food & wealth granting Veena Vadini-Maa Saraswati; make our Yagy successful with knowledge and endeavours.
क इमं नाहुषीष्वा इन्द्रं सोमस्य तर्पयात्। स नो वसून्या भरात्॥
मनुष्य जनों में ऐसा कौन है, जो इन देवराज इन्द्र को संतुष्ट कर सके? वे इन्द्र देवता हमारे यज्ञ में पधारें एवं हमें धन, वैभव देने की कृपा करें।(सामवेद 2.8.6)
Who amongest the humans is there to satisfy Devraj Indr! Let Indr Dev invoke in our Yagy and grant us wealth and grandeur.
आ याहि सुषुमा हि त इन्द्र सोमं पिबा इमम्। एदं बर्हिः सदो मम॥
हे देवराज इन्द्र! आप हमारे इस हवन में उपस्थित हों। अपने तृप्ति प्राप्त करने हेतु निकाले गये इस सोमरस को ग्रहण कर अत्यन्त उत्तम कुश पर विराजमान हों।(सामवेद 2.8.7)
Hey Devraj Indr! Invoke in our Hawan. Occupy the excellent Kush cushion to drink the Somras sanctified for your satiation-satisfaction.
महि त्रीणामवरस्तु द्युक्षं मित्रस्यार्यम्णः। दुराधर्षं वरुणस्य॥
मित्र, वरुण एवं अर्यमा इन तीनों देवताओं का एक साथ मिला हुआ ओजयुक्त महान् संरक्षण हमें प्राप्त हो, जिससे हम अन्य लोगों को परास्त करने में सक्षम हों।(सामवेद 2.8.8)
We should have asylum accompanied with aura-radiance, together of Mitr, Varun and Aryma, the three demigods, so that we are able to defeat others.
त्वावतः पुरुवसो वयमिन्द्र प्रणेतः। स्मसि स्थातर्हरीणाम्॥
हे सम्पूर्ण संपदाओं के अधिष्ठाता, अति उत्तम कर्म करने वाले, अश्वों पर बैठे हुए देवराज इन्द्र! आप हमारी रक्षा करें, जिससे हम सभी प्रकार से सुरक्षित रह सकें।(सामवेद 2.8.9)
Hey Lord of all wealth-grandeur, performing excellent deeds, riding horses, hey Indr Dev! Protect us so that we are safe in every manner.
सामवेद ऐन्द्रं पर्व (1.9) :: ऋषि :- प्रगाथ, विश्वामित्र, वामदेव, श्रुतकक्ष, आंगिरस मधुच्छन्दा, गृत्समद, भरद्वाज; देवता :- इन्द्र; छन्द :- गायत्री।
उत्त्वा मन्दन्तु सोमाः कृणुष्व राधो अद्रिवः। अव ब्रह्मद्विषो जहि॥
हे देवराज इन्द्र! यह सोमरस आपको सुख देने वाला हो। हे वज्रधारी देवराज इन्द्र! आप हमें धन-वैभव से परिपूर्ण कर ज्ञान से शत्रुता का भाव रखने वाले लोगों का हनन कर दें।(सामवेद 2.9.1)
Hey Devraj Indr! Let this Somras grant you pleasure-comforts. Hey Vajr wielding Indr Dev!! Accomplish-enrich us with wealth & grandeur and destroy those who are the enemy of learning-knowledge.
गिर्वणः पाहि नः सुतं मधोर्धाराभिरज्यसे। इन्द्र त्वादातमिद्यश:॥
हे स्तुत्य देवराज इन्द्र आप हमारे द्वारा शुद्ध करे सोमरस का सेवन करें, क्योंकि आप इस उल्लास से युक्त सोमरस की धाराओं के माध्यम सिंचित होते हैं। आपकी अनुकम्पा से ही हमें कीर्ति प्राप्त होती है।(सामवेद 2.9.2)
Hey worshipable Devraj Indr! Drink this sanctified Somras, since you are nourished-nurtured through the currents of Somras full of glee-frolic. Your blessings-mercy grant us fame.
सदा व इन्द्रश्चर्कृषदा उयो न स सपर्यन। न देवो यतः शूर इन्द्रः॥
हे याजकों! ये देवराज इन्द्र तुम्हारी सहायता करने हेतु हमेशा तैयार रहते हैं। वे आराधना करने के साथ ही तुम्हारे हवन की ओर उत्कंठित होते हैं। इसी प्रकार के महापराक्रमी देवराज इन्द्र हमारे द्वारा आराध्य है।(सामवेद 2.9.3)
उत्कंठित :: चिंतित, व्यग्र: eager anxious.
Hey Yajak Gan! Devraj Indr is always ready to help you. He become eager-anxious for your Yagy with the performance of prayers. Redoubtable-mighty Indr Dev is worshiped by us.
आ त्वा विशन्त्विन्दवः समुद्रमिव सिन्धवः। न त्वामिन्द्राति रिच्यते॥
हे देवराज इन्द्र! जिस प्रकार नदियाँ समुद्र में जाकर मिल जाती है, उसी प्रकार सोमरस आपके भीतर समा जाता है। हे इन्द्र! आपसे अधिक बढ़कर और कोई देव नहीं है।(सामवेद 2.9.4)
Hey Devraj Indr! The way the river merge with the ocean, Somras is absorbed-soaked by your body. Hey Indr Dev! No other demigod-deity is comparable to you.
इन्द्रमिद्गाथिनो बृहदिन्द्रमर्केभिरर्किणः। इन्द्रं वाणीरनूषत॥
सामगान के गायकों ने, गाये जाने योग्य, बृहत् (लंबे-चौड़े) साम की स्तुतियों के माध्यम से इन्द्र देव को हर्षयुक्त किया है। इसी प्रकार याजको ने भी वैदिक मन्त्रोच्चारण के माध्यम से देवराज इन्द्र की उपासना की है।(सामवेद 2.9.5)
Singers of Sam Gan gladdened Indr Dev with the long-vast prayers-Stuties. Similarly the Yajak Gan worshiped Indr Dev with Mantropchar-recitation of Mantr.
इन्द्र इषे ददातु न ऋभुक्षणमृभुं रयिम्। वाजी ददातु वाजिनम्॥
महान् शक्तिशाली देवराज इन्द्र हमें अति उत्तम धन से सर्वदा परिपूर्ण बनाये रखें। अन्न प्राप्त करने हेतु हमें मेधावी उत्तराधिकार (पुत्र) देने की कृपा करें। हे शक्तिशाली इन्द्र द्रेव! हमें बलवान् बनायें।(सामवेद 2.9.6)
Great & mighty Indr Dev should always keep us replete with excellent wealth-riches. Grant us intelligent sons for accepting food grains. Hey mighty-powerful Indr Dev! Make us strong.
इन्द्रो अङ्ग महद्भयमभी षदप चुच्यवत्। स हि स्थिरो विचर्षणिः॥
संग्राम में अचल रहने वाले विश्व द्रष्टा देवराज इन्द्र, महान् आतंक को अति शीघ्र दूर करते हैं और उन्हें स्थाई रूप से हटा देते हैं।(सामवेद 2.9.7)
During war always unmoved, watching the universe, Devraj Indr remover terror quickly and remove it permanently.
इमा उ त्वा सुतेसुते नक्षन्ते गिर्वणो गिरः। गावो वत्सं न धेनवः॥
हे आराध्य देवराज इन्द्र! जैसे दूध प्रदान करने वाली गायें अपने बछड़ों के निकट स्वयं ही चली जाती है, वैसे ही हर हवन में हमारे द्वारा की गई वन्दनाएं आपके समीप पहुँच जाती हैं।(सामवेद 2.9.8)
Hey worshiped deity Devraj Indr! The way the cows themselves move to the calf for feeding them, our prayers automatically reach you in every Hawan.
इन्द्रा नु पूषणा वयं सख्याय स्वस्तये। हुवेम वाजसातये॥
हम अनाज प्राप्त करने की अभिलाषा से, अपने कल्याण हेतु मित्रता के निमित्त इन्द्र एवं पूषा (वायु) देवताओं को स्तुतियों के माध्यम से आवाहित करते हैं।(सामवेद 2.9.9)
With the desire of food grains we invoke Indr & Push (Vayu Dev) with Stuties.
न कि इन्द्र त्वदुत्तरं न ज्यायो अस्ति वृत्रहन्। न क्येवं यथा त्वम्॥
हे शत्रुओं का हनन करने वाले देवराज इन्द्र! आपसे ज्यादा श्रेष्ठ एवं महान् अन्य कोई देवता नहीं हैं। आपके समतुल्य दूसरा और कोई भी नहीं है।(सामवेद 2.9.10)
Hey destroyer of the enemies Devraj Indr! No other deity is better & greater than you. None equals you.(14.11.2025)
सामवेद ऐन्द्रं पर्व (2.10) :: ऋषि :- त्रिशोक, मधुच्छन्दा, वत्स, सुकक्ष, वामदेव, विद्यामित्र गोपूक्त्यश्वसूक्तिनौ, श्रुतकक्ष अथवा सुरुक्षा; देवता :- इन्द्र; छन्द :- गायत्री।
तरणिं वो जनानां त्रदं वाजस्य गोमतः। समानमु प्र शंसिषम्॥
हे मनुष्यों! विपत्तियों में पड़े लोगों को मुक्त कराने वाले, शत्रुओं को डराने वाले, पशुधन के माध्यम से युक्त अन्न प्रदान करने वाले, प्रगति की ओर बढ़ने वाले देवराज इन्द्र का हम स्तवन करते हैं।(सामवेद 2.10.1)
Hey humans! We worship Devraj Indr who release the troubled, create terror-fear for the enemy, grant food grains through the animals, push us to progress.
असृग्रमिन्द्र ते गिरः प्रति त्वामुदहासत। सजोषा वृषभं पतिम्॥
हे देवराज इन्द्र! आपकी वन्दना करने हेतु हम लोगों ने स्तुत्यात्मक श्लाकों (स्तात्रों) का निर्माण किया है। पराक्रमी एवं मनुष्यों के पालनकर्ता देवराज इन्द्र, इन स्तुतियों से हमने आपकी अभ्यर्थना की है, जिसको आपने स्वीकार किया है।(सामवेद 2.10.2)
Hey Devraj Indr! We have created-written Shlok for you worship. Nurturer of the invincible-brave humans Devraj Indr has accepted our prayers.
सुनीथो घा स मों यं मरुतो यमर्यमा। मित्रास्पान्त्यद्रुहः॥
हिंसा से रहित मरुत्, मित्र एवं अर्यमा, जिस मनुष्य को संरक्षण प्रदान करते हैं, वह मनुष्य अवश्य रूप से अति उत्तम मार्ग पर चलने वाला होता है।(सामवेद 2.10.3)
The humans who are granted asylum by Marud Gan, Mitr and Aryma who are free from violence, moves over excellent path.
यद्वीडाविन्द्र यत्स्थिरे यत्पर्शाने पराभृतम्। वसु स्पार्हं तदा भर॥
हे देवराज इन्द्र! पुरुषार्थ (धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष) से प्राप्त किया हुआ स्थिर तथा शक्तिशाली स्तम्भ प्रदान कराने वाला श्रेष्ठ धन, जो आपके निकट है, वह हमें प्राप्त कराने की कृपा करें।(सामवेद 2.10.4)
Hey Devraj Indr! Help us attain the wealth you have, which awards might and support and is generated through efforts (labour, endeavours), Dharm, Arth, Kam & Moksh.
श्रुतं वो वृत्रहन्तमं प्र शर्धं चर्षणीनाम्। आशिषे राधसे महे॥
हे ऋत्विजों! आपने वृत्रहन्ता-पराक्रम की महिमा सुनी ही है। मानव मात्र को अति उत्तम धन प्राप्त कराने की अभिलाषा के फलस्वरूप वह महान् पराक्रम आपको प्रयोग करने हेतु प्रदान करता हूँ।(सामवेद 2.10.5)
Hey Ritviz! You have heard the glory of Vratr slaying. I grant desirous humans great courage-might for the attainment of excellent wealth.
अरं त इन्द्र श्रवसे गमेम शूर त्वावतः। अरं शक्र परेमणि॥
हे शूरवीर देवराज इन्द्र! आपकी कीर्ति को हमने बहुत बार श्रवण किया है। हे बलशाली देवराज इन्द्र! आपके सदृश महान् देवताओं के सन्निकट रहकर हम प्रफुल्लित हों।(सामवेद 2.10.6)
Hey brave-invincible Devraj Indr! We have heard your fame several times. Hey mighty Devraj Indr! Let us gladden in your proximity.
धानावन्तं करम्भिणमपूपवन्तमुक्थिनम्। इन्द्र प्रातर्जुषस्व नः॥
हे देवराज इन्द्र! दही एवं घी युक्त जौ के सत्तू से मिश्रित पुओं की हवि को मन्त्रों के उच्चारण के साथ हम आपको अर्पित करते हैं, आप प्रातः इसे स्वीकारें।(सामवेद 2.10.7)
पुआ :: Dough mixed with sugar is fried in Ghee.
Hey Devraj Indr! We offer you fried dough mixed with sugar in Ghee, curd, Ghee and roasted barley with recitation of Mantr, please accept them.
अपां फेनेन नमुचेः शिर इन्द्रोदवर्तयः। विश्वा यदजय स्पृधः॥
युद्ध करने वाले सभी लोगों को परास्त करने के पश्चात् देवराज इन्द्र ने नमुचि नामक राक्षस के सिर को पानी के फेन (समुद्र झाग औषधि) से निर्मित शस्त्र से तोड़ डाला।(सामवेद 2.10.8)
Devraj Indr defeated all those who were fighting war and then smashed the head of Namuchi, a demon with the weapon made from the foam of ocean.
इमे त इन्द्र सोमाः सुतासो ये च सोत्वाः। तेषां मत्स्व प्रभूवसो॥
हे महान् वैभवशाली देवराज इन्द्र! यह सोमरस आपके पान करने हेतु शुद्ध करके तैयार किया गया है। आप इस शोधित सोमरस का सेवन करके प्रफुल्लित हों।(सामवेद 2.10.9)
Hey glorious Devraj Indr! This Somras has been prepared for you to drink. Drink this sanctified Somras and gladden.
तुभ्यं सुतासः सोमाः स्तीर्णं बर्हिर्विभावसो। स्तोतृभ्य इन्द्र मृडय॥
हे वैभव से युक्त देवराज इन्द्र! आपके ग्रहण करने के निमित्त यह सोमरस कुश पर प्रतिस्थापित है। हे देवराज इन्द्र। इस पावन कुश-आसन पर विराजमान होकर सोमरस का सेवन करने की कृपा को एवं याजकों को हर्षयुक्त करें।(सामवेद 2.10.10)
Hey Devraj Indr possessing grandeur! This Kush cushion has been laid for you to occupy and drink Somras. Make the Yajak Gan happy by sitting over it and drinking Somras.
सामवेद ऐन्द्रं पर्व (1.11) :: ऋषि :- शुनःशेप, श्रुतकक्ष, त्रिशोक, मेधातिथि, गौतम, ब्रह्मातिथि, विश्वामित्र, जमदग्नि या प्रस्कण्व; देवता :- इन्द्र; छन्द :- गायत्री।
आ व इन्द्रं कृविं यथा वाजयन्तः शतक्रतुम्। मंहिष्ठं सिञ्च इन्दुभिः॥
जिस तरह अनाज की अभिलाषा करने वाले मनुष्य कृषि कार्य में संलग्न भूमि की जल से सिंचाई करते हैं, उसी प्रकार हम पराक्रम की इच्छा वाले याजक उन महान् देवराज इन्द्र को सोमरस के द्वारा सींचते हैं।(सामवेद 2.11.1)
The way we humans desirous of food grains irrigate the land, we too satiate Indr Dev by feeding him with Somras desiring courage-might.
अतश्चिदिन्द्र न उपा याहि शतवाजया। इषा सहस्त्रवाजया॥
हे देवराज इन्द्र! असंख्य प्रकार के बल से सम्पन्न हजारों प्रकार के पोषण प्रदान करने वाले पदार्थों एवं रसों के साथ, आप अन्तरिक्ष (पृथ्वी एवं स्वर्ग के बीच का स्थान) से हमारे यज्ञ में उपस्थित हों।(सामवेद 2.11.2)Hey Devraj Indr! Join our Yagy with hundred kinds of strength, nourishing materials and saps from the space between the heavens and earth.
आ बुन्दं वृत्रहा ददे जातः पृच्छाद्विमातरम्। क उग्राः के ह श्रृण्विरे॥
उत्पन्न होते ही शर हस्त में लेकर वृत्र नामक असुर का संहार करने वाले देवराज इन्द्र ने अपनी माता से पूछा, कि दूसरे श्रेष्ठ वीर कौन-कौन से प्रसिद्ध हैं?(सामवेद 2.11.3)
With his birth Indr Dev, who later killed Vratr the demon, held arrow in his hand and asked his mother that who were other famous great warriors?
वृबदुक्थं हवामहे सृप्रकरस्नमूतये। साधः कृण्वन्तमवसे॥
संसार में बसे समस्त लोगों के संरक्षण हेतु अपने हाथों को पसारे, साधनों के साथ तत्पर देवराज इन्द्र को हम अपनी रक्षा करने हेतु आवाहित करते हैं।(सामवेद 2.11.4)
We spread our palms for the protection of all humans and invoke Devraj Indr who is ready with his means of protection.
ऋजुनीती नो वरुणो मित्रो नयति विद्वान्। अर्यमा देवैः सजोषाः॥
विवेक से परिपूर्ण मित्र एवं वरुण देवता हमें सहज विधि वाले मार्ग पर अग्रसर करते हैं। देवताओं के साथ गमन करने वाले अर्यमा हमें सहज पथ से प्रगतिशील बनायें।(सामवेद 2.11.5)
Full of prudence Mitr & Varun Dev make us move forward with easy movement. Let Aryma who move with demigods make our journey progressive via simple path.
दूरादिहेव यत्सतोऽरुणप्सुरशिश्वितत्। वि भानुं विश्वथातनत्॥
दूर से निकट आने वाली उषा की लालिमा, जब दिखाई पड़कर अपनी किरणों को चारों ओर प्रसारित करती है, तब उसके तेज से सम्पूर्ण जगत् आलोकित हो जाता है।(सामवेद 2.11.6)
The whole universe-world is illuminated by the reddish light of Usha-dawn in all directions.
आ नो मित्रावरुणा घृतैर्गव्यूतिमुक्षतम्। मध्वा रजांसि सुक्रतू॥
हे मित्रा-वरुण! हमारी गायों (ज्ञानेन्द्रियों) को घी (प्रेम) से परिपूर्ण करें तथा त्रिलोक को भी अत्यन्त उत्तम रसों (भावों) से सींचें।(सामवेद 2.11.7)
Hey Mitra-Varun! Nurture our cows (sense organs) with Ghee (love) and in addition nourish the three abodes with best saps.(15.11.2025)
उदु त्ये सूनवो गिरः काष्ठा यज्ञेष्वत्नत। वाश्रा अभिजु यातवे॥
शब्दनाद करने वाले मरुतों ने यज्ञार्थ जल को निःसृत किया। बहते हुए पानी को पीने के लिए रैभाती गाएँ, घुटने तक जल में जाने हेतु आदिष्ट रहती है। (सामवेद 2.11.8)
निःसृत :: बाहर आया हुआ; discharged.
Marud Gan making sound released water. The cows move to running water for drinking till their knees are submerged in it.
इदं विष्णुर्वि चक्रमे त्रेधा नि दधे पदम्। समूढमस्य पांसुले॥
इस संसार को भगवान् विष्णु (वामन) देवता ने तीन पग में नाप लिया। उनके धूल से युक्त पग में सम्पूर्ण विश्व समाया हुआ है। (सामवेद 2.11.9)
Bhagwan Shri Hari Vishnu covered the whole universe as Vaman Avtar in just three steps. His foot full of dust pervade the entire universe.
सामवेद ऐन्द्रं पर्वणि पर्व (2.12) :: ऋषि :- मेधातिथि, वामदेव, प्रियमेध, विश्वामित्र, कौत्स दुर्मित्र, सुमित्र व गथिनोऽमीपाद् उदलो या श्रुतकक्ष; देवता :- इन्द्र; छन्द :- गायत्री।
अतीहि मन्युषाविणं सुषुवांसमुपेरय। अस्य रातौ सुतं पिब॥
हे देवराज इन्द्र! जो याजक क्रोध से युक्त होकर सोमरस तैयार करता है, आप उस सोमरस का सेवन न करें। श्रेष्ठ विधि से जो याजक सोमरस निकालता है, आप उस याजक के हवन में जाकर सोमरस को ग्रहण करें।(सामवेद 2.12.1)
Hey Devraj Indr! Do not drink the Somras extracted by the Yajak in ager. Accept the Somras extracted by the Yajak with best procedures in the Hawan only.
कदु प्रचेतसे महे वचो देवाय शस्यते। तदिद्ध्यस्य वर्धनम्॥
देवराज इन्द्र की प्रशंसा करने वाले, हमारे तुच्छ से दृष्टिगोचर होने वाले स्तोत्रों से भी श्रेष्ठ ज्ञानी देवराज इन्द्र संतुष्ट होते हैं।(सामवेद 2.12.2)
Our Strotr sung in the honour of best scholar Devraj Indr satisfy him though they appear to be inferior.
उक्थं च न शस्यमानं नागो रयिरा चिकेत। न गायत्रं गीयमानम्॥
आराधना न करने वालों (आस्था रहित) के देवराज इन्द्र, बैरी हैं। याजकों द्वारा पढ़े गए स्तोत्रों को वे अच्छी तरह जानते हैं। सामवेद का गायन करने वालों (उद्गाता) के गान को भी वे श्रवण करते एवं समझते हैं।(सामवेद 2.12.3)
Devraj Indr is an enemy of those who are faithless and do not pray-worship. He is aware of the Strotr read by the Yajak Gan. He listen & understand the Sam Ved sung by the recitators.
इन्द्र उक्थेभिर्मन्दिष्ठो वाजानं च वाजपतिः। हरिवांत्सुतानां सखा॥
परम् शक्तिशाली, घोड़ों से सुशोभित देवराज इन्द्र सोमयज्ञ में याजकों के स्तुत्यात्मक श्लोकों से प्रफुल्लित होकर उनके सहयोगी बन जाते हैं।(सामवेद 2.12.4)
Extremely might, glorified by the horses Indr Dev gladden with the Shloks pertaining to prayers-worship sung by the Yajak Gan and become their accomplice.
Accomplice :: साथी, सह-अपराधी, सहकारी; cooperative, co-operative, accessary, associate, associatory.
आ याह्युप नः सुतं वाजेभिर्मा हृणीयथाः। महाँ इव युवजानिः॥
पत्नीव्रत धर्म को निभाने वाले वीर पुरुष की तरह, हे देवराज इन्द्र! आप हमारे ही सोमयज्ञ में उपस्थित होकर हविष्यान्त्र का सेवन करें। अन्य लोगों के (हीन पुरुषों के) अनाज पर दृष्टि न रखें।(सामवेद 2.12.5)
Hey Devraj Indr accomplishing Dharm-duties like the brave person devoted to his wife! Present your self in our Yagy and accept offerings of food grains etc. Do not look at the food grains of other people lie a person of low dignity.
कदा वसो स्तोत्रं हर्यत आ अव श्मशा रुधद्वाः। दीर्घ सुतं वाताप्याय॥
हे स्तोत्रों से आनन्दित होने वाले देवराज इन्द्र! जिस प्रकार नहरें निकालने हेतु पानी को बाँध के माध्यम से रोका जाता है, उसी तरह निकाले गये सोमरस को समर्पित करने हेतु आपको कब रोकें?(सामवेद 2.12.6)
Hey Devraj Indr gladdened with the Strotrs! The way water is blocked by building dams for water channels-canals, similarly how long should be stop you for serving Somras.
ब्राह्मणादिन्द्र राधसः पिबा सोममृतूरनु। तवेदं सख्यमस्तृतम्॥
हे देवराज इन्द्र! विधाता को जानने वाले याजक के बर्तन से, मित्र के सदृश ऋतुओं के अनुसार सोमरस का सेवन करें; क्योंकि आपकी मित्रता कभी न समाप्त होने वाली है।(सामवेद 2.12.7)
Hey Devraj Indr! Do not drink Somras offered through the pots of the Yajak who knows the creator and season like friends; since your friendship is ever lasting.
वयं घा ते अपि स्मसि स्तोतार इन्द्र गिर्वणः। त्वं नो जिन्व सोमपाः॥
हे गुणगान करने योग्य देवराज इन्द्र! हम आपके स्तोता हैं। हे सोमरस का पान करने वाले देवराज इन्द्र! आप हमें संतोष प्रदान करें।(सामवेद 2.12.8)
Hey Devraj Indr deserving appreciation! We are your Stotas. Hey consumer of Somras Devraj Indr! Grant us satisfaction.
एन्द्र पृक्षु कासु चिन्नृम्णं तनूषु धेहि नः। सत्राजिदुग्र पौंस्यम्॥
हे देवराज इन्द्र! यज्ञ-सम्बन्धी कार्य में उपयोग किये गये हमारे अंगों को बलशाली बना दें। हे शूरवीर देवराज इन्द्र! आप हमें एक साथ समस्त शत्रुओं को परास्त करने का पराक्रम प्रदान करें।(सामवेद 2.12.9)
Hey Devraj Indr! Make our organs devoted to Yagy related deeds strong-powerful. Hey brave Devraj Indr! Grant us might & power to eliminate all enemies together.
एवा ह्यसि वीरयुरेवा शूर उत स्थिरः। एवा ते राध्यं मनः॥
हे महाशक्तिशाली देवराज इन्द्र! आप युद्धभूमि में शत्रुओं को परास्त करने वाले, संग्राम में स्थिर रहने वाले शूरवीर हैं। आपका चित्त (संकल्पशील) प्रशंसनीय है।(सामवेद 2.12.10)
Hey highly powerful-mighty Devraj Indr! You are brave-invincible and defeat the enemies in the battle. Your innerself-psyche, determination deserve appreciation.(16.11.2025)
सामवेद ऐन्द्रं पर्वणि पर्व (3.13) :: ऋषि :- वसिष्ठ, भरद्वाज, बार्हस्पत्य, प्रस्कण्व, नोधा, कलि, प्रगाथ, मेधातिथि, भर्ग, कण्व; देवता :- इन्द्र, मरुत; छन्द-बृहती।
अभि त्वा शूर नोनुमोऽदुग्धा इव धेनवः।
ईशानमस्य जगतः स्वर्दृशमीशानमिन्द्र तस्थुषः॥
हे बलशाली देवराज इन्द्र! जगत् सृजेता, सब कुछ जानने वाले, आपके दर्शन हेतु हम उसी प्रकार उत्सुक है, जिस प्रकार बिना दुही हुई गाएँ अपने बछड़े के समीप जाने हेतु उत्सुक रहती हैं।(सामवेद 3.13.1)
Hey mighty Devraj Indr! You are creator of the world, knowing every thing. We are anxious to see you just like the un milked cow who wish to reach her calf.
त्वामिन्द्धि हवामहे सातौ वाजस्य कारवः। त्वां वृत्रेष्विन्द्र सत्पतिं नरस्त्वां काष्ठास्वर्वतः॥
हे देवराज इन्द्र! हम याजक आपको अनाज में बढ़ोत्तरी करने हेतु आमन्त्रित करते हैं। हे देवराज इन्द्र! बुद्धिमान् सज्जन पुरुष मुसीबत पड़ने पर सहायता करने हेतु आपको ही पुकारते हैं।(सामवेद 3.13.2)
Hey Devraj Indr! We the Yajak invoke-call you for increase in food grain stock. Intelligent & gentle person in trouble invoke-call you.
अभि प्र वः सुराधसमिन्द्रमर्च यथा विदे।
यो जरितृभ्यो मघवा पुरूवसुः सहस्त्रेणेव शिक्षति॥
हे मनुष्यों! वैभवशाली देवराज इन्द्र वन्दना करने वालों को अनेकों तरह के अति उत्तम धन देते हैं। इसीलिए श्रेष्ठ धन प्राप्त करने के लिए जिस तरह भी संभव हो सके उनकी आराधना करो।(सामवेद 3.13.3)
Hey humans! Glorious Devraj Indr on being worshiped-prayed grant several kinds of excellent wealth. Hence, pray to him for acquisition best wealth by all possible means.
तं वो दस्ममृतीषहं वसोर्मन्दानमन्धसः।
अभि वत्सं न स्वसरेषु धेनव इन्द्रं गीर्भिर्नवामहे॥
हे मनुष्यों! शत्रुओं से हमें संरक्षण प्रदान करने वाले, पराक्रमी, सोमरस से संतुष्ट होने वाले, देवराज इन्द्र की हम (हर्षपूर्वक) वैसे ही स्तुति करते हैं, जिस प्रकार गौशाला में गाएँ अपने बछड़ों के समीप जाने हेतु उल्लसित रहती हैं।(सामवेद 3.13.4)
Hey humans! We Gladly worship Devraj Indr, who grant us asylum, is brave-invincible, satisfies on drinking Somras just like the cows who are gladly anxious to reach their calf.
तरो भिर्वो विदद्वसुमिन्द्रं सबाध ऊतये।
बृहद्गायन्तः सुतसोमे अध्वरे हुवे भरं न कारिणम्॥
जिस प्रकार शिशु अपने माता-पिता को पुकारता है, उसी प्रकार हम अपने संरक्षक देवराज इन्द्र को सहायता करने हेतु आवाहित करते हैं। हे मनुष्यों! अपने संरक्षण हेतु सोमयज्ञ में वैभव प्रदान करने वाले, वेगवान् घोड़ों से युक्त देवराज इन्द्र की अर्चना करो।(सामवेद 3.13.5)
The way an infant calls his parents, similarly we invoke Devraj Indr for our safety. Hey humans! For your protection-safety worship Devraj Indr, who possess high speed horses, who grant grandeur in the Som Yagy.
तरणिरित्सिषासति वाजं पुरन्ध्या युजा।
आ व इन्द्रं पुरुहूतं नमे गिरा नेमिं तष्टेव सुनुवम्॥
(सांसारिक-बन्धनों को) पार करने में सक्षम याजक श्रेष्ठ बुद्धि के संयोग से विवेक बल प्राप्त करने की चेष्टा करते हैं। हे साधकों! आपके लिए देवराज इन्द्र की वन्दनाओं के द्वारा हम उसी प्रकार नमस्कार करने वाले बनते हैं, जिस प्रकार योग्य शिल्पकार अच्छी तरह चलने हेतु चक्र को (पहिये पर चढ़ायी जाने वाली धातु की पट्टी को झुकाकर) गोलाई देता है।(सामवेद 3.13.6)
Capable Yajak make efforts to cut the worldly bonds-ties by the combination of excellent intelligence. Hey practitioner! We salute and worship Devraj Indr just like the artisan who make the outer metal ring of wheel round.
पिबा सुतस्य रसिनो मत्स्वा न इन्द्र गोमतः।
आपिनों बोधि सधमाद्ये वृधे 3 S स्माँ अवन्तु ते धियः॥
हे देवराज इन्द्र! गौ के दुग्ध में मिश्रित, रस रूप में हमारे द्वारा शुद्ध किये गये सोमरस का आप सेवन करें एवं आनन्दित हो। एकजुट होकर किये गये कार्य में हमारे साथी बनकर हमें प्रगतिशील पथ दिखाएँ।(सा0मवेद 3.13.7)
साथी :: व्यक्ति, मित्र, सहचर, सहभागी, जोड़ीदार, हिस्सेदार, पति, साझी, साथी, संगी, यार; partner, fellow, companion.
Hey Devraj Indr! Enjoy the Somras sanctified and mixed with milk by us. Become over co worker-companion in the endeavours undertaken by us and show the progressive path.
त्वं होह्ये चेरवे विदा भगं वसुत्तये। उद्वावृषस्व मघवन् गविष्टय उदिन्द्राश्वमिष्टये॥
हे देवराज इन्द्र! हम श्रेष्ठ आचरण से युक्त होकर आपको बुलाते हैं। हे वैभवशाली देवराज इन्द्र! आप गौ, घोड़ा एवं उत्तम धन की अभिलाषा रखने वाली हमारी मनोकामनाओं की पूर्ति करें।(सामवेद 3.13.8)
Hey Devraj Indr! We acquire virtuous-righteous conduct and call you. Hey grandeur possessing Devraj Indr! Accomplish our desire for cows, horses and excellent wealth.
न हि वश्चरमं च न वसिष्ठः परिमंसते।
अस्माकमद्य मरुतः सुते सचा विश्वे पिबन्तु कामिनः॥
हे मरुद्गण! वसिष्ठ ऋषि आप में, जो छोटे हैं हम उनकी भी आराधना करते हैं। आप हमारे इस हवन में संगठित होकर आसन ग्रहण करें एवं सभी लोग सोमरस का सेवन करें।(सामवेद 3.13.9)
Hey Marud Gan! We worship Vashishth Rishi, who is younger than you. Come together in our Yagy, occupy cushion and drink Somras.
मा चिदन्यद्वि शंसत सखायो मा रिषण्यत।
इन्द्रमित्स्तोता वृषणं सचा सुते मुहुरुक्था च शंसतः॥
हे साधकों! देवराज इन्द्र के अलावा और किसी की वन्दना करके व्यर्थ परिश्रम मत करो। इस सोमयज्ञ में एकजुट होकर पराक्रमी देवराज इन्द्र की वन्दना करने हेतु स्तोताओं से बारम्बार कहो।(सामवेद 3.13.10)
Hey practitioners! Do not waste efforts in the worship any one else except Devraj Indr. Ask the Stotas to worship Devraj Indr together in this Som Yagy repeatedly.
सामवेद ऐन्द्रं पर्वणि पर्व (3.14) :: ऋषि :- आंगिरस, तुरुहन्मा, मेधातिथिर्मेध्यातिथिश्व, विश्वामित्र, गौतम, नृमेधपुरुमेधौ, मेधातिथि, देवातिथि, कण्व; देवता :- इन्द्र; छन्द :- बृहती।
नकिष्टं कर्मणा नशद्यश्चकार सदावृधम्। इन्द्रं न यज्ञैर्विश्वगूर्तमृध्वसमधृष्टं धृष्णुमोजसा॥
महा पराक्रमी, स्तुति करने योग्य, समृद्ध, अजेय, शत्रुओं का शमन करने वाले देवराज इन्द्र को जो याजक यागादि से अपना सहचर (साथी) बना लेता है, उस याजक के उत्तम कृत्यों की कोई बराबरी नहीं कर सकता।(सामवेद 3.14.1)
Mighty, brave invincible, worship deserving, prosperous, destroyer of the enemy Devraj Indr is made a companion by the Yajak in the Yagy etc. None can compare such Yajak with his excellent-virtuous deeds.
य ऋते चिदभिनिषः पुरा जत्रुभ्य आतृदः।
सन्धाता सन्धिं मघवा पुरूवसुर्निष्कर्ता विहुतं पुनः॥
जो देवराज इन्द्र कण्ठ के स्नायुओं से रुधिर निकलने पर बिना सामग्री के ही सन्धियों को संयुक्त कर देते हैं, वे वैभवशाली देवराज इन्द्र कटे हुए अंगों को भी फिर से संयुक्त कर देते हैं।(सामवेद 3.14.2)
Grandeur possessing Devraj Indr who stops the blood oozing out of muscles of the throat without any material, join the organs cut from the body.(17.11.2025)
आ त्वा सहस्त्रमा शतं युक्त रथे हिरण्यये।
ब्रह्मयुजो हरय इन्द्र केशिनो वहन्तु सोमपीतये॥
हे इन्द्र (सूर्य) देव! सोने के रथ में (ब्रह्म युक्त) मन्त्र के प्रभाव से संयुक्त हो जाने वाले सैकड़ों-असंख्यों उत्तम अश्व (रश्मियो) सोमरस का सेवन करने हेतु आपको लेकर आएँ।(सामवेद 3.14.3)
Hey Indr (Sury)! Let hundreds-infinite (horses) rays bring you to drink Somras riding over the Golden charoite (possessing Brahm).
आ मन्दैरिन्द्र हरिभिर्याहि मयूररोमभिः।
मा त्वा के चिन्नि येमुरिन्न पाशिनोऽति धन्वेव ताँ इहि॥
जिस प्रकार राहगीर मरुभूमि को शीघ्र बिना विश्राम किये पार कर जाते हैं, उसी तरह हे देवराज इन्द्र! हर्ष प्रदान करने वाले मयूर के पंखों के सदृश रोमयुक्त अश्वों (सात रंग से युक्त मनोहर रश्मियों) के साथ रास्ते की बाधाओं को दूर करते हुए आप पधारें। जाल फैलाने वाले (व्याघ्र) आपके मार्ग में बाधा उत्पन्न न कर सकें।(सामवेद 3.14.4)
The way the passengers cross the desert-arid regions without trouble-tension, hey Devraj Indr! Come to grant pleasure like the feathers of peacock horses possessing bristles (seven colours of attractive rays of light) removing obstacles on the way. The hunters who lay net-trap on the way, should not create trouble-obstacles for you.
त्वमङ्ग प्र शंसिषो देवः शविष्ठ मर्त्यम्। न त्वदन्यो मघवन्नस्ति मर्डितेन्द्र ब्रवीमि ते वचः॥
हे स्तुत्य शक्तिशाली देवराज इन्द्र! आप अपने बल से पराक्रमी बनकर याजक का गुणगान करते है। हे वैभवशाली देवराज इन्द्र! आपके अतिरिक्त दूसरे कोई देवता सुख प्रदान करने वाले नहीं है, इसीलिए हम आपकी स्तुति कर रहे हैं।(सामवेद 3.14.5)
Hey worshipable mighty Devraj Indr! You sing the glory of the Yajak by virtue of your might-valour. Hey Devraj Indr possessor of grandeur! No other demigod-deity can grant pleasure-comfort to us, hence we are worshiping you.
त्वमिन्द्र यशा अस्पृजीषी शवसस्पतिः।
त्वं वृत्राणि हंस्यप्रतीन्येक इत्पुर्वनुत्तश्चर्षणीधृतिः॥
हे देवराज इन्द्र! आप महा पराक्रमी, सोमरस का पान करने वाले एवं ऐश्वर्यमान हैं। आप मनुष्य मात्र की भलाई हेतु अत्यधिक शक्तिशाली शत्रुओं का बगैर किसी के सहयोग के अकेले ही शमन करने में सक्षम है।(सामवेद 3.14.6)
Hey Devraj Indr! You are mighty, drinker of Somras and has grandeur. You are capable of destroying mighty enemies alone without the help of anyone for the sake of humans.
इन्द्रमिद्देवतातय इन्द्रं प्रयत्यध्वरे। इन्द्रं समीके वनिनो हवामह इन्द्रं धनस्य सातये॥
ईश्वरीय प्रयोजनों हेतु किये गये याग में हम याज्ञिक लोग, जिस तरह याग के प्रारम्भ एवं उसके अन्त होने के समय तक देवराज इन्द्र को ही मन्त्रों द्वारा आमंत्रित करते हैं, उसी प्रकार धन प्राप्त करने की अभिलाषा से भी हम देवराज इन्द्र को ही बुलाते हैं।(सामवेद 3.14.7)
The way we the Yajak Gan remain busy with the eternal efforts during the Yagy since beginning to accomplishment and invoke Devraj Indr with the recitation of Mantrs; similarly we invoke Devraj Indr for the sake of wealth.
इमा उ त्वा पुरूवसो गिरो वर्धन्तु या मम।
पावकवर्णाः शुचयो विपश्चितोऽभिस्तोमैरनूषत॥
हे वैभवशाली देवराज इन्द्र! हमारी वन्दनाएँ आपके यश में वृद्धि करें। अग्नि के सदृश तेजस्वी, ज्ञानी याजक स्तोत्रों से आपकी आराधना करते हैं।(सामवेद 3.14.8)
Hey prosperous-possessor of grandeur Devraj Indr! Let our prayers boost your glory. Enlightened Yajak who are energetic (Tejaswi) like Agni worship you.
उदु त्ये मधुमत्तमा गिर स्तोमास ईरते।
सत्राजितो धनसा अक्षितोतयो वाजयन्तो रथा इव॥
राक्षसों पर विजय प्राप्त करने वाले, धन के स्वामी, रक्षा करने में सक्षम, वेगवान् रथ के सदृश उमंग प्रदान करने वाले स्तोत्रों का विधिवत् उच्चारण किया जाता है।(सामवेद 3.14.9)
उमंग :: पदोन्नति, उल्लास, उत्साह, जोश, राग; enthusiasm, exaltation, exultation.
The Strotrs which grant victory over the demons, are the Lord of wealth, capable of protection, accelerated like a charoite granting enthusiasm are recited following procedures.
यथा गौरो अपा कृतं तृष्यन्नेत्यवेरिणम्।
आपित्वे नः प्रपित्वे तूयमा गहि कण्वेषु सु सचा पिब॥
हे देवराज इन्द्र! प्यासे गौर रंग के पशु जिस प्रकार जल से युक्त सरोवर के पास पहुँचते हैं, उसी तरह हे देवराज इन्द्र! आप सहचर (अनुकूल) होकर हमारे इस काण्व के याग में उग्र गति से पधारे एवं सोमरस का पान करके संतुष्ट हों।(सामवेद 3.14.10)
Hey Devraj Indr! The way thirsty animals of fair colour reach the water reservoirs, similarly, you should become favourable to us & come to the Yagy of Kavy with fast speed and drink Somras.
सामवेद ऐन्द्रं पर्वणि पर्व (3.15) :: ऋषि :- भर्ग, रेभ, कश्यप, जमदग्नि, मेधातिथि, नृमेधपुरुमेघौ वसिष्ठ, भरद्वाज; देवता :- इन्द्र, मित्रावरुणादित्या; छन्द :- बृहती।
शग्ध्यू3षु शचीपत इन्द्र विश्वाभिरुतिभिः।
भगं न हि त्वा यशसं वसुविदमनु शूर चरामसि॥
हे शचीपते वीर देवराज इन्द्र! सभी तरह के संरक्षण प्रदान करने वाले साधनों सहित आप हमें अभीष्ट फल प्रदान करें। सौभाग्य युक्त संपत्ति प्रदान करने वाले आपकी हम पूजा करते हैं।(सामवेद 3.15.1)
Hey Devraj Indr husband of Shachi! Accomplish our desires with all sorts of protection means. We worship you since you grant us lucky-auspicious, property-prosperity.
या इन्द्र भुज आभरः स्वर्वी असुरेभ्यः।
स्तोतारमिन्मघवन्त्रस्य वर्धय ये च त्वे वृक्तबर्हिषः॥
हे सभी धन-संपत्ति से परिपूर्ण देवराज इन्द्रः असुरों पर विजय प्राप्त करके लायी गयी संपत्ति के द्वारा आप स्तोताओं की रक्षा करें तथा जो आपकी उपासना करते हैं, उनको समृद्धि प्रदान करें।(सामवेद 3.15.2)
Hey Devraj Indr possessor of all sorts of wealth, prosperity, property won by defeating the demons protect the worshipers and grant them prosperity.
प्र मित्राय प्रार्यम्णे सचथ्यमृतावसो। वरूथ्ये3वरुणे छन्द्यं वचः स्तोत्रं राजसु गायत॥
हे परमार्थी याजकों! मित्र, वरुण एवं अर्थमा देवताओं के यज्ञशाला में स्थापित होने के पश्चात् छन्द बद्ध गाये जा सकने वाले स्तोत्रों से उनकी याचना करो।(सामवेद 3.15.3)
Hey Yajak Gan devoted to the welfare of others! Pray to Mitr, Varun & Aryma deities after they are established in the Yagy Shala, with the Strotrs sung in the form of Chhand.
अभि त्वा पूर्वपीतय इन्द्र स्तोमेभिरायवः।
समीचीनास ऋभवः समस्वरन्रुदा गृणन्त पूर्व्यम्॥
संगठित हुए देवताओं, मरुतों आदि पुरुषों के सदृश, हे देवराज इन्द्र! सर्वप्रथम सोमरस सेवन हेतु याजकगण आपकी स्तुति, स्तुत्यात्मक श्लोकों के द्वारा करते हैं।(सामवेद 3.15.4)
Hey Devraj Raj Indr, like the united demigods, Marud Gan & humans etc! The Yajak worship-pray to you with Shloks, for offering-serving Somras; first of all.
प्र व इन्द्राय बृहते मरुतो ब्रह्मार्चत। वृत्रं हनति वृत्रहा शतक्रतुर्वज्रेण शतपर्वणा॥
हे स्तोताओं! असंख्यों धार वाले वज्र से वृत्र का संहार करने वाले, शतकर्मा देवराज इन्द्र को स्तुति सुनाओ।(सामवेद 3.15.5)
Hey Stotas! Worship Devraj Indr who accomplished hundred Yagy & is a slayer (of demons, enemies) with the Vajr having infinite sharpened points.
बृहदिन्द्राय गायत मरुतो वृत्रहन्तमम्। येन ज्योतिरजनयन्नृतावृधो देवं देवाय जागृवि॥
हे याज्ञिकजन! देवराज इन्द्र के निमित्त अज्ञान को नष्ट करने वाली बहुत सारी स्तुतियों का गान करो। याग के विशेषज्ञ ऋषियों ने उसी की सहायता से अलौकिक जागृति लाने वाला प्रकाश उत्पन्न किया है।(सामवेद 3.15.6)
Hey Yagyik Gan! Sing several Stuties which eliminate ignorance-darkness for Devraj Indr. Specialist in Yagy Rishi Gan, evolved the divine aura-radiance with his help.(18.11.2025)
इन्द्र क्रतुं न आ भर पिता पुत्रेभ्यो यथा।
शिक्षा णो अस्मिन्पुरुहूत यामनि जीवा ज्योतिरशीमहि॥
हे देवराज इन्द्र। हमें याग के कार्यों में दक्ष बना दें। जिस प्रकार पिता अपने पुत्र को शिक्षा प्रदान करता है, उसी प्रकार आप हमें भी ज्ञान प्रदान करें। जनसमूहों द्वारा स्मरण करने योग्य हे देवराज इन्द्र! प्रतिदिन हमें सूर्य देव का दर्शन प्राप्त हो।(सामवेद 3.15.7)
Hey Devraj Indr! Grant us expertise in Yagy. The way a father educate his son, grant us learning like that. Worth deserving remembrance, by the groups of people, hey Devraj Indr! Ensure that we see Sury Dev every day.
मा न इन्द्र परा वृणग्भवा नः सधमाद्ये।
त्वं न ऊती त्वमिन्न आप्यं मा न इन्द्र परावृणक्॥
हे देवराज इन्द्र! आप हमें संरक्षण प्रदान करने वाले एवं हमारे बन्धु हैं। हे देवों के देव इन्द्र राज! आप हमारे इस पावन याग में उपस्थित हों, हमें अपने से कदापि दूर न हटायें।(सामवेद 3.15.8)
Hey Devraj Indr! You are the one who grant us asylum as a brother. Hey deity of demigods Devraj Indr! Invoke in our pious-virtuous Yagy and never move us away from you.
वयं घ त्वा सुतावन्त आपो न वृक्तबर्हिषः।
पवित्रस्य प्रस्त्रवणेषु वृत्रहन्यरि स्तोतार आसते॥
हे वृत्र संहारक देवराज इन्द्र! जैसे जल नीचे की तरफ बहता है, वैसे ही शुद्ध किये हुए सोमरस के साथ हम नीचे की ओर झुककर आपको प्रणाम करते हैं। पावन याग में कुश-आसन पर एक साथ विराजमान होकर याज्ञिकगण आपकी आराधना करते हैं।(सामवेद 3.15.9)
Hey slayer of Vratr, Devraj Indr! The way water flows in the down wards direction, we bow before you with sanctified Somras, prostrating before you. Gathered together the Yajak Gan, occupy the Kush cushions and worship you in the pious-virtuous Yagy..
यदिन्द्र नाहुषीष्वा ओजो नृम्णं च कृष्टिषु।
यद्वा पञ्चक्षितीनां द्युम्नमा भर सत्रा विश्वानि पौंस्या॥
हे देवराज इन्द्र! एकत्रित जनसमूहों में जो बल है, पाँच जनों (पाँच वर्गों ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और निषाद) में जो संपत्ति है, उसी प्रकार का वैभव आप हमें प्रदान करें। एकता के कारण बढ़ने वाली शक्ति हमें प्राप्त हों।(सामवेद 3.15.10)
Hey Devraj Indr! Grant us the grandeur & strength similar to the gatherings of people, wealth in the hands of Panch Jan viz Brahman, Kshatriy, Vaeshy, Shudr and Nishad
सामवेद ऐन्द्रं पर्वणि पर्व (3.16) :: ऋषि :- मेधातिथि, रेभ, वत्स, भरद्वाज, नृमेध, पुरुहन्मा, पुरुमेधौ, वसिष्ठ, मेधातिथिर्मेध्यातिथिश्च, कलि; देवता :- इन्द्र; छन्द :- बृहती।
सत्यमित्था वृषेदसि वृषजूतिर्नोऽविता। वृषा ह्युम श्रृण्विषे परावति वृषो अर्वावति श्रुतः॥
हे शूर देवराज इन्द्र! दूर एवं समीप के देशों में सभी जगह बलशाली रूप में आपकी प्रसिद्धि विस्तारित है। हे देवराज इन्द्र! आप अवश्य रूप से शक्तिशाली हैं। सोमरस के निमित्त यज्ञ करने वाले हम याज्ञिक जनों के बुलाने पर आप यहाँ पधारें तथा हमें संरक्षण प्रदान करें।(सामवेद 3.16.1)
Hey brave Devraj Indr! Your fame is spreaded far & near as a mighty person. Hey Devraj Indr! You are definitely powerful-mighty. Arrive on being invited by us, the Yagy performers; for drinking Somras and grant us protection-asylum.
यच्छक्रासि परावति यदर्वावति वृत्रहन्।
अतस्त्वा गीर्भिद्युगदिन्द्र केशिभिः सुतावाँ आ विवासति॥
हे शक्तिशाली वृत्र संहारक देवराज इन्द्र! आप असमीपस्थ हों अथवा समीपस्थ हों, उत्तम अश्वों के सदृश वेग से युक्त स्तोत्रों से सोमयज्ञ में याज्ञिक आपको आहूत करते हैं।(सामवेद 3.16.2)
Hey mighty slayer of Vratr, Devraj Indr! Whether near or far we Yagyik of Som Yagy worship you with the best Strotr, like the speed of best horses.
अभि वो वीरमन्धसो मदेषु गाय गिरा महा विचेतसम्।
इन्द्रं नाम श्रुत्यं शाकिनं वचो यथा॥
हे स्तोताओं! आप सब कल्याणकारी, दानवों को पराजित करने वाले, सोमरस का पान करके प्रफुल्लित, शूर, बुद्धिमान् एवं ऐश्वर्यवान् देवराज इन्द्र को विशेष स्तुतियों से क्षमतानुसार स्तुति करो।(सामवेद 3.16.3)
Hey Stotas! All of you should together worship Devraj Raj devoted to your welfare, drinks Somras, gladdened, brave, possess grandeur, intelligent with best special Stuties as per your strength.
इन्द्र त्रिधातु शरणं त्रिवरूधं स्वस्तये।
छर्दिर्यच्छ मघवज्ञयश्च महां च यावया दिद्युमेभ्यः॥
हे देवराज इन्द्र! संपत्ति से से परिपूर्ण याज्ञिक एवं हमें तीनों ऋतुओं (त्रिवरूथ) में कल्याणमयी, आनन्ददायक, श्रेष्ठ तीन इमारतों वाला गृह प्रदान करें एवं उनके लिए शस्त्रों का उपयोग न करें।(सामवेद 3.16.4)
Hey Devraj Indr! Grant us home with three buildings, granting pleasure-comforts during the three seasons, to the Yagyik having wealth and us without using weapons.
श्रायन्त इव सूर्य विश्वेदिन्द्रस्य भक्षत।
वसूनि जातो जनिमान्योजसा प्रति भागं न दीधिम॥
हे ऋत्विजों! जिस प्रकार सूर्य की रश्मियाँ सूर्य देव के आश्रय में रहती हैं, उसी प्रकार देवराज इन्द्र पूरे संसार को आश्रय प्रदान करने वाले हैं। जिस प्रकार पुत्र को अपने पिता से संपत्ति में हिस्सा प्राप्त होता है, उसी प्रकार देवराज इन्द्र से हम अपने भाग की अभिलाषा करते हैं। क्योंकि देवराज इन्द्र ही उत्पन्न हुए एवं उत्पन्न होने वालों को अपना भाग प्रदान करते हैं।(सामवेद 3.16.5)
Hey Ritviz! Devraj Indr grant asylum to the whole universe just like the rays of light are under the asylum of Sury Dev. The way a son wish to have his share of property from father we too expect our share from Devraj Indr, since its Devraj Indr who grant their share to those who have evolved-taken birth.
न सीमदेव आप तदिषं दीर्घायो मर्त्यः।
एतग्वा चिद्य एतशो युयोजत इन्द्रो हरी युयोजते॥
हे दीर्घजीवी देवराज इन्द्र! जो व्यक्ति परमात्मा में विश्वास नहीं रखता, वह उत्तम धन की प्राप्ति नहीं कर सकता है। जो इन्द्र देव याग में पहुँचने की इच्छा से अपने अश्वों को संयुक्त करते हैं, इस प्रकार के देवराज इन्द्र की जो मनुष्य आराधना नहीं करते, वह इन्द्र को नहीं प्राप्त कर सकते हैं।(सामवेद 3.16.6)
Hey Devraj Indr having long life! One who has no faith in the Almighty can not have excellent wealth. Those who do not worship Indr Dev, who wish to reach the Yagy deploying his horses in the charoite, can not have him.
आ नो विश्वासु हव्यमिन्द्रं समत्सु भूषत।
उप ब्रह्माणि सवनानि वृत्रहन्परमज्या ऋचीषम॥
युद्ध में रक्षा हेतु आवाहन योग्य, हे देवराज इन्द्र। आप हमारे स्तुत्यात्मक श्लोकों के द्वारा की गई स्तुतियों से सुसज्जित होते हैं। हे वृत्र संहारक, धनुष की उत्तम प्रत्यंचा के सदृश श्रेष्ठ मन्त्रों से स्तुति योग्य देवराज इन्द्र! हमारे तीनों संध्याओं (सवनों) के समय उच्चरित स्तोत्रों को आप सुसज्जित करें।(सामवेद 3.16.7)
Hey Devraj Indr, deserving to be invoke in the war! You are decorated with our Strotr meant for prayers-worship. Hey slayer of Vratr, deserving worship with the excellent Mantrs like the sound of the bow! Decorate the Mantrs recited by us during the three segments of the day prayers.
तवेदिन्द्रावमं वसु त्वं पुष्यसि मध्यमम्।
सत्रा विश्वस्य परमस्य राजसि न किष्ट्वा गोषु वृण्वते॥
हे देवराज इन्द्र! निम्न कोटि, मध्यम कोटि एवं उच्च कोटि के धन के आप ही अकेले अधिष्ठाता हैं। आप जब गौ आदि धन का दान करते हैं, तब आपको कोई भी रोक नहीं सकता।(सामवेद 3.16.8)
Hey Devraj Indr! You are the only deity of low, middle-average and excellent level wealth. When you donate wealth like cows none can stop you.
क्वेयथ क्वेदसि पुरुत्रा चिन्द्धि ते मनः। अलर्षि युध्म खजकृत्पुरंदर प्र गायत्रा अगासिषुः॥
अनेकों स्थलों में मन लगाने वाले, संग्राम कौशल में कुशल, शत्रुओं के नगर को तहस-नहस करने वाले, हे योद्धा देवराज इन्द्र! आप कहाँ चले गये थे? अब आप कहाँ है? हमारे निपुण उद्गाताओं के द्वारा किये जा रहे सामगान को श्रवण करने हेतु आप हमारे याग में उपस्थित हो।(सामवेद 3.16.9)
Hey warrior Devraj Indr, inclined to several places, expert in warfare, destroyer of the enemy forts! Where had you gone? Where are you now? Invoke to listen to the Sam Gan, recited by our expert singers, in loud voice.
वयमेनमिदा ह्योऽपीपेमेह वज्रिणम्। तस्मा उ अद्य सवने सुतं भरा नूनं भूषत श्रुते॥
हम याज्ञिकों ने देवराज इन्द्र को कल सोमरस के द्वारा संतुष्ट किया था, इसीलिए इस समय आज के याग में भी हम उन्हें सोमरस प्रदान करते हैं। हे याज्ञिकों! इस समय स्तोत्रगान सुनाकर देवराज इन्द्र को सुसज्जित करो।(सामवेद 3.16.10)
We Yagyik satisfied Devraj Indr yesterday with Somras, hence we are offering him Somras today as well. Hey Yagyik Gan! Decorate Devraj Indr with the Strota Gan.(19.11.2025)
सामवेद ऐन्द्रं पर्वणि पर्व (3.17) :: ऋषि :- पुरुहन्मा, भर्ग, इरिम्बिठि, जमदग्नि, देवातिथि, मेध्य, वसिष्ठ, भरद्वाज, कण्व; देवता :- इन्द्र, सूर्य, इन्द्राग्नी; छन्द :- बृहती।
यो राजा चर्षणीनां याता रथेभिरध्रिगुः। विश्वासां तरुता पृतनानां ज्येष्ठं यो वृत्रहा गृणे॥
मनुष्यों के अधिष्ठाता, वेगवान, शत्रुओं की सेना का हनन करने वाले, वृत्र संहारक, अति उत्तम देवराज इन्द्र की हम वन्दना करते हुए उन्हें सुसज्जित करते हैं।(सामवेद 3.17.1)
सुसज्जित :: सजा हुआ, साज-सामान से युक्त; furnished, equiped.
We equip Lord of humans, Devraj Indr, the slayer of enemy armies and Vratr, excellent worshiping him.
यत इन्द्र भयामहे ततो नो अभयं कृधि।
मघवञ्छग्धि तव तन्न ऊतये वि द्विषो वि मृधो जहि॥
हे देवराज इन्द्र! आप हमें डराने वाले लोगों से आप निडर करें। हे ऐश्वर्यवान् देवराज इन्द्र! आप सबसे अधिक पराक्रमी है, इसीलिये अपनी शक्ति से हमारे शत्रुओं एवं द्वेष व हिंसा की इच्छा रखने वालों का शमन कर हमारी रक्षा करें।(सामवेद 3.17.2)
Hey Devraj Indr! Make us fear less from the fearsome. Hey grandeur possessing Devraj Indr! You are mightier than others, hence supress our enemies and those who are envious to us and protect us.
वास्तोष्पते ध्रुवा स्थूणां सत्रं सोम्यानाम्। द्रप्सः पुरां भेत्ता शश्वतीनामिन्द्रो मुनीनां सखा॥
हे गृह अधिपति देवराज इन्द्र! गृह के स्तंभ दृढ़ हों, सोमयज्ञ करने वाले याजकों को शरीर की रक्षा करने का सामर्थ्य प्राप्त हो। असुरों के कई नगरों को तहस-नहस करने वाले, सोमरस का पान करने वाले देवराज इन्द्र ऋषियों के मित्र हैं।(सामवेद 3.17.3)
Hey Lord of house Devraj Indr! Pillars of the Yagy house should be strong & capable of protecting the bodies of the Yagy performers. Devraj Indr is the destroyer of the cities-forts of the enemy. He drinks Somras and is friendly with the Rishi Gan.
बण्महाँ असि सूर्य बडादित्य महाँ असि।
महस्ते सतो महिमा पनिष्टम मह्ना देव महाँ असि॥
हे प्रेरणा प्रदान करने वाले, अदिति पुत्र देवराज इन्द्र! यह सत्य है कि आप अत्यन्त तेजस्वी है। हे परमेश्वर! आप अत्यन्त पराक्रमी है, आपकी महानता की हम प्रशंसा करते हैं।(सामवेद 3.17.4)
Hey inspiring son of Aditi, Devraj Indr! Its true that your are majestic-highly energetic. Hey Almighty! You are very brave-mighty. We appreciate your greatness.
अश्वी रथी सुरूप इद्गोमान् यदिन्द्र ते सखा।
श्वात्रभाजा वयसा सचते सदा चन्द्रैर्याति सभामुप॥
हे देवराज इन्द्र! जो मानव आपको अपना सखा बना लेते हैं, वो अश्वों के रथ से युक्त सौन्दर्यवान्, वैभववान् एवं धन-संपत्ति से हमेशा परिपूर्ण रहते हैं। वह सदा उत्तम गहनों से सुशोभित होकर सभा आदि में जाते हैं।(सामवेद 3.17.5)
Hey Devraj Indr! The humans who make you a friend remain enriched with charoite deployed with horses, are handsome grandeur possessing, have wealth & prosperity. They go the meeting-council decorated with ornaments.
यद्याव इन्द्र ते शतं शतं भूमीरुत स्युः। न त्वा वज्रिन्त्सहस्रं सूर्या अनु न जाममष्ट रोदसी॥
हे देवराज इन्द्र! असंख्यों देवलोक, सैकड़ों पृथ्वियों एवं सहस्रों सूर्य भी यदि पैदा हो जाएँ, तो भी ये समस्त लोग आपकी तुल्यता नहीं कर सकते हैं। स्वर्गलोक से भूलोक तक आपकी समानता करने वाला कोई भी नहीं है। आपकी बराबरी करने वाला कोई भी उत्पन नहीं हुआ है।(सामवेद 3.17.6)
Hey Devraj Indr! Infinite heavens, hundreds of earth and thousands of Sun can not compare-compete with you. Non matches with you from heavens to earth. None equal-parallel to you has evolved-taken birth.
यदिन्द्र प्रागपागुदड्न्यग्वा हूयसे नृभिः। सिमा पुरू नृषूतो अस्यानवेऽसि प्रशर्ध तुर्वशे॥
हे देवराज इन्द्र! चारों दिशाओं से स्तुति करने वालों के द्वारा सहयोग हेतु आपको आवाहित किया जाता है। हे शत्रुओं का शमन करने वाले देवराज इन्द्र! अनु एवं तुर्वश हेतु आपको निवेदन पूर्वक आमंत्रित किया जाता है।(सामवेद 3.17.7)
अनु और तुर्वश :: ये राजा ययाति के पुत्र थे। तुर्वश ययाति के दूसरे पुत्र थे जो रानी देवयानी से हुए थे, जबकि अनु ययाति के चौथे पुत्र थे जो रानी शर्मिष्ठा से हुए थे। तुर्वशों का वंश दक्षिण-पूर्व की ओर फैला और अनु का वंश उत्तर-पश्चिम की ओर।
Hey Devraj Indr! You are invoked from all directions for cooperation, by the worshipers-devoted. Hey suppressor of the enemies Devraj Indr! You are invited with honour for Anu & Turvash.
कस्ममिन्द्र त्वा वसवा मत्यों दधर्षति।
श्रद्धा हि ते मघवन्पायें दिवि वाजी वाजं सिषासति॥
हे समस्त जनों को आश्रय प्रदान करने वाले देवराज इन्द्र! भला ऐसा कौन मनुष्य है, जो आपका निरादर कर सकता है? हे संपत्तिशाली देवराज इन्द्र! आपके प्रति श्रद्धा युक्त लोग शक्तिशाली होते हैं। वे दुःखों से मुक्त होने (अभावों) के समय भी अनुदान की अभिलाषा करते हैं।(सामवेद 3.17.8)
Hey Devraj Indr granting asylum to all people! Who can insult you? Hey wealthy Devraj Indr! Your devotees are powerful-strong. For release from pain-sorrow they wish you have grants-help from you.
इन्द्राग्नी अपादियं पूर्वागात्पद्वतीभ्यः।
हित्वा शिरो जिह्वया रारपच्चरत् त्रिंशत्पदा न्यक्रमीत्॥
हे देवराज इन्द्र एवं अग्निदेवों! बिना पाँव वाली वह उषा, पाँव वाली प्रजा से पहले ही आ जाती है तथा सिर के अभाव में भी जिह्वा से (जागृत हुए मुर्गे आदि की ध्वनि से) प्रेरणा प्रदान करती हुई, एक दिन में तीस मुहर्तों अर्थात् चौबीस घण्टों को पार कर लेती है।(सामवेद 3.17.9)
Hey Devraj Indr & Agni Dev! Usha Devi-dawn without legs arrive prior to the legged living beings. In the absence of head, it inspire from the tongue (awakened cook) and passes away in 24 hours (30 Muhurt).
इन्द्र नेदीय एदिहि मितमेधाभिरूतिभिः।
आ शंतम शंतमाभिरभिष्टिभिरा स्वापे स्वापिभिः॥
हे परम शान्ति प्रदान करने वाले देवराज इन्द्र! अत्यधिक सुख प्रदान करने वाली इच्छाओं के साथ, श्रेष्ठ बन्धुओं के साथ पास ही निर्मित यज्ञशाला में आप उपस्थित हों। मेधावी एवं रक्षा प्रदान करने की कामना रखने वालों के साथ आप पधारें।(सामवेद 3.17.10)
Hey Devraj Indr granting extreme peace! Invoke in the Yagy Shala with excellent brothers, to grant ultimate pleasure-comforts. Come with the intelligent and those who wish to protect.
सामवेद ऐन्द्रं पर्वणि पर्व (3.18) :: ऋषि :- नृमेध, वसिष्ठ, भरद्वाज, परुच्छेप, वामदेव, मेध्यातिथि, भर्ग, मेधातिथिर्मेध्या-तिथिश्च; देवता :- इन्द्र, अश्विनी; छन्द :- बृहती।
इत ऊती वो अजरं प्रहेतारमप्रहितम्। आशुं जेतारं होतारं रथीतममतूर्तं तुग्रियावृधम्॥
हे याजकों! शत्रुओं का शमन करने वाले, सबको प्रेरणा प्रदान करने वाले, तीव्र गति से यज्ञशाला में पहुँचने वाले श्रेष्ठ रथी, अहिंसनीय व्यापक, जल वर्षा करने वाले, अजर-अमर देवराज इन्द्र का अपनी रक्षा करने की अभिलाषा से आवाहन करो।(सामवेद 3.18.1)
Hey Yajak Gan! Invoke immortal Devraj Indr who is the destroyer of the enemies, inspire all, charioteer who reaches Yagy Shala with fast speed, pervaded as non violent and shower rains.(20.11.2025)
मो षु त्वा वाघतश्च नारे अस्मन्नि रीरमन्।
आरात्ताद्वा सधमादं न आ गहीह वा सन्नुप श्रुधि॥
हे देवराज इन्द्र! यजमान आपको हमसे दूर न कर सकें। इसलिये आप हमारे याग में शीघ्रता से पधारे एवं हमारे समीप रहकर हमारी स्तुतियों को श्रवण करें।(सामवेद 3.18.2)
Hey Devraj Indr! Do not the let Yajman keep us away from you. Hence come quickly to the Yagy and listen to our Stuties, becoming close to us.
सुनोता सोमपाव्ने सोममिन्द्राय वज्रिणे।
पचता पक्तीरवसे कृणुध्वमित्पृणन्नित्पृणते मयः॥
हे याज्ञिकों! वज्रधारी, सोमपायी देवराज इन्द्र हेतु सोमाभिषव करो। देवराज इन्द्र को संतुष्ट करने के निमित्त पुरोडाश पकाओ एवं यज्ञ करो। यजमान को सुख प्रदान करने हेतु देवराज इन्द्र स्वयं हविष्यान ग्रहण करते हैं।(सामवेद 3.18.3)
Hey Yagyik Gan! Perform Somabhishav of Somras drinking Devraj Indr. To satisfy Devraj Indr cook Purodash and perform Yagy. Devraj Indr accept the offerings of food grains to satisfy the Yajman.
यः सत्राहा विचर्षणिरिन्द्रं तं हूमहे वयम्।
सहस्त्रमन्यो तुविनृम्ण सत्पते भवा समत्सु नो वृधे॥
हे देवराज इन्द्र! आप एक साथ शत्रुओं का विनाश करने वाले एवं सर्वद्रष्टा हैं। हम आपका आवाहन करते हैं। (अनीति से संघर्ष करने वाले) मन्यु से युक्त, वैभवशाली, सज्जनों के पालनकर्ता हे देवराज इन्द्र! आप युद्धभूमि (जीवन-संग्राम) में एवं हमारे वैभव की वृद्धि में सहयोगी बनें।(सामवेद 3.18.4)
मन्यु :: क्रोध, गुस्सा, जुनून, उत्साह या शक्ति; anger, wrath, rage, grief, sorrow, passion.
अनीति :: अनैतिकता, अनौचित्य, अनुवित कार्य, ग़लती, अधर्म, अन्याय, अधर्म, नाइंसाफी, अन्यायपूर्ण कृत्य, पाप, अनैतिक आचरण; immorality, injustice, impropriety.
Hey Devraj Indr! You slay many enemies together and looks at every thing. We invoke you. You fight injustice-impropriety with anger and support the grandeur possessing gentle person. Increase our prosperity and become our associate.
शचीभिर्नः शचीवसू दिवा नक्तं दिशस्यतम्।
मा वां रातिरुपदसत्कदाचनास्मद्रातिः कदाचन॥
पुरुषार्थ पूर्वक ऐश्वर्य संगृहीत करने वाले हे अश्विन युगलों! अपने सामर्थ्य से आप हमें दिन-रात धन-धान्य से युक्त करें। आपके दानशीलता की भाँति हमारा भी दान (देने का स्वभाव) कभी समाप्त न हो।(सामवेद 3.18.5)
Hey Ashwani Kumar duo gaining grandeur through efforts! We should become possessors of wealth and food grains with our own endeavours-efforts. We should adopt your habit of donations.
यदा कदा च मीढुषे स्तोता जरेत मर्त्यः।
आदिद्वन्देत वरुणं विपा गिरा घर्त्तारं विव्रतानाम्॥
जब भी हविदाता यजमान हेतु, स्तुति गायन करने वाले लोग स्तुति करें, उस समय विशेष संरक्षण की अभिलाषा से विभिन्न प्रकार के कर्मों को धारण करने वाले, पापों को नष्ट करने वाले वरुण देव की विशेष स्तुत्यात्मक श्लोकों से स्तुति करें।(सामवेद 3.18.6)
Worship Varun Dev with the Shloks pertaining to prayers-worship devoted to destroyer of sins, when the singers of Stuti recite prayers for the Yajman making offerings, desirous of special protection devoted to various endeavours.
पाहि गा अन्यसो मद इन्द्राय मेध्यातिथे।
यः संमिश्लो हर्योर्यो हिरण्यय इन्द्रो वज्री हिरण्ययः॥
हे महाज्ञानी अतिथि! जो देवराज इन्द्र रथ में दो अश्वों को संयुक्त करते हैं, वज्रधारी हैं, सौन्दर्यशील है, स्वर्ण से युक्त रथ में बैठे हैं, ऐसे देवराज इन्द्र को सोमरस के पान से प्रफुल्लित करके अपनी गायों की सुरक्षा करो।(सामवेद 3.18.7)
Hey enlightened guest! Protect your cows by pleasing-gladdening Devraj Indr who deploy houses in his charoite having gold, wield Vajr, by offerings Somras to him for drinking.
उभयं शृणवच्च न इन्द्रो अर्वागिदं वचः।
सत्राच्या मघवान्त्सोमपीतये धिया शविष्ठ आ गमत्॥
सत्य का मार्ग प्रशस्त करने वाले, समस्त धनों के अधिपति, वैभवशाली हे देवराज इन्द्र! हमारे स्तोत्र एवं शस्त्र से की गई दोनों तरह की विनती को हमारे समक्ष आकर श्रवण करें एवं सामूहिक आराधना से प्रसन्न, हे बलशाली एवं धनवान् इन्द्र देव! सोमरक्ष के पान हेतु आप हमारे यज्ञ में पधारे।(सामवेद 3.18.8)
Hey prosperous Devraj Indr, lord of all wealth, clearing-paving the way for truth! Listen-respond to our two types of prayers, made with the Strotr and weapons, while coming to us, become happy with the prayers sung in groups. Hey mighty, wealthy Devraj Indr! Come to our Yagy for drinking Somras.
महे च न त्वाद्रिवः परा शुल्काय दीयसे।
न सहस्त्राय नायुताय वज्रिवो न शताय शतामध॥
हे वज्रधारी देवराज इन्द्र! बहुत अधिक धन के बदले में भी आपको नहीं छोड़ा जा सकता है। है वज्रधारी वैभवशाली देवराज इन्द्र! सौ अथवा दस हजार की (किली थी) कीमत पर भी आपका त्याग नहीं किया जा सकता है अर्थात् आप अनमोल है।(सामवेद 3.18.9)
अनमोल :: बहुमूल्य, मूल्यवान, प्रिय, अमूल्य, उत्कृष्ट, महंगा; precious, priceless, invaluable.
Hey Vajr wielding Devraj Indr! You can not be rejected-released for lots of wealth. Hey prosperous-grandeur possessing, wielding Vajr, Devraj Indr! You can not be separated from us even if we are offered hundred or thousands of (KILI), since you are invaluable-priceless.
वस्याँ इन्द्रासि मे पितुरुत भ्रातुरभुञ्जतः।
माता च मे छदयथः समा वसो वसुत्वनाय राधसे॥
हे धनवान् देवराज इन्द्र! आप हमारे पिताजी की तुलना में स्थादा ऐश्वर्यवान् है। आप पोषण न देने वाले भ्राता से भी ज्यादा महान् है। समस्त प्राणियों के पालनहार हे देवराज इन्द्र! आप हमारी माता के समान है। आप हमें धन-धान्य से परिपूर्ण होने हेतु महान् बनायें।(सामवेद 3.18.10)
Hey rich Devraj Indr! You possess more grandeur as compared to our father. You are great as compared to the brother who do not nourish us. Hey nurturer of all living beings-organism Devraj Indr! You are like our mother. Make us great (empower) to be equipped with wealth & food grains.
सामवेद ऐन्द्रं पर्वणि पर्व (3.19) :: ऋषि :- वसिष्ठ, वामदेव, मेधातिथिर्मेध्यातिथि, विश्वाधित्र इत्येके, मेधातिथि, वालखिल्य, श्रुष्टिगु, नृमेध; देवता-इन्द्र बहन; छन्द-बृहती।
इम इन्द्राय सुन्विरे सोमासो दध्याशिरः।
ताँ आ भदाय वज्रहस्त पीतये हरिभ्यां याह्योक आ॥
हे वज्रधारी, पराक्रमी देवराज इन्द्र! दही मिश्रित, सुखदायक, विशेषतः विधि से तैयार किये गये इस सोमरस का सेवन करने हेतु आप हमारे यज्ञ करने के स्थान पर उपस्थित हों।(सामवेद 3.19.1)
Hey Vajr wielding, mighty Devraj Indr! Arrive at the Yagy site to drink the pleasure giving Somras, mixed with curd prepared for you with special techniques.
इम इन्द्र मदाय ते सोमाश्चिकित्र उक्थिनः।
मधोः पधान उप नो गिरः शृणु रास्व स्तोत्राय गिर्वणः॥
हे देवराज इन्द्र! याजकों द्वारा विशेष प्रकार की विधि से शोधित, सुख प्रदान करने वाले, इस मधुर सोमरस का पान करके स्तोत्रों को श्रवण करते हुए हम याज्ञिकों को उत्तम धन-धान्य से परिपूर्ण कर दें।(सामवेद 3.19.2)
Hey Devraj Indr! Drink the sweetened Somras, extracted-sanctified with special techniques-methods. Having consumed Somras, listening to the Strotrs, enrich us the Yagyik with wealth and food grains.
आ त्वा3द्य सबर्दुघां हुवे गायत्रवेपसम्।
इद्धं धेनुं सुदुधामन्यामिषमुरुधारामरङ्कृतम्॥
हे देवराज इन्द्र! गतिमान, विशेषतायुक्त विधि से सहजतापूर्वक अत्यधिक दूध प्रदान करने वाली, इच्छाओं को पूर्ण करने वाली गौ के सदृश सुसज्जित, आपका हम आवाहन करते है।(सामवेद 3.19.3)
Hey Devraj Indr! We invoke you like the cow accomplishing desires, which is decorated, yielding lots of milk easily with specific techniques.
न त्वा बृहन्तो अद्रयो वरन्त इन्द्र वीडवः।
यच्छिक्षसि स्तुवते मावते वसु न किष्टदा मिनाति ते॥
बृहत्, अचल पर्वत के सदृश, अपने कर्तव्य के मार्ग से न डगमगाने वाले हे देवराज इन्द्र! आपके द्वारा दिया गया ऐश्वर्य, हम याजकों को लगातार मिलता रहे।(सामवेद 3.19.4)
Sagging :: झुकना, शिथिलता, भाव गिराना; deflate, back give, condescend, defer to.
डगमगाना :: क्रिया, लड़खड़ाना, डिगना, भचकना, हकलाना, कंपना, लड़खड़ाते हुए चलना, डगमगाते हुए चलना, लंगड़ाते हुए चलना; waver, falter, totter, toddle.
Hey Devraj Indr; like the immovable huge-vast mountain, never sagging-wavering over the dutiful path! You carry out your duties firmly. We should continue having the grandeur granted by you.(21.11.2025)
सामवेद ऐन्द्रं पर्वणि पर्व (3.19) :: ऋषि :- नृमेध, वसिष्ठ, भरद्वाज, परुच्छेप, वामदेव, मेध्यातिथि, भर्ग, मेधातिथिर्मेध्या-तिथिश्च; देवता :- इन्द्र, अश्विनी; छन्द :- बृहती।
क ई वेद सुते सचा पिवन्तं कद्वयो दधे।
अयं यः पुरो विभिनत्त्योजसा मन्दानः शिप्रयन्धसः॥
सोमयज्ञ में एक ही स्थल पर उपस्थित होकर सोमरस का सेवन करने वाले सर्वाधिक ऐश्वर्यवान् देवराज इन्द्र को कौन (नहीं) जानता है? सोमरस के सेवन से मतवाले, शिरस्त्राण (अखों-शत्रों के प्रहार से सिर की रक्षा हेतु पहना जाने वाला मुकुट) पहने हुए देवराज इन्द्र अपने पराक्रम से शत्रुओ के नगरों को उजाड़ देते हैं।(सामवेद 3.19.5)
मतवाला :: नशे में चूर, मस्त, लापरवाह; intoxicate.
Who amongest those assembled at the Som Yagy does not know the drinker of Som, possessor of highest grandeur Devraj Indr? Under the impact of Somras, Devraj Indr wearing head gear, uproot the cities-forts of the enemies.
यदिन्द्र शासो अव्रतं च्यावया सदसस्परि।
अस्माकमंशुं मघवन्पुरुस्पृहं वसव्ये अधि बर्हय॥
पाप कर्म करने वालों को निष्ठुर दंड देने के सदृश, यज्ञ-स्थल के चहुँ ओर विद्यमान, यज्ञ में बाधा उत्पन्न करने वालों को दूर रखने वाले, ऐश्वर्यवान् हे देवराज इन्द्र! आप हम याजकों के उत्तम सोमरस की अत्यधिक मात्रा में बढ़ोत्तरी करें।(सामवेद 3.19.6)
Hey Devraj Indr, possessor of grandeur! You punish the sinners with harsh penalty who gather around the Yagy site and create disturbance. Increase the quantum of excellent Somras extracted by the Yajak for your consumption.
त्वष्टा नो दैव्यं वचः पर्जन्यो ब्रह्मणस्पतिः।
पुत्रैर्भातृभिरदितिर्नु पातु नो दुष्टरं त्रामणं वचः॥
सभी वेदों के अधिष्ठाता त्वष्टा (विश्वकर्मा), इन्द्र देवता, बृहस्पति भगवान, सम्पूर्ण परिवार सहित देवमाता अदिति आदि दैवीय शक्तियाँ, दुःखों से पार करने वाले स्तोत्रों द्वारा हमें संरक्षण प्रदान करें (सामवेद 3.19.7)
Let the deity of all Veds Twasta, Vishw Karma, Indr Dev, Brahaspati, Mata Aditi with whole family etc divine powers; grant us asylum with the Strotr, which can pull us out of trouble-disaster, pain-sorrow.
कदा चन स्तरीरसि नेन्द्र सश्चसि दाशुषे। उपोपेन्नु मघवन्भूय इन्नु ते दानं देवस्य पृच्यते॥
बन्ध्या गाय (जिसे बच्चा न होता हो) के सदृश कभी भी विफल न होने वाले हे धन-सम्पत्र देवराज इन्द्र! आपके अत्यधिक अलौकिक अनुदान याज्ञिकों को आपकी कृपा से ही उपलब्ध होते हैं।(सामवेद 3.19.8)
Never failing, hey prosperous Devraj Indr like the infertile cow! Your divine donations are received by the Yagyik due to your mercy-kindness.
युङ्क्ष्वा हि वृत्रहन्तम हरी इन्द्र परावतः।
अर्वाचीनो मघवन्त्सोमपीतय उग्र ऋष्वेभिरा गहि॥
वृत्र नामक राक्षस का संहार करने में समर्थ, रथ पर विराजमान हे वैभवशाली देवराज इन्द्र! आप पराक्रम से परिपूर्ण होकर, मरुद्गणों सहित स्वर्गलोक से हमारे यज्ञ में प्रकट हों।(सामवेद 3.19.9)
Hey prosperous Devraj Indr having grandeur, riding charoite, capable of slaying demon Vratr! Invoke here in our Yagy along with Marud Gan from the heavens, equipped with mighty & power.
त्वामिदा ह्यो नरोऽपीप्यन्वज्रिन्भूर्णयः। स इन्द्र स्तोमवाहस इह श्रुध्युप स्वसरमा गहि॥
यजमानों द्वारा प्रदान किये गये सोमरस का लगातार पान करने वाले हे वज्र धारक, तेजस्वी देवराज इन्द्र! आप मनुष्यों द्वारा उच्चारित स्तोत्रों को श्रवण करते हुए यज्ञ करने के स्थान पर उपस्थित हों।(सामवेद 3.19.10)
Hey aurous-radiant Devraj drinking Somras continuously served by the Yajmans! Listen-respond to the Strotr recited by the humans and invoke at the Yagy site.
सामवेद ऐन्द्रं पर्वणि पर्व (3.20) :: ऋषि :- वसिष्ठ, अश्विन, प्रस्कण्व, मेधातिथिर्मेध्यातिथि, देवातिथि, नृमेघ; देवता :- उषा, अश्विनी, इन्द्र; छन्द :- बृहती।
प्रत्यु अदर्थ्यायत्यू 3 च्छन्ती दुहिता दिवः।
अपो मही वृणुते चक्षुषा तमो ज्योतिष्कृणोति सूनरी॥
प्रदीप्त होकर (भूलोक में) प्रकट होती हुई सूर्य देव की पुत्री उषा का साक्षात्कार होने लगा है। आभा से युक्त रूपवती उषा अपने तेज से तिमिर को समाप्त कर देती है।(सामवेद 3.20.1)
Usha Devi, daughter of Sury Dev, appeared over the earth and illuminate the world. Possessing aura, beautiful Usha destroys the darkness.
इमा उ वां दिविष्टय उस्त्रा हवन्ते अश्विना।
अयं वामह्वेऽवसे शचीवसू विशं विशं हि गच्छथः॥
हे समस्त मनुष्यों के आश्रय स्थल अश्चिन् देवता! स्वर्ग की अभिलाषा करने वाले प्रजागण आपको पुकारते हैं। आप सभी मनुष्यों के समीप जाने वाले एवं शक्ति से धन कमाने वाले हैं। हम संरक्षण प्राप्त करने के उद्देश्य से आपका आवाहन करते हैं।(सामवेद 3.20.2)
Hey Ashwin Dev granting asylum to all humans! Subjects desirous of heavens call you. You approach humans and earn money with strength. We invoke you for asylum.
कुष्ठः को वामश्विना तपानो देवा मर्त्यः। घ्नता वामश्नया क्षपमाणोंऽ शुनेत्थमु आद्वन्यथा॥
हे दिव्य तेज वाले अश्विनी कुमारों! पृथ्वी पर दूसरा कौन मनुष्य आपको प्रदीप्त करने में समर्थ है? आपको प्राप्त करने के उद्देश्य से पत्थरों से कूटकर सोमरस निर्मित करने वाला, शिथिल हुआ याजक राजा के सदृश अपने यथेष्ट (पदार्थों का) भोग करने में समर्थ होता है।(सामवेद 3.20.3)
Hey divine Ashwani Kumars! Who else over the earth amongest humans is capable of making you shine? The tired Yajak who smash-crush Som with stones for you become capable of enjoying desired pleasure-comforts like a king.
अयं वां मधुमत्तमः सुतः सोमो दिविष्टिषु।
तमश्विना पिबतं तिरोअह्नयं धत्तं रत्नानि दाशुषे॥
हे अश्विनी कुमारों! बहुत अधिक मधुर एवं एक दिन पहले शुद्ध किये गये सोमरस का आप पान करें तथा यज्ञ करने वाले पुरोहितों को धन-धान्य से परिपूर्ण कर दें।(सामवेद 3.20.4)
Hey Ashwani Kumars! Drink the sanctified very sweet Somras, extracted one day ago and grant wealth & food grains to the Priest-Purohits accomplishing the Yagy.
आ त्वा सोमस्य गल्दया सदा याचन्नहं ज्या।
भूर्णि मृगं न सवनेषु चुक्रूधं क ईशानं न याचिषत्॥
सिंह के सदृश परम् शक्तिशाली, पालन-पोषण करने में सक्षम हे देवराज इन्द्र! यज्ञ में सोमरस अर्पित करते हुए, विजय प्राप्त करने वाले स्तोत्रों द्वारा लगातार आपसे प्रार्थना करने वाले हम कभी भी क्रोध के योग्य नहीं हैं; क्योंकि ऐसा कौन प्राणी है, जो अपने स्वामी से निवेदन नहीं करता?(सामवेद 3.20.5)
Extremely powerful like the lion, capable of nourishing-nurturing, hey Devraj Indr! Offering Somras in the Yagy, praying you with victorious Strotrs we do not deserve anger. There is no living being, who do not request to his master.
अध्वयों द्रावया त्वं सोममिन्द्रः पिपासति।
उपो नूनं युयुजे वृषणा हरी आच जगाम वृत्रहा॥
पराक्रमी घोड़ों वाले रथ पर आसीन, वृत्रहन्ता देवराज इन्द्र प्रकट हो गए है। इसलिए हे यजुर्वेद ऋत्विक! सोमरस का सेवन करने की अभिलाषा रखने वाले देवराज इन्द्र हेतु आप अति शीघ्र सोमरस तैयार करें।(सामवेद 3.20.6)
Slayer of Vratr, Devraj Indr has invoked riding the mighty horses. Therefore hey Yajur Ved Yagyik! Extract Somras quickly to accomplish the desire of Somras by Devraj Indr.
अभीषतस्तदा भरेन्द्र ज्यायः कनीयसः। पुरूवसुर्हि मघवन्बभूविथ भरेभरे च हव्यः॥
है ऐश्वर्यवान् देवराज इन्द्र! आप समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाले धन-वैभव हम जैसे दरिद्र को प्रदान करने की अनुकम्पा करें। आप युद्धों (जीवन युद्ध) में सहायता करने हेतु आवाहन करने के पात्र है।(सामवेद 3.20.7)
Hey possessor of grandeur Devraj Indr! Grant wealth and prosperity which accomplish all desires to us the poverty stricken, kindly. You deserve to be invoked to fight the wars-struggles in life to help.(22.11.2025)
यदिन्द्र यावतस्त्वमेतावदहमीशीय। स्तोतारमिद्दधिषे रदावसो न पापत्वाय रंसिषम्॥
हे वैभव-सम्पन्न देवराज इन्द्र! हम आपके सदृश ऐश्वर्य के स्वामी होने की अभिलाषा करते हैं। यजमानों को धन प्रदान करने की हमारी कामना है, किंतु कुटिल कर्म करने वालों को नहीं।(सामवेद 3.20.8)
Hey Devraj possessor of grandeur-prosperity! We wish be become the Lord of grandeur like you. We wish to donate to the Yajmans not to the wicked-vicious.
त्वमिन्द्र प्रतूर्तिष्वभि विश्वा असि स्पृथः। अशस्तिहा जनिता वृत्रतूरसि त्वं तूर्य तरुष्यतः॥
हे शत्रुओं का शमन करने वाले देवराज इन्द्र! आप यश से रहित, दुर्जनों एवं बाधा उत्पन्न करने वाले, दुष्टों का विनाश करने वाले हैं।(सामवेद 3.20.9)
Hey controller-destroyer of the enemies Devraj Indr! You are the destroyer of wicked and obstructors, who are without virtues and glory.
प्र यो रिरिक्ष ओजसा दिवः सदोभ्यस्परि।
न त्वा विव्याच रज इन्द्र पार्थिवमति विश्वं ववक्षिथ॥
हे देवराज इन्द्र! आप अपने प्रभाव से स्वर्गलोक में अच्छी प्रकार प्रतिस्थापित हैं। सम्पूर्ण पृथ्वीलोक के धूलि-कण भी आपको सीमाबद्ध करने में सक्षम नहीं हैं, किंतु आप पूरे संसार को धारण करने में समर्थ हैं।(सामवेद 3.20.10)
Hey Devraj Indr! You are well established in the heavens by virtue of your might-impact. All particle of the earth are incapable of restricting you but you are capable of supporting the whole universe.
सामवेद ऐन्द्रं पर्वणि पर्व (3.21) :: ऋषि :- वसिष्ठ, गातु, पृथवैन्य, सप्तुगु, गौरिवीति, वेन, भार्गव, बृहस्पति, नकुल या सुहोत्र; देवता :- इन्द्र; छन्द :- त्रिष्टुप्।
असावि देवं गोऋजीकमन्धो न्यस्मिन्निन्द्रो जनुषेमुवोच।
बोधामसि त्वा हर्यश्व यज्ञैर्बोधा न स्तोममन्धसो मदेषु॥
हे अविनाशी एवं अश्वों के पालनकर्ता देवराज इन्द्र! स्वाभाविक रूप से सभी को प्रिय सोमरस, गायों के दूध के मिश्रण से अलौकिक रूप से तैयार किया जाता है। सोमरस के सेवन से प्रफुल्लित हुए, यज्ञ में उच्चारित की जाती हुई, हमारी इन स्तुतियों पर आप विशेष कृपादृष्टि दिखायें।(सामवेद 3.21.1)
Hey immortal and nurturer of horses Devraj Indr! Somras liked by all is prepared by mixing cow milk in divine manners. Gladdened by drinking Somras, show special support-mercy to our Stuties, recited in the Yagy.
योनिष्ट इन्द्र सदने अकारि तमा नृभिः पुरुहूत प्र याहि।
असो यथा नोऽविता वृधश्चिद्ददो वसूनि ममदश्च सोमैः॥
बहुत सारे लोगों द्वारा स्तुति के योग्य हे देवराज इन्द्र! यज्ञ-स्थल पर आप अपने सहयोगियों सहित उपस्थित होने की दया करें। हमारी रक्षा करने वाले, हमें धनादि से सम्पन्न करने वाले, हमें पोषण प्रदान करने वाले आप सोमरस का सेवन करके प्रफुल्लित हों।(सामवेद 3.21.2)
Hey Devraj Indr deserving worship by lots of people! Please oblige us by arriving at the Yagy site with your associates. Being our protector, granting wealth to us & nourishment, drink Somras and gladden.
अदर्दरुत्समसृजो वि खानि त्वमर्णवान्बद्वधानाँ अरम्णाः।
महान्तमिन्द्र पर्वतं वि यद्वः सृजद्धारा अव यद्दानवान्हन्॥
हे देवराज इन्द्र! आप पयोधरों (मेघों) को चीरकर जल वृष्टि करने हेतु, जल मार्ग के विघ्नों को हटाकर ऊँची लहरों वाले सागर को अत्यधिक जल प्रदान करके आनन्दित करते हैं। उसके बाद आप असुरों (कुटिल प्रकृति वालों) का शमन करते हैं।(सामवेद 3.21.3)
Hey Devraj Indr! You shower rains by tearing into the clouds, remove all obstacles in the path of water running to high tide ocean gladdening him. Thereafter, you destroy the wicked demons.
सुष्वाणास इन्द्र स्तुमसि त्वा सनिष्यन्तश्चित्तुविनृम्ण वाजम्।
आ नो भर सुवितं यस्य कोना तना त्मना सह्याम त्वोताः॥
हे ऐश्वर्यवान् देवराज इन्द्र! सोमरस अभिषवण करने वाले एवं पुरोडाश पकाने वाले याज्ञिक, आपकी स्तुति करते हैं। आपके द्वारा प्रतिपालित ऐच्छिक धन की अभिलाषा करने वाले, हम याज्ञिकगण प्रचुर धन-वैभव कमाने की आपसे सामर्थ्य प्राप्त करते हैं।(सामवेद 3.21.4)
Hey Devraj Indr Lord of grandeur! We the Yagyik extract Somras and cook Purodash for you, worship-pray to you. Desirous of desired wealth, we Yagyik Gan attain the calibre-capability to earn wealth & grandeur-prosperity.
जगृह्मा ते दक्षिणमिन्द्र हस्तं वसूयवो वसुपते वसूनाम्।
विद्या हि त्वा गोपतिं शूर गोनामस्मभ्यं चित्रं वृषणं रयिं दाः॥
हे प्रचुर ऐश्वर्यवान् वीर देवराज इन्द्र! ऐश्वर्य की अभिलाषा करने वाले, बहुत अधिक शक्ति बढ़ाने वाले एवं धन अर्जित करने हेतु हम आपके दाहिने हाथ (बल) का सहारा लेते हैं, आप गायों के पालनकर्ता के रूप में प्रसिद्ध हैं।(सामवेद 3.21.5)
Hey Devraj Indr with lots of grandeur! We desirous of increasing our grandeur and strength, seek the help of your right hand for earning wealth. You are famous for nourishing cows.
इन्द्रं नरो नेमधिता हवन्ते यत्पार्या युनजते धियस्ताः।
शूरो नृषाता श्रवसश्च काम आ गोमति व्रजे भजा त्वं नः॥
मानव-जन संग्राम आदि के समय संकट से रक्षा करने हेतु अपनी सहायता करने के लिए देवराज इन्द्र को बुलाते हैं। इसलिए हे देवराज इन्द्र! आप मानवों हेतु धन के स्वामी तथा पराक्रम बढ़ाने वाले हैं। आप हमें गोष्ठ में, गायों से लाभ प्राप्त करने हेतु पहुँचाने की कृपा करें।(सामवेद 3.21.6)
Humans invoke Devraj Indr for their protection in the war. Hence, hey Devraj Indr! You are the one who increase might and wealth of the humans. Help us in reaching the cow shed for gain through cows.
वयः सुपर्णा उप सेदुरिन्द्रं प्रियमेधा ऋषयो नाधमानाः।
अप ध्वान्तमूर्णहि पूर्घि चक्षुर्मुमुग्ध्या 3 स्मान्निधयेव बद्धान्॥
श्रेष्ठ पंखों से युक्त पक्षी (दिव्य ज्योति-स्वर्णिम रश्मियों से युक्त) देवराज इन्द्र को प्राप्त होता है। श्रेष्ठ (यज्ञप्रेमी) ऋषि इन्द्रदेव से प्रार्थना करने में लगे हुए हैं। हे देवराज इन्द्र! आप जीवन चक्र में फंसे हुए लोगों को मुक्ति प्रदान करें, अंधकार का विनाश कर हमारे नेत्रों को अलौकिक तेज से युक्त कर दें।(सामवेद 3.21.7)
Bird (with golden aura and rays) having excellent feathers is availed by Devraj Indr. Best lovers of Yagy Rishi Gan, are busy praying to Devraj Indr. Hey Devraj Indr! Release the humans captured in the life cycle, destroy the darkness and fill our eyes with divine light-vision.
नाके सुपर्णमुप यत्पतन्तं हृदा वेनन्तो अभ्यचक्षत त्वा।
हिरण्यपक्षं वरुणस्य दूतं यमस्य योनौ शकुनं भुरण्युम्॥
पक्षी की भाँति अन्तरिक्ष में उड़नशील सुवर्ण के पंख वाले, सभी को पोषण प्रदान करने वाले हे वरुण के दूत! आप समस्त जनों के प्रिय हैं, ऊर्जा (अग्नि) के उत्पत्ति स्थल अंतरिक्ष में, आपको पक्षी की भाँति भ्रमण करते हुए देखते हैं।(सामवेद 3.21.8)
Hey ambassador-messenger of Varun Dev flying like birds in the space, granting nourishment to all! You are dear to all. We see you flying like a bird at the origin of fire-Agni in the space.
ब्रह्म जज्ञानं प्रथमं पुरस्ताद्वि सीमतः सुरुचो वेन आवः।
स बुध्न्या उपमा अस्य विष्ठाः सतश्च योनिमसतश्च विवः॥
परमपिता परमेश्वर (ब्रह्मा) ने सृष्टि के आरंभिक काल में सबसे पहले ब्रह्माण्ड की रचना की। उन्होंने ही सौर-मण्डल में सूर्य-मण्डल के माप के स्रोत, दिशाओं की सीमा एवं तेज को प्रसारित किया। इस तरह प्रकृति, भूत, भविष्य एवं वर्तमान को उन्होंने कई स्वरूपों में दर्शाया।(सामवेद 3.21.9)
Param Pita Parbrahm Parmeshwar generated the universe in the beginning of evolution. He created solar system, measurements Solar system, limits of directions and spreaded the energy. In this manner HE demonstrated the nature, past, present & future in many ways.
अपूर्व्या पुरुतमान्यस्मै महे वीराय तवसे तुराय।
विरप्शिने वज्रिणे शन्तमानि वचांस्यस्मै स्थविराय तक्षुः॥
परम् बलशाली, शूरवीर अति शीघ्र कार्य करने वाले, वन्दनीय, वज्रधारक, पूजनीय देवराज इन्द्र हेतु अनेक संतुष्टि प्रदान करने वाले स्तोत्रों के द्वारा वन्दना की जाती है।(सामवेद 3.21.10)
Mighty, brave-invincible, working quickly-rapidly, worshipable, honourable Devraj Indr is satisfied and worshiped with many Strotrs.(23.11.2025)
सामवेद ऐन्द्रं पर्वणि पर्व (3.22) :: ऋषि :- द्युतान, वृहदुक्थ, वामदेव, वसिष्ठ, विश्वामित्र, गोरिवीति; देवता :- इन्द्र; छन्द :- त्रिष्टुप्।
अव द्रप्सो अंशुमतीमतिष्ठदियानः कृष्णो दशभिः सहस्त्रैः।
आवत्तमिन्द्रः शच्या धमन्तमप स्नीहितिं नृमणा अधद्राः॥
तीव्र गमनशील, दस हजार सैनिकों के साथ आक्रमण करने वाले, सम्पूर्ण जगत् को पीड़ा पहुँचाने वाले, अंशुमती सरिता (यमुना) के किनारे पर स्थित, (सभी को आकृष्ट करके) अपने कब्जे में कर लेने वाले (कृष्णासुर) पर समस्त जनों के प्रिय देवराज इन्द्र ने आक्रमण करके शत्रुओं की सेना को पराभूत कर दिया।(सामवेद 3.22.1)
Devraj Indr attacked the demon Krashna Sur who was troubling-torturing the whole world, over the bank of Anshumati Sarita-Yamuna, with high speed and ten thousand soldiers, defeating his armies.
वृत्रस्य त्वा श्वसथादीषमाणा विश्वे देवा अजहुर्ये सखायः।
मरुद्भिरिन्द्र सख्यं ते अस्त्वथेमा विश्वाः पृतना जयासि॥
हे देवराज इन्द्र! वृत्रासुर से भयभीत होकर आपके सहयोगी समस्त देवगण आपका साथ छोड़कर चारों दिशाओं में भाग गये। उसके पश्चात् मरुद्गणों की सहायता लेकर आपने शत्रुओं की सेना को पराभूत किया।(सामवेद 3.22.2)
Hey Devraj Indr! Terrified by Vratra Sur, your associate demigods run away in four direction. Thereafter, you defeated the enemy army with the help of Marud Gan.
विधुं दद्राणं समने बहूनां युवानं सन्तं पलितो जगार।
देवस्य पश्य काव्यं महित्वाद्या ममार स ह्यः समान॥
संग्राम में वीरता का प्रदर्शन करके शत्रुओं की सेना को भगा देने वाले देवराज इन्द्र के तेज से श्वेत केश वाला (शत्तिहीन) वृद्ध भी उत्तेजित हो जाता है। हे यजमान! देवराज इन्द्र के बल का विश्लेषण करने वाले अद्भुत काव्य का अवलोकन करो, जो आज (उच्चारण के पश्चात्) विलुप्त (सा) ज्ञात होता हुआ भी (भविष्य में) नये मन्त्रों के सदृश वन्दनाओं में प्रयोग किया जाता है।(सामवेद 3.22.3)
An old man with grey hair too become excited-agitated due to the aura of Devraj Indr, who show courage in the war and repel the enemy army. Hey Yajman! Review the amazing poetry analysing the strength of Devraj Indr which appear to be disappearing and compose new Mantrs.
त्वं ह त्यत्सप्तभ्यो जायमानोऽशत्रुभ्यो अभवः शत्रुरिन्द्र।
गूढे द्यावापृथिवी अन्वविन्दो विभुमद्भयो भुवनेभ्यो रणं धा:॥
अजातशत्रु हे देवराज इन्द्र! वृत्रादि सात असुरों के आप जन्म लेते ही बैरी बन गये। अंधकार से युक्त (असुरों द्वारा प्रतिष्ठित किये गये) स्वर्गलोक एवं भूलोक को (उद्धार करके) आपने प्रदीप्त किया। अब आपने इन लोकों को वैभवशाली एवं भली प्रकार स्थायी करके रूपवान् बना दिया है।(सामवेद 3.22.4)
Ajat Shatru (has no enemy) Devraj Indr! You became the enemy of Vratra Sur and seven other demons as soon as you took birth. You removed the darkness over the earth & heavens and illuminated them. You granted grandeur & prosperity to the three abodes and made them beautiful & stable.
मेडिं न त्वा वज्रिणं भृष्टिमन्तं पुरुधस्मानं वृषभं स्थिरप्स्नुम्।
करोष्यर्यस्तरुषीर्दुवस्युरिन्द्र द्युक्षं वृत्रहणं गृणीषे॥
अच्छे कर्मों के प्रभाव से प्रशंसा योग्य, वृत्र हन्ता, स्वर्गलोक में विराजमान, शत्रुओं का शमन करने वाले, परम बलशाली, युद्ध में अचल रहने वाले, वज्रधारी, कुटिल प्रकृति के लोगों का विनाश करने वाले, देवराज इन्द्र हमें सदैव विजय प्रदान करते हैं। इसलिए हम आपको स्तुति के माध्यम से संतुष्ट करते हैं।(सामवेद 3.22.5)
By virtue of virtuous deeds appreciation deserving, slayer of Vratra Sur, present in heavens, destroyer of enemies, unmoved in the war, Vajr wielding, destroyer of the wicked-vicious, Devraj Indr always help us win. Hence, we satisfy him through prayers-Stuties.
प्र वो महे महे वृधे भरध्वं प्रचेतसे प्र सुमतिं कृणुध्वम्।
विशः पूर्वीः प्र चर चर्षणिग्राः॥
हे ऋत्विजो! श्रेष्ठ कार्यों को परिपूर्ण करने वाले, प्रसिद्ध देवराज इन्द्र हेतु सोम अर्पित करते हुए, उत्तम स्तोत्रों से वन्दना करो। हे देवराज इन्द्र! आप मनुष्यों की इच्छाओं की पूर्ति करते हुए उनका कल्याण करें।(सामवेद 3.22.6)
Hey Ritviz! Offer Somras to Devraj Indr who accomplish the excellent endeavours and worship him with best Strotrs. Hey Devraj Indr! Accomplish the desires of the humans and look to their welfare-well being.
शुनं हुवेम मघवानमिन्द्रमस्मिन्भरे नृतमं वाजसातौ।
शृण्वन्तमुग्रमूतये समत्सु घ्नन्तं वृत्राणि सञ्जितं धनानि॥
हे सम्पूर्ण सुखों को प्रदान करने वाले, अन्नदाता, युद्ध में उत्साह जागृत करने वाले महान् शूरवीर, वैभवशाली, कुटिल कृत्य का विनाश करने वाले, हमारी याचनाओं को श्रवण करने वाले, सम्पूर्ण धन-संपत्ति के अधिपति देवराज इन्द्र! आप हमें संरक्षण प्रदान करें। हम अपने संरक्षण के उद्देश्य से आपका आवाहन करते हैं।(सामवेद 3.22.7)
Granter of all comforts & food grains, invincible-brave encouraging in the war, mighty-powerful, possessor of grandeur-prosperity, destroyer of wicked-vicious actions, responding to our prayers Lord of all wealth, hey Devraj Indr! Grant us asylum. We invoke you for our protection.
उदु ब्रह्माण्यैरत श्रवस्येन्द्रं समर्ये महया वसिष्ठ।
आ यो विश्वानि श्रवसा ततानोपश्रोता म ईवतो वचांसि॥
हे इन्द्रियों को वश में रखने वाले (वसिष्ठ) ऋषिः कीर्ति में वृद्धि करने वाले, आराधकों की याचनाओं को श्रवण करने वाले, पोषक पदाथों को प्राप्त करने की अभिलाषा से याग में देवराज इन्द्र की महिमा का वर्णन करने वाले स्तोत्रों का पाठ करो।(सामवेद 3.22.8)
Hey Vashishth Rishi, keeping the sense organs under control! Recite the Strotrs which boost the glory of Devraj Indr who respond to the prayers of the devotees, expecting nourishment-offerings in the Yagy.
चक्रं यदस्याप्स्वा निषत्तमुतो तदस्मै मध्विच्चच्छद्यात्।
पृथिव्यामतिषितं यदूधः पयो गोष्वदधा ओषधीषु॥
अन्तरिक्ष में जाज्वल्यमान देवराज इन्द्र का अस्त्र आराधकों हेतु मधुर जल (पोषक रस) को आच्छादित करता है। यह धरती पर प्रवाहित होता हुआ वनस्पतियों में पोषक रस के रूप में नीहित है।(सामवेद 3.22.9)
जाज्वल्य, जाज्वल्यमान् :: चमकता हुआ, प्रकाशमान् प्रज्वलित तेजपूर्ण, तेजोमंडित; flamboyant, shining, blazing, refulgent.
Shinning in the space, the weapons-missiles of Devraj Indr cover the devotees with sweet water. It flow-falls over the earth and nourish the vegetation.
सामवेद ऐन्द्रं पर्वणि पर्व (3.23) :: ऋषि :- अरिष्टनेमि, तार्थ्य, भरद्वाज, बसुकृद या वासुक्र, वामदेव, विश्वामित्र, रेणु, गौतम; देवता :- तार्थ्य, इन्द्र, इन्द्रापर्वतौ; छन्द :- त्रिष्टुप्।
त्यमू षु वाजिनं देवजूतं सहोवानं तरुतारं रथानाम्।
अरिष्टनेमिं पृतनाजमाशुं स्वस्तये तार्थ्यमिहा हुवेम॥
देवगणों द्वारा प्रेरित रथ को लाने वाले, आराध्य, पराक्रमी, धन-संपत्ति के अधिष्ठाता, शत्रुओं की सेना को पराजित कर विजय प्राप्त करने वाले, युद्ध में उद्धार करने में सक्षम, गतिशील, व्यापक तार्क्ष्य (गरुड़-सूर्य-इन्द्र) का हम अपने कल्याण के निमित्त आवाहन करते हैं।(सामवेद 3.23.1)
उद्धार :: निस्तार, मुक्ति, छुटकारा, बचाव, छुड़ाना, दस्तबरदारी; deliverance, extrication, releasement, rescue.
We invoke Tarksh-trio (Garud Ji, Sury Dev & Devraj Indr) who bring the charoite inspired by the demigods-deities, deity, chivalric-mighty, Lord of wealth & prosperity, defeats the enemy armies and victorious, capable of rescue in war, dynamic, for our welfare-well being.
त्रातारमिन्द्रमवितारमिन्द्रं हवेहवे सुहवं शूरमिन्द्रम्।
हुवे नु शक्रं पुरुहूतमिन्द्रमिदं हविर्मघवा वेत्विन्द्रः॥
सभी को संरक्षण प्रदान करने वाले, सभी के सहयोगी, शक्तिशाली, समर्थ, संग्राम में बुलाये जाने वाले, महादानी एवं अनेक याजकों द्वारा वन्दनीय देवराज इन्द्र को हम अपने कल्याण करने के उद्देश्य से आमन्त्रित करते हैं। संपत्तिवान वे देवराज इन्द्र (याज्ञिकों द्वारा अर्पित) हविष्यान्न को स्वीकार करें।(सामवेद 3.23.2)
We invite Devraj Indr for our welfare-well being, who is a great donor, grants asylum to everyone, associate of all, mighty-powerful, capable, join war on being invited, worshiped by the Yajak. Let wealthy Devraj Indr, accept the oblations-offerings of the Yagyik Gan.(24.11.2025)
यजामह इन्द्रं वज्रदक्षिणं हरीणां रथ्यां 3 विव्रतानाम्।
प्र श्मश्रुभिर्दोधुवदूर्ध्वधा भुवद्वि सेनाभिर्भयमानो वि राधसा॥
वज्रधारी, तीव्रगति वाले रथ पर विराजमान, सर्वोपरि, दाड़ी तथा मूंछों को हिलाकर शत्रु को कंपित कर देने वाले, सेना के द्वारा शत्रुओं को डरा देने वाले देवराज इन्द्र आराधकों को धन-ऐश्वर्य प्रदान करते है।(सामवेद 3.23.3)
Vajr wielding, riding fast moving charoite, above all, tremble the enemy just by shaking beard and moustaches, producing fear in the enemy army, Devraj Indr grants wealth & grandeur to the devotees.
