Tuesday, December 8, 2015

PERFORMANCE-KARM YOG कर्म योग SHRIMAD BHAGWAD GEETA (3) श्रीमद्भगवद्गीता

कर्म योग
SHRIMAD BHAGWAD GEETA (3) श्रीमद्भगवद्गीता
CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM
By :: Pt. Santosh Bhardwaj

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ॐ गं गणपतये नम:।
अक्षरं परमं ब्रह्म ज्योतीरूपं सनातनम्।
गुणातीतं निराकारं स्वेच्छामयमनन्तजम्॥
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि
[श्रीमद्भगवद्गीता 2.47]
गजानन भूतगणादिसेवितं कपिथ्यजम्बूफलचारुभक्षणम्।
 उमासुतं शोकविनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वरपादपपंकजम्॥ 
From the first breath in the womb until the last breath, the human body works, Karm  is associated with it. Respiration-heart beat, functions of brain, movement etc. are Karm. This treatise on Shri Mad Bhagwat Geeta connects one with the commentary world. Its easy to relinquish the world just by practicing Varnashram Dharm. Be it enlightenment or devotion, Karm is involved in each and every activity.
श्रीमद्भागवत गीता का यह भाष्य एक गृहस्थ, सांसारिक, कलयुग जन्मे व्यक्ति द्वारा विश्लेषित किया जा रहा है, जो कि एक साथ धर्म-कर्म, ज्ञान, भक्ति और मोक्ष मार्ग का आश्रय लिए हुए है। 
कर्मयोग :: 
अर्जुन उवाच: ::
ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन।
तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव॥3.1॥
अर्जुन ने कहा :- हे जनार्दन! यदि आप कर्म की अपेक्षा बुद्धि-विवेक, ज्ञान को श्रेष्ठ मानते हैं, तो फिर हे केशव! मुझे, इस युद्ध रुपी घोर-भयंकर कर्म में क्यों लगाते हैं?
Arjun questioned Janardan-Bhagwan Shri Krashn with due obedience! If he considered the intelligence (enlightenment, wisdom, prudence) to be superior to action, why did he then, ordered him to fight the fierce battle?
जब तक संसार की सत्ता है, तभी तक कोई कर्म, घोर या सौम्य दिखता है। संसार की सत्ता मानने से कर्म की तरफ दृष्टि रहती है, कर्तव्य की ओर नहीं। कर्तव्य की राह में कोई भी कर्म घोर या सौम्य नहीं है। समबुद्धि ज्ञान की द्योतक है। परन्तु कर्म करने से रोकती नहीं है। प्राणी जब तक जीवित है, तब तक कर्म तो करता ही रहेगा। 
समबुद्धि उसे सही गलत को पहचानने में मदद करती है। क्या, कब, कैसे, क्यों, किसलिए, कब तक, किसके लिये आदि-आदि का निर्णय लेने में समबुद्धि उसे सक्षम बनाती है।
Karm is synonym to deeds, action, work, endeavours, labour, effort, performance. Its an essential ingredient of both Gyan Yog & Bhakti Yog. Till one breaths his last, he is performing-working willing or unwillingly.
Performance with out attachment is essential. Let us do our pious, virtuous, righteous duty honestly and leave rest to HIM.
व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे।
तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम्॥3.2॥
आप अपने मिले-जुले वचनों से मेरी बुद्धि को मोहित सा कर रहे हैं; इसलिए आप निश्चित करके उस एक बात को कहिये, जिससे कि मैं कल्याण को प्राप्त हो जाऊँ।
I am getting confused (being deluded), due the description made by YOU. So, please instruct-guide me through a single directive which should lead me to my welfare (Ultimate Pleasure, Bliss).
अर्जुन भर्मित-मोहित हो गए, मानो इंद्रजाल -सम्मोहन के अधीन हों। परन्तु फिर भी उन्होंने अपनी जिज्ञासा को भगवान् श्री कृष्ण के सम्मुख प्रकट-प्रस्तुत कर ही दिया। एक साथ इतना कुछ ज्ञान प्राप्त हो जाये और वो भी युद्ध के मैदान में, तो यही होता है। उनके मस्तिष्क में एक साथ कई सवाल पैदा हो रहे थे और इसीलिए उन्होंने अनुरोध किया कि उन्हें एक स्पष्ट आदेश कर दिया जाये कि उन्हें क्या करना है। परन्तु भगवान् श्री कृष्ण को यह ज्ञात था कि अर्जुन फिर से उलझन में फँसकर हथियार रख सकते हैं, अतः उन्होंने समस्या का पूर्ण समाधान करने हेतु अपना वक्तव्य जारी रखा।
Arjun got mixed up due to the highly intellectual (philosophical, enlightening doctrine, thesis, treatise). He could not grasp it properly and wanted the whole thing to be summarised-explained again, to clear the way for Salvation-Moksh. The cast (spell, mesmerism, hypnotic impact) over Arjun was visible. Yet, he was unable to find solution to various questions striking his mind. He wanted more knowledge briefing and clarifications. It was a typical situation, when Arjun was standing in the battle field and tutored by Bhagwan Shri Krashn. Like a good student-disciple, he posed his queries for further elaboration-clarification. Its always advisable to consult the enlightened, when ever one gets struck and do not find a solution to come out of the typical situation.
Its very common to get confused in day today life, even for those who have learnt Bhagwat Geeta. One reads and reads and then prefer to forget what has been learnt by him. So, read it, think over it, grasp it and then apply in life with ease.
श्रीभगवानुवाच: ::
लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ। 
ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम्॥3.3॥
श्री भगवान बोले :- हे निष्पाप अर्जुन! इस लोक में दो प्रकार की निष्ठा मेरे द्वारा पहले कही गई है। उनमें से साँख्य योगियों की निष्ठा तो ज्ञान योग से और योगियों की निष्ठा कर्मयोग से होती है।
Bhagwan Shri  Krashn said :- O sinless Arjun! I described two types of Yog-dedication in this abode. The dedication by the enlightened (philosophers, scholars, Pandits) is through Gyan-Sankhy Yog (enlightenment, knowledge, understanding, application, practice, skill) while that of the Yogis-ascetics is through Karm Yog.
मनुष्य की स्वयं के कल्याण की तीव्र चाहत-इच्छा उसे निष्पाप करने के लिए जरूरी है। इस लोक (पृथ्वी और शरीर) के निष्पाप करने वाले उपाय ज्ञान व कर्म स्पष्ट कर दिए हैं और मनुष्य से अपनी निष्ठा इन दोनों में से किसी में भी कम न करने के लिये कहा गया। नाशवान संसार-क्षर के सिद्धि और असिद्धि में सम रहना कर्म योग तथा  विमुख होकर अक्षर में स्थित होना ज्ञान योग है। परमात्मा क्षर से अतीत और अक्षर से उत्तम है। अतः पुरुषोत्तम है। क्षर की प्रधानता कर्म योग, अक्षर की प्रधानता ज्ञान योग और परमात्मा की प्रधानता भक्ति योग से युक्त है।
साँख्य निष्ठा और योग निष्ठा साधन, साध्य और लौकिक हैं और साधक के प्रयत्न पर निर्भर हैं। भगवन्निष्ठा जो कि अलौकिक है, साधक, भगवान् और उनकी कृपा पर निर्भर है।
कर्म योग का मर्म :: किसी को बुरा न समझना, न किसी का बुरा चाहना और न किसी का बुरा करना।
ज्ञान योग का मूल :: मेरा कुछ नहीं है, मेरे को कुछ नहीं चाहिये और मुझे अपने लिए कुछ नहीं करना है।
Strong will-determination (motive, desire) is essential for one to become sinless-free from sins. The requisite for this purpose has been explained by the Almighty, in the form of Gyan and Karm Yog. He has said that one should not desert any of the two. To be neutral towards achievement and failure (perishable) is Karm Yog, i.e., attainment of equanimity. To relinquish and attach with the divine, eternal, imperishable is Gyan Yog. The Ultimate is above both perishable and imperishable. 
Supremacy of perishable is Karm Yog, supremacy of the imperishable is Gyan Yog and the supremacy-dominance of the Almighty is Bhakti Yog.
Dedication to Sankhy Yog and Karm Yog is connected with this world-human body and the efforts of the devotee, while the divine-eternal is dependent over the practitioner (devotee) and the mercy of God.
The theme-central idea behind Karm Yog is :: Do not consider any one bad, do not have ill will for others and never do bad-harm others.
The nectar-gist of Gyan Yog is that I do not possess any thing, I do not need any thing and I have nothing to do for my self.
Sins and virtues are carried over to next birth just as the air carries impurities, scents, moisture, dust particles from one place to another but ultimately become free from them.
न कर्मणामनारम्भान्नै ष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते।
न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति॥3.4॥
मनुष्य न तो कर्मों का आरंभ किए बिना निष्कर्मता (जिस अवस्था को प्राप्त हुए पुरुष के कर्म अकर्म हो जाते हैं अर्थात् फल उत्पन्न नहीं कर सकते, उस अवस्था का नाम निष्कर्मता या योगनिष्ठा है) को प्राप्त होता है (अनुभव करता है) और न कर्मों के केवल त्यागमात्र से सिद्धि (साँख्य निष्ठा) को ही प्राप्त होता है।
One can not accomplish-attain renunciation-relinquish, without initiating action; without the desire of reward or by rejecting the action-deeds. 
निष्काम भाव से कर्म करना नितान्त आवश्यक है। कामना का त्याग करके कर्तव्य का निर्वाह करना चाहिये। वह अवस्था जब कर्म बन्धनकारी नहीं होते निष्कर्मता कहलाती है। ये ऐसा ही है जैसे भुने हुए बीज का अंकुरित ना होना। निष्काम मनुष्य जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है। जब तक कर्म अपने लिए किया जायेगा, तब तक बन्धन  बना रहेगा और पुनर्जन्म होता रहेगा। कर्मों को केवल स्वरूप से त्याग देने से साँख्य योगी को सिद्धि-निष्कर्मता प्राप्त नहीं होती। सिद्धि की प्राप्ति के लिए कर्तापन का त्याग जरूरी है। अतः साँख्य योगी को अहंता का त्याग करना होगा। साँख्य योग में कर्म किये भी जा सकते हैं और किसी सीमा तक उनका त्याग भी किया जा सकता है। कर्म योग में सिद्धि प्राप्ति हेतु कर्म करना जरूरी है। यह व्यवहार में मनुष्य को परमार्थ-सिद्धि का ज्ञान देता है न कि कर्म को त्यागने या कराने की बात करता है।
One should perform for the sake-welfare of others, with the feeling (desire, will) of service to the man kind. He should not be smeared-tainted by it. There should be no desire for attaining (receiving, gratification) any thing from others as the reward of his services. Having attained this state, he can perform for the benefit (service, help) of others. The deeds done will be like the gram seed which has been roasted and it will not germinate. Such deeds will not be carried forward to materialise (germinate) into yet another birth. Such people become free from the cycles of birth and death. The bonds (ties, attachment, affections, allurements) will remain till one serve (nurtures) his own personal interests. Mere rejection of the Karm-deeds is not enough for the Sankhy Yogi (enlightened, learned, philosopher, Pandit, scholar, devotee, ascetic). Perform for the welfare of others, without the desire for return (gratification). For accomplishment one has to forget the ego-pride or that he has done something for others. Enlightened do perform but for the sake of others not for him self. Karm Yog makes it essential to perform but without the desire of return-personal benefit. One should make it a habit to help others without constraints. Only then he will be able to reach the Ultimate. 
I relentlessly worked throughout the service for the welfare of teachers either as the Secretary or President of the association and the welfare of residents in his locality as the President of Residents Welfare Association and achieved success. It was found that several people readily claimed credit for the job done by me. They had to be exposed. I feels satisfied, content with what I could achieve in life.
न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः॥3.5॥
निःसंदेह कोई भी मनुष्य किसी भी काल-अवस्था में क्षण मात्र भी बिना कर्म किए नहीं रह सकता, क्योंकि प्रकृति के परवश हुए सब प्रणियों से प्रकृति जन्य गुण कर्म करने पड़ते ही हैं (सारा मानव समुदाय प्रकृति से उत्पन्न गुणों द्वारा परवश हुआ कर्म करने के लिए बाध्य है)।
One can not survive even for the 1,000th fraction of a second without performing, since he is controlled (guided, bound) by the nature (mother nature Maa Bhagwati better half of the Ultimate-Almighty).
प्राणी-मनुष्य तब तक ही प्राणी है, जब तक उसकी साँस चल रही है, अन्यथा मिट्टी। अतः वह चाहे-अनचाहे, जाने-अनजाने कर्म तो कर ही रहा है। परमात्म तत्व-परमात्मा को प्राप्त करने का कोई भी मार्ग वह ग्रहण करे, उसे कर्म तो करना ही है। शारीरिक, मानसिक वाचिक कोई भी क्रिया-रूप हो कर्म ही है। जिस किसी क्रिया से मनुष्य अपना सम्बन्ध मान लेता है, वही बन्धन कारक हो जाती है। जब तक शरीर-मन में अहंता-ममता है, तब तक शरीर से होने वाली समस्त क्रियाएँ कर्म हैं, क्योंकि शरीर तो प्रकृति का अंग ही है। यद्यपि आत्मा स्वयं अक्रिय, असंग, अविनाशी, निर्विकार, निर्लिप्त है तथापि जब तक उसका और शरीर का साथ-संयोग है, तब तक वह प्रकृति एवं उसके कार्य :- स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर के साथ अपना सम्बन्ध मानकर सुख चाहता है, तब तक वह प्रकृति के परवश अधीन है।
निद्रा, सुषुप्तावस्था, मूर्छा, समाधि-ध्यान आदि में भी निरन्तर क्रियाएँ होती रहती हैं।
सहजावस्था-सहज समाधि में कोई क्रिया संभव नहीं है। यह स्वरूप की अवस्था है। इसमें परिणाम व व्युत्थान का कोई स्थान नहीं है। योग समाधि में योगी श्वसन क्रिया को विराम दे देता है, जिससे सिवाय चैतन्यावस्था के सभी क्रियाएँ रुक जाती हैं। 
प्रकृति से गुण, गुणों से  वृत्ति और वृत्ति से मानव स्वभाव बनता है और यह स्वभाव ही परवशता का कारण है। वह कभी गुणों, कभी काल, कभी भोग और तो कभी स्वभाव के वश में होता है। परिस्थिति, व्यक्ति, स्त्री, पुत्र, जायदाद, धन आदि भी मनुष्य को परवश कर देते हैं। मनुष्य कर्म में भले ही परतंत्र हो, राग द्वेष रखने ना रखने में वह स्वतंत्र है।
One who has taken birth will die. Whatever has evolved will perish.
Man is mortal. The organism-creature is a living being only till, he is respiring-breathing, otherwise he is just clay (mould, sand, earth). Which ever-what ever means (way, path, track, route) he adopt to realise the Ultimate-God he has to perform. He performs through physical, mental and vocal means-faculties. What ever deed-commodity attract him create ties-bonds (with nature, physique) for him. By the time he has affection-love for the body-desires, all activities performed through this body are actions-deeds. Though soul-spirit in itself is inactive, untainted, dissociated, uncontaminated, imperishable, yet it wish to experience the comforts-pleasure  due to its association with the body (in any of the three forms: material, divine-absolute, ghost-spirit-soul etc.)  compelling him to be under the dictates of nature.
Actions-performances continue, irrespective of sleep, unconsciousness, staunch meditation.
Its only innate-absolute state, when all activities in the body of the human-Yogi comes to halt. He stops breathing and soul is free to move any where. No action no performance.
Nature generate characters, characteristics create tendency-inclination, bent of mind, which in turn create-evolve the human nature. This nature of the human make him dependent over characteristics, time, comforts, griefs, situation, others, wife, children wealth etc. The human may be dependent over nature but he is free to detach and forget the enmity.
All galaxies, stars, planets are in motion in comparison to each other.
कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्।
इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते॥3.6॥
जो मनुष्य कर्मेन्द्रियों (सम्पूर्ण इन्द्रियों) को हठ पूर्वक रोककर, मन से उन इन्द्रियों के विषयों का चिन्तन करता रहता है, वह मूढ़ बुद्धि वाला मनुष्य मिथ्याचारी (असत्य आचरण वाला) कहा जाता है। 
One who control his sense & functional organs forcibly but thinks of the comforts, desires, objects of pleasure, joy is ignorant who is deceiving him self or simply a liar. One who restrains-prohibits his sense organs forcibly but thinks of them, that idiot-fool is a liar having-portraying false conduct.
