Tuesday, February 7, 2012

INCARNATIONS OF BHAGWAN SHRI HARI VISHNU & BHAGWAN SHIV भगवान् श्री हरी विष्णु व भगवान् शिव के अवतार

 
INCARNATIONS OF BHAGWAN SHRI HARI VISHNU & BHAGWAN SHIV
भगवान् श्री हरी विष्णु व भगवान् शिव के अवतार
CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM
By: Pt. Santosh Bhardwaj
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ॐ गं गणपतये नम:।
अक्षरं परमं ब्रह्म ज्योतीरूपं सनातनम्।
निराकारं स्वेच्छामयमनन्तजम्॥
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि
[श्रीमद्भगवद्गीता 2.47]
गहन अन्धकार को चीरकर अव्यक्त-निराकर परब्रह्म परमेश्वर ने स्वयं को साकार भगवान् श्री कृष्ण के रूप में व्यक्त किया।परमात्मा श्री कृष्ण ने ने स्वयं को दो भागों में विभाजित किया और उनसे भगवान् श्री कृष्ण और आदि शक्ति माँ भगवती प्रकट हुईं। माँ भगवती से राधा जी और राधा जी और भगवान् श्री कृष्ण से विराट पुरुष-महाविष्णु की उत्पत्ति हुई, जिनसे अनन्त ब्रह्माण्ड और प्रत्येक ब्रह्माण्ड में भगवान् ब्रह्मा, भगवान् विष्णु और भगवान् शिव प्रकट हुए। ये तीनों ही एक ही पुरुष के तीन रूप हैं। माँ भगवती आदि शक्ति प्रकृति नियन्ता हैं।
परमात्मा ने स्वयं को दो भागों में विभाजित किया और श्री कृष्ण रूप में गौलोक तथा चतुर्भुज रूप में वैकुण्ठ लोक में श्री हरी विष्णु के रूप में प्रतिष्ठित हुए। गौलोक समस्त ब्रह्माण्डों का 64 आयामी केंद्र है। गौलोक और वैकुण्ठ सामान स्तर के हैं। वैकुण्ठ लोक अत्यंत भव्य, सुन्दर और सुखकारी है। महाविष्णु के जितने रोम हैं उतने ही ब्रह्माण्ड हैं। हमारे ब्रह्माण्ड में भगवान् विष्णु श्वेत द्वीप में विराजमान हैं। 
श्री कृष्ण, भगवान् श्री हरी विष्णु, विराट पुरुष एक ही शक्ति के व्यक्त रूप हैं, जो एक भी हैं और अनेक भी।
त्रिदेव भगवान् श्री हरी विष्णु पालनहार, ब्रह्मा जी सृजन कर्ता और भगवान् शिव संहारक हैं। ब्रह्मा, विष्णु और महेश-शिव एक ही शक्ति-परब्रह्म परमेश्श्वर के तीन रूप हैं जो कि अलग-अलग भी हैं और एकीकृत भी। 
माता भगवती लक्ष्मी भगवान् विष्णु की पत्नी हैं। माता पार्वती, पूर्व में माँ भगवती सती; भगवान् शिव की पत्नी हैं तथा ब्रह्माणी ब्रह्मा जी की पत्नी हैं।
वैकुण्ठ लोक :: यह भगवान् श्री हरी विष्णु का धाम है जहाँ क्षीर सागर में वे माँ भगवती लक्ष्मी के साथ शेष शय्या पर विराजमान हैं। वह अपने नीचे वाले बाएँ हाथ में पद्म (कमल), अपने नीचे वाले दाहिने हाथ में गदा (कौमोदकी), ऊपर वाले बाएँ हाथ में शंख और अपने ऊपर वाले दाहिने हाथ में चक्र (सुदर्शन) धारण करते हैं।
भगवान् श्री हरी  विष्णु का स्वरूप :: उनका सम्पूर्ण स्वरूप ज्ञानात्मक है। उनके द्वारा धारण किये जाने वाले आभूषणों तथा आयुधों प्रतीकात्मक हैं।  
कौस्तुभ मणि :: जगत् के निर्लेप, निर्गुण तथा निर्मल क्षेत्रज्ञ स्वरूप,
श्रीवत्स :: प्रधान या मूल प्रकृति,
गदा :: बुद्धि,
शंख :: पंचमहाभूतों के उदय का कारण तामस अहंकार,
शार्ंग (धनुष) :: इन्द्रियों को उत्पन्न करने वाला राजस अहंकार,
सुदर्शन चक्र :: सात्विक अहंकार,
वैजयन्ती माला :: पंचतन्मात्रा तथा पंचमहाभूतों का संघात (वैजयन्ती माला मुक्ता, माणिक्य, मरकत, इन्द्रनील तथा हीरा; इन पाँच रत्नों से बनी होने से पंच प्रतीकात्मक),  
बाण :: ज्ञानेन्द्रिय तथा कर्मेन्द्रिय,
खड्ग :: विद्यामय ज्ञान, जो अज्ञानमय कोश (म्यान) से आच्छादित रहता है। 
इस प्रकार समस्त सृजनात्मक उपादान तत्त्वों को भगवान् श्री हरी विष्णु अपने शरीर पर धारण किये रहते हैं।
शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशम्; 
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघ वर्णं शुभांगम्। 
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यम्; 
वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥
जिनकी आकृति अतिशय शांत है, जो शेषनाग की शैया पर शयन किए हुए हैं, जिनकी नाभि में कमल है, जो ‍देवताओं के भी ईश्वर और संपूर्ण जगत के आधार हैं, जो आकाश के सदृश सर्वत्र व्याप्त हैं, नीलमेघ के समान जिनका वर्ण है, अतिशय सुंदर जिनके संपूर्ण अंग हैं, जो योगियों द्वारा ध्यान करके प्राप्त किए जाते हैं, जो संपूर्ण लोकों के स्वामी हैं, जो जन्म-मरण रूप भय का नाश करने वाले हैं, ऐसे लक्ष्मीपति, कमलनेत्र भगवान श्रीविष्णु को मैं प्रणाम करता हूँ।विष्णु के अवतार :: अवतार का शाब्दिक अर्थ है, भगवान् का अपनी स्वातंत्र्य-शक्ति के द्वारा भौतिक जगत् में मूर्त रूप से आविर्भाव होना, प्रकट होना।
अवतार की सिद्धि दो दशाओं में मानी जाती है :- (1). अपने रूप का परित्याग कर कार्यवश नवीन रूप का ग्रहण तथा (2). नवीन जन्म ग्रहण कर सम्बद्ध रूप में आना, जिसमें माता के गर्भ में उचित काल तक एक स्थिति की बात भी सन्निविष्ट है। इसमें अत्यल्प समय के लिए रूप बदलकर या किसी दूसरे का रूप धारणकर पुनः अपने रूप में आ जाना शामिल नहीं होता।
भगवान् ने स्वयं अवतार का प्रयोजन बताते हुए कहा है कि जब-जब धर्म की हानि और अधर्म का उत्थान हो जाता है, तब-तब सज्जनों के परित्राण और दुष्टों के विनाश के लिए मैं विभिन्न युगों में (माया का आश्रय लेकर) उत्पन्न होता हूँ।[श्रीमद्भगवद्गीता 4.7-8]
भगवान् प्रकृति सम्बन्धी वृद्धि-विनाश आदि से परे अचिन्त्य, अनन्त, निर्गुण हैं। वे अवतार रूप में अपनी लीला को प्रकट करके जीव को अपके अशेष गुणों को समझाते हैं? जीवों के प्रेरणारूप कल्याण के लिए उन्होंने अपने को (अवतार रूप में) तथा अपनी लीला को प्रकट किया। 
हंस: कूर्मश्च मत्स्यश्च प्रादुर्भावा द्विजोत्तम॥
वराहो नरसिंहश्च वामनो राम एव च। रामो दाशरथिश्चैव सात्वत: कल्किरेव च॥[महाभारत शान्तिपर्व]
श्री भगवान् नारद जी से कहते हैं :- हंस, कूर्म, मत्स्य, वराह, नरसिंह, वामन परशुराम, दशरथनन्दन राम, यदुवंशी श्रीकृष्ण तथा कल्कि; ये सब मेरे अवतार हैं। आगे यह भी कहा गया है कि ये भूत और भविष्य के सभी अवतार हैं।
प्रमुख अवतार :: (1). वराह, (2). नरसिंह, (3). वामन, (4). परशुराम, (5). राम और (6). कृष्ण। 
मत्स्य: कूर्मो वराहश्च नरसिंहश्च वामन:; 
रामो रामश्च रामश्च कृष्ण: कल्की च ते दश।
महाभारत दाक्षिणात्य, पद्मपुराण (उत्तरखण्ड 257.40-41), लिंगपुराण (2.48.31-32), वराहपुराण (4.2), मत्स्यपुराण (2.85.6-7) आदि में दशाश्वतारों का वर्णन है। भागवत महापुराण में 22 तथा 24 अवतारों वर्णन है।
दशाश्वतार वन्दना ::
नमो मत्स्याय देवाय कूर्मदेवाय वै नमः। 
नमो वाराहदेवाय नरसिंहाय वै नमः॥  
वामनाय नमस्तुभ्यं परशुरामाय ते नमः। 
नमोSस्तु रामदेवाय विष्णुदेवाय ते नमः॥  
नमोSस्तु बुद्धदेवाय कल्कि च नमो नमः। 
नमः सर्वात्मने तुभ्यं शिरसेत्य भिपूजयेत्॥  
मत्स्य, कच्छप, वाराह, नरसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध तथा कल्कि, ये दस अवतार धारण करनेवाले आप सर्वात्मा को मैं मस्तक झुका कर नमस्कार करता हूँ।
MATSYAVTAR मत्स्यावतार :: पूर्व कल्प के अन्त में ब्रह्मा जी की तन्द्रावस्था में उनके मुख से निःसृत वेद को हयग्रीव दैत्य के द्वारा चुरा लेने पर भगवान् ने मत्स्यावतार लिया तथा सत्यव्रत नामक राजा से कहा कि सातवें दिन प्रलयकाल आने पर समस्त बीजों तथा वेदों के साथ नौका पर बैठ जाएँ। उस समय सप्तर्षि के भी आ जाने पर भगवान् ने महामत्स्य के रूप में उस नौका को उन सबके साथ अनन्त जलराशि पर तैराते हुए उन सबको बचा लिया। पश्चात् हयग्रीव को मारकर वेद वापस ब्रह्मा जी को दे दिया।
It represents the first incarnation of the Almighty when he took the zoomorphic form to salvage the creatures from the insistent rains leading to delude, devastation, floods over the earth. The event is connected to the Saty Yug-cosmic era which is the period of truthfulness, virtuousness, piousness, righteousness. 