सत्राहणं दाघृषिं तुम्रमिन्द्रं महामपारं वृषभं सुवज्रम्।
हन्ता यो वृत्रं सनितोत वाजं दाता मघानि मघवा सुराधाः॥
शत्रुओं की सेनाओं का शमन करने वाले, उनका तिरस्कार करने वाले, उनको युद्ध में परास्त करने वाले, महान् पराक्रमी, उत्तम वज्र धारण करने वाले, पोषणकर्ता, संपत्तिवान्, ऐश्वर्यवान, वृत्र संहारक, धनों के अधिष्ठाता एवं रक्षक देवराज इन्द्र अपने आराधकों को धन-संपत्ति से परिपूर्ण करने वाले हैं।(सामवेद 3.23.4)
Oppressor of the enemy army, disdain-reproach them, defeat them, mighty-powerful, Vajr wielding, nurturer, wealthy, possess grandeur, slayer of Vratr, deity-Lord of wealth and protector Devraj Indr grant wealth and property-prosperity to his devotees.
यो नो वनुष्यन्नभिदाति मर्त उगणा वा मन्यमानस्तुरो वा।
क्षिधी युधा शवसा वा तमिन्द्राभी ष्याम वृषमणस्त्वोताः॥
मृत्यु की अभिलाषा करने वाले, अहंकार से युक्त, नाश करने वाले, शस्त्रों के साथ हमला करने को तैयार, दृढ़ निश्चयी, आपके द्वारा संरक्षण प्राप्त कर हम (याज्ञिकगण), शत्रुओं को पराभूत करने में समर्थ हैं।(सामवेद 3.23.5)
पराभूत :: पराजित, परास्त, विनष्ट, ध्वस्त; defeated, vanquished, subjugated, overthrown.
Hey Devraj Indr! We Yagyik Gan, having the desire for death, egoistic, destroyer, ready to attack with weapons, firm-determined, under your protection are ready to defeat the enemy.
यं वृत्रेषु क्षितय स्पर्धमाना यं युक्तेषु तुरयन्तो हवन्ते।
यं शूरसातौ यमपामुपज्मन्यं विप्रासो वाजयन्ते स इन्द्रः॥
संग्राम में लगी हुई प्रजाओं द्वारा सहायता करने हेतु आवाहित किये जाने वाले, हाथ में शस्त्र लेकर लड़ाई करने वाले, शूरवीरों द्वारा बुलाये जाने वाले, जल-वृष्टि के उद्देश्य से निवेदन किये जाने वाले, ज्ञानियों द्वारा हवि अर्पित किये जाने वाले ईश्वर एक मात्र देवराज इन्द्र हैं।(सामवेद 3.23.6)
On being called by the populace busy with war for help, those fighting having arms in their hands, by the mighty-brave, oblations-offerings made by the learned scholars the responding only deity is Devraj Indr.
इन्द्रापर्वता बृहता रथेन वामीरिष आ वहतं सुवीराः।
वीतं हव्यान्यध्वरेषु देवा वर्षेथां गीर्भिरिडया मदन्ता॥
हे देवराज इन्द्र एवं पर्वत! स्तुति करने योग्य, उत्तम संतान युक्त, याजक द्वारा निवेदित हविष्यान्न से आनन्द का अनुभव करने वाले, हवन में हवि को ग्रहण करने वाले आप हमें पोषण पदार्थ प्रदान करें तथा हमारी स्तुतियों से प्रवृद्ध हों।(सामवेद 3.23.7)
Hey Devraj Indr & Parwat-mountain! Deserving worship, having excellent progeny, enjoying the offerings made by the Yajak, accept the offerings of the Hawan, you both grant us nourishing material and grow with our Stuties-prayers.
इन्द्राय गिरो अनिशितसर्गा अपः प्रैरयत्सगरस्य बुध्नात्।
यो अक्षेणेव चक्रियौ शचीभिर्विष्वक्तस्तम्भ पृथिवीमुत द्याम्॥
जिस प्रकार 'हाल' (लोहे की पट्टी) चक्र को चारों ओर से घेरे हुए उसकी रक्षा करता है, उसी प्रकार देवराज इन्द्र अपने सामर्थ्य से, स्वर्गलोक एवं पृथ्वीलोक को आच्छादित करके वहीं पर विद्यमान है। ऐसे देवराज इन्द्र हेतु ऊँचे स्वर से उच्चारित होने वाली वन्दनाएँ आकाश से जल बरसाने में समर्थ होती हैं।(सामवेद 3.23.8)
The way a flat plate-ring of iron protects the wheel from all sides, similarly Devraj Indr pervade the earth & heavens with his capability and remain there. Prayers made to Devraj Indr in loud voice leads to showers from the sky.
आ त्वा सखायः सख्या ववृत्युस्तिरः पुरू चिदर्णवां जगम्याः।
पितुर्नपातमा दधीत वेधा अस्मिन्क्षये प्रतरां दीद्यानः॥
हे देवराज इन्द्र! बहुत दूर अन्तरिक्ष में अवस्थित आपके सखागण, उत्तम स्तुतियों के माध्यम से आपको आहूत करते है। इस हवन में प्रकाशित होते हुए आपके प्रभाव से हम उत्तम पुत्र-पौत्रों को प्राप्त करें।(सामवेद 3.23.9)
Hey Devraj Indr! Your associates established in the sky-space worship you with excellent prayers. Your aura evolved in the Hawan should grant us best sons & grandsons.
को अद्य युङ्क्ते धुरि गा ऋतस्य शिमीवतो भामिनो दुर्हृणायून्।
आसन्नेषामप्सुवाहो मयोभून्य एषां भृत्यामृणधत्स जीवात्॥
हवन में जाने वाले देवराज इन्द्र के रथ की धुरी के सहयोग से गमनशील, शक्तिशाली शत्रु पर कुपित, आनन्द प्रदान करने वाले, हवन में देवराज इन्द्र को ले जाने वाले, स्तोताओं की स्तुतियों द्वारा अश्वों को (आपके अलावा) कौन रथ में संयोजित कर सकता है? देवराज इन्द्र के घोड़ों का पालन-पोषण करने वाला ही दीर्घजीवी हो सकता है।(सामवेद 3.23.10)
Movable with the help of axle of the charoite of Devraj moving towards Hawan, angry over the mighty enemy, pleasure granting, those who take Devraj Indr to Hawan, who else other than them can deploy the horses in the charoite with Stuties! One who nurse -nurture the horses of Devraj Indr can survive for long.
सामवेद ऐन्द्रं पर्वणि पर्व (3.24) :: ऋषि :- मधुच्छन्दा, जेता माधुच्छन्दस, गौतम, अत्रि, तिरश्चीरांगिरस, काण्वो, नीपातिथि, विश्वामित्र, शंयुर्वाहस्पत्य; देवता :- इन्द्र; छन्द :- अनुष्टुप्।
गायन्ति त्वा गायत्रिणोऽर्चन्त्यर्कमर्किणः। ब्रह्माणस्त्वा शतक्रत उद्वंशमिव येमिरे॥
हे श्रेष्ठ कर्म या सौ यज्ञ करने वाले (शतक्रतु) देवराज इन्द्र! स्तोतागण उच्च स्वर से स्तुतियों का उच्चारण करके आपको आहूत करते हैं। उद्गातागण पूजनीय देवराज इन्द्र का मन्त्रोच्चारण के माध्यम से सम्मान करते हैं। बाँस के ऊपर अपना खेल दिखाने वाले नट के सदृश ब्रह्मज्ञानी लोग सबसे अधिक उत्तम स्तुतियों के द्वारा आपका आवाहन करते हैं।(सामवेद 3.24.1)
Hey Devraj Indr accomplishing hundred Yagy! The Stotas make Stuties in loud voice to invoke you. The singers honour revered Devraj Indr with Mantropchar-recitation of hymns. The enlightened-Brahm Gyani invoke you with best Stuties like the contortionist-acrobat, who show his feats over the bamboo.
इन्द्रं विश्वा अवीवृधन्त्समुद्रव्यचसं गिरः। रथीतमं रथीनां वाजानां सत्पतिं पतिम्॥
अन्तरिक्ष के सदृश चारों ओर विद्यमान, श्रेष्ठ शूरवीर, सागर के सदृश विशाल रथ पर विराजमान, पराक्रम तथा अन्न के स्वामी, सत्पुरुषों की रक्षा करने वाले देवराज इन्द्र की महिमा का गुणगान सभी लोग करते हैं।(सामवेद 3.24.2)
Glory of excellent brave, riding the large charoite like ocean, invincible-mighty, deity of food grains, protector of the virtuous, Devraj Indr present in the space all around, is sung by all people.
इममिन्द्र सुतं पिब ज्येष्ठममर्त्य मदम्। शुक्रस्य त्वाभ्यक्षरन्धारा ऋतस्य सादने॥
हे देवराज इन्द्र! अविनाशी, अति उत्तम, सुख का अनुभव कराने वाले सोमरस का सेवन करें। यज्ञवेदिका में निष्पन्न किया हुआ सोमरस आपको समर्पित है।(सामवेद 3.24.3)
Hey Devraj Indr! Enjoy excellent Somras that makes feel excellent comforts, boost life span i.e., grants immortality. Somras sanctified over the Yagy Vedika is offered to you.
यदिन्द्र चित्र म इह नास्ति त्वादातमद्रिवः। राधस्तन्नो विदद्वस उभयाहस्त्या भर॥
हे विचित्र वज्र को धारण करने वाले संपत्तिवान् देवराज इन्द्र! आपको समर्पित करने हेतु पर्याप्त धन हमारे समीप नहीं है। इसलिए अपने खुले हाथों से हमें पर्याप्त धन देने की कृपा करें।(सामवेद 3.24.4)
Hey wealthy Devraj Indr wielding amazing Vajr! We do not have sufficient money to offer you. Therefore, you grant us sufficient wealth with liberal open hands.(25.11.2025)
श्रुधी हवं तिरश्र्च्या इन्द्र यस्त्वा सपर्यति। सुवीर्यस्य गोमतो राबस्पूर्धि महाँ असि॥
हे ऐश्वर्यवान् देवराज इन्द्र! तिरश्चि ऋषि जो आपके आराधक हैं, आप उनकी स्तुतियों को श्रवण करें। हे महान् देवराज इन्द्र! आप उत्तम पराक्रम तथा गाय देते हुए हमें धन-धान्य से सम्पन्न कर दें।(सामवेद 3.24.5)
Hey Devraj Indr, possessor of grandeur! Respond to the Stuti-prayers of your devotee Tirshrichi. Hey great Devraj Indr! Grant excellent valour, cows, wealth & food grains to us.
असावि सोम इन्द्र ते शविष्ठ धृष्णवा गहि।
आ त्वा पृणक्त्विन्द्रियं रजः सूर्यो न रश्मिभिः॥
महा पराक्रमी शत्रुओं को परास्त कर देने वाले हे देवराज इन्द्र! विस्तृत आकाश को अपनी रश्मियों से प्रकाशित करने वाले सूर्य के सदृश आप के अंदर भी सोमरस का सेवन करने के पश्चात् अत्यधिक शक्ति का नेतृत्व हो।(सामवेद 3.24.6)
Hey Devraj Indr defeater of the mighty enemy! You should drink Somras and spread your aura-radiance in the space like Sury Dev, lead with Ultimate might power & strength.
एन्द्र याहि हरिभिरुप कण्वस्य सुष्टुतिम्। दिवो अमुष्य शासतो दिवं यय दिवावसो॥
हे पराक्रमी देवराज इन्द्र! आप घोड़े पर सवार होकर कण्व की उत्तम स्तुतियों को सुनने के निमित्त उपस्थित हो। स्वर्गलोक में रहने में हमारी तरह आपको भी आनन्द की प्राप्ति होगी, इसलिए आप उसी स्थान पर रहने हेतु गमन करें।(सामवेद 3.24.7)
Hey mighty Devraj Indr! Ride the horse and come to listen the best Stuties-prayers by Kavy Rishi. You will experience pleasure-comforts like us residing in the heavens, hence move to that place.
आ त्वा गिरो रथीरिवास्थुः सुतेषु गिर्वणः। अभि त्वा समनूषत गावो वत्सं न घेनवः॥
हे वन्दनीय देवराज इन्द्र! रथ पर विराजमान होकर सुरक्षित उपस्थित होने वाले युद्धकर्ता (योद्धा) के सदृश एवं बछड़े के समीप जाने हेतु गमनशील गौ के सदृश, "सोमयज्ञ" में हमारे स्तोत्र आपके समीप पहुंचते हैं।(सामवेद 3.24.8)
Hey worshipable Devraj Indr! Our Strotr in the Som Yagy reach you like the warrior safe in the charoite and the moving cow reaching the calf.
एतो न्विन्द्रं स्तवाम शुद्धं शुद्धेन साम्ना। शुब्दैरुक्थैर्वावृध्वां सं शुद्धैराशीवर्वान्ममत्तु॥
हे देवराज इन्द्र! आप बिना विलम्ब किये यहाँ उपस्थित हों। पावन सामगानों तथा यजुर्मन्त्रों के द्वारा हम आपकी स्तुति करते हैं। पराक्रम बढ़ाने वाला, मन्त्रों से शुद्ध किया गया, गाय के दूध में मिला हुआ सोमरस, आपको सुखानुभूति प्रदान करे।(सामवेद 3.24.9)
Hey Devraj Indr! Come here without delay. We worship you with pious Som Gan and Yajur Mantrs. Let the Somras sanctified with Mantrs mixed with cow's milk increase your valour-bravery & grant you pleasure.
यो रयिं वो रयिन्तमो यो द्युम्नैद्युम्नवत्तमः। सोमः सुतः स इन्द्र तेऽस्ति स्वधापते मदः॥
हे ऐश्वर्यवान् देवराज इन्द्र! रूपवान्, अत्यधिक तेज से युक्त, आराधकों को धन प्रदान करने वाला यह सोमरस आपको प्रफुल्लित करने वाला है।(सामवेद 3.24.10)
Hey possessor of grandeur Devraj Indr! This Somras gladden you & grant wealth to the beautiful devotees, possessing extreme aura-radiance.
सामवेद ऐन्द्रं पर्वणि पर्व (4.25) :: ऋषि :- भरद्वाज, वामदेव अथवा शाकपूतो, प्रियमेध, प्रगाथ, श्यावश्व, आत्रेय, शंयु, वामदेव, जेता माधुच्छंदस; देवता :- इन्द्र, मरुत् अथवा दधिक्रा; छन्द :- अनुष्टुप्।
प्रत्यस्मै पिपीषते विश्वानि विदुषे भर। अरङ्गमाय जग्मयेऽपश्चादध्वने नरः॥
हे याजक! सोमरस का पान करने की अभिलाषा रखने वाले, यज्ञ का संचालन करने वाले, महाज्ञानी, निश्चित समय पर उचित स्थान को प्राप्त कराने वाले, यज्ञ में गमनशील होकर, सबसे पहले यज्ञ स्थल पर पहुँचने वाले देवराज इन्द्र को सोमरस समर्पित करके संतुष्ट करो।(सामवेद 4.25.1)
Hey Yajak! Satisfy Devraj Indr desirous of Somras, who conduct Yagy, is enlightened, attain right position at the right moment, movable to the Yagy and reaching first of all.
आ नो वयो वयःशयं महान्तं गह्वरेष्ठाम्। महान्तं पूर्विणेष्ठामुग्रं वचो अपावधीः॥
हे देवराज इन्द्र! बृहत् पर्वत पर विद्यमान, सभी जगह व्याप्त, सोमरूपी अन्न प्रदान करके हमें परिपूर्ण कर दें। अत्यन्त प्रसिद्ध भाषणों को आप हमारे निकट न आने दें। हम निन्दा करने के पात्र न बनें।(सामवेद 4.25.2)
Hey Devraj Indr! Present over the huge-vast mountain, pervading all places, suffice us with food grain in the form of Som. Do not let extreme speeches close to you. We should not attract condemnation-reprehension.
आ त्वा रथं यथोतये सुम्नाय वर्तयामसि। तुविकूर्मिमृतीषहमिन्द्रं शविष्ठ सत्पतिम्॥
शत्रुओं को पराभूत करने वाले महा पराक्रमी, याज्ञिकों के पोषणकर्ता हे महा बलशाली देवराज इन्द्र! रक्षा करने तथा सुख प्राप्त करने के उद्देश्य से, गतिमान रथ के सदृश, सभी ओर भ्रमण कराते हुए, आपको हम (याज्ञिक जन) यज्ञ-वेदिका पर ले आते हैं।(सामवेद 4.25.3)
Hey extremely powerful, defeating enemies, nurturer of the Yagyik Devraj Indr! We move all around like a movable charoite, bring you to the Yagy Vedica with the purpose of protection and comforts.
स पूव्यों महोनां वेनः क्रतुभिरानजे। यस्य द्वारा मनुः पिता देवेषु धिय आनजे॥
याजक के सहयोग से हवियों को ग्रहण करने हेतु, कर्म करने वाले, देवगणों के पोषणकर्ता, चिंतनशील, उत्तम देवराज इन्द्र यज्ञ-वेदिका पर प्रकट होते हैं।(सामवेद 4.25.4)
Thoughtful Devraj Indr nurturer of demigods-deities, performer of endeavours, appear over the Yagy Vedica for accepting offerings with the cooperation of the Yajak.
यदी वहन्त्याशवो भ्राजमाना रथेष्वा। पिबन्तो मदिरं मधु तत्र श्रवांसि कृण्वते॥
सबको आनन्द प्रदान करने वाले, अन्न पैदा करने वाले, तृप्तिकारी सोमरस का पान करने वाले, देदीप्यमान, तुरन्त गमन करने वाले मरुद्गण, देवराज इन्द्र को यज्ञ-स्थल पर ले जाते हैं।(सामवेद 4.25.5)
Producer of food grains, drinker of satisfying Somras, Marud Gan who grant pleasure to everyone, bring Devraj Indr to the Yagy site.
त्यमु वो अप्रहणं गृणीषे शवसस्पतिम्। इन्द्रं विश्वासाहं नरं शचिष्ठं विश्ववेदसम्॥
याजकों की भलाई हेतु शुभ कार्य करने वाले, पराक्रम तथा धन के अधिष्ठाता, शत्रुओं को परास्त करने वाले, हवन के नायक, पराक्रम से परिपूर्ण, सब कुछ जानने वाले देवराज इन्द्र की (हम) वन्दना करते हैं।(सामवेद 4.25.6)
We worship Devraj Indr who perform pious deeds for the welfare, well being of the Yajak Gan, deity of might & wealth, defeater of the enemy, leader of the Yagy, full of valour all knowing.(29.11.2025)
दधिक्राव्णो अकारिषं जिष्णोरश्वस्य वाजिनः।
सुरभि नो मुखा करत्प्र ण आयूंषि तारिषत्॥
सदैव विजय प्राप्त करने वाले, घोड़े के सदृश तेज गतिमान, दधिक्राव (ऋषि) की हम वन्दना करते हैं। जो शारीरिक अंगों की रक्षा करने वाले एवं हमें दीर्घ आयु प्रदान करने वाले हैं।(सामवेद 4.25.7)
We worship Dadhikrav Rishi who is accelerated like a horse and is always a winner. He protect the body organs and grant us long life.
पुरा भिन्दुर्युवा कविरमितौजा अजायत। इन्द्रो विश्वस्य कर्मणो धर्ता वज्री पुरुष्टुतः॥
वह देवराज इन्द्र शत्रुओं की पुरियों को तहस-नहस करने वाले, नित्य युवा, महाज्ञानी, कल्याणमय कार्यों को शरण प्रदान करने वाले, महा पराक्रमी, सबसे अधिक ऐश्वर्यवान् होकर उत्पन्न हुए है।(सामवेद 4.25.8)
Devraj Indr, destroyer of the forts-cities of the enemies, always young, extremely-Ultimate enlightened, shelter-protect the welfare means, possess extreme valour-might and has evolved with the grandeur which is more than everyone.
सामवेद ऐन्द्रं पर्वणि पर्व (4.26) :: ऋषि :- प्रियमेध, वामदेव, मधुच्छन्दा, आप्त्यस्त्रित, भरद्वाज, अत्रि, प्रस्कण्व; देवता :- इन्द्र, उषा, विश्वेदेवा; छन्द :- अनुष्टुप्।
प्रप्र वस्त्रिष्टुभमिषं वन्दद्वीरायेन्दवे। धिया वो मेधसातये पुरन्ध्या विवासति॥
हे याज्ञिक गण! तीन स्तोत्रों से निर्मित धान्य (भोज्य पदार्थ), उत्तम शूरवीर देवराज इन्द्र को समर्पित करो। यज्ञ को पूर्ण करने हेतु बुद्धिमानी से किये गये श्रेष्ठ कर्मों का मनवांछित फल प्रदान करके 'देवराज इन्द्र' याज्ञिकों को सम्मानित करते हैं।(सामवेद 4.26.1)
Hey Yagyik Gan! Offer the eatables backed with three food grains to the best warrior. Devraj Indr honour the Yagyik who accomplish the Yagy intelligently and reward them with accomplishment of desires.
कश्यपस्य स्वर्विदो यावाहुः सयुजाविति। ययोर्विश्वमपि व्रतं यज्ञं धीरा निचाय्य॥
सब कुछ जानने वाले देवराज इन्द्र के दोनों घोड़े हमेशा यज्ञ के कार्यों (देवराज इन्द्र को यज्ञ-वेदिका तक पहुँचाने) में लगे रहते हैं। इस बात के निश्चित होने के पश्चात्, उन्हें (बिना संकोच के) रथ में नियुक्त कर लिया जाता है, ऐसा ज्ञाता पुरुषों का कहना है।(सामवेद 4.26.2)
The horses of Devraj Indr who knows every thing, continue carrying him to the Yagy Vedica. These horses are deployed in the charoite without hitch once its decided that Devraj is going to join the Yagy.
अर्चत प्रार्चता नरः प्रियमेधासो अर्चत । अर्चन्तु पुत्रका उत पुरमिद् धृष्णवर्चत॥
हे ऋत्विजों! हवन से स्नेह करने वाले आराधकों तथा याजकों की अभिलाषा को पूरा करने वाले एवं शत्रुओं का तिरस्कार करने वाले देवराज इन्द्र का आप सभी (श्रद्धापूर्वक) आदर करें।(सामवेद 4.26.3)
Hey Ritvij Gan! Honour Devraj Indr who accomplish the desires of the devotees and the Yajak Gan who perform the Hawan with love & affection and disdain-reproach the enemies.
उक्थमिन्द्राय शंस्यं वर्धनं पुरुनिष्विधे। शक्रो यथा सुतेषु नो रारणत्सख्येषु च॥
हे उद्गाताओं! शत्रुओं का विनाश करने वाले, शक्तिशाली देवराज इन्द्र हेतु (उनके) कीर्तिवर्द्धक श्रेष्ठ स्तोत्रों का उच्चारण करो, जिसके फलस्वरूप देवराज इन्द्र हमारी संतानों तथा सखाओं पर सर्वदा अपनी कृपा बनाये रखें।(सामवेद 4.26.4)
Hey hymns singers-Udgata Gan! Recite the best Strotrs leading to the fame-glory of mighty destroyer of the enemies Devraj Indr. As an outcome of it, let Devraj Indr have mercy-compassion over our progeny and companions.
विश्वानरस्य वस्पतिमनानतस्य शवसः। एवैश्च चर्षणीनामूती हुवे रथानाम्॥
हे मरुद्गण! शत्रुओं द्वारा कभी न परास्त होने वाले, शत्रुओं के सैनिकों पर चढ़ाई करने वाले, महा पराक्रमी देवराज इन्द्र की आपके सैनिकों पर होने वाले हमले के दौरान उनके रथों की रक्षा करने हेतु आहूत करते हैं।(सामवेद 4.26.5)
Hey Marud Gan! Never defeated, attacker-raider of the enemy soldiers, absolutely mighty Devraj Indr invoke you for the protection of the charoites & warriors.
स घा यस्ते दिवो नरो धिया मर्तस्य शमतः। ऊती स बृहतो दिवो द्विषो अंहो न तरति॥
याजक के दिव्य गुणों से सम्पन्न स्तोत्रों के द्वारा जो व्यक्ति देवराज इन्द्र का सखा बन जाता है, वह मनुष्य अद्भुत संरक्षण प्राप्त कर लेता है, जिससे वह कुटिल कर्म एवं शत्रुओं से सदैव बचा रहता है।(सामवेद 4.26.6)One who attain the companionship of Devraj Indr by virtue of the divine qualities-traits of the Yajak attain amazing protection and remain safe by the wicked-vicious actions of the enemies.
अभ्यर्थना :: अनुरोध, विनती, मांग, याचना, शपथ दिलाना, सौंगंध दिलाना, कसम खिलाना, अनुरोध, आधार तत्व-स्थापन, अभियाचना, अनुबंध, इकरारनामा; candidature, postulation, adjuration.Hey Udgata Gan! Think-concentrate in appreciable Devraj Indr, who is worshipped by several Yajak Gan with Strotrs and Mantr shakti.(01.12.2015)
विभोष्ट इन्द्र राधसो विभ्वी रातिः शतक्रतो। अथा नो विश्वचर्षणे द्युम्नं सुदत्र मंहय॥
हे सर्वज्ञ, सौ अश्वमेध (सैकड़ों शुभ कर्मों को) करने वाले, महान् दानी देवराज इन्द्र! आप गौरवशाली धन प्रदान करे, हमें भी धन-धान्य से परिपूर्ण कर दें।(सामवेद 4.26.7)
Hey all knowing, performer of hundred auspicious Yagy, great donor Devraj Indr! Grant us glorious wealth and enrich us with food grains and wealth.
वयश्चित्ते पतत्रिणो द्विपाच्चतुष्यादर्जुनि। उषः प्रारन्नृतूँरनु दिवो अन्तेभ्यस्परि॥
हे दिव्य प्रकाश से युक्त उषादेवि! जब अन्तरिक्ष में आपका उदय हो जाता है, तत्पश्चात् द्विपाद (मनुष्य), चतुष्पाद (चार पैरों वाले पशु) एवं अन्तरिक्ष में भ्रमण करने वाले पक्षीगण सभी अपनी इच्छानुसार भ्रमण करते हुए दृष्टिगत होते हैं।(सामवेद 4.26.8)
Hey Usha devi possessing divine aura-radiance! When you rise in the space-sky, the two legged, four legged and birds flying in the sky appear to be roaming as per their will.
अमी ये देवा स्थन मध्य आ रोचने दिवः। कद्व ऋतं कदमृतं का प्रत्ला व आहुतिः॥
हे (इन्द्रादि) देवताओं! सूर्य के उदित हो जाने के पश्चात् अन्तरिक्ष में प्रकाश युक्त हो जाने से आप लोगों तक कोई स्तुति जाती है अथवा नहीं? या किसी विशेष प्रकार की आहुति को आप प्राप्त कर पाते है अथवा नहीं।(सामवेद 4.26.9)
Hey Indr & other demigods-deities! Does the Stuti-prayers reach after the Sun rise? Or else whether you attain any other kind of sacrifices or not?
ऋचं साम यजामहे याभ्यां कर्माणि कृण्वते। वि ते सदसि राजतो यज्ञं देवेषु वक्षतः॥
ऋचा (वेद मन्त्र) तथा साम-गान के सहयोग से यज्ञ कर्म परिपूर्ण किया जाता है। यज्ञ-वेदिका मे उच्चारित हुए (ऋचा तथा साम-गान) मन्त्रों के सहयोग से ही हवि देवताओं तक जाती है।(सामवेद 4.26.10)
Yagy Karm are accomplish with the help of Richas, Ved Mantrs. The oblations-offering reach the demigods-deities with the help of Mantr Shakti.(30.11.2025)
सामवेद ऐन्द्रं पर्वणि पर्व (4.27) :: ऋषि :- रेभ, सुवेदा, शैलूषि, वामदेव, सव्य आंगिरस विश्वामित्र, कृष्ण आंगिरस, मेधातिथि, भरद्वाज, कुत्स; देवता :- इन्द्र, द्यावापृथिवी; छन्द :- जगती, महापंक्ति।
विश्वाः पृतना अभिभूतरं नरः सजूस्ततक्षुरिन्द्रं जजनुश्च राजसे।
क्रत्वे वरे स्थेमन्यामुरीमुतोग्रमोजिष्ठं तरसं तरस्विनम्॥
मनुष्य लोग याग में उत्तम पद पर विराजमान होकर सेनानी, शक्तिशाली, एकत्रित सेना से सम्पन्न, शस्त्र-अस्त्र धारण करने वाले, शत्रु का संहार करने वाले, तेजस्वी, तीव्र वेग से काम करने वाले देवराज इन्द्र की वन्दना करते हैं।(सामवेद 4.27.1)
Humans worship mighty Devraj Indr who has attained excellent position as a warriors, has army, wield weapon-missiles, destroy the enemy, is aurous-radiant, energetic and perform at high speed.
श्रत्ते दधामि प्रथमाय मन्यवेऽहन्यद्दस्युं नर्यं विवेरपः।
उभे यत्वा रोदसी धावतामनु भ्यसाते शुष्मात्पृथिवी चिदद्रिवः॥
हे वज्रधारक देवराज इन्द्र! असुरों का विनाश करने वाले, जीव-जंतुओं के लिए कल्याणकारी जल को प्रवाहित करने वाले अर्थात् स्वेच्छानुसार गतिमान करने वाले, आपके उस तीव्र मन्यु (क्रोध) का, हम याज्ञिक जन आदर करते हैं।(सामवेद 4.27.2)
Hey Vajr wielding Devraj Indr! You are destroyer of the demons, flow water for the welfare of humans. We Yagyik Gan respect-honour your anger-furiousity.
समेत विश्वा ओजसा पतिं दिवो य एक इद्भुरतिथिर्जनानाम्।
स पूव्यों नूतनमाजिगीषन् तं वर्तनीरनु वावृत एक इत्॥
हे प्रजाओं! अपने पुरुषार्थ से स्वर्गलोक के अधिष्ठाता, एकमात्र मनुष्यों में आराधना करने योग्य, शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने की इच्छा वाले, स्तोताओं को विजय दिलाने वाले मार्ग की ओर बढ़ाने वाले, उन देवराज इन्द्र की सामूहिक वन्दना करो।(सामवेद 4.27.3)
Hey populace! Resort to groups worship of Devraj Indr, who is the Lord of heavens due to his efforts, alone qualifies for worship by the humas, victorious over the enemies, moves the Stotas towards victory.
इमे त इन्द्र ते वयं पुरुष्टुत ये त्वारभ्य चरामसि प्रभूवसो।
न हि त्वदन्यो गिर्वणो गिरः सघत्क्षोणीरिव प्रति तद्धर्य नो वचः॥
हे ऐश्वर्यवान् तथा लोगों द्वारा प्रशंसनीय देवराज इन्द्र! आपके आश्रय में रहकर काम करते हुए, श्रद्धापूर्वक निवास करते हुए, आपके सदृश दूसरे स्तुति करने योग्य देवता के न रहने के निमित्त हम आपकी आराधना करते हैं। जिस प्रकार धरती सभी को आश्रय प्रदान करती है, उसी प्रकार आप भी हमारे स्तोत्रों को आश्रय प्रदान करें, अर्थात् स्वीकार करें।(सामवेद 4.27.4)
Hey Devraj Indr appreciated by the glorious people! We remain under your asylum respectfully, worship you not to have any other deity capable like you. They way earth gives shelter to everyone, similarly grant asylum to our Strotrs i.e., accept-respond them.
चर्षणीधृतं मघवानमुक्थ्या3 मिन्द्रं गिरो बृहतीरभ्यनूषत।
वावृधानं पुरुहूतं सुवृक्तिभिरमर्त्यं जरमाणं दिवेदिवे॥
सम्पूर्ण मानवों के पोषणकर्ता, वैभवशाली, विख्यात, आराधकों की वृद्धि करने वाले, अविनाशी, विविध स्तुतियों से नित्य प्रति प्रशंसनीय, देवराज इन्द्र की हम विभिन्न दिव्य स्तोत्रों से स्तुति करते हैं।(सामवेद 4.27.5)
We worship sumptuous-glorious, famous, immortal Devraj Indr who nurture the entire human race, grant progress to the devotees with different divine appreciable Strotrs & Stuties.
अच्छा व इन्द्रं मतयः स्वर्युवः सनीचीर्विश्वा उशतीरनूषत।
परिष्वजन्त जनयो यथा पतिं मर्यं न शुन्ध्युं मघवानमूतये॥
अपनी सुरक्षा के निमित्त, पावन, वैभवशाली, देवराज इन्द्र की, आत्मबल की वृद्धि करने वाली, एक संग निवास करने वाली, उन्नतशील होने की अभिलाषा करने वाली, हमारी स्तुतियां वैसे ही इच्छा करती है, जिस प्रकार स्त्री अपने पति के प्रेम एवं श्रद्धाभाव से युक्त होकर आलिंगन करती हैं।(सामवेद 4.27.6)
For our safety, pious, glorious, boosting self confidence, accompanied together, desirous of progress our Stuties to Devraj Indr wish that they should embraces Devraj Indr just like a woman who embraces her husband with love and respect.
अभि त्यं मेषं पुरुहूतमृग्मियमिन्द्रं गीर्भिर्मदता वस्वो अर्णवम्।
यस्य द्यावो न विचरन्ति मानुषं भुजे मंहिष्ठमभि विप्रमर्चत॥
हे उद्गाताओं! शत्रुओं को परास्त करने वाले, बहु प्रशंसनीय, विपुल धन के स्वामी देवराज इन्द्र की अभ्यर्थना करो। स्वर्गलोक के विस्तार के सदृश, जिसके मंगलकारी कर्म चारों दिशाओं में व्याप्त हैं, ऐसे ज्ञान से युक्त देवराज इन्द्र की, सुख की प्राप्त करने के लिए स्तुति करो।(सामवेद 4.27.7)
Hey Udgata Gan, singers of hymns! Request Devraj Indr lord of large quantum wealth for defeating the enemy, who is respected by majority of people. His auspicious-virtuous endeavours are pervaded in the four directions. For pleasure-comforts worship him.
त्यं सु मेषं महया स्वर्विदं शतं यस्य सुभुवः साकमीरते।
अत्यं न वाजं हवनस्यदं रथमिन्द्रं ववृत्यामवसे सुवृक्तिभिः॥
जिन देवराज इन्द्र के उत्कृष्ट, सैकड़ों, श्रेष्ठ स्थान एक साथ ही उन्नतशील होते हैं, उन शत्रुओं से स्पर्द्धा करने वाले, धन तथा दान के लिए अभिलषित स्थान पर गमन करने वाले, घोड़े के सदृश तीव्रता से यज्ञ-स्थान पर पहुँचाने वाले देवता की उत्कृष्ट कीर्ति को, अपनी सुरक्षा के निमित्त, सैकड़ों बार स्तोत्रों के द्वारा स्तुति करते हुए अभिव्यक्त करो।(सामवेद 4.27.8)
Describe the glory of Devraj Indr hundreds of times with Strotrs, who's hundreds of excellent places are progressive, who compete with the enemies, moves to the desired place for making donations & wealth, reaches the desired place and Yagy site with the speed of horse, possess excellent fame for your protection-safety.
घृतवती भुवनानामभिश्रियोर्वी पृथ्वी मधुदुघे सुपेशसा।
द्यावापृथिवी वरुणस्य धर्मणा विष्कभिते अजरे भूरिरेतसा॥
प्रकाशमान् समस्त प्राणियों के आश्रय स्थान, बृहत्, सुविस्तृत, मधुरता से युक्त जल प्रदान करने वाले, उत्तम विधाता की धारक शक्ति से अमर रहने वाले तथा उत्तम उत्पादक सामर्थ्य से सम्पन्न ये स्वर्गलोक तथा भूलोक हैं।(सामवेद 4.27.9)
Heavens & earth are aurous-radiant, shelter for all creatures, vast, huge, grant sweetened water, immortal due to the support of Almighty possess best productivity and capability.
उभे यदिन्द्र रोदसी आपप्राथोषा इव। महान्तं त्वा महीनां सम्राजं चर्षणीनाम्।
देवी जनित्र्यजीजनद्भद्रा जनित्र्यजीजनत्॥
हे देवराज इन्द्र! प्रकाशमान् उषा के सदृश स्वर्गलोक तथा भूलोक को देदीप्यमान् करने वाले, महान् प्राणियों के अधिपति आपको मंगल करने वाली देवताओं की माता अदिति ने उत्पन्न किया है।(सामवेद 4.27.10)
Hey Devraj Indr! Shinning like brilliant Usha, illuminating heavens & earth, lord of all organism was evolved by the mother of demigods-deities for the welfare of great living beings.
प्र मन्दिने पितुमदर्चता वचो यः कृष्णगर्भा निरहनृजिश्वना।
अवस्यवो वृषणं वज्रदक्षिणं मरुत्वन्तं सख्याय हुवेमहि॥
हे याजकगण! सर्वप्रधान देवराज इन्द्र को हव्य पदार्थ अर्पित करके आराधना करो। ऋजिश्व के सहयोग से कृष्णासुर की गर्भयुक्त स्त्रियों के संग उसका संहार करने वाले, दायें हस्त में वज्र धारण करने वाले, मरुतों के सैन्य दल के साथ स्थित रहने वाले, बलशाली, उन देवराज इन्द्र को, अपनी रक्षा की अभिलाषा करने वाले हम (यजमान) सख्यता के लिए आवाहित करते हैं।(सामवेद 4.27.11)
Hey Yajak Gan-Yajman! Make oblations-offerings to Devraj Indr first of all. We invoke Devraj Indr who destroyed Krashna Sur along with his pregnant wives with the help of Rijishv, wielding Vajr in his right hand accompanying the army of Marud Gan, for our welfare-well being.
सामवेद ऐन्द्रं पर्वणि पर्व (4.27) :: ऋषि :- नारद, गोषूक्त्यश्वसूक्तिनौ, पर्वत, विश्वमना वैयश्च , नृमेध, गौतम; देवता :- इन्द्र; छन्द :- उष्णिक्।
इन्द्र सुतेषु सोमेषु क्रतुं पुनीष उक्थ्यम्। विदे वृधस्य दक्षस्य महाँ हि षः॥
हे देवराज इन्द्र! उत्तम विधि से निर्मित सोमरस का सेवन करके (आप) याजक तथा स्तुतिकर्ता (दोनों) को, प्रगति की ओर अग्रसर करने वाली शक्ति को प्राप्त करने के निमित्ति, पावन कर देते हैं, (क्योंकि) आप महान् हैं।(सामवेद 4.28.1)
Hey Devraj Indr! Drinking Somras with best means-methods, you cleanse both Yajak and Stuti performers, for attaining strength for progress, since you are great.
तमु अभि प्र गायत पुरुहूतं पुरुष्टुतम्। इन्द्रं गीर्भिस्तविषमा विवासत॥
हे उद्गाताओं! अनेक याजकों द्वारा आहूत किये जाने वाले प्रशंसनीय, उन देवराज इन्द्र का स्तोत्रों से स्तुति तथा मन्त्रों से चिन्तन करो।(सामवेद 4.28.2)
तं ते मदं गृणीमसि वृषणं पृक्षु सासहिम्। उ लोककृत्नुद्रिवो हरिश्रियम्॥
हे वज्रधारक देवराज इन्द्र! बलशाली, रणक्षेत्र में शत्रुओं को पराभूत करने वाले, मानवों के निमित्त मंगलकारी घोड़े जिनके निकट शोभायमान होते हैं, सोमरस के पान के फलस्वरूप उत्पन्न होने वाले, उस आपके उल्लास की हम सराहना करते हैं।(सामवेद 4.28.3)
Hey Vajr wielding Devraj Indr! We appreciate mighty, defeater of the enemy in the war, appear glorious near the auspicious horses Devraj Indr; who has glee-frolic after drinking Somras.
यत्सोममिन्द्र विष्णवि यद्वा घ त्रित आप्त्ये। यद्वा मरुत्सु मन्दसे समिन्दुभिः॥
हे देवराज इन्द्र! यज्ञों में भगवान् विष्णु के आगमन करने के पश्चात् आपने जो सोमरस का पान किया अथवा आप्त्य-त्रित के अथवा मरुतों सहित अथवा दूसरे यज्ञों में सोमरस के पान से आह्वादित होने वाले आप हमारे यज्ञ में भी आगमन करके सोमपान से प्रसन्न हों।(सामवेद 4.28.4)
Hey Devraj Indr! The way you enjoy-gladden drinking Somras in the Yagy of Bhagwan Shri Hari Vishnu, Apt-Trit, the Marud Gan or the other Yagy, enjoy Somras in our Yagy as well.
एदु मधोर्मदिन्तरं सिञ्चाध्वर्यो अन्धसः। एवा हि वीरस्तवते सदावृधः॥
हे मनुष्यों! माधुर्ययुक्त सोमरस के पान से प्रफुल्लित होने वाले देवराज इन्द्र को यह रस प्रदान करो। बलशाली तथा लगातार बढ़ोत्तरी करने वाले देवराज इन्द्र ही उद्गाताओं द्वारा हमेशा प्रशंसा के योग्य होते है।(सामवेद 4.28.5)
Hey humans! Offer this sap to Devraj Indr who gladden after drinking Somras. Progressive, mighty Devraj Raj Indr is always appreciated by the Udgata Gan.
एन्दुमिन्द्राय सिञ्चत पिबाति सोम्यं मधु। प्र राधांसि चोदयते महित्वना॥
हे पुरुषों! देवराज इन्द्र के निमित्त (प्रसन्न करने के उद्देश्य से) सोमरस समर्पित करो; क्योंकि माधुर्ययुक्त सोमरस का सेवन करने के पश्चात् वह अपनी महिमा से याज्ञिकों को प्रचुर धन प्रदान करते हैं।(सामवेद 4.28.6)
Hey humans! Offer Somras to appease Devraj Indr. He grants sufficient wealth to the Yagyik after drinking Somras by virtue of his glory.
एतो न्विन्द्रं स्तवाम सखायः स्तोम्यं नरम्। कृष्टीर्यो विश्वा अभ्यस्त्येक इत्॥
हे मित्र गण! तुम तुरन्त ही यहाँ उपस्थित हो, हम उस स्तुति के योग्य, उत्तम मार्ग दर्शन करने वाले देवराज इन्द्र की याचना करें, जो अकेले ही समस्त शत्रुओं को पराभूत करने में समर्थ हैं।(सामवेद 4.28.7)
Hey Mir Gan! Present yourself here immediately so that we pray to deserving Devraj Indr to seek his guidance since he alone is capable of defeating all enemies alone.
इन्द्राय साम गायत विप्राय बृहते बृहत्। ब्रह्मकृते विपश्चिते पनस्यवे॥
हे स्तोतागण! मेधायुक्त, महान्, स्तुति करने के योग्य, परम ज्ञानी देवराज इन्द्र को प्राप्त करने के उद्देश्य से आप लोग बृहत्साम नामक स्तोत्रों का गान करिये।(सामवेद 4.28.8)
Hey Stota Gan! Sing Brahat Sam Strotr to access intelligent, worshipable, highly enlightened Devraj Indr.
य एक इद्विदयते वसु मर्ताय दाशुषे। ईशानो अप्रतिष्कुत इन्द्रो अङ्ग॥
हे प्रिय याज्ञिक गण! दानी प्रवृत्ति होने के कारण व्यक्तियों को धन प्रदान करने वाले, विरोध न किये जाने वाले, वे अकेले देवराज इन्द्र ही समस्त जनों के अधिष्ठाता हैं।(सामवेद 4.28.9)
Hey affectionate Yagyik Gan! By virtue of his tendency to donate, unopposed, Devraj Indr is sole deity of all humans.
सखाय आ शिषामहे ब्रह्मेन्द्राय वज्रिणे। स्तुष ऊ षु वो नृतमाय धृष्णवे॥
हे मित्रगण! न्यायरूपी शस्त्र धारण करने वाले देवराज इन्द्र की हम स्तोत्रों के माध्यम से स्तुति करते हुए, उनसे आशीर्वाद की प्रार्थना करते हैं। शूरवीर एवं शत्रुओं को परास्त करने वाले देवराज इन्द्र की हम, आप समस्त जनों के कल्याण हेतु वन्दना करते हैं।(सामवेद 4.28.10)
Hey Mitr Gan! We achieve blessings of Devraj Indr through Strotrs, who hold a shield of justice. We worship invincible-mighty Devraj Indr who defeats the enemies for the welfare-well being of you people.
सामवेद ऐन्द्रं पर्वणि पर्व (4.29) :: ऋषि :- प्रगाथ, भरद्वाज, नृमेध, पर्वत, इरिम्बिठि, विश्वमना, वसिष्ठ; देवता :- इन्द्र, आदित्य; छन्द :- उष्णिक्, विराडुष्णिक्।
गृणे तदिन्द्र ते शव उपमां देवतातये। यद्धंसि वृत्रमोजसा शचीपते॥
हे पराक्रमी देवराज इन्द्र! हम समीप ही पूर्ण होने वाले हवन में आपके उस पराक्रम की वन्दना करते हैं, जिसके निमित्त आप वृत्र का संहार करने में समर्थ है।(सामवेद 4.29.1)
Hey mighty Devraj Indr! We worship your calibre-might of slaying Vratra Sur; in the Hawan-Yagy being accomplished near us.
यस्य त्यच्छम्बरं मदे दिवोदासाय रन्धयन्। अयं स सोम इन्द्र ते सुतः पिब॥
हे देवराज इन्द्र! जिस सोमरस के सेवन से आनंदित होकर आपने दिवोदास की भलाई करने हेतु उनके शत्रु शम्बरासुर का संहार किया, उस निष्पन्न किये हुए सोमरस का आप पान करें।(सामवेद 4.29.2)
Hey Devraj Indr! By virtue of the pleasure attained by drinking Somras for helping Divo Das to kill Shambra Sur, drink that sanctified Somras.
एन्द्र नो गधि प्रिय सत्राजिदगोह्य। गिरिर्न विश्वतः पृथुः पतिर्दिवः॥
हे समस्त जनों के द्वारा आदरणीय एवं प्रिय देवराज इन्द्र! आप समस्त शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने वाले, कभी न परास्त होने वाले, पहाड़ के समान बृहत् स्वर्गलोक के अधिष्ठाता हैं। आप आर्थिक सहायता प्रदान करने के लिए हमारे निकट आगमन करें।(सामवेद 4.29.3)
Honoured by all people, hey affectionate Devraj Indr! You are the Lord of vast mountain like heavens, attain victory over the enemies and never defeated. Come close to us to grant financial help.
य इन्द्र सोमपातमो मदः शविष्ठ चेतति। येना हंसि न्या3त्रिणं तमीमहे॥
बहुत ज्यादा सोमरस का सेवन करने वाले महा पराक्रमी देवराज इन्द्र आपका हौसला प्रशंसा करने के योग्य हैं। जिससे आप (दूसरों का बुरा करने वाले) घातक दानवों (कुटिल कृत्य करने वाले) का शमन करते हैं, आप जैसे महान् की हम वन्दना करते हैं।(सामवेद 4.29.4)
Courage of Devraj Indr who drink too much Somras, deserve applaud. By virtue of which he harm-degrade the wicked demons. We worship him for his greatness.
तुचे तुनाय तत्सु नो द्राघीय आयुर्जीवसे। आदित्यासः समहसः कृणोतन॥
हे श्रेष्ठ आदित्यगण! आप आदरणीय हैं। हमारे पुत्र एवं पौत्रादि को दीर्घजीवी बनाने की आप अनुकम्पा करें।(सामवेद 4.29.5)
Hey excellent Adity Gan! You are respectable. Bless our sons and grans sons with long life.
वेत्या हि निर्ऋतीनां वज्रहस्त परिवृजम्। अहरहः शुन्थ्युः परिपदामिव॥
हे वज्र को अपने हाथ में धारण करने वाले देवराज इन्द्र! आप बाधा डालने वाले मूल कारणों को हटाने के रास्ते को जानते हैं। शुद्धता से विपत्तियों (विकारों) को समीप न आने देने वाले मनुष्य के सदृश, आप भी कठिनाइयों को दूर करने में सक्षम हैं।(सामवेद 4.29.6)
Hey Devraj Indr wielding Vajr in your right hand! You remove the root cause-basic hurdles from the path. You are capable of obstructing the defects like those humans who don't let the danger come near by virtue of their piousity-virtuousness.
अपामीवामप स्त्रिधमप सेधत दुर्मतिम्। आदित्यासो युयोतना नो अंहसः॥
हे सूर्य देव! आप हमें विकारों, शत्रुओं, कुकृत्यों तथा कुविचार के निमित्त होने वाले दुष्परिणामों से सदैव बचाकर रखें।(सामवेद 4.29.7)
Hey Sury Dev! Protect us from outcome-result of the defects, enemies, wickedness-viciousness, ill will.(don't let us follow the wicked path)
पिबा सोममिन्द्र मन्दतु त्वा यं ते सुषाव हर्यश्वाद्रिः। सोतुर्बाहुभ्यां सुयतो नार्वा॥
हे अश्वों से सम्पन्न देवराज इन्द्र! आप हर्ष प्रदान करने वाले सोमरस का सेवन करें। पाश से बँधे हुए, अचल अश्वों के सदृश (यज्ञ-वेदिका में) भली-भाँति सुरक्षित रखे गये पत्थर के माध्यम से आपके निमित्त सोमरस तैयार किया जाता है।(सामवेद 4.29.8)
Hey Devraj Indr enriched with horses! Drink gladdening Somras. Somras is produced with stones like the immovable horses in the Yagy Vedica for you.(02.12.2025)
सामवेद ऐन्द्रं पर्वणि पर्व (4.30) :: ऋषि :- सौभरि, नृमेध; देवता :- इन्द्र, मरुत; छन्द :-ककुप्।
अभ्रातृव्यो अना त्वमनापिरिन्द्र जनुषा सनादसि। युधेदापित्वमिच्छसे॥
हे देवराज इन्द्र! आप उत्पन्न होने के साथ ही भ्राताओं के स्पर्द्धा से मुक्त है, न आप पर राज्य करने वाले कोई स्वजन हैं और न सहयोग करने वाले कोई स्वजन। आप संग्राम (लोगों की रक्षा करके) के माध्यम से सहायता करने वाले (स्वजनों) उपासकों को प्राप्त करने की अभिलाषा करते हैं।(सामवेद 4.30.1)
Hey Devraj Indr! You are free from the competition of the brothers born together, There is none to rule you or own person to help-cooperate you. You wish to have helping hands-devotees by virtue of help through the war.
थो न इदमिदं पुरा प्र वस्य आनिनाय तमु व स्तुषे। सखाय इन्द्रमूतये॥
हे मित्र गण! पहले से ही जो धन प्रदान करने वाले हैं, उन देवराज इन्द्र की हम आपके लाभ हेतु वन्दना करते हैं।(सामवेद 4.30.2)
Hey Mitr Gan! We worship Devraj Indr who has been granting wealth before as well for your help.
आ गन्ता मा रिषण्यत प्रस्थावानो माप स्थात समन्यवः। दृढा चिद्यमयिष्णवः॥
गतिमान मरुतों हमें नुकसान न पहुँचाते हुए हमारे समीप पधारें। वे मन्यु (क्रोध) युक्त पराक्रमी शत्रुओं को भी कष्ट पहुँचाने वाले है, वे सदैव हमारे पास ही रहें अर्थात् हमें कभी न छोड़े।(सामवेद 4.30.3)
Let moving Marud Gan come to us without harming us. They should torture-harm the enemy full of anger. They should stay with us.
आ याह्ययमिन्दवेऽश्वपते गोपत उर्वरापते। सोमं सोमपते पिब॥
घोड़ों तथा गायों के अधिपति, पृथ्वी के संरक्षक, सोमरस का सेवन करने वाले हे देवराज इन्द्र! शोधित किये गये सोमरस का सेवन करने हेतु हम आपको आमंत्रित करते हैं।(सामवेद 4.30.4)
Hey Devraj Indr, Lord of cows & horses, protector of earth, drinker of Somras! We invite you for drinking purified-sanctified Somras.
त्वया ह स्विद्युजा वयं प्रति श्वसन्तं वृषभ ब्रुवीमहि। संस्थे जनस्य गोमतः॥
हे बैल के सदृश शक्तिशाली देवराज इन्द्र! गाय आदि भलाई करने वाले जानवरों के प्रति आक्रोश प्रकट करने वालों को, हम आपके सहयोग से उनके क्रोध का उचित उत्तर देकर दूर हटा दें।(सामवेद 4.30.5)
Hey Devraj Indr, strong like he bull! Let us repel away those who show anger towards the cows and other beneficial animals with your help, giving proper-fitting reply for their anger.
गावश्चिघा समन्यवः सजात्येन मरुतः सबन्धवः। रिहते ककुभो मिथः॥
हे उत्साह से सम्पन्न मरुद्गण! गाएँ एक ही जाति की होने के कारण आपस में बहिन के सदृश भिन्न-भिन्न दिशाओं में घूमते हुए भी, आपस में चाटकर स्नेह दर्शाने वाली हैं। कहने का तात्पर्य है कि मनुष्यों को भी गाय के सदृश परस्पर प्रेमपूर्वक निर्वाह करना चाहिए।(सामवेद 4.30.6)
उत्साह :: जोश, उमंग, राग, धुन, सरगर्मी, याद दिलाने की क्रिया, बढ़ावा, उकसावा; excitement, enthusiasm, zeal, prompting.
Hey Marud Gan full of zeal! Cows belonging to the same species, roam together and show affection like sisters by licking. The humans too should behave like them and live together with love & affection.
त्वं न इन्द्रा भर ओजो नृम्णं शतक्रतो विचर्षणे। आ वीरं पृतनासहम्॥
हे शतकर्मा देवराज इन्द्र! आप हमें पराक्रम तथा धन-वैभव देकर सम्पूर्ण कर दें और शत्रुओं को पराजित करने वाले पुत्र भी देने की कृपा करें।(सामवेद 4.30.7)
Hey Devraj Indr accomplisher of hundred Yagy! Grant us might, wealth & prosperity in addition to sons who can not be defeated by the enemy.
अधा हीन्द्र गिर्वण उप त्वा काम ईमहे ससृग्महे। उदेव ग्मन्त उदभिः॥
जिस प्रकार जल के साथ गमन करते हुए लोग आवश्यकतानुसार जल से संतुष्ट होते हैं, उस प्रकार हे गुणगान करने योग्य देवराज इन्द्र! अपनी कामनाओं की पूर्ति करने हेतु हम आपसे निवेदन करते हैं, आपके समीप आकर आपका आवाहन करते हैं।(सामवेद 4.30.8)
The way people travelling with water remain satisfied with water, similarly hey praise deserving hey Devraj Indr! We request-pray to you for the accomplishment of our desires by drawing near-close to you.
सीदन्तस्ते वयो यथा गोश्रीते मधौ मदिरे विवक्षणे। अभि त्वामिन्द्र नोनुमः॥
हे देवराज इन्द्र! निचोड़ने के पश्चात् गौ दुग्ध मिश्रित, शक्ति बढ़ाने वाले, वाणी को मधुरता प्रदान करने वाले सोमरस के समीप इकट्ठा होने वाले पक्षीगण के सदृश, हम एक साथ उपस्थित होकर आपको प्रणाम करते हैं।(सामवेद 4.30.9)
Hey Devraj Indr! After squeezing power booster Somras, increasing sweetness of voice, mixing with cow milk, like the birds flocking nearby, we gather and salute you.
वयमु त्वामपूर्व्य स्यूरं न कच्चिद्भरन्तोऽवस्यवः। वज्रि चित्रं हवामहे॥
जैसे स्थूल गुणों से युक्त (सांसारिक गुणों से युक्त बलशाली) व्यक्ति को लोग आमंत्रित करते हैं, वैसे ही हे वज्रधारक, सर्वोत्तम देवराज इन्द्र! अपने संरक्षण की अभिलाषा से, सर्वश्रेष्ठ सोमरस से आपको संतुष्ट करते हुए हम आपकी वन्दना करते हैं।(सामवेद 4.30.10)
The way we invite a person full of strength and worldly traits, similarly, hey best of all Indr Dev, we invoke you for the sake of our protection and drinking the best Somras, praying-worshiping you.
सामवेद ऐन्द्रं पर्वणि पर्व (4.31) :: ऋषि :- गौतम, त्रित, अवस्यु; देवता :- इन्द्र, विश्वेदेवा, अश्विनी; छन्द :- पंक्ति।
स्वादोरित्या विषूवतो मधोः पिबन्ति गौर्यः।
या इन्द्रेण सयावरीवृष्णा मदन्ति शोभथा वस्वीरनु स्वराज्यम्॥
उपासकों पर अपनी कृपा बरसाने वाले देवराज इन्द्र (सूर्य) देव के संग प्रसन्नतापूर्वक रहकर (गौर्यः) रश्मियों सुंदरता प्राप्त करती हैं। वे धरती पर अपने राज्य की सीमा के अनुसार, उत्पन्न स्वादिष्ट, माधुर्ययुक्त सोमरस का सेवन करती हैं।(सामवेद 4.31.1)
Remaining with Devraj Indr the rays attain beauty-happiness becoming close to him, who shower mercy-grace over the worshipers-devotees. They enjoy sweetened tasty Somras over the earth remaining in their state-boundary.
इत्था हि सोम इन्मदो ब्रह्म चकार वर्धनम्।
शविष्ठ वज्रिन्नोजसा पृथिव्या निः शशा अहिमर्चन्ननु स्वराज्यम्॥
हे महा पराक्रमी-वज्रधारक देवराज इन्द्र! सोमरस में उत्साह बढ़ाने वाले गुणों के निमित्त उसके गुणों का अनुसंधान इन स्तोत्रों में किया गया है। अपने साम्राज्य के कल्याण की दृष्टि से धरती पर आक्रमण करने वाले शत्रुओं का पूर्ण रूप से संहार हो।(सामवेद 4.31.2)
Hey extremely mighty Devraj Indr wielding Vajr! Encouragement boosting qualities have been incorporated in the Somras with these Strotrs. For the betterment-welfare of our own empire-state over the earth, the invaders-attackers should be destroyed.
इन्द्रो मदाय वावृधे शवसे वृत्रहा नृभिः।
तमिन्महत्स्वाजिषूतिमर्भे हवामहे स वाजेषु प्र नोऽविषत्॥
आनन्द एवं हौसला बढ़ाने की अभिलाषा से उद्गाताओं के माध्यम से देवराज इन्द्र की कीर्ति का फैलाव किया जाता है। इसलिए लघु एवं विशाल समस्त संग्रामों में हम संरक्षण प्रदान करने वाले देवराज इन्द्र को आहूत करते हैं। वे देवराज इन्द्र संग्रामों में हमें संरक्षण प्रदान करें।(सामवेद 4.31.3)
हौंसला :: मानसिक शक्ति, मानोबल, नैतिक शक्ति, बढ़ावा, प्रोत्साहन, ग्रहणशीलता, उत्साह; courage, morale, cheerfulness.For increasing the pleasure and morale fame-glory of Devraj Indr is spreaded with the help of Udgata Gan. Hence, Devraj Indr is invoked in small of big wars-battle. Hey Devraj Indr shelter us in wars.
इन्द्र तुभ्यमिदद्रिवोऽनुत्तं वज्रिन्वीर्यम्।
यद्ध त्यं मायिनं मृगं तव त्यन्माययावधीरर्चन्ननु स्वराज्यम्॥
हे पहाड़ों पर निवास करने वाले, अपने राज्य की पूजा करने वालों की सहायता करने वाले, वज्रधारक देवराज इन्द्र! आप महा पराक्रमी हैं। कोई भी शत्रु आप पर विजय प्राप्त नहीं कर सकता है। माया-मृग रूप वृत्र का शमन करने हेतु आप छल-कपट का भी आश्रय लेते हैं।(सामवेद 4.31.4)
माया :: Cast, enchantment, mirage.
छल-कपट :: छल, माया, धोखा; deceit, guile, charlatanry, treachery.
Hey Vajr wielding Devraj Indr, helping those who live over the mountains and worship their state! You are highly powerful-mighty. No enemy can win you. To destroyed Vratr who took shelter under charlatanry, you too resort to treachery.(03.12.2025)
प्रेह्यभीहि धृष्णुहि न ते वज्रो नि यंसते।
इन्द्र नृम्णं हि ते शवो हनो वृत्रं जया अपोऽर्चन्ननु स्वराज्यम्॥
हे देवराज इन्द्र! आप चारों ओर से आक्रमण कर शत्रुओं का संहार कर दें। आपका वज्र एवं पराक्रम सर्वोत्तम है। उसके आगे सभी शत्रु सिर झुकाते हैं। आप अपने अनुकूल स्वराज्य की अभिलाषा करते हुए वृत्र को पराजित कर उसका संहार करें एवं जल प्राप्त करें (वृष्टि के रुकाव को विनष्ट करके जल वृष्टि करे)।(सामवेद 4.31.5)
Hey Devraj Indr! Destroy the enemies by attacking them from all sides. Your Vajr and valour are the best. You never bow before the enemy. You should have-desire your own favourable empire, kill Vratra Sur and attain water by removing the blocked.
यदुदीरत आजयो घृष्णवे धीयते धनम्।
युङ्क्ष्वा मदच्युता हरी कं हनः कं वसौ दधोऽस्माँ इन्द्र वसौ दधः॥
संग्राम के आरम्भ हो जाने पर जो शत्रुओं पर विजय प्राप्त करता है, वही घन प्राप्त करता है। हे देवराज इन्द्र। संग्राम में शत्रुओं के मद को विनष्ट करने वाले, अपने घोड़ों को आप अपने रथ में योजित कर दें। आप किसका शमन करें, किसको धन-धान्य से परिपूर्ण करें, यह आप भली-भाँति जानते हैं। अतः हे देवराज इन्द्र! आप शत्रुओं का हनन कर, हमें धन-वैभव से परिपूर्ण कर दें।(सामवेद 4.31.6)
One who wins the enemy after victory in the war, attains wealth. Hey Devraj Indr! Deploy your horses in the charoite which destroy the ego of the enemy in the battle. You know well whom to destroy and whom to enrich with wealth and food grains. Hence, hey Devraj Indr! Destroy the enemy and enrich us wealth- prosperity & grandeur.
अक्षन्नमीमदन्त ह्यव प्रिया अधूषत।
अस्तोषत स्वभानवो विप्रा नविष्ठया मती योजा न्विन्द्र ते हरी॥
हे देवराज इन्द्र! आपके पोषण के सेवन से संतुष्ट हुए याजकों ने अपनी प्रसन्नता को प्रकट करते हुए सिर हिलाया। तत्पश्चात् उन तेज से युक्त विप्रों ने अद्भुत स्तोत्रों से आपकी वन्दना की। अतः आप अपने घोड़ों को हवन में गमन करने हेतु जोड़ दें।(सामवेद 4.31.7)
Hey Devraj Indr! The Yajak Gan satisfied with the nourishment granted by you moved their head. Thereafter, the Brahmans having radiance-energy worshiped you with Strotrs. Deploy your horses in the charoite while moving to the Hawan.
उपो षु शृणुही गिरो मघवन्मातथा इव।
कदा नः सूनृतावतः कर इदर्थयास इद्योजान्विन्द्र ते हरी॥
हे ऐश्वर्यवान् देवराज इन्द्र! आप हमारे स्तोत्रों को हमारे समक्ष प्रस्तुत होकर ध्यानपूर्वक श्रवण करें। आप हमें सत्य वाणी से युक्त कब करेंगे? हमारी स्तुतियों को सर्वदा स्वीकार करने वाले आप, घोड़ों को यज्ञ में पहुँचने हेतु रथ में जोड़ दें।(सामवेद 4.31.8)
Hey Devraj possessor of grandeur! Listen to our Strotrs while present before us. When will we accomplish with truthful speech-voice? You always respond to our prayers. Deploy your horses in the charoite to reach the Yagy.
चन्द्रमा अप्सवांऽ 3 न्तरा सुपर्णों धावते दिवि।
न वो हिरण्यनेमयः पदं विन्दन्ति विद्युतो वित्तं मे अस्य रोदसी॥
अन्तरिक्ष में रहने वाला निशाकर-चंद्रमा अपनी उत्कृष्ट रश्मियों के साथ अंबर में गतिमान हैं। हे विद्युत् रूप स्वर्ण के समान सूर्य की किरणों! आपके पगरूपी आगे के हिस्से को हमारी इंद्रियां पकड़ने में असमर्थ है। हे द्युलोक एवं पृथ्वीलोक! मेरी स्तुतियों को ग्रहण करें। रात में सूर्य का आलोक अन्तरिक्ष में गतिशील रहता है, परन्तु हमारी ज्ञानेन्द्रियां उसे अनुभव नहीं कर पाती। निशाकर (चंद्र) के माध्यम से ही हमें दीप्ति प्राप्त होती है।(सामवेद 4.31.9)
Nishakar-Moon is revolving in the space with his excellent rays. Hey Sun rays like the Golden lightening! Our senses are incapable of catching your front like the legs. Hey heavens & earth! Accept my prayers. Radiance of the Sun remain movable in the space at night, but our senses are not able to reach-grasp it. We notice it via Moon.
प्रति प्रियतमं रथं वृषणं वसुवाहनम्।
स्तोता वामश्विनावृषि स्तोमेभिर्भूषति प्रति माध्वी मम श्रुतं हवम्॥
हे देवताओं के वैद्य अश्विनी कुमारों! आपके अत्यधिक प्रिय, शक्ति से सम्पन्न, धन को ले जाने वाले रथ को, प्रार्थना करने वाले ऋषि अपने स्तोत्रों के द्वारा अलंकृत करते हैं। हे प्रिय विद्या के जानकारों! आप मेरी प्रार्थनाओं को ध्यान से सुनें।(सामवेद 4.31.10)
Hey physician of the demigods-deities! Your admirable powerful charoite which carries wealth, has been decorated by the Rishi Gan with their Strotrs. Hey enlightened-scholars of lovely knowledge! Respond to my prayers.
सामवेद ऐन्द्रं पर्वणि पर्व (4.32) :: ऋषि :- वसुश्रुत, विमद, सत्यश्रवा, गौतम; देवता :- अग्नि, उषा, सोम, इन्द्र, विश्वेदेवा; छन्द :- पंक्ति, बृहती।
आ ते अग्न इधीमहि द्युमन्तं देवाजरम्।
यद्ध स्या ते पनीयसी समिद्दीदयति द्यवीषं स्तोतृभ्य आ भर॥
हे अग्नि देव! आप दीप्तिमान् तथा अजर हैं। हम आपको प्रकाशित करते हैं। आपकी उत्कृष्ट रोशनी स्वर्गलोक में चमकती है। आप उद्गाताओं को अन्नादि प्रदान कर परिपूर्ण कर दें।(सामवेद 4.32.1)
Hey Agni Dev! You are illuminated and immortal. You shine us. Your excellent light in visible in the heavens as well. You should make us-the Udgata Gan, self sufficient in food grains etc.
आग्निं न स्ववृक्तिभिर्होतारं त्वा वृणीमहे।
शीरं पावकशोचिषं वि वो मदे यज्ञेषु स्तीर्णबर्हिषं विवक्षसे॥
उत्कृष्ट मन्त्रों से हविष्यान्न समर्पित करने वाले, यजन में जिसके लिए आसन फैलाया गया है, ऐसे सभी जगह विराजमान, पावन ज्योति से सम्पन्न महान् अग्नि देव की हम विशिष्ट प्रसन्नता के साथ स्तुति करते हैं।(सामवेद 4.32.2)
For whom the cushion has been spreaded in the Yagy in which oblations-offerings are made reciting excellent Mantrs? Present over here and every place Agni Dev accompanied with pious-virtuous light is worshiped by us with extreme happiness.
महे नो अद्य बोधयोषो राये दिवित्मती।
यथा चिन्नो अबोधयः सत्यश्रवसि वाय्ये सुजाते अश्वसूनृते॥
हे उषा देवी! जिस प्रकार आप हमें पहले धन-वैभव प्राप्त करने हेतु उठाती रहीं हैं, उसी प्रकार प्रज्वलित होकर आज भी हमें जगायें। हे उत्कृष्ट विधि से जन्म लेने वाली, सत्यप्रिय उषादेवी! वय की संतान सत्यश्रवा पर आप अपनी कृपा दृष्टि दिखायें।(सामवेद 4.32.3)
Hey Usha Devi! The way you awoke us earlier for having wealth and grandeur, similarly awake us now as well with your aura-radiance. Hey Usha Devi arising with excellent procedure! Show your mercy towards Saty Shrava, progeny of Vay.
भद्रं नो अपि वातय मनो दक्षमुत क्रतुम्।
अथा ते सख्ये अन्धसो वि वो मदे रणा गावो न यवसे विवक्षसे॥
हे विश्वेदेवा! आप सोमरस के पान से हर्षित हमारे मन को पराक्रम, कर्मशीलता, कल्याण करने वाली शक्ति, उत्कृष्टता एवं मित्रता प्राप्त करने हेतु प्रेरित करें। जिस प्रकार गायों की मित्रता हरी घास से होती है, उसी तरह हम (स्तोता) आपकी मित्रता प्राप्त करें।(सामवेद 4.32.4)
Hey Vishwe Dev! Having satisfied with the drinking of Somras inspire our innerself for valour, dedication to work, strength for welfare-well being, excellence and attainment of friendship. The way cows are friendly with grass, the same way we the Stotas should attain your friendship.
क्रत्वा महाँ अनुष्वधं भीम आ वावृते शवः।
श्रिय ऋष्व उपाकयोर्नि शिप्री हरिवां दधे हस्तयोर्वज्रमायसम्॥
अपार पराक्रमी देवराज इन्द्र सोमरस का सेवन कर अपने बल को बढ़ाते हैं। तत्पश्चात् कान्तिमय, उच्च शिरस्त्राण धारण करने वाले, रथ में घोड़ों को योजित करने वाले देवराज इन्द्र अपने दाहिने हाथ में लौह-वज्र को समृद्धि लाभ हेतु धारण करते हैं।(सामवेद 4.32.5)
Devraj Indr possessor of extreme-limitless valour, drink Somras to increase his strength. Thereafter, aurous-radiant, wearing high head gear, Devraj Indr deploy the horses in the charoite, wield Vajr in his right hand to attain prosperity.
स घा तं वृषणं रथमधि तिष्ठाति गोविदम्।
यः पात्रं हारियोजनं पूर्णमिन्द्र चिकेतति योजा न्विन्द्र ते हरी॥
देवराज इन्द्र पोषण, सोम आदि से पहले, गायों को प्रदान करने में सक्षम मजबूत रथ को भली-भाँति जानते हैं तथा उसी पर विराजमान होते हैं। इसलिए हे रथारूढ़ देवराज इन्द्र! आप अपने हर्यश्वों को रथ में नियोजित कर दें (जिससे समस्त इच्छित पदार्थ हमको प्रदान कर सकें)।(सामवेद 4.32.6)
Devraj Indr is fully aware of the strong capable charoite granting cows, prior to nourishment and Somras drinking, he rides it. Hence hey Devraj Indr riding the charoite! Deploy your green coloured horses in the charoite so that we are blessed with all desirable commodities.(04.12.2025)
अग्नि तं मन्ये यो वसुरस्तं यं यन्ति धेनवः।
अस्तमर्वन्त आशवोऽस्तं नित्यासो वाजिन इर्ष स्तोतृभ्य आ भर॥
जो अग्नि बादलों में आश्रय लिये रहती है, यज्ञ-वेदिका में आसीन जिस अग्नि की तरफ गायें गमन करती है, जिस तरफ द्रुत गति से दौड़ने वाले घोड़े जाते हैं, जिस अग्नि के समक्ष स्तोतागण हवि लेकर प्रस्तुत होते हैं, मैं उस अग्नि देवता की आराधना करता हूँ। हम यजमानों को वे अन्न-धनादि से परिपूर्ण कर दें।(सामवेद 4.32.7)
I worship Agni Dev, who has asylum under the clouds, cows run towards the Yagy Vedica where its present, horses running with fast speed towards it, Stota Gan remain present before it with oblations-offerings. Enrich us the Yajmans with food grains and wealth.
न तमंहो न दुरितं देवासो अष्ट मर्त्यम्।
सजोषसो यमर्यमा मित्रो नयति वरुणो अति द्विषः॥
हे देवताओं! एकमत होकर उपस्थित रहने वाले, अर्यमा, मित्र एवं वरुण देव कुकर्मियों का तिरस्कार करके व्यक्तियों को उन्नति के पथ पर बढ़ाते हैं, वह व्यक्ति कुकृत्य से रहित होकर दुर्दशा से दूर रहता है।(सामवेद 4.32.8)
दुर्दशा :: दुर्गति, दुरावस्था; predicament-plight.
Hey demigods-deities! Aryma, Mitr and Varun Dev together in one voice disdain, scorn wicked-sinners and lead the humans to progress. Such person supported by them remain aloof from viciousness and is protected from predicament-plight.
सामवेद ऐन्द्रं पर्वणि पर्व (4.33) :: ऋषि :- धिष्ण्या ऐश्वरयोऽग्न्य, त्र्यरुणत्रसदस्यु वसिष्ठ, वामदेवा; देवता :- पवमान, मरुत्, वाजिन; छन्द :- पंक्ति, उष्णिक्।
परि प्र धन्वेन्द्राय सोम स्वादुर्मित्राय पूष्णे भगाय॥
हे मधुर रस से युक्त सोम देव! आप पालन-पोषण करने वाले देवराज इन्द्र, परम स्नेही मित्र, पूषा एवं भग आदि देवगणों पर भी हर्ष की वर्षा करें।(सामवेद 4.33.1)
Hey Somras, associated with sweetness! Shower pleasure-bliss over Devraj Indr, extreme affectionate Pusha & Bhag Dev; who nurture you.
पर्यू षु प्र धन्व वाजसातये परि वृत्राणि सक्षणिः। द्विषस्तरध्या ऋणया न ईरसे॥
हे सुमधुर सोम देव! आप पोषण (अन्न) को प्राप्त करने हेतु अच्छी तरह कलश को अपने रस से परिपूर्ण करके उसी में मौजूद रहे। पराक्रम से युक्त होकर आप शत्रुओं पर प्रहार कर दें। हमें ऋणों से छुटकारा दिलाने वाले आप शत्रुओं को पराजित करने हेतु उन पर प्रहार करने हेतु गमन करें।(सामवेद 4.33.2)
Hey sweetened Somras (Som Dev)! Fill the Kalash-vessels fully to have nourishment with your sap. Enriched with valour you should strike the enemies. Move to strike the enemies to defeat them and relieve from debt.
पवस्व सोम महान्त्समुद्रः पिता देवानां विश्वभि धाम॥
हे सोम! विशाल समुद्र के सदृश सभी जगह स्थित एवं पिता तुल्य समस्त लोगों का पालन-पोषण करने वाले आप देवगणों के समस्त धामों के पात्रों में उपस्थित रहते हैं।(सामवेद 4.33.3)
Hey Som! You remain present in the pots of all abodes of the demigods as vast ocean like the father who nurture all people.
पवस्व सोम महे दक्षायाश्वो न निक्तो वाजी धनाय॥
हे सोम देव! तुरंग के सदृश (प्रयास पूर्वक) शुद्ध किये गये, शक्ति में वृद्धि करने वाले आप पराक्रम तथा धन-वैभव देने के लिए बर्तनों में अवस्थित रहें।(सामवेद 4.33.4)
Hey Somras (Dev)! You the booster of power-strength, remain present in the vessels sanctified like the horse to grant wealth and grandeur-prosperity.
इन्दुः पविष्ट चारुर्मदायापामुपस्थे कविर्भगाय॥
उत्कृष्ट ज्ञान से युक्त यह सोमरस संपत्ति से परिपूर्ण आनन्द को प्राप्त करने हेतु जल के बीच में स्त्रवित किया जाता है।(सामवेद 4.33.5)
Somras accompanied with excellent knowledge, is mixed with water to attain pleasure, wealth and comforts.
अनु हि त्वा सुतं सोम मदामसि महे समर्यराज्ये। वाजों अभि पवमान प्र गाहसे॥
हे सोम! आपका अभिषव होने के पश्चात् हम आपकी आराधना करते हैं। हे निष्पन्न किये हुए सोमदेव! उत्कृष्ट नरेश की रक्षा करने के उद्देश्य से, बलशाली होकर आप शत्रुओं को पराभूत करने हेतु जाते हैं।(सामवेद 4.33.6)
Hey Som! We worship you after your extraction. Hey sanctified Somras (Dev)! You acquire might to protect the best king and move to defeat the enemies.
कई व्यक्ता नरः सनीडा रुद्रस्य मर्या अथा स्वश्वाः॥
यह मंत्र एक अन्वय से प्रश्नवाचक है तथा दूसरे से समाधान वाचक है :-
प्रश्न :- हे प्रकट करने वालों! (जानकारी प्रदान करने वालों) समान स्थान में रहने वाले, उत्कृष्ट अश्वों से सम्पत्र मरुद्गणों का रुद्र से क्या सम्बन्ध है?
Hey people, who manifest-reveal! What is the relationship between Rudr Gan and Marud Gan having best horses; residing over he same place?
समाधान :: समान स्थान, (शरीर) में निवास करने वाले उत्कृष्ट घोड़ों (इन्द्रियों) से सम्पत्र मरुद्गण (प्राण, उदान, व्यान, समान, अपान आदि पंच प्राण) विशिष्ट गतिमान शरीर के नेता रुद्र (महाप्राण) के साथ चलने वाले हैं।(सामवेद 4.33.7)
Residing over the same place, excellent horses-senses, the Marud Gan (Pran, Udan, Apan, Saman, Apan etc Panch Pran-5 forms of Air Vital), are present with leader of specifically dynamic body i.e., Rudr.
अग्ने तमद्याश्वं न स्तोमैः क्रतुं न भद्रं हृदिस्पृशम्। ऋध्यामा त ओहैः॥
हे सर्वव्यापक अग्ने! आज हम याज्ञिक जन हवन के सदृश (कल्याणकारी), अश्वों के सदृश गतिमान, आपके सुख्याति में वृद्धि करने हेतु ऊह नामक चित्त को छू जाने वाले स्तोत्रों का उपयोग करते हैं।(सामवेद 4.33.8)
Hey all pervading Agne! We the Yagyik Jan, use the Strotrs which touches the innerself (mind & heart) named Uh, like the beneficial like Hawan and dynamic like horses for increasing your fame-honour.
आविर्मर्या आ वाजं वाजिनो अग्मन् देवस्य सवितुः सवम्। स्वर्गां अर्वन्तो जयत॥
मनुष्यों का हित करने वाले प्रतापी एवं बलशाली सविता देवता ने निष्पन्न किये गये सोमरस रूपी अन्न को ग्रहण कर लिया है। अतः हे यजमान! उनसे विजय प्राप्त करने हेतु घोड़ों एवं द्युलोक को प्राप्त करो।(सामवेद 4.33.9)
Mighty & honourable Savita Dev who resort to the welfare of humans has accepted the Somras. Hence hey Yajman! Have horses and heavens for attaining victory from him.
पवस्व सोम द्युम्नी सुधारो महाँ अवीनामनुपूर्व्यः॥
हे सोम देव! ज्योर्तिमय, अच्छी तरह सहज धारा से बर्तन में प्रवाहित होते हुए, आप पहले की भाँति उच्च ही है। आप (यज्ञ-वेदिका में स्थापित हुए) कलश में अपने आप ही परिपूर्ण हो जाएँ।(सामवेद 4.33.10)
Hey Somras (Dev)! You are higher like before, having flown into the vessel as a current. You should be stored in the Kalash kept over the Yagy Vedica.
सामवेद ऐन्द्रं पर्वणि पर्व (4.34) :: ऋषि :- त्रसदस्यु, संवर्त आंगिरस; देवता :- इन्द्र, विश्वेदेवा, उषा; छन्द :- द्विपदा विराट्।
विश्वतोदावन्विश्वतो न आ भर यं त्वा शविष्ठमीमहे॥
शत्रुओं का शमन करने वाले हे देवराज इन्द्र! आप हमें सब तरह की अभिलषित धन, संपदा प्रदान करें, जिसको प्राप्त करने के लिए हम अत्यधिक सामर्थ्यवान् (इन्द्र) की वन्दना करते हैं।(सामवेद 4.34.1)
Hey Devraj Indr destroyer-repressor of the enemies! Grant us all sorts of wealth, prosperity for which we worship-pray to you, possessor of extreme capability.
एष ब्रह्मा य ऋत्विय इन्द्रो नाम श्रुतो गृणे॥
सभी ऋतुओं के अनुसार कार्य का संचालन करने वाले, महाज्ञानी, देवराज इन्द्र के नाम से जो प्रसिद्ध है, उनकी हम सर्वदा याचना करते हैं।(सामवेद 4.34.2)
We always worship enlightened-a great scholar, famous Devraj Indr who function in accordance of the all seasons.(05.12.2025)
सामवेद ऐन्द्रं पर्वणि पर्व (4.34) :: ऋषि :- त्रसदस्यु, संवर्त आंगिरस; देवता :- इन्द्र, विश्वेदेवा, उषा; छन्द :- द्विपदा विराट्।
ब्रह्माण इन्द्रं महयन्तो अर्कैरवर्धयन्नहये हन्तवा उ॥
अहि नामक दानव का हनन करने हेतु विचार-सम्पन्न स्तोत्रों से पूजा किये जाने वाले इन्द्र देव के यज्ञ का हम प्रसार करते हैं।(सामवेद 4.34.3)
We expand the Yagy accomplished with the Strotrs involving meditation for killing demon Ahi by Indr Dev.
अनवस्ते रथमश्वाय तक्षुस्त्वष्टा वज्रं पुरुहूत द्युमन्तम्॥
हे देवराज इन्द्र! ऋभु देवताओं ने आपके अश्वों के निमित्त रथ की रचना की। अनेक मन्त्र द्रष्टाओं के माध्यम से आहूत किये जाने वाले हे देवराज इन्द्र! देवशिल्पी विश्वकर्मा ने आपके लिए तेजस्वी वज्र का निमार्ण किया।(सामवेद 4.34.4)
Hey Devraj Indr! Devgan Ribhus developed the charoite for you to deploy the horses. Hey Devraj Indr, summoned-invoked by many Mantr Drashta Gan! Dev Shilpi Vishw Karma produced the energised Vajr for you.
शं पदं मघं रयीषिणो न काममव्रतो हिनोति न स्पृशद्रयिम्॥
हवि समर्पित करने वाले याज्ञिक जन सुख, उच्च-आश्रय स्थल एवं धन-वैभव को प्राप्त करते हैं। जो मनुष्य यज्ञादि नहीं करते वह किसी भी तरह के पदार्थों को प्राप्त नहीं कर पाते हैं एवं वे ऐच्छिक धन-वैभव को भी स्पर्श करने में असमर्थ होते हैं।(सामवेद 4.34.5)
Yagyik Gan make offerings-oblations and achieve pleasure-comforts, high shelter, wealth and grandeur. Those humans who do not conduct Yagy etc do not get any sort of goods. They are unable to even touch the desired wealth-prosperity.
सदा गावः शुचयो विश्वधायसः सदा देवा अरेपसः॥
हे (यजमानों)! गौएं सदैव स्वच्छ समस्त जीवों को पोषण प्रदान करने वाली, उत्कृष्ट एवं कुकृत्य से रहित होती हैं।(सामवेद 4.34.6)
Hey Yajmans! Cows are excellent, free from misdeeds and provide nourishment to all clean living beings.
आ याहि वनसा सह गावः सचन्त वर्तनिं यदूधभिः॥
हे उषा देवी! जब आप दीप्तिमान् होती हुई उदित होती हैं, तब (पृथ्वी पर) दुग्ध से युक्त थनों वाली गायें (या पोषण से युक्त रश्मियाँ) मार्ग में स्थित रहती है।(सामवेद 4.34.7)
Hey Usha Devi! When you rise shinning, the cows having milk in their udder are present in its way.
उप प्रक्षे मधुमति क्षियन्तः पुष्येम रयिं धीमहे त इन्द्र॥
हे सर्वव्यापक देवराज इन्द्र! माधुर्य युक्त यज्ञ के चम्मचों से सम्पन्न (यज्ञार्थ प्रस्तुत) ऐश्वर्य हम प्राप्त करें तथा आपके निकट रहने वाले (पतनोन्मुख) हम, आपका स्मरण करने में सक्षम हों।(सामवेद 4.34.8)
Hey all pervading Devraj Indr! Let have grandeur presented with the spoons meant for the Yagy. We though near you, are prone to down fall. We should be capable of remembering you.
अर्चन्त्यर्कं मरुतः स्वर्का आ स्तोभति श्रुतो युवा स इन्द्रः॥
हे उत्कृष्ट तेजस्वी मरुतों! हम स्तुति करने योग्य देवराज इन्द्र की उपासना करते हैं। वे जरारहित, प्रसिद्ध देवराज इन्द्र समस्त शत्रुओं का हनन करने वाले हैं।(सामवेद 4.34.9)
Hey excellent Tejaswi-majestic Marud Gan! We pray to Devraj Indr who deserve worship. Famous Devraj Indr is capable of slaughtering all the enemies.
प्र व इन्द्राय वृत्रहन्तमाय विप्राय गार्थ गायत यं जुजोषते॥
हे बुद्धिमान् ऋत्विजों! वृत्र का संहार करने में निपुण देवराज इन्द्र की मनोहर मन्त्रों से अर्चना करो, जिन मन्त्रों को वे प्रसन्नतापूर्वक श्रवण करते हैं।(सामवेद 4.34.10)
Hey intelligent Ritviz Gan! Worship Devraj Indr expert in killing Vratra Sur with the attractive Mantrs which are responded by him happily.
सामवेद ऐन्द्रं पर्वणि पर्व (4.35) :: ऋषि :- पृषन, बन्धु, संवर्त, भुवन, आप्त्य, भरद्वाज इत्यादि; देवता :- अग्नि, इन्द्र, उषा, विश्वेदेवा; छन्द :- द्विपदा विराट्, एकपदा।
अचेत्यग्निश्चिकितिर्हव्यवाड् न सुमद्रथः॥
दी गई आहुतियों को देवगणों के प्रति ले जाने वाले, उत्कृष्ट हवि से युक्त, देवगणों को समर्पित समस्त पदार्थों को रथ के सदृश अभिलषित स्थलों पर पहुँचाने वाले अग्नि देव सब कुछ जानते हैं।(सामवेद 4.35.1)
Agni Dev who carry-deliver the sacrifices to demigods-deities, possessed with excellent offerings-oblations like the charoite, at all places, is aware of every thing.
अग्ने त्वं नो अन्तम उत त्राता शिवो भुवो वरूथ्यः॥
हे अग्नि देव! आप प्रार्थना करने योग्य, हमारे समीपस्थ सहायता करने वाले एवं भला करने वाले रक्षक बन गए है।(सामवेद 4.35.2)
Hey Agni Dev! Deserving worship, you have become our nearest helper and beneficial protector.
भगो न चित्रो अग्निर्महोनां दधाति रत्नम्॥
बृहत् पदाथों में सूर्य देव के सदृश, स्तुति के योग्य अग्नि देव यजमानों को उत्कृष्ट धन प्रदान करते हैं।(सामवेद 4.35.3)
Stuti deserving Agni Dev grant excellent wealth to the Yajmans like the vast-majestic objects similar-identical to Sury Dev.
विश्वस्य प्र स्तोभ पुरो वा सन्यदिवेह नूनम्॥
हे अग्नि देव! आप सभी शत्रुओं का शमन करने वाले है। आप हमारे यज्ञ-वेदिका पर अवश्य रूप से एकाग्रचित्त होकर विद्यमान् रहते हैं।(सामवेद 4.35.4)
Hey Agni Dev! You are destroyer-slaughterer of the enemy. You are present over our Yagy Vedica with concentration (meditation mode).
उषा अप स्वसुष्टमः सं वर्तयति वर्तनिं सुजातता॥
यह उषा अपनी बहिन रूपी रात्रि के तिमिर को, अपनी किरणों से विनष्ट कर देती है एवं श्रेष्ठ ज्योति के माध्यम से अपने पथ को भी प्रदीप्त करती है।(सामवेद 4.35.5)
Usha remove the darkness spreaded by her sister Ratri-night with its rays and illuminate our path with its radiance-luminosity.
इमा नु कं भुवना सीषधेमेन्द्रश्च विश्वे च देवाः॥
(मन्त्र द्रष्टा मुनि का कहना है कि) हम सुख प्राप्त करने की अभिलाषा से इस सम्पूर्ण विश्व को अपने नियंत्रण में चलाते हैं। इस कार्य को पूर्ण करने में देवराज इन्द्र आदि समस्त देवगण हमारी सहायता करते हैं।(सामवेद 4.35.6)
Mantr Drashta (Visionary of the Hymns, Mantr) says that we control this universe for the sake of comforts-pleasure. Devraj Indr and all demigods help us in accomplishing this job.
वि सुतयो यथा पथा इन्द्र त्वद्यन्तु रातयः॥
हे देवराज इन्द्र! जिस प्रकार छोटे-छोटे मार्ग राजपथ में मिल जाते हैं, उसी तरह आपके द्वारा प्रदत्त दान समस्त जनों को प्राप्त होते हैं।(सामवेद 4.35.7)
Hey Devraj Indr! The way small roads-streets merge in the Raj Path (express way), simialarly the donations made by you are obtained by everyone.
अया वाजं देवहितं सनेम मदेम शतहिमाः सुवीराः॥
इस वन्दना से आनंदित देव शक्तियों द्वारा दिया गया पोषित अन्न (आहार) एवं सामर्थ्य हमें मिले। श्रेष्ठ बलशाली पुत्रों से सम्पन्न होकर हम प्रसन्नतापूर्वक निर्वाह करें एवं दीर्घजीवी बनें।(सामवेद 4.35.8)
We should have the nourishing food grains and capability awarded by the divine powers gladdened with this prayer. We should have mighty sons, live happily and become long lived.
ऊर्जा मित्रो वरुणः पिन्वतेडाः पीवरीमिषं कृणुही न इन्द्र॥
हे देवराज इन्द्र! मित्रा-वरुण देवता हमें शक्ति बढ़ाने वाले पोषण प्रदान करते हैं। आप हमारे अन्न (पोषण) को अत्यधिक पुष्टिकर बना दें।(सामवेद 4.35.9)
Hey Devraj Indr! Mitra-Varun Dev grant us nourishment that increase our strength. You should make our food grains extremely nourishing.
इन्द्रो विश्वस्य राजति॥
देवराज इन्द्र सम्पूर्ण भूमण्डल के अधिष्ठाता है।(सामवेद 4.35.10)
Devraj Indr is the Lord-deity of the whole earth.(06.12.2025)
त्रिकद्रुकेषु महिषो यवाशिरं तुविशुष्मस्तृम्पत्सोममपिबद्विष्णुना सुतं यथावशम्।
स ई ममाद महि कर्म कर्तवे महामुरुं सैनं सश्चद्देवो देवं सत्य इन्दुः सत्यमिन्द्रम्॥
अत्यधिक पराक्रमी, आदरणीय देवराज इन्द्र ने तीनों लोकों में विद्यमान, संतुष्टि प्रदान करने वाले, अद्भुत सोम को जौ के आटे में मिश्रित कर विष्णु भगवान् के संग इच्छानुकूल सेवन किया। उस सोम ने महिमामयी देवराज इन्द्र को उत्कृष्ट कार्य करने हेतु प्रेरित किया। श्रेष्ठ अद्भुत गुणों से सम्पत्र वह अलौकिक सोमरस देवराज इन्द्र को प्राप्त हुआ।(सामवेद 4.36.1)
अत्यधिक पराक्रमी :: अत्यधिक शक्ति और बहादुरी; mighty, valiant, powerful, valorous and heroic.
Valiant, mighty, honoured Devraj Indr ate amazing Som mixed in flour, present in the three abodes, granting satisfaction, with Bhagwan Shri Hari Vishnu as per their wish. Som encouraged mighty Devraj Indr to perform excellent deeds, Devraj Indr availed the amazing Som possessing amazing qualities.
अयं सहस्त्रमानवो दृशः कवीनां मतिज्योतिर्विधर्म। ब्रध्नः समीचीरुषसः समैरयदरेपसः सचेतसः स्वसरे मन्युमन्तश्चिता गोः॥
असंख्यों व्यक्तियों का कल्याण करने वाला, दर्शनीय, विवेकशील, प्रजा का स्वामी, प्रतापी यह सूर्य स्वच्छ एवं अंधकार रहित कान्तिमय उषाओं (किरणों) को प्रेरित करता है। इन सूर्य रश्मियों के समक्ष दीप्तिमान् चन्द्रमा आदि दूसरे नक्षत्र दिन में कान्ति-रहित हो जाते हैं।(सामवेद 4.36.2)
Sury Dev scenic, prudent, Lord of subjects, resort to the welfare of infinite-numerous people. Glorious-august Sun inspire the Usha-rays to eliminate darkness. In the presence of Sun rays Moon and constellations appear faint-lustreless.
एन्द्र याद्युप नः परावतो नायमच्छा विदथानीव सत्पतिरस्ता राजेव सत्पतिः।
हवामहे त्वा प्रयस्वन्तः सुतेष्वा पुत्रासो न पितरं वाजसातये मंहिष्ठं वाजसातये॥
हे देवराज इन्द्र! जिस प्रकार सत्पुरुषों के पालनकर्ता अग्निदेव यज्ञ-वेदिका में आगमन करते हैं, जिस तरह शत्रु को परास्त करने वाला नरेश अपने गृह वापस आ जाता है, उसी तरह आप असीम अन्तरिक्ष से हमारे समक्ष प्रकट हुए। पोषण प्राप्त करने के लिए जिस प्रकार संतान अपने पिता को पुकारते हैं, शूरवीर को जिस प्रकार संग्राम में पुकारते हैं, वैसे ही हवियों के साथ हम आपको सोमयज्ञ में आहूत करते हैं।(सामवेद 4.36.3)
Hey Devraj Indr! The way the nurturer of virtuous people Agni Dev arrive at the Yagy Vedi, emperor retune home after defeating the enemy; similarly you have invoked from the limitless space-sky in front of us. The way the progeny call its father for nourishment-food, the brave is called by the war, similarly the offerings-oblations are invited & honour in the Som Yagy by us.
तमिन्द्रं जोहवीमि मघवानमुत्रं सत्रा दधानमप्रतिष्कुतं श्रवांसि भूरि।
मंहिष्ठो गीर्भिरा च यज्ञियो ववर्त राये नो विश्वा सुपथा कृणोतु वज्री॥
ऐश्वर्यवान्, शूरवीर, कभी पराजित न होने वाले देवराज इन्द्र को हम अपनी मदद करने हेतु आमन्त्रित करते हैं। सबसे महान्, यज्ञों में स्तुत्य देवराज इन्द्र की स्तोत्रों के माध्यम से याचना करते है। वज्रधारण करने वाले इन्द्र धन-संपत्ति प्राप्त करने हेतु हमारे समस्त रास्तों को सुलभ कर दें।(सामवेद 4.36.4)
We invite grandeur possessing, brave, undefeated Devraj Indr for our help. Greatest, worshiped in the Yagy through the Strotrs, Vajr wielding Devraj Indr is requested to make availble wealth-prosperity through all means-doors to us.
अस्तु श्रौषट् पुरो अग्निं धिया दध आ नु त्यच्छध्रो दिव्यं वृणीमह इन्द्रवायू वृणीमहे। यद्ध क्राणा विवस्वते नाभा सन्दाय नव्यसे। अध प्र नूनमुप यन्ति धीतयो देवाँ अच्छा न धीतयः॥
हम लोगों ने अग्नि देव को आदरपूर्वक उत्तरवेदी के अग्रभाग में प्रतिस्थापित कर दिया है। उस अद्भुत दीप्तियुक्त प्रकाश की हम उपासना करते हैं। ऐश्वर्यवान् एवं अपूर्व याजक के यज्ञ-स्थल पर उपस्थित होकर हमारी इच्छाओं की पूर्ति करने वाले देवराज इन्द्र एवं पूषा देवताओं की हम याचना करते हैं। ऐसा करने से अवश्य ही हमारी वन्दना उनके समीप पहुँचेगी। हमारे ये सब यज्ञीय कर्म देवताओं तक पहुँचाने के निमित्त सम्पन्न हो रहे हैं।(सामवेद 4.36.5)
We have established Agni Dev in the front of Uttar Vedi, honourably. We worship that lustrous light. We worship Yajak Devraj Indr & Pusha Dev possessing unparallel glory-grandeur at the Yagy Sthal-site, who accomplish our desires. It will forward our worship-prayers to them. Our Yagy Karm are accomplished to forward to the demigods.
प्र वो महे मतयो यन्तु विष्णवे मरुत्वते गिरिजा एवयामरुत्।
प्र शर्धाय प्र यज्यवे सुखादये तवसे भन्ददिष्टये धुनिव्रताय शवसे॥
एवया मरुत् नामक ऋषि द्वारा की गई स्तुतियां महा पराक्रमी देवराज इन्द्र आपको और मरुत् के साथ विष्णु भगवान् को प्राप्त हो। श्रेष्ठ अलंकारों से सुशोभित, हितकारी याजक को प्रगतिशील मरुद्गण का पराक्रम प्राप्त हो।(सामवेद 4.36.6)
Let the prayers-Stuties performed by Evya Marut Rishi reach Devraj Indr Marud Gan and Bhagwan Shri Hari Vishnu. Let the Yajak devoted to welfare, adorned with best ornaments; avail the valour of progressive Marud Gan.
अया रुचा हरिण्या पुनानो विश्वा द्वेषांसि तरति सयुग्वभिः सूरो न सयुग्वभिः। धारा पृष्ठस्य रोचते पुनानो अरुषो हरिः। विश्वा यद्रूपा परियास्यृक्वभिः सप्तास्येभिर्ऋक्वभिः॥
हरिताभ, निष्पन्न किया हुआ सोमरस अपनी आभा से शत्रुओं का विनाश करता है। तिमिर (अन्धकार) को विनष्ट करने वाली सूर्य की किरणों के समान इस सोमरस की उत्कृष्ट दिखाई देने वाली धारा प्रदीप्त होती है। पवित्र हरिताभ सोमरस भी चमकता है, जो तेज के सात मुखों (सतरंगी किरणों) एवं स्तोत्रों से अनेक रूप धारण करता है।(सामवेद 4.36.7)
Greenish, sanctified Somras destroy the enemy with its aura-radiance. The excellent rays of the Somras appear to destroy the darkness. Pious-virtuous greenish Somras too shine, display seven coloured rays and adopt many forms through the Strotrs.
अभि त्यं देवं सवितारमोण्योः कविक्रतुमर्चामि सत्यसवं रत्नधामभि प्रियं मतिम्।
ऊर्ध्वा यस्यामतिर्भा अदिद्युतत्सवीमनि हिरण्यपाणिरमिमीत सुक्रतुः कृपा स्वः॥
सोच-विचार कर कार्य करने वाले, सत्य की ओर प्रेरित करने वाले, धन प्रदान करने वाले, अत्यधिक स्नेही तथा प्रखर बुद्धि वाले उन सविता देवता की हम पूजा करते हैं, जिसका तेज द्यावा-पृथिवी तक द्रुत गति से प्रसारित होता है। श्रेष्ठ कर्म करने वाले, स्वर्ण के सदृश दीप्तिमान सविता देवता कृपापूर्वक अपनी ज्योति बिखेरते हैं।(सामवेद 4.36.8)
We worship Savita who's Tej-aura which moves to earth & heavens, who meditate (analyse-synthesize) prior to doing any thing, inspires to truthfulness, wealth awarding, affectionate with sharp intellect; with fast speed. Performer of best endeavours illuminated like the Gold Savita Dev kindly spread his light.
अग्निं होतारं मन्ये दास्वन्तं वसोः सूनुं सहसो जातवेदसं विप्रं न जातवेदसम्। य ऊर्ध्वया स्वध्वरो देवो देवाच्या कृपा। घृतस्य विभ्राष्टिमनु शुक्रशोचिष आजुह्वानस्य सर्पिषः॥
अत्यधिक धन प्रदान करने वाले, पालन की योग्यता देने वाले, सर्वज्ञाता, परम पूजनीय हवनीय यज्ञ की हम याचना करते हैं। उत्कृष्ट यज्ञ वाले महाशय, देवताओं की अनुकम्पा की अभिलाषा से, पवित्र ज्योतिर्मय अग्निदेव, घृत की आहुति देने से आनन्दित होते हैं।(सामवेद 4.36.9)
Granting lots of wealth, ability to nurse, aware of all-everything, extremely revered, Yagy is worshiped-accomplished by us. Gentle men performing excellent Yagy, by virtue of the blessings of demigods-deities, pious-virtuous illuminated Agni Dev is gladdened by making sacrifices with Ghee,
तव त्यन्नर्यं नृतोऽप इन्द्र प्रथमं पूर्वं दिवि प्रवाच्यं कृतम्। यो देवस्य शवसा प्रारिणा असु रिणन्नपः। भुवो विश्वमभ्यदेवमोजसा विदेदूर्जं शतक्रतुर्विदेदिषम्॥
हे समस्त लोगों को अपने नियमानुसार चलाने वाले देवराज इन्द्र! मनुष्य-मात्र का भला करने वाले, सर्वप्रथम किये गये आपके परम् श्रेष्ठ कार्य द्युलोक में प्रशंसनीय हैं। आपने अपने सामर्थ्य से दानवों का हनन किया, उनको पराजित किया एवं जल वर्षा के अवरोधों को दूर कर वर्षा की, अतएव शतकर्मा (शतक्रतु) देवराज इन्द्र पराक्रमी हों तथा हविरूप अन्नादि प्राप्त करें।(सामवेद 4.36.10)
Hey Devraj Indr, performer of hundred Yagy, directing all humans with your rules-regulations! Resorting to human welfare, your efforts towards best deeds are appreciated in the heavens. You destroyed the demons with your valour, defeated them, removed obstacles in the flow of water created by them. Hence, invincible Devraj Indr should attain food grains as offerings-oblations.(07.12.2025)
सामवेद पावमानं पर्व (5.1) :: ऋषि :- अमहीयु, मधुच्छन्दा, भृगुर्वारुणि, त्रित, कश्यप, जमदग्नि, दृढच्युत, आगस्त्य, काश्यपोऽसित; देवता :- पवमान, सोम; छन्द :- गायत्री।
उच्चा ते जातमन्धसो दिवि सद्भूम्या ददे। उग्रं शर्म महि श्रवः॥
हे सोम! आपके शक्तिवर्द्धक रस की उत्पत्ति स्वर्ग लोक में हुई है। वहाँ विद्यमान कल्याण करने वाले सुख एवं महिमामय अन्न (आपकी अनुकम्पा से) हम धरती पर प्राप्त करते हैं।(सामवेद 5.1.1)
Hey Som Dev! Your strengthening sap evolved in the heavens. We attain the welfare & comfort-pleasure granting glorious food grains over the earth due to your kindness.
स्वादिष्ठया मदिष्ठया पवस्व सोम धारया। इन्द्राय पातवे सुतः॥
हे सोम! आप देव राज इन्द्र के पान करने हेतु तैयार किये गये हैं। इसलिए अत्यधिक माधुर्ययुक्त, आनन्द प्रदान करने वाले धारा के साथ प्रवाहित हों।(सामवेद 5.1.2)
Hey Somras! You are prepared for drinking by Devraj Indr. Hence, flow in a sweetened, pleasurous-pleasureful current.
वृषा पवस्व धारया मरुत्वते च मत्सरः। विश्वादधान ओजसा॥
हे सोम! आप स्तोता गण हेतु द्रुत गतिशील धारा से कलश में आगमन करें एवं मरुतों से सेवित देवराज इन्द्र हेतु शक्ति तथा आनन्दवर्द्धक सिद्ध हों।(सामवेद 5.1.3)
Hey Som! Move with fast speed into the Kalash-vessel for the Stota Gan and prove strength boosting and pleasureful for Marud Gan & Devraj Indr.
यस्ते मदो वरेण्यस्तेना पवस्वान्धसा। देवावीरघशंसहा॥
हे सोम! आपका रस देवगणों को आकर्षित करने वाला, कुकर्मी तथा दुर्जनों का विनाश करने वाला एवं अत्यधिक आनन्द प्रदान करने वाला है। उस पुष्टिवर्धक रस के साथ आप कलश में प्रवेश करें।(सामवेद 5.1.4)
Hey Som! Your extremely gladdening juice attracts the demigods-deities, destroys the wicked-sinful . Enter the vessel with that strength increasing sap.
तिस्त्रो वाच उदीरते गावो मिमन्ति धेनवः। हरिरेति कनिक्रदत्॥
यज्ञ के समय जब तीनों वेदों के मन्त्र उच्चारित किये जाते हैं, गाएँ दुहने के लिए रँभाती हैं, उस समय हरे रंग का सोमरस नाद करता हुआ परिष्कृत होता है।(सामवेद 5.1.5)
At the occasion of Yagy when Mantrs from the three Veds are recited, cows moo to be milked, greenish Somras is sanctified making sound.
इन्द्रायेन्दो मरुत्वते पवस्व मधुमत्तमः। अर्कस्य योनिमासदम्॥
माधुर्य युक्त हे सोम! आप इस यज्ञ-वेदिका में, जिसके सहयोगी मरुत्वान् हैं, उन देवराज इन्द्र के लिए कलश में प्रतिष्ठित हों।(सामवेद 5.1.6)
Hey sweetened Somras! Establish in the Kalash-vessel for Indr Dev who's accomplice-associates are Marud Gan.
असाव्यं शुर्मदायाप्सु दक्षो गिरिष्ठाः। श्येनो न योनिमासदत्॥
गिरि (पर्वत) पर जन्मा सोम हर्ष के लिए अभिषुत किया गया तथा जल के मिश्रण से सर्वत्र प्रसारित हुआ तथा जिस प्रकार श्येन पक्षी अपने स्थान को प्राप्त होता है, उसी प्रकार यह सोम अपने निश्चित स्थान पर प्रतिस्थापित होता है।(सामवेद 5.1.7)
श्येन पक्षी :: hawk, falcon, eagle.
Som evolved over the mountain is extracted for pleasure, mixed with water and sent every where. The way hawk moves to its nest-place, the Som too is established over its place (pitcher, vessel, Kalash).
पवस्व दक्षसाधनो देवेभ्यः पीतये हरे। मरुद्भ्यो वायवे मदः॥
हे हरिताभ सोम! आप आनन्द तथा शक्ति के साधन उपलब्ध कराने वाले हैं। देवताओं एवं मरुद्गणों के सेवन करने के उद्देश्य से आप कलश में प्रतिष्ठित हों।(सामवेद 5.1.8)
Hey greenish Som! You grant mighty and pleasure. Flow into the Kalash to be drunk by demigods & Marud Gan.
परि स्वानो गिरिष्ठाः पवित्रे सोमो अक्षरत्। मदेषु सर्वधा असि॥
यह सोमरस पावन कलश में विराजित किया गया है। हे साम! आपकी उत्पत्ति गिरि पर होती है, रस तैयार किये जाने पर हर्ष प्रदान करने वालों में आप सर्वोत्तम हैं।(सामवेद 5.1.9)
Somras has been stored in the Kalash. Hey Som! You evolve over the mountain. You are best amongest gladdening saps.
परि प्रिया दिवः कविर्वयांसि नप्त्योर्हितः। स्वानैर्याति कविक्रतुः॥
मति में वृद्धि करने वाला यह सोम, सोमरस अभिषुत करने के दो फलकों (स्वर्गलोक तथा भूलोक) के मध्य में प्रतिष्ठित होकर, ब्रह्मनिष्ठों द्वारा विवेकशील मनुष्यों तक पहुँचाया जाता है।
Intelligence booster Somras is established in two portions i.e., over the earth & heavens and is served to those prudent humans who are established in the Brahm.
सामवेद पावमानं पर्व (5.2) :: ऋषि :- श्यावाश्व, त्रित, अमहीयु, भृगु, कश्यप, निधुवि काश्यप, काश्पोऽसित; देवता :- पवमान, सोम; छन्द :- गायत्री।
प्र सोमासो मदच्युतः श्रवसे नो मघोनाम्। सुता विदथे अक्रमुः॥
हर्ष प्रदान करने वाला सोम शोधित होकर हमारे याग में अन्न (पोषण) एवं कीर्ति प्रदान करने वाला बनकर प्रतिष्ठित होता है।(सामवेद 5.2.1)
Let the gladdening Som establish in our Yagy on been extracted as food-supplement and fame-glory granting.