ज्ञानेन्द्रियाँ कर्मेन्द्रियों के तहत ही आती हैं। जो मनुष्य इन्द्रियों को हठ पूर्वक रोकता है, उसमें संयम का अभाव है। यह इन्द्रियों को वश में करना नहीं, अपितु मिथ्याचार है। स्वयं को धोखा देना है। मूढ़मति-विवेकहीन इन्द्रियों की क्रियाओं को बल पूर्वक रोककर मन ही मन उनका चिंतन करता है तो, मिथ्या आचरण का दोषी तो हुआ ही, बाहर से, दिखावे ले लिये वह इन से भले ही छूट गया हो, परन्तु अहंता, ममता, कामना, राग-द्वेष, भोगों का चिंतन-लगाव, फिर भी नहीं छूटा। इसमें लोक-लाज, बदनामी, जेल का डर, अपमान, भर्तस्ना शामिल हैं। साधक को कर्मो  को स्वरूप से ही कामना-आसक्ति रहित होकर त्यागना है। 
Sense organs mind, nose, skin, ears, eyes are considered to be a component of functional organs. One who has no control over his sensualities but with hold the sense organs forcibly, which is nothing more than deception-cheating. One should make endeavours to train him self for rejecting-restraining from allurements of the sensualities-passions. This is false hood. He is still involved (attached to desires, affections, allurements, envy, greed, worldly subjects, pleasures, grief, imagination, thinking of sensualities, sexuality, lust, passions) with motives. The reason behind this the fear of defamation, jail, insult, scandalisation, abuse. The devotee has to summarily isolate-preserve (unlike a curtain) him self and subject to the God's dictates under his shelter (asylum, protection, cover).
इसका एक फायदा यह है कि वह कार्मिक पाप से बच जाता है, परन्तु मानसिक पाप तो रह ही जाते हैं जो निरन्तर परेशान करते हैं।
One is at least protected from the physical-functional sins. Mental sins remains as such. Practice makes a man perfect. Slowly & gradually one acquires control over his mind, brain waves, thoughts as well. It may be considered to be a preparatory stage for him. Its not that easy to get rid of the bad thoughts acquired in numerous births & rebirths.
Practice makes a man perfect.
यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन।
कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते॥3.7॥
किन्तु हे अर्जुन! जो पुरुष मन से इन्द्रियों को वश में करके अनासक्त हुआ (निष्काम भाव से) समस्त कर्मेन्द्रियों के द्वारा कर्मयोग का आचरण करता है, वह विशिष्ट-श्रेष्ठ है।
Hey Arjun! The detached (relinquished) who controls his sense organs without desires and follows the path-dictates of Karm Yog (Functional attachment with the Almighty) with the help of all functional organs is a distinguished person (A Karm Yogi).
अनासक्त कर्म योगी मिथ्याचारी और साँख्य योगी दोनों से ही उत्तम है। निर्मल अन्तःकरण (मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार) वाले के व्यक्ति में कर्म-कर्तव्य को लेकर शंका नहीं होने चाहिये। इन्द्रियाँ तब वश में आती हैं, जब ममता, अहंता, घमण्ड नष्ट हो जाते हैं। जब निश्चयात्मक बुद्धि इन्द्रियों को काबु में कर लेती है तो, उनकी स्वतंत्रता-भटकाव खत्म हो जाता है और वे आज्ञा पालन करने लगती हैं।
कर्मयोगी को शास्त्र-वर्णाश्रम धर्म के अनुरूप कार्य करना चाहिये। उसे कर्म और उसके फल दोनों का ही त्याग करना होता है। इन दोनों के त्याग के बगैर मोक्ष सम्भव नहीं है। ज्ञान-साँख्य योगी का मुक्ति मार्ग अपेक्षाकृत कठिन है, क्योंकि उसे देहाभिमान से भी मुक्त होना है। दूसरों (समाज) के भले के लिए गये कार्य कर्म योग में परिणित हो जाते हैं। जो व्यक्ति दूसरों के लिए जीता-कार्य करता है वो, निश्चित रूप से श्रेष्ठ है।
Performance of the doer without attachment, is not only better than that of the one, who is a liar-deceiver, but also the Gyan Yogi-following the dictates of prudence-enlightenment. There is no place for confusion-doubt for the detached-relinquished Karm Yogi with pure, pious, clean innerself. The senses comes under control, only when attachment vanish (feeling of I, my, me, mine, ego-pride, arrogance). When the will (determination, heart, mind, soul) applies control (breaks) over the senses, they loss independence and start behaving.
The Karm Yogi acts through the controlled senses as per dictates of the scriptures (epics, Varnashram Dharm). One has to relinquish the attachment with the Karm as well as its reward (out come, fall out, result). One can not acquire assimilation in God without rejection of both (Karm-deeds and reward). The enlightened's the task is tedious, since he has to reject the pride of being a human. Performance of deeds for the benefit (welfare) of others turn into Karm Yog. One who live (survive, perform, work) for the sake of others is a distinguished person (better than others).
Mere knowledge is not enough. It should be strengthened with understanding, applicability with firm determination & effort. Let us perform our duties to the best of our ability and leave the rest to the God.
नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः।
शरीरयात्रापि च तेन प्रसिद्ध्येदकर्मणः॥3.8॥
तुम शास्त्र-विहित कर्मों को करो क्योंकि कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करना ही श्रेष्ठ है तथा कर्म न करने से तो तुम्हारा शरीर निर्वाह भी सिद्ध नहीं होगा।
One must perform the prescribed duties, actions, deeds described-explained in the scriptures, since its appreciable, better, superior to perform than not to do and its not possible to maintain the body if one fails to carry out routine-daily chores.
शास्त्रों में कर्म दो प्रकार ::
(1). विहित कर्म (Ordained, prescribed- proper, fit, determined) :- व्रत, उपवास, उपासना और 
(2). निहित कर्म (Contained, latent, entrusted, vested) :- वर्णाश्रम, स्वभाव, परिस्थिति जन्य कर्म।
शास्त्र विहित कर्मों को पूरी तरह करना-निवाहना सरल नहीं है, परन्तु निषिद्ध कर्मों जैसे चोरी करना, झूठ बोलना, हिंसा आदि का त्याग सुगम है।
निहित कर्म के उदाहरण :: भोजन करना, व्यापार, घर बनवाना, रास्ता दिखाना आदि। क्षत्रिय होने के नाते वर्ण धर्म के अनुसार परिस्थिति वश प्राप्त युद्ध हिंसात्मक होते हुए भी घोर नहीं, अपितु नियत-स्वधर्म है। इन दोनों को विद्वान एक ही मानते हैं। यद्यपि युद्ध दुर्योधन के लिए भी नियत कर्म था, परन्तु उसमें अन्याय शामिल था। दुर्योधन पाण्डवों पर युद्ध थोप रहा था जबकि यह अनिवार्य नहीं था।
दोष युक्त होने पर पर भी नियत-सहज कर्म का त्याग न करके व्यक्ति को उसे अनासक्ति भाव से करना चाहिये, क्योंकि यह कर्मों से सवर्था सम्बन्ध विच्छेद करा देता है। कर्म करते हुए ही कर्मों से सम्बन्ध-विच्छेद कर लेना चाहिये।
जैसे ज्ञान योग में विवेक के द्वारा सम्बन्ध विच्छेद होता है वैसे ही कर्म योग में कर्तव्य-कर्म का ठीक-ठीक अनुष्ठान करने से संसार से सम्बन्ध विछ्छेद हो जाता है।
निष्काम भाव से किया गया कर्म सकाम भाव से किये गए कर्म और ज्ञान योग से भी श्रेष्ठ है।
TWO CATEGORIES OF KARM AS PER SCRIPTURES ::  
(1). Ordained, prescribed, proper, fit, determined and 
(2). Contained, latent, entrusted, vested. 
Its not easy to carry out, perform the prescribed duties easily (properly) due to the procedural intricacies (difficulties, troubles, possible mistakes). But what one can do easily is to speak the truth, reject violence, animal slaughter, meat eating, murders, terrorism, abstain from stealing.
Examples of entrusted (vested duties, deeds) :: Eating, house building, business, showing (paving) the path. Being a warrior its one's duty to fight without indulgence negative attitude, even though it involves violence. Its essential for him. Its fixed-own duty. The learned consider these two to be the same (identical). Though war was an essential, compulsory, mandatory duty for Duryodhan as well, yet injustice was involved in it. He forced the war upon Pandavs, though it was not essential. In spite of being defective-smeared, one must not reject the prescribed duties. However, one should perform them without involvement or indulgence. A deed performed without motive or desire to harm others, detaches one from its negative outcome (bad impact, effect). One must perform,  keeping him self detached-unsmeared.
The way prudence detaches one from the world (impact of the deeds); Karm Yog detaches one from the out come-impacts of the endeavours (like killing the guilty, culprit, murderer, intruder, terrorist, attacker in war). There should be no guilty feeling.
A deed performed without attachment is appreciated and held superior to enlightenment and the duties (endeavours) under taken for the sake of benefit-profit-result-reward.
Breathing-respiration, eating, drinking, excretion, heart beating-pulse, movements are the activities-Karm, one keep on performing till he is alive. Karm may be categorised as voluntary and involuntary, prescribed and mandatory as well.
यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः।
तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर॥3.9॥
यज्ञ (कर्तव्य पालन, त्याग और ईश-आराधना से भावित होकर किये गए शास्त्र सम्मत कर्म) के निमित्त किए जाने वाले कर्मों से अतिरिक्त (अन्यंत्र, अपने लिए किये जाने वाले) दूसरे कर्मों में लगा हुआ ही यह मुनष्य समुदाय कर्मों से बँधता है। इसलिए हे कुंती नंदन अर्जुन! तुम आसक्ति रहित होकर, उस यज्ञ के निमित्त ही कर्म करो।
Hey Kunti Nandan Arjun! The human being is tied with society by performing duties concerned with the social welfare-service other than prayers, worshipping God.
One is subjected to the community (social service, helping the masses), through practice (performance of the deeds other than those performed by him for the sake of Sacrifices, Agnihotr, Hawan, Offerings made in holy fire, Rituals). Therefore, you should be detached-relinquished to perform those duties, prescribed as well as vested.
यज्ञ के अंतर्गत  दान, तप, होम, तीर्थ, व्रत, स्वाध्याय आदि समस्त शारीरिक, व्यवहारिक, मानसिक, पारमार्थिक क्रियाएँ भी आ जाती हैं। ये सब भी यज्ञ ही हैं। कर्तव्य मानकर किये गए व्यापार, नौकरी, अध्ययन जैसे शास्त्र विहित कर्म भी यज्ञ ही हैं। दूसरों को सुख पहुँचाने, उनके हित भी यज्ञ हैं। यज्ञार्थ किये गए कर्म आसक्ति को दूर करते हैं और कर्म योगी के सम्पूर्ण कर्म भी समाप्त हो जाते हैं। ये सभी कर्म मनुष्य को बंधन में नहीं बाँधते, अपितु पूर्व संचित कर्मो से भी प्राणी-मनुष्य को मुक्त कर देते हैं।
साधक को निर्वाह, भोग अथवा ऐश्वर्य बुद्धि की अपेक्षा साधन बुद्धि से ही कर्म करना चाहिए।
सभी वर्णों के कर्म अलग-अलग हैं। जो कर्म एक वर्ण के लिए स्वधर्म है, वही दूसरे वर्ण के लिए परधर्म-त्याज्य है। निष्काम भाव से किया गया कर्तव्य स्वधर्म तथा सकाम भाव से किये गया कर्म परधर्म है। अपनी मुक्ति के लिए किया गया प्रयास-कर्म भी सकाम होने के कारण बंधनकारी है। स्थूल, सूक्ष्म तथा कारण तीनों शरीरों से की गई क्रियाएँ भी संसार के भले के निमित्त होनी चाहियें, अपनी मुक्ति के लिए नहीं। ममता, आसक्ति और स्वार्थ भावना से मुक्त होकर किया गया कर्म बंधन हीन और परहित में है।
स्वार्थ, ममता, आसक्ति, वासना, पक्षपात आदि से रहित शास्त्र सम्मत कर्म उत्साह, लगन, प्रयत्न पूर्वक अपनी पूरी योगता, सामर्थ  तथा आलस्य, प्रमाद का त्याग करके करने चाहिये। बदले में सुख, अमरत्व, निश्चिंतता, निर्भयता, स्वाधीनता आदि की अपेक्षा भी नहीं रखनी चाहिये।
Its not only the sacrifices in holy fire; but-instead all activities like donations, asceticism, chastity, fasting, self study of scriptures-Veds, visiting temples, religious places, holy places-pilgrimage, bathing in holy rivers physically, mentally or dedication for the sake of others, comes under Yagy. Helping-comforting others too are considered to be Yagy. If one perform his duty with dedication with whole hearted efforts, it too turn into Yagy (holy, pious, virtuous, righteous deeds). Deeds performed like a Yagy-Auspicious duty, becomes instrumental in cutting bonds (tied, affections, allurements, attachments, desires). The less the deeds (needs, wants, desires), the closer is the human to the God. Such deeds not only relieve one from the clutches of connections, but release him from the accumulated deeds, as well.
The devotee should perform with out the inclination for earning for him self, comforts or the accumulation-experiencing luxuries. One should utilise-birth as human being, as the opportunity, a means for subjecting himself for the sake of others relentlessly (vigorously, dedicatedly), whole heartedly.
The Varnashram Dharm is different for the different castes. Performing the duties meant for the other caste is not acceptable. The deed performed without attachment (for rewards), is own duty and the endeavour meant for the sake of reward (salary, appreciation, honours, profit) is not own duty. Even the efforts made for the release of self from the cycle of birth and rebirth may turn binding. The activities taken over by any of the three forms of body should be meant for the benefit-sake of others, not meant for the sake of our own release-liberation. Any activity under taken for the help of others without motive, affection, inclination and selfishness, turn into a tool for cutting bonds.
One should perform without selfishness, affection, attachment or taking sides. It should be in accordance with the scriptures. One should utilise his full means, energy, efforts for the sake of others, without prejudice, selfishness, greed; by rejecting laziness, pride-ego. He should not crave for desire (comforts, luxuries, immortality, eternity, freedom from anxiety-worries, fearlessness, independence) etc.
सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः।
अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक्॥3.10॥
प्रजापति ब्रह्मा ने कल्प के आदि काल में यज्ञ-कर्तव्य कर्मों के विधान सहित मनुष्यों (प्रजाओं) को रचकर उनसे कहा कि तुम लोग इस यज्ञ द्वारा वृद्धि करो और यह कर्तव्य-कर्म रूपी यज्ञ तुम लोगों को इच्छित भोग-आवश्यक सामग्री प्रदान करने वाला हो।
At the beginning of his day Brahma Ji created the Humans & specified their duties as well. He issued direction to perform deeds-Yagy etc. to attain the desired-essential goods to survive.
प्रजापति ब्रह्मा जी ने श्रष्टि की रचना की और समस्त प्राणियों के कर्तव्य कर्मो का निर्धारण  किया। इन सब में केवल मनुष्य मात्र ही कर्म करने में सक्षम हैं। शेष योनियाँ भोग योनियाँ हैं। कर्म यज्ञ को निरूपित करता है। द्रव्य, तप, योग, वर्णाश्रम धर्म, निहित और विहित कर्म  केवल लौकिक और पारलौकिक उन्नति के हेतु हैं। मनुष्य जन्म का मूल कारण आत्मा की शुद्धि और परमात्मा में विलय है।
Amongest the various creations of the creator-Brahma Ji, its only the human being who has been blessed with the capability of performing various activities for relinquishing to assimilate in the Almighty. All other organisms, including the divine once are meant for experiencing the outcome, reward or punishment of their deeds, accumulated, by virtue of destiny and the present ones. The deeds have special significance in the charter of Brahma Ji. Deeds described in the scriptures are meant for salvation-purification. One can make efforts to improve his present and future. The reason behind human incarnation is to grant opportunity to achieve assimilation in God.
The stress is over purity of means for earning livelihood for subsistence. All duties, functions including prayers, worship are covered under it.
देवान्भावयतानेनते देवा भावयन्तु वः।
परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ॥3.11॥
तुम लोग इस यज्ञ-कर्तव्य कर्म के  द्वारा देवताओं की आराधना करो और वे देवता तुम लोगों का पोषण करें। इस प्रकार एक-दूसरे को संतुष्ट करते हुए, तुम लोग परम कल्याण को प्राप्त हो जाओगे।
You should satisfy the deities-divinity through various means like Yagy, Yog (Karm, Gyan and Bhakti), sacrifices, offering, prayers, pilgrimage and in turn the deities-divinity shall take care of you, through blessings-vows, nurture, protection, growth-nourishment. In this manner both of you will attain the ultimate satisfaction-welfare.