Bhagwan Vishnu appeared before Prajapati Manu-the progenitor of mankind, as a small fish in his hands, while he was taking a bath in the river waters. Manu took it to his palace and placed in a pitcher. It grew to the size of the pitcher in a fraction of seconds and requested to be placed else where. King took him to the pond, where again it took seconds to to grow to the size of the pond. King was astonished-aghast. He was again asked to take the fish to safety in some bigger water body. Now, the king utilised his Yog Shakti (mystic, ascetic powers) to do the needful and take the giant fish to the river. The king was amazed when the fish took super normal size. King concentrated into meditation and thought over the event. He immediately realised that the fish was non other than the Almighty HIMSELF who had come to salvage him, due to the virtuous deeds in his previous many-many births. Now, he folded his hands and requested HIM to come to HIS real form. The lord conceded to his prayers and showed him, HIS figure with four hands bearing, Sudarshan Chakr, mash, lotus and Abhay Mudra. 
The Almighty asked Manu to prepare himself for the great deluge, devastation, flood, which was going to occur with in 7 days of his appearance  He was asked to be ready with the 7 sages (Atri, Vashishth, Vishwamitr, Gautam, Jamdagni, Kashyap,  Bhardwaj) along with all varieties-species of creatures on earth and place them in the gigantic divine boat, which will appear just before the event and tie it with the horn over his head in the fish formation. The great serpent-another incarnation (Nag Raj Vasuki) of the Almighty will form the rope and cover the boat with his hood to save them from insistent rains.
At the appointed time The Almighty appeared along with HIS another incarnation and kept roaming over the waters telling-describing the story of the evolution, which forms the core of Matsy Puran.
When waters receded the The Almighty left them near Badrikashram-Badri Dham and entered waters to salvage Veds from the hold of Hay Greev-the demon-giant, killing-slewing him and handing over the Veds back to Brahma Ji.
Bhagwan Vishnu's Matsy Avtar is with the upper half as human bearing Kireet (Mukut, Tall conical Crown), over the head, four hands bearing Sudarshan Chakr-discuss, Shankh-conch, Varad Mudra (granting boons, assurance to the devotees) of protection and Gada-mace. The lower half is in the form of a fish. This is anthropomorphic form with human torso is connected to the rear half as a fish.
Whosoever, whenever and wherever, will remember-recollect the story of the Almighty in ten incarnations, will be able to obtain peace-solitude and tranquillity and ultimately able to attain salvation. 
KURM AVTAR  कूर्मावतार :: असुरराज बलि के नेतृत्व में दानवों द्वारा देवताओं को परास्त कर शासन-च्युत कर देने पर भगवान् ने देवताओं को दानवों के साथ मिलकर समुद्र मंथन करने को कहा और जब मन्थन के समय मथानी (मन्दराचल) डूबने लगा तो कूर्म (कच्छप) रूप धारणकर उसे अपनी पीठ पर स्थित कर लिया। इसी मन्थन से चौदह रत्नों की प्राप्ति हुई।
It is the second incarnation of Bhagwan Vishnu, who is a component of the Almighty-SHRI KRISHN. It occurred-took place in Sat Yug. KURM stands for Anthropomorphic-Zoomorphic form of a tortoise-turtle. Durwasa-an incarnation of Bhagwan shiv, son of Atri and Anusuya offered a garland to Indr the king of demigods in the heaven. Dev Raj Indr unknowingly-carelessly, passed on the garland of flowers to his elephant Aeravat, who in turn shattered-tramped it. The garland which was going to become a boon-blessing to Indr turned into a bow-curse, leading to the down fall of demigods from the heaven and occupation  its by the Rakshas, giants, demons, Asur. Devs soon became weak and fragile and sought Bhagwan Shri Hari Vishnu's help.
Bhagwan Vishnu asked them to approach the demons to come to negotiations and extract elixir-nectar from the ocean, which they readily agreed to.  Mandranchal mountain formed the churning stock and Mighty serpent Nag Raj Vasuki became the cord-rope. The Mandranchal Parwat could not be stabilised and it started sinking in the ocean. At this juncture Bhagwan Vishnu took the form of a tortoise, to support the base-foundation for the mountain to move-slide over it. The churning yielded 14 valuables along with Amrat (nectar, elixir). The event is popularly depicted as Samundr (ocean) Manthan (churning) in Purans.
MOHINI-ENCHANTMENT OF BHAGWAN VISHNU :: After the recovery of nectar-elixir from the ocean, the dispute pertaining to its distribution had to be resolved-settled. At this juncture, Bhagwan Vishnu assumed the form of the most-supernaturally beautiful-attractive woman-perfect in all senses and appeared before the demons-giants (Asur, bad, evil-wretched, wicked souls). Demons forgot elixir and started craving for her, due to the enchantment over them cast by the Almighty. They assigned the task of distribution of elixir to her. A row was formed and the demigods were the ones to receive it first. Rahu could see through the plan and moved to the side of the demigods by assuming their shape-figure. As soon as he had the sip of nectar, he was recognized by Bhawan Sury (Sun) and Chandr (Moon). They immediately cautioned Bhagwan Vishnu in the grab of Mohini, about the trick-game played by Rahu, the Chief of Demon's army. Bhagwan Vishnu recalled Sudarshan Chakr who immediately beheaded Rahu. Since, Rahu had elixir in his mouth, which could not cross the neck, he was divided into two components called Rahu and Ketu, the Dragon heads of astrology.
Bhagwan Shiv could not control himself to see this incarnation of Bhagwan Vishnu and he requested Bhagwan Vishnu to oblige him by revealing himself as Mohini. Bhagwan Vishnu agreed to do so. He appeared before Bhagwan Shiv, who immediately started chasing him, but could not approach the enchantment-Mohini. He became so much passionate that his sperms were ejected out of the body. Fragments of these sperms which fall over the earth formed gold mines, while the major component of them, was stored-conserved by the saints-sages for the future Rudravtar-Hanuman Ji Maha Raj. Sperms were transferred to Maa Anjali by the Pawan. Bhagwan Shiv soon realized what had happened and became the one and only one who could not be deceived by the enchantments of Bhagwan Vishnu. At this juncture Bhagwan Shiv freed himself from the impact of Kam Dev for ever. As result of which Kam Dev was turned to ashes at a later stage.
Mohini was exceptionally-supernaturally beautiful, in a manner-sense that a woman can never  be so, for one has to be real. She was a facsimile of the Creative Feminine and starkly, cruelly, flawless. Mohini was a fantastic version of femininity. Her attributions-attractions were precisely as if she was not a woman.  In reality she was not a woman. Trying to possess this impossibly beguiling "woman" is what drives the men to  madness. This is why the woman is often refereed to as illusion.
Bhagwan Shankar granted boon to Bhasmasur that the one who so ever come under his hands, will be turned to ashes-burnt. Bhasmasur tried it out on Bhagwan Shankar himself. Bhagwan Shiv did not want the boon to be proved incorrect and protect himself, side by side. He remembered Bhagwan Vishnu at once. Bhagwan Vishnu appeared before Bhasmasur in his Mohini grab. Bhasmasur was enchanted. He forgot Bhagwan Shiv and offered to marry Mohini. Bhagwan Vishnu told him that Mohini would marry him only  if he could dance exactly like her. In one of the posture Mohini placed her hand over her head and Bhasmasur did the same-copied her and got burnt at once-turning to ashes.
VARAH AVTAR  वराह अवतार :: Length of Brahma Ji's one day is 4 Arab, 32 Crore (4,32,00,00,000) solar years on earth, followed  by same length of night. On completion of Brahma Ji's day, comes the period of destruction Praly-Deluge, in between his day and night. The gap between the Heavens, earth and hells is covered with water, in stead of space-ether. 
Please refer to :: ANCIENT HINDU CALENDAR काल गणनाsantoshkipathshala.blogspot.com
Brahma Ji woke up to find that the earth was missing. It had sunk deep inside water. At this juncture a small bore sneezed out of the nostril of Brahma Ji. It acquired enormous size and entered the water to plunge the earth out of it, successfully and locate it the right position. The earth was balanced between the snort and the two tusks by the Almighty before placing it at the right location in the Solar system. This was the beginning of Saty Yug.
This is considered to be the third incarnation in a sequence of 10 incarnations out of which 9 have already taken place and the 10th will take place during Kali Yug.
Hiranyaksh was an incarnation of Jay a caretaker cum gatekeeper in Vaikunth Lok, abode of Almighty Bhagwan Vishnu. He was cursed by Sanat Kumars, when  they were obstructed from entering the Almighty's resting place in the company of mother Goddess Laxmi. Hiranyaksh took the earth to the cosmic bottom-primordial waters, after Praly-Deluge, before the beginning of new Kalp-cosmic cycle. 
Deities, sages, Devs, Swambhu Manu,  sage Marichi along with other sages,  prayed to Brahma Ji to salvage-retrieve the earth, to facilitate the beginning of new era-cosmic regeneration.
Varah Avtar had the head of a boar-an anthropomorphic form, with four hands holding the Sudarshan Chakr-disc-wheel, conch shell, a mace and  a sword.
NAR SINGH AVTAR :: Out of the 60 daughters of Daksh Prajapati, 13 were married to Mahrishi Kashyap. One of the 13 wife's of Kashyap Rishi, Diti gave birth to 2 sons called Hiranyaksh and Hiranykshipu. Both of them were furious-ferocious demons (giants-Rakshash). Hiranyaksh was killed while the earth was salvages by Varah Avtar. Hiranykshipu wanted to take revenge from the Almighty Vishnu. He set himself to profound meditations, asceticism, austere penances, austerities and Yog. Ultimately, Brahma Ji appeared before him & asked him for the boon. Hiranykshipu asked for immortality, but Brahma Ji denied-declined, since no one is immortal (Ajar, Amar). Who so ever is born has to die one day or the other.
Still Hiranykshipu was not disheartened and requested that he should neither be killed either inside the house-residence nor outside the house,  during the day or the night, over the ground or the sky, any weapon, by a human-animal or any of the creations of the Brahma Ji, demigod or a demon. He wanted the benediction to bind the death, so that he had no rivals as well, sovereignty-supremacy over living and presiding deities and mystic powers. Brahma Ji granted the boons and left. Hiranykashipu was glad-happy, under the illusion-impression that he had won over death.
Dev Rishi Narad protected Kyadu the wife of Hiranykshipu from the attack of Indr-the king of demigods. She took asylum in the Ashram of Dev Rishi and gave birth to Prahlad. Prahlad acquired Vishnu Bhakti in the womb by virtue of the divine rituals, prayers, piousity, holiness prevailing in the Ashram, each and every moment.