प्र सोमासो विपश्चितोऽपो नयन्त ऊर्मयः। वनानि महिषा इव॥
विवेक का अभ्युदय करने वाला यह सोमरस, जल की लहरों के सदृश एवं सामान्य रूप से जानवरों के जंगल में गमन करने की भाँति, जल में मिश्रित किया जाता है।(सामवेद 5.2.2)
Somras which evolve prudence roaming like water waves, generally the forests; is mixed in water.
पवस्वेन्दो वृषा सुतः कृधी नो यशसो जने। विश्वा अप द्विषो जहि॥
हे शोधित सोम! आप उत्कृष्ट शक्ति में वृद्धि करने वाले हैं। हमें समस्त जनों में कीर्तिमान निर्मित करें एवं आप हमारे सारे शत्रुओं (विकारों) को विनष्ट कर दें।(सामवेद 5.2.3)
Hey purified Somras! You are excellent strength booster. Establish us a glorious person amongest the humans and destroy our defects-enemies.
वृषा ह्यसि भानुना द्युमन्तं त्वा हवामहे। पवमान स्वर्दृशम्॥
हे शुद्ध होने वाले, शक्ति बढ़ाने वाले सोम! आप सभी को एक समान देखने वाले एवं तेज से युक्त हैं। इस याग में हम आपको आमंत्रित करते हैं।(सामवेद 5.2.4)
Hey sanctified strength booster Somras! You consider everyone at par and possess energy. We invite you in this Yagy.
इन्दुः पविष्ट चेतनः प्रियः कवीनां मतिः। सृजदश्वं रथीरिव॥
उमंग का अभ्युदय वाला, सभी लोगों का प्रिय सोमरस विद्वान् लोगों की प्रार्थना के साथ, पात्र में छाना जाता है। रथ चलाने वाला जैसे अश्व को (अपने अनुशासन) चलाता है, वैसे ही यह सोम बर्तन में परिपूर्ण किया जाता है।(सामवेद 5.2.5)
उमंग :: उल्लास, उत्साह, जोश; enthusiasm, exaltation, exultation.
Somras dear to all, generating enthusiasm, is filtered in the vessel over the request of the enlightened-scholars. The way charioteer keeps the charoite under control, its filled in the vessel.
असृक्षत प्र वाजिनो गव्या सोमासो अश्वया। शुक्रासो वीरयाशवः॥
पराक्रम एवं उत्तेजना में वृद्धि करने वाला यह सोमरस तेजवान् है। यह गौ, अश्व और शूरवीर संतानों की अभिलाषा करने वालों के द्वारा निष्पन्न किया जाता है। जो याज्ञिक इसको निचोड़ते हैं, यह उनकी गौ, अश्व, शूरवीर पुत्र आदि अभिलाषाओं को पूर्ण करता है।(सामवेद 5.2.7)
Courage & excitement increasing Somras possess energy-Tej. Its extracted for those who wish to have cows, horses and brave progeny. The Yagyik who squeeze it are blessed with cows, horses and brae sons.
पवस्व देव आयुषगिन्द्रं गच्छतु ते मदः। वायुमा रोह धर्मणा॥
हे अलौकिक गुणों से युक्त सोम! आप छाने जाने हेतु बर्तन पर उपस्थित हों। आपका प्रफुल्लित करने वाला रस देवराज इन्द्र को प्राप्त हो। आप अद्भुत रूप से वायु में गमन कर जाएँ।(सामवेद 5.2.7)
Hey Somras; possessing divine powers! You should occupy the vessel on being filtered. Let your gladdening sap be availed by Devraj Indr. You should be mixed in air in your amazing form.(08.12.2025)
पवमानो अजीजनद्दिवश्चित्रं न तन्यतुम्। ज्योतिर्वैश्वानरं बृहत्॥
शोधित किये जाने के पश्चात् इस सोमरस ने स्वर्गलोक में प्रतिष्ठित सभी को दीप्तिमान् करने में सक्षम, अद्भुत वैश्वानर प्रकाश को विद्युत् की भाँति उत्पन्न किया।(सामवेद 5.2.8)
After being purified Somras illuminated amazing Vaeshwar Nar which is capable of illuminating everyone established in the heavens like lightening.
परि स्वानास इन्दवो मदाय बर्हणा गिरा। मधो अर्षन्ति धारया॥
निचोड़े जाने के पश्चात् अमृत स्वरूप, बुद्धि बढ़ाने वाला, माधुर्य युक्त सोम स्तोताओं के द्वारा स्तोत्रों का गान करते हुए छाना जाता है।(सामवेद 5.2.9)
On being squeezed, elixir like sweetened Somras, capable of boosting intelligence, is filtered while singing the Strotrs, by the Stotas.
परि प्रासिष्यदत्कविः सिन्धोरूर्मावधि श्रितः। कारुं बिभ्रत्पुरुस्पृहम्॥
ज्ञान वर्द्धक, प्रशंसा करने योग्य, यजमानों को अन्न प्रदान करने वाला, सरिता की धारा में मिश्रित यह सोम बर्तन (सत्पात्र) में उपस्थित होता है।(सामवेद 5.2.10)
Appreciable Somras boosting knowledge, is collected in the vessel like a stream granting food grains to the Yajmans.
सामवेद पावमानं पर्व (5.3) :: ऋषि :- अमहीयु, वृहन्मति, आंगिरस, जमदग्नि, प्रभूवसु, मेध्यातिथि, निघुवि, काश्यप, उचथ्य; देवता :- सोम, पवमान; छन्द :- गायत्री।
उपो षु जातमप्तुरं गोभिर्भङ्गं परिष्कृतम्। इन्दुं देवा अयासिषुः॥
शत्रुओं का विनाश करने वाला, अच्छी तरह से शोधित, पानी एवं गाय के दूध में मिश्रित यह सोमरस देवताओं को संतुष्टि प्रदान करने वाला सिद्ध हो।(सामवेद 5.3.1)
Let this Somras finely purified, mixed with water & cow's milk, destroyer of the enemies, become satisfying to the demigods-deities.
पुनानो अक्रमीदभि विश्वा मृधो विचर्षणिः। शुम्भन्ति विप्रं धीतिभिः॥
विवेक में वृद्धि करने वाला, शुद्ध होने के पश्चात् ज्ञान में वृद्धि करने वाला यह सोमरस सारे शत्रुओं (विकारों) का हनन करता है। ऐसे सोम की विद्वान् लोग अद्भुत स्तोत्रों के द्वारा याचना करते हैं।(सामवेद 5.3.2)
Somras booster of prudence, on being purified-sanctified destroys all defects and increase knowledge. The scholars worship Som with amazing Strotrs.
आविशन्कलशं सुतो विश्वा अर्षन्नभि श्रियः। इन्दुरिन्द्राय धीयते॥
यह शुद्ध किया हुआ सोमरस पात्र में परिपूर्ण करते समय अलंकृत होता है, जो देवराज इन्द्र को आनन्द प्रदान करने हेतु उन्हें दिया जाता है।(सामवेद 5.3.3)
Sanctified Somras is decorated-worshiped in the vessel on being filled and served to Devraj Indr to grant him pleasure.
असर्जि रथ्यो यथा पवित्रे चम्वोः सुतः। कार्ष्मन्वाजी न्यक्रमीत्॥
नियंत्रण में रखे गये रथ के अश्व के समान अभिषुत किया गया सोमरस सतकर्त्ता पूर्वक कलश में भरा जाता है। यह शक्तिवर्द्धक सोम देवगणों को अपनी ओर आकृष्ट करने में सक्षम है।(सामवेद 5.3.4)
Extracted Somras is filled in the vessel like a controlled horse. This energising Somras is capable of attracting demigods-deities towards it.
प्र यद्गावो न भूर्णयस्त्वेषा अयासो अक्रमुः। घ्नन्तः कृष्णामप त्वचम्॥
दीप्ति युक्त एवं द्रुत गति से जाने वाला सोम अपनी काली त्वचा (छाल) को विनष्ट करते हुए याग में उसी तरह पहुँचता है, जिस तरह गाएँ (द्रुत गति से) गोष्ठ में गमन करती हैं।(सामवेद 5.3.5)
Radiant Somras moving with fast speed destroys its blackish bark-outer covering and reaches the Yag-Yagy like the fast moving cows go to the cow shed.
अपघ्नन्पवसे मृधः क्रतुवित्सोम मत्सरः। नुदस्वादेवयुं जनम्॥
है पवित्र सोम! आप सुख प्रदान करने वाले एवं यज्ञ विधा के ज्ञानी हैं। जैसे रोगों को विनष्ट करते हुए आप शुद्ध होते हैं, वैसे ही देवत्व का विरोध करने वालों का विनाश करें।(सामवेद 5.3.6)
Hey pious Som! You grant comforts-pleasure and is learned of the Yagy Vidhya-procedures. The way you are sanctifies destroying the diseases-impurities, similarly destroy those who oppose the demigodhood.
अया पवस्व धारया यया सूर्यमरोचयः। हिन्वानो मानुषीरपः॥
हे सोम! मनुष्यों का भला करने वाले कार्यों को पूर्ण करने हेतु जल को (वर्षा के लिए) प्रेरणा प्रदान करते हुए जैसे (अपने सामर्थ्य से) आपने सूर्य देवता को प्रकाशित किया, उसी धारा (सामर्थ्य) से आप कलश में शुद्ध होकर प्रतिष्ठित हो।(सामवेद 5.3.7)
Hey Som! The way you inspired Sury Dev to shine, similarly inspire rains for the welfare-benefit of the humans. By virtue of the strength of the current-rains establish in the Kalash.
स पवस्व य आविथेन्द्रं वृत्राय हन्तवे। वव्रिवांसं महीरपः॥
हे सोम! आप जल-वृष्टि में अवरोध उत्पन्न करने वाले वृत्र का संहार करने हेतु देवराज इन्द्र का उत्साहवर्द्धन करें एवं द्रुत गतिशील धारा सहित पात्र में छनते जाएँ।(सामवेद 5.3.8)
Hey Som! You encouraged Devraj Indr to remove the obstacles in the flow of water created by Vratr. Keep on pouring-filtering in the pot with fast speed.
अया वीती परि स्रव यस्त इन्दो मदेष्वा। अवाहन्नवतीर्नव॥
हे सोमदेव देवराज इन्द्र के पान करने के निमित्त आप पात्र में प्रतिष्ठित हों। आपका यह शुद्ध रस संग्राम में शत्रुओं की सारी पुरियों को विध्वंस करने हेतु, देवराज इन्द्र को क्षमता प्रदान करता है।(सामवेद 5.3.9)
Hey Somras establish in the vessel to be drunk by Devraj Indr. You grant strength to Devraj Indr to destroy the forts-cities of the enemies in the war.
परि द्युक्षं सनद्रयिं भरद्वाजं नो अन्धसा। स्वानो अर्ष पवित्र आ॥
हे सोमदेव! तेज, शक्ति एवं उत्कृष्ट धन अपने पौष्टिक रस के साथ हमें देने की कृपा करें। जब आपका शुद्ध रस छन जाए, तब वह पात्र में विद्यमान हो जाए।(सामवेद 5.3.10)
Hey Som! Grant us Tej-energy, power-might and excellent wealth with the nourishing sap. Let you juice-sap be stored in the vessel on being purified.
सामवेद पावमानं पर्व (5.4) :: ऋषि :- मेधातिथि, भृगु, उचथ्य, अवत्सार, निध्रुवि, काश्यप, असित, मारीच, कवि, जमदग्नि, अयास्य, आंगिरस, अमहीयु; देवता :- पवमान, सोम; छन्द :- गायत्री।
अचिक्रददृषा हरिर्महान्मित्रो न दर्शतः। सं सूर्येण दिद्युते॥
मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाला, मित्र की भाँति दर्शनीय, हरित वर्ण का, आदरणीय, अभिषुत करते समय नाद करता हुआ यह सोम वैसे ही प्रज्वलित होता है, जिस तरह सूर्य प्रज्वलित होता है।(सामवेद 5.4.1)
As soon as Somras accomplishing desires, beautiful like a friend, greenish in colour, producing sound, illuminate like the Sun.
आ ते दक्षं मयोभुवं वह्निमद्या वृणीमहे। पान्तमा पुरुस्पृहम्॥
हे सोम! आपके आनन्ददायक, धन-धान्य से परिपूर्ण करने वाले, शत्रुओं से बचाने वाले, अनेक लोगों द्वारा अभिलाषा किये गये पराक्रम को हम प्राप्त करते हैं।(सामवेद 5.4.2)
Hey Som! We attain your valour which grant pleasure, accomplish us with wealth & food grains, protects us from the enemies.
अध्वर्यो अद्रिभिः सुतं सोमं पवित्र आ नय। पुनाहीन्द्राय पातवे॥
हे यज्ञ कर्ताओं! देवराज इन्द्र के लिए पान करने योग्य तैयार करने हेतु अभिषुत सोमरस को शुद्ध करके कलश के समीप लेकर उपस्थित हो।(सामवेद 5.4.3)
Hey Yagy performers! Bring the purified Somras ready to drink by Devraj Indr in the Kalash-vessel.
तरत्स मन्दी धावति धारा सुतस्यान्धसः। तरत्स मन्दी धावति॥
निष्यन्त्र की गई सोमरस की पौष्टिक धारा सुखदायी है। यह कुटिल कृत्य से रहित एवं आराधकों को उन्नति के मार्ग पर अग्रसर करने वाली है।(सामवेद 5.4.4)
Controlled nourishing stream of Somras gives pleasure. Free from wickedness it grants progress to the devotees-moves over the path of progress.
आ पवस्व सहस्रिणं रयिं सोम सुवीर्यम्। अस्मे श्रवांसि धारय॥
हे सोमदेव! आप हजारों तरह का उत्तम, बल में वृद्धि करने वाला, अलौकिक धन एवं अन्न हमें देने की कृपा करें।(सामवेद 5.4.5)
Hey Somras! Grant thousands of types of excellent divine strength and food grains to us.(09.12.2025)
अनु प्रत्नास आयवः पदं नवीयो अक्रमुः। रुचे जनन्त सूर्यम्॥
प्राचीनकाल में लोगों ने ज्ञान को प्राप्त करने हेतु सूर्य की भाँति तेजोमय सोम को उत्पन्न किया एवं सर्वश्रेष्ठ पद को हासिल किया।(सामवेद 5.4.6)
During ancient times people evolved-grew energetic Som to have knowledge like he Sun and attained highest rank-post.
अर्षा सोम द्युमत्तमोऽभि द्रोणानि रोरुवत्। सीदन्योनौ वनेष्वा॥
हे कान्तिवान् सोम देव! आप आवाज करते हुए (यज्ञ) पात्र में पवित्र होकर प्रतिष्ठित हों। आप तपस्या करने योग्य वन में अवस्थित इस यज्ञ मण्डप में उपस्थित हो।(सामवेद 5.4.7)
Hey lustrous Som! Establish in the Yagy Kalsh making sound. Invoke in the forest suitable for ascetics-Tapasya in the Yagy Mandap.
वृषा सोम द्युमाँ असि वृषा देव वृषव्रतः। वृषा धर्माणि दध्रिषे॥
हे सोम! आप महा बलशाली एवं तेज से युक्त है। शक्ति में वृद्धि करने की योग्यता से सम्पन्न आप सर्वदा अपने इस धर्म (गुण) को धारण किये रहते हैं।(सामवेद 5.4.8)
Hey Som! You are associated with extreme power and aura-radiance. You always possess this trait to boost strength.
इषे पवस्व धारया मृज्यमानो मनीषिभिः। इन्दो रुचाभि गा इहि॥
हे सोम देव! आप विद्वान् पुरुषों के द्वारा निचोड़े जाने के पश्चात् पौष्टिक रस से युक्त धारा के रूप में पवित्र हों तथा गाय के दूध में मिश्रित होकर प्रदीप्त हो।(सामवेद 5.4.9)
Hey Som! You should be sanctified as nourishing juice-sap stream on being squeezed by the learned people and shine on being mixed with cow's milk.
मन्द्रया सोम धारया वृषा पवस्व देवयुः। अव्या वारेभिरस्मयुः॥
शक्तिवर्द्धक, देवगणों द्वारा अभिलषित हे सोम देव! आप हमारी रक्षा करें एवं छननी में सुख प्रदान करने वाली धारा के रूप में परिष्कृत किये जाएँ।(सामवेद 5.4.10)
Hey strength boosting Somras desired by the demigods-deities! Protect us and become purified as a stream-current passing through the sieve granting pleasure-comfort.
अया सोम सुकृत्यया महान्त्सन्नभ्यवर्धथाः। मन्दान इद् वृषायसे॥
हे सोम! आप अपने उत्कृष्ट कर्मों से आदर-योग्य बनकर महानता को प्राप्त करते हैं तथा सुख प्रदान कर बल में वृद्धि करते हैं।(सामवेद 5.4.11)
Hey Som! You become revered-honourable due to your virtuous deeds, attain greatness, grant pleasure and increase strength.
अयं विचर्षणिर्हितः पवमानः स चेतति। हिन्वान आप्यं बृहत्॥
विवेक में वृद्धि करने वाला, पात्र में प्रतिष्ठित होकर शोधित, यह सोमरस जल में मिश्रित होकर अत्यधिक अन्न (पोषण) देता हुआ कीर्तिमान होता है।(सामवेद 5.4.12)
Somras mixed in water increase prudence on being stored in the vessel, grant extreme nourishment and shine.
प्र न इन्दो महे तु न ऊर्मि न बिभ्रदर्षसि। अभि देवाँ अयास्यः॥
हे सोम देव! अत्यधिक धन-संपत्ति को प्राप्त करने हेतु आप पात्र में छाने जाते हैं। आपकी कान्ति को धारण करने वाले अयास्य ऋषि देव पूजन (देवत्व को धारण) करते हैं।(सामवेद 5.4.13)
Hey Som! For achievement of extreme wealth & prosperity you are filtered in the pot. Ayasy Rishi holding your lustre attain demigodhood.
अपध्नन्पवते मृधोऽप सोमो अराव्णः। गच्छन्निन्द्रस्य निष्कृतम्॥
यह सोम शत्रुओं का तथा दान न देने वालों का विनाश करता है। यह देवराज इन्द्र के समीप गमन करता हुआ स्त्रवित होता है।(सामवेद 5.4.14)
Som destroys the enemies and those who do not donate. It flows while moving close to Devraj Indr.
सामवेद पावमानं पर्व (5.5) :: ऋषि :- भरद्वाज, कश्यप, गौतमोऽचिर्विश्वामित्र, जमदग्नि, वसिष्ठ; देवता :- पवमान, सोम; छन्द-बृहती।
पुनानः सोम धारयापो वसानो अर्षसि।
आ रत्नधा योनिमृतस्य सीदस्युत्सो देवो हिरण्ययः॥
सोमरस शुद्ध होकर, पानी में मिश्रित होकर प्रवाह के साथ नीचे पात्र में गिरता है। समस्त स्त्नों को प्रदान करने वाला, यज्ञवेदी में विद्यमान प्रकाशित होता हुआ वह सोमरस प्रवाहित होता है।(सामवेद 5.5.1)
Somras on being purified and mixed with water falls into the pot. Granter of all jewels, it shines over the Yagy Vedi and flows.
परीतो षिञ्चता सुतं सोमो य उत्तमं हविः।
दधन्वाँ यो नर्यो अस्वा3न्तरा सुषाव सोममद्रिभिः॥
हे होताओं! मानवों के लिए कल्याणकारी, पाषाणों पर कूटकर तैयार किया गया शोधित, जल में मिला हुआ यह सोमरस देवताओं हेतु श्रेष्ठ हवि है।(सामवेद 5.5.2)
Hey Hota Gan! Somras constitute the best oblation for the demigods-deities on being crushed with stones, purifies & mixed in water.
आ सोम स्वानो अद्रिभिस्तिरो वाराण्यव्यया।
जनो न पुरि चम्वोर्विशद्धरिः सदो वनेषु दध्रिषे॥
पत्थरों द्वारा कूटकर निचोड़ा हुआ यह सोमरस छलनी से नीचे के पात्र में छाना जाता है। हरित वर्ण का यह सोमरस इस काष्ठ के पात्र (द्रोण कलश) में उसी तरह पहुँचकर प्रतिष्ठित रहता है, जिस प्रकार पुरी में मानव।(सामवेद 5.5.3)
On being crushed with stones, squeezed Somras is filtered in the sieve into the pot kept below. Greenish Somras present in the wooden pot (Dron), stay like the humans live in their abode-homes.
प्र सोम देवतीतये सिन्धुर्न पिप्ये अर्णसा।
अंशोः पयसा मदिरो न जागृविरच्छा कोशं मधुश्श्रुतम्॥
यह सोमरस देवगणों के पानार्थ जल में मिश्रित किया जाता है। आनन्द प्रदान करने वाला होने के साथ-साथ यह सोम उत्साह का संचार करने वाला भी है। यह सोमरस पानी में मिश्रित होकर माधुर्य युक्त रस टपकाने वाले पात्र में आसीन हो।(सामवेद 5.5.4)
Somras is mixed in water for the demigods-deities to drink. In addition to pleasure it increase enthusiasm, as well. On being mixed in water, Somras should be kept in the vessel to be sweetened.
सोम उ ष्वाणः सोतृभिरधि ष्णुभिरवीनाम्।
अश्वयेव हरिता याति धारया मन्द्रया याति धारया॥
याज्ञिकों द्वारा निचोड़कर तैयार किया गया यह सोम, शुद्ध होकर नीचे पात्र में पहुँचता है। यह हरिताभ सोम तीव्र गतिमान होकर प्रफुल्लित करने वाले प्रवाह से पात्र में प्रतिष्ठित होता है।(सामवेद 5.5.5)
Squeezed by the Yagyik, Somras on being purified, moves into the pot kept below. Greenish Somras acquire fast speed, flow happily into the pot, to be stored there.
तवाहं सोम रारण सख्य इन्दो दिवेदिवे।
पुरूणि बभ्रो नि चरन्ति मामव परिधीं रति ताँ इहि॥
हे सोम देव! हम नित्य प्रति आपकी मित्रता से लाभान्वित हों। जो अनेक तरह के दुर्जन मनुष्य हमें कष्ट देते हैं, उन दुष्ट राक्षसों का आप विनाश कर दें।(सामवेद 5.5.6)
Hey Som! We should benefited by your friendship everyday. Destroy the many types of vicious humans who torture us like the wicked demons.
मृत्यमानः सुहस्त्या समुद्रे वाचमिन्यसि। रयिं पिशङ्ग बहुलं पुरुस्पृहं पवमानाभ्यर्षसि॥
उत्तम हाथों के माध्यम से तैयार किये गये, शुद्ध हुए हे सोम! शोधित होने वाले, आप पात्र में शब्द करते हुए पहुँचते हैं तथा उद्गाताओं को अभिलषित सुवर्ण आदि धन प्रदान करते हैं।(सामवेद 5.5.7)
Hey sanctified Som prepared by the best hands! You on being purified reach the pot making sound and granting wealth like gold etc to the Udgata Gan.
अभि सोमास आयवः पवन्ते मद्यं मदम्।
समुद्रस्याधि विष्टपे मनीषिणो मत्सरासो मदच्युतः॥
व्यक्तियों के हितकारी, हर्ष प्रदान करने वाले ज्ञानवान, शुद्ध किये जाने वाले यन्त्र से नीचे की ओर गिरने वाले, हर्षयुक्त सोम, पानी से परिपूर्ण बर्तन में अपने आप पवित्र होकर इकठा होते हैं। पुनानः सोम जागृविरव्या वारैः परि प्रियः।
त्वं विप्रो अभवोऽङ्गिरस्तम मध्वा यज्ञं मिमिक्ष णः॥
ज्ञान से युक्त, मधुर एवं पावन सोम, छलनी में छनकर शुद्ध होते हुए नीचे की ओर प्रवाहित होता है। हे अंगिरस् (मुनि) की परंपरा में सर्वश्रेष्ठ देवता सोम! आप ज्ञानवर्द्धक होकर हमारे याग को माधुर्ययुक्त रस से शुद्ध करें।(सामवेद 5.5.9)
Sweetened, pious-pure Som, accompanied with Gyan-knowledge is filtered in the sieve and then it move below. Hey Som best demigod-deity in the clan of Angiras Muni! You should be associated with Gyan and sanctify our Yagy with your sweetened sap.
इन्द्राय पवते मदः सोमो मरुत्वते सुतः। सहस्त्रधारो अत्यव्यमर्षति तमी मृजन्त्यायवः॥
आनन्द प्रदान करने वाला, निचोड़कर तैयार किया गया सोम, मरुद्गण तथा देवराज इन्द्र हेतु स्वच्छ होता है। यह सोम सर्वप्रथम असंख्यों धराओं के रूप में छलनी से पवित्र होता है, तत्पश्चात् दुबारा उद्गातागण मन्त्रोच्चारण के द्वारा इसे शुद्ध करते हैं।(सामवेद 5.5.10)
Gladdening Somras is squeezed and purified for Devraj Indr & Marud Gan. Initially this Som is sanctified and then passes through the sieve in hundreds of streams-currents. Thereafter, the Udgata Gan again sanctify it by the chanting of Mantrs.
पवस्व वाजसातमोऽभि विश्वानि वार्या। त्वं समुद्रः प्रथमे विधर्मन् देवेभ्यः सोम मत्सरः॥
स्तोत्रों के द्वारा स्वच्छ हुए, असाधारण अन्न (पोषकता) से सम्पन्न, देवताओं को हर्षित करने वाले हे सोम! दयालुता आदि विशेषतायुक्त गुणों से सम्पन्न होकर आप इस उत्कृष्ट याग में शोधित हो।(सामवेद 5.5.11)
असाधारण :: अपूर्व, निराला, विशेष, ख़ास, न्यारा, ग़ैरमामूली; extraordinary, exceptional, unique, extravagant.
Sanctified with the Strotrs, extraordinary nourishing food grain, gladdening the demigods, hey Som! Accompanying with kindness-mercy etc, special qualities you should be sanctified in this Yagy.
पवमाना असृक्षत पवित्रमति धारया।
मरुत्वन्तो मत्सरा इन्द्रिया हया मेधामभि प्रयांसि च॥
मरुतों का सखा, आनन्द प्रदान करने वाला, देवराज इन्द्र को प्रिय, विवेक एवं पोषण से सम्पन्न, यज्ञ में प्रयोग किया जाने वाला एवं शोधित होने वाला सोमरस छलनी से छनते हुए नीचे पात्र में प्रवाहित होता है।(सामवेद 5.5.12)
Friend of Marud Gan, gladdening, dear to Devraj Indr, possessing prudence & nourishment, the Somras used in the Yagy is purified and passes through the sieve.
सामवेद पावमानं पर्व (5.6) :: ऋषि :- उशना, काव्य, वृषणो वासिष्ठ, पराशर, वसिष्ठ, पराशर, शाक्यत्य, वसिष्ठौ मैत्रावरुणि, प्रतर्दनो दैवोदासि, प्रस्कण्व, काण्व; देवता :- पवमान, सोम; छन्द :- त्रिष्टुप्।
प्र तु द्रव परि कोशं नि षीद नृभिः पुनानो अभि वाजमर्ष।
अश्वं न त्वा वाजिनं मर्जयन्तोऽच्छा बर्ही रशनाभिर्नयन्ति॥
हे सोम! याज्ञिकगण आपको शोधित कर कलश में प्रतिष्ठित करते हैं। आप याज्ञिकों को अन्न एवं धन प्रदान करें। पराक्रमी अश्व के सदृश शोधित करते हुए याज्ञिकगण आपको यज्ञ-वेदी तक पहुंचाते हैं।(सामवेद 5.6.1)
Hey Som! The Yagyik Gan purify you and collect in the Kalash. Grant food grains and wealth to the Yagyik Gan. The Yagyik Gan carry you to the Yagy Vedi like a chivalric horse.
प्र काव्यमुशनेव ब्रुवाणो देवो देवानां जनिमा विवक्ति।
महिव्रतः शुचिबन्धुः पावकः पदा वराहो अभ्येति रेभन्॥
ऋषि उशना के समान स्तोत्रों का उच्च्चारण करने वाले याजक, देवगणों के जीवन-चरित्र का वर्णन करते हैं। श्रेष्ठ, धर्माचारी, तेजोमय एवं स्वच्छ करने वाला उत्कृष्ट सोमरस, आवाज करते हुए कलश में गिरता है।(सामवेद 5.6.2)
The Yajak who recite the Strotrs like Rishi Ushna describe the nature-character of demigods-deities. Excellent, duty bound, energetic, clean-pure Somras falls into the Kalash.
तिस्त्रो वाच ईरयति प्र वह्निर्ऋतस्य धीतिं ब्रह्मणो मनीषाम्।
गावो यन्ति गोपतिं पृच्छमानाः सोमं यन्ति मतयो वावशानाः॥
याज्ञिक जन सत्य को धारण करने वाले, तीनों वेदों (ऋक्, यजु, साम) के मन्त्रों द्वारा अद्भुत, उत्कृष्ट सोम की याचना करते हैं। जिस प्रकार वृषभ गायों के निकट गमन करते हैं, उसी प्रकार श्रेष्ठ सुख की कामना करने वाले उद्गातागण सोम के निकट गमन करते हैं।(सामवेद 5.6.3)
Truthful Yagyik Gan prepare excellent Somras with the Mantrs of three Veds Rik, Yajur, Sam). The way the bull move to the cows, the Udgata Gan with the desire of excellent comforts-pleasure move to Som.
अस्य प्रेषा हेमना पूयमानो देवो देवेभिः समपृक्त रसम्।
सुतः पवित्रं पर्येति रेभन् मितेव सद्म पशुमन्ति होता॥
स्वर्ण से परिष्कृत, यज्ञ को प्रेरणा प्रदान करने वाला, अलौकिक सोमरस देवगणों को निवेदित किया जाता है। निचोड़कर निकाला गया यह सोमरस, यज्ञ-मण्डप में पहुँचने वाले यजमान या गाय के बाड़े में गमन करने वाले ग्वाले के सदृश कलश में उपस्थित हो रहा है (शुद्ध हो रहा है)।(सामवेद 5.6.4)
Divine Somras sanctified with gold, inspiring Yagy is served to the demigods-deities. Squeezed Somras is present in the Kalash like the Yajman going to the Yagy or the cowherd going to the cow shed.
सोमः पवते जनिता मतीनां जनिता दिवो जनिता पृथिव्याः।
जनिताग्नेर्जनिता सूर्यस्य जनितेन्द्रस्य जनितोत विष्णोः॥
उच्च विवेक, भूलोक, दिव्यलोक, अग्नि, दिनकर, इन्द्र एवं नारायण आदि देवताओं को प्रकट करने वाला अलौकिक सोम पात्र में पवित्र होकर विद्यमान है।(सामवेद 5.6.5)
Sanctified divine pure-pious Somras with high prudence, invoke divine abodes, earth, Agni, Dinkar, Indr & Narayan etc demigods is present in the pot.
अभि त्रिपृष्ठं वृषणं वयोधामङ्गोषिणमवावशन्त वाणीः।
वना वसानो वरुणो न सिन्धुर्वि रत्नधा दयते वार्याणि॥
तीन स्थानों (व्योम, वनस्पति तथा काया) में वास करने वाले, सौंदर्य प्रदान करने वाले एवं पोषण प्रदान करने वाले सोम की ऊँचे स्वर में यजमानों की वेद-मन्त्रों से युक्त वाणियाँ स्तुति करती हैं। जल देवता (वरुण) के सदृश पानी में मिश्रित सोम उपासकों को रत्न एवं धन से परिपूर्ण करता है।(सामवेद 5.6.6)
Som residing in the three abodes (space-sky, vegetation and the body), granting beauty and nourishment, is prayed in loud voice with the recitation of Ved Mantrs. Mixed in water Som, grants jewels-Gems, wealth to the worshipers like Varun Dev.
अक्रांत्समुद्रः प्रथमे विधर्मं जनयन् प्रजा भुवनस्य गोपाः।
वृषा पवित्रे अधि सानो अव्ये बृहत्सोमो वावृधे स्वानो अद्रिः॥
जल वर्षा करने वाला, यज्ञ का पालनकर्ता, शक्तिवर्द्धक, निष्पन्न किया हुआ सोम सबसे पहले प्रजाओं का हौसला वर्द्धन कर उनकी प्रगति करते हुए सर्वश्रेष्ठ हो गया।(सामवेद 5.6.7)
Extracted Som became best by showering rains, supporting Yagy, boosting strength, inspiring-encouraging the populace.
कनिक्रन्ति हरिरा सृज्यमानः सदीन्वनस्य जठरे पुनानः।
नृभिर्यतः कृणुते निर्णिजं गामतो मतिं जनयत स्वधाभिः॥
ऋत्विजों द्वारा निचोड़कर रस निकाला जाने वाला, हरित वर्ण का सोम स्वच्छ होता है। गाय के दूध में मिला हुआ वह शब्द करता हुआ द्रोण कलश में प्रवाहित होता है। स्तोतागण इस सोम की हवियुक्त स्तुति करते हैं।(सामवेद 5.6.8)
Squeezed by the Ritviz, greenish Somras is pure. It flows into the Dron-wooden pot mixed with cow's milk, making sound. Stota Gan worship this Somras with the oblations.(11.12.2025)
एष स्य ते मधुमाँ इन्द्र सोमो वृषा वृष्णः परि पवित्रे अक्षाः।
सहस्त्रदाः शतदा भूरिदावा शश्वत्तमं बर्हिरा वाज्यस्थात्॥
हे महापराक्रमी देवराज इन्द्र! शक्ति बढ़ाने वाला, आपका यह सोम माधुर्ययुक्त एवं तेजवान् होकर कलश में प्रवाहित होता है। सैकड़ों-सहस्रों तरह का अत्यधिक घन देने वाला, यह बलयुक्त सोम, निरन्तर होने वाले याग में प्रकट होकर प्रतिष्ठित होता है।(सामवेद 5.6.9)
Hey extremely mighty Devraj Indr! Somras which increase your potential-strength flows into the Kalash. Somras possessing energy-nourishment is established in the Yagy, continuously. It grants hundreds & thousands of kinds of wealth.
पवस्व सोम मधुमाँ ऋतावापो वसानो अधि सानो अव्ये।
अव द्रोणानि घृतवन्ति रोह मदिन्तमो मत्सर इन्द्रपानः॥
हे माधुर्ययुक्त सोम! आप पानी में मिश्रित होकर, उच्च स्थान पर विराजमान होकर, शोधन यन्त्र से शुद्ध होते हैं। तत्पश्चात् आनन्द प्रदान करने वाले एवं देवराज इन्द्र के पान करने योग्य आप (सोम) जल में मिश्रित होकर पात्र में प्रतिष्ठित होते हैं।(सामवेद 5.6.10)
Hey sweetened Somras! You are purified through a machine kept over a high place on being mixed in water. Thereafter, you become suitable to be drunk by Devraj Indr and gladden him, after mixing in water and kept in the pot.
सामवेद पावमानं पर्व (5.7) :: ऋषि :- प्रतर्दन, पराशर, शाक्त्य, इन्द्रप्रमतिर्वासिष्ठ, वसिष्ठो मैत्रावरुणि, कर्णश्रुद्वासिष्ठ, नोधा गौतम, कण्वोधौर, मन्युर्वासिष्ठ, कुत्स, आंगिरस, कश्यपो मारीच, प्रस्कण्व काण्व: देवता :- पवमान, सोम; छन्द :- त्रिष्टुप्।
प्र सेनानीः शूरो अग्ने रथानां गव्यन्नेति हर्षते अस्य सेना।
भद्रान् कृण्वन्निन्द्रहवांत्सखिभ्य आ सोमो वस्त्रा रभसानि दत्ते॥
सेना का संचालन करने वाला, पराक्रमी सोम गौ (के दुग्ध) की अभिलाषा करते हुए, रथों के आगे-आगे चलता है, जिससे इसका दल आनंदित होता है। यह सोम देवराज इन्द्र की याचनाओं को सखाओं तथा यजमानों हेतु कल्याणकारी बनाते हुए प्रखर तेज को ग्रहण करता है।(सामवेद 5.7.1)
Mighty Som which control the army, desiring cow's milk, moves ahead of the charoites leading to pleasure of the group. Som makes the requests-prayers of Devraj Indr and the Yajmans beneficial-useful and adopt sharp aura.
प्र ते धारा मधुमतीरसृग्रन्वारं यत्पूतो अत्येष्यव्यम्।
पवमान पवसे धाम गोनां जनयंत्सूर्यमपिन्वो अर्कैः॥
हे सोम! शुद्धिकाल में आपकी दूध में मिली हुई माधुर्ययुक्त धाराएं, ऊन की छलनी से छनकर बर्तन में विद्यमान होती हैं। तब शुद्धता को प्राप्त हुए आप सूर्य देवता के सदृश प्रखर तेज को ग्रहण करते हैं।(सामवेद 5.7.2)
Hey Somras! Your sweetened streams mixed in water, being filtered through the sieve of wool are stored in the vessel. On being sanctified you accept sharp radiance like Sury Dev.
प्र गायताभ्यर्चाम देवान्त्सोमं हिनोत महते धनाय।
स्वादुः पवतामति वारमव्यमा सीदतु कलशं देव इन्दुः॥
माधुर्य एवं तेज से युक्त सोमरस शोधन यन्त्र से क्षरित होकर बर्तन में प्रवाहित होता हुआ प्रतिष्ठित होता है। धन-ऐश्वर्य प्राप्त करने की अभिलाषा से हम स्तुति किये जाने वाले सोम को प्रेरित करते हुए देवगणों की आराधना करते हैं।(सामवेद 5.7.3)
Sweetened Somras having radiance on passing through purifier plant-machine flow into the vessels. We worship demigods-deities who inspire Som; with the desire of wealth-grandeur & prosperity.
प्र हिन्वानो जनिता रोदस्यो रथो न वाजं सनिषन्नयासीत्।
इन्द्रं गच्छन्नायुधा संशिशानो विश्वा वसु हस्तयोरादधानः॥
देवलोक तथा भूलोक का उद्गम करने वाले, शस्त्रों की धार को तेज करने वाले, देवगणों को पोषण देने वाले सोमदेव द्रुत गति से देवराज इन्द्र के पास गमन करते हुए मानो जगत् का सम्पूर्ण ऐश्वर्य हम याजकगणों को देने हेतु उपस्थित हुए हैं।(सामवेद 5.7.4)
Som Dev who evolve the heavens & earth, sharpen the weapons, nourishing the demigods-deities moves with high speed to Devraj Indr as if he has invoked to grant the entire grandeur of the universe to the Yajak Gan.
तक्षद्यदी मनसो वेनतो वाग् ज्येष्ठस्य धर्मं द्युक्षोरनीके।
आदीमायन्वरमा वावशाना जुष्टं पतिं कलशे गाव इन्दुम्॥
अभ्युदय की आकांक्षा से युक्त, उपासकों के चित्त में विचारों के माध्यम से अभिप्रेरित स्तुति, जिस सोम का निर्माण करती है, उस याग के श्रेष्ठ हवि के समीप उसकी सराहना होती है। तत्पश्चात् भली-भाँति तैयार, सबको पोषण प्रदान करने वाले एवं पात्र में प्रतिष्ठित इस सोम में गौ का माधुर्ययुक्त दुग्ध मिश्रित किया जाता है।(सामवेद 5.7.6)
अभ्युदय :: वृद्धि, उदय, ऊंचाई, चढ़ाव, उन्नति; prosperity, rise, aggrandizement, advent.
The prayers which inspire the innerself of the worshipers, with the desire of advent, Somras produced is appreciated near the best offerings of the Yagy. Thereafter, properly prepared, nourishing Somras kept in the pot is mixed with cow's milk.
साकमुक्षो मर्जयन्त स्वसारो दश धीरस्य धीतयो धनुत्रीः।
हरिः पर्यद्रवज्जाः सूर्यस्य द्रोणं ननक्षे अत्यो न वाजी॥
कर्म परायण उंगलियाँ सोमरस को शोधित करती है। यह दसों उंगलियाँ तेजवान् सोम को डोलाती एवं धारण करती हैं। हरे रंग का यह सोमरस सब दिशाओं में गमन करता हुआ, तीव्र वेग से चलने वाले अश्व के सदृश कलश में विद्यमान होता है।(सामवेद 5.7.7)
Fingers dedicated to work, purify the Somras. These ten finger move-churn aurous Somras and hold it in vessels. Greenish Somras moving in all directions like a high speed horse is stored in the vessel.
अधि यदस्मिन्वाजिनीव शुभः स्पर्धन्ते धियः सूरे न विशः।
अपो वृणानः पवते कवीयान्व्रजं न पशुवर्धनाय मन्म॥
जिस प्रकार घोड़े को अलंकारों से सुसज्जित करते हैं, उसी प्रकार सूर्य की रश्मियाँ उस सोम (सूर्य) को अलंकृत करती हैं। रस निकालने में ये दसों उंगलियाँ समझदारी के साथ प्रतियोगिता करती हैं। जैसे पशुओं का पालन-पोषण करने हेतु गोपति गायों को बाड़े में ले जाता है, वैसे ही पानी में मिश्रित होकर एवं स्तुतियों को श्रवण करते हुए सोम पात्रों में छनता है।(सामवेद 5.7.8)
The way the horse is decorated with ornaments, rays of Sun decorate Somras. The finger compete amongst themselves to squeeze Somras. The way the nurturers of animals-Goupati take the cows to the shed, Somras mixed in water is filtered in the vessels with the recitation of hymns-Stuties.
इन्दुर्वाजी पवते गोन्योघा इन्द्रे सोमः सह इन्वन्मदाय।
हन्ति रक्षो बाधते पर्यरातिं वरिवस्कृण्वन्वृजनस्य राजा॥
देवराज इन्द्र के पराक्रम में वृद्धि करने वाला, याजकों को धन प्रदान करने वाला, बल का अधिपति सोम आनन्द में वृद्धि करने हेतु पात्र में छाना जाता है। वह सोमरस असुरों का शमन करता है एवं दुर्जनों को विनष्ट कर देता है।(सामवेद 5.7.8)
Lord of might, strength & power Som, which increase valour-might of Devraj Indr, granting wealth to the Yajak is filtered with increase in pleasure. Somras destroys the demons and the wicked-vicious.
अया पवा पवस्वैना वसूनि माँश्चत्व इन्दो सरसि प्र धन्व।
ब्रध्नश्चिद्यस्य वातो न जूतिं पुरुमेधाश्चित्तकवे नरं धात्॥
हे सोम! आपकी धारा पवित्रता से युक्त है। आप हमें उसी धारा के माध्यम से धन-धान्य से परिपूर्ण करें। जैसे सूर्यदेव सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के मूलाधार हैं, वायु को गतिमान करने वाले हैं, वैसे ही आप वसतीवरी जल में मिश्रित होकर पात्र में उपस्थित होकर मेधावी देवराज इन्द्र को ग्रहण हों तथा हमें सुयोग्य संतान प्रदान करें।(सामवेद 5.7.9)
Hey Somras! Your current possess piousity. Enrich us with food grains & wealth with that current. The way Sury Dev is at the core-helm of the universe, Vayu Dev grants speed; similarly you on being mixed with Vastivari water, kept in the pot be accepted by Devraj Indr and grant us able progeny.
महत्तत्सोमो महिषश्चकारापां यद्गर्भोऽवृणीत देवान्।
अदधादिन्द्रे पवमान ओजोऽजनयत्सूर्ये ज्योतिरिन्द्रः॥
हे सोम! आप महान् हैं। आप श्रेष्ठ कर्मों को सम्पन्न करने वाले हैं, आप ही जल का गर्भ (धारण करने वाले) एवं देवगणों को अन्न प्रदान करने वाले हैं। आप ही पवित्र होकर देवराज इन्द्र को शक्ति प्रदान करते हैं एवं सूर्य देव को तेजवान बनाते हैं।(सामवेद 5.7.10)
Hey Som! You are great. You accomplish excellent efforts. You hold water and grant food grains to demigods-deities. On being sanctified you boost strength of Devraj Indr and make Sury Dev shine-radiant.(12.12.2025)
असर्जि वक्वा रथ्ये यथाजौ धिया मनोता प्रथमा मनीषा।
दश स्वसारो अधि सानो अव्ये मृजन्ति वह्निं सदनेष्वच्छ॥
जिस तरह घोड़ों को रणभूमि में भेजा जाता है, उसी तरह सर्वप्रिय, सर्वप्रथम स्तुत्य सोम शब्द करता हुआ, स्तोत्रों का उच्चारण करते हुए पात्र के जल में मिलाया जाता है। दसों उंगलियाँ सोम को ऊपर स्थित छलनी से छानकर (कलश में) गिराती हैं।(सामवेद 5.7.11)
The way horses are sent to war field, similarly Somras is initially mixed in water vessel reciting Strotrs. All the ten fingers involve in squeezing Som through the sieve.
अपामिवे दूर्म यस्तर्तुराणाः प्र मनीषा ईरते सोममच्छ।
नमस्यन्तीरुप च यन्ति सं चाच विशन्त्युशतीरुशन्तम्॥
जल की तीव्र वेगवान् लहरों के समान शीघ्रता से स्तुति करने वाले उद्गातागण याचनाओं को शीघ्र ही सोम के समीप पहुँचाते हैं। प्रगति की अभिलाषा रखने वाली नमनशील याचनाएँ लालसा करने वाले सोम के समीप पहुँचाती हैं तथा उसी में मिश्रित हो जाती है।(सामवेद 5.7.12)
Udgata Gan quickly move the prayers-Stuties like the fast moving waves-currents of water near Somras. Bowing requests-prayers with the desire for progress, reach Somras and are mixed in it.
सामवेद पावमानं पर्व (5.8) :: ऋषि :- अंधीगु, श्यावाश्चि, नहुषो मानव, ययातिर्नाहुष, मनु, सांवरण, भरद्वाज, रेभसूनू काश्यप, प्रजापतिर्वाच्योवा; देवता-पवमान, सोम; छन्द :-अनुष्टुप्, बृहती।
पुरोजिती वो अन्धसः सुताय मादयित्नवे। अप श्वानं श्नथिष्टन सखायो दीर्घजिह्वयम्॥
हे ऋत्विजों! आपके समक्ष हर्ष प्रदान करने वाला सोमरस रखा हुआ है। बड़ी जिह्वा वाले श्वान उस सोमरस के समीप पहुँचकर उसे जूठा करना चाहते हैं, अतः आप उन्हें वहाँ से दूर हटा दें।(सामवेद 5.8.1)
Hey Ritviz Gan! Gladdening Somras is kept in front of you. Dogs with long tongue wish to defile-invalidate or just make is left over. Hence, repel them away.
अयं पूषा रयिर्भगः सोमः पुनानो अर्षति। पतिर्विश्वस्य भूमनो व्यख्यद्रोदसी उभे॥
सभी जीवों को पोषण प्रदान करने वाला, पान करने योग्य, रमणीय, यह अलौकिक सोम छनते हुए नीचे पात्र (पृथ्वी) में गिरता है। प्राणियों का पालनकर्ता यह सोमरस अपने ओज से देवलोक एवं पृथ्वीलोक को प्रदीप्त करता है।(सामवेद 5.8.2)
Divine delightful Somras ready to drink granting nourishment to all living beings falls into the pot. Nurturer of living beings Somras illuminate the heavens and earth with its glow-aura.
सुतासो मधुमत्तमः सोमा इन्द्राय मन्दिनः। पवित्रवन्तो अक्षरन् देवान् गच्छन्तु वो मदाः॥
माधुर्ययुक्त एवं आनन्द प्रदान करने वाला सोमरस स्वच्छ होकर देवराज इन्द्र के निमित्त पात्र में विद्यमान होता है। हे सोम! आपका यह हर्ष प्रदान करने वाला रस देवताओं के समीप पहुँचे।(सामवेद 5.8.3)
Sweetened, gladdening Somras is ready in the vessel of Devraj Indr for drinking. Hey Som! Let your pleasure granting juice-sap reach demigods-deities.
सोमाः पवन्त इन्दवोऽस्मभ्यं गातुवित्तमाः। मित्राः स्वाना अरेपसः स्वाध्यः स्वर्विदः॥
उत्कृष्ट मार्गों का जानकार, सखा की भाँति, अभिषुत किया हुआ, कुकृत्य से रहित, एकाग्रचित्त करने वाला, आत्मज्ञाता यह सोमरस हमारे लिए पवित्र किया जाता है।(सामवेद 5.8.4)
Aware of the excellent routes-paths, like friends, extracted, free from wickedness, leading to concentration of mind, aware of innerself-granting self assessment Somras is sanctified for us.
अभी नो वाजसातमं रयिमर्ष शतस्पृहम्। इन्दो सहस्त्रभर्णसं तुविद्युम्नं विभासहम्॥
हे सोम! आप असंख्य लोगों द्वारा प्रशंसनीय, सहस्रों को पोषण प्रदान करने वाले, अत्यन्त प्रखर तेज से युक्त एवं शक्तिवर्द्धक हैं। आप हमें धन-धान्य प्रदान करें।(सामवेद 5.8.5)
Hey Somras! You are appreciated by numerous people, grant nourishment to hundreds, possessing extreme glow and boost strength. Grant us food grains and wealth.
अभी नवन्ते अद्रुहः प्रियमिन्द्रस्य काम्यम्। वत्सं न पूर्व आयुनि जातं रिहन्ति मातरः॥
जिस तरह गायें अपने बछड़े को चाटती हैं, उसी तरह हानि न पहुँचाने वाले जल समूह, देवराज इन्द्र को अत्यधिक प्रिय एवं ऐच्छिक सोम से मिश्रित हो जाते हैं।(सामवेद 5.8.6)
The way cows lick their calf, similarly harmless water bodies-reservoirs, are mixed with desired Somras dear to Devraj Indr.
आ हर्यताय धृष्णवे धनुष्टन्वन्ति पौंस्यम्।
शुक्रा वि यन्त्यसुराय निर्णिजे विपामग्रे महीयुवः॥
जिस तरह शूरवीर कमान पर प्रत्यंचा चढ़ाते हैं, उसी तरह पुरुषों में श्रेष्ठ, अर्चना की लालसा रखने वाले याजकगण, शत्रुओं को नष्ट करने वाले, पूजा करने योग्य सोम को उत्कृष्ट बनाने हेतु उसे शुद्ध गौ-दुग्ध से मिश्रित करते हैं। (उसे सेवन करने योग्य निर्मित करते हैं)।(सामवेद 5.8.7)
The way a mighty person pulls the string of bow, excellent in males, desirous of worship Yajak Gan, destroyer of the enemies, make Somras worth consuming by mixing it with cow's milk.
परि त्यं हर्यतं हरिं बभ्रुं पुनन्ति वारेण। यो देवान्विश्वाँ इत्परि मदेन सह गच्छति॥
हरिताभ एवं सर्वप्रिय सोम को भेड़ों के बालों की छलनी से छानते हैं। यह सोम देवराज इन्द्र आदि सभी देवों के समीप अपनी आनन्द पहुँचाने वाली धाराओं सहित पहुँचता है।(सामवेद 5.8.8)
Greenish Somras liked by everyone is filtered through the hairs of sheep. This Somras reach Devraj Indr & demigods-deities through gladdening streams-currents.
प्र सुन्वानायान्धसो मर्तों न वष्ट तद्वचः। अप श्वानमराधसं हता मखं न भृगवः॥
शुद्ध होते समय सोम का शब्द, विघ्न उत्पन्न करने वाले व्यक्ति श्रवण न करें। हे याजकों! जिस प्रकार भृगु ऋषि ने दान-दक्षिणा से रहित मख नामक असुर को विनष्ट कर दिया था, उसी तरह इन गंडको (कुत्तों) को यज्ञ-स्थल से दूर हटा दो।(सामवेद 5.8.9)
While purification the sound produced by Somras should not be heard by disturbing people. Hey Yajak Gan! The way Rishi Bhragu destroyed the demons named Makh, similarly the dogs should be repelled from the Yagy site.
सामवेद पावमानं पर्व (5.9) :: ऋषि :- कविभार्गव, सिकता निवावरी, रेणुर्वैश्वामित्र, वेनोभार्गव, वसुर्भारद्वाज, वत्सप्री, गृत्समद, शौनक, पवित्र आंगिरस; देवता :- पवमान, सोम; छन्द :- जगती।
अभि प्रियाणि पवते चनोहितो नामानि यह्नो अधि येषु वर्धते। आ सूर्यस्य बृहतो बृहन्नधि रथं विष्वञ्चमरुहद्विचक्षणः॥
लोकातीत सोम, सभी जगह जाने वाले सूर्य के रथ पर विराजमान होकर सम्पूर्ण विश्व को देखने वाला बन जाता है। वह भरतार जल के साथ मिश्रित होकर, पोषण के लिए हितैषी बनकर, व्यापक होता हुआ प्रवाहित होता है।(सामवेद 5.9.1)
लोकातीत :: असाधारण; superhuman, preternatural, extra ordinary.
Extra ordinary Somras ride the charoite of Sury Dev and become viewer of the whole universe. It become well wisher and nourishing like a husband on mixing with water and flow acquiring huge mass-quantum.(13.12.2025)
अचोदसो नो धन्वन्त्विन्दवः प्र स्वानासो बृहद्देवेषु हरयः।
वि चिदश्नाना इषयो अरातयोऽर्यो नः सन्तु सनिषन्तु नो धियः॥
अन्य लोगों से प्रेरित न होने वाला, उचित तरीके से अभिषुत किया गया, हरे एवं भूरे रंग का सोमरस, यजमानों के याग में पधारे। दान न करने वाले, यज्ञ में बाधा उत्पन्न करने वाले विपक्षी, यजमानों के बैरी, पोषण की लालसा करने पर भी उसे न ग्रहण कर सकें। हमारी स्तुतियां देवताओं तक पहुँचे।(सामवेद 5.9.2)
Extracted through proper means-methods, uninspired by other people, greenish and brownish Somras should reach the Yagy of the Yajmans. Those who create obstacles in Yagy, do not donate, enemies of the Yajmans should not be able to get Somras with the desire for nourishment. Let our prayers-Stuties reach the demigods-deities.
एष प्र कोशे मधुमाँ अचिक्रददिन्द्रस्य वज्रो वपुषो वपुष्टमः।
अभ्यृ3तस्य सुद्घा घृतश्चतो वाश्रा अर्षन्ति पयसा च धेनवः॥
देवराज इन्द्र के वज्र के सदृश सामर्थ्यवान्, दूध देने वाली गायों के घी से युक्त उत्कृष्ट दुग्ध की धारा की भाँति नाद करता हुआ, मनोहरम बीजों को प्रस्फुटित करने वाला सोमरस, काष्ठ के पात्र में प्रवाहित होता है।(सामवेद 5.9.3)
बीज प्रस्फुटित होना :: बीज अंकुरण-अंकुरित; seed germination.
Capable like the Vajr of Devraj Indr, like the stream of milch cow's excellent milk containing Ghee & making sound, germinating beautiful seeds; Somras flows into wooden pot.
प्रो अयासीदिन्दुरिन्द्रस्य निष्कृतं सखा सख्युर्न प्र मिनाति सङ्गिरम्।
मर्य इव युवतिभिः समर्षति सोमः कलशे शतयामना पथा॥
सखा की भाँति यह सोमरस देवराज इन्द्र के उदर में पहुँचकर हर्ष प्रदान करता है, उन्हें कोई संताप नहीं देता है। जैसे नवयुवक नवयुवतियों के संग मिल-जुलकर वास करते है, वैसे ही यह सोम जल के साथ संयुक्त होकर, छलनी से छनकर पात्र में प्रतिष्ठित होता है।(सामवेद 5.9.4)
Somras reaches Devraj Indr's stomach like a friend and gladden him without troubling-torturing him. The way young man & woman live together, Somras mixed with water passes through the sieve and is stored in the pot-Kalash.
घर्ता दिवः पवते कृत्व्यो रसो दक्षो देवानामनुमाद्यो नृभिः।
हरिः सृजानो अत्यो न सत्वभिर्वृथा पाजांसि कृणुषे नदीष्वा॥
धारण करने की क्षमता से युक्त सोम अपने कर्मों को श्रद्धापूर्वक करने वाला, देवगणों के पुरुषार्थ में वृद्धि करने वाला, पात्र में शोधन यन्त्र से छनकर प्रविष्ट होता है। यजमानों के माध्यम से शोधित यह सोमरस शक्तिशाली घोड़ों के सदृश सरलता से ही स्वतः नदी के जल में संयुक्त हो जाता है।(सामवेद 5.9.5)
Somras with the capability to support, performs its functions respectfully, increase the calibre-efforts of demigods-deities, enter the pot after filtration through the purification plant. Through the Yajmans, purified Somras easily, mixes with the river water easily, like powerful horses.
वृषा मतीनां पवते विचक्षणः सोमो अह्नां प्रतरीतोषसां दिवः।
प्राणा सिन्धूनाँ कलशाँ अचिक्रददिन्द्रस्य हार्धाविशन्मनीषिभिः॥
यजमानों की अभिलाषाओं को पूरा करने वाला, सम्पूर्ण विश्व पर अपनी कृपा दृष्टि रखने वाला, दिवस, उषा एवं दिनकर के बल में वृद्धि करने वाला यह सोम शुद्ध किया जाता है। नदी के जीवन दायक पानी में संयुक्त होकर, दृष्टिवत स्तोताओं के माध्यम से अभिषुत किया हुआ यह सोमरस देवराज इन्द्र के उदर में जाने की लालसा से बर्तन में नाद करता हुआ प्रविष्ट होता है।(सामवेद 5.9.6)
Somras which accomplish the wishes-desires of the Yajmans, looking with mercy over the whole universe, increasing the power of day, Usha and the Sun is purified. Mixed in the life supporting water of the river, extracted by the Stotas carefully the Somras with the desire of reaching the stomach of Devraj Indr; enter the pot making sound.
त्रिरस्मै सप्त धेनवो दुदुह्रिरे सत्यामाशिरं परमे व्योमनि।
चत्वार्यन्या भुवनानि निर्णिजे चारूणि चक्रे यदृतैरवर्धत॥
विशाल अन्तरिक्ष में विद्यमान इस सोम को त्रिसप्त (तीन एवं सात के संयोग से निर्मित) अर्थात् इक्कीस गौएँ (पोषक शक्तियां) उत्कृष्ट दूध प्रदान करती हैं। जिस समय यह सोम याग आदि द्वारा बढ़ता है, उस समय चारों लोकों के जल, दूध को शोधित करने हेतु हितकारी रूप से प्रवााहित (गतिशील) होते हैं।(सामवेद 5.9.7)
त्रिसप्त :: 3x7=21.
Somras present in the space is enriched with the excellent milk of twenty one cows. When Som Yagy is accomplished, water from the four abodes (heavens, earth, nether world and space), is made to flow to purify milk.
इन्द्राय सोम सुषुतः परि स्त्रवापामीवा भवतु रक्षसा सह।
मा ते रसस्य मत्सत द्वयाविनो द्रविणस्वन्त इह सन्त्विन्दवः॥
हे सोम! आप उत्कृष्ट विधि से अभिषुत होने के बाद देवराज इन्द्र के पान करने के लिए गतिमान हों तथा विकार एवं असुरों से मुक्त हों। दो तरह का (झूठा एवं सच्चा) आचरण करने वाले दुर्जन मनुष्य इस सोमरस को ग्रहण न कर पायें। इस हितकारी याग में यह सोमरस धन-संपत्ति से सम्पन्न बने।(सामवेद 5.9.8)
Hey Somras! You should flow to be consumed by Devraj Raj on being extracted through best procedures, freed from impurities and demons. People with dualistic behaviour should not be able to drink it. Let Somras possess wealth & prosperity in the favourable Yagy.
असावि सोमो अरुषो वृषा हरी राजेव दस्मो अभि गा अचिक्रदत्।
पुनानो वारमत्येष्यव्ययं श्येनो न योनिं घृतवन्तमासदत्॥
तेजोमय, बल बढ़ाने वाला, हरिताभ सोमरस तैयार किया गया है। वह सोम, नरेश की भाँति रमणीय है। गाय के दूध में संयुक्त होने के पश्चात् नाद करता हुआ, पावन होने के बाद भी यह शोधन यन्त्र से शुद्ध किया जाता है। तत्पश्चात् श्येन पक्षी की तरह जल से परिपूर्ण कलश में प्रवाहित होकर प्रतिष्ठित होता है।(सामवेद 5.9.9)
Radiant, strength boosting greenish Somras is ready. Somras is delightful like a king. Sound producing Somras mixed in cow's milk is subjected to further purification by machine in spite of purifying. Thereafter, its made to be stored in the Kalash containing water, like a hawk.
प्र देवमच्छा मधुमन्त इन्दवोऽसिष्यदन्त गाव आ न धेनवः।
बर्हिषदो वचनावन्त ऊधभिः परिस्रुतमुस्त्रिया निर्णिजं घिरे॥
यह सोमरस माधुर्ययुक्त है। यह देवताओं के पान करने के निमित्त कलश में प्रवाहित होते हुए उसी प्रकार प्रविष्ट करता है, जिस प्रकार गौएँ अपने बछड़ों के समीप पहुँचती हैं। यज्ञशाला में विद्यमान एवं रँभाती हुई गायें अपने कुचों से टपकने वाले दूध में सोमरस को धारण करती हैं।(सामवेद 5.9.10)
Somras is sweetened. It flows into the Kalsh for consumption by the demigods-deities like the cows reaching their calf. Cows present in the Yagy Shala hold Somras in the milk coming out of their nipples-udder.
(Somras is mixed in the milk of the cows present in the Yagy Shala).
अञ्जते व्यञ्जते समञ्जते क्रतुं रिहन्ति मध्वाभ्यञ्जते।
सिन्धोरुछ्वासे पतयन्तमुक्षणं हिरण्यपावाः पशुमप्सु गृभ्णते॥
यजमान, सोमरस को गाय के दूध में विशेषता युक्त तरीके से भली-भांति मिश्रित करते हैं, जिसका देवता लोग आस्वादन करते हैं। उस सोम में गौ का घी एवं मधु संयुक्त करते हैं। तत्पश्चात् सरोवर के पानी में विराजमान सोम को सुवर्ण से शोधित करके कान्तिमय रूप प्रदान करते हैं।(सामवेद 5.9.11)
Yajman mix the Somras in cow's milk with various techniques, which is tasted- drunk by the demigods-deities. Somras is mixed with cow's ghee and honey. Thereafter, its treated with the water of the reservoir to give it lustre.
पवित्रं ते विततं ब्रह्मणस्पते प्रभुर्गात्राणि पर्येषि विश्वतः।
अतप्ततनूर्न तदामो अश्नुते शृतास इद्वहन्तः सं तदाशत॥
हे वेदों के ज्ञाता सोम! आपके पावन अंग सभी जगह व्याप्त है। आप पराक्रमी होने के निमित्त सेवन करने वाले के शरीर में स्फूर्ति का संचार करते हैं। तपस्या से जिसका देह तेजोमय नहीं हुआ है, उसे वह फल ग्रहण नहीं हो पाता है। उपासना परिपक्व होने के बाद ही उपासक उसे ग्रहण करने में सक्षम होता है अर्थात् तभी उस पर आपकी कृपा होती है।(सामवेद 5.9.12)
Hey Som having deeply learnt Veds! Your pious organs pervade all places. Somras cause alertness in the body of one who consume it for becoming mighty. One who has not attained aura due to ascetics-Tapasya fails to have its impact-affect. Only after success of the worship one becomes capable of accepting the reward-impact of it.(14.12.2025)
सामवेद पावमानं पर्व (5.10) :: ऋषि :- अग्निश्चाक्षुष, चक्षुर्मानव, पर्वतनारदौ, त्रित आप्त्य, मनुराप्सव, द्वित आप्त्य; देवता :- पवमान, सोम; छन्द :- उष्णिक्।
इन्द्रमच्छ सुता इमे वृषणं यन्तु हरयः। श्रुष्टे जातास इन्दवः स्वर्विदः॥
अविलम्ब तैयार हुआ, ज्ञान में वृद्धि करने वाला, यह हरे एवं भूरे रंग का सोमरस शक्तिशाली देवराज इन्द्र को शीघ्रता से प्राप्त हो।(सामवेद 5.10.1)
Let this Gyan-knowledge boosting, greenish & brownish Somras prepared without delay, be availed by Devraj Indr quickly.
प्र धन्वा सोम जागृविरिन्द्रायेन्दो परि स्रव। द्युमन्तं शुष्ममा भर स्वर्विदम्॥
हे सोमदेव! उमंग से परिपूर्ण होकर आप, देवराज इन्द्र के पान करने के उद्देश्य से पात्र में प्रविष्ट हो। हमें ओज बढ़ाने वाले तथा बुद्धि में वृद्धि करने वाले पराक्रम से सम्पन्न कर दें।(सामवेद 5.10.2)
उमंग :: पदोन्नति, उल्लास, उत्साह, जोश, राग; enthusiasm, exaltation, exultation.
Hey Somras! Full of enthusiasm-exaltation Somras should enter the pot for drinking by Devraj Indr. Fill us with aura, intelligence and valour.
सखाय आ नि षीदत पुनानाय प्र गायत। शिशुं न यज्ञैः परि भूषत श्रिये॥
हे सखाओं (मनुष्यों)! आप यहाँ आसन ग्रहण करें। सोम को अभिषुत करते समय सामगान करो। जैसे-नवजात बच्चे को आभरण से सुसज्जित करते हैं, वैसे ही याग (हवनीय सामग्री) से इस सोमरस को अलंकृत करो।(सामवेद 5.10.3)
Hey friends! Occupy the cushion-seat here. While extracting Somras recite Sam Gan. The way an infant is decorated with ornaments-clothing, similarly decorate this Somras with the Yagy related goods.
तं वः सखायो मदाय पुनानमभि गायत। शिशुं न हव्यैः स्वदयन्त गूर्तिभिः॥
प्रफुल्लित करने वाले, सोमरस का शोधन करते समय हे सखाओं! इसकी याचना करो। नवजात बालक को जैसे सजाया जाता है, वैसे ही हवियों एवं सामगान के माध्यम से आप इसे स्वादिष्ट अर्थात् ग्रहण करने योग्य निर्मित करें।(सामवेद 5.10.4)
Hey friends colleagues! While extracting Somras worship it. The way an infant is decorated, make it tasty with oblations and Sam Gan.
प्राणा शिशुर्महीनां हिन्वज्ञतस्य दीधितिम्। विश्वा परि प्रिया भुवदध द्विता॥
यह सोम, यज्ञ का मूलाधार एवं जल की संतान है। यह याग को प्रदीप्त करने वाले अपने रस को प्रेरित करता है। यह समस्त हवियों में विद्यमान होता हुआ, द्यावा-पृथ्वी तक प्रतिष्ठित रहता है।(सामवेद 5.10.5)
Som forms the basis of Yagy and is the progeny of water (Varun Dev). It illuminate the Yagy and inspire juice-sap. Being present in all offerings, its established-honoured in the heavens & earth.
पवस्व देववीतय इन्दो धाराभिरोजसा। आ कलशं मधुमान्त्सोम नः सदः॥
हे सोम! देवताओं के ग्रहण करने के निमित्त, द्रुत गतिमान धाराओं के साथ आप बर्तन में प्रविष्ट हो। प्रसन्नता प्रदान करने वाले हे सोम! आप हमारे इस पात्र में विराजमान हों।(सामवेद 5.10.6)
Hey Somras! Enter the vessel to be drunk by the demigods-deities. Hey pleasure granting Somras! Settle in the pot.
सोमः पुनान ऊर्मिणाव्यं वारं वि धावति। अग्रे वाचः पवमानः कनिक्रदत्॥
स्वच्छ होने वाला, सामगान के बाद शब्द करता हुआ, निष्पन्न होने वाला यह सोम, अपनी तीव्र धारा सहित शोधन यन्त्र में छनने के लिए गमन करता है।(सामवेद 5.10.7)
After cleansing & Sam Gan sound producing, extracted Somras enters the machine for filtration with high speed.
प्र पुनानाय वेधसे सोमाय वच उच्यते। भृतिं न भरा मतिभिर्जुजोषते॥
हे स्तोताओं! आप पवित्र होने वाले एवं कर्म करने के लिए प्रेरणा प्रदान करने वाले सोम की याचना करें। जिस प्रकार हम परिचारक की आराधना से हर्षित होकर उसे धन-धान्य से परिपूर्ण कर देते हैं, उसी प्रकार हम सोम को हर्षित करने के निमित्त विशेष सामगान करें।(सामवेद 5.10.8)
Hey Stotas! Worship Somras to inspire for virtuous-righteous efforts. The way we enrich the servants with food grains and wealth on being happy with their service-requests, similarly we should recite Som Gan to gladden Som.
गोमन्न इन्दो अश्ववत्सुतः सुदक्ष धनिव। शुचिं च वर्णमधि गोषु धारय॥
अभिषवण करने के बाद पराक्रमी सोम! आप हमें गौ तथा अश्वों से सम्पन्न धन देने की कृपा करें। इसके बाद गाय के दुग्ध में संयुक्त होकर पवित्र वर्ण (श्वेत रंग) वाले निर्मित हो जाएँ।(सामवेद 5.10.9)
अभिषवण :: स्नान, विशेषकर यज्ञ या धार्मिक अनुष्ठानों के समय का स्नान और यह सोमरस को निचोड़ने या निकालने की क्रिया या उसके लिए प्रयुक्त साधन।
After bathing and rituals, hey mighty Som! Enrich us with cows and horses i.e., grant us wealth. Thereafter, on being mixing with cow's milk acquire white colour.
अस्मभ्यं त्वा वसुविदमभि वाणीरनूषत। गोभिष्टे वर्णमभि वासयामसि॥
हे सोम! आप धन के स्वामी हैं, हमें आपके द्वारा दिया हुआ धन प्राप्त हो, अतएव हम वेदवाणी से युक्त आपकी स्तुति करते हैं। हम आपके रस को गाय के दूध में संयुक्त करते हैं।(सामवेद 5.10.10)
Hey Som! You are the Lord of wealth. Let us have the wealth granted by you. Hence, we worship you with Ved Vani (Mantrs, Shloks, Stutis etc). We mix your sap-juice in cow's milk.
पवते हर्यतो हरिरति ह्वरांसि रं ह्या। अभ्यर्ष स्तोतृभ्यो वीरवद्यशः॥
हे नमस्कार करने योग्य हरिताभ सोम! आप छलनी के माध्यम से शुद्ध होते हुए, वेगपूर्वक धारा सहित हमारे पात्र में प्रवाहित होते हैं। आप हम सभी याजकों को संतान अथवा पोषण से संबंधित ऐश्वर्य प्रदान करें।(सामवेद 5.10.11)
Hey salute deserving greenish Somras! On being filtered through the sieve you move into the pot with speed. Grant progeny and grandeur related to nourishment to all of us i.e., the Yajak Gan.
परि कोशं मधुश्रुतं सोमः पुनानो अर्षति। अभि वाणीर्ऋषीणां सप्ता नूषत॥
हे सोम! आप पवित्र होते हुए अपने माधुर्ययुक्त रस को कलश में प्रविष्ट कराते हैं। गायत्री आदि सातों छन्द वाली ऋषियों की वाणियाँ आपकी याचना करती हैं।(सामवेद 5.10.12)
Hey Somras! Your sweetened sap-juice enter the vessel on being purified. Gayatri etc verses constituting seven Chhands worship you.
सामवेद पावमानं पर्व (5.11) :: ऋषि :- गौरवीति शाक्त्य, उर्ध्वसद्या आंगिरस, ऋजिश्वा भरद्वाज, कृतयशा आंगिरस, ऋणंचय, शक्तिर्वासिष्ठ, उरुयंगिरस; देवता :- पवमान, सोम; छन्द :- ककुप्, यवमध्या गायत्री।
पवस्व मधुमत्तम इन्द्राय सोम क्रतुवित्तमो मदः। महि द्युक्षतमो मदः॥
हे सोम! आप अत्यधिक मधुरता से युक्त, याग के विषय में सब कुछ जानने वाले, उत्कृष्ट शान्ति से युक्त तथा हर्षवर्द्धक है। आप देवराज इन्द्र को प्रसन्न करने के निमित्त पवित्र हों।(सामवेद 5.11.1)
Hey Som! You possess lots of sweetness, aware of every thing about the Yagy, has excellent peace and boost happiness. Become purified for gladdening Devraj Indr.
अभि द्युम्नं बृहद्यश इषस्पते दिदीहि देव देवयुम्। वि कोशं मध्यमं युव॥
हे अन्न के अधिष्ठाता तथा तेजोमंडित सोम! आप देवताओं के पान करने योग्य हैं। आप हमें कान्तिमय तथा महान् ऐश्वर्य प्रदान करें एवं द्रोण कलश में प्रवाहित होकर उसे परिपूर्ण कर दें।(सामवेद 5.11.2)
Hey Lord of food lustrous Somras! You are fit-suitable for drinking by the demigods-deities. Grant us illuminate-lustrous grandeur and flow through the Dron-wooden vessel, to fill it.
आ सोता परि षिञ्चताश्वं न स्तोममप्तुरं रजस्तुरम्। वनप्रक्षमुदप्रुतम्॥
हे यजमानों! स्तुति करने योग्य, घोड़े की भाँति द्रुत गतिमान, जल की भाँति बहने वाले, प्रकाश की रश्मियों की भाँति त्वरित उपस्थित होने वाले, जल में मिले हुए, जल से सम्पन्न सोमरस को निचोड़ें तथा उसे गौ-दुग्ध से सिंचित करें।(सामवेद 5.11.3)
Hey Yajman Gan! Squeeze the Somras mixed with water and cow's milk; which deserve worship, move fast like a horse, flowing like water, quick like the rays of light.
एतमु त्यं मदच्युतं सहस्त्रधारं वृषभं दिवोदुहम्। विश्वा वसूनि बिभ्रतम्॥
प्रसन्नता प्रदान करने वाले, हजारों प्रवाह के साथ पात्र में गिरने वाले, बल बढ़ाने वाले, समस्त ऐश्वयों के अधिपत्ति इस सोमरस को विद्वान् लोग अभिषुत करते हैं।(सामवेद 5.11.4)
Somras is extracted by the learned-scholars which grants happiness-pleasure, falling through thousands of streams-currents and is the Lord of all grandeurs.
स सुन्वे यो वसूनां यो रायामानेता य इडानाम्। सोमो यः सुक्षितीनाम्॥
याजकों ने धन-वैभव, दूध आदि पदार्थ, पृथ्वी एवं उत्तम संतान देने वाले उस सोम के रस को अभिषुत कर लिया है।(सामवेद 5.11.5)
The Yajak Gan have extracted Somras which grants wealth-prosperity, milk and other goods-materials, land-home.
त्वं ह्या3ङ्ग दैव्यं पवमान जनिमानि द्युमत्तमः। अमृतत्वाय घोषयन्॥
हे सोम देवता! आप अत्यधिक तेजस्वी, अद्भुत जन्मों के जानकार एवं उनकी अमरता की उद्घोषणा करने वाले हैं।(सामवेद 5.11.6)
Hey Somras! You are radiant, aware of amazing rebirths and declare their immortality.(15.12.2025)
एष स्य धारया सुताऽव्या वारेभिः पवते मदिन्तमः। क्रीळन्नूर्मिरपामिव॥
परम आनन्द प्राप्त कराने वाले, जल की लहरों के समान खेल खेलते हुए यह सोमरस ऊन के शोधन यन्त्र से छनते हुए पात्र में प्रवाहित होता है।(सामवेद 5.11.7)
Somras grants bliss, playing with the water waves, passes through the purification plant made of wool and flows into the pot.
य उस्त्रिया अपि या अन्तरश्मनि निर्गा अकृन्तदोजसा।
अभि व्रजं तत्निषे गव्यमश्र्व्यं वर्मीव घृष्णवा रुज। ॐ वर्मीव धृष्णवा रुज॥
यह सोम, मेघ के अंदर उपस्थित पानी को अपने बल से इधर-उधर कर देता है, व्योम का विस्तार करने वाला यह सोम पानी को प्राप्त करने वाला है। यह गायों एवं घोड़ों को चहुँ ओर से आच्छादित कर लेता है। हे शत्रुओं का शमन करने वाले सोम! रक्षा कवच धारण करने वाले योद्धा के सदृश आप शत्रुओं का संहार करें।(सामवेद 5.11.8)
व्योम :: आकाश, अंतरिक्ष, आसमान; space, sky, ether, welkin.
Som moves the water present in the clouds hither & thither with its strength, leading to extension of sky and sucks water. It covers the cows and horses from all sides. Hey destroyers of the enemies Som! Destroy the enemies like the warrior who wear shield.
सामवेद आरण्यं पर्व (6.1) :: ऋषि :- भरद्वाज, वसिष्ठ, वामदेव, शुनःशेप, गृत्समद, अमहीयु, आत्मा; देवता :- इन्द्र, वरुण, पवमान, सोम, विश्वेदेवा, अन्नम्; छन्द :- वृहती, त्रिष्टुप्, गायत्री, जगती।
इन्द्र ज्येष्ठं न आ भर ओजिष्ठं पुपुरि श्रवः। यद्दिधृक्षेम वज्रहस्त रोदसी उभे सुशिप्र पप्राः॥
हे वज्र धारण करने वाले देवराज इन्द्र! आप हमें तेज तथा शक्ति से युक्त अन्न (पोषक पदार्थ) प्रदान करें। जो पौष्टिकता से युक्त अन्न द्यावा-पृथ्वी तक पोषण प्रदान करते हैं, उन्हें हम अपने समीप रखने की अभिलाषा करते हैं।(सामवेद 6.1.1)
Hey Vajr wielding Devraj Indr! Grant us nourishing food grains equipped with Tej (might) and strength. We wish to have the food grains with us which grants nourishment over the earth and in the heavens.
इन्द्रो राजा जगतश्चर्षणीनामधि क्षमा विश्वरूपं यदस्य।
ततो ददाति दाशुषे वसूनि चोदद्राध उपस्तुतं चिदर्वाक्॥
देवराज इन्द्र ही सम्पूर्ण जगत् के अधिपति एवं समस्त धन-वैभव के सम्राट हैं, अतएव दान करने की प्रवृत्ति वालों को वे जीवन के लिए उपयोगी पदार्थ देते हैं। वे उत्कृष्ट (लौकिक तथा दैवी) धन-संपत्ति हमारी तरफ प्रेषित करें।(सामवेद 6.1.2)
WORLDLY :: सांसारिक, लौकिक; earthly, mundane, carnal, terrestrial, cosmic, profane.
Devraj Indr is the Lod of the whole universe, wealth, grandeur, prosperity. He grants useful commodities to those who has the tendency to donate. He should direct the divine and worldly wealth & grandeur towards us.
यस्येदमा रजोयुजस्तुजे जने वनं स्वः। इन्द्रस्य रन्त्यं बृहत्॥
हे महाप्रतापी देवराज इन्द्र! आपके द्वारा दिया गया दान देवलोक एवं दानी दोनों लोगों के मध्य गुणगान करने योग्य, सर्वश्रेष्ठ तथा संतुष्टि प्रदान करने वाला है।(सामवेद 6.1.3)
महाप्रतापी :: शानदार, आलीशान, तेजस्वी, ठाठदार, शोभमान; majestic, magnificent.
Hey magnificent Devraj Indr! Donations made by you deserve appreciation in the heavens and amongest the donors, being excellent, satisfying.
उदुत्तमं वरुण पाशमस्मदवाधमं वि मध्यमं श्रथाय।
अथादित्य व्रते वयं तवानागसो अदितये स्याम॥
हे वरुण देव! आप ऊँचे बन्धनों को हमसे ऊपर की तरफ से, निम्न बन्धनों को नीचे की तरफ से और बीच के बन्धनों को खोलकर हमें बन्धन रहित कर दें, जिससे हम आपके अनुशासन स्वरूप आचरण करके कुकृत्य एवं संताप से मुक्त होकर जीवन-यापन कर सकें।(सामवेद 6.1.4)
संताप :: दु:ख, कष्ट, पीड़ा, दण्ड; agony, anguish, pain, sorrow.
Hey Varun Dev! Make us free form all ties-bonds, so that we adopt discipline life, remain aloof from wickedness and agony.
त्वया वयं पवमानेन सोम भरे कृतं वि चिनुयाम शश्वत्।
तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदितिः सिन्धुः पृथिवी उत द्यौः॥
हे सोम देव! आप सम्पूर्ण विश्व को पवित्र करने वाले हैं। आपके सहयोग से हम रणभूमि (जीवन-संग्राम) में लगातार श्रेष्ठ कर्मों का चुनाव करें। जिसके निमित्त अदिति, मित्र वरुण, धरती, सागर एवं परमधाम हमें समृद्धशाली बनाएँ।(सामवेद 6.1.5)
Hey Som Dev! You make the entire world pure-pious. Let us select best endeavours with your cooperation. Let the earth, Aditi, Mitr-Varun, ocean-Sagar and the Ultimate abode make us prosperous for this purpose.
इमं वृषणं कृणेतैकमिन्माम्॥
हे देवों! आप इस सोम को शक्ति से सम्पन्न बनाएँ, जिससे वह हमारी सभी अभिलाषाओं को पूर्ण कर सकें तथा हमें सामर्थ्यवान् बना दे।(सामवेद 6.1.6)
Hey demigods-deities! Make Som full of strength so that its able to accomplish our wishes-desires and capable.(16.12.2025)
स न इन्द्राय यज्यवे वरुणाय मरुद्भयः वरिवोवित्परिस्रव॥
हमें समृद्धिवान् बनाने वाले हे सोम देव! हम याजकगण जिनके लिए याग करते हैं, उन इन्द्र, मरुतों एवं वरुण देवताओं के ग्रहण करने के उद्देश्य से आप अच्छी तरह से पवित्र हों।(सामवेद 6.1.7)
Hey Somras enriching us! You should be thoroughly sanctified for consumption by Indr Dev, Marud Gan, Varun Dev; for whom we Yajak Gan organise Yagy.
एना विश्वान्यर्य आ द्युम्नानि मानुषाणाम्। सिषासन्तो वनामहे॥
इस सोम के सहयोग से मानवों हेतु आवश्यक सब तरह के अन्नादि (धन) हमें प्राप्त हों। हम उनके उत्कृष्ट प्रयोग की लालसा रखते हैं।(सामवेद 6.1.8)
Let us have all sorts of food grains etc. With the help of Som, we wish to put it to excellent use.
अहमस्मि प्रथमजा ऋतस्य पूर्वं देवेभ्यो अमृतस्य नाम।
यो मा ददाति स इदेवमावदहमन्नमन्नमदन्तमद्मि॥
मैं अन्न देवता सनातन याग के माध्यम से देवगणों से भी पूर्व पैदा हुआ हूँ। जो मुझे अतिथियों को प्रदान करते हैं, वे अवश्य ही समस्त लोगों की भलाई करते हैं। जो दान न देकर, अकेले ही मेरा भक्षण करते हैं, उन कंजूसों को तो मैं ही नष्ट कर देता हूँ।(सामवेद 6.1.9)
I, deity of food grains evolved prior to demigods through eternal Yagy. Those who award-offer me to the guests, certainly resort to the welfare of all people-whole community. Those who do not donate and just eat me alone are destroyed by me.
सामवेद आरण्यं पर्व (6.2) :: ऋषि :- श्रुतकक्ष, पवित्र, मधुच्छन्दा, वैश्वामित्र, प्रथ, गृत्समद, नृमेधपुरुमेधौ; देवता :- इन्द्र, पवमान, विश्वेदेवा, वायु; छन्द :- गायत्री, जगती, त्रिष्टुप्, अनुष्टुप्।
त्वमेतदधारयः कृष्णासु रोहिणीषु च। पुरुष्णीषु रुशत्पयः॥
हे देवराज इन्द्र! आपने काले, भूरे, लाल, आदि अनेक रंगों की गौओं में एक समान तेजो मंडित सफेद रंग के दूध को प्रतिस्थापित किया है। हम आपकी इस दिव्य शक्ति का गुणगान करते हैं।(सामवेद 6.2.1)
Hey Devraj Indr! You have established aurous-radiant milk in the cows possessing different colours viz black, brown, red. We praise your divine powers.
अरूरुचदुषसः पृश्निरग्रिय उक्षा मिमेति भुवनेषु वाजयुः।
मायाविनो ममिरे अस्य मायया नृचक्षसः पितरो गर्भमादधुः॥
उषाकाल एवं सूर्य से संबन्धित सोम अपने आप ही प्रदीप्त होते हैं। जल वृष्टि करने में समर्थ मेघ, विश्व को अन्नादि पोषण प्रदान करने की अभिलाषा से नाद करते हैं। उत्कृष्ट देवगणों ने अपनी योग्यता से इस संसार का निर्माण किया है। देख-रेख करने वाले पितरों अर्थात् विश्व का पालन-पोषण करने वाली किरणों ने वनस्पतियों में गर्भ प्रतिस्थापित किये या जलवृष्टि करने हेतु गर्भ धारण किया।(सामवेद 6.2.2)
Som related to Usha Kal (morning) and Sun illuminate by it self. Clouds capable of showring rains, thunder with the desire of granting nourishment to the universe. Excellent demigods-deities have produced the universe with their ability. The Manes supervising the universe and the rays of light which nourish the vegetation have either established the foetus in them or the vegetation has conceived for the sake of showering rains.
इन्द्र इद्धयोंः सचा सम्मिश्ल आ वचोयुजा। इन्द्रो वज्री हिरण्ययः॥
वज्रपाणि, सुवर्ण के अलंकारों से सुशोभित, देवराज इन्द्र के केवल संकेत मात्र से ही रथ के बल एवं वैभव रूपी दोनों अश्व रथ में एक साथ संयुक्त हो जाते हैं, अर्थात् वह अपने सारथी इन्द्र के पूर्ण प्रतिबन्धन में रहते हैं।(सामवेद 6.2.3)
Greenish horses together deploy themselves in the charoite as per the strength and grandeur just by signalling by Vajr wielding Devraj Indr decorated with ornaments-jewels. They remain under the command of the charioteer Devraj Indr.
इन्द्र वाजेषु नोऽव सहस्रप्रधनेषु च। उग्र उग्राभिरूतिभिः॥
हे देवराज इन्द्र! आप सहस्रों तरह के हितकारी धन वाले, छोटे-बड़े युद्धों में बलपूर्वक हमें संरक्षण प्रदान करें। (सामवेद 6.2.4)
Hey Devraj Indr! Grant us protection forcefully in hundreds of beneficial wealth-riches in large or small scale wars.
प्रथश्च यस्य सप्रथश्च नामानुष्टुभस्य हविषो हविर्यत्।
धातुर्द्युतानात्सवितुश्च विष्णो रथन्तरमा जभारा वसिष्ठः॥
वसिष्ठ के वत्स प्रथ तथा भरद्वाज के वत्स सप्रथ हेतु अनुष्शुप् छन्द में सामगान करके एवं उत्कृष्ट याग को समर्पित करके, वसिष्ठ ऋषि ने रथंतर नामक साम को प्रतापी धाता (ब्रह्मा, विष्णु, शिव) से ग्रहण किया।(सामवेद 6.2.5)
प्रथ :: प्रसिद्ध होना, फैलना, बढ़ना या दिखाई देना।
Vashishth Rishi attained the Rathantar Sam from Dhata (Brahma, Vishnu and Shiv) for the sake of his Vats Prath and Rishi Bhardwaj's Saprath Anushshup Chhand in Sam Gan and the excellent Yagy.
नियुत्वान्वायवा गह्ययं शुक्रो अयामि ते। गन्तासि सुन्वतो गृहम्॥
यजमानों के समक्ष रथ में आरूढ़ होकर उपस्थित होने वाले हे वायु देवता! आपके उद्देश्य से यह तेजोमंडित सोमरस तैयार किया गया है। इसलिए हम आपको आमंत्रित करते हैं।(सामवेद 6.2.6)
Hey Vayu Dev, riding the charoite in front to the Yajmans! Somras has been extracted for you to drink. Hence, we invite you to have it.
यज्जायथा अपूर्व्य मघवन्वृत्रहत्याय। तत्पृथिवीमप्रथयस्तदस्तभ्ना उतो दिवम्॥
हे लोकातीत, वैभव-सम्पन्न देवराज इन्द्र! आपने वृत्र (दानवता) का शमन करने के निमित्त, धरती को स्थिर एवं विस्तारित करने के साथ-साथ परमधाम (स्वर्ग) को भी दृढ़ किया।(सामवेद 6.2.7)
लोकातीत :: असाधारण; extraordinary, superhuman, preternatural.
Hey extraordinary, possessor of grandeur Devraj Indr! You strengthened and extended the earth & heaven for slaying Vratra Sur.
सामवेद आरण्यं पर्व (6.3) :: ऋषि :- वामदेवो, गौतम, मधुच्छंदा, गृत्साद्, भरद्वाजो बार्हस्पत्य, ऋजिश्वा, हिरण्यस्तूप, विश्वामित्र; देवता :- प्रजापति, पवमान, सोम, अग्नि, रात्रि, अपांनपात्, विश्वेदेवा, लिंगोक्ता, इन्द्र, आत्मा वैश्वानर; छन्द :- अनुष्टुप्, त्रिष्टुप्, गायत्री, जगती, पंक्ति।
मयि वर्षों अथो यशोऽथो यज्ञस्य यत्पयः। परमेष्ठी प्रजापतिर्दिवि द्यामिव दंहतु॥
देवलोक में निवास करने वाले, विश्व के पालनकर्ता परमपिता हमारे अंदर ज्ञान के प्रकाश, कीर्ति तथा अन्नादि की बढ़ोत्तरी करें। अद्भुत तेज से युक्त व्योम के समान हमारा जीवन भी प्रकाशित हो।(सामवेद 6.3.1)
Almighty, nurturer of the universe, residing in the heavens, should initiate the power of Gyan-enlightenment in our innerself, fame-honour and the food grains. Eternal-amazing aura-radiance like space should illuminate our lives as well.
सं ते पयांसि समु यन्तु वाजाः सं वृष्ण्यान्यभिमातिषाहः।
आप्यायमानो अमृताय सोम दिवि श्रवांस्युत्तमानि धिष्व॥
हे शत्रुओं का विनाश करने वाले सोम! आप दुग्ध, पोषण तत्त्व व बल को ग्रहण करें। अपने अमरत्व के निमित्त स्वर्गलोक में उत्कृष्ट पोषक पदार्थों को अर्थात् उच्च पद को धारण करें।(सामवेद 6.3.2)
Hey destroyer of the enemies, Som! Accept milk, nourishing elements and strength. For your immortality have the excellent nourishment in the heavens i.e., possess high position-dignity.
त्वमिमा ओषधीः सोम विश्वास्त्वमपो अजनयस्त्वं गाः।
त्वमातनोरुर्वा 3 न्तरिक्षं त्वं ज्योतिषा वि तमो ववर्थ॥
अपने प्रकाश से तम को विनष्ट करने वाले तथा आकाश को व्यापक करने वाले हे लोकातीत सोम! आपने ही धरती पर समस्त औषधियों, गायों तथा पानी का आविर्भाव किया है।(सामवेद 6.3.3)
Hey extraordinary Som, eliminating the darkness with your light-aura, pervading the space-sky! Its you who evolved all the medicine over earth, the cows & water.(17.12.2025)
अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम्। होतारं रत्नधातमम्॥
हम विश्व का कल्याण करने वाले, यज्ञ को देदीप्यमान् करने वाले, पूजा करने योग्य, देवगणों को आहूत करने में सक्षम तथा याज्ञिकों को घन-ऐश्वर्य से सम्पन्न करने वाले अग्नि देव की याचना (स्तुति) करते हैं।(सामवेद 6.3.4)
We worship Agni Dev who resort to the welfare of the universe, illuminate the Yagy, capable of invoking the demigods and grant wealth, prosperity, grandeur to the Yagyik.
ते मन्वत प्रथमं नाम गोनां त्रिः सप्त परमं नाम जानन्।
ता जानतीरभ्यनूषत क्षा आविर्भुवन्नरुणीर्यशसा गावः॥
हे अग्नि देव! आपके नाम ओंकार को वाणियों में सर्वप्रथम मानकर, ऋषियों ने गायत्री आदि इक्कीस छन्दों में होने वाले स्तोत्रों को समझा। इसके बाद उस वाणी से उषा की स्तुति की, जिसके प्रभाव से सूर्य की रश्मियां उत्पन्न हुई।(सामवेद 6.3.5)
Hey Agni Dev! The Rishi Gan considered your name Onkar (Omॐ) as the first in the speech-voice and understood the twenty one Chhands in the Gayatri and the Strotrs. Thereafter, Usha was prayed leading to the evolution of Sun rays.
समन्या यन्त्युपयन्त्यन्याः समानमूर्वं नद्यस्पृणन्ति।
तमू शुचिं शुचयो दीदिवां समपान्नपातमुप यन्त्यापः॥
जैसे बारिश का पानी, भूमि पर प्रवाहित होकर, भू-जल में संयुक्त होकर नदी का रूप ग्रहण करके सिंधु में मिल जाता है और वहाँ समुद्र-अग्नि को प्रफुल्लित करता है, जैसे जल को ऊँची गति प्रदान करने वाले आग के समीप सारा जल पहुँचता है, वैसे ही सोमरस जल में संयुक्त होकर सबको हर्षित करता है।(सामवेद 6.3.6)
The way rain water flow over the earth, mixes with the land water and turn into river, joining ocean-sea thereafter, entire water reaches fire-Agni granting it high speed and gladden every one on being mixed in Somras.
आ प्रागाद्भद्रा युवतिरह्नः केतून्त्समीर्त्सति। अभूद्भद्रा निवेशनी विश्वस्य जगतो रात्री॥
हितकारी नारी के रूप में निशा आते ही दिन को प्रदीप्त करने वाली सूर्य की किरणों को नियंत्रित कर देती है। सारे विश्व को आराम देने वाली यह रात सभी जनों के लिए कल्याणकारी है।(सामवेद 6.3.7)
Night falls as a beneficial woman and controls-checks the Sun rays. Night relaxes the whole world and grants rest.
प्रक्षस्य वृष्णो अरुषस्य नू महः प्र नो वचो विदथा जातवेदसे।
वैश्वानराय मतिर्नव्यसे शुचिः सोम इव पवते चारुरग्नये॥
हे अग्नि देव! आप सभी जगह विद्यमान, देदीप्यमान् व तेज से युक्त हैं, हम आपकी वन्दना करते हैं। यज्ञादि कर्मों में आपके निमित्त उच्चारित होने वाले ये पावन एवं रमणीय स्तोत्र, समस्त स्तोताओं के शुभचिंतक अग्नि देव के समक्ष उसी तरह पहुँचते हैं, जिस प्रकार यज्ञ के समक्ष सोमदेव गमन करते हैं।(सामवेद 6.3.8)
Hey Agni Dev! Shining-lustrous and Tej possessing, you are present every where,. We worship you. Delightful-enjoyable, pious, well wisher of all Stotas; Strotrs recited for you in the Yagy Karm & reach you like the movement of Som Dev in front of Yagy.
विश्वे देवा मम शृण्वन्तु यज्ञमुभे रोदसी अपां नपाच्च मन्म।
मा वो वचांसि परिचक्ष्याणि वोचं सुम्नेष्विद्वो अन्तमा मदेम॥
समस्त देवतागण हमारे जनीय उत्कृष्ट स्तोत्रों को सुनें। पृथ्वीलोक एवं देवलोक दोनों ही हमारे पूज्य स्तोत्रों को श्रवण करें। अग्नि देव भी हमारे स्तोत्रों को श्रवण करने की अनुकम्पा करें। हम कदापि देवों को अरुचिकर लगने वाले एवं तिरस्कार करने योग्य वचन न बोलें तथा सदैव देवताओं द्वारा प्रदान किये हुए अनुदानों से ही आनंदित हों।(सामवेद 6.3.9)
अनुकम्पा :: दया, हमदर्दी; sympathy, kindness, yearning, mercy, compassion.
Let all demigods-deities listen to our Strotrs. Let Earth & heavens respond to our Strotrs. Agni Dev should listen to our Strotr and have compassion-mercy our us. We should never speak such words which are disliked by them or reproach them. We should always enjoy-rejoice the grants made by demigods-deities.
यशो मा द्यावापृथिवी यशो मेन्द्रबृहस्पती। यशो भगस्य विन्दतु यशो मा प्रतिमुच्यताम्। यशस्व्या 3 स्याः संसदोऽहं प्रवदिता स्याम्॥
हे ईश्वर! हम याजकों को सम्पूर्ण लोकों (द्यावा-पृथिवी से) तथा वज्रपाणि इन्द्र, बृहस्पति आदि
देवों से ऐश्वर्य की प्राप्ति हो। हम कभी भी वैभव से विनष्ट न हों तथा संसद में अपने मतों को प्रकट करने का सामर्थ्य प्राप्त हो।(सामवेद 6.3.10)
Hey God! Let us-the Yajak Gan have grandeur from all abodes (earth, heavens etc), Vajr wielding Indr Dev, Dev Guru Brahaspati etc. Our grandeur should never destroy and make us capable of putting forward our views in the meeting-councils.
इन्द्रस्य नु वीर्याणि प्रवोचं यानि चकार प्रथमानि वज्री।
अहन्नहिमन्वपस्ततर्द प्र वक्षणा अभिनत्पर्वतानाम्॥
हे देवराज इन्द्र! आप महा शक्तिशाली, अम्बर को भेदकर जल-वृष्टि करने वाले, पहाड़ों की नदियों के तटों का निर्माण करने वाले, वज्र को धारण करने वाले हैं। आपके द्वारा किये गये इन उत्कृष्ट कर्मों का हम बारम्बार वर्णन करते हैं।(सामवेद 6.3.11)
Hey Devraj Indr! You ae extremely powerful, Vajr wielding, tear into the sky leading to rain fall, produce the embarkments of the mountain rivers. We repeatedly describe your great deeds-efforts.
अग्निरस्मि जन्मना जातवेदा घृतं मे चक्षुरमृतं म आसन्।
त्रिधातुरर्को रजसो विमानोऽजस्त्रं ज्योतिर्हविरस्मि सर्वम्॥
मैं (आत्मा) उत्पन्न होने के साथ से ही अग्नि स्वरूप, सर्वज्ञाता, कान्तिमान हूँ। (घी के प्रज्वलन से होने वाली दीप्ति) मेरे नयन है। मेरे मुँह में अमृतमयी वाणी है। मैं विश्व का निर्माता प्राण, तीनों प्राणो (प्राण, अपान, व्यान) में विद्यमान हूँ, आकाश का अधिष्ठाता हूँ। प्रखर, तेजस्वी सूर्य, हवि तथा अग्नि भी मैं ही हैं।(सामवेद 6.3.12)
प्रखर :: तीक्ष्ण, तेज, उग्र, प्रचंड; fierce, sharp.
I (soul) am aurous like Agni, all knowing. Shine-glitter produced by ghee, form my eyes. My mouth has voice-speech like he elixir. I am producer of the universe, Air Vital and reside in the three Pran viz Pran, Apan & Vyan. I am the Lord of the sky. I am fierce, Tejaswi-majestic Sun, oblations and Agni.
पात्यग्निर्विपो अग्रं पदं वेः पाति यह्नश्चरणं सूर्यस्य।
पाति नाभा सप्तशीर्षाणमग्निः पाति देवानामुपमादमृष्वः॥
हे अग्नि देव! आप धरती के अग्रणी (प्रमुख) जगहों की, सूर्य के मार्ग की, आकाश तथा द्युलोक में निवास करने वाले मरुतों तथा देवताओं के प्राणेश यज्ञों की रक्षा करते हैं।(सामवेद 6.3.13)
प्राणेश यज्ञ :: वे पंच महायज्ञ (ब्रह्मयज्ञ, देवयज्ञ, पितृयज्ञ, नृयज्ञ-मनुष्य यज्ञ, वैश्वदेव यज्ञ) जो जीवन के प्राण, आत्मा और परम कल्याण से जुड़े हैं।
Hey Agni Dev! You protect the important places of earth, route-path of the Sun. You protect the Marud Gan and demigods-deities in the heavens and life sustaining the Yagy.
सामवेद आरण्यं पर्व (6.4) :: ऋषि :- वामदेव, नारायण; देवता :- अग्नि, पुरुष, द्यावा-पृथ्वी, इन्द्र, गौ; छन्द :- पंक्ति, अनुष्टुप्, त्रिष्टुप्।
भ्राजन्त्यग्ने समिधान दीदिवो जिह्वा चरत्यन्तरासनि।
स त्वं नो अग्ने पयसा वसुविद्रयिं वर्ची दृशेऽदाः॥
हे देदीप्यमान् अग्ने! आपके वर्चस्वरूपी मुख में जीभ के समान अग्निशिख हवि को धारण करती है। हे ऐश्वर्यशाली अग्निदेव! आप हमें उपयोग करने योग्य संपत्ति तथा तीक्ष्ण प्रकाश प्रदान करें।(सामवेद 6.4.1)
देदीप्यमान :: बड़ा चमकीला, शानदार, आलीशान, तेजस्वी, ठाठदार, शोभमान; resplendent, refulgent, magnificent.
वर्चस्व :: तेज, प्राबल्य, प्रधानता, प्रभाव; supremacy, predominance.
Hey resplendent Agni! Your predominant mouth hold the oblations over your tongue tip. Hey grandeur possessor Agni Dev! Grant us useful assists and sharp light.
वसन्त इन्नु रन्त्यो ग्रीष्म इन्नु रन्त्यः। वर्षाण्यनु शरदो हेमन्तः शिशिर इन्नु रत्यः॥
बसंत ऋतु अवश्य ही हर्ष प्रदान करने वाली है। ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमंत तथा शीत ऋतु भी हर्ष प्रदान करने वाली है।(सामवेद 6.4.2)
Spring season grants pleasure. Summer, rainy season, chilly winters, Hemant and winters too grant happiness.
India is the only country all over the world, where all these six seasons are observed.
सहस्रशीर्षाः पुरुषः सहस्राक्षः सहस्त्रपात्। स भमिं सर्वतो वृत्वात्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम्॥
हजारों शीश वाले, हजारों चक्षु तथा हजारों पग वाले विराट् पुरुष हैं। वे सम्पूर्ण जगत् को समेटकर भी दस अंगुल बचे रहते हैं।(सामवेद 6.4.3)
Virat Purush possess thousands head, eyes, legs-feet. In spite of covering the whole universe HE still has about ten inches more space.
Almighty is infinite, limit less. Virat Purush is HIS one of little forms.(18.12.2025)
त्रिपादूर्ध्व उदैत्पुरुषः पादोऽस्येहाभवत्पुनः। तथा विष्वङ् व्यक्रामदशनानशने अभि॥
जड़ एवं चेतन बहुत सारे रूपों में, चार भागों वाले विराट् पुरुष में यह सम्पूर्ण विश्व समाया हुआ है। इसके तीन भाग असीम व्योम में व्याप्त हैं।(सामवेद 6.4.4)
Virat Purush HAS static-inertial & conscious forms, sub divided into four segments containing the whole universe. Infinite space-sky constitute HIS three segments.
पुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भाव्यम्। पादोऽस्य सर्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि॥
जिस जगत् का निर्माण हो चुका है तथा जिसका होने वाला है, यह सभी विराट् पुरुष ही है। इसके एक पाद में समस्त जीव हैं तथा तीन पाद असीम द्युलोक में समाये हुए हैं।(सामवेद 6.4.5)
The universe which has evolved or the one which is going evolve constitute the Virat Purush only. One foot of HIM constitute all living beings while the infinite heavens are present in HIS three feet-steps.
तावानस्य महिमा ततो ज्यायाँश्च पूरुषः। उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति॥
यह विराट् पुरुष जड़-चेतन तथा सम्पूर्ण धरती इन सबसे विशाल है। इस अमर प्राणी जगत् का भी वही अधिपति है। जो अन्न (पोषक पदार्थों) द्वारा बढ़ोत्तरी करते हैं। उनका भी अधिपति वही (विराट् पुरुष) है।(सामवेद 6.4.6)
Virat Purush is larger than the static, conscious and the entire earth. HE is the Lord deity of the immortal universe. HE increases the quantum of food grains, nourishing-nurturing materials, being their Lord-deity as well.
ततो विराडजायत विराजो अधि पूरुषः। स जातो अत्यरिच्यत पश्चाद्भूमिमथो पुरः॥
उस विराट् (पूर्ण) पुरुष से ही इस ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति हुई है। उसी विराट् पुरुष से सम्पूर्ण सृष्टि एवं समस्त जीव समुदाय की उत्पत्ति हुई है। वही शरीरधारी रूप में सर्वश्रेष्ठ हुआ, जिसने सर्वप्रथम धरती, तत्पश्चात् देह धारण करने वालों का आविर्भाव किया।(सामवेद 6.4.7)
The universe, evolved from HIM. HE created the living & non living. HE became best amongest all living beings. HE produced earth initially followed by other creatures.
मन्ये वां द्यावापृथिवी सुभोजसौ ये अप्रथेथाममितमभि योजनम्।
द्यावापृथिवी भवतं स्योने ते नो मुञ्चतमं हसः॥
हे पृथ्वी लोक एवं देव लोक! हम आपको पालनहार के रूप में जानते हैं। आप हमें असीमित धन-वैभव से परिपूर्ण करें। हे द्यावा-पृथ्वी के देवगण! आप हमें आनन्द प्रदान करें तथा हमें कुकृत्य से रहित करें।(सामवेद 6.4.8)
Hey earth and heavens! We recognise you as the nurturer. Grant us unlimited wealth, prosperity-grandeur. Hey demigods governing the earth & heavens! Grant us pleasure and keep us off sins, wickedness, viciousness.
हरी त इन्द्र श्मश्रूण्युतो ते हरितौ हरी। तं त्वा स्तुवन्ति कवयः परुषासो वनर्गवः॥
हे वज्रपाणि इन्द्र! हरे एवं भूरे रंग के सोमरस का सेवन करने से आपकी मूँछे भी उसी रंग की हो गई है तथा आपके दोनों अश्वों का वर्ण भी हरिताभ है। हे श्रेष्ठ गायों के पालनकर्ता! बुद्धिमान् लोग आपकी याचना करते हैं।(सामवेद 6.4.9)
Hey Vajr wielding Indr Dev! Your mustachoes have acquired the colour greenish & brown colours of the Somras you drink. Your horses too are greenish. Hey excellent nurturers of cows! The intelligent-enlightened worship you.
यद्वर्चो हिरण्यस्य यद्वा वर्चो गवामुत। सत्यस्य ब्रह्मणो वर्चस्तेन मा सं सृजामसि॥
जो तेज स्वर्ण, गौओं तथा सत्य ज्ञान में है, हम भी उस तेज से युक्त होने की अभिलाषा करते हैं।(सामवेद 6.4.10)
We wish to acquire the Tej (aura, energy) present in gold, cows and the true knowledge.
सहस्तन्न इन्द्र दद्धयोज ईशे ह्यस्य महतो विरप्शिन्।
क्रतुं न नृम्णं स्थविरं च वाजं वृत्रेषु शत्रून्त्सहना कृधी नः॥
हे महापराक्रमी, वैभवशाली देवराज इन्द्र! आप हमारे उत्कृष्ट याग के अनुसार धन-वैभव, पराक्रम तथा शक्ति दें तथा रणभूमि में शत्रुओं को परास्त करने का सामर्थ्य भी प्रदान करें।(सामवेद 6.4.11)
Hey great majestic, grandeur possessing Devraj Indr! Grant us wealth and prosperity, valour, strength and the power to defeat the enemy in the war, as per our Yagy.
सहर्षभाः सहवत्सा उदेत विश्वा रूपाणि बिभ्रतीद्वर्यूध्नीः।
उरुः पृथुरयं वो अस्तु लोक इमा आपः सुप्रपाणा इह स्त॥
बड़े-बड़े स्तनों वाली, बछड़ों तथा सांडों के साथ विविध रूप रंगों वाली गायें हमारे समीप आगमन करें। यह पृथ्वी लोक तुम्हारे रहने योग्य है, तुम्हें यह संतुष्टि प्रदान करने वाला पानी प्राप्त हो।(सामवेद 6.4.12)
Let the cows of vivid colours with large udders-nipples, calf and bulls come to us. The earth suits you for living-survival and it should grant you water to satisfy.
सामवेद आरण्यं पर्व (6.4) :: ऋषि :- शतं वैखानसा, विभ्राट, कुत्स, सार्पराज्ञी, प्रस्कण्व, कण्व; देवता :- अग्नि, पवमान, सूर्य; छन्द :- गायत्री, जगती, त्रिष्टुप्।
अग्न आयूंषि पवस आ सुवोर्जमिषं च नः। आरे बाधस्व दुच्छुनाम्॥
हे सर्वव्यापक अग्नि देव! आप हमें पोषक पदार्थ तथा पराक्रम से परिपूर्ण करें, हमें दीर्घायु दें एवं आसुरी-प्रवृत्ति वाले शत्रुओं को हमारे समीप न आने दें।(सामवेद 6.5.1)
Hey all pervading Agni Dev! Grant us nourishment, valour, long life and do not let the enemies with demonic tendencies approach us.