कोई भी शास्त्र मनुष्य के द्वारा भोगों की हिमायत नहीं करता। मनुष्य को सुख, भोग-विलास, आराम के पीछे नहीं भागना चाहिये। अपितु प्रयत्न पूर्वक दूसरों की सेवा, मदद के लिए तत्पर  रहना चाहिये।  ब्रह्मा जी ने कहा है कि मनुष्य को निःस्वार्थ भाव से कर्तव्य कर्म करने से ही तरक्की की प्राप्ति हो सकती है।
यहाँ देव शब्द ब्रह्मा द्वारा रचित श्रष्टि का द्योतक है, यद्यपि प्रमुख रूप से इसमें देवता, ऋषिगण, पितृगण हीआते हैं। अतः मनुष्य का ध्येय समस्त जीवों का कल्याण है न कि केवल स्वयं-व्यक्तिगत का। यहाँ परस्पर एक दूसरे पर निर्भर रहने और एक दूसरे की सहायता करने की लिए कहा गया है। इसका प्रमुख उद्देश्य प्रकृति का संतुलन कायम रखना है अन्यथा विप्लव-अनावृष्टि, अतिवृष्टि की संभावना बढ़ जाती है।
अधिकार से पहले कर्तव्य आता है। अगर व्यक्ति अपने कर्तव्य-दायित्व का पालन करता है तो अधिकार तो स्वतः प्राप्त हो जाता है। मनुष्य यदि अपने कर्तव्य का पालन करता है तो उसे मुक्ति तो स्वतः मिल जाता है।
None of the scriptures support enjoyment, luxuries-comforts to the human body. One should not roam (follow, chase) behind sensualities (passions, lust, pleasures, comforts) and enjoy-utilise them freely. One must try to help others by all means. The human tendency should be for helping others but not for seeking favours from others. Brahma Ji has said that one should reject selfishness & do his duties for upliftment. Here Dev represents all creations of Brahma Ji. But mainly it covers the humans, deities, saints and the Pitre-Manes. The purpose of human life is to help-co ordinate others and not to look-seek for own welfare-help. Further mutual help and coexistence is stressed. The reason behind this is to maintain the balance of nature failing which disaster is possible, in the form of no rains or excess-torrential rains.
The ultimate welfare is Salvation. One must strive for this.
The survival of humans and the demigods is interdependent. Both are complementary of each other. The demigods showers the accomplishment of desires and the humans in return pray-worship them through Yagy, Hawan, Agnihotr, charity, social service, helping the mankind, asceticism, meditation etc.
Do not rush to help the wicked, vicious, criminals, terrorists, inhuman Muslims. Always help the deserving virtuous, righteous, pious, honest, truthful faithful.
इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः।
तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः॥3.12॥
जीवन की विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाले विभिन्न देवता यज्ञ सम्पन्न होने पर प्रसन्न होकर तुम्हारी सारी आवश्यकताओं की पूर्ति करेंगे। किन्तु जो इन उपहारों को देवताओं को अर्पित किये बिना भोगता है, वह निश्चित रूप से चोर है। 
The demigods-deities will fulfil all desires, needs of the devotee after the completion of the Yagy-sacrifices in Holi fire, by him. But if one enjoys these gifts without offering them to the demigods he is surly a thief.
देवतागण मनुष्यों की इच्छाओं को पूरा करते हैं। इसलिये मनुष्यों को उनकी पूजा यज्ञ, हवन अग्निहोत्र आदि के द्वारा करनी चाहिये। देवतों के निमित्त चढ़ावा अर्पित करना उसकी जिम्मेवारी है। मनुष्य को अपनी जिम्मेवारियों का निर्वाह चाहिये। अर्जुन के लिये यह अनिवार्य था कि वो युद्ध करे। 
The demigods helps the humans in growing food, through rains, various seasons etc., when they perform prayers. They fulfil desires and grant boons. Therefore, one must offer prayers, worship them and offer sacrifices Yagy, in return. Its essential to perform his duties for the humans. It was therefore, essential for Arjun to fight, which was his primary duty as a Kshatriy.
Arjun himself was a divine creation fathered by Dev Raj Indr. Maha Bharat too was a divine design. His appearance over the earth was just to become a tool to eliminate the traitors, tyrants, unjust, unreasonable, whether he agreed or not he was destined to fight and accomplish the job assigned to him. After Maha Bharat he became the Supreme Commander of Narayani Sena and eliminated the cruel, unjust kings who did not participate in Maha Bharat, as was desired by the Almighty.
One is born to carry out one or the other aspect of his destiny. So, he should understand this and act in a virtuous manner to accomplish the job.
यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः।
भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्॥3.13॥
यज्ञशेष (योग) का अनुभव करने वाले श्रेष्ठ पुरुष सम्पूर्ण पापों से मुक्त हो जाते हैं (बचे हुए अन्न-प्रसाद को खाने वाले) और जो लोग केवल अपने लिए ही पकाते हैं अर्थात कर्म करते हैं (अन्न पकाते हैं) वे पापी लोग तो केवल पाप का ही भक्षण करते हैं।
The righteous, who eat the remnant of the sacrifice as Prasad, are freed from all sins; but one who cook for their own sake swallow, eat, engulf only the sin.
कर्तव्य कर्मों का निष्काम भाव से पालन करने पर योग अथवा समता ही यज्ञ शेष के रूप में रहती है। व्यक्ति को अपने अलावा-स्वयं, नाते-रिश्ते, समाज का पोषण करना चाहिए। केवल अपने हित चिंतन की अपेक्षा अन्य व्यक्तियों-समाज की चिन्ता अधिक श्रेयकर है। ऐसा करने से स्वार्थ, ममता, आसक्ति और कामना-फलेच्छा का अंत हो जाता है। किसी प्रकार का बंधन नहीं रहता। पाप नष्ट हो जाते हैं। प्रारब्ध, संचित और वर्तमान कर्म विलीन हो जाते हैं अर्थात प्राणी-मनुष्य को साम्यावस्था प्राप्त होती और वह सनातन ब्रह्म में  विलीन जाता है।
अपने सुख, मंगल, भलाई का विचार रखने वाला तो जाने-अनजाने पाप ही अर्जित करता रहता है और उनका फल भोगता भी है।
When one discharge his duties without any desire, return-expectation, he is left with the virtues (piousity, holiness, equanimity) as the residue of the sacrifices. He is obliged to look after, take care of the family (relatives, society, needy, poor, have nots). Instead of caring for self one should consider the entire group-society for well being (care, help). 
He should increasing the sphere of beneficiaries from self to family, neighbourhood, village, colony, country and the whole world.
This eliminates desires, affections, bonds-attachments, allurements-selfishness. All his sins by virtue of his destiny (sum total of deeds in past life-births), accumulated deeds and the current-present deeds are neutralised-vanishes. He achieves equanimity. He become one with the Ultimate. His identity merges with the Almighty.
On the contrary one who is selfish-thinks of himself only, earns only sins. He is made to undergo the punishment, grief, rigours due to this.
हर व्यक्ति पहले अपनी, फिर घर की और उसके बाद बाहर की सोचता है। एक चिन्तनशील बुद्धिमान मनुष्य को अपने अलावा समाज, देश और संसार की बेहतरी का विचार भी करना चाहिये। वसुधैव कुटुम्बकम्।
One should make endeavours for the upliftment-benefit of all.
अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः।
यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः॥3.14॥
कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम्।
तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्॥3.15॥
सम्पूर्ण प्राणी जीवित रहने के लिये अन्न पर निर्भर रहते हैं, अन्न वर्षा से उत्पन्न होता है, वर्षा यज्ञ से होती है और यज्ञ कर्मों से सम्पन्न होता वाला है। 
All creatures (organism, living beings) subsist on food and food is produced by rains. Rains come from the performance of sacrifice and sacrifice is produced by the performance of prescribed duties.
कर्म समुदाय को तू वेद से उत्पन्न हुआ जान और वेद को अक्षर ब्रह्म-अविनाशी परमात्मा से उत्पन्न हुआ जान। इसलिए वह सर्वव्यापी परमात्मा यज्ञ-कर्तव्य कर्म में सदा ही प्रतिष्ठित है।
The duties for human beings are described in the Ved and the Ved are manifested by God himself. Therefore, the all-pervading Almighty is eternally present in acts of sacrifice.
The Karm-action is cyclic (consequential, chain forming) in nature. The creature (organism, living beings) came forth (were generated) as a result of their Karm-performances in the previous births. The deities, humans all are tied with their present, past and current deeds. The Humans perform Yagy to appease the demigods who in return produce rains. It helps in production of food grain which is used by all creatures for their survival.
Yagy is a form of the deeds (actions, sacrifices, duties, endeavours). The Karm have evolved from the Ved and the Ved were produced by the Almighty for the benefit-sake of humanity. One way or the other, its the Almighty is present in the deeds in one form or the other. The action has evolved from the Par Brahm Parmeshwar, who is Imperishable-all pervading, existing in sacrifice.
जो कुछ भी खाया जाता है, वह अन्न स्वरूप और अन्न से ही बना है। सभी किस्म के प्राणी अपने अस्तित्व के लिये अन्न पर ही निर्भर हैं। इन सबको उत्पन्न होने के लिए जल की आवश्यकता है, जिसका आधार वर्षा है। यज्ञ को समान्य जन केवल हवन-अग्निहोत्र, तप, ध्यान-समाधि ही समझते हैं। वस्तुतः यज्ञ वेदों में परिभाषित समस्त क्रियाओं को व्यक्त करता है। यज्ञ, आहुति, दान-पुण्य, तपस्या सीधे देवताओं को प्राप्त होते हैं, जिसको ग्रहण करके वे वर्षा करते हैं। भारत में ऐसे अनेकों साधु-महात्मा, साधक-संगीतकार, मंत्र-वेत्ता हैं, जो आज भी  बरसात करवाने में समर्थ हैं। कृत्रिम बरसात की तकनीक का ईजाद भी कर लिया गया है और इन सबमें कर्म की प्रधानता है। अध्यापक का पढ़ाना, स्त्री का भोजन बनाना, पूजा-पाठ, ध्यान-संध्या, वैधक-चिकित्सा, नौकरी, व्यापार, खेती-बाड़ी, उद्योग आदि कर्म; यज्ञ के ही रूप हैं। वेद कर्म करने की विधि और उनको करने वालों की व्याख्या करते हैं। क्योंकि परमपिता परमेश्वर सर्वव्यापी हैं, अतः वे कर्म में भी उपस्थित हैं। अतः कोई भी कर्म छोटा-बड़ा-हीन नहीं है। वर्णाश्रम धर्म के अनुसार  समता भाव से, निष्काम, निर्लिप्त, निष्पाप, कामना, ममता-मात्सर्य मुक्त, निर्विकार भाव से कर्म करते जाओ मोक्ष अपने आप मिल जायेगा। 
स्त्रियों के लिए वैवाहिक विधि का पालन ही वैदिक संस्कार-यज्ञोपवीत, पति की सेवा ही गुरुकुल निवास-वेदाध्ययन और गृहकार्य ही अग्निहोत्र-यज्ञ कहा गया है। यह नियम अन्य वर्णों पर लागू नहीं होता ना ही आजकल के लोग इसको मानते हैं, भले ही वह सही हों।
Each and every organism is dependent over food grain for its survival, directly or indirectly. Water is essential for growing food, which is dependent over rains. The common masses consider Yagy to be a form of sacrifice only & restricted them to :- asceticism, meditation, staunch meditation, rituals, pilgrimage, prayers etc. In fact Yagy is symbolic of all the deeds described-defined in the Ved. Ved lays down the procedure (methodology, manner) in which various activities have to be performed. Any activity performed with the desire of helping others, with purity of heart (piousity, virtuousness, righteousness, all sacrifices, prayers) are received by the deities. The deities turn these deeds into rains. India is a place where such people, who are capable of bringing rains, as and when desired, through Mantr Shakti, music, desire are present. The scientists have evolved the technique for artificial rains. All these activities are various forms of Karm (deeds, actions, performances, functions). Any profession (job, endeavour) is just one or the other form of action-Yagy. Teaching, cooking meals by the women, agriculture, warfare, health care, road building etc. are deeds. No deed is small or big, honourable or disgraceful (except criminal offences, vices, wretchedness, sins, terrorism). Ved are the origin-source of all actions-nature. The Almighty is present in each one of us. He is all pervading. Therefore, the deeds-actions too are the embodiment of the Ultimate. 
One who perform relentlessly, detached, relinquished, with equanimity, attains Salvation (Liberation, Assimilation, emancipation) in the God, just by performing his duties according to Varnashram Dharm.
एवं प्रवर्तितं चक्रं  नानुवर्तयतीह यः।
अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति॥3.16॥
हे पार्थ! जो पुरुष इस प्रकार लोक में इस प्रकार, परम्परा से प्रचलित सृष्टि चक्र के अनुकूल-अनुसार नहीं चलता-कार्य नहीं करता, वह इन्द्रियों द्वारा भोगों में रमण करने वाला अधायु-पाप मय जीवन बिताने वाला मनुष्य संसार में  व्यर्थ ही जीता है।
Hey Parth! One who do not follow-function according to the cycle of evolution, due to indulgence in sensual pleasures (passions, sensualities, comforts, lust) is a sinner; living in vain. His life is of no use.
भगवान् जब अर्जुन को पार्थ कहकर सम्बोधित करते हैं तो वे उन्हें याद दिलाते हैं कि उनकी माँ कुन्ती ने अपने कर्तव्य के निर्वाह में जीवन भर कष्ट झेले हैं। जिस कर्म को अर्जुन घोर कर्म कह रहे हैं, वो तो महज यज्ञ-कर्तव्य है, जो कि सृष्टि क्रम के अनुकूल है। रथ का पहिया सृष्टि चक्र को प्रदर्शित करता है और यदि उसमें जरा सा भी खोट-खराबी उत्पन्न हो जाये तो वह परेशान करने लगता है अर्थात रथ का चलना बन्द हो सकता है। शरीर और संसार प्रकृति के ही रूप हैं। जब मनुष्य कामना, अहंता, ममता, आसक्ति का त्याग करके अपने कर्तव्य का पालन करता है, उससे पूरी सृष्टि को सुख पहुँचता है। इन्द्रियों को सुख भोग के लिए वाला सृष्टि क्रम में बाधक, पशु के समान और पापी माना गया है। ऐसा व्यक्ति हिंसा, स्वार्थ, अभिमान और भोग से मुक्त हो ही नहीं सकता। इस प्रकार के व्यक्ति को प्रभु द्वारा पापी-चोर कहा गया है।
When Bhagwan Shri Krashn address Arjun as Parth, he reminds him of the difficulties faced by his mother Kunti, for carrying out her duties throughout the life. Arjun too is supposed to carry out, his duties as a Yagy, as an essential component of the cycle of evolution, which he is considering as terrible (frightful, violent, vehement, harsh, extreme, intense, taboo). Evolutionary process is like the wheel of the chariot, which does not move or create jerks, if damaged. Human body and the world are the components of nature. When an individual acts by rejecting desires (affections, allurements, ego) the whole world (nature) feels the pleasure. On the contrary one who indulges in bodily comforts (pleasures, sensualities, sexuality, passions) create hindrances in the natural cycles-processes and is considered to be a sinner. One with these tendencies can not become free from violence, selfishness, pride, ego and suffering. Bhagwan Shri Krashn equate these people with the thief-sinner.
One who is born will die. One who commit sin will go to hell. Cause & effect are the essential components of evolution and are cyclic in nature. If one preform he gets outcome. Do not give up, face the trouble and achieve success.
यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः।
आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते॥3.17॥
परन्तु जो मनुष्य आत्मा (अपने आप) में ही रमण करने वाला और आत्मा में ही तृप्त तथा आत्मा (अपने आप) में ही सन्तुष्ट है, उसके लिए कोई भी कर्तव्य नहीं है।
One who is content (self centred, satisfied, rejoices) in him self, nothing is left to be done.
अपने कर्तव्य कर्म में लीन मनुष्य के द्वारा सिद्धि सहज ही प्राप्त कर ली जाती है। रति और प्रीति (काम वासनाएँ) मनुष्य में सदा नहीं रहतीं। ये न तो कभी पूर्ण होती हैं और न ही कभी निरंतर बनी रहती हैं। इनकी तृप्ति-संतुष्टि सदा के लिए नहीं होती। आसक्ति, कामना, अपूर्ण इच्छाएँ दुःख का मूल हैं। कर्म योगी की प्रीति, रति, तृप्ति और संतुष्टि में कभी कमी नहीं आती (काम देव की दो पत्नियाँ हैं, प्रीति और रति)। उसका परम उद्देश्य परमात्मा की प्राप्ति है, चाहे मार्ग कोई भी क्यों न हो :- कर्म, ज्ञान या भक्ति। इस उद्देश्य की प्राप्ति के उपरान्त बचा ही क्या?! कर्म योगी निस्वार्थ भाव से संसार की सेवा करता है। जैसे गँगा जल से माँ गँगा का पूजन किया जाता है, वैसे ही प्रकृति-संसार से प्राप्त शरीर, मन, इन्द्रियों, बुद्धि और अहम् को संसार की सेवा में लगा देने से चिन्मय स्वरूप ही शेष रह जाता है अर्थात उसके लिए कोई भी कर्तव्य शेष नहीं है।
One who is devoted to his duties-work, achieves contentment-satisfaction soon. Desire for Rati-sex and Preeti-love do not remain for ever. (Rati and Preeti are the two wives of Kam Dev-deity of passions, sex & love). Either he becomes incompetent or bored (disinterested, even disheartened) & reject it forever. These two activities are not for ever. In fact saturation is very-very rare. Attachment, unfulfilled desires, always lead to frustration, pain, sorrow, grief. The Karm Yogi never face these problems of frustration (pain, sorrow, grief). The target-aim of the Karm Yogi is Assimilation in God whatever may the way (route, method, means) be :- Karm, Gyan-enlightenment or Bhakti Yog. If the Ultimate is realised then, what is left to be attained?! Karm Yogi perform his duties without motive-selfishness. The way-manner in which Ganga Jal is used to pray-worship Maa Ganga, the same way the dutifulness-dedication in serving the society-world by making use of the limbs, body, intelligence, brain, heart, innerself leads to achievement of enlightenment. Thereafter, nothing is left to be achieved, nothing is left to be done.