Prahlad was affected by the transcendental instructions of the sage even at such a young stage of development. Prahlad Ji started showing devotion to Bhagwan Shri Hari Vishnu from the very tender age, much to the disappointment of Hiranykshipu. Hiranykshipu was furious due to the devotion of his son to Bhagwan Vishnu. He decides to eliminate Prahlad, when he refused to recognise him superior to the God.  All attempts led to utter failure. Hiranykashipu's sister Holika too tried to burn Prahlad in fire, which engulfed her and spared Prahlad. Prahlad was under the protection of the Almighty. He repeatedly told his father that the Almighty was all-pervading and omnipresent. Hiranykshipu wanted know if Bhagwan Vishnu was present in the pillar of the Palace Court. Prahlad Ji replied that Bhagwan Vishnu was present in each and every thing. Hiranykshipu could not hold anger any more, unable to tolerate his son's treatise. He tried to smash the pillar to show that nothing was there inside. He himself pounced to kill Prahlad.

At this juncture the Nar Singh (a fusion of human body and lion's head) appeared-descended as an anthropomorphic incarnation, with the body of a man and head and claws of a lion-out of the pillar, caught hold of  Hiranykshipu, placed him over his thighs and teared his stomach with his nails. He was an incarnate-half human half lion. It was evening, twilight-dusk, neither day nor night. Tearing of the stomach-disembowels, took place at the door step-thresh hold, neither inside the house nor out side the house. He was not killed by a weapon. Nar Singh was not a creation of Brahma Ji. He was not killed by demons, humans, demigods. It was not battle field, either.
All the demigods, Laxmi Ji and Bhagwan Shiv descended over the scene to witness the elimination of the traitor. None of them could calm down the Almighty. Ultimately, Brahma Ji him self took Prahlad Ji to the Nar Singh. Prahlad Ji started prayers and gradually Bhagwan Vishnu cooled down and blessed Prahlad Ji. Prahalad Ji voluntarily relinquished the throne and is now staying in Sutal Lok governed by Raja Bahu Bali his grand son along with Vibhishan Ji etc.
ऋषि कश्यप, हिरण्यकश्यप और हिरण्याक्ष :: संपूर्ण धरती पर जल-जल ही था। जल जब हटा तो धरती का सर्वप्रथम हिस्सा जो प्रकट हुआ, वह मेरू पर्वत के आसपास का क्षेत्र था। यह पर्वत हिमालय के बीचों बीच का हिस्सा है। यहीं पर कैलाश पर्वत है। मरीचि के पुत्र और ब्रह्मा जी के पौत्र महृषि कश्यप की तपोभूमि है, कश्मीर। सुर-असुरों के मूल पुरुष ऋषि कश्यप का आश्रम मेरू पर्वत के शिखर पर था, जहाँ पर वे परब्रह्म परमात्मा के ध्यान में लीन रहते थे। समस्त देव, दानव एवं मानव ऋषि कश्यप की आज्ञा का पालन करते थे। 
जय विजय को श्राप :: एक समय चारों सनकादि कुमार भगवान् श्री हरी विष्णु के दर्शनार्थ वैकुण्ठ जा पहुँचे। वे वहाँ के सौंदर्य को देखकर बड़े प्रसन्न हुए। वहाँ स्फटिक मणि के स्तंभ थे, भूमि पर भी अनेकों मणियाँ जड़ित थीं। भगवान् के सभी पार्षद नन्द, सुगन्ध सहित वैकुण्ठ के पति का सदैव गुणगान किया करते हैं। चारों मुनि छः ड्योढ़ियाँ लाँघकर जैसे ही सातवीं ड्योढ़ी पर चढ़े, उनका दृष्टिपात दो महाबलशाली द्वारपाल जय तथा विजय पर हुआ। कुमार जैसे ही आगे बढ़े, दोनों द्वारपालों ने मुनियों को धृष्टतापूर्वक रोक दिया। यद्यपि वे रोकने योग्य न थे, इस पर सदा शाँत रहने वाले सनकादि मुनियों को भगवत् इच्छा से क्रोध आ गया। वे द्वारपालों से बोले "अरे! बड़ा आश्चर्य है। वैकुण्ठ के निवासी होकर भी तुम्हारा विषम स्वभाव नहीं समाप्त हुआ? तुम लोग तो सर्पों के समान हो। तुम यहाँ रहने योग्य नहीं हो, अतः तुम नीचे लोक में जाओ। तुम्हारा पतन हो जाये"। इस पर दोनों द्वारपाल मुनियों के चरणों पर गिर पड़े। तभी भगवान् का आगमन हुआ। मुनियों नें भगवान् को प्रणाम किया। श्री भगवान् कहते हैं "हे ब्रह्मन्! ब्राह्मण सदैव मेरे आराध्य हैं। मैं आपसे मेरे द्वारपालों द्वारा अनुचित व्यवहार हेतु क्षमा प्रार्थी हूँ"। उन्होंने द्वारपालों से कहा "यद्यपि मैं इस श्राप को समाप्त कर सकता हूँ; परंतु मैं ऐसा नहीं करुँगा; क्योंकि तुम लोगों को ये श्राप मेरी इच्छा से ही प्राप्त हुआ है। तुम लोग इसके ताप से तपकर ही चमकोगे, यह परीक्षा है, इसे ग्रहण करो। एक बात और, तुम मेरे बड़े प्रिय हो"। द्वारपालों ने श्राप को ग्रहण किया। मुनियों ने कहा "प्रभु! आप तो हमारे भी स्वामी हैं और सब ब्राह्मणों का आदर करते हुए सभी लोग मुक्ति को प्राप्त करें यह सोचकर हमें आदर प्रदान करते हैं। प्रभु आप धन्य हैं। सदैव हमारे हृदय में वास करें और द्वारपालों की मुक्ति आपके कर कमलों से ही"।  भगवान् ने द्वारपालों को कहा "द्वारपालों तुम तीन जन्म तक राक्षस योनि में जाओगे तथा मैं तुम्हारा उद्धार करुँगा"। इसी श्राप के कारण ये दोनों द्वारपाल तीन जन्मों तक राक्षस बने। प्रथम जन्म में ये दोनों ही हिरण्याक्ष तथा हिरण्यकश्यपु बनें, द्वितीय में रावण तथा कुम्भकर्ण तथा तृतीय जन्म में ये ही शिशुपाल तथा दन्तवक्र बने।
हिरण्यकश्यप के 4 पुत्र (अनुहल्लाद, हल्लाद, भक्त प्रह्लाद और संहल्लाद) :: अदिति के पुत्र सुर-देवगणों और दिति के पुत्र असुरों में त्रिलोकी के अधिपत्य को लेकर देवासुर संग्राम हुआ।
हिरण्याक्ष भयंकर दैत्य था। वह तीनों लोकों पर अपना अधिकार चाहता था। हिरण्याक्ष ने तपस्या करके ब्रह्मा से युद्ध में अजेय रहने का वरदान प्राप्त किया और निरंकुश हो गया। उसने वेदों को चुरा लिया और पृथ्वी को भी जल में छुपा दिया। भगवान् विष्णु ने वराह रूप धारण करके पृथ्वी को अपने थूथन पर धारण करके जल से बाहर निकाला और हिरण्याक्ष का वध करके वेदों को मुक्त किया। भगवान् विष्णु ने नील वराह का अवतार लिया फिर आदि वराह बनकर हिरण्याक्ष का वध किया इसके बाद श्‍वेत वराह का अवतार नृसिंह अवतार के बाद लिया।
हिरण्यकश्यप ने अपने भाई की मौत का बदला लेने के लिए कठोर तपस्या की और ब्रह्मा जी से वरदान किया। उसका पुत्र प्रह्लाद भगवान् विष्णु का परम भक्त था। हिरण्यकश्यप को यह अच्छा नहीं लगता था। हिरण्याक्ष की तरह वह चाहता था कि संपूर्ण धरती के देव, दानव और मानव उसे ईश्‍वर मानें। भगवान् विष्णु ने नृसिंह का अवतार लेकर उसका वध किया। ब्रह्मा जी सहित सभी देवताओं ने उनकी आराधना की तो भी वे शान्त नहीं हुए, तब ब्रह्मा जी के आदेश पर प्रह्लाद ने उनकी स्तुति की और वे शाँत हो गए। भक्त प्रह्लाद के विरोचन जैसे दानवीर पुत्र हुए और उनके ही पुत्र राजा बाहु बली हुए। सहस्त्रबाहु जो कि भगवान् शिव के परम भक्त थे, उन्हीं के पुत्र थे। भगवान् श्री कृष्ण ने सहस्त्रबाहु की भुजाओं को काटा। भगवान् शिव ने उसे बताया कि उनमें और भगवान् कृष्ण में अंतर नहीं है।
VAMANAVTAR वामनावतार :: प्रह्लाद के पौत्र, विरोचन के पुत्र दानवराज बलि द्वारा स्वर्गाधिपत्य प्राप्त कर लेने पर कश्यप जी के परामर्श से माता अदिति के पयोव्रत से प्रसन्न होकर भगवान् ने उनके घर जन्म लेकर वामन रूप में बलि की यज्ञशाला में पधारकर तीन पग भूमि माँगी और फिर विराट रूप धारण कर दो पगों में पृथ्वी-स्वर्ग सब नापकर तीसरा पद रखने के लिए बलि द्वारा अपना सिर दिये जाने पर उसे सुतल लोक भेज दिया।
Vamanavtar of Bhagwan Vishnu took place in Treta-Yug (Cosmic Era, Age). Vaman stands for dwarf and Brahmn as well. The fourth descendant of Hiranykashyap, Demon King Bahu Bali (Son of Virochan and grand son of Bhakt Prahlad), was able to defeat Indr (king of demigods, a Brahm), the demigod of firmament. This humbled-humiliated the demigods and the deities. King Bahu Bali became the unquestioned ruler-emperor of the three worlds-heavens, earth and Nether world (Patals). The demigods, deities, sages appealed to Bhagwan Vishnu for protection. Bhagwan Vishnu took birth as a Brahmn smaller in size as compared to the people of those times. Bahu Bali had a record of donations and charity from his previous birth. Who so ever, came to him was not allowed to return back unless his needs-requirements were met. 
Guru Shukrachary advised him to perform the Yagy which could make him most powerful person in the Universe. Vaman Dev came to deceive Bahu  Bali of all his possessions. Bahu Bali honoured him and requested him to ask, what he needed, who was happy to see the dimunited holy man. Bahu Bali promised to do every thing asked by HIM, in spite of the warning of his Guru that HE was none other than Bhagwan Vishnu. Bahu Bali reminded Shukrachary that he was the grand son of Prahlad and was honoured by the God by coming to him in the grab of a Brahmn. All that he had was given to Prahlad by Bhagwan Vishnu and that he would do what ever was asked, what ever may the consequences be. Vaman asked for three paces of land. Bali took the oath and agreed to do the needful. Now, Bhagwan Vishnu came to his real self-form and begun to extend his shape and size covering the entire earth, heaven  and Patal in two paces-feet. Bhagwan asked him for the third place, when the king Bahu Bali offered his head to put his foot there. The Vamanavtar obliged Bahu Bali and granted him immortality.