विभ्राड् बृहत्पिबतु सोम्यं मध्वायुर्दधद्यज्ञपतावविह्रुतम्।
वातजूतो यो अभिरक्षति त्मना प्रजाः पिपर्ति बहुधा वि राजति॥
असीम प्रतापी सूर्य देव अत्यधिक मात्रा में सोमरस का सेवन करें, यजमानों को विकार से रहित आयु प्रदान करें। ये सूर्य देव वायु से प्रेरणा प्रदान कर किरणों के द्वारा सारे संसार का पालन करते है तथा उन्हें तेज आदि से युक्त करके अनेक रूपों में प्रदीप्त होते हैं।(सामवेद 6.5.2)
Let too much majestic Sury Dev drink Somras and grant us defect free life. Sury Dev inspired by Vayu Dev nurture the entire universe and its his Tej-energy which appears in different forms.
चित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः।
आप्रा द्यावापृथिवी अन्तरिक्षं सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च॥
जंगम-स्थावर, विश्व की आत्मा स्वरूप सूर्य देव, देवगणों के अलौकिक आभा-मंडल के रूप में प्रकाशित हो गये हैं। सूर्य देव मित्र, वरुण एवं अग्नि आदि देवताओं के नयन हैं। यह उदित होते ही तीनों लोकों (पृथ्वी, स्वर्ग एवं अन्तरिक्ष) को अपनी आभा से परिपूर्ण कर देते हैं।(सामवेद 6.5.3)
Movable, like the soul of the universe Sury Dev, shinning in the divine aura region of the demigods has illuminated static-fixed and movable. Sury Dev constitute the eyes of Mitr, Varun and Agni Dev etc demigods. He fills the three abodes (earth, heavens and the nether world) with his aura-radiance.
आयं गौः पृश्निरक्रमीदसदन्मातरं पुरः। पितरं च प्रयन्त्स्वः॥
यह सूर्य देव गतिशील तथा प्रखर तेज से युक्त है। यह उदित होते ही ऊपर आकाश में प्रतिष्ठित हो जाते हैं। सर्वप्रथम वह जननी पृथ्वी लोक को, तत्पश्चात् तात् द्युलोक एवं अन्तरिक्ष लोक को प्राप्त होते हैं।(सामवेद 6.5.4)
Sury Dev is dynamic and has intense Tej. He establishes in the sky as soon as he evolve. Initially, he rises over the earth followed by the heavens and the space-sky.
अन्तश्चरति रोचनास्य प्राणादपानती। व्यख्यन्महिषो दिवम्॥
सूर्य देव का आलोक अंबर में किरणों के रूप में गतिमान् होता है। सूर्य के उदित होने पर ये किरणें प्रदीप्त होती हैं तथा अस्त हो जाने पर विलुप्त हो जाती हैं। ये परम् प्रतापी सूर्य देव स्वर्गलोक को विशेष रूप से प्रदीप्त करते हैं।(सामवेद 6.5.5)
Aura-radiance of Sury Dev moves-spread as the rays in the sky. The rays of light appear as soon as Sun rises and disappear as soon as the Sun sets. Majestic Sury Dev specifically lit the heavens.(19.12.2015)
त्रिंशद्धाम वि राजति वाक्पतङ्गाय धीयते। प्रति वस्तोरह द्युभिः॥
ये सूर्य देव दिन की तीस घड़ियों (1 घड़ी = 24 मिनट) तक अपनी किरणों से आलोकित होते हैं। तब इन आलोकित सूर्य देव की स्तुति की जाती है।(सामवेद 6.5.6)
Sury Dev shine for 30 Ghadi (30X24 minutes) with his rays. During this period he is worshiped.
अप त्ये तायवो यथा नक्षत्रा यन्त्यक्तुभिः। सूराय विश्वचक्षसे॥
सम्पूर्ण जगत् को आलोक प्रदान करने वाले सूर्य देव के उदित होते ही ग्रह, नक्षत्र एवं तारों के समूह उसी प्रकार अदृश्य हो जाते है, जिस प्रकार दिन में चोर अदृश्य अर्थात् छिप जाते हैं।(सामवेद 6.5.7)
With the rise of Sun constellations, planets, stars disappear like the thief, in the universe.
अदृश्रन्नस्य केतवो वि रश्मयो जनाँ अनु। भ्राजन्तो अग्नयो यथा॥
देदीप्यमान् अग्नि की शिखाओं की भाँति इन सूर्य देव की ज्योतिर्मय किरणें संसार के सभी प्राणियों का अवलोकन करती हैं।(सामवेद 6.5.8)
Rays of Sun looks at all the living beings over the earth, like the blazing fire.
तरणिर्विश्वदर्शतो ज्योतिष्कृदसि सूर्य। विश्वमाभासि रोचनम्॥
हे सूर्य देव! आप उपासकों का कल्याण करने वाले हैं, सम्पूर्ण जगत् में अकेले ही अवलोकित करने वाले तथा प्रकाशित करने वाले हैं। चंद्र, तारामण्डल आदि जगमगाने वाले पदार्थों को भी आप ही आलोकित करते हैं।(सामवेद 6.5.9)
Hey Sury Dev! You look to the welfare of the devotees, shine alone in the universe and illuminate it. Moon, group of Stars-constellation and all shining objects shine due to your light.
प्रत्यङ् देवानां विशः प्रत्यङ्ङ्गुदेषि मानुषान्। प्रत्यङ् विश्वं स्वर्दृशे॥
हे सूर्य! आप देवताओं के सहायक मरुद्गण, प्राणियों एवं सम्पूर्ण जगत् का अवलोकन करने हेतु अपनी किरणों के रूप में प्रकट होते हैं।(सामवेद 6.5.10)
Hey Sury Dev! You appear in the form of rays to see Marud Gan-helper of demigods-deities, living beings and the entire universe.
येना पावक चक्षसा भुरण्यन्तं जनाँ अनु। त्वं वरुण पश्यसि॥
हे सारे लोगों को शुद्ध करने वाले तेजोमय सूर्य देव! सभी को पोषण प्रदान करने वाले, तीनों लोकों को आलोकित करने वाले, आपके अद्भुत आलोक की हम याचना करते हैं।(सामवेद 6.5.11)
Hey shining Sury Dev, purifying all people! We worship your amazing aura-radiance which nourish all and illuminate the three abodes.
उद्द्यामेषि रजः पृथ्वहा मिमानो अक्तुभिः। पश्यञ्जन्मानि सूर्य॥
हे सूर्य! आप काया धारण करने वाले लोगों को प्रदीप्त करते हैं, दिन को निशा से मापते हैं तथा देवलोक एवं अनंतलोक को भी दीप्ति से युक्त कर देते हैं।(सामवेद 6.5.12)
Hey Sury! You adopts the body-physical form and illuminate the populace, measure the day with night (remove darkness with the day) and illuminate the heavens and the infinite abode.
अयुक्त सप्त शुन्ध्युवः सूरो रथस्य नप्त्र्यः। ताभिर्याति स्वयुक्तिभिः॥
सूर्य देवता पवित्र करने वाले, सप्त अश्वों (सप्त किरणों- बैंगनी, नीला, आसमानी, हरा, पीला, नारंगी, लाल) को अपने रथ में संयोजित किये हुए हैं। रथ को संभालने वाली, अश्वरूपी रश्मियों से अपने पराक्रम के द्वारा सूर्य देवता यज्ञादि सभी स्थान पर गमन करते हैं।(सामवेद 6.5.13)
Sury Dev is purifying-sanctifying deploying his seven horses (seven rays viz violet, blue, sky coloured, green, yellow, orange and red) in the charoite. Rays in the form of horses control the charoite & move to all places including the Yagy sites.
सप्त त्वा हरितो रथे वहन्ति देव सूर्य। शोचिष्केशं विचक्षण॥
हे सूर्य देव! आप सम्पूर्ण जगत् को प्रदीप्त करने वाले हैं। पवित्र करने वाली सतरंगी सप्त रश्मियाँ आपके रथ को ले जाती हैं।(सामवेद 6.5.14)
Hey Sury Dev! You illuminate the entire world. Sanctifying seven coloured rays pull your charoite.
महानाम्न्यार्चिक ::
विदा मघवन् विदा गातुमनुशंसिषो दिशः। शिक्षा शचीनां पते पूर्वीणां पुरूवसो॥
हे महाज्ञानी तथा ऐश्वर्यवान् देवराज इन्द्र। आप सर्वज्ञाता है, इसलिए हमें हमारे लक्ष्य को प्राप्त करने का रास्ता दिखाएँ। हे महाबलशाली, वैभवशाली ईश्वर। आप हमें शिक्षा प्रदान करें।(सामवेद महानाम्न्यार्चिक 1)
Hey enlightened and grandeur possessing Devraj Indr! You know every thing, therefore guide us to attain our goal-target. Educate us.
आभिष्छ्वमभिष्टिभिः स्वाऽ 3 न्नाशुः। प्रचेतन प्रचेतयेन्द्र द्युम्नाय न इषे॥
हे तीनों लोकों के अधिष्ठाता इन्द्र। आप आत्मा स्वरूप, सूर्य देवता की भाँति प्रखर कान्तिमय हैं। आप हमें पोषण पदार्थ प्रदान करें और मनवांछित अभिलाषाओं को पूर्ण करते हुए हमारी रक्षा करें।(सामवेद महानाम्न्यार्चिक 2)
Hey Lord-deity of the three abodes Devraj Indr! You are glorious in the form of soul like Sury Dev. Grant us nourishment, accomplish our desires-wishes and protect us.
एवा हि शक्रो राये वाजाय वज्रिवः। शविष्ठ वज्रिनृञ्जसे मंहिष्ठ वज्रिनृञ्जस।
आ याहि पिब मत्स्व॥
हे महान् वज्रधारक देवराज इन्द्र! आप महा पराक्रमी हैं। अतः हे शक्तिशाली देवराज इन्द्र! आप हमें पराक्रम से युक्त कर अत्यन्त पराक्रमी बनाएँ तथा हमें संपत्ति प्राप्त करने हेतु सक्षम बनाएँ। आप हमारे समक्ष प्रकट होकर हमारे सोमरस को ग्रहण कर सुख का अनुभव करें।(सामवेद महानाम्न्यार्चिक 3)
Hey Vajr wielding Devraj Indr! You are mighty-powerful. Hence, hey majestic Devraj Indr! Accomplish us with valour and make us capable of acquiring prosperity. Invoke before us, be comfortable, enjoy Somras and gladden.
विदा राये सुवीर्यं भवो वाजानां पतिर्वशाँ अनु। मंहिष्ठ वज्रिनृञ्जसे यः शविष्ठः शूराणाम्॥
हे देवराज इन्द्र! आपको उत्कृष्ट योग्यता से संपत्तिवान् बनने का रास्ता ज्ञात है। मानवों में पराक्रमी योद्धा की भाँति हे वज्रधारक देवराज इन्द्र! आप सभी सामर्थों के अधिपति हैं। आपका अनुसरण करने बाले उपासक आपसे प्रभावित होकर शक्तिशाली बनते हैं।(सामवेद महानाम्न्यार्चिक 4)
Hey Devraj Indr! Your excellent qualification is the way for prosperity. Amongest the humans like a majestic warrior, hey Devraj Indr! You are the Lord-deity of ability-capability. The devotees who follow you become mighty by following you.
यो मंहिष्ठो मघोनाम शुर्न शोचिः। चिकित्वो अभि नो नयेंद्रो विदे तमु स्तुहि॥
हे संपत्तिवान् देवराज इन्द्र! आप वैभवशालियों में परम् महान् हैं, अपने प्रखर तेज से सर्वत्र विद्यमान सूर्य देव की भाँति तेजस्वी हैं।(सामवेद महानाम्न्यार्चिक 5)
Hey prosperous Devraj Indr! You are great amongest the prosperous and is aurous like Sury Dev.
ईशे हि शक्रस्तमूतये हवामहे जेतारमपराजितम्।
स नः स्वर्षदति द्विषः क्रतुश्छन्द ऋतं बृहत्॥
सबसे अधिक बलशाली, देवराज इन्द्र ही सभी की रक्षा करने वाले है, अतएव सर्वदा विजय प्राप्त करने वाले देवराज इन्द्र को अपनी रक्षा के निमित्त आवाहित करते हैं। वे शत्रुओं को विनष्ट करने वाले, सत्य के पथ पर जाने वाले कर्मों को करने वाले, सभी के संरक्षक, बुद्धिमान् तथा महान् हैं।(सामवेद महानाम्न्यार्चिक 6)
Powerful as compared to others, Devraj Indr protects every one, hence always victorious Devraj Indr is requested for our own safety. He destroys the enemies, protector of those who follow truthful path and virtuous-righteous path-deeds, being patron of all, intelligent and great.
इन्द्रं धनस्य सातये हवामहे जेतारमपराजितम्।
स नः स्वर्षदति द्विषः स नः स्वर्षदति द्विषः॥
ऐश्वर्यवान् बनने की अभिलाषा से कभी न परास्त होने वाले, विजयी देवराज इन्द्र को हम अपनी सहायता करने हेतु आहूत करते हैं। वे देवराज इन्द्र हमारे शत्रुओं का नाश करते हुए हमारी रक्षा करें।(सामवेद महानाम्न्यार्चिक 7)
We call victorious Devraj Indr for our help with the desire of becoming prosperous and possessor of grandeur. Let him destroy our enemies and protect us.(20.12.2025)
पूर्वस्य यत्ते अद्रिवोंऽ शुर्मदाय। सुम्न आ धेहि नो वसो पूर्तिः शविष्ठ शस्यते।
वशी हि शक्रो नूनं तन्नव्यं संन्यसे॥
हे वज्रपाणि देवराज इन्द्र! आपकी ज्ञानवान् किरणें अत्यधिक सुख प्रदान करने वाली हैं। हे सभी के पालक देवराज इन्द्र! वह किरणें हमारे आनन्द हेतु हमें दें। हे शक्तिशाली देवराज इन्द्र! आप अवश्य रूप से सामर्थ्यवान् तथा सभी को अपने अधीन करने वाले हैं, इसीलिए अपनी नवीन स्तुतियों के योग्य आपको हम अपने आराधना करने वाले स्थान पर प्रतिस्थापित करते हैं।(सामवेद महानाम्न्यार्चिक 8)
Hey Vajr wielding Devraj Indr! Your rays of enlightenment grant extreme pleasure-comfort. Hey nurturer of all Devraj Indr! Let these rays grant us pleasure. Hey mighty Devraj Indr! You are capable and keep everyone under your control, hence we worship you with newly composed Stuties-verse, establishing you at our place of worship.
प्रभो जनस्य वृत्रहन्त्समर्येषु ब्रवावहै। शूरो यो गोषु गच्छति सखा सुशेवो अद्वयुः॥
हे वृत्र का संहार करने वाले ईश्वर! हम उत्कृष्ट पुरुषों में आपका गुणगान करते हैं। आप हमारे लिए आत्मा स्वरूप है, सखा के समान हैं। आप उचित तरीके से सेवा करने योग्य, अद्वितीय व श्रेष्ठ हैं।(सामवेद महानाम्न्यार्चिक 9)
Hey slayer of Vratr God! We praise you amongest the excellent humans. You are like our soul and friend. You deserve service in proper way, unique and best.
एवाहो ऽ3S33 व। एवा ह्यग्ने। एवाहीन्द्र।
एवा हि पूषन्। एवा हि देवाः ॐ एवाहि देवाः॥
हे देवराज इन्द्र! आप शत्रुओं का शमन करने वाले हैं। हे अग्नि देव! आप आभा स्वरूप हैं। हे पूषा देव! आप सभी को पोषण प्रदान करने वाले हैं। हे सभी दैवी शक्तियों! आप समस्त लोग अद्भुत गुणों से युक्त हैं। आपका जैसा वर्णन किया जाता है, आप सभी वैसे ही हैं। अर्थात् दिव्य गुणों से सम्पन्न हैं।(सामवेद महानाम्न्यार्चिक 10)
Hey Devraj Indr! You are destroyer of the enemies. Hey Agni Dev! You are embodiment of aura-radiance. Hey all divine powers! You all possess amazing traits-qualities.
सामवेद उत्तरार्चिकः (1) :: ऋषि :- काश्यप, देवल अघवा असित, कश्यप, मारीच, शतं वैखानस, भरद्वाज, विश्वामित्र अथवा जमदग्नि, इरिम्बिठि, विश्वामित्र गाथिन, अमहीयुरांगिरस, सप्तर्ष, उशना काव्य, वसिष्ठ, वामदेव, नोधा गौतम, कलि प्रगाथ, मधुच्छंदा, गौरवीति, अग्निश्चाक्षुष, अंधीगु, श्यावाश्चि, कविभार्गव, शंयुर्वार्हस्पत्य, सौभरि, नृमेध; देवता :-पवमान, सोम, अग्नि, मित्रावरुणौ, इन्द्राग्नि; छन्द :- गायत्री, पादनिवृत्, प्रगाथ, त्रिष्टुप्, काकुभ, उष्णिक्, अनुष्टुप्, जगती।
उपास्मै गायता नरः पवमानायेन्दवे। अभि देवाँ इयक्षते॥
हे ऋत्विजों! यदि आप सब देवगणों को प्रसन्न करने की इच्छा रखते हों, तो यज्ञादि में प्रयोग होने वाले, निष्पन्न किये हुए सोम की याचना करो।(सामवेद उत्तरार्चिक.1.1)
Hey Ritviz Gan! If you possess the desire-wish to please all demigods-deities, pray to the extracted Somras used in the Yagy and rituals etc.
अभि ते मधुना पयोऽथर्वाणो अशिश्रयुः। देवं देवाय देवयुः॥
यह लोकातीत सोमरस देवताओं ने देवताओं के निमित्त उत्पन्न किया है। अथर्वा ऋषियों ने इस दिव्य रस को गौ के दूध में संयुक्त कर याज्ञिकों हेतु तैयार किया है।(सामवेद उत्तरार्चिक 1.1.2)
Unique-extraordinary Somras has been extracted for the demigods-deities. Athrva Rishi mixed cow's milk in it and prepared it for the Yagyik Gan.
स नः पवस्व शं गवे शं जनाय शमर्वते। शं राजन्नोषधीभ्यः॥
हे शुभचिंतक सोम! आप स्वयं पवित्र होकर हमारी गौ रूपी धन, पुत्र-पौत्रों से संबंधित धन एवं अश्व आदि के समूह का हित करें तथा औषधियों को स्वच्छ निर्मित करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 1.1.3)
Hey well wisher Somras! You should be sanctified for the welfare of our wealth in the form of cows, horses, wealth of our sons & grand sons, including medicines-herbs.
दविद्युतत्या रुचा परिष्टोभन्त्या कृपा। सोमाः शुक्रा गवाशिरः॥
प्रखर तेजोमय, ध्वनि से पूर्ण प्रवाह से छने एवं पवित्र हुए सोमरस को गौ के दुग्ध में मिश्रित कर तैयार किया जाता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 1.1.4)
Possessing high degree of aura, filtered while making sound sanctified Somras is prepared by mixing in cow's milk.
हिन्वानो हेतृभिर्हित आ वाजं वाज्यक्रमीत्। सीदन्तो वनुषो यथा॥
जिस प्रकार रणभूमि में पराक्रमी योद्धा विचरण करते हैं, उसी तरह यजमानों से प्रशंसित, शक्ति बढ़ाने वाला, सभी का कल्याण करने वाला सुसंस्कारित सोमरस यज्ञ वेदी में सम्मान ग्रहण करता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 1.1.5)
The way the mighty warriors move in war field, similarly strength increasing Somras, resorted to the welfare of all, honoured by the Yajman Gan attain honour at the Yagy Vedi.
ऋधक्सोमै स्वस्तये संजग्मानो दिवा कवे। पवस्व सूर्यो दृशे॥
हे ज्ञानवान् सोम! आप परम् प्रतापी आदित्य के समान, अद्भुत प्रकाश से पूर्ण होकर सबका हित करने के निमित्त सुसंस्कारित बनें।(सामवेद उत्तरार्चिक 1.1.6)
Hey enlightened Som! You should be sanctified to become majestic like Adity, acquiring amazing light, for the welfare of all.
पवमानस्य ते कवे वाजिन्त्सर्गा असृक्षत। अर्वन्तो न श्रवस्यवः॥
हे शक्ति वर्द्धक सोम! पवित्र काल में आपकी परम् प्रतापी धारा घुड़साल से निकलने वाले घोड़ों की भाँति गतिमान होती हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 1.1.7)
Hey strength increasing Som! During the auspicious period, your stream-current is fast like the majestic horses coming out of the horse shed.(21.122025)
अच्छा कोशं मधुश्श्रुतमसृग्रं वारे अव्यये। अवावशन्त धीतयः॥
माधुर्य युक्त रस से परिपूर्ण काष्ठ पात्र में हम (याजक) सोमरस को छानते हैं, जिसे हमारी उंगलियाँ बारम्बार स्वच्छ करती हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 1.1.8)
Our fingers repeatedly clean the sweetened Somras filtered in the wooden pot.
अच्छा समुद्रमिन्दवोऽस्तं गावो न धेनवः। अग्मन्नृतस्य योनिमा॥
जिस प्रकार तुष्टि कारक दुग्ध प्रदान करने वाली गौएँ अपने बाड़े में पहुँचती हैं, उसी प्रकार छाना हुआ सोमरस यज्ञ-मण्डप में अपने आप पहुँच जाता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 1.1.9)
The way the cows yielding satiating milk reach the shed, similarly the filtered Somras reach the Yagy Mandap-site by it self.
सामवेद उत्तरार्चिक (2) ::
अग्न आ याहि वीतये गृणानो हव्यदातये। नि होता सत्सि बर्हिषि॥
हे सर्वव्यापक अग्ने! सर्वप्रथम हम आपकी स्तुति करते हैं। तत्पश्चात् देवगणों तक हवियों को भेजने हेतु हम आपको आहूत करते हैं। आप इस यज्ञ में पधारें।(सामवेद उत्तरार्चिक 1.2.1)
Hey all pervading Agni Dev! Initially we worship you. Thereafter, we invoke you for sending the offerings-oblations to demigods-deities. Come to this Yagy.
तं त्वा समिद्भिरङ्गिरो घृतेन वर्धयामसि। बृहच्छोचा यविष्ठ्य॥
हे ज्योतिर्मय ईश्वर! हम आपको समिधाओं एवं घी द्वारा प्रकाशित करते हैं। इसीलिए हे शक्तिशाली! आप अत्यधिक तेज से युक्त हों।(सामवेद उत्तरार्चिक 1.2.2)
Hey lustrous God! We lit you with wood and Ghee. Hence, hey mighty! You should be accompanied with extreme Tej-aura.
स नः पृथु श्रवाय्यमच्छा देव विवाससि। बृहदग्ने सुवीर्यम्॥
हे अग्नि देव! हमें अत्यधिक शक्ति तथा उत्कृष्ट ऐश्वर्यदायक सामर्थ्य प्रदान करने की अनुकम्पा करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 1.2.3)
Hey Agni Dev! Bless us extreme strength and excellent grandeur-prosperity.
आ नो मित्रावरुणा घृतैर्गव्यूतिमुक्षतम्। मध्वा रजांसि सुक्रतू॥
हे मित्रा-वरुण! हमारी ज्ञानेन्द्रियों के निवास स्थान को अर्थात् हमारे शरीर को कान्तिमय होने के भाव से सम्पन्न करें तथा परलोक का भी उत्कृष्ट रसों (भावों) से सिंचन करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 1.2.4)
Hey Mitra-Varun! Bless our sense organs with virtuous thoughts-ideas granting aura to our body and ascertain that our next birth too posses best-righteous, auspicious feelings.
उरुशंसा नमोवृधा मह्ना दक्षस्य राजथः। द्राधिष्ठाभिः शुचिव्रता॥
हे मित्रा-वरुण! आप शुद्ध कर्म करने वाले हैं। आप हवियों तथा श्रेष्ठ स्तुतियों द्वारा बलशाली बनकर अपने महिमामयी उत्कृष्ट ऐश्वर्य को अधिकृत करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 1.2.5)
Hey Mitra-Varun! You perform virtuous-righteous endeavours. You acquire might from oblations-offerings, become mighty-powerful and grant us excellent grandeur.
गृणाना जमदग्निना योनावृतस्य सीदतम्। पातं सोममृतावृधा॥
हे मित्रा-वरुण! जमदाग्नि ऋषि आपकी वन्दना करते हैं। आप हमारे यज्ञ-मण्डप में उपस्थित हों तथा हमारे द्वारा तैयार किये गये सोमरस का सेवन कर आनंदित हों।(सामवेद उत्तरार्चिक 1.2.6)
Hey Mitra-Varun! Jamdagni Rishi pray to you. Come to our Yagy Mandap, drink Somras and gladden.
आ याहि सुषुमा हि त इन्द्र सोमं पिबा इमम्। एदं बर्हिः सदो मम॥
हे देवराज इन्द्र! आप हमारे यज्ञ-मण्डप में उपस्थित हों। वहाँ पर आपके पान करने के निमित्त सिद्ध किया हुआ सोमरस रखा है, उस सोमरस को आप ग्रहण करें तथा उत्तम आसन पर बैठने की कृपा करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 1.2.7)
Hey Devraj Indr! Come to our Yagy Mandap! We have kept Somras for you to drink. Accept it and occupy the best cushion-seat.
आ त्वा ब्रह्मयुजा हरी वहतामिन्द्र केशिना। उप ब्रह्माणि नः शृणु॥
हे देवराज इन्द्र! मन्त्र को श्रवण करते ही रथ में संयोजित हो जाने वाले घोड़ों पर विराजमान होकर आप हमारे समक्ष प्रकट होकर हमारी स्तुतियों को ध्यानपूर्वक श्रवण करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 1.2.8)
Hey Devraj Indr! With the recitation of Mantr by us you should deploy the horses in your charoite and visit us. Stay in front of us and listen-respond to our Stuties-prayers.
ब्रह्माणस्त्वा युजा वयं सोमपामिन्द्र सोमिनः। सुतावन्तो हवामहे॥
हे देवराज इन्द्र! हम ब्रह्म चिंतन (Contemplation of the Ultimate Reality-Ultimate Reality) में लीन रहने वाले सोमयज्ञ कर्ता तथा सोमरस सिद्ध करने वाले याजक सोमरस का पान करने वाले आपको श्रेष्ठ स्तोत्रों के द्वारा आवाहित करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 1.2.9)
Hey Devraj Indr! We the people who meditate-concentrate, contemplate in the Brahm, accomplishers of Som Yagy, extractors of Somras, Yajak who drink Somras invoke with the recitation of best Strotr.
इन्द्राग्नी आ गतं सुतं गीर्भिर्नभो वरेण्यम्। अस्य पातं धियेषिता॥
हे देवराज इन्द्र एवं अग्निदे वता! हमारी स्तुतियों से प्रभावित, अन्तरिक्ष से उच्च हिमालय की चोटियों अर्थात् द्युलोक से आया हुआ यह पवित्र सोमरस उत्कृष्ट है। आप हमारी सेवा की भावना को ग्रहण करने हेतु इस सोमरस का सेवन करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 1.2.10)
Hey Devraj Indr& Agni Dev! Starting from the space, heavens and cliffs of Himalay Parwat, the impact of our Stuties have made the Somras excellent. Accept our feeling-prayers and drink Somras.
इन्द्राग्नी जरितुः सचा यज्ञो जिगाति चेतनः। अया पातमिमं सुतम्॥
हे इन्द्र देव और अग्नि देव! आप स्तोताओं की सहायता करने वाले हैं। स्तोत्रों के माध्यम से आवाहित आप स्फूर्ति जाग्रत करने वाले तथा यज्ञ के साधनभूत सोमरस का सेवन करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 1.2.11)
Hey Indr Dev & Agni Dev! You help the Stotas. Invoked through the Strotrs and drink the Somras, a means-tool for the Yagy, which grant vitality and alertness.
इन्द्रमग्निं कविच्छदा यज्ञस्य जूत्या वृणे। ता सोमस्येह तृम्पताम्॥
यज्ञ के साधन भूत सोमरस से प्रेरित होने वाले हम स्तोता गण कर्मों के परिणाम स्वरूप फल प्रदान करने वाले दोनों देवता (अग्नि एवं इन्द्र) की आराधना करते हैं। वे दोनों देवता इस सोमरस का सेवन कर तुष्टि से युक्त हों।(सामवेद उत्तरार्चिक 1.2.12)
We the Stota Gan invoke Indr & Agni Dev, inspired by the Somras, a means-tool of Yagy for the grant of desired rewards-output, accomplishment of wishes. Let both Indr & Agni Dev drink the satiating Somras.
सामवेद उत्तरार्चिक (3) ::
उच्चा ते जातमन्धसो दिवि सद्भूम्या ददे। उग्रं शर्म महि श्रवः॥
हे सोमदेव! आप पराक्रमी, आनन्द प्रदान करने वाले, महान् यशस्वी हैं। आप स्वर्गलोक में निवास करते हैं। हम (याजकगण) आपको पोषक पदार्थ के रूप में पृथ्वीलोक में ग्रहण करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 1.3.1)
Hey Som Dev! You are majestic, gladdening and possess great glory. You reside in the heavens. We the Yajak Gan, accept you as a nourishing product-material over the earth.
स न इन्द्राय यज्यवे वरुणाय मरुद्भ्यः। वरिवोवित्परि स्रव॥
हे धन-संपत्ति प्रदान करने वाले सोमदेव! हमारे आराध्य इन्द्र, वरुण एवं मरुद्गणों के निमित्त आप स्रवित हों।(सामवेद उत्तरार्चिक 1.3.2)
Hey Somras granting grandeur & prosperity! You should to be extracted for the sake of our adorable-placable deities Indr Dec, Varun Dev and Marud Gan.
एना विश्वान्यर्य आ द्युम्नानि मानुषाणाम्। सिषासन्तो वनामहे॥
हे सोमदेव! आपकी कृपा से हमें मानवों में श्रेष्ठ धन-संपत्ति की प्राप्ति हुई है। परन्तु हम आपकी सेवा करने की लालसा से आपकी स्तुति करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 1.3.3)
Hey Som Dev! By virtue of your blessing-mercy, we the humans have acquired best wealth-prosperity, property. We worship you with the desire of serving you.
पुनानः सोम धारयापो वसानो अर्षसि।
आ रत्नधा योनिमृतस्य सीदस्युत्सो देवो हिरण्ययः॥
हे सोमदेव! आप वैभव प्रदान करने वाले, सुवर्ण की भाँति कान्तिमान, निर्मल हैं। आप जल के साथ मिश्रित होकर, गतिमान धारा के रूप में अवश्यरूप से यज्ञ में उपस्थित कलश में प्रतिस्थापित हों।(सामवेद उत्तरार्चिक 1.3.4)
Hey Somras! You grant grandeur, has holden hue and pure. On mixing with water current-stream you present yourself in the Yagy and establish in the Kalash-vessel.(22.12.2025)
दुहान ऊधर्दिव्यं मधु प्रियं प्रत्नं सधस्थमासदत्।
आपृच्छयं धरुणं वाज्यर्षसि नृभिर्धौतो विचक्षणः॥
याजकों द्वारा शुद्ध किया हुआ माधुर्ययुक्त, हर्षदायक, लोकातीत सोमरस यज्ञ-स्थल पर प्रतिष्ठित है। उपासकों पर अपनी कृपादृष्टि बनाये रखने वाला यह सोम, उत्कृष्ट यज्ञ करने की भावना से युक्त याज्ञिको को ग्रहण होता है।(उत्तरार्चिक 1.3.5)
Sweetened, gladdening, extraordinary Somras, sanctified by the Yajak Gan is established at the Yagy site-Sthal. Somras merciful over the devotees is available to Yajak Gan accomplishing excellent Yagy.
प्र तु द्रव परि कोशं नि षीद नृभिः पुनानो अभि वाजमर्ष।
अश्वं न त्वा वाजिनं मर्जयन्तोऽच्छा बहीं रशनाभिर्नयन्ति॥
यज्ञ कर्ताओं द्वारा परिष्कृत हे सोम! आप हमारे यज्ञ-स्थल में उपस्थित होकर हमारे पूजा योग्य पात्र में प्रतिष्ठित हों। आप हविष्यान्न को ग्रहण करें। पराक्रमी अश्वों को पवित्र करने वालों की भाँति याज्ञिक गण आपको परिष्कृत करते हैं और घोड़ों की भाँति, उंगलियों के द्वारा आपको यज्ञ-वेदी तक ले जाते है।(उत्तरार्चिक 1.3.6)
Hey Somras, extracted by the Yagy performers! Come to our Yagy site and establish in the pot good enough for prayers. The Yagyik purify you like those who purify-train the mighty horses and take you to the Yagy Vedi through fingers like the horses.
स्वायुधः पवते देव इन्दुरशस्तिहा वृजना रक्षमाणः।
पिता देवानां जनिता सुदक्षो विष्टम्भो दिवो धरुणः पृथिव्याः॥
श्रेष्ठ अस्त्रों-शस्त्रों से सम्पन्न, शत्रुओं का संहार करने वाला, व्यवधानों को विनष्ट कर उनसे सुरक्षा करने वाला, पालनकर्ता, दिव्यता का विकास करने वाला, श्रेष्ठ पराक्रमी, द्यावा-पृथ्वी को धारण करने वाला, लोकातीत सोम परिष्कृत किया जाता है।(उत्तरार्चिक 1.3.7)
Extraordinary Somras possessing weapons & missiles, destroyer of the enemy and troubles-disturbances, protecting from them, booster of divinity, excellent mighty, supporter of the heavens & earth is extracted.
ऋषिर्विप्रः पुर एता जनानामृभुर्धीर उशना काव्येन।
स चिद्विवेद निहितं यदासामपीच्यां 3 गुह्यं नाम गोनाम्॥
तीक्ष्ण, महाज्ञानी, संचालन करने वाले, अधीर न होने वाले उशना ऋषि ने अपने स्तुतियों के माध्यम से, गायों में छिपे रहने वाले सोम को परिश्रम से अधिगत किया।(उत्तरार्चिक 1.3.5)
Sharp, highly qualified, calm-patient Rishi Ushna attained the Somras hidden in the cows by means of Stuties and his labour.
सामवेद उत्तरार्चिक (4) ::
अभि त्वा शूर नोनुमोऽदुग्धा इव धेनवः।
ईशानमस्य जगतः स्वर्दृशमीशानमिन्द्र तस्थुषः ॥
हे पराक्रम से युक्त देवराज इन्द्र! आप सब कुछ जानने वाले एवं संसार का पालन करने वाले हैं। आपके साक्षात्कार हेतु हम वैसे ही उत्सुक रहते हैं, जिस प्रकार बिना दुही हुई गायें अपने बछड़े के समीप जाने हेतु उत्सुक रहती हैं।(उत्तरार्चिक 1.4.1)
Hey mighty Devraj Indr! You know every thing and support the universe. We are keen to see you just like the cows who have not been milked and are ready to move to their calf.
न त्वावाँ अन्यो दिव्यो न पार्थिवो न जातो न जनिष्यते।
अश्वायन्तो मघवन्निन्द्र वाजिनो गव्यन्तस्त्वा हवामहे॥
हे वैभवशाली देवराज इन्द्र! इस भूलोक अथवा सुरलोक में आपके सदृश न कोई है, न कोई हुआ और न ही कभी कोई होगा। हम गाय रूपी द्रव्य (धन) एवं धन-संपत्ति प्राप्त करने की अभिलाषा से आपकी याचना करते हैं।(उत्तरार्चिक 1.4.2)
Hey possessor of grandeur Devraj Indr! Neither there is anyone comparable to you nor will be there, over the earth or heavens. We worship you with the wish to have wealth in the form of cows, prosperity etc.
कया नश्चित्र आ भुवदूती सदावृधः सखा। कया शचिष्ठया वृता॥
हे देवराज इन्द्र! आप लगातार उन्नति की ओर बढ़ने वाले हैं। किन तुष्टि कारक तत्त्वों को समर्पित करने से, किस प्रकार के विवेक से युक्त आराधना से, किन सामर्थों के साथ आप हमारे सहायक होंगे?(उत्तरार्चिक 1.4.3)
Hey Devraj Indr! You continue moving towards progress. By virtue which satisfying factors-means or the goods offered to you, worship prudently or the means will make you favourable-helping to us.
कस्त्वा सत्यो मदानां मंहिष्ठो मत्सदन्धसः। दृढा चिदारुजे वसु॥
हे इन्द्र! सत्य का पालन करने वालों को सुख प्रदान करने वाले पदार्थों में कौन-सा पदार्थ सबसे श्रेष्ठ है? सोमरस सबसे उत्कृष्ट है, क्योंकि ये आपको आनंदित करने वाला तथा परास्त न होने वाले शत्रुओं की सम्पन्नता का विनाश करने वाला है।(उत्तरार्चिक 1.4.4)
Hey Indr Dev! Which material is best to grant pleasure-comforts to the ruthful? Somras is best., since it gladden you and destroys the riches-prosperity of the undefeated enemy.
अभी षु णः सखीनामविता जरितृणाम्। शतं भवास्यूतये॥
हे मित्र देवराज इन्द्र! आप याजकों की रक्षा करने वाले हैं। अतः आप सब तरह से सुरक्षा करने के निमित्त उत्कृष्ट तैयारी के साथ उपस्थित हों।(उत्तरार्चिक 1.4.5)
Hey friendly Devraj Indr! You protect the Yajak Gan. Therefore, invoke with excellent preparedness for our safety.
तं वो दस्ममृतीषहं वसोर्मन्दानमन्धसः।
अभि वत्सं न स्वसरेषु धेनव इन्द्रं गीर्भिर्नवामहे॥
जिस तरह बाड़े में गायें अपने बछड़ों के समीप जाने हेतु उत्सुक होकर शब्द करती है, उसी प्रकार हम (स्तोतागण) शत्रुओं से सुरक्षित होने वाले देवराज इन्द्र के निमित्त उत्सुक होकर प्रार्थना करते हैं।(उत्तरार्चिक 1.4.6)
The way cows moo to reach their calves in the shed, similarly we the Strota Gan anxiously worship Devraj Indr for our protection from the enemy.
द्युक्षं सुदानं तविषीभिरावृतं गिरि न पुरुभोजसम्।
क्षुमन्तं वाजं शतिनं सहस्रिणं मक्षु गोमन्तमीमहे॥
हे देवराज इन्द्र! आप श्रेष्ठ दानी, स्वर्गलोक में निवास करने वाले व महा पराक्रमी हैं। हम आपसे सभी तरह की धन-संपत्ति, असंख्यों गायों एवं अन (पोषण पदार्थ) प्राप्त करने की अभिलाषा करते है।(उत्तरार्चिक 1.4.7)
Hey Devraj Indr! You are best donor, resident of heavens and majestic warrior. We expect wealth, prosperity, grandeur, numerous cows and food grains from you.
तरोभिर्वो विदद्वसुमिन्द्रं सबाध ऊतये।
बृहद्गायन्तः सुतसोमे अध्वरे हुवे भरं न कारिणम्॥
जिस प्रकार शिशु अपने माता-पिता को पुकारता है, उसी प्रकार हम अपने हितैषी देवराज इन्द्र को अपने सहायतार्थ आवाहित करते हैं। हे याजकों! सोमयज्ञ में वैभव से युक्त करने वाले गतिमान घोड़ों से सम्पन्न देवराज इन्द्र की अपनी सुरक्षा के उद्देश्य से पूजा करो।(उत्तरार्चिक 1.4.8)
The way an infant call his parents, similarly we invoke our well wisher Devraj Indr for our help. Hey Yajak Gan! Worship the Devraj Indr lord of fast moving horses, possessing grandeur, for your own safety.
न यं दुध्रा वरन्ते न स्थिरा मुरा मदेषु शिप्रमन्धसः।
य आदृत्या शशमानाय सुन्वते दाता जरित्र उक्थ्यम्॥
सुरम्य आकार वाले देवराज इन्द्र को महा पराक्रमी दानव भी पराजित नहीं कर सकते हैं। हम उस देवराज इन्द्र की अभ्यर्थना करते हैं, जो सोमरस के उल्लास में सोमयज्ञ के निमित्त यज्ञ करने वालों को ऐश्वर्य से सम्पन्न करते हैं।(उत्तरार्चिक 1.4.9)
Devraj Indr possessor of picturesque-beautiful body can not be defeated by majestic demons-giants. We worship Devraj Indr having glee-frolic due to Somras drinking, who grant grandeur to those who conduct Som Yagy.(23.12.2025)
सामवेद उत्तरार्चिक (5) ::
स्वादिष्ठया मदिष्ठया पवस्व सोम धारया। इन्द्राय पातवे सुतः॥
हे सोम! आप स्वादिष्ट और माधुर्य युक्त रस से पूर्ण तथा देवों के आनन्द में वृद्धि करने वाले हैं। आप देवराज इन्द्र के पान करने के निमित्त क्षरित तथा शोधित हों।(सामवेद उत्तरार्चिक 1.5.1)
क्षरित :: गिरा हुआ, टपकता हुआ, बहता हुआ, स्रवित, कमजोर, क्षीण किसी चीज़ का घिस जाने, कट जाना, किसी दोष से कलंकित होना; leaked, dripped, weakened, degraded, tainted, erode.
Hey Somras! You are tasty, sweetened, increase the pleasure of the demigods-deities. You should drip and sanctify for consumption by Devraj Indr.
रक्ष्गेहा विश्वचर्षणिरभि योनिमयोहते। द्रोणे सधस्थमासदत्॥
हे शत्रुओं का संहार करने वाले, विश्व द्रष्टा सोम! आप परिष्कृत होते हुए यज्ञ-मण्डप में स्थित स्वर्ण रूपी कलश में प्रतिस्थापित हों।(सामवेद उत्तरार्चिक 1.5.2)
Hey destroyer of enemies, viewer of the universe! You should be established in the golden Kalash in Yagy Mandap after purification.
वरिवोधातमो भुवो मंहिष्ठो वृत्रहन्तमः। पर्षि राधो मघोनाम्॥
हे सोम! आप महान् धन-संपदा प्रदान करने वाले हैं एवं शत्रुओं का पूरी तरह से विनाश करने वाले है, अतः पाप कर्मों में धन न लगने देकर, उसे अच्छे काम में नियोजित करने हेतु प्रदान करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 1.5.3)
Hey Somras! You are the possessor of great wealth-prosperity and destroyers of the enemies with their root. Do not let the wealth be used-wasted in evil deeds, instead let it be used in virtuous-righteous deeds.
पवस्व मधुमत्तम इन्द्राय सोम क्रतुवित्तमो मदः। महि द्युक्षतमो मदः॥
हे सोम! आप ऋत्विजों को उनके कर्मों का फल प्रदान करने वाले, परम् प्रतापी तथा अत्यधिक मधुरता से युक्त है, अतः देवराज इन्द्र को आनन्दित करने के उद्देश्य से आप परिष्कृत होकर कलश में विराजमान हों।(सामवेद उत्तरार्चिक 1.5.4)
Hey Som! You reward the Ritviz for their efforts, majestic and too much sweetened. Hence, you should be purified for gladdening Devraj Indr and stored in the Kalash.
यस्य ते पीत्वा वृषभो वृषायतेऽस्य पीत्वा स्वर्विदः।
स सुप्रकेतो अभ्यक्रमीदिषोऽच्छा वाजं नैतशः॥
हे सोमदेव! पराक्रमी देवराज इन्द्र आपको ग्रहण करके और अधिक पराक्रमी बन जाते हैं। विद्वान् लोग भी आपका सेवन करके अत्यन्त हर्षित होते हैं। इस प्रकार के श्रेष्ठ दृष्टिवंत देवराज इन्द्र, आपकी शक्ति से रणभूमि में जीतने वाले घोड़े की तरह, अति शीघ्र शत्रुओं की सम्पत्ति पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लेते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 1.5.5)
दृष्टिवंत :: जिसे दिखाई पड़े, बुद्धिमान्, ज्ञानी; clairvoyant.
Hey Somras! Majestic Devraj Indr become mighty after drinking Somras. Enlightened-learned become happy after drinking Somras. Best clairvoyant Devraj Indr winner like a horse in the war field, take over the property of the enemy quickly.
इन्द्रमच्छ सुता इमे वृषणं यन्तु हरयः। श्रुष्टे जातास इन्दवः स्वर्विदः॥
शीघ्रता से परिष्कृत, तेजोमंडित, ज्ञान को बढ़ाने वाला हरे एवं भूरे वर्ण का सोमरस, पराक्रमी देवराज इन्द्र को तुरन्त प्राप्त हो।(सामवेद उत्तरार्चिक 1.5.6)
तेजो मंडित :: तेज (प्रकाश, आभा, ओज) से भरा हुआ, सुशोभित या मंडित (सजाया हुआ); full of aura-radiance.
Let quickly extracted, aura and learning booster, greenish and brownish coloured, Somras be availed by Devraj Indr immediately.
अयं भराय सानसिरिन्द्राय पवते सुतः। सोमो जैत्रस्य चेतति यथा विदे॥
संग्राम के समय पान करने योग्य यह सोमरस देवराज इन्द्र हेतु तैयार किया जाता है। जैसा कि सभी लोगों को ज्ञात है, कि विजय प्राप्त करने की अभिलाषा रखने वाले देवराज इन्द्र को यह सोमरस विशेष शक्ति प्रदान करता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 1.5.7)
Somras to be consumed during war is readied for Devraj Indr.
अस्येदिन्द्रो मदेष्वा ग्राभं गृभ्णाति सानसिम्। वज्रं च वृषणं भरत्समप्सुजित्॥
सोमरस को ग्रहण करके प्रफुल्लित हुए देवराज इन्द्र जल-धारा को स्तम्भित करके अपने धनुष तथा वज्र को धारण कर लेते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 1.5.8)
स्तंभित :: निश्चल, निस्तब्ध, सुन्न; frozen.
Gladdened by drinking Somras Devraj Indr freeze the water stream and wield his bow and Vajr.
पुरोजिती वो अन्धसः सुताय मादयित्नवे। अप श्वानं श्नथिष्टन सखायो दीर्घजिह्वयम्॥
हे यजमानों! जिस सोमरस के सेवन से शक्ति प्राप्त कर जीत अवश्य मिलती है, ऐसे सुख प्रदान करने वाले सोमरस को श्वानों तथा उनके सदृश लालची लोगों से दूर हटा दो अर्थात् यह दिव्य सोमरस दुष्ट प्रवृत्ति वालों को न प्राप्त हो।(सामवेद उत्तरार्चिक 1.5.9)
Hey Yajman Gan! Drinking of Somras ensure victory. Keep Somras away from the approach of dogs, greedy & wicked-vicious.
यो धारया पावकया परिप्रस्यन्दते सुतः। इन्दुरश्वो न कृत्व्यः॥
याज्ञिकों की यज्ञादि में सहायता करने वाला यह सोमरस परिष्कृत होते समय घोड़े की भाँति तीव्र गतिमान रूप से द्रोण कलश में प्रवाहित होता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 1.5.10)
Somras helpful to the Yagyik in Yagy, moves fast into the Dron-wooden vessel quickly like a horse.
तं दुरोषमभी नरः सोमं विश्वाच्या धिया। यज्ञाय सन्त्वद्रयः॥
हे स्तोताओं! यह सोम दुर्जनों को नष्ट करने वाला है। आप यज्ञ का सम्मान करते हुए उस सोमरस को सभी के कल्याण की भावना रखते हुए आहूत करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 1.5.11)
Hey Stotas! Somras destroys the wicked-vicious, sinners. Honouring the Yagy you should have Somras with the wish of social welfare.
अभि प्रियाणि पवते चनोहितो नामानि यह्नो अधि येषु वर्धते।
आ सूर्यस्य बृहतो बृहन्नधि रथं विष्वञ्चमरुहद्विचक्षणः॥
यह सोमरस प्रजा को संतुष्टि प्रदान करने वाला, पवित्र तथा कल्याणकारी है। यह जिस जल में मिश्रित किया जाता है, उसमें यह महान् तथा सब कुछ जानने वाला सोमरस सूर्य की दीप्ति से अत्यधिक तेज होकर ऊपर बढ़ता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 1.5.12)
Somras grants satisfaction to the populace-subjects, pious and grant welfare. Somras knowing every thing, on mixing in water shine like the Sun and rises up wards.
ऋतस्य जिह्वा पवते मधु प्रियं वक्ता पतिर्धियो अस्या अदाभ्यः।
दधाति पुत्रः पित्रोरपीच्यां 3 नाम तृतीयमधि रोचनं दिवः॥
याग की जीभ के समान, छनते समय ध्वनि उत्पन्न करता हुआ यह सोमरस प्रिय तथा मधुर रूप में तैयार होता है। यज्ञ कर्म की रक्षा करने वाला यह सोम भय से रहित है। यह सोम न अपनी माँ को जानता है और न अपने पिता को जानता है, यह तो याज्ञिकों द्वारा तैयार होता है। तीनों लोकों में प्रसिद्ध यह सोम तैयार होने के पश्चात् 'सोमजयी' नामक तीसरे नाम को धारण करता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 1.5.13)
Sweet & dear Somras make sound during filtration, like the tongue of the Yagy. Somras that protect Yagy Karm is free from fear. Somras does no know its parents and prepared by the Yagyik Gan. Famous in the three abodes Somras get new name "Somjayi".
अव द्युतानः कलशाँ अचिक्रदन्नृभिर्येमाणः कोश आ हिरण्यये।
अभी ऋतस्य दोहना अनूषताधि त्रिपृष्ठ उषसो वि राजसि॥
याजकगण सुवर्ण युक्त पात्र में परिष्कृत होकर, प्रवाहित होते समय नाद करने वाले कान्तिमय सोमरस की याचना करते हैं। यह सोम तीनों ही दिवावसान (सुबह, दोपहर, शाम) में प्रदीप्त होता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 1.5.14)
Yajak Gan worship Somras making sound while flowing into the pot having gold on being purified. Somras shines during the three segments of the day viz morning, noon and evening.
सामवेद उत्तरार्चिक (6) ::
यज्ञायज्ञा वो अग्नये गिरागिरा च दक्षसे।
प्रप्र वयममृतं जातवेदसं प्रियं मित्रं न शंसिषम्॥
हे उद्गाताओं! आप हर-एक याग में देदीप्यमान् अग्नि देव की अपने स्तोत्रों से स्तुति करो। हम भी उस अविनाशी, सब कुछ जानने वाले अग्नि देव की, मित्र की भांति सराहना करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 1.6.1)
Hey Udgata Gan! Worship lustrous-aurous Agni Dev with the Strotrs. We too appreciate immortal, all knowing Agni Dev like a friend.
ऊर्जा नपातं स हिनायमस्मयुर्दाशेम हव्यदातये।
भुवद्वाजेष्वविता भुववृध उत त्राता तनूनाम्॥
हे अन्न-बल के पुत्र अग्नि देव! हम आपकी याचना करते हैं। आप अवश्य रूप से हमारे लिए कल्याणकारी हैं। आप हमारी हवियों को देवताओं तक ले जाते हैं। आप रणभूमि में हमारी सुरक्षा करते हुए, प्रगति के मार्ग पर अग्रसर करने वाले तथा सभी तरह से हमें संरक्षण प्रदान करने वाले हों।(सामवेद उत्तरार्चिक 1.6.2)
Hey son of food grains and son of Bal, Agni Dev! You should be beneficial to us. You carry our offerings-oblations to demigods-deities. You protect us in the war field, move us to progress and grant protection.(24.12.2025)
एह्य षु ब्रवाणि तेऽग्न इत्थेतरा गिरः। एभिर्वर्धास इन्दुभिः॥
हे अग्नि देव! विधि-विधान से की गई उपासना से आनन्दित होकर आप हमारे समक्ष पधारें। यह सोमरस आपकी उन्नति करने वाला है।(सामवेद उत्तरार्चिक 1.6.3)
Hey Agni Dev! Invoke before us having pleased with ritualistic worship. Somras meant for you here, is for your growth.
यत्र क्व च ते मनो दक्षं दधस उत्तरम्। तत्र योनिं कृणवसे॥
हे अग्नि! आप जिस किसी भी ऋत्विज की प्रार्थना से आनन्दत होते हैं, उसे शक्ति तथा उत्कृष्ट निवास स्थान प्रदान करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 1.6.4)
Hey Agni! You grant might-power, excellent residence-house to the Ritviz with whom you become happy-pleased due to his prayers.
न हि ते पूर्तमक्षिपद्भुवन्नेमानां पते। अथा दुवो वनवसे॥
हे अग्नि देव! आपका तेज आँखों को कष्ट नहीं पहुँचाता है। हे नियमों का पालन करने वाले, मनुष्यों के अधिपति! आप हमारी याचनाओं को स्वीकारें।(सामवेद उत्तरार्चिक 1.6.5)
Hey Agni Dev! Your radiance do not harm-torture the eyes. Hey Lord of humans; following rules & regulation! Accept and respond to our prayers.
वयमु त्वामपूर्व्य स्थूरं न कच्चिद्भरन्तोऽवस्यवः। वज्रिं चित्र हवामहे॥
हे वज्रधारक देवराज इन्द्र! सोमरस समर्पित करने वाले हम, आपको अपनी रक्षा करने के निमित्त वैसे ही पुकारते हैं, जिस प्रकार कमजोर मनुष्य अपनी सहायता हेतु किसी बलवान् को पुकारता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 1.6.6)
Hey Vajr wielding Devraj Indr! We, those who offer Somras to you, call you for our protection; the way a weak person calls a mighty person for his help.
उप त्वा कर्मन्नुतये स नो युवोग्रश्चक्राम यो धृषत्।
त्वामिध्यवितारं ववृमहे सखाय इन्द्र सानसिम्॥
हे देवराज इन्द्र! हम यज्ञादि कर्म करते हुए अपने सहायक के रूप में आपकी शरण लेते हैं। आप शत्रुओं का शमन करने वाले, युवा तथा पराक्रमी योद्धा हैं। हम आपको मित्रवत् सहायता हेतु आवाहित करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 1.6.7)
Hey Devraj Indr! We seek your help-asylum for accomplishing Yagy and ritualistic sacrifices as our helping hand. You a majestic warrior and destroyer of the enemy. We invoke you as a friend for help.
अधा हीन्द्र गिर्वण उप त्वा काम ईमहे ससृग्महे। उदेव ग्मन्त उदभिः॥
हे प्रार्थना करने योग्य देवराज इन्द्र! जल ले जाते समय, जिस प्रकार मनुष्य जल फेंककर क्रीड़ा करते हैं, वैसे ही हम आपके समक्ष आकर अपनी मनोकामनाओं को पूर्ण करने की याचना करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 1.6.8)
Hey Devraj Indr deserving prayers! The way a man play splashing water while carrying water, we too pray before you for fulfilment of our desires-wishes.
वार्ण त्वा यव्याभिर्वर्धन्ति शूर ब्रह्माणि। वावृध्वांसं चिदद्रिवो दिवेदिवे॥
हे वज्रपाणि-वीर देवराज इन्द्र! जिस प्रकार सरिताओं का जल सिंधु में मिलकर उसकी शोभा को बढ़ाता है, उसी प्रकार हम अपनी प्रार्थनाओं से आपके कीर्ति का प्रसार करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 1.6.9)
Hey Vajr wielding brave Devraj Indr! The way water of rivers increase the glory of the ocean, similarly our prayers spread your name & fame.
युञ्जन्ति हरी इषिरस्य गाथयोरौ रथ उरुयुगे वचोयुजा। इन्द्रवाहा स्वर्विदा॥
वेगवान् देवराज इन्द्र के महान् रथ में आदेश मात्र से ही उत्कृष्ट अश्व संयोजित हो जाते हैं। वे स्तोताओं की स्तुतियों से उत्साहित होकर देवराज इन्द्र को उनके आवास स्थल पर ले जाते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 1.6.10)
The horses deploy in the great charoite of dynamic Devraj Indr just by ordering. They get-become encroused by the Stuties of the Stotas and take Devraj Indr to his house-abode.
सामवेद उत्तरार्चिक (2) :: ऋषि :- श्रुतकक्ष, वसिष्ठ, मेधातिथिप्रमेधौ, इरिम्बिठि, कुसीदी काण्व, त्रिशोक, काण्व, विश्वामित्र, मधुच्छन्दा, शुनःशेप, नारद, अवत्सार, मेध्यातिथि, असित, काश्यप देवलोवा, अमहीयुरांगिरस, त्रित आप्त्य, भरद्वाजादय, सप्तऋषय, श्यावाश्व, अग्निचाक्षुष, प्रजापतिर्वैश्वामित्रो वाच्यो वा; देवता :- इन्द्र, अग्नि, उषा, अश्विन, पवमान, सोम। छन्द :- प्रगाथ, गायत्री, उष्णिक्, बृहती, अनुष्टुप्।
पान्तमा वो अन्धस इन्द्रमभि प्र गायत। विश्वासाहं शतक्रतुं मंहिष्ठं चर्षणीनाम्॥
हे स्तोताओं! आप सभी देवराज इन्द्र की स्तुति करो। वह आपके द्वारा अर्पित किये गये सोमरूपी पोषक तत्त्व का सेवन करने वाले हैं। वह शत्रुओं का संहार करने वाले, धन-वैभव उपलब्ध कराने वाले, शतक्रतु (सौ यज्ञादि कर्म करने वाले हैं।)(सामवेद उत्तरार्चिक 2.1.1)
Hey Stotas! You all worship Devraj Indr. He is going to drink the Somras offered by you. He destroys the enemies, make available wealth & prosperity and accomplished hundred Yagy.
पुरुहूतं पुरुष्टुतं गाथान्यां 3 सनश्रुतम्। इन्द्र इति ब्रवीतन॥
हे याजकों! जो इन्द्र अनेक लोगों द्वारा सहायता हेतु आवाहित किये जाते हैं, अनेक लोगों द्वारा स्तुत्य हैं, उन प्राचीनकाल से ख्याति प्राप्त देवराज इन्द्र की प्रार्थना करो।(सामवेद उत्तरार्चिक 2.1.2)
Hey Yajak Gan! Devraj Indr invoked for help is worshiped by numerous people. Worship eternal-ancient glorious Devraj Indr.
इन्द्र इन्नो महोनां दाता वाजानां नृतुः। महाँ अभिज्ञवा यमत्॥
हे ऋत्विजों! समस्त जनों को उन्नति के मार्ग पर अग्रसर करने वाले, महान् देवराज इन्द्र हमारे समक्ष उपस्थित हों तथा हमें समृद्धिवान् बनायें।(सामवेद उत्तरार्चिक 2.1.3)
Hey Ritviz Gan! Let Devraj Indr behind the progress of all people invoke before us and make us prosperous.
प्र व इन्द्राय मादनं हर्यश्वाय गायत। सखायः सोमपाव्ने॥
हे ऋत्विजों! देवराज इन्द्र सोमरस का सेवन करने वाले, उत्कृष्ट बलवान् अश्वों से सम्पन्न हैं, आप सभी उनको प्रसन्न करने वाले सुन्दर स्तोत्रों का गान करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 2.1.4)
Hey Ritviz! Devraj who drinks Somras possess best mighty horses. You should recite descent Strotr.
शंसेदुक्थं सुदानव उत द्युक्षं यथा नरः। चकृमा सत्यराधसे॥
हे यजमानों! देवराज इन्द्र उत्कृष्ट ऐश्वर्य प्रदान करने वाले, सत्य के मार्ग से अर्जित सम्पदा वाले है, तुम उनकी याचना करो। हम भी श्रेष्ठ विधि से उनकी स्तुति करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 2.1.5)
Hey Yajman Gan! Devraj You should worship Devraj Indr who grants excellent grandeur, having earned it by truthful means. We too worship-pray to him with descent methods.
त्वं न इन्द्र वाजयुस्त्वं गव्युः शतक्रतो। त्वं हिरण्ययुर्वसो॥
हे देवराज इन्द्र! आप शतक्रतु, महा बलवान् हैं। आप हमें पोषक पदार्थ (अन्न), गौरूपी धन एवं सुवर्ण प्रदान करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 2.1.6)
Hey Devraj Indr! You are the performer of hundred Yagy and highly powerful. Grant us nourishing food grains, wealth in the form of cows and gold.
वयमु त्वा तदिदर्था इन्द्र त्वायन्तः सखायः। कण्वा उक्थेभिर्जरन्ते॥
हे देवराज इन्द्र! हम (याजक) आपको प्राप्त करने की लालसा से सन्तान सहित अद्भुत स्तोत्रों से आपकी अभ्यर्थना करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 2.1.7)
Hey Devraj Indr! We the Yajak Gan worship you with amazing Strotrs along with our progeny-sons.
न घेमन्यदा पपन वज्रिन्नपसो नविष्टौ। तवेदु स्तोमैश्चिकेत॥
हे वज्रपाणि देवराज इन्द्र! यज्ञ अनुष्ठान में हम केवल आपका ही आवाहन करते हैं, किसी दूसरे का नहीं। हम स्तोत्रों द्वारा केवल आपकी ही अभ्यर्थना करना जानते है।(सामवेद उत्तरार्चिक 2.1.8)
Hey Vajr wielding Indr! We invoke only you for the accomplishment of Yagy, none other than you. We know how to worship-invoke you with the help of Strotrs.(26.12.2025)
इच्छन्ति देवाः सुन्वन्तं न स्वप्नाय स्पृहयन्ति। यन्ति प्रमादमतन्द्राः॥
जो लोग सोम यज्ञ करने वाले हैं, उनसे देवता लोग प्रसन्न रहते हैं, आलस करने वालों से नहीं। मेहनत करने वाले याजक ही अत्यन्त हर्षदायी सोम प्राप्त करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 2.1.9)
Demigods-deities remain happy-pleased with those who perform Som Yagy not the lazy ones. Laborious Yajak attain gladdening Somras.
इन्द्राय मद्वने सुतं परि ष्टोभन्तु नो गिरः। अर्कमर्चन्तु कारवः॥
हे ऋत्विजों! आप हर्ष प्रदान करने वाले सोमरस की इच्छा रखने वाले देवराज इन्द्र हेतु सोमरस को परिष्कृत करते हैं। हम अपने स्तोत्रों से इन्द्र की स्तुति कर रहे हैं, आप सब भी उस प्रशंसा करने योग्य सोमरस की अभ्यर्थना करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 2.1.10)
Hey Ritviz Gan! You purify gladdening Somras for Devraj Indr, who wish to have it. We are worshiping Devraj Indr with the Strotrs. You too pray-request for appreciable Somras.
यस्मिन्विश्वा अधि श्रियो रणन्ति सप्त संसदः। इन्द्रं सुते हवामहे॥
उन शोभनीय देवराज इन्द्र को हम सोमयज्ञ में आवाहित करते हैं, जिनकी अभ्यर्थना यज्ञ के सातों ऋत्विज, यज्ञ-मण्डप में उपस्थित सातों संसद (होतृ, पोतृ, नेष्ट, आग्नीध्र, प्रशास्तु, अध्वर्यु एवं ब्रह्मन्) करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 2.1.11)
We invoke decorated Devraj Indr who's worship is done by the seven Ritviz, and the seven participants-contributors viz Hotr, Potr, Nesht, Agnidhr, Prashastu, Ardhvaryu and Brahmans in the Som Yagy.
त्रिकद्रुकेषु चेतनं देवासो यज्ञमत्नत। तमिद्वर्धन्तु नो गिरः॥
देवगण प्रेरणा प्रदान करने वाले, उत्साह वर्धन, तीन चरणों में पूर्ण होने वाले यज्ञ का विस्तार किया करते हैं, जिसकी साधक गण पूर्ण रूप से प्रशंसा करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 2.1.12)
Demigods extend the inspiring Yagy accomplished in three stages appreciated by the Sadhak Gan.
सामवेद उत्तरार्चिक (2.2) ::
अयं त इन्द्र सोमो निपूतो अधि बर्हिषि। एहीमस्य द्रवा पिब॥
हे वज्रधारी इन्द्र! आपके लिए परिष्कृत किया हुआ सोमरस तैयार है। हम याजकों ने इसे यज्ञ में आसन पर स्थित कर दिया है। अतः आप इसका सेवन करने के निमित्त अति शीघ्र यज्ञ में आएँ।(सामवेद उत्तरार्चिक 2.2.1)
Hey Vajr wielding Devraj Indr! Purified Somras is ready for you. We Yajak Gan have established it in the Yagy. Hence, you should quickly come to drink it.
शाचिगो शाचिपूजनायं रणाय ते सुतः। आखण्डल प्र हूयसे॥
हे शक्तिशाली इन्द्र देव! आप महा पराक्रमी, शत्रुओं का संहार करने वाले, आराध्य, परम् प्रतापी हैं। आपको हर्षित करने हेतु सोमरस तैयार किया गया है। अतएव हम आपको यज्ञ में सोमरस का सेवन करने हेतु आमन्त्रित करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 2.2.2)
Hey mighty Devraj Indr! You are the destroyer of mighty enemies, adorable and majestic. Somras has been sanctified to gladden you. Hence, we invite you in the Yagy to drink Somras.
यस्ते शृङ्गवृषो णपात्प्रणपात्कुण्डपाय्यः। न्यस्मिन् दध्र आ मनः॥
हे प्रचण्ड आभा से युक्त देवराज इन्द्र! आपने श्रृंगवृष ऋषि के पुत्र सूर्य को धुरी पर प्रतिष्ठित किया है। सहजता से सेवन करने योग्य सोम हेतु इस कुण्डपायी सोमयज्ञ की तरफ आप उन्मुख हों।(सामवेद उत्तरार्चिक 2.2.3)
प्रचंड :: अति उग्र, अति तीव्र, अत्यधिक गर्म; mortal, intense, intensive, furious, drastic, heady, stormy, burly, sharp, vehement, impetuous, obstreperous, fervid, warm, pelting, severe, serious, mad, hot, tearing, wanton, wild, roistering, dithyrambic, keen, high, frenetic, cutthroat, phrenetic.
Hey Devraj Indr possessing-intense-fierce aura! You established Sury son of Shrang Varsh Rishi at the focus-foci (in its path of revolution). You should move to the pond of Somras in the Som Yagy for drinking Somras easily.
आ तू न इन्द्र क्षुमन्तं चित्रं ग्राभं सं गृभाय। महाहस्ती दक्षिणेन॥
हे विशाल बाँहों वाले देवराज इन्द्र! आप यशस्वी, विलक्षण तथा उपयुक्त ऐश्वर्य अपने दाहिने हाथ में लेकर हमें देने की अनुकम्पा करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 2.2.4)
Hey Devraj Indr with long arms! Hold glorious, amazing, eccentric and suitable grandeur in your right hand and give it to us, mercifully.
विद्मा हि त्वा तुविकूर्मि तुविदेष्णं तुवीमघम्। तुविमात्रमवोभिः॥
हे देवराज इन्द्र! आप वैभवशाली, बहुमुखी सामर्थ्य करने वाले, विशाल आकृति वाले तथा सभी की रक्षा करने वाले हैं। हम आपको इसी रूप में जानते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 2.2.5)
Hey Devraj Indr! You possess grandeur, multiple forms of capability, large form-body and protector of all (virtuous, righteous, pious). We identify you in this form.
न हि त्वा शूर देवा न मर्तासो दित्सन्तम्। भीमं न गां वारयन्ते॥
हे देवराज इन्द्र! जिस प्रकार बलिष्ठ सांड़ को कोई भी रोक नहीं सकता, वैसे ही हे शूरवीर! दानी प्रवृत्ति वाले आपको ईश्वर अथवा मनुष्य कोई भी हटा नहीं सकता।(सामवेद उत्तरार्चिक 2.2.6)
Hey mighty Devraj Indr! The way a strong bull can not be stopped by any one, none can not stop you with the tendency to donate; even the God or a human being.
अभि त्वा वृषभा सुते सुतं सृजामि पीतये। तृम्पा व्यश्नुही मदम्॥
हे शक्तिशाली वीरेन्द्र! सोमयज्ञ में आपके निमित्त सोमरस परिष्कृत किया जाता है। आप उस हर्ष प्रदान करने वाले सोमरस का सेवन कर संतुष्ट हों।(सामवेद उत्तरार्चिक 2.2.7)
Hey mighty Virendr-Devraj Indr! Somras is distilled-sanctified for you in the Som Yagy. Drink the gladding Somras and become satiated.
मा त्वा मूरा अविष्यवो मोपहस्वान आ दभन्। मा कीं ब्रह्मद्विषं वनः॥
हे देवराज इन्द्र! आपसे संरक्षण प्राप्त करने की इच्छा करने वाले तथा परिहास करने वाले बुद्धि हीन लोगों का आप पर कोई असर न हो। ज्ञान से शत्रुता रखने वाले लोगों की आप सहायता न करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 2.2.8)
Hey Devraj Indr! You should not have the impact of the duffers who wish to be protected and still make fun of you. Do not protect those who are the enemies of learning.
इह त्वा गोपरीणसं महे मन्दन्तु राधसे। सरो गौरो यथा पिब॥
हे देवराज इन्द्र! स्तोतागण आपसे धन-सम्पत्ति प्राप्त करने की अभिलाषा रखते हैं। इसलिए वह गाय के दूध में मिले सोमरस की हवि देकर, आपको प्रसन्न करना चाहते हैं। जिस प्रकार मृग जलाशय के पानी का सेवन करता है, वैसे ही आप इस सोमरस का सेवन करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 2.2.9)
Hey Devraj Indr! The Stota Gan expect wealth-prosperity from you. They wish to appease you by offering you Somras mixed with cow's milk. The way a deer drink water in the pond you should drink Somras in the same manner.
इदं वसो सुतमन्धः पिबा सुपूर्णमुदरम्। अनाभयिन्ररिमा ते॥
हे सहारा देने वाले, भय रहित देवराज इन्द्र! हम आपको परिष्कृत सोमरस अर्पित करते हैं, आप जी भरकर इस सोमरस का पान करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 2.2.10)
Hey supporter, making us fearless, Devraj Indr! We offer you sanctified-purified Somras. Drink it as much as you can.
नृभिर्धौतः सुतो अश्नैरव्या वारैः परिपूतः। अश्वो न निक्तो नदीषु॥
जैसे अश्व को तालाब में साफ किया जाता है, वैसे ही यजमानों द्वारा सोम साफ करके, पत्थरों से कूटकर, शोधन यंत्रों से छानकर रस रूप में तैयार किया गया है।(सामवेद उत्तरार्चिक 2.2.11)
The way the horse is bathed in the pond, similarly the Yajmans cleanse the Som, crush it with stones, clean it with purifying machines and converted into juice-extract.
तं ते यवं यथा गोभिः स्वादुमकर्म श्रीणन्तः। इन्द्र त्वास्मिन्त्सधमादे॥
हे देवराज इन्द्र! पुरोडाश (हवि) की तरह गौ दुग्ध मिश्रित शुद्ध किया हुआ यह सोमरस आपके लिए तैयार किया गया है। इस हर्षदायी, तृप्त करने वाले सोमरस का सेवन करने के निमित्त हम आपको आमन्त्रित करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 2.2.12)
Hey Devraj Indr! Somras has been prepared for you mixed with cow's milk for you, like Purodas (offerings). We invite-invoke you for drinking satiating gladdening Somras.
सामवेद उत्तरार्चिक (2.3) ::
इदं ह्यन्वोजसा सुतं राधानां पते। पिबा त्वा3स्य गिर्वणः॥
हे अपार सम्पत्ति वाले (कुबेर), स्तुति करने योग्य, पराक्रमी इन्द्र! आप अपनी इच्छानुसार इस आनन्ददायी सोमरस का सेवन करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 2.3.1)
Hey magnificent Devraj Indr possessing unlimited wealth! Drink this gladdening Somras with your wish.
यस्ते अनु स्वधामसत्सुते नि यच्छ तन्वम्। स त्वा ममत्तु सोम्य॥
हे सोमरस का सेवन करने योग्य देवराज इन्द्र! आपकी काया हेतु यह सोम पोषक तत्त्व के समान है। आप इस याग में प्रकट होकर सोमरस के सेवन से हर्षित हों।(सामवेद उत्तरार्चिक 2.3.2)
Hey Devraj Indr deserving drinking Somras! For your body, this Somras acts like a nutrient. Invoke in the Yagy drink Somras and gladden.(28.12.2025)
प्र ते अश्नोतु कुक्ष्योः प्रेन्द्र ब्रह्मणा शिरः। प्र बाहू शूर राधसा॥
हे बलशाली देवराज इन्द्र! यह शोधित सोम स्तुति के प्रभाव से आपके पूरे शरीर में पहुंचे। आपके दोनों भुजाओं में वह सोम अच्छी तरह से रम जाए। हे वीरेन्द्र! आप अपने हाथों से हमें धन प्रदान करने में सक्षम हों।(सामवेद उत्तरार्चिक 2.3.3)
Hey mighty Devraj Indr! Let this sanctified Somras reach in your whole body due to the Stuti. It should be thoroughly immersed in your arms. Hey Virendr! You should be capable of granting us wealth with your both hands.
आ त्वेता नि षीदतेन्द्रमभि प्र गायत। सखाय स्तोमवाहसः॥
हे यज्ञ कर्ताओं! देवराज इन्द्र को हर्षित करने के लिए अविलम्ब यहाँ आगमन करो तथा आसन पर स्थित हो। फिर उनकी प्रार्थना करो, उनकी पूजा करो।(सामवेद उत्तरार्चिक 2.3.4)
Hey Yagy performers! Come here quickly to please Devraj Indr and occupy the seat-cushion. Then pray & worship him.
पुरूतमं पुरूणामीशानं वार्याणाम्। इन्द्रं सोमे सचा सुते॥
हे याज्ञिक गण! देवराज इन्द्र शत्रुओं को पराभूत करने वाले तथा सभी सम्पत्तियों के अधिष्ठाता हैं। आप सभी एक साथ उन इन्द्रदेव की स्तुति करो।(सामवेद उत्तरार्चिक 2.3.5)
Hey Yagyik Gan! Devraj Indr is the Lord-deity of all powers to defeat the enemies. Worship him together.
स घा नो योग आ भुवत्स राये स पुरन्ध्या। गमद्वाजेभिरा स नः॥
वे देवराज इन्द्र हमारे पौरुष को तेज करने में सहायता करें, हमें धन-सम्पदा से सम्पन्न करें, विवेक प्राप्त करने का मार्ग प्रशस्त करते हुए पोषक पदार्थ के साथ हमारे सम्मुख पधारें।(सामवेद उत्तरार्चिक 2.3.6)
Let Devraj Indr help us increase-boost our potential, grant us wealth-prosperity, direct us to prudence and come to us with the nourishing-nurturing materials.
योगेयोगे तवस्तरं वाजेवाजे हवामहे। सखाय इन्द्रमूतये॥
हे स्तोताओं! हम अच्छे कामों को शुरु करने में, सभी तरह के युद्ध में, रक्षा करने हेतु पराक्रमी देवराज इन्द्र को आवाहित करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 2.3.7)
Hey Stota Gan! We invoke majestic Devraj Indr to begin with all virtuous-pious deeds, wars, protection.
अनु प्रत्नस्यौकसो हुवे तुविप्रतिं नरम्। यं ते पूर्व पिता हुवे॥
हे परमधाम में निवास करने वाले इन्द्र! आप अनेक लोगों के समक्ष उपस्थित होकर उन्हें नेतृत्व प्रदान करते हैं। हम आपको अपनी मदद करने हेतु बुलाते हैं। हमारे पूर्वजों ने भी आपका ही आवाहन किया था।(सामवेद उत्तरार्चिक 2.3.8)
Hey Devraj, resident of Ultimate abode! You invoke before many people and grant them leadership. We invoke you for our help. Our ancestors too invoked you.
आ घा गमद्यदि श्रवत्सहस्रिणीभिरूतिभिः। वाजेभिरुप नो हवम्॥
हे याजकों! हमारी प्रार्थना से खुश होकर वे देवराज इन्द्र अवश्यरूप से असंख्यों रक्षा-साधनों एवं पोषक पदार्थ-वैभव आदि के साथ हमारे समक्ष प्रस्तुत होंगे।(सामवेद उत्तरार्चिक 2.3.9)
Hey Yajak Gan! On being happy with our prayers Devraj Indr will definitely appear before us with numerous protection means, grandeur etc.
इन्द्र सुतेषु सोमेषु क्रतुं पुनीष उक्थ्यम्। विदे वृधस्य दक्षस्य महाँ हि षः॥
हे देवराज इन्द्र! अत्यधिक पराक्रम प्राप्त करने के लिए सोमरस तैयार करके, यज्ञ तथा स्तोत्रों को आप शुद्ध करते हैं। आप निश्चित रूप से महान् हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 2.3.10)
Hey Devraj Indr! You purify Somras with extreme valour, Yagy and Strotrs. You certainly great.
स प्रथमे व्योमनि देवानां सदने वृधः। सुपारः सुश्रवस्तमः समप्सुजित्॥
आराधकों की उन्नति करने वाले, दुःखों से भली-भाँति रक्षा करने वाले, उत्कृष्ट यश प्रदान करने वाले, राक्षसों पर विजय प्राप्त करने वाले वे वीरेन्द्र, अन्तरिक्ष में, देवताओं के गृहों में निवास करते है। हम उन इन्द्र देव को आहूत करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 2.3.11)
Virendr granting progress, protecting from sorrow-pains, granting extreme fame-glory, winning demons, reside in the space in the houses of demigods. We invoke-call that Devraj Indr.
तमु हुवे वाजसातय इन्द्रं भराय शुष्मिणम्। भवा नः सुम्ने अन्तमः सखा वृधे॥
हे पराक्रमी इन्द्र देव! हम पोषक तत्त्वों (अन्न) में बढ़ोत्तरी करने हेतु यज्ञ में आपको आमन्त्रित करते हैं। हे इन्द्र! सुख तथा प्रगति के समय मार्गदर्शक के रूप में आप हमारे निकट रहें।(सामवेद उत्तरार्चिक 2.3.12)
Hey majestic Devraj Indr! We invoke you in the Yagy for the increase of nourishing materials food grains. You should be close to us for granting guidance, pleasure-comforts and progress.
सामवेद उत्तरार्चिक (2.4) ::
एना वो अग्नि नमसोर्जी नपातमा हुवे। प्रियं चेतिष्ठमरतिं स्वध्वरं विश्वस्य दूतममृतम्॥
अपनी वन्दनाओं से, अविनाशी विश्वदूत, उन्नतिशील, अमर अग्नि देव का आपके (याजकों के) लिए आवाहन करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 2.4.1)
We invoke immortal, imperishable messenger-ambassador Agni Dev, for the sake of progressive Yajak Gan.
स योजते अरुषा विश्वभोजसा स दुद्रवत्स्वाहुतः।
सुब्रह्मा यज्ञः सुशमी वसूनां, देवं राधो जनानाम्॥
वे अग्नि देव दुनिया के सब पदार्थों को ग्रहण करके सक्षम ओज को नियोजित करते हैं। तत्पश्चात् वे श्रेष्ठ विद्वान, संयमशील, शुद्ध अग्नि देव उत्कृष्ट हवियों से प्रज्वलित होकर गतिशील होते हैं। यह अग्नि दृष्टिवंतों की उत्कृष्ट संपत्ति है।(सामवेद उत्तरार्चिक 2.4.2)
दृष्टिवंत :: जिसे दिखाई पड़े, बुद्धिमान्, ज्ञानी; blessed with eye sight, clairvoyant.
Agni Dev accept all materials of the universe generating aura-radiance. Thereafter enlightened, self controlled, pure-virtuous Agni Dev ignite with the best oblations-offerings move further. Agni is the best asset of the clairvoyant, those blessed with eye sight.
प्रत्यु अदर्थ्यायत्यू 3 च्छन्ती दुहिता दिवः।
अपो मही वृणुते चक्षुषा तमो ज्योतिष्कृणोति सूनरी॥
स्वर्गलोक से प्रकट होने वाली सूर्य पुत्री उषादेवी अपनी प्रदीप्त रश्मियों से गहरे तिमिर को भी विनष्ट कर देती हैं। नेतृत्व करने के सामर्थ्य से युक्त यह सम्पूर्ण विश्व को अपनी दीप्ति से परिपूर्ण कर देतीं हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 2.4.3)
Daughter of Sury Dev arising out of the heavens, destroys the dense-intense darkness with her rays. Capable of leadership she illuminate the entire world.
उदुस्त्रियाः सृजते सूर्यः सचा उद्यन्नक्षत्रमर्चिवत्।
तवेदुषो व्युषि सूर्यस्य च सं भक्तेन गमेमहि॥
ग्रह, नक्षत्र तथा सूर्य, अन्तरिक्ष को प्रदीप्त करते हैं। सूर्य देव अपनी किरणों को एक साथ विस्तारित करते हैं। हे उषे! हम आपके एवं सूर्य के आभा को प्राप्त कर अन्नादि से सम्पन्न होते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 2.4.4)
Planets, constellations and Sury Dev illuminate the space. Sury Dev increase the intensity of his rays. Hey Usha! We obtain your radiance and along with that of Sury Dev and become self reliant in food grains.
इमा उ वां दिविष्टय उस्त्रा हवन्ते अश्विना।
अयं वामह्वेऽवसे शचीवसू विशंविशं हि गच्छथः॥
हे देवों के वैद्य अश्विनी कुमारों! आप सभी को सहारा देने वाले, द्युलोक में रहने वाले हैं। द्युलोक की इच्छा करने वाले मनुष्य अपने सहायता हेतु आपको आवाहित करते हैं। अपने सामर्थ्य से देवलोक में स्थान बनाने वाले हे देवताओं! ये याजक आश्रय हेतु आपको आहूत करते हैं, इसलिए कि आप ही यजमानों के समक्ष पहुँचते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 2.4.5)
Hey physicians-doctors of demigods-deities! You help-support everyone and reside in the heavens. Humans nursing the desire of residing in the heavens invoke you. Attaining a position-place in the heavens due to your own capability, hey demigods! These Yajak Gan summon you with the desire of having asylum under you.
युवं चित्रं ददथुर्भोजनं नरा चोदेथां सूनृतावते।
अर्वाग्रथं समनसा नि यच्छतं पिबतं सोम्यं मधु॥
हे नेतृत्व देने वाले अश्विनी कुमारों! आप अद्भुत आहार प्रदान करने वाले हैं। हे देव! आप प्रार्थना करने वालों को प्रेरणा प्रदान करते हैं। आप अपना रथ रोकने की कृपा करें तथा यहाँ माधुर्ययुक्त सोमरस का सेवन करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 2.4.6)
Hey Ashwani Devs granting leadership! You grant amazing food. Hey Dev! You inspire the worshipers. Stop your charoite and drink sweetened Somras.(30.12.2025)
अस्य प्रत्नामनु द्युतं शुक्रं दुदुह्रे अह्रयः। पयः सहस्त्रसामृषिम्॥
प्रतापी, समस्त अभिलाषाओं को पूर्ण करने वाले, ज्ञान में बढ़ोत्तरी करने वाले इस सोमरस को उसके शाश्वत स्वरूपों का स्मरण कर, ज्ञानी पुरुषों ने तैयार किया है।(सामवेद उत्तरार्चिक 2.5.1)
Majestic-glorious, accomplisher of all desires, boosting knowledge-enlightenment Somras; has been produced by the learned scholars keeping in mind its eternal-ancient forms.
अयं सूर्य इवोपदृगयं सरांसि धावति। सप्त प्रवत आ दिवम्॥
जैसे सूर्य अपनी सप्त किरणों सहित द्युलोक से पृथ्वी लोक तक गमन करता है, उसी प्रकार यह सोम भी अपनी सप्त धाराओं में गिरता हुआ, जल से युक्त बर्तन में परिष्कृत किया जाता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 2.5.2)
The way Sun moves to the earth with his seven rays, Somras flowing in seven streams is purified in a vessel containing water.
अयं विश्वानि तिष्ठति पुनानो भुवनोपरि। सोमो देवो न सूर्यः॥
शोधित किया हुआ यह सोमरस, सूर्य देव के सदृश सम्पूर्ण लोकों में प्रदीप्त होता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 2.5.3)
Purified Somras shine in all abodes like Sury Dev.
एष प्रत्लेन जन्मना देवो देवेभ्यः सुतः। हरिः पवित्रे अर्षति॥
सनातन रीति से संस्कारित किया गया यह हरे एवं भूरे रंग का सोमरस, देवगणों के लिए शोधन यन्त्र से छानकर परिष्कृत किया जाता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 2.5.4)
Sanctified with eternal methods-procedures, greenish & brownish Somras is purified in the filtration plant-machine, for the demigods-deities.
एष प्रत्नेन मन्मना देवो देवेभ्यस्परि। कविर्विप्रेण वावृधे॥
अनादिकाल की स्तुतियों की मदद से यह जाज्वल्यमान्, विद्वान् सोम ब्रह्म वेत्ताओं के माध्यम से देवों हेतु परिव्याप्त किया जाता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 2.5.5)
जाज्वल्य :: चमकता हुआ, प्रकाशमान्, ज्वलित तेजपूर्ण, तेजो मंडित; illuminated, flamboyant, shining, blazing, refulgent.
परिव्याप्त :: पूरी तरह से छाया हुआ, हर जगह फैला हुआ, किसी चीज़ से भरा हुआ; pervaded, saturated, spread throughout.
ब्रह्म वेत्ता :: परम् ज्ञानी, One with the knowledge of the Brahm, Absolute, Ultimate, Almighty.
Shinning since eternal-ancient times by virtue of Stuties, Somras is pervaded by the Brahm Vetas-enlightened for the demigods-deities.
दुहानः प्रत्नमित्ययः पवित्रे परि षिच्यसे। क्रन्दं देवाँ अजीजनः॥
पात्रों में निकाला गया यह सोमरस शोधन यन्त्र के द्वारा शुद्ध किया जाता है। शब्द करता हुआ यह सोम देवों को यज्ञ में पुकारता हुआ सा लगता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 2.5.6)
Somras is brought out of the vessels and purified-filtered in purification plants, making sound as if its calling the demigods-deities.
उप शिक्षापतस्थुषो भियसमा धेहि शत्रवे। पवमान विदा रयिम्॥
हे सोमदेव! अमंगल करने वालों को आतंकित करके, आप अपने समीप स्थान ग्रहण करने वालों का, श्रेष्ठ मार्गदर्शन करें तथा उन्हें धन-अन्नादि से सम्पन्न करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 2.5.7)
Hey Som Dev! Terrorise those who perform inauspicious deeds-actions. Bless those near to you, with best guidance, wealth and food grains etc.
उपो षु जातमप्तुरं गोभिर्भङ्ग परिष्कृतम्। इन्दुं देवा अयासिषुः॥
निचोड़ने के पश्चात् सोमरस को जल में मिश्रित किया जाता है। शत्रुओं का शमन करने वाले, गौ-दुग्ध से मिश्रित इस सोमरस को देवता लोग भी आवाहित करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 2.5.8)
After extraction Somras is mixed with water. Destroyer of the enemies Somras mixed with cow's milk, is invoked by the demigods-deities.
उपास्मै गायता नरः पवमानायेन्दवे। अभि देवाँ इयक्षते॥
हे स्तोताओं! देवताओं की याचना करने की अपेक्षा परिष्कृत किये गये सोमरस के गुणों का विवेचन करो।(सामवेद उत्तरार्चिक 2.5.9)
याचना :: माँगना, प्रार्थना करना; solicitation, begging, impetration.
Hey Stotas! Instead of requesting-praying, begging before the demigods-deities analyse the characterises of Somras.
सामवेद उत्तरार्चिक (2.6) ::
प्र सोमासो विपश्चितोऽपो नयन्त ऊर्मयः। वनानि महिषा इव॥
सरोवरों में जैसे तरंगे मिल जाती हैं, वैसे ही ज्ञान में बढ़ोत्तरी करने वाला सोमरस पानी में समाहित हो जाता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 2.6.1)
The way waves merge with the reservoirs, Somras boosting enlightenment is absorbed-mixed in water.
अभि द्रोणानि बभ्रवः शुक्रा ऋतस्य धारया। वाजं गोमन्तमक्षरन्॥
गाय के दूध रूपी पोषक पदार्थ के साथ हरिताभ सोमरस जल-प्रवाह के साथ कलश में मिश्रित किया जाता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 2.6.2)
Greenish Somras containing nourishing substances like cow's milk, is mixed in Kalash with flowing water.
सुता इन्द्राय वायवे वरुणाय मरुद्भ्यः। सोमा अर्षन्तु विष्णवे॥
हे सोम! आप परिष्कृत होकर देवराज इन्द्र, वायु, नारायण तथा मरुतों को प्राप्त हो।(सामवेद उत्तरार्चिक 2.6.3)
On being sanctified, you should be availed by Devraj Indr, Vayu Dev, Narayan Hari and Marud Gan.
प्र सोम देववीतये सिन्धुर्न पिप्ये अर्णसा।
अंशोः पयसा मदिरो न जागृविरच्छा कोशं मधुश्चतम्॥
जल से भरी नदियों के समान हे सोम! आपको देवताओं हेतु पानी में मिश्रित किया जाता है। आप सुख प्रदान करने वाले तत्त्वों के सदृश स्फूर्ति बढ़ाने वाले हैं। इसीलिए हे यजमानों! इस माधुर्य युक्त सोमरस को दुग्ध में मिश्रित कर कलश में उत्कृष्ट रीति से एकत्रित करो।(सामवेद उत्तरार्चिक 2.6.4)
Hey Somras, like the river full of water! You are mixed with water for the demigods-deities. You increase freshness-refreshing influence like the substances which grant pleasure. Hence, hey Yajman Gan! Collect this sweetened Somras mixed with cow's milk in the Kalash following best procedures.
आ हर्यतो अर्जुनो अत्के अव्यत प्रियः सूनुर्न मर्ज्यः।
तमीं हिन्वन्त्यपसो यथा रथं नदीष्वा गभस्त्योः॥
प्रिय बालक के सदृश सुसंस्कारित इस पवित्र सोमरस को वैसे ही तीव्र गतिमान हाथों से जल के बर्तन में मिलाते हैं, जिस प्रकार तीव्र गति से चलने वाला रथ संग्राम में गमन करता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 2.6.5)
सुसंस्कृत :: निर्मल किया हुआ, सिद्ध किया हुआ, संस्कार किया हुआ, सुधारा हुआ, चमकाया हुआ; cultured, refined.
Cultured-refined like a dear-lovely child, the pious Somras is mixed with fast moving hands in water, just like the fast moving charoite in the battle field.
प्र सोमासो मदच्युतः श्रवसे नो मघोनाम्। सुता विदथे अक्रमुः॥
सुख की वर्षा करने वाला यह सोम, परिष्कृत होने के पश्चात् याग में यश तथा धन-धान्य प्रदान करने में सहायता करता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 2.6.6)
Pleasure-comforts showering Somras on being sanctified, helps in the acquisition of glory-fame, wealth food grains etc.
आदीं हंसो यथा गणं विश्वस्यावीवशन्मतिम्। अत्यो न गोभिरज्यते॥
हंस जिस तरह (सरल तरीके से) अपने समुदाय में (वेगपूर्वक) गमन करता है, वैसे ही वेग के साथ यह सोमरस ज्ञानवानों के ज्ञान तक पहुँचता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 2.6.7)
The way Swan fly normally with fast speed in its flock, similarly Somras reaches the learned scholars with high speed.
आदीं त्रितस्य योषणो हरिं हिन्वन्त्यद्रिभिः। इन्दुमिन्द्राय पीतये॥
इस पवित्र हरिताभ सोमरस को याजक अपनी उंगलियों से दबाकर देवराज इन्द्र के सेवन करने योग्य तैयार करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 2.6.8)
Pious greenish Somras is squeezed with fingers for drinking by Devraj Indr by the Yajak Gan.
अया पवस्व देवयू रेभन्यवित्रं पर्येषि विश्वतः। मधोर्धारा असृक्षत॥
हे हरिताभ सोम! देवताओं को प्राप्त करने की कामना से परिष्कृत होते समय, निरन्तर प्रवाह साथ ध्वनि करते हुए मधुर होकर, आप अत्यधिक मात्रा में क्षरित हों।(सामवेद उत्तरार्चिक 2.6.9)
Hey greenish Somras! You are produced in large quantities, making sound with regular flow, become sweetened while purifying with the desire of meeting the demigods-deities.
पवते हर्यतो हरिरति ह्वरांसिं रंह्या। अभ्यर्ष स्तोतृभ्यो वीरवद्यशः॥
यह हरित वर्ण सोमरस अत्यन्त प्रिय है। यह शूरवीर पुत्र एवं यश प्राप्त करने की कामना रखने वाले याजकों हेतु पवित्र रूप से पात्र में गिरता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 2.6.10)
Greenish Somras is very lovely. It flow-falls into the vessel for those who wish to have brave-mighty son and glory.
प्र सुन्वानायान्धसो मर्ती न वष्ट तद्वचः। अप श्वानमराधसं हता मखं न भृगवः॥
परिष्कृत होते समय सोम शब्द करता है। नीच कर्म करने वाले आपकी आवाज को श्रवण न करें। हे यजमानों! भृगुओं ने जिस प्रकार मख को दूर हटा दिया था, वैसे ही आप श्यान-वृत्ति वाले मनुष्यों को इस उत्कृष्ट कर्म से दूर हटा दो।(सामवेद उत्तरार्चिक 2.6.11)
Somras make sound while extraction, filtration, purification. Do not let the wicked, vicious, sinners hear your sound. Hey Yajmans! The way Bhragus repelled the Makh-fly, you too repel the people with the nature of dog from this virtuous-righteous function-venture.(31.12.2025)
सामवेद उत्तरार्चिक (3) :: ऋषि :- जमदग्नि, हीयु, कश्यप, भृगुवारुणिर्जमदग्नि-भार्गवो, मेधातिथि काण्व, मधुच्छंदा, वैश्वामित्र, वसिष्ठ, नहुष मानव, सिकतानिवावरी, पृश्नियोऽजा, नृमेध, उपमन्युर्वासिष्ठ, शंयुर्वाहस्पत्य, प्रसकण्व, श्रुतकक्ष, सुकक्षो, आंगिरस, जेता, माधुच्छन्दस; देवता-पवमान, सोम, अग्नि, मित्रावरुणौ, इन्द्र, इन्द्राग्नि; छन्द :- गायत्री, त्रिष्टुप्, वृहत्य प्रगाथ, अनुष्टुप्, जगती।
सामवेद उत्तरार्चिक (3.1) ::
पवस्व वाचो अग्रिय: सोम चित्राभिरूतिभिः। अभि विश्वानि काव्या॥
हे सोमदेव! आप सबसे उत्कृष्ट हैं। इसीलिए अनेकों प्रकार के रक्षा साधनों के साथ हमारी अभ्यर्थनाओं को श्रवण करते हुए उनके शब्दों पर ध्यान दें।(सामवेद उत्तरार्चिक 3.1.1)
Hey Som Dev! You are he best-excellent. Hence, listen-respond to our prayers carefully and manage our protection through various means.
त्वं समुद्रिया अपोऽग्रियो वाच ईरयन्। पवस्व विश्वचर्षणे॥
हे सभी मनुष्यों का कल्याण करने वाले सोम! आप उच्च स्थान प्राप्त कर हमारी स्तुतियों से प्रफुल्लित हुए, स्वर्गलोक में स्थित जल को आहूत करें। यही शुद्ध जल सोमरस में संयुक्त किया जाता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 3.1.2)
Resorting to the welfare of all humans, hey Som! Gladdened with our Stuties you have attained high position. Summon water from the heavens to be added-mixed in Somras.
तुभ्येमा भुवना कवे महिम्ने सोम तस्थिरे। तुभ्यं धावन्ति धेनवः॥
हे सर्वद्रष्टा सोम! आपकी महिमा से यह सम्पूर्ण जगत् स्थित है। देवताओं को संतुष्ट करने वाली गायें आपके लिए दुग्ध प्राप्त कराने के लिए, आपके निकट आगमन कर रही हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 3.1.3)
Hey Som watching every thing! Your glory is established through out the universe. Cows which satisfy the demigods-deities are moving close to you.
पवस्वेन्दो वृषा सुतः कृधी नो यशसो जने। विश्वा अप द्विषो जहि॥
हे पराक्रम में बढ़ोत्तरी करने वाले, परिष्कृत किये गये सोम! आप स्वच्छ होकर हमें कीर्तिवान् बनाएँ। आप हमारे शत्रुओं को पराभूत करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 3.1.4)
Hey sanctified Somras, increasing valour! You should become clear and make us glorious.
यस्य ते सख्ये वयं सासह्याम पृतन्यतः। तवेन्दो द्युम्न उत्तमे॥
हे सोमदेव! आप हमारे सखा हैं। आपने हमें पराक्रमी बनाया है, इसीलिए (आपकी दया से) हम अपने शत्रुओं से युद्ध कर उनको पराजित करने में समर्थ हो गये हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 3.1.5)
Hey Som Dev! You are our companion. You have made us majestic and hence we have become capable of defeating the enemies in the war, due to your mercy.
या ते भीमान्यायुधा तिग्मानि सन्ति धूर्वणे। रक्षा समस्य नो निदः॥
हे सोम देव! अपने शत्रुओं का संहार करने वाले आयुधों द्वारा शत्रुओं का तिरस्कार करते हुए आप हमें संरक्षण प्रदान करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 3.1.6)
Hey Som Dev! Grant us protection by destroying the enemies with your weaponry.
वृषा सोम द्युमाँ असि वृषा देव वृषव्रतः। वृषा धर्माणि दध्रिषे॥
हे सोमदेव! आप महा प्रतापी तथा पराक्रमी हैं। हे प्रभु! आप मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाले, शक्ति में बढ़ोत्तरी करने वाले हैं, इस प्रकार के नियमों का पालन करने वाले आप अपने सामर्थ्य से हितकारी धर्मों को धारण करने वाले हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 3.1.7)
महा प्रतापी :: शानदार, आलीशान, तेजस्वी, ठाठदार, शोभमान; great majesty, magnificent.
Hey Som Dev! You are highly majestic possessing valour. Hey Lord-Prabhu! You accomplish the desire, strength, follow the rules & regulations and support the virtuous, righteous, pious Dharm-efforts.
वृष्णस्ते वृष्ण्यं शवो वृषा वनं वृषा सुतः। स त्वं वृषन्वृषेदसि॥
हे शक्तिशाली सोम! आप अत्यन्त प्रभावशाली क्षमता वाले हैं। आपका सेवन करने वाले यजमान, अवश्य रूप से श्रेष्ठ बल तथा श्रेष्ठ शक्ति से सम्पन्न होते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 3.1.8)
Hey mighty Somras! You are extremely effective and capable. The Yajman who drink you; must be having excellent power & might.
अश्वो न चक्रदो वृषा सं गा इन्दो समर्वतः। वि नो राये दुरो वृधि॥
हे सोमदेव! आप महा पराक्रमी, गोधन एवं अश्वधन में वृद्धि करने वाले हैं। इसीलिए आप हमें सन्मार्ग के द्वारा धन-सम्पत्ति प्रदान कराएँ।(सामवेद उत्तरार्चिक 3.1.9)
Hey Som Dev! You are majestic, capable of increasing the cows & horses stock. Hence, you should help us in acquiring wealth-prosperity, through virtuous-honest means.
वृषा ह्यसि भानुना द्युमन्तं त्वा हवामहे। पवमान स्वर्दृशम्॥
हे सोम! आप अवश्य रूप से शक्ति वर्द्धक हैं। आनन्द बरसाने वाले, सूर्य के समान प्रकाशमान, हे परिष्कृत किये हुए सोमदेव! हम अपने याग में आपको आमन्त्रित करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 3.1.10)
Hey Som Dev! You are definitely-certainly strength booster. You shower pleasure, illuminated like the Sun. We invite you in our Yagy.
यदद्भिः परिषिच्यसे मर्मृज्यमान आयुभिः। द्रोणे सधस्थमश्नुषे॥
स्तोताओं के द्वारा परिष्कृत किये गये हे सोम देव! जब आप पानी में मिश्रित कर दिये जाते हैं, तत्पक्षात् आपको पूजा-पात्र में प्रतिष्ठित किया जाता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 3.1.11)
Hey Somras, sanctified by the Stotas! You are established in the vessels for worship after mixing in water.
आ पवस्व सुवीर्यं मन्दमानः स्वायुध। इहो ष्विन्दवा गहि॥
हे श्रेष्ठ शस्त्रों से सम्पन्न सोमदेव! आप हमें हर्षित करने वाले हैं। आप हमें उत्कृष्ट योद्धा बनाएँ। तथा हमारे याग में उपस्थित होकर यज्ञ की शोभा में वृद्धि करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 3.1.12)
Hey Som Dev possessing excellent weaponry! You grant us pleasure. Make us excellent warriors and join our Yagy to increase its glory-significance.
पवमानस्य ते वयं पवित्रमभ्युन्दतः। सखित्वमा वृणीमहे॥
हे सोम! आप शोधन यन्त्र के द्वारा छनकर पवित्र होते हैं। आप हमें अपना मित्र बनाते हुए हमें सहायता प्रदान करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 3.1.13)
Hey Somras! You pass through the purification plant-machine to become pious. Make us your friend and help us.
ये ते पवित्रमूर्मयोऽभिक्षरन्ति धारया। तेभिर्नः सोम मृडय॥
हे सोम! आपकी लहरों में से जो धारा शुद्ध हो रही है, उसके द्वारा हमें आनन्दित करने की कृपा करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 3.1.4)
Hey Somras! The current-stream purified through your waves should grant us pleasure.
स नः पुनान आ भर रयिं वीरवतीमिषम्। ईशानः सोम विश्वतः॥
हे सोमदेव! आप सम्पूर्ण विश्व का संचालन करने वाले हैं। पवित्र होने के पश्चात् आप हमें ऐश्वर्य के साथ सुयोग्य संतान प्रदान करने की अनुकम्पा करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 3.1.15)
Hey Som Dev! You regulate the entire universe. On being purified grant us able progeny with grandeur.
सामवेद उत्तरार्चिक (3.2) ::
अग्नि दूतं वृणीमहे होतारं विश्ववेदसम्। अस्य यज्ञस्य सुक्रतुम्॥
देवताओं को उत्कृष्ट कर्म की ओर प्रेरित करने वाले, वैभवशाली, इस याग को श्रेष्ठ विधि से सम्पन्न कराने वाले, हवि को देवताओं तक पहुँचाने वाले अग्नि को हम आहूत करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 3.2.1)
We invoke Agni Dev who carry the oblations-offerings to demigods-deities, inspiring them to perform excellent deeds and accomplishes the Yagy in best possible manner.
अग्निमग्निं हवीमभिः सदा हवन्त विश्पतिम्। हव्यवाहं पुरुप्रियम्॥
हे सर्व-प्रिय, प्रजा का पालन करने वाले, देवताओं तक हवियों को ले जाने वाले, सर्वश्रेष्ठ नायक अग्ने! हम स्तोतागण वेदमन्त्रों के द्वारा सदैव आपका आवाहन करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 3.2.2)
Hey excellent leader Agni Dev, loved by every one & supporter of the populace! You carry of the offerings to demigods-deities. We the Stota Gan invoke you with the Ved Mantrs.
अग्ने देवाँ इहा वह जज्ञानो वृक्तबर्हिषे। असि होता न ईड्यः॥
हे प्रार्थना करने योग्य, मित्र, देवाधारक अग्नि देव! आपकी उत्पत्ति अरणियों से हुई है। आप देवताओं को आहूत करने वाले यजमानों हेतु देवगणों को इस याग में आवाहित करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 3.2.3)
Hey worshipable friend, supporter of the demigods! You have evolved from the fire wood. You should summon the demigods-deities for the Yajmans, in this Yagy.(01.01.2026)
मित्रं वयं हवामहे वरुणं सोमपीतये। या जाता पूतदक्षसा॥
यज्ञ में आहूत की जाने वाली दैवी शक्तियों, अति शुद्ध तथा शक्तिशाली मित्र एवं वरुण देवता का हम इस यज्ञ में आवाहन करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 3.2.4)
We summon-invoke the divine powers including pious-virtuous Mitr & Varun Dev in the Yagy.
ऋतेन यावृतावृधावृतस्य ज्योतिषस्पती। ता मित्रावरुणा हुवे॥
याजकों का उत्साह वर्द्धन करने वाले, सन्मार्ग पर चलने वालों को श्रेष्ठ फल प्रदान करने वाले हे प्रकाशवान् मित्र एवं वरुण देव! हम आपको आमन्त्रित करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 3.2.5)
Hey Mitr & Varun Dev! You encourage the Yajak, guide him to move over virtuous path and grant excellent rewards. We invoke you.
वरुणः प्राविता भुवन्मित्रो विश्वाभिरूतिभिः। करतां नः सुराधसः॥
मित्र एवं वरुण देवतागण अपने समस्त रक्षा साधनों के साथ हमारी रक्षा करते हुए हमें शरण प्रदान करें तथा हमें श्रेष्ठ एवं शुद्ध धन प्रदान कर कीर्तिवान् बनाएँ।(सामवेद उत्तरार्चिक 3.2.6)
Let Mitr & Varun Dev protect us with all availble means granting asylum-shelter, making us best granting pious-pure wealth and glory.
इन्द्रमिद्गाथिनो बृहदिन्द्रमर्केभिरर्किणः। इन्द्रं वाणीरनूषत॥
वेद मन्त्रों का उच्चारण करने वाले स्तोताओं ने गाने योग्य बृहत् साम की स्तुतियों से इन्द्र देव की स्तुति की। इसी प्रकार मनुष्यों ने भी मन्त्रों का उच्चारण करते हुए देवराज इन्द्र की अभ्यर्थना की।(सामवेद उत्तरार्चिक 3.2.7)
With the recitation of Ved Mantrs the Stotas worshiped Devraj Indr with Brahat Sam. Similarly, the humans should also recite Mantrs and invoke-worship Devraj Indr.
इन्द्र इद्धर्यो: सचा सम्मिश्ल आ वचोयुजा। इन्द्रो वज्री हिरण्ययः॥
वज्र धारण करने वाले, सोने के अलंकारों से युक्त देवराज इन्द्र, उत्कृष्ट अश्वों (बलशाली प्रवृत्तियों) को वाणी के साथ प्रयोग करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 3.2.8)
Vajr wielding Devraj Indr decorated with gold ornaments, move-direct his excellent horse through voice-speech.
इन्द्र वाजेषु नोऽव सहस्त्रप्रधनेषु च। उग्र उग्राभिरूतिभिः॥
हे देवराज इन्द्र! आप महा पराक्रमी है। सहस्त्रों तरह के वैभव प्राप्त करने हेतु होने वाले संग्राम (जीवन-संग्राम) में आप अपने उग्र रक्षा साधनों सहित हमें संरक्षण प्रदान करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 3.2.9)
Hey Devraj Indr! You posses great valour. For the attainment of thousands of prosperity-grandeur grant us protection in the fight for struggle in the life along with furious means for protection.
इन्द्रो दीर्घाय चक्षस आ सूर्यं रोहयद्दिवि। वि गोभिरद्रिमैरयत्॥
हे देवराज इन्द्र! आपने इस जगत को परिव्याप्त करने के निमित्त सूर्य देव को देवलोक (अन्तरिक्ष) में प्रतिष्ठित किया। उसी तरह अपनी किरणों से जल-वृष्टि हेतु बादलों को प्रेरित किया।(सामवेद उत्तरार्चिक 3.2.10)
Hey Devraj Indr! You established Sury Dev to pervade the universe in the heavens-space. Similarly, inspire the clouds to shower rains through your rays-aura.
इन्द्रे अग्ना नमो बृहत्सुवृक्तिमेरयामहे। धिया धेना अवस्यवः॥
हम अपनी रक्षा करने की इच्छा से हविष्यान्नों को देवराज इन्द्र एवं अग्नि देवता के समीप पहुँचाते हैं तथा पूरे मनोयोग से उनकी अभ्यर्थना करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 3.2.11)
We move the oblations-offerings of food grains to Devraj Indr & Agni Dev for our protection and worship them with full concentration-devotion.
ता हि शश्वन्त ईडत इत्था विप्रास ऊतये। सबाधो वाजसातये॥
विद्वान् पुरुष देवराज इन्द्र तथा अग्नि देव की आराधना करते हैं। वे लोग उसी प्रकार उनकी अभिलाषा करते हैं, जिस प्रकार मनुष्य लोग अन्नादि प्राप्त करने हेतु लड़ाई-झगड़ा करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 3.2.12)
The learned-scholars worship Devraj Indr & Agni Dev. They wish-desire to have them just like the humans who quarrel to have food grains.
ता वां गीर्भिर्विपन्यवः प्रयस्वन्तो हवामहे। मेधसाता सनिष्यवः॥
हम स्तोतागण, ऐश्वर्यवान् बनने की अभिलाषा से हवियों के माध्यम से आप दोनों (देवराज इन्द्र तथा अग्नि देव) को अभ्यर्थना द्वारा आहूत करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 3.2.13)
We the Stota Gan summon-invoke Devraj Indr & Agni Dev with the desire of becoming possessor of prosperity & grandeur with oblations-offerings.