Equanimity, self satisfaction, social welfare, helping others in them selves are components of devotion leading to emancipation, Salvation, Liberation, Assimilation in the Almighty.
नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन।
न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः॥3.18॥
उस कर्म योग से सिद्ध हुए महापुरुष का इस विश्व में न तो कर्म करने से कोई प्रयोजन रहता है और न कर्मों के न करने से ही कोई प्रयोजन रहता है। समस्त प्राणियों में किसी भी प्राणी के साथ उसका बिलकुल भी स्वार्थ का संबंध नहीं रहता।
The Karm Yogi becomes relinquished-detached breaking all bonds (ties, relations). He is free from selfishness (interest, motive) with any creature-organism.
प्रत्येक मनुष्य में कुछ ने कुछ करने की प्रवृति होती है। यह प्रवृति उसमें लालसा, पाने, बनने, तरक्की की इच्छा पैदा करती है। इस इच्छा की निवृति के लिए भी कर्म अनिवार्य है। कर्मयोगी निवृति के लिए निस्वार्थ भाव से कर्म करता है। उसको यह ज्ञात है कि पदार्थ, शरीर, इन्द्रियाँ, अन्तःकरण आदि व्यक्तिगत नहीं हैं। इनके माध्यम से उसे केवल संसार के लिए कर्म करना है। अगर वह कुछ भी अपने लिए इस्तेमाल करता है तो अशांति होती है। अगर वह पदार्थ, शरीर, इन्द्रियाँ, अन्तःकरण को अपना व्यक्तिगत मानेगा तो प्रमाद, आलस, आराम, आदि तामस प्रवृतियों का शिकार हो जायेगा। परन्तु क्योंकि वह सात्विक, सुख से ऊपर उठ चुका है, वह तामस प्रवृतियों का शिकार हो ही नहीं सकता।
Each and every one is born with the desire-tendency to do achieve-something. One has to resist these intentions (motives, interests). He has to act to overcome the initiative within him. He will make efforts to do this without selfishness. His body, possessions, sense organs and the innerself are meant for the service of the mankind-world. If he consider them to be his own, he will suffer from laziness, tiredness, need for comfort-rest, which are tendencies, which will drag him to darkness (ignorance, hells). But being a Karm Yogi, he has overcome all these and will detach from the them, without motive.
One is destined to undergo the impact of his deeds till they last to qualify him for Salvation. Bhagwan Shri Krashn awarded Gau Lok to HIS teacher-Guru Sandeepan but asked him to stay back till the impact of all his deeds was over-neutralised.
संतोषी सदा सुखी। 
तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर।
असक्तो ह्याचरन्कर्मपरमाप्नोति पुरुषः॥3.19॥
इसलिए तुम निरन्तर आसक्ति से रहित होकर सदा कर्तव्य (कर्म) को भली भाँति आचरण करो, क्योंकि आसक्ति से रहित होकर कर्म करता हुआ मनुष्य परमात्मा को प्राप्त हो जाता है।
One must perform his duties without attachment to achieve (to assimilate, immerse in the God) the Almighty. 
अपने स्वरूप से विजातीय जड़ पदार्थों के प्रति आकर्षण को आसक्ति कहते हैं। आसक्ति ही पतन का कारण है, कर्म नहीं। जड़ता से आसक्ति पूर्वक बना सम्बन्ध ही बार-बार लगातार जन्म-मरण का कारण है। आसक्ति निरंतर बनी रहती है, जबकि कर्म निरन्तर नहीं रहते। नितन्तर आसक्ति रहित रहते हुए जो विहित कर्म सामने आ जाये, उसे कर्तव्य समझकर कर देना चाहिये। निस्वार्थ भाव से अपने दायित्य का निर्वाह और अपने स्वार्थ का त्याग करके किये गए कर्म को कर्तव्य माना जाता है। अन्य लोगों की शास्त्रोक्त (न्याय-संगत युक्त) माँगों को पूरा करना चाहिए, जिसकी सामर्थ हमारे अन्दर है। परहित को ही कर्तव्य मानना चाहिए। कर्तव्य का पालन करने के लिए व्यक्ति स्वतंत्र है। आलस, प्रमादवश बुरे कार्य करने का अभ्यास (आदत) होने के कारण कर्तव्य पालन में मनुष्य कठिनाई महसूस कर सकता है, अन्यथा कर्तव्य सुगम (सरल) है। परिस्थिति भी कर्तव्य और कार्य क्षमता का निर्धारण करती है। कर्तव्य कर्म उत्साह पूर्वक (सावधानी, तत्परता, ध्यान, लग्न से, मेहनत पूर्वक) विधि अनुसार करना चाहिए। वर्णाश्रम धर्म, प्रकृति-स्वभाव, परिस्थिति जन्य कर्म शास्त्र विहित हैं। अवसर-समय आने पर यही कर्म सहज-सुगम  हो जाते हैं। सहज कर्म में कोई दोष हो तो भी उनका त्याग नहीं किया जाता। अर्जुन को अपने सम्बन्धियों से सहज कर्म युद्ध भी घोर कर्म दिखाई दे रहा है। अतः आसक्ति का त्याग जरूरी है।
कर्मयोगी सेवा करके घटनाक्रम, वस्तुओं, व्यक्तियों से विमुख हो जाता है और उसे कर्त्वाभिमान भी नहीं होता। कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग कोई भी मार्ग चुना जाये, पहुँचना तो वहीं परमात्मा के पास है, जो कि अनासक्ति के बगैर सम्भव नहीं है।
Attraction towards-with the stationary (inertial, rigid bodies) is attachment (bonding). Attachment is the true cause of down fall. It leads to reincarnation (rebirth). One should perform without attaching himself with the event (deed, happening), considering it as his duty. Carrying out of deeds without selfishness (motive, interest, desire) is duty. One should help others-genuine, deserving people  if he is competent (capable) and the desired help is in accordance with the scriptures. It should be logical (judicious, reasonable). One is free to carry out his duties-discharging, his liabilities. Laziness, intoxication, bad company, bad habits, may not permit one to carryout, discharge his inherit duties; otherwise its easy to perform the job assigned to him (accepted by one). Situation may interfere (create hurdles) with discharging one's duty. Duties have to be performed with interest, care, spirit, concentration, properly by adopting procedures (proper methodology). Varnashram Dharm, performances related to one's nature and the situation are in accordance with scriptures. It become easy to carry out these duties. These deeds which are a part of nature-habit performed with ease should not be rejected. Arjun was trying to run away from war, which was quite easy for him, since he had to fight the near and dear. Attachment to the relatives must be discarded-dumped. Rejection-relinquishing the attachments became essential. The Karm Yogi isolate him self from the deed, situation, events, happenings after rendering his services. He is not troubled by pride (ego, misconception). What ever way-path, he choose, he reaches the Ultimate-the Almighty, if he generate detachment.
One keep on travelling in a train till his destination comes. He interact with co passengers, helps them without the desire for thanks or any thing in return. Similarly, our destination is the abode of the Almighty. Why should we have attachment for the places, relations, deeds which comes in between & leave-vanish?! Let us just do our duty and let every thing to HIM.
कर्मणैव हि संसिद्धिमा स्थिता जनकादयः।
लोकसंग्रहमेवापि संपश्यन्कर्तुमर्हसि॥3.20॥
राजा जनक जैसे अनेक महापुरुष भी आसक्ति रहित कर्म (कर्म योग) द्वारा ही परम सिद्धि को प्राप्त हुए थे, इसलिए तथा लोक संग्रह को देखते हुए भी तुम्हें निष्काम भाव से कर्म करना ही उचित है।
Many renounced-great people like renounced-renowned king Janak, attained Salvation by means of Karm Yog, performing their duties without the desire of reward. You should perform your duty without motive-smearing, in view of the large gathering in the battle field.
RENOUNCED :: त्यागी, विरक्त, छोड़ना; miss, quit, discard, renounce, relinquish, forsake, forgo, reject, give up, leave.
जितेन्द्रिय-निर्लिप्त राजा जनक ने गृहस्थ और राज्य धर्म राज्य पालन करते हुए भी मोक्ष प्राप्त  किया था। उनसे पहले, वैवस्वत मनु, इक्ष्वाकु आदि भी कर्म योग का अनुसरण करते हुए, परम पद को प्राप्त कर चुके हैं। यहाँ कर्म बन्धन-आसक्ति से मुक्ति की प्रधानता है। विवेक का आश्रय लेकर मनुष्य जड़ कर्मों से मुक्ति  पा लेता है। लोक रंजन-दिखावे के लिये किया गया कर्म-कर्तव्य व्यर्थ जाता है। मनुष्य लोक की, उसमें रहने वाले प्राणियों की और शास्त्रों की मर्यादा के अनुसार समस्त कर्तव्य-आचरण का होना लोक संग्रह है। कर्मयोग मुक्ति का साधन है और इसके पालन से परमसिद्धि प्राप्त होती है, यह आदर्श उदाहरण अर्जुन को युद्ध के लिये प्रस्तुत करने के लिए कहा गया है।
Raja Janak-the relinquished has been cited-quoted for the Salvation achieved by him in spite of being a household and an emperor, by virtue of his performing the Varnashram Dharm-duties. He had over come all desires and controlled his sensuality-passions. Prior to him Vaevasvat Manu and Ikshvaku etc., had attained the Ultimate position (Assimilation, Liberation, Salvation), through carrying out their duties-functions religiously. In all these cases detachment and equanimity prevailed. Utilisation of prudence helps one eliminating the root (basic, inertial) deeds which prevent breaking of bonds (connections, relations, ties) with the world. The detachment for the sake of demonstration (illustration, hypocrisy, dissimulation) goes waste. The actions (deeds, performances) according to the scriptures and the organisms prevailing over the earth is utilitarian-useful. This paves for Salvation. Arjun should become an ideal (role model) for the common masses.
The Almighty had taught this to Bhagwan Sury as well, earlier. Bhagwan Ved Vyas sent his son Sukh Dev Ji Maha Raj to seek enlightenment to relinquished king Janak. One can easily become enlightened while performing his daily routine, family life, Varnashram Dharm, discharging social liabilities-obligations.
यद्यदाचरति श्रेष्ठस् तत्त देवेतरो जनः।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥3.21॥
श्रेष्ठ पुरुष जैसा-जैसा आचरण करता है, अन्य पुरुष भी वैसा-वैसा ही आचरण करते हैं। वह जो कुछ प्रमाणित कर देता है, समस्त मनुष्य-समुदाय उसी के अनुसार बरतने-आचरण करने लग जाता है।
Common masses (citizens, general public, civilians) start copying the behaviour (character) of the renounced (great, honourable personalities, in this era film stars, imposters) people in the society. Whatever he says (talks, explain, illustrates, proves) becomes code of conduct and people start working  (copying him) on those lines.
समाज में श्रेष्ठ व्यक्तियों के अनुयायी स्वतः बन जाते हैं। आज के समय में धनवान को श्रेष्ठ समझ लिया जाता है। राजनीति, फिल्म, व्यापार, व्यवसाय आदि में जो व्यक्ति आगे है, वो अनुकरणीय है, ऐसा लोग मानते हैं। उसकी नकल शुरु कर देते हैं। श्रेष्ठ वो है,  जिसका आचरण, मर्यादा, आचार-विचार, व्यवहार शुद्ध हों। जो मनसा, वचना, कर्मणा प्रभु के आधीन हो। स्वयं से संतुष्ट और ललक-लालसा रहित हो। जिसका तन-मन-धन समाज के अर्पण हो। जिसके भाव-भंगिमा शुद्ध, अनुकरणीय हो। जो अपने वर्णाश्रम धर्म में प्रतिष्ठित हो। जो एक आदर्श पुरुष हो। जो व्यक्ति समाज को सही राह  दिखाने वाले होते हैं, वो समाज के लिए ही जीते हैं। ऐसे लोग सज्जन-सच्चे और ईमानदार होते हैं। उन्हें अपने तारीफ या बुराई से कुछ लेना देना नहीं है। काम,  क्रोध, मद, लोभ, मोह, तृष्णा से दूर होते हैं। कर्तव्याभिमान तो उन्हें छू भी नहीं सकता। वो दिखावा-छलावा नहीं करते अपितु, कार्य, कर्म-कर्तव्य का पालन करते हैं। अध्यापक, गुरु, प्रवचनकर्ता, ज्ञानी, विद्वान, नेता, अभिनेता, शासक, कथावाचक, पुजारी, आचार्य, महन्त, व्याख्यान देने वाला आदि को बड़ी सावधानी-सादगी से स्वयं को समाज में प्रस्तुत करना चाहिए। बनावट से दूर रहना चाहिए। "पर उपदेश कुशल बहुतेरे" यह एक प्रसिद्ध कहावत है। उनकी कथनी और करनी में अन्तर नहीं होना चाहिये। उनकी रूचि भौतिक उन्नति में न होकर आध्यात्मिक, पारमार्थिक उन्नति में होनी चाहिए। जो काम वह दूसरों के लिए उचित नहीं समझते,  उसे तो वह स्वप्न में भी ना करे। 
आज जमाने में जिसके watts app और Facebook पर followers ज्यादा हैं, उसे बहुत अधिक जनप्रिय मानकर बढ़ा-चढ़ा कर उसकी तरीफों के पुल बाँध दिये जाते हैं, भले ही वो डोनाल्ड ट्रम्प ही क्यों न हो!
आज के वक्त में ढोंगी, दुराचारी, पाखण्डी, लोलुप व्यक्ति को ही आम जनता अपना आदर्श मान लेती है। गन्दी, दुष्चरित्र व्यक्ति राजनीति, व्यवसाय, फिल्मों में कामयाबी के शिखर पर पहुँचकर नादानों को भटकाने के लिये पर्याप्त हैं। 
Please refer to :: THE SAFFRON CLAD-IMPOSTORS पाखण्डी-ढ़ोंगी GOD MAN bhartiyshiksha.blogspot.com
Visually successful person, is a role model-an ideal person in the society these days. He has a stream of followers from all walks of life. In today's world one who is rich, ahead of others in one or the other field is considered to be great. People start copying the politicians, film stars, business man and industrialists too quickly. What they see is seldom true. Now a days, people and blindly following Bageshwar Baba, a boy of 26 and the other one distributing Rudraksh.
Renounced-great-people never show artificial behaviour. Their functioning, behaviour, ideals are honest (pure, pious, virtuous, righteous). They are God fearing-devoted to God. They are under the shelter (asylum, protection, shelter) of the Almighty. Their looks (thoughts, ideas, perception are good, impressive. They act-work according to their Varnashram Dharm and carry out their duties with devotion dedication. They are free from personality defects like anger, sex-lust, ego-intoxication, desires-allurements. They are free from deception. Teacher, preacher, enlightened, narrator, leader, film personality, emperor-Prime Minister etc., all have to be extremely careful in discharging their duties. They should preach what they practice. There should not be a difference between what they say and what they do (practice, preach).They should be interested in the well being of others. They should not imagine of doing what they do not like for themselves.
यथा राजा तथा प्रजा। कांग्रेस के शासन ने देश में भ्रष्ट आचरण वालों की बाढ़ ला दी। अब मोदी है तो उसके दुश्मनों की सँख्या भी उतनी ही है। मगर उसके आचरण ने उसके चाहने वाले, अनुसरण करने वाले ज्यादा पैदा किये हैं। अगले वर्ष चुनाव हैं। परिणाम भले ही कुछ भी हो मगर वो अपने समकक्ष-समकालीन राजनेताओं में श्रेष्ठ होते भी मतों की राजनीति और लालचवश आरक्षण वादियों के साथ खड़ा  वर्णाश्रम धर्म के विरुद्ध  SC?ST ACT को जारी रखने पाए आमदा है। 
वह पैंशन धारकों, सरकारी कर्मचारियों, मध्यम वर्ग, स्वर्ण का बेड़ागर्क करने पर आमदा है। वह तो यह भी नहीं जानता कि कांग्रेस को सत्ता से हटाने वाला सरकारी कर्मचारी ही था, जिसने चुनाव में ईमानदारी को खूँटी पर टाँग कर बगैर पड़े हुए वोट जनता पार्टी की झोली में डाल को दिये। 
न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किंचन।
नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि॥3.22॥
हे पार्थ! मेरा इन तीनों लोकों में न तो कुछ कर्तव्य है और न कोई भी प्राप्त करने योग्य वस्तु अप्राप्त है, तो भी मैं कर्तव्य-कर्म में ही लगा रहता हूँ।
Hey Parth! I have nothing whatsoever to achieve  or liability in the three worlds earth, heaven & the nether world), nor is there anything to be be attained; still I am busy performing my duty (as a creator, nurturer, destroyer).