Bhagwan Vishnu awarded him with Sutal Lok, which is much more beautiful, luxurious, enchanting, revered as compared to Heavens. Bhagwan Vishnu agreed to safeguard Sutal Lok him self. At present Sutal Lok is the abode of Bhakt Prahlad, Bahu Bali, Vibhishan, Shukrachary and other mighty demons blessed by the God. King Bahu Bali will be the next Indr, but leave for Tapasaya, meditation, asceticism much before the completion of his term as Indr-the king of Swarg-heavens.
Bahu Bali is believed to have ruled Keral and Tulu Nadu. He is still worshipped there as the king of prosperity and recalled before the time of harvest. All citizens of Keral worship him irrespective their religion-caste.
PARSHU RAM AVTAR परशुरामावतार :: 
भृगुदेव कुलं भानुं, सहस्रबाहुर्मर्दनम्।
रेणुका नयनानंदं, परशुं वन्दे विप्रधनम्
ॐ जमदग्न्याय विद्महे महावीराय धीमहि।
तन्नो परशुराम: प्रचोदयात
भगवान विष्णु के छठें अवतार भगवान परशुराम जी जन्मोत्सव अक्षय तृतीया के पावन पर्व की बधाई एवं शुभकामनाएं। अन्यायी क्षत्रियों और विशेषतः हैहयवंश का नाश करने के लिए भगवान् ने परशुराम जी के रूप में अंशावतार ग्रहण किया था। उन्होंने इस पृथ्वी को इक्कीस बार क्षत्रियहीन कर दिया। ये महान् पितृभक्त हैं। पिता की आज्ञा से इन्होंने अपनी माता का भी वध कर दिया था और पिता के प्रसन्न होकर वर माँगने के लिए कहने पर, पुनः माता को जीवित करवा लिया था। अत्याचारी कार्तवीर्य अर्जुन (सहस्रार्जुन) के हजार हाथों को इन्होंने युद्ध में काट डाला था और उसके पुत्रों द्वारा जमदग्नि ऋषि (परशुराम जी के पिता) को बुरी तरह घायल कर हत्या कर देने पर, इन्होंने अत्यन्त क्रोधित होकर उन सबका वध करके इक्कीस बार पृथ्वी को क्षत्रियहीन करके उनके रक्त से समन्तपंचक क्षेत्र में पाँच कुण्ड भर दिये थे। फिर यज्ञ करके सारी पृथ्वी कश्यप जी को देकर महेन्द्र पर्वत पर चले गये।
परशुराम जी के माता पिता :- रेणुका और जमदग्नि।
परशुराम जी ने पृथ्वी को इक्कीस बार आततायी  विहीन किया। 
भगवान् परशुराम जी की गति मन और वायु के समान है। 
परशुराम जी के गुरु :- भगवान् शिव।
परशुराम जी के प्रमुख शिष्यों के नाम :- भीष्म पितामह, गुरु द्रोणाचार्य, दानवीर कर्ण।
परशुराम जी का अवतार त्रेता युग में हुआ।
परशुराम जी भगवान् श्री हरी विष्णु के छठे अवतार थे।
परशुराम जी के पिता सप्तर्षियों के मंडल में सातवें ऋषि हुए। 
कैलाश पर्वत पर परशुराम जी का गणपति के साथ हुआ जिसमें उनका एक दाँत टूट गया और वो एकदंत कहलाये।
परशुराम जी ब्रह्मा जी के मानस पुत्र भृगु ऋषि के वंशज।
परशुराम जी ने कार्तवीर्यार्जुन सहस्त्रबाहु का वध किया। 
परशुराम जी के दादा और दादी :- सत्यवती और ऋचीक मुनि।
परशुराम जी महेन्द्र पर्वत पर तपस्या रत हैं।
भगवान् ने परशुराम के रूप में हैहयवंश का नाश करने हेतु अंशावतार ग्रहण किया था।
बाल्यावस्था में परशुराम जी ने भगवान् की तपस्या परम पवित्र चक्रतीर्थ पर की। 
परशुराम जी का सहस्त्रबाहु से युद्ध  नर्मदाजी के तट पर हुआ था।
भगवान् शिव ने परशुराम जी को त्रेलोक्य विजय कवच प्रदान किया।
परशुराम जी की माता ऋषि जमदग्नि की हत्या के पश्चात् शोक मग्न होकर सती हो गई।
परशुराम जी जमदग्नि ऋषि के सबसे छोटे पुत्र हैं।
ब्रह्मा जी की पाॅंचवी पीढ़ी में (ब्रह्मा जी के भृगु ऋषि, भृगु ऋषि के ऋचिक, ऋचिक के जमदग्नि, जमदग्नि के परशुराम जी) उत्पन्न हुए ।
मत्स्यराज से कवच माँगने के लिए परशुराम जी ने शृंगधारी संन्यासी का रूप धारण किया।
 He is the 6th incarnation of Bhagwan Vishnu. He is son of Renuka and Jamdagni. This incarnation appeared during the Treta Yug. He is one of the seven immortals or Chiranjivi. The purpose behind this incarnation was to eliminate-terminate-contain-curtail-control, the tyranny-reign of terror by the Kshatriy-rulers kings. Kartviry Arjun and his sons killed his father, in his absence, when Jamdagni refused to hand over Kam Dhenu to him. Parshu Ram wiped off the earth of the Kshatriy 21 times (only grown up who wore weapons were killed, women, children, infirm and those without arm were spared). He is the one who acquired the characteristics of both a Brahmn and Kshatriy. He is meditating at Mahendr Parvat in present Cambodia. His period of Avtar was over when he fought with his disciple Bhishm.
Parsu-Farsa (a weapon alike-icon to axe) was given to him by Bhagwan Shiv on completion of Tapasya (meditation). So, his name is Parsu Ram. He appeared during Ramavtar and Krashnavtar, simultaneously  without taking part in the events of these periods. Please refer to :: BHAGWAN PARSHU RAM भगवान् परशुरामsantoshkathasagar.blogspot.com
RAMAVTAR रामावतार :: इस विश्व-विश्रुत अवतार में भगवान् ने महर्षि पुलस्त्य जी के पौत्र एवं मुनिवर विश्रवा के पुत्र रावण-जो कुयोगवश राक्षस हुआ, के द्वारा माता सीता का हरण कर लेने से वानर जातियों की सहायता से अनुचरों सहित रावण का वध करके आर्यावर्त को अन्यायी राक्षसों से मुक्त किया तथा आदर्श राज्य की स्थापना की। यह विशेष ध्यातव्य है कि मानवमात्र की प्रेरणा के लिए उच्चतम आदर्श-स्थापना का यह कार्य उन्होंने पूरी तरह मनुष्य-भाव से किया। राम कथा के लिए सर्वाधिक प्रमाणभूत एवं आधार ग्रन्थ वाल्मीकीय रामायण में भगवान् श्री राम का चरित्र समर्थ मानव-रूप में ही चित्रित है। युद्धादि के समापन के बाद जब सभी देवता उन्हें ब्रह्म मानकर उनकी स्तुति करते हैं, तब भी वे कहते हैं कि: -
आत्मानं मानुषं मन्ये रामं दशरथात्मजम्। 
सोऽहं यश्च यतश्चाहं भगवांस्तद् ब्रवीतु मे॥
मैं तो अपने को दशरथ पुत्र मनुष्य राम ही मानता हूँ। मैं जो हूँ और जहाँ से आया हूँ, हे भगवन् (ब्रह्मा जी)! वह सब आप ही मुझे बताइए। तब ब्रह्मा जी उन्हें सब बताते हैं। लीला के लिए ही सही, पर पूरी तरह मनुष्यता का यह आदर्श अनुपम है और जो प्रेरणा इससे मिलती है, वह स्वयं को हर समय सर्वशक्तिमान् परात्पर ब्रह्म मानते हुए लीला करने से (जैसा कि बाद की रामायणों में वर्णित है) कभी नहीं मिल सकती है।
भगवान् श्री राम अवतार में चार मूर्तियों-रूपों में :- राम, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघन  में प्रकट हुए। लक्ष्मण जी स्वयं भगवान् शेषनाग के अवतार भी हैं। 
Ramavtar constitute the 7th incarnation of Bhagwan Vishnu. He was a descendant of Ikshwaku Vansh-Sury Vansh-Raghu Vansh (which was recognized as Chandr Vansh ultimately). He is the one who is known as Maryada Purushottm. He established ideals for the citizens to follow, during the ages to come. This incarnation has four forms-Ram, Bharat, Lakshman and Shatrughan. Lakshman is the incarnation of Bhagwan Shesh Nag, while Maa Sita is the incarnation of Maa Laxmi. Rudravtar Hanuman was associated along with them to complete the purpose of this Avtar-killing of Ravan and millions of demons-giants. Ravan and Kumbhkaran were the same Jai and Vijay who took birth second time after being killed as Hiranyaksh and Hiranykshipu. Story of this incarnation was written by Mahrishi Balmiki (Balmiki Ramayan) much before the incarnation and narrated by Kak Bhushundi before the sages and saints in Suk Tal (pond, water body) near Hastinapur-on the banks of Holy river Ganga. He said that he had witnessed this event at least 6 times before, in different Kalps (cosmic era-age). The event took place nearly 17,50,000 years  before, from this date. It is 5,243 year after the Maha Bharat-Krashnavtar.
(Some soft wares developed by astrologers depict the event to have happened around 5,500 years ago. The software needs correction since same planetary configuration occurs several times in a Manvantar & a Chatur Yug.)
The events were told and retold in a continuous process by one generation to another and is the core of hundreds of books, in native languages of India, including Ram Charit Manas written by Goswami Tulsidas Ji Maharaj in Avdhi, in Medieval period of history, during the current ages. All the places and rivers are still present and some of the remains are still available, including Ayodhya. Remains of the buildings are present much below the top soil, up to a depth of 500 meters. At least three such formations have been revealed so far buried under the earth.
Bhagwan Shri Ram ruled the earth with happiness, peace, prosperity and justice-a period known as Ram Rajy, for over 10,000 years and went back to Vaikunth Lok-his abode along with the four brothers.