सामवेद उत्तरार्चिक (3.3) ::
वृषा पवस्व धारया मरुत्वते च मत्सरः। विश्वा दधान ओजसा॥
हे पराक्रमी सोम! आप परिष्कृत होते हुए काष्ठ पात्र में विद्यमान हों। आप समस्त धन-सम्पत्ति के साथ मरुद्गणों के मित्र देवराज इन्द्र को संतुष्टि प्रदान करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 3.3.1)
Hey Majestic Somras! You should be present in the wooden pot. Grant satisfaction to Marud Gan's friend Devraj Indr with all sorts of wealth-prosperity.
तं त्वा धर्तारमोण्यो 3 पवमान स्वर्दृशम्। हिन्वे वाजेषु वाजिनम्॥
हे पवित्र सोम! आप सभी को देखने वाले, बलशाली, देवलोक से भूलोक तक सबकी रक्षा करने वाले हैं। हम आपको युद्ध (जीवन-समर) में जाने हेतु प्रेरित करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 3.3.2)
Hey pious Som! You are mighty, watch everyone and protect everyone from the heavens to the earth. We invoke-inspire you to struggle in the battle of life.
अया चित्तो विपानया हरिः पवस्व धारया। युजं वाजेषु चोदय॥
हे सोम! अंगुलियों द्वारा स्वादिष्ट बनाये गये आप द्रोण कलश में शुद्ध होने के लिए प्रवाहित हों तथा अपने मित्र देवराज इन्द्र को युद्ध में गमन करने हेतु प्रेरित करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 3.3.3)
Hey Som! Sweetened with the fingers, you should move into the wooden pot for purification and inspire your friend Devraj Indr to move the war-battle.
वृषा शोणो अभिकनिक्रदद्गा नदयन्नेषि पृथिवीमुत द्याम्।
इन्द्रस्येव वग्नुरा शृण्व आजौ प्रचोदयन्नर्षसि वाचमेमाम्॥
अविरल गतिमान, आनन्द की बारिश करने वाले, हे लोकातीत सोमदेव! जिस प्रकार गायों को देखकर लाल रंग के सांड़ दहाड़ते हैं, वैसे ही स्वर्गलोक से पृथ्वीलोक तक अपनी रश्मियों के मध्य बादलों जैसी गर्जना पैदा करते हुए आप विद्यमान हैं। हम देवराज इन्द्र की भाँति आपके आदेशों को श्रवण करते हैं। आप भी अपने स्वरूप का ज्ञान कराते हुए हमारी प्रार्थनाओं को ग्रहण करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 3.3.4)
Dynamic, showering pleasure, hey extraordinary Som Dev! The way the red skinned bull moo-roar looking at the cows, you present from heavens to earth make thunderous sound like the rattling clouds in their middle with your radiance. We follow your directives like those of Devraj Indr. You make us recognise your form and accept our prayers.
रसाय्यः पयसा पिन्वमान ईरयन्नेषि मधुमन्तमंशुम्।
पवमान सन्तनिमेषि कृण्वन्निन्द्राय सोम परिषिच्यमानः॥
अत्यन्त माधुर्ययुक्त, गौ-दुग्ध में संयुक्त होने के पश्चात् अत्यधिक परिष्कृत (स्वादिष्ट) किये हुए हे सोम! जल से सिंचित, स्वच्छ धाररूप में (अविरल) आप देवराज इन्द्र को प्राप्त हों।(सामवेद उत्तरार्चिक 3.3.5)
Hey sweetened, tasty, highly purified Somras mixed with cow's milk! Mixed with water you should be availed by Devraj Indr like a stream-current.
एवा पवस्व मदिरो मदायोदग्राभस्य नमयन्वधस्नुम्।
परि वर्णं भरमाणो रुशन्तं गव्युनों अर्ष परि सोम सिक्तः॥
हे उमंग में वृद्धि करने वाले सोम! आप बादलों को जल-वर्षा करने हेतु नीचे की ओर प्रेरित करते हुए हर्ष प्रदान करने वाले बनें। जल के साथ सफेद रंग के होकर, गौ-दुग्ध के रूप में हमारे चहुंओर विद्यमान हों।(सामवेद उत्तरार्चिक 3.3.6)
Hey Som boosting thrill! You should become pleasure granting inspiring the rains clouds in the lower direction. You should be present around us mixed with water acquiring while colour like the cow's milk.
सामवेद उत्तरार्चिक (3.4) ::
त्वामिद्धि हवामहे सातौ वाजस्य कारवः। त्वां वृत्रेष्विन्द्र सत्पतिं नरस्त्वां काष्ठास्वर्वतः॥
हे देवराज इन्द्र! हम याजकगण पोषक पदार्थों को प्राप्त करने हेतु स्तोत्रों के माध्यम से आपको आहूत करते हैं। हे इन्द्र! विद्वान् पुरुष मुसीबत के समय आपको ही अपनी सहायता करने हेतु पुकारते है।(सामवेद उत्तरार्चिक 3.4.1)
Hey Devraj Indr! We the Yajak Gan invoke you with Strotrs to have nourishing substances. Hey Devraj Indr! Learned-scholars call you for help, in an hour of need.(02.01.2026)
स त्वं नश्चित्र वज्रहस्त धृष्णुया मह स्तवानो अद्रिवः।
गामश्वं रथ्यमिन्द्र सं किर सत्रा वाजं न जिग्युषे॥
हे महा पराक्रमी, बलधारी, वज्रपाणि देवराज इन्द्र! आप राक्षसों पर विजय प्राप्त करने वाले बल से महान् बन गए हैं। आप हमारी अभ्यर्थनाओं से प्रफुल्लित होकर हम यजमानों को अन्त्र एवं धन-सम्पत्ति प्रदान करने की दया करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 3.4.2)
Hey majestic, mighty, Vajr wielding Devraj Indr! You became great due to your victory over the demigods. Become happy with our prayers grant us-the Yajmans food grains, wealthy-prosperity.
अभि प्र वः सुराधसमिन्द्रमर्च यथा विदे।
यो जरितृभ्यो मघवा पुरूवसुः सहस्त्रेणेव शिक्षति॥
हे यजमानो! वैभवशाली देवराज इन्द्र विभिन्न प्रकार के उत्कृष्ट ऐश्वर्य को प्रदान करने वाले हैं। आप जैसे भी सम्भव हो, श्रेष्ठ धन प्राप्त करने हेतु उनकी उपासना करो।(सामवेद उत्तरार्चिक 3.4.3)
Hey Yajmans! Luxurious Devraj Indr grant various kinds of grandeur. Worship him with all means to have excellent wealth.
शतानीकेव प्र जिगाति धृष्णुया हन्ति वृत्राणि दाशुषे।
गिरेरिव प्र रसा अस्य पिन्विरे दत्राणि पुरुभोजसः॥
जैसे पराक्रमी योद्धा शत्रुओं के दल पर आक्रमण करते समय अपने दल की रक्षा करता है, वैसे ही उत्कृष्ट कार्यों में अपने साधन लगाने वालों (याजकों) की देवराज इन्द्र रक्षा करते हैं। इस प्रकार के साधन लोगों को तुष्टि प्रदान करने वाले पर्वत के झरने से प्रवाहित होने वाले पानी की भाँति हितकारी होते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 3.4.4)
The way a majestic warrior protect his group while attacking the opponents-enemies, similarly Devraj Indr protect his worshiper busy with excellent deeds. This type of worshipers-Yajak Gan are helping others like the water steam flowing from the mountains.
त्वामिदा ह्यो नरोऽपीप्यन्वज्रिन् भूर्णयः।
स इन्द्र स्तोमवाहस इह श्रुध्युप स्वसरमा गहि॥
हे वज्र धारण करने वाले देवराज इन्द्र! पहले ही दिन से हवि समर्पित करने वाले याजक आपके लिए सोम अर्पित करते हैं। स्तोतागण आपके लिए साम गान कर रहे हैं। आप उनको श्रवण करें तथा याग में विद्यमान हों।(सामवेद उत्तरार्चिक 3.4.5)
Hey Vajr wielding Devraj Indr! The Yajak who make offerings from the very first day, offer you Somras. Stota Gan are reciting Sam Gan for you. Listen to them and present yourself in the Yagy.
मत्स्वा सुशिप्रिन्हरिवस्तमीमहे त्वया भूषन्ति वेधसः।
तव श्रवांस्युपमान्युक्थ्य सुतेष्विन्द्र गिर्वणः॥
हे शिरस्त्राण धारण करने वाले, अश्वों के पालनकर्ता, प्रार्थना करने योग्य देवराज इन्द्र! आपका पूजन करने वाली अनेकों सामग्री से हम आपको अलंकृत करते हैं। आप सोमरस के सेवन से संतुष्ट हों। हे स्तुत्य देवराज इन्द्र! सोमरस अर्पित करने के पश्चात् अनुकूल हविष्यान्न भी आपको समर्पित करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 3.4.6)
अलंकृत :: शानदार, आलंकारिक, पद्यसम्बन्धी, छन्दबद्ध, रंगीन, पद्यात्मक; embellished, ornate, gorgeous, poetic.
Hey head gear wearing, nurturer of horses, worshipable Devraj Indr! We embellish you with various kinds of worship materials. You should be satisfied with the drinking of Somras. After offerings you Somras we offer suitable oblations of food grains to you.
सामवेद उत्तरार्चिक (3.5) ::
यस्ते मदो वरेण्यस्तेना पवस्वान्धसा। देवावीरघशंसहा॥
हे दिव्य सोमदेव! आपका रस देवताओं के योग्य, राक्षसों को जीतने का सामर्थ्य प्रदान करने वाला एवं अत्यधिक हर्ष प्रदान करने वाला है। इस प्रकार के सामर्थ्य के साथ आप कलश में पवित्र हों।(सामवेद उत्तरार्चिक 3.5.1)
Hey divine Som! Your sap-juice is suitable for demigods-deities, grant them strength to win demons and extreme happiness. You should be sanctifies with such capability.
जघ्निर्वृत्रममित्रियं सस्निर्वाजं दिवेदिवे। गोषातिरश्वसा असि॥
हे सोमदेव! आप अहित चाहने वाले वृत्रासुर जैसे शत्रुओं का विनाश करने वाले हैं। आप विपत्तियों का सामना करने हेतु सदैव तत्पर रहते हैं। आप गाय तथा अश्वरूपी धन की भी बढ़ोत्तरी करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 3.5.2)
Hey Som Dev! You are the destroyer of the harmful-dangerous enemies like Vratra Sur. You are always ready-prepared to face troubles. You increase wealth in the form of cows and horses.
सम्मिश्लो अरुषो भुवः सूपस्थाभिर्न धेनुभिः। सीदं च्छ्येनो न योनिमा॥
हे सोमदेव! जिस प्रकार बाज पक्षी अपने घोंसले पर सुसज्जित होता है, वैसे ही आप उत्कृष्ट गौ के दुग्ध में मिश्रित करने पर प्रदीप्त होते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 3.5.3)
Hey Somras! The way a falcon is equipped-settled in its nest, you shine on being mixed in cow's milk.
अयं पूषा रयिर्भगः सोमः पुनानो अर्षति। पतिर्विश्वस्य भूमनो व्यख्यद्रोदसी उभे॥
सभी को पोषण प्रदान करने वाला, सौभाग्य में वृद्धि करने वाला, ऐश्वर्य प्रदान करने वाला सोमरस शुद्ध होते हुए पात्र में प्रतिष्ठित होता है। सभी जीवधारियों का स्वामी यह सोम द्यावा-पृथिवी को अपने ओज से प्रदीप्त करता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 3.5.4)
Somras which grant nourishment to all, increase good Luck, grant grandeur and is established in the pot as soon as its purified. Lord of all living beings Som grant aura to the earth & heavens.
समु प्रिया अनूषत गावो मदाय घृष्वयः। सोमासः कृण्वते पथः पवमानास इन्दवः॥
हे सोमदेव! हर्ष प्राप्त करने हेतु प्रेम तथा उत्कृष्ट स्पर्धा दिखाने वाली वाणियों से आपकी प्रार्थना होती हैं। शुद्ध किया गया वैभवशाली सोमरस भी सुख के निमित्त संचरित होता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 3.5.5)
Hey Som! You are worshiped for attaining pleasure and love-affection with prayers in excellent voice. Sanctified glorious Somras flow for grant of pleasure-comforts.
य ओजिष्ठस्तमा भर पवमान श्रवाय्यम्। यः पञ्च चर्षणीरभि रयिं येन वनामहे॥
हे सोम! पंचों अर्थात् सम्पूर्ण समाज को प्राप्त होने वाला, शक्ति में वृद्धि करने वाला, सराहना करने योग्य रस, प्रचुर मात्रा में हमें देने की कृपा करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 3.5.6)
Hey Som! Grant us your praise worthy juice-Somras granting strength, for the whole community, in sufficient quantity.
वृषा मतीनां पवते विचक्षणः सोमो अह्नां प्रतरीतोषसां दिवः।
प्राणा सिन्धूनां कलशाँ अचिक्रददिन्द्रस्य हार्धाविशन्मनीषिभिः॥
हे सोमदेव! आप बुद्धि में वृद्धि करने वाले, विशिष्ट ज्ञान से युक्त, दिन, उषा तथा देवलोक के जानकार, तंत्रिकाओं में चेतना जाग्रत करने वाले, विद्वानों द्वारा स्तुति करने योग्य हैं। आप देवराज इन्द्र के पान करने के निमित्त, आवाज करते हुए कलश में परिष्कृत हों।(सामवेद उत्तरार्चिक 3.5.7)
Hey Somras! You increase intelligence-brain power, possess specific knowledge, are aware of the Usha and heavens, cause sensation in the nerves and deserve worship by the learned-scholars. You are sanctified in the Kalash to be drunk by Devraj Indr.
मनीषिभिः पवते पूर्व्यः कविर्नृभिर्यतः परि कोशाँ असिष्यदत्।
त्रितस्य नाम जनयन्मधु क्षरन्निन्द्रस्य वायुं सख्याय वर्धयन्॥
सब कुछ जानने वाला सोम यजमानों द्वारा पवित्र करके उनके माध्यम से पात्र में प्रतिष्ठित किया जाता है। तीनों लोकों में पूजनीय देवराज इन्द्र के यश में वृद्धि करता हुआ यह माधुर्य युक्त सोमरस इन्द्र को संतुष्ट करने हेतु, वायुदेव सहित पात्र में एकत्रित किया जाता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 3.5.8)
Sweetened, all knowing Somras is sanctified by the Yajmans and placed in the Kalash containing air. It boosts the prestige-glory of Devraj In the three abodes.
अयं पुनान उषसो अरोचयदयं सिन्धुभ्यो अभवदु लोककृत्।
अयं त्रिः सप्त दुदुहान आशिरं सोमो हृदे पवते चारु मत्सरः॥
प्रजा का कल्याण करने वाला यह पवित्र सोम उषा को प्रदीप्त करता है, नदियों के पानी में बढ़ोत्तरी करता है तथा सभी के हृदय में वास करने हेतु इक्कीस घटकों (10 प्राण 10 इन्द्रियाँ 1 मन = 21) को पुष्ट करता हुआ गतिमान होता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 3.5.9)
Virtuous-pious Som is devoted to the welfare of the populace illuminate Usha, increase water in the rivers and strengthen the 21 characteristics (10 Air Vital, ten senses and one innerself) and flows.(03.01.2026)
सामवेद उत्तरार्चिक (3.6) ::
एवा ह्यसि वीरयुरेवा शूर उत स्थिरः। एवा ते राध्यं मनः॥
हे पराक्रमी इन्द्र! आप संग्राम में शूरवीरों का सदुपयोग करने वाले हैं, संग्राम में अडिग रहने वाले है, अतः आपका मनोबल सराहनीय है।(सामवेद उत्तरार्चिक 3.6.1)
Unperturbed :: बेफिक्र, स्थिर, अचल; stable, static, stationary, constant, stagnant, immovable, invariable, irreplaceable, unshakable, still.
Hey majestic Devraj Indr! You make propre use of the brave warriors in the war, remain unperturbed, demonstrating your high moral.
एवा रातिस्तुविमघ विश्वेभिर्धायि धातृभिः। अधा चिदिन्द्र नः सचा॥
हे वैभवशाली देवराज इन्द्र! उपासकों द्वारा दैवी प्रवृत्तियों हेतु प्रवृत्त किये गये आपके द्वारा प्रदान किये गये साधन कभी खत्म नहीं होते, अतएव हे देवराज इन्द्र! आप हमें वैभवशाली बनाने की दया कर हमारी मदद करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 3.6.2)
Hey grandeur possessor Devraj Indr! Your directives towards the divine powers-tendencies granted to the worshipers remain as such. Help is acquisition of grandeur & prosperity.
मो षु ब्रह्मेव तन्द्रयुर्भुवो वाजानां पते। मत्स्वा सुतस्य गोमतः॥
हे शक्तिशाली, पोषक पदार्थों के अधिष्ठाता देवराज इन्द्र! गौ के दुग्ध में मिश्रित किये गये माधुर्ययुक्त सोमरस का सेवन करके आप प्रफुल्लित हों। आलस करने वाले विप्र की तरह क्रिया रहित न रहें।(सामवेद उत्तरार्चिक 3.6.3)
Hey deity of nourishing substances mighty Devraj Indr! Gladden by drinking Somras mixed in cow's milk. Don't become inactive like a lazy Brahman.
इन्द्रं विश्वा अवीवृधन्त्समुद्रव्यचसं गिरः। रथीतमं रथीनां वाजानां सत्पतिं पतिम्॥
महारथी, सागर की भाँति बृहत्, शक्तियों के अधिपति, दैवी शक्तियों को संरक्षण प्रदान करने वाले देवराज इन्द्र का गुणगान सब वेद मन्त्रों के द्वारा होता है, जिनसे उनकी कीर्ति में वृद्धि होती है।(सामवेद उत्तरार्चिक 3.6.4)
Maha Rathi-great charioteer, vast like ocean, deity of Shakti-might, grantor of protection to divine powers Devraj Indr is praised through the Ved Mantrs, adding to his glory.
सख्ये त इन्द्र वाजिनो मा भेम शवसस्पते। त्वामभि प्र नोनुमो जेतारमपराजितम्॥
हे देवराज इन्द्र! आप अपराजेय, विजेता, शक्तिशाली तथा हमारे सखा हैं। आपकी शरण में रहकर हम कभी किसी से भयभीत न हों। हम याजकगण आपको नमस्कार करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 3.6.5)
Hey Devraj Indr! You are undefeated, victorious, mighty and our friend. We should not experience fear under your patronage. We Yajak Gan salute you.
Devraj had to suffer-face defeat at the hands of Indrjit, son of Ravan.
पूर्वीरिन्द्रस्य रातयो न वि दस्यन्त्यूतयः। यदा वाजस्य गोमत स्तोतृभ्यो मंहते मघम्॥
हे देवराज इन्द्र! आप महा दानी हैं। सूर्य किरणों के द्वारा पैदा हुए अन्नादि पोषक पदार्थ, जब आप यजमानों को प्रदान करते हैं, तब यजमान का दान व्यर्थ नहीं होता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 3.6.6)
Hey Devraj Indr! You are a great donor. When you award-donate the nourishing food grains etc to the Yajman with the rays of Sun, the donation of the Yajman do not go waste.
सामवेद उत्तरार्चिक (4) :: ऋषि :- जमदग्नि, भृगुर्वारुणिजमदग्निर्भार्गवो वा, कविर्भार्गव, कश्यप, मधुच्छंदा, वैश्वामित्र, भरद्वाजो बार्हस्पत्य, सप्तर्षय, पराशर, पुरुहन्मा, मेध्यातिथिकाण्व, वसिष्ठ, त्रित, ययातिर्नाहुष, पवित्र, सौभरि काण्व, गोषूक्त्यश्वसूक्तिनौ, काण्वायनो, तिरश्ची; देवता :- पवमान, सोम, अग्नि, मित्रावरुणौ, मरुत्, इन्द्रश्च, इन्द्राग्नि, इन्द्र; छन्द :- गायत्री, प्रगाथ, त्रिष्टुप, बृहती, अनुष्टुप्, जगती, काकुभ, प्रगाथ, उष्णिक्।
सामवेद उत्तरार्चिक (4.1) ::
एते असृग्रमिन्दवस्तिरः पवित्रमाशवः। विश्वान्यभि सौभगा॥
हे छलनी की तरफ छनने के निमित्त तीव्र गति से प्रवाहित होते हुए सोम! आपको समस्त याजकों के द्वारा सौभाग्य प्राप्त करने हेतु शुद्ध किया जाता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 4.1.1)
Hey Somras flowing with high speed into the sieve for filtration! You are filtered-purified by all the Yajak Gan for good luck.
विघ्नन्तो दुरिता पुरु सुगा तोकाय वाजिनः। त्मना कृण्वन्तो अर्वतः॥
हे शक्ति वर्द्धक, कुकृत्य का विनाश करने वाले सोम! आप हमारे पुत्र, पौत्रों आदि की बाधाओं को विनष्ट कर उनके लिए गौ एवं अश्व आदि धन प्राप्त करने का मार्ग निर्मित करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 4.1.2)
Hey strength increasing, destroyed of wickedness-viciousness Som! Remove the obstacles of our sons & grand sons and pave way for acquiring cows, horses and wealth.
कृण्वन्तो वरिवो गवेऽभ्यर्षन्ति सुष्टुतिम्। इडामस्मभ्यं संयतम्॥
हे सोमदेव! आप हमारे तथा हमारी गौओं हेतु उत्कृष्ट धन एवं शक्तिवर्द्धक अन्न प्रदान करते हैं। आप हमारी अभ्यर्थनाओं को स्वीकार करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 4.1.3)
Hey Som Dev! Grant excellent wealth, nourishing & strength increasing food grains for our cows. You accept our requests.
राजा मेधाभिरीयते पवमानो मनावधि। अन्तरिक्षेण यातवे॥
मनुष्यों के द्वारा किये गये याग से पवित्र होने वाला यह रसराज सोम, विवेक पूर्वक की गई प्रार्थनाओं के प्रभाव से स्वर्गलोक में व्याप्त होता हुआ पात्र की ओर बढ़ता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 4.1.4)
Sanctified by the humans for the Yagy Rasraj (king of fluids) Somras, by virtue of prudent prayers, pervade the heavens and moves towards the vessel.
आ नः सोम सहो जुवो रूपं न वर्चसे भर। सुष्वाणो देववीतये॥
देवी-देवताओं के लिए परिष्कृत किये गये हे सोमदेव! आप पराक्रम से युक्त होकर हमें इस तरह का सामर्थ्य प्रदान करें, जिससे हमारी तेजस्विता में वृद्धि हो।(सामवेद उत्तरार्चिक 4.1.5)
Hey Somras, sanctified for the demigods-deities and goddesses! You should possess majesty and grant us strength so that our aura-radiance is increased.
आ न इन्दो शातग्विनं गवां पोषं स्वश्वयम्। वहा भगत्तिमूतये॥
हे सोम! आप हमें सैकड़ों गौएँ तथा उत्कृष्ट अश्व प्रदान करें। आपमें उन सभी का पालन-पोषण करने की क्षमता है। आप हमें भाग्यशाली बनाने की अनुकम्पा करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 4.1.7)
Hey Som Dev! Grant us hundreds of cows and excellent horses. You have the power to nurture-nourish them all. Bless us good luck.
तं त्वा नृम्णानि बिभ्रतं सधस्थेषु महो दिवः। चारुं सुकृत्ययेमहे॥
स्वर्गलोक में विद्यमान विभिन्न तरह की धन-सम्पत्तियों से सम्पन्न, सुरम्य हे सोम! श्रेष्ठ कर्मों (हवनों) के माध्यम से हम आपको प्राप्त करने की अभिलाषा करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 4.1.7)
Blessed with the wealth of different kinds present in the heavens, hey picturesque Som Dev! We wish to attain you by virtue of pious-virtuous endeavours like Yagy-Hawan.
संवृक्तधृष्णुमुक्थ्यं महामहिव्रतं मदम्। शतं पुरो रुरुक्षणिम्॥
हे विशाल सोमदेव! आप श्रेष्ठ कर्म करने वाले, हर्ष प्रदान करने वाले एवं शत्रुओं की पुरियों का विनाश करने वाले हैं। हम आपसे वैभव की अभ्यर्थना करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 4.1.8)
Hey voluminous Som Dev! You are a performer of best actions, gladdening and destroyer of enemy's cities-forts. We request you to grant us grandeur-prosperity.(04.01.2026)
अतस्त्वा रयिरभ्ययद्राजानं सुक्रतो दिवः। सुपर्णो अव्यथी भरत्॥
हे सत्कर्मों के स्वामी, वैभवशाली, बलवान, ओजस्वी सोम! आप कभी भी कष्ट से पीड़ित नहीं होते हैं। गरुड़ आपको देवलोक से धरती पर लाने की अनुकम्पा करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 4.1.9)
Hey Lord of virtues, glorious, mighty, aurous Som! You never feel pain-trouble. Let Garud Ji bring you from heavens to earth.
अधा हिन्वान इन्द्रियं ज्यायो महित्वमानशे। अभिष्टिकृद्विचर्षणिः॥
हे सोम! आप ज्ञान से परिपूर्ण तथा अभिलषित फलों को प्रदान करने वाले हैं। आप शुद्ध होकर अपने सामर्थ्य में अत्यधिक वृद्धि कर, अत्यन्त महिमामयी बन जाते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 4.1.10)
Hey Som! You are enlightened and accomplish desires-wishes. You become purified, increase your capability and become extremely glorious.
विश्वस्मा इत् स्वर्दृशे साधारणं रजस्तुरम्। गोपामृतस्य विर्भरत्॥
हे दिव्य सोम! आप जल को प्रेरित करने वाले, यज्ञ की रक्षा करने वाले, अपने आप देदीप्यमान् देवी-देवताओं को सरलता से प्राप्त होने वाले हैं। आप अन्तरिक्ष को व्याप्त कर लेते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 4.1.11)
Hey divine Som! You inspire water, protect the Yagy and is attainable to the lustrous demigods-goddess automatically. You pervade the sky-space.
इषे पवस्व धारया मृज्यमानो मनीषिभिः। इन्दो रुचाभि गा इहि॥
मेधावी याजकों द्वारा शुद्ध किये गये हे सोम! आप अपने ओज से पौष्टिक अन्न एवं सुन्दर गायें प्रदान करने के लिए अपनी धाराओं में प्रवाहित हों।(सामवेद उत्तरार्चिक 4.1.12)
Hey Somras sanctified for the intelligent Yajak Gan! Flow in streams-current to grant nourishing food grains and beautiful cows through your radiance.
पुनानो वरिवस्कृध्यूर्ज जनाय गिर्वणः। हरे सृजान आशिरम्॥
हे हरितवर्ण, स्तुति करने योग्य सोम! आप गौ दुग्ध के साथ संयुक्त होकर, यजमानों को धन एवं अन्नादि से परिपूर्ण करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 4.1.13)
Hey greenish, worshipable Somras! Mix up with the cow's milk and accomplish the Yajmans with wealth & food grains etc.
पुनानो देववीतय इन्द्रस्य याहि निष्कृतम्। द्युतानो वाजिभिर्हितः॥
हे शुद्ध, कान्तिमय, अद्भुत सोमदेव! देवी-देवताओं हेतु कल्याणकारी परिष्कृत किये हुए, आप देवराज इन्द्र को प्राप्त हों।(सामवेद उत्तरार्चिक 4.1.14)
Hey pure, lustrous-shinning, amazing Somras! Sanctified for the goddesses & demigods-deities, you should be availed by Devraj Indr.
सामवेद उत्तरार्चिक (4.2) ::
अग्निनाग्निः समिध्यते कविगृहपतिर्युवा। हव्यवाड् जुह्वास्यः॥
यज्ञ-मण्डप की रक्षा करने वाले, दूर तक दृष्टि रखने वाले, हविष्यान्नों को देवताओं तक ले जाने वाले, प्रकाश युक्त यज्ञाग्नि को, अरणि-मंथन द्वारा उत्पन्न अग्नि देव से जलाया जाता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 4.2.1)
Agni Dev! Protector of the Yagy Mandap, far sighted, carrier of offerings-oblations to the demigods-deities, illuminate the Yagy fire is invoked by rubbing-churning the wood pieces.
यस्त्वामग्ने हविष्पतिर्दूतं देव सपर्यति। तस्य स्म प्राविता भव॥
हे अग्ने! देवताओं को हवि पहुँचाने वाले जो यजमान, आप (देव-दूत) की आराधना करते हैं, आप उनको अवश्य रूप से संरक्षण प्रदान करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 4.2.2)
Hey Agne! You must grant protection to those Yajmans who make offerings for demigods-deities who worship you as messenger of demigods-deities.
यो अग्नि देववीतये हविष्माँ आविवासति। तस्मै पावक मृडय॥
हे पवित्र अग्नि देव! देवताओं हेतु हविष्यान्न समर्पित करने वाले याजक आपकी अभ्यर्थना करते हैं। आप उन्हें सुखी कर दें।(सामवेद उत्तरार्चिक 4.2.3)
Hey pious Agni Dev! Make Yajak Gan happy & comfortable who make offerings to demigods-deities and worship you.
मित्रं हुवे पूतदक्षं वरुणं च रिशादसम्। धियं घृताचीं साधन्ता॥
हे मित्रा-वरुण! आप जल की उत्पत्ति करने वाले हैं। मित्र देव हमें पराक्रमी बनाएँ एवं वरुण देव आक्रमणकारी शत्रुओं का शमन कर दें। हम आप दोनों को आहूत करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 4.2.4)
Hey Mitra-Varun! You are producer of water. Let Varun Dev become friendly with us and Varun Dev should destroy the invader enemies. We summon-worship both of you.
ऋतेन मित्रावरुणवृतावृधावृतस्पृशा। क्रतुं बृहन्तमाशाथे॥
हे सत्य की रक्षा करने वाले, सत्य तथा याग को पुष्ट करने वाले, मित्र एवं वरुण! आप दोनों हमारे धर्मकृत कार्यों को सत्य से परिपूर्ण कर दें।(सामवेद उत्तरार्चिक 4.2.5)
Hey protector of truth, nurturer of truth & Yagy, Mitra-Varun! Both of you should accomplish our virtuous endeavours and make them truthful.
कवी नो मित्रावरुणा तुविजाता उरुक्षया। दक्षं दधाते अपसम्॥
बहुत सारे कार्यों को पूर्ण कराने वाले, ज्ञानवान्, अनेक स्थानों पर रहने वाले मित्र एवं वरुण देव हमारे सामर्थ्य तथा कार्यों को पुष्ट करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 4.2.6)
Mitra-Varun accomplish our several efforts, remain at many places; support our capability and strengthen our deeds.
इन्द्रेण सं हि दृक्षसे संजग्मानो अबिभ्युषा। मन्दू समानवर्चसा॥
हे मरुतों! आप सदैव प्रफुल्लित रहने वाले, प्रतापी हैं। आप निर्भीक रहने वाले बलशाली देवराज इन्द्र के संग सुशोभित होते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 4.2.7)
Hey Marud Gan! You are majestic and always remain happy. You accompany fearless, Devraj Indr.
आदह स्वधामनु पुनर्गर्भत्वमेरिरे। दधाना नाम यज्ञियम्॥
हे आराधना किये जाने वाले, नाम धारण करने वाले मरुद्गण! आप जल्द ही पोषक तत्त्वों को लक्ष्य करके, फिर से गर्भ को धारण करके आकृति ग्रहण करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 4.2.8)
Hey worshipable, assuming names, Marud Gan! You targe nourishing materials, become pregnant and acquire shapes.
वीडु चिदारुजलुभिर्गुहा चिदिन्द्र वह्निभिः। अविन्द उस्त्रिया अनु॥
हे देवराज इन्द्र! बहुत बड़े तथा बलशाली किले को भी तहस-नहस करने में सक्षम, प्रतापी मरुतों ने रुकी हुई किरणों को उत्पन्न किया।(सामवेद उत्तरार्चिक 4.2.9)
Hey Devraj Indr! Majestic Marud Gan capable of destroying strong forts, released the blocked rays.
ता हुवे ययोरिदं पप्ने विश्वं पुरा कृतम्। इन्द्राग्नी न मर्धतः॥
सदैव बने रहने वाले, बलशाली, शत्रुओं का संहार करने वाले, यजमानों के दुःखों को हरने वाले, देवराज इन्द्र तथा अग्नि देव को हम आहूत करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 4.2.10)
We invoke-summon always present, mighty, destroyer of the enemies Devraj Indr & Agni Dev who remove the troubles, pain, sorrow of the Yajmans.
उग्रा विघनिना मृध इन्द्राग्नी हवामहे। ता नो मृडात ईदृशे॥
हे इन्द्र तथा अग्निदेव! आप महा पराक्रमी, शत्रुओं का शमन करने वाले हैं। हम युद्ध (जीवन-संग्राम) में आपको आहूत करते हैं। आप हमारी सहायता करें तथा हमें सुख से परिपूर्ण कर दें।(सामवेद उत्तरार्चिक 4.2.11)
Hey Devraj Indr and Agni Dev! You are majestic, destroyer of the enemies. We invoke-summon for help in the struggle of life. Help us and grant us pleasure-comforts.
हथो वृत्राण्यार्या हथो दासानि सत्पती। हथो विश्वा अप द्विषः॥
हे सज्जन पुरुषों के स्वामी देवराज इन्द्र तथा अग्नि देव! आप कर्म करने वालों के दुःखों को दूर करने वाले हैं। आप यज्ञादि में पड़ने वाली बाधाओं को विनष्ट करें, कर्म न करने वालों तथा विरोध करने वालों को नष्ट कर दें तथा सभी शत्रुओं का भी शमन कर दें।(सामवेद उत्तरार्चिक 4.2.12)
Hey lord of the gentlemen, Devraj Indr & Agni Dev! You remove the trouble-sorrow of those who make efforts. Remove the obstecles in Yagy, destroy those who oppose us including our all enemies.
सामवेद उत्तरार्चिक (4.3) ::
अभि सोमास आयवः पवन्ते मद्यं मदम्।
समुद्रस्याधि विष्टपे मनीषिणो मत्सरासो मदच्युतः॥
हे स्फूर्ति प्रदान करने वाले, आनन्द की बारिश करने वाले सोमदेव! आपको स्तोतागण हर्ष प्राप्त करने तथा स्फूर्ति में वृद्धि करने हेतु पानी के कलश पर विद्यमान छलनी से छानते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 4.3.1)
Hey refreshing, showering bliss, Somras! The Stota Gan filter you through the sieve for happiness, exhilarating freshness over the Kalash carrying water.(05.01.2026)
तरत्समुद्रं पदमान ऊर्मिणा राजा देव ऋतं बृहत्।
अर्षा मित्रस्य वरुणस्य धर्मणा प्र हिन्वान ऋतं बृहत्॥
प्रेरणा प्रदान करने वाला अद्भुत सोमरस पवित्र होकर, प्रकृति में विद्यमान बृहत् सोम (ऋतु) के सागर में मित्र (सूर्य) तथा वरुणदेव (जल) द्वारा प्रयोग किये जाने हेतु प्रतिस्थापित किया जाता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 4.3.2)
Inspiring, amazing Somras on being purified is replaced for use by Brahat Som's (season) friend ocean (Mitr-Sun) and Varun Dev (water).
नृभिर्येमाणो हर्यतो विचक्षणो राजा देवः समुद्रयः॥
स्तोताओं के द्वारा शुद्ध किया गया, सर्वप्रिय, विवेक में बढ़ोत्तरी करने वाला, नरेन्द्र दिव्य सोम, देवराज इन्द्र के पान करने के उद्देश्य से पवित्र होकर पानी के पात्र में प्रवाहित होता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 4.3.3)
Sanctified by the Stotas, loved by all, prudence increaser, Narendr (Lord of Humas) divine Somras flows into water vessel for drinking by Devraj Indr.
तिस्रो वाच ईरयति प्र वह्निर्ऋतस्य धीतिं ब्रह्मणो मनीषाम्।
गावो यन्ति गोपतिं पृच्छमानाः सोमं यन्ति मतयो वावशानाः॥
हे सोमदेव! विप्र-बुद्धिमान् स्तोतागण ऋक्, यजु, सामरूप इन तीनों वाणियों से आपकी प्रशंसा करते हैं। आपकी इच्छा रखने वाली बुद्धियाँ आपको पूछते हुए, आपके समीप वैसे ही जाने का प्रयास करती है, जैसे गाएँ शब्द करती हुई अपने पालनकर्ता गोपाल के समीप गमन करती हैं, क्योंकि जैसे गायों के स्वामी गोपाल हैं, वैसे ही बुद्धियों को पोषण देने वाले आप (सोम) है।(सामवेद उत्तरार्चिक 4.3.4)
Hey Som Dev! Intelligent Brahman Stota Gan appreciate you in the form of Rick, Yajur and Sam Ved recitation. Those interested in you enquire about you and move close to you, like the cows moving to their herds man-nurturer-owner Gopal, since the way the deity-Lord of cows is Gopal, nurturer of the intelligence is you.
Gopal is one of the many names of Bhagwan Shri Krashn.
सोमं गावो धेनवो वावशानाः सोमं विप्रा मतिभिः पृच्छमानाः।
सोमः सुत ऋच्यते पूयमानः सोमे अर्कास्त्रिष्टुभः सं नवन्ते॥
निचोड़े जाने के पश्चात् परिष्कृत किया हुआ सोम कलश में प्रवाहित होता है। मनीषी याजक अपने विवेक से तीनों छन्दों के मन्त्र से उसकी वन्दना करते हैं। दुधारु गौएँ सोम की कामना करती हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 4.3.5)
On being squeezed purified Somras flow into the Kalash-vessel. Thoughtful, Yajak Gan worship it with the three Chhand Mantrs. Milch cows wish for Som.
एवा नः सोम परिषिच्यमान आ पवस्व पूयमानः स्वस्ति।
इन्द्रमा विश बृहता मदेन वर्धया वाचं जनया पुरंधिम्॥
हे सोम देव! आप जल में संयुक्त एवं पवित्र होते हुए हमारे हित के लिए परिष्कृत हों। आप हमारी अभ्यर्थनाओं को स्वीकारें तथा हमें उत्कृष्ट ज्ञान प्रदान करें। आप देवराज इन्द्र को प्राप्त होकर उन्हें तृप्त करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 4.3.6)
Hey Somras! You should be sanctified for us on being mixed in water. Accept our prayers and grant us excellent knowledge-Gyan. You should be attained by Devraj Indr and satiate him.
सामवेद उत्तरार्चिक (4.4) ::
यदयाव इन्द्र ते शतं शतं भूमीरुत स्युः।
न त्वा वज्रिन्त्सहस्त्रं सूर्या अनु न जातमष्ट रोदसी॥
हे देवराज इन्द्र! सैकड़ों स्वर्गलोक, सैकड़ों पृथ्वियाँ भी आपकी बराबरी नहीं कर सकते। यदि सहस्रों सूर्य भी उदित हो जाएं तो भी वे आपके बराबर प्रदीप्त नहीं हो सकते हैं। हे वज्रपाणि! अब तक ऐसा कोई नहीं जन्मा है, जो आपके तुल्य हो। द्यावा-पृथिवी तक आपकी समानता करने वाला कोई भी नहीं है।(सामवेद उत्तरार्चिक 4.4.1)
Hey Devraj Indr! Hundreds of heavens & hundreds of earths can not match you. Even if thousands of Sun rise they can not match your aura-radiance. Hey Vajr wielding! None equivalent to you has ever born. Even heaven & earth can not match-equivalise you.
आ पप्राथ महिना वृष्ण्या वृषन्विश्वा शविष्ठ शवसा।
अस्माँ अव मघवन् गोमति व्रजे वज्रिं चित्राभिरूतिभिः॥
हे पराक्रमी देवराज इन्द्र! आप शक्तिमान्, धनपति, वज्रधारक, अपनी योग्यता से सभी की अभिलाषाओं को पूर्ण करने वाले हैं। आप अपने सभी रक्षा साधनों के साथ गौओं से युक्त बाड़े हमें देने की कृपा करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 4.4.2)
Hey majestic Devraj Indr! You are mighty-powerful, wealthy and accomplish the wishes-desires of everyone. Grant us cow sheds having cows, protected by you.
वयं घ त्वा सुतावन्त आपो न वृक्तबर्हिषः।
पवित्रस्य प्रस्रवणेषु वृत्रहन्परि स्तोतार आसते॥
हे शत्रुओं का संहार करने वाले देवराज इन्द्र! जिस प्रकार जल प्रवाहित होता है, वैसे ही हम सोमरस को आपके समक्ष प्रवाहित (समर्पित) करते हैं। पवित्र सोमरस लेकर याजकगण आपके बैठने के लिए कुशासन फैलाते हैं तथा आपकी पूजा करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 4.4.3)
Hey slayer of the enemies Devraj Indr! We present Somras to you like the flowing water. Yajak Gan spread Kushasan and worship you holding Somras for you.
स्वरन्ति त्वा सुते नरो वसो निरेक उक्थिनः।
कदा सुतं तृषाण ओक आ गमदिन्द्र स्वब्दीव वंसगः॥
हे समस्त लोगों को आश्रय प्रदान करने वाले देवराज इन्द्र! यजमान लोग सोमरस निकालने के पश्चात् आपकी वन्दना करते हैं। सोमरस का सेवन करने की कामना रखने वाले आप, बैल के सदृश शब्द करते हुए हमारे समक्ष कब प्रस्तुत होकर हमें अपने दर्शन देंगे?(सामवेद उत्तरार्चिक 4.4.4)
Hey Devraj Indr awarding asylum to all people! Yajman pray to you after extracting. Desirous of Somras, when will you come to us making sound like the bull?
कण्वेभि र्धुष्णवा धृषद्वाजं दर्षि सहस्त्रिणम्।
पिशङ्गरूपं मघवन्विचर्षणे मक्षू गोमन्तमीमहे॥
हे ऐश्वर्यवान्, सर्वज्ञाता देवराज इन्द्र! शत्रुओं का विनाश करने वाले, स्वर्ण आभा से सम्पन्न, गौ के सदृश शुद्ध धन आप हमें अति शीघ्र प्रदान करें। हे पराक्रमी देवराज इन्द्र! बुद्धिमान् मनुष्यों द्वारा प्रार्थना किये जाने के पश्चात् आप उन्हें सहस्रों तरह की शक्ति तथा धन-वैभव प्रदान करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 4.4.5)
Hey grandeur possessor, all knowing Devraj Indr! Destroyer of the enemies, with golden hue, grant us pure wealth like the cows quickly. Hey majestic Devraj Indr! On being worshiped by the intelligent humans, you grant hundreds of kinds of strength, wealth and prosperity to them.
तरणिरित्सिषासति वाजं पुरंध्या युजा। आ व इन्द्रं पुरुहूतं नमे गिरा नेमिं तष्टेव सुद्रुवम्॥
हे देवराज इन्द्र! जिस प्रकार निपुण शिल्पी अच्छी तरह चलने के लिए पहिये को नीचे की ओर झुकाता है, वैसे ही हम प्रार्थनाओं के माध्यम से आपके लिए झुक जाते हैं। हम भव-सागर से मुक्त होना चाहते हैं और मानसिक तथा शारीरिक दोनों प्रकार के बल आपसे प्राप्त करने की इच्छा रखते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 4.4.6)
Hey Devraj Indr! The way an expert craftsman lower the properly moving wheel, similarly we bow before you by virtue of prayers with the desire of acquiring both mental and physical strength from you.
न दुष्टुतिर्द्रविणोदेषु शस्यते न स्त्रेधन्तं रयिर्नशत्।
सुशक्तिरिन्मघवन् तुभ्यं मावते देष्णं यत्पायें दिवि॥
उत्कृष्ट कार्यों के लिए धन प्रदान करने वाले धनवानों की निन्दा कभी नहीं करनी चाहिए। जो लोग दानी लोगों की प्रशंसा नहीं करते, उन्हें धन कभी प्राप्त नहीं होता है। हे वैभवशाली देवराज इन्द्र! सोमयज्ञ करते समय श्रेष्ठ-बलवान् उपासकों को ही आपसे देने योग्य धन मिलता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 4.4.7)
One should never reproach the wealthy-rich people who grant money for excellent-virtuous deeds. Those people who do not appreciate the donors, never get wealth. Hey grandeur possessing Devraj Indr! While accomplishing Som Yagy; only excellent-mighty worshipers get wealth from you.
सामवेद उत्तरार्चिक (4.5) ::
तिस्रो वाच उदीरते गावो मिमन्ति धेनवः। हरिरेति कनिक्रदत्॥
स्तोतागण ऋक्, यजु, सामरूप तीनों वाणियों से सोमरस का गुणगान करते हैं। उन वाणियों का श्रवण कर हरितवर्ण सोमरस, दुही जाने वाली गायों के शब्द करने की तरह ध्वनि करता हुआ पात्र में गिरता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 4.5.1)
Stota Gan recite the glory of Somras using Rick, Yaju and Sam Ved Mantrs. responding to these hymns greenish Somras fall into the vessel making sound like the milking cows.(06.01.2026)
अभि ब्रह्मीरनूषत यह्वीऋ॒तस्य मातरः। मर्जयन्तीर्दिवः शिशुम्॥
उच्च्चाकाश से जन्मे सोम को शुद्ध करने हेतु यज्ञों में विशेष वेद मन्त्रों के द्वारा स्तुति की जाती है।(सामवेद उत्तरार्चिक 4.5.2)
Som born in the high sky is worshiped with special-specific Ved Mantrs for purification in the Yagy.
रायः समुद्रां श्चतुरोस्मभ्यं सोम विश्वतः। आ पवस्व सहस्रिणः॥
हे सोमदेव! हमारी असंख्यों अभिलाषाओं को पूर्ण करने हेतु प्रगति के चारों सागर (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष आदि साधन) हमें प्राप्त कराने की कृपा करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 4.5.3)
Hey Som Dev! For accomplishment of our numerous-infinite desires grant us the four oceans-four motives, goals (Dharm, Arth, Kam, Moksh) of life.
सुतासो मधुमत्तमाः सोमा इन्द्राय मन्दिनः। पवित्रवन्तो अक्षरं देवान् गच्छन्तु वो मदाः॥
अत्यधिक मधुरता से युक्त, सुख प्रदान करने वाला, सुसंस्कारित सोम, देवराज इन्द्र हेतु पात्र में प्रवाहित होता है। हे सोम! आपका रस देवी-देवताओं को तृप्ति प्रदान करने वाला सिद्ध हो।(सामवेद उत्तरार्चिक 4.5.4)
Highly sweetened, pleasure granting, sanctified Somras is poured in the vessel for Devraj Indr. Hey Som! Let your sap-juice prove satisfying to the demigods-deities.
इन्दुरिन्द्राय पवत इति देवासो अब्रुवन्। वाचस्पतिर्मखस्यते विश्वस्येशान ओजसः॥
हे इन्द्र! याजकगण आपके निमित्त सोमरस को शुद्ध करते हैं। सभी की रक्षा करने वाले वाचस्पति सोम का यज्ञ में प्रयोग किया जाता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 4.5.5)
वाचस्पति :: बहुत बड़ा विद्वान्, वाणी का स्वामी, बृहस्पति-देवताओं के गुरु; great scholar-enlightened.
Hey Devraj Indr! We purify Somras for you. Vachaspati Som protector of all, is used in the Yagy.
सहस्त्रधारः पवते समुद्रो वाचमीङ्खयः। सोमस्पती रयीणां सखेन्द्रस्य दिवेदिवे॥
स्तुति गान के लिए प्रेरित करने वाला, वैभवशाली देवराज इन्द्र का सखा, पानी में मिला हुआ सोम अपनी हजारों धारा से नित्य प्रति पात्र में परिष्कृत होता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 4.5.6)
Som, a companion of Devraj Indr, which inspire for Stuti Gan, mixed in water is extracted-purified with its thousands of currents in the vessel-pot.
पवित्रं ते विततं ब्रह्मणस्पते प्रभुर्गात्राणि पर्येषि विश्वतः।
अतप्ततनूर्न तदामो अश्नुते शृतास इद्वहन्तः सं तदाशत॥
हे वेद मन्त्रों के अधिपति सोम! आप पवित्र होकर सर्वत्र विद्यमान हैं। आप शक्तिमान् याजकों को ही प्राप्त होते हैं। बुद्धिमान् तपस्वी याजक यज्ञ करते हुए आपको पाते हैं। जो याजक तप नहीं करते, ऐसे अपरिपक्व बुद्धि वाले आपको प्राप्त नहीं कर पाते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 4.5.7)
Hey Lord-deity of the Mantrs Som! You are present every where on being purified. You can be attained by the mighty Yajak Gan only. Intelligent ascetic Yajak Gan attain you while accomplishing Yagy. The immature Yajak who do not perform Yagy never attain you.
तपोष्पवित्रं विततं दिवस्पदेऽर्चन्तो अस्य तन्तवो व्यस्थिरन्।
अवन्त्यस्य पवितारमाशवो दिवः पृष्ठमधि रोहन्ति तेजसा॥
सोम के स्वच्छ भाग शत्रुओं को कष्ट देने हेतु स्वर्गलोक में व्याप्त हैं। इनकी प्रकाशित किरणें स्वर्गलोक के पृष्ठ भाग पर विशिष्ट विधि से प्रतिष्ठित हो गई हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 4.5.8)
The illuminated segment of Som pervade the heavens to torture the enemies. Its rays have been focused over the surface of the heavens by adopting special techniques.
अरूरुचदुषसः पृश्निरग्रिय उक्षा मिमेति भुवनेषु वाजयुः।
मायाविनो ममिरे अस्य मायया नृचक्षसः पितरो गर्भमा दधुः॥
सभी ग्रहों में प्रमुख सूर्यदेव प्रदीप्त होकर समस्त लोकों में अपनी किरणों को विस्तारित करते हैं। सम्पूर्ण विश्व को अन्न (पोषक पदार्थ) प्रदान करते हैं। सभी को प्रदीप्त करने वाली रश्मियाँ, गर्भ के सदृश जल को ग्रहण करती हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 4.5.9)
Sury Dev major amongest all planets, extend its rays in all abodes. He grants food grains & nourishment to the entire world. Rays which illuminate everyone sucks water like the womb-foetus.
सामवेद उत्तरार्चिक (4.6) ::
प्र मंहिष्ठाय गायत ऋतान्वे बृहते शुक्रशोचिषे। उपस्तुतासो अग्नये॥
हे ऋत्विजों! उत्कृष्ट यज्ञकर्त्ता, परम् प्रतापी अग्नि देव की याचना करो।(सामवेद उत्तरार्चिक 4.6.1)
Hey Ritviz Gan! Worship Agni Dev, the excellent Yagy accomplisher.
आ वंसते मघवा वीरवद्यशः समिद्धो द्युम्याहुतः।
कुविन्नो अस्य सुमतिर्भवीयस्यच्छा वाजेभिरागमत्॥
हे अग्ने! आप ऐश्वर्यवान्, ओजवान, देदीप्यमान है। आप पौत्रादि से सम्बन्धित कीर्ति प्रदान करते हैं। आप हमें अत्यधिक मात्रा में अन्न देने की अनुकम्पा करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 4.6.2)
Hey Agne! You are grandeur possessing, aurous-radiant, illuminated. You grant fame pertaining to the grand sons etc. Bless us with extreme quantity of food grains.
तं ते मदं गृणीमसि वृषणं पृक्षु सासहिम्। उ लोककृत्लुमद्रिवो हरिश्रियम्॥
हे वज्र धारण करने वाले देवराज इन्द्र! मनोकामनाओं की पूर्ति करने वाले, शत्रुओं का संहार करने वाले, लोकों का संचार करने वाले, घोड़ों से सुशोभित आपके सोमरस के सेवन से पैदा हुए उल्लास की हम सब बड़ाई करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 4.6.3)
Hey Vajr wielding Devraj Indr! We all appreciate the pleasure generated Somras for you, you being accomplisher of wished-desires, destroyer of the enemies, communicator of the abodes, decorated with the horses.
येन ज्योतींष्यायवे मनवे च विवेदिथ। मन्दानो अस्य बर्हिषो वि राजसि॥
हे देवराज इन्द्र! आपने जिस स्फूर्ति के साथ मानव को दीर्घायु प्रदान की, उनके कल्याण हेतु सूर्य के साथ दूसरी कई तेजवान् वस्तुएँ परिव्याप्त की, उसी स्फूर्ति से हर्षित होकर याजक के इस यज्ञ में बिछाए गए आसन पर आप प्रतिष्ठित हों।(सामवेद उत्तरार्चिक 4.6.4)
स्फूर्ति :: ऊर्जा से भरा हुआ, चुस्ती-फुर्ती, तेज़ी, स्फुरण; vitality, alertness, quickness.
Hey Devraj Indr! The vitality, quickness-readiness with which you granted long life to the humans, established and pervaded aurous-energetic material for them like the Sun, with the same spirit you should acquire the cushion laid by the Yajak for you.
तदद्या चित्त उक्थिनोऽनु ष्टुवन्ति पूर्वथा। वृषपत्नीरपो जया दिवेदिवे॥
हे देवराज इन्द्र! सनातन स्तोता आज भी आपके बल का गुणगान करते हैं। इस प्रकार बल नामक राक्षस के अधिष्ठाताओं को पराजित कर आप जीत हासिल करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 4.6.5)
Hey Devraj Indr! Eternal Stota sing the glory of your might-power, even today. You should achieve victory over the Lord of demons named Bal etc by defeating them.
श्रुधी हवं तिरश्या इन्द्र यस्त्वा सपर्यति। सुवीर्यस्य गोमतो रायस्पूर्धि महाँ असि॥
हे तेजस्वी देवराज इन्द्र! आप अभ्यर्थना में लगे हुए तिरश्चि ऋषि की अभ्यर्थना को श्रवण करें। आप हमें उत्कृष्ट सन्तान तथा गायों से युक्त धन-वैभव से परिपूर्ण करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 4.6.6)
Hey energetic Devraj Indr! Respond to the prayers of Rishi Tirshchi busy with ascetics. Grant us excellent progeny, cows including wealth & prosperity.
यस्त इन्द्र नवीयसीं गिरं मन्द्रामजीजनत्। चिकित्विन्मनसं धियं प्रत्नामृतस्य पिप्युषीम्॥
हे देवराज इन्द्र! जो यजमान नव्य हर्ष प्रदान करने वाली वन्दनाओं से आपकी प्रार्थना करते हैं, वह यजमान उत्कृष्ट ज्ञान से युक्त हो जाते हैं। आप उनके मन को पाप रहित अर्थात् शुद्ध करते हैं तथा उनको सुख प्रदान करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 4.6.7)
Hey Devraj Indr! The Yajman who recite new gladdening prayers devoted to you is blessed with excellent knowledge-enlightenment by you. You make their innerself free from sins and grant them pleasure-comforts.
तमु ष्टवाम यं गिर इन्द्रमुक्थानि वावृधुः। पुरूण्यस्य पौंस्या सिषासन्तो वनामहे॥
जिन देवराज इन्द्र का मन्त्र तथा स्तोत्रों द्वारा यशगान होता है, उन महान् बलशाली देवराज इन्द्र की हम पूर्ण श्रद्धा से स्तुति करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 4.6.8)
Mighty-majestic Devraj Indr who's glory is sung with Mantrs & Strotrs is worshiped by us with complete dedication-devotion.(07.01.2026)
सामवेद उत्तरार्चिक (5) :: ऋषि :- अकृष्टा भाषा, अमहीयु, मेध्यातिथि, वृहन्मति, भृगुवारुणिर्जमदग्निर्भार्गवो वा, सुतंभर आत्रेय, गृत्समदो, गौतमो राहूगण, वसिष्ठ, दृढच्युत आगस्त्य, सप्तऋर्षय, रेभ, काश्यप, पुरुहन्मा, असित, काश्यप, देवल वा, शक्ति, उरु, अग्निश्चाक्षुष, प्रतर्दनो, दिवोदास, प्रयोगो भार्गव, अग्निर्वा पावको बार्हस्पत्य, ग्रहपतियाविष्ठौ सहस सुतो तयोर्वान्यतर, भृगु; देवता :- पवमान, सोम, अग्नि, मित्रावरुणौ, इन्द्र, इन्द्राग्नि; छन्द :- जगती, गायत्री, प्रगाथ, अनुष्टुप्, बृहती, काकुभ, उष्णिक्, त्रिष्टुप्।
सामवेद उत्तरार्चिक (5.1) ::
प्र त आश्विनीः पवमान घेनवो दिव्या असृग्रन्ययसा घरीमणि।
प्रान्तरिक्षात्स्थाविरीस्ते असृक्षत ये त्वा मृजन्त्युषिषाण वेधसः॥
हे सोमदेव! तुष्टि प्रदान करने वाले दुग्ध से मिश्रित आपकी धाराएँ आवाज करते हुए पात्र में प्रविष्ट होती हैं। शुद्ध करने वाले मनीषी ऋषि आपको ऊपर के बर्तन से नीचे के बर्तन में प्रवाहित करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 5.1.1)
मनीषी :: आला दिमाग, प्रणेता, कर्णधार, अग्रणी; wise, learned, master mind, clever, thoughtful, prudent, intelligent.
Hey Somras! Your satiating currents mixed with milk flow into the vessel. Intelligent Rishi Gan flow you from the upper vessels to lower pots.
उभयतः पवमानस्य रश्मयो ध्रुवस्य सतः परि यन्ति केतवः।
यदी पवित्रे अधि मृज्यते हरिः सत्ता नि योनौ कलशेषु सीदति॥
पवित्र, शोधित किया हुआ, हरितवर्ण सोम कलश में विद्यमान होता है। उसकी किरणें चारों ओर प्रसारित होकर पवित्रता का संचार करती हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 5.1.2)
Pious, sanctified, greenish Somras is present in the Kalash. Its rays spread in the four directions generating purity-piousness.
विश्वा धामानि विश्वचक्ष ऋभ्वसः प्रभोष्टे सतः परि यन्ति केतवः।
व्यानशी पवसे सोम धर्मणा पतिर्विश्वस्य भुवनस्य राजसि॥
हे सभी को एक समान दृष्टि से देखने वाले, व्यापक स्वभाव वाले सोम! आपकी बृहत् किरणों का प्रकाश सभी ओर प्रसारित है। अपने स्वाभाविक धर्म से पवित्र होने वाले आप अखिल विश्व के अधिष्ठाता के रूप में सुसज्जित हो रहे हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 5.1.3)
Hey Som viewing every one equally, having comprehensive-vast nature! Your wide beams are spreading in all directions. Being pious-virtuous naturally you are established as the Lord-deity of the whole universe.
पवमानो अजीजनद्दिवश्चित्रं न तन्यतुम्। ज्योतिर्वैश्वानरं बृहत्॥
हे पवित्र सोमदेव! आप देवलोक में प्रतापी वैश्वानर की अद्भुत शक्ति को विद्युत् की भाँति प्रकट करते हुए, जाज्वल्यमान होते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 5.1.4)
जाज्वल्य :: चमकता हुआ, प्रकाशमान्, प्रज्वलित तेजपूर्ण, तेजो मंडित; illuminated, flamboyant, shining, blazing, refulgent.
Hey Som Dev with absolute purity-piousness! You shine in the heavens-divine abodes as the amazing power of Vaeshwanar like lightening.
पवमान रसस्तव मदो राजन्नदुच्छुनः। वि वारमव्यमर्षति॥
हे पवित्र किये गये सोमदेव! आपका रस असुरों को प्राप्त नहीं होता। आप देवों का उत्साहवर्द्धन करने वाले हैं। आपका अद्भुत रस छन्ने से छानकर अच्छी तरह शोधित होकर, कलश में एकत्रित होता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 5.1.5)
Hey purified Som! Your sap-juice is not meant for the demons. You encourage the demigods-deities. Your amazing juice is filtered & collected in the Kalash-vessel.
पवमानस्य ते रसो दक्षो वि राजति द्युमान्। ज्योतिर्विश्वं स्वर्दृशे॥
हे पवित्रता को प्राप्त हुए सोमदेव! आपका रस पराक्रम को बढ़ाने वाला तथा तेजवान् है। आप सभी ओर परिव्याप्त हैं, आपका आलोक सम्पूर्ण जगत् में दिखाई पड़ता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 5.1.6)
Hey Som, having attained piousity! Your sap increase valour-bravery, is aurous-energetic and pervade all directions. Your shine-radiance is visible throughout the universe.
प्र यद्गावो न भूर्णयस्त्वेषा अयासो अक्रमुः। घ्नन्तः कृष्णामप त्वचम्॥
सूर्य की रश्मियों की भाँति तेजवान्, गतिशील सोम, जो त्वचा के दाग-धब्बे एवं कालेपन को विनष्ट करता है, कलश में प्रतिष्ठित होता है। हम उसका गुणगान करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 5.1.7)
Energetic like the beam-rays of the Sun, dynamic Som destroys the spots, darkness over the skin and is stored in the Kalash. We praise it.
सुवितस्य वनामहेऽति सेतुं दुराय्यम्। साह्याम दस्युमव्रतम्॥
हे आनन्ददायी सोमदेव! आप हमें असुरों के बन्धन से मुक्त करें। हम अच्छे कर्मों में मन लगाकर बुरे कर्मों को करने से बचें। हम शत्रुओं का संहार करने के लिए आपकी स्तुति करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 5.1.8)
Hey gladding Som! Release us from the bondage of the demons. We should divert our attention to virtuous deeds and remain aloof from wickedness-viciousness. We worship for the destruction of the enemies.
शृण्वे वृष्टेरिव स्वनः पवमानस्य शुष्मिणः। चरन्ति विद्युतो दिवि॥
हे पवित्रता को प्राप्त हुए सोमदेव! शुद्ध होने के लिए बर्तन में प्रवाहित होते समय आपका शब्द-नाद, बारिश के दौरान होने वाले पानी की ध्वनि के सदृश प्रिय है। आपकी (सोम) रश्मियाँ अन्तरिक्ष में सभी ओर प्रसारित होती हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 5.1.9)
Hey Somras having attained purity! While flowing in the vessel your sound appears lovely like the rain showers. Your beams-rays spread in all directions.
आ पवस्व महीमिषं गोमदिन्दो हिरण्यवत्। अश्ववत्सोम वीरवत्॥
हे पवित्र सोमदेव! आप हमें घोड़े, गायें, पुत्र-पौत्र, अन्न के भण्डार तथा सुवर्ण आदि असीम धन-ऐश्वर्य प्रदान करने की कृपा करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 5.1.10)
Hey pious Som Dev! Grant us horses, cows, son-grandsons, granary-food storage, gold, extreme wealth& grandeur.
पवस्व विश्वचर्षण आ मही रोदसी पृण। उषाः सूर्यो न रश्मिभिः॥
हे जगत् को देखने वाले सोम! अरुणोदय के पश्चात् अपनी सुवर्णयुक्त किरणों से विश्व को प्रकाशित करने वाले सूर्यदेव की तरह आप अपने आनन्द प्रदान करने वाले रस से पृथ्वी तथा नभको परिपूर्ण कर दें।(सामवेद उत्तरार्चिक 5.1.11)
Hey on looker of the world, Som! The way after Sun rise, the golden rays grant pleasure to the world, you too fill the sky and earth with your gladdening sap.
परिणः शर्मयन्त्या धारया सोम विश्वतः। सरा रसेव विष्टपम्॥
हे पवित्र सोमदेव! जिस प्रकार सम्पूर्ण धरती जल की धाराओं से आच्छादित है, वैसे ही आप अपनी सुखदायी रस की धाराओं से हमें चहुं ओर से आच्छादित कर लें।(सामवेद उत्तरार्चिक 5.2.1)
Hey pious Somras! The way the water streams cover the earth, let your gladding juice-sap cover the whole earth from all sides.
सामवेद उत्तरार्चिक (5.2) ::
आशुरर्ष बृहन्मते परि प्रियेण धाम्ना। यत्रा देवा इति ब्रुवन्॥
हे ज्ञानवान् सोमदेव! आप अपनी प्रिय सरस धारा के रूप में प्रवाहित होकर अति शीघ्र प्रकट हों। जिस स्थान पर दैवशक्तियों का वास है, उस स्थान पर आप आएं, ऐसी हमारी आपसे विनती है।(सामवेद उत्तरार्चिक 5.2.1)
Hey learned-enlightened Somras! Appear flowing in tasty currents quickly. We request you to come to those places where the divine powers reside.
परिष्कृण्वन्ननिष्कृतं जनाय यातयन्निषः। वृष्टिं दिवः परि स्त्रवः॥
हे सोम! आप अपवित्र स्थान को पवित्र बनाकर, मनुष्यों का हित करने के उद्देश्य से अन्नादि के उत्पादन हेतु अन्तरिक्ष से जल-वृष्टि करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 5.2.2)
Hey Som Dev! Purify the impure places for the benefit of the humas and shower rains from the sky-space for production of food grains.
अयं स यो दिवस्परि रघुयामा पवित्र आ। सिन्धोरूर्मा व्यक्षरत्॥
अन्तरिक्ष में धीमी गति से भ्रमण करने वाला, शोधित किया जाता हुआ सोमरस, सिंधु (नदी) तालाब आदि की तरंगों को ग्रहण करता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 5.2.3)
Revolving slowly in the space, Somras subjected to purification, accept the waves of Sindhu river and ponds-reservoirs.(08.01.2026)
सामवेद उत्तरार्चिक (5.2) ::
सुत एति पवित्र आ त्विषिं दधान ओजसा। विचक्षाणो विरोचयन्॥
सभी का पालन-पोषण करने वाला, आलोकित करने वाला, अद्भुत सोम दिव्यलोक से छलनी से छनता हुआ प्रबल वेगवान् धारा के रूप में प्रकट होता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 5.2.4)
Nurturer of all, illuminating, amazing Somras appear from the divine abodes with strong current-stream passing through the sieve.
आविवासन्परावतो अथो अर्वावतः सुतः। इन्द्राय सिच्यते मधु॥
तैयार किया हुआ सोमरस, दूर तथा निकट से पवित्र करके, देवराज इन्द्र को प्रदान (अर्पित) किया जाता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 5.2.5)
Ready to drink Somras is offered to Devraj Indr irrespective of distance, whether far of near.
समीचीना अनूषत हरिं हिन्वन्त्यद्रिभिः। इन्दुमिन्द्राय पीतये॥
पत्थरों पर कूटकर तैयार किया गया, ताजा हरिताभ सोमरस, देवराज इन्द्र के सेवन करने के निमित्त चढ़ाया जाता है। ऐसा करते समय सभी याजक संकलित होकर इन्द्र की प्रार्थना करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 5.2.6)
Fresh greenish Somras, prepared by crushing with stones is offered to Devraj Indr for drinking. All Yajak Gan collectively pray-worship him
हिन्वन्ति सूरमुस्त्रयः स्वसारो जामयस्पतिम्। महामिन्दुं महीयुवः॥
सभी स्थान पर पहुँच जाने वाली, बांधवी (बहन) की भाँति प्रेम पूर्वक साथ-साथ रहने वाली अँगुलियाँ, अपने उत्कृष्ट अधिष्ठाता सोमरस को निचोड़ते हुए पवित्र करने का काम करती हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 5.2.7)
Fingers which function together in unison, reach every where, remain together like the sister, squeeze the excellent deity Somras, purifying it.
पवमान रुचारुचा देव देवेभ्यः सुतः। विश्वा वसून्या विश॥
हे पवित्र, कान्तिमय सोम! आप देवगणों को चढ़ाने के निमित्त तैयार किये गये हैं। आप हमें सभी प्रकार के धन-ऐश्वर्य प्रदान करने की कृपा करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 5.2.8)
Hey pious-pure Somras! You have been extracting for offering to the demigods-deities. Grant us all sorts of wealth-prosperity, grandeur.
आ पवमान सुष्टुतिं वृष्टिं देवेभ्यो दुवः। इषे पवस्व संयतम्॥
हे शुद्ध किये गये सोम! जैसे देवगण हमें अन्नादि प्रदान करने हेतु जल-वृष्टि करने की कृपा करते हैं, वैसे ही स्तुत्य आप अपने मधुर रस की बारिश करें और हमें सुख प्रदान करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 5.2.9)
Hey sanctified Somras! The way demigods-deities shower rains for granting us food grains, you too shower pleasing rains and grant us comfort-pleasure.
सामवेद उत्तरार्चिक (5.3) ::
जनस्य गोपा अजनिष्ट जागृविरग्निः सुदक्षः सुविताय नव्यसे।
घृतप्रतीको बृहता दिविस्पृशा द्युमद्वि भाति भरतेभ्यः शुचिः॥
जागरुकता तथा शक्ति प्रदान करने वाले, प्रजा के संरक्षक, अग्निदेव यजमानों को उन्नति के नित्य नये मार्ग बनाने हेतु उत्पन्न हुए हैं। घी की आहुतियों से अत्यधिक प्रज्वलित होकर, विशाल अन्तरिक्ष को छूने में सक्षम तेजवान्, शुद्धता देने वाले आप यजमानों हेतु (अनुदान देने के लिए) प्रदीप्त होते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 5.3.1)
Awakening, strength grantor, guardian of the populace, Agni Dev evolve to pave new paths for the progress of the Yajmans & is illuminated by the offerings of Ghee, capable of touching the space-sky, granting piousity to the Yajmans.
त्वामग्ने अङ्गिरसो गुहा हितमन्वविन्दञ्छिश्रियाणं वनेवने।
स जायसे मथ्यमानः सहो महत्त्वामाहुः सहसस्पुत्रमङ्गिरः॥
पेड़ों तथा वनस्पतियों की लकड़ियों में दिखाई न पड़ने वाले दावानल के रूप में विद्यमान हे अग्नि देव! अंगिरस ऋषियों ने गुप्त रूप में विद्यमान आपको अत्याधिक खोज करने पर प्राप्त किया। आप बलपूर्वक अरणि-मंथन के द्वारा उत्पन्न होते हैं। इसीलिए हे अंगिरस! आपको सामर्थ्य का पुत्र माना जाता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 5.3.2)
Hey Agni Dev present in the trees and vegetation as invisible Dawanal (jungle fire)! Angiras Rishi Gan made extreme efforts & traced you while in the hiding. You evolve by rubbing wood forcefully. Hence, hey Angiras! You are known as the son of Samrthy (capability)
यज्ञस्य केतुं प्रथमं पुरोहितमग्निं नरस्त्रिषधस्थे समिन्धते।
इन्द्रेण देवैः सरथं स बर्हिषि सीदन्नि होता यजथाय सुक्रतुः॥
हे अग्नि देव! यज्ञ की पताका फहराने वाले, रथ पर आसीन होने वाले, पुरोहित अग्नि देव को यजमान गृह, मन तथा यज्ञ-मण्डप तीनों स्थलों में अच्छी तरह से देदीप्यमान् करते हैं। उत्कृष्ट कार्यों में रत, यज्ञ करने की कामना रखने वाले अग्नि देव अपने स्थल पर (यज्ञवेदी में) यज्ञ करने हेतु प्रतिस्थापित होते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 5.3.3)
Hey Agni Dev! Unfurling the flag of the Yagy, riding the charoite, Purohit-Priest Agni Dev properly-thoroughly ignited in the house of the Yajman; illuminate the house, innerself, Yagy Mandap. Busy with excellent endeavours, desirous of Yagy, Agni Dev is established over the Yagy Vedi-his seat.
अयं वा मित्रावरुणा सुतः सोम ऋतावृधा। ममेदिह श्रुतं हवम्॥
यज्ञ में अर्थात् सत्कर्म में वृद्धि करने वाले हे मित्रा-वरुण देव! श्रेष्ठ विधि से तैयार तथा पवित्र किया गया यह सोमरस आपके लिए रखा गया है। आप इसे प्राप्त करने की अनुकम्पा करें, यह हमारा आपसे निवेदन है।(सामवेद उत्तरार्चिक 5.3.4)
Hey Mitr Varun Dev, increasing virtuous efforts in the Yagy! Somras prepared with excellent procedure, Somras has been kept for you. Kindly accept it.
राजानावनभिद्रुहा ध्रुवे सदस्युत्तमे। सहस्त्रस्थूण आशाते॥
परस्पर बैर-भाव न रखने वाले तेजवान् मित्रा-वरुण देव! सहस्रों स्तम्भों पर विराजमान समर्थ, उत्कृष्ट यज्ञ स्थल में आप पधारें।(सामवेद उत्तरार्चिक 5.3.5)
Aurous-radiant Mitra-Varun, without mutual enmity! Join the excellent Yagy carried out under hundreds of pillars.
ता सम्राजा घृतासुती आदित्या दानुनस्पती। सचेते अनवह्वरम्॥
आज्याहुति के रूप में मिलने वाले घी का ही जो उपभोग करते हैं, इस तरह के अदिति पुत्र ऐश्वर्यपति शासक, मित्रा-वरुण देव, छल-कपट से दूर, सहज हृदय वाले यजमानों की ही मदद करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 5.3.6)
Adity's sons soft hearted Mitra-Varun, deity of grandeur, aloof from cheating-deceiving, using the offerings of ghee, helps the Yajmans.
इन्द्रो दधीचो अस्थभिर्वृत्राण्यप्रतिष्कुतः। जघान नवतीर्नव॥
हे सम्पत्तिशाली देवराज इन्द्र! समस्त देवगण आपका आदर करते हैं। आप किसी से भी शत्रुता नहीं रखते हैं। आपने शस्त्र से, अवरोध डालने वाले निन्यानबे शत्रुओं का शमन किया।(सामवेद उत्तरार्चिक 5.3.7)
Hey wealthy Devraj Indr! All demigods deities honour-respect you. You do not have enmity with any one. You destroyed the ninety nine enemies with weapons who created obstructions.
इच्छन्नश्वस्य यच्छिरः पर्वतेष्वपश्रितम्। तद्विदच्छर्यणावति॥
हे देवराज इन्द्र! आपने आकाश में प्रतिष्ठित बादलों के भीतर विराजमान विद्युत् बल को ग्रहण किया तथा उससे शत्रुओं का हनन किया।(सामवेद उत्तरार्चिक 5.3.8)
Hey Devraj Indr! You accepted the electric power present in the clouds in the sky and destroyed the enemies with it.
अत्राह गोरमन्वत नाम त्वष्टुरपीच्यम्। इत्था चन्द्रमसो गृहे॥
हे ऋत्विजों! गतिमान् चन्द्र मण्डल में अप्रत्यक्ष रूप से आसीन सूर्य देव की तेजोमय रश्मियाँ ही रात में प्रदीप्त होती हैं अर्थात् सूर्य के प्रकाश से ही चन्द्रमा प्रकाशित होता है। उसका अपना कोई प्रकाश नहीं होता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 5.3.9)
Hey Ritviz Gan! Rays-beams of light of Sun present in the Chandr Mandal, invisibly are emitted at night. Moon has no light of his own.
Moon light constitute of the light reflected by its surface, at night.
इयं वामस्य मन्मन इन्द्राग्नी पूर्व्यस्तुतिः। अभ्राद्वृष्टिरिवाजनि॥
हे देवराज इन्द्र तथा अग्नि देव! उत्कृष्ट आदरणीय विद्वानों द्वारा आप दोनों की सर्वप्रथम की गई यह याचना, बादलों से होने वाली बारिश की तरह (सरल भाव से) प्रस्तुत हुई है।(सामवेद उत्तरार्चिक 5.3.10)
Hey Devraj Indr and Agni Dev! This prayer performed for the first time has been simply received like the clouds during rains by the honourable excellent-enlightened learned, scholars to you.
शृणुतं जरितुर्हवमिन्द्राग्नी वनतं गिरः। ईशाना पिप्यतं धियः॥
हे देवराज इन्द्र एवं अग्नि देव! आप स्तोतागण की अभ्यर्थनाओं को श्रवण करें। आप दोनों ईश्वर रूप होते हुए उन स्तोताओं के उत्कृष्ट कर्मों का श्रेष्ठ फल उन्हें प्रदान करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 5.3.11)
Hey Devraj Indr and Agni Dev! Listen-respond to the prayers of the Stota Gan. Both of you grant the excellent rewards to the Stotas like the form of God.
मा पापत्वाय नो नरेन्द्राग्नी माभिशस्तये। मा नो रीरधतं निदे॥
उन्नति के मार्ग पर अग्रसर करने वाले प्रधान स्वरूप हे देवराज इन्द्र तथा अग्नि देव! आप बुराई तथा कुटिल कृत्यों से हमारी रक्षा करें। निन्दा करने योग्य कार्यों से हमें सदैव दूर रखें।(सामवेद उत्तरार्चिक 5.3.12)
कुटिल कृत्य :: टेढ़ा, छली, चालबाज; devious act, crooked act, devious deed, cunning action, something dishonest, cynical, tricky or manipulative, wicked, nefarious act, shrewd, crafty move, Machiavellian plot or sly manoeuvre.
Hey Devraj Indr & Agni Dev as the chief paving way for progress! Protect us from reproach-wickedness, viciousness. keep off-away those from us who reproach us.(09.01.2026)
सामवेद उत्तरार्चिक (5.4) ::
पवस्व दक्षसाधनो देवेभ्यः पीतये हरे। मरुद्भ्यो वायवे मदः॥
हे पराक्रम तथा स्फूर्ति में वृद्धि करने वाले हरित वर्ण सोम! आप वायु तथा मरुद्गणों को सन्तुष्टि प्रदान करने के निमित्त कलश में शोधित हों।(सामवेद उत्तरार्चिक 5.4.1)
Hey greenish Somras, increasing valour and freshness! You should be extracted in the Kalash for satisfying-satiating Vayu Dev & Marud Gan.
सं देवैः शोभते वृषा कवियोंनावधि प्रियः। पवमानो अदाभ्यः॥
ज्ञान तथा शक्ति से परिपूर्ण, पवित्र होने के कारण सर्वप्रिय, किसी के आश्रय में न रहने वाले सोमदेव, देवगणों के बीच सुशोभित होते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 5.4.2)
Filled with learning and power, loved by all due to purity, never depending over any one, Som Dev is adorned by the demigods-deities.
पवमान धिया हितो3 ऽभि योनिं कनिक्रदत्। धर्मणा वायुमारुहः॥
अच्छी तरह सोच-समझकर प्रतिस्थापित किये गये, हे शुद्ध सोम देव! आप अपने स्वाभाविक गुण से वायुदेव के साथ मिलकर, पात्र में विराजमान हों।(सामवेद उत्तरार्चिक 5.4.3)
Established after due consideration, hey pure-pious Somras! You should be established in the Kalash, retaining your own traits on being mixed with Vayu Dev.
तवाहं सोम रारण सख्य इन्दो दिवेदिवे।
पुरूणि बभ्रो नि चरन्ति मामव परिधीं रति ताँ इहि॥
हे प्रकाशवान् सोमदेव! हम आपके सखा बनने हेतु लगातार प्रयास में लगे हुए हैं। दुष्ट-बुरा आचरण करने वाले अर्थात् हमारे विरोधी हमें कष्ट पहुँचा रहे हैं। आप हमारे उन विरोधियों का शमन कर दें।(सामवेद उत्तरार्चिक 5.4.4)
Hey illuminated-shining Som Dev! We are continuously making efforts for your friendship. Wicked people following misconduct i.e., our opponents are torturing us continuously. Please supress our opponents.
तवाहं नक्तमुत सोम ते दिवा दुहानो बभ्र ऊधनि।
घृणा तपन्तमति सूर्यं परः शकुना इव पप्तिम॥
हे महान्, चमकते हुए सोम देव! हम रात-दिन आपके निकट ही रहें। हम अन्तरिक्ष लोक में प्रकाशित होने वाले सूर्य देव एवं आपको पक्षी की तरह अपनी आँखों से विचरण करते हुए देखते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 5.4.5)
Hey great shining Som Dev! Let us remain near you throughout the day & night. We see you revolving in the space like the Sun and birds with our own eyes.
पुनानो अक्रमीदभि विश्वा मृधो विचर्षणिः। शुम्भन्ति विप्रं धीतिभिः॥
हे सोमदेव! आप पवित्र किये जाने वाले, सबकी समीक्षा करके शत्रुओं का नाश करने वाले हैं। स्तोतागण भिन्न-भिन्न वन्दनाओं से आपकी शोभा में वृद्धि करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 5.4.6)
Hey Som Dev! You are purified to destroy the enemies on being recommended by all. Stota Gan increase your glory through different prayers.
आ योनिमरुणो रुहद्गमदिन्द्रो वृषा सुतम्। ध्रुवे सदसि सीदतु॥
विधि पूर्वक तैयार किया गया, गुलाबी आभा से युक्त सोम, पात्र में प्रतिष्ठित होता है। तत्पश्चात् प्रजा में उत्कृष्ट पद पर आसीन होने वाले बलशाली देवराज इन्द्र, उस सोमरस को ग्रहण करने हेतु उसके समीप जाते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 5.4.7)
Produced following procedure, Som with pinkish aura is established in the pot. Thereafter, mighty Devraj Indr who occupy excellent seat-position, move close to it to drink it.
नू नो रयिं महामिन्दोऽस्मभ्यं सोम विश्वतः। आ पवस्व सहस्रिणम्॥
हे तुष्टि प्रदान करने वाले सोम! आप हमें अति शीघ्र, सहस्रों तरह के धन-ऐश्वर्य सब तरफ से देने की कृपा करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 5.4.8)
Hey satiating Som Dev! Grant us thousands kinds of wealth, grandeur, prosperity, quickly.
सामवेद उत्तरार्चिक (5.5) ::
पिबा सोममिन्द्र मन्दतु त्वा यं ते सुषाव हर्यश्वाद्रिः। सोतुर्बाहुभ्यां सुयतो नार्वा॥
हे अश्वपति देवराज इन्द्र! यजमानों द्वारा अपने हाथों से पत्थरों पर कूटकर निकाला गया सोमरस, आपके निमित्त अश्व-बल जैसे गुणों से परिपूर्ण तथा हर्षदायी हो। आप इस सोमरस का सेवन करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 5.5.1)
Hey deity of horses, Devraj Indr! Somras extracted by the Yajmans by crushing with stones for you should be full of pleasure and strength like the horses. You should drink this Somras.
यस्ते मदो युज्यश्चारुरस्ति येन वृत्राणि हर्यश्व हंसि। स त्वामिन्द्र प्रभूवसो ममत्तु॥
हे अश्वों के अधिपति, ऐश्वर्यवान् देवराज इन्द्र! जिस सोमरस का सेवन करने से आप में स्फूर्ति का संचार होता है और आप वृत्रासुर (असुरों) का शमन करते हैं, वह उत्कृष्ट रस आपको सुख प्रदान करे।(सामवेद उत्तरार्चिक 5.5.2)
Hey Lord of horses, grandeur possessing Devraj Indr! You destroy the demons Vratra Sur etc. by drinking the excellent, refreshing, gladdening Somras.
बोधा सु मे मघवन्वाचमेमां यां ते वसिष्ठो अर्चति प्रशस्तिम्। इमा ब्रह्म सधमादे जुषस्व॥हे सम्पत्तिशाली देवराज इन्द्र! आप स्तोताओं के स्तोत्रों को सुनें। वसिष्ठ ऋषि अपनी उत्कृष्ट वाणी से आपकी पूजा कर रहे हैं, आप उन्हें अच्छी तरह ध्यानपूर्वक श्रवण करें। यज्ञमण्डप पर इस हविष्यान्न को आप स्वीकार करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 5.5.3)
Hey wealthy Devraj Indr! Listen-respond to the Strotrs of the Stotas. Listen carefully the worship by Vashishth Rishi addressed to you, in his excellent voice. Accept the offering of food grains in the Yagy Mandap.
विश्वाः पृतना अभिभूतरं नरः सजूस्ततक्षुरिन्द्रं जजनुश्च राजसे।
क्रत्वे वरे स्थेमन्यामुरीमुतोग्रमोजिष्ठं तरसं तरस्विनम्॥
रणभूमि में अपने उग्र शक्ति के द्वारा असुरों का संहार कर, उन पर जीत हासिल करने वाले देवराज इन्द्र की सभी लोग वन्दना करते हैं। उत्कृष्ट कर्मों के द्वारा श्रेष्ठ स्थान को प्राप्त करने वाले, अत्यन्त शीघ्र सभी कार्यों को परिपूर्ण करने वाले, देवराज इन्द्र की महिमा का गान करके उनकी योग्यता में वृद्धि करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 5.5.4)
Every one worship Devraj Indr who attain victory over the demons in the war field. Attaining high position by virtue of excellent-virtuous deeds, Devraj Indr completes his projects too quickly and his ability-calibre is boosted by singing his glory.
नेमिं नमन्ति चक्षसा मेषं विप्रा अभिस्वरे।
सुदीतयो वो अद्रुहोऽपि कर्णे तरस्विनः समृक्वभिः॥
हे देवराज इन्द्र! आप महा बलवान् हैं। अपनी उत्कृष्ट वाणी से प्रार्थना करने वाले बुद्धिमान् पुरुष अत्यन्त नम्र भाव से आपको देखते ही सर्वप्रथम प्रणाम करते हैं। किसी से शत्रुता न करने वाले हे उत्तम तेजवान् ऋत्विजों! आप भी देवराज इन्द्र के कानों को प्रिय लगने वाले वेदमन्त्रों से उनकी अभ्यर्थना करो।(सामवेद उत्तरार्चिक 5.5.5)
Hey Devraj Indr! You are majestic-mighty. Down to earth-polite intelligent people salute you, as soon as they see you. Hey energetic excellent Ritviz not entering into enmity with anyone! Worship & invoke Devraj Indr with the Ved Mantrs which are pleasing to the ears.
समु रेभासो अस्वरन्निन्द्रं सोमस्य पीतये।
स्वः पतिर्यदी वृधे धृतव्रतो ह्योजसा समूतिभिः॥
हे सोमरस का सेवन करने वाले देवराज इन्द्र! आप संकल्पशील, स्वर्गलोक के अधिपति, शक्तिशाली तथा ऐश्वर्यवान् हैं। यजमानों को आप उत्कृष्ट ज्ञान प्रदान करने की कामना करते हैं। स्तोतागण आपकी पूरे विधि-विधान से आराधना करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 5.5.6)
संकल्पशील :: दृढ निश्चयी; resolute, determined, strong-willed, firm in purpose.
Hey Devraj Indr drinking Somras! You are resolute, Lord of the heavens, mighty-powerful and possessor of grandeur. You wish to grant enlightenment-supreme Gyan to the Yajmans. Stota Gan perform prayers devoted to you with due procedures-methodology.(10.01.2026)
यो राजा चर्षणीनां याता रथेभिरध्रिगुः। विश्वासां तरुता पृतनानां ज्येष्ठं यो वृत्रहा गृणे॥
हे देवराज इन्द्र! आप अपने रथ पर आसीन होकर द्रुतगति से विचरण करने वाले, शत्रुओं का संहार कर उनसे अपने उपासकों की रक्षा करने वाले, प्रजा के संरक्षक हैं। हम आपकी प्रशंसा करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 5.5.7)
Hey Devraj Indr! You ride your charoite with fast speed, destroy the enemies and protect the devotees from them and is the protector of the populace-subjects. We appreciate you.
इन्द्रं तं शुम्भ पुरुहन्मन्नवसे यस्य द्विता विधर्त्तरि।
हस्तेन वज्रः प्रति धायि दर्शतो महान्दे वो न सूर्यः॥
हे याजक! आप अपनी रक्षा हेतु देवराज इन्द्र की उपासना करो। जिनके संरक्षण में (देवत्व की) सुरक्षा तथा (दुष्टता के) नाश का दोहरा सामर्थ्य है। वह दर्शनीय देवराज इन्द्र सूर्यदेव के सदृश तेजवान् वज्र को हाथ में धारण किये रहते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 5.5.8)
Hey Yajak! Worship Devraj for your safety. He possess the dual ability of protection and destruction of the wicked. Spectacular Devraj Indr's Vajr held in the hand, posses the aura-radiance like Sury Dev.
सामवेद उत्तरार्चिक (5.6) ::
परि प्रिया दिवः कविर्वयांसि नप्त्योर्हितः। स्वानैर्याति कविक्रतुः॥
हे उत्कृष्ट बुद्धि से कर्मों का सम्पादन करने वाला, लकड़ी की वेदी पर प्रतिष्ठित, देव लोक से अत्यधिक प्रिय, लम्बी आयु प्रदान करने वाला, अद्भुत सोमरस अध्वर्युगणों (रस निचोड़ने वालों) द्वारा प्राप्त होता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 5.6.1)
Amazing Somras carrying out the endeavours with excellent intelligence, established over the wooden Vedi, dear than the heavens, guarantor of long life is obtained by the priests-squeezers.
स सूनुर्मातरा शुचिर्जातो जाते अरोचयत्। महान्मही ऋतावृधा॥
पवित्र किया जाता हुआ वह दिव्य सोम रूपी श्रेष्ठ पुत्र, यज्ञ की वृद्धि करने वाले ख्याति प्राप्त माता-पिता दिव्य लोक तथा पृथ्वी लोक की शोभा बढ़ाने वाला है।(सामवेद उत्तरार्चिक 5.6.2)
Somras under purification process as the excellent son of the heavens & earth, grants growth to Yagy increase the glory and honour of the heavens & earth.
प्रप्र क्षयाय पन्यसे जनाय जुष्टो अद्रुहः। वीत्यर्ष पनिष्टये॥
हे सोम! आपको प्रतिष्ठित करने के लिए प्रयास में लगे हुए हिंसा से रहित मित्रता पूर्वक आपकी प्रशंसा करने वाले ऋत्विजों हेतु, पोषण के रूप में प्रयुक्त किये गये आप प्रार्थना करने योग्य हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 5.6.3)
Hey Som! The Ritviz busy establishing you, free from violence, praise you as a friend. You being used as a nourishing substance; deserve worship.
त्वं ह्या 3 ङ्ग दैव्य पवमान जनिमानि द्युमत्तमः। अमृतत्वाय घोषयन्॥
हे तेजवान् स्वभाव को धारण करने वाले लोकातीत सोम देव! आप अपनी उत्पत्ति की दिव्यता के आधार पर अतिशीघ्र अमरत्व को प्राप्त करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 5.6.4)
Having the energetic nature, hey extra ordinary Som Dev! You should attain immortality quickly on the basis of your divine evolution-credentials.
येना नवग्वा दध्यङपोर्णते येन विप्रास आपिरे।
देवानां सुम्ने अमृतस्य चारुणो येन श्रवांस्याशत॥
नव्य रश्मियों वाले सूर्य देव जिस सोम से समस्त जनों को श्रेष्ठ कर्मों को करने के लिए प्रेरणा प्रदान करते हैं, ब्राह्मण जिसके सहयोग से अगाध धन-सम्पत्ति प्राप्त करते हैं, जो यजमानों को जल-वृष्टि करके अन्नादि (पोषक पदार्थ) प्रदान करते हैं, वह आनन्ददायक सोम समस्त देवगणों को ग्रहण हो।(सामवेद उत्तरार्चिक 5.6.5)
Sury Dev with newly generated rays-beams due to which Som inspire the populace to perform excellent-virtuous deeds, Brahmans obtain unlimited wealth-prosperity by virtue of whom, he who grants food grains-nutrition by showering rains, that gladdening Somras should be available to demigods-deities.
सोमः पुनान ऊर्मिणाव्यं वारं वि धावति। अग्रे वाचः पवमानः कनिक्रदत्॥
शोधित किया जाता हुआ सोमरस, सामगान के पश्चात् पवित्र होकर शब्द-नाद करते हुए कलश में प्रतिष्ठित होता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 5.6.6)
Sanctified Somras enters the Kalash with the recitation of Sam Gan making Nad-sound.
धीभिर्मृजन्ति वाजिनं वने क्रीडन्तमत्यविम्। अभि त्रिपृष्ठं मतयः समस्वरन्॥
पानी में मिलाया जाने वाला, सामर्थ्यवान् सोम याजकों द्वारा स्तोत्रों का गान करते हुए छलनी से छानकर शुद्ध किया जाता है। स्वर्ग, वनस्पति तथा पृथ्वीरूपी तीनों पात्रों में आसीन उस अलौकिक सोम की ज्ञानवान् लोग स्तुति करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 5.6.7)
Capable Somras to be mixed in water is purified through the sieve. Seated in the Heavens, vegetation and the earth as vessels, divine Somras is worshiped by the learned.
असर्जि कलशाँ अभि मीढ्वांत्सप्तिर्न वाजयुः। पुनानो वाचं जनयन्नसिष्यदत्॥
हे पुष्टि वर्द्धक सोमदेव! आप जल में संयुक्त होकर बर्तन में विद्यमान रहते हैं। परिष्कृत होते हुए आप, रणक्षेत्र में गमन करते हुए घोड़े की तरह शब्द करते हुए द्रुत गतिमान धार के साथ पात्र में प्रविष्ट होते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 5.6.8)
Hey nourishing Somras! You stay in the vessel-Kalash mixed with water. While under going purification process you make sound like the horses in the war field and enter the Kalash with accelerated current.
सोमः पवते जनिता मतीनां जनिता दिवो जनिता पृथिव्याः।
जनिताग्नेर्जनिता सूर्यस्य जनितेन्द्रस्य जनितोत विष्णोः॥
जो दिव्य सोम देव लोक, भुलोक, अग्नि देव, सूर्य देव, इन्द्र देव, विष्णु देव का जनक तथा ज्ञानेन्द्रियों को जाग्रत करने वाला है अर्थात् जिसकी उपस्थिति से ही ये सभी देवगण प्रकट होते हैं, ऐसा वह सोम पवित्र करके कलश में स्थिर किया जा रहा है।(सामवेद उत्तरार्चिक 5.6.9)
Divine Som Dev is the initiator-progenitor of heavens, earth, Agni Dev, Sury Dev, Indr Dev, Bhagwan Shri Hari Vishnu and awaken the senses. It means that just by the presence of which all demigods-deities invoke. This Somras is established in the Kalash.
ब्रह्मा देवानां पदवीः कवीनामृषिर्विप्राणां महिषो मृगाणाम्।
श्येनो गृध्राणां स्वधितिर्वनानां सोमः पवित्रमत्येति रेभन्॥
देवताओं में नेतृत्त्व की क्षमता, कवियों में शब्द प्रतिभा, ब्राह्मणों में वेदज्ञान, पशुओं में बल, पक्षियों में द्रुतगति तथा द्रोह करने वालों में नष्ट करने की क्षमता आदि विभिन्न रूपों में विद्यमान दिव्य सोम शुद्ध होते हुए शब्दनाद के साथ पात्र में प्रविष्ट हो रहे हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 5.6.10)
Divine Som with the ability of the leadership of demigods, genius of the poets, scholar like the Brahmans, strength of the animals, speed like the birds, power to destroy the revolting etc etc, enters the pot making sound-Nad.
प्रावीविपद्वाच ऊर्मिं न सिन्धुर्गिर स्तोमान्यवमानो मनीषाः।
अन्तः पश्यन्वृजनेमावराण्या तिष्ठति वृषभो गोषु जानन्॥
हे सोम! प्रवाहित जलाशयों की लहरों द्वारा उत्पन्न प्रिय ध्वनि के सदृश, शोधित होते समय आपकी ध्वनि कानों को अति प्रिय है। आप अन्तर्यामी हैं। अन्तर्दृष्टि से गुप्त क्षमताओं के ज्ञाता, आप (सोम) कभी क्षीण न होने वाली शक्ति को धारण करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 5.6.11)
Hey Somras! Your sound like the waves in the reservoirs-ponds during the purification process is dear to the ears. You ae omniscient-immanent. By virtue of your insight-intuitive power, you attain never ending divine powers.
सामवेद उत्तरार्चिक (5.7) ::
अग्नि वो वृधन्तमध्वराणां पुरूतमम्। अच्छा नप्ने सहस्वते॥
हे स्तोताओं! आप सभी विपुल शक्ति के भण्डार, बलवर्द्धक, अत्यन्त उत्तम, तेजवान् अग्नि देव के पास आएँ।(सामवेद उत्तरार्चिक 5.7.1)
Hey Stota Gan! You should approach the store house of enormous powers, booster of strength, excellent, energetic Agni Dev.
अयं यथा न आभुवत्त्वष्टा रूपेव तक्ष्या। अस्य क्रत्वा यशस्वतः॥
जिस प्रकार बढ़ई काष्ठ को रूप तथा आकृति प्रदान करता है, उसी तरह इन अग्नि देव के कर्म से हम ऐश्वर्यवान् तथा उत्तम स्वरूप प्राप्त करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 5.7.2)
The way a carpenter give shape and form to the wood, similarly Agni Dev grant us grandeur and excellent form by virtue of Karm (endeavours, efforts, deeds).
अयं विश्वा अभि श्रियोऽग्निर्देवेषु पत्यते। आ वाजैरुप नो गमत्॥
हे समस्त धन-सम्पत्तियों को देने वाले अग्नि देव! आप अन्न तथा धन सहित हमारे समक्ष प्रस्तुत हों।(सामवेद उत्तरार्चिक 5.7.3)
Hey deity-Lord of all wealth-grandeur, prosperity Agni Dev! You should invoke before us with food grains & wealth.(11.01.2026)
इममिन्द्र सुतं पिब ज्येष्ठममर्त्य मदम्। शुक्रस्य त्वाभ्यक्षरन्धारा ऋतस्य सादने॥
हे देवराज इन्द्र! यज्ञ-स्थल में हर्षदायी अलौकिक सोमरस की धाराएँ, आपके निमित्त पात्र में गिर रही हैं। आप इस कान्तिमय सोमरस का सेवन करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 5.7.4)
Hey Devraj Indr! Gladdening streams of Somras are falling into the vessel at the Yagy Sthal-site. Drink this aurous Somras.
न किष्ट्वद्रथीतरो हरी यदिन्द्र यच्छसे। न किष्ट्वानु मज्मना न किः स्वश्व आनशे॥
अश्वों के बल से चलने वाले रथ में आसीन हे देवराज इन्द्र! अन्य कोई योद्धा आपसे ज्यादा बलशाली नहीं है। आपके समान कोई दूसरा सामर्थ्यवान् अश्वों का पालनकर्ता, घोड़े का अधिपति नहीं है।(सामवेद उत्तरार्चिक 5.7.5)
Hey Devraj Indr riding the charoite pulled by the horses! No other warrior is mighty-powerful than you. None other person nurturing the horses is neither capable nor is their Lord like you.
इन्द्राय नूनमर्चतोक्थानि च ब्रवीतन। सुता अमत्सुरिन्दवो ज्येष्ठं नमस्यता सहः॥
हे याजकों! हर्षदायी, संस्कारित सोमरस चढ़ाकर भिन्न-भिन्न तरह के स्तोत्रों से स्तुति करते हुए सभी लोग श्रेष्ठ देवराज इन्द्र की उपासना करो।। शक्तिशाली देवराज इन्द्र को प्रणाम करो।(सामवेद उत्तरार्चिक 5.7.6)
Hey Yajak Gan! Offer sanctified Somras and worship Devraj Indr with different-different Strotrs. salute mighty Devraj Indr.
इन्द्र जुषस्व प्र वहा याहि शूर हरिह। पिबा सुतस्य मतिर्न मधोश्चकानश्चारुर्मदाय॥
हे घोड़ों के अधिपति पराक्रमी देवराज इन्द्र! आप हमारे यज्ञ-स्थल में उपस्थित हों तथा हमारे द्वारा चढ़ाये गये हविष्यान्नों को स्वीकार करें। हर्षदायी, उत्कृष्ट प्रिय सोमरस का यथेष्ट सेवन करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 5.7.7)
Hey Lord-deity of horses, Devraj Indr! Invoke at our Yagy Sthal and accept the food grains offered by us. Drink excellent, gladdening Somras in desired quantity.
इन्द्र जठरं नव्यं न पृणस्व मधोर्दिवो न।
अस्य सुतस्य स्वा3नर्नोप त्वा मदाः सुवाचो अस्युः॥
हे देवराज इन्द्र! जैसे उच्चाकाश में होने वाली स्तुतियों को श्रवण कर, आप सर्वोत्तम द्युलोक के सुख से लाभ प्राप्त करते हैं, वैसे ही इस माधुर्ययुक्त शुद्ध सोमरस का सेवन कर प्रसन्न हों।(सामवेद उत्तरार्चिक 5.7.8)
Hey Devraj Indr! The way you feel pleasure by listening to Stuties in high sky, has excellent comforts-pleasure in the heavens, similarly drink this sweetened Somras and become happy.
इन्द्रस्तुराषाण्मित्रो न जघान वृत्रं यतिर्न। बिभेद वलं भृगुर्न ससाहे शत्रून्मदे सोमस्य॥
हे शत्रुओं को अति शीघ्र पराजित कर उन पर जीत हासिल करने वाले देवराज इन्द्र! सूर्य की भाँति मेघ (वृत्र) को, धैर्यवान् शूरवीर की तरह वल राक्षस को तथा सोमरस के सेवन से प्राप्त सामर्थ्य से युक्त आप भृगु ऋषि की भाँति हमारे अनिष्टकारियों (शत्रुओं) को नष्ट कर दें।(सामवेद उत्तरार्चिक 5.7.9)
Hey Devraj Indr defeating the enemies quickly and attaining victory! Destroy our malefic enemies like Bhragu Rishi, Dev Vratr-Megh like Sury, demon Bal like patient brave, having attained strength by drinking Somras.
सामवेद उत्तरार्चिक (6) :: ऋषि :- काश्यपो देवलो वा, ऋषय, कश्यप, असित, त्रय, अवत्सार, जमदग्नि, अरुणो वैत-हव्य, उरुचक्रिरात्रेय, कुरुसुति, काण्व, भरद्वाजो, वार्हस्पत्य, भृगुर्वारुणिर्जमदग्नि-र्भार्गवो वा, सप्तर्षय, गौतमो राहूगण, ऊर्ध्वसद्या, कृतयश, रेभ, त्रित, सूनू काश्यप, मन्युर्वासिष्ठ, वसुश्रुत, आत्रेय, नृमेध; देवता :- पवमान, सोम, अग्नि, मित्रा-वरुण, इन्द्र, इन्द्राग्नि; छन्द :- जगती, गायत्री, बृहती, पंक्ति, काकुभ, प्रगाथ, उष्णिक्, अनुष्टुप्, त्रिष्टुप्।
सामवेद उत्तरार्चिक (6.1) ::
गोवित्पवस्व वसुविद्धिरण्यविद्रेतोधा इन्दो भुवनेष्वर्पितः।
त्वं सुवीरो असि सोम विश्ववित्तं त्वा नर उप गिरेम आसते॥
हे संस्कारित सोम! आप सुवर्ण-सम्पदा से सम्पन्न, शक्ति वर्द्धक, समस्त लोकों में विद्यमान, गौ के दूध में मिले हुए, सब कुछ जानने वाले, उत्कृष्ट मार्ग पर अग्रसर करने वाले तथा उत्तम वीर हैं। समस्त स्तोतागण आपकी अभ्यर्थना करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 6.1.1)
Hey sanctified Som! You possess excellent gold, boost strength, present in all abodes, mixed in cow's milk, aware of every thing, moves towards best path and is a brave warrior.
त्वं नृचक्षा असि सोम विश्वतः पवमान वृषभ ता वि धावसि।
स नः पवस्व वसुमद्धिरण्यवद्वयं स्याम भुवनेषु जीवसे॥
हे पराक्रम बढ़ाने वाले, पवित्र सोम! सर्वत्र विद्यमान, साक्षी रूप, आप शुद्ध होते हुए हमारे समीप प्रस्तुत हों। आपकी कृपा से हम सब वैभवशाली बनकर सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 6.1.2)
Hey pious Som, increasing valour! Present every where, like a witness, you should come to us while being purified. By virtue of your mercy, let us enjoy life comfortably.
ईशान इमा भुवनानि ईयसे युजान इन्दो हरितः सुपर्ण्यः।
तास्ते क्षरन्तु मधुमद्धृतं पयस्तव व्रते सोम तिष्ठन्तु कृष्टयः॥
हे तेजवान् सूर्य की भाँति सोम! आप हरे रंग के द्रुतगामी अश्वों (रश्मियों) से समस्त लोकों में विद्यमान, विश्व के अधिपति हैं। मधुर स्निग्ध जलधाराओं में आपका रस स्थिर रहे। हे अलौकिक सोम! आपके द्वारा प्रेरित होकर ऋत्विग्गण अच्छे कार्यों को करने में लगे रहें।(सामवेद उत्तरार्चिक 6.1.3)
Hey Som like the radiant Sun! You are the Lord of fast moving horses (beams-rays of light), present in all abodes and is the Lord of the universe. Let your juice-sap remain static by the sweetened of streams of water. Hey divine Som! Inspired by you the Ritviz Gan remain busy with pious-virtuous deeds.
पवमानस्य विश्ववित्प्र ते सर्गा असृक्षत। सूर्यस्येव न रश्मयः॥
हे सर्वज्ञाता दिव्य सोम! संस्कारित होती हुई आपकी धाराएँ सूर्य की किरणों की तरह द्रुत गति से पात्र में प्रवाहित हो रही हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 6.1.4)
Hey divine Som aware of every thing! Your currents-streams are flowing with fast speed like the rays of Sun light into the pot, while being sanctified.
केतुं कृण्वन्दिवस्परि विश्वा रूपाभ्यर्षसि। समुद्रः सोम पिन्वसे॥
हे सर्वत्र फैलने वाले सोम! आकाश में सूर्य की किरणों के रूप में विद्यमान आप जल के माध्यम से हमें विभिन्न तरह के ऐश्वर्य प्रदान करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 6.1.5)
Hey Som spreading every where! Like the rays of Sun light in the sky-space, you grant us grandeur of different types through the water.
जज्ञानो वाचमिष्यसि पवमान विधर्मणि। क्रन्दन्देवो न सूर्यः॥
सूर्य की किरणों के समान प्रदीप्त होने वाले हे सोम! स्तोत्र-गान के सहित शुद्ध होते हुए आप शब्द करते हुए कलश में प्रतिष्ठित हो रहे हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 6.1.6)
Shining like the rays of Sun light, hey Som! While being sanctified with the recitation of the Strotr, you are entering the vessel-Kalash.(12.01.2026)
प्र सोमासो अधन्विषुः पवमानास इन्दवः। श्रीणाना अप्सु वृञ्जते॥
दूध आदि पोषण प्रदान करने वाले पदार्थों से सम्पन्न, शीतल सोमरस संस्कारित होते समय, जल में संयुक्त होकर नीचे स्थित कलश में संगृहीत हो रहा है।(सामवेद उत्तरार्चिक 6.1.7)
Cold Somras mixed with nourishing substances like milk, sanctified, mixed in water, is collected in the vessel-Kalash.
अभि गावो अधन्विषुरापो न प्रवता यतीः। पुनाना इन्द्रमाशत॥
पवित्र होने वाला यह सोमरस नीचे के पात्र में प्रवाहित होकर एकत्रित हो रहा है। इन्द्र देव इस संस्कारित सोमरस का सेवन करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 6.1.8)
Somras subjected to purification, is being collected in the pot. Devraj Indr drink this sanctified Somras.
प्र पवमान धन्वसि सोमेन्द्राय मादनः। नृभिर्यतो वि नीयसे॥
हे सोमदेव! आप देवराज इन्द्र के उत्साह को बढ़ाने वाले हैं। शोधित होने की प्रक्रिया पूर्ण होने के पश्चात् आप यजमानों के माध्यम से यज्ञस्थल पर ले जाए जाते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 6.1.9)
Hey Somras! You encourage Devraj Indr. On being purified you are taken to the Yagy Sthal-site by the Yajmans.
इन्दो यदद्रिभिः सुतः पवित्रं परिदीयसे। अरमिन्द्रस्य धाम्ने॥
हे सोम! पाषाड़ों से कूटकर निकालने के पश्चात् आपको शोधन यन्त्र के माध्यम से पवित्र किया जाता है, तत्पश्चात् आप देवराज इन्द्र के पान करने योग्य बन जाते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 6.1.10)
Hey Somras! You are crushed with stones and passed through the purification plant. Thereafter, it become fit for drinking by Devraj Indr.
त्वं सोम नृमादनः पवस्व चर्षणीधृतिः। सस्निर्यो अनुमाद्यः॥
हे शुद्ध सोम! आप गुणगान करने योग्य हैं। मनुष्य मात्र के हर्ष में वृद्धि करने वाले, यजमानों के द्वारा धारण किये गये, आप पवित्र हों।(सामवेद उत्तरार्चिक 6.1.11)
Hey purified Somras! You deserve appreciation. You increase pleasure of the humans, held by the Yajmans and is pious-pure.
पवस्व वृत्रहन्तम उक्थेभिरनुमाद्यः। शुचिः पावको अद्भुतः॥
हे दिव्य सोमदेव! आप विचित्र तरीके से शत्रुओं का संहार करने वाले, उत्कृष्ट वेदमन्त्रों द्वारा स्तुत्य हैं। आप शुद्धता तथा पवित्रता को प्राप्त करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 6.1.12)
Hey divine Som Dev! You destroy the enemies by amazing means and worshiped with excellent Mantrs. You should attain purity and piousity.