अनन्त ब्रह्माण्डों में व्याप्त परमेश्वर को तीन लोकों में अपने लिए कोई कर्तव्य कर्म, प्राप्त करने-धारण करने को कुछ भी शेष नहीं है। फिर भी वे प्रजाजनों की रक्षा, पालन-पोषण में लगे रहते हैं। उनका अवतार पापियों के नाश, साधु जनों की रक्षा और धर्म की रक्षा-संस्थापना के लिए होता है। क्योंकि मनुष्य शरीर में शरीरी-आत्मा का निवास है और आत्मा परमात्मा का रूप है, इसलिए मनुष्य को भी अपने लिए (व्यक्तिगत, स्वार्थ सिद्धि) कोई कर्तव्य-कर्म शेष नहीं है। कर्मयोग से सिद्ध हुए महापुरुष जो कि रति, प्रीति, तृप्ति और संतुष्टि प्राप्त कर चुके हैं, के करने को भी कुछ शेष नहीं है। फिर भी वे लोक संग्रह के लिए ही कर्तव्य-कर्म करते हैं।
परमात्मा उत्साहपूर्वक, तत्परता से, आलस्य रहित होकर, सावधानी पूर्वक, सांगोपांग कर्तव्य-कर्मों को करते हुए न तो उनका त्याग करते हैं और न ही उपेक्षा।
The Almighty has nothing to receive-achieve from the three abodes viz. earth, heaven and the Patal-Nether world. HE is pervaded in the infinite Universes. HE has no liability-activity to be performed and still he takes incarnations to perish-destroy the sinner and protect the virtuous-sages. HE establish the Dharm and protects it. The man has the soul in his body which is nothing but the fraction-component of the Almighty HIMSELF. So, the humans too don't have any thing to achieve or perform for them selves. Karm Yog purifies the great souls who are content with comforts and don't have any thing to do. Still they keep on doing for the welfare of others-society. They are dedicated for the benefit of others.
The Almighty keep on doing whole heartedly, energetically, carefully, without laziness, for the welfare of his creations. HE neither sacrifice the Karm (deeds, endeavours) nor discard them.  HE is just neutral to them.
The Sun, Moon, Constellations keep on revolving in the sky continuously.
यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥3.23॥
उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम्।
संकरस्य च कर्ता स्यामु-पहन्यामिमाः प्रजाः॥3.24॥
क्योंकि हे पार्थ! यदि मैं किसी समय सावधान होकर कर्तव्य कर्म न करूँ तो बड़ी हानि हो जाए, क्योंकि मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं। इसलिए यदि मैं कर्म न करूँ, तो ये सब मनुष्य नष्ट-भ्रष्ट हो जाएँ और मैं वर्ण संकरता को करने वाला होऊँगा तथा इस तरह समस्त प्रजा को नष्ट करने वाला बनुँगा।
Hey Parth! If I fail to deliberate (discharge my duties, functions) carefully (attentively), it may lead to big loss-disaster. Hence, if I do not act (function, perform), the life (humans & other creatures) will be destroyed (eliminated) and I will become the propagator of hybridisation (mixing of blood, races, castes, religions, faiths,cultures) & impurity.
परमात्मा अपना दायित्व पूर्ण निष्ठा और ईमानदारी-जबाबदेही के साथ निभाते हैं। इस कर्म में आलस्य-प्रमाद नहीं हैं। तत्परता है, कर्मों से सम्बन्ध विच्छेद हो जाता है, शिथिलता नहीं है। कामना, अपूर्णता, उपेक्षा, आलस्य-प्रमाद, शिथिलता कर्मों से सम्बन्ध-विच्छेद नहीं होने देते। मनुष्य वही है जो कि परमात्मा के इन गुणों को ग्रहण कर उनका अनुसरण करता-चलता है। वस्तुतः परमात्मा ने इहलोक और परलोक में रहने के लिए मनुष्य के समक्ष आदर्श प्रस्तुत किया है। महापुरुष पारमार्थिक-कल्याण मार्ग का ही अनुसरण करते हैं।
परमात्मा अपने लिए कुछ भी न चाहने के बावजूद कर्म करते हैं। अगर परमात्मा कर्म ने करें तो यह ब्रह्माण्ड नष्ट-भ्रष्ट हो जाये। अर्जुन ने कहा था कि युद्ध के परिणाम स्वरूप स्त्रियाँ विधवा हो जाएँगी और वर्ण संकरता फैलेगी। परन्तु यहाँ परमात्मा स्पष्ट कर रहे हैं किअगर वे कर्म नहीं करेंगे तो वर्ण संकरता फैलेगी। अगर अत्याचारी (दुराचारी, आतताई, अपराधी) को रोक दिया जाता है, तो वर्ण संकरता की नौबत आएगी ही नहीं। 
The Almighty completes his task of Creation, Nurture and Destruction with responsibility-carefully. There is no place for laziness (intoxication, frenzy). Readiness to act detaches the doer from the impact of bonds-ties evolved due to the performance of a certain deed. There is no place for sluggishness-delay. Desires, incompetence, negligence, laziness, intoxication-ego, do not let the bonds to break from this material, physical world. One is a true human, if he accept these characteristics-qualities of the God. Great men follow the path of helping others. In fact the Almighty has built up, nurtured (developed) an ideal path-model for the humans to follow. Though the Almighty does not need any thing for HIMSELF, yet HE works for the welfare of the humans. HIS incarnations are meant for the sanctity of the creatures evolved out of HIM. In case, HE stops doing this, the whole universe will perish. Arjun argued that the women will become widow as a consequence of war and indulge in immoral activities-moral turpitude, leading to mixing of blood, birth of illegitimate children. The Almighty answers that hybridisation-infidelity results only when the public will not be protected from the atrocities (tyranny, oppression, wickedness, moral turpitude, harassment of the rulers, terrorism) of the rulers (emperors, kings).
As a matter of fact the subjects have a lot of time during this era. They make use of it in leisure, vulgar activities. The internet keep them tied to sexual acts. The outcome is clear-breaking families, impotency, infidelity, lust etc.
Russia, North Korea, China, Pakistan, Iran and Afghanistan are bent upon creating disorder. They must be crushed at once.
सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत।
कुर्याद्विद्वांस्तथासक्त श्चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम्॥3.25॥
न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम्।
जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तः समाचरन्॥3.26॥
हे भारत! कर्म में आसक्त हुए अज्ञानीजन जिस प्रकार कर्म करते हैं, आसक्ति रहित तत्वज्ञ विद्वान-महापुरुष भी लोक संग्रह करना चाहता हुआ, उसी प्रकार कर्म करे। सावधान तत्वज्ञ महापुरुष-ज्ञानी शास्त्र विहित कर्मों में आसक्ति वाले अज्ञानियों की बुद्धि को भ्रमित न करे, अपितु-प्रत्युत स्वयं शास्त्र विहित समस्त कर्मों को भली-भाँति करता हुआ, उनसे भी करवाए।
Hey Bharat! The unattached who has acquired the basic knowledge, extract-gist of Yog-Karm, Gyan, Bhakti & the Ultimate; should perform his duties-deeds normally, just like the ignorant who is dedicated-devoted to work, for the sake of upliftment (betterment, welfare) of the society. The alert-enlightened who has acquired the gist-understanding of the Varnashram Dharm-duties should not confuse the attache-common masses; in stead he should perform the Varnashram Dharm himself and let others (ignorant, deluded) follow him.
जिन सामान्य लोगों को पूरा विश्वास है कि शास्त्र, शास्त्र पद्धति और शास्त्र विहित कर्मों का फल अवश्य मिलता है, वे न तत्वज्ञ हैं और ना ही दुराचारी, बस उनकी कर्मों, भोगों में आसक्ति है। उनके आलावा ऐसे भी लोग हैं, जो शास्त्रों के ज्ञाता तो हैं, मगर आसक्ति होने के कारण अज्ञानी-अविद्वान कहे गए हैं। वे शास्त्रज्ञ तो हैं, परन्तु तत्वज्ञ-मर्मज्ञ नहीं। क्योकि वे केवल अपने लिए ही कर्म करते हैं, इसलिए अज्ञानी कहे गए हैं। फिर भी वे कर्मों में प्रमाद, आलस्य न करके तत्परता, साधनी से सांगोपांग विधि से कर्म करते हैं, क्योंकि वे सोचते हैं कि ऐसा न करने पर फल में कमी रह जायेगी।
भगवान् ने इसे आदर्श मानकर सर्वथा आसक्ति रहित तत्वज्ञ विद्वान को भी लोक संग्रह के लिए इसी विधि से कर्म करने की प्रेरणा दी है। परमात्मा में भक्ति, प्रेम रखने वाला आसक्त विद्वान कामना, ममता, आसक्ति, वासना, पक्षपात, स्वार्थ को  सर्वथा त्याग चुका है। वो तत्वज्ञ है।
श्रेष्ठ मनुष्य के सभी यज्ञ-कर्म, मर्यादा को सुरक्षित रखने के लिए होते हैं। उसकी रति परिमात्र के हित में होती है। उसका अन्तःकरण लोकहित-लोक संग्रह का भाव रखता है। ऐसा तो केवल दूसरों को दीखता है, वस्तुतः वह इसको भी दिखाना नहीं चाहता। हम उसे आदर्श कहते हैं, परन्तु वह स्वयं को भगवान्, शास्त्रों, वर्णाश्रम धर्म का अनुयायी कहता-मानता है। वह सावधानी पूर्वक कर्म-आचरण से ऐसा व्यवहार करता है कि अन्य लोगों में बुद्धि भेद-भ्रम  पैदा न हो। तत्वज्ञ और भगवान् दोनों में ही कर्तव्याभिमान नहीं है। वे लोगों को उन्माद से हटाकर सन्मार्ग पर लगाते हैं।
Hey Bharat! The unattached who has acquired the basic knowledge (extract, gist) of Yog-Karm, Gyan, Bhakti  & the Ultimate; should perform his duties-deeds normally, just like the ignorant who is dedicated-devoted to work, for the sake of upliftment, betterment-welfare of the society. The alert-enlightened who has acquired the gist-understanding of the Varnashram Dharm-duties should not confuse the attached-common masses; in stead he should perform the Varnashram Dharm himself and let others (ignorant) follow him.
Those who have faith in the reward of the deeds are neither aware of the gist of Varnashram Dharm (scriptures) and the procedures laid down in the scriptures, nor are they wicked. Other than them there are the people who knows-understand the scriptures but addicted to the deeds with motive-interest. They are learned but ignorant of the gist (nectar, elixir, truth) of the scriptures, since they perform for their own sack, welfare, benefit that's why, they are called ignorant. Still, they perform the deeds with full care (procedure, methodically) without laziness actively (smartly, quickly), since they assume that some deficiency will remain if they are not dedicated-devoted to them.
Please refer to ::
(1). THE GIST OF ENLIGHTENMENT तत्व ज्ञान :: santoshhindukosh.blogspot.com 
(2). THE GIST OF THE ULTIMATE परमात्म तत्व ::  santoshhindukosh.blogspot.com 
The Almighty has considered it to be ideal and asked the enlightened to perform through this means-manner for the sack of the society. The relinquished-enlightened has detached from desires (affections, attachments, lust (sensuality, sensibilities, passions), favours, selfishness, individuality) completely. They are the people who have acquired the gist (basics, roots, theme, truth) reasons behind the evolution of the universe and the humans.
The deeds of the great man are meant for the sake of protection of ideals. His involvement is for the benefit of others. His innerself is  concentrated to the help of the entire population. It appears-visible to others, though in fact he do not wish to be noticed. We call-consider him to be ideal but he considers him self to be the follower of the Almighty, Varnashram Dharm and the scriptures, Ved. He is careful in behaving-performing so that the public is not confused. The one who has acquired the gist-enlightenment and the Almighty both are free from the ego-pride of doing-performing. They divert the frenzy of the common masses and shows them, the right (virtuous, righteous, pious) path.
Kapil Muni an incarnation of God was redirected to family life by Dev Raj Indr and a pious virtuous Brahmani dedicated to her husband. He followed the verdict and performed all essential acts and then later subjected himself to rigorous ascetics-Tapasya.
प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः।
अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते॥3.27॥
सम्पूर्ण कर्म, सब प्रकार से प्रकृति के गुणों द्वारा किए जाते हैं, तो भी अहंकार से मोहित अन्तःकरण वाला अज्ञानी 'मैं कर्ता हूँ', ऐसा मान लेता है!
The deluded, considers him to be the doer and suffers from the ego-pride of having done it, though all actions-deeds are performed by the nature (a component of the Almighty), since the human body too is a component of nature. 
प्रकृति के द्वारा संसार और सभी प्रणियों का संचालन होता है, तथापि मनुष्य अहंकार से मोहित ज्ञान वश होने वाली क्रियाओं को अज्ञान वश अपने द्वारा की जाने वाली मान लेता है। अहंकार अन्तःकरण की एक वृति है, जिसे मूढ़ता वश मनुष्य स्वयं का स्वरूप समझने लगता है। किसी कार्य-कलाप गतिविधि में अपनी सत्ता मान लेना मनुष्य का स्वभाव है। वास्तविक अहम्  विस्मृत तो हो सकता है, परन्तु मिट नहीं सकता। स्वयं को शरीर मान लेना अवास्तविक अहम् है, जो कि विस्मृत किया जा सकता है। इसके ऊपर विवेक-विचार पूर्वक ही काबू पाया जा सकता है। व्यक्ति का संसार के अतिरिक्त स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है। शरीर को प्रकृति से भिन्न अपना मान लेने से अहंकार वश कमनाएँ पैदा होने लगती हैं। कर्तव्याभिमान कभी कल्याणकारी हो ही नहीं सकता। विवेक के सहारे से साधक कर्तव्याभिमान पर विजय प्राप्त कर तत्व ज्ञान हासिल के सकता है।
All actions-activities in this universe are performed by the nature, though the deluded overcome by the ego-pride, considers himself to be the doer. Ego-pride, imprudence is a component of the innerself of the humans, which is considered to be his own by one by mistake,  due to ignorance. Its the nature of the humans to consider them be the part and partial of the actions-deeds going around them, belonging to be of their own. The real ego occupying the brain can not be removed, while the unreal (imaginary one, assumed), can be eliminated through the use of prudence (intelligence, enlightenment). The humans do not have independent existence, except the world i.e., they too are the components of the world. So, when one considers himself to be independent of the nature, he suffers from pride of having done and desires start evolving (hovering, generating) in his mind. This ego-pride can never bring welfare. One who wins over the false pride (ego, illusion, mirage) of being the doer with the help on prudence acquires the gist (nectar, elixir) of the Brahm (the Ultimate, Supreme knowledge i.e., enlightenment).
पवन देव, वरुण देव, देवराज इंद्र, अग्नि देव  को अहंकार हो गया कि वे बहुत शक्ति शाली हैं। माता भगवती ने पवन देव से एक तृण-तिनका उड़ाने को कहा। वे एड़ी-चोटी का दम लगाकर भी उसे उड़ा नहीं पाये।  माता भगवती ने स्पष्ट किया ब्रह्माण्ड में सभी क्रियाएँ उन्हीं से नियंत्रित होती हैं। भगवान् ब्रह्मा, भगवान् विष्णु और भगवान् महेश जब माँ भगवती के समक्ष प्रस्तुत हुए, तो उनका रूप स्त्री का हो गया। अतः मनुष्य को समझ लेना चाहिये कि उसका कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है। वह तो प्रकृति का एक सबसे छोटा अंग-खिलौना मात्र है। इसलिये मनुष्य स्वयं को कभी कर्ता समझने की भूल न करे।
Ego is the worst enemy of one who considers himself ad the doer. 
Please refer to ::  EGO अहंकार santoshsuvichar.blogspot.com
तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः।
गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते॥3.28॥
परन्तु, हे महाबाहो! गुण विभाग और कर्म विभाग को तत्व से जानने वाला महा पुरुष-ज्ञान योगी ही "सम्पूर्ण गुण ही गुणों में बरत रहे हैं", ऐसा समझकर उनमें आसक्त नहीं होता।
But hey Maha Baho (the mighty, brave)! One-the enlightened, who is aware of the reality that the characters are intermingling (interacting) amongest themselves on the basis of their qualities and the actions; remain detached (i.e., he is not attracted towards them). 