Please refer to :: RAMAYAN रामायण   santoshkathasagar.blogspot.com
RAVAN KATHA रावण कथा   santoshkathasagar.blogspot.com
KRASHNAVTAR कृष्णावतार :: इस अवतार में भगवान् ने देवकी और वसुदेव के घर जन्म लिया था। उनका लालन पालन यशोदा और नंद बाबा ने किया था। इस अवतार में भगवान् ने विशिष्ट लीलाओं द्वारा सबको चकित करते हुए दुराचारी कंस का वध किया और विख्यात महाभारत-युद्ध में गीता-उपदेश द्वारा अर्जुन को युद्ध हेतु तत्पर करके विभिन्न विषम उपायों का भी सहारा लेकर कौरवों के विध्वंश के बहाने पृथ्वी के लिए भारस्वरूप प्रायः समस्त राजाओं को ससैन्य नष्ट करवा दिया। यहाँ तक कि उनके बतलाये आदर्शों की अवहेलना कर मद्यपान में रमने वाले यदुवंश का भी विनाश करवा दिया। भगवान् श्री कृष्ण ने यह शिक्षा दी कि जीवन की राह सीधी रेखा में ही नहीं चलती। धर्म और अधर्म का निर्णय परिस्थिति और अन्तिम परिणाम के आधार पर होता है, न कि परम्परा के आधार पर। भगवान् श्री कृष्ण की बहुत सी लीलाएँ केवल अनुकरणीय नहीं अपितु निरन्तर चिन्तन के योग्य हैं। भगवान् राम का चरित्र अनुकरण के योग्य है। राम के चरित्र का अनुकरण करके कृष्ण-चरित्र को समझ सकें, इसी में ज्ञान की सार्थकता है। भगवान् श्री कृष्ण-चरित्र का वर्णन अनेक पुराणों में है। परन्तु महाभारत के अन्तर्गत आये अंशों के अतिरिक्त शेष बाल-लीला एवं अन्य लीलाओं का प्राचीन रूप हरिवंशपुराण में है; उसके बाद का रूप विष्णुपुराण में तथा सर्वथा परिष्कृत रूप श्रीमद्भागवत पुराण के पूरे दशम स्कन्ध में है।
Bhagwan Shri Krashn was approached in Gau Lok-the nerve centre of entire Universe, Galaxies, Super Galaxies, by all deities, Devs, demigods, Bhagwan Shankar along with Brahma Ji, when Mother Earth complained of ever increasing load over her, due to the demons, sinners, wicked and loss of Dharm and Truth. Bhu Devi-Mother Earth took the shape of a cow to please the Almighty. Bhagwan Shri Krashn promised to do the needful. There was a sequence of various events in the past like boons granted to Vasudev and Devki, Curse to Shri Dama by mother Radha and vice versa. Kans, Shishu Pal (incarnation of Jai, Hiranykshipu and lastly Ravan), along with a number of mighty demons-giants had to be eliminated. Bali had taken birth and his killing had to to be compensated. During Ramavtar a number of saints-sages were promised to be with the God in his close companionship-courtship. A number of Apsras (celestial nymph, typically the wife of a heavenly musician) were blessed by Ashtawakr Ji to be the mate of the incarnation.
Please refer to :: SHRI KRASHN LEELA श्री कृष्ण लीलाsantoshkathasagar.blogspot.com
पाण्डवों के दूत भगवान् श्री कृष्ण   santoshkathasagar.blogspot.com
BHAGWAN SHRI KRASHN :: This incarnation is unique, since a number of deeds had to be performed unlike the previous incarnations. This incarnation too had 4 four forms. Shri Krashn, Balram, Pradumn Ji and Aniruddh Ji. Nar-Narayan, the two incarnations meditating over Badrikashram and Bhagwan Vishnu from Vaekunth Lok too merged with HIM. This incarnation is considered to be complete in all senses.
HE became the eighth son of Devki and Vasudev Ji. Bhagwan Balram-incarnation of Shesh Nag (Lakshman Ji of Ramavtar), became 7th son, but the womb was transferred to Rohini (Nag Mata, a wife of Kashyap Rishi, in her previous incarnation). In this incarnation the Almighty took the Ultimate (Virat Swroop), shape and size, twice. The epic Maha Bharat was dictated by Bhagwan Ved Vyas to Ganpati, who wrote it only after understanding the meaning of the hymen-Shlok, verse. His preaching's to Arjun formed the treatise called Shri Mad Bhagwat Geeta. The human beings of this era must study this to understand how to live and survive the present-current times, specially chapter-18, which is also present over this blog as Salvation-Moksh. He took the incarnation in Dwapar and left the earth in Kalyug. The event-beginning of Kalyug is marked by the handing over of the Chakr Sudarshan by Parshu Ram Ji to him, in Guru Sandipan's Ashram.
Please refer to :: MAHA BHART (3) WAR महाभारत युद्ध    santoshkathasagar.blogspot.com
MAHA BHARAT KATHAEN (2) महाभारत कथाएँ    santoshkathasagar.blogspot.com
MAHA BHARAT KATHA (1) महाभारत कथा    santoshkathasagar.blogspot.com
KARN TEMPLE कर्ण मंदिर & PANDAV TEMPLE-HASTINAPUR  santoshkipathshala.blogspot.com
SHRIMAD BHAGWAT GEETA (1-18) श्रीमद्भागवत गीता  santoshkipathshala.blogspot.com
BUDDHAVTAR  बुद्धावतार :: महाभारत में बुद्ध का अवतार के रूप में तो नहीं ही, व्यक्ति रूप में भी नामोनिशान नहीं है। हिन्दू धार्मिक ग्रन्थों में उनकी पहली उपस्थिति महाभारत का खिल (परिशिष्ट) भाग माने जाने वाले हरिवंश पुराण में है, परन्तु विरोध के रूप में। भागवत महापुराण तक में उन्हें मोहित-भ्रमित करनेवाला ही माना गया है। परन्तु, अथर्ववेद की शाब्दिक स्पष्टता से लेकर महाभारत तक में हिंसा के अत्यधिक विरोध के बावजूद सनातन (हिन्दू) धर्म में इस कदर हिंसा व्याप्त हो गयी कि अहिंसा के प्रबल उपदेशक बुद्ध को जयदेव के समय (12वीं शती) से पहले ही पूरी तरह भगवान् का सहज अवतार मानकर उनके उपदेशों को मान्यता दे दी गयी। गीतगोविन्दम् के प्रथम सर्ग में ही दशावतार-वर्णन के अन्तर्गत जयदेव जी ने बुद्ध की स्तुति में यही कहा है कि आपने श्रुतिवाक्यों (के बहाने) से यज्ञ में पशुओं की हत्या देखकर सदय हृदय होने से यज्ञ की विधियों की निन्दा की। 
He is the 9th principal incarnation of Bhagwan Vishnu (24th out of a total of 25). It has taken the shape a sect-tributary of Hinduism. Bhagwan Buddh diverted  the attention of a segment of people away from Veds. The sole purpose of this Avtar was to  delude-mislead demons and prohibit  animal sacrifice. This incarnation is associated with a period which saw frequent ritualistic sacrifices of both animals and humans, by those demons who took rebirth in the families of those who used to perform prayers devoted to the demigods. He preached Ahinsa-non violence. 
He took birth in the family of King Shuddodhan and Anjna, as his parents, in Kapilvastu. This incarnation too had extreme beautiful figure with golden coloured, glowing skin. Please refer to :: NAN TIEN BUDDHIST TEMPLE BERKELEY WOLLONGONG (NSW-SYDNEY, AUSTRALIA)
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BHAGWAN KALKI कल्कि अवतार :: यह भविष्य का अवतार है। कलियुग का अन्त समीप आ जाने पर जब अनाचार बहुत बढ़ जाएगा और राजा लोग लुटेरे हो जाएँगे, तब सम्भल नामक ग्राम के विष्णुयश नामक ब्राह्मण के घर भगवान् का कल्कि अवतार होगा।उनके द्वारा अधर्म का विनाश हो जाने पर पुनः धर्म की वृद्धि होगी। धर्म की वृद्धि होना ही सत्य युग (कृतयुग) का आना है।
पूर्व काल में देवताओं और असुरों में घोर संग्राम हुआ। इसमें दैत्यों ने देवताओं को परास्त कर दिया। तब देवता गण त्राहि त्राहि पुकारते हुए  भगवान् की शरण में गये। उस संग्राम में अन्ततोगत्वा राक्षसों की  हार हुई। वे ही राक्षस पुनः कलयुग में मानव रूप उत्पन्न हुए तो भगवान ने राजा शुद्दोधन के पुत्र रूप में अवतार ग्रहण किया और उनसे वैदिक धर्म का परित्याग कराया। वही लोग बौद्ध कहलाये। ये लोग वेद धर्म से वंचित होकर पाखण्डी बन गये। उन्होंने नरक में ले जाने वाले कार्य आरम्भ कर दिये। वे सब के सब कलयुग के अन्त में वर्ण संकर होंगे और नीच लोगों से दान, घूस (रिश्वत-उत्कोच) लेंगे। वे डाकू और दुराचारी भी होंगे। धर्म का चोला पहने हुए लोग अधर्म का आचरण करेंगे। राजा रूप धारी म्लेच्छ लोगों का शोषण-भक्षण करेंगे।
10th AVTAR :: BHAGWAN KALKI WILL APPEAR IN THIS KALI YUG IN A BRAHMAN FAMILY TO ABOLISH THE RULERS WHO ARE ADAMANT AT RUINING THE DHARM.