शुचिः पावक उच्यते सोमः सुतः स मधुमान्। देवावीरघशंसहा॥
विधिवत् ढंग से तैयार किया गया, शुद्ध तथा माधुर्ययुक्त सोमरस, देवों को हर्ष प्रदान करने वाला तथा दुराचारियों को नष्ट करने वाला बताया गया है।(सामवेद उत्तरार्चिक 6.1.13)
Prepared following procedures, pure, sweetened Somras grant pleasure to demigods-deities and destroy the devilish-debouchee.
सामवेद उत्तरार्चिक (6.2) ::
प्र कविर्देववीतयेऽव्या वारेभिरव्यत। साह्वान्विश्वा अभि स्पृधः॥
ज्ञान को बढ़ाने वाला यह दिव्य सोम देवों को समर्पित करने हेतु शोधित किया जाता है। विकृतियों का नाश करने वाला यह सोम समस्त शत्रुओं को पराभूत करता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 6.2.1)
Divine Somras which boost knowledge, to be offered to demigods-deities, is sanctified. Destroyer of the deformities, Som defeats all enemies.
स हि ष्मा जरितृभ्य आ वाजं गोमन्तमिन्वति। पवमानः सहस्रिणम्॥
शुद्ध होने वाला यह विलक्षण सोम, प्रार्थना करने वाले यजमानों को धन-धान्य प्रदान कर सब तरह से तृप्त करता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 6.2.2)
Subjected to purification, this Somras is amazing, grants wealth, food grains to the Yajmans and satisfies them.
परि विश्वानि चेतसा मृज्यसे पवसे मती। स नः सोम श्रवो विदः॥
हे पवित्रता को प्राप्त किये हुए स्तुत्य सोम! आप हमें बुद्धि पूर्वक अन्न-धन से सम्पन्न करने की कृपा करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 6.2.3)
Hey worshipable Somras having attained purity! Grant us ability to earn food grains and wealth by virtue of intelligence.
अभ्यर्ष बृहद्यशो मघवद्ध्यो ध्रुवं रयिम्। इषं स्तोतृभ्य आ भर॥
हे विलक्षण एवं पवित्र सोम! याचना करने वाले ऐश्वर्यशाली याजकों हेतु भी आप अपार वैभव, बना रहने वाला धन तथा अन्न के भंडार प्रदान करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 6.2.4)
Hey amazing and pure Somras! Grant unlimited grandeur, imperishable wealth and food grain stocks to the rich-prosperous Yajak Gan.
त्वं राजेव सुव्रतो गिरः सोमा विवेशिथ। पुनानो वह्ने अद्भुत॥
राजा के सदृश व्रत धारण करने वाले, सत्कर्म में लगे रहने वाले, सद्भावना से युक्त हे विलक्षण सोम! यजमानों द्वारा हो रही उत्कृष्ट प्रार्थनाओं को आप ग्रहण करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 6.2.5)
Hey amazing Somras, following resolves-vows like the king, busy with virtuous deeds and possessing sympathy! Accept the prayers of the Yajmans.
स वह्निरप्सु दुष्टरो मृज्यमानो गभस्त्योः। सोमश्चमूषु सीदति॥
यज्ञ-सम्पन्न कर्त्ता, अँगुलियों के माध्यम से परिष्कृत किया जाता हुआ, जल में संयुक्त सोम, कलश में प्रविष्ट होता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 6.2.6)
Accomplisher of the Yagy, squeezed-purified with fingers, mixed with water, Somras is collected in the vessel-Kalash.
क्रीडुर्मखो न मंहयुः पवित्रं सोम गच्छसि। दधत्स्तोत्रे सुवीर्यम्॥
यज्ञ की तरह लगातार दूसरों का कल्याण करने में लगे हुए, क्रीड़ा करने वाले हे सोम! आप ऋत्विजों को शूरवीर बनाते हुए पवित्रता को धारण करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 6.2.7)
Busy with the welfare of others, like the Yagy, playful, hey Somras! You make the Ritviz brave adopting piousity.
यवंयवं नो अन्धसा पुष्टंपुष्टं परि स्त्रव। विश्वा च सोम सौभगा॥
हे सोमदेव! आप अपने अद्भुत पोषण से युक्त रस को, अन्न तथा वनस्पतियों के साथ हमें प्राप्त कराते रहें। हमें समस्त धन-ऐश्वर्य प्रदान करने की कृपा करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 6.2.8)
Hey Somras! You make availble the amazing nourishing juice-sap along with vegetation and food grains. Grant us all sorts of grandeur prosperity.
इन्दो यथा तव स्तवो यथा ते जातमन्धसः। नि बर्हिषि प्रिये सदः॥
देवगणों के प्रिय ग्रहण करने योग्य, हे सोम! जिस भावना के साथ स्तोतागण आपकी वन्दना करते हैं, उसी सद्भावना के साथ आप यज्ञमण्डप में उत्तम आसन पर बैठने की अनुकम्पा करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 6.2.9)
Hey Somras dear to the deities-demigods for adoption! The feeling-sentiments with which the Stota Gan worship you, you too should respond with the same attitude occupying the best cushion in the Yagy Mandap.
उत नो गोविदश्ववित्पवस्व सोमान्धसा। मक्षुतमेभिरहभिः॥
हे सोमदेव! आप हमें गौ, अश्व, अन्नादि के रूप में अगाध ऐश्वर्य त्वरित प्रदान करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 6.2.10)
Hey Som Dev! Grant us unlimited grandeur in the form of cows, horses, food grains etc speedily.
यो जिनाति न जीयते हन्ति शत्रुमभीत्य। स पवस्व सहस्त्रजित्॥
शत्रुओं पर विजय पाने वाले हे सोम! अपने आघात से राक्षसों का संहार करके आप उन पर विजय प्राप्त करते हैं। कभी परास्त न होने वाले आप शुद्ध हों।(सामवेद उत्तरार्चिक 6.2.11)
Hey Somras attaining victory over the enemies! You strike the demons and get victory over them. Never defeated, you should be purified-sanctified.
यास्ते धारा मधुश्चतोऽसृग्रमिन्द ऊतये। ताभिः पवित्रमासदः॥
हे सोमदेव! आपकी मधुर जलयुक्त धाराएँ सबको संरक्षण प्रदान करने वाली हैं। आप उन पवित्र धाराओं के साथ शुद्ध होकर पात्र में प्रविष्ट हों।(सामवेद उत्तरार्चिक 6.2.12)
Hey Somras! Your streams-currents grant asylum. You should enter the pious currents on being purifies and enter the vessel.
सो अर्षेन्द्राय पीतये तिरो वाराण्यव्यया। सीदन्नृतस्य योनिमा॥
शोधन यन्त्र के माध्यम से शुद्ध किये जाने वाले हे सोम! यज्ञशाला में प्रतिस्थापित होकर, आप देवराज इन्द्र को संतुष्टि प्रदान करने हेतु तैयार हों।(सामवेद उत्तरार्चिक 6.2.13)
Hey Somras being purified through the purification plant! Established in the Yagy Shala, you are prepared to grant satisfaction to Devraj Indr.
त्वं सोम परि स्त्रव स्वादिष्ठो अङ्गिरोभ्यः। वरिवोविद्युतं पयः॥
हे सोमदेव! आप अपार धन-ऐश्वर्य देने वाले हैं। आप अंगिर आदि ऋषियों हेतु घी-दूध से सम्पन्न पुष्टिवर्द्धक आहार प्रदान करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 6.2.14)
Hey Somras! You grant extreme grandeur and wealth. Grant nourishing food to Angira & other Rishis, fortified-enriched with Ghee and milk.(13.01.2026)
सामवेद उत्तरार्चिक (6.3) ::
तव श्रियो वर्ण्यस्येव विद्युतोऽग्नेश्चिकित्र उषसामिवेतयः।
यदोषधीरभिसृष्टो वनानि च परि स्वयं चिनुषे अन्नमासनि॥
हे अग्नि देव! जब आप मुँह में डाले गये आहार के रूप में औषधियों, पेड़-पौधों को प्रज्वलित करते हैं, तब आपकी विभूतियाँ वर्षाकाल तथा उषाकाल के आलोक के सदृश लगती हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 6.3.1)
Hey Agni Dev! You ignite the medicines-herbs, trees, shrubs like the food put into the mouth. Your greatness become comparable to the aura during the rainy season and Usha Kal-dawn.
वातोपजूत इषितो वशाँ अनु तृषु यदन्ना वेविषद्वितिष्ठसे।
आ ते यतन्ते रथ्यो 3 यथा पृथक् शर्धास्यग्ने अजरस्य धक्षतः॥
हे अग्ने! हवा के द्वारा हिलते हुए आप अपने प्रिय अन्न स्वरूप वनस्पतियों की ओर आकर्षित होकर जब उसे ज्वालाओं द्वारा चहुंओर से आच्छादित कर लेते हैं, उस समय आपका तीक्ष्ण तेज सब कुछ जला देने की लालसा से, सारी दिशाओं में उसी तरह जाता है, जिस प्रकार कोई रथ पर आसीन योद्धा हो।(सामवेद उत्तरार्चिक 6.3.2)
Hey Agne! You move with air attracting your dear food in the form of vegetation, covering it with flames from all sides, with the desire of burning everything and move in all direction like the warrior occupying the charoite.
मेधाकारं विदथस्य प्रसाधनमग्निं होतारं परिभूतरं मतिम्।
त्वामर्भस्य हविषः समानमित्त्वां महो वृणते नान्यं त्वत्॥
हे अग्नि देव! आप विवेक में वृद्धि करने वाले, शत्रुओं का संहार करने वाले, यज्ञ तथा देवों के साधक हैं। हम आपकी याचना करते हैं। हे अग्ने! अल्प या अधिक हविष्यान्न ग्रहण करने हेतु हम आपको संयुक्त स्वर में आहूत करते हैं। हम आपके अलावा किसी दूसरे को आहूत नहीं करते।(सामवेद उत्तरार्चिक 6.3.3)
Hey Agni Dev! You increase prudence, destroy enemies and a means for he Yagy and demigods. We worship you. Hey Agne! We together convene-summon you for accepting the offerings. We do not invoke any one else other than you.
पुरूरुणा चिद्ध्यस्त्यवो नूनं वां वरुण। मित्र वंसि वां सुमतिम्॥
हे सूर्य तथा वरुण देव! आप दोनों के समीप पर्याप्त मात्रा में प्रयोग किये जाने वाले साधन उपलब्ध हैं। आप अपनी उत्कृष्ट बुद्धि हमें प्रदान करने की कृपा करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 6.3.4)
Hey Sury and Varun Dev! Suitable means are available near you, in sufficient quantity. Grant us excellent intelligence.
ता वां सम्यगद्रुह्वाणेषमश्याम धाम च। वयं वां मित्रा स्याम॥
हे मित्र एवं वरुण देव! शत्रुता न करने वाले आप दोनों की हम अच्छी तरह स्तुति करते हैं। हम आपकी मित्रता से लाभान्वित हों तथा हमें धन-धान्य की प्राप्ति हो।(सामवेद उत्तरार्चिक 6.3.5)
Hey Mitr & Varun Dev! We properly worship you both. You do not enter into enmity with any one. Let us be blessed with your friendship and have wealth & food grains.
पातं नो मित्रा पायुभिरुत त्रायेथां सुत्रात्रा। साह्याम दस्यून् तनूभिः॥
हे सूर्य तथा वरुण देवता! आप उत्कृष्ट रक्षक के रूप में अपने सभी साधनों से हमारी सुरक्षा तथा पालन करे। उस योग्यता के द्वारा हम भी शत्रुओं को परास्त करने में सफल हों।(सामवेद उत्तरार्चिक 6.3.6)
उत्तिष्ठन्नोजसा सह पीत्वा शिप्रे अवेपयः। सोममिन्द्र चमू सुतम्॥
हे देवराज इन्द्र! कलश में विद्यमान सोमरस का सेवन करें एवं तेजस्वी होकर उठें तथा चिबुक को हिलाएँ अर्थात् अपनी वीरता दिखाने हेतु तैयार हो जाएँ।(सामवेद उत्तरार्चिक 6.3.7)
Hey Devraj Indr! Drink the Somras present in the Kalash, become energetic, get up, move chin and become ready to demonstrate valour.
अनु त्वा रोदसी उभे स्पर्धमानमद देताम्। इन्द्र यद्दस्युहाभवः॥
शत्रुओं के प्रति स्पर्धावान् हे देवराज इन्द्र! जब आप शत्रुओं का विनाश करते हैं तो आपके द्वारा किये गये इस कार्य से स्वर्गलोक तथा भूलोक दोनों ही सुख का अनुभव करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 6.3.8)
Hey Devraj Indr entering into competition with the enemies. When you destroy the enemies, both heavens and earth feel pleasure, comfortable.
वाचमष्टापदीमहं नवस्त्रक्तिमृतावृधम्। इन्द्रात्परितन्वं ममे॥
हे देवराज इन्द्र! हम आपके लिए सत्य को बढ़ाने वाली, नव्य कल्पनाओं से युक्त, आठ पदों वाली, स्तुति को प्रस्तुत करते हैं। आप उसे स्वीकार करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 6.3.9)
Hey Devraj Indr! We conduct Stuti-prayer, which increase truth, possess new imagination (thoughts-ideas), having eight steps-Pad. Please accept it.
इन्द्राग्नी युवामिमे 3 ऽभि स्तोमा अनूषत। पिबतं शम्भुवा सुतम्॥
हे आनन्द दायक देवराज इन्द्र तथा अग्ने! हम ऋत्विग्गण आप दोनों की स्तुति करते हैं। आप दोनों सोमरस का सेवन करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 6.3.10)
Hey pleasure-comfort granting Devraj Indr & Agni Dev! We Ritviz, worship you both. Both of you drink Somras.
या वां सन्ति पुरुस्पृहो नियुतो दाशुषे नरा। इन्द्राग्नी ताभिरा गतम्॥
हे विश्व के स्वामी देवराज इन्द्र तथा अग्ने! यजमानों द्वारा गुणगान किये जाते हुए, आप दोनों उनसे प्रदान किए गए हविष्यान्न हेतु, यज्ञ वेदी में अपने तीव्र गतिमान वाहनों (घोड़ों) के सहयोग से आगमन करें तथा दानी प्रवृत्ति वालों की मदद करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 6.3.11)
Hey lord of the universe, Devraj Indr & Agni Dev! While praised by the Yajmans, both of you move to the Yagy Vedi at high speed, riding charoite-horses for accepting the offerings of food grains and help those who intend to donate.
ताभिरा गच्छतं नरोपेदं सवनं सुतम्। इन्द्राग्नी सोमपीतये॥
हे जगत्द्रष्टा देवराज इन्द्र तथा अग्ने! विधिपूर्वक संस्कारित किए गए उस सोमरस का सेवन करने हेतु, आप अपने अश्वों सहित इस सोमरस के निकट उपस्थित हों।(सामवेद उत्तरार्चिक 6.3.12)
Hey viewer of the world Devraj Indr & Agni Dev! Come near the procedurally sanctified Somras, for drinking it; with your horses.
सामवेद उत्तरार्चिक (6.4) ::
अर्षा सोम द्युमत्तमोऽभि द्रोणानि रोरुवत्। सीदन्योनौ वनेष्वा॥
हे अत्यन्त तेजस्वी सोमदेव! शुद्ध हुए आप, जल के साथ संयुक्त होकर आवाज करते हुए काष्ठ-पात्र में प्रतिष्ठित हों।(सामवेद उत्तरार्चिक 6.4.1)
Hey extremely energetic-majestic Somras! You on being purified, mixed in water, making sound establish in the wooden vessel.
अप्सा इन्द्राय वायवे वरुणाय मरुद्भ्यः। सोमा अर्षन्तु विष्णवे॥
हे पवित्र सोमदेव! आप जल के साथ मिलकर इन्द्र, वायु, वरुण, मरुद्गणों तथा विष्णु देवताओं को संतुष्टि प्रदान करने हेतु पात्र में विद्यमान हों।(सामवेद उत्तरार्चिक 6.4.2)
Hey pious Somras! You mix with water to grant satisfaction to Devraj Indr, Varun Dev, Marud Gan, Bhagwan Shri Hari Vishnu and demigods, stay in the pot.
इषं तोकाय नो दधदस्मभ्यं सोम विश्वतः। आ पवस्व सहस्रिणम्॥
हे विलक्षण तथा पवित्र सोम! आप हमारी संतानों हेतु हजारों तरह के आहार, धनादि ऐश्वर्य सब तरफ से देने की कृपा करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 6.4.3)
Hey amazing and pious Som Dev! Grant thousands of kinds of foods, wealth, grandeur, prosperity to our progeny, mercifully.
सोम उ ष्वाणः सोतृभिरधि ष्णुभिरवीनाम्।
अश्वयेव हरिता याति धारया मन्द्रया याति धारया॥
स्तोताओं द्वारा अभिषुत किया गया, हर्ष बढ़ाने वाला, हरितवर्ण सोमरस, घोड़े के सदृश द्रुत गति से शोधन यन्त्र के द्वारा छनते हुए पात्र में प्रतिष्ठित होता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 6.4.4)
Sanctified by the Stotas, pleasure increasing, greenish Somras, purified with fast speed like the horse, filtered through the machine, establish in the pot-Kalash.(14.01.2026)
अनूपे गोमान् गोभिरक्षाः सोमो दुग्धाभिरक्षाः।
समुद्रं न संवरणान्यग्मन्मन्दी मदाय तोशते॥
देदीप्यमान्, गाय के दूध में मिला हुआ, हर्ष प्राप्त करने के निमित्त तैयार किया जाने वाला, हर्ष बढ़ाने वाला यह सोमरस, अपने पौष्टिक तत्त्वों सहित बर्तन में वैसे ही प्रविष्ट हो रहा है, जिस तरह नदियाँ शरण देने वाले सागर के समक्ष पहुँचती तथा स्थित होती हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 6.4.5)
Radiant Somras mixed in cow's milk, prepared for giving pleasure, gladdening, enter with its ingredients into the vessel, like the river which goes to the oceans for asylum.
यत्सोम चित्रमुक्थ्यं दिव्यं पार्थिवं वसु। तन्नः पुनान आ भर॥
हे विलक्षण, शुद्ध किये जाने वाले सोम! इस धरती पर जितने प्रकार के प्रशंसा करने योग्य वैभव है, वह सब आप हमें देने की कृपा करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 6.4.6)
Hey unique-amazing, purified Somras! We should attain all sorts of grandeur worth praising over the earth by virtue of your mercy-blessings.
वृषा पुनान आयूंषि स्तनयन्नधि बर्हिषि। हरिः सन्योनिमासदः॥
हे हरे एवं भूरे रंग के सोम! आप ऋत्विजों के जीवन को शुद्ध करने वाले हैं। आप ध्वनि करते हुए अपने आसन (कलश) पर विद्यमान हों।(सामवेद उत्तरार्चिक 6.4.7)
Hey brownish & greenish Som! You sanctify the Ritviz. You should occupy your seat-cushion while making sound.
युवं हि स्थः स्वःपती इन्द्रश्च सोम गोपती। ईशाना पिप्यतं धियः॥
हे सोम तथा इन्द्र देवताओं! आप दोनों गायों के अधिपति, वैभववान् हैं। आप अवश्य ही इस सृष्टि की रक्षा करने वाले हैं। आप हम सभी लोगों की मति को उत्कृष्ट मार्ग की ओर प्रेरित करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 6.4.8)
Hey Som, Devraj Indr! Both of you are the Lord-deities of the cows and posses grandeur. You are the protectors of this universe. Inspire our minds to virtuous path.
सामवेद उत्तरार्चिक (6.5) ::
इन्द्रो मदाय वावृधे शवसे वृत्रहा नृभिः।
तमिन्महत्स्वाजिषूतिमर्भे हवामहे स वाजेषु प्र नोऽविषत्॥
हे इन्द्र! आप बलवान् तथा असुरों का संहार करने वाले हैं। हम हर्ष तथा बल की अभिलाषा से आपकी याचना करते हैं। आप हमारे छोटे या बड़े संग्रामों में हमें सुरक्षा प्रदान करें इसके लिए हम आपको पुकारते हैं। आप हमारी रणभूमि में रक्षा करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 6.5.1)
Hey Devraj Indr! You destroy the mighty demons. We pray to you for pleasure and strength. We call you for protection in small & large battles for protection. Protect us in the war field.
असि हि वीर सेन्योऽसि भूरि पराददिः।
असि दभ्रस्य चिद्वृधो यजमानाय शिक्षसि सुन्वते भूरि ते वसु॥
हे पराक्रमी देवराज इन्द्र! आप शत्रुओं का पूर्णतया नाश तथा उनके ऐश्वर्य को समाप्त करने वाले हैं। आप परम् वैभवशाली हैं। आप अपने भक्तों को ऐश्वर्य प्रदान करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 6.5.2)
Hey mighty-majestic Devraj Indr! You completely destroy the enemies and their grandeur. You possess ultimate grandeur. Grant grandeur to your devotees.
यदुदीरत आजयो घृष्णवे धीयते धनम्।
युद्ध्वा मदच्युता हरी कं हनः कं वसौ दधोऽस्माँ इंद्र वसौ दधः॥
संग्राम के समय जो योद्धा विजय प्राप्त करता है, उसे बहुत सारे ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। बलशाली तथा वेगवान् घोड़ों से जुड़े रथ वाले हे देवराज इन्द्र! युद्ध में किसे नष्ट करना है तथा किसे नष्ट नहीं करना है? इसका विचार करते हुए हमको (यजमानों को) आप अपार ऐश्वर्य प्रदान करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 6.5.3)
The warrior who attain victory during war gets lots of grandeur. Hey Devraj Indr master of the charoite deploying powerful fast moving horses! Decide whom to kill and whom to spare in the war? Keeping this in mind grant us unlimited grandeur.
स्वादोरित्था विषूवतो मधोः पिबन्ति गौर्यः।
या इन्द्रेण सयावरीर्वृष्णा मदन्ति शोभथा वस्वीरनु स्वराज्यम्॥
अतिशय स्वादु तथा माधुर्ययुक्त सोमरस का सेवन करती हुई चमकती हुई रश्मियाँ, देवराज इन्द्र (सूर्य) के निकट शोभित होती हैं। पराक्रमी देवराज इन्द्र के समीप सुखपूर्वक वास करने वाली रश्मियाँ अपने राज्य में ही वास करती हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 6.5.4)
Beams of light are glorified near Indr (Sury Dev) enjoying the very tasty and sweetened Somras. The rays of light reside in their abode near majestic-mighty Devraj Indr comfortably.
ता अस्य पृशनायुवः सोमं श्रीणन्ति पृश्नयः।
प्रिया इन्द्रस्य धेनवो वज्रं हिन्वन्ति सायकं वस्वीरनु स्वराज्यम्॥
देवराज इन्द्र के संग वाली गौएँ इन्द्र देव के पान करने वाले सोमरस में अपना दुग्ध मिश्रित करती हैं। जिससे देवराज इन्द्र पराक्रम से युक्त हो जाते हैं तथा वज्र को पोषण प्रदान करती हुई वे अपने ही राज्य में निवास करती हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 6.5.5)
Cow's in the company of Devraj Indr add their milk in the Somras for his consumption. It leads to addition of valour to Devraj Indr's might. They grant nourishment to the Vajr and reside in their abode.
ता अस्य नमसा सहःसपर्यन्ति प्रचेतसः।
व्रतान्यस्य सश्चिरे पुरूणि पूर्वचित्तये वस्वीरनु स्वराज्यम्॥
हे देवराज इन्द्र! ज्ञान से युक्त सूर्य-किरणें आपको नमस्कार करती हैं। पूर्व में हो चुके को समझने वाली ये किरणें, देवराज इन्द्र को उनके द्वारा पूर्व में किये गये कार्यों की याद दिलाती हैं तथा स्वराज्य में ही विद्यमान रहती हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 6.5.6)
Hey Devraj Indr! Rays of light accompanied with knowledge salute you. These rays which understand the past events remind Devraj Indr of his endeavours and stay in their abode.
सामवेद उत्तरार्चिक (6.6) ::
असाव्यंशुर्मदायाप्सु दक्षो गिरिष्ठाः। श्येनो न योनिमासदत्॥
पर्वत की चोटियों पर प्राप्त होने वाला, हर्ष बढ़ाने वाला सोमरस, जल में संयुक्त होता है तथा बाज पक्षी के सदृश वेग से बर्तन में प्रवाहित होता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 6.6.1)
Gladdening Somras available over the mountain cliffs, mix with water and flow like falcon into the vessel.
शुभ्रमन्यो देववातमप्सु धौतं नृभिः सुतम्। स्वदन्ति गावः पयोभिः॥
स्तोताओं के द्वारा निचोड़े गये, देवताओं के उत्कृष्ट आहार, जल में मिले हुए, पावन सोमरस को गायें अपना दूध मिश्रित करके और अधिक सुस्वादु कर रही हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 6.6.2)
The cows are making the pious Somras squeezed by the Stotas, by mixing their milk in it; even more tasty.
आदीमश्वं न हेतारमशूशुभन्नमृताय। मधो रसं सधमादे॥
परिष्कृत किये जाने के पश्चात् घोड़े के सदृश द्रुत गतिशील तथा फुर्तीले इस सोमरस को स्तोतागण अमरता प्राप्त करने की अभिलाषा से यज्ञ करने के स्थान पर प्रतिस्थापित करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 6.6.3)
फुर्तीला :: तेज, चालाक, चपल, स्फ़ुर्तीकारक; agile, brisk.
The Stota Gan establish the agile, fast moving, dynamic Somras after purification like the horse with the desire of immortality at the Yagy site.
अभि द्युम्नं बृहद्यश इषस्पते दिदीहि देव देवयुम्। वि कोशं मध्यमं युव॥
हे वनस्पतियों के अधिपति सोम! जिस महान् वैभव की लालसा देवतागण करते हैं, आप वह वैभव हमें प्रदान करें। आप यज्ञ-स्थल में प्रमुख स्थान पर प्रतिष्ठित हों।(सामवेद उत्तरार्चिक 6.6.4)
Hey Lord of vegetation (trees, plants, shrubs etc.) Som Dev! Grant us the great grandeur which is desired by the demigods-deities. You should be established at an major-important place in the Yagy.
आ वच्यस्व सुदक्ष चम्वोः सुतो विशां वह्निर्न विश्पतिः।
वृष्टिं दिवः पवस्व रीतिमपो जिन्वन् गविष्टये धियः॥
हे नरेश के समान प्रजा के पालनकर्ता, ज्ञानवान् सोम! आप यजमानों की बुद्धियों को श्रेष्ठ पथ पर जाने हेतु प्रेरणा प्रदान करें। देवलोक से होने वाली जल-वृष्टि के समान नीचे रखे हुए पात्र में विराजमान होने की अनुकम्पा करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 6.6.5)
अनुकंपा :: दया, हमदर्दी; compassion, sympathy, mercy, pity, kindness.
Hey enlightened Somras, nurturing subjects, like the king! Inspire the minds of the Yajmans towards best-virtuous path. Sympathetically, deposit in the vessel kept below, like the rain fall in heavens.(15.01.2026)
प्राणाः शिशुर्महीनां हिन्वन्नृतस्य दीधितिम्। विश्वा परि प्रिया भुवदध द्विता॥
जल से जन्म लेने वाले हे अलौकिक सोम! आप यज्ञ को ज्योतिर्मय करने वाले हैं। आप अपने जीवनदायक रस को प्रेरित करें। सभी लोगों की प्रिय हवियों को अंगीकार करते हुए पृथ्वी तथा देवलोक को परिव्याप्त करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 6.6.6)
Hey divine Som, born in water! You illuminate the Yagy. Inspire your life granting juice-sap. Accept the offerings of all people and pervade the heavens & earth.
उप त्रितस्य पाष्यो 3 रभक्त यद्गुहा पदम्। यज्ञस्य सप्त धामभिरध प्रियम्॥
हे सोम! आप त्रित ऋषि की गुफा में चट्टान के सदृश कठोर दो फलकों के बीच से प्राप्त होते हैं। याजकगण गायत्री आदि सात छन्दों से आपकी वन्दना करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 6.6.7)
Hey Som! You are obtained from the cave of Trit Rishi in two panels. Yajak Gan worship you with the 7 Chhands of Gayatri.
त्रीणि त्रितस्य धारया पृष्ठेष्वैरयद्रयिम्। मिमीते अस्य योजना वि सुक्रतुः॥
तीनों भवनों, तीनों कालों में संव्याप्त हे अद्भुत सोम! आप अपनी मधुर रस की धारा से देवराज इन्द्र को प्रेरित करें। उत्कृष्ट ऋत्विज उन देवराज इन्द्र की श्रेष्ठ स्तोत्रों से अभ्यर्थना करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 6.6.8)
Hey Som, pervading the three abodes and three segments of time! Inspire Devraj Indr with your sweet stream. Excellent Ritviz worship Devraj Indr with the best Strotrs.
पवस्व वाजसातये पवित्रे धारया सुतः। इन्द्राय सोम विष्णवे देवेभ्यो मधुमत्तरः॥
हे मधुर रस से युक्त सोम! आप अपनी पुष्टि वर्द्धक धारा से देवराज इन्द्र तथा विष्णु आदि समस्त देवगणों को संतुष्ट करने हेतु संस्कारित होकर कलश में प्रतिष्ठित हों।(सामवेद उत्तरार्चिक 6.6.9)
Hey Som possessing sweet sap! You should be sanctified with your nourishing stream and enter the Kalsh for satisfying Devraj Indr, Bhagwan Shri Hari Vishnu and all demigods-deities.
त्वां रिहन्ति धीतयो हरिं पवित्रे अद्रुहः। वत्सं जातं न मातरः पवमान विधर्मणि॥
हे छलनी से छनकर शुद्ध होने वाले हरित वर्ण सोम! आपस में एक साथ मिलकर रहने वाली अँगुलियाँ आपको उसी तरह अभिषुत करती हैं, अर्थात् स्वच्छ करती हैं, जिस तरह कोई गौ नवजात बछड़े को स्नेहपूर्वक चाटती है।(सामवेद उत्तरार्चिक 6.6.10)
Hey greenish Somras undergoing filtration through the sieve! Finger working together cleanse & extract you like the cow licking her calf.
त्वं द्यां च महिव्रत पृथिवीं चाति जनिषे। प्रति द्रापिममुञ्चथाः पवमान महित्वना॥
हे पवित्र किये जाने वाले, महान् व्रती सोम! आप द्यु तथा पृथ्वीलोक को अच्छी प्रकार धारण किये रहते हैं। आप अपनी महिमा के अनुसार कवच धारण करने वाले हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 6.6.11)
Hey Som with great vow-resolve undergoing purification! You are supporting the heavens & earth carefully. You wear the shield-armour as per your glory-grandeur.
इन्दुर्वाजी पवते गोन्योघा इन्द्रे सोमः सह इन्वन्मदाय।
हन्ति रक्षो बाधते पर्यरातिं वरिवस्कृण्वन्वृजनस्य राजा॥
अपनी शक्ति से सम्पन्न रसधार से देवराज इन्द्र के सामर्थ्य में वृद्धि करते हुए, उन्हें तृप्ति प्रदान करने वाले सोम शुद्ध होते हैं। शक्तिमान् यह सोम बुरे आचरण वाले शत्रुओं को कष्ट देते हुए उनका हनन करते हैं और याजकों को ऐश्वर्य प्रदान करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 6.6.12)
Hey Somras increasing the capability of Devraj Indr granting him satisfaction-satiation, with your stream full of strength. Mighty Som torture the wicked enemies, destroy them and grant grandeur-prosperity to the Yajak Gan.
अध धारया मध्वा पृचानस्तिरो रोम पवते अद्रिदुग्धः।
इन्दुरिन्द्रस्य सख्यं जुषाणो देवो देवस्य मत्सरो मदाय॥
हे सोमदेव! आप पाषाणों पर कूटकर तैयार किये गये हैं। आपकी रसधार तेजवान्, आनन्ददायक, माधुर्ययुक्त, देवताओं के सन्निकट रहने वाली तथा उनमें स्फूर्ति का संचार करने वाली है।(सामवेद उत्तरार्चिक 6.6.13)
Hey Somras! You are prepared-extracted by crushing with stones. Your stream-current possess energy-Tej, gladdening, sweetened, remain close to the deities-demigods and generate freshness.
अभि व्रतानि पवते पुनानो देवो देवान्स्वेन रसेन पृञ्चन्।
इन्दुर्धर्माण्यृतुथा वसानो दश क्षिपो अव्यत सानो अव्ये॥
हे सोम देव! आपका मधुर रस ऋतुओं को धारण करने वाला, व्रती, तेजवान् तथा देवों को संतुष्टि प्रदान करने वाला है। आप अँगुलियों के माध्यम से संस्कारित होते हुए बर्तन में प्रतिष्ठित हों।(सामवेद उत्तरार्चिक 6.6.14)
Hey Som! Your sweet sap support the seasons, having resolve-vow, possessing Tej-aura, granting satisfaction to the demigods-deities. You are sanctified with fingers while moving into the vessel.
सामवेद उत्तरार्चिक (6.7) ::
आ ते अग्न इधीमहि द्युमन्तं देवाजरम्।
यद्ध स्या ते पनीयसी समिद्दीदयति द्यवीषं स्तोतृभ्य आ भर॥
हे अजर-अमर अग्नि देव! हम स्तोतागण आपको श्रेष्ठ समिधाओं के माध्यम से उत्पन्न करते हैं। जब आप प्रकाशित होते हैं, तो उसके तेज से सम्पूर्ण द्युलोक प्रकाशमान् हो जाता है। आप प्रार्थना करने वाले लोगों को असीम ऐश्वर्य प्रदान करने की अनुकम्पा करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 6.7.1)
Hey un decaying-immortal Agni Dev! We the Stota Gan, produce you with best wood. When you illuminate whole universe is illuminate. Grant unlimited grandeur-prosperity to the worshipers.
आ ते अग्न ऋचा हविः शुक्रस्य ज्योतिषस्पते।
सुश्चन्द्र दस्म विश्पते हव्यवाट् तुभ्यं हूयत इषं स्तोतृभ्य आ भर॥
जगत् के अधिष्ठाता, शत्रुओं का शमन करने वाले, देवों तक हवियों को ले जाने वाले, सुख को बढ़ाने वाले, दीप्तिमान् हे अग्ने! वेदमन्त्रों का गान करते हुए स्तोतागण आपकी ज्योतियों में हवि समर्पित कर रहे हैं, आप उन ऋत्विजों को वैभव देने की कृपा करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 6.7.2)
Lord of the universe, destroyer of the enemies, carrier of offerings to the demigods-deities, illuminated; hey Agni Dev! The Stota Gan are making offerings with the recitation of Ved Mantrs. Grant grandeur-prosperity to those Ritviz Gan.
ओभे सुश्चन्द्र विश्पते दर्वी श्रीणीष आसनि।
उतो न उत्पुपूर्या उक्थेषु शवसस्पत इषं स्तोतृभ्य आ भर॥
राजा की भाँति प्रजा के पालनकर्ता, पराक्रम से युक्त, जाज्वल्यमान् हे अग्ने! आहुति देते समय दोनों पात्र आपके मुँह तक पहुँचते हैं। हवियों के माध्यम से आपको प्रसन्न करने वाले यजमानों को आप अपार धन-वैभव प्रदान करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 6.7.3)
Supporter-nurturer of the populace like the king, hey shing Agni Dev! While making offerings-oblation both pots reach your mouth. Grant unlimited grandeur-prosperity to the Yajman Gan, who make offerings to you.
इन्द्राय साम गायत विप्राय बृहते बृहत्। ब्रह्मकृते विपश्चिते पनस्यवे॥
हे साम-गान करने वाले स्तोताओं! गुणगान करने योग्य, बुद्धिमान, आराधक, महान् देवराज इन्द्र हेतु बृहत् नामक साम को गाओ।(सामवेद उत्तरार्चिक 6.7.4)
Hey Stota Gan reciting Sam Gan! Hey intelligent worshiper sing-recite Brahat Sam Gan for Devraj who deserve it.
त्वमिन्द्राभिभूरसि त्वं सूर्यमरोचयः। विश्वकर्मा विश्वदेवो महाँ असि॥
हे देवराज इन्द्र! आप सूर्य को प्रदीप्त करने वाले, दुष्ट-शत्रुओं को परास्त करने वाले हैं। आप हमारे यज्ञ में आगमन करें। आप विश्वकर्मा आदि देवों के सदृश महान् हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 6.7.5)
Hey Devraj Indr! You illuminate the Sun, defeat the wicked-vicious enemies. Join our Yagy. You are great like Vishw Karma etc demigods.
विभ्राजं ज्योतिषा स्व 3 रगच्छो रोचनं दिवः। देवास्त इन्द्र सख्याय येमिरे॥
अपनी आभा को संव्याप्त करते हुए सूर्य को देदीप्यमान् करने वाले, हे देवराज इन्द्र! आप प्रकट हों। सभी देवगण आपसे मित्रता करने की अभिलाषा रखते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 6.7.6)
Hey Devraj Indr, you equally spread your aura and illuminate the Sun! Invoke before us. All demigods-deities wish to be friendly with you.(16.01.2026)
असावि सोम इन्द्र ते शविष्ठ धृष्णवा गहि।
आ त्वा पृणक्त्विन्द्रियं रजः सूर्यो न रश्मिभिः॥
हे पराक्रमी देवराज इन्द्र! आप शत्रुओं को पराभूत करने वाले हैं। आपके पान करने के निमित्त सोमरस रखा हुआ है, आप प्रकट हों। जिस प्रकार सूर्यदेव अपनी किरणों से सम्पूर्ण अन्तरिक्ष को परिव्याप्त करते हैं, उसी प्रकार आप इस सोमरस का सेवन कर पराक्रम से युक्त हों।(सामवेद उत्तरार्चिक 6.7.7)
पराक्रम :: gallantry, valour, ability, might, courage, exploit, power.
Hey majestic Devraj Indr! You defeat the enemies. Somras has been kept for you to drink. The way the rays-beams of Sun light pervade the space-sky, similarly you should acquire gallantry after drinking Somras.
आ तिष्ठ वृत्रहनथं युक्ता ते ब्रह्मणा हरी। अर्वाचीनं सु ते मनो ग्रावा कृणोतु वग्नुना॥
शत्रुओं को पराभूत करने वाले हे देवराज इन्द्र! आप मन्त्रों द्वारा संयोजित अश्वों वाले रथ पर आसीन हों। सोम निष्पन्न करने वाले पत्थर की आवाज आपके मन को सोमरस की ओर प्रभावित करे और उससे प्रेरित होकर आप सोमरस का पान करने की इच्छा से हमारे यहाँ पधारें।(सामवेद उत्तरार्चिक 6.7.8)
Hey Devraj Indr defeating the enemy! Ride the charoite driven by the horses deployed by the recitation of Mantrs. Let the sound of crushing Som with stones effect your innerself and you should be driven by the desire of Somras brining you here.
इन्द्रमिद्धरी वहतोऽ प्रतिधृष्टशवसम्। ऋषीणां सुष्टुतीरुप यज्ञं च मानुषाणाम्॥
हे पराक्रमी देवराज इन्द्र! आप कभी न परास्त होने वाले हैं। आप अपने घोड़ों से युक्त रथ पर सवार होकर हमारे उस यज्ञ-स्थल में आगमन करें, जिस स्थान पर यजमानों, ऋषियों द्वारा साम-गान हो रहा है।(सामवेद उत्तरार्चिक 6.7.9)
Hey majestic Devraj Indr! You are never defeated. Ride the charoite driven by the horses and come to our Yagy site where Yajmans and Rishi Gan are reciting Sam Gan.
सामवेद उत्तरार्चिक (7) :: ऋषि :- त्रय, कश्यप, कुत्स, अवत्सार, जमदग्नि, मेधातिथि, हिरण्यस्तूष, आंगिरस, वसिष्ठ, त्रिशोक, काण्व, सप्तर्षय, अमहीयु, शुनःशेप, आजीगर्ति, मधुच्छन्दा वैश्वामित्र, मांधाता, यौवनाश्व, गोधा, असित, काश्यप, देवल या ऋणञ्चय, शक्ति, पर्वत नारदौ, मनु, सांवरण, बन्धु, सुबन्धु, श्रुतबन्धुर्विप्रबन्धुश्च क्रमेण गोपायना लौपायना वा, भुवन आप्त्य, भौवन, वामदेव; देवता-पवमान, सोम, अग्नि, आदित्य, इन्द्र, इन्द्राग्नि विश्वेदेवा; छंद-जगती, गायत्री, बृहती, प्रगाथ, पंक्ति, उष्णिक्, अनुष्टुप्, त्रिष्टुप्।
सामवेद उत्तरार्चिक (7.1) ::
ज्योतिर्यज्ञस्य पवते मधु प्रियं पिता देवानां जनिता विभूवसुः।
दधाति रत्नं स्वधयोरपीच्यं मदिन्तमो मत्सर इन्द्रियो रसः॥
यज्ञों को प्रकाशित करने वाले, पोषणकर्ता, पालनकर्ता, देवों के प्रिय, माधुर्ययुक्त रस प्रदान करने वाले, ऐश्वर्यवान्, हर्ष बढ़ाने वाले, स्फूर्ति प्रदान करने वाले, देवराज इन्द्र को प्रिय, इन विभिन्न गुणों से सम्पन्न हे सोम! आप द्यु तथा पृथ्वी लोक के छिपे हुए ऐश्वर्य को स्तोताओं हेतु प्रदान करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.1.1)
Hey Som possessing the characters like illuminator of the Yagy, nurturer, nourisher, dear to the demigods-deities, granting sweetened sap, dear to Devraj Indr! You award the hidden grandeurs of heavens & earth to the Stotas.
अभिक्रन्दन्कलशं वाज्यर्षति पतिर्दिवः शतधारो विचक्षणः।
हरिर्मितस्य सदनेषु सीदति मर्मृजानोऽविभिः सिन्धुभिर्वृषा॥
स्वर्गलोक का स्वामी, सहस्रों धाराओं से परिष्कृत, विवेक को बढ़ाने वाला तथा शक्तिशाली हरितवर्ण सोमरस शब्दनाद करते हुए पात्र में स्थिर होता है। जल के साथ मिलकर छलनी से छनकर, इस प्रकार का पराक्रमी सोम मनोकामनाओं को पूर्ण करने हेतु सखा की भाँति यज्ञ के बर्तन में प्रतिस्थापित होता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.1.2)
Lord of the heavens, purified in thousands streams, prudence increasing, mighty, greenish Somras making sound is filled in the vessel. Mixed in water, filtered through the sieve, majestic Somras fulfils desires-wishes like a companion and is established in the Kalash.
अग्रे सिन्धूनां पवमानो अर्षस्यग्रे वाचो अग्रियो गोषु गच्छसि।
अग्रे वाजस्य भजसे महद्धनं स्वायुधः सोतृभिः सोम सूयसे॥
हे सोमदेव! जल में मिलाये जाने से पहले शुद्ध होने के लिए तथा प्रार्थनाओं को ग्रहण करने हेतु आप श्रद्धाभाव से आवाहित किये जाते हैं। उत्कृष्ट शस्त्रों से सम्पन्न होकर, आप गायों की रक्षा करते हुए गमन करते हैं तथा पर्याप्त धन-ऐश्वर्य प्रदान करते हैं। हे सोम! आपको स्तोताओं द्वारा संस्कारित (पवित्र) किया जाता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.1.3)
Hey Som! Prior to soaking in water for purification you are invoked to respond to the prayers with respect. Accompanied with excellent weapons you move to protect the cows and grant sufficient wealth-prosperity. Hey Somras! You are sanctified by the Stota Gan.
असृक्षत प्र वाजिनो गव्या सोमासो अश्वया। शुक्रासो वीरयाशवः॥
पराक्रमी, देदीप्यमान् तथा द्रुत गतिमान सोमरस गाय, घोड़े तथा संतानादि को प्राप्त करने हेतु याजकों द्वारा शोधित किया जाता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.1.4)
Majestic, radiant, fast moving Somras is sanctified for having cows, horses and the progeny by the Yajak Gan.
शुम्भमाना ऋतायुभिर्मृज्यमाना गभस्त्योः। पवन्ते वारे अव्यये॥
हे सोमरस! यजमान आपको अपनी हथेलियों से तैयार करते हैं। विशिष्ट शोभा से युक्त आप शोधन यन्त्र के माध्यम से शोधित किये जाते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.1.5)
Hey Somras! The Yajman Gan rub you over the palms. Possessing specific beauty you are subjected through the purification plant.(17.01.2026)
ते विश्वादाशुषे वसु सोमा दिव्यानि पार्थिवा। पवन्तामान्तरिक्ष्या ॥
हे सोम देव! आप अपने साधकों को समस्त लोकों (स्वर्ग, अन्तरिक्ष, पृथ्वी) के ऐश्वर्य को देने की अनुकम्पा करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.1.6)
Hey Som Dev! Grant the grandeur of all abodes (heavens, space-sky, earth, nether world) to your devotees.
पवस्व देववीरति पवित्रं सोम रंह्या। इन्द्रमिन्दो वृषा विश॥
हे सोम! देवगणों को प्राप्त होने की अभिलाषा वाले आप तीव्र वेग के साथ परिष्कृत हों। हे सोम! शक्ति बढ़ाने वाले आप देवराज इन्द्र के लिए प्रतिस्थापित हों।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.1.7)
Hey Som! Having the desire-wish of attaining demigods-deities, you should purify with fast speed. Strengthening-boosting power you should be available to Devraj Indr.
आ वच्यस्व महि प्सरो वृषेन्दो द्युम्नवत्तमः। आ योनिं धर्णसिः सदः॥
हे सोम! पराक्रमी, प्रकाशमान् तथा सभी को धारण करने के गुणों से सम्पन्न आप, हमें पर्याप्त मात्रा में अन्न तथा बल देने की कृपा करें तथा निश्चित किये गये स्थान पर उपस्थित हों।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.1.8)
Hey Som! Majestic, illuminated, capable of holding everyone, grant us sufficient food grains and strength; you should be present at the pre appointed place.
अधुक्षत प्रियं मधु धारा सुतस्य वेधसः। अपो वसिष्ट सुक्रतुः॥
पवित्र सोमरस की धाराएँ, प्रिय माधुर्ययुक्त रस को कलश में एकत्रित करती हैं। श्रेष्ठ वसिष्ठ ऋषि इस सोमरस को जल में संयुक्त करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.1.9)
Sanctified streams of sweetened Somras are collected in the Kalash. Excellent Vashishth Rishi mix Somras in water.
महान्तं त्वा महीरन्वापो अर्षन्ति सिन्धवः। यद्गोभिर्वासयिष्यसे॥
हे सोमदेव! आप गौ-दुग्ध के मिलाये जाने से पहले, विशेष गुणों से सम्पन्न जलाशयों के जल या दूसरे पवित्र जल को ग्रहण करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.1.10)
Hey Somras! Prior to mixing in cow's milk, you either accept the water from those reservoirs which possess specific qualities-characters or pure water.
समुद्रो अप्सु मामृजे विष्टम्भो धरुणो दिवः। सोमः पवित्रे अस्मयुः॥
जल में मिश्रित, स्वर्गलोक को धारण करने वाला, आधारभूत, वांछित सोम, बर्तन के जल में बारम्बार स्वच्छ किया जाता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.1.11)
Mixed in water, supporting the heavens, fundamental, desired Som is cleaned in water kept in vessels.
अचिक्रदद्वृषा हरिर्महान्मित्रो न दर्शतः। सं सूर्येण दिद्युते॥
अत्यन्त महान्, बल में वृद्धि करने वाला, हरे एवं भूरे रंग का और सखा की भाँति दर्शनीय सोम, शब्दनाद करते हुए सूर्यदेव के समान दीप्तिमान् होता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.1.12)
Too great, strength boosting, greenish and brown coloured and like a companion, beautiful Somras making sound-Nad, is illuminated like the Sun.
गिरस्त इन्द ओजसा मर्मृज्यन्ते अपस्युवः। याभिर्मदाय शुम्भसे॥
हे सोमदेव! आपके पराक्रम से ही कर्म करने की प्रेरणा प्राप्त करने वाले ऋत्विग्गण ऋचाओं का उच्चारण करते हैं तथा स्तोत्रों के माध्यम से हर्ष बढ़ाने हेतु आपको शोभित करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.1.13)
Hey Som Dev! By virtue of your valour, the Ritviz are inspired to perform, recite the Richas and Strotrs decorate-beautify you, to gladden them.
तं त्वा मदाय घृष्वय उ लोककृत्लुमीमहे। तव प्रशस्तये महे॥
हे सोम! आप विश्व की भलाई करने की अभिलाषा से समस्त शत्रुओं का विनाश करते हैं। हम सुख प्राप्त करने की कामना से श्रेष्ठ स्तोत्रों के माध्यम से आपकी अभ्यर्थना करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.1.14)
Hey Som! You destroy the enemies for the welfare of the universe. For having comfort-pleasure, we worship you with best Strotrs.
गोषा इन्दो नृषा अस्यश्वसा वाजसा उत। आत्मा यज्ञस्य पूर्व्यः॥
हे सोम! यज्ञ के आधारभूत तथा अग्रणी आत्मा के रूप में आप गाय, घोड़े, आहार तथा योग्य संतान प्रदान करने वाले हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.1.15)
Hey Som! As the basis of Yagy and in the form of forward soul, you grant cows, horses and progeny.
अस्मभ्यमिन्दविन्द्रियं मधोः पवस्व धारया। पर्जन्यो वृष्टिमाँ इव॥
हे सोम! आप वर्षा करने वाले बादलों के जल के सदृश हमारी इन्द्रियों के पराक्रम को अपनी अमृतमयी माधुर्ययुक्त धारा प्रवाह से बढ़ाएं।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.1.16)
Hey Som! Boost the valour of our senses like the rain clouds with your sweetened current comparable to elixir-nectar.
सामवेद उत्तरार्चिक (7.2) ::
सना च सोम जेषि च पवमान महि श्रवः। अथा नो वस्यसस्कृधि॥
प्रार्थना करने योग्य, पावन हे सोम! आप देवी-देवताओं को प्राप्त हों और शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने के पश्चात् हमें ऐश्वर्यवान् बनाएँ।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.2.1)
Qualified-deserving prayers, hey pious Som! You should be attained by the goddesses and demigods-deities, attain victory over the enemies and grant us grandeur.
सना ज्योतिः सना स्व 3 र्विश्वा च सोम सौभगा। अथा नो वस्यसस्कृधि॥
हे सोम! आप हमें तेजवान् बनाएँ। स्वर्ग के समस्त सुख तथा सौभाग्य को प्रदान करते हुए हमारा भला करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.2.2)
Hey Som! Grant us aura-Tej. Grant us all pleasures-comforts, good luck of the heavens; leading to our welfare.
सना दक्षमुत क्रतुमप सोम मृधो जहि। अथा नो वस्यसस्कृधि॥
हे सोम! आप हमें पराक्रम तथा यज्ञ-कर्म करने हेतु सामर्थ्यवान् बनाएँ, शत्रुपक्ष को परास्त करके आप हमारा भला करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.2.3)
Hey Som! You should grant us valour and capability to accomplish Yagy Karm, defeat the enemy resorting to our welfare.
पवीतारः पुनीतन सोममिन्द्राय पातवे। अथा नो वस्यसस्कृधि॥
हे सोमरस शुद्ध करने वाले स्तोताओं! देवराज इन्द्र के सेवन करने के निमित्त सोमरस को पवित्र करो। जिसका पान करके वे हमारा कल्याण करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.2.4)
Hey Stota Gan, sanctifying the Somras! Purify Somras for drinking by Devraj Indr leading to our welfare by him.
त्वं सूर्ये न आ भज तव क्रत्वा तवोतिभिः। अथा नो वस्यसस्कृधि॥
हे सोम! आप अपने अच्छे कर्मों तथा सुरक्षा प्रदान करने वाले साधनों से हमें सूर्य की आराधना हेतु प्रेरित करें, जिससे हमारा उत्तम कल्याण हो।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.2.5)
Hey Som! Inspire us to worship Sury Dev with virtuous-righteous deeds and means; so that he is able to resort to our best welfare.
तव क्रत्वा तवोतिभिज्योंक्पश्येम सूर्यम्। अथा नो वस्यसस्कृधि॥
हे सोम! आपके द्वारा प्रदान किये गये ज्ञान से तथा आपकी सुरक्षा से युक्त हम अनेकों वर्षों तक सूर्य-दर्शन से लाभ प्राप्त करें यानि लम्बी जीवन शक्ति प्राप्त करें तथा हमारा कल्याण हो।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.2.6)
Hey Som! By virtue of the enlightenment granted by you and under your asylum; we should be able to see Sury Dev-Sun leading to long life span and our welfare.
अभ्यर्ष स्वायुध सोम द्विबर्हसं रयिम्। अथा नो वस्यसस्कृधि॥
हे उत्कृष्ट आयुधों को धारण करने वाले सोम! आप हमें स्वर्ग तथा पृथ्वी दोनों लोकों के धन-धान्य से परिपूर्ण करें, जिससे हमें सुख की प्राप्ति हो।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.2.7)
Hey Som wielding best weapons! Enrich us with the wealth and food grains of both earth & heavens, leading to comforts-pleasure.
अभ्य3र्षानपच्युतो वाजिन्त्समत्सु सासहिः। अथा नो वस्यसस्कृधि॥
हे महा बलवान् सोम! आप रणक्षेत्र में विजय प्राप्त करने वाले तथा अपने शत्रुओं को परास्त करने वाले हैं। आप सुपात्र में प्रतिष्ठित हों तथा हमारा कल्याण करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.2.8)
Hey too mighty Som! You attain victory in the war field and defeat your enemies. You should be placed in a virtuous-pious vessel, leading to our welfare.
त्वां यज्ञैरवीवृधन्यवमान विधर्मणि। अथा नो वस्यसस्कृधि॥
हे पवित्र होने वाले सोमदेव! अनेक फल प्रदान करने वाले याग में याजक श्रेष्ठ स्तोत्रों को गाते हुए आपके गौरव में वृद्धि करते हैं, अतएव आप हमें सुख से परिपूर्ण करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.2.9)
Hey Som Dev, attaining piousity! The Yajak Gan increase to your glory in the Yagy granting multiple boons-rewards, reciting best Strotrs. Enrich us with comforts-pleasure.
रयिं नश्चित्रमश्विनमिन्दो विश्वायुमा भर। अथा नो वस्यसस्कृधि॥
हे सोम! आप हमें विशेष प्रकार के घोड़ों से युक्त तथा सभी लोकों के कल्याण करने वाले ऐश्वर्य प्रचुर मात्रा में देने की कृपा करें, जिसे प्राप्त कर हम सुखी हों।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.2.10)
Hey Som! Grant us special types of horses and grandeur of all abodes, in sufficient-ample quantity; leading to our pleasure-comforts.(18.01.2026)
तरत्स मन्दी धावति धारा सुतस्यान्धसः। तरत्स मन्दी धावति॥
आनन्द प्रदान करने वाली, श्रेष्ठ पोषक पदार्थों से परिपूर्ण सोमरस की धारा, छलनी के माध्यम से शुद्ध होकर द्रुत गतिमान रूप से गिर रही है। हर्ष से परिपूर्ण वह सोमरस शुद्ध होते हुए पात्र में बहता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.2.11)
Gladdening Somras current, having best nourishing components is flowing with fast speed through the sieve. Full of joy Somras flow into the vessel on being purified.
उस्त्रा वेद वसूनां मर्तस्य देव्यवसः। तरत्स मन्दी धावति॥
समस्त तरह के धन-धान्य से परिपूर्ण, प्रकाशवान् धाराएँ ऋत्विजों को सभी तरह से सुरक्षित रखती हैं, इस प्रकार की हर्ष प्रदान करने वाली धाराएँ तीव्र वेग से बहती हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.2.12)
Full of all sorts of wealth and food grains, illuminated, gladdening streams keeping the Ritviz safe, flow with high speed.
ध्वस्त्रयोः पुरुषन्त्योरा सहस्त्राणि दद्महे। तरत्स मन्दी धावति॥
हे द्रुत गतिमान सोमदेव! आप आनन्द प्रदान करने वाले हैं। आप ध्वस्त्र तथा पुरुषन्ति नामक दुष्ट प्रकृति के राजाओं के सभी ऐश्वर्य हमें प्रदान करने की कृपा करें, क्योंकि आप इस कार्य को करने में सक्षम हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.2.13)
Hey Som Dev running with high speed! You grant grandeur-prosperity. Grant the grandeur of the wicked-vicious kings named Dhvastr and Purushanti, to us since you are capable of doing this.
आ ययोस्त्रिं शतं तना सहस्त्राणि न दद्महे। तरत्स मन्दी धावति॥
हे सोम! तीन सौ एवं सहस्त्रों अर्थात् प्रचुर मात्रा में वस्त्रों को हम धारण करते हैं। हर्षदायी सोम शीघ्रता से कलश में गिर रहा है।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.2.14)
Hey Som! We wear three hundreds and thousands of cloths. Gladdening Somras is falling into the vessel.
एते सोमा असृक्षत गृणानाः शवसे महे। मदिन्तमस्य धारया॥
महान् आनन्द से सम्पन्न यह सोमरस साम-गान के पश्चात् हमें उत्तम सामर्थ्यवान् बनाने हेतु धाराओं सहित सुपात्र में प्रविष्ट हो रहा है।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.2.15)
Somras possessing great pleasure is flowing through the streams into the virtuous vessel after Sam Gan, for granting us high power.
अभि गव्यानि वीतये नृम्णा पुनानो अर्षसि। सनद्वाजः परि स्रव॥
हे सोम! आप मनुष्य मात्र को सुख प्रदान करने वाले हैं। आप देवशक्तियों के पान करने के लिए गाय के दुग्धादि मिल जाने से पवित्र गुणों से परिपूर्ण होकर बर्तन में प्रविष्ट करते हैं। आप अन्न देते हुए पात्र में प्रवाहित होते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.2.16)
Hey Somras! You grant comforts-pleasure to the humans. You mix with cow's milk, possess piousity and then flow into the vessel for divine powers. You flow into the vessel, while granting food grains.
उत नो गामतीरिषो विश्वाअर्ष परिष्टुभः। गृणानो जमदग्निना॥
हे सोम! जमदग्नि ऋषि द्वारा की गई वन्दना से सम्पन्न होकर आप हमें गायों के साथ दूसरे समस्त गुणगान करने योग्य पोषक अन्न प्रदान करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.2.17)
Hey Som! On being happy with the prayers of Rishi Jamdagni, grant us cows and other nourishing appreciable food.
इमं स्तोममर्हते जातवेदसे रथमिव सं महेमा मनीषया।
भद्रा हि नः प्रमतिरस्य संसद्यग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव॥
स्तुत्य अग्नि देव की महिमा को व्यापक करने के लिए, अर्थात् अपनी श्रद्धा-भावना पहुँचाने हेतु हम अपनी अभ्यर्थनाओं को रथ के समान उपयोग में लाते हैं। इन अग्नि देव की वन्दना से हमारी बुद्धि तेज होती है। हे अग्ने! आपकी मित्रता से हम अवश्य ही दुःख से मुक्ति प्राप्त कर लें।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.2.18)
We use our prayers like a charoite to communicate our devotional feeling for worshipable Agni Dev. Agni Dev is worshiped by our sharp intelligence. Hey Agne! Let your friendship relieve us from pains-sorrow.
भरामेध्मं कृणवामा हवींषि ते चितयन्तः पर्वणापर्वणा वयम्।
जीवातवे प्रतरां साधया थियोऽग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव॥
हे अग्ने! हर पवित्र अवसर पर हम समिधाएँ संगृहीत कर आपको देदीप्यमान् करते हैं तथा हवि समर्पित करते हैं। हम चिरायु प्राप्त करने की लालसा से यज्ञ कर रहे हैं, आप उसे सफल बनाएँ। आपकी मित्रता में रहकर हम कभी दुःखी न हों।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.2.19)
Hey Agne! At all holy-pious occasions we collect wood and ignite-illuminate you and make offerings. We are accomplishing Yagy for the sake of Chirayu-complete age (hundred years in Kali Yug). Make our endeavour successful. Your friendship should never pain us.
शकेम त्वा समिधं साधया धियस्त्वे देवा हविरदन्त्याहुतम्।
त्वमादित्याँ आ वह तान्ह्य 3 श्मस्यग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव॥
हे अग्ने! हम आपको समिधाओं आदि से अच्छी तरह जाज्वल्यमान् कर देवों को पहुँचाने हेतु आहुतियाँ अर्पित करते हैं। आप हवियों को स्वीकार करने हेतु देवताओं को आमन्त्रित करें तथा हमारे याग को भली-भाँति सफल करें। हम देवताओं के पधारने हेतु उत्सुक हैं। हे अग्ने! आपके मित्र बनकर हमारा कल्याण हो।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.2.20)
Hey Agne! We properly ignite the wood and make offerings to be carried to demigods-deities. Invoke demigods-deities to accept our oblations and make our Yagy successful. We are eager to welcome the demigods-deities. Hey Agne! Your friendship should grant us welfare-well being.
सामवेद उत्तरार्चिक (7.3) ::
प्रति वां सूर उदिते मित्रं गृणीषे वरुणम्। अर्यमणं रिशादसम्॥
हे मित्रा-वरुण देवताओं! हम सूर्य उदित होने के समय आप दोनों देवों और शत्रुओं का विनाश करने वाले अर्यमा सहित सभी देवगणों की अभ्यर्थना करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.3.1)
अभ्यर्थना :: अनुरोध, विनती, मांग, आधार तत्व-स्थापन, अभियाचना, अनुबंध, इकरार, शपथ दिलाना, सौंगंध दिलाना, कसम खिलाना, याचना, दरख्वास्त; request, prayer, postulation, request, adjuration.
Hey Mitra-Varun deities! We worship-pray to you and all demigods including Aryma, at the time of Sun rise, to destroy the enemies.
राया हिरण्यया मतिरियमवृकाय शवसे। इयं विप्रा मेधसातये॥
हे ज्ञानी मित्र तथा वरुण देवता! हित करने वाले उत्तम धन और दुष्टता रहित पराक्रम तथा उत्तम बुद्धि प्राप्त करने हेतु हम आपकी स्तुति करते हैं। आप हमारी स्तुतियों को ग्रहण करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.3.2)
Hey enlightened Mitr & Varun Dev! We pray to you for excellent intelligence, wickedness less valour, useful wealth. Accept our prayers.
ते स्याम देव वरुण ते मित्र सूरिभिः सह। इषं स्वश्च धीमहि॥
हे वरुण देवता! ज्ञानवानों के साथ आपकी वन्दना करते हुए हम ऐश्वर्यवान् बनें। हे मित्र (सूर्य)! आपकी वन्दना से हम धन-धान्य तथा स्वर्ग के उपमा रहित सुखों को प्राप्त करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.3.3)
Hey Varun Dev! We wish to have grandeur by worshiping you along with the enlightened. Hey Mitr (Sury)! We should avail wealth, food grains and heavens and undefined luxury-comforts.
भिन्धि विश्वा अप द्विषः परि बाधो जही मृधः। वसु स्पार्ह तदा भर॥
हे देवराज इन्द्र! आप सभी दुष्टों का शमन करें। उत्कृष्ट कर्मों में बाधा डालने वाले शत्रुओं का संहार करें तथा मनवांछित धन से हमें परिपूर्ण करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.3.4)
Hey Devraj Indr! Destroy the wicked-vicious and those who create hurdles in our pious-virtuous efforts-endeavours. Grant us desired wealth.
यस्य ते विश्वमानुषग्भूरेर्दत्तस्य वेदति। वसु स्पाईं तदा भर॥
हे देवराज इन्द्र! आपके द्वारा प्रदान किये गये जिस धन-सम्पत्ति से सारे मनुष्य भली-भाँति परिचित हैं, उस अभिलषित वैभव को हमें प्रचुर मात्रा में प्रदान करने की कृपा करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.3.5)
Hey Devraj Indr! Grant us the wealth-grandeur with which humans are well worsed-acquainted. Grant the desired grandeur in sufficient quantity.
यद्वीडाविन्द्र यत्स्थिरे यत्पशनि पराभृतम्। वसु स्पार्हं तदा भर॥
हे देवराज इन्द्र! सुरक्षित अभेद्य कोष में स्थित, अचल स्थान पर स्थित, किसी के द्वारा स्पर्श न हो पाने वाले स्थान पर स्थित एवं शत्रुओं को पराजित कर प्राप्त किये गये इस प्रकार के समस्त धन को, जिसकी हम अभिलाषा करते हैं, हमें प्रचुर मात्रा में प्राप्त कराएँ।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.3.7)
Hey Devraj Indr! The wealth placed in safe impenetrable custody at remote immovable place, untouched by any one, obtained by defeating the enemy, desired by us in sufficient quantity; should be granted to us.
यज्ञस्य हि स्थ ऋत्विजा सस्नी वाजेषु कर्मसु। इन्द्राग्नी तस्य बोधतम्॥
हे देवराज इन्द्र तथा अग्नि देव! आप ही याग के ऋत्विज्ञ हैं। संग्राम की भाँति यज्ञ कर्मों में भी आप पवित्र रहते हैं, इसीलिए आप हमारी अभ्यर्थना के आशय को समझते हुए उसे स्वीकार करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.3.7)
Hey Devraj Indr & Agni Dev! You are Ritviz for the Yagy. You remain pure-pious in the Yagy Karm like the war. Please understand our requirements and oblige.(19.01.2026)
तोशासा रथयावाना वृत्रहणापराजिता। इन्द्राग्नी तस्य बोधतम्॥
हे देवराज इन्द्र तथा अग्ने! आप शत्रुओं का संहार करने वाले, रथ पर आरूढ़ होकर विचरण करने वाले, आवृत्त करने वाले, दुराचारियों के शमनकर्त्ता तथा कभी पराजित न होने वाले हैं, आप हमारी प्रार्थनाओं को स्वीकारें।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.3.8)
Hey Devraj Indr & Agni Dev! You are the destroyer of the enemies, roam riding the charoite, enveloping-shrouding, controller of the wicked-vicious and never defeated, please accept our prayers.
इदं वां मदिरं मध्वधुक्षन्नद्रिभिर्नरः। इन्द्राग्नी तस्य बोधतम्॥
हे इन्द्र तथा अग्नि देव! स्तोताओं ने आपके पान करने के निमित्त हर्ष प्रदान करने वाले माधुर्य युक्त सोमरस को तैयार किया है। इसके लिए आप हमारी स्तुतियों को स्वीकार करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.3.8)
Hey Devraj Indr & Agni Dev! The Stota Gan have prepared sweetened gladdening Somras for you to drink. Therefore, respond-accept our prayers.
सामवेद उत्तरार्चिक (7.4) ::
इन्द्रायेन्दो मरुत्वते पवस्व मधुमत्तमः। अर्कस्य योनिमासदम्॥
हे माधुर्य रस से युक्त सोम! यज्ञवेदी के उत्कृष्ट स्थान पर विराजमान होने हेतु, मरुतों के साथ आगमन करने वाले देवराज इन्द्र के लिए आप शोधित होते हुए पात्र में प्रतिष्ठित हों।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.4.1)
Hey sweetened Somras! You should be established at the best place over the Yagy Vedi in the pot, while being sanctified for Devraj Indr who arrive with Marud Gan.
तं त्वा विप्रा वचोविदः परिष्कृण्वन्ति धर्णसिम्। सं त्वा मृजन्त्यायवः॥
सम्पूर्ण जगत् के धारणकर्ता हे सोम! विद्वान् ऋत्विज्, वन्दनाओं के माध्यम से आपको सुशोभित करते हुए उचित ढंग से संस्कारित कर रहे हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.4.2)
Hey Som holding-supporting the whole universe! Learned-scholars, Ritviz are decorating you while properly sanctifying with prayers.
रसं ते मित्रो अर्यमा पिबन्तु वरुणः कवे। पवमानस्य मरुतः॥
हे नवीन तत्त्वदर्शी सोमदेव! आपके मधुर तथा पावन रस को मित्र, वरुण, अर्यमा तथा मरुद्गण ग्रहण (पान) करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.4.3)
Hey Tattv Darshi-identifier of the gist of Brahm, Som Dev! Your sweet and pious-pure, sap-juice, Somras should be drunk by Mitr, Varun, Aryma and Marud Gan.
मृज्यमानः सुहस्त्या समुद्रे वाचमिन्वसि। रयिं पिशङ्गं बहुलं पुरुस्पृहं पवमानाभ्यर्षसि॥
स्वच्छ हाथों से शुद्ध किया हुआ यह सोमरस सुपात्र में ध्वनि करते हुए प्रवाहित होता है। हे पवित्र सोम! आप सुवर्ण-रंग से युक्त एवं बहुत सारे लोगों द्वारा वांछित पर्याप्त धन हमें देते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.4.4)
Purified with clean hands Somras flow into the Kalsh making sound. Hey pious Som! You grant us sufficient wealth possessing golden colour-aura, desired by numerous people.
पुनानो वारे पवमानो अव्यये वृषो अचिक्रदद्वने।
देवानां सोम पवमान निष्कृतं गोभिरञ्जानो अर्षसि॥
हे पावन सोम! आप उत्साह बढ़ाने वाले हैं। आप साधक द्वारा परिष्कृत होकर जल में तीव्र गति से मिल जाते हैं। हे स्वच्छ सोमदेव! आप देवताओं के निमित्त गाय के दूध में मिलाये जाते हैं तथा काष्ठ पात्र में प्रतिष्ठित किये जाते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.4.5)
Hey pious Som! You are encouraging. You mix up with water on being purified by the devotee with high speed and establish in wooden pot. Hey clean Som Dev! You are mixed in cow's milk for the sake of demigods.
एतमु त्यं दश क्षिपो मृजन्ति सिन्धुमातरम्। समादित्येभिरख्यत॥
जिस सोम की जन्मदायिनी समुद्र है, इस तरह के सोम को शोधित करने में दसों अँगुलियाँ सहायता करती हैं। ऐसा सोम, देवशक्तियों को प्राप्त होता है अर्थात् चढ़ाया जाता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.4.6)
The Som born out of the ocean, is sanctified by the ten fingers. Som is attained with the help of divine powers.
समिन्द्रेणोत वायुना सुत एति पवित्र आ। सं सूर्यस्य रश्मिभिः॥
सूर्य की किरणों से दीप्तिमान् हे सोमदेव! कलश में विद्यमान हुए आप देवराज इन्द्र तथा वायु देव को उपलब्ध होते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.4.7)
Shinning with the rays-beams of Sun light, hey Somras! You are available for Devraj Indr and Vayu Dev when placed in the Kalash.
स नो भगाय वायवे पूष्णे पवस्व मधुमान्। चारुर्मित्रे वरुणे च॥
हे रम्य शुद्ध तथा मधुर सोम! हमारे याग में भग, वायु, पूषा, मित्र तथा वरुण देवताओं के निमित्त आप पवित्र हो।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.4.8)
रम्य :: रमणीय,शिष्ट, सजीला, सुष्ठु, सुश्री, मनोरंजक, दिलचस्प, मज़े दार; elegant, amusing.
Hey elegant-amusing Somras sweet Somras! You should be sanctified along with Bhag, Vayu, Mitr, Varun and demigods in our Yagy.
सामवेद उत्तरार्चिक (7.5) ::
रेवतीर्नः सधमाद इन्द्रे सन्तु तुविवाजाः। क्षुमन्तो याभिर्मदेम॥
जिन गौओं को अपने समीप रखकर हम अन्न से सम्पन्न होकर सुख का उपभोग करते हैं; देवराज इन्द्र की कृपा से हमारी ये गौएँ, दूध-घी आदि देने वाली तथा स्वस्थ काया वाली हों।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.5.1)
The cows due to whom we enjoy food grains and comforts-pleasure keeping them with us, should bless us with milk, Ghee and should be healthy by the mercy of Devraj Indr.
आ घ त्वावान् त्मना युक्तः स्तोतृभ्यो धृष्णवीयानः। ऋणोरक्षं न चक्रयोः॥
हे धीरज रखने वाले देवराज इन्द्र! आप हितकारी बुद्धि से प्रार्थना करने वाले साधकों को मनवांछित पदार्थ निश्चित रूप से प्रदान करें। आप साधकों को धन प्रदान करने हेतु उसी प्रकार सहायक हैं, जिस प्रकार रथ के पहिये को मिलाने के लिए धुरी सहायक होती है।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.5.2)
Hey patient Devraj Indr! Grant desired materials to the devotees who worship you with the welfare seeking pure intellect. You are helpful to the devotees by granting them wealth just like the axel of the charoite.
आ यद् दुवः शतक्रतवा कामं जरितृणाम्। ऋणोरक्षं न शचीभिः॥
हे देवराज इन्द्र! ऋत्विजों द्वारा अभीष्ट धन आप उन्हें प्रदान करें। जैसे रथ के गतिमान होने से उसकी धुरी को भी गति प्राप्त होती है, वैसे ही आपकी कृपा से यज्ञकर्ताओं को धन उपलब्ध हो।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.5.3)
Hey Devraj Indr! Grant desired wealth to the Ritviz Gan. The way the axel of the charoite is accelerated with it; similarly the Yagy performers should also get wealth by virtue of your kindness-mercy.
सुरूपकृत्नूमूतये सुदुघामिव गोदुहे। जुहूमसि द्यविद्यवि॥
हे मनोहर रूप धारण करने वाले देवराज इन्द्र! जिस तरह दुग्ध निकालने के समय ग्वाले (shepherd, herdsman) गौओं को बुलाते है, उसी तरह हम अपने संरक्षण हेतु आपको आवाहित करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.5.4)
Hey Devraj Indr acquiring elegant forms! The way the cow owners call the cows for milking them, similarly we invoke you for our protection-safety.
उप नः सवना गहि सोमस्य सोमपाः पिब। गोदा इद्रेवतो मदः॥
हे देवराज इन्द्र! सोमरस का सेवन करने के निमित्त आप हमारे यज्ञ-संध्या में आगमन करें। सोमरस का सेवन करने के पश्चात् आप साधकों को समृद्धि, हर्ष तथा गायें प्रदान करने की कृपा करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.5.5)
Hey Devraj Indr! Invoke during our evening prayers in the Yagy for drinking Somras. After drinking Somras grant pleasure, cows, prosperity to your devotees.
अथा ते अन्तमानां विद्याम सुमतीनाम्। मा नो अति ख्य आ गहि॥
हे देवराज इन्द्र! सोमरस के सेवन के बाद हम आपकी उत्कृष्ट बुद्धि को जान सकें। आप हमारे यहाँ आगमन करें। हमारे प्रतिकूल आप किसी दूसरे कुकर्मियों को यह श्रेष्ठ ज्ञान प्रदान करके संतुष्टि न दें यानि हमें निश्चित रूप से इस ज्ञान को प्रदान कर तृप्ति प्रदान करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.5.6)
Hey Devraj Indr! Once you drink Somras we should recognise-identify your excellent brain-intelligence. Do not grant the excellent knowledge to our anti wicked people, opponents. We should be content-satisfied with the learning imparted by you to us.
उभे यदिन्द्र रोदसी आपप्राथोषा इव। महान्तं त्वा महीनां सम्राजं चर्षणीनाम्।
देवी जनित्र्यजीजनद्भद्रा जनित्र्यजीजनत्॥
हे देवराज इन्द्र! उषा जैसे स्वर्गलोक तथा पृथ्वीलोक को अपने आलोक से परिव्याप्त कर देती है, वैसे ही आप भी दोनों लोक को अपने प्रकाश से संव्याप्त कर देते हैं। हे देवराज इन्द्र! आप अत्यन्त महान्, जगत् के अधिपति हैं। कल्याण करने वाली देवमाता अदिति ने आपको उत्पन्न किया है अर्थात् आप उन्हीं के पुत्र हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.5.7)
Hey Devraj Indr! The way Usha illuminate the heavens and earth with her radiance-aura, you too shine the two abodes with your aura. Hey Devraj Indr! You are extremely great and the Lord of the universe. Welfare and well being granting Dev Mara Aditi has given you birth.(20.01.2026)
दीर्घ ह्यङ्कुशं यथा शक्तिं बिभर्षि मन्तुमः।
पूर्वेण मघवन्यदा वयामजो यथा यमः। देवी जनित्र्यजीजनद्भद्रा जनित्र्यजीजनत्॥
हे विद्वान् देवराज इन्द्र! महान् आयुधों को धारण करने वाले के सदृश आप शक्ति-सामर्थ्य को धारण करते हैं। जिस प्रकार बकरा अपने अग्रपाद से अपने आहार योग्य पदार्थों को प्रतिबद्ध करता है, उसी प्रकार आप भी अपने पराक्रम से दुर्जनों को प्रतिबद्ध करते हैं। आपको देवताओं की माता ने जन्म दिया है अर्थात् माता अदिति द्वारा आपकी उत्पत्ति हुई है।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.5.8)
प्रतिबद्धता :: समर्पण, दायित्व, वचन बद्धता, निष्ठा, किसी व्यक्ति, कार्य, उद्देश्य या विश्वास के प्रति खुद को पूरी तरह समर्पित करने का संकल्प; dedication, commitment, loyalty, allegiance.
Hey enlightened Devraj Indr! You the one who wield great weapons, you possess strength and capability. The way a male-billy goat dedicate himself to eatables, your valour is dedicated towards the destruction of the wicked-vicious. You are have been given birth by the mother of demigods Aditi.
अव स्म दुर्हृणायतो मर्त्तस्य तनुहि स्थिरम्। अधस्पदं तमीं कृधि यो अस्माँ अभिदासति। देवी जनित्र्यजीजनद्भद्रा जनित्र्यजीजनत्॥
हे देवराज इन्द्र! जो हमें अपने अधीन करने वाले हैं, उन कुकर्मी शत्रुओं का आप विनाश कर दें। आप माता अदिति द्वारा उत्पन्न हुए हैं, आप उस कल्याणकारी माता अदिति के पुत्र हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.5.9)
Hey Devraj Indr! Destroy those wicked-vicious enemies who enslave us. You are have been given birth by the mother of demigods Aditi, who is devoted to welfare-well being.
सामवेद उत्तरार्चिक (7.6) ::
परि स्वानो गिरिष्ठाः पवित्रे सोमो अक्षरत्। मदेषु सर्वधा असि॥
हे सोम देव! आप पर्वत की चोटियों पर निवास करने वाले, आनन्द प्रदान करने वाले सभी तत्त्वों में सबसे उत्तम है। आपकी रसधारा छलनी से छनकर शुद्ध होते हुए प्रतिष्ठित हो रही है।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.6.1)
Hey Som Dev! You reside over the mountain cliffs and best among the materials causing please-comfort. You juice is filtered through the sieve and collected-stored.
त्वं विप्रस्त्वं कविर्मधु प्र जातमन्धसः। मदेषु सर्वधा असि॥
हे सोम देव! आप ज्ञानवान, दूर तक दृष्टि रखने वाले हैं और आप अन्न से उत्पन्न हुए पोषक पदार्थों को प्रदान करते हैं। हर्ष प्रदान करने वाले रसों में आपका पद सर्वश्रेष्ठ है।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.6.2)
Hey Som Dev! You are enlightened, far sighted and provide the nourishing material obtained from the food grains. Your gladdening juice-sap Somras is best amongest the gladdening fluids.
त्वे विश्वे सजोषसो देवासः पीतिमाशत। मदेषु सर्वधा असि॥
हे सोम देव! एकत्रित होकर तैयार किये जाने वाले आपके रस को सब देवगण ग्रहण करने की अभिलाषा रखते हैं। हर्ष प्रदान करने वाले सभी तत्त्वों में आप ही सर्वोत्तम हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.6.3)
Hey Som Dev! Demigods are desirous of consuming the Somras stored after preparation. You are the best amongest the gladdening materials.
स सुन्वे यो वसूनां यो रायामानेता य इडानाम्। सोमो यः सुक्षितीनाम्॥
जो सोम, धन, अन्न, गायें तथा उत्कृष्ट संतान के रूप में असीम ऐश्वर्य देने वाले हैं, उस सोम के रस को हम अभिषुत करके शुद्ध करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.6.4)
We purify the extracted juice of Som, who grant grandeur in the form of wealth, cows and best progeny.
यस्य त इन्द्रः पिबाद्यस्य मरुतो यस्य वार्यमणा भगः।
आ येन मित्रावरुणा करामह एन्द्रमवसे महे॥
हे सोम देव! आपके दिव्य रस को देवराज इन्द्र, मरुद्गण, अर्यमा, भग आदि देव पान करते हैं। जिस तरह सोम द्वारा संरक्षण हेतु मित्रा-वरुण देवताओं को आवाहित किया जाता है, उसी तरह देवराज इन्द्र को भी आवाहित करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.6.5)
Hey Som Dev! Your divine juice-Somras is drunk by Devraj Indr, Marud Gan, Aryma, Bhag etc. demigods-deities. The way Mitra-Varun are in invoked for protection by Som, similarly Devraj Indr too is invoked.
तं वः सखायो मदाय पुनानमभि गायत। शिशुं न हव्यैः स्वदयन्त गूर्तिभिः॥
हे स्तोताओं! आप देवगणों को हर्षित करने हेतु पवित्रता प्राप्त करने वाले सोमरस की प्रशंसा करो। जिस तरह मातृ-शक्ति से बालक शोभायमान होता है। उसी तरह सोम को हवियों तथा याचनाओं द्वारा स्वादिष्ट बनाओ।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.6.6)
Hey Stota Gan! You should appreciate the Somras who please-gladden the demigods-deities. The way an infant is magnified-beautified by the mother power, similarly make Som tasty with offerings and prayers.
सं वत्स इव मातृभिरिन्दुर्हिन्वानो अज्यते। देवावीर्मदो मतिभिः परिष्कृतः॥
देवताओं की सुरक्षा करने वाले, आनन्द प्रदान करने वाले, स्तोत्रों द्वारा शुद्ध किये गये तथा यजमानों को प्रेरणा प्रदान करने वाले सोमरस को जल में मिलाते हैं। माता के सदृश बालक को स्नान कराने की भाँति, सोमरस जल के द्वारा स्वच्छ किया जाता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.6.7)
Gladdening Somras, sanctified with Strotrs, which inspire the Yajmans, grant protection to Demi Gods; is mixed in water. Somras is cleansed like the infant bathed by the mother.
अयं दक्षाय साधनोऽयं शर्धाय वीतये। अयं देवेभ्यो मधुमत्तरः सुतः॥
शक्ति बढ़ाने वाले साधन के रूप में इस माधुर्ययुक्त सोमरस को देवगणों के सेवन करने के निमित्त उचित रीति से अभिषुत किया जाता है। वे पराक्रम से युक्त होने के लिए इसको ग्रहण करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.6.8)
Power boosting sweetened Somras to be drunk by the demigods-deities is extracted with right method. They accept it for possessing valour.
सोमाः पवन्त इन्दवोऽस्मभ्यं गातुवित्तमाः। मित्राः स्वाना अरेपसः स्वाध्यः स्वर्विदः॥
हे सोमदेव! आप मित्र की भाँति भला चाहने वाले, शोधित हुए, कुकृत्य से रहित तथा उत्तम उद्देश्य के लिए प्रेरणा प्रदान करने वाले, आत्मज्ञानी, प्रार्थना करने योग्य एवं प्रकाश से युक्त हैं। आप हमारे निमित्त कलश में पावन होते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.6.9)
Hey Somras! You are like the friend who wish welfare-well being, sanctified, free from wickedness, inspiring, self realised, praise worthy and illuminated. You become pure in our Kalash.
ते पूतासो विपश्चितः सोमासो दध्याशिरः। सूरासो न दर्शतासो जिगत्लवो ध्रुवा घृते॥
सूर्यदेव के समान तेजवान्, शुद्ध दिव्य सोम दुग्ध, घी से युक्त पात्र में विद्यमान है। वह जल की लसदार धार से मिश्रित होकर शुद्ध होने वाला है।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.6.10)
लसदार:: चिपचिपा, लसीला या गोंद जैसा होना, जिसमें किसी चीज़ को चिपकाने या उससे चिपकने की क्षमता हो; sticky.
Majestic like Sury Dev, purified divine sticky Somras is present in the vessel having milk and Ghee. It is purified by mixing with the stream of water.
सुष्वाणासो व्यद्रिभिश्चिताना गोरधि त्वचि। इषमस्मभ्यमभितः समस्वरन्वसुविदः॥
धरती के ऊपर रहने वाला, कई पाषाड़ों से कूटकर अभिषुत किया जाने वाला, धन प्रदान करने वाला सोम, हमें पर्याप्त मात्रा में धन प्रदान करता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.6.11)
Residing over the earth, crushed with stones and extracted Somras grant wealth and sufficient quantity of money.
अया पवा पवस्वैना वसूनि मांश्चत्व इन्दो सरसि प्र धन्व।
ब्रध्नश्चिद्यस्य वातो न जूतिं पुरुमेधाश्चित्तकवे नरं धात्॥
हे सोमदेव! अपनी इस पवित्र धारा से आप हमें धन से परिपूर्ण कर दें। हे सोम! उत्कृष्ट जल में मिले हुए आपका पान करके सूर्यदेव भी वायु की भाँति वेगवान् बन जाते हैं। श्रेष्ठ ज्ञानी देवराज इन्द्र भी आपका (सोम) सेवन करके हमें नेतृत्व करने के सामर्थ्य से युक्त संतति प्रदान करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.6.12)Hey Somras! Let us fulfil your stream with wealth. Having drunk you Sury Dev become like speedy Vayu Dev. Enlightened Devraj Indr too drink you and grant us capable progeny.
Suitable for the cows, Som present in the nourishing fodder of the cows completely-charge them with milk. This best intelligent Som is mixed in the streams of milk. The way humans cover themselves with cloth, the cows fill the vessel of Somras with their milk.(10.02.206)
उत न एना पवया पवस्वाधि श्रुते श्रवाय्यस्य तीर्थे।
षष्टिं सहस्त्रा नैगुतो वसूनि वृक्षं न पक्वं धूनवद्रणाय॥
हे सोमदेव! समस्त जनों द्वारा उपासना करने योग्य, आप हमारे याग में पावन धारा-सहित शुद्ध हों। हे शत्रुओं के विनाशक! जिस प्रकार वृक्ष से पका हुआ फल प्राप्त होता है, उसी प्रकार आप हमें हजारों तरह का धन शत्रुओं के साथ प्रतिस्पर्धा करने हेतु प्रदान करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.6.13)
Hey Somras! Worshipable by all people, your stream should flow in our Yagy. Hey destroyer of the enemies! The way a ripen fruit is obtained similarly grant us thousands kinds of wealth, to compete with enemies.
महीमे अस्य वृष नाम शूषे मांश्चत्वे वा पृशने वा वधत्रे।
अस्वापयन्निगुतः स्नेहयच्चापामित्राँ अपाचितो अचेतः॥
याजकों पर सुखों की बारिश करना तथा दुष्टों को परास्त करके उनको नीचे करना आपके ये दो कार्य आनन्द प्रदान करने वाले हैं। हे सोम! आप युद्ध में हमें नुकसान पहुँचाने वाले शत्रुओं को सामर्थ्य से रहित करके नष्ट कर दें। बुद्धिहीन लोगों को हमारे समीप न आने दें।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.6.14)
Hey Som Dev! Shower bliss over the Yajak Gan and defeat the wicked, supress them and grant us pleasure. Destroy the power of the enemy in the war and make them incapable. Do not let the duffers idiots come close to us.(21.01.2026)
सामवेद उत्तरार्चिक (7.7) ::
अग्ने त्वं नो अन्तम उत त्राता शिवो भुवो वरूथ्यः॥
हे सर्वव्यापक अग्ने! आप हमारे समीप रहकर हमारा संरक्षण करें और हमारा भला करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.7.1)
Hey all pervading Agne! Remain close to us and grant us protection and well being.
वसुरग्निर्वसुश्रवा अच्छा नक्षि द्युमत्तमो रयिं दाः॥
हे अग्नि देव! आप सभी को शरण देने वाले, धनवानों में सर्वोत्तम हैं। आप हमारे समीप आगमन करें तथा प्रतापी होकर हमें धन देने की कृपा करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.7.2)
Hey Agni Dev! You are best amongest those who provide asylum & the rich. Come close to us, become majestic and grant us wealth.
तं त्वा शोचिष्ठ दीदिवः सुम्नाय नूनमीमहे सखिभ्यः॥
हे तेजस्वी तथा दीप्तिमान् अग्ने! मित्र आदि प्रिय परिजनों हेतु सुख की अभिलाषा करते हुए अवश्य ही हम आपकी अभ्यर्थना करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.7.3)
Hey majestic and illuminous Agne! We worship you for the sake of comforts-pleasure for our friends and relatives.
इमा नु कं भुवना सीषधेमेन्द्रश्च विश्वे च देवाः॥
ये समस्त लोक हमें हर्ष प्रदान करने के साधन रूप हों। देवराज इन्द्र के साथ-साथ अन्य समस्त देवगण हमारा कल्याण करने वाले हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.7.4)
All abodes should become means to grant us pleasure. In addition to Devraj Indr, other demigods-deities should also look to our welfare.
यज्ञं च नस्तन्वं च प्रजां चादित्यैरिन्द्रः सह सीषधातु॥
आदित्यों के साथ हे देवराज इन्द्र! हमारे याग कर्म, काया तथा संतति आदि को आप उत्कृष्ट सफलता प्राप्त कराएं।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.7.5)
Along with Adity Gan, hey Devraj Indr! Grant excellent success pertaining to Yagy Karm, physique and progeny.
आदित्यैरिन्द्रः सगणो मरुद्भिरस्मभ्यं भेषजा करत्॥
हे देवराज इन्द्र (सूर्य)! आदित्यों, मरुतों तथा दूसरी सभी सहायता करने वाली देव शक्तियों के साथ हमारे लिए औषधि तैयार करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.7.6)
Hey Devraj Indr! Prepare medicines for us with Adity Gan, Marud Gan and other divine powers.
प्र व इन्द्राय वृत्रहन्तमाय विप्राय गाथं गायत यं जुजोषते॥
हे ऋत्विजों! आप शत्रुओं का संहार करने वाले, श्रेष्ठ ज्ञानी देवराज इन्द्र हेतु स्तुतियों को गाओ, जिन्हें वे हर्षपूर्वक श्रवण करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.7.7)
Hey Ritviz! Worship best scholar, destroyer of the enemy Devraj Indr with Stuties which should be heard-responded by him.
अर्चन्त्यर्क मरुतः स्वर्का आ स्तोभति श्रुतो युवा स इन्द्रः॥
सम्मान करने योग्य, गुणगान करने योग्य देवराज इन्द्र का स्तोतागण स्तवन करते हैं। पराक्रमी तथा ऐश्वर्य से युक्त देवराज इन्द्र उनको सब तरह से सुरक्षित रखते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.7.8)
The Stota Gan pray to Devraj who deserve honour and praise. Majestic and grandeur possessing Devraj Indr keep them safe by all means.
उप प्रक्षे मधुमति क्षियन्तः पुष्येम रयिं धीमहे त इन्द्र॥
हे देवराज इन्द्र! आपकी छत्र-छाया में रहने वाले हम यजमान शक्ति से सम्पन्न हों तथा ऐश्वर्य प्राप्त करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 7.7.8)
Hey Devraj Indr! Yajman Gan under your asylum should get power and grandeur.
सामवेद उत्तरार्चिक (8) :: ऋषि :- वृषगणो वासिष्ठ, असित, काश्यपो देवलो वा, भृगुर्वारुणिर्जमदग्निर्भार्गवो वा, भरद्वाजो, बार्हस्पत्य, यजत आत्रेय, मधुच्छन्दा वैश्वामित्र, सिकता निवावरी, पुरुहन्ना, पर्वतनारदौ काण्वौ शिखण्डिन्यावप्सरसौ काश्यपौ वा, अग्नये धिष्ण्ये ऐश्वरा, वत्स, काण्व, नृमेध, अत्रि; देवता :- पवमान, सोम, वैश्वानर, इन्द्र, मित्रा-वरुण, अग्नि; छन्द :- त्रिष्टुप्, गायत्री, जगती, प्रगाथ, उष्णिक्, द्विपदा, इन्द्राग्नि, विराट्, अनुष्टुप्, ककुप्, पुर उष्णिक्।
प्र काव्यमुशनेव ब्रुवाणो देवो देवानां जनिमा विवक्ति।
महिव्रतः शुचिबन्धुः पावकः पदा वराहो अभ्येति रेभन्॥
उशना की भाँति श्रेष्ठ वाणी वाले उद्गाता, देवगणों की जीवन-गाथाओं को उचित ढंग से व्यक्त करते हैं। व्रतधारी, तेजवान्, सत्य गुण-सम्पन्न, पोषणदायक पदार्थ से सम्पन्न सोम, शोधनकाल में आवाज करता हुआ सुपात्र में प्रतिष्ठित होता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 8.1.1)
Udgata Gan having excellent voice like Ushna, describe-illustrate the life stories of demigods-deities in proper manner. Truthful, nourishing Somras with a resolve-vow, make sound during the process of purification and establish in the best vessel.
प्र हंसासस्तृपला वग्नुमच्छामादस्तं वृषगणा अयासुः।
अङ्गोषिणं पवमानं सखायो दुर्मर्षं वाणं प्र वदन्ति साकम्॥
बुद्धिमान् याजक, शत्रुओं के शौर्य से भयभीत होकर उस स्थल पर तुरन्त पहुँच गये, जहाँ पर सोम तैयार किया जा रहा है। सब लोग संगठित होकर, शत्रुओं द्वारा सहन न किये जाने वाले एवं संस्कारित होने वाले सोम हेतु वाद्ययन्त्रों से मधुर ध्वनि निकालने लगे।(सामवेद उत्तरार्चिक 8.1.2)
Intelligent Yajak Gan, afraid of the valour of the enemies quickly reached the spot where Somras was being extracted. They all jointly produced melodious sound of instrumental music for Somras, which could not be tolerated by the enemies.
स योजत उरुगायस्य जूतिं वृथा क्रीडन्तं मिमते न गावः।
परीणसं कृणुते तिग्मशृङ्गो दिवा हरिर्ददृशे नक्तमृज्रः॥
क्रीड़ा करते हुए सरल रूप से ही वह सोम गुणगान करने योग्य स्थिति को प्राप्त करता है। जिसे दूसरे लोगों द्वारा आंका नहीं जा सकता है। उसका बृहत् तेजवान् आलोक दिन में हरितवर्ण का तथा रात में उज्जवल दिखाई देता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 8.1.3)
Playful Somras attain praise worthy status, which can not be evaluated by other people. Its vast aura-radiance is greenish during the day and bright at night.
प्र स्वानासो रथा इवार्वन्तो न श्रवस्यवः। सोमासो राये अक्रमुः॥
घोड़ों तथा रथों के सदृश शीघ्रतापूर्वक शब्द करता हुआ सोमरस पावन हो रहा है। परिष्कृत सोम, हमें असीम सुख तथा ऐश्वर्य प्रदान करता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 8.1.4)
Somras is being sanctified producing sound like the horses and charoites. Purified Somras grant us enormous pleasure and grandeur.
हिन्वानासो रथा इव दधन्विरे गभस्त्योः। भरासः कारिणामिव॥
रणक्षेत्र में गमन करने वाले रथों के सदृश, याग की तरफ गमन करने वाले सोमरस को दोनों स्तोतागण अपने दोनों हाथों में उसी प्रकार लिये रहते हैं, जिस प्रकार कुली लोग भार उठाते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 8.1.5)
Both Stota Gan carry the Somras in their hands moving towards the Yagy site; like the charoites moving to war field and the coolies carrying load.
राजानो न प्रशस्तिभिः सोमासो गोभिरञ्जते। यज्ञो न सप्त धातृभिः॥
राजा के गुणगान और सात साधकों द्वारा जिस तरह याग प्रतिस्थापित होता है, उसी तरह गाय के दूध एवं घी आदि द्वारा यह सोम पावन किया जाता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 8.1.6)
The way praise of the king by the seven devotees and Yagy is accomplished, similarly Somras is sanctified with cow's milk and Ghee.(22.01.2026)
सामवेद उत्तरार्चिक (8) :: ऋषि :-
परि स्वानास इन्दवो मदाय बर्हणा गिरा। मधो अर्षन्ति धारया॥
हे उत्कृष्ट स्तुतियों से प्रशंसा किये जाने वाले, अभिषुत सोम! आप देवों को हर्ष से परिपूर्ण करने के निमित्त अपनी माधुर्ययुक्त रस धारा सहित कलश में प्रवाहित हों।(सामवेद उत्तरार्चिक 8.1.7)
Sanctified with best praise worthy Stuties, hey Somras! Flow into the Kalash in sweetened current to gladden the demigods-deities.
आपानासो विवस्वतो जिन्वन्त उषसो भगम्। सूरा अण्वं वि तन्वते॥
उषा को तेज से युक्त करता हुआ सोमरस देवराज इन्द्र के सेवन करने के निमित्त शब्द करता हुआ पवित्र हो रहा है।(सामवेद उत्तरार्चिक 8.1.8)
Magnify :: बढ़ाना, वृद्धि करना, अधिक करना, बढ़ा-चढ़ा कर बताना, छोटी चीज को बड़ा दिखाना, बढ़ा-चढ़ा कर कहना, बढ़ा देना, आवर्धन करना, ज़्यादा करना, इज़ाफ़ा करना, अतिशय वर्णन करना; amplify, exaggerate, hyperbolise, hyperbolize, overdraw, overstate.
Magnifying Usha with its Tej-aura, Somras is purified making sound for drinking by Devraj Indr.
अप द्वारा मतीनां प्रत्ना ऋण्वन्ति कारवः। वृष्णो हरस आयवः॥
प्राचीन, बलशाली सोम को आहूत करने वाले साधक, यज्ञ द्वारों का उद्घाटन करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 8.1.9)
The devotees who invoke ancient-eternal mighty Somras, inaugurate the gates of the Yagy.
समीचीनास आशत होतारः सप्तजानयः। पदमेकस्य पिप्रतः॥
श्रेष्ठ जाति के, केवल सोम को पूर्णता देते हुए, सात याजक, यज्ञ आयोजित करने हेतु आगमन करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 8.1.10)
Seven Yajak Gan belonging to the best-upper caste amplifying-completing Som arrive for organising the Yagy.
नाभा नाभिं न आ ददे चक्षुषा सूर्यं दृशे। कवेरपत्यमा दुहे॥
चक्षुओं से सूर्य दर्शन के निमित्त, याग की नाभि की भाँति सोम को, अपनी नाभि अर्थात् पेट के पास प्रतिस्थापित करते हैं, इस तरह सोम द्वारा उत्पादित तेजस्विता को हम पूर्ण रूप से प्रदान करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 8.1.11)
For the sake of viewing Sury Dev with eyes, like the navel-nucleus of the Yagy, Som is established near the stomach granting completion to its majesties.
अभि प्रियं दिवस्पदमध्वर्युभिर्गुहा हितम्। सूरः पश्यति चक्षसा॥
शक्तिशाली देवराज इन्द्र अपने चक्षुओं द्वारा द्युलोक में स्नेही तथा अध्वर्युओं द्वारा हृदय में विद्यमान सोमदेव को दृष्टिगत करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 8.1.12)
Mighty-powerful Devraj Indr looks at Somras present in the hearts of the affectionate-loved ones and the priests in the heavens, with his eyes.
सामवेद उत्तरार्चिक (8.2) ::
असृग्रमिन्दवः पथा धर्मनृतस्य सुश्रियः। विदाना अस्य योजना॥
साधक तथा देवों से सम्बन्धित (याग) को भली प्रकार जानते हुए, समृद्धवान् सोम सत्कर्म की भाँति याग मार्ग में आसीन होता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 8.2.1)
Prosperous Som is established in the Yagy related to devotees and demigods like the virtuousness, in the path of the Yagy.
प्र धारा मधो अग्रियो महीरपो वि गाहते। हविर्हविःषु वन्द्यः॥
स्तुत्य, सर्वोत्तम तथा आहुतियों में प्रशंसित सोम, जल में सिंचित होकर माधुर्ययुक्त रसधार से बर्तन में प्रतिष्ठित हो रहा है।(सामवेद उत्तरार्चिक 8.2.2)
Worshipable, excellent appreciated in the offerings, sweetened Somras mixed in water, enter the vessel as the stream of juice.
प्र युजा वाचो अग्रियो वृषो अचिक्रदद्वने। सद्माभि सत्यो अध्वरः॥
बलवान्, आहुतियों में प्रमुख, वाणी को जोड़ने वाले तथा हिंसा न करने वाले यह सोमदेव जल में मिश्रित होकर यज्ञ स्थल में विराजमान होते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 8.2.3)
Mighty, major amongest the offerings, connecting the voice-sound, non violent Somras mixes with water and is established in the Yagy.
परि यत्काव्या कविर्नृम्णा पुनानो अर्षति। स्वर्वाजी सिषासति॥
ज्ञानवान् सोम अपने पराक्रम से, मानवों में पवित्रता का संचार करते हुए, स्तवनों को जिस समय स्वीकारता है, उसी समय बलशाली देवराज इन्द्र द्युलोक से यज्ञशाला पर आगमन करने हेतु तत्पर होते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 8.2.4)
Enlightened Som generate piousness amongest the humans by virtue of his valour, as and when accept the segments of the day, mighty Devraj Indr become ready to arrive in the Yagy Shala.
पवमानो अभि स्पृधो विशो राजेव सीदति। यदीमृण्वन्ति वेधसः॥
पवित्र होने वाला सोम, राजा के सदृश प्रजा को सुरक्षित करने के लिए शत्रुओं का शमन करने हेतु तत्पर रहता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 8.2.5)
Somras while sanctifying, become ready to protect the populace like a king and destruction of the enemies.
अव्या वारे परि प्रियो हरिर्वनेषु सीदति। रेभो वनुष्यते मती॥
जल में मिलाया हुआ हरितवर्ण सोमरस, परिष्कृत होते समय साधकों द्वारा की गई याचनाओं को अंगीकार करते हुए, शब्द के साथ सुपात्र में प्रतिष्ठित हो रहा है।(सामवेद उत्तरार्चिक 8.2.6)
Greenish Somras mixed in water, accept the prayers by the devotees while under going purification, establish in the vessel.
स वायुमिन्द्रमश्विना साकं मदेन गच्छति। रणा यो अस्य धर्मणा॥
जो स्तोतागण इस सोम को अभिषुत तथा पवित्र करने में जुटे रहते हैं, वे हर्ष बढ़ाने वाले सोम के साथ वायुदेव, देवराज इन्द्र तथा अश्विनी कुमारों का सामीप्य लाभ प्राप्त करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 8.2.7)
Those Stota Gan who remain busy with the extraction and purification of Somras attain proximity of Vayu Dev, Devraj Indr and Ashwani Kumars, along with it.
आ मित्रे वरुणे भगे मधोः पवन्त ऊर्मयः। विदाना अस्य शक्मभिः॥
जिन स्तोताओं के माध्यम से माधुर्य युक्त सोम की धाराएँ मित्र, वरुण तथा भग देवताओं के लिए पात्र में गिरती हैं, ऐसे सोम के माहात्म्य को भली-भाँति जानने वाले यजमान सुख की प्राप्ति करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 8.2.8)
Yajmans who are aware of the significance of the currents of sweetened Somras falling into the vessel near Mitr, Varun and Bhag demigods, due to the efforts of the Stotas Gan, attain comforts-pleasure.
अस्मभ्यं रोदसी रयिं मध्वो वाजस्य सातये। श्रवो वसूनि सञ्चितम्॥
हे पृथ्वी तथा स्वर्ग लोक के अधिपति देवता! सोमरस रूपी उत्कृष्ट पोषण से भरे आहार को प्राप्त करने हेतु आप हमें धन, अन्नादि के रूप में असीम ऐश्वर्य देने की कृपा करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 8.2.9)
Hey Lord of the earth and heavens demigods! Grant us unlimited grandeur in the form of food grains, wealth as Somras, full of best nutritious food.
आ ते दक्षं मयोभुवं वह्निमद्या वृणीमहे। पान्तमा पुरुस्पृहम्॥
हे सोम! आपके आनन्ददायक, मनवांछित धन प्रदान करने वाले, सुरक्षित रखने वाले सभी लोगों के द्वारा प्रशंसित सामर्थ्य को आज हम (यजमान) पाने की अभिलाषा करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 8.2.10)
Hey Som, appreciated by all! We the Yajmans wish to attain your capability as granting pleasure, desirable wealth and protection.
आ मन्द्रमा वरेण्यमा विप्रया मनीषिणम्। पान्तमा पुरुस्पृहम्॥
हर्ष बढ़ाने वाले, सर्वोत्तम, विद्वान, दिव्य, सबका संरक्षण करने वाले तथा सभी लोगों के द्वारा प्रशंसा करने योग्य हे सोम! हम (स्तोतागण) आपकी आराधना करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 8.2.11)
Hey Som, pleasure increasing, the best, scholar, divine, granting protection to all, appreciated by all! We Stota Gan worship you.
आ रयिमा सुचेतुनमा सुक्रतो तनूष्वा। पान्तमा पुरुस्पृहम्॥
उत्कृष्ट कार्य में लगे हुए हे सोमदेव! धन, श्रेष्ठ विवेक, उत्कृष्ट संतान, सशक्त सुरक्षा तथा प्रशंसनीय पराक्रम प्राप्त करने हेतु हम आपकी अभ्यर्थना करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 8.2.12)
Hey Som Dev busy with excellent endeavours! We expect wealth, best prudence, excellent progeny, strong safety and appreciable valour.
सामवेद उत्तरार्चिक (8.3) ::
मूर्धानं दिवो अरतिं पृथिव्या वैश्वानरमृत आ जातमग्निम्।
कविं सम्राजमतिथिं जनानामासन्नः पात्रं जनयन्त देवाः॥
स्वर्ग के उच्च स्थान पर विद्यमान, भूलोक पर भ्रमण करने वाले, सृष्टि के सम्राट, यज्ञकर्म के लिए उपस्थित होने वाले, विद्वान् तथा साम्राज्य अधिष्ठाता, देवों के मुखरूप तथा हमारी रक्षा करने वाले, प्रार्थनीय अग्नि देव को स्तोतागण यज्ञवेदी में समिधाओं के घर्षण द्वारा उत्पन्न करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 8.3.1)
Agni Dev, who occupy an elevated place in the heavens, roam over the earth, is the Lord of the creation-nature, remain present in the Yagy Karm, enlightened and is the deity of the empire, forming face-mouth of the demigods, our worshipable protector is invoked (evolve-produce) by the Stotas by rubbing wood at the Yagy Vedi.(23.01.2026)
त्वां विश्वे अमृत जायमानं शिशुं न देवा अभि सं नवन्ते।
तव क्रतुभिरमृतत्वमयन् वैश्वानर यत्पित्रोरदीदेः॥
हे अमृतरूप अग्नि देव! सभी देव मानव पैदा होते समय आपको शिशु की भाँति सम्माननीय मानते हैं। हे जगत् के अधिपति! जिस समय स्वर्गलोक तथा पृथ्वीलोक के बीच आप प्रकाशित हुए उस समय याजकों ने आपके द्वारा सम्पन्न होने वाले यज्ञ से उच्च स्थान को प्राप्त किया।(सामवेद उत्तरार्चिक 8.3.2)
Hey Agni Dev in the form of elixir-nectar! All demigods & humans consider you respected like the infant while producing-igniting. Hey Lord of the universe! When illuminated between the heavens & earth, the Yajak Gan attained high position through the Yagy accomplished by you.
नाभिं यज्ञानां सदनं रयीणां महामाहावमभि सं नवन्त।
वैश्वानरं रथ्यमध्वराणां यज्ञस्य केतुं जनयन्त देवाः॥
याग के मध्य में स्थित, धन के भण्डार, श्रेष्ठ, हवियों से सम्पन्न, सम्पूर्ण जगत् के नायक, शत्रुता न करने वाले, याग का संचालन करने वाले, याग में पताका की तरह महिमावान् अग्नि को यजमानों अरणि-मंथन से प्रकट किया। उस अग्नि की सब लोग स्तुति करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 8.3.3)
Present in the middle of the Yagy, store house of wealth, best, accomplished with offerings-oblations, Lord of the whole world, do not have enmity, controller of the Yagy, great like the flag of the Yagy; Agni Dev was produced by the rubbing of wood. Everyone pray-worship that Agni.
प्र वो मित्राय गायत वरुणाय विपा गिरा। महिक्षत्रावृतं बृहत्॥
हे स्तोताओं! आप मित्र तथा वरुण देवता के लिए उच्च स्वर में स्तवन करें। अत्यन्त महान् योद्धा की भाँति पराक्रम से युक्त वे दोनों यज्ञ करने के स्थान पर विशाल स्तोत्रों को सुनने हेतु आगमन करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 8.3.4)
Hey Stota Gan! You should recite Stuties for Mitr & Varun Dev, loudly. Both of them should come to listen to the large Strotrs, like great warriors, at the site of the Yagy.