सत्त्व, रज और तम: ये तीन गुण प्रकृतिजन्य हैं। अतः प्रकृति त्रिगुणात्मक है। शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, प्राणी और पदार्थ सभी गुणमय हैं। इनसे होने वाली क्रियाएँ कर्म विभाग कहलाती हैं। गुण, पदार्थ और कर्म-क्रियाएँ निरन्तर होती रहती हैं और परिवर्तन शील हैं। इसको अनुभव करना ही गुण और कर्म को ठीक-तत्व से जानना है। चेतन स्वरूप में कोई क्रिया नहीं होती। वह सदा, निर्लिप्त, निर्विकार रहता है; यह समझना चेतन तत्व को जानना है। अज्ञानी इन गुण-कर्म विभाग से अपना सम्बन्ध बना लेता है। राग अविवेक से होता है। साधक को विवेक को जाग्रत कर राग को मिटाना चाहिए। क्रिया चाहे कोई भी हो, मनुष्य को वह निलिप्त-अपने पन का त्याग करके करनी चाहिए। अपरिवर्तन शील परमात्म तत्व से आत्मा का संबन्ध स्थाई और परिवर्तन शील प्रकृति से अस्थाई है। प्रकृति जन्य गुणों से उत्पन्न होने के कारण शरीर, मन, बुद्धि और इन्द्रियाँ भी गुण ही कही जाती हैं। अविवेकी-अज्ञानी इनसे अपना सम्बंध मानकर स्वयं को कर्ता मान लेता है। इस बात को समझकर-जानकर  साधक उनमें आसक्त नहीं होता।
चेतन :: aware, alert, vigilant, rational, the conscious self, being. 
Satvik-divine, Raj-human and Tam-demonic are the three tendencies (characters, qualities, traits) pertaining to the nature. Human body, sense organs, intelligence, the organism and the matter too constitutes of these characters. These characters, matter and the deeds-actions are continuous and subject to change (division of labour). Experiencing (realisation, understanding) of these, is the awareness of gist. The soul (the conscious self, being) is free from actions. It is always unsmeared, uncontaminated, detached and absolute. The imprudent-ignorant develops rapport (bonds, ties, connections) with these characters and actions. Attachment is caused by ignorance (imprudence). The practitioner (devotee) has to grow prudence (wisdom, enlightenment) and vanish (eliminate) the bonds (ties). Whatever the action-deed be, one should perform it, without attachment (belongingness, ownership, authority). The soul has a permanent connection-link with the Absolute (the Almighty), where as, its relationship with the body (nature, world) is quite temporary (momentary, for the time being only). The senses, body, mood (mind, intelligence) are the outcome of the nature. So, they too are considered as characters. Therefore, the characters are intermingling amongest them selves. The ignorant (stupid, idiot, insensible) considers to be a component of them and thinks to be the doer. One who understands this fact, remains detached (unaffected, detached, relinquished).
The relinquished-detached breaks all bonds (ties) with the living world and crave for his relation with the Almighty only. 
प्रकृतेर्गुणसंमूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु।
तानकृत्स्नविदो मन्दान् कृत्स्नविन्न विचालयेत्॥3.29॥
प्रकृति के गुणों से अत्यन्त मोहित हुए मनुष्य गुणों में और कर्मों में आसक्त रहते हैं, उन पूर्णतया न समझने वाले मन्द बुद्धियों को, ज्ञानी विचलित न करे।
The enlightened (learned, scholar, philosopher), should not disturb the unwise (ignorant, people of low intelligence, imprudent, idiots), mesmerised (deluded, under the shadow, cast of illusion) by the characteristics-qualities of nature, devoted to its characters and performing various functions.
अज्ञानी जिनको शास्त्र में, शास्त्र विहित शुभकर्मों में तथा शुभ कर्मों के फल में आस्था है, को सत्वगुण सुख और ज्ञान की आसक्ति से, रजोगुण कर्म की आसक्ति से तथा तमोगुण प्रमाद, आलस्य और निद्रा से बाँधता है। ये व्यक्ति लौकिक और पारलौकिक भोगों की कामना के कारण कर्मों में आसक्त हैं और परमात्म तत्व को ग्रहण करने की सोच भी नहीं सकते।
उनके द्वारा किये गए शुभ कर्म नाश्वान् पदार्थों-भोगों के लिए होते हैं और वे ममता, कामना से बँधे हुए हैं। उन्हें शास्त्र विहित कर्म विधि का ज्ञान तो है, परन्तु गुणों और कर्म के तत्व-गति का ज्ञान नहीं है। सांसारिक भोग तथा संग्रह में रूचि के कारण उन्हें  मन्द बुद्धि (नासमझ, अज्ञानी, अविवेकी) कहा गया है। ज्ञानी (विद्वान, विवेकी पुरुष) इन अज्ञानियों को विचलित करेंगे, तो उनका अपने इस स्तर से भी नीचे गिरने का डर है। वे अज्ञानी के शास्त्र विहित शुभ कर्मों में अश्रद्धा, अविश्वास या अरुचि उत्पन्न कर सकते हैं। वे सकाम निष्ठा से विचलित हो सकते हैं।
The ignorant (mesmerised, illusioned) has faith in scriptures and the prescribed duties in addition to the impact of the result (outcome, reward) of the deeds (functions, endeavours, working) duties. The Satvik (pure, pious, divine) characters grant comforts, the Rajsik-selfishness provides faith in attachment and the Tamsik (ignorance, illusion, demonic) traits grants intoxication, laziness, frenzy and sleep. Such people have the desires of comforts & passions over the earth and the heavens. They can never imagine-think of the attainment of God. Their sole motto in life is eat drink and be merry.
The deeds performed by them are to target the worldly comforts (luxuries, passions) and they are attached with affections (allurements, greed). They are aware of the methods-procedures of Varnashram Dharm, but they are ignorant of the characters, direction-outcome and the gist of deeds-Karm. The are called morons (duffers, fool, idiots), since they are engaged in collection of worldly possessions and enjoyment. If the learned (enlightened, scholar, wise, philosopher) try to educate (teach, convince) them about the Ultimate, they may react in an adverse direction and degrade themselves. They may develop disrespect, distaste, lack of faith in prescribed duties. Their faith may be shaken in the duties (deeds) performances and the reward.
Its of no use teaching one who do not wish-want to learn or understand. The zealous teachers try to put their best efforts to educate the children from low class families but fail miserably and are often punished by the authorities. Its easy to take the horse to water but impossible to make him drink.
Let only those come to school who are willing, interested in learning. The government lure them with mid day meals, free cloths-uniform, cash, free books and still no interest in education. Pushed by the government they graduate in crimes. Then the government appoint them in the jobs unsuitable unfit for them.
मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा।
निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः॥3.30॥
विवेकशील बुद्धि के द्वारा सम्पूर्ण कर्तव्य-कर्मों को मुझ अन्तर्यामी परमात्मा में लगे हुए चित्त द्वारा मुझ में अर्पण करके आशा-कामना रहित, ममता रहित और सन्ताप रहित होकर (तुम) युद्ध रूपी कर्तव्य-कर्म करो।
One should renounce all action in  the Almighty by concentrating in HIM only and perform-discharge his duties, without motive-free from desires (affections, selfishness), with fervour devoid of worries (grief, sorrow).
मनुष्य को चाहिए कि वह सम्पूर्ण कर्मों को अध्यात्म चित्त (विवेक, विचार युक्त, अन्तः करण) से परमात्मा को समर्पित कर दे। इससे बंधन नहीं रहेगा। साधक का उद्देश्य आध्यात्मिक होना चाहिए, लौकिक नहीं। कामना अनित्य तत्व-विनाश शील हैं। अविवेक से विनाश शील संसार-शरीर अपना दिखाई पड़ता है। विवेक से देखने पर अविनाशी परमात्म तत्व दिखाई देगा। आध्यात्मिकता नित्य तत्व है। राग-द्वेष, काम-क्रोध, ज्वर-संताप हैं। कौटुम्बिक स्नेह से संताप कष्ट-दुःख की संभावना है। भगवान् ने इसीलिए निष्काम, निर्मम और नि:संताप होकर समभाव से युद्ध-घोर क्रूर कर्म-यज्ञ करने की आज्ञा दी है। यदि कल्याण-श्रेय की इच्छा है, तो युद्ध से बचो-डरो मत। 
One should perform all his prescribed and entrusted duties & then  surrender them to the Almighty to detach himself from bonds-ties. Imprudence compels the individual to the worldly affairs. One's motive should be spirituality, which is continuous, never ending, all pervading, for ever. Worldly affairs & objects are periodic (impermanent, temporary), like a phase, perishing. Prudence guides one to the Almighty. The Almighty asks one-Arjun, to perform the cruel (tough task) of war. War can save one from dreaded pains (sorrow, grief) if fought with equanimity for the welfare. The prime motive should be welfare.
The society is full of goons, antisocial, demonic, brute, barbarians, terrorists. By the time one toes their line, bows in front of them; they will continue exploiting, inflicting injuries, tortures. So wake up, unite and pounce upon them. Sooner or later one has to die. Control them, eliminate them and live peacefully. 
The law enforcing agencies will wake up late and by that time you will be finished. In today's scenario the law makers, police are all sold off. You have prepare your own to protection shield.
While performing duties, situation comes when one indulges in personal enmity. It should always be avoided.
ये मे मतमिदं नित्यम नुतिष्ठन्ति मानवाः।
श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः॥3.31॥
जो कोई मनुष्य दोष दृष्टि से रहित और श्रद्धा युक्त होकर मेरे इस मत (पूर्व श्लोक 3.30 में वर्णित) का सदा अनुसरण करते हैं, वे भी सम्पूर्ण कर्मों से छूट जाते हैं।
One who is free from jaundiced (myopic, defective vision), tendency to find faults with others, prejudiced thinking; follows the dictates of the Almighty discussed in Shlok (श्रीमद्भगवद्गीता 3.30) with faith & devotion, is liberated from all deeds and their impact, leading to Liberation (Salvation) i.e., Moksh.
जो भी व्यक्ति कर्म बंधन से मुक्ति चाहता है, वह इस संसार-शरीर को अपना नहीं मानता। वह श्रद्धावान साधक सत्-शास्त्र, सत्-चर्चा और सत्संग में  जाता है और इन सब पर आचरण करता है, श्रद्धा, तत्परता, संयतेन्द्रियता प्राप्त कर लेता है। वह दूसरों में दोष दृष्टि नहीं रखता। समाज में अलग-अलग समयों पर, विद्वानों ने अलग-अलग मत प्रतिपादित किये हैं। परन्तु जो परमात्मा का मत है, वही अनुकरणीय है। इस संसार में परमात्मा के सिवाय मनुष्य का अपना कुछ भी नहीं है। अन्यानेक व्यक्ति जिनको परमात्मा स्पष्ट आदेश नहीं देते (आमने-सामने) वे भी अगर इन आदेशों का पालन करते हैं, तो वे भी मुक्ति प्राप्त कर लेते हैं।
One who want to desert the impact of deeds by virtue of destiny, accumulated actions and the current (immediate, present functions), do not recognise him self with this world. The devotee who has faith in the God, scriptures, listens to the preachings by the enlightened and follows them, attains control over his sense organs & develops willingness (readiness) to act. He do not find fault with others. He believes in what has been said by the Almighty, ignoring the various versions (hypothesis, opinions) propagated by different scholars (learned, enlightened, philosophers). He believes that this universe do not have anything which belongs to him, except the God. Various other people who learn, listen and act over the directives of the Almighty, are Liberated; though they are not spoken to, delivered the sermons,  face to face or directly by the God.
The prudent should always act without attachment, bonds or ties with devotion to the Almighty. He should never take any thing personally to heart while discharging his duties his duties as an employee.
ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम्।
सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः॥3.32॥
परन्तु जो मनुष्य भगवान् के इस कथन में दोष दृष्टि रखते हुए इसका अनुष्ठान नहीं करते, उन सम्पूर्ण ज्ञानों में मोहित और अविवेकी मनुष्यों को नष्ट हुआ ही समझो अर्थात उनका पतन निश्चित ही है।
One who is deluded with fake (defective, untrue knowledge), find fault (defect) in the statement made by the Almighty and fails to adopt, do it; is sure to be doomed (degraded, fall below his status-position) as a human being to hells & low species of animals & insects, later in next births. 
भोग और संग्रह की इच्छा से युक्त कामना, ममता से ग्रस्त, राग-द्वेषादि से भ्रमित लोग समस्त पदार्थों और कर्मों को अपने लिए ही उपयुक्त समझते हैं। वे मूढ़, परमात्मा की दिखाई गई राह पर न चलकर, साँसारिक खोजों, ज्ञान-विज्ञान, उन्नति, कौशल-कलाओं, अन्यानेक भाषाओँ, लिपियों, रीति-रिवाजों, मंत्र-तंत्र, यंत्रादि में लगे रहते हैं। उनमें सत्-असत्, सार-असार, निस्सार, धर्म-अधर्म, बंधन-मोक्ष, आदि परमार्थिक ज्ञान-विवेक नहीं होता। वे पशु के समान विमूढ़ हैं। जो भी व्यक्ति भगवत्ज्ञान को नहीं अपनाता, उनके अनुरूप नहीं चलता, उसका नाश, निम्न योनियों और नर्क में पड़ना निश्चित समझना चाहिए।
One with the desire of comforts, possession of wealth, worldly goods, affections, allurements, expectations, attachments, differentiation (hate, allergies), consider all facilities (faculties) made for him only. Instead of following the divine path  & divine doctrine, he entangle himself with development, growth, acquisition of knowledge, inventions-innovations, learning various languages-scripts, traditions, rituals, Tantr-Mantr, mechanisation of the unknown. He do not have prudence (intelligence) to differentiate between right or wrong, true or false, Dharm (religiosity)-Adharm (vices, sins, devilish, wickedness), bonds or Salvation and the tendency to help others, social benefit. He is comparable to animal (brainless, beast). He is not expected to follow the divine gospel-sermons and face extinction, down fall, rebirth in low species or stay in hell.
Researches, innovations, growth are meant for physical, worldly success. They add to comforts, luxuries, riches but repel one from the Almighty & Salvation. One finds it impossible to get out of the varied attraction around him.
Growth, development, research, innovations are continuous processes and can not be stopped. What advancement one see today, is not for the first time. All these things have existed prior to it, as well. Latest researched have proved this beyond doubt. In spite of this, one should never forget the God. He should live in this world and keep on preparing for Moksh-Salvation, simultaneously.
सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि।
प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति॥3.33॥
सभी प्राणी प्रकृति को प्राप्त होते हैं। ज्ञानी महापुरुष भी अपनी प्रकृति के अनुसार चेष्टा करते हैं। फिर इसमें किसी का हठ क्या करेगा?
All organism (living beings, creatures) acts in conformity with the nature. The enlightened (scholars, Pandits, learned, philosopher) too act according to their nature. One can not be coerced (forced, compelled, directed or diverted) to act otherwise i.e,. obey the doctrine leading him to the God.
प्राणी द्वारा जो भी कर्म किये जाते हैं, वे उसके स्वभाव, सिद्धान्त (शास्त्र, भगवान् की आज्ञानुसार) पर आधरित होते हैं। स्वभाव राग अथवा द्वेष पूर्ण होने से अशुद्ध हो जाता है, जो कि बन्धन कारी हैं। ऐसा व्यक्ति मुक्त नहीं हो सकता। सिद्धान्त के अनुरूप की गई क्रियाएँ मनुष्य का उद्धार करने वाली होती हैं। परमात्म प्राप्ति के इच्छुक साधक की क्रियाएँ सिद्धान्त पर आधारित होती हैं। क्रियाएँ ज्ञानी व्यक्ति के द्वारा कर्तव्याभिमान से रहित मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करती हैं। क्रियाएँ प्रकृति का अंग हैं, मगर अज्ञानी उनसे संबंधित होकर अहंकार वश स्वयं को कर्ता मान लेता है। इससे राग (द्वेष, बंधन, जन्म-मरण) उत्पन्न होते है। महापुरुष राग-द्वेष न होने से निर्दोष प्रकृति का होता है। भगवान् के अवतार भी नियत योनि के अनुरूप चेष्टा करते हैं, यद्यपि वे प्रकृति के अधीन नहीं हैं। चेष्टा बंधनकारी नहीं है, आसक्ति सहित कर्म बंधनकारी हैं। मनुष्य के स्वभाव का निर्माण उसके पूर्व कर्म, जन्म के संस्कार, माता-पिता, बुजुर्गों के संस्कार, संग-साथ, संगति, शिक्षा, वातावरण, अध्ययन, उपासना, चिन्तन-मनन, क्रिया, भाव आदि करते हैं। शुद्ध स्वभाव के व्यक्ति की क्रियाएँ भी शुद्ध होंगी। ऐसा व्यक्ति हमेशां दूसरों के हित-भले का ही चिंतन करेगा।
Actions-deeds of the organism are based upon his basic nature (instinct, inborn faculties, tendencies) & principles discussed (elaborated, described, defined, explained) in scriptures. The nature of a human being may be spoiled due to attachment and jealousy, hatred, arrogance, pride, ego. Performances based on scriptures are meant to salvage the ascetic. One who seek assimilation in the Almighty will follow the path shown by the scriptures. The enlightened, who is devoid of ego paves-smooths his way for assimilation in God with their help. The ignorant considers himself to be the doer, due to ego. It gives birth to attachment, bonds, hatred, jealousy, birth & rebirth. Great (noble) person is free from attachment, envy, jealousy, ego with defect less, uncontaminated nature. Incarnations of God do act according to the nature of the species in which they have evolved. Though the nature is under their control. Efforts are not binding, but the deeds are binding. 