24 INCARNATION अवतार ::
(1). सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार ने कौमार सर्ग में ब्राह्मणों के रूप में अवतार ग्रहण करके, अत्यन्त कठिन ब्रह्मचर्य का पालन किया।
(2). इस संसार के कल्याण के लिये समस्त यज्ञों के स्वामी उन भगवान् ने ही रसातल में गई हुई पृथ्वी को निकालने के लिये सूकर रूप ग्रहण किया। 
(3). ऋषियों की सृष्टि में उन्होंने देवर्षि नारद के रूप में तीसरा अवतार ग्रहण किया और सात्वत तन्त्र का (नारद पाञ्चरात्र) उपदेश दिया। कर्मों के द्वारा किस प्रकार बन्धनों से मुक्ति का वर्णन किया। 
(4). धर्म की पत्नी मूर्ति के गर्भ से नर-नारायण के रूप में चौथा अवतार ग्रहण किया और ऋषि बनकर मन और इन्द्रियों के सर्वथा संयम करके कठिन तपस्या की। 
(5). वे सिद्धों के स्वामी कपिल के रूप में प्रकट हुए और तत्वों का निर्णय करने वाले साँख्य शास्त्र का आसुरि नामक  उपदेश दिया। इनके पिता कर्दम ऋषि थे। इनकी माता देवहूती ने भगवान् विष्णु से उनके समान पुत्र की कामना की। इसलिए भगवान् विष्णु खुद उनके गर्भ से पैदा हुए। जब उनके पिता कर्दम संन्यासी बन जंगल में जाने लगे तो देवहूती ने खुद अकेले रह जाने की स्थिति पर दुःख जताया। इस पर ऋषि कर्दम देवहूती को इस बारे में पुत्र से ज्ञान मिलने की बात कही। वक्त आने पर कपिल मुनि ने जो ज्ञान माता को दिया, वही साँख्य शास्त्र कहलाता है।
इसी तरह पावन गंगा के स्वर्ग से धरती पर उतरने के पीछे भी कपिल मुनि का शाप भी संसार के लिए कल्याणकारी बना। भगवान् श्री राम के पूर्वज राजा सगर के द्वारा किए गए यज्ञ का घोड़ा इंद्र ने चुराकर कपिल मुनि के आश्रम के करीब छोड़ दिया। तब घोड़े को खोजते हुए वहाँ पहुँचे राजा सगर के साठ हजार पुत्रों ने कपिल मुनि पर चोरी का आरोप लगाया। इससे कुपित होकर मुनि ने राजा सगर के सभी पुत्रों को भस्म कर दिया। राजा सगर के वंशज भगीरथ ने घोर तपस्या कर स्वर्ग से माँ गंगा को स्वर्ग से जमीन पर उतारा और अपने पूर्वजों को शापमुक्त किया।
(6).अनसूया के वर माँगने पर छटे अवतार के रूप में वे अत्रि ऋषि के पुत्र दत्तात्रेय हुए और अलर्क एवं प्रह्लाद को ब्राह्मण ज्ञान का उपदेश दिया। 
(7). सातवीं बार उन्होंने रूचि प्रजापति की पत्नी आकूति के पुत्र यज्ञ के रूप में अवतार लिया और अपने पुत्र याम आदि देवताओं के साथ स्वायम्भुव मन्वन्तर की रक्षा की। 
(8). राजा नाभि की पत्नी मेरु देवी के गर्भ से ऋषभदेव के रूप में भगवान् ने आठवाँ अवतार ग्रहण किया और इस रूप में उन्होंने परमहँसों का वह मार्ग दिखाया जो समस्त आश्रमियों के लिये वंदनीय है।
(9). ऋषियों की प्रार्थना पर वे नौवमीं बार राजा पृथु के रूप में प्रकट हुए। इस अवतार में उन्होंने पृथ्वी से समस्त ओषधियों का दोहन किया। 
(10). चाक्षुष मन्वन्तर के अंत में जब पृथ्वी सहित सारी त्रिलोकी समुद्र में डूब रही थी, तब मत्स्य के रूप में दसवाँ अवतार ग्रहण किया और पृथ्वी रूपी नौका पर बैठाकर अगले मन्वन्तर के अधिपति वैवस्वत मनु की रक्षा की। 
(11). समुद्र मंथन के समय ग्यारहवाँ अवतार कच्छप के रूप में लिया और मन्दराचल पर्वत को अपनी पीठ पर स्थिर-धारण किया। 
(12).  धन्वन्तरि के रूप में अमृत कलश लेकर समुद्र मन्थन में प्रकट हुए। 
(13). मोहिनी अवतार में भगवान् श्री विष्णु ने अमृत कलश लेकर समुद्र मंथन के उपरान्त राक्षसों को मोहित किया और देवताओं को अमृत पिलाया। 
(14). चौदहवें अवतार में उन्होंने नरसिंह रूप धारण किया और हिरण्य कशिपु की छाती अपने नखों से अनायास इस प्रकार फाड़ डाली जैसे चटाई बनानेवाला सींक को चीर डालता है। 
(15). वामन रूप धरकर उन्होंने पंद्रहवीं वार दैत्यराज बाहुबली से तीन डग-पग के बराबर जमीन माँगीं और सारी त्रिलोकी को दो पग में ही नाप लिया।
(16). परशुराम अवतार में उन्होंने ब्राह्मण द्रोही क्षत्रियों को 21 बार नष्ट किया।  
(17). सत्यवती के गर्भ से उत्पन्न पराशर नन्दन भगवान् वेद व्यास ने वेदों की कई शाखाएं करीं ताकि जाएँ उनको आसानी से समझ सकें। 
(18). देवताओं का कार्य सम्पन्न करने के लिए उन्होंने रामावतार में रावण सहित अन्यानेक राक्षसों का वध किया तथा सेतुबन्ध का निर्माण किया। भरत जी, लक्ष्मण जी और शत्रुघन जी भी अवतारी पुरुष थे। 
(19). यदुवंश में भगवान् श्री कृष्ण और उनके बड़े भाई बलराम के रूप में प्रकट होकर पृथ्वी का भार उतारने में सहायता की। प्रदुयम्न जी भगवान् श्री कृष्ण के पुत्र (कामदेव) और अनिरुद्ध जी उन्हीं के पौत्र के रूप में प्रकट हुए। 
भगवान् श्री कृष्ण अवतार नहीं, अपितु अवतारी हैं। उनकी गिनती अवतारों में नहीं होती। उनके चार अंश और हैं :- (19.1). केशका अवतार, (19.2) सुतपा तथा पृश्नि पर कृपा करनेवाला अवतार, (19.3) बलराम-संकर्षण  और (19.4) परब्रह्म। 
(20). कलियुग में मगधदेश-बिहार में देवताओं के द्वेषी दैत्यों को मोहित करने के लिए अजन के पुत्र में  बुद्धावतार हुआ 
(21). कलियुग का अन्त करीब होने पर राजा लोग प्रायः लुटेरे हो जायेंगे, तब जगत के रक्षक भगवान् विष्णु यश शर्मा नामक ब्राह्मण के घर कल्कि रूप में अवतीर्ण होंगे। 
(22). उपयुक्त अवतार तो  हैं ही, इनके अतिरिक्त अन्य दो हैं :- हंस और हयग्रीव।
INCARNATIONS OF BHAGWAN SHIV भगवान् शिव के अवतार :: There is no difference between various incarnations of the Almighty-Shri Krashn :- Brahma, Vishnu and Mahesh. The trio reproduce them selves as fragment, projection, fraction of themselves, as and when required by the circumstances, for protecting their devotees-humans. Various incarnations of Bhagwan Shiv are hideously important as well as considered to be the most significant-important and effective for the safety of his devotees. Pouranic scriptures contain occasional references to "ansh, fraction, piece, fragment" Avtars. The Ling Puran speaks of twenty-eight forms of Bhagwan Shiv. Shiv Maha Puran describes these incarnation at length.
अंशावतार :: दुर्वासा, हनुमान, महेश, वृषभ, पिप्पलाद, वैश्यानाथ, द्विजेश्वर, हंसरूप, अवधूतेश्वर, भिक्षुवर्य, सुरेश्वर, ब्रह्मचारी, सुनटनतर्क, द्विज, अश्वत्थामा, किरात और नतेश्वर। 
तंत्र से सम्बन्धित अवतार :: (1). महाकाल, (2). तारा, (3). भुवनेश, (4). षोडश, (5). भैरव, (6). छिन्न मस्तक, (7). धूम्रवान, (8. बगलामुखी, (9. मातंग और (10. कमल। 
अन्य ग्यारह अवतार :: (1). कपाली, (2). पिंगल, (3). भीम, (4). विरुपाक्ष, (5). विलोहित, (6). शास्ता, (7). अजपाद, (8). आपिर्बुध्य, (9). शम्भु, (10). चण्ड तथा (11). भव। 
ब्रह्मा जी के आग्रह करने पर  भगवान् शिव ने जिस श्रष्टि की रचना की उसमें 10 रूद्र (रोने वाले) उत्पन्न हुए, जिन्हें ब्रह्मा जी ने दसौं दिशाओं का दिक्पाल नियुक्त कर दिया।
VEER BHADR वीरभद्र :: This incarnation took place, when Bhagwan Shiv grew furious, pulled a lock of his matted, lock-hair and dashed it over Kaelash Parwat, as soon as he came to know of the incident, in which Mata Sati sacrificed her self during Daksh Yagy. Vir Bhadr destroyed Daksh's Yagy (fire sacrifice) and severed Daksh's head as per Bhagwan Shiv's instructions-directives.
दक्ष द्वारा आयोजित यज्ञ में माता सती ने अपनी देह का योगाग्नि में त्याग किया था। भगवान् शिव ने ज्ञात होने पर  क्रोध में अपने सिर से एक जटा उखाड़ी और उसे रोष पूर्वक कैलाश पर्वत के पर पटक दिया। उस जटा के पूर्वभाग से महा भंयकर वीरभद्र प्रकट हुए। भगवान् शिव के इस अवतार ने दक्ष के यज्ञ का विध्वंस कर दिया और दक्ष का सिर काटकर उसे मृत्युदंड दिया। 
BHAERAV भैरव 
::  This incarnation was to protect the fragmented body (pind पिंड) of Mata Sati which was divided by Bhagwan Vishnu in 52 segments-pieces with Sudarshan Chakr. Mata Sati evolved Yogic-Sacrificial fire which engulfed her, in protest against her father Daksh's abnormal behaviour, when he insulted Bhagwan Shiv ignorantly. Bhagwan Shiv wandered all over the earth. Ultimately these pieces fell over various places on earth resulting in the establishment of 52 Shakti Peeth. Bhaerav (the terrible or frightful) is often called Haroun, Bhairon, Hardy, Bhaeroun Ji, is the fierce manifestation of Shiv associated with annihilation. 
KAL BHAERAV काल भैरव ::  Bhagwan Shiv decapitated the 5th head of Brahma Ji's and thus was named Kal Bhaerav. 
भैरव को भगवान शंकर का पूर्ण रूप बताया गया है। माया से प्रभावित होकर भगवान्  ब्रह्मा व भगवान् विष्णु स्वयं को एक दूसरे से श्रेष्ठ मानने लगे। तभी वहाँ एक  वहां तेज-पुंज प्रकट हुआ जिसके मध्य एक पुरुषाकृति दिखाई पड़ी, जिसे  देखकर ब्रह्मा जी ने कहा, "चंद्र शेखर तुम मेरे पुत्र हो। अत: मेरी शरण में आओ"। ब्रह्मा जी की ऐसी बात सुनकर भगवान् शिव को क्रोध आ गया। उन्होंने उस पुरुषाकृति से कहा, "काल की भांति शोभित होने के कारण आप साक्षात काल राज हैं। भीषण होने से भैरव हैं"। भगवान् शिव से इन वरों को प्राप्त कर कालभैरव ने अपनी अंगुली के नाखून से ब्रह्मा जी  के पाँचवें सिर को काट दिया। ब्रह्मा जी का पांचवां सिर काटने के कारण भैरव ब्रह्म हत्या के पाप से ग्रस्त हो गए। ब्रह्मा जी का कटा हुआ सिर भगवान् शिव की जाँघ पर चुपक गया और वे कापालिक कहलाये। काशी में भैरव को ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्ति मिल गई। काशी वासियों के लिए भैरव की भक्ति अनिवार्य बताई गई है।
भैरवाष्टक :: देवताओं के युद्ध में अन्धक (भगवान् शिव का पुत्र, जिसे हिरण्याक्ष ने पाला था), पैदल ही गदा लेकर भगवान् शिव की ओर दौड़ा, तो उन्होनें इन्द्र और ब्रह्मा जी सहित समस्त देवताओं को अपने शरीर में छुपा लिया और नन्दीश्वर को छोड़कर, पर्वत पर पैरों के बल खड़े होकर (1). अति भयंकर भैरव रूप धारण कर लिया और उसका ह्रदय विदीर्ण कर दिया। उस समय वे भयानक दाढ़ों वाले करोड़ों सुरों के समान प्रकाशमान, बाघम्बर, पहने, जटा से युक्त, सर्प के हार से अलंकृत ग्रीवा वाले और दस भुजा और तीन नेत्रों से युक्त थे। अन्धक की गदा से उनके सर से खून की धाराएँ बहने लगीं। (2). पूर्व दिशा की धारा से अग्नि की प्रभा वाले, कमल की माला से शोभित विद्याराज, (3). दक्षिण दिशा से प्रेत से मण्डित, काले अञ्जन की प्रभा वाले कालराज, (4). पश्चिम से अलसी के फूल के समान पत्र, से शोभित कामराज, (5). उत्तर से चक्र माला से शोभित शूल लिए हुए, सोमराज, (6). घाव के रक्त से इन्द्रधनुष के समान चमक वाले शूल लिए हुए, स्वछंदराज, (7). पृथ्वी पर गिरे हुए रक्त से सौभाञ्जन-सहिजनके समान शूल लिये हुए शोभायुक्त ललितराज और (8). आठवें विघ्नराज  नामक भैरव उत्पन्न हुए।
HANUMAN JI  राम भक्त हनुमान :: This is the incarnation of Bhagwan Shiv which took place to help the Almighty, when he took the incarnation along with his three more forms as Ram, Bharat, Laxman and Shatrughan to eliminate Ravan. He is called Ram Bhakt Hanuman. He under took to serve Shri Ram in all adversities. He is a role model of devotion. His devotion is ideal. He always helps the worshippers as and when they are in distress and call him. He was born out of Man Anjali, called Pawan Putr and the son of Vanar king Kesri, from the sperms of Bhagwan Shiv ejected out during Mohini Avtar.