सम्राजा या घृतयोनी मित्रश्चोभा वरुणश्च। देवा देवेषु प्रशस्ता॥
तेजस्विता के उत्पत्ति केन्द्र, मित्र तथा वरुण दोनों अधिष्ठाताओं की सभी देवों के मध्य सराहना होती है।(सामवेद उत्तरार्चिक 8.3.5)
Centre of the majesty of evolution, Mitr & Varun Dev, both deities are praised amongest all the demigods-deities.
ता नः शक्तं पार्थिवस्य महो रायो दिव्यस्य। महि वां क्षत्रं देवेषु॥
देवों में ख्यात, बलशाली, हे मित्रा-वरुण देवों! आप हमें भूमण्डल तथा स्वर्गलोक का असीम ऐश्वर्य प्रदान करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 8.3.6)
Famous amongest the demigods, hey mighty Mitra-Varun deities! Grant us enormous grandeur of the earth and heavens.
इन्द्रा याहि चित्रभानो सुता इमे त्वायवः। अण्वीभिस्तना पूतासः॥
हे दिव्य प्रकाशमान् देवराज इन्द्र! याजकों की अँगुलियों के माध्यम से शुद्ध हुआ, उत्कृष्ट पवित्रता से सम्पन्न, यह सोम आपके लिए रखा गया है। आप हमारे यज्ञशाला में पधारें तथा इस सोमरस का सेवन करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 8.3.7)
Hey Devraj Indr, illuminated by divine light! Somras having Ultimate purity, extracted by the fingers of the Yajak has been kept for you. Come to our Yagy Shala and drink it.
इन्द्रा याहि धियेषितो विप्रजूतः सुतावतः। उप ब्रह्माणि वाघतः॥
हे देवराज इन्द्र! उत्कृष्ट ज्ञान द्वारा समझने योग्य आप सोमरस समर्पित करने वाले स्तोताओं द्वारा आवाहित किये गये हैं। आप उनके द्वारा प्रस्तुत स्तोत्र गानों को श्रवण करने हेतु यज्ञ-स्थल में उपस्थित हों।(सामवेद उत्तरार्चिक 8.3.8)
Hey Devraj Indr! You being capable of understanding the excellent knowledge, have been invoked for offering Somras by the Stotas. You should be present at the Yagy site, to listen the Strotr sung by them.
इन्द्रा याहि तूतुजान उप ब्रह्माणि हरिवः। सुते दधिष्व नश्चनः॥
हे अश्वों के पालनकर्ता देवराज इन्द्र! आप हमारे द्वारा गायी जा रही स्तुतियों को सुनने तथा याग में डाली जाने वाली आहुतियों को ग्रहण करने हेतु याग वेदी में जल्द ही उपस्थित हों।(सामवेद उत्तरार्चिक 8.3.9)
Hey nurturer of the horse, Devraj Indr! Quickly present yourself at the Yagy Vedi to listen the Stuties sung by us and accept the offerings-oblations.
तमीडिष्व यो अर्चिषा वना विश्वा परिष्वजत्। कृष्णा कृणोति जिह्वया॥
जिन अग्नि की प्रचण्ड ज्वालाएँ, सभी वनों को घेरकर जलाकर राख कर डालती हैं, उन सामर्थ्यवान् अग्नि देव की हम वन्दना करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 8.3.10)
Let us worship capable Agni Dev who's blazing flames turn the forests into ashes.
य इद्ध आविवासति सुम्नमिन्द्रस्य मर्त्यः। द्युम्नाय सुतरा अपः॥
जो मानव जलती हुई अग्नि में देवराज इन्द्र हेतु हर्ष प्रदान करने वाली हवि अर्पित करते हैं, उनको उत्कृष्ट धन-धान्य से परिपूर्ण करने हेतु देवराज इन्द्र जल-वृष्टि करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 8.3.11)
Those humans who make offerings in the burning fire for the happiness of Devraj Indr are granted rain showers to grant them sufficient wealth & food grains.
ता नो वाजवतीरिष आशून् पिपृतमर्वतः। एन्द्रमग्निं च वोढवे॥
हे इन्द्राग्नि देवता! आप दोनों प्रगतिशील हैं, इसकी प्राप्ति हेतु बलवर्द्धक अनाज तथा तीव्र गति वाले अश्वों को देने की कृपा करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 8.3.12)
Hey Indr & Agni Dev! Both of you are progressive. Grant us healthy-strength boosting food grains and fast moving horses for our progress.
सामवेद उत्तरार्चिक (8.4) ::
प्रो अयासीदिन्दुरिन्द्रस्य निष्कृतं सखा सख्युर्न प्र मिनाति सङ्गिरम्।
मर्य इव युवतिभिः समर्षति सोमः कलशे शतयामना पथा॥
कई तरह से पवित्र किया गया यह सोमरस देवराज इन्द्र के पेट में स्थित हुआ अर्थात् इन्द्र द्वारा इस सोम का सेवन किया गया। मधुरता से युक्त यह सोमरस अपने मित्र स्वरूप देवराज इन्द्र के पेट में जाकर उन्हें कोई पीड़ा नहीं देता है। (अच्छी तरह विद्यमान हो जाता है।) जिस प्रकार नवयुवक नवयुवतियों के साथ घूमते-फिरते हैं, उसी प्रकार सोम वसतीवरी (याग के एक दिन पहले नदी से लाकर पूरी रात रखने के पश्चात् प्रयोग होने वाला जल) आदि में मिश्रित होकर अनेक प्रकार से सुपात्र में प्रविष्ट होता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 8.4.1)
Somras sanctified with various processes is drunk by Devraj Indr. Sweetened Somras do not cause pain in his stomach. The way young boys roam with girls, similarly, Somras is mixed in water and kept in deserving vessel, one day prior to the Yagy.
प्र वो धियो मन्द्रयुवो विपन्युवः पनस्युवः संवरणेष्वक्रमुः।
हरिं क्रीडन्तमभ्यनूषत स्तुभोऽभि धेनवः पयसेदशिश्रयुः॥
हे सोम! आपका ध्यान करने वाले, वन्दना करने के इच्छुक याज्ञिक, जब यज्ञशाला में याग करते हुए धारा से युक्त हरितवर्ण सोमरस को पवित्र करते हैं, तब गायें अपने दूध से इस सोम की सेवा करती हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 8.4.2)
Hey Som! Your worshiper Yagyik, desirous of conducting prayers, when purify the greenish Somras in the Yagy Shala, then the cows serve it with their milk.
आ नः सोम संयतं पिप्युषीमिषमिन्दो पवस्व पवमान ऊर्मिणा।
या नो दोहतो त्रिरहन्नसश्चषी क्षुमद्वाजवन्मधुमत्सुवीर्यम्॥
हे पवित्र किये जाने वाले तेजस्वी सोम! तीनों संध्याओं में प्रयोग किये जाने वाले जो अनाज, प्रशंसा करने योग्य, शक्ति बढ़ाने वाले एवं श्रेष्ठ संतान देने वाले हैं, हमारे उस पोषण से युक्त अन्न को आप अपनी लहरों से स्वच्छ करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 8.4.3)
Hey Tejaswi-majestic Somras, subjected to purification! Let the praise worthy food grains used in the prayers of the three segments of the day, increase strength and grant us best progeny. Clean our nutritious food grains with your waves.
न किष्टं कर्मणा नशद्यश्चकार सदावृधम्। इन्द्रं न यज्ञैर्विश्वगूर्तमृभ्वसमधृष्टं धृष्णुमोजसा॥
समृद्धि प्रदान करने वाले, सभी के द्वारा प्रार्थना करने योग्य, महान् तेजवान्, कभी परास्त न होने वाले, शत्रुओं को पराजित करने वाले देवराज इन्द्र का, जो ऋत्विज् याग द्वारा स्वागत करते हैं, उन्हें अपने कर्म से कोई नष्ट नहीं कर सकता।(सामवेद उत्तरार्चिक 8.4.4)
The Ritviz Gan who welcome Devraj Indr, who increase prosperity, deserve prayers by everyone, has great Tej, never defeated by the enemies; do not get torture-pain due to their efforts-endeavours.(24.01.2026)
अषाढमुग्रं पृतनासु सासहिं यस्मिन्महीरुरुज्रयः।
सं धेनवो जायमाने अनोनवुर्भावः क्षामीरनोनवुः॥
जिन देवराज इन्द्र के प्रकट होने पर महान् तीव्र गति वाली (पशु) गायें उन्हें नमन करती हैं, तथा द्यावा-पृथिवी भी उनके सामने नत-मस्तक होती है, उन प्रबल, शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने वाले तथा शक्तिशाली देवराज इन्द्र की हम वन्दना करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 8.4.5)
The way cows having high speed salute-bow before, Devraj Indr; heavens & earth too lower their head before him. We worship mighty Devraj Indr who is victorious over the strong enemies.
सामवेद उत्तरार्चिक (8.5) ::
सखाय आ नि षीदत पुनानाय प्रगायत। शिशुं न यज्ञैः परि भूषत श्रिये॥
हे सखाओं! आप सभी पवित्र किये जाने वाले सोम हेतु आसन ग्रहण कर स्तवन गाओ। जिस प्रकार पिता अपने पुत्र को सुसज्जित करता है, उसी प्रकार सोम को हविष्यान्न आदि तत्त्वों द्वारा याग में सुशोभित करो।(सामवेद उत्तरार्चिक 8.5.1)
Hey companions! Recite Satwan-prayers for sanctified Somras occupying your seats-cushion. The way a father decorate his son, similarly decorate Som with the offerings of food grains etc in the Yagy.
समी वत्सं न मातृभिः सृजता गयसाधनम्। देवाव्यं 3 मदमभि द्विशवसम्॥
हे स्तोताओं! गृह के मुख्य साधन, अलौकिक गुणों की रक्षा करने वाले, हर्ष बढ़ाने वाले, दोनों तरह (दिव्य तथा पार्थिव) से शक्ति बढ़ाने वाले इस सोम को उसी प्रकार जल में मिलायें, जिस प्रकार बालक अपनी माता के साथ मिलकर वास करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 8.5.2)
Hey Stota Gan! Mix the main tool-means of the house, protector of the divine traits, gladdening, divine Somras in water; booster of both divine and material power, the way a child lives with his mother.
पुनाता दक्षसाधनं यथा शर्धाय वीतये। यथा मित्राय वरुणाय शन्तमम्॥
हे साधकों! गतिशीलता प्राप्ति हेतु, श्रेष्ठ ज्ञान को प्रदान करने हेतु, अधिक से अधिक तृप्ति प्रदान करने वाला बनाने हेतु, शक्ति बढ़ाने हेतु और मित्रा-वरुण देवताओं के निमित्त सोम को पवित्र करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 8.5.3)
Hey devotees! Sanctify Somras for being dynamic, excellent learning, maximum satisfaction, strength increasing and for the sake of drinking by Mitra Varun.
प्र वाज्यक्षाः सहस्त्रधारस्तिरः पवित्रं वि वारमव्यम्॥
शक्ति से सम्पन्न तथा अनेक धाराओं से शोधित किया जाने वाला सोम, भेड़ के बालों से बनी छलनी से छनकर पात्र में प्रवाहित होता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 8.5.4)
Full of power, filtered in many streams through the sieve of sheep wool; Somras enters the pot.
स वाज्यक्षाः सहस्ररेता अद्भिर्मृजानो गोभिः श्रीणानः॥
अपार बल से सम्पन्न, जल से शुद्ध किया हुआ, गाय के दूध में मिलाया गया वह शक्तिवर्द्धक सोम शोधन यन्त्र के माध्यम से छनकर कलश में प्रविष्ट होता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 8.5.5)
Strength booster Somras, possessing extreme power, purified with water, mixed in cow's milk on being filtered through the machine, enter the pot.
प्र सोम याहीन्द्रस्य कुक्षा नृभिर्येमानो अद्रिभिः सुतः॥
पत्थरों से कूटकर अभिषुत किया हुआ, साधकों द्वारा विधिवत् शुद्ध किया हुआ सोमरस, देवराज इन्द्र के उदर में विद्यमान हो।(सामवेद उत्तरार्चिक 8.5.6)
Extracted by crushing with stones, mixed in cows milk, procedurally purified Somras is present in the stomach of Devraj Indr.
ये सोमासः परावति ये अर्वावति सुन्विरे। ये वादः शर्यणावति॥
जो सोम दूर अथवा निकट के स्थानों में शर्यणावत् नदियों के समीप पैदा होते तथा पवित्र होते हैं। वह हमारी मनोकामनाओं को पूर्ण करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 8.5.7)
शर्यणावत् :: एक प्राचीन स्थान, प्रसिद्ध तीर्थ और सरोवर जो कि वर्तमान थानेश्वर के पास स्थित 'रामहृद' (रामहृद) माना जाता है।
Som produced far & near in the terrain of Shryavat rivers should accomplish our wishes-desires.
य आर्जीकेषु कृत्वसु ये मध्ये पस्त्यानाम्। ये वा जनेषु पञ्चसु॥
जो सोम आर्जीक देश में, कर्मरत देशों में, सरोवर के निकट अथवा पंचजनों के मध्य में पैदा होता तथा शुद्ध किया जाता है, वह हमें सुख पहुँचाने वाला हो।(सामवेद उत्तरार्चिक 8.5.8)
Som produced in Arjik region, in busy terrains, close to the reservoir-Sarovar or between the Panch Jan is purified to grant us pleasure-comforts.
ते नो वृष्टिं दिवस्परि पवन्तामा सुवीर्यम्। स्वाना देवास इन्दवः॥
अभिषुत कर शुद्ध किया हुआ, प्रकाशवान् विलक्षण सोम, हमें देवलोक से वर्षा तथा उत्कृष्ट शक्ति से परिपूर्ण पौष्टिक अन्न देने की कृपा करे।(सामवेद उत्तरार्चिक 8.5.9)
Extracted & purified, illuminated amazing Som should grant us rains from the heavens and excellent strength possessing nutritious food grains.
सामवेद उत्तरार्चिक (8.6) ::
आ ते वत्सोमनो यमत्परमाच्चित्सधस्थात्। अग्ने त्वां कामये गिरा॥
हे अग्नि देव! वत्स ऋषि स्तवनों द्वारा आपसे अभिलाषा करते हैं कि आपका मन आकाश से भी ऊपर अर्थात् स्वर्गलोक से भी हमारे समीप सहायता करने के निमित्त पधारे।(सामवेद उत्तरार्चिक 8.6.1)
Hey Agni Dev! Vats Rishi through Satwan-prayers expect that your innerself, much over the sky i.e., heavens, should come to help us.
पुरुत्रा हि सदृङ्ङसि दिशो विश्वा अनु प्रभुः। समत्सु त्वा हवामहे॥
हे अग्नि देव! आप सभी को एक समान दृष्टि से देखने वाले, सब दिशाओं के अधिष्ठाता हैं, अतएव संग्राम में अपने संरक्षण के लिए, हम आपको आहूत करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 8.6.2)
Hey Agni Dev! You look at everyone equally and is the deity of all directions. Hence, we invoke you for protection in the war.
समत्स्वग्निमवसे वाजयन्तो हवामहे। वाजेषु चित्रराधसम्॥
हे दिव्य, शक्तिवान् अग्नि देव! हम युद्ध में अपनी सुरक्षा करने हेतु, अपनी शक्ति का प्रयोग करने के लिए, आपको आहूत करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 8.6.3)
Hey divine, mighty Agni Dev! We invoke you for our protection and use of our strength in the war.
त्वं न इन्द्रा भर ओजा नृम्णं शतक्रतो विचर्षणे। आ वीरं पृतनासहम्॥
हे सैकड़ों कर्म करने वाले, विशेष तरीके से देखने वाले देवराज इन्द्र! आप हमें तेजवान् बनने वाली शक्ति प्रदान करें तथा संग्राम में शत्रुओं का विनाश कर, वीर संतान प्रदान करने वाले हों।(सामवेद उत्तरार्चिक 8.6.4)
Hey performer of hundreds of deeds (Yagy Karm) looking in a specific manner Devraj Indr! You should use your power to make us aurous-Tejaswi, destroy the enemy in the war-battle and grant brave son to humiliate the enemy.
त्वं हि नः पिता वसो त्वं माता शतक्रतो बभूविथ। अथा ते सुम्नमीमहे॥
हे सभी को शरण देने वाले, सैकड़ों यज्ञकर्म करने वाले देवराज इन्द्र! आप पिता के समान पालनकर्ता तथा माता के समान धारण करने वाले हैं। इसीलिए हम आपके समीप सुख प्राप्ति की कामना से उपस्थित होते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 8.6.5)
Hey performer of hundreds of Yagy Karm, granting shelter to all, Devraj Indr! You nurture us like a father and nourish-support us like a mother. Therefore, we wish to be close to you for having comforts-pleasure.
त्वां शुष्मिन्युरुहूत वाजयन्तमुप ब्रुवे सहस्कृत। स नो रास्व सुवीर्यम्॥
हे बलशाली, सहस्त्रों द्वारा स्तुति किये जाने वाले, प्रशंसा के योग्य देवराज इन्द्र! हम आपकी वन्दना करते हैं। हम आपसे श्रेष्ठ शक्ति प्राप्त करने की इच्छा रखते हैं, आप हमें वह शक्ति प्रदान करने की कृपा करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 8.6.6)
Hey mighty, worshiped by thousands, deserving appreciation, Devraj Indr! We worship-pray to you. We expect best powers from you. Grant us such might-strength.
यदिन्द्र चित्र म इह नास्ति त्वादातमद्रिवः। राधस्तन्नो विदद्वस उभयाहस्त्या भर॥
हे वज्रपाणि, अद्भुत बल से युक्त देवराज इन्द्र! जो आपके द्वारा दिया हुआ धन-सामर्थ्य हमारे पास नहीं है, उस धन को हे वैभवशाली देवराज इन्द्र! आप अपने दोनों हाथों से हमें प्रचुर मात्रा में देने की कृपा करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 8.6.7)
Hey wielder of Vajr, possessing amazing power, Devraj Indr! Hey grandeur possessing Devraj Indr! Grant us the wealth, capability which we do not posses. Grant us sufficient wealth with your both hands.(25.01.2026)
यन्मन्यसे वरेण्यमिन्द्र द्युक्षं तदा भर। विद्याम तस्य ते वयमकूपारस्य दावनः॥
हे देवराज इन्द्र! जिस धन-धान्य को आप उत्कृष्ट तथा तेजवान् मानते हैं, वह हमें प्रचुर मात्रा में प्रदान करें तथा साथ ही साथ हम उस धन को सृष्टि का हित करने हेतु दान करने के योग्य भी हों अर्थात् दानी प्रवृत्ति वाले हों।(सामवेद उत्तरार्चिक 8.6.8)
Hey Devraj Indr! Grant us the wealth & food grains which you consider best; in sufficient quantity. We should have the tendency to donate the wealth for the benefit-welfare of the society.
यत्ते दिक्षु प्रराध्यं मनो अस्ति श्रुतं बृहत्। तेन दृढा चिदद्रिव आ वाजं दर्षि सातये॥
हे वज्रपाणि देवराज इन्द्र! आप सभी दिशाओं में स्तुति करने योग्य, ख्याति प्राप्त तथा विशाल मन से हमें स्थायी धन तथा पराक्रम प्रदान करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 8.6.9)
Hey Vajr wielding Devraj Indr! You deserve to be worshiped in all directions. Attain name fame & honour and grant us immovable wealth and valour showing large heart-innerself.
सामवेद उत्तरार्चिक (9) :: ऋषि :- प्रतर्दनो दिवोदासौ, असित, काश्यपो देवलो वा, उचथ्य, अमहीयु, निघुवि, काश्यप, वसिष्ठ, सुकक्ष, कवि देवातिथि, काण्व, भर्ग, प्रगाथ, अम्बरीष, ऋजिश्वा च अग्नये धिष्ण्या ऐश्वरा, उशना काव्य, नृमेध, जेता माधुच्छन्दस; देवता :- पवमान, सोम, अग्नि, इन्द्र; छन्द :- त्रिष्टुप्, गायत्री, जगती, प्रगाथ, अनुष्टुप्, उष्णिक्।
सामवेद उत्तरार्चिक (9.1) ::
शिशुं जज्ञानं हर्यतं मृजन्ति शुम्भन्ति विप्रं मरुतो गणेन।
कविर्गीभिः काव्येना कविः सन्त्सोमः पवित्रमत्येति रेभन्॥
पृथ्वी पर जन्म लेने वाले बच्चे की भाँति सर्वजनों को आनन्दित करने वाले सोमरस को मरुद्गण परिष्कृत करते हैं। सात गुणों से सम्पन्न यह बुद्धि बढ़ाने वाला सोमरस वन्दनाओं के साथ ध्वनि करता हुआ पवित्र हो जाता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 9.1.1)
Like the infant who get birth over the earth, Somras which grant pleasure to all is sanctified by the Marud Gan. Intelligence boosting, Somras equipped with seven qualities, is purified with the prayers making sound.
ऋषिमना य ऋषिकृत्स्वर्षाः सहस्रनीथः पदवीः कवीनाम्।
तृतीयं धाम महिषः सिषासन्त्सोमो विराजमनु राजति ष्टुप्॥
ऋषियों के सदृश सद्द्धचरण वाला, ऋषित्व देने वाला, ज्ञान प्रदान करने वाला, सोम अपने आप में महान् है। यह तीसरे धाम देवलोक में निवास करने वाले प्रतापी देवराज इन्द्र को और भी ज्यादा ओज से युक्त करता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 9.1.2)
Somras behaving like the virtuous Rishis, granting sage hood and learning is great in itself. It grant even more radiance to Devraj Indr who reside in the heavens.
चमूषच्छ्येनः शकुनो विभृत्वा गोविन्दुर्द्रप्स आयुधानि बिभ्रत्।
अपामूर्मिं सचमानः समुद्रं तुरीयं धाम महिषो विवक्ति॥
हे आयुधों को धारण करने वाले सोम! आप समस्त क्षमताओं से सम्पन्न, प्रशंसा किये जाने वाले, पराक्रमी, सागर की लहरों के सदृश वेगवान्, प्रवाहित होने वाले, गाय के दूध में मिश्रित होने वाले हैं। आप चतुर्थ धाम (मोक्षधाम) में विद्यमान होते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 9.1.3)
Hey Som wielding weapons! You are praise worthy, majestic, fast moving like the waves of ocean, fluid and mixes int he cow's milk. You have enormous capability. You are stabilised in the Ultimate abode i.e., the fourth abode.
एते सोमा अभि प्रियमिन्द्रस्य काममक्षरन्। वर्धन्तो अस्य वीर्यम्॥
यह सोम रसों की बारिश करने वाला व देवराज इन्द्र को अति प्रिय है। यह देवराज इन्द्र के पराक्रम में वृद्धि करने वाला है।(सामवेद उत्तरार्चिक 9.1.4)
Som rain shower saps-juices and is dear to Devraj Indr. It boosts the valour of Devraj Indr.
पुनानासश्चमूषदो गच्छन्तो वायु मश्विना। ते नो धत्त सुवीर्यम्॥
हे पावन सोम! आप वायु तथा अश्वनी कुमारों के साथ मिलकर हमें सर्वोत्तम बल प्रदान करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 9.1.5)
Hey pious Som! You should mix up with Vayu Dev & Ashwani Kumars to grant us best strength.
इन्द्रस्य सोम राधसे पुनानो हार्दि चोदय। देवानां योनिमासदम्॥
हे शुद्ध सोम देव! आप देवराज इन्द्र की उपासना के लिए हमें हार्दिक प्रेरणा प्रदान करें। हम देवताओं के अनुरूप याग कर्म के लिए आएँ हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 9.1.6)
Hey pure Som! You should inspire us to worship Devraj Indr, whole heartedly. We have come to accomplish Yagy as per the suitability of the demigods-deities.
मृजन्ति त्वा दश क्षिपो हिन्वन्ति सप्त धीतयः। अनु विप्रा अमादिषुः॥
हे सोम! याजकों की दसों अँगुलियाँ एक साथ मिलकर आपको परिष्कृत करती है। सप्त पुरोहितगण आपको तृप्त करते हैं। विद्वान् पुरुष आपके अनुयायी बनते हैं तथा आनन्दित होते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 9.1.7)
Hey Som! Ten fingers o f the Yajak work together to squeeze-purify you. Seen priests satisfy-satiate you. Intellectuals follow you and get pleasure.(26.01.2026)
देवेभ्यस्त्वा मदाय कं सृजानमति मेष्यः। सं गोभिर्वासयामसि॥
शोधन यन्त्र के माध्यम से शोधित होने वाले, हर्षवर्द्धक, सुख प्रदान करने वाले हे सोम देव! आपको देवगणों को प्रसन्न करने के निमित्त हम गाय के दूध, घी आदि में मिश्रित करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 9.1.8)
Hey gladdening, comfortable Somras, purified through purification plant! We mix you in cow's milk ghee etc. to please demigods-deities.
पुनानः कलशेष्वा वस्त्राण्यरुषो हरिः। परि गव्यान्यव्यत॥
पवित्रता प्राप्त कर सुपात्र में प्रतिष्ठित होने वाले हरित वर्ण सोम को गो दुग्ध अपने में समाहित कर लेता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 9.1.9)
Greenish Somras having attained purity, stored in the pot, absorb cow's milk in it.
मघोन आ पवस्व नो जहि विश्वा अप द्विषः। इन्दो सखायमा विश॥
हे सोम! आप हमें धन-वैभव से परिपूर्ण करने के निमित्त पावन हों। शत्रुता करने वालों का आप विनाश कर दें तथा मित्र देवराज इन्द्र के साथ मिलकर एक हो जाएँ।(सामवेद उत्तरार्चिक 9.1.10)
Hey Som Dev! You should be purified to grant us wealth, grandeur, prosperity. Destroy the enemies and form single entity with Devraj Indr.
नृचक्षसं त्वा वयमिन्द्रपीतं स्वर्विदम्। भक्षीमहि प्रजामिषम्॥
हे सोम! सभी प्राणियों की देखभाल करने वाले, सब कुछ जानने वाले देवराज इन्द्र के द्वारा सेवन किये जाने वाले आप हमें संतति, शक्ति तथा सच्चा ज्ञान देने की कृपा करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 9.1.11)
Hey Somras! On bring drunk by Devraj Indr; who look after everyone and know everything; you should grant us progeny, strength and true learning.
वृष्टिं दिवः परि स्त्रव द्युम्नं पृथिव्या अधि। सहो नः सोम पृत्सु धाः॥
हे सोमदेव! आप अन्तरिक्ष से धरती पर दिव्यता की बारिश करें। धरती पर पोषण युक्त अनाज पैदा करें तथा हमें शत्रुओं के साथ युद्ध करने का बल प्रदान करने की कृपा करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 9.1.12)
Hey Som Dev! Shower divinity from the space over the earth. We should produce nourishing food grains. Grant us strength to fight with the enemy.
सामवेद उत्तरार्चिक (9.2) ::
सोमः पुनानो अर्षति सहस्त्रधारो अत्यविः। वायोरिन्द्रस्य निष्कृतम्॥
पावन किया जाने वाला, सहस्रों धाराओं से भेड़ के बालों से निर्मित शोधन यन्त्र से छनकर शुद्ध होने वाला सोम, वायु देव तथा इन्द्र देव के सेवन करने के निमित्त सुपात्र में प्रतिष्ठित होता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 9.2.1)
Purified Somras having thousands of streams having passed through the filtration plant constituting of sheep wool, is stored in the suitable-deserving vessel for drinking by Vayu Dev and Devraj Indr.
पवमानमवस्यवो विप्रमभि प्र गायत। सुष्वाणं देववीतये॥
अपनी सुरक्षा की इच्छा करने वाले हे साधकों! समस्त जनों को पावन करने वाले, विशिष्ट प्रसन्नता प्रदान करने वाले, देवताओं के सेवन करने योग्य, शुद्ध सोम हेतु आदर पूर्वक स्तवनों को गाओ।(सामवेद उत्तरार्चिक 9.2.2)
Hey devotees having the desire of your security! Sing Satwan respectfully for sanctified Somras granting specific pleasure, to be consumed by demigods.
पवन्ते वाजसातये सोमाः सहस्रपाजसः। गृणाना देववीतये॥
पोषक आहार उपलब्ध कराने के निमित्त स्तुति किया जाने वाला, देवों के समान सहस्रों तरह से शक्ति बढ़ाने वाला, यह सोमरस सिद्ध किया जा रहा है।(सामवेद उत्तरार्चिक 9.2.3)
For having nourishing food, processed through Stuties, increasing strength in hundreds of ways like the demigods, Somras is being sanctified.
उत नो वाजसातये पवस्व बृहतीरिषः। द्युमदिन्दो सुवीर्यम्॥
हे अलौकिक सोम! आप जीवन-समर में सफलता प्राप्त करने हेतु हमें उत्कृष्ट पोषण देने की कृपा करें, हमें तेजवान् तथा शौर्यवान् बनाएँ।(सामवेद उत्तरार्चिक 9.2.4)
शौर्यवान :: बहादुर, दिलेर, साहसी, वीर; valiant, courageous, brave, gallant, chivalrous.
Hey divine Som Dev! Grant us excellent nutrition for attaining success in the battle-struggle for life. Make us Tejaswi-energetic and courageous.
अत्या हियाना न हेतुभिरसृग्रं वाजसातये। वि वारमव्यमाशवः॥
हे सोम देव! आप जीवन-समर को प्रेरणा प्रदान करने वाले हैं। याजक गण आपको तीव्र वेग से शुद्ध करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 9.2.5)
Hey Som Dev! You inspire us in the fight for struggle in life. Yajak Gan purified with fast speed.
ते नः सहस्रिणं रयिं पवन्तामा सुवीर्यम्। स्वाना देवास इन्दवः॥
वह परिष्कृत किया गया विलक्षण सोमरस, हमें सहस्रों वैभव तथा श्रेष्ठ वीरता प्रदान करे।(सामवेद उत्तरार्चिक 9.2.6)
Amazing, sanctified Somras should grant us thousands of kinds of grandeur and best bravery.
वाश्रा अर्षन्तीन्दवोऽभि वत्सं न मातरः। दधन्विरे गभस्त्योः॥
जिस प्रकार माता मधुर ध्वनि में बोलती हुई अपने शिशु के पास जाती है, उसी तरह ध्वनि करता हुआ सोम सुपात्र में प्रविष्ट करता है तथा हाथों में लिया जाता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 9.2.7)
The way a mother goes to the infant speaking in sweet voice, similarly the Somras enters the suitable pot, held in the hands.
जुष्ट इन्द्राय मत्सरः पवमानः कनिक्रदत्। विश्वा अप द्विषो जहि॥
हे देवराज इन्द्र को संतुष्टि प्रदान करने वाले सोम! आप पवित्रता को प्राप्त करके ध्वनि करते हुए हमारे सभी शत्रुओं का संहार कर दे।(सामवेद उत्तरार्चिक 9.2.8)
Hey Somras granting satisfaction-satiation to Devraj Indr! While attaining purity, destroy all enemies making sound simultaneously.
अपघ्नन्तो अराव्णः पवमानाः स्वर्दृशः। योनावृतस्य सीदत॥
हे अलौकिक सोम! जो लोग स्वार्थवश दान नहीं करते हैं, आप उनका विनाश कर दें तथा अपने वर्चस्वी स्वरूप में यज्ञशाला में उपस्थित हों।(सामवेद उत्तरार्चिक 9.2.9)
वर्चस्वी स्वरूप :: ऐसा व्यक्ति, समूह, तत्व जो दूसरों पर सर्वोच्च नियंत्रण, शक्ति, प्रभाव; supremacy, dominant form, predominant nature, ascendant state.
Hey divine Som Dev! Destroy those who do not donate due to selfishness and remain yourself present in the Yagy Shala in predominant state-form.
सामवेद उत्तरार्चिक (9.3) ::
सोमा असृग्रमिन्दवः सुता ऋतस्य धारया। इन्द्राय मधुमत्तमा॥
याग हेतु परिष्कृत किये गये, मधुर रस से युक्त सोम को देवराज इन्द्र के पान करने के लिए प्रस्तुत करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 9.3.1)
sweetened Somras sanctified for the purpose of Yagy is offered to Devraj Indr for drinking.
अभि विप्रा अनूषत गावो वत्सं न धेनवः। इन्द्रं सोमस्य पीतये॥
हे साधकों! जिस तरह गौएँ अपने बछड़ों को दुग्ध पान कराने हेतु व्याकुल हो जाती हैं, उसी तरह आप देवराज इन्द्र को सोमरस का सेवन कराने हेतु तत्पर हो जाएँ। सोमपान हेतु आप देवराज इन्द्र की वन्दना करके उनसे प्रार्थना करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 9.3.2)
Hey devotees! The way cows are eager to feed their calf with milk similarly you should be ready to offer Somras for drinking to Devraj Indr. Worship-pray Devraj Indr for drinking Somras.
मदच्युत्क्षेति सादने सिन्धोरूर्मा विपश्चित्। सोमो गौरी अधि श्रितः॥
आनन्दवर्द्धक सोमरस यज्ञशाला में स्थापित होता है। नदी की लहरों के सदृश यह वाणी को तरंगित करता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 9.3.3)
Gladdening Somras is established in the Yagy Shala. It resonate the voice like the waves in the river.
दिवो नाभा विचक्षणोऽव्या वारे महीयते। सोमो यः सुक्रतुः कविः॥
हे सोम देव! आप उत्कृष्ट कर्म करने वाले, विद्वान, अद्भुत, अन्तरिक्ष की नाभि हैं। जल के साथ शोधन यन्त्र से शोधित होकर आप महिमा मण्डित हो जाते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 9.3.4)
महिमा मंडित :: गुणगान किया हुआ, प्रशंसित, सम्मानित, यश से सुशोभित; glorified, exalted, adorned with glory, majestic, praised.
Hey Som Dev! You are a performer of excellent deeds, an enlightened, amazing, forming the nucleus-navel of space. You are glorified on being purified in the water purification plant.
यः सोमः कलशेष्वा अन्तः पवित्र आहितः। तमिन्दुः परि षस्वजे॥
पावन होकर सुपात्र में प्रतिष्ठित सोमरस में चंद्रमा के उत्कृष्ट गुणों का संचार होता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 9.3.5)
Somras acquire the excellent properties of Moon having stored in a nice pot.
प्र वाचमिन्दुरिष्यति समुद्रस्याधि विष्टपि। जिन्वन्कोशं मधुश्श्रुतम्॥
मधुर रस-संयुक्त सोम, अन्तरिक्ष में प्रविष्ट होकर ध्वनि करता हुआ सुपात्र को समुद्र की तरह पूर्णतया भर देता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 9.3.6)
Sweetened Somras make sound while entering the sky and fills the nice-suitable pot like the oceans completely.
नित्यस्तोत्रो वनस्पतिर्धेनामन्तः सबर्दुघाम्। हिन्वानो मानुषा युजा॥
प्रतिदिन स्तुति किये जाने वाले, वन के अधिपति सोमदेव, उत्कृष्ट पुरुषों को एकत्रित होने की प्रेरणा प्रदान करें तथा मधुर बोलने वालों के हृदय से निकली स्तुतियों को स्वीकारें।(सामवेद उत्तरार्चिक 9.3.7)
Lord of forest Som Dev; who is worshiped every day, should inspire the excellent people to gather and he should accept the Stuties coming out of their hearts.(27.01.2026)
आ पवमान धारया रयिं सहस्रवर्चसम्। अस्मे इन्दो स्वाभुवम्॥
हे पवित्रता को प्राप्त करने वाले सोम देव! आप हमें हजारों गुणों से युक्त अपने धाम (निवास स्थल) तथा वैभव का अधिकारी नियुक्त करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 9.3.8)
Hey Som Dev, attaining purity! Grant us the capability to acquire your thousands of characterises and grandeur.
Appoint us as rightful recipients of your abode and divine splendour, endowed with countless virtues.
अभि प्रिया दिवः कविर्विप्रः स धारया सुतः। सोमो हिन्वे परावति॥
उत्कृष्ट स्थान पर निवास करने वाले विद्वान् की भाँति, स्वर्गलोक में वास करने वाला सोम, यज्ञशाला की तरफ उत्तम प्रेरणाओं का संचार करता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 9.3.9)
Som residing at the best place in heavens communicate excellent inspiration towards the Yagy Shala, like the scholars residing at excellent place.
सामवेद उत्तरार्चिक (9.4) ::
उत्ते शुष्मास ईरते सिन्धोरूर्मेरिव स्वनः। वाणस्य चोदया पविम्॥
हे सोम! आपके गति पूर्वक गिरने से सागर की लहरों के सदृश आवाजें उत्पन्न होती हैं। आप वाणी से उच्चारित शब्दों को प्रेरणा प्रदान करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 9.4.1)
Hey Somras! When you fall with speed, generate sound like the ocean waves and inspire the words uttered by voice-speech.
प्रसवे त उदीरते तिस्रो वाचो मखस्युवः। यदव्य एषि सानवि॥
हे सोम! आपके प्रकट होने के पश्चात् याज्ञिक जन ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा सामवेद के मन्त्रों का उच्चारण करते हैं, उस समय आप ऊँचे पद पर आरूढ़ होकर पवित्र होने के लिए उद्यत हो जाते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 9.4.2)
Hey Somras! After your appearance, the Yagyik Gan recite Mantrs from Rig Ved and Sam Ved and then you become ready to reach a higher place to be purified.
अव्या वारैः परिप्रियं हरिं हिन्वन्त्यद्रिभिः। पवमानं मधुश्चतम्॥
याजकगण पत्थरों से कूटकर निकाले गये, हरितवर्ण के, मनोहर माधुर्य युक्त सोमरस को भेड़ के बालों से निर्मित छलनी से छानकर शुद्ध करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 9.4.3)
Yajak Gan purify-filter the delightful, sweetened greenish Somras extracted by crushing with stones, through the sieve made of sheep wool.
आ पवस्व मदिन्तम पवित्रं धारया कवे। अर्कस्य योनिमासदम्॥
हे अत्यन्त हर्ष प्रदान करने वाले सोम देव! देवराज इन्द्र को संतुष्ट करने के निमित्त आप छलनी से स्वच्छधारा के रूप में छनें।(सामवेद उत्तरार्चिक 9.4.4)
Hey Somas producing extreme pleasure! To satisfy Devraj Indr you should be filtered in the sieve as a clean stream.
स पवस्व मदिन्तम गोभिरञ्जानो अक्तुभिः। एन्द्रस्य जठरं विश॥
हे हर्षदायक सोमदेव! गौ के दूधादि के मिश्रण में स्रवित होकर आप देवराज इन्द्र के पेट में प्रविष्ट हों।(सामवेद उत्तरार्चिक 9.4.5)
Hey gladdening Somras! You should enter the stomach of Devraj Indr on being mixed in cow's milk.
सामवेद उत्तरार्चिक (9.5) ::
अया वीती परि त्रव यस्त इन्दो मदेष्वा। अवाहन्नवतीर्नव॥
हे सोम! देवराज इन्द्र के पान करने के निमित्त आप स्वच्छ हों। आपका अलौकिक रस जीवन-समर में अवरोधों को विनष्ट करने में सक्षम है।(सामवेद उत्तरार्चिक 9.5.1)
Hey Som! You should be purified for drinking by Devraj Indr. Your divine sap-juice is capable of destroying struggles-obstecles in life.
पुरः सद्य इत्थाधिये दिवोदासाय शंबरम्। अध त्यं तुर्वशं यदुम्॥
सोमरस का सेवन करने के पश्चात् देवराज इन्द्र ने याग करने वाले दिवोदास हेतु शम्बरासुर (अहित करने वाले) का, तुर्वश (कोप) का तथा यदु (नियंत्रित न किये जाने वाले) का विनाश किया।(सामवेद उत्तरार्चिक 9.5.2)
After drinking Somras Devraj Indr destroyed harming Shambkasur, furious Turvash and uncontrolled Yadu.
परि णो अश्वमश्वविद्गोमदिन्दो हिरण्यवत्। क्षरा सहस्रिणीरिषः॥
हे सोमदेव ! आप हमें गाय, अश्व, स्वर्णादि समृद्धि तथा मनवांछित पौष्टिकता से युक्त आहार प्रदान करने की कृपा करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 9.5.3)
Hey Som Dev! Grant us cows, horses, gold, prosperity and desired nourishing food.
अपघ्नन्पवते मृधोऽप सोमो अराव्णः। गच्छन्निन्द्रस्य निष्कृतम्॥
यह सोमरस विकृतियों को विनष्ट कर, दान न करने वालों को दूर कर, देवराज इन्द्र के स्थान पर्यन्त पहुँचने हेतु निर्मल होता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 9.5.4)
Somras is purified by the removal of impurities, repel non donors and become pure after reaching the abode of Devraj Indr.
महो नो राय आ भर पवमान ही मृधः। रास्वेन्दो वीरवद्यशः॥
हे शुद्ध कर्म करने वाले सोम! आप हमें अत्यधिक साधन तथा ख्याति प्राप्त कराएँ तथा शत्रुओं का संहार करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 9.5.5)
Hey Som performing pure-virtuous deeds! Make available extreme means and fame-glory to us destroying the enemies.
न त्वा शतं च न हृतो राधो दित्सन्तमा मिनन्। यत्पुनानो मखस्यसे॥
हे निर्मल सोमदेव! याज्ञिकों को जिस समय आप धन-सम्पत्ति प्रदान करने की कामना करते हैं, उस समय आपको कोई नहीं रोक सकता, यहाँ तक कि सैकड़ों शत्रु भी नहीं।(सामवेद उत्तरार्चिक 9.5.6)
Hey pure Som Dev! When you wish to grant wealth and prosperity to the Yagyik, none can stop you, not even the enemies.
अया पवस्व धारया यया सूर्यमरोचयः। हिन्वानो मानुषीरपः॥
हे सोम! मानवों के लिए कल्याणकारी, जल-वृष्टि करने वाले आप सूर्य देव को परिव्याप्त करने वाले सामर्थ्य से स्वयं भी निर्मल हों।(सामवेद उत्तरार्चिक 9.5.7)
Hey Som! You shower rains for the welfare of humans, pervade Sury Dev and purify yourself due to your own capability.
अयुक्त सूर एतशं पवमानो मनावधि। अन्तरिक्षेण यातवे॥
यह शुद्ध सोम, मनवांछित उच्च पद प्राप्त करने हेतु संकल्पित ऋत्विजों को सूर्य के अश्वों (रश्मियों) के सदृश गति देने में सक्षम है।(सामवेद उत्तरार्चिक 9.5.8)
Pure Som is capable of granting desired high designation to the Ritviz like the speed of the horses of Sury Dev.
उत त्या हरितो रथे सूरो अयुक्त यातवे। इन्दुरिन्द्र इति ब्रुवन्॥
देवराज इन्द्र सोम को आवाहित करते हुए, हरिताभ अश्वों को सूर्य के रथ में गमन करने हेतु संयोजित करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 9.5.9)
Devraj Indr deploy green coloured horses in the charoite of Sury Dev, invoking Som to travel-move.
सामवेद उत्तरार्चिक (9.6) ::
अग्नि वो देवमग्निभिः सजोषा यजिष्ठं दूतमध्वरे कृणुध्वम्।
यो मत्र्येषु निध्रुविर्ऋतावा तपुर्मूर्धा घृतान्नः पावकः॥
हे देवगणों! अनेकों अग्नियों में आराध्य, उस यज्ञाग्नि को दूत बनाकर प्रयोग करो, जो अग्नि मानवों की सखा है, घी ही जिसका भोजन है तथा जिसका ओज विकृतियों का विनाश करने वाला तथा स्वच्छता प्रदान करने वाला है।(सामवेद उत्तरार्चिक 9.6.1)
Hey demigods-deities! Deity in several Agni, use that Yagyagni which is the friend of humans, ghee is its food, the aura of which destroy the deformities-distortions and grant cleanliness.
प्रोथदश्वो न यवसेऽविष्यन्यदा महः संवरणाद्व्यस्थात्।
आदस्य वातो अनु वाति शोचिरध स्म ते व्रजनं कृष्णमस्ति॥
जिस प्रकार हिन-हिनाते अश्व घास को चरते चले जाते हैं, उसी तरह दावानल पेड़ों के भीतर चलता जाता है। ऐसी स्थिति में हवा के गतिमान होने से जिस ओर काला धुंआ जाता है, वही राह अग्नि का होता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 9.6.2)
The way the neighing horses eat grass, similarly the jungle fire enters the woods. In such situation the direction of blowing air producing black smoke, is the direction of Agni as well.
उद्यस्य ते नवजातस्य वृष्णोऽग्ने चरन्त्यजरा इधानाः।
अच्छा द्यामरुषो धूम एषि सं दूतो अग्न ईयसे हि देवान्॥
हे अग्ने! आपकी नूतन ज्वालाएँ बारिश करने में सक्षम हैं। हे दीप्तिमान् अग्ने! आप समाप्त न होने वाली अपनी ऊर्जा के साथ स्वर्गलोक में पहुँचते हैं और देवगणों को संतुष्टि प्रदान करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 9.6.3)
Hey Agne! Your new flames are capable of causing rains. Hey illuminated fire! You carry never ending energy to heavens and satisfy the demigods.(28.01.2026)
तमिन्द्रं वाजयामसि महे वृत्राय हन्तवे। स वृषा वृषभो भुवत्॥
देवराज इन्द्र स्वयं अत्यन्त शक्तिशाली हैं। आसुरी वृत्रियों के सर्वनाश हेतु उन्हें हम और भी ज्यादा शक्ति से सम्पन्न बनाते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 9.6.4)
Devraj Indr is very powerful. We make him even more powerful to destroy-eliminate the demonic powers.
इन्द्रः स दामने कृत ओजिष्ठः स बले हितः। द्युम्नी श्लोकी स सोम्यः॥
देवराज इन्द्र दान (धन) देने हेतु ही उत्पन्न हुए हैं। वह शक्ति से युक्त होने हेतु सोमरस का सेवन करते हैं। प्रशंसा किये जाने योग्य कर्म करने वाले देवराज इन्द्र सोमपान कराने योग्य हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 9.6.5)
Devraj Indr has taken birth for charity-making donations. He drink Somras to acquire strength. Devraj Indr deserve drinking Somras on accomplishing of appreciable job.
गिरा वज्रो न सम्भृतः सबलो अनपच्युतः। ववक्ष उम्रो अस्तृतः॥
वज्रधारक, शक्तिमान्, वर्चस्वी, स्तवनों द्वारा प्रशंसा किये जाने वाले, सूरमा तथा कभी परास्त न होने वाले देवराज इन्द्र, याजकों को समृद्धवान् बनाने की अभिलाषा रखते हैं। (सामवेद उत्तरार्चिक 9.6.6)
Vajr wielding, mighty, dominant, gladdened by Stwan-prayers, brave and never defeating Devraj Indr wish to make the Yajak Gan prosperous.
सामवेद उत्तरार्चिक (9.7) ::
अध्वयों अद्रिभिः सुतं सोमं पवित्र आ नय। पुनाहीन्द्राय पातवे॥
हे अध्वर्यु! पत्थरों द्वारा कूटकर तैयार किये गये इस सोमरस को, देवराज इन्द्र के पान करने के निमित्त शोधन यन्त्र से छानकर शुद्ध करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 9.7.1)
Hey priests! Purify Somras obtained by crushing with stones, in the purification for drinking by Devraj Indr.
तव त्य इन्दो अन्धसो देवा मधोर्व्याशत। पवमानस्य मरुतः॥
हे सोमदेव! वह देवराज इन्द्र तथा मरुद्गण आपके माधुर्ययुक्त तथा निर्मल करने वाले पुष्टिवर्द्धक रस का सेवन करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 9.7.2)
Hey Som! Devraj Indr & Marud Gan drink your sweetened and pure nourishing Somras.
दिवः पीयूषमुत्तमं सोममिन्द्राय वज्रिणे। सुनोता मधुमत्तमम्॥
हे स्तोताओं! यह सोमरस जो बहुत मीठा, स्वर्गलोक के अमृत के समान तथा सर्वोत्तम है। आप इसे वज्रधारी देवराज इन्द्र के पान करने के निमित्त परिष्कृत करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 9.7.3)
Hey Stotas! Somras is very sweet, like the elixir-nectar of the heavens and is the best. Sanctify it for drinking by Vajr wielding Devraj Indr.
घर्ता दिवः पवते कृत्व्यो रसो दक्षो देवानामनुमाद्यो नृभिः।
हरिः सृजानो अत्यो न सत्वभिर्वृथा पाजांसि कृणुषे नदीष्वा॥
पवित्र करने योग्य, रस से परिपूर्ण, देवताओं के पराक्रम में वृद्धि करने वाला, याजकों द्वारा प्रशंसा किये जाने वाला, सभी को धारण करने वाला सोम उच्चाकाश में स्वच्छ होता है। यह हरिताभ सोमरस घोड़े के सदृश गतिशील धाराओं में गिरता हुआ, अपनी योग्यता को प्रकट करता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 9.7.4)
Som capable of sanctifying, full of juice-sap, increasing the valour-majesty of demigods, appreciated by the Yajak Gan, supporter of all; is purified in the higher space-sky. Greenish Somras fall with the speed of accelerated horses and show-express its qualities.
शूरो न धत्त आयुधा गभस्त्योः स्व3: सिषासन्रथिरो गविष्टिषु।
इन्द्रस्य शुष्ममीरयन्नपस्युभिरिन्दुर्हिन्वानो अज्यते मनीषिभिः॥
शस्त्र धारक वीरों की भाँति रथ पर सवार, गायों का संरक्षक, शूरवीर तथा देवराज इन्द्र के पराक्रम में वृद्धि करता हुआ यह विलक्षण सोम याजकों द्वारा प्रेरित होकर, पुष्टिवर्द्धक गौ-दूध के साथ मिश्रित किया जाता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 9.7.5)
Amazing Som like the weapon wielding brave person ride the charoite, protected by the cows, increasing the valour-majesty of Devraj Indr is inspired by the Yajak Gan. Its juice Somras is mixed with cow's nourishing milk.
इन्द्रस्य सोम पवमान ऊर्मिणा तविष्यमाणो जठरेष्वा विश।
प्र नः पिन्व विद्युदभ्रेव रोदसी धिया नो वाजाँ उप माहि शश्वतः॥
हे निर्मल सोम! आप अत्यधिक शक्तिशाली होकर देवराज इन्द्र के उदर में प्रविष्ट हों। बादलों को जल वृष्टि हेतु प्रेरित करती हुई विद्युत् की भाँति आप द्युलोक तथा भूमिलोक दोनों को फलदायी बनाएँ। कर्म करते हुए आप कर्म के द्वारा हमारे निमित्त कभी कम न होने वाले पोषकता से परिपूर्ण अनाज देने की कृपा करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 9.7.6)
Hey pure Somras! You should be extremely powerful and enter the stomach of Devraj Indr. Inspire the lightening to shower rains, making the heavens & earth rewarding. While making efforts grant us never ending nourishing food grains stocks.
यदिन्द्र प्रागपागुदङ् न्यग्वा हूयसे नृभिः। सिमा पुरू नृषूतो अस्यानवेऽसि प्रशर्थ तुर्वशे॥
हे देवराज इन्द्र! आप ऋत्विजों द्वारा आहूत किये जाते हैं। शत्रुओं को पराभूत करने वाले हे देवराज इन्द्र! पुरु (प्राण-संवर्द्धन) तथा तुर्वश (क्रोधी) को नष्ट करने हेतु आपकी वन्दना हो रही है।(सामवेद उत्तरार्चिक 9.7.7)
Hey Devraj Indr! You are invoked by the Ritviz. Hey Devraj Indr defeater of the enemies! You are being worshiped to destroy Puru (Air Vital and growth) and Turvash (angry).
यद्वा रुमे रुशमे श्यावके कृप इन्द्र मादयसे सचा।
कण्वासस्त्वा स्तोमेभिर्ब्रह्मवाहस इन्द्रा यच्छन्त्या गहि॥
हे देवराज इन्द्र! आप रुम, रुशम, श्यावक तथा कृप पर अपनी विशेष कृपादृष्टि दिखाने वाले हैं। ऋत्विग्गण भिन्न-भिन्न स्तोत्रों के माध्यम से आपको आकर्षित करने की चेष्टा कर रहे हैं। आप हमारे याग में उपस्थित हों।(सामवेद उत्तरार्चिक 9.7.8)
Hey Devraj Indr! You show special favour to Rum, Rusham, Shyavak and Krap. Ritviz make efforts to attract you by means of different-different Strotrs. Join our Yagy.
उभयं शृणवच्च न इन्द्रो अर्वागिदं वचः।
सत्राच्या मघवान्त्सोमपीतये धिया शविष्ठ आ गमत्॥
हमारी दोनों तरह की वाणियों को देवराज इन्द्र हमारे समक्ष प्रस्तुत होकर ध्यान से सुनें। शक्तिशाली तथा वैभवशाली देवराज इन्द्र हमारी अभ्यर्थना से प्रफुल्लित होकर सोमरस का सेवन करने हेतु हमारे समीप आगमन करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 9.7.9)
Let Devraj Indr invoke before us and listen-respond to our two kinds of prayers carefully. Mighty and majestic (Possessing grandeur and prosperity) Devraj Indr should be gladdened with our prayers and come close to us for drinking Somras.
तं हि स्वराजं वृषभं तमोजसा धिषणे निष्टतक्षतुः।
उतोपमानां प्रथमो निषीदसि सोमकामं हि ते मनः॥
द्यावा-पृथिवी, शक्तिशाली तथा वर्चस्वी देवराज इन्द्र को अपनी योग्यता से प्रकट करते हैं। हे देवराज इन्द्र! आप कल्याण करने वालों में सबसे उत्कृष्ट हैं। आप सोमरस का सेवन करने की अभिलाषा से यज्ञ मण्डप पर आसीन होते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 9.7.10)
Heavens & earth, evolve mighty and dominant Devraj Indr with their ability. Hey Devraj Indr! You are the best amongest those perform welfare-well being. You sit in the Yagy Mandap with the desire of drinking Somras.
सामवेद उत्तरार्चिक (9.8) ::
पवस्व देव आयुषगिन्द्रं गच्छतु ते मदः। वायुमा रोह धर्मणा॥
हे तेज से युक्त सोम! आप दीर्घजीवी बनाने वाले है। पवित्र होकर आपका हर्ष बढ़ाने वाला रस देवराज इन्द्र को प्राप्त हो तथा पराक्रम से सम्पन्न होकर वायुदेव को मिले।(सामवेद उत्तरार्चिक 9.8.1)
Hey Som possessing Tej-aura! You make us long lived. Your gladdening sanctified juice should be available to Devraj Indr and Vayu Dev who possess might.
पवमान नि तोशसे रयिं सोम श्रवाय्यम्। इन्दो समुद्रमा विश॥
हे निर्मल सोम! आप प्रशंसा करने योग्य वैभव हेतु दुराचारियों को दंडित करते हैं। हम यज्ञ कलश में आपको आहूत करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 9.8.2)
Hey pure Somras! You punish the debouchee for appreciable grandeur. We pour-invite in the Yagy Kalash.(29.01.2026)
अपघ्नन्पवसे मृधः क्रतुवित्सोम मत्सरः। नुदस्वादेवयुं जनम्॥
हे यज्ञ कर्म के लिए प्रेरणा प्रदान करने वाले, हर्षदायी सोमदेव! आप पवित्र होकर अपने दिव्य तेज से आस्था न रखने वालों तथा कुकर्मियों को विनष्ट कर दें।(सामवेद उत्तरार्चिक 9.8.3)
Hey gladdening Som Dev, inspiring for Yagy Karm! Get purified and destroy the wicked-vicious with your divine aura-radiance; who has no faith in the either in the God or Yagy Karm.
अभी नो वाजसातमं रयिमर्ष शतस्पृहम्। इन्दो सहस्त्रभर्णसं तुविद्युम्नं विभासहम्॥
हे तेजवान् सोम! आप हमें इस प्रकार का उत्कृष्ट वैभव प्रदान करें, जो सैकड़ों द्वारा प्रशंसा करने योग्य, हजारों लोगों का भरण-पोषण करने में सक्षम, ओज से युक्त तथा कीर्ति में वृद्धि करने वाला हो।(सामवेद उत्तरार्चिक 9.8.4)
Hey radiant Som! Grant us best grandeur which is appreciable by hundreds of people, capable of providing food and nourishment, has aura and boosts fame.
वयं ते अस्य राधसो वसोर्वसो पुरुस्पृहः। नि नेदिष्ठतमा इषः स्याम सुम्ने ते अध्रिगो॥
हे श्रेष्ठ आश्रयदाता सोम! समस्त जनों के द्वारा प्रशंसनीय, सभी को अन्न प्रदान करने वाले आपके ऐश्वर्य के हम अत्यन्त पास रहने की कामना करते हैं। हे सूर्य किरणों के साथ वास करने वाले सोम! आपके द्वारा प्रदान किये गये पोषण पदार्थों का प्रयोग करके हम सुखी हों।(सामवेद उत्तरार्चिक 9.8.5)
Hey excellent asylum granter Som! We wish to have the food grains providing grandeur, which is appreciated by all people, very close to us. Hey Som, residing in the beams-rays of Sury Dev! Let us become comfortable by virtue of the nourishing materials granted by you.
परि स्य स्वानो अक्षरदिन्दुरव्ये मदच्युतः। धारा य ऊर्ध्वा अध्वरे भ्राजा न याति गव्ययुः॥
सूर्य अंशुओं की आकांक्षा करने वाला, प्राकृतिक ओज से युक्त यह उत्कृष्ट सोम, धाराओं के रूप में यज्ञकर्म में प्रकट होता है। यजमानों को हर्षित करने के निमित्त विधिपूर्वक शोधित होता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 9.8.6)
अंशु :: सूर्य की किरण, चमक, आभा; brilliance.
Excellent Somras desirous of the Sun rays , having natural aura, appears in streams in the Yagy Karm. Gladdening the Yajmans, Somras is purified methodically following procedures.
पवस्व सोम महान्त्समुद्रः पिता देवानां विश्वाभि धाम॥
हे सोम! आप अद्वितीय रसयुक्त, सभी के पालनकर्ता हैं। आप देवताओं के समस्त धामों को अपने दिव्य रस से भर दें।(सामवेद उत्तरार्चिक 9.8.7)
Hey Som Dev! You possess unique juice-sap and support all. Fill all the abodes of the demigods-deities with your divine Somras.
शुक्रः पवस्व देवेभ्यः सोम दिवे पृथिव्यै शं च प्रजाभ्यः॥
हे तेजवान् सोम! आप अलौकिक गुणों हेतु प्रवाहित हों। अन्तरिक्ष, भूमि एवं प्रजाओं (सभी जीव-जगत्) को सुख की प्राप्ति हो।(सामवेद उत्तरार्चिक 9.8.8)
Hey radiant Somras! Flow with your divine characters, leading to pleasure-comforts to all in the space-sky, earth and the populace.
दिवो धर्तासि शुक्रः पीयूषः सत्ये विधर्मन्वाजी पवस्व॥
हे सोम! आप कान्तिमान्, पीने योग्य एवं दिव्य गुणों को धारण करने वाले हैं। आप सत्य रूप यज्ञ कर्मों के मध्य में शोधित हों।(सामवेद उत्तरार्चिक 9.8.9)
Hey Somras! You are radiant and possess divine characters. You should be sanctified in the truthful Yagy Karm.
सामवेद उत्तरार्चिक (9.9) ::
प्रेष्ठं वो अतिथिं स्तुषे मित्रमिव प्रियम्। अग्ने रथं न वेद्यम्॥
हे अग्निदेव! आप अत्यधिक प्रिय, अतिथि के सदृश पूजा करने योग्य, आहुतियों को देवों तक पहुँचाने वाले, सखा की भाँति, वैभव प्रदान करने वाले हैं। हम याजकगण आपकी वन्दना करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 9.9.1)
Hey Agni Dev! You are extremely lovable, worshipable like the guest, carrier of the offerings-oblations to the demigods-deities, friendly, granting grandeur. We Yajak Gan worship you.
कविमिव प्रशस्यं यं देवास इति द्विता। नि मत्र्येष्वादधुः॥
देवताओं ने प्रशंसा करने योग्य विद्वानों की तरह गार्हपत्य तथा आहवनीय इन दोनों रूपों में, मानवों के मध्य में अग्नि को प्रतिष्ठित किया।(सामवेद उत्तरार्चिक 9.9.2)
Demigods-deities established the two forms of Agni Garhpaty and invocable amongest the humans.
त्वं यविष्ठ दाशुषो नृँ: पाहि शृणुही गिरः। रक्षा तोकमुत त्मना॥
हे अजर, आश्रय प्रदान करने वाले देवराज इन्द्र! आप दानी प्रवृत्ति वालों के संरक्षण हेतु उनकी याचनाओं को ध्यानपूर्वक श्रवण करें। आप अपने भक्तों की रक्षा करने हेतु प्रयासरत हों।(सामवेद उत्तरार्चिक 9.9.3)
Hey immortal, asylum granting Devraj Indr! Respond-listen to the people with the tendency of charity-donation carefully. You should be continuously making efforts for the protection of your devotees.
एन्द्र नो गधि प्रिय सत्राजिदगोह्य। गिरिर्न विश्वतः पृथुः पतिर्दिवः॥
हे समस्त शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने वाले देवराज इन्द्र! आप समस्त जनों के प्रिय, गिरि की भाँति विराट्, कभी परास्त न होने वाले तथा देवलोक के अधिष्ठाता है। आप हमारे यज्ञ में उपस्थित होने की कृपा करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 9.9.4)
Hey Devraj Indr attaining victory over all enemies! You are dear to all people, huge like a mountain, never defeated and the Lord of the heavens. Oblige us with your presence in our Yagy.
अभि हि सत्य सोमपा उभे बभूथ रोदसी। इन्द्रासि सुन्वतो वृधः पतिर्दिवः॥
हे सत्य मार्ग पर चलने वाले तथा सोमरस का सेवन करने वाले देवराज इन्द्र! आप स्वर्ग तथा भूमि दोनों लोकों में अपनी सामर्थ्य रखते हैं। हे देवलोक के अधिपति! आप सोमयज्ञ करने वाले ऋत्विजों को आश्रय प्रदान करने वाले हैं, उनकी प्रगति करने वाले हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 9.9.5)
Hey Devraj Indr following the truthful path and drinker of Somras! You possess capability-calibre in the heavens and the earth simultaneously. Hey Lord of heavens! You grant asylum and progress to the Ritviz, accomplishing Som Yagy.
त्वं हि शश्वतीनामिन्द्र धर्ता पुरामसि। हन्ता दस्योर्मनोवृधः पतिर्दिवः॥
हे देवराज इन्द्र! आप शाश्वत दुर्जनों का विनाश करने वाले, अज्ञानरूपी अंधेरे को दूर करने वाले, ऋत्विजों के उत्साह में वृद्धि करने वाले तथा अन्तरिक्ष लोक के अधिपति हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 9.9.6)
शाश्वत :: सदा रहने वाला, अनंत, स्थायी, अविनाशी, जिसे नष्ट न किया जा सके, नित्य-निरंतर, जो हमेशा कायम रहे, सनातन, चिरस्थायी, जो पारंपरिक रूप से हमेशा से चला आ रहा हो, समय से परे; perpetual, sempiternal, permanent.
Hey Devraj Indr! You are the destroyer of the permanent-perpetual, wicked-vicious, remover of the darkness in the form of ignorance, booster of the enthusiasm of the Ritviz and is the Lord off space-heavens.
पुरां भिन्दुर्युवा कविरमितौजा अजायत। इन्द्रो विश्वस्य कर्मणो धर्ता वज्री पुरुष्टुतः॥
हे देवराज इन्द्र! आप असुरों के नगरों को विध्वंस करने वाले, युवा, ज्ञान के भण्डार तथा शक्ति से सम्पन्न, उत्कृष्ट यज्ञ कर्मों को आहार प्रदान करने वाले, वज्रपाणि, बहुत सारे लोगों द्वारा सराहनीय रूप में उत्पन्न हुए हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 9.9.7)
Hey Devraj Indr! You are the destroyer of the forts-cities of the demons, young, store house of knowledge, granter of food to excellent Yagy Karm, Vajr wielding, appeared in the form appreciated by several people.
त्वं वलस्य गोमतोऽपावरद्रिवो बिलम्। त्वां देवा अबिभ्युषस्तुज्यमानास आविषुः॥
हे वज्रधारक देवराज इन्द्र! आपने सूर्य रश्मियों का हरण करने वाले असुरों के समूह को समाप्त कर दिया, तत्पश्चात् असुरों से परास्त हुए देवता आपके साथ संगठित हुए।(सामवेद उत्तरार्चिक 9.9.8)
Hey Vajr wielding Devraj Indr! You abducted the rays of Sun Light and destroyed the demons in groups, thereafter defeated the demigods-deities defeated by the demons united with you.
इन्द्रमीशानमोजसाभि स्तोमैरनूषत। सहस्त्रं यस्य रातय उत वा सन्ति भूयसीः॥
स्तोता गण हजारों प्रकार की आर्थिक सहायता प्रदान करने वाले, सामर्थ्यवान् देवराज इन्द्र की वेद मन्त्रों द्वारा स्तुति करने लगे।(सामवेद उत्तरार्चिक 9.9.9)
Stota Gan started worshiping capable Devraj Indr, who granted them financial help in thousands of manners, with Ved Mantrs.(30.01.2026)
सामवेद उत्तरार्चिक (10) :: ऋषि :- पराशर, शुनःशेप, असित, काश्यपो देवलो वा, राहूगण, प्रियमेध, नृमेध, पवित्रो आंगिरसो वा वसिष्ठो वा उभौ वा, वसिष्ठ, वत्स, काण्व, शतं वैखानसा, सप्तर्षय, वसुभारद्वाज, भर्ग, प्रगाथ, भरद्वाज, मनुराप्सव, अम्बरीष, ऋजिश्वा, अग्नयो धिष्ण्या ऐश्वरा, अमहीयु, त्रिशोक, गौतमो राहूगण, मधुच्छन्दा, विश्वामित्र; देवता :- पवमानाध्येतृस्तुति, सोम, पवमान, अग्नि, इन्द्र; छन्द :- त्रिष्टुप्, गायत्री, अनुष्टुप्, बार्हत, प्रगाथ, पंक्ति, जगती, उष्णिक्।
सामवेद उत्तरार्चिक (10.1) ::
अक्रान्त्समुद्रः प्रथमे विधर्मन् जनयन्प्रजा भुवनस्य गोपाः।
वृषा पवित्रे अधि सानो अव्ये बृहत्सोमो वावृधे स्वानो अद्रिः॥
जल वर्षा करने वाला, जगत् का रक्षक एवं पालन करने वाला सोम, विशाल अन्तरिक्ष में सबसे पहले जीव-जगत् को उत्पन्न करके सर्वोत्तम हुआ, तत्पश्चात् धरती के ऊपर प्रतिष्ठित प्राकृतिक शोधन यन्त्र के माध्यम से प्रविष्ट करता हुआ अभ्युदय को प्राप्त होता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.1.1)
Rain showering, protector & nurturer of the universe Som, became the first one to produce living beings in the space-sky. It is subjected to natural purification plant over the earth and prosper thereafter.
मत्सि वायुमिष्टये राधसे नो मत्सि मित्रावरुणा पूयमानः।
मत्सि शर्धो मारुतं मत्सि देवान्मत्सि द्यावापृथिवी देव सोम॥
हे अलौकिक सोमदेव! आप हमें धन-धान्य उपलब्ध कराने के लिए वायुदेव को हर्षित करें। परिष्कृत किये गये आप, मित्रावरुण देवताओं को, मरुद्गणों की क्षमता को, देवराज इन्द्रादि को, द्युलोक तथा भूलोक के आह्लाद को बढ़ाने वाले हों।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.1.2)
Hey divine Som Dev! Please-gladden Vayu Dev to make available wealth & food grains to us. On being sanctified you should increase the happiness of Mitra-Varun, Marud Gan, Devraj Indr, heavens & the earth.
महत्तत्सोमो महिषश्चकारापां यद्गर्भोऽवृणीत देवान्।
अदधादिन्द्रे पवमान ओजोऽजनयत्सूर्ये ज्योतिरिन्दुः॥
यज्ञकर्मों को करने वाला, जल का गर्भरूप यह सोम देवों के पान करने के निमित्त प्रयोग होता है। पवित्र हुए इस सोम ने देवराज इन्द्र को शक्ति से युक्त किया और सूर्य देव को कान्तिमान बनाया।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.1.3)
Performer of Yagy Karm, Som is like the ovary of water and is sanctified for drinking by demigods. Purified Somras granted strength to Devraj Indr and made Sury Dev shinning-radiant.
एष देवा अमर्त्यः पर्णवीरिव दीयते। अभि द्रोणान्यासदम्॥
कभी भी मृत्यु को प्राप्त न होने वाला अर्थात् अमर यह लोकातीत सोम वेगपूर्वक विचरण करने वाले पक्षी के समान, पात्र में गति पूर्वक विद्यमान होता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.1.4)
Immortal-preternatural Somras enter the vessel with great speed, like flying bird.
एष विप्रैरभिष्टुतोऽपो देवो वि गाहते। दधद्रत्नानि दाशुषे॥
विद्वानों द्वारा प्रशंसा किये जाने वाला यह विलक्षण सोम, आहुति देने वालों को धनादि देता हुआ जल में संयुक्त हो जाता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.1.5)
Appreciated by the learned scholars, amazing Somras mixes with water, awarding wealth etc to those who make offerings.
एष विश्वानि वार्या शूरो यन्निव सत्वभिः। पवमानः सिषासति॥
यह पवित्र, शक्तिशाली सोम अपनी क्षमता से श्रेष्ठ वैभव को प्राप्त करते हुए, उसको उचित ढंग से वितरित करने की कामना करता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.1.6)
Pure-pious, mighty Som attain grandeur by virtue of its strength and wish to distribute it in proper manner.
एष देवो रथर्यति पवमानो दिशस्यति। आविष्कृणोति वग्वनुम्॥
यह पवित्र दिव्य सोम शब्दनाद करते हुए यज्ञ करने के स्थान पर प्रस्थान करने के लिए, समुचित माध्यम की अभिलाषा करता है तथा यज्ञकर्ताओं को उनके द्वारा अभिलषित पदार्थों को देने की कामना करता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.1.7)
Pure-pious divine Somras make sound while moving towards the Yagy site and wish to have a proper medium. It wishes to grant desired commodities to the performers of the Yagy.
एष देवो विपन्युभिः पवमान ऋतायुभिः। हरिर्वाजाय मृज्यते॥
पवित्र किये गये इस सोम को ऋत्विग्गण अपनी वन्दनाओं के माध्यम से उसी प्रकार सुशोभित करते हैं, जिस तरह संग्राम में उद्यत घोड़ों को अलंकृत किया जाता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.1.8)
The Ritviz decorate sanctified Som with their prayers like the horses are decorated for war.
एष देवो विपा कृतोऽति ह्वरांसि धावति। पवमानो अदाभ्यः॥
अँगुलियों के माध्यम से अभिषुत कर पवित्र किया गया सोम, स्वयं अदम्य रहकर शत्रुओं का संहार करता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.1.9)
अदम्य :: जो दबाया न जा सके, प्रबल, प्रचंड; indomitable, untamed.
Extracted by squeezing with fingers, purified Som itself destroy the enemies being indomitable.
एष दिवं वि धावति तिरो रजांसि धारया। पवमानः कनिक्रदत्॥
परिष्कृत होकर क्रंदन करते हुए धाररूप में उत्पन्न सोम, शत्रुलोकों पर विजय प्राप्त कर यज्ञ के प्रभाव से ऊर्ध्वगति को प्राप्त करता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.1.10)
On being purified Somras move in a stream making sound, attain victory over the enemies and rises up by the impact of Yagy.
एष दिवं व्यासरत्तिरो रजांस्यस्तृतः। पवमानः स्वध्वरः॥
श्रेष्ठ यज्ञ करने वाला, निर्मल अलौकिक सोम, शत्रुओं को पराभूत करने में सक्षम है। वह सोम इस यज्ञ स्थल से द्युलोक में पहुँचता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.1.11)
Yagy performer, pure divine Som has the capability of defeating the enemies. Som rises to heavens through the Yagy.
एष प्रत्नेन जन्मना देवो देवेभ्यः सुतः। हरिः पवित्रे अर्षति॥
यह विलक्षण हरित वर्ण सोम, सर्वदा से ही देवताओं के गुणों को बढ़ाने के निमित्त निर्मल होकर उपयोग किया जा रहा है।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.1.12)
Amazing greenish Som, always increase the virtuous-righteous qualities-traits of the demigods and itself is used on being purified.
एष उ स्य पुरुव्रतो जज्ञानो जनयन्निषः। धारया पवते सुतः॥
विशेष कार्य करने का सामर्थ्य पैदा करने वाला तथा पौष्टिकता से युक्त अनाज पैदा करने वाला यह सोम, अपने रसधार के साथ अपने आप ही स्वच्छ हो जाता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.1.13)
Som capable to generating special powers-capabilities, producer of nourishing food grains, itself purifies with its current.
सामवेद उत्तरार्चिक (10.2) ::
एष धिया यात्यण्व्या शूरो रथेभिराशुभिः। गच्छन्निन्द्रस्य निष्कृतम्॥
अभिषुत किया गया, बलशाली यह सोम शीघ्र गमन करने वाले रथ के द्वारा बुद्धिमानी से देवराज इन्द्र के समीप पहुँच जाता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.2.1)
Extracted mighty Som, riding a fast moving charoite intelligently and reaches Devraj Indr.
एष पुरु धियायते बृहते देवतातये। यत्रामृतास आशत॥
देवताओं से प्रतिस्थापित उत्तम यज्ञ-स्थल में, यह सोम सहस्रों कर्मों को संचालन करने की कामना रखता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.2.2)
Established by the demigods at an excellent Yagy Sthal, Som wish to conduct -perform thousands of endeavours.
एतं मृजन्ति मर्ज्यमुप द्रोणेष्वायवः। प्रचक्राणं महीरिषः॥
रस-संयुक्त (पोषक) आहारों को उत्पन्न करने वाले, परिष्कृत होने योग्य सोमरस को स्तोतागण पवित्र करके पात्रों में संगृहीत करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.2.3)
Purification deserving Somras which produces juicy food materials, is stored by Stotas Gan after sanctifying.(31.01.2026)
सामवेद उत्तरार्चिक (10.2) ::
एष हितो वि नीयतेऽन्तः शुन्ध्यावता पथा। यदी तुञ्जन्ति भूर्णयः॥
हवियों के रूप में प्रयोग किये जाने वाले इस सोम को यज्ञशाला में ले जाया जाता है, जहाँ से ऋत्विग्गण उसे पवित्र करते हैं तथा देवताओं को अर्पित करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.2.4)
Som used as an offering is carried to the Yagy Shala, where it is purified by the Ritviz and offered to demigods-deities.
एष रुक्मिभिरीयते वाजी शुभ्रेभिरंशुभिः। पतिः सिन्धूनां भवन्॥
सफेद किरणों से युक्त, रसों का राजा, प्रवाहित होने वाला, बलवान् सोम वेग पूर्वक गिरते हुए साधकों के समीप पहुँचता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.2.5)
Mighty Somras; the king of juices-saps, possess white rays and reaches the devotees.
एष शृङ्गाणि दोधुवच्छिशीते यूथ्यो 3 वृषा। नृम्णा दधान ओजसा॥
अत्यधिक शक्तिशाली तथा समृद्धिशाली सोम अपनी शक्ति को उसी तरह प्रकट करता है, जिस तरह शक्तिशाली बैल पशुओं के बीच अपने पराक्रम को प्रकट करता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.2.6)
Extremely mighty and prosperous Som exhibit his power just like the mighty bull, demonstrate his power amongest the animals.
एष वसूनि पिब्दनः परुषा ययिवाँ अति। अव शादेषु गच्छति॥
अपने पुरुषार्थ से कर्म न करने वाले दुर्जनों को कष्ट देता हुआ यह सोम, उन्हें सीमा के अंदर रखता है तथा हिंसा करने वाले दुराचारियों का संहार कर देता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.2.7)
दुराचारी :: evildoers, wrongdoers, immoral people, scoundrels, sinners.
Som torture those who do not put their labour in performing endeavours, keep them within the boundaries and destroy the immoral people.
एतमुत्यं दश क्षिपो हरिं हिन्वन्ति यातवे। स्वायुधं मदिन्तमम्॥
उत्कृष्ट प्राण-शक्ति को धारण करने वाला हरित वर्ण सोम दसों अँगुलियों के माध्यम से अभिषवित होकर देवों के सेवन करने के निमित्त अर्पित किया जाता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.2.8)
Greenish Somras possessing excellent Air Vital is extracted with ten fingers and offered to demigods for drinking.
सामवेद उत्तरार्चिक (10.3) ::
एष उ स्य वृषा रथोऽव्या वारेभिरव्यत। गच्छन्वाजं सहस्रिणम्॥
रथ की भाँति गतिमान्, मनोवांछित धन-धान्य प्रदान करने वाला यह सोम, भेड़ के बालों से निर्मित शोधन यन्त्र के द्वारा छनते हुए पात्र में प्रविष्ट करता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.3.1)
Dynamic like the charoite, granting desired food grains & wealth, Somras is filtered via-through the purification machine constituting of sheep wool.
एतं त्रितस्य योषणो हरिं हिन्वन्त्यद्रिभिः। इन्दुमिन्द्राय पीतये॥
देवराज इन्द्र द्वारा सेवन किये जाने हेतु यह हरित वर्ण का सोम (तीन प्रकार से आकाश में, भौतिक यंत्रों में तथा शरीर में स्थित तंत्रिकाओं में) अभिषुत किया जा रहा है।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.3.2)
Greenish Somras meant for drinking by Devraj Indr is extracted in three ways e.g., sky-space, physical machines and nervous system of the body.
एष स्य मानुषीष्वा श्येनो न विक्षु सीदति। गच्छं जारो न योषितम्॥
जिस तरह बाज पक्षी अपने शिकार के प्रति एवं प्रेमी अपने प्रेमिका के प्रति गतिपूर्वक प्रस्थान करता है, उसी तरह यह सोम मनुष्यों के मध्य द्रुत गति से पहुँचकर स्थापित होता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.3.3)
The way a falcon rushes to its pray and a lover goes to his lover & his beloved-paramour, Somras reaches amongest the humans with high speed.
एष स्य मद्यो रसोऽव चष्टे दिवः शिशुः। य इन्दुर्वारमाविशत्॥
यह सोम जिसकी उत्पत्ति दिव्य लोक में हुई है, सभी को देखता हुआ शोधन यन्त्र से स्वच्छ होता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.3.4)
Somras which evolve in the heavens looks at everyone and is sanctified in the purification machine-plant.
एष स्य पीतये सुतो हरिरर्षति धर्णसिः। क्रन्दन्योनिमभि प्रियम्॥
जगत् का पालन करने वाला यह अक्षय सोम, देवताओं के पान करने के निमित्त तैयार किया गया है, जो क्रन्दन करता हुआ अपने प्रिय धाम, कलश में प्रविष्ट होता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.3.5)
अक्षय :: अटूट, अक्षय, सदा भरपूर होनेवाला, अक्षीण; inexhaustible, unspent, unabated.
Nurturer of the universe inexhaustible Somras is prepared for drinking by demigods-deities, which moves towards the Kalash its dear storage, making sound.
एतं त्यं हरितो दश मर्मृज्यन्ते अपस्युवः। याभिर्मदाय शुम्भते॥
देवराज इन्द्र को आनन्दित करने हेतु यज्ञार्थ दसों अँगुलियाँ (दशेन्द्रियाँ) उस सोम को पवित्र करती हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.3.6)
To gladden Devraj Indr ten fingers purify Somras.
सामवेद उत्तरार्चिक (10.4) ::
एष वाजी हितो नृभिर्विश्वविन्मनसस्पतिः। अव्यं वारं वि धावति॥
सब कुछ जानने वाला, कल्याणकारी मन का स्वामी, शक्तिमान् दिव्य सोम, याज्ञिकों के माध्यम से पवित्र होकर पात्र में प्रतिस्थापित होता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.4.1)
Knowing every thing, intended to welfare, devoted its innerself, mighty divine Somras is purified for the Yagyik and stored in the Kalash.
एष पवित्रे अक्षरत्सोमो देवेभ्यः सुतः। विश्वा धामान्याविशन्॥
देवताओं के पान करने के उद्देश्य से निचोड़कर तैयार किया गया यह सोम, निर्मल होकर देवताओं के शरीर में फैल जाता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.4.2)
Squeezed Somras is sanctified for drinking by the demigods and pure Somras spread in their body.
एष देवः शुभायतेऽधि योनावमर्त्यः। वृत्रहा देववीतमः॥
देवों को अत्यन्त प्रिय, देवत्व को बढ़ाने वाला, अक्षय, शत्रुओं का हनन करने वाला सोम, यज्ञ-कलश में अति विभूषित होता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.4.3)
Extremely-Highly loved by the demigods, increasing demigodhood, imperishable Somras, destroyer of the enemies is beautifully decorated in the Yagy Kalash.
एष वृषा कनिक्रदद्दशभिर्जामिभिर्यतः। अभि द्रोणानि धावति॥
दसों अँगुलियों के माध्यम से अभिषुत किया गया, शक्ति बढ़ाने वाला यह सोमरस आवाज करता हुआ, शीघ्र तीव्र गति से काष्ठ पात्र में प्रवेश करता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.4.4)
Extracted with ten fingers, power boosting Somras make sound and enter the wooden pot with great speed.
एष सूर्यमरोचयत्पवमानो अधि द्यवि। पवित्रे मत्सरो मदः॥
संस्कारित स्वर्गलोक में यह प्रसन्न करने वाला पवित्र सोम सूर्य देव को दीप्तिमान् करता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.4.5)
Gladdening pure Somras illuminate Sury Dev in the sanctified heavens.
एष सूर्येण हासते संवसानो विवस्वता। पतिर्वाचो अदाभ्यः॥
किसी के अधिकार में न रहने वाला अर्थात् स्वतंत्र, स्तुति करने योग्य यह सोम कान्तिमान् सूर्य देव द्वारा जलादि पांच तत्त्वों में मिश्रित होने हेतु गिराया जाता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.4.6)
Uncontrolled by any one, worshipable Somras is showered by radiant Sury Dev by absorbing in Panch Tattv (Sky-space, water, fire, earth, air).
सामवेद उत्तरार्चिक (10.5) ::
एष कविरभिष्टुतः पवित्रे अधि तोशते। पुनानो घ्नन्नप द्विषः॥
कवियों तथा विद्वानों द्वारा स्तुति किया जाने वाला, शुद्ध किया हुआ, विकृतियों को नष्ट करने वाला यह सोमरस संतुष्टि प्रदान करने वाला है।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.5.1)
Worshiped by the poets and the learned scholars, purified Somras, destroy the deformities and grant satisfaction.
एष इन्द्राय वायवे स्वर्जित्परि षिच्यते। पवित्रे दक्षसाधनः॥
बल बढ़ाने वाला तथा स्वर्ग में प्राप्त होने वाले सुख को अपने आधिपत्य रखने वाला यह अलौकिक सोम, आकाश से छनकर देवराज इन्द्र (मेघों) तथा वायुदेव के लिए नीचे प्रवाहित होता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.5.2)
Divine Somras which increase strength of the heavenly comforts-pleasure, maintain its dignity, filtered through the sky, lowers for clouds-Devraj Indr & Vayu Dev.(01.02.206)
एष नृभिर्वि नीयते दिवो मूर्धा वृषा सुतः। सोमो वनेषु विश्ववित्॥
शक्तिशाली, सर्वज्ञाता, स्वर्गलोक आदि में सराहनीय दिव्य रसरूप सोम, याजकों द्वारा काष्ठ पात्र में रखकर यज्ञ-स्थान की ओर ले जाया जाता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.5.3)
Mighty, aware of every thing, appreciated in the heavens etc divine Somras, is kept in the wooden pots and carried to the Yagy Sthal.
एष गव्युरचिक्रदत्पवमानो हिरण्ययुः। इन्दुः सत्राजिदस्तृतः॥
स्वर्गलोक में विद्यमान, बल बढ़ाने वाला, रस से भरा हुआ, सब कुछ जानने वाला यह सोम वनों की औषधि के रूप में मानवों द्वारा प्रयोग किया जाता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.5.4)
Present in the heavens, strength increasing, full of juice, all knowing Som is recognised as a medicine by the humans in the jungle.
एष शुष्यसिष्यददन्तरिक्षे वृषा हरिः। पुनान इन्दुरिन्द्रमा॥
यह दीप्तिमान्, विजय प्राप्त करने वाला, कभी परास्त न होने वाला, निर्मल सोम, गौओं तथा सुवणीदि को बढ़ाने हेतु ध्वनि करता हुआ प्रकट होता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.5.5)
Shinning, victorious, never defeating, pure Som appear to increase cows and gold etc., making sound.
एष शुष्म्यदाभ्यः सोमः पुनानो अर्षति। देवावीरघशंसहा॥
अलौकिक, अविनाशी, देवों का संरक्षण करने वाला, कुकृत्य करने वालों का विनाश करने वाला, शुद्ध किया हुआ, शक्ति से सम्पन्न सोमरस काष्ठ पात्र में प्रविष्ट होता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.5.6)
Divine, immortal, protector of the demigods-deities, destroyer of the wicked-vicious, sinners, full of strength Somras enters the wooden pot.
सामवेद उत्तरार्चिक (10.6) ::
स सुतः पीतये वृषा सोमः पवित्रे अर्षति। विघ्नन्रक्षांसि देवयुः॥
अद्भुत गुणों से सम्पन्न, इन्द्रादि देवताओं हेतु परिष्कृत, मनोकामनाओं की पूर्ति करने वाला सोम, विकृतियों का नाश करते हुए छलनी से गिरता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.6.1)
Full of amazing powers-qualities Somras, extracted & purified for Devraj Indr and demigods, accomplisher of wishes-desires, falls in the sieve removing the impurities.
स पवित्रे विचक्षणो हरिरर्षति धर्णसिः। अभि योनिं कनिक्रदत्॥
सभी को सुरक्षित रखने वाला, सभी को धारण करने वाला, बुरे कर्म करने वालों का शमन करने वाला वह हरित वर्ण का सोम, शोधन यन्त्र से स्वच्छ होकर क्रंदन करते हुए पात्र में आसीन होता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.6.2)
Protector & supporter of all, destroyer of sinners, greenish Somras settle in the pot making sound.
स वाजी रोचनं दिवः पवमानो वि धावति। रक्षोहा वारमव्ययम्॥
सबसे अधिक बलशाली, स्वर्गलोक में प्रकाशित होने वाला, दुर्जनों का विनाश करने वाला, पवित्र होता हुआ यह दिव्य सोम निरन्तर धारा के साथ पात्र में गिरता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.6.3)
Mightier than others, shinning in the heavens, destroyer of the wicked-vicious, divine Somras continuously falls in the pot regularly as a stream.
स त्रितस्याधि सानवि पवमानो अरोचयत्। जामिभिः सूर्य सह॥
वह सोम तीन प्रकार के यज्ञ (अन्तरिक्ष, प्रकृति तथा मनुष्यों के बीच लेन-देन करने वाले यज्ञ) में परिशोधित होकर अपने प्रखर तेज से सूर्य देव को परिव्याप्त करता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.6.4)
Som pervade Sun with its sharp-penetrating beams under going three types of Yagy e.g., space-sky, nature and mutual interaction between the humans.
स वृत्रहा वृषा सुतो वरिवोविददाभ्यः। सोमो वाजमिवासरत्॥
असुरों का संहार करने वाला, शक्ति बढ़ाने वाला, अभिषुत करके तैयार किया गया, ऐश्वर्य प्रदान करने वाला सोम गतिमान घोड़े के सदृश वेगपूर्वक पात्र में प्रतिष्ठित होता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.6.5)
Destroyer of the demons, power increasing, extracted ready for drinking, granting grandeur Somras establishes in the pot with high speed like the horse.
स देवः कविनेषितो 3 ऽभि द्रोणानि धावति। इन्दुरिन्द्राय मंहयन्॥
स्वर्गलोक में परिव्याप्त वह सोम, इन्द्रादि देवताओं के महत्त्व में वृद्धि करने हेतु, याज्ञिकों के द्वारा प्रवाहित होकर तीव्र गति से काष्ठ पात्र (द्रोण कलश) में प्रतिष्ठित होता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.6.6)
Pervaded over the heavens, booting the significance of Devraj Indr & demigods, made to flow by the Yagyik. Somras moves into the wooden pot to be established-settled there.
सामवेद उत्तरार्चिक (10.7) ::
यः पावमानीरध्येत्यृषिभिः संभृतं रसम्। सर्व स पूतमश्नाति स्वदितं मात-रिश्वना॥
ऋषियों द्वारा संचित (जीवन सूत्रों) में आनन्द लेने वाला, निर्मल करने वाले सूक्तों का पाठ करने वाला, ऋत्विज (यज्ञ के प्रभाव से) वायु में संव्याप्त पोषण से युक्त अन्नादि को ग्रहण करता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.7.1)
Irrigated-nourished by the Rishi Gan, enjoying the life, reciting purifying Sukt, Ritviz attain food grains nourished by the Vayu-air due to the impact of the Yagy.
पावमानीर्यो अध्येत्यृषिभिः संभृतं रसम्। तस्मै सरस्वती दुहे क्षीरं सर्पिर्मधूदकम्॥
जो ऋषियों द्वारा निर्मित वेद-मन्त्रों का अध्ययन करता है, उसको ज्ञान से परिपूर्ण करने हेतु माँ वीण-वादिनी, दूध, घी, मधु आदि पोषण से युक्त पदार्थों को स्वयं प्राप्त कराती हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.7.2)
One who study the Ved Mantrs written by the Rishi Gan, are granted milk, ghee, honey etc nourishing materials by Maa Veena Vadini-Saraswati herself.
पावमानीः स्वस्त्ययनीः सुदुघा हि घृतश्श्रुतः।
ऋषिभिः संभृतो रसो ब्राह्मणेष्वमृतं हितम्॥
ऋषियों द्वारा संचालित पावमानी (पवित्र करने वाले) वेद मन्त्र भला करने वाले, श्रेष्ठ फल प्रदान करने वाले तथा प्रेम की वर्षा करने वाले हैं। वेदाध्ययन करने वाले विप्रों के मध्य उन्होंने तो जैसे कल्याणकारी अमृत ही रख दिया है।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.7.3)
Purifying Ved Mantr conducted by the Rishi Gan for welfare, grant best awards and shower love & affection.
पावमानीर्दधन्तु न इमं लोकमथो अमुम्। कामान्त्समर्धयन्तु नो देवीर्देवैः समाहृताः॥
देवताओं द्वारा निर्मित दैवीय ऋचाएँ हमें भूलोक और स्वर्गलोक में सुख दें और हमारे मनोवांछित मनोरथ सम्पूर्ण हों।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.7.4)
Divine Richas-compostions by the demigods should grant us pleasure-comforts in the heavens & earth and our wishes-desires should be accomplished.
येन देवाः पवित्रेणात्मानं पुनते सदा। तेन सहस्त्रधारेण पावमानीः पुनन्तु नः॥
देवता लोग अपने आप को पावन करने हेतु जिन साधनों का प्रयोग करते हैं, उन सहस्रों तरह के साधनों से पावन करने वाली यह वेद वाणियाँ हमें भी स्वच्छ बनाएँ।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.7.5)
Let the Ved Vani purify us as well, with the thousands of means adopted by the demigods to cleanse-purify themselves.
पावमानीः स्वस्त्ययनीस्ताभिर्गच्छति नान्दनम्।
पुण्याँश्च भक्षान्भक्षयत्यमृतत्वं च गच्छति॥
शुद्धता देने वाली तथा कल्याण करने वाली ऋचाओं से प्रेरणा प्रदान कर याजक, हर्षित होने वाले ऐश्वर्य को प्राप्त करता है। वह पुण्य कमाने वाले आहार को भक्षण करता है तथा अमरता (मोक्ष) को पा लेता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.7.6)
The Yajak is inspired by the purifying and welfare granting Richas, get gladdening grandeur. He eats the food which grants virtues and attains emancipation.(02.02.2026)
सामवेद उत्तरार्चिक (10.8) ::
अगन्म महा नमसा यविष्ठं यो दीदाय समिद्धः स्वे दुरोणे।
चित्रभानुं रोदसी अन्तरुर्वी स्वाहुतं विश्वतः प्रत्यञ्चम्॥
यज्ञ-मण्डप में श्रेष्ठ रीति से प्रज्वलित, स्वर्गलोक तथा भूलोक के बीच में स्थित, विशेष प्रकार से प्रकाशमान्, श्रेष्ठ हवियों से युक्त, चिरयुवा अग्ने को हम आदर पूर्वक नमस्कार करते हुए, उनका आश्रय प्राप्त करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.8.1)
We respectfully salute always young Agni Dev ignited with best technique, present between the heavens & earth, illuminated in a specific manner, possessing best offerings-oblations and seek asylum under him.
स मह्ना विश्वा दुरितानि साह्वानग्नि ष्टवे दम आ जातवेदाः।
स नो रक्षिषद्दुरितादवद्यादस्मान्गृणत उत नो मघोनः॥
हे अग्नि देव! आप प्रखर तेज से युक्त होकर समस्त कुकर्मों का नाश करने वाले, ज्ञानरूपी ज्योति को संव्याप्त करने वाले हैं। आप यज्ञ वेदिका में प्रतिस्थापित होते हैं। स्तुति किये जाने वाले आप हमें दोष से युक्त तथा निंदा होने योग्य कर्मों से दूर रखते हैं तथा हवियाँ स्वीकार करके हमारी धन-सम्पत्तियों की रक्षा करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.8.2)
Hey Agni Dev! You acquire fierce brilliance, destroy the wicked-vicious deeds and pervade the light in the form of enlightenment. You are established in the Yagy Vedica. On being worshiped you drift us away from defects and condemnation. Accept our offerings and protect our wealth-property.
त्वं वरुण उत मित्रो अग्ने त्वां वर्धन्ति मतिभिर्वसिष्ठाः।
त्वे वसु सुषणनानि सन्तु यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः॥
हे अग्ने! आप वरुण (अभिलषित पदार्थों की पूर्ति करने वाले) तथा मित्र (प्रेम पूर्वक सहायता प्रदान करने वाले) स्वरूप हैं। वसिष्ठ ऋषि उत्कृष्ट वन्दनाओं से आपको सम्मानित करते हैं। आप उत्कृष्ट धन तथा हितकारी साधनों से हमारा संरक्षण करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.8.3)
Hey Agne! You are like Varun Dev (accomplish the desired materials) and Mitr Dev (grant help with love). Vashishth Rishi honour you with excellent prayers. Protect us with excellent wealth and welfare means.
महाँ इन्द्रो य ओजसा पर्जन्यो वृष्टिमाँ इव। स्तोमैर्वत्सस्य वावृधे॥
वर्षा करने वाले जलधरों की भाँति विशाल तथा तेजवान् वे देवराज इन्द्र अपने प्रिय उपासकों की वन्दनाओं से, विस्तृत रूप धारण कर कीर्तिवान् बन जाते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.8.4)
Radiant-aurous Devraj Indr acquire large size and become honourable by virtue of his worshipers like the rains showering water reservoirs.
कण्वा इन्द्रं यदक्रत स्तोमैर्यज्ञस्य साधनम्। जामि ब्रुवत आयुधा॥
जब कण्वादि ऋषि अपने स्तोत्रों के प्रभाव से देवराज इन्द्र को याग का संरक्षक बना लेते हैं, तो याग के संरक्षण हेतु किसी भी आयुधों की जरूरत नहीं रह जाती है।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.8.5)
When Kavy and other Rishi Gan make Devraj Indr their guardian, need for the Yagy for attaining weapons is eliminated.
प्रजामृतस्य पिप्रतः प्र यद्भरन्त वह्नयः। विप्रा ऋतस्य वहसा॥
जब अन्तरिक्ष को आच्छादित कर लेने वाली दिव्य अग्नियाँ याग के लिए तैयार देवराज इन्द्र को गतिमान अश्व की भाँति यज्ञ-स्थान पर ले जाती हैं, उस समय स्तोतागण यज्ञ में प्रयुक्त होने वाली स्तुतियों के द्वारा उनकी स्तुति करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.8.6)
When the divine fire pervading the space-sky carry Devraj Indr like the accelerated horses to the Yagy Sthal, the Stota Gan worship him.
सामवेद उत्तरार्चिक (10.9) ::
पवमानस्य जिघ्नतो हरेश्चन्द्रा असृक्षत। जीरा अजिरशोचिषः॥
हे हरित वर्ण के सोम! आप शत्रुओं को नष्ट करने वाले, सभी जगह विचरण करने वाले, प्रखर तेजस्वी हैं। आपकी प्रफुल्लित करने वाली धारा, शोधन यन्त्र से छनकर पात्र में गिरती है।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.9.1)
Hey greenish Somras! You destroy the enemies, roam all around and possess high kevel of intelligence. Your gladdening current is filtered in the purification plant and then fall into the vessel.
पवमानो रथीतमः शुभ्रेभिः शुभ्रशस्तमः। हरिश्चन्द्रो मरुद्गणः॥
ऊँचे स्थान पर विभूषित, प्रखर तेज से दीप्तिमान्, मरुतों के सहयोग से समृद्धशाली बना यह हरित वर्ण का सोम समस्त जनों को आनन्दित करने वाला है।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.9.2)
Placed at a high level, possessing sharp radiance, the greenish Somras enriched with the help of Marud Gan gladden all people.
पवमान व्यश्नुहि रश्मिभिर्वाजसातमः। दधत्स्तोत्रे सुवीर्यम्॥
हे सोम! सहस्रों तरह के अनाज तथा शक्ति देने वाले आप ऋत्विजों को उत्कृष्ट पुत्र तथा वैभव प्रदान करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.9.3)
Hey Som! You grant thousands of kinds of food grains & strength and bless the Ritviz with excellent sons and grandeur.
परीतो षिञ्चता सुतं सोमो य उत्तमं हविः।
दधन्वाँ यो नर्यो अप्स्व 3 ऽन्तरा सुषाव सोममद्रिभिः॥
देवों का सबसे उत्कृष्ट ग्रहण किया जाने वाला पदार्थ (हव्य) मानवों का शुभचिंतक सोम जल में मिलाया जाता है। पुरोहित उसे पत्थरों द्वारा कूटकर योग्य बनाते हैं, ऐसे सोम को ऊपर उठाकर उसका सिंचन करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.9.4)
The best material accepted by the demigods-deities, well wisher of humans; is mixed in water. Priest crush it with stones and make it useful. Lift Som and irrigate it.
नूनं पुनानोऽविभिः परि स्रवादब्धः सुरभिंतरः।
सुते चित्वाप्सु मदामो अंधसा श्रीणन्तो गोभिरुत्तरम्॥
हे अविनाशी, अत्यन्त प्रिय, सुगंधित, परिष्कृत होने वाले सोमदेव! जब आप शोधन यन्त्र से छन जाते हैं, तब आपको पोषक पदार्थ तथा गौ के दुग्ध में मिलाया जाता है, तत्पश्चात् आपको जल में मिश्रित कर ग्रहण करने योग्य बनाया जाता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.9.5)
Hey immortal, highly adored, purifiable Somras! When you filtered in the purification plant, mixed with nourishing materials and cow's milk, water is mixed in you, making you useful.
परि स्वानश्चक्षसे देवमादनः क्रतुरिन्दुर्विचक्षणः॥
देवताओं के आह्लाद में वृद्धि करने वाला, याग का अग्रणी साधन, ज्ञान से युक्त, प्रखर तेज से सम्पन्न सोम सभी का अवलोकन करने हेतु पात्र में प्रतिष्ठित हो।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.9.6)
Let the Somras gladdening the demigods-deities, forward-ahead in the Yagy, has sharp radiance-aura, is stored in the vessel to see all.
असावि सोमो अरुषो वृषा हरी राजेव दस्मो अभि गा अचिक्रदत्।
पुनानो वारमत्येष्यव्ययं श्येनो न योनिं घृतवन्तमासदत्॥
दीप्तिमान्, शक्ति बढ़ाने वाला, हरित वर्ण का सोम राजा के सदृश देखने योग्य है। गाय के दूध में मिलाकर निर्मल किया जाने वाला सोम, भेड़ के बालों से निर्मित छन्ने से छाना जाता है। जिस प्रकार वेग के साथ पक्षी नीचे आता है, उसी प्रकार सोम वेगपूर्वक जल से परिपूर्ण बर्तन में स्थिर होता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.9.7)
Shinning, strength increasing, greenish king Som deserve to be seen-respected like a king. Somras mixed in cow's milk and filtered through the sieve, made of sheep hairs. The way a bird fly down with fast speed, similarly Som moves with high speed into the vessel full of water.
पर्जन्यः पिता महिषस्य पर्णिनो नाभा पृथिव्या गिरिषु क्षयं दधे।
स्वसार आपो अभि गा उदासरन्त्सं ग्रावभिर्वसते वीते अध्वरे॥
जल-वर्षण करने वाले बादल ही बृहत् पत्तों वाले सोम के पिता है। वे सोमदेव धरती के गर्भ में स्थित पर्वतों पर निवास करने वाले हैं। वे सोमदेव, गौ के दूध, जल तथा स्तुतियों को ग्रहण करते हुए यज्ञशाला में प्रतिष्ठित होते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.9.8)
Rain water showering clouds are the father of Som with large leaves. Som Dev resides over the mountains in the navel of the earth. Som Dev accept the cow's milk mixed in water, water, Stuties and is stablished in the Yagy Shala.(03.02.2026)
श्रायन्त इव सूर्य विश्वेदिन्द्रस्य भक्षत।
वसूनि जातो जनिमान्योजसा प्रति भागं न दीधिमः॥
हे ऋत्विजों! अंशुओं (सूर्य, किरण) को प्रश्रय प्रदान करने वाले सूर्य देवता के सदृश इन्द्र देव सृष्टि के असीम ऐश्वर्य को धारण करने वाले हैं। पिता द्वारा कमाई गई सम्पदा का हिस्सा प्राप्त करने के सदृश हम इन्द्र देव की क्षमता से उत्पन्न ऐश्वर्य को पाते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.10.1)
Hey Ritiz Gan! Devraj Indr grant possessing unlimited grandeur and support Sury Dev who support beams-rays of light. We get grandeur like the fragment-share of father's wealth-assets from Devraj Indr.
अलर्षिरातिं वसुदामुप स्तुहि भद्रा इन्द्रस्य रातयः।
यो अस्य कामं विधतो न रोषति मनो दानाय चोदयन्॥
हे याजकों! सात्विक मनुष्यों को विभूति प्रदान करने वाले देवराज इन्द्र की अभ्यर्थना करो, इसलिए कि इनके द्वारा प्रदत्त धन कल्याण की ओर प्रेरित करने वाले हैं। जब ये देवराज इन्द्र अपने मन को (यजमानों के निमित्त) देने की प्रेरणा करते हैं, तो साधक की इच्छा का क्षय नहीं करते।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.10.2)
Hey Yajak Gan! Worship-pray to Devraj Indr, who award prosperity to the Satvik-virtuous humans. Wealth granted by Devraj Indr is used for welfare-well being. When Devraj Indr decide to grant wealth to the Yajmans, he do not supress the desire-wishes of the devotees.
यत इन्द्र भयामहे ततो नो अभयं कृधि।
मघवञ्छग्धि तव तन्न ऊतये वि द्विषो वि मृधो जहि॥
हे देवराज इन्द्र! हिंसा करने वालों के आतंक से आप हमें निडरता प्रदान करें। अपनी शक्ति से हमारा संरक्षण करने में सक्षम, आप हमारे शत्रुओं तथा हिंसा करने वालों का विनाश कर दें।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.10.3)
Hey Devraj Indr! Make us fearless from the violent-harmful. Capable of protecting us with your power, destroy our enemies resorting to violence.
त्वं हि राधसस्पते राधसो महः क्षयस्यासि विधर्ता।
तं त्वा वयं मघवन्निन्द्र गिर्वणः सुतावन्तो हवामहे॥
हे समृद्धिवान् देवराज इन्द्र! आप अगणित धन हमें प्रदान करने हेतु लिये रहते हैं। हे स्तुत्य ऐश्वर्यवान् देवराज इन्द्र! निर्मल सोम का स्वाद लेने हेतु, हम (ऋत्विज) आपको आवाहित करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.10.4)
Hey prosper Devraj Indr! You are willing to grant us unlimited wealth. Hey worshipable grandeur possessing Devraj Indr! We Ritviz Gan invoke you to taste pure-pious Somras.
सामवेद उत्तरार्चिक (10.11) ::
त्वं सोमासि धारयुर्मन्द्र ओजिष्ठो अध्वरे। पवस्व मंहयद्रयिः॥
हे सोम! आप अत्यन्त सुख प्रदान करने वाले, परम् शक्तिशाली हैं। आप इस श्रेष्ठ याग में अपनी धाराओं को वैभव से सम्पन्न करें। धन तथा पराक्रम प्रदान करने वाले हे सोम! आप पात्र में पावन हों।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.11.1)
Hey Somras! You grant extreme pleasure and possess extreme strength. You should accomplish your currents with grandeur. Hey Som, awarding valour and wealth! You should be purified in the pot.
त्वं सुतो मदिन्तमो दधन्वान्मत्सरिन्तमः। इन्दुः सत्राजिदस्तृतः॥
हे सोम! पवित्रता को प्राप्त किये आप अत्यधिक आनन्द प्रदान करने वाले, बलवान, याग में प्रयुक्त अग्रणी साधन, प्रकाशवान्, उत्साह में वृद्धि करने वाले, शत्रुओं को जीतने वाले तथा परास्त न होने वाले हैं।।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.11.2)
Hey mighty Som! Having attained piousness, you grant extreme pleasure, used in the Yagy as a forward material, illuminated, increases enthusiasm-excitement, winner of the enemies and undefeated.
त्वं सुष्वाणो अद्रिभिरभ्यर्ष कनिक्रदत्। द्युमन्तं शुष्ममा भर॥
हे सोमदेव! पत्थरों से कूटकर रसरूप निचोड़े गये आप ध्वनि के साथ पात्र में प्रतिष्ठित हों तथा हमें प्रखर तेज से युक्त शक्ति देने की कृपा करें।।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.11.3)
Hey Som Dev! You should be stored in the vessel on being squeezed after crushing with stones and grant us sharp intelligence and youth power.
पवस्व देववीतय इन्दो धाराभिरोजसा। आ कलशं मधुमान्त्सोम नः सदः॥
हे सामर्थ्यवान्, माधुर्ययुक्त सोमरस! आप शीघ्रतापूर्वक धारारूप में हमारे पात्र में देवताओं को तृप्त करने के निमित्त प्रतिष्ठित हो।।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.11.4)
Hey capable, sweetened Somras! Come quickly in a stream and establish in our pots to satisfy-satiate demigods-deities.
तव द्रप्सा उदप्रुत इन्द्रं मदाय वावृधुः। त्वां देवासो अमृताय कं पपुः॥
हे सोमदेव! जल में संयुक्त किया जाने वाला आपका रस, देवराज इन्द्र के हर्ष तथा कीर्ति में वृद्धि करने हेतु है। देवतागण अमरता को पाने हेतु आपका सेवन करते हैं।।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.11.5)
Hey Som Dev! Your juice on being mixed in water gladden Devraj Indr and increase his honour. Demigods-deities drink Somras to attain immortality.
आ नः सुतास इन्दवः पुनाना धावता रयिम्। वृष्टिद्यावो रीत्यापः स्वर्विदः॥
अन्तरिक्ष से पर्जन्य की वर्षा करने वाले, परिष्कृत होकर रसरूप पवित्र हुए हे अलौकिक सोमरस! आप हमें उत्कृष्ट वैभव देने की कृपा करें।।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.11.6)
Hey purified-refined divine Somras, showering water from the space-sky! Grant us excellent grandeur.
परि त्यं हर्यतं हरिं बभ्रुं पुनन्ति वारेण। यो देवान्विश्वाँ इत्परि मदेन सह गच्छति॥
हम सुंदर, कुटिल कृत्यों का विनाश करने वाले, तेजस्वी सोम को शोधन यन्त्र के माध्यम से छानकर शुद्ध करते हैं। वह सोमरस सभी देवताओं को आनन्द पहुँचाने वाले रसों के साथ प्राप्त होता है।।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.11.7)
We refine-purify Tejaswi-radiant Somras in the purification plant, who destroy wicked-vicious deeds. Somras is availed by the demigods-deities granting pleasure along with the juices-saps.
द्विर्यं पञ्च स्वयशसं सखयो अद्रिसं हृतम्। प्रियमिन्द्रस्य काम्यं प्रस्नापयन्त ऊर्मयः॥
पत्थरों द्वारा कूटकर निचोड़े गये, यशस्वी, सभी के द्वारा अभिलषित तथा देवराज इन्द्र के प्रिय सोमरस को दसों अँगुलियाँ (दशेन्द्रियाँ) अच्छी तरह से पवित्र करती हैं तथा जल से परिपूर्ण करती हैं।।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.11.8)
Squeezed after crushing with stones, glorious, desired by all and dear to Devraj Indr, Somras is purified with the ten fingers and saturated with water.