The nature of a person is a mix of his interaction in the group, education, parents (elders, relatives, teachers), impact of previous birth, environment, learning, meditation, thinking, feeling, conceptualisation and actions, though his previous life do affect him. One with pure, pious, righteous, virtuous nature will perform pure-auspicious deeds. Such people are always busy with the betterment-service of others.
One should always make efforts to shun viceful-vicious company. Company of the virtuous helps one in paving his path to Salvation.
इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ।
तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ॥3.34॥
प्रत्येक इन्द्रिय और उसके विषय में राग और द्वेष स्थित हैं। मनुष्य को उन दोनों के वश में नहीं होना चाहिए, क्योंकि वे दोनों ही इसके पारमार्थिक-कल्याण मार्ग में विघ्न करने वाले शत्रु हैं।
One should not be dependent (misguided, distracted, controlled, misled) by the attachments and enmity, the subjects of sense organs, which are the enemies of one, who is eager (willing, devoted) for the welfare of others.
प्रत्येक इन्द्रिय (श्रोत्र, त्वचा, नेत्र, रसना, और घ्राण) के विषय (शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध) में अनुकूलता होने पर राग और प्रतिकूलता होने पर द्वेष होता है। राग-द्वेष शरीर के अहम् से जुड़े हैं। साधक को इनके उत्पन्न होने पर साधन और साध्य से निराश न होकर, किसी भी कार्य में प्रवृत अथवा निवृत्त नहीं होना चाहिए। जैसे ही साधक साधना, भजन-पूजन से उपराम होता है, दबी-ढ़ँकी इच्छाएँ बलवती होकर सर उठाती हैं। यह घबराने, हताश, चिंता, निराश होने का विषय नहीं है। उसे न तो इनसे डरना है और न ही इनके प्रति दुर्भावना को ही लाना है, अपितु तटस्थ-समभाव हो जाना है, किनारा कर लेना है। 
जो कुछ भी कोई मनुष्य अपने लिए पसन्द  नहीं करता, उसे वह दूसरों के प्रति न करे। अगर राग द्वेष न हों, तो जड़ता हो ही नहीं और सब कुछ चिन्मय परमात्मा स्वरूप आनन्दमय-मंगलमय हो जाये। मनुष्य अनुकूलता में दूसरों की सेवा और प्रतिकूलता में इच्छा का त्याग करें। अनुकूलता-प्रतिकूलता में सुखी-दुखी न हो, क्योकि यह फलासक्त होना है और फलासक्ति से मनुष्य बँध जाता है।
Favourable situations generate attachment for the sense organs, while unfavourable one, create rejection (enmity, anger, pain-sorrow-grief). Attachment and enmity are connected with the actions of the body and are further attached with ego-pride. The practitioner should not be happy or disheartened with fulfilment of desire or failure. He should generate equanimity with the subjects of sense organs and outcome. As soon as the devotee is free from his daily routine (prayers, rituals, meditation), the suppressed desires raise their head, again. One has to ignore them. There is nothing to fear or afraid of. He should not grow hatred for them. Instead, he should become neutral towards them. 
One should never do any thing which he do not like to be done with him. One will not be static-inertial, if attachments and enmity are not there and everything will become blissful like the Almighty. When ever and where ever one gets a favourable opportunity, he should work for the sake of others (society). If things take an adverse route (course) he should reject the desires completely. To be happy or dejected is associated with the reward of deeds and the desire for favourable outcome (fruit) of deeds is binding, leading to unending cycle of birth & death.
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः॥3.35॥
अच्छी प्रकार आचरण में लाए हुए दूसरे के धर्म से गुण में कमी वाला, अपना धर्म श्रेष्ठ है। अपने धर्म में तो मरना भी कल्याणकारक है और दूसरे का धर्म भय को देने वाला है। 
One should discharge own duties (Varnashram Dharm, dictate of scriptures, religion) even if they lack qualities-virtues, better or superior characteristics, traits as compared to the religion (duties) of others. One should prefer death while performing own duties as compared to those of others, which causes fear.
मनुष्य के लिए स्वधर्म का पालन करना सहज है, क्योंकि यह प्रारब्ध के आधीन और पूर्व कर्मों के फलस्वरूप है। इसके पालन करते हुए मनुष्य बंधन मुक्त हो जाता है। 
पिछले 800-2100 सालों में भारत में और उसके बाहर बहुसँख्यक हिन्दुओं को तलवार की धार पर, लालच देकर, बहकाकर-फुसलाकर धर्म परिवर्तन करा दिया गया। आज पूरे इण्डिनेशिया, पाकिस्तान, बंगलादेश, ईरान, मिस्त्र, ईराक, फारस की खाड़ी तक जो मुसलमान हैं, उनके पूर्वज हिन्दु थे। बहुसँख्यक सुन्नियों के पूर्वज और शेष 542 फिरकों के इस्लाम के मानने वाले भी हिन्दु ही थे। ये लोग पहले मुसलमान बने और अब आतंकवादी बनाये जा रहे हैं। हिन्दु धर्म के ठेकेदारों, पोंगा पण्डितों ने उन्हें वापस हिन्दु नहीं होने दिया। कहा गया हिन्दु पैदा होता नहीं है। पर घर में वापसी तो होती है। पोते-पड़ पोते को  कोई घर आने से नहीं रोकता।
जिस मोहम्मद से इस्लाम शुरू हुआ वो खुद भी एक भटका हुआ, हिन्दु ब्राह्मण पुजारी का महाघमण्डी-अहँकारी और धर्म द्रोही बेटा था।
Please refer to :: FORCIBLE CONVERSIONS OF HINDUS हिन्दुओं का इस्लाम में बलात् धर्मांतरण bhartiyshiksha.blogspot.com 
ईसाईयों ने भी कुछ कम गुनाह नहीं किये हैं। वे आज भी भारत में सक्रिय हैं और धन, पद का लालच देकर, बरगला कर धर्म परिवर्तन करा रहे हैं। भारत में निखद्द सरकारें मन्दिरों का चढ़ावा इन धर्म परवर्तन किये हुओं पर लूट कर खर्च-व्यर्थ कर रही हैं। 
स्वधर्म में राग द्वेष रहने से पाप लगता है, अन्यथा नहीं। निस्वार्थ-निष्काम भाव से  किया गया कोई भी कर्तव्य-कर्म परमात्म प्राप्ति का साधन बन सकता है। परधर्म का पालन करने वाले कभी भी कहीं भी सुखी नहीं हो सकते। त्याग-कर्मयोग, बोध-ज्ञान योग और प्रेम-भक्ति योग स्वधर्म हैं। निर्लिप्त रहना, परसेवा, निष्काम, निर्मल रहना, अनासक्ति स्वधर्म हैं। कामना, ममता और आसक्ति परधर्म हैं।  परमात्मा का अंश शरीरी-आत्मा स्वयं है और प्रकृति का अंश शरीर पर है। स्वधर्म चिन्मय धर्म और परधर्म जड़धर्म हैं। भोग-संग्रह की इच्छा परधर्म पारमार्थिक, समाज कल्याण की इच्छा स्वधर्म है। तीर्थ, व्रत, दान-पुण्य, तप, चिंतन, समाधि, शुभ कर्म स्वधर्म तथा यदि इन्हीं को सकाम भाव से किया जाये तो पर धर्म हो जाते हैं।  स्वधर्म कल्याण कारक व परधर्म भयानक हैं। 
To carry out one's inborn duties is quite easy, since its determined by the destiny and deeds in previous births. One who perform them relentlessly become free from the clutches of birth-death cycle.
During the period of last 2,100 years a large number of people have been converted to Islam by the use of force or incentives. One finds people making efforts to convert the natives to Christianity, by be fooling them or luring them through one or the other means. One will hardly find a person in India and neighbouring countries with pure DNA, chromosomes or genes. The trend has changed now. Terrorists are converting innocent people to their net work in the name of either Islam or Khalistan. Their sole goal to snatch power by using religion called Islam. Now, Islam is synonymous with terrorism. Khalistanis are handled by Pakistan ISI. The tragedy with the Hindu community is that the so called enlightened, learned, Pandits did not let the home coming respectfully. They slammed the doors over their mouth. Such people are still active and trying to give a wrong narrative, negative direction to Hinduism. It had been heard that Hindu is born and not converted. Home coming is home coming be it for the son or the great-great grand son.
NARRATIVE :: कथा में घटनाओं का वर्णन, कहानी सुनाने की प्रक्रिया या कला; वृतांत, आख्‍यान; the process or skill of telling a story, the description of events in a story.
ANY ONE CAN PRACTICE HINDUISM WITHOUT BEING CONVERTED BY ARY SAMAJ OR ANY OTHER AGENCY. ONE DO NOT NEED CERTIFICATE TO BE A HINDU.
If one carries out his own duties without attachment, enmity, motive, he is not tainted, stained, slurred, blasphemed. Any deed carried out without selfishness without desires, motives, becomes a means to attain the Almighty. One who does the duty which does not belong, pertain to him, always lead to dissatisfaction (trouble, tensions, tortures). Such people can never rest in peace-live peacefully. Sacrifice, rejection, relinquishment grants Karm Yog, understanding (realisation), awards enlightenment i.e., Gyan (Sankhy) Yog; while love for the Eternity awards Bhakti Yog, the divine duties of a human being. To be detached, helping (servicing) others, purity (piousness, righteousness, honesty) to remain detached, are ones own duties, i.e., divine duties-responsibilities. Desires, affections-attachments and passions are foreign. Soul is a component of the God and pertains to one, while the body is a component of the nature and pertains to others. Carrying out of one's duties is Godly and the rest is inertial to be discarded. Desire (habit of accumulations, passions, sensuality, sexuality, lust) is not own religion while helping others (social-community service), without the desire of appreciation (honours, respect, praise, reward) is own religion. Visiting holy places, fasting, meditation, staunch meditation, asceticism, chastity, pious deeds remain own-self religion; till one is free from the desire of return (reward, favourable outcome). The impact of own duties is positive, beneficial; while that of carrying others duties (religion, faith), is surely furious (harmful, dangerous).
धर्म DHARM RELIGION (Faith) :: प्रत्येक धर्म में कुधर्म, अधर्म, और परधर्म का समिश्रण होता है। दूसरे के अनिष्ट का भाव, कूटनीति आदि, धर्म में कुधर्म हैं। यज्ञ में पशु बलि देना आदि धर्म में अधर्म है। जो अपने लिए निषिद्ध है, ऐसा दूसरे वर्ण, आश्रम आदि का धर्म, धर्म में परधर्म है। कुधर्म, अधर्म और परधर्म से कल्याण नहीं होता। कल्याण उस धर्म से होता है, जिसमें अपने स्वार्थ तथा अभिमान का त्याग एवं दूसरे का वर्तमान और भविष्य में हित शामिल है।
Please refer to :: RELIGION-DHARM धर्म santoshhindukosh.blogspot.com
अर्जुन उवाच: 
अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः।
अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः॥3.36॥
अर्जुन बोले :- हे वार्ष्णेय कृष्ण! तो फिर यह मनुष्य स्वयं न चाहता हुआ भी बलात्‌ लगाए हुए की भाँति, किससे प्रेरित होकर पाप का आचरण करता है ?
Arjun queried :- Please explain why, one acts unwillingly (against his desire, dragged, forced, compelled) to commit sin, though reluctantly?
स्वधर्म में कुल-वंश की व्याख्या-प्रशंसा है और भगवान् श्री कृष्ण ने वृष्णि वंश में अवतार ग्रहण किया था, अतः अर्जुन उन्हें वृष्णि-वार्ष्णेय कह रहे हैं। विचारशील (विवेक शील, समझदार) पुरुष पाप नहीं करना चाहता, क्योंकि पाप का फल दुःख है; जिसको कोई भी नहीं चाहता। फिर भी भोग, समृद्धि, संग्रह की इच्छा उसे पाप कर्म में लगा देती है। यहाँ दृढ़ निश्चय की कमी है। काम पाप में प्राणी को प्रवर्त करता है। काम वासना, भोग, समृद्धि, संग्रह की इच्छा ही है। अश्रद्धा, असूया, दुष्ट चित्ता, मूढ़ता, प्रकृति-स्वभाव की परवशता, राग-द्वेष, स्वधर्म में अरुचि, परधर्म में रूचि आदि में ऐसा क्या है, जो मनुष्य पाप कर्म में प्रवर्त होता है!? ईश्वर, प्रारब्ध, युग, समय, काल, परिस्थिति, कर्म, समाज, रीति, रिवाज, सरकारी कानून आदि-आदि में भी पाप की ओर प्रवर्त करने वाला क्या है-कौन है!? 
Bhagwan Shri Krashn has appreciated the doing of ones duty pertaining to Vansh-Varn Dharm. This incarnation of Bhawan Shri Krashn was in the family (Vansh, lineage, clan, dynasty) of Vrashni Vansh, a family of Kshatriy (warriors, marshal caste Ahir or Yadavs, but carrying out agriculture and nurturing cows, animal husbandry as profession, which are duties of Vaeshy). The prudent (thoughtful, intelligent), never indulge in sin-crime the result (outcome) of which is frustration (failure, sorrow, grief, pain). Still desire for sex, accumulation of wealth, money, possessions leads to crime vices, evil, wretchedness, sin). Human nature, dullness, criminal mind (nature, psyche), conforming of others duties, rejecting own religion and accepting others religion, government rules and regulations, unfavourable conditions-favourable opportunities, destiny, enmity-anger, time (period, cosmic era), traditions, society, attachment (allurements, greed), lack of faith in God, the God or else; what are the reasons behind crime-sin? Which one of these or who is responsible for the evil (sin)?
The worst has just begun. The Kshatriy who used to be courageous-tough warriors turned to agriculture in Dwapar and now in Kali Yug they pretend to be Dalits, degraded, low caste-low origin. Tomorrow they may claim to be scheduled castes-scheduled tribes i.e., Shudr. (This is how the Varn Vyavastha of Manu Smrati functions. Kshatriy to Vaeshy and then Shudr!) Mulayam-Akhilesh, Lalu-Rabri are worst examples. These are corrupt politicians engaged in all sinful wicked acts.
Ram Vraksh Yadav a dreaded criminal tried to establish himself as a sect leader but was killed in police action. Another desperado Ram Dev popularly known as Baba Ram Dev established himself as a Yog Guru and turned into a shrewd-cunning businessman with the desire to become Prime Minister of  India. He is accused of killing his mentor-Guru, escaping-fleeing with the daughter of a well known person and and mixing bones in the medicines sold by him. Recently he started a campaign against the Brahmans. 
Narendr Modi-a Teli, Nitish Kumar-a Koli and Shiv Raj Singh Chauhan-a Kirad, Ashok Gahlot, Maya Wati though Scheduled castes-Shudr up lifted themselves through their actions, suitable for Brahmanical task of governance.
श्रीभगवानुवाच: 
काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः। 
महाशनो महापाप्मा  विद्ध्येनमिह वैरिणम्॥3.37॥
श्री भगवान् बोले :- रजोगुण से उत्पन्न हुआ यह काम (कामना, इच्छा) ही पाप का कारण है। यह काम ही क्रोध में परिणित होता है। बहुत खाने वाला अर्थात भोगों से कभी न अघानेवाला और बड़ा पापी है। इसको ही तू इस विषय में वैरी-दुश्मन समझ। 
Bhagwan Shri Krashn said that the Kam (desires & sex, passions, sexuality, sensuality, Lasciviousness), which develop, evolve from Rajo Gun, is behind the sins. The unfulfilled desires turn into anger. One who utilise too much of it and still remain dissatisfied is the greatest-utmost sinner. Therefore, it is the greatest enemy, for of an individual. 