देवताओं और दानवों को अमृत बाँटते हुए भगवान् विष्णु के मोहिनी रूप को देखकर लीलावश कामातुर भगवान् शिव का वीर्यपात हो गया। सप्त ऋषियों ने उस वीर्य को कुछ पत्तों में संग्रहीत कर लिया। समय आने पर सप्तऋषियों ने भगवान् शिव के वीर्य को पवन देव के माध्यम से वानरराज केसरी की पत्नी अंजनी गर्भ में स्थापित कर दिया, जिससे अत्यंत तेजस्वी एवं प्रबल पराक्रमी श्री हनुमानजी उत्पन्न हुए।
Please refer to :: HANUMAN JI MAHA RAJ राम भक्त हनुमानsantoshsuvichar.blogspot.com

KIRAT  किरात (भील) :: 
Arjun started praying to Bhagwan Shiv on the advice of Bhagwan Shri Krashn for obtaining various Ashtr-Shatr including Pashupashtr, when Bhagwan Shiv appeared before him as a Bheel (tribal, native) and killed a demon in the form of pig. Both of them claimed that it was killed by him. Arguments resulted in a war. Ultimately, Arjun offered a garland over the Shiv Ling he was praying to, to be blessed to win the Kirat. The garland immediately switched over to the neck of Bhagwan Shiv. Now, Arjun recognised him and fell over his feet. Bhagwan Shiv blessed him, since he had proved to be worthy of the different weapons, he was looking for, from Bhagwan Shiv. 

भगवान श्री कृष्ण के कहने पर अर्जुन ने पाशु पात्र सहित अन्य दिव्यास्त्र प्राप्त करने के लिये वनवास के दौरान अर्जुन ने भगवान शंकर को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की, दुर्योधन द्वारा भेजा हुआ मूड़ नामक दैत्य अर्जुन को मारने के लिए शूकर (सूअर) का रूप धारण कर वहाँ आया। अर्जुन और भगवान् शिव ने किरात वेष धारण कर शूकर पर अपने बाण से प्रहार किया। अर्जुन उन्हें पहचान नहीं पाया और शूकर का वध किसके  बाण से हुआ है, इस बात  पर दोनों में विवाद होने लगा। भगवान शंकर ने अर्जुन की पात्रता की परीक्षा ली और उनकी योग्यता देखकर अर्जुन को समस्त वांछित अस्त्र-शस्त्र प्रदान किये। 
PIPPLAD पिप्पलाद :: Dadhichi swallowed the weapons (Ashtr-Shashtr) given to him for safe custody. Demigods requested him to return them in an hour of need. Dadhichi showed his inability and offered to leave his body through Yog Vidya-Kriya. His body was utilised by Dev Shilpi Vishw Karma to produce Vajr. His death was a set back to his pregnant wife Suvrcha. Her son questioned the demigods in this regard, who told that it all happened due to the Saturn. He grew angry and punished Saturn, by striking his leg with a stick, making him lame. This act led to Brahma Ji name him as Pipplad. One suffering from the trouble caused by Saturn, may pray to Pipplad. Its advised that one should pray to Saturn in stead of punishing him, who is duty bound due to ones own deeds in previous births-incarnations.
शनि पीड़ा का निवारण पिप्पलाद की कृपा से ही संभव हो सकता है। पिप्पलाद ने देवताओं से अपने पिता दधीचि द्वारा जन्म से पूर्व मृत्यु का कारण पूछा तो उन्हें बताया गया कि शनिग्रह की वक्र दृष्टि के चलते ही ऐसा कुयोग बना। पिप्पलाद यह सुनकर बड़े क्रोधित हुए। उन्होंने शनि को नक्षत्र मंडल से गिरने का श्राप दे दिया। शाप के प्रभाव से शनि उसी समय आकाश से गिरने लगे। देवताओं की प्रार्थना पर पिप्पलाद ने शनि को इस बात पर क्षमा किया कि शनि जन्म से लेकर 16 साल तक की आयु तक किसी को कष्ट नहीं देंगे। तभी से पिप्पलाद का स्मरण करने मात्र से शनि की पीड़ा दूर हो जाती है। ब्रह्मा जी ने ही प्रसन्न होकर शिव के इस अवतार सुवर्चा के पुत्र का नामकरण पिप्पलाद किया। 
नंदीश्वर :: पशुपति नाथ भगवान् शिव सभी जीवों के पूज्य हैं। नंदी (बैल) धर्म-कर्म के प्रतीक हैं। वंश नाश होते देख पितरों ने ब्रह्मचारी शिलाद मुनि से संतानोतपत्ति के लिये कहा। तब शिलाद ने अयोनिज और मृत्युहीन संतान की कामना से भगवान् शिव की तपस्या की। भगवान् शिव ने स्वयं शिलाद के यहाँ पुत्र के रूप में जन्म लेने का वरदान दिया। कुछ समय बाद भूमि जोतते समय शिलाद को खेत में एक बालक मिला। जिसका नाम नंदी रखा गया।भगवान् शिव ने नंदी को अपना गणाध्यक्ष बनायाऔर वे नंदीश्वर हो गए। मारुतों की पुत्री सुयशा के साथ नंदीश्वर का विवाह हुआ। 
अश्वत्थामा :: आचार्य द्रोण पुत्र अश्वत्थामा काल, क्रोध, यम व भगवान् शिव के अंशावतार हैं। आचार्य द्रोण ने भगवान् शिव को पुत्र रूप में पाने की लिए घोर तपस्या की थी और भगवान् शिव ने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। सवन्तिक रुद्र-भगवान् शिव ने अपने अंश से द्रोण के बलशाली पुत्र अश्वत्थामा के रूप में जन्म लिया। ऐसी मान्यता है कि अश्वत्थामा अमर (स्वेच्छा से कल्पान्त में देह त्याग) हैं तथा वह आज भी धरती पर विचरण कर रहे हैं।
शरभावतार :: शरभावतार में भगवान् शिव का स्वरूप आधा मृग (हिरण) तथा शेष शरभ पक्षी (आख्यानिकाओं में वर्णित आठ पैरों वाला जंतु, जो शेर से भी अधिक शक्तिशाली था)  के रूप में, नृसिंह भगवान् की क्रोधाग्नि को शांत करने के लिए प्रकट हुए। हिरण्य कश्यपू के वध के पश्चात भी जब भगवान् नृसिंह का क्रोध शांत नहीं हुआ तो देवता भगवान् शिव की शरण में गये। पहले तो शरभ रूपी भगवान् शिव ने नर सिंह की स्तुति की, जब उनकी क्रोधाग्नि शांत नहीं हुई तो शरभ रूपी भगवान् शिव, अपनी पूँछ में नृसिंह को लपेटकर ले उड़े और  भगवान् नृसिंह की क्रोधाग्नि को शांत किया। भगवान् विष्णु ने शरभ से क्षमा याचना की और अतयन्त विनम्र भाव से उनकी स्तुति की। 
गृहपति :: नर्मदा तट पर धर्मपुर में मुनि विश्वानर तथा उनकी पत्नी शुचिष्मती निवास करते थे। मुनि विश्वनार ने काशी  में घोर तप द्वारा भगवान् शिव के वीरेश लिंग की आराधना की। एक दिन मुनि को वीरेश लिंग के मध्य एक बालक दिखाई दिया तो मुनि ने बाल रूपधारी भगवान् शिव की पूजा की। उनकी पूजा से प्रसन्न होकर भगवान शिव  ने शुचिष्मति के गर्भ से जन्म लेने का वरदान दिया। कालांतर में भगवान् शिव शुचिष्मती के गर्भ से पुत्र रूप में प्रकट हुए। पितामह ब्रह्मा जी  ने  उस बालक का नाम गृहपति रखा। 
दुर्वासा :: सती अनुसूइया के पति महर्षि अत्रि ने ब्रह्मा जी के निर्देशानुसार पत्नी सहित ऋक्षकुल पर्वत पर पुत्र कामना से घोर तप किया। त्रिदेव भगवान् ब्रह्मा, विष्णु और महेश उनके आश्रम पर परीक्षा लेने पहुँचे तो अनुसूइया ने उन्हें बालक बना दिया। अनुसूइया ने बृह्माणी, माता पार्वती और लक्ष्मी जी के अनुरोध पर उन्हें मुक्त किया और तीनों को अपने पुत्र रूप में प्राप्त करना चाहा। ब्रह्माजी के अंश से चंद्रमा हुए, जो देवताओं द्वारा समुद्र में फेंके जाने पर, उससे प्रकट हुए। भगवान् विष्णु के अंश से श्रेष्ठ संन्यास-साँख्य पद्धति को प्रचलित करने वाले दत्तात्रेय उत्पन्न हुए और रुद्र के अंश से मुनिवर दुर्वासा ने जन्म लिया।
वृषभ :: भगवान् विष्णु दैत्यों को मारने पाताल गए तो उन्हें वहाँ बहुत सी सुंदर स्त्रियाँ मिलीं, जिनसे भगवान् विष्णु ने अनेक  पुत्र उत्पन्न किए, जिन्होंने पाताल से पृथ्वी पर्यन्त बड़ा उत्पात मचाया। ब्रह्मा जी ऋषि-मुनियों को लेकर भगवान् शिव के पास गए और रक्षा के लिए प्रार्थना की। भगवान् शंकर ने वृषभ रूप धारण कर भगवान् विष्णु के पुत्रों का संहार किया। 