इन्द्राय सोम पातवे वृत्रघ्ने परि षिच्यसे। नरे च दक्षिणावते वीराय सदनासदे॥
हे सोमरस! दुर्जनों का नाश करने वाले देवराज इन्द्र के सेवन करने हेतु, याग में दक्षिणा देने वाले शूर हेतु तथा याग करने वाले याजकों हेतु आप कलश में झरते हुए प्रतिष्ठित हों।।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.11.9)
Hey Somras! You should be established in the Kalash drop by drop, for Devraj Indr who destroy the wicked-sinner and those who grant Dakshina in the Yagy along with Yajak Gan.
पवस्व सोम महे दक्षायाश्वो न निक्तो वाजी धनाय॥
हे सोमरस! घोड़े की भाँति द्रुत गति वाले, जल से धुलकर पवित्र हुए आप शत्रुओं का विनाश करने वाले शक्ति तथा वैभव हेतु कलश में प्रविष्ट करें।।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.11.10)
Hey Somras! Having fast speed like the horse, washed with water, with the destroying power of enemies; enter the Kalash for strength and grandeur.
प्र ते सोतारो रसं मदाय पुनन्ति सोमं महे द्युम्नाय॥
हे सोम! ऋत्विग्गण आनन्द तथा महान् ऐश्वर्य प्राप्त करने की अभिलाषा से आपको शुद्ध करते हैं।।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.11.11)
Hey Somras! Ritviz refine you with the desire of pleasure and grandeur.(04.02.2026)
शिशुं जज्ञानं हरिं मृजन्ति पवित्रे सोमं देवेभ्य इन्दुम्॥
जन्मे बालक को स्वच्छ करने के समान याजक गण, हरित वर्ण के, तेजस्वी सोम को देवताओं के पान करने के उद्देश्य से शोधन यन्त्र से शुद्ध करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.11.12)
The Yajak Gan purify greenish Tejaswi-aurous Somras for drinking by the demigods-deities subjecting it to purification machine like cleaning an infant-newly born child.
उपो षु जातमप्तुरं गोभिर्भङ्गं परिष्कृतम्। इन्दुं देवा अयासिषुः॥
शत्रुओं का विनाश करने वाले, जल-गाय के दूधाादि में मिलाये हुए, पवित्र, तेजस्वी सोमरस का देवता लोग सेवन करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.11.13)
Destroyer of the enemies, mixed in cow's milk and water, pious-pure radiant Somras is drunk by the demigods-deities.
तमिद्वर्धन्तु नो गिरो वत्सं संशिश्वरीरिव। य इन्द्रस्य हृदं सनिः॥
हमारी वेदों से युक्त वाणियाँ देवराज इन्द्र के हार्दिक प्रिय पात्र, उत्कृष्ट सोम की स्तुतियाँ करें। जैसे शिशु को माता अपने दूध से पुष्ट करती है, वैसे ही हमारी स्तुतियाँ सोम के कीर्ति को बढ़ाएँ।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.11.14)
Let our Ved Vani voice worship Somras dear to Devraj Indr. The way a mother nourish her infant by feeding with her milk, our Stuties should increase the glory of Som.
अर्षा नः सोम शं गवे धुक्षस्व पिप्युषीमिषम्। वर्धा समुद्रमुक्थ्य॥
हे स्तुत्य सोम देव! हमारी गायों को सुख देने वाले, हमारे निवास स्थान को पोषण-पदार्थों से परिपूर्ण करने वाले आप जल से संयुक्त होकर कलश में प्रविष्ट हों।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.11.15)
Hey worshipable Somras! Granting comfort to our cows, providing nourishing materials at our residence you should be mixed in water and enter the Kalash.
सामवेद उत्तरार्चिक (10.12) ::
आ घा ये अग्निमिन्धते स्तृणन्ति बर्हिरानुषक्। येषामिन्द्रो युवा सखा॥
अग्नि को प्रज्वलित करने वाले याजकों के युवा (अजर) देवराज इन्द्र सदैव ही सहचर रहते हैं। वे याजक देवताओं हेतु यथाक्रम कुश का आसन फैलाते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.12.1)
Youthful, immortal Devraj Indr is always with the Yajak Gan who ignite fire-Agni. They spread the cushion-Kush Mat for the demigods-deities.
बृहन्निदिध्म एषां भूरि शस्त्रं पृथुः स्वरुः। येषामिन्द्रो युवा सखा॥
जिन ऋषियों के पास भरपूर समिधाएँ हैं, महान् शस्त्र (प्रार्थनाएँ) हैं, स्तोत्र भी असंख्य हैं, युवा देवराज इन्द्र सदैव ही इनके सखा रहते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.12.2)
Youthful Devraj Indr is friendly with the Rishis who has enough woods for Yagy-Agni Hotr, unlimited Strotrs and great prayers.
अयुद्ध इद्युधा वृतं शूर आजति सत्वभिः। येषामिन्द्रो युवा सखा॥
देवराज इन्द्र जिनके सखा हैं, वह ऋत्विज संग्राम की लालसा नहीं रखते, फिर भी पराक्रमी सैन्य बल वाले शत्रु को पराभूत करने की क्षमता रखते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.12.3)
Those Ritviz who are friendly with Devraj Indr do not wish to fight war, still they have the capability of defeating the enemy with mighty-powerful army.
य एक इद्विदयते वसु मर्ताय दाशुषे। ईशानो अप्रतिष्कुत इन्द्रो अङ्ग॥
जगत् के अधिपति, संग्राम में अकेले होते हुए भी शत्रु से अपराजेय देवराज इन्द्र, यजमानों को समस्त ऐश्वर्य प्रदान करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.12.4)
Devraj Indr Lord of the universe, undefeated by the enemy though alone, yet grant all sorts of grandeur to the Yajmans.
यश्चिद्धि त्वा बहुभ्य आ सुतावाँ आविवासति। उग्रं तत्पत्यते शव इन्द्रो अङ्ग॥
अनेकों में से जो याजक सोमयज्ञ करके आपकी पूजा करते हैं, उसे हे देवराज इन्द्र! आप अत्यन्त शीघ्र शक्ति से युक्त कर देते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.12.5)
Hey Devraj Indr! Out of the several Yajak Gan who worship you by performing Som Yagy; are strengthened by you quickly.
कदा मर्तमराधसं पदा क्षुम्पमिव स्फुरत्। कदा नः शुश्रवद्भिर इन्द्रो अङ्ग॥
वे देवराज इन्द्र हमारी अभ्यर्थनाओं को कब श्रवण करेंगे तथा भक्ति न करने वालों को तुच्छ पौधों के समान कब विनष्ट करेंगे?(सामवेद उत्तरार्चिक 10.12.6)
Hey Devraj Indr! When will you respond to our prayers and destroy the inferior like the unwanted plants-weeds, who are not devotees-worshipers.
गायन्ति त्वा गायत्रिणोऽर्चत्यर्कमर्किणः। ब्रह्माणस्त्वा शतक्रत उद्वंशमिव येमिरे॥
हे सैकड़ों कर्म करने वाले देवराज इन्द्र! ऋत्विग्गण आपकी प्रशंसा करते तथा ऋचाओं द्वारा यज्ञ करते हैं। जिस प्रकार बाँस बढ़ जाता है, उसी प्रकार याजकगण महिमा गान द्वारा आपको ऊँचा स्थान प्रदान करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.12.7)
Hey Devraj Indr performing hundreds of deeds-endeavours! Ritviz Gan appreciate you and perform Yagy with the Richas. The way a bamboo increase in size, similarly the Yajak Gan sing your glory and grant you a high position-place.
यत्सानोः सान्वारुहो भूर्यस्पष्ट कर्वम्। तदिन्द्रो अर्थं चेतति यूथेन वृष्णि रेजति॥
जब याजकगण समिधा आदि एकत्र करने के उद्देश्य से शैल पर प्रस्थान करते हैं तथा यज्ञकर्म करते हैं, तब उनकी कामनाओं को जानने वाले देवराज इन्द्र, अभीष्ट प्रदान करने वाले याग में प्रस्थान करने हेतु उद्यत होते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.12.8)
When Yajak Gan go the mountain for collecting wood for Yagy and accomplish Yagy, Devraj Indr become ready to grant-approve their desires and participate in the Yagy.
युंश्वा हि केशिना हरी वृषणा कक्ष्यप्रा। अथा न इन्द्र सोमपा गिरामुपश्रुतिं चर॥
हे सोमरस का सेवन करने वाले देवराज इन्द्र! शक्तिशाली अश्वों को रथ में संयोजित करके आप हमारी प्रार्थनाओं को श्रवण करने के लिए यहाँ पधारें।(सामवेद उत्तरार्चिक 10.12.9)
Hey Devraj Indr drinking Somras! Deploy strong horses in the charoite and invoke here to respond our prayers.(05.02.2026)
सामवेद उत्तरार्चिक (11) :: ऋषि :- मेधातिथि काण्व, वसिष्ठ, प्रगाथ, काण्व, मेध्यातिथि काण्व, त्र्यरुणखेवृष्ण, अग्नयो, धिष्ण्या ऐश्वरा, हिरण्यस्तूप, पराशर, अग्नयो, घोर, सार्पराज्ञी; देवता :- इध्मः समिद्धोऽग्निर्वा, तनूनपात्, नराशंस, इल, सूर्य, इन्द्र, पवमान, सोम, अग्नि; छन्द :- गायत्री, त्रिष्टुप्, वार्हत, प्रगाथ, अनुष्टुप, विराट्, द्विपदा विराट्, जगती।
सामवेद उत्तरार्चिक (11.1) ::
सुषमिद्धो न आ वह देवाँ अग्ने हविष्मते। होतः पावक यक्षि च॥
हे पवित्र करने वाले, यजमान अग्ने! आप भली-भाँति देदीप्यमान् होकर साधकों के कल्याण हेतु, देवों को आवाहित करें तथा उनके उद्देश्य से याग सम्पन्न करें; अर्थात् देवताओं के पोषण हेतु हविष्यान्न ग्रहण करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 11.1.1)
Hey Yajman Agne, purifying the humans! Get ignited & illuminated properly for the welfare of the devotees-Yajman to invite-invoke the demigods-deities. Accept offering for the nourishment of the demigods-deities.
मधुमन्तं तनूनपाद्यज्ञं देवेषु नः कवे। अद्या कृणुहयूतये॥
ऊपर की ओर जाने वाले, प्रज्ञावान् हे अग्ने! हमारे संरक्षण हेतु प्राण वर्द्धक, माधुर्य युक्त हवियों को देवों के उद्देश्य से ग्रहण करें तथा इन्हें देवों तक ले जाएँ।(सामवेद उत्तरार्चिक 11.1.2)
Rising in the upward direction, hey enlightened Agne! For the sake of our protection-asylum accept & carry the Air Vital boosting, sweetened offerings for the demigods-deities.
नराशंसमिह प्रियमस्मिन्यज्ञ उप ह्वये। मधुजिह्व हविष्कृतम्॥
हम इस याग में देवगणों को प्रिय तथा प्रसन्नता देने वाले अग्नि देव को आहूत करते हैं। वे हमारे हविष्यान्नों को देवगणों तक पहुँचाने वाले और प्रार्थना किये जाने वाले हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 11.1.3)
We summon-invoke Agni Dev in the Yagy who is gladdening & dear to the demigods-deities. He carry our offerings to the demigods and deserve worshiped.
अग्ने सुखतमे रथे देवाँ ईडित आ वह। असि होता मनुर्हितः॥
मनुष्य मात्र के शुभ चिंतक, हे अग्ने! आप अपने उत्कृष्ट-सुख प्रदान करने वाले रथ से देवों को लेकर याग करने के स्थान पर आगमन करें। हम आपकी स्तुति करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 11.1.4)
Hey Agni Dev! You are a well wisher of humans. Join the Yagy, riding comfortable, excellent charoite along with the demigods-deities. We worship you.
यदद्य सूर उदितेऽनागा मित्रो अर्यमा। सुवाति सविता भगः॥
सूर्य के उदित होने के बाद पाप रहित मित्र, अर्यमा, भग तथा सविता देव हमें अभिलषित धन प्रदान करने की कृपा करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 11.1.5)
After the Sun rise, let sinless Mitr, Aryma and Savita Dev bless us with desired wealth.
सुप्रावीरस्तु स क्षयः प्र नु यामन्त्सुदानवः। ये नो अंहोऽतिपिप्रति॥
हे देवताओं! आप हमारी भलाई करने वाले, श्रेष्ठ संरक्षक तथा याग में रहने वाले हैं। आप हमें संरक्षण प्रदान करें तथा हमें निष्पाप करने की कृपा करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 11.1.6)
Hey demigods-deities! You resort to our welfare-well being as the best guardian and remain present in the Yagy. Grant us protection and make us sinless.
उत स्वराजो अदितिरदब्धस्य व्रतस्य ये। महो राजान ईशते॥
मित्रादि देवगण अपनी जननी अदिति के साथ हमारे कर्मों के अधिपति हैं। वह हमारी मनोकामनाओं की पूर्ति करने में सक्षम हैं, इसलिए वे हमारे स्वामी हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 11.1.7)
Mitr and other demigods along with their mother Aditi are the lords of our deeds. They are capable of accomplishing our wishes-desires, hence they are our lord.
उ त्वा मदन्तु सोमाः कृणुष्व राधे अद्रिवः। अव ब्रह्मद्विषो जहि॥
हे देवराज इन्द्र! सोमरस का सेवन करके आप आह्लादित हों। आप हमें वैभव प्रदान करें एवं ब्रह्म ज्ञानियों से शत्रुता रखने वालों को विनष्ट कर दें।(सामवेद उत्तरार्चिक 11.1.8)
Hey Devraj Indr! Gladden by drinking Somras. Grant us grandeur and destroy those have enmity with the Brahm Gyani-who has realized God-Supreme Knowledge.
पदा पणीनराधसो नि बाधस्व महाँ असि। न हि त्वा कश्चन प्रति॥
हे देवराज इन्द्र! आप महान् हैं। आपके सदृश दूसरा कोई भी शक्तिशाली नहीं है। आप दानी प्रवृत्ति न रखने वालों को कष्ट पहुँचाएँ।(सामवेद उत्तरार्चिक 11.1.9)
Hey Devraj Indr! You are great. There is none; mightier than you. Torture those who do not intend to donate.
त्वमीशिषे सुतानामिन्द्र त्वमसुतानाम्। त्वं राजा जनानाम्॥
हे देवराज इन्द्र! आप रस से भरे पदार्थों तथा रस से रहित पदार्थों के अधिपति है। आप सभी जीव धारियों के राजा हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 11.1.10)
Hey Devraj Indr! You are the lord of the materials full of sap-juices and without sap. You are the Lord of all living beings.
सामवेद उत्तरार्चिक (11.2) ::
आ जागृविर्विप्र ऋतं मतीनां सोमः पुनानो असदच्चमूषु।
सपन्ति यं मिथुनासो निकामा अध्वर्यवो रथिरासः सुहस्ताः॥
चैतन्य, स्तोत्रों को जानने वाला सोम शोधन यन्त्र से शोधित होते हुए पात्र में क्षरित होता है। उत्कृष्ट कार्य में निपुण, शरीर धारण करने वाले, अभिलाषा रखने वाले पुरोहित इसे संगृहीत करके सुरक्षित रखते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 11.2.1)
Conscious awake Somras, aware of the Strotrs, passes through the purification plant and is stored in the vessel. Expert in virtuous-excellent jobs, desirous Priests collect it and keep it safe.
स पुनान उप सूरे दधान ओभे अप्रा रोदसी वी ष आवः।
प्रिया चिद्यस्य प्रियसास ऊती सतो धनं कारिणे न प्र यंसत्॥
स्वच्छ होने वाला, वह सोम देवराज इन्द्र को पाता है। यह सोम द्युलोक तथा भूलोक दोनों को परिव्याप्त करने वाला है। इसकी अति प्रिय रस-संयुक्त धाराएं हमारी सुरक्षा करती हैं तथा धन-सम्पत्ति प्रदान करती है।(सामवेद उत्तरार्चिक 11.2.2)
Somras subjected to purification is meant for Devraj Indr. Som pervade the heavens & earth. Its currents of lovely juice protect us and grant us wealth and prosperity.
स वर्धिता वर्धनः पूयमानः सोमो मीढ्वाँ अभि नो ज्योतिषावीत्।
यत्र नः पूर्वे पितरः पदज्ञाः स्वर्विदो अभि गा अद्रिमिष्णन्॥
देवताओं के कीर्ति को बढ़ाने वाला, समृद्धि को प्राप्त करने वाला, मनवांछित पदार्थों को उपलब्ध कराने वाला, शुद्ध किया हुआ सोम अपनी कान्ति से सब तरह से हमारा संरक्षण करें। वेदमन्त्रों को जानने वाले आत्मज्ञानी, हमारे पूर्वज अपनी यज्ञीय गौओं को सोम से परिपूर्ण गिरि के समीप ले जाया करते थे।(सामवेद उत्तरार्चिक 11.2.3)
Purified Somras which increase the glory of demigods, grant prosperity and desired good-materials should protect us like its lustre.
मा चिदन्यद्वि शंसत सखायो मा रिषण्यत।
इन्द्रभिस्तोता वृषणं सचा सुते मुहुरुक्था च शंसत॥
हे सखाओं! आप सब किसी दूसरे की अभ्यर्थना करने में अपने सामर्थ्य को व्यर्थ में व्यय मत करो। सोम को पवित्र करने के पश्चात् संगठित रूप से, परम् सामर्थ्यवान् देवराज इन्द्र की ही अभ्यर्थना करो।(सामवेद उत्तरार्चिक 11.2.4)
Hey companions-friends! Do not waste your energy-capability in the worship of others. After purifying Somras worship together worship-pray capable-mighty Devraj Indr, only.
अवक्रक्षिणं वृषभं यथा जुवं गां न चर्षणीसहम्।
विद्वेषणं संवननमुभयङ्करं मंहिष्ठमुभयाविनम्॥
बैल के समान स्पर्द्धा करने वाले, त्वरित गतिशील, शत्रुओं से बैर रखने वाले तथा उनका शमन करने वाले, आराधकों के पूज्य, भय से रहित करने वाले, महान् स्वर्ग तथा पृथ्वी दोनों वैभवों को प्रदान करने वाले देवराज इन्द्र की ही वन्दना करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 11.2.5)
Competing like oxen-bulls, accelerated, has enmity with the enemies and destroys them, revered-honoured by the worshipers, free from fear, grants grandeur of both heavens & earth Devraj Indr should be worshiped.(06.02.2026)
उद्दु त्ये मधुमत्तमा गिरः स्तोमास ईरते।
सत्राजितो धनसा अक्षितोतयो वाजयन्तो रथा इव॥
जीवन-समर में सत्य की जीत प्राप्त कराने वाले, धन-सम्पत्ति प्राप्त करने के माध्यम, सदैव संरक्षित रखने वाले देवराज इन्द्र के निमित्त मधुर स्तोत्र, संग्राम के प्रिय साधन रथ के सदृश कहलाते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 11.2.6)
Sweet Strotrs for Devraj Indr, who help in granting success in the struggles of life, grants wealth and prosperity, is always protective; are like the dear charoite meant for war.
कण्वा इव भृगवः सूर्या इव विश्वमिद्धीतमाशत।
इन्द्रं स्तोमेभिर्महयन्त आयवः प्रियमेधासो अस्वरन्॥
भृगु ऋषियों ने भी कण्व के समान ध्यान द्वारा, सूर्य अंशुओं की भाँति विश्व में संव्याप्त देवराज इन्द्र का दर्शन किया। वे श्रद्धापूर्वक याग करने वाले यजमानों की भाँति देवराज इन्द्र की महिमा का गान करने लगे।(सामवेद उत्तरार्चिक 11.2.7)
Bhragu Rishis too viewed Devraj Indr like Kavy Rishi like the beans-rays of Sun light during meditation. They started singing praises with respect-honour, like the Yajmans who accomplish Yagy.
पर्यू षु प्र धन्व वाजसातये परि वृत्राणि सक्षणिः। द्विषस्तरध्या ऋणया न ईरसे॥
हे तेजस्वी सोम! आप श्रेष्ठ अन्न (पोषक पदार्थ) प्रदान करने के निमित्त प्रकट हों। जिस प्रकार शूरवीर देवराज इन्द्र वृत्रासुर को पराभूत करने हेतु प्रेरित हुए थे, उसी प्रकार हे ऋणों को अपनी अनुकम्पा से समाप्त कर देने वाले (सोम)! आप शत्रुओं का शमन करने हेतु प्रेरित हों।(सामवेद उत्तरार्चिक 11.2.8)
Hey radiant Som! You should appear-invoke to grant best food grains. The way brave Devraj Indr was inspired to defeat Vratra Sur, similarly you too finish-discharge our debt by virtue of your mercy. You too should be inspired-encouraged to destroy the enemies.
अजीजनो हि पवमान सूर्यं विधारे शक्मना पयः। गोजीरया रंहमाणः पुरन्ध्या॥
हे सोम देवता! रश्मियों के माध्यम से द्युलोक तथा भूमिलोक में जीवन को गतिमान् करने वाले, आपने अपने सामर्थ्य से जल को धारण करने वाले अन्तरिक्ष से ऊपर सूर्य को प्रकट किया है।(सामवेद उत्तरार्चिक 11.2.9)
Hey Som Dev! You make the life survive-dynamic by virtue of your rays-beams over the heavens & earth. You evolved the Sun by virtue of your capability over the space-sky which support-sustain water.
अनु हि त्वा सुतं सोम मदामसि महे समर्यराज्ये। वाजाँ अभि पवमान प्र गाहसे॥
हे दिव्य सोम! ज्ञानी पुरुषों के इस विशाल राज्य में, आपके आज्ञाकारी होकर हम सुख का लाभ उठाते हैं। आप बल से युक्त होने वाले कर्मों को करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 11.2.10)
Hey divine Som! We avail comforts in this empire of the enlightened, becoming obedient to you. You perform those deeds which involve strength.
परि प्र धन्वेन्द्राय सोम स्वादुर्मित्राय पूष्णे भगाय॥
हे सोम! प्रमुदित करने वाले आप मित्र, पूषा, भग तथा इन्द्र आदि देवों के निमित्त पात्र में प्रविष्ट हों। (सामवेद उत्तरार्चिक 11.2.11)
Hey Som ras! You being gladdening, enter the pot for your friends Mitr, Pusha and Indr etc.
एवामृताय महे क्षयाय स शुक्रो अर्ष दिव्यः पीयूषः॥
हे सोमरस! अन्तरिक्ष लोक में देवगणों के पान करने के उद्देश्य से प्रकट हुए आप, अमरत्व को प्राप्त करने हेतु धरती पर वेग पूर्वक प्रवाहित हों।(सामवेद उत्तरार्चिक 11.2.12)
Hey Somras! You appeared in the space-sky for consumption by the demigods-deities. Now, you should flow with high speed over the earth to become immortal.
इन्द्रस्ते सोम सुतस्य पेयात्क्रत्वे दक्षाय विश्वे च देवाः॥
हे सोम! उत्कृष्ट ज्ञान तथा शक्ति प्राप्त करने के अभिलषित देवराज इन्द्र के साथ-साथ समस्त देवगण निचोड़े गये आपके इस पवित्र सोमरस का सेवन करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 11.2.13)
Hey Som! Let Devraj Indr & all demigods-deities drink your squeezed pious-pure, sap-Somras for excellent knowledge and strength.
सामवेद उत्तरार्चिक (11.3) ::
सूर्यस्येव रश्मयो द्रावयित्नवो मत्सरासः प्रसुतः साकमीरते।
तन्तुं ततं परि सर्गास आशवो नेन्द्रादृते पवते धाम किंचन॥
सूर्य की किरणों के समान, प्रेरित करने वाली, प्रमुदित करने वाली, सोम की धाराएँ संव्याप्त होती हैं। वे देवराज इन्द्र के अलावा किसी दूसरे को प्राप्त नहीं होती।(सामवेद उत्तरार्चिक 11.3.1)
Like the Sun rays, inspiring, gladdening currents of Somras are omnipresent. They are not available to anyone except Devraj Indr.
उपो मतिः पृच्यते सिच्यते मधु मन्द्राजनी चोदते अन्तरा सनि।
पवमानः सन्तनिः सुन्वतामिव मधुमान् द्रप्सः परि वारमर्षति॥
मधुरता से पूर्ण तथा हर्ष प्रदान करने वाला सोमरस देवराज इन्द्र को समर्पित किया जाता है। याजकों द्वारा निकाला गया यह मधुर सोमरस बारम्बार स्वच्छ किया जाता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 11.3.2)
Full of sweetness, pleasure granting Somras is offered to Devraj Indr. This Somras extracted by the Yajak Gan is repeatedly cleansed-sanctified.
उक्षा मिमेति प्रति यन्ति धेनवो देवस्य देवीरुप यन्ति निष्कृतम्।
अत्यक्रमीदर्जुनं वारमव्ययमत्कं न निक्तं परि सोमो अव्यत॥
ऊँचे स्वर में दीप्तिमान् सोम की, दिव्य वाणी से वन्दना की जाती है तथा गाय के दूध से निर्मल हुआ वह सोम दिव्य गुणों को प्राप्त कर लेता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 11.3.3)
Radiant Som is worshiped in divine voice loudly. Purified with cow's milk Som attains all divine characters.
अग्निं नरो दीधितिभिररण्योर्हस्तच्युतं जनयत प्रशस्तम्। दूरेदृशं गृहपतिमथव्युम्॥
प्रार्थना के योग्य, दूर से ही दर्शन करने योग्य, घरों के संरक्षण कर्त्ता, अचल तथा दीप्तिमान् अग्नि को हे स्तोताओं! अरणि-मंथन के द्वारा उत्पन्न करो।(सामवेद उत्तरार्चिक 11.3.4)
Hey Stota Gan! Produce divine Agni-fire, which deserve worship, seen through a distance, protect homes-houses, that is immovable & illuminating. Evolve it by rubbing wood together.
तमग्निमस्ते वसवो न्यृण्वन्त्सुप्रतिचक्षमवसे कुतश्चित्। दक्षाय्यो यो दम आस नित्यः॥
हे अग्निदेव! आप प्रति दिन दर्शन करने योग्य, गृहों में प्रदीप्त किये जाने योग्य, हमेशा जलने वाले, मनोहर स्वरूप वाले हैं। आपको ऋत्विग्गण ने यज्ञशाला में अपने संरक्षण के निमित्त प्रतिस्थापित किया है।(सामवेद उत्तरार्चिक 11.3.5)
Hey Agni Dev! You deserve to be seen everyday, are produced for illuminating the house, is always burning and attractive. The Ritviz Gan established you in the Yagy Shala for protection.
प्रेद्धो अग्ने दीदिहि पुरो नोऽजस्त्रया सूर्या यविष्ठ। त्वां शश्वन्त उप यन्ति वाजाः॥
हे महा पराक्रमी अग्ने! उचित तरह से देदीप्यमान् हुए आप, तीक्ष्ण ज्वालाओं से हमारे सम्मुख (यज्ञ वेदिका में) प्रज्वलित हों। हम जौ से मिली हुई हवियाँ आपको लगातार अर्पित करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 11.3.6)
Hey Agne with great valour! Properly ignited, having sharp-fierce flames, evolve before us in the Yagy Vedica. We continue making offerings mixed with barley.
आयंगौः पृश्निरक्रमीदसदन्मातरं पुरः। पितरं च प्रयन्त्स्वः॥
लगातार विचरण करने वाले, तेजवान् सूर्यदेव पूर्व दिशा में उदित होने के बाद, उच्चाकाश में आसीन हो जाते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 11.3.7)
Continuously revolving Sury Dev rise in the east and establish in the high space-sky.
अन्तश्चरति रोचनास्य प्राणादपानती। व्यख्यन्महिषो दिवम्॥
हे सूर्य देवता! आपका तेज अन्तरिक्ष तथा धरती के बीच उदय होने से अस्त होने तक चारों ओर फैला रहता है। आप महान् अन्तरिक्ष को दीप्तिमान् तथा तेजस्वी बनाते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 11.3.8)
Hey Sury Dev! Your radiance-aura is spreaded over the space and the earth since Sun rise to Sun set, all around. You make the space-sky great, illuminated and Tejaswi-energetic.
त्रिंशब्द्धाम वि राजति वाक्पतङ्गाय धीयते। प्रति वस्तोरह द्युभिः॥
सूर्य देवता दिन की तीस घड़ियों; अर्थात् 12 घंटे अपने तेजस्विता से अत्यधिक चमकते रहते हैं। उस समय ऋक्, यजु, साम रूपी स्तुतियाँ सूर्य देवता को ग्रहण होती हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 11.3.9)
Sury Sun keep shinning for 24 hours (30 Ghadi). During this period, prayers in the form Rik, Yaju, Sam are attained by him.(07.02.2026)
सामवेद उत्तरार्चिक (12) :: ऋषि :- गौतमो राहूगण, वसिष्ठ, भरद्वाजो बार्हस्पत्य, प्रजापति, सौभरि, काण्व, मेधातिथिमेध्यातिथि काण्वी, ऋजिश्वा, ऊर्ध्वसद्या तिरची, मुतम्भर, आत्रेय, नृमेधपुरुमेधौ, शुनःशेप, आजीगर्ति, नोधा, मेध्यातिथिकाण्व, रेर्णर्वैश्वमित्र, कुत्स, अगस्त्य; देवता :- अग्नि, पवमान, सोम, इन्द्र; छन्द :- गायत्री, अनुष्टुप्, काकुभ, प्रगाध बार्हत, प्रगाथ, त्रिष्टुप्, जगती।
सामवेद उत्तरार्चिक (12.1.1) ::
उपप्रयन्तो अध्वरं मन्त्रं वोचेमाग्नये। आरे अस्मे च शृण्वते॥
उत्तम यज्ञानुष्ठान करने वाले यजमानों की स्तुतियों को श्रवण करने वाले अग्नि देवता का हम वेद मन्त्रों द्वारा स्तवन करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 12.1.1)
We praise-worship Agni Dev with Ved Mantrs who listen-respond to the Stuties of the Yajmans, who organise-accomplish excellent Yagy.
यः स्नीहितीषु पूर्व्यः संजग्मानासु कृष्टिषु। अरक्षद्दाशुषे गयम्॥
सदैव देदीप्यमान् वे अग्नि देवता परस्पर भेदभाव रखने वाले मनुष्यों के इकट्ठा होने पर भी दान करने वाले लोगों की धन-सम्पत्तियों की रक्षा करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 12.1.2)
Always shinning Agni Dev protect the donors of wealth and property; where human being having mutual differences gather.
स नो वेदो अमात्यमग्नी रक्षतु शन्तमः। उतास्मान्यात्वं हसः॥
अत्यधिक कल्याण करने वाले अग्नि देवता हमारे धन के संरक्षण में सहायता करें तथा हमें कुकर्मों से बचाएं।(सामवेद उत्तरार्चिक 12.1.3)
Let Agni Dev resorting to extreme welfare-well being, protect our wealth and keep us off sins, wickedness.
उत ब्रुवन्तु जन्तव उदग्निर्वृत्रहाजनि। धनञ्जयो रणेरणे॥
शत्रुओं के विनाशक, शत्रुओं को परास्त कर धन जीतने वाले अग्नि देवता प्रज्वलित हुए हैं, स्तोताओं को उनकी वन्दना करनी चाहिए।(सामवेद उत्तरार्चिक 12.1.4)
Destroyer of the enemies, winner of their wealth after defeating them Agni Dev; has evolved. The Stota Gan should worship-pray to him.
सामवेद उत्तरार्चिक (12.2) ::
अग्ने युंक्ष्वा हि ये तवाश्वासो देव साधवः। अरं वहन्त्याशवः॥
हे अग्नि देवता! आप अपने तेज गति से चलने वाले तथा शक्तिशाली घोड़ों को अपने रथ में संयोजित करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 12.2.1)
Hey Agni Dev! Deploy your fast running mighty horses in the charoite.
अच्छा नो याह्या वहाभि प्रयांसि वीतये। आ देवान्त्सोमपीतये॥
हे अग्नि देवता! आप आहुतियाँ प्राप्त करने तथा सोमरस का सेवन करने के लिए हमारी तरफ उद्यत हों। आप अपने साथ-साथ देवताओं को भी प्रकट करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 12.2.2)
Hey Agni Dev! You should move towards us, to accept offerings and drinking Somras. Invoke demigods-deities along with you.
उदग्ने भारत द्युमदजस्त्रेण दविद्युतत्। शोचा वि भाह्यजर॥
हे अग्नि देवता! आप इस सृष्टि के पालनकर्ता हैं। आप देदीप्यमान् होकर ऊँचे उठें। कभी कम न होने वाले अपने तेज से दीप्तिमान् हों तथा विश्व में चारों ओर अपना आलोक संव्याप्त करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 12.2.3)
Hey Agni Dev! You are the nurture of this universe. You should shine and rise up. Let your never ending Tej, (radiance, energy) illuminate and spread aura-light all over the world.
प्र सुन्वानायान्धसो मर्ती न वष्ट तद्वचः। अप श्वानमराधसं हता मखं न भृगवः॥
रस से परिपूर्ण तथा ग्रहण करने योग्य सोम के लिए की गई वन्दनाओं को धर्म न करने वाले तथा श्वान के समान मानव श्रवण न कर पायें। जिस प्रकार भृगु ऋषि ने मख नाम के दानव का संहार किया था; उसी प्रकार ऐसे मनुष्यों को दोषी के समान दंडित करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 12.2.4)
Prayers offered to acceptable Som full of juice-sap, should not be heard by those who do not follow Dharm and the humans who are like the dog. The way Bhragu Rishi killed the demon Makh, similarly punish the guilty humans.
आ जामिरत्के अव्यत भुजे न पुत्र ओण्योः।
सरज्जारो य न योषणां वरो न योनिमासदम्॥
भ्राता के समान अत्यधिक प्रिय सोम, माता-पिता की बांहों में सुरक्षित रहने वाले बेटों के समान शोधन यन्त्र से द्रवित होकर पात्र में प्रविष्ट होता है। जिस प्रकार कामी व्यक्ति स्त्री की तरफ, युवक-युवती की तरफ उद्यत होता है, उसी प्रकार सोम पात्र में प्रतिष्ठित होता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 12.2.5)
Highly affectionate like the brother dear Som, enters the purification machine for refining like the son safe in the arms of parents. The way a lascivious move man towards a woman and young boys move to girls.; similarly Som enters the pot.
स वीरो दक्षसाधनो वि यस्तस्तम्भ रोदसी। हरिः पवित्रे अव्यत वेधा न योनिमासदम्॥
पुष्ट करने वाले पदार्थों तथा रसायनों से भरा हुआ वह शूर सोम, अपने तेज से अन्तरिक्ष तथा पृथ्वी को संव्याप्त कर देता है। जिस प्रकार याजक गृह में प्रवेश करता है, उसी प्रकार पवित्र हुआ हरित वर्ण का सोम छनकर पात्र में प्रवेश करता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 12.2.6)
Full of nourishing chemicals brave Somras pervade the sky-space with its Tej-radiance. The way a Yajak enters his house, similarly Somras enters the vessel after filtration.
अभ्रातृव्यो अना त्वमनापिरिन्द्र जनुषा सनादसि। युधेदापित्वमिच्छसे॥
हे देवराज इन्द्र! आप शत्रु विहीन, सभी को नियन्त्रित रखने वाले, बन्धु-बांधवों से रहित है। बन्धु भाव की कामना से संग्राम में शत्रुओं का संहार करके, आप एकमात्र याजकों को ही अपना बन्धु स्वीकार करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 12.2.7)
Hey Devraj Indr! You are free from enemies, controls all, has no brothers-companions. With the feeling of brotherhood you destroy the enemies in the war and accept the Yajak Gan as your brothers-relatives.
न की रेवन्तं सख्याय विन्दसे पीयन्ति ते सुराश्वः।
यदा कृणोषि नदनुं समूहस्यादित्पितेव हूयसे॥
हे शक्तिशाली देवराज इन्द्र ! आप उन लोगों के सखा नहीं होते जिन्हें अपने धनी होने पर गर्व रहता है। मदिरापान करके नशे में धुत व्यक्ति आपको कष्ट पहुँचाते हैं। ज्ञान तथा गुणों से युक्त ऋत्विजों को आप सखा बनाकर प्रगति के मार्ग पर अग्रसर करते हैं, उस समय आप पिता के समान आदर प्राप्त करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 12.2.8)
Hey mighty-powerful Devraj Indr! You do not maintain friendly relations with those who are proudy due to their wealth, torture-tease others after drinking wine. You become friendly with the enlightened-learned and full of virtues, leading them to progress and then you get love & affection like a father.
आ त्वा सहस्त्रमा शतं युक्ता रथे हिरण्यये।
ब्रह्मयुजो हरय इन्द्र केशिनो वहन्तु सोमपीतये॥
हे देवराज इन्द्र! आप सोने के रथ पर विराजमान होकर केवल संकेत मिलने से ही गतिशील अश्व, आपको यज्ञशाला में सोमरस का सेवन करने के निमित्त लेकर आगमन करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 12.2.9)
Hey Devraj Indr! You ride the golden charoite and the accelerated horses take you to the Yagy Shala for drinking Somras.
आ त्वा रथे हिरण्यये हरी मयूरशेप्या।
शितिपृष्ठा वहतां मध्वो अन्धसो विवक्षणस्य पीतये॥
हे देवराज इन्द्र! मधुरता से भरे हुए, अमृत के सदृश, स्तुति किये जाने योग्य सोम का पान करने के निमित्त, सुवर्ण-रथ में, मयूर के सदृश वर्ण वाले, सफेद पीठ वाले घोड़े, आपको यज्ञ-स्थान पर लाएँ।(सामवेद उत्तरार्चिक 12.2.10)
Hey Devraj Indr! Let the horses with white back and the body colour like the peacock, bring you to Yagy Shala for drinking worshipable Somras, which is sweetened and like elixir-nectar, in a golden charoite.(08.02.2026)
पिबा त्व3स्य गिर्वणः सुतस्य पूर्वपा इव।
परिष्कृतस्य रसिन इयमासुतिश्चारुर्मदाय पत्यते॥
हे वेद मन्त्रों द्वारा स्तुति किये जाने वाले देवराज इन्द्र! आप इस निर्मल सोमरस का सबसे पहले सेवन करें। यह सोमरस अत्यधिक आनन्दित कर देने वाले गुणों से सम्पन्न है।(सामवेद उत्तरार्चिक 12.2.11)
Hey Devraj worshiped with the Ved Mantrs! Drink this pure Somras, first of all. This Somras possess highly gladdening characterises.
आ सोता परि षिञ्चताश्वं न स्तोममप्तुरं रजस्तुरम्। वनप्रक्षमुदप्रुतम्॥
हे स्तोताओं! अश्व की भाँति तीव्र गति से जल को प्रवाहित करने वाले, अपनी कान्ति को संव्याप्त करने वाले, प्रशंसा करने योग्य, जल में तैरने वाले सोमरस का शुद्धिकरण करें तथा उसको जल में संयुक्त करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 12.2.12)
Hey Stota Gan! You make the water flow with the speed of horse, pervade aura, deserve praise. Purify Somras floating over water and then mix it with water.
सहस्रधारं वृषभं पयोदुहं प्रियं देवाय जन्मने।
ऋतेन य ऋतजातो विवावृधे राजा देव ऋतं बृहत्॥
बहुत सारी धाराओं के माध्यम से शोधित, सुखों को बढ़ाने वाले, दूध में मिलाये गये प्रिय सोमरस को देवों के लिए पवित्र करें। वह अलौकिक गुणों से सम्पन्न सोम जल में मिश्रित होकर समृद्धिशाली बन जाता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 12.2.13)
Sanctify Somras for demigods-deities which is purified in many streams, increase pleasure-comfort. Somras possessing divine traits-qualities become powerful when mixed in water.
सामवेद उत्तरार्चिक (12.3) ::
अग्निर्वृत्राणि जङ्घनद्रविणस्युर्विपन्यया। समिद्धः शुक्र आहुतः॥
उचित तरह से प्रकाशित तथा कान्तिमान्, आहुतियों से समृद्ध होने वाले, धन प्रदान करने वाले अग्नि देवता अज्ञान रूपी शत्रुओं को नष्ट करने वाले हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 12.3.1)
Wealth awarding Agni Dev, properly illuminated and radiant, enriched by oblations destroy the enemies in the form of ignorance.
गर्भे मातुः पितुः पिता विदिद्युतानो अक्षरे। सीदन्नृतस्य योनिमा॥
हे अग्नि देवता! आप धरती माँ के गर्भ में विशिष्ट जाज्वल्यमान् तथा आकाश में रक्षा करने वाले अर्थात् पिता के रूप में आसीन हैं। आप यज्ञ-स्थल में प्रतिष्ठित हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 12.3.2)
Hey Agni Dev! You are specifically blazing, present in the womb of earth, established in the sky like a protecting father. You are established at the Yagy site.
ब्रह्म प्रजावदा भर जातवेदो विचर्षणे। अग्ने यद्दीदयद्दिवि॥
सर्वज्ञाता, सभी का अवलोकन करने वाले, हे अग्नि देवता! द्युलोक में देवताओं को जो सुख, वैभव तथा संतान आदि प्राप्त है, वो सब हमें भी प्रदान करने की कृपा करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 12.3.3)
Aware of every thing and looking at all, hey Agni Dev! Grant us the comforts-pleasure, grandeur and progeny availble in the heavens to us as well.
अस्य प्रेषा हेमना पूयमानो देवो देवेभिः समपृक्त रसम्।
सुतः पवित्रं पर्येति रेभन्मितेव सद्म पशुमन्ति होता॥
सोम को प्रेरित करने वाला, सुवर्ण के सदृश कान्ति से पवित्र हुआ, तेजस्वी सोमरस देवताओं को ग्रहण करता है। याजकों के पशु आदि से भरे हुए गृहों में प्रवेश करने के सदृश, कूटकर अभिषुत किया गया सोम शोधन यन्त्र से छनते हुए कलश में प्रवेश करता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 12.3.4)
Inspiring Som, purified and possessing golden hue, Tejaswi Somras accepts demigods-deities. Som extracted by crushing with stones and passed through the purification machine enters the Kalash, while filtering like the animals of the Yajak Gan who enter the house.
भद्रा वस्त्रा समन्या3वसानो महान्कविर्निवचनानि शंसन्।
आ वच्यस्व चम्वोः पूयमानो विचक्षणो जागृविर्देववीतौ॥
शूरों में उत्तम पराक्रम तथा सुंदरता से युक्त, ज्ञान से भरे हुए, स्तुति किये जाने योग्य, चैतन्य, विशेष रूप से देखने वाले हे सोम देवता! आप स्वच्छ होने के पश्चात् यज्ञ-स्थल में रखे गये बर्तनों में प्रतिष्ठित हों।(सामवेद उत्तरार्चिक 12.3.5)
Best amongest the brave, beautiful, enlightened, worshipable, conscious watching specially, hey Som Dev! After being purified you should be stored in the vessel kept at the Yagy Sthal.
समु प्रियो मृज्यते सानो अव्ये यशस्तरो यशसां क्षैतो अस्मे।
अभि स्वर धन्वा पूयमानो यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः॥
कीर्तिवानों में उत्कृष्ट, धरती पर उत्पन्न हुआ, संतुष्टि प्रदान करने वाला सोमरस भेड़ के बालों से बनी छलनी से छनकर शुद्ध होता है। हे स्वच्छता को प्राप्त करने वाले सोम! हम सदैव स्वस्ति वचनों से ऊँचे स्वर से याचना करते हैं। आप कल्याण करने वाले साधनों से हमारी सुरक्षा करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 12.3.6)
Excellent amongest the glorious, born over the earth, satisfying Somras is purified by passing through the sieve made of sheep wool. Hey Som granting cleanliness! We make requests in loud voice with Swasti Vachan. Protect us with welfare means.
एतो न्विन्द्रं स्तवाम शुद्धं शुद्धेन साम्ना। शुद्धैरुक्थैर्वावृध्वांसं शुब्दैराशीर्वान्ममत्तु॥
पवित्र ऋचाओं से साम-गान करते हुए हम देवराज इन्द्र की स्तुति करते हैं। हे शक्तिशाली देवराज इन्द्र! आप वेगपूर्वक उपस्थित हों। हम गाय के स्वच्छ दूध आदि के मिश्रण से पौष्टिक, हर्ष प्रदान करने वाले सोमरस को आपके निमित्त प्रस्तुत करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 12.3.7)
We perform Stuti-prayers of Devraj Indr with the pious Richas reciting (Gan) Sam. Hey mighty Devraj Indr! You should appear quickly. We present gladding, nourishing Somras mixed with cow's milk to you.
इन्द्र शुद्धो न आ गहि शुद्धः शुद्धाभिरूतिभिः।
शुद्धो रयिं नि धारय शुद्धो ममद्धि सोम्य॥
हे देवराज इन्द्र! स्वच्छ हुए आप हमें धन-सम्पत्ति देने की कृपा करें। हे सोमरस का पान करने वाले देवराज इन्द्र! स्वच्छ हुए इस सोम को ग्रहण कर आप आह्लादित हों।(सामवेद उत्तरार्चिक 12.3.8)
Hey Devraj Indr! Having cleansed yourself, grant us wealth and prosperity. Hey Somras drinking Devraj Indr! Drink this sanctified Somras and become happy.
इन्द्र शुद्धो हि नो रयिं शुद्धो रत्नानि दाशुषे।
शुद्धो वृत्राणि जिघ्नसे शुद्धो वाजं सिषाससि॥
हे देवराज इन्द्र! शुद्ध हुए आप हमें वैभव से युक्त करें। श्रेष्ठ कर्मों को पूर्ण करने में आ रही बाधाओं को विनष्ट करें। आप वैभव प्रदान करने में सक्षम हैं। आप हमारी वेदवाणियों से पवित्र होकर शत्रुओं को दूर हटा दें।(सामवेद उत्तरार्चिक 12.3.9)
Hey Devraj Indr! Grant us grandeur. Remove the obstecles in our way, while accomplishing virtuous deeds. You are capable of granting grandeur. You should by purified by our Ved Vani and repel the enemies.
सामवेद उत्तरार्चिक (12.4) ::
अग्ने स्तोमं मनामहे सिध्रमद्य दिविस्पृशः। देवस्य द्रविणस्यवः॥
धन प्राप्ति की अभिलाषा से हम अन्तरिक्ष में संव्याप्त, तेजवान् अग्नि देवता की कल्याण करने वाले स्तोत्रों के द्वारा स्तुति करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 12.4.1)
With the expectation-desire of wealth, we worship Tejaswi Agni Dev with the Strotrs meant for well being-welfare.
अग्निर्जुषत नो गिरो होता यो मानुषेष्वा। स यक्षदैव्यं जनम्॥
याग में अग्रणी, व्यक्तियों की सहायता करने वाले अग्नि देवता, हमारी प्रार्थनाओं को भली प्रकार श्रवण करें तथा हमें दिव्य गुणों से सम्पूर्ण करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 12.4.2)
Forward in the Yagy, helper of the humans, respond-listen to our prayers properly and accomplish us with divine traits.(09.02.2026)
त्वमग्ने सप्रथा असि जुष्टो होता वरेण्यः। त्वया यज्ञं वि तन्वते॥
हे अग्नि देवता! आप याग-साधक, वर्णन करने योग्य, आनन्द प्रदान करने वाले तथा महान् है। यज्ञ कर्म करने वाले समस्त ऋत्विग्गण आपको प्रतिस्थापित कर अनुष्ठान सम्पन्न करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 12.4.3)
Hey Agni Dev! You are supporter of the Yagy, deserve description, grant pleasure and great. Ritviz Gan who perform Yagy establish you and accomplish the Yagy.
अभि त्रिपृष्ठं वृषणं वयोधामङ्गोषिणमवावशंत वाणीः।
वना वसानो वरुणो न सिन्धुर्वि रत्नधा दयते वार्याणि॥
हे सोम देवता! आप तीनों कालों में बरसने वाले हैं। आप अन्न प्रदान करने वाले, जल को घेरने वाले, प्रवाहमान्, रत्नों को प्रदान करने वाले, ध्वनि करने वाले तथा वरणीय धन प्रदान करने वाले है। हम याजक आपका मधुर स्तोत्रों से स्तवन करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 12.4.4)
Hey Som Dev! You shower in the three segments of the day. You provide food grains, surround water, sound producing, grant gems-jewels and acceptable wealth.शूरग्रामः सर्ववीरः सहावान् जेता पवस्व सनिता धनानि।
तिग्मायुधः क्षिप्रधन्वा समत्स्वषाढः साह्वान्पृतनासु शत्रून्॥
हे सोमदेव! आप योद्धाओं के समुदाय तथा वीरों को प्रेरणा प्रदान करने वाले, बलशाली, सदैव विजय प्राप्त करने वाले, धन-प्रदान करने वाले, अस्त्रों-शस्त्रों से सम्पन्न, अत्यन्त वेगवान्, शस्त्रों से प्रहार करने वाले, युद्ध में पराजित न होने वाले, संग्राम में शत्रु को पराभूत करने वाले हैं। आप काष्ठ पात्र में प्रतिष्ठित हों।(सामवेद उत्तरार्चिक 12.4.5)
Hey Som Dev! You inspire the groups of warriors and the brave-mighty, always winning, grant wealth, possess weapons (Astr-Shashtr), highly accelerated, striking with weapons, never defeated in the war, defeats the enemy and stay in wooden pot.
उरुगव्यूतिरभयानि कृण्वन्त्समीचीने आ पवस्वा पुरन्धी।
अपः सिषासन्नुषसः स्वऽ3र्गाः सं चिक्रदो महो अस्मभ्यं वाजान्॥
हे सोमदेव! विस्तारित मार्ग से युक्त, आतंक से रहित करने वाले, द्यावा-पृथिवी को संयोजित करने वाले, आप शोधन यन्त्र द्वारा द्रवित होकर पवित्र हों। जल, उषा तथा सूर्य अंशुओं को ग्रहण कर पोषण प्राप्त करने वाले, क्रंदन करते हुए आप (सोम) हमें वैभव से सम्पन्न कर दें।(सामवेद उत्तरार्चिक 12.4.6)
Hey Som Dev! You possess the broad path, free from violence-terror, join the heavens & earth, assume fluid state and become sanctified by passing through the purification machine. You accept, water, Usha and the beams of Sun light while making sound. You should grant us grandeur.
त्वमिन्द्र यशा अस्यृजीषी शवसस्पतिः।
त्वं वृत्राणि हंस्यप्रतीन्येक इत्पुर्वनुत्तश्चर्षणीधृतिः॥
हे देवराज इन्द्र! आप शक्ति के स्वामी, सोम की अभिलाषा रखने वाले, कीर्तिवान् तथा कभी परास्त न होने वाले हैं। सभी व्यक्तियों को देखने वाले आप बलशाली दुर्जनों का दमन करने वाले हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 12.4.7)
Hey Devraj Indr! You are the Lord of strength, wish to have Somras, glorious and -invincible never defeated. You look at every person and destroy the powerful wicked-vicious sinners.
तमुत्वा नूनमसुर प्रचेतसं राधो भागमिवेमहे।
महीव कृत्तिः शरणा त इन्द्र प्र ते सुम्ना नो अश्नवन्॥
हे पराक्रमी देवराज इन्द्र! जिस प्रकार पुत्र अपने पिता से धन में हिस्सा माँगता है, उसी प्रकार हम आपसे उत्कृष्ट वैभव प्रदान करने की प्रार्थना करते हैं। आप धन तथा ज्ञान से परिपूर्ण हैं एवं समस्त जनों को सहारा देने वाले हैं। आपका उत्तम सुख हमें भी ग्रहण हो।(सामवेद उत्तरार्चिक 12.4.8)
Hey brave Devraj Indr! The way a son demand his share in father's wealth, similarly, we ask you for excellent grandeur. You possess wealth and knowledge and grant asylum to us. Your best pleasure-comforts should be available to us as well.
यजिष्ठं त्वा ववृमहे देवं देवत्रा होतारममर्त्यम्। अस्य यज्ञस्य सुक्रतुम्॥
हे अग्नि देवता! आप सभी देवताओं में विलक्षण, यज्ञसाधक, अनश्वर, उत्कृष्ट कर्म करने वाले तथा यज्ञ करने योग्य हैं, इसीलिए हम आपकी वन्दना करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 12.4.9)
Hey Agni Dev! You are distinguished amongest the demigods, supporter of the Yagy, perform excellent deeds and deserve preforming Yagy, hence we worship you.
अपां नपातं सुभगं दुदीदितिमग्निमु श्रेष्ठशोचिषम्।
स नो मित्रस्य वरुणस्य सो अपामा सुम्नं यक्षते दिवि॥
श्रेष्ठ भाग्यशाली, अन्तरिक्ष में स्थित जल को धारण करने वाले, उत्कृष्ट कान्तिमान्, उत्कृष्ट ज्वालाओं से सम्पन्न अग्नि देवता की हम स्तुति करते हैं। वे हमें यज्ञ-स्थान में प्रतिष्ठित मित्र तथा वरुण देवताओं द्वारा प्राप्त होने वाला सुख प्रदान करें तथा साथ-साथ सुख पहुँचाने वाला जल भी देने की कृपा करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 12.4.10)
We worship Agni Dev, who is excellent-best, hold water in the space-sky, possess excellent shine, has excellent flames. Let him grant us comforts-pleasure available in the place of Yagy to reputed Mitr & Varun demigods and in addition to it, he should give us water as well.
सामवेद उत्तरार्चिक (12.5) ::
यमग्ने पृत्सु मर्त्यमवा वाजेषु यं जुनाः। स यन्ता शश्वतीरिषः॥
हे अग्नि देवता! आप जिन मनुष्यों को युद्ध में प्रेरित करते हैं, उनकी सुरक्षा आप स्वयं करते हैं। आप इसके साथ-साथ उनके लिए पौष्टिक आहार (अन्न) की पूर्ति भी करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 12.5.1)
Hey Agni Dev! You protect those humans whom you inspire in the war. In addition to it, you supply them nourishing food grains as well.
न किरस्य सहन्त्य पर्येता कयस्य चित्। वाजो अस्ति श्रवाय्यः॥
हे शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने वाले अग्नि देवता! जो मनुष्य आपकी आराधना करते हैं, उन्हें कोई भी परास्त नहीं कर सकता, इसलिए कि उनका आपके द्वारा प्रदान किया गया प्रतापी बल ख्यात है।(सामवेद उत्तरार्चिक 12.5.2)
Hey Agni Dev, attaining victory over the enemies! Those humans who worship you, cannot be defeated by any one, hence the glorious strength granted to them by you is famous.
स वाजं विश्वचर्षणिरर्वद्भिरस्तु तरुता। विप्रेभिरस्तु सनिता॥
समस्त लोगों का कल्याण करने वाले अग्नि देवता जीवन-समर में अश्व रूपी इन्द्रियों द्वारा हमें विजेता बनाने वाले हैं। बुद्धिमान् पुरुष उनका गुणगान करते हैं। वे अग्नि देव हमें मनवांछित फल प्रदान करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 12.5.3)
Agni Dev devoted to the welfare-well being of humans, in the struggle for life, make us victorious with the sense organs acting as horse. The intelligent humans praise him. Let Agni Dev grant us the desired rewards-commodities.
साकमुक्षो मर्जयन्त स्वसारो दश धीरस्य धीतयो धनुत्रीः।
हरिः पर्यद्रवज्जाः सूर्यस्य द्रोणं ननक्षे अत्यो न वाजी॥
ये दसों अँगुलियाँ अर्थात् दसों दिशाएँ संगृहीत होकर सोम को मसलकर संस्कारित करती है, तत्पश्चात् यह हरितवर्ण का सोम सूर्य की किरणों द्वारा पवित्र होता है। इसके बाद यह सोम अश्व के समान द्रुत गति से द्रोण कलश में प्रवाहित होता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 12.5.4)
The fingers in the form of ten directions, crash-crush Som and sanctify it, thereafter greenish Somras is purified by the rays of Sun. and then, this Somras moves into the Kalash with great speed like the horse.
सं मातृभिर्न शिशुर्वावशानो वृषा दधन्वे पुरुवारो अद्भिः।
मर्यो न योषामभि निष्कृतं यन्त्सं गच्छते कलश उस्त्रियाभिः॥
देवों द्वारा चाहा हुआ, वर्णन करने योग्य, बलशाली सोम, जल में उसी प्रकार मिल जाता है, जिस प्रकार बालक अपनी माता से या स्त्री पुरुष के साथ मिल जाती है। तत्पश्चात् यह सोम शुद्ध किये जाने वाले स्थान में गाय के दूधादि से मिल जाता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 12.5.5)
Desired by the demigods, deserve description, mighty Soras, mixes in water; the way a child meets his mother or wife and husband meets together.
उत प्र पिप्य ऊधरघ्न्याया इन्दुर्धाराभिः सचते सुमेधाः।
मूर्धानं गावः पयसा चमूष्वभि श्रीणन्ति वसुभिर्न निक्तैः॥
गौओं के योग्य, गौ को पोषण देने वाले चारे में स्थित सोम, उनको दूध से अभिपूरित कर देता है। श्रेष्ठ बुद्धिमान् यह सोम दूध की धाराओं से मिश्रित किया जाता है। जैसे मनुष्य लोग स्वयं को वस्त्र से ढंक लेते हैं, वैसे ही ये गौएँ सोम के बर्तन को अपने दूध से ढंक लेती है।(सामवेद उत्तरार्चिक 12.5.6)
पिबा सुतस्य रसिनो मत्स्वा न इन्द्र गोमतः।
आपिर्ने बोधि सधमाद्ये वृधे 3 स्माँ अवन्तु ते धियः॥
हे देवराज इन्द्र! आप हमारे द्वारा अभिषुत कर बनाये गये, गाय के दूध में मिलाये हुए सोमरस का सेवन करके आह्वादित हों। सोम के द्वारा अपने साथ हमें भी समृद्धवान् बनाते हुए उदारशयता से हमें संरक्षण प्रदान करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 12.5.7)
Hey Devraj Indr! You should gladden by drinking the Somras extracted by us and mixed with cow's milk. Make us rich, prosper and grant us protection, liberally.
भूयाम ते सुमतौ वाजिनो वयं मा न स्तरभिमातये।
अस्माञ्चित्राभिरवतादभिष्टिभिरा नः सुम्नेषु यामय॥
हे देवराज इन्द्र! आपके अनुरूप श्रेष्ठ बुद्धि द्वारा प्रेरित होकर हम शक्ति प्राप्त करें। शत्रु हमारा विनाश न करें। आप अपने वांछित तथा योग्यतानुसार रक्षा-साधनों से सुरक्षित करें तथा हमारी सुख समृद्धि में वृद्धि करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 12.5.8)
Hey Devraj Indr! We should get strength by inspiring with the best intelligence like you. The enemy should not be able to destroy us. You should protect us with desired safety equipment and enhance our pleasure-comforts, prosperity.
त्रिरस्मै सप्त धेनवो दुदुहिरे सत्यामाशिरं परमे व्योमनि।
चत्वार्यन्या भुवनानि निर्णिजे चारूणि चक्रे यदृतैरवर्धत॥
विशाल अन्तरिक्ष में विद्यमान इस सोम को त्रिसप्त (तीन एवं सात के संयोग से निर्मित) अर्थात् इक्कीस गौएँ (पोषक शक्तियाँ) उत्कृष्ट दूध देती हैं। जिस समय यह सोम याग आदि द्वारा बढ़ता है, तब चारों लोकों के जल, दूध को शोधित करने हेतु हितकारी रूप से प्रवाहित (गतिशील) होते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 12.5.79
उस (परम सत्ता) के लिए सात गौओं (अर्थात् सात शक्तियों/प्रकाश किरणों) ने तीन बार परम आकाश में स्थित सत्य रूप अमृतमय पोषण का दुग्ध प्रवाहित किया और उसने अन्य चार सुन्दर भुवनों (लोकों) की रचना की; वे सब ऋत (सत्य और ब्रह्मांडीय नियम) के द्वारा विकसित और पुष्ट हुए।
सप्त धेनवः (seven cows) :- Symbolically represent the seven rays, energies or streams of knowledge-power that nourish creation.
Som present in the vast space is enriched by the combination of the milk drawn from twenty one cows. When Som is boosted by the Yagy then water from four abodes flow to purify the milk and make it flow.
स भक्षमाणो अमृतस्य चारुण उभे द्यावा काव्येना वि शश्रथे।
तेजिष्ठा अपो मंहना परि व्यत यदी देवस्य श्रवसा सदो विदुः॥
उत्कृष्ट, रस की कामना करने वालों अर्थात् ऋत्विजों की वन्दनाओं से प्रभावित अलौकिक सोम देवलोक तथा भूलोक दोनों को जल से अभिपूरित कर देता है। याजक जिस समय देवताओं के स्थल को आहुतियों के द्वारा पूर्ण करते हैं, उस समय वह (सोम) जल को अपने महत्त्व से तेजवान् बना देता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 12.5.10)
Divine Som fulfil the heavens & earth with water for those Ritviz who wish to have excellent fluid-sap. When the Yajak fill the abode of demigods with offerings Som make water Tejaswi-energetic by virtue of its significance.
ते अस्य सन्तु केतवोऽमृत्यवोऽदाभ्यासो जनुषी उभे अनु।
येभिर्नृम्णा च देव्या च पुनत आदिद्राजानं मनना अगृभ्णत॥
अनश्वर तथा अमरत्व पायी हुई इस सोमरस की रश्मियाँ दोनों तरह के (दो पैर वाले तथा चार पैर वाले) प्राणियों की रक्षा करने वाली हैं। अपनी क्षमता से यह सोम पोषक तत्त्वों को देवताओं की ओर प्रेरित करता है, इसके बाद सम्राट सोम की याजकगण वन्दना करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 12.5.11)
Imperishable, having attained immortality, rays of Somras protect the living beings having two and four legs. By virtue of its capability Som forward nourishing elements towards the demigods. Thereafter, emperor Som is worshiped by the Yajak Gan.
सामवेद उत्तरार्चिक (12.6) ::
अभि वायुं वीत्यर्षा गृणानो 3 ऽभि मित्रावरुणा पूयमानः।
अभी नरं धीजवनं रथेष्ठामभीन्द्रं वृषणं वज्रबाहुम्॥
हे सोम देवता! आप वन्दना होने के पश्चात् वायुदेव के सेवन करने के निमित्त आगमन करें। स्वच्छ होने के बाद मित्र तथा वरुण देवताओं को ग्रहण हों। नेतृत्त्व करने वाले, बुद्धि प्रदान करने वाले, रथ में आरूढ़ अश्विनी कुमारों की ओर प्रस्थान करें तथा वांछित वर्षा करने वाले वज्र के समान बाजुओं वाले देवराज इन्द्र के निकट गमन करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 12.6.1)
Hey Som Dev! After worship you should arrive to be consumed by Vayu Dev. After being cleansed, you should be availed by Mitr & Varun Dev. Move towards leaders Ashwani Kumars, who grant intelligence riding charoite and come close to rain showering Devraj Indr having arms like Vajr.
अभि वस्त्रा सुवसनान्यर्षाभि धेनूः सुदुघाः पूयमानः।
अभि चन्द्रा भर्तवे नो हिरण्याभ्यश्वाव्रथिनो देव सोम॥
हे अलौकिक सोम देवता! पवित्रता को प्राप्त किये आप हमें धारण करने योग्य कपड़े, कान्तिमान् सोना, चांदी आदि वैभव, दुग्ध देने वाली गौएँ तथा रथ में संयोजित करने योग्य उत्तम अश्व प्रदान करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 12.6.2)
Hey divine Som Dev! Having availed piousness, you should Grant us wearable cloths, lustrous Gold, silver and grandeur, milch cows and beautiful horses to be deployed in the charoite.
अभी नो अर्ष दिव्या वसून्यभि विश्वा पार्थिवा पूयमानः।
अभि येन द्रविणमश्नवामाभ्यार्षेयं जमदग्निवन्नः॥
हे सोम देवता! पवित्रता को प्राप्त किये आप हमें लोकातीत धन तथा वैभव से सम्पन्न करें। आप हमें जमदग्नि आदि ऋषियों के तुल्य क्षमता प्रदान करें। हमें उत्कृष्ट धन को अच्छे कार्यों में नियोजित करने की योग्यता प्राप्त हो।(सामवेद उत्तरार्चिक 12.6.3)
Hey Som Dev! Having attained piousness grant us divine grandeur. Grant us power-might comparable to Jamdagni and other Rishi Gan. Let us attain ability to use best wealth for virtuous-righteous endeavours.
यज्जायथा अपूर्व्य मघवन्वृत्रहत्याय। तत्पृथिवीमप्रथयस्तदस्तभ्ना उतो दिवम्॥
हे देवराज इन्द्र! आप अनादि, असीम तथा सम्पूर्ण विभूतियों के अधिष्ठाता हैं। आप जिस समय शत्रुओं का दमन करने के निमित्त प्रकट हुए, उस समय आपके प्रभाव से धरती अचल हुई तथा स्वर्गलोक ऊपर विद्यमान हुआ।(सामवेद उत्तरार्चिक 12.6.4)
Hey Devraj Indr! You are possessor of eternal, unlimited and all celebrities. When you appeared to destroy the enemies your influence made the earth immovable over the heavens.
Earth is revolving around the Sun in its orbit and in addition to spinning over its axis. Its position wrt to planets, Sun and Moons is fixed.
तत्ते यज्ञो अजायत तदर्क उत हस्कृतिः। तद्विश्वमभिभूरसि यज्जातं यच्च जन्त्वम्॥
हे देवराज इन्द्र! आपके उत्पन्न होने पर दिन का राजा सूर्य प्रतिष्ठित हुआ। इसके पश्चात् जीवधारियों की व्युत्पत्ति हुई तथा आगे उत्पन्न होने वाले सभी जीवधारियों में आप व्याप्त हुए। आपके द्वारा ही उत्कृष्ट यज्ञ-अनुष्ठानों का आर्विभाव हुआ।(सामवेद उत्तरार्चिक 12.6.5)
Hey Devraj Indr! After your evolution, Sun was established as the king of the day. Thereafter, living beings appeared-evolved and you pervaded the organisms. Its you from from rituals, Yagy etc. emanated.
आमासु पक्वमैरय आ सूर्यं रोहयो दिवि।
घर्मं न सामन्तपता सुवृक्तिभिर्जुष्टं गिर्वणसे बृहत्॥
हे देवराज इन्द्र! शिशु को जन्म देने से पहले ही आपने परिपुष्ट दूध उत्पन्न किया। अन्तरिक्ष में सूर्य को विद्यमान किया। जैसे यजमान यज्ञाग्नि को उत्पन्न करते हैं, वैसे ही हे उद्गाताओं! उक्त स्तुतियों के माध्यम से देवराज इन्द्र में आनन्द की बढ़ोत्तरी करो। स्तुति करने योग्य देवराज इन्द्र को प्रमुदित करने के निमित्त बृहत् साम को गाओ।(सामवेद उत्तरार्चिक 12.6.6)
अग्निं वो देवयज्यया अग्निं प्रयत्यध्वरे।
अग्निं होतारं वृषणं यजिष्ठं होतारं ऋत्विजम्॥
सामगान में इस ऋचा के शब्दों के बीच “हो, हायि, आ, इ” आदि स्तोभाक्षर जोड़कर इसे बृहत् साम के रूप में गाया जाता है।
Hey Devraj Indr! Prior to giving birth to the infant you evolved nourishing milk. Established the Sun in the sky. The way Yajman evolve fire-Agni, similarly hey Udagata Gan! Increase-boost the happiness of Devraj Indr with the Stuties. Sing Brahat Sam for gladdening Devraj Indr.
| बृहत्साम :: त्वमिदधि हवामहे सातौ वाजस्य कारव:। त्वां वृत्रेष्विन्द्र सत्पतिं नरस्त्त्वां काष्ठास्वर्वतः॥ हे इंद्र रुप परमेश्वर! हम स्तोता अन्न वृद्धि के लिए आपका ही आह्वान करते हैं। विवेकशील मनुष्य भी शत्रुओं की शत्रुता से आक्रान्त होने पर, जब सब प्रयत्न करके भी हारने लगते हैं तो आपको ही पुकारते हैं। Hey Almighty, in the form of Indr Dev! We invoke you for the growth of food grains. When the prudent people start loosing at the hands of the enemies bent upon enmity, they call you. स त्वं नश्चित्र वज्रहस्त धृष्णुया महस्तवानो अद्रिव:। गामश्वं रथ्यमिन्द्र् सं किर सत्रा वाजं न जिग्युषे॥ हे अतुल पराक्रमी! हाथ में विचित्र वज्र धारण करने वाले, स्वयं के तेज से प्रकाशित इंद्र रूप परमेश्वर! आप हमें गोधन, रथ योग्य कुशल अश्व, अन्न तथा ऐश्वर्य प्रदान करें। Hey mighty possessing infinite power! You wield Vajr in your hand and shine with your own aura as Indr Dev. Grant us cows, skilled horses to drive the charoite, food grains and grandeur. Please refer to :: वृहत्साम santoshsuvichar.blogspot.com |
मत्स्यपायि ते महः पात्रस्येव हरिवो मत्सरो मदः।
वृषा ते वृष्ण इन्दुर्वाजी सहस्त्रसातमः॥
हे अश्वों को धारण करने वाले देवराज इन्द्र! आप बृहत् पात्र के सदृश विराट् हैं। आप शक्ति बढ़ाने वाले, आनन्द में वृद्धि करने वाले, अनगिनत उत्तम दान प्रदान करने वाले सोमरस का सेवन करते हुए हर्षित हों।(सामवेद उत्तरार्चिक 12.6.7)
Hey Devraj Indr, Supporter-nurturer of horses! You are large-huge like a broad-vast pot. You are booster of strength, pleasure-comfort, making unlimited-uncounted donation, charity gladden while drinking Somras.(11.02.2026)
आ नस्ते गन्तु मत्सरो वृषा मदो वरेण्यः। सहावाँ इन्द्र सानसिः पृतनाषाडमर्त्यः॥
हे देवराज इन्द्र! यह सोम शक्ति बढ़ाने वाला, आनन्द प्रदान करने वाला, क्षमतावान्, उत्कृष्ट, पान करने योग्य, अनश्वर, शत्रुओं को जीतने वाला, प्रसन्नता प्रदान करने वाला है। यह आपके पान करने के निमित्त तैयार किया गया है, यह आपको प्राप्त हो।(सामवेद उत्तरार्चिक 12.6.8)
Hey Devraj Indr! Som increase-boosts strength, grant pleasure, make capable, worth drinking, immortal-imperishable, winner of the enemies, gladdening. Its ready for drinking by you. Have-drink it. You should attain it.
त्वं हि शूरः सनिता चोदयो मनुषो रथम्। सहावान्दस्युमव्रतमोषः पात्रं न शोचिषा॥
हे पराक्रमी तथा महान् दानी देवराज इन्द्र! मानवों के मनोरथों को आप भली-भाँति (श्रेष्ठता की दिशा में) प्रेरित करें। जिस प्रकार अग्नि अपनी लपटों से बर्तन को तपाती है, उसी प्रकार आप हमारे सहयोगी बनकर दुर्जनों तथा मर्यादाओं को पार करने वालों को तपाएँ अर्थात् विनष्ट कर दें।(सामवेद उत्तरार्चिक 12.6.9)
Hey mighty and great donor Devraj Indr! You should inspire the wishes-desires of humans to right-virtuous, excellent direction. The way fire heat the vessel with its flames, you should become our companion and destroy those who are wicked-sinner and cross their boundaries-limits.
सामवेद उत्तरार्चिक (13) :: ऋषि :- कविर्भार्गव, भारद्वाजो बार्हस्पत्य, असित, काश्यपो देवलो वा सुकक्ष, विभ्राटसौर्य, वसिष्ठ, भार्गव, प्रागाथ, विश्वामित्र, मेधातिथि, शतं वैखानसा, यजत आत्रेय, मधुच्छन्दा, वैश्वामित्र, उशना, हर्यत, बृहद्दिव आथर्वण, गृत्समद; देवता :- पवमान, सोम, इन्द्र, सरस्वान, सरस्वती, ब्रह्मणस्पति, अग्नि, मित्रावरुणौ, अग्निर्हवीषिवा, सूर्य, सविता; छन्द :- गायत्री, अनुष्टुप्, बृहती, जगती, प्रगाथ, त्रिष्टुप्, अष्टि, शक्वरी।
सामवेद उत्तरार्चिक (13.1) ::
पवस्व वृष्टिमा सुनोऽपामूर्मि दिवस्परि। अयक्ष्मा बृहतीरिषः॥
हे लोकातीत सोमदेव! आप हमारा हित करने के निमित्त उत्कृष्ट रीति से जल-वर्षा करें। जल को तरंगित करें तथा पौष्टिकता से पूर्ण अनाज हमें प्रदान करने की कृपा करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 13.1.1)
Hey Somras beyond the limits! You should shower rains for our welfare with excellent methods. Produce waves in water and grant us sufficient food grains.
तया पवस्व धारया यया गाव इहागनम्। जन्यास उप नो गृहम्॥
हे सोम देवता! आप उन विलक्षण जल धाराओं से निर्मल हों (यानि जल-वृष्टि करें), जिससे दुग्ध देने वाली गौएं हमारे यहाँ आगमन करें, धन, अन्नादि हमारे निवास स्थान में पहुँच सके।(सामवेद उत्तरार्चिक 13.1.2)
Hey Som Dev! You should be sanctified with the water currents (rain showers) so that milk producing cows come to us and wealth with food grains reach our house.
घृतं पवस्व धारया यज्ञेषु देववीतमः। अस्मभ्यं वृष्टिमा पव॥
हे सोम देवता! याग में देवों द्वारा अभीष्ट आप धार-रूप की वर्षा करें अर्थात् अत्यधिक तेज बारिश करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 13.1.3)
Hey Som Dev! Desirable for the demigods-deities in the Yagy; you should produce torrential rains.
स न ऊर्जे व्य 3 व्ययं पवित्रं धाव धारया। देवासः शृणवन् हि कम्॥
हे सोम! हमें पोषक अन्न प्रदान करने हेतु आप शोधन यन्त्र से धाररूप में छनकर पात्र में प्रतिष्ठित हों। देवता लोग आपकी (मधुर) ध्वनि श्रवण करके आह्लादित हों।(सामवेद उत्तरार्चिक 13.1.4)
Hey Somras! For granting us nourishing food grains pass through the filtration-purifying machine and establish in the vessel. Let the demigods-deities feel pleasure listening to your sound.
पवमानो असिष्यदद्रक्षांस्यपजङ्ङ्घनत्। प्रत्नवद्रोचयन्रुचः॥
आभा से जाज्वल्यमान्, शत्रुओं का दमन करने वाला, स्वच्छ होने वाला सोमरस पात्र में प्रवाहित होता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 13.1.5)
Somras having lustre-aura, destroyer of the enemies, subjected to purification; flow into the vessel.
प्रत्यस्मै पिपीषते विश्वानि विदुषे भर। अरङ्गमाय जग्मयेऽपश्चादध्वने नरः॥
हे स्तोताओं! आप सभी यज्ञ सम्पादित करने वाले, सब कुछ जानने वाले, यज्ञ-अनुष्ठान करने वाले, आगे चलने वाले, उन्नति करने वाले एवं सोमरस का सेवन करने के इच्छुक देवराज इन्द्र के निमित्त सोमरस द्रोण कलश में परिपूर्ण कर दें।(सामवेद उत्तरार्चिक 13.1.6)
Hey Stota Gan! You are the accomplisher of all Yagy, know every thing, devoted to Yagy and rituals, moving forward, progressive, fill the Dron Kalash with Somras for Devraj Indr.
एमेनं प्रत्येतन सोमेभिः सोमपातमम्। अमत्रेभिर्ऋजीषिणमिन्द्रं सुतेभिरिन्दुभिः॥
हे याजकों! पवित्र रस से भरे हुए, तेजोमय सोमरस का रुचिपूर्वक सोम के बर्तनों से ही प्रचुर मात्रा में सेवन करने वाले इन देवराज इन्द्र की सम्मुख जाकर अभ्यर्थना करो।(सामवेद उत्तरार्चिक 13.1.7)
Hey Yajak Gan! Go to Devraj Indr to make request who drink radiant Somras filled in vessels.(12.02.2026)
यदी सुतेभिरिन्दुभिः सोमेभिः प्रतिभूषथ। वेदा विश्वस्य मेधिरो धृषत्तन्तमिदेषते॥
हे स्तोताओं! रस से भरे हुए, कान्तिमान् सोम को लेकर देवराज इन्द्र के सम्मुख जाओ। वे आपकी अभिलाषाओं को जानने वाले हैं। वे बाधाओं को विनष्ट करते हुए, समस्त कामनाओं को पूरा कर देंगे।(सामवेद उत्तरार्चिक 13.1.8)
Hey Stota Gan! Carry aurous Som, full of juice in front of Devraj Indr. He is aware of your wishes-desires. He will clear all obstecles and fulfil your desires.
अस्माअस्मा इदन्धसोऽध्वर्यो प्र भरा सुतम्।
कुवित्समस्य जेन्यस्य शर्धतोऽभिशस्तेरवस्वरत्॥
हे पुरोहितों! देवराज इन्द्र हेतु प्राण-रूप सोमरस परिपूर्ण मात्रा में अर्पित करो। वे देवराज इन्द्र युद्ध करने योग्य, विजय प्राप्त करने योग्य शत्रुओं को नष्ट करके आपकी रक्षा करेंगे।(सामवेद उत्तरार्चिक 13.1.9)
Hey priests! Offer Somras which is like Air Vital to Devraj Indr, in enough quantity. Devraj Indr will destroy the enemies in the war, attain victory & protect you.
सामवेद उत्तरार्चिक (13.2) ::
बभ्रवे नु स्वतवसेऽरुणाय दिविस्पृशे। सोमाय गाथमर्चत॥
हे उपासकों! भूरे वर्ण वाले, शक्तिशाली, लाली से भरे हुए, अन्तरिक्ष में संव्याप्त, विलक्षण सोम की आप लोग वन्दना करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 13.2.1)
Hey worshipers! Worship brownish, amazing Som with reddishness, pervading the sky.
हस्तच्युतेभिरद्रिभिः सुतं सोमं पुनीतन। मधावा धावता मधु॥
हे यजमानों! पत्थरों से कूटकर अभिषुत किए गए सोमरस को पवित्र करो। इस मधुरता से भरे हुए सोमरस में, मधुर गौ का दूध मिलाओ।(सामवेद उत्तरार्चिक 13.2.2)
Hey Yajman! Purify the Somras obtained by crushing with stones. Add cow's milk to this sweetened Somras.
नमसेदुप सीदत दध्नेदभि श्रीणीतन। इन्दुमिन्द्रे दधातन॥
हे स्तोताओं! इस सोमरस को नमन करते हुए दही में मिश्रित करके रखो। इस तेजस्वी सोमरस को देवराज इन्द्र के पान करने के निमित्त समर्पित करो।(सामवेद उत्तरार्चिक 13.2.3)
Hey Stota Gan! Pray to this Somras, add curd to it and keep it. Offer this radiant Somras to Devraj Indr for drinking.
अमित्रहा विचर्षणिः पवस्व सोम शं गवे। देवेभ्यो अनुकामकृत्॥
हे दिव्य सोम देव! सभी को देखने वाले, शत्रुओं का दमन करने वाले, देवताओं के यथेष्ट कर्म करने वाले, आप हमारी गौओं को समृद्धिशाली बनायें।(सामवेद उत्तरार्चिक 13.2.4)
Hey divine Som Dev! You watch every one, destroy the enemies, perform the duties assigned by demigods-deities. You should make our cows prosperous.
इन्द्राय सोम पातवे मदाय परि षिच्यसे। मनश्चिन्मनसस्पतिः॥
यह सोम मनों को सुंदर लगने वाले, मनों के अधिष्ठाता बने देवराज इन्द्र के पान करने के लिए, उनके हर्ष को बढ़ाने के लिए परिष्कृत होकर बर्तन में संगृहीत होता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 13.2.5)
This attractive Som, liked by the innerself, is sanctified and stored in the vessel for Devraj Indr the deity of innerself, to gladden him.
पवमान सुवीर्यं रयिं सोम रिरीहि णः। इन्दविन्द्रेण नो युजा॥
हे शोधन यन्त्र से छनने वाले निर्मल सोम! आप श्रेष्ठ कान्ति से सम्पन्न होकर अपने सहायता करने वाले देवराज इन्द्र के पास से हमें मनवांछित धन उपलब्ध कराएं।(सामवेद उत्तरार्चिक 13.2.6)
Hey pure Som clarified in the purification plant-machine. Attain best radiance and help us attain desired wealth from Devraj Indr, who helps you.
उद्देदभि श्रुतामधं वृषभं नर्यापसम्। अस्तारमेषि सूर्य॥
हे सूर्य देव के सदृश कान्तिमय देवराज इन्द्र! आप कीर्तिमान् बनाने वाले धन से सम्पन्न, पराक्रमी, मनुष्यों के शुभ चिंतक हैं। दानी प्रवृत्ति वाले मनुष्यों के सम्मुख आप उत्पन्न होते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 13.2.7)
Hey mighty Devraj Indr, lustrous like Sur Dev! You make the humans glorious and enrich them with wealth. You invoke before the humans with the tendency to donate-charity.
नव यो नवतिं पुरो बिभेद बाह्वोजसा। अहिं च वृत्रहावधीत्॥
अपने पुरुषार्थ से शत्रु की निन्यानवे पुरियों का नाश करने वाले तथा वृत्रासुर का संहार करने वाले देवराज इन्द्र हमें मनवांछित धन देने की कृपा करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 13.2.8)
Hey Devraj Indr, destroyer of the 99 forts-cities of demons and slayer of Vratra Sur! Grant us desired wealth.
स न इन्द्रः शिवः सखाश्वावद्गोमद्यवमत्। उरुधारेव दोहते॥
हे देवराज इन्द्र! आप हमारा भला चाहने वाले सखा स्वरूप हैं। आप गौओं की अपार दुग्ध-धारा के सदृश हमें असीम धन देने की कृपा करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 13.2.9)
अपार :: किसी चीज़ की अत्यधिक मात्रा, विस्तार या असीमता, जिसे आसानी से मापा न जा सके; unlimited, immense, boundless, vast, infinite, huge.
Hey Devraj Indr! You are our well wisher and like a companion. Grant us wealth like the boundless stream of cow's milk.
सामवेद उत्तरार्चिक (13.3) ::
विभ्राड् बृहत्पिबतु सोम्यं मध्वायुर्दधद्यज्ञपतावविह्रतम्।
वातजूतो यो अभिरक्षति त्मना प्रजाः पिपर्ति बहुधा वि राजति॥
कान्तिमय सूर्य देवता, ऋत्विजों को रोग से रहित उत्तम स्वास्थ्य तथा शतायु प्रदान करते हैं। वायु को प्रवाहित करने वाले, सभी की रक्षा करने वाले, समस्त लोगों का भरण-पोषण करने वाले, विविध रूपों में सुशोभित होने वाले देवराज इन्द्र अत्यधिक मात्रा में मधुर सोमरस का सेवन करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 13.3.1)
Radiant-lustrous Sury Dev grants excellent health and longevity of 100 years, free form ailments-diseases to the Ritviz. Devraj Indr who make the air flow, protect all, nourish all and present in various glorious forms; should drink lots & lots of Somras.
विभ्राड् बृहत्सुभृतं वाजसातमं धर्मं दिवो धरुणे सत्यमर्पितम्।
अमित्रहा वृत्रहा दस्युहन्तमं ज्योतिर्जज्ञे असुरहा सपत्नहा॥
तेजस्विता से युक्त, विशाल, शक्ति प्रदान करने वाले तथा श्रेष्ठ पोषक अनाज प्रदान करने वाले, उचित नीति से द्युलोक को धारण करने वाले, शत्रुओं का संहार करने वाले, दुर्जनों तथा दानवों का शमन करने वाले सूर्यदेवता चारों दिशाओं में अपने आलोक को संव्याप्त करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 13.3.2)
Sury Dev full of Tej-energy, huge-large, granter of strength and best food grains, supports the heavens with proper policy, destroyer of the wicked-sinners & demons, pervade the four directions with his lustre.
इदं श्रेष्ठं ज्योतिषां ज्योतिरुत्तमं विश्वजिन्द्धनजिदुच्यते बृहत्।
विश्वभ्राड् भ्रोजो महि सूर्यो दृश उरु पप्रथे सह ओजो अच्युतम्॥
सूर्य उत्कृष्ट, विविध ज्योतियों की ज्योति, परमज्योति कहलाता है। यह जगत् पर विजय प्राप्त करने वाला है। यह दीप्तिमान् सूर्य देव धन पर विजय प्राप्त करने वाले, विशाल शक्ति से सम्पन्न, पूरे विश्व को प्रकाशित करने वाले, अनश्वर, तेजवान् बल को पूरी सृष्टि में विस्तारित करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 13.3.3)
Sun is called Ultimate light having excellent aura-radiance composed of various rays-beams. Lustrous Sury Dev wins wealth, full of vast strength-power, illuminate the whole universe, imperishable-immortal pushes the aurous strength in the whole world.
इन्द्र क्रतुं न आ भर पिता पुत्रेभ्यो यथा।
शिक्षा णो अस्मिन्पुरुहूत यामनि जीवा ज्योतिरशीमहि॥
हे देवराज इन्द्र! हमें यज्ञ-कर्मों का उत्कृष्ट फल प्राप्त हो। जिस प्रकार पिता, अपने पुत्रों को धन इत्यादि प्रदान कर उनका भरण-पोषण करते हैं, उसी प्रकार आप हमें भी पोषक तत्त्व प्रदान कर हमारा पालन-पोषण करें। असंख्य लोगों द्वारा मदद हेतु आवाहित किये जाने वाले हे देवराज इन्द्र! आप याग में हमें विलक्षण ओज देने की कृपा करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 13.3.4)
Hey Devraj Indr! Let us attain the suitable best reward-result of our excellent -virtuous performances. The way a father nurture his sons with wealth etc., you should grant us nourishing materials and nourish-nurture us. Hey Devraj Indr invoked by innumerable people! Grant us amazing aura in the Yagy.
मा नो अज्ञाता वृजना दुराध्यो 3 माशिवासोऽव क्रमुः।
त्वया वयं प्रवतः शश्वतीरपोऽति शूर तरामसि॥
हे देवराज इन्द्र! बुद्धिहीन, कुकर्मी, दुर्जन, पाप कर्म में लिप्त, अहित करने वाले, हम पर हमला न करें। हे उत्कृष्ट शूर! आपकी सुरक्षा प्राप्त कर हम बाधाओं, अवरोधों को पार कर पायें।(सामवेद उत्तरार्चिक 13.3.5)
Hey Devraj Indr! Ensure that the idiots-duffers, busy with wicked-vicious deeds, harmful to others should not attack us. Hey best brave-invincible! Under your patronage we should swim across all obstecles-hurdles.(13.02.2026)
अद्याद्या श्वःश्व इन्द्र त्रास्व परे च नः।
विश्वा च नो जरितदृन्त्सत्पते अहा दिवा नक्तं च रक्षिषः॥
हे देवराज इन्द्र! आप वर्तमान तथा भविष्य में हमें सुरक्षा प्रदान करें। हे सत्पुरुषों का पालन-पोषण करने वाले देवराज इन्द्र! आप हमेशा दिन तथा रात्रि हमारी रक्षा करने वाले हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 13.3.6)
Hey Devraj Indr! Grant us protection at present & in future. Hey nurturer of the virtuous-pious humans Devraj Indr! You always provide us protection during the day & night.
प्रभङ्गी शूरो मघवा तुवीमघः सम्मिश्लो वीर्याय कम्।
उभा ते बाहू वृषणा शतक्रतो नि या वज्र मिमिक्षतुः॥
हे क्षमतावान् देवराज इन्द्र! आप अपने शौर्य से शत्रुओं की क्षमता को नष्ट करने वाले हैं। आप सभी में विशाल तथा वैभवशाली है। हे सैकड़ों कर्म करने वाले देवराज इन्द्र। आपकी दोनों बाँहें जो वज्र को लिये रहती हैं, विशेष शक्ति से सम्पन्न हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 13.3.7)
शौर्य :: वीरता, बहादुरी, निर्भीकता, वीर्य, दिलेरी, मजबूती, बलिष्ठता, gallantry, hardihood, doughtiness.
Hey mighty-capable Devraj Indr! You destroy the enemy with your gallantry. You are huge and glorious. Hey Devraj Indr accomplishing hundreds of Karm-functions! Your arms carrying Vajr possess special power.
सामवेद उत्तरार्चिक (13.4) ::
जनीयन्तो न्वग्रवः पुत्रीयन्तः सुदानवः। सरस्वन्तं हवामहे॥
हे माता सरस्वती! हम याग-दान आदि में अग्रणी हैं। हम योग्य संतति की अभिलाषा से आपको आहूत करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 13.4.1)
Hey Mata Saraswati! We are ahead in Yagy Karm and charity-donations. We invoke you with the desire of able progeny.
उत नः प्रिया प्रियासु सप्तस्वसा सुजुष्टा। सरस्वती स्तोम्या भूत्॥
अत्यधिक प्रिय गायत्री आदि सातों छन्द तथा गंगा आदि नदियां जिन माँ सरस्वती की बहनें हैं, वे माँ सरस्वती हमारे लिए स्तुति किये जाने योग्य हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 13.4.2)
Mata Saraswati who has sisters like highly lovable Gayatri with seven Chhands, Maa Ganga and other rivers, deserve worship-prayers .
तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात्॥
जो हमारी मतियों को उत्कृष्ट पथ की ओर प्रेरित करते हैं, उन सविता देव के वरण करने योग्य ओज को हम प्राप्त करने की इच्छा रखते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 13.4.3)
ओज :: ऊर्जा, ओजस्विता, तेज, शक्ति; vigour, energy, lustre, force, prowess.
Savita Dev who direct our mind towards excellent path, we wish to have his aura-prowess.
सोमानां स्वरणं कृणुहि ब्रह्मणस्पते। कक्षीवन्तं य औशिजः॥
हे ब्रह्मणस्पते! सोम निचोड़ने वाले हम अध्वर्युओं को आप उसी तरह कीर्तिवान् तथा ज्ञान से युक्त बनाने की कृपा करें, जिस तरह आपने उशिज पुत्र कक्षीवान् को कीर्तिवान् तथा ज्ञानी बनाया था।(सामवेद उत्तरार्चिक 13.4.4)
Hey Brahmanspate! Make us the officiating-assistant priests, squeezing Somras glorious & enlightened like Ushij son of Kakshiwan whom you granted glory and enlightenment.
अग्न आयूंषि पवस आ सुवोर्जमिषं च नः। अरे बाधस्व दुच्छुनाम्॥
हे अग्नि देवता! आप हमें विविध प्रकार के अन्न, शक्ति तथा लम्बी आयु प्रदान करें। दुर्जनों को हमारे समीप न आने दें, उन्हें विनष्ट (दूर) कर दें।(सामवेद उत्तरार्चिक 13.4.5)
Hey Agni Dev! Grant various kinds of food grains and long life to us. Do not let the wicked-vicious near-close to us and repel-destroy them.
ता नः शक्तं पार्थिवस्य महो रायो दिव्यस्य। महि वां क्षत्रं देवेषु॥
देवताओं में प्रशंसा किये जाने योग्य, क्षात्र बल से युक्त हे मित्रा-वरुण देवता! आप हमें पृथ्वी तथा अन्तरिक्ष के सम्पूर्ण ऐश्वर्यो को प्रदान करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 13.4.6)
Hey Mitra-Varun Dev, possessing Kshatr Bal (power of warriors) deserving praise from the demigods-deities! Grant us grandeur of earth, space and the heavens.
ऋतमृतेन सपन्तेषिरं दक्षमाशाते। अगुहा देवौ वर्धेते॥
सत्य के पालनकर्ता वांछित शक्ति को प्राप्त करते हैं। शत्रुता न करने वाले मित्रा-वरुण देवता अपनी योग्यता से समृद्धशाली बनते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 13.4.7)
Those who follow the tenets of truth, attain desire strength. Mitra-Varun Dev who do not enter into enmity, become prosperous due to their ability.
वृष्टिद्यावा रीत्यापेषस्पती दानुमत्याः। बृहन्तं गर्तमाशाते॥
जिनकी जल-वर्षण के निमित्त स्तुति की जाती है, अनुशासनपूर्वक सभी कुछ प्राप्त करने वाले, दानी, पोषक तत्त्वों के स्वामी वे मित्रा वरुण देवता उत्कृष्ट स्थानों में आसीन् हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 13.4.8)
Mitra-Varun who are worshiped for rains, attain every thing due to discipline, are donors, Lord of nourishing elements, are placed at high-excellent rank-position.
युञ्जन्ति ब्रध्नमरुषं चरन्तं परि तस्थुषः। रोचन्ते रोचना दिवि॥
आदित्य स्वरूप, ज्वाला स्वरूप, गतिमान्, परन्तु अचल सूर्य देवता की हम अर्चना करते हैं। सूर्य के समान देवराज इन्द्र की प्रकाश-रश्मियों सम्पूर्ण अन्तरिक्ष लोक को परिव्याप्त करती हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 13.4.9)
We worship Sury Dev who is like Adity and fire, dynamic but remain fixed (in his orbit around a much larger star as compared to him). Aura-radiance of Devraj Indr pervade the entire space.
युञ्जन्त्यस्य काम्या हरी विपक्षसा रथे। शोणा घृष्णू नृवाहसा॥
इन्द्र रूपी आत्मा को मनचाहे स्थान पर ले जाने हेतु कायारूपी रथ, कर्म एवं ज्ञानरूपी अश्वों के माध्यम से खींचा जाता है, मन रूपी सारथी द्वारा चलाया जाता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 13.4.10)
Soul in the form of Indr, is carried to the desired place by the charoite forming body and horses pulling it in the form of Karm and Gyan-learning, with innerself as charioteer.
केतुं कृण्वन्नकेतवे पेशो मर्या अपेशसे। समुषद्भिरजायथाः॥
हे ऋत्विजों! ज्ञान से विहीन लोगों को ज्ञान से परिपूर्ण करते हुए, कुरूप को सुंदर बनाते हुए, ये सूर्य देवता उषा काल में उदित होते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 13.4.11)
Hey Ritviz Gan! Sury Dev rises in the morning Usha Kal, making ignorant learned-scholars, ugly to beautiful.
सामवेद उत्तरार्चिक (13.5) ::
अयं सोम इन्द्र तुभ्यं सुन्वे तुभ्यं पवते त्वमस्य पाहि।
त्वं ह यं चकृषे त्वं ववृष इन्दुं मदाय युज्याय सोमम्॥
हे देवराज इन्द्र! यह सोमरस आपके पान करने के उद्देश्य से परिष्कृत किया जाता है। इस स्वच्छ हुए सोम का आप सेवन करें। आप ही इसको उत्पन्न करने वाले हैं, इस प्रकाशमान् सोम का आप हर्ष के लिए, योग हेतु पान करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 13.5.1)
Hey Devraj Indr! Somras has been sanctified for you to drink. Drink this clarified Somras. Its you who produce-evolve it. Drink this luminant Somras for happiness and Yagy.
स ईं रथो न भुरिषाडयोजि महः पुरूणि सातये वसूनि।
आदीं विश्वा नहुष्याणि जाता स्वर्षाता वन ऊर्ध्वा नवन्त॥
वे विशाल देवराज इन्द्र ज्यादा बोझ वहन किये हुए, रथ के सदृश, हमें असीम धन-सम्पत्ति प्रदान करने हेतु, नियुक्त किये गये हैं तथा युद्ध में हमारे विरोधी शत्रुओं का संहार करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 13.5.2)
Huge Devraj Indr is bearing more load, like the charoite. He has been appointed to grant us unlimited wealth and prosperity. He destroys our opponents & enemies in the war.
शुष्मी शर्धो न मारुतं पवस्वानभिशस्ता दिव्या यथा विट्।
आपो न मक्षु सुमतिर्भवा नः सहस्त्राप्साः पृतनाषाण्न यज्ञः॥
हे सोम देवता! मरुतों के सदृश शक्ति प्राप्त करने हेतु आप शुद्ध हों। जिस प्रकार अलौकिक प्रजा आपस में ईर्ष्या, निन्दा से दूर रहते हुए एक साथ रहती है, उसी प्रकार आप जल के सदृश स्वच्छ होकर हमारे लिए श्रेष्ठ मती प्रदान करें। विविध रूपों में सुशोभित, शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने वाले आप याग के समान पूजा करने योग्य हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 13.5.3)
Hey Som Dev! You should be clarified for attaining strength like the Marud Gan. The way divine populace live together free from envy, reproach; similarly you should become clean like water and grant us best intelligence. You deserve worship, possessing various forms and attaining victory over the enemy.
त्वमग्ने यज्ञानां होता विश्वेषं हितः। देवेभिर्मानुषे जने॥
हे अग्नि देवता! आप समस्त यागों का सम्पादन करने वाले हैं। देवों ने आपको मनुष्यों का भला करने के निमित्त नियुक्त किया है।(सामवेद उत्तरार्चिक 13.5.4)
Hey Agni Dev! Its you who accomplish all Yagy. Demigods have appointed for the welfare-well being of the humans.
स नो मन्द्राभिरध्वरे जिह्वाभिर्यजा महः। आ देवान्वक्षि यक्षि च॥
हे अग्नि देवता! आप हमारे याग में आनन्द में वृद्धि करने वाले ज्वालाओं के द्वारा देवताओं का यजन करें। देवों को आमन्त्रित कर उन्हें संतुष्टि प्रदान करने वाली आहुतियाँ समर्पित करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 13.5.5)
Hey Agni Dev! Accomplish prayers in our Yagy with fire, which should increase pleasure. Invite-invoke demigods-deities and make offerings-oblations to satisfy them.(14.02.2026)
वेत्था हि वेधो अध्वनः पथश्च देवाञ्जसा। अग्ने यज्ञेषु सुक्रतो॥
हे नियन्ता, उत्कृष्ट कर्म करने वाले अग्नि देवता! आप याग के पास तथा दूर के समस्त रास्तों को जानने वाले हैं। आप यजमानों का उचित पथ प्रदर्शन करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 13.5.6)
Hey controller, performer of excellent deeds Agni Dev! You know all the paths-roads to Yagy whether near of far. Show right direction to the Yajmans.
होता देवो अमर्त्यः पुरस्तादेति मायया। विदथानि प्रचोदयन्॥
यज्ञकर्ता, कभी नष्ट न होने वाले, दीप्तिमान् अग्नि देवता, उपासकों को अच्छे कर्मों को करने की प्रेरणा प्रदान करते हुए अविलम्ब उत्पन्न होते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 13.5.7)
Yagy performer, never perishable, illuminated Agni Dev appear without delay to inspire-advise the worshiper for performing virtuous-righteous, pious deeds.
वाजी वाजेषु धीयतेऽध्वेरेषु प्र णीयते। विप्रो यज्ञस्य साधनः॥
शक्तिशाली अग्नि देवता को युद्ध में शत्रुओं का दमन करने के लिए प्रतिष्ठित किया जाता है। ये ज्ञान से परिपूर्ण अग्नि देवता याग के अग्रणी साधन हैं तथा उन्हीं के द्वारा याग सम्पादित होता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 13.5.8)
Mighty-powerful Agni Dev is established to destroy the enemies in the war. Enlightened Agni Dev remain forward-ahead in the Yagy. Its who conduct the Yagy.
धिया चक्रे वरेण्यो भूतानां गर्भमा दधे। दक्षस्य पितरं तना॥
वे अग्नि देवता सभी यज्ञ-अनुष्ठान में उपस्थित होने के निमित्त उत्कृष्ट है। वे समस्त जीव-धारियों में व्याप्त हैं। जगत् का पालन-पोषण करने वाले अग्नि देवता को दक्ष की पुत्री (वेदी) धारण करती है।(सामवेद उत्तरार्चिक 13.5.9)
Agni Dev is best since he remain present in every Yagy and ritualistic ceremonies. He pervades each and every living being. For the nourishment of the universe Agni Dev retain-support the daughter of Daksh named Vedi.
सामवेद उत्तरार्चिक (13.6) ::
आ सुते सिञ्चत श्रियं रोदस्योरभिश्रियम्। रसा दधीत वृषभम्॥
हे पुरोहितों! स्वर्गलोक तथा भूलोक में जाज्वल्यमान् दूध (धवल किरणों) से सोम सिंचित करो। (इसलिए कि) बाद में वह दुग्ध (धवल ओज) शक्तिमान् सोम को अपने में समाहित कर लेता है। (तथा स्वयं अत्यन्त शक्तिशाली बन जाता है।)(सामवेद उत्तरार्चिक 13.6.1)
Hey priests! Saturate-irrigate Som with the radiant milk available in the heavens & earth. Since, the milk absorb mighty Somras and itself become powerful later.
ते जानत स्वमोक्यं3 सं वत्सासो न मातृभिः। मिथो नसन्त जामिभिः॥
वे गौएँ (सूर्य की किरणें) अपने स्थलों को भली-भाँति जानती हैं। जिस तरह बछड़े अत्यन्त भीड़ में भी अपनी माताओं के समीप पहुँच जाते हैं, उसी तरह ये गौएँ (लोकातीत किरणें) भी अपने आश्रयदाताओं के समीप स्वतः ही पहुँच जाती है।(सामवेद उत्तरार्चिक 13.6.2)
The cows are aware of their place-residence properly. The way the calf reaches the cow in a dense crowd, similarly cows reach their master-shelter automatically.
उप स्रक्वेषु बप्सतः कृण्वते धरुणं दिवि। इन्द्रे अग्ना नमः स्वः॥
ग्रहण करने वाली ज्वालाओं से प्राप्त अन्न तथा दूध को अग्नि तथा इन्द्र देवता याग कर्म के माध्यम से अन्तरिक्ष में प्रसारित कर देते हैं। इसके बाद इन्द्र तथा अग्नि देवता को समस्त (प्रकृति के अंग-अवयव) दूध-पोषण प्रदान करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 13.6.3)
Agni Dev and Devraj Indr spread the food grains and milk obtained via flames-offerings in the space. Thereafter, all components of nature provide milk and nourishment to Agni Dev & Devraj Indr.
तदिदास भुवनेषु ज्येष्ठं यतो जज्ञ उग्रस्त्वेषनृम्णः।
सद्यो जज्ञानो नि रिणाति शत्रूननु यं विश्वे मदन्त्यूमाः॥
विश्व का कारणभूत ब्रह्म समस्त लोकों में दीप्तिमान् होकर व्याप्त हुआ। उसी के प्रताप से सूर्य देवता का आर्विभाव हुआ। जिसके केवल उदित होने से ही तमरूपी शत्रु विनष्ट हो जाते हैं। समस्त जीवधारी उसे देखकर प्रसन्न हो जाते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 13.6.4)
Reason behind evolution Brahm, illuminated & pervaded the entire universe. By virtue of HIS glory Sury Dev originated-evolved. Just by Sun rise, enemies in the form of darkness are destroyed. All living beings become happy on seeing him.
वावृधानः शवसा भूर्योजाः शत्रुर्दासाय भियसं दधाति।
अव्यनच्च व्यनच्च सस्नि सं ते नवन्त प्रभृता मदेषु॥
अपनी क्षमता से विश्व को व्यापक करते हुए, असंख्यों शक्ति से सम्पन्न, दुर्जनों के बैरी देवराज इन्द्र समस्त चर-अचर प्राणियों को संचालित करते हैं। हम ऋत्विग्गण ऐसे देवराज इन्द्र की सम्मिलित रूप में, एक साथ वन्दना करके उन्हें तथा स्वयं को आह्लादित करते हैं।(सामवेद उत्तरार्चिक 13.6.5)
Devraj Indr blessed with numerous powers, pervade the entire world with his capability-power and regulate-organise the movable and fixed-trees living beings; enemies of the wicked sinners. We Ritviz Gan together worship Devraj Indr gladdening-pleasing him.
त्वे क्रतुमपि वृञ्जन्ति विश्वे द्विर्यदेते त्रिर्भवन्त्यूमाः।
स्वादोः स्वादीयः स्वादुना सृजा समदः सु मधु मधुनाभि योधीः॥
हे देवराज इन्द्र! सभी याजक आपके लिए ही यज्ञ-कर्म करते हैं। जब याजक विवाहोपरान्त दो अथवा एक संतति के पश्चात् तीन होते हैं, तो प्रिय से प्रिय प्रतीत होने वाले संतति को आप प्रिय धन-संपदा से सम्पन्न करें। भविष्य में इस प्रिय संतति को पौत्रादि की मधुरता से परिपूर्ण करें।(सामवेद उत्तरार्चिक 13.6.6)
Hey Devraj Indr! All Yajak Gan perform Yagy for you. Let the dearest progeny after marriage be blesses by you with wealth-prosperity. Thereafter, in future bless the sons and grandsons with sweetness i.e., love & affection.
त्रिकद्रुकेषु महिषो यवाशिरं तुविशुष्मस्तृम्पत् सोममपिबद्विष्णुना सुतं यथावशम्।
स ईं ममाद महि कर्म कर्तवे महामुरुं सैनं सश्चद्देवो देवं सत्य इदुः सत्यमिन्द्रम्॥
अत्यधिक क्षमतावान्, संतुष्ट हुए देवराज इन्द्र तीन पात्र में निकाले गए जौ के सत्तू से मिले हुए सोमरस को विष्णु देवता के साथ ग्रहण करते हैं। वे सोमदेव अत्यधिक विस्तीर्ण तेजोमय, इन देवराज इन्द्र को श्रेष्ठ कार्य करने के निमित्त आनन्दित करते हैं। सत्यस्वरूप, प्रकाशमान् विलक्षण सोम सत्य तथा देवस्वरूप देवराज इन्द्र को प्राप्त होता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 13.6.7)
Highly capable, Devraj Indr accept three pots of Sattu (powdered roasted gram and barley) mixed in Somras along with Bhagwan Shri Hari Vishnu. Somras possess extreme aura-radiance and gladden Devraj Indr for best performances. Illuminated Som a form of truth, is availed by truthful, divine Devraj Indr.
साकं जातः क्रतुना साकमोजसा ववक्षिथ साकं वृद्धो वीर्यैः सासहिर्मुधो विचर्षणिः।
दाता राध स्तुवते काम्यं वसु प्रचेतन सैनं सश्चद्देवो देवं सत्य इन्दुः सत्यमिन्द्रम्॥
हे देवराज इन्द्र! आप अपनी क्षमता से इस सम्पूर्ण सृष्टि का बोझ वहन कर सकते हैं। आपकी उत्पत्ति याग के साथ हुई है। आप महा ज्ञानी, सर्वश्रेष्ठ हैं। आप महान् शक्तिशाली शत्रुओं का संहार करने वाले, विशेष ज्ञान से परिपूर्ण हैं। आप याजकों को मनवांछित वैभव प्रदान करते हैं। सत्यस्वरूप प्रकाशमान् विलक्षण सोम सत्य तथा देवस्वरूप देवराज इन्द्र को प्राप्त होता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 13.6.8)
Hey Devraj Indr! You can bear-support the entire universe with your might-power. You evolve through Yagy. You are enlightened and possess Ultimate Gyan-knowledge. You possess the knowledge technique to destroy the great enemies. Illuminated Som a form of truth, is availed by truthful, divine Devraj Indr.
अध त्विषीमाँ अभ्योजसा कृविं युधाभवदा रोदसी अपृणदस्य मज्मना प्र वावृधे।
अधत्तान्यं जठरे प्रेमरिच्यत प्र चेतय सैनं सश्चद्देवो देवं सत्य इन्दुः सत्यमिन्द्रम्॥
हे देवराज इन्द्र! आपने अपनी योग्यता से कृवि नामक राक्षस पर विजय प्राप्त किया तथा तेजवान् बनें। आपने द्यावा-पृथिवी को अपने ओज से परिपूर्ण कर दिया। सोमरस का सेवन करने में अत्यधिक समृद्धिशाली हुए आप सोम के एक अंश को अपने उदर में तथा दूसरे अंश को देवताओं के लिए शेष रखते हैं। हे देवराज इन्द्र! आप सोमरस का सेवन करने हेतु देवताओं को आहूत करें। सत्य स्वरूप, प्रकाशमान्, विलक्षण सोम, सत्य स्वरूप जाज्वल्यमान् देवराज इन्द्र को प्राप्त होता है।(सामवेद उत्तरार्चिक 13.6.9)
Hey Devraj Indr! You won the demon named Kravi and become radiant. You filled heavens and earth with your aura. Having become extremely powerful, you keep one segment of Somras in your stomach and the rest for the demigods-deities. Hey Devraj Indr! You invite-invoke the demigods-deities for drinking Somras. Truthful form of illuminated, amazing Somras is availed by blazing Devraj Indr.(15.02.2026)