वस्तु, क्रिया और व्यक्ति से सुख की चाहत का नाम काम है। इनका फल केवल अनिष्ट ही है। किसी भी चीज के प्रति बहुत ज्यादा लगाव-राग कामना, तृष्णा, आसक्ति जैसे रजोगुण उत्पन्न करते हैं। चाहत, इच्छाओं, वस्तुओं अथवा काम के प्रति जरूरत से ज्यादा लगाव, पाप को जन्म देता है, क्योंकि उनको प्राप्त करने के लिए मनुष्य हर प्रकार के छल-छंद करता है। उन कामनाओं की इच्छा पूर्ति न होने पर क्रोध उत्पन्न होता है। क्रोध भी पाप का जनक है। एक कामना की पूर्ति, दूसरी, फिर तीसरी और इसी प्रकार लोभ बढ़ता जाता है। कामनाएँ अन्तहीन हैं। इससे केवल पाप ही नहीं अपितु सन्ताप और दुःख-विषाद भी उत्पन्न होता है। 
Desire of comfort through acquisition of goods, (property, possessions, fun-frolic, actions and interaction) with humans is Kam (function & sexuality, sensuality, passions). The result is always disastrous. Extreme attachment for something, leads to defects pertaining to Rajo Gun, the characteristics that leads to never ending process of birth & rebirth as a human being. One commit all types of crimes resulting into sin. They leads to greed as well. If desires remain unfulfilled, success is not achieved, it leads to anger and pains (sorrow, grief).
People of all ages commit sex related crimes like rape and spoil their life. In societies like Europe, America & Australia people are more liberal but rape is a crime there as well. Manu Smrati recommend swear punishment for this crime.
धूमेनाव्रियते वह्नि र्यथादर्शो मलेन च।
यथोल्बेनावृतो गर्भस् तथा तेनेदमावृतम्॥3.38॥
जिस प्रकार धुएँ से अग्नि और मैल से दर्पण ढँका जाता है तथा जिस प्रकार जेर से गर्भ ढँका रहता है, वैसे ही कामना के द्वारा यह ज्ञान ढँका रहता है। 
Enlightenment is clouded (covered, enveloped) by the desires; just like the fire is covered by the smoke, dirt (dust) make the mirror shabby and the protective membrane covers the foetus inside the mothers womb. 
सांसारिक इच्छाओं के कारण पारमार्थिक उन्नति अवरुद्ध हो जाती है। मनुष्य का विवेक कुण्ठित हो जाता है। वह अपने मार्ग से भटक जाता है। वो कामनाओं के जाल से दृढ़ निश्चय और परमात्मा की शरण में जाने से छूट सकता है। जिस प्रकार धुआँ अग्नि के प्रज्वलित होने में बाधक है और आँखों में जलन पैदा करता है, उसी प्रकार इच्छाएँ मनुष्य को परमात्मा की ओर बढ़ने से रोकती हैं। जैसे मैल से दर्पण धुँधला होता है, उसी प्रकार मनुष्य जन्म का ध्येय (उद्देश्य, परमात्म की प्राप्ति); उसे स्पष्ट नहीं होती। जिस प्रकार गर्भ में जेर भ्रूण को ढके रहता है और उसकी रक्षा करता है, उसी प्रकार अभिलाषाएँ उसके अन्दर बुराई (कामेच्छा, कामनाओं) को संचित रखती हैं। कामनाएंँ मनुष्य के मन (अन्तःकरण, मस्तिष्क, विवेक) को आच्छादित किये रहतीं हैं और वह अपना ध्यान परमात्मा में केन्द्रित करने से वंचित रह जाता है। 
Desires create obstruction in the path of the ascetic (practitioner, recluse), who wish to attain the Supreme soul. His aim (target, goal-Salvation) is masked by the worldly comforts (passions, possessions, attachments, allurements, desires). The human incarnation is meant for the sake of helping others and attain Salvation, the Ultimate. One has the sole aim of achieving the Ultimate, which is beyond his reach, due to his indulgence in various other fields (objectives) misleading him (deluding him). He is not clear, what to do, when to do, how to do; but one thing that he can do easily, is to come out of the vicious situation just by surrender before the Almighty, seek salvage (shelter, asylum, protection) under him & leave every thing up to HIM. His prudence will wake up & the enlightenment will automatically start functioning.
One keep on fighting for more & more of one or the other commodity, targets, goals forgetting the real reason-objective  behind his birth, which is assimilation in the Almighty.
आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा।
कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च॥3.39॥
हे अर्जुन! इस अग्नि के समान कभी तृप्त न होने वाले और विवेकियों-ज्ञानियों के कामना-काम रूपी नित्य वैरी द्वारा, मनुष्य का विवेक-ज्ञान ढँका हुआ है।
Hey Arjun! The prudence (enlightenment, wisdom) of the humans is covered (engulfed, masked) by lust (greed, desires, insatiability), just like the fire the appetite (hunger) of which is never satisfied.
पाप करवाने में मुख्य भूमिका काम-कामना की रहती है। सुख, भोग, संग्रह की इच्छा इतने बलवती होती है कि इसकी तुष्टि तब तक संभव नहीं, जब तक कि मनुष्य स्वयं पर दृढ़ निश्चय के साथ उन पर लगाम (रोक, अंकुश) न लगाये। तृष्णा (आशा, इच्छाएँ) एक से अनेक होती रहती हैं और उनका कोई अन्त नहीं है। लोभ (लालच, स्पृहा, आसक्ति) अंतहीन  निरंतर प्रवाह स्वरूप हैं। विवेक चित्त वृत्तियों को काबू में रखता है। परन्तु कामना (चाहत) एक ऐसी भूख है, जो विवेक का नाश कर देती है, उस पर पर्दा डाल देती है। इस विकार का ज्ञान होने पर भगवद्भक्त स्वयं को परमात्मा के आधीन कर, प्रयास करे तो सफलता अवश्य मिलेगी।
Unending desires & greed for passions (comforts, possessions, position, status, authority, power) forces one to indulge in crime (vices, wretchedness, sins). These faculties are insatiable, unlimited, never ending & infinite. Its not possible to fulfil each and every desire. One must exercise restraint (control) over them. He should utilise wisdom (prudence, intelligence) to overcome them. Desire is a tendency which vanish  wisdom (prudence, intelligence) as well. Those who moves to the asylum (shelter, patronage) of God, successfully avoid (overpower, overcome) these. 
One should try-make endeavours to restraint his desires, greed, need with firm determination. He may adopt prayers, studying scriptures, meditation as tools. He should seek patronage-asylum, shelter, protection under the Almighty. One who has faith in the Almighty and surrenders himself before the God is sure to achieve success in self control-discipline and Ultimately Moksh.
इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते।
एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम्॥3.40॥
इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि-इस कामना के निवास स्थान हैं। यह कामना इन इन्द्रियों, मन और बुद्धि के द्वारा ज्ञान को आच्छादित कर देहाभिमानी मनुष्य-जीवात्मा को मोहित करती है। काम यद्यपि दिखता तो पदार्थों, इन्द्रियों, मन, मस्तिष्क और अहंम् में है, तथापि यह निवास अहंम् में ही करता है। अहंम् मनुष्य को पारमार्थिक कार्यों से रोकता है और सांसारिकता में उलझाता है। कामना एक बंधन है। कामना से मुक्ति का अर्थ है, ब्रह्मभाव का उदय। यह क्रोध, मोह उत्पन्न करती है। काम स्वयं रजोगुणी होने पर भी तमोगुणी कार्य करता है। यह राग और जड़ता का संयोग कराता है और मुक्ति-भक्ति का मार्ग अवरुद्ध करता है।
The senses, mind and intelligence (innerself, brain, thoughts, reason, argument) consists-constitutes of the seat of aspirations (desires, possessiveness). The desires which cloud (shroud, mask, cover, shadow) the enlightenment (veiling wisdom, learning) through the senses, mind and mood, delude the embodied-humans.
The desire, aspiration though appears to be present in the senses, mind, mood and worldly possessions, yet its seat is located, found, fixed in the pride (Id, Ego & Super Ego, arrogance). Ego obstruct the devotee-practitioner from performing the service (charity, social, community welfare). Kam in itself is a tie (bond, obstruction) in the Liberation of the human being from the clutches (cycles of birth & death, reincarnations). If one sets himself free from the bonds, feeling of oneness with the Brahm-Almighty, contentment will automatically evolve in him. Unfulfilled desires (motives) create (evolve)  anger, illusion, ignorance, delusion in him. It attaches one with the initial-inertial state and checks-stops the assimilation of soul with the Ultimate the Eternal.
Only firm determination, loss of ego-arrogance can help one in over coming desires, lust (sexuality, sensuality, passions, Lasciviousness). One may seek patronage of God if unable to control-exercise restraint over self.
तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ।
पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम्॥3.41॥
इसलिए हे भरत वंशियों में श्रेष्ठ अर्जुन! तू पहले इन्द्रियों को वश में करके इस ज्ञान और विज्ञान का नाश करने वाले महान पापी काम को अवश्य ही बलपूर्वक मार डाल। 
Therefore, Hey Arjun, the best amongest the ancestors of Bharat-descendant of Bharat clan! You should control the senses  and over power (vanish, kill) the worst sinner Kam (the desire, motive, aspiration or sexuality, lust) with firm determination, might, that destroy the enlightenment and sciences.
मनुष्य को काम (लालसा, वासना, लिप्सा, लालच, लोभ, राग, द्वेष, आसक्ति) से बचने लिए कामना रहित-निष्काम होकर कर्म करना चाहिये; अन्यथा वह शास्त्र ज्ञान तथा विज्ञान तत्व-ब्रह्म ज्ञान आदि का नाश करने की प्रवृति रखेगा (जो कि ढँक-आच्छादित अवश्य हो जायेगा, मगर नष्ट नहीं होगा)। मनुष्य इन्द्रियों के वश-आधीन होकर अकर्तव्य कर बैठता है और पतन-अधोगति को प्राप्त होता है। कामनाएँ ही मनुष्य को पाप, बुराई, पतन, अधोगति की ओर अग्रसर करती हैं।
Desires, aspirations, motives forces one to commit undesirable sinful-wretched, wicked, vicious acts. He is over powered by the lust (passions, sensuality, sexuality, endless wants-desires). Therefore, he should perform all deeds-actions without involvement. Failure to do so leads to masking of his learning (understanding, prudence, intelligence). In this state he commits all sorts of crimes-sins and moves towards down fall, the hell.
One should make continuous endeavours to control himself with firmness, not to be swayed by lust, sex, passions, sensuality, Lasciviousness. Desires and lust can never be satisfied, quenched, satiated.
Sexual desires are greatest hurdles in the path of Moksh. They pollutant the mind and distract one from the righteous path.
इन्द्रियाणि पराण्याहु-रिन्द्रियेभ्यः परं मनः।
मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः॥3.42॥
एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा  संस्तभ्यात्मानमात्मना।
जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम्॥3.43॥
इन्द्रियाँ स्थूल शरीर से श्रेष्ठ (सबल, प्रकाशक, व्यापक, सूक्ष्म) हैं, इन इन्द्रियों से श्रेष्ठ मन है, मन से भी श्रेष्ठ बुद्धि है और जो बुद्धि से भी अत्यन्त श्रेष्ठ है, वह आत्मा है। इस प्रकार बुद्धि से श्रेष्ठ आत्मा को जानकर और बुद्धि द्वारा मन (काम, वासना, आसक्ति)  को वश में करके, हे महाबाहो! तुम इस काम रूप दुर्जय शत्रु को मार डालो।
The senses are superior to the human body which houses them, the MAN (innerself, mood, mind-brain, psyche) is superior to the senses, the intelligence is superior to the MAN and the the soul is superior-stronger to the intelligence. Being aware of the fact that the soul is superior to the intelligence, utilize the intelligence to smash, vanish, kill the enemy in the shape of desires, motives, aspiration.
Restrain-control the body through senses, senses through psyche, psyche through intelligence-prudence and intelligence through Soul.
मनुष्य को इन्द्रियों के द्वारा विषयों का भान होता है। अतः इन्द्रियाँ शरीर और विषयों से भी श्रेष्ठ हैं। इन्द्रियाँ मन को नहीं जानतीं, परन्तु मन इन्द्रियों को जानता है। इन्द्रियाँ अपने-अपने विषय को जानती हैं। मन बुद्धि को नहीं जानता, मगर बुद्धि मन को और उसके संकल्पों को जानती है। बुद्धि का स्वामी अहम् है, बुद्धि कारण है और अहम् कर्ता, कारण परतंत्र होता है, पर कर्ता स्वतंत्र। अहम् के जड़ (प्रकृति) अंश में काम का निवास है। जड़ अंश से तादात्म्य होने के कारण, वह काम स्वरूप-चेतन में रहता प्रतीत होता है। अहम् में ही काम रहता है, जो कि भोगों की इच्छा करता है और सुख-दुःख का भोक्ता बनता है। भोक्ता, भोग और भोग्य सजातीय हैं। अहम् तक, सब कुछ प्रकृति का अंश है और उस अहम् से आगे परमात्मा का अंश स्वयं है, जो शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि और अहम् का आश्रय, आधार, कारण और प्रेरक है तथा श्रेष्ठ, बलवान, प्रकाशक, व्यापक और सूक्ष्म है।
जड़ प्रकृति का अंश ही सुख-दुःख रूप में परिणित होता है। चेतन में विकृति नहीं है, प्रत्युत चेतन विकृति का ज्ञाता है। जड़ से तादात्म्य होने पर सुख-दुःख का भोक्ता चेतन ही बनता है। केवल जड़ में सुख या दुःख नहीं होता और चेतन भी स्वयं को भोक्ता मान लेता है। परमात्म तत्व का साक्षात्कार होते ही रसबुद्धि निवृत हो जाती है। भोक्तापन में जो निर्लिप्त तत्व है, उसके ज्ञान से रस अर्थात काम की निवृति हो जाती है। परमात्मा के साक्षात्कार से काम सर्वदा और सर्वथा मिट जाता है। अपने आप में अपने को वश में करने से, काम मरता है। मनुष्य इस काम को जो कि दुर्जय शत्रु है, वश में करने में समर्थ है। 
The human being identifies the subjects & objects through the senses. So, the senses are stronger than the physique-body and the objects-subjects of lust. The senses are unaware of the the MAN (inner self, psyche) but the MAN identifies-knows the senses. Man does not recognize the intelligence but the intelligence identifies-controls the MAN (mood, desires). The ego commands the intelligence. Intelligence is a tool and the ego is the master. Ego-pride dominates the intelligence. This ego is a component of the nature. The ego has a close relation ship with the static (inertial component, nature), but the static component too has a relationship with the awake (energised, living, conscious). The awaken bears all pleasures & pains. The ego seeks pleasure and the awake-conscious, suffers-bears the pain. Beyond ego exists the soul-component of the Almighty. The soul is superior to the body, MAN, intelligence & ego and provides support-sustain them being base, reason and inspiring & is superior, strong, enlightening, pervading and minute.
The static-inertial component of nature ego, converts into pleasures & pains-miseries. Soul constitutes the living-awake component which has no defect. This soul is aware of the defects, impurities, stains. Attachment of the soul with the static make the soul experience-bear pleasure-pains. The soul is a component of the Almighty. On realisation of this state, the human being, discards the tendency to accept (find, experience, enjoy) the comforts. Here detachment appears and the devotee is set free from the clutches of desires (lust, tendency to enjoy the comforts, passions). The realisation of the Almighty vanishes the desires for ever and relinquishment appears. Allurements (attachments, bonds, ties) break. The human being is capable of controlling himself from the onslaught of desires, his worst possible enemy.
Its the pious duty of an individual to control his demands (desires, aspiration, motives, provocations) so as to rise above the nature and move closer to the Almighty. Soul is a component of the Almighty. So, seek asylum in the Almighty.
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे कर्मयोगो नाम तृतीयोऽध्यायः॥3॥ 
ॐ तत् सत्! इस प्रकार ब्रह्मविद्या का योग करवाने वाले शास्त्र, श्रीमद्भगवद्गीता रूपी उपनिषद् में भगवान् श्री कृष्ण और अर्जुन के संवाद रूपी कर्म योग नाम वाला तृतीय अध्याय सम्पूर्ण हुआ।  
Om Tat is Truth! This completes the third chapter of Shrimad Bhagwad Gita, an Upnishad to unify one with the Almighty. Third chapter depicts the conversation between Bhagwan Shri Krashn and Arjun and is named as KARM (ACTION) YOG.
Revision of the sacred text has been completed today i.e., October 15, 2018 at Gledswood Hills, NSW, Sydney, Australia., by the grace of the Almighty. The text is presented to the pious, virtuous, righteous souls studying it.(Reviewed 19.03.2023)
नाभुक्तं क्षीयते कर्म कल्पकोटिशतैरपि।
अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्
अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्। 
नाभुक्तं क्षीयते कर्म कल्पकोटिशतैरपि
अपना किया हुआ जो भी कुछ शुभ-अशुभ कर्म है, वह अवश्य ही भोगना पड़ता है। बिना भोगे तो सैंकड़ों-करोड़ों कल्पों के गुजरने पर भी कर्म नहीं टल सकता। कर्म कर चुकने पर उसे परमात्मा की व्यवस्था से शुभाशुभ, पुण्य-पाप फल भोगना पड़ता है।[ब्रह्मवैवर्त प्रकृति 37.16-17]
    
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संतोष महादेव-धर्म विद्या सिद्ध व्यास पीठ (बी ब्लाक, सैक्टर 19, नौयडा)

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