यतिनाथ :: अर्बुदाचल पर्वत के समीप भगवान् शिव भक्त आहुक-आहुका भील दम्पत्ति निवास करते थे। भगवान् शिव यतिनाथ-अतिथि बनकर उनके घर आए। उन्होंने भील दम्पत्ति के घर रात व्यतीत करने की इच्छा प्रकट की। आहुका ने अपने पति से  गृहस्थ की मर्यादा अनुसार यति को घर में विश्राम करने कि लिए प्रार्थना की। आहुक धनुष-बाण लेकर रक्षा हेतु बाहर ठहरा। दिन निकलने पर आहुका और यति ने देखा कि वन्य प्राणियों ने आहुक को मार डाला है। यतिनाथ बहुत दु:खी हुए तो आहुका ने कहा कि वे शोक न करें। अतिथि सेवा में प्राण विसर्जन धर्म है और उसका पालन कर आहुक धन्य हो गये हैं। आहुका ने अपने पति का शवदाह किया, तो भगवान् शिव ने उसे दर्शन देकर अगले जन्म में पुन: अपने पति से मिलने का वरदान दिया।
कृष्णदर्शन :: इक्ष्वाकु वंशीय श्राद्धदेव की नवमी पीढ़ी में राजा नभग का जन्म हुआ। नभग विद्या-अध्ययन के लिये गुरुकुल गए। उनके भाइयों ने परस्पर राज्य का विभाजन कर लिया। नभग ने अपने पिता से इस सम्बन्ध में बात की तो उन्होंने  कहा कि वह यज्ञ परायण ब्राह्मणों के मोह को दूर करते हुए उनके यज्ञ को सम्पन्न करके, उनके धन को प्राप्त करे। नभग ने यज्ञभूमि में पहुँचकर वैश्य देव सूक्त के स्पष्ट उच्चारण द्वारा यज्ञ संपन्न कराया। अंगारिक ब्राह्मण, यज्ञ अवशिष्ट धन नभग को देकर स्वर्ग को चले गए। भगवान् शिव ने  कृष्णदर्शन रूप में प्रकट होकर कहा कि  यज्ञ के अवशिष्ट धन पर केवल उनका अधिकार है। विवाद होने पर कृष्णदर्शन रूपधारी भगवान् शिव ने उसे अपने पिता से ही निर्णय कराने को कहा। नभग के पूछने पर श्राद्धदेव ने कहा-वह पुरुष भगवान् शिव हैं और यज्ञ में अवशिष्ट वस्तु उन्हीं की है। पिता की बातों को मानकर नभग ने भगवान् शिव की स्तुति की।
अवधूत :: देव गुरु वृहस्पति और अन्य देवताओं को साथ लेकर देवराज इंद्र भगवान् शिव  के दर्शन के लिए कैलाश पर्वत पर गए। इंद्र की परीक्षा लेने के लिए भगवान् शिव  ने अवधूत रूप धारण कर, उनका मार्ग अवरुद्ध कर दिया। इंद्र ने अवज्ञा पूर्वक बार-बार अवधूत से उनका परिचय पूछा, तो भी वे  मौन रहे। क्रोधित  इंद्र ने ज्योंही  अवधूत पर प्रहार करने के लिए वज्र छोडऩा चाहा, त्योंही उनका हाथ स्तंभित हो गया। यह देखकर गुरु वृहस्पति ने भगवान् शिव को पहचान कर अवधूत की बहुविधि स्तुति की। इंद्र का  अंहकार मिट गया और भगवान् शिव ने उन्हें क्षमा कर दिया। 
भिक्षुवर्य ::  विदर्भ नरेश सत्यरथ को शत्रुओं ने मार डाला। उसकी गर्भवती पत्नी ने शत्रुओं से छिपकर अपने प्राण बचाए। समय आने पर उसने एक पुत्र को जन्म दिया। रानी जब जल पीने के लिए सरोवर गई तो एक उसे घडिय़ाल ने उन्हें अपना आहार बना लिया। बालक भूख-प्यास से तड़पने लगा। भगवान् शिव की प्रेरणा से एक भिखारिन वहाँ आई। भगवान् शिव ने भिक्षुक का रूप धारण कर बालक का परिचय दिया और उसके पालन-पोषण का निर्देश दिया और स्वयं को प्रकट किया। बालक ने बड़े होकर भगवान् शिव की कृपा से  दुश्मनों को हराकर राज्य प्राप्त किया। 
सुरेश्वर :: व्याघ्रपाद का पुत्र उपमन्यु अपने मामा के घर पलता था। वह सदा दूध की इच्छा से व्याकुल रहता था। उसकी मां ने उसे अपनी अभिलाषा पूर्ण करने के लिए भगवान् शिव की शरण में जाने को कहा। उपमन्यु ने वन में जाकर "ऊँ नम: शिवाय" का जाप किया। भगवान् शिव ने सुरेश्वर (इंद्र) का रूप धारण कर उसे दर्शन दिया और स्वयं की अनेक प्रकार से निंदा की। इस पर उपमन्यु क्रोधित होकर उन्हें को मारने के लिए खड़ा हुआ। उपमन्यु को अपने में दृढ़ भक्ति और अटल विश्वास देखकर भगवान् शिव ने उसे दर्शन दिया और क्षीरसागर के समान एक अनश्वर सागर उसे प्रदान किया। उसकी प्रार्थना पर भगवान् शिव ने उसे परम भक्ति और अमर पद प्रदान किया। 
ब्रह्मचारी :: दक्ष यज्ञ में प्राण त्यागने के बाद माता  सती ने पर्वतराज हिमालय के घर जन्म लिया और भगवान् शिव को पुनः पति रूप में पाने के लिए घोर तप किया। माँ पार्वती की परीक्षा लेने के लिए भगवान् शिव ब्रह्मचारी का रूप धारण कर उनके पास पहुँचे। माँ पार्वती ने ब्रह्मचारी को देख उनकी विधिवत पूजा की। जब ब्रह्मचारी ने माँ पार्वती से उनके तप का उद्देश्य पूछा तो बृह्मचारी ने शिव निंदा की। उन्हें श्मशान वासी व कापालिक बताया तो माँ पार्वती बहुत क्रोधित हुईं। माँ पार्वती की भक्ति व प्रेम को देखकर भगवान् शिव ने स्वयं को प्रकट किया। 

सुनट नर्तक ::
 माँ पार्वती के पिता हिमाचल से उनकी पुत्री का हाथ मागंने के लिए 
भगवान् शिव ने सुनट नर्तक का वेष धारण किया। हाथ में डमरू लेकर भगवान् शिव हिमालय के घर पहुँचे और नृत्य करने लगे। नटराज शिव ने सुंदर और मनोहर नृत्य किया। उन्होंने नैना के कहने पर अपना ब्रह्मा व विष्णु रूप प्रकट किया तो भी कोई उन्हें पहचान नहीं पाया। हिमाचल ने नटराज से इनाम माँगने को कहा तो नटराज शिव ने माँ पार्वती  को माँग लिया। नटराज माँ पार्वती को दर्शन देकर चले गए। मैना और हिमाचल को दिव्य ज्ञान हुआ और उन्होंने माँ पार्वती का कन्यादान भगवान्  शिव को करने का निश्चय किया। 
यक्ष :: देवताओं व असुरों द्वारा किए गए समुद्र मंथन से प्राप्त हलाहल को भगवान् शिव  ने ग्रहण कर अपने कंठ में धारण किया। अमृतपान करने से सभी देवता अमर और अभिमानी गये और स्वयं  को सबसे अधिक बलशाली मानने लगे। भगवान् शिव ने यक्ष का रूप धारण कर देवताओं से  एक तिनका उठाने को कहा। पूरी शक्ति लगाने पर भी देवता उस तिनके को उठा नहीं पाए। उसी समय एक आकाशवाणी हुई जिसने यक्ष को सब गर्वों का विनाशक भगवान् शिव बताया।    
ब्रह्मा जी के अवतार ::
चन्द्र देव :: ब्रह्मा जी के अवतारों में चंद्रदेव और काम देव प्रमुख हैं। चंद्र देव ब्रह्मा जी के मानस पुत्र महर्षि अत्रि और उनकी पत्नी अनुसूया की सन्तान हैं। जब भगवान् विष्णु, ब्रह्मा जी और भगवान् शिव अनुसूया के सतीत्व की परीक्षा करने पहुँचे तो अनुसूया ने उन्हें बच्चा बना दिया। माता  लक्ष्मी पार्वती और ब्राह्मणी के अनुरोध पर उन्हें फिर से उनका स्वरूप प्रदान किया। त्रिमुति-त्रिदेवों के आशीर्वाद से त्रिदेवों के स्वरूप दत्तात्रेय, दुर्वासा और चंद्र देव अनुसूया और अत्रि को पुत्र रूप में प्राप्त हुए। चन्द्रदेव ब्रह्मा जी के स्वरूप हैं।
काम देव :: 
कामो जज्ञे प्रथमो नैनं देवा आपु: पितरो न मत्र्या:।
ततस्त्वमसि ज्यायान् विश्वहा महांस्तस्मैते काम॥[अथर्ववेद 9.2.19]
कामदेव सर्वप्रथम उत्पन्न हुए जिन्हें देव, पितर और मनुष्य भी न पा सके। इसलिए काम सबसे बड़ा विश्वविजयी है।
कामदेव ब्रह्मा जी के स्वरूप हैं और वे ब्रह्मा जी के हृदय से उत्पन्न हुए :-
हृदि कामो भ्रुव: क्रोधो लोभश्चाधरदच्छदात।[श्रीमद्भागवत 3.12.26]
ब्रह्मा के हृदय से काम, भौंहों से क्रोध और नीचे के होंठ से लोभ उत्पन्न हुआ।
भगवान् शिव द्वारा भस्म किये जाने पर कामदेव भगवान् श्री कृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न जी के शरीर में व्याप्त हो गए। जब प्रद्युम्न जी अश्वमेध यज्ञ के लिए घोड़े को लेकर निकले तो एक वन में ब्रह्मा जी, चंद्र देव और कामदेव उनके शरीर में व्याप्त हो गए। प्रद्युम्न जी भगवान् श्री कृष्ण के अवतार में उनकी चार मूर्तियों में से तीसरी मूर्ति थे दूसरे बलराम जी और चौथे अनिरुद्ध जी। 
Please refer to :: KAM DEV-THE DEITY OF LOVE काम देव
santoshkathasagar.blogspot.com

 
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संतोष महादेव-सिद्ध व्यास पीठ, बी ब्लाक, सैक्टर 19, नौयडा

